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पर्यावरण का संग: मस्ती न करें भंग

बृज खंडेलवाल द्वारा

होली का त्योहार दस्तक दे रहा है, और आगरा शहर  समेत समूचा ब्रज मंडल रंगों के इस जश्न की तैयारी में जुट गया है।

होली, ब्रज क्षेत्र में मनाया जाने वाला प्रमुख उत्सव है, जहाँ रंग, मस्ती, और हुल्लड़ की भरपूर झलक देखने को मिलती है। फाल्गुन में जब यह पर्व आता है,  पिचकारियों से रंगों की बौछार और ठंडाई की मिठास  की खासियत बढ़ जाती है।

आगरा में होली के पर्व की अपनी खास परंपराएँ हैं, जो मुग़ल युग से चली आ रही हैं। मूर्खों का सम्मान किया जाता है। आगरा नगर निगम पालीवाल पार्क में मेला आयोजित करता है। अतीत में, यहाँ होली का उत्सव विशेष रूप से शानदार होता था, जहाँ बादशाह और दरबारी रंगों में रंगते थे। आगरा के किले में होली के दिन बड़े समारोह आयोजित होते थे, जिसमें मनोहारी संगीत, नृत्य, और रंगों की बौछार होती थी। मुग़ल बादशाह रंगों से भरे जल में अपने दरबारियों के साथ खेलते थे। आगरा के लोगों के बीच मिठाईयों का आदान-प्रदान भी होता रहा है, जिससे यह पर्व और रंगीन हो जाता है। इस प्रकार, आज भी आगरा में होली का उल्लास मुग़ल काल की समृद्ध परंपराओं को जीवित रखता है।

मगर, इस बार होली की धूम में पर्यावरण की फिक्र भी जरूरी है। अब जबकि त्योहार में सिर्फ दस दिन बाकी हैं,  पर्यावरण प्रेमियों ने  मांग की है कि होली के दौरान प्रदूषण को कम करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। उनका कहना है कि “गौ काष्ठ” (गाय के गोबर से बनी ईंटें) जैसे पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को बढ़ावा दिया जाए और होलिका दहन के दौरान हानिकारक कचरे को जलाने पर पाबंदी लगाई जाए। यही नहीं, उन्होंने लोगों को जागरूक करने और प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल पर जोर देने की भी अपील की है।

होली के दौरान पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सकता है। पर्यावरणविद् देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं कि लोग होलिका दहन के लिए पेड़ों की टहनियाँ काटते हैं और घरों का कचरा, प्लास्टिक, पॉलीथीन, चमड़े का कचरा और अन्य जहरीली चीजें जलाते  हैं। जब यह सब जलता है, तो हवा में प्रदूषणकारी गैसें फैलती हैं, जो आगरा की पहले से खराब हवा को और भी ज़हरीला बना देती हैं। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है, खासकर तब जब आगरा का वायु प्रदूषण स्तर पहले ही खतरनाक स्तर पर पहुँच चुका है।

इस समस्या का एक और पहलू यह है कि होलिका दहन अक्सर सड़कों के चौराहों पर किया जाता है। ग्रीन एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर ने बताया कि इन अलावों से सड़कों पर तारकोल जल जाता है और गड्ढे पड़ जाते हैं, जिनकी मरम्मत महीनों तक नहीं होती है। कुछ लोग तो पुराने टायर भी जला देते हैं, जिससे हवा में और भी जहर घुल जाता है। ऐसे में, प्रशासन को सख्त कदम उठाने चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि होली का जश्न पर्यावरण के लिए बोझ न बने।

आगरा का हरित क्षेत्र पहले से ही सिमटता जा रहा है। रिवर कनेक्ट कैंपेनर राहुल राज ने बताया कि शहर का हरित क्षेत्र महज 9 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय दिशानिर्देश के मुताबिक यह 33 प्रतिशत होना चाहिए। ताज ट्रैपेज़ियम ज़ोन, जो ताजमहल के लिए बेहद अहम है, भी खतरे में है। मानसून में लगाए गए हज़ारों पौधे उपेक्षा के कारण मुरझा जाते हैं, और होली के दौरान पेड़ों की कटाई से हरियाली और भी कम हो जाती है। दीपक राजपूत ने कहा कि लोगों को जागरूक करने और उन्हें पर्यावरण के अनुकूल विकल्प देने की जरूरत है।

इस मुद्दे का पैमाना देखें तो यह और भी गंभीर हो जाता है। कार्यकर्ता चतुर्भुज तिवारी के मुताबिक, आगरा में हर साल एक हज़ार से ज्यादा होलिका दहन किए जाते हैं। अगर हर अलाव में दस क्विंटल जलाऊ लकड़ी जलती है, तो पर्यावरण को होने वाला नुकसान का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। ग्रामीण इलाकों में लोग गोबर के उपले और विलायती बबूल की टहनियाँ जलाते हैं, लेकिन शहरों में जलाऊ लकड़ी महंगी होने के कारण लोग कूड़ा-कचरा जलाते हैं, जिससे हवा में जहर घुल जाता है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए कार्यकर्ताओं ने कई सुझाव दिए हैं। उन्होंने प्रशासन से जनता को प्रदूषण के खतरों के बारे में जागरूक करने और होलिका दहन के लिए जैविक कचरे जैसे विकल्पों को बढ़ावा देने की अपील की है। साथ ही, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को वायु गुणवत्ता पर नज़र रखनी चाहिए और नियमों को सख्ती से लागू करना चाहिए। नगर निगम को होलिका दहन से क्षतिग्रस्त सड़कों की तुरंत मरम्मत करनी चाहिए।

होली के रंगों की बात करें तो सिंथेटिक रंगों के बजाय प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करना चाहिए। सिंथेटिक रंगों में मौजूद हानिकारक रसायन त्वचा को नुकसान पहुँचा सकते हैं और पर्यावरण को भी प्रदूषित करते हैं। प्राकृतिक रंगों से न सिर्फ त्योहार का मजा दोगुना होगा, बल्कि पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।

आगरा की हवा पहले से ही जहरीली है। सुप्रीम कोर्ट के 1993 के फैसले के बावजूद, ताजमहल को प्रदूषण से बचाने के लिए जो उपाय किए गए, उनका असर नगण्य है। होली के दौरान अलाव और सिंथेटिक रंगों का इस्तेमाल इस समस्या को और भी बढ़ा देता है।

होली के इस मौके पर सरकार, नगर निगम और आम लोगों को मिलकर काम करना चाहिए। पर्यावरण के अनुकूल तरीके से होली मनाकर आगरा दूसरे शहरों के लिए मिसाल कायम कर सकता है। आइए, इस होली को जीवन, प्रकृति और स्थिरता का उत्सव बनाएं। होली का रंग हो, पर्यावरण का संग हो!

पूर्व डीजीपी की बेटी 12 करोड़ की गोल्ड स्मैगलिंग करते गिरफ्तार

चर्चित एक्ट्रेस के घर पर 2 करोड़ रुपये मिले

बैंगलुरू: चर्चित एक्ट्रेस रान्या राव करोड़ों की सोने की तस्करी करते रंगे हाथों गिरफ्तार होने के बाद मुश्किलों में घिर गयी है। डायरेक्टोरेट आफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस (DRI) ने 12 करोड़ की गोल्ड के साथ रान्या को अरेस्ट किया है। पूर्व डीजीपी की बेटी रान्या राव के बारे में डीआरआई को खुफिया जानकारी मिली थी।

जीसके बाद अमीरात की फ्लाइट से लैंड करने के बाद एक्ट्रेस को रेवेन्यू डिपार्टमेंट ने बड़ी सूझबूझ के साथ गिरफ्तार कर लिया। वो दुबई से बेंगलुरु इंटरनेशनल एयरपोर्ट पहुंची थीं। उन्होंने ने 15 दिनों के भीतर दुबई की चार ट्रिप की, जिससे संदेह पैदा हुआ। यहां एयरपोर्ट पर उनकी मदद के लिए पहले से ही बसवराजू नाम का एक पुलिस कांस्टेबल तैयार था।

उसी की मदद से एक्ट्रेस ने सिक्योरिटी चेक से बच निकलने की कोशिश की, लेकिन डीआरआई की टीम उन पर पहले से ही नजर बनाए हुई थी, जिन्होंने उन्हें रोक लिया और सोने की खेप के साथ रंगे हाथों पकड़ लिया। जांच के दौरान, अधिकारियों ने उनके जैकेट में छिपे विदेशी मूल का 14.2 किलोग्राम सोना बरामद किया।

27 लाख की लेन-देन में राजस्थान के व्यवसायी की हत्या, रांची में मिला सिर, खूंटी पुलिस ने किया खुलासा

रांची: झारखंड के खूंटी जिले में एक सनसनीखेज हत्याकांड का खुलासा हुआ है, जिसमें राजस्थान के व्यवसायी की बेरहमी से हत्या कर दी गई। खूंटी पुलिस ने नामकुम पुलिस की मदद से इस जघन्य अपराध की गुत्थी सुलझाई है। मामला खूंटी जिले के मारंगदाहा थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जहां पुलिस को सड़क किनारे एक व्यक्ति का सिर कटा शव मिला था।

गहन जांच के बाद पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार किया, जिनकी निशानदेही पर मृतक का सिर रांची के नामकुम इलाके से बरामद किया गया। शव की शिनाख्त राजस्थान के 27 वर्षीय व्यवसायी पुखराज के रूप में हुई, जो झारखंड में डोडा (अफीम से जुड़ा उत्पाद) की खरीद-फरोख्त करता था। गिरफ्तार आरोपियों ने खुलासा किया कि व्यवसाय से जुड़े 27 लाख रुपये के लेन-देन को लेकर हत्या को अंजाम दिया गया।

हत्या के बाद सिर को खेत में दफनाया गया

खूंटी पुलिस के मुताबिक, हत्या नामकुम थाना क्षेत्र के सुकरीडीह में की गई थी। अपराधियों ने व्यवसायी का सिर धड़ से अलग करने के बाद उसे खेत में दफना दिया था, जबकि शव को खूंटी में सड़क किनारे फेंक दिया गया था।

खूंटी पुलिस ने राजस्थान पुलिस को मामले की जानकारी दे दी है, ताकि मृतक के परिजन आगे की प्रक्रिया के लिए पुलिस से संपर्क कर सकें और शव को अपने कब्जे में ले सकें।

न उत्तरदायित्व, न काम

पंडित प्रेम बरेलवी

संसार में हर व्यक्ति अपने नियत कर्म से बँधा होता है। लेकिन सत्ता मिलने पर अय्याशी करने वाले बहरूपिया राजनेता न उत्तरदायित्व निभाते हैं और कोई काम करते हैं। दिन भर सजना-सँवरना, इधर-उधर घूमना, लफ़्फ़ाजी करना, जनकल्याण की जगह सिर्फ़ अपने आकाओं और अपने लिए धन लूटना; बस यही ऐसे भारत के राजनेताओं की ज़िन्दगी का मक़सद हो चुका है। ऐसा नहीं कि भारत में इस प्रवृत्ति का कोई एक नेता है। ऐसे नेताओं की आज देश भर में भरमार है, जो अपने उत्तरदायित्व की नहीं, बल्कि चंदे और धंधे की ही चिन्ता करते हैं।

ऐसे नेता अपने अपराधों को भी जायज़ मानते हैं। दुर्भाग्य से इस प्रवृत्ति के नेताओं की संख्या इतनी ज़्यादा हो चुकी है कि अब उनके हाथों से सत्ता छीन पाना बहुत मुश्किल है। ये नेता निर्लज्जता से सरेआम झूठ बोलते हैं। मनमानी करके देश को विकट नुक़सान पहुँचा रहे हैं। पूँजीपतियों के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार के मामलों को निजी मामला बता देते हैं। विपक्षी पार्टियों की सरकारों को गिराने और परेशान करने के लिए षड्यंत्र रचते हैं। पत्रकारों के सवालों से ऐसे बचने लगते हैं, जैसे मेहनत से कोई आलसी कामचोर बचना चाहता है। सवाल पूछे जाने पर भारत के लोकतंत्र, संस्कृति, दर्शन और वसुधैव कुटुंबकम् की भारतीय धारणा की दुहाई देते हुए भ्रष्टाचार के मामलों को भी निजी और पारिवारिक बता देते हैं। देश को तर$क्क़ी के रास्ते पर ले जाने से लेकर दुनिया भर में उसका मान-सम्मान और क़द बढ़ाने की ज़िम्मेदारी निभाने की जगह दलाली का काम करते हैं। नैतिक ज़िम्मेदारियाँ निभाने की जगह हास्यास्पद ज्ञान बघारते फिरते हैं। हर काम का आभार और वाहवाही लूटने में माहिर हैं और दुर्घटनाओं पर मुँह में इतना दही जमा लेते हैं कि संवेदना तक प्रकट नहीं करते। देश के ईमानदार अधिकारियों को धमकाकर और रिश्वतख़ोर अधिकारियों को रिश्वत खाने की छूट देकर उनसे मनचाहे काम कराते हैं।

हाल ही में जब ऐसी ही आपराधिक प्रवृत्ति के नेताओं पर रोक लगाने की सोच से जब अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका लगाकर आपराधिक प्रवृत्ति के सांसदों, विधायकों और नेताओं के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने और उनके आपराधों पर न्यायिक फ़ैसले जल्द-से-जल्द करने की माँग की, तो सत्ता में बैठे अपराधियों ने तुरंत अपने बचाव में केंद्र सरकार की तरफ़ से जवाब दाख़िल करवाकर अपना बचाव कर लिया। केंद्र सरकार की तरफ़ से जवाब आया कि न्यायिक समीक्षा की सीमाएँ होती हैं। न्यायालय क़ानून की प्रभावशीलता के आधार पर संसद के फ़ैसले को चुनौती नहीं दे सकता। अपराधों पर प्रतिबंध की अवधि संसद की नीति का हिस्सा है। इसे चुनौती देकर किसी अपराधी पर आजीवन (चुनाव लड़ने पर) प्रतिबंध थोपना सही नहीं होगा।

अपराधियों पर प्रतिबंध लगने की आहट से ही यह बचाव इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि संसद से लेकर विधानसभाओं तक में अपराधी भरे पड़े हैं। इनकी हिम्मत इतनी बढ़ चुकी है कि ये न्यायालय को चुनौती दे रहे हैं। इन अपराधियों को यह हिम्मत आँख बंद करके जाति, धर्म, पार्टी के नाम पर लोकलुभावने वादों के झाँसे में आकर मतदान करने वालों ने दी है। इसी हिम्मत के दम पर ये लोग संविधान द्वारा प्रदत्त संसद की शक्तियों का दुरुपयोग कर रहे हैं और सर्वोच्च न्यायालय को एक प्रकार की धमकी दे रहे हैं कि वह इस मामले में दख़ल न दे। क्योंकि अपराध के रास्ते सत्ता तक पहुँचने वाले ये लोग इतने ताक़तवर हो चुके हैं और बहुमत में हैं कि हर प्रकार की मनमानी पर उतारू हैं। अपराधियों के लिए राजनीतिक पक्ष की क़ानूनी अवधारणा इतनी कमज़ोर और सस्ती हो चुकी है कि कोई भी शातिर अपराधी संसद की सीढ़ियाँ आसानी से चढ़ जाता है। जो जितना बड़ा शातिर अपराधी होता है, वह उतनी ही बड़ी सत्ता पा जाता है। लेकिन इसमें सिर्फ़ जनता का ही दोष नहीं है, बल्कि कौड़ियों के भाव ईमान बेचने वाले संवैधानिक संस्थाओं में बैठे मठाधीश, अफ़सर, पत्रकार और बुद्धिजीवी भी बहुत बड़े दोषी हैं। लेकिन इन सबके लालच की भेंट अंत में जनता ही चढ़ती है। 

सत्ता की ताक़त के आगे सर्वोच्च न्यायालय की लाचारी इतनी बढ़ चुकी है कि वह अब आपराधिक बहुमत के राजनीतिक क़िलों पर टिप्पणी ही कर सकता है, सत्ता में पहुँच चुके अपराधियों को जेल नहीं भिजवा सकता। संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोग षड्यंत्र रच रहे हैं। अपने और अपनी सत्ता के बचाव के लिए देश से लगातार झूठ बोल रहे हैं। खुलेआम देश की संपदा और जनता की मेहनत की कमायी लूट रहे हैं। मूर्ख लोग नियति और राजनीतिक परंपरा की दुहाई देते हुए बड़ी आसानी से कह देते हैं कि हर सरकार में भ्रष्टाचार होता है। निर्बलों को इसकी परवाह नहीं है। जो बोलते हैं, वे एकजुट नहीं हैं। यही कारण है कि सरकारों में बहुमत में बैठे दाग़ी शासकों की हिम्मत इतनी बढ़ चुकी है कि वे बड़ी आसानी से न्यायालयों के फ़ैसलों में हस्तक्षेप कर देते हैं। फिर भी जनता ही सर्वशक्तिमान है; लेकिन यह जनता तभी कुछ कर सकती है, जब वह ख़ुद न्यायप्रिय, जागरूक, लालच से दूर, देश और जनहित की समझ रखने वाली होगी।

योगी के राम-राज्य में जनता की दशा

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन का दूसरा कार्यकाल चल रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं उनके समर्थक उनके शासन को राम राज्य बताकर अब तक का सर्वश्रेष्ठ शासनकाल कह रहे हैं; मगर जनता में सब इस बात से सहमत नहीं हैं। अनेक समस्याओं एवं प्रशासनिक दबाव से त्राहिमाम कर रही अधिकांश जनता मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ-साथ भाजपा से भी छुटकारा पाना चाहती है। इसका स्पष्ट उदाहरण बीते वर्ष लोकसभा चुनाव में भाजपा को अत्यधिक कम मिली सीटें हैं। दूसरा उदाहरण मिल्कीपुर विधानसभा सीट पर मतदान में हुई कथित गड़बड़ी है।

मास्टर नंदराम कहते हैं कि भाजपा की करनी एवं कथनी में धरती-आकाश का अंतर दिखायी देता है। जनता ने जिस आशा से बड़े सम्मान के साथ भाजपा को देश एवं उत्तर प्रदेश का शासन सौंपा है, जनता को उसका मलाल होने लगा है। प्रदेश में आपराधिक घटनाएँ हर दिन घट रही हैं। बुलडोज़र अवैध निर्माणों के अतिरिक्त निर्दोषों के निर्माणों पर भी दहाड़ रहा है। भ्रष्टाचार भी नहीं रुका है। नौकरियाँ घट रही हैं एवं शिक्षा व्यवस्था ठप होती दिख रही है। इसका परिणाम ये देखने को मिल रहा है कि लूट, चोरी एवं हत्या की वारदात बढ़ती जा रही हैं; मगर शासन प्रशासन में कोई मानने को तैयार नहीं है कि प्रदेश में अपराध हो रहे हैं। समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता करन सिंह कहते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से प्रदेश की व्यवस्था नहीं सँभल रही है। अपराधों की तो कोई गिनती ही नहीं है। बलात्कार की घटनाओं से मन दु:खी होता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं को न्यायाधीश समझते हैं एवं घोषणा करते हैं कि वह संत हैं; मगर प्रदेश में हर दिन कई-कई जघन्य अपराध होने के उपरांत भी उनका हृदय नहीं रोता है। उनके सारे प्रयास स्वयं की छवि चमकाने एवं अपनी कमियों पर पर्दा डालने के दिखते हैं। उन्होंने आज तक किसी बलात्कार पीड़िता के घर जाकर उसकी पीड़ा को कम करने के लिए बलात्कारियों को नेस्तनाबूद करने की क़सम नहीं खायी। ऊपर से उन्होंने अपनी पार्टी के अनेक बलात्कारियों को बचाने के प्रयास ही किये हैं। उन्नाव कांड, कानपुर कांड, हाथरस कांड, बदायूँ कांड, पीलीभीत कांड, गोरखपुर कांड, बाराबंकी कांड से लेकर हर जनपद में कोई-न-कोई घिनौनी दुराचार की घटना होती रहती है; मगर मुख्यमंत्री योगी की सेहत पर कोई असर नहीं हुआ। उनका हृदय मासूम बच्चियों के बलात्कार से भी नहीं पसीजता है। भाजपा कार्यकर्ता योगेंद्र कहते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन में अपराधी बचे ही नहीं है। जब योगेंद्र से पूछा गया कि अगर प्रदेश में अपराध नहीं हो रहे हैं, तो हर दिन अपराध के अनेक समाचार कैसे प्रकाशित हो रहे हैं? इस पर योगेंद्र ने उत्तर दिया कि छोटी-मोटी घटनाएँ कहाँ नहीं होती हैं? अपराध की बड़ी-बड़ी घटनाओं पर इस प्रकार का उत्तर देना भाजपा की मानसिकता दर्शाता है।

दहल उठीं महिलाएँ

उत्तर प्रदेश में हर दिन बलात्कार की अनेक घटनाओं से समाचार पत्र भरे दिखते हैं; मगर योगी शासन में इन घटनाओं को आम घटनाएँ कहने का चलन बन गया है। एक पुलिसकर्मी नाम प्रकाशित करने की विनती करते हुए कहते हैं कि अपराध पर रोक लगाने में पुलिस को मात्र 24 घंटे का समय पर्याप्त है। मगर अपराध की घटनाओं को अंजाम देकर भी अगर कोई अपराधी पुलिस की पकड़ से बचा रहता है, तो इसका अर्थ स्पष्ट समझ लीजिए कि उस अपराधी का बचाव कोई राजनीतिक ताक़त कर रही है। पुलिस के लिए अपराधियों को सीधा करना कोई कठिन चुनौती नहीं है। राजनीतिक दबाव एवं अपराधियों के संरक्षण का चलन राजनीति में रहता है, क्योंकि नेता चुनाव से लेकर सत्ता में अपना दबदबा बनाये रखने तक के लिए अपराधियों का सहारा लेते हैं।

तात्कालिक आपराधिक घटनाओं पर दृष्टिपात करने पर देखा जा सकता है। बीती 20 जनवरी को बरेली के हाफिजगंज थाना क्षेत्र के एक गाँव में झब्बू नाम के एक व्यक्ति ने खेत पर जा रही सात वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म करके उसका गला दबाकर हत्या करने का प्रयास किया। परिजनों ने बलात्कारी को पकड़ लिया, जिसके बाद पुलिस ने उसे हिरासत में लेकर न्यायालय में प्रस्तुत किया, जहाँ विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) कोर्ट-3 उमाशंकर कहार ने फोरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर झब्बू को दोषी मानते हुए 20 वर्ष का सश्रम कारावास एवं 10,000 रुपये के आर्थिक दंड की सज़ा सुनायी। इससे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कर्म स्थली उनके ही गोरखपुर नगर में एक हुक्का बार में एक युवती के साथ सामूहिक बलात्कार की वारदात हुई थी। बीती 27 जनवरी को ही मुज़फ़्फ़रनगर में भी एक कैफे में एक 15 वर्षीय 10वीं की छात्रा का सामूहिक बलात्कार किया गया। मुज़फ़्फ़रनगर में ही फरवरी के पहले सप्ताह में एक अन्य नवविवाहिता के साथ सामूहिक बलात्कार करके उसकी हत्या कर दी गयी। 30 जनवरी को भगवान राम की नगरी में एक मंदबुद्धि युवती से सामूहिक बलात्कार करके अज्ञात लोगों ने उसे इतना पीटा कि उसकी पसलियाँ तक टूट गयीं। 2 फरवरी को उसका शव मिला। पुलिस इस घटना को दबाने के प्रयास में लगी रही। अयोध्या में ऐसे जघन्य अपराध की घटना बताती है कि प्रदेश में राम राज्य की बात एक जुमला ही है। 29 जनवरी को शाहजहांपुर में एक छात्रा का अपहरण करके अपराधियों ने सामूहिक बलात्कार करके उसके अश्लील वीडियो बना लिये। अपराधियों ने छात्रा को धमकाते हुए घटना के बारे में किसी को न बताने एवं बुलाने पर चले आने को कहकर छोड़ दिया। घटना की जानकारी पुलिस को हुई, तो अपराधियों की गिरफ़्तारी के लिए दबिश दी गयी मगर अपराधियों ने पुलिस पर ही गोलियाँ चला दीं। मुठभेड़ में पुलिसकर्मी भी घायल हो गये; मगर अपराधी पकड़े गये। अपराधियों के इतने बुलंद हौसले बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में आपराधिक घटनाएँ नहीं रुकी हैं एवं राम राज्य कहीं नहीं है। ये केवल कुछ ही बलात्कार की घटनाएँ हैं। प्रदेश में हर प्रकार के अपराध की घटनाएँ हर दिन घटित हो रही हैं।

बुलडोज़र से समर्थक भी तंग

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के उपरांत भी उत्तर प्रदेश में बुलडोज़र कार्रवाई नहीं रुक रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि बुलडोज़र बाबा के नाम से प्रसिद्ध हो चुके प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बुलडोज़र एवं एनकाउंटर को अपनी न्याय नीति का प्रमुख हथियार मानते हैं। यही कारण है कि उनका बुलडोज़र न इलाहाबाद उच्च न्यायालय की आपत्ति पर रुका एवं न सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के उपरांत रुका है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन में पुलिस एनकाउंटर को लेकर भी आपत्तियाँ दर्ज हुई हैं; मगर उस पर भी रोक नहीं लगी है। एक भाजपा नेता नाम प्रकाशित न करने की विनती करते हुए कहते हैं कि योगी जनता को डराकर स्वयं को शक्तिशाली घोषित करना चाहते हैं। उनकी बुलडोज़र एवं एनकाउंटर नीतियाँ अनेक अपराधियों को डराने के नाम पर चर्चित अवश्य हुई हैं; मगर आम जनता में इसका संदेश अच्छा नहीं गया है।

बुलडोज़र केवल अपराधियों के घरों, व्यावसायिक केंद्रों एवं अवैध निर्माणों पर ही नहीं चल रहा है, वरन् सरकार के विरुद्ध हुंकार भरने वालों के घरों एवं व्यावसायिक केंद्रों पर चलने के आरोप लग रहे हैं। यह भी नहीं है कि बुलडोज़र केवल भाजपा के पक्ष में खड़े होने वालों के अवैध निर्माण ढहा रहा है। कई गाँवों में देखा गया है कि ग्राम सभा की भूमि पर अवैध निर्माण करने वाले कई भाजपा समर्थकों को भी बुलडोज़र कार्रवाई में छोड़ा नहीं गया है। भाजपा के पक्ष में बोलने एवं मतदान करने वाले दो ऐसे ही व्यक्तियों तुलाराम एवं कोमिल प्रसाद के उन निर्माणों को भी तोड़ने के लिए नाप लिया गया है, जो ग्राम सभा की भूमि पर बने हुए बताये जाते हैं। तुलाराम कहते हैं कि उन्होंने अपने घेर का निर्माण ग्रामसभा की भूमि पर अवश्य कराया है; मगर वह ग्रामसभा की भूमि उन्हें घर बनाने के लिए वर्षों पहले पट्टे पर मिली थी। कोमिल प्रसाद कहते हैं कि उनका घर तो उनके खेत में बना हुआ है फिर भी उसे तोड़ने के लिए सरकारी अधिकारी नापकूत करके ले गये हैं। गाँव के दूसरे लोग कहते हैं कि कोमिल प्रसाद ने अपना घर खेत में ही बनाया है; मगर सड़क किनारे की सरकारी भूमि को भी पाटकर उन्होंने घर सड़क किनारे बनाया है। इन दोनों लोगों के निर्माण अवैध हैं अथवा वैध यह बिना आधिकारिक घोषणा के नहीं कहा जा सकता; मगर दोनों ही लोग भाजपा के कट्टर समर्थक हैं। अब जबसे उनके निर्माणों पर बुलडोज़र चलने की बात सामने आयी है, भाजपा एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नीतियों को लेकर दोनों के सुर बदल गये हैं।

उर्दू पर प्रहार का विरोध

बीते दिनों उत्तर प्रदेश विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी ने उर्दू को कठमुल्लापन की भाषा बताकर विवाद मोल ले लिया है। उर्दू लखनऊ की तहज़ीब वाली भाषा मानी जाती है एवं पूरे प्रदेश में उर्दू के शब्दों का अपनी स्थानीय भाषा एवं हिंदी में सम्मान के साथ सभी लोग उपयोग करते हैं। स्वयं योगी आदित्यनाथ उर्दू का विरोध करते हुए उर्दू के शब्द बोल रहे थे। उन्होंने विधानसभा में एक शायरी भी पढ़ी जो उर्दू की थी। मगर वह उर्दू को मुसलमानों की भाषा एवं उसका अपमान करके फँस गये हैं। उर्दू के प्रति उनकी इस घृणा पर मुसलमान तो फिर भी कम बोल रहे हैं, हिंदू उनको संकीर्ण मानसिकता से ग्रस्त घृणा फैलाने वाला मुख्यमंत्री बता रहे हैं। एक साहित्यकार कहते हैं कि पहली बात तो उर्दू भारतीय भाषा है एवं आम बोलचाल की भाषा का अभिन्न अंग है। दूसरी बात यह एक मीठी ज़ुबान है, जिसके बिना काम चल ही नहीं सकता। मगर योगी आदित्यनाथ को हिंदुत्व के नाम पर राजनीति करनी है एवं उन्हें हिंदुओं का नेता बनने का भूत सवार है; वह भी घृणा फैलाकर, अच्छे काम करके नहीं। ऐसे में उन्हें कौन पसंद करेगा?

संगम के जल पर विवाद

प्रयागराज में महाकुंभ स्नान के बीच संगम में त्रिवेणी के जल को न नहाने योग्य बताने वाली केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भड़क गये हैं। वह उत्तर प्रदेश विधानसभा में विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी पर बरसने के उपरांत त्रिवेणी के जल को नहाने योग्य न बताने वाली रिपोर्ट को लेकर भी भड़क गये। वह कहते हैं कि महाकुंभ में संगम का जल पूर्णत: स्नान करने योग्य है एवं आचमन करने योग्य भी है। संगम के जल में ऑक्सीजन की मात्रा आठ से नौ तक है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण बोर्ड लगातार जल स्वच्छ करने की दिशा में कार्य कर रहा है। इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने महाकुंभ में बड़े-बड़े लोगों के स्नान करने की बात कही। मुख्यमत्री योगी आदित्यनाथ ने आरोप लगाया कि महाकुंभ को बदनाम करने की साज़िश चल रही है। झूठे वीडियो चल रहे हैं।

विदित हो कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने संगम के जल के कई नमूने लेकर परीक्षण किया था, जिसकी रिपोर्टर 03 फरवरी को उसने राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण को सौंपी थी। इस रिपोर्ट में कहा था कि गंगा-यमुना के पानी में तय मानक से कई गुना फ़ीकल कोलीफार्म बैक्टीरिया हैं। इसके उपरांत 18 फरवरी को उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट को अनुचित बताते हुए एक नयी रिपोर्ट सौंपी। इसके बाद राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से जल के पुनर्परीक्षण की नयी रिपोर्ट माँगी है।

दिल्ली में फर्जी पहचान के साथ रह रही महिला नक्सली गिरफ्तार, झारखंड पुलिस को थी लंबे समय से तलाश

नई दिल्ली/चाईबासा: बाहरी दिल्ली के पीतमपुरा इलाके से पश्चिमी सिंहभूम की रहने वाली एक महिला नक्सली को दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने गिरफ्तार किया है। वह राष्ट्रीय राजधानी में फर्जी पहचान के सहारे घरेलू सहायिका के रूप में रह रही थी। पुलिस ने बुधवार को इस गिरफ्तारी की पुष्टि की।

कई गंभीर मामलों में वांछित थी महिला नक्सली

दिल्ली पुलिस के मुताबिक, 23 वर्षीय यह महिला झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के कुदाबुरु गांव की रहने वाली है। वह झारखंड पुलिस के साथ मुठभेड़ के कई मामलों में वांछित थी और उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC), शस्त्र अधिनियम, विस्फोटक अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की विभिन्न धाराओं के तहत मामले दर्ज हैं। झारखंड की एक अदालत ने 26 मार्च 2023 को उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया था।

2020 में आई थी दिल्ली, फर्जी पहचान पर कर रही थी काम

पुलिस के अनुसार, महिला नक्सली संभवतः 2020 में दिल्ली आई थी। उसने झूठी पहचान के सहारे नोएडा और दिल्ली के विभिन्न इलाकों में घरेलू सहायिका के रूप में काम किया। बाद में वह पीतमपुरा में स्थायी रूप से रहने लगी।

गुप्त सूचना के आधार पर गिरफ्तारी

दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा को कई महीनों की निगरानी और खुफिया जानकारी के बाद महिला नक्सली की उपस्थिति के बारे में विश्वसनीय सूचना मिली थी। पुलिस उपायुक्त (अपराध) विक्रम सिंह ने बताया कि चार मार्च को महाराणा प्रताप एन्क्लेव, पीतमपुरा में छापेमारी के दौरान उसे गिरफ्तार किया गया।

कम उम्र में बनी थी नक्सली, खतरनाक हथियारों का मिला था प्रशिक्षण

महिला नक्सली का जन्म झारखंड के एक किसान परिवार में हुआ था। वह महज 10 साल की उम्र में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) गुट में शामिल हो गई थी। उसने झारखंड के कोल्हान जंगल में रमेश नामक कमांडर के नेतृत्व में पांच साल तक प्रशिक्षण लिया। इस दौरान उसे इंसास राइफल, एसएलआर, एलएमजी, हथगोला और .303 राइफल जैसे आधुनिक हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी गई।

पुलिस मुठभेड़ों में थी सक्रिय भूमिका

झारखंड पुलिस के अनुसार, 2018 और 2020 के बीच हुई तीन अलग-अलग मुठभेड़ों में वह सक्रिय रूप से शामिल रही। पहली मुठभेड़ 2018 में कोल्हान में हुई थी, दूसरी 2019 में पोरहाट में और तीसरी 2020 में सोनुआ में हुई थी। इन मुठभेड़ों के बाद उसके गुट के कमांडरों ने उसे दिल्ली भाग जाने का निर्देश दिया था।

झारखंड पुलिस को सौंपी जाएगी आरोपी

अधिकारी ने बताया कि झारखंड के सोनुआ थाने में महिला नक्सली के खिलाफ आपराधिक साजिश, हत्या के प्रयास और राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने जैसे गंभीर आरोपों के तहत कई प्राथमिकियां दर्ज हैं। दिल्ली पुलिस उसे आगे की कानूनी कार्यवाही के लिए अदालत में पेश करेगी, जिसके बाद झारखंड पुलिस उसे हिरासत में ले सकती है।।

अमेरिका का कनाडा और मेक्सिको को बड़ा झटका, आज से टैरिफ लगाने की घोषणा

वाशिंगटन: हाल के दिनों में ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई देशों पर टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। इस कड़ी में आज यानी मंगलवार से इसकी शुरुआत हो रही है। अमेरिका आज से कनाडा और मेक्सिको पर तगड़ा टैरिफ लगाने जा रहा है। इन दोनों देशों से अमेरिका आने वाले सामानों पर 25 फीसदी टैरिफ लगेगा। इससे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को कहा कि 4 मार्च से कनाडा और मेक्सिको पर टैरिफ लागू हो जाएंगे।

यूएस प्रेसिडेंट के टैरिफ वाले एलान के बाद व्हाइट हाउस का बयान सामने आया है। इस बयान में कहा गया कि अमेरिका को टैरिफ लगाना ही होगा। अब लोगों को कार प्लांट और दूसरी चीजें अमेरिका में ही बनाना चाहिए। जिससे उन्हें किसी प्रकार के टैरिफ का सामना नहीं करना पड़ेगा।

इतना ही नहीं गत दिनों डोनाल्ड ट्रंप ने फेंटेनाइल (ड्रग) के बारे में बात की। उन्होंने इस संदर्भ में कहा कि फेंटेनाइल की तस्करी पर रोक नहीं लगाई गई। इसलिए अब समझौते की कोई गुंजाइश बची नहीं है। ट्रंप ने चीन का जिक्र करते हुए कहा कि अमेरिका चीन से फेंटेनाइल के शिपमेंट को रोकने में विफल रहा है। अब बीजिंग को दंडित करने के लिए सभी चीनी इंपोर्ट पर टैरिफ को 10 फीसदी से बढ़ाकर 20 फीसदी कर दिया जाएगा।

फ़सलों का उचित भाव नहीं देना चाहती सरकार!

केंद्र सरकार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी नहीं दे रही है। स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों को तो केंद्र सरकार बिलकुल भी लागू नहीं करना चाहती। इसलिए दोबारा किसानों के साथ बातचीत की पहले के बाद भी न्यूनतम समर्थन मूल्य के गारंटी क़ानून और स्वामीनाथन आयोग के हिसाब से किसानों को फ़सलों का भाव देने की सहमति केंद्र सरकार नहीं दे रही है। न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर गारंटी क़ानून और दूसरी सभी माँगों को लेकर केंद्र सरकार और किसान नेताओं के बीच चंडीगढ़ में अभी तक छ: बैठकें हो चुकी हैं और सभी विफल रही हैं। इससे पहले 14 फरवरी को हुई बैठक भी विफल रही थी। केंद्र सरकार और किसानों के बीच अब अगली बैठक होली के बाद 19 मार्च को होनी है।

यह बैठक क़रीब ढाई घंटे चली, जिसमें केंद्र सरकार की तरफ़ से केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी, केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और केंद्रीय कमेटी के पदाधिकारी मौज़ूद थे। वहीं, किसानों की तरफ़ से संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के 28 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख किसान नेता सरवन सिंह पंधेर, काका सिंह कोटड़ा, जसविंदर लोंगोवाल, बलवंत सिंह बेहरामके सुखजीत सिंह, इंद्रजीत सिंह कोटबुढ़ा, अरुण सिन्हा, लखविंदर सिंह और अभिमन्यु कोहाड़ के अलावा दूसरे प्रमुख किसान नेता शामिल हुए थे। किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल भी इस बैठक के दौरान पास ही एंबुलेंस में रहे। इस बैठक में पंजाब सरकार की तरफ़ से वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा, कृषि मंत्री गुरमीत सिंह गुड्डियाँ और फूड प्रोसेसिंग मंत्री लालचंद कटारुचक भी शामिल रहे।

इस बैठक में किसानों की माँगों पर केंद्र सरकार सहमत नहीं हुई और उसके प्रतिनिधियों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की क़ानूनी गारंटी पर हामी नहीं भरी। केंद्र सरकार के प्रतिनिधि कह रहे हैं कि सरकार अभी 18 फ़सलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीदने की जगह दो-तीन फ़सलों को और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीद सकती है। लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत पहले ही 23 फ़सलें शामिल हैं। लगता है कि केंद्र सरकार किसानों से चालाकी कर रही है और उन्हें बहकाकर शान्त करना चाहती है। केंद्र सरकार को खनोरी बॉर्डर और शंभू बॉर्डर पर किसानों के आन्दोलन से ऐतराज़ है और डर यह है कि कहीं दोबारा पूरे देश के किसान सड़कों पर न उतर आएँ। किसान केंद्र सरकार से साफ़ कह रहे हैं कि अगर उसने किसानों की माँगें नहीं मानीं, तो वे दिल्ली जाएँगे। केंद्र सरकार जानती है कि अगर किसान दिल्ली की तरफ़ बढ़े, तो किसान आन्दोलन फिर से तूल पकड़ सकता है। यही कारण है कि 2020 से ही केंद्र सरकार किसान आन्दोलन को विफल करने की कोशिश करती रही है। इसके लिए उसने किसानों को बदनाम भी किया और उन पर अत्याचार भी किये।

बैठक के बाद केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि चर्चा सकारात्मक रही है। हमने किसानों की समस्याओं को ध्यान से सुना है और हमने मोदी सरकार की प्राथमिकताओं को सामने रखा, जो किसानों के कल्याण से सम्बन्धित हैं। दोनों पक्षों के पास अपने-अपने आँकड़े हैं और अब इनका मिलान किया जाएगा। इस बैठक से पहले कृषि मंत्री शिवराज सिंह किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल के पास पहुँचे और उनसे अनशन ख़त्म करने की अपील की। लेकिन किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने किसानों की माँगें पूरी न होने तक अनशन तोड़ने से मना कर दिया। संयुक्त किसान मोर्चा के नेता सरवन सिंह पंधेर और दूसरे कई किसान नेता केंद्र सरकार के किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं करने पर दिल्ली कूच का ऐलान कर चुके हैं। अब अगली बैठक 19 मार्च को होने के बाद ही किसानों के दिल्ली कूच की तारीख़ तय हो सकेगी। 19 मार्च को केंद्र सरकार और किसानों की बैठक में क्या होगा? केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान किसानों की समस्याओं को कितनी गंभीरता से लेंगे? यह तो बैठक के बाद ही पता चलेगा। इससे पहले समझने की ज़रूरत यह है कि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी क्यों दी जानी ज़रूरी है?

केंद्र सरकार ने जून, 2024 ख़रीफ़ की और अक्टूबर, 2024 में रबी की कुछ ही फ़सलों का मामूली न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाते हुए किसानों को बहलाने का प्रयास किया था। जबकि केंद्र सरकार की विपणन नीति के तहत 23 फ़सलें आती हैं, जिन्हें स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिश के आधार पर सी2 प्लस 50 प्रतिशत के हिसाब से ख़रीदा जाना चाहिए। लेकिन केंद्र सरकार और राज्य सरकारें न तो न्यूनतम समर्थन मूल्य वाली सभी फ़सलें किसानों से ख़रीदती हैं और न ही न्यूनतम समर्थन मूल्य का ही सही निर्धारण अभी तक किया गया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य सही न मिलने के चलते किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य वाली अपनी ज़्यादातर फ़सलों को बाज़ार में कम भाव में बेचना पड़ता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी न मिलने से बाज़ार के उतार-चढ़ाव के कारण किसानों को बहुत नुक़सान होता है। किसानों को घाटे से बचाने के लिए भारत के कृषि सुधारों के हिस्से के रूप में पहली बार वित्त वर्ष 1966-67 में बाज़ार भाव पर नियंत्रण करने के प्रयास हुए थे। इसके बाद न तो इस तरह के प्रयास हुए और न ही फ़सलों का कोई निर्धारित भाव किसानों मिल पाया है। इसलिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का गारंटी क़ानून बनना ज़रूरी है।

अभी न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत सात तरह के अनाज (गेहूँ, धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, जौ और रागी), पाँच तरह की दालें (अरहर, चना, मसूर, उड़द और मूँग), सात तिलहन वाली फ़सलें (सरसों, सोयाबीन, मूँगफली, तिल, सूरजमुखी, कुसुम, निगरसीड) और चार व्यावसायिक फ़सलें (गन्ना, कपास, कच्चा जूट और सूखा गोला) आदि 23 फ़सलें आती हैं। लेकिन केंद्र सरकार अभी तक केवल 18 फ़सलें ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीद रही है। हरियाणा ने अगस्त 2024 में 24 फ़सलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत रखा। इससे पहले हरियाणा सरकार 14 फ़सलें ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीद रही थी। केंद्र सरकार ने कुछ वर्ष पहले यह भी कहा था कि किसान अपनी फ़सलें कहीं भी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेच सकते हैं। लेकिन राज्य सरकारें दूसरे राज्यों के किसानों की फ़सलें नहीं ख़रीदती हैं।

फ़सलों के भाव की अस्थिरता और स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों के हिसाब से न्यूनतम समर्थन मूल्य न मिलने से किसानों को घाटा हो रहा है, जिसमें सबसे ज़्यादा छोटी और मध्यम जोत के किसान पिस रहे हैं। क्योंकि बड़े किसान तो किसी तरह घाटे से उबर जाते हैं, जिसकी वजह भी उनके पास अपनी मशीनरी का होना प्रमुख है। लेकिन ऐसे किसान, जो किराये पर ही मशीनरी पर निर्भर हैं और खेतों में पानी लगाने के लिए उन्हें ज़्यादा पैसा ख़र्च करना पड़ता है; उनके लिए कम न्यूनतम समर्थन मूल्य और उसका गारंटी क़ानून न होने से घाटा होता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी का क़ानून इन किसानों की फ़सलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ख़रीदने की गारंटी देगा और स्वामीनाथन आयोग का सी2 प्लस 50 प्रतिशत का फार्मूला किसानों को घाटे से बचाएगा। लेकिन केंद्र सरकार किसानों की इन दोनों ही माँगों को नहीं मान रही है, जिससे किसानों को अपनी फ़सलों को घाटे से बेचना पड़ता है। वहीं दूसरी तरफ़ किसानों से फ़सलें ख़रीदने वाले व्यापारी मनमाने भाव में उन्हें बेचते हैं।

अभी केंद्र सरकार किसानों को ए2, ए2 प्लस एफएल, सी2 फार्मूला लगाकर न्यूनतम समर्थन मूल्य दे रही है। इसमें ए2 के तहत खादों और कीटनाशकों और मज़दूरी की लागत, एफएल किसान परिवार का श्रम है और सी2 के तहत भूमि का किराया और अन्य निश्चित लागत है। हालाँकि इन सब लागतों को सरकार किसानों की वास्तविक लागत के हिसाब से भी नहीं देती, बल्कि अपने द्वारा निर्धारित लागतों को मान्य करती है, जिससे किसानों को लगातार घाटा ही होता है। इन न्यूनतम समर्थन मूल्य में किसानों को लाभ सरकार नहीं देती है। स्वामीनाथन आयोग के हिसाब से लागत और लागत का 50 प्रतिशत लाभ किसानों को देने का प्रावधान है। अगर स्वामीनाथन आयोग के हिसाब से केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू करे और अभी जो भाव किसानों को दे रही है, वही लागत मूल्य मान भी लें, तो उसमें आज के भाव में 50 प्रतिशत रुपये और जोड़कर उसे किसानों को देने होंगे। उदाहरण के लिए अभी गेहूँ का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,425 रुपये प्रति कुंतल है। अगर केंद्र सरकार स्वामीनाथन आयोग के हिसाब से न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करती है, तो किसानों को कम से कम 3,637.50 रुपये प्रति कुंतल गेहूँ का भाव मिलेगा। केंद्र सरकार का तर्क है कि इससे खाद्य पदार्थ महँगे हो जााएँगे। लेकिन महँगाई तो अब भी है और केंद्र सरकार उस पर रोक नहीं लगा रही है। बाज़ार में बिकने वाले खाद्य पदार्थों पर अधिकतम ख़ुदरा मूल्य लागू (एमआरपी) होता है, जबकि किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम पर भी सरकार केवल लागत मूल्य ही देना चाहती है। आज देश के किसानों को आधिकारिक तौर पर घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलता है, जिसे महँगाई के हिसाब से हर साल बढ़ाया भी नहीं जाता। इससे साफ़ है कि केंद्र सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य की मौज़ूदा नीति न किसानों के हित में है, न न्यायकारी है।

जानलेवा साबित हो रही रैगिंग

हाल में केरल के कोट्टायम के सरकारी कॉलेज ऑफ नर्सिंग में सीनियर्स द्वारा जूनियर छात्र के साथ क्रूर रैगिंग की घटना का वीडियो सामने आने के बाद यह एक बार साफ़ हो गया है कि रैगिंग की रोकथाम के लिए बना क़ानून, सर्वोच्च अदालत के दिशा-निर्देश व विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के रैगिंग को रोकने के लिए चलाये जाने वाले कार्यक्रम कारगर नतीजे नहीं ला पा रहे हैं। यह चिन्ता का सबब है। वीडियो में दिख रहा है कि जूनियर छात्र चारपाई पर पड़ा हुआ है और उसके हाथ पैर बाँधे हुए हैं। जब उसके गुप्तांगों पर डंबल रखे जाते हैं, तो वह दर्द से चीखता है और सीनियर्स हँसते हैं। ज्योमेट्री डिवाइडर से उसके शरीर के कई हिस्सों को चुभाया जाता है और पेट पर गोले बनाये जाते हैं। जूनियर के पैर से ख़ून बह रहा है। सीनियर्स अन्य डरे हुए छात्रों को वीडियो बनाने के लिए कहते हैं। जब भयानक कृत्य वाला यह वीडियो सामने आया, तो पुलिस ने जाँच शुरू की और आरोपी पाँचों छात्रों को गिरफ़्तार कर लिया।

उधर केरल नर्सेज एंड मिडवाइव्स काउंसिल ने तृतीय वर्ष के आरोपी इन पाँचों छात्रों को पढ़ाई जारी रखने से रोकने का फ़ैसला किया है। इस काउंसिल की एक सदस्य का मानना है कि यह निर्णय इस तरह से लिया गया है कि उन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखने का कोई मौक़ा नहीं मिलेगा। ऐसे व्यक्तियों को नर्सिंग पेशे में आने की अनुमति देना विनाशकारी होगा। यही नहीं इस सरकारी कॉलेज के प्रिंसिपल व एक असिस्टेंट प्रोफेसर को भी निलंबित कर दिया है। इस घटना के बाद इसी कॉलेज के कई और छात्रों ने भी रैगिंग का शिकार होने वाले अपने अनुभवों को अब साझा किया है।

दरअसल भारत के शैक्षणिक संस्थानों में रैगिंग सम्बन्धित केरल की नवीनतम घटना अपने आपमें कोई अपवाद नहीं है। आँकड़ों पर निगाह डालें, तो पता चलता है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की हेल्पलाइन पर 2012-2023 के दरमियान 8,000 रैगिंग की शिकायतें दर्ज की गयीं। इन शिकायतों में 208 प्रतिशत का उछाल देखा गया। इन 8,000 शिकायतों में से 1,202 शिकायतें उत्तर प्रदेश की हैं, यह अन्य राज्यों की तुलना में सबसे अधिक हैं। यानी उत्तर प्रदेश पहले नंबर पर है। यह हालात तब हैं, जब यहाँ के बीते सात साल से मुख्यमंत्री पद सँभाले योगी अक्सर यह डंका पीटते सुनायी पड़ते हैं कि इस राज्य में क़ानून का उल्लघंन करने वाले की $खैर नहीं। रैगिंग के कारण 78 छात्रों ने आत्महत्या कर ली। इनमें से सबसे अधिक 10 आत्महत्या के मामले महाराष्ट्र के हैं।

सवाल यह है कि रैगिंग जारी क्यों है? यह सवाल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि देश में रैगिंग को रोकने के लिए रैगिंग प्रतिषेध अधिनियम-2011 है। इसके तहत जो कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी शैक्षणिक संस्थान के अंदर या बाहर रैगिंग करता है, उसमें भाग लेता है, उसे बढ़ावा देता है या उसका प्रचार करता है, उसके अपराधी साबित होने पर दो साल तक की जेल या 10 हज़ार रुपये तक का ज़ुर्माना या दोनों ही हो सकते हैं। रैगिंग एक संज्ञेय अपराध है यानी ऐसा अपराध, जिसके लिए पुलिस बिना वारंट के अपराधी को गिरफ़्तार कर सकती है। सन् 2009 में सर्वोच्च अदालत ने रैगिंग को रोकने के लिए कई दिशा-निर्देश जारी किये थे।

इसमें रैगिंग को रोकने के लिए शैक्षणिक संस्थानों में प्रॉक्टोरियल समितियाँ बनाना, ऐसी घटनाओं की पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना आदि शामिल हैं।

इसके अलावा यूजीसी ने भी उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग रोकने के नियम बनाये हैं। इन नियमों के तहत दोषी छात्र का कक्षा से निलंबन हो सकता है। छात्रवृत्ति और सरकारी सुविधाओं को रोकना, हॉस्टल से निलंबन या निकालना, उसका दाख़िला रद्द करना आदि। लेकिन अहम सवाल यह उठता है कि कितने शैक्षणिक संस्थानों में ऐसे नियमों का पालन गंभीरता से होता है। कमज़ोर पालन के चलते भी छात्र रैगिंग के शिकार होते हैं। शैक्षणिक संस्थानों के प्रशासन की इस मामले में बरतने वाले सुस्त नज़रिये की सज़ा जूनियर छात्र भुगतते हैं। भारत इस समय सबसे अधिक युवा आबादी वाला देश है और प्रधानमंत्री भी समय-समय पर इस युवा शक्ति की भरपूर ऊर्जा के इस्तेमाल का आह्वान करते रहते हैं। वह बीते 11 सालों से प्रधानमंत्री हैं; लेकिन इस अवधि में रैगिंग के मामलों में वृद्धि हुई है।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसलाः दृष्टिहीन भी बन सकेंगे जज

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि दृष्टिहीन (नेत्रहीन) लोग भी न्यायिक सेवाओं में नियुक्त हो सकते हैं। अदालत ने साफ किया कि दिव्यांगता के आधार पर किसी भी व्यक्ति को न्यायिक सेवाओं से वंचित नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा नियमों को खारिज कर दिया, जो दृष्टिहीन उम्मीदवारों को जज बनने से रोकते थे। इस फैसले के बाद अब दृष्टिहीन उम्मीदवार भी न्यायिक सेवाओं के लिए चयन प्रक्रिया में भाग ले सकेंगे।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने ?

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की डबल बेंच ने यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा, कि किसी भी व्यक्ति को उसकी दिव्यांगता के आधार पर न्यायिक सेवा से वंचित नहीं किया जा सकता। दृष्टिहीन लोगों को भी समान अवसर मिलना चाहिए, ताकि वे अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें। सुप्रीम कोर्ट

ने कहा कि मध्य प्रदेश के न्यायिक सेवा नियमों में भेदभावपूर्ण भाषा का इस्तेमाल किया गया था, जिससे दृष्टिहीन उम्मीदवारों को बाहर रखा जाता था।

कैसे शुरू हुआ मामला ?

इस फैसले की शुरूआत मध्य प्रदेश की एक महिला की याचिका से हुई थी, जिसका

एक दृष्टिहीन बेटा न्यायिक सेवा में जाना चाहता था। जब उसे चयन प्रक्रिया में भाग लेने से रोका गया, तो उसकी मां ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखा। अदालत ने इसे गंभीरता से लेते हुए स्वतः संज्ञान लेकर मामला सुना और यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाया।

यह फैसला दृष्टिहीन और अन्य दिव्यांग व्यक्तियों के लिए एक बड़ी जीत है। यह न्यायिक सेवाओं में समावेशन को बढ़ावा देगा। दिव्यांग व्यक्तियों को बराबरी का अवसर मिलेगा और भेदभाव खत्म होगा।

सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से दृष्टिहीन उम्मीदवारों के लिए न्यायिक सेव-ओं में एक नया रास्ता खुल गया है। अब वे भी जज बनने के अपने सपने को साकार कर सकते हैं।