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दिल्ली विधानसभा का बजट सत्र आज से शुरू

नई दिल्ली: नवनिर्वाचित भारतीय जनता पार्टी सरकार का पांच दिवसीय बजट सत्र सोमवार को सुबह 11 बजे खीर समारोह के साथ शुरू होगा। उन्होंने बताया कि सत्र के पहले दिन 2024 के लिए दिल्ली परिवहन निगम पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट पेश किए जाने की संभावना है।

हालांकि, इस बात की पुष्टि नहीं हुई कि पहले दिन सदन में आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया जाएगा या नहीं।

सोमवार को सरकार ने किसानों और व्यापारियों के प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया है, जिनसे बजट में शामिल करने के लिए सुझाव मांगे गए हैं।

कार्यसूची के अनुसार, सदन की कार्यवाही प्रश्नकाल से शुरू होगी और उसके बाद विशेष उल्लेख (नियम-280) होगा, जिसके तहत विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्रों से संबंधित और सामान्य रूप से दिल्ली के लोगों को प्रभावित करने वाले मामलों को अध्यक्ष की अनुमति से उठाएंगे।

सत्र के दूसरे दिन मंगलवार को मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, जिनके पास वित्त विभाग भी है, भाजपा सरकार का पहला बजट पेश करेंगी, जिसका शीर्षक “विकसित दिल्ली” होने की संभावना है।

मामले से अवगत लोगों के अनुसार, नाम के अनुरूप, दिल्ली बजट 2025-26 में बुनियादी ढांचे के विकास, यमुना की सफाई और वायु प्रदूषण से निपटने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा, जिसमें स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों के लिए प्रावधान शामिल होंगे। इसमें 2,500 रुपये मासिक भत्ते के लिए वित्तीय प्रावधान भी शामिल होने की उम्मीद है, जिसका वादा भाजपा ने विधानसभा चुनाव से पहले महिलाओं के लिए किया था।

बजट प्रस्तुति के बाद, वित्तीय आवंटन और नीतिगत पहलों का विश्लेषण करने के लिए 26 मार्च (बुधवार) को एक सामान्य चर्चा होगी। विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि विधानसभा 27 मार्च (गुरुवार) को प्रस्तावित बजट पर विचार-विमर्श करेगी और मतदान करेगी। विधानसभा 27 मार्च (गुरुवार) को बजट पर विचार-विमर्श करेगी और मतदान करेगी। सत्र 28 मार्च तक चलेगा, जिसके दौरान सदन विभिन्न विधायी कार्य करेगा।

स्पीकर गुप्ता ने कहा, “बजट सत्र विधायी कैलेंडर में एक महत्वपूर्ण अवधि है, जिसके दौरान प्रमुख वित्तीय और नीतिगत मामलों पर चर्चा की जाएगी और उन पर निर्णय लिया जाएगा। सत्र को 24 मार्च से 28 मार्च, 2025 तक चलने की संभावना है, जिसमें आवश्यकता पड़ने पर विस्तार का प्रावधान है।”

पांच दिनों में से प्रत्येक दिन प्रश्नकाल शामिल होगा। अंतिम दिन, विधायकों को शासन और लोक कल्याण पर अपने प्रस्ताव पेश करने और उन पर बहस करने की अनुमति होगी।

स्पीकर गुप्ता ने सत्र को सफल बनाने के लिए शिष्टाचार बनाए रखने के महत्व पर जोर दिया। भाजपा नेताओं के अनुसार, बजट 2025-26 दिल्ली के लोगों से प्राप्त सुझावों के आधार पर बनाया गया है।

सीएम रेखा गुप्ता ने कहा, “हमें ईमेल पर 3,303 सुझाव और व्हाट्सएप पर 6,982 संदेश मिले। हमने उन सभी सुझावों पर ध्यानपूर्वक विचार किया है। हमने आम आदमी की सभी जरूरतों जैसे पानी और बिजली के साथ-साथ महिला सशक्तिकरण पर ध्यान दिया है। यह बजट जलभराव की समस्याओं के समाधान, यमुना नदी की सफाई, वायु प्रदूषण से निपटने, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढांचे के विकास पर भी ध्यान केंद्रित करेगा। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित दिल्ली के सपने को पूरा करता है।”

बजट के अलावा, विधानसभा डीटीसी पर सीएजी रिपोर्ट पर भी ध्यान केंद्रित करेगी – जिसका शीर्षक “दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) का कामकाज” है – दिल्ली विधानसभा ने पिछले महीने स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे और आबकारी नीतियों पर दो अन्य सीएजी रिपोर्ट पेश की हैं। 2017-2018 से लंबित ऐसी 14 रिपोर्टों को पेश करना 8 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा द्वारा किया गया चुनावी वादा था।

भाजपा ने लगातार पूर्व आप सरकार पर इन रिपोर्टों को पेश न करने का आरोप लगाया है, उनका दावा है कि पार्टी “दिल्ली सरकार के विभिन्न विभागों में अपने शासन के दौरान की गई अनियमितताओं” को छिपाने की कोशिश कर रही है।

दिल्ली का पिछला बजट आम आदमी पार्टी (आप) सरकार ने पिछले साल मार्च में 76,000 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ पेश किया था। तत्कालीन वित्त मंत्री आतिशी ने दिल्ली का बजट 2024 “राम राज्य” थीम पर पेश किया था।

नागपुर हिंसा के मास्टरमाइंड फहीम खान के घर चला बुलडोजर

नागपुर: नागपुर में बीते सप्ताह दंगे भड़क गए थे। इसमें एक दर्जन पुलिसकर्मी घायल हुए और करीब इतने ही नागरिक जख्मी हो गए थे। इस घटना में बड़ी संख्या में गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया था, जबकि दुकानों में भी आग लगाई गई और तोड़फोड़ की गई थी। पुलिस का कहना है कि इस हिंसा का मास्टरमाइंड फहीम खान नाम का शख्स था, जिसके घर पर आज बुलडोजर चला है। नागपुर महानगरपालिका की टीम आज सुबह ही बुलडोजर लेकर फहीम खान के घर पर पहुंच गई। इस दौरान बड़े पैमाने पर सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया था। बता दें फहीम खान पेशे से बुर्का विक्रेता है। माना जा रहा है कि उसने कुछ वीडियो जारी किए थे और उत्तेजक बयान दिए थे, जिससे लोग भड़के और उन्होंने नागपुर शहर में उपद्रव काट दिया। फहीम खान को पुलिस ने बीते मंगलवार को ही अरेस्ट कर लिया था और उसे अदालत में पेश किया गया था।

नागपुर हिंसा को लेकर फहीम खान समेत कुल 6 लोगों के खिलाफ पुलिस ने देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया था। फहीम खान माइनॉरिटी डेमोक्रेटिक पार्टी नाम के दल का शहर प्रमुख रहा है। वह कई बार पुलिस को लेकर भी आपत्तिजनक टिप्पणी करता रहा है। वह हिंदू पुलिस जैसी टिप्पणी करता रहा है। प्रशासन ने फहीम खान के घर के उस हिस्से को ढहाया है, जो अतिक्रमण करके बना था और अवैध पाया गया। इसके अलावा अन्य हिस्से के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। नागपुर के महल इलाके में यह हिंसा हुई थी, जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय भी स्थित है। आरएसएस का दफ्तर हिंसा वाले इलाके से थोड़ी ही दूर पर स्थित है।

वह 2024 के लोकसभा चुनाव में अल्पसंख्यक डेमोक्रेटिक पार्टी (MDP) के टिकट पर नागपुर सीट से चुनाव लड़ा था, जिसमें उसे करारी हार का सामना करना पड़ा था। चुनावी मैदान में उतरने के बाद से ही वह राजनीतिक रूप से सक्रिय हो गया था और शहर में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा था। पुलिस की जांच में सामने आया है कि नागपुर हिंसा की साजिश पहले से ही रची गई थी। फहीम खान ने कुछ कट्टरपंथी लोगों को इकट्ठा कर एक सुनियोजित तरीके से दंगा भड़काने का काम किया। बता दें कि औरंगजेब की कब्र को लेकर हुए विवाद ने सोमवार को हिंसक रूप ले लिया था। महाराष्ट्र के नागपुर के महाल में सोमवार रात दो गुटों के बीच विवाद के बाद हिंसा भड़क गई थी।

आगरा की धरोहर पर संकट: सरकारी लापरवाही से अतिक्रमण का बढ़ता खतरा

बृज खंडेलवाल द्वारा

आगरा, ताजमहल का शहर, भारत के इतिहास और संस्कृति का एक अहम हिस्सा है। यह शहर न केवल अपनी ऐतिहासिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि यह भारतीय मुग़ल कला और स्थापत्य का एक जीवंत उदाहरण भी है। लेकिन आज आगरा की धरोहर संकट में है। अवैध निर्माण और अतिक्रमण की समस्या तेजी से बढ़ रही है, और सरकार की निष्क्रियता इस स्थिति को और भी गंभीर बना रही है। इससे ना केवल आगरा की पहचान को नुकसान पहुँच रहा है, बल्कि इसका प्रभाव पर्यटन उद्योग पर भी पड़ रहा है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण पार्ट है। 

ताज गंज का बफर ज़ोन, जो ताजमहल के चारों ओर सुरक्षा प्रदान करने के लिए था, अब अव्यवस्थित दुकानों और अवैध निर्माणों से भर चुका है। ये निर्माण न केवल ताजमहल के आसपास के दृश्य को विकृत कर रहे हैं, बल्कि स्मारक की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्ता को भी प्रभावित कर रहे हैं। इसके कारण, ताजमहल के दर्शन करने वाले पर्यटकों को एक अव्यवस्थित और अस्वस्थ वातावरण का सामना करना पड़ता है, जो इसके पवित्र और ऐतिहासिक महत्व को नष्ट कर रहा है।

ताजमहल के अलावा, आगरा के अन्य ऐतिहासिक स्थल भी संकट में हैं। सिकंदरा, जहाँ सम्राट अकबर की समाधि स्थित है, अवैध संरचनाओं और अतिक्रमणों से घिर चुका है। यह स्थल अपनी ऐतिहासिक महत्ता और वास्तुकला के कारण हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है, लेकिन अब इसके आसपास के अवैध निर्माण इस स्थल की सुंदरता और ऐतिहासिकता को नष्ट कर रहे हैं। सुरक्षित पैदल यात्रा, यमुना के किनारे, इस पार या उस पार, कष्टदायक सौदा है।

इसके अलावा, फतेहपुर सीकरी, जो एक और प्रमुख मुग़ल स्थल है, भी इसी समस्या से जूझ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने यहां अवैध खनन पर प्रतिबंध लगाया था, लेकिन इसके बावजूद खनन कार्य जारी हैं, जो इस स्थल की संरचना को नुकसान पहुँचा रहे हैं।

यमुना नदी के किनारे स्थित ऐतिहासिक स्थल, दिल्ली गेट, जोधाबाई की छतरी, और हुमायूँ की मस्जिद, आज उपेक्षित हैं। अतिक्रमण और असुरक्षित रास्तों के कारण पर्यटक इन स्थलों तक नहीं पहुँच पाते। विभाग दारा शिकोह की लाइब्रेरी का भी कायदे से प्रमोशन नहीं कर पा रहा है। इन स्थलों का ऐतिहासिक महत्व बहुत बड़ा है, और अगर इन्हें संरक्षित किया जाए तो ये आगरा को एक और प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में स्थापित कर सकते हैं। लेकिन वर्तमान स्थिति में, इन स्थलों की उपेक्षा और उनके आसपास का अव्यवस्थित माहौल, पर्यटन की संभावनाओं को नष्ट कर रहा है।

आगरा की धरोहर की रक्षा के लिए जिम्मेदार संस्थाएँ, जैसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और आगरा विकास प्राधिकरण (एडीए), अपनी जिम्मेदारियों को सही तरीके से निभाने में विफल रही हैं। एएसआई ने कई बार अवैध निर्माणों और प्राचीन स्मारकों के उल्लंघनों के बारे में चेतावनी दी है, लेकिन इन चेतावनियों पर कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। आगरा विकास प्राधिकरण, जो अवैध निर्माणों पर अंकुश लगाने का जिम्मेदार है, राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक लापरवाही के कारण अपने कर्तव्यों को पूरा करने में असमर्थ है। इसी तरह, राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण (एनएमए), जो धरोहर स्थलों की रक्षा के लिए स्थापित किया गया था, भी अपने उद्देश्य में सफल नहीं रहा है। इसके कारण आगरा के ऐतिहासिक स्थलों की हालत बिगड़ रही है और उनका भविष्य अंधकारमय हो रहा है।

ब्रज मंडल हेरिटेज कंजर्वेशन सोसाइटी और पर्यावरणविद इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते रहे हैं। उनका कहना है कि ऐतिहासिक स्थलों के आसपास घर, गैरेज, और नर्सिंग होम जैसे संरचनाएँ बिना किसी रोक-टोक के उग आए हैं। यह न केवल इन स्थलों के ऐतिहासिक महत्व को नष्ट कर रहा है, बल्कि यह यमुना नदी के बाढ़ क्षेत्र और पारिस्थितिकीय तंत्र को भी खतरे में डाल रहा है। यमुना के बाढ़ क्षेत्र, जो आगरा की पारिस्थितिक और ऐतिहासिक पहचान के लिए महत्वपूर्ण हैं, अब लालच और अतिक्रमण की चपेट में हैं। यह पर्यावरणीय और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यधिक हानिकारक है और अगर इसे रोका नहीं गया, तो आगरा की धरोहर का नुकसान असाधारण होगा।

आगरा की धरोहर केवल इस शहर या देश की संपत्ति नहीं, बल्कि यह पूरी मानवता का खजाना है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह अनमोल धरोहर हमेशा के लिए नष्ट हो सकती है। सरकार और प्रशासन को इस संकट को गंभीरता से लेना चाहिए। यह केवल एक स्थानीय समस्या नहीं है, बल्कि एक वैश्विक धरोहर का संकट है। आगरा की धरोहर को बचाने के लिए सख्त प्रवर्तन, राजनीतिक साहस, और पूरी प्रतिबद्धता की आवश्यकता है। सरकारी अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी, और सिर्फ बयानबाजी से काम नहीं चलेगा। आगरा के ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित करना और इस शहर की पहचान को बचाना आज के समय की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है।

बात बात पे जंग: व्यंग्य और हास्य के बदलते रंग

बृज खंडेलवाल द्वारा

पिछले दो दशकों में हमने एक पूरी जमात को गुम होते देखा है। वो जमात जो हमें हंसाती थी, गुदगुदाती थी, और सोचने पर मजबूर करती थी। व्यंग्यकार, कार्टूनिस्ट, और हास्य के बादशाह अब धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं।

उनकी जगह यूट्यूबर्स और स्टैंड-अप कॉमेडियन ने ले ली है, जिनके चुटकुलों में गालियों और अश्लीलता का बोलबाला है। ये वो दौर है जब हंसी की जगह चीखने-चिल्लाने, मार-पीट, और नफरत भरे संवादों ने ले ली है। क्या यही है आज की लोकतांत्रिक हकीकत?

एक जमाना था जब अखबारों की पहचान लक्ष्मण, रंगा, सुधीर धर, विजयन और शंकर जैसे कार्टूनिस्टों के उम्दा कार्टूनों से होती थी। उनके कार्टून सिर्फ हंसाते ही नहीं थे, बल्कि समाज और राजनीति पर गहरी चोट करते थे। आर.के. लक्ष्मण के “कॉमन मैन” ने हर भारतीय को अपनी छवि दिखाई, और शंकर के कार्टून ने नेताओं की पोल खोल दी।

मगर आज? अखबारों में कार्टून गायब हैं, और राजनीति से हास्य गायब हो गया है। ऐसा लगता है कि अखबार डरते हैं, कार्टूनिस्ट डरते हैं, और हम सब डरते हैं। क्या यही है आजादी का मतलब? चो रामास्वामी की तमिल में तुगलक पत्रिका, शरद जोशी के व्यंग, खुशवंत सिंह के कटाक्ष, काका हाथरसी की कविताएं, अब कहां गायब हो गए इस परंपरा के वारिस! फिल्मों से जॉनी वॉकर, महमूद, देवेन वर्मा, जौहर, ॐ प्रकाश टाइप कॉमेडियंस गायब हुए, टीवी से कॉमेडी के सीरियल्स।

राजनीति और हास्य का रिश्ता हमेशा से जटिल रहा है। एक जमाने में संसद में मजाक, शेर-ओ-शायरी, और हंसी-मजाक का दौर था। पीलू मोदी और राज नारायण जैसे नेता खूब हंसाते थे। मगर आज? संसद हो या विधानसभा, सभी जगह मान्यवर गंभीर मुद्रा में बैठे रहते हैं। हंसी-मजाक की जगह गंभीरता ने ले ली है। क्या यही है लोकतंत्र की परिभाषा?

आज के दौर में राजनीतिक या धार्मिक हस्तियों पर व्यंग्य करना जानलेवा हो सकता है। कार्टूनिस्ट और कॉमेडियन धमकियों, ऑनलाइन उत्पीड़न, और कानूनी कार्रवाई का शिकार हो रहे हैं। उदाहरण के लिए, विवादास्पद धार्मिक हस्तियों को चित्रित करने वाले कार्टूनिस्टों को व्यापक विरोध और धमकियों का सामना करना पड़ा है। भारत में भी, राजनीतिक नेताओं या धार्मिक हस्तियों की आलोचना करने वाले कार्टूनिस्ट अक्सर ऑनलाइन ट्रोलिंग और कानूनी कार्रवाई का शिकार होते हैं।

मगर, यह सब इतना भी निराशाजनक नहीं है। भारत में कुछ बहुत ही मज़ेदार लोग हैं जो हंसी की मशाल जलाए रखते हैं। वीर दास, बस्सी,  उपमन्यु, केनी , और कल्याण रथ जैसे कॉमेडियन ने हास्य को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। यूट्यूब पर कैरी, डॉली, भुवन, आशीष  जैसे क्रिएटर्स ने हंसी को नया रंग दिया है। मगर, इनमें से ज्यादातर राजनीति से दूर भागते हैं।

कपिल शर्मा के शो में नेता नहीं आते, और वह खुद भी राजनीति से दूर रहते हैं। क्या यही है हास्य की आजादी? कुछ श्रोता और दर्शक टीवी न्यूज चैनल को मनोरंजन के लिए देखते हैं, जब एंकर चिल्लाता है या लड़वाता है तो बहुत मजा आता है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स अक्सर आपत्तिजनक समझे जाने वाले कंटेंट को हटा देते हैं, कभी-कभी स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बिना। इससे सेल्फ-सेंसरशिप की स्थिति पैदा हो जाती है। कॉमेडियन और क्रिएटर्स को अपने कंटेंट को लेकर सतर्क रहना पड़ता है। हिंसा की धमकियों के कारण कई कॉमेडियन के शो रद्द हुए हैं। इंटरनेट शटडाउन और सेंसरशिप का इस्तेमाल असहमति की आवाज़ों को दबाने के लिए किया जाता है, जिसमें हास्य कलाकार और ऑनलाइन क्रिएटर भी शामिल हैं।

मगर, यह सब इतना भी निराशाजनक नहीं है। भारत में कुछ बहुत ही मज़ेदार लोग हैं जो हंसी की मशाल जलाए रखते हैं। स्टैंड-अप कॉमेडियन, यूट्यूबर्स, और ब्लॉगर्स का उदय लचीलापन और रचनात्मकता की स्थायी मानवीय भावना को प्रदर्शित करता है। ये नई आवाज़ें राजनेताओं और सामाजिक मुद्दों का मज़ाक उड़ाती रहती हैं, यह साबित करते हुए कि हास्य को आसानी से चुप नहीं कराया जा सकता।

ह्यूमर टाइम्स की प्रकाशक मुक्ता गुप्ता कहती हैं, “राजनीतिक कार्टूनिंग का पतन एक बड़े सामाजिक बदलाव का प्रतीक है। ग्राफिक डिज़ाइन और एनिमेटेड पात्रों का उदय, तकनीकी रूप से उन्नत होते हुए भी, अक्सर पारंपरिक रेखाचित्रों की वैचारिक गहराई और सरलता नहीं रखता है।”

हास्य और व्यंग्य सिर्फ मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि सत्ता को जवाबदेह ठहराने, सामाजिक मानदंडों को चुनौती देने, और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक तंत्र हैं। खुले समाजों में, हास्य और व्यंग्य स्वतंत्रता, सहिष्णुता, और उदार मूल्यों के महत्वपूर्ण बैरोमीटर के रूप में काम करते हैं। मगर, आज के दौर में हास्य और राजनीतिक व्यंग्य के लिए जगह कम होती जा रही है, जो बढ़ती असहिष्णुता, धार्मिक कट्टरता, और राजनीतिक शुद्धता से प्रभावित है।

फिर भी, इन चुनौतियों के बीच, आशा की किरणें हैं। हंसी की जंग जारी है, क्योंकि, जब तक हंसी है, तब तक जिंदगी है। और जब तक जिंदगी है, तब तक हंसी है। शायद इंसान के अलावा कोई जीव हंसने की काबिलियत नहीं रखता है।

बन गई सहमति, नया भाजपा अध्यक्ष 20 अप्रैल से पहले

15 महीने की लंबी देरी के बाद नए भाजपा प्रमुख को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा के बीच आम सहमति बनती दिख रही है। हालांकि भाजपा प्रमुख जे.पी. नड्डा की जगह आने वाले नए अध्यक्ष को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर काम करना होगा, लेकिन यह भी साफ है कि उनकी जड़ें मूल संगठन आरएसएस में भी गहरी होंगी। संघ परिवार से आ रही खबरों की मानें तो यह साफ है कि नए प्रमुख का चुनाव 20 अप्रैल तक हो जाएगा। हालांकि जेपी नड्डा का कार्यकाल जनवरी, 2024 में खत्म हो गया था, उनकी जगह नए पार्टी प्रमुख के मुद्दे पर भाजपा में पूरी तरह से चुप्पी है। लेकिन अब यह सामने आ रहा है कि संघ परिवार के घटकों के बीच पर्दे के पीछे लंबी बातचीत के बाद अच्छे नतीजे सामने आए हैं। पिछले साल जनवरी में जब नड्डा का कार्यकाल खत्म हुआ तो आम चुनाव से पहले पार्टी के संविधान में बदलाव किया गया, ताकि संसदीय बोर्ड, सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था को ‘आपातकालीन स्थितियों’ में पार्टी अध्यक्ष का कार्यकाल बढ़ाने की अनुमति मिल सके, जिसका इस्तेमाल बाद में नड्डा के कार्यकाल को बढ़ाने के लिए किया गया। इस महीने के अंत में प्रधानमंत्री के रूप में मोदी का महाराष्ट्र के नागपुर में आरएसएस मुख्यालय जाना तय हो गया है, जो इस बात का संकेत है कि कई पेचीदा मुद्दों का समाधान हो गया है। मोदी आरएसएस मुख्यालय जाने वाले पहले प्रधानमंत्री होंगे, जबकि दिवंगत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐसा करने से परहेज किया था।

आरएसएस भाजपा और मोदी का वैचारिक मार्गदर्शक है। मोदी हाल ही में अपने जीवन पर आरएसएस के प्रभाव के बारे में बार-बार बोलते रहे हैं, ताकि मातृ संगठन का सुचारु संचालन और निरंतर समर्थन सुनिश्चित हो सके। मोदी का आरएसएस से परिचय 8 साल की उम्र में हुआ था और 1971 में 21 साल की उम्र में वे गुजरात में आरएसएस के पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए थे।

ऐसा कहा जा रहा है कि हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्री मनोहरलाल खट्टर पर आखिरकार दांव चल सकता है। खट्टर पूर्णकालिक आरएसएस प्रचारक, अविवाहित और मोदी के करीबी विश्वासपात्र हैं। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि दक्षिण भारत से केंद्रीय मंत्री जी. किशन रेड्डी अभी भी चर्चा में हैं। लेकिन खट्टर के पक्ष में आम सहमति बनती दिख रही है।

बिहार में नीतीश को लेकर अनिश्चितता, भाजपा हुई महत्वाकांक्षी

भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के एक प्रमुख सहयोगी लोजपा के केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने बिहार एनडीए में यह कहकर हलचल मचा दी है कि बिहार का अगला मुख्यमंत्री वह व्यक्ति होगा जिसके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विजन है। इससे राजनीतिक परिदृश्य और भी अनिश्चित हो गया है। वरिष्ठ भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद ने यह कहकर आग में घी डालने का काम किया कि भाजपा का यह सोचना गलत नहीं है कि मुख्यमंत्री इसी पार्टी से होना चाहिए। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़े जाएंगे। ये बयान ऐसे समय में आए हैं, जब एनडीए में पूरी तरह से असमंजस की स्थिति है, क्योंकि भाजपा नेता राज्य में नेतृत्व के मुद्दे पर अलग-अलग सुर में बोल रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कुछ सप्ताह पहले कहा था कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नवंबर में होने वाले चुनावों में बिहार में एनडीए के अभियान का नेतृत्व करेंगे। लेकिन अगले मुख्यमंत्री के सवाल पर उन्होंने कहा कि पार्टी का संसदीय बोर्ड चुनावों के बाद इस मुद्दे पर फैसला करेगा। भाजपा में कुछ कट्टरपंथी लोग हैं जो मानते हैं कि चुनाव के बाद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाए रखने के बजाय पार्टी को अपना खुद का मुख्यमंत्री बनाना चाहिए।

2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 243 सदस्यीय सदन में 74 सीटें जीती थीं, जबकि जनता दल (यू) ने 115 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद केवल 43 सीटें जीती थीं। भाजपा ने केवल 110 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इन कट्टरपंथियों का मानना है कि भाजपा अब अपने दम पर सरकार बनाने में सक्षम है और उसे बहुमत हासिल करने के लिए नीतीश कुमार की जरूरत नहीं है और वह 2025 में अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना चाहेगी। ये बयान आने वाली चीजों का संकेत हैं।

सिसोदिया को राज्य सभा भेजा जाएगा ?

राष्ट्रीय राजधानी में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के खास मनीष सिसोदिया को अब पंजाब से राज्यसभा भेजा जा सकता है। चूंकि केजरीवाल की योजनाएं लगभग धराशायी हो चुकी हैं, इसलिए अब कयास लगाए जा रहे हैं कि सिसोदिया को राज्यसभा में भेजा जा सकता है। लुधियाना पश्चिम विधानसभा उपचुनाव में पार्टी के मौजूदा सदस्य संजीव अरोड़ा के जीतने पर राज्यसभा की सीट खाली हो सकती है। सिसोदिया केजरीवाल के बेहद करीबी माने जाते हैं और और उन्हें अस्तित्व बचाने के लिए पार्टी के समर्थन की जरूरत है।

दिल्ली के उपराज्यपाल को मिलेगी पदोन्नति!

दिल्ली के उपराज्यपाल (एलजी) विनय कुमार सक्सेना ने तीन साल के भीतर ही अपना काम पूरा कर लिया है, क्योंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी हार चुकी है और भाजपा सत्ता में आ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निजी पसंद के मुताबिक दिल्ली के एलजी के तौर पर सक्सेना की नियु​क्ति ने 2022 में कई लोगों को चौंका दिया था, क्योंकि वह केवीआईसी (खादी और ग्रामोद्योग आयोग) से आए थे, जिसके वे 2015 से अध्यक्ष थे।

मोदी भी उनके खादी को लोकप्रिय बनाने के तरीके से प्रभावित हुए थे। सक्सेना ने अकेले दम पर दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आप को बेनकाब कर दिया, जबकि भाजपा का स्थानीय नेतृत्व कोई रणनीति नहीं बना पाया। एक तरह से उन्होंने शहर में भाजपा की सरकार बनाने का रास्ता साफ कर दिया।

क्या अब सक्सेना को जाना चाहिए या वे बने रहेंगे? दिल्ली के उपराज्यपाल ने ठीक वही किया है जिसकी उनके राजनीतिक आकाओं ने उनसे अपेक्षा की थी और अब दिल्ली में डबल इंजन की बजाय ट्रिपल इंजन वाली सरकार को केंद्र के साथ मिलकर काम करने और दिल्ली के लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए एक नई तरह की भूमिका की आवश्यकता होगी।

ऐसा लगता है कि सक्सेना को पदोन्नत करने का समय आ गया है, हालांकि वे कुछ और समय तक पद पर बने रह सकते हैं, जब तक कि नई दिल्ली सरकार स्थापित नहीं हो जाती। उन्होंने उपराज्यपाल के रूप में अपनी कार्यशैली का परिचय दिया है और हर मुद्दे पर बारीकी से नजर रखी है, जिसमें राजनीतिक मुद्दे भी शामिल हैं, जिन्होंने आप को हर बिंदु पर बेनकाब किया है।

भाजपा को अब शहरी आवास, बुनियादी ढांचे, शहर की गतिशीलता सहित पेयजल पाइपलाइनों, बिजली, यमुना की सफाई, वायु प्रदूषण आदि का ध्यान रखने के अलावा लोकलुभावन वादों को पूरा करने की जरूरत है। लेकिन अभी शुरुआत है और सक्सेना, जिनका ग्राफ बहुत ऊपर चला गया है, पर अंतिम फैसला केवल प्रधानमंत्री लेंगे।

मोती की खेती कर बनीं पर्ल क्वीन, लोगों को दे रही रोजगार

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में एक ऐसी युवती है जो मोती की खेती कर लोगों को रोजगार दे रही है. साथ ही इनके इस कार्य को देखकर लोग इन्हें पर्ल क्वीन के से नाम से पुकारने लगे है. हम बात कर रहे पूजा विश्वकर्मा की जो मोती की खेती के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध है. पूजा ने बताया कि वह सुन्दर गोल-मटोल व रंगीन मोती के अलावा डिजाइनर मोती पानी की टंकी बनाती है. पूजा ने बताया कि वह श्रद्धाजीवन ज्योति वेलफेयर सोसायटी के माध्यम से मोती की खेती का कार्य करती है. उन्होंने बताया जॉब करने के बजाये कुछ नया करने के उद्देश्य से इस क्षेत्र रूचि उत्पन्न हुई. उसके बाद पूजा ने नागपुर जाकर मोती की खेती का प्रशिक्षण प्राप्त किया. वहां से आने के बाद अपने घर में ही मोती की खेती करने की शुरुआत की. फिर धीरे-धीरे इस कार्य में नयापन देने डिजाइनर मोती तैयार करना शुरु कर दिया. जिसे लोग काफी पसंद कर रहे है. 

8 माह करती है परिश्रम 

पूजा विश्वकर्मा ने बताया कि मोती की खेती सामान्य खेती की तरह होती है. जिसमें काफी परिश्रम की आवश्यकता होती है. मोती की खेती के लिए तालाब या बहुत बड़ी टंकी या कुआँ होना चाहिए. जिसमें मोती के बीज केमिकल के साथ सीप में डालकर पानी में डाला जाता है. बीच-बीच में देखरेख करने की जरुरत पड़ती है. अंत में बड़ी सावधानी के साथ सीप से मोती निकालने का कार्य किया जाता है.

डिजाइनर मोती कर रही है तैयार 

मोती की खेती में सिम्पल मोती के साथ ही गणेश, माँ सरस्वती, भगवान शंकर, ओम, स्वास्तिक के प्रतीक चिन्ह वाले मोती तैयार करती है. इसके साथ ही क्रॉस व अन्य धर्म के अनुसार उनके प्रतीक चिन्ह वाले मोती बनाती है.

लागत से ज्यादा मेहनत 

पूजा ने बताया कि मोती की खेती में लागत काम है, लेकिन मेहनत बहुत अधिक होता है. बहुत ही बारिकी से हर एक चीज को देखना व करना होता है. एक मोती को बनाने में 30 से 50 रूपये की लागत आती है, लेकिन एक मोती ज़ब सुन्दर तैयार होती है तो उसकी मार्केट में कीमत अच्छी मिलती है. अच्छी मोती बनाने के लिए काफी धैर्य रखना पड़ता है.

यमुना बैराज बनाओ, तालाब बचाओ!

बृज खंडेलवाल

विश्व जल दिवस 2025 पर, दुनिया जब पानी की कमी से जूझ रही है, दो मिलियन से अधिक लोगों का शहर आगरा सरकारी लापरवाही और गलत प्राथमिकताओं का जीता-जागता सबूत और असफलता की बेहतरीन मिसाल है।

135 किलोमीटर लंबी गंगाजल पाइपलाइन से हालिया संकट कुछ हद तक नियंत्रित हुआ है,  मगर शहर की जीवनदायिनी, पावन यमुना नदी का गला घोंटकर, आगरा के पर्यावरण को तबाह कर दिया गया है। नदी किनारे खड़ी बेहतरीन  मुगलकालीन इमारतें अब पर्यावरणीय खतरे में हैं।

यमुना आरती के महंत, पंडित जुगल किशोर कहते हैं, “देवी माँ के रूप में पूजी जाने वाली यमुना आज एक नाला बन गई है। इसका पानी ज़हरीला हो गया है, और इसकी सहायक नदियाँ, उठनगन, खारी, पार्वती, कार्बन आदि, लगभग ख़त्म हो चुकी हैं। ताज महल की छाँव में, शहर का जल संकट पारिस्थितिकी की अनदेखी और शहरी बदइंतजामी की एक भयावह तस्वीर पेश करता है।”

पर्यावरणविद डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य के अनुसार, “यमुना नदी की दुर्दशा सिस्टम के नाकाम होने की कहानी है। ऊपर की ओर, ओखला बैराज इसके प्रवाह का अधिकांश हिस्सा डायवर्ट कर देता है, जिससे आगरा में एक कंकाल जैसी धारा रह जाती है। नीचे की ओर, नदी एक ज़हरीले कूड़ेदान में बदल जाती है, जो दिल्ली और हरियाणा से आने वाले अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक कचरे से भरी हुई है। घाटों पर रसायन युक्त झाग तैर रहे हैं, और इसकी सतह पर मरी हुई मछलियाँ दिखती हैं – जो पारिस्थितिकी तंत्र के पतन की एक कठोर याद दिलाती हैं। नदी की सहायक नदियाँ, जो कभी महत्वपूर्ण धमनियाँ हुआ करती थीं, अतिक्रमण और उदासीनता के बोझ तले लुप्त हो चुकी हैं, जिससे भूजल पुनर्भरण और भी कम हो गया है। यमुना, जिसने कभी आगरा के अतीत को आकार दिया था, अब इसके भविष्य को सूखने का ख़तरा है।”

नदी के उस पार, आगरा के ऐतिहासिक तालाब – जो कभी जीवन और जीविका के जीवंत केंद्र थे – विलुप्त हो रहे हैं। रिवर कनेक्ट अभियान के सदस्य चतुर्भुज तिवारी कहते हैं, “जिले में लगभग 1000 तालाब थे, जो कभी मानसून की बारिश का पानी इकट्ठा करते थे और सूखे महीनों में पड़ोस को सहारा देते थे, अब कंक्रीट के नीचे दबे हुए हैं या कचरे से भरे हुए हैं। शहर के सांस्कृतिक और पारिस्थितिक ताने-बाने में उकेरे गए ये जल निकाय अनियंत्रित शहरीकरण और नागरिक उपेक्षा का शिकार हो गए हैं। जहाँ कभी पानी नीले आसमान की परछाई दिखाता था, वहाँ अब बंजर टीले धूप में तप रहे हैं, जिससे शहर की निर्भरता पहले से ही तनावग्रस्त यमुना और घटते तालाब, पोखर, बावड़ी पर और बढ़ गई है। कीठम झील जो अंग्रेजों ने आगरा की ग्रीष्मकालीन जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाई थी, वो सुविधा मथुरा रिफाइनरी को मिल रही है।”

आगरा के निवासियों के लिए, इसके नतीजे डरावने हैं। शहर की जल उपयोगिता, डिमांड सप्लाई,  आगरा जल संस्थान, के लिए चुनौती है। नल घंटों तक सूखे रहते हैं। पंडित महेश शुक्ला कहते हैं कि झुग्गियों और ट्रांस यमुना कॉलोनियों में, महिलाएँ सामुदायिक पंपों पर घंटों कतार में खड़ी रहती हैं, जबकि जिले के किसान अपनी फसलों को सूखते हुए देखने को मजबूर हो जाते हैं,  क्योंकि बोरवेल सूख जाते हैं या जल स्तर गिर जाता है। ज़हरीले पानी से बीमारियाँ भी फैलती हैं, जिससे शहर की मुश्किलें और बढ़ रही हैं।

यहाँ तक कि आगरा का नायाब रत्न ताजमहल भी इससे अछूता नहीं है। ग्रीन एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर के अनुसार, सूखी, प्रदूषित यमुना ताज की लकड़ी की नींव को कमज़ोर कर रही है, जिससे स्मारक की संरचनात्मक अखंडता और इससे जुड़ी पर्यटन अर्थव्यवस्था पर ख़तरा मंडरा रहा है। सर्किट हाउस के तालाबों और शाहजहां गार्डन को  अब नहरी पानी नहीं मिल रहा है, उक्खररा माइनर, शमशाबाद रोड पर अतिक्रमणों के बोझ तले मर चुकी है.”

यमुना भक्त ज्योति खंडेलवाल कहती हैं, “सभी ब्लॉकों में जल स्तर लगातार पाताल लोक की ओर बढ़ रहा है, फ्लोराइड और अन्य ज़हरीले रसायनों की वजह से कई गाँवों में लोग बेबस, बीमार और कुबड़े हो रहे हैं, हरियाली सूख रही है, चंबल नदी भी पानी के लिए तरस रही है, लेकिन जन प्रतिनिधियों को कोई फ़िक्र नहीं है।”

रिवर कनेक्ट कैंपेन के सदस्य कहते हैं कि यमुना की सफाई के लिए अंतरराज्यीय सहयोग की ज़रूरत है, जिसमें दिल्ली में सख़्त अपशिष्ट नियंत्रण, गाद निकालने के ज़रिए सहायक नदियों को पुनर्जीवित करना और अवैध रेत खनन पर लगाम लगाना शामिल है।

स्थानीय स्तर पर, आगरा नगर निगम अतिक्रमण हटाकर, गाद निकालकर और वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देकर सामुदायिक तालाबों को पुनर्जीवित कर सकता है।

आगरा सिविल सोसाइटी के संयोजक अनिल शर्मा का कहना है कि शहर में वाटर हार्वेस्टिंग, छत पर संग्रह प्रणाली और जन जागरूकता अभियान भूजल तनाव को कम कर सकते हैं, जबकि किसान ड्रिप सिंचाई जैसे जल-कुशल तरीकों को अपना सकते हैं।

श्री मथुराधीश मंदिर के गोस्वामी नंदन श्रोत्रिय को अभी भी उम्मीद है। “ताजमहल अभी भी चमक रहा है, जो इंसानी प्रतिभा और लचीलेपन का सबूत है। इसकी झलक को किसी सूखी खाई में गायब होने की ज़रूरत नहीं है। सामूहिक इच्छाशक्ति और योगी सरकार की निर्णायक कार्रवाई से, आगरा अपने हालात बदल सकता है – इससे पहले कि इसकी विरासत धूल में मिल जाए।”