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सौर ऊर्जा से पूरा हो सकेगा 24 घंटे बिजली आपूर्ति का सपना

हिंदुस्तान में हर घर और हर व्यावसायिक केंद्र को 24 घंटे बिना रुकावट के बिजली आपूर्ति एक बड़ी समस्या बनी हुई है। अभी हाल ही में हुए एक सर्वे के मुताबिक, उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में भी बिजली आपूर्ति का संकट लगातार बना हुआ है। इसके अलावा बिजली के बिलों से लोग परेशान हैं। जिन घरों में दो-चार बल्ब और एक-दो पंखे भी लगे हैं, उनका बिल भी हज़ारों रुपये महीने का आ रहा है। दिल्ली जैसे राज्य में पिछली आम आदमी पार्टी की पिछली सरकार ने बिजली न बनाने के बावजूद 24 घंटे 200 यूनिट तक मुफ़्त और उससे ऊपर की यूनिट पर सस्ती बिजली की उपलब्धता के सपने को ज़रूर पूरा किया, बाक़ी किसी भी राज्य या शहर में अभी तक यह मुमकिन नहीं हो सका है। इसकी वजह बिजली उत्पादन के सीमित संसाधन और कोयले पर बिजली आपूर्ति की बड़ी निर्भरता है। सौर ऊर्जा यानी ग्रीन एनर्जी एक ऐसा प्राकृतिक स्रोत है, जिसकी हर प्राणी, पेड़-पौधे को तो ज़रूरत होती ही है, इससे घरों में रोशनी फैलाने से लेकर उद्योग धंधे भी चलाये जा सकते हैं और इसका सबसे सस्ता और सुलभ माध्यम हैं- सोलर पैनलों का विस्तार। आज दिल्ली हो चाहे मुंबई हो, कलकत्ता हो चाहे मद्रास या फिर किसी भी राज्य के किसी बड़े शहर से लेकर छोटे-छोटे गाँव हों, वहाँ सोलर पैनल से सौर ऊर्जा यानी ग्रीन ऊर्जा सस्ती, टिकाऊ और आसानी से उपलब्ध हो पा रही है। मेरे ख़याल को केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे हर घर और हर व्यावसायिक केंद्र को 24 घंटे सस्ती बिजली मिल सके, जिसके लिए सौर ऊर्जा से अच्छा संसाधन कोई दूसरा नहीं है।

बहरहाल, ग्रीन एनर्जी और औद्योगिक क्षेत्रों को बढ़ावा देने के लिए केंद्र की मोदी सरकार और ओडिशा सरकार ने हाल ही में मेक इन ओडिशा कॉन्क्लेव 2025 के तहत तक़रीबन 22,700 करोड़ रुपये के एमओयू सिर्फ़ ग्रीन एनर्जी के लिए साइन किये हैं। इस व्यापार समझौता कॉन्क्लेव का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया। इस दौरान उन्होंने हिंदुस्तान में ग्रीन एनर्जी हब बनने की ओडिशा की ज़रूरतों और महत्त्वाकांक्षा के बारे में बताया। उम्मीद है इससे ओडिशा जैसा पिछड़ा राज्य भी ग्रीन एनर्जी और औद्योगिक विकास में बुलंदियों को छुएगा। यह समझौता भारत के अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में अग्रणी अवाडा ग्रुप के साथ ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी की उपस्थिति में हुआ है। इस दौरान ओडिशा सरकार में उद्योग सचिव हेमंत शर्मा ने बताया कि ओडिशा खनिज पदार्थों के मामले में काफ़ी महत्त्वपूर्ण राज्य है। पहले यहाँ के 50 फ़ीसदी खनिज पदार्थ, जिनमें स्टील, एल्युमीनियम और दूसरे कई पदार्थ हैं, दूसरे राज्यों, ख़ास तौर पर झारखंड, बिहार, छत्तीगढ़ में चले जाते थे। हालाँकि हम जून 2023 में एक लॉन्ग टर्म लिंकेज फार्म सी फॉर रॉ मैटेरियल लेके आये थे, जिसमें हमने गारंटी दी थी कि जो प्लांट्स ओडिशा में लगेंगे, आयरन हो, सीसा हो, निकल हो या बॉक्साइट हो, इन खनिजों में जितना खनिज ओडिशा माइनिंग कार्पोरेशन निकालती है, उसका 70 फ़ीसदी लोकल इंडस्ट्रीज के लिए रिजर्व होगा। पहले इनको मिलेगा। अगर लोकल इंडस्ट्री नहीं लेंगी, तो उसे बाहर राज्यों में भेजा जाएगा। हालाँकि अभी वो 70 फ़ीसदी पर नहीं पहुँच पाये हैं, वो अभी 50 फ़ीसदी के आसपास ही है। लेकिन इस बार जो हमने क़रीब कई छोटी-बड़ी कम्पनियों के साथ एमओयू साइन किये हैं, उससे लगता है कि यहाँ के खनन से मिलने वाले खनिज पदार्थों का राज्य में ही 70 से 80 फ़ीसदी तक उपयोग हो सकेगा।

पूरे देश की कई बड़ी कम्पनियों ने यहाँ औद्योगिक संभावनाएँ देखते हुए ओडिशा में उद्योग स्थापित करने में रुचि दिखायी है। कालाहांडी जो कभी कई समस्याओं के लिए जाना जाता था, आज वहाँ औद्योगिक विकास काफ़ी हो चुका है। बड़ी बात यह है कि हमने इस बार छोटे उद्योगपतियों को भी आमंत्रित किया था, जिसमें से बहुतों की रुचि ओडिशा में प्लांट लगाने की जगी है। हमने इथेनॉल ग्रेन बेस्ड भी दो-तीन साल पहले ही कम्पनियों को अलाउ कर दिया था। अब कम्पनियाँ कई चीज़ों से इथेनॉल बनाकर ऑयल मार्केटिंग कम्पनियों को दे सकती हैं।

विनीत मित्तल ने बताया कि अवाडा ग्रुप ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में काम करती है। हम लोग क़रीब 20,000 मेगावाट के प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। पूरे देश में आज ग्रीन एनर्जी की माँग हो रही है। आज के लोग बहुत ज़िम्मेदार हैं और वे ग्रीन एनर्जी की उपयोगिता समझ रहे हैं। लोग ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि शहरों में भी ग्रीन एनर्जी पाने के लिए सोलर पैनल लगा रहे हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि एक बार पैसा लगाने के बाद न सिर्फ़ 24 घंटे उन्हें बिजली मिल सकेगी, बल्कि उसका ख़र्चा भी दोबारा नहीं करना पड़ेगा। बिना पैसे के तो कुछ नहीं हो सकता; लेकिन इस क्षेत्र में बार-बार पैसा लगाने या कहें कि बहुत पैसा लगाने की ज़रूरत ही नहीं है। ईश्वर ने हमें प्राकृतिक रूप से बहुत संपन्न बनाया है और हमें उसका इस तरह उपयोग करना चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़ी को भी उसका फ़ायदा मिल सके।

दरअसल, आज पूरी दुनिया में ग्रीन एनर्जी प्राप्त करने की होड़-सी लगी हुई है; लेकिन हिंदुस्तान में इसके प्रति अभी भी जागरूकता और प्रोत्साहन की कमी नज़र आती है। सौर ऊर्जा के ज़रिये ग्रीन एनर्जी यानी सूरज से बिजली उत्पादन के मामले में हिंदुस्तान अभी भी 10वें स्थान पर है, जबकि दुनिया में बिजली खपत करने वाला सबसे बड़ा तीसरा देश हिंदुस्तान है। तीन साल पहले इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (आईईए) की इंडिया एनर्जी आउटलुक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2040 तक औद्योगिक विकास की वजह से हिंदुस्तान में बिजली की माँग बढ़ती रहेगी। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अप्रैल, 2015 में साल 2022 तक हिंदुस्तान में 175 गीगावाट ग्रीन एनर्जी उत्पादन का जो लक्ष्य तय किया था, हिंदुस्तान अभी उसमें बहुत पीछे है और अभी तक अनुमानित तौर पर 100 गीगावाट के लक्ष्य को भी नहीं छू सका है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीन एनर्जी के उत्पादन मामले में हिंदुस्तान अभी तक सिर्फ़ 54 फ़ीसदी यानी तक़रीबन 94 गीगावाट का लक्ष्य पर ही पहुँच सका है। साल 2015 में हिंदुस्तान तक़रीबन 40 गीगावाट ग्रीन एनर्जी का उत्पादन कर रहा था, जबकि खपत के लिहाज़ से हिंदुस्तान को 250 गीगावाट ग्रीन एनर्जी की ज़रूरत है। देश के सिर्फ़ दो राज्य कर्नाटक और गुजरात ही ग्रीन एनर्जी उत्पादन के लक्ष्य का 70 फ़ीसदी का आँकड़ा छू सके हैं। इसके अलावा ग्रीन एनर्जी उत्पादन मामले में तमिलनाडु और राजस्थान 69 फ़ीसदी और आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश क्रमश: 47 फ़ीसदी, 47 फ़ीसदी और 43 फ़ीसदी ग्रीन एनर्जी उत्पादन के आँकड़े को छू सके हैं। उत्तर प्रदेश इस मामले में अभी बहुत पिछड़ा है, जो अभी तक सिर्फ़ 27 फ़ीसदी ग्रीन एनर्जी के उत्पादन के लक्ष्य को छू सका है। कई राज्य तो इससे भी पिछड़े हुए हैं।

बहरहाल, समस्या यह है कि एक तरफ़ बिजली कम्पनियों को बिजली काफ़ी सस्ती पड़ती है, वहीं उपभोक्ताओं को यह काफ़ी महँगी पड़ती है। इसका हिसाब इंटरनेट जैसा ही है, जो कि कम्पनियों को बहुत सस्ता और उपभोक्ताओं को बहुत महँगा पड़ता है। यही वजह है कि जो कम्पनियाँ पानी, कोयले और दूसरे संसाधनों से बिजली बनाकर उनकी सप्लाई कर रही हैं, वो कभी नहीं चाहतीं कि हिंदुस्तान सौर ऊर्जा यानी ग्रीन एनर्जी से संपन्न हो। क्योंकि जब उपभोक्ताओं को सस्ती और सुलभ बिजली आपूर्ति होने लगेगी, तो उनके करोड़ों रुपये सालाना का बिजली आपूर्ति का धंधा न सिर्फ़ मंदा होगा, बल्कि उन्हें मोटा मुनाफ़ा भी नहीं मिल सकेगा। सोलर पैनलों से ग्रीन एनर्जी पर सबका अधिकार होना चाहिए और इसे एक जन्मसिद्ध अधिकार की तरह ही सबके लिए सुलभ उपलब्ध कराया जाना चाहिए, जिसमें केंद्र सरकार से लेकर हर राज्य की सरकार को आगे आना होगा। लेकिन केंद्र सरकार और राज्य सरकारें ग्रीन एनर्जी के भी दाम वसूलना चाहती हैं, जिसके लिए इस मामले को केंद्रीय मुद्दा माना जा रहा है। हालाँकि मुझे नहीं लगता कि सौर ऊर्जा का बाज़ारीकरण होना चाहिए। हाँ, अगर कोई इस सौर ऊर्जा से औद्योगीकरण करके मुनाफ़ा कमा रहा है, तो उसके लिए बिल की व्यवस्था ज़रूर होनी चाहिए; लेकिन घरेलू उपयोग के लिए इसके दाम नहीं वसूले जाने चाहिए।

दिल्ली जैसे राज्यों का हाल यह है कि यहाँ साल के तक़रीबन 10 महीने घरों में एसी चलते हैं। नवंबर, 2024 तक हिंदुस्तान के कई राज्यों में गर्मी ही रहती है। वहीं कई राज्य ऐसे हैं, जहाँ साल भर तक गर्मी ही रहती है। केंद्रीय बिजली मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक, दिसंबर 2024 में देश में बिजली खपत बढ़कर तक़रीबन 130.40 बिलियन यूनिट, जो दिसंबर, 2023 की तुलना में क़रीब छ: फ़ीसदी से भी ज़्यादा थी। क्योंकि दिसंबर, 2023 में बिजली की माँग 123.17 बिलियन यूनिट थी। इसकी वजह शहरों में सर्दी के समय हीटर, गीजर और ब्लोअर चलना बताया जाता है। गर्मियों में एसी, कूलर और पंखों के चलते खपत बढ़ती है।

केंद्र सरकार कह रही है कि उसने बिजली उत्पादन बढ़ाने में काफ़ी सफलता हासिल की है; लेकिन बिजली आपूर्ति के मामले में अभी भी समस्याएँ कम नहीं हुई हैं। आम उपभोक्ताओं के लिए न सिर्फ़ महँगी बिजली एक समस्या बनी हुई है, बल्कि 24 घंटे बिजली आपूर्ति भी एक बड़ी समस्या है। बिजली आपूर्ति में बाधा और महँगी बिजली के चलते किसानों को भारी नुक़सान उठाना पड़ता है।

केंद्र सरकार छूटे हुए घरों के विद्युतीकरण के लिए पुनरुद्धार वितरण क्षेत्र योजना (आरडीएसएस) के तहत राज्य सरकारों का सहयोग कर रही है। इसके अलावा प्रधानमंत्री जन-मन के तहत सभी चिह्नित पीवीटीजी (विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह) परिवारों को ऑन-ग्रिड बिजली कनेक्शन के तहत आरडीएसएस के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, वित्त पोषण की भी मंज़ूरी देने की दिशा में काम हो रहा है। पिछले साल लोकसभा में भी बिजली आपूर्ति की समस्या को लेकर सवाल उठे थे। लेकिन ज़रूरत समाधान की है, जिसके लिए ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में काम करने वाली कम्पनियों को प्रोत्साहित करने की ज़रूरत भी है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

क्या आप की हार से इंडिया गुट में बढ़ी परेशानी?

प्रसिद्ध कवि जेफ्री चौसर और टी.एस. एलियट, दोनों ने अप्रैल को ‘सबसे क्रूर महीना’ बताया है; लेकिन आम आदमी पार्टी के लिए फरवरी यह ख़िताब ले सकता है। उल्कापिंड की तरह उभरने के बाद आम आदमी पार्टी को अब एक कठिन वास्तविकता का सामना करना पड़ रहा है। क्योंकि उसने अपने गढ़ दिल्ली को खो दिया है और इसके साथ ही इंडिया गुट में अपनी जगह भी खो दी है। इस बीच भारतीय जनता पार्टी अजेय नज़र आ रही है। हरियाणा में अप्रत्याशित जीत, महाराष्ट्र में शानदार प्रदर्शन और अब दिल्ली में ज़ोरदार जीत के बाद भाजपा की गति निर्बाध लगती है। ऐसा प्रतीत होता है कि भगवा रथ अब रुकने वाला नहीं है, जो 2024 के लोकसभा चुनावों में कमज़ोर प्रदर्शन के बाद मंद होता हुआ माना गया था। भाजपा ने अपनी पिछली ग़लतियों से सीखा है और वह मुफ़्त सुविधाओं तथा ग़रीब कल्याण योजनाओं के वादों की पेशकश करने में आम आदमी पार्टी से एक क़दम आगे हो गयी है।

हालाँकि ‘तहलका’ के इस अंक की आवरण कथा ‘पुरस्कार बिकते हैं!’ में एसआईटी द्वारा उजागर किया गया है कि कैसे चकाचौंध और ग्लैमर के पीछे एक फलता-फूलता भूमिगत बाज़ार लाभ के लिए योग्यता को दरकिनार करते हुए पैसों के बदले पुरस्कारों का व्यापार करता है। दिल्ली चुनाव परिणाम के बीच यह भी ध्यान देने योग्य है। ध्यान देने योग्य है ​​कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी चुनावों से पहले मुफ़्त वस्तुओं की घोषणा करने की प्रथा की निंदा की है और सवाल उठाया है कि क्या यह ‘परजीवियों के वर्ग’ को बढ़ावा देता है? इसका राजनीतिक प्रभाव स्पष्ट है कि मुफ़्त चीज़ें वास्तव में चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं। 2025-26 के केंद्रीय बजट में महत्त्वपूर्ण कर (टैक्स) राहत की पेशकश के साथ भाजपा की रणनीति मध्यम वर्ग तक विस्तारित हुई है। 12 लाख रुपये तक की आय वाले लोगों को कोई आयकर नहीं देना होगा। इसके अतिरिक्त किराये की आय के लिए टीडीएस सीमा को बढ़ाकर छ: लाख रुपये कर दी गयी है, जिससे किराये की आय पर निर्भर लोगों को लाभ होगा। केंद्र सरकार के वेतन और पेंशन भत्तों को संशोधित करने के लिए आठवें वेतन आयोग की घोषणा के साथ इन उपायों ने प्रमुख मतदाता वर्गों में भाजपा की अपील को और मज़बूत किया है।

हालाँकि यह अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से जन्मी आम आदमी पार्टी पर भाजपा का रणनीतिक हमला था, जिसका सबसे विध्वंसकारी प्रभाव पड़ा है। आम आदमी पार्टी सरकार के कथित भ्रष्टाचारों, विशेष रूप से आबकारी नीति घोटाले और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आधिकारिक आवास, जिसे भाजपा ने शीश महल कहा; के असाधारण नवीनीकरण पर ध्यान केंद्रित करने से पार्टी की छवि ख़राब हुई। एक समय आम आदमी की आवाज़ के रूप में देखी जाने वाली आम आदमी पार्टी को भ्रष्ट व्यवस्था में एक अन्य राजनीतिक खिलाड़ी के रूप में देखा जा रहा था, जिसे वह उखाड़ फेंकना चाहती थी। हालाँकि दिल्ली एक छोटा केंद्र साशित प्रदेश है; लेकिन यह राजनीतिक शक्ति का केंद्र है और यहाँ आम आदमी पार्टी की हार से विपक्ष की संभावनाएँ काफ़ी बढ़ गयी हैं; ख़ासकर पंजाब में, जो एकमात्र राज्य है, जहाँ वह अभी भी सत्ता में है।

ऐसी चर्चाएँ बढ़ रही हैं कि आम आदमी पार्टी संभावित रूप से अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है। कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि पार्टी टूट सकती है। हालाँकि इस तरह के निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगी। लेकिन कांग्रेस नेता खुले तौर पर स्वीकार कर रहे हैं कि उनके मतदाता आधार पर आम आदमी पार्टी का अतिक्रमण बढ़ते दबाव का संकेत देता है। यह झटका इंडिया गुट के लिए और भी समस्याएँ पैदा कर सकता है; ख़ासकर तब, जब बिहार में इस साल के अंत में चुनाव होने वाले हैं और पश्चिम बंगाल 2026 के चुनावों की तैयारी कर रहा है।

लोकतंत्र को ज़िन्दा रहने दो

दिल्ली चुनाव में उम्मीदों के विपरीत नतीजे आने पर एक बार फिर चुनाव आयोग कथित घपलेबाज़ी के आरोपों से घिर गया है। इससे पहले भी कई बार लोगों ने चुनाव आयोग को उसकी निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए कटघरे में खड़ा किया है। चुनाव आयोग हर बार सफ़ाई देता रहा है कि उसने बिलकुल निष्पक्ष चुनाव कराये हैं। अब सर्वोच्च न्यायालय ने यह 2024 के लोकसभा चुनाव और महाराष्ट्र विधानसभा को लेकर ईवीएम में पड़े मतों और चुनाव आयोग द्वारा बताये गये डेटा में मेल न खाने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग ईवीएम में कोई डेटा डिलीट न करने और नया डेटा रीलोड भी न करने का आदेश दिया, तो भाजपा को चुनाव जितवाने के कथित आरोपों से घिरे मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता की दुहाई देकर कहने लगे कि लाखों अधिकारी डेटा फीडिंग में शामिल होते हैं। किसी भी गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं है।

1984 बैच के आईएएस अधिकारी राजीव कुमार देश के 25वें चुनाव आयुक्त हैं और जल्द ही अपने पद से सेवानिवृत्त होने वाले हैं। लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद सरकारों से लाभ लेने वाले दूसरे कई भ्रष्ट अधिकारियों की तरह ही लाभ की आकांक्षा के आरोपों से वह भी नहीं बच सके। हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में फ़र्ज़ी मत पड़ने और चुनाव के बाद मत प्रतिशत बढ़ने से लेकर दिन भर मतदान की हुई ईवीएम की बैटरी का 95 से 99 प्रतिशत तक चार्ज रहने जैसे आरोप चुनाव आयोग पर लगे। स्थिति यहाँ तक पहुँची कि हरियाणा में 20 प्रतिशत से ज़्यादा सीटों पर भाजपा नेताओं की जीत को चुनौती देने लोग पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट पहुँच गये, तो महाराष्ट्र में गड़बड़ी को लेकर मामला दिल्ली तक पहुँच गया। चुनाव आयोग पर भाजपा के लिए गड़बड़ी करने के आरोप लगाने के बाद जब महाराष्ट्र के सोलापुर ज़िले के मरकरवाड़ी गाँव के लोगों ने दोबारा बैलेट पेपर पर चुनाव की तरह मतदान करके यह जाँच करनी चाही कि उस क्षेत्र में कितने लोगों ने किसे मतदान किया है, तो चुनाव आयोग तिलमिला उठा और महाराष्ट्र पुलिस ने जाँच के लिए लोगों द्वारा बनाये गये मतदान केंद्र पर जाकर मतदान बंद कराकर अनेक लोगों को गिरफ़्तार कर लिया। 200 लोगों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की और उस क्षेत्र में कर्फ्यू लगा दिया। इससे चुनाव आयोग की भूमिका संदेह के घेरे में आ गयी। गुजरात के विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद भी बहुत लोगों ने गड़बड़ी के आरोप लगाये थे। तीन गाँवों के लोगों ने तो ईवीएम के विरोध में मतदान ही नहीं किया था।

गुजरात चुनाव, लोकसभा चुनाव, हरियाणा चुनाव, महाराष्ट्र चुनाव, जम्मू-कश्मीर चुनाव, झारखण्ड चुनाव के बाद हुए दिल्ली के चुनाव तक भाजपा नेताओं, विशेषकर भाजपा के सबसे बड़े चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों और जनसभाओं में जितने लोग जुटे, उससे भी कहीं-से-कहीं तक संभव नहीं लगा कि भाजपा को सत्ता पाने लायक जीत मिल सकेगी। ऐसे भी वीडियो सामने आये, जिनमें भाजपा के झंडे उठाने वालों ने यहाँ तक कहा कि वे दिहाड़ी पर आये हैं। दिल्ली में खुलेआम पैसे बाँटने, साड़ियाँ और दूसरे तोहफ़े बाँटने का सिलसिला चुनाव वाले दिन भी जारी रहा। कई शिकायतें मिलीं कि लोगों को मतदान नहीं करने दिया जा रहा है। लोकसभा चुनाव से लेकर इन सभी राज्यों के विधानसभा चुनावों में लाखों की संख्या में नये मतदाता बढ़ने, पुराने मतदातओं के नाम काटे जाने के आरोप भी लगते रहे। दिल्ली में भाजपा के सांसदों, मंत्रियों, नेताओं और कई सरकारी आवासों के पतों पर दज़र्न-दज़र्न भर के क़रीब लोगों के मतदाता पहचान पत्र बने मिले, जिस पर चुनाव आयोग चुप्पी साधे रहा।

लगता है कि चुनाव आयोग में वर्तमान में कार्यरत अधिकारी या तो लोकतंत्र का अर्थ नहीं समझते या उन्होंने किसी लालच अथवा दबाव में किसी विशेष पार्टी से कोई क़रार कर रखा है। लेकिन इस सबका ख़ुलासा तो तभी हो सकता है, जब चुनाव आयोग के सभी अधिकारियों को कुछ दिन का अवकाश देकर पिछले तीन-चार साल में हुए सभी चुनावों की गहन जाँच हो। सर्वोच्च न्यायालय ने ठीक ही आदेश दिया है कि चुनाव आयोग ईवीएम के डेटा से छेड़छाड़ न करे। क्योंकि चुनाव किसी पार्टी के लिए नहीं, बल्कि जनता के लिए चुनी हुई सरकार द्वारा पाँच साल तक व्यवस्थित ढंग से विकास कार्य करने के लिए कराये जाते हैं। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और यहाँ की चुनावी प्रक्रिया में लोकतंत्र की रक्षा करना ही चुनाव आयोग की पहली ज़िम्मेदारी है। उसे हर हाल में यह ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए। दिल्ली में लंबे समय से वकील, पूर्व सैनिक और अन्य लोग ईवीएम को प्रतिबंधित करके बैलेट पेपर से चुनाव कराने की माँग कर रहे हैं। विश्व के विकसित देश भी बैलेट पेपर से चुनाव करवाते हैं। लेकिन भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में चुनाव आयोग लगातार ईवीएम से चुनाव कराने वकालत करने की इच्छा से सफ़ाई दे रहा है। पार्टियों, सत्ताओं और चुनाव आयोग से अपील है कि वे सफ़ाई देने की बजाय भारत के इस लोकतंत्र को ज़िन्दा रहने दें।

किसानों ने केंद्र को दिया एक और मौक़ा

14 फरवरी को चंडीगढ़ में केंद्र सरकार और किसानों के बीच होगी बातचीत,- माँगें पूरी न होने पर फिर से देशव्यापी आन्दोलन कर सकते हैं किसान

योगेश

केंद्र सरकार के प्रतिनिधिमंडल और सुप्रीम कोर्ट की समिति के किसानों से मिलने के बाद किसान संगठन बैठक के लिए तैयार हो गये हैं। कुछ दिन पहले आमरण अनशन पर बैठे किसान नेता जगजीत डल्लेवाल से मिलने पहुँचे केंद्र सरकार के प्रतिनिधिमंडल के कहने पर किसानों ने तय किया है कि वे 14 फरवरी को शाम 5:00 बजे चंडीगढ़ के महात्मा गाँधी राज्य लोक प्रशासन संस्थान में केंद्र सरकार के प्रतिनिधिमंडल और सुप्रीम कोर्ट की समिति के साथ बैठक करेंगे। इस बैठक में किसानों की माँगों को मानने के लिए केंद्र सरकार तैयार होती है, तो किसान आन्दोलन ख़त्म कर देंगे। लेकिन ऐसा न होने पर सभी किसान देशव्यापी आन्दोलन करने और दिल्ली जाने की तारीख़ तय करेंगे। इस बैठक और आन्दोलन में भाग लेने के लिए 26 नवंबर से आमरण अनशन पर बैठे भारतीय किसान यूनियन (एकता सिद्धूपुर – ग़ैर राजनीतिक) के किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल डॉक्टरों की देखरेख को तैयार हो गये हैं। खनोरी बॉर्डर पर हरियाणा की सीमा में 121 किसान भी मरणव्रत की क़सम खाकर अनशन पर बैठे थे; लेकिन किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल के आग्रह के इन किसानों ने मरणव्रत अनशन समाप्त कर दिया है।

कुछ दिन पहले केंद्र सरकार की तरफ़ से एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल से मिलने भी पहुँचा था और उससे पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित समन्वय समिति के सदस्यों ने उनसे बातचीत की थी। केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल ने किसान नेता से मिलने के बाद कहा कि उन्होंने डल्लेवाल जी की सेहत की जानकारी ली और किसानों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत भी की। इस प्रतिनिधिमंडल ने किसान नेता डल्लेवाल से अनशन तोड़ने का अनुरोध भी किया; लेकिन उन्होंने साफ़ कहा कि किसानों की माँगों को अगर केंद्र सरकार मान लेती है, तो वो अनशन तोड़ देंगे और आन्दोलन भी ख़त्म हो जाएगा। यही बात डल्लेवाल ने सुप्रीम कोर्ट के द्वारा बनायी समिति से कही थी।

ध्यान रहे कि किसानों केंद्र सरकार से लगभग 13 माँगें कर रहे हैं, जिनमें सबसे पहली और महत्त्वपूर्ण माँग स्वामीनाथन आयोग द्वारा सुझाया गया फ़सलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को गारंटी क़ानून के साथ लागू करना। केंद्र सरकार किसानों की माँगों पर अपना वादा नहीं निभा रही है, जिसे लेकर पंजाब के किसानों ने 2023 में दोबारा आन्दोलन शुरू किया था। इस आन्दोलन को यूँ तो देश भर के किसानों का समर्थन है; लेकिन पंजाब के किसानों का सबसे ज़्यादा साथ हरियाणा के किसानों ने दिया है। राजस्थान और उत्तर प्रदेश के जागरूक किसान भी इस आन्दोलन के समर्थन में लगातार आवाज़ उठा रहे हैं। केंद्र सरकार किसानों की माँगों को अनदेखा करके तरह-तरह के प्रलोभनों से देश के किसानों को लुभा तो रही है; लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर चुप है। कुछ दिन पहले केंद्र सरकार ने ख़रीफ़ की फ़सलें कटने के दौरान रबी की प्रमुख छ: फ़सलों के मौज़ूदा न्यूनतम समर्थन मूल्य में मामूली बढ़ोतरी करके यह प्रचार कर दिया कि उसने किसानों की फ़सलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा दिया है। रबी की फ़सलें अभी तैयार भी नहीं हुई हैं और गेहूँ का बाज़ार भाव नये न्यूनतम समर्थन मूल्य से कहीं ज़्यादा हो गया है, जिससे उपभोक्ताओं की रोटी, तेल और दालें महँगी हो गयी हैं।

अब आन्दोलन पर बैठे किसानों ने तय किया है कि वे किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल और दूसरे किसान संगठन के नेताओं के नेतृत्व में 14 फरवरी को केंद्र सरकार के प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठक करेंगे, जिसमें किसानों के दिल्ली कूच करने की तारीख़ निर्धारित की जाएगी। इस बैठक में भाग लेने के लिए ही दो महीने से ज़्यादा समय से आमरण अनशन पर बैठे किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने चिकित्सा सहायता लेने पर अपनी सहमति दी है। लेकिन उन्होंने साफ़ कह दिया है कि जब तक केंद्र सरकार फ़सलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की क़ानूनी गारंटी नहीं दे देगी, तब तक वह आमरण अनशन अनिश्चितकाल के लिए जारी रखेंगे। किसानों और केंद्र सरकार के बीच यह बैठक एक साल से ज़्यादा समय बीतने पर होने जा रही है। केंद्र सरकार और किसानों के बीच इस बड़े हुए तनाव को ख़त्म करने के लिए बैठक करने में 1998 बैच के पुलिस के सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी (एडीजीपी इंटेलिजेंस) जसकरण सिंह और 2008 बैच के पुलिस के सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी (डीआईजी विजिलेंस ब्यूरो) नरिंदर भार्गव ने अहम भूमिका निभायी है। 2020 में तीन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ शुरू हुए किसान आन्दोलन में भी 12 दौर की बातचीत में नरिंदर भार्गव शामिल रहे थे। दोनों सेवानिवृत अधिकारी लंबे अरसे के बाद केंद्र सरकार और किसानों के बीच बैठक के इस सकारात्मक क़दम को दोनों सेवानिवृत अधिकारी एक सकारात्मक क़दम मान रहे हैं। वहीं किसानों का कहना है कि केंद्र सरकार किसानों की समस्याओं और फ़सलों में उनके घाटे को ध्यान में न रखकर सिर्फ़ पूँजीपतियों को फ़ायदा पहुँचाने के बारे में ही सोचती है। ऐसा नहीं होता, तो किसानों को इतना परेशान नहीं किया जाता। फिर भी किसानों ने उम्मीद जतायी है कि 14 फरवरी को होने वाली संयुक्त बैठक में उनकी समस्याओं का हल केंद्र सरकार निकलेगी। ऐसा होता है, तो किसान आन्दोलन ख़त्म करके अपनी खेती-बाड़ी देखेंगे और चार साल से हो रहे नुक़सान के बाद चेन की साँस लेंगे।

सुप्रीम कोर्ट कमेटी के सदस्य और केंद्र सरकार के प्रतिनिधिमंडल की इस पहल को किसान देर से आये, पर दुरुस्त आये की नज़र से देख रहे हैं। भारतीय किसान यूनियन (सिद्धपुर) के महासचिव काका सिंह कोटड़ा ने इस बातचीत की जानकारी देते हुए कहा है कि किसानों की माँगें अभी हल नहीं हुई हैं। केंद्र ने केवल माँगों पर बातचीत का प्रस्ताव रखा है, जिसके लिए किसान बातचीत को तैयार हैं। केंद्र सरकार की तरफ़ से बातचीत का प्रस्ताव मिलने के बाद किसानों ने 21 जनवरी के दिल्ली कूच के कार्यक्रम को रद्द कर दिया है। हालाँकि किसानों ने केंद्र सरकार से माँग की है कि 14 फरवरी को होने वाली बैठक को चंडीगढ़ की जगह दिल्ली में आयोजित किया जाए और बैठक दिन में ही कर ली जाए। किसानों ने यह माँग किसान नेता डल्लेवाल की सेहत को ध्यान में रखते हुए की है। किसानों ने दिल्ली में बैठक आयोजित करने की माँग करने के पीछे की वजह यह बतायी है कि यह देश भर के किसानों का मुद्दा है; सिर्फ़ पंजाब और हरियाणा का नहीं। संयुक्त किसान मोर्चा की एकता को लेकर भी प्रयास जारी हैं कि सभी संगठन इस बातचीत को सकारात्मक बनाएँ और ज़रूरत पड़ने पर 2020 के आन्दोलन की तरह ही फिर से आन्दोलन के लिए तैयार रहें। इसे लेकर 18 जनवरी और 24 जनवरी को संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक भी हुई थी। हालाँकि किसान संगठनों में अभी तक आपसी एकता पर सहमति नहीं हो सकी है। लेकिन हरियाणा की विभिन्न ख़ास पंचायतों ने किसानों का साथ देने का फ़ैसला ले लिया है। सभी खाप पंचायतों ने आन्दोलन को एक सूत्र में बांधने के लिए किसानों के 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च में हिस्सा भी लिया। खापों ने यह भी कहा है कि अगर किसानों की माँगे पूरी नहीं हुईं, तो 14 फरवरी के बाद पूरे देश में बड़ा आन्दोलन किया जाएगा। पहले भी किसान आन्दोलन में सभी 102 खाप पंचायतों ने किसानों का साथ दिया था।

इधर किसानों और केंद्र सरकार में बातचीत की तारीख़ तय होने के बीच राजस्थान के क़रीब 40 हज़ार से ज़्यादा गाँवों के किसानों ने आन्दोलन की तैयारी शुरू कर दी है। राजस्थान के किसानों का कहना है कि इस बार अगर किसान आन्दोलन की ज़रूरत पड़ी, तो पूरे राजस्थान के किसान आन्दोलन में भाग लेंगे। इसके लिए किसान नेता हर गाँव में जा-जाकर किसानों को जागरूक करके उन्हें एकजुट कर रहे हैं। जानकारी मिली है कि 40 में 26-27 ज़िलों के किसानों का समर्थन किसान नेताओं को मिल चुका है और अन्य ज़िलों में अभी किसान नेताओं का जाना बाक़ी है। इसके साथ ही राजस्थान में किसान 29 जनवरी को गाँव बंद आन्दोलन चलाएँगे। यह आन्दोलन 45,537 गाँवों में प्रभावी ढंग से किया जाएगा। वहीं हरियाणा में खाप नेताओं ने हरियाणा के किसानों को जागरूक करना शुरू कर दिया है। इससे हरियाणा सरकार इतनी डर गयी है कि वो किसानों को हाल ही में फ़सल बीमा की नयी योजना के फ़ायदे गिनाने का प्रयास कर रही है।

खनोरी बॉर्डर पर आमरण अनशन पर बैठे किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल के द्वारा बैठक के लिए हामी भरने को लेकर जब कुछ किसानों से पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि डल्लेवाल जी ने प्रतिनिधिमंडलों से बातचीत और डॉक्टरों की देख-रेख के लिए जो हामी भरी है, वह सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हुए ही राज़ी हुए हैं। लेकिन अगर किसानों की माँगों को पूरा नहीं किया गया, तो सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार को यह कहने का मौक़ा नहीं मिलेगा कि किसानों ने उनकी बात नहीं सुनी। किसान कह रहे हैं कि उनकी माँगें पूरी न होने की स्थिति में उनके पास देशव्यापी आन्दोलन करने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा। किसानों ने कहा कि वे लंबे समय तक केंद्र सरकार की लापरवाही और किसानों की अनदेखी के चलते अपने किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल और दूसरे किसानों की बलि नहीं चढ़ा सकते। किसानों का कहना है कि एक तरफ़ केंद्र सरकार किसानों को उनकी फ़सलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य तक नहीं देना चाहती, दूसरी तरफ़ कम्पनियों को मनचाही एमआरपी पर खाने-पीने की चीज़ें बेचने की छूट दे रही है। इससे देश भर के उपभोक्ताओं की जेब पर भारी बोझ पड़ रहा है और खेती में किसानों का घाटा बढ़ता ही जा रहा है। किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य कोई अलग से बढ़ाकर नहीं माँग रहे हैं।

क्षेत्रीय पार्टियों का डर और भाजपा-कांग्रेस

हिंदुस्तान की राजनीति में सैकड़ों छोटी-बड़ी पार्टियाँ सक्रिय हैं; लेकिन इनमें से छ: राष्ट्रीय पार्टियाँ और तक़रीबन 57 राज्य स्तरीय पार्टियाँ देश की राजनीति में चर्चित और सक्रिय हैं। फिर भी भाजपा और कांग्रेस का नेतृत्व ही देश की राजनीति पर हावी है और इन पार्टियों से आज भी छोटी यानी क्षेत्रीय पार्टियों में यह डर बैठा हुआ है कि इनमें से किसी भी पार्टी की सरकार केंद्र में रहेगी, तो क्षेत्रीय पार्टियों के अस्तित्व को ख़तरा रहेगा। इनमें से तमाम पार्टियाँ अपने इसी अस्तित्व को बचाने के लिए भाजपा के राजनीतिक गठबंधन एनडीए यानी नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस और कुछ कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस है। सभी जानते हैं कि साल 2014 से केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में चल रही है। यह वही भाजपा है, जिसका गठन साल 1980 में हुआ। इसका पहले भारतीय जनसंघ नाम था।

बहरहाल, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में साल 2014 और साल 2019 में बड़े बहुमत के साथ भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए की सरकार केंद्र में आने के बाद भाजपा को देश भर में मात देने के उद्देश्य से बिहार के मुख्यमंत्री और जद(यू) के मुखिया नीतीश कुमार की पहल पर 18 जुलाई, 2023 को कांग्रेस के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन बनाया गया, जिसमें शुरू में तक़रीबन 40 पार्टियाँ शामिल हुई थीं। उस समय इंडिया गठबंधन में जितनी भी पार्टियाँ शामिल थीं, उन्हें किसी भी हाल में भाजपा से छुटकारा चाहिए था; लेकिन कुछ ही समय बाद जद(यू) के मुखिया नीतीश कुमार कूदकर एनडीए में चले गये और उद्धव ठाकरे की शिवसेना, शरद पवार की राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी टूट गयीं और उधर कांग्रेस और सपा के बीच विधानसभा चुनाव में मतभेद बढ़ने लगे। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में रालोद के मुखिया जयंत चौधरी भी एनडीए में चले गये। आम आदमी पार्टी ने भी पहले पंजाब के विधानसभा चुनाव में और पिछले साल हरियाणा के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से हाथ मिलाना उचित नहीं समझा। इधर कांग्रेस को न सिर्फ़ हरियाणा और महाराष्ट्र में बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा, बल्कि जम्मू-कश्मीर और झारखण्ड में भी उसे बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ। और इस प्रकार से इंडिया गठबंधन में फूट पड़ने लगी। ये वो मोटी-मोटी बातें हैं, जो तक़रीबन सभी जानकार जानते और मानते हैं; लेकिन इंडिया गठबंधन टूटने की असली वजह कुछ और है, जो हर किसी को नहीं मालूम।

दरअसल, इंडिया गठबंधन से छिटकी इन छोटी पार्टियों को अपने अस्तित्व का जितना ख़तरा भाजपा से है, उतना ही ख़तरा कांग्रेस से भी है। और इन क्षेत्रीय पार्टियों को लेकर कहीं-न-कहीं कांग्रेस भी उसी ढर्रे पर चल रही है, जिस ढर्रे पर भाजपा चल रही है। कांग्रेस को कहीं-न-कहीं यह भी लगने लगा है कि अपनी सबसे पुरानी राजनीतिक विरासत में अगर उसने इन छोटी पार्टियों को घुसने का मौक़ा दिया, तो न सिर्फ़ उसका अस्तित्व छोटा हो जाएगा, बल्कि छोटी पार्टियों की शर्तों पर उसे चलना पड़ेगा, जिसका असर कभी केंद्र की सत्ता अगर हाथ लगी, तो उस पर भी पड़ेगा। क्योंकि हर छोटी पार्टी अपनी-अपनी पकड़ वाले राज्यों में अपनी सरकार चलाना पसंद करती हैं और उनके रहते कांग्रेस को क्षेत्रीय पार्टियों के वर्चस्व वाले राज्यों में तो मज़बूती मिलेगी ही नहीं, कभी केंद्र में भी मज़बूती नहीं मिल सकेगी। इसका नमूना कांग्रेस उत्तर प्रदेश में देख भी चुकी है, जहाँ सपा ने उसे लोकसभा में चौथाई से भी कम सीटें देने के लिए लंबे समय तक इंतज़ार करवाया था।

अब दिल्ली में चुनाव आने पर इंडिया गठबंधन में दो-फाड़ होने से मामला साफ़ हो गया और इंडिया गठबंधन में छोटी पार्टियों में से ज़्यादातर ने किनारा करके यह साफ़ संदेश कांग्रेस को दिया है कि उन्हें उसकी ज़रूरत नहीं है। क्योंकि राज्यों में सक्रिय छोटी पार्टियों को यह लगता है कि जहाँ उनका वर्चस्व है, वहाँ कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने से कोई चमत्कार नहीं हो रहा है और बिना मतलब उन्हें सीटें कांग्रेस को देनी पड़ रही हैं। यही कांग्रेस को भी लगता है कि 5-10 सीटों पर सुलह करने से तो अच्छा है कि अकेले सभी सीटों पर मैदान में उतरा जाए, जिससे न सिर्फ़ यह अनुभव मिलेगा कि उसकी अपनी खोयी ज़मीन को पाने में कहाँ-कहाँ समस्याएँ आ रही हैं, बल्कि उसकी सीटें बढ़ भी सकती हैं। और यह विश्वास कांग्रेस को साल 2024 के लोकसभा चुनाव में 99 सीटें जीतने के बाद आया, जो कि पिछले दो चुनावों में करारी हार के बाद डगमगा गया था।

बहरहाल, दिल्ली में पिछले दो विधानसभा चुनावों में शून्य पर रही कांग्रेस इस बार पूरे दमख़म से दिल्ली विधानसभा चुनाव लड़ रही है और वो न सिर्फ़ आम आदमी पार्टी सरकार की मुफ़्त की योजनाओं के आधार पर ख़ुद भी वादे कर रही है, बल्कि भाजपा की तर्ज पर दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार पर हमलावर भी है। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर जब जून, 2024 में जेल हुई, तो इंडिया गठबंधन की सभी प्रमुख पार्टियों के नेता, यहाँ तक कि कांग्रेस के सभी बड़े नेता सोनिया गाँधी, प्रियंका गाँधी, राहुल गाँधी और मल्लिकार्जुन खड़गे दिल्ली के रामलीला मैदान में जुटे थे और भाजपा की तानाशाही से लेकर केंद्र की मोदी सरकार द्वारा ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स कार्यालय के दुरुपयोग के आरोप लगाते हुए उसके ख़िलाफ़ हल्ला बोला था। लेकिन कुछ ऐसे छड़ भी आये, जब कांग्रेस को मोदी सरकार के ख़िलाफ़ बोलना चाहिए था और वो नहीं बोली। मसलन, लालू प्रसाद को जब जेल हुई, तो कांग्रेस चुप रही। इसी प्रकार से जब झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को जेल हुई, तो कांग्रेस ने अपनी आवाज़ उतनी बुलंद नहीं की, जितनी उसे करनी चाहिए थी, जबकि वहाँ झामुमो के साथ कांग्रेस की गठबंधन सरकार उस समय भी थी और आज भी है। हालाँकि झारखण्ड सरकार में कांग्रेस को उसी तरह छोटा दूसरे नंबर की पार्टी बनकर गठबंधन निभाना पड़ रहा है, जिस प्रकार से भाजपा को बिहार में गठबंधन निभाना पड़ रहा है। लेकिन मक़सद दोनों का एक ही है कि किसी तरह मौक़ा मिले और क्षेत्रीय पार्टी को कमज़ोर कर दिया जाए, जिससे केंद्र में मज़बूती मिल सके।

दरअसल, जहाँ कांग्रेस अपनी खोयी ज़मीन पाने के लिए राज्यों में मज़बूती चाहती है, तो भाजपा अपनी सत्ता मज़बूत करने के लिए हर राज्य में सत्ता चाहती है, जिससे वो अगले 50-100 साल तक केंद्र में भी शासन कर सके। लेकिन दोनों ही पार्टियों के लिए न तो राज्यों में मज़बूती हासिल हो पा रही है और न केंद्र में ही। पिछली दो केंद्र सरकारों में भाजपा का बहुमत बड़ा था; लेकिन इस बार वो केंद्र में भी कमज़ोर हो गयी और दो-तीन राज्यों को छोड़कर तक़रीबन बाक़ी उसकी सत्ता वाले सभी राज्यों में उसकी हालत भी गठबंधन की बैसाखी के सहारे सरकार चलाने वाली है। कांग्रेस की भी हालत यही है। लेकिन दूसरी कई क्षेत्रीय पार्टियाँ हैं, जो अपने दम पर कई राज्यों में सरकारें चला रही हैं। इनमें से पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस है, तो दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी है। अपनी इसी विरासत को बचाते हुए दूसरे राज्यों में बढ़कर कांग्रेस और भाजपा को हराने के लिए ये क्षेत्रीय पार्टियाँ राज्यों में इनके साथ हाथ मिलाकर अपनी पकड़ कमज़ोर करना नहीं चाहतीं। इसी के चलते शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस, सपा और राजद ने खुलकर दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का समर्थन किया है। और दिल्ली में जिस प्रकार से अरविंद केजरीवाल के पक्ष में इन क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं ने समर्थन दिया, वो यह साफ़ ज़ाहिर करता है कि क्षेत्रीय पार्टियाँ कहीं-न-कहीं इन दोनों बड़ी पार्टियों को केंद्र की सत्ता से भी दूर रखने पर एकमत हैं। हालाँकि आज़ाद हिंदुस्तान के तक़रीबन 72 साल से ज़्यादा के इतिहास में जो भी सरकारें अब तक बनी हैं, उनमें सबसे ज़्यादा कांग्रेस ने और उसके बाद भाजपा ने ही शासन किया है। दूसरी पार्टियों के प्रधानमंत्री तो हिंदुस्तान को मिले हैं, और जनता पार्टी की सरकार भी एक बार बनी है; लेकिन न तो दूसरी पार्टियों के प्रधानमंत्री लंबे समय तक शासन में रह सके और न ही कोई तीसरी पार्टी केंद्र की सत्ता को लंबे समय तक नेतृत्व कर सकी।

क्योंकि जनता पार्टी की सरकार साल 1977 के लोकसभा चुनाव में बन तो गयी; लेकिन तीन साल के भीरत ही साल 1980 में ही कांग्रेस ने ज़ोरदार वापसी कर ली। उसके बाद साल 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद जो चुनाव हुए, उनमें उनके बेटे राजीव गाँधी ने जबरदस्त सीटें हासिल करते हुए सत्ता हासिल की। इसके बाद बीच-बीच में भाजपा की सरकार भी बनी; लेकिन पूरे पाँच साल चल नहीं सकी। लेकिन साल 2000 में भाजपा की जबरदस्त वापसी हुई और एनडीए की सरकार अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में बनी, जो पूरे पाँच साल चली। इसके बाद साल 2004 और साल 2009 में फिर कांग्रेस ने बाज़ी मार ली। और साल 2014 के बाद से नरेंद्र मोदी सत्ता में आये। हालाँकि साल 2024 में वो भी भाजपा को मज़बूती नहीं दिला पाये; लेकिन किसी तरह चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार के दम पर सरकार बना ले गये। विपक्षी दलों में कांग्रेस को यहाँ पूरे 10 साल बाद कुछ मज़बूती तो मिली; लेकिन सरकार बनाने लायक नहीं। अब क्षेत्रीय पार्टियों के पास मौक़ा यह है कि किसी भी तरह राज्यों में अपनी पकड़ मज़बूत रखो, जिससे भविष्य में न तो भाजपा मज़बूती के साथ केंद्र में उभर सके और न ही कांग्रेस वापसी कर सके। इससे होगा यह कि केंद्र में बैठी सरकार क्षेत्रीय पार्टियों को कमज़ोर करने के लिए ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स कार्यालय के झमेले में नहीं फँसा सकेंगी और केंद्र में भी अगर उनको ज़रूरत पड़ी, तो क्षेत्रीय पार्टियों का ही मुँह देखना पड़ेगा।

बहरहाल, दिल्ली विधानसभा चुनाव ज़ोर-शोर से चल रहा है और सभी पार्टियों का एजेंडा यही है कि किसी भी तरह दूसरी पार्टियों की कमियाँ निकालकर और आरोप लगाकर उन्हें कमज़ोर किया जाए। इसके लिए झूठे इश्तिहारों, बरगलाने वाले पोस्टरों और बैनरों से लेकर झूठे विज्ञापन तक तैयार किये जा रहे हैं। इस काम में सबसे आगे भाजपा दिख रही है, जो न सिर्फ़ आम आदमी पार्टी की तरह आम जनता को मुफ़्त योजनाओं का लालच दे रही है, बल्कि महिलाओं को वोट देने के लिए अभी से पैसे भी बाँटने का काम कर रही है। चुनाव आयोग ऐसी घटनाओं को जिस तरह से नज़रअंदाज़ कर रहा है, वो लोकतंत्र के लिए एक गंभीर ख़तरे का संकेत है। इन दिनों दिल्ली वासियों के लिए सभी पार्टियाँ एक से बढ़कर एक वादे करती जा रही हैं। हालाँकि मुक़ाबला त्रिकोणीय तो बनता दिख रहा है; लेकिन आम आदमी पार्टी का पलड़ा अभी भी भारी ही दिख रहा है। फ़िलहाल, 05 फरवरी को दिल्ली में वोटिंग है और 08 फरवरी को रिजल्ट आना है। सरकार किसकी बनेगी, यह रिजल्ट वाले दिन ही साफ़ हो पाएगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान की गिरफ्तारी पर लगी रोक

नई दिल्ली : आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह खान को आज राउज एवेन्यू कोर्ट ने राहत देते हुए उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। अदालत ने अमानतुल्लाह को पुलिस की जांच में शामिल होने को कहा है। सुनवाई के दौरान अमानतुल्लाह खान के वकील ने कहा कि वो जांच में शामिल होने के लिए तैयार हैं। उन्होंने दावा किया कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप झूठे हैं।

इस पर कोर्ट ने कहा कि अमानतुल्लाह खान से जामिया नगर थाने में पूछताछ हो, ऐसी जगह हो जहां सीसीटीवी लगे हों। दिल्ली पुलिस ने सोमवार को जामिया नगर में पुलिस की एक टीम पर कथित रूप से हमला करने के आरोप में ओखला से विधायक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में पेश किया नया आयकर बिल

नई दिल्ली :   वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा गुरुवार को लोकसभा में नया इनकम टैक्स बिल 2025 पेश कर दिया गया है। नए बिल में सरकार ने कानूनों के सरलीकरण पर जोर दिया गया है। नया कानून पुराने इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की जगह लेगा, जो कि मौजूदा समय में पुराना पड़ चुका है और बार-बार संशोधनों के कारण काफी पेचीदा हो गया है। नए इनकम टैक्स बिल 2025 में सरकार ने सुधारों और कानून को सरल बनाने पर जोर दिया है।

नए इनकम टैक्स बिल 2025 में सेक्शन की संख्या घटाकर 819 से 536 कर दी गई है। इसमें अनावश्यक छूटों को समाप्त कर दिया गया है और साथ ही नए बिल में कुल शब्द संख्या 5 लाख से घटाकर 2.5 लाख कर दी गई है। नए इनकम टैक्स बिल में चीजों को आसान बनाने पर फोकस किया गया है। साथ ही ‘असेसमेंट ईयर’ को ‘टैक्स ईयर’ से रिप्लेस किया जाएगा। नया टैक्स कानून एक अप्रैल, 2026 से अमल में लाया जाएगा।

लोकसभा में पेश होने के बाद, नए कानून को आगे के विचार-विमर्श के लिए वित्त पर संसदीय स्थायी समिति को भेजा जाएगा। यह बिल मौजूदा टैक्स स्लैब में बदलाव नहीं करेगा या दी गई टैक्स छूट को कम करेगा। इसके बजाय नए कानून का लक्ष्य छह दशक पुराने कानून को मौजूदा समय के अनुकूल बनाना है।

इससे भारत का टैक्स बेस मजबूत होगा और लंबे समय में आय स्थिरता में सुधार होगा। यह कानून भारत के टैक्स सिस्टम को ग्लोबल बेस्ट प्रैक्टिस के करीब भी लाता है। नए इनकम टैक्स बिल 2025 की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें टेक्नोलॉजी से संचालित असेसमेंट पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

अधिक स्पष्टता सुनिश्चित करने के लिए नए इनकम टैक्स बिल में व्यक्तियों और व्यवसायों के लिए व्याख्या को आसान बनाने के लिए टैक्स प्रावधानों को समझाने के लिए तालिकाएं, उदाहरण और सूत्र भी शामिल किए गए हैं। टैक्स कानूनों को सरल बनाकर नए इनकम टैक्स बिल 2025 में सरकार की कोशिश है कि बिजनेस अपना ध्यान वृद्धि पर लगाए न कि टैक्स प्लानिंग पर। इससे देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में मदद मिलेगी।

मोहब्बत की दास्ताँ: ताजमहल की धरती पर वैलेंटाइन डे का असली मतलब

बृज खंडेलवाल द्वारा

आगरा, 13 फरवरी 2025

जबकि दुनिया गुलाबों और चॉकलेट के साथ “वैलेंटाइन डे” मना रही है,  ताजमहल का शहर आगरा  मोहब्बत की नई परिभाषा और  एक ऐसी दास्तां  लिखना चाहता है जो क्षणभंगुर इशारों और व्यावसायिक दिखावों से परे है।

“सच्चा प्यार कालातीत होता है,” ऑस्ट्रेलिया से आए एक पर्यटक जेम्स ने  सर्दियों के सूरज के नीचे चमकते हुए सफेद संगमरमरी ताज महल के सामने खड़े होकर कहा।

एक दूसरे विदेशी पर्यटक ने कहा “शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताज़ के लिए यह चमत्कार बनवाया था, जिसने

 चौदह बच्चे पैदा किए। पश्चिम में, आपको इसके लिए एक दर्जन पत्नियों की आवश्यकता होगी!” उसने हँसते हुए कहा, उसके शब्द प्रेम की स्थायी विरासत को परिभाषित करते हैं।

ताजमहल, जिसे  रवींद्रनाथ टैगोर ने “अनंत काल के गाल पर एक आंसू” कहा था, समय और नश्वरता को पार करने की प्रेम की शक्ति का एक वसीयतनामा है। फिर भी, जब जोड़े उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं और सोशल मीडिया पर प्यार के इजहार की धूम मची रहती है, फ्रांस से आई एक टूरिस्ट,  मैरी प्यार की भौतिक अभिव्यक्तियों के साथ आधुनिक जुनून पर सवाल उठाती हैं। उन्होंने पूछा, “कामसूत्र की भूमि में चॉकलेट और गुलाब पर इतना जोर क्यों है?”

उधर, सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर कहती हैं, “यहां भारत में, प्यार हमेशा से गहरा, अधिक आध्यात्मिक, अधिक स्थायी और एक कालातीत बंधन रहा है।

भारत में प्यार की अवधारणा ने लंबे समय से बाहरी लोगों को आकर्षित किया है।” आगरा आने वाली एक पर्यटक, रोजलिंद ने आश्चर्य जताया, “लोग अपने साथी को करीब से जाने बिना कैसे शादी कर लेते हैं?” आजकल विदेशी मेहमान आगरा, वृंदावन, उदयपुर में भारतीय पद्वति से विवाह करने लगे हैं।  फिर भी, अरेंज मैरिज के प्रचलन के बावजूद, भारतीय विवाहों को अक्सर उनकी लंबी उम्र के लिए जाना जाता है – जो पश्चिम में बढ़ती तलाक दरों के बिल्कुल विपरीत है।

लेकिन परंपरा की धाराएँ बदल रही हैं। विश्वविद्यालय के छात्र पवन कहते हैं, “प्रेम विवाह अब पहले की तरह वर्जित नहीं रह गए हैं। अधिक युवा लोग अपने साथी चुन रहे हैं, अक्सर कई सालों के प्रेम-संबंध के बाद।” उनकी सहपाठी अनीता का मानना ​​है कि प्रेम विवाह को लेकर समाज में डर को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। “विफलता की दर अरेंज्ड और लव मैरिज दोनों के लिए समान है। बस इतना है कि जाति-आधारित समाज में “विद्रोहियों” को हतोत्साहित किया जाता है और पुरानी परंपराओं को बनाए रखने के लिए विफलताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है।”

यूनिवर्सिटी की  स्टूडेंट  निवेदिता, एक बढ़ती प्रवृत्ति पर प्रकाश डालती हैं: ‘अरेंज्ड लव मैरिज’ – जहां जोड़े पहले प्यार में पड़ते हैं और फिर अपने परिवारों को रिश्ते को औपचारिक रूप देने के लिए मना लेते हैं। “अधिकांश मामलों में, जब दोनों साथी आर्थिक रूप से स्वतंत्र होते हैं, तो माता-पिता के पास बहुत कम विकल्प होते हैं।” कंप्यूटर साइंस की एक छात्रा कहती है, “प्यार अब अंधा नहीं रह गया है; यह सिर्फ़ सेलेक्टिव या चुनिंदा हो गया है। सोच विचार के, आगा पीछा देख कर ही आजकल मोहब्बत की जाती है।”

फिर भी, हर कोई वैलेंटाइन डे के उन्माद से प्रभावित नहीं होता। स्थानीय दुकानदार राकेश पूछते हैं, “प्यार को एक दिन तक सीमित क्यों रखा जाए?” “प्यार को हर दिन हमारे जीवन का मार्गदर्शन करना चाहिए, न कि इसे एक व्यावसायिक नौटंकी तक सीमित कर देना चाहिए, जहाँ आपको अपनी भावनाओं को साबित करने के लिए उपहार खरीदना पड़ता है।”

हालाँकि, प्यार हमेशा की तरह एक पहली या गुत्थी बना हुआ है। राहुल, एक शिक्षक, ने एक मिस्ड,  गलत फ़ोन कॉल के ज़रिए अपना जीवनसाथी पाया। “मैं दिल्ली विश्वविद्यालय में था, वह ग्वालियर में थी। एक गलत नंबर डायल करने से अंतहीन बातचीत शुरू हुई और आखिरकार, शादी हो गई। प्यार अपनी राह खोज ही लेता है, चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों न हों,” वह हँसते हुए कहते हैं, उनकी कहानी रोमांस की अप्रत्याशितता पर आधुनिक समय का एक मोड़ है।

सामाजिक कार्यकर्ता अभिनय कहते हैं कि प्यार के इर्द-गिर्द कलंक मिट रहा है। “पहले, लोग चुपचाप ज़िंदगी भर दिल का दर्द सहते थे। अब, युवा प्रेमी अपनी पसंद के लिए लड़ते हैं, भले ही इसका मतलब परंपराओं को तोड़ना हो।” वह ऐसे मामलों की ओर इशारा करते हैं जहाँ तीन या चार बच्चों की माँएँ भी शादीशुदा महिलाएँ प्यार के लिए भाग जाती हैं। “बढ़ती गतिशीलता और स्वतंत्रता के साथ, जातिगत बाधाएँ टूट रही हैं। प्यार विकसित हो रहा है, और समाज भी।”

इन बदलती कहानियों के बीच, ताजमहल प्यार का एक शाश्वत प्रतीक बना हुआ है। ताज गंज के एक होटल व्यवसायी कहते हैं, “हर दिन हज़ारों लोग इस स्मारक को देखने आते हैं, उनका मानना ​​है कि यह उनके रिश्तों को मज़बूत बनाता है।” “इसकी आभा में कुछ ऐसा है – कुछ ऐसा जो प्यार को इस तरह से मजबूत करता है जैसा कोई वैलेंटाइन डे कार्ड कभी नहीं कर सकता।”

जैसा कि शेक्सपियर ने एक बार लिखा था, “प्यार वह प्यार नहीं है जो बदलाव पाकर बदल जाता है।” ताज की छाया में, प्यार एक दिन या एक ही रूप तक सीमित नहीं है। यह एक शांत भक्ति, एक भव्य इशारा, एक फुसफुसाया हुआ वादा है। यह परंपरा को चुनौती देने का साहस है, एक गलत नंबर की अप्रत्याशितता, सहन करने की लचीलापन है। क्योंकि आखिरकार, प्यार एक दिन के बारे में नहीं है। यह एक जीवनकाल के बारे में है। और शायद, थोड़ा सा अनंत काल।

 सही कहा है, “प्यार में जीने वाले, जन्नत भी ठुकराते हैं, क्योंकि मोहब्बत करने वाले, कभी किसी से नहीं डरते।”

सिख विरोधी दंगा 1984 के मामले में सज्जन कुमार दोषी करार

फरवरी 18 को सुनाई जा सकती है सजा

नई दिल्ली: 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले में बड़ी खबर सामने आ रही है। खबर यह है कि दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने सज्जन कुमार को दोषी करार दिया है। सज्जन कुमार को सरस्वती विहार इलाके में दो लोगों की हत्या के लिए दोषी ठहराया गया है। अब 18 फरवरी को सज्जन कुमार की सजा को लेकर बहस होगी।

यह केस 1 नवंबर 1984 को दिल्ली के सरस्वती विहार इलाके में एक सिख पिता और बेटे की हत्या से संबंधित है। इस मामले में सज्जन कुमार पर भीड़ का नेतृत्व करने का आरोप है। आरोप है कि उनके उकसावे पर भीड़ ने पिता-पुत्र को जिंदा जला दिया। इसके बाद पीड़ितों के घर में लूटपाट की गई और घर में मौजूद दूसरे लोगों को घायल कर दिया गया। सज्जन कुमार वर्तमान में दिल्ली कैंट में एक अन्य सिख विरोधी दंगा मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं।

फैसला सुनाने के लिए सज्जन कुमार को तिहाड़ जेल से अदालत में पेश किया गया। शुरुआत में पंजाबी बाग पुलिस स्टेशन ने मामला दर्ज किया था, लेकिन बाद में एक विशेष जांच दल ने जांच अपने हाथ में ले ली।

बड़ी क्रांति के इंतज़ार में गुजरात का कपड़ा उद्योग

– दूसरे राज्यों का रुख़ कर रहे गुजरात के कपड़ा उद्योगपति, कोरोना-काल के बाद से नहीं उबर पा रहा यह क्षेत्र

कपास उत्पादन के साथ-साथ कपड़ा उद्योग में गुजरात का स्थान भारत में सबसे ऊपर है; लेकिन यहाँ का कपड़ा उद्योग कोरोना-काल से संकट का सामना कर रहा है। गुजरात सरकार ने यहाँ के कपड़ा उद्योग को बचाने के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाये हैं। कोरोना-काल में जहाँ टैक्सटाइल कम्पनियों के महीनों बंद रहने के साथ-साथ कपड़ा उद्योग में कई दूसरी समस्याएँ के आड़े आयीं, वहीं टेक्सटाइल उद्योग में मोदी सरकार द्वारा टैक्स लगाये जाने से इस उद्योग पर बुरा असर पड़ा है। इसके चलते कई टेक्सटाइल कम्पनियाँ और उनके खाते बंद हो चुके हैं, बल्कि कपड़ा उद्योग पर लागू नीतियों के चलते भी टैक्सटाइल कम्पनियाँ गुजरात छोड़कर दूसरे राज्यों में जा रही हैं। पिछली कपड़ा नीति 31 दिसंबर, 2023 को समाप्त हो जाने के बाद काफ़ी देरी से नयी कपड़ा नीति गुजरात सरकार ने बनायी, जिसकी तारीफ़ गुजरात सरकार ने तो की है; लेकिन टैक्सटाइल के जानकार इसे उचित नहीं मान रहे हैं।

जानकारों के मुताबिक, पिछले एक साल में कपड़ा नीति में कमियों के चलते कई बड़ी कम्पनियाँ गुजरात छोड़कर झारखण्ड, महाराष्ट्र. तमिलनाडु, मध्य प्रदेश और दूसरे राज्यों का रुख़ कर चुकी हैं। गुजरात में कपास उत्पादन भी घट रहा है, जिसकी वजह कपास की खेती की लागत ज़्यादा आने के अलावा कपास का भाव कम होना है। एक प्रमुख उत्पादक बना हुआ है; लेकिन सूत और कपड़े के उत्पादन में इस क्षेत्र की क्षमताएँ पिछड़ रही हैं। स्थिति यह है कि गुजरात के किसानों की कपास को व्यापारी सूत और कपड़ा बनाने के लिए महाराष्ट्र और तमिलनाडु आदि राज्यों में में भेज रहे हैं। इन राज्यों में पहले भी कपास जाती थी; लेकिन अब इसमें बढ़ोतरी हो गयी है।

कोरोना-काल के बाद गुजरात के कपड़ा उद्योग पर हाल ही में बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन से बुरा असर पड़ा है। बांग्लादेश की नयी सरकार ने भारत के साथ व्यापारिक रिश्तों को ख़त्म करने के लिए नीतियों में बदलाव कर दिया है। इससे बांग्लादेश से आने वाले कपड़े में काफ़ी कमी आयी है, जिससे भारत में कपड़े का भाव भी बढ़ा है। इसका असर गुजरात के सूरत, अहमदाबाद जैसे मुख्य कपड़ा उद्योग वाले ज़िलों पर सबसे ज़्यादा पड़ा है। पड़ोसी देश में अचानक सत्ता परिवर्तन के दौरान सामने आयी एक रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के समय सूरत के क़रीब 250 से ज़्यादा कपड़ा व्यापारियों के 550 करोड़ रुपये फँस गये थे। बांग्लादेश से जींस आदि का कपड़ा आयात होता है, तो साड़ी, लेडीज ड्रेस मटेरियल और सादा कपड़ा निर्यात होता है, जिस पर बुरा असर पड़ा है। सूरत के व्यापारिक एसोसिएशनों ने उस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल को पत्र लिखकर इस मुद्दे का हल निकालने की माँग की थी। टैक्सटाइल क्षेत्र के एक्सपर्ट जगदीश भाई का कहना है कि गुजरात में कपास की खेती में कमी आयी है और पिछले चार-पाँच साल से सरकार की कुछ ग़लत नीतियों के चलते कपड़ा उद्योग कमज़ोर भी हुआ है। लेकिन अब भी गुजरात में कपड़ा क्षेत्र में अपार संभावनाएँ हैं और इसे चार गुना तक बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए ख़ासकर सूत