म्यांमार में भूकंप ने हज़ारों लोगों की जान ले ली, लाखों लोगों को बर्बाद कर दिया और अरबों की संपत्ति तहस-नहस कर दी। प्रकृति से खिलवाड़ का ख़ामियाज़ा इंसान को कितनी भयंकर मौत का दर्द झेलकर चुकाना पड़ता है, इसका इस दु:खद तबाही से बड़ा उदाहरण आज दूसरा कोई नहीं है। फिर भी इंसान अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आ रहा है। बहुत-से लोग महज़ चार दिन की अपनी इस एक ज़िन्दगी में ख़ुशियाँ भरने के लिए दूसरों की ख़ुशियाँ छीनने में लगे हैं। दुनिया पर शासन करने के लिए तबाहियों के इंतज़ामात में लगे हुए हैं। सत्ता और धन के नशे में इतने मदमस्त हैं कि उन्हें पाप भी पाप नहीं लगता।
युद्ध, दंगे, अपराध, अकड़, षड्यंत्र, पाखंड, राजनीति, कुकर्म, अधर्म, धूर्तता, नफ़रत आदि सब वे ख़तरनाक हथियार हैं, जिन्हें चंद स्वार्थी इंसानों ने अपने सुख के लिए ईज़ाद किया है। लोगों की जेब काटने से लेकर जंगलों और पहाड़ों के कटान तक ऐसे ही स्वार्थी लोगों का हाथ है। ये लोग अपने अपराधी चेहरों को छिपाने के लिए झूठ और दिखावे के मुखौटे लगाये घूमते हैं। अहंकार ऐसे लोगों की वह नस है, जिसे छूते ही उनका क्रोध जाग जाता है। सत्ता और पैसे की ताक़त के दम पर यह हिमाक़त करने का प्रयास करने वाले को किसी भी आरोप में फँसा दिया जाता है। उनकी हत्या करवा दी जाती है। मगर जब मामला टक्कर का हो, तो ये लोग कसमसाकर रह जाते हैं।
मौज़ूदा केंद्र सरकार में शीर्ष पर बैठे कुछ लोग इसी कसमसाहट के दौर से गुज़र रहे हैं। हिंडनबर्ग से जैसे-तैसे छुटकारा पाने वाली केंद्र सरकार और उसकी पार्टी भाजपा की नींद अब एलन मस्क की जनरेटिव आर्टिफिसियल इंटेलीजेंस (एक्सएआई) की चैटबॉट ग्रोक ने उड़ा रखी है। हालात यहाँ तक पहुँच गये हैं कि दोनों ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ मुक़दमे दर्ज करा दिये हैं। केंद्र सरकार की शक्तियों का इस्तेमाल करके सत्तासीन भाजपा नेता ग्रोक का मुँह बंद करना चाहते हैं। मुँह न बंद करने पर उन्होंने ग्रोक को ही बंद कराने के प्रयास शुरू कर दिये हैं। हालाँकि वे ऐसा करने में अभी तक पूरी तरह नाकाम हैं, तो उन्होंने सरकार, प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, भाजपा, संघ के बारे में सवाल पूछने वाले भारतीयों को ही धमका डाला। सवाल पूछे, तो सज़ा होगी। ग्रोक और केंद्र सरकार के बीच बढ़ी इस तनातनी में भाजपा के सत्तासीन नेता ग्रोक से नहीं निपट सके, तो सवाल पूछने वालों के कान ऐंठने पर आमादा हैं।
इस बीच कुणाल कामरा ने भाजपा नेताओं की दु:खती रगों को छू लिया है। जैसे ही पूरी भाजपा लॉबी कुणाल कामरा के पीछे पड़ी कि उनके ख़िलाफ़ कई आपराधिक मामले दर्ज करा दिये। कुणाल को आतंकवादी कहा जाने लगा। कुणाल को अपनी अग्रिम जमानत करानी पड़ी। इस बीच सर्वोच्च न्यायालय ने सांसद इमरान प्रतापगढ़ी के ख़िलाफ़ दर्ज एफआईआर मामले में लोगों के मौलिक अधिकारों और उनकी स्वतंत्रता को लेकर केंद्र सरकार को नसीहत दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि हमारा संविधान लागू होने के 75 साल बाद भी प्रवर्तन तंत्र या तो इस महत्त्वपूर्ण मौलिक अधिकार से अनजान है या इसकी परवाह नहीं करता। साहित्य, जिसमें कविता, नाटक, फिल्में, स्टेज शो, स्टैंड-अप कॉमेडी, व्यंग्य और कला शामिल हैं; मानव जीवन को और अधिक सार्थक बनाते हैं। न्यायालय भारत के संविधान के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों को बनाये रखने और लागू करने के लिए बाध्य हैं। सर्वोच्च न्यायालय के इस फ़ैसले ने कुणाल कामरा, विपक्षी नेताओं और ग्रोक से सवाल पूछने वालों को राहत पहुँचायी है। लेकिन क्या भारत में लोकतंत्रिक मूल्यों की सत्ता के नशे में चूर नेताओं को परवाह है?
सत्ता के नशे में चूर नेताओं ने सवालों के तीरों और प्रकृति के प्रकोप को हमेशा शासन करने की चाह में ख़ुद ही आमंत्रित किया है। उन्होंने मरते दम तक सत्ता पर आसीन रहने के लिए लोगों के अधिकारों और प्रकृति का हनन करके अपनी ताक़त को बढ़ाने का काम किया है। लेकिन वे भूल गये कि जब तबाही होती है, तो अमीर-ग़रीब नहीं देखती। जो भी उसकी चपेट में आता है, या तो मारा जाता है या तबाह हो जाता है। फिर दूसरों को लूटकर इतना धन इकट्ठा करने का क्या फ़ायदा? और इसकी ज़रूरत भी क्या है? इस एक ज़िन्दगी के लिए आख़िर दूसरों को लूटकर अमीर बनने के बाद अगर नींद नहीं आये और लोगों के सवाल सारा सुख-चैन हराम कर दें, तो इस सबका अर्थ क्या? कहावत है- खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे। लेकिन इंसान जब खिसियाता है, तो वह दूसरों के बाल नोचना चाहता है। यह काम वे लोग पहले करते हैं, जो ग़लत होते हैं।
आज के दौर में सब एक-दूसरे के बाल नोचने में ही लगे हुए हैं। जो जितना ज़्यादा धूर्त और चालाक है, दूसरे के बाल नोचने में उतना ही कुशल है। इस मामले में ग्रोक को भी कम नहीं समझा जाना चाहिए। भविष्य में इंसानों की ज़िन्दगी में तबाही लाने वालों में से आर्टिफिसियल इंटेलीजेंस भी एक ख़तरनाक हथियार साबित होगा। यह आज चंद ग़लत नेताओं के बाल नोचकर जनता को ख़ुश कर रहा है, तो सिर्फ़ इसलिए, क्योंकि उसे जनता को मानसिक रूप से अपना ग़ुलाम बनाना है।
– प्रधानमंत्री मोदी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कह चुके हैं कि हिन्दू कोई धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति है
एक बार एक इंटरव्यू में देश के प्रधानमंत्री मोदी ने साफ़-साफ़ कहा था कि हिन्दू कोई धर्म नहीं है। उन्होंने कहा था कि ‘हिन्दू कोई रिलीजन नहीं, वे ऑफ लाइफ है। सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के अनुसार, हिन्दू कोई धर्म नहीं, जीने की पद्धति है। इस देश में हमारे ही सब लोग हैं। हम सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के हिसाब से चलते हैं। और उसमें न बौद्ध को एतराज़ है, न सिख को एतराज़ है। इतना ही नहीं, आज भी केरल में हमारे ईसाई संप्रदाय से लोग हैं, जो इसी प्रकार से जीवन जीते हैं।’
जब पत्रकार ने सवाल किया कि आपके मेनिफेस्टो में तो हिन्दुओं की बात है? तब नरेंद्र मोदी ने जवाब दिया- ‘वो सुप्रीम कोर्ट के हिसाब से हम वे ऑफ लाइफ के हिसाब से करते हैं, रिलीजन के हिसाब से नहीं करते। हम मानने को तैयार नहीं हैं कि हिन्दू कोई धर्म है।’ तब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे और केंद्र की सत्ता में आने की तैयारी कर रहे थे। फिर प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने कनाडा में भी यही कहा था कि हिन्दू कोई धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है। इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा था कि मुसलमानों का विरोध करने वाले हिन्दू नहीं हो सकते। हिन्दू तो जीओ और जीने दो के हिसाब से चलते हैं। विश्व को भाईचारे की भावना सिखाते हैं। यह अलग बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी पूरी भाजपा टीम और यहाँ तक कि संघ देश में हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति करके ही आज सत्ता में हैं।
देश के सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी, 2023 में भाजपा के अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर याचिका को ख़ारिज करते हुए कहा था कि ‘हिन्दू धर्म नहीं, बल्कि यह जीवन जीने का एक तरीक़ा है। इसमें कोई कट्टरता नहीं है। न्यायमूर्ति के.एम. जोसेफ और न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने कहा था कि भारत क़ानून के शासन, धर्मनिरपेक्षता और संविधानवाद से बँधा हुआ है। कोई भी देश अतीत का क़ैदी बनकर नहीं रह सकता। न्यायमूर्ति जोसेफ का मानना है कि उपाध्याय की याचिका से और अधिक वैमनस्य पैदा होगा, क्योंकि वह एक ख़ास समुदाय को निशाना बना रहे थे।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने साफ़ कहा था कि ‘हिन्दू धर्म जीवन जीने का एक तरीक़ा है। इसकी वजह से भारत ने सभी को आत्मसात किया है। इसकी वजह से हम एक साथ रह पा रहे हैं। अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति ने विभाजन पैदा किया। हमें उस स्थिति में वापस नहीं आना चाहिए।’ उन्होंने याचिका ख़ारिज करते हुए कहा था कि ‘भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। कोई भी देश अतीत का क़ैदी नहीं रह सकता किसी भी देश का इतिहास वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को इस हद तक परेशान नहीं कर सकता कि आने वाली पीढ़ियाँ अतीत की क़ैदी बन जाएँ।’
साल 2016 में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने 1995 के फ़ैसले पर पुनर्विचार न करने का फ़ैसला किया था। पीठ का ध्यान एक अलग मुद्दे पर था कि क्या किसी धार्मिक नेता द्वारा किसी विशेष पार्टी को वोट देने की अपील जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा-123 के तहत चुनावी कदाचार के बराबर है, और उसने हिन्दुत्व के अर्थ के बारे में व्यापक बहस में नहीं उलझने का फ़ैसला किया? उस समय हिन्दुत्व को फिर से परिभाषित करने और चुनावों में इसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ की याचिका को भी ख़ारिज कर दिया गया था। तक़रीबन दो साल पहले ही 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने फिर से पुष्टि की कि हिन्दुत्व एक जीवन-शैली है, इसकी समावेशी प्रकृति पर ज़ोर देते हुए और यह कहते हुए कि हिन्दू धर्म में कोई कट्टरता नहीं है। न्यायालय ने ऐतिहासिक स्थानों के लिए नामकरण आयोग स्थापित करने की याचिका ख़ारिज करते हुए यह टिप्पणी की थी, जिसमें विविध संस्कृतियों को आत्मसात करने में हिन्दू धर्म की भूमिका पर प्रकाश डाला गया। जबकि याची को सन् 1995 के आदेश की अपेक्षा थी। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने साल 2023 में आगे बढ़कर अपने रुख़ को मज़बूत तरीक़े से पुष्टि के साथ जीवन के तरीक़े की व्याख्या को मज़बूत किया गया है, जो लगभग तीन दशकों से एक सुसंगत न्यायिक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
दरअसल साल 1995 में देश के सुप्रीम कोर्ट ने मनोहर जोशी बनाम एन.बी. पाटिल के मामले में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय जारी किया था। यह मामला तब उठा, जब बॉम्बे हाई कोर्ट ने मनोहर जोशी सहित नौ भाजपा उम्मीदवारों का चुनाव रद्द कर दिया था, क्योंकि उन्होंने 1992-93 के मुंबई दंगों के बाद हिन्दू राज्य बनाने के लिए वोट माँगे थे। न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को पलटते हुए कहा कि ‘हिन्दुत्व अथवा हिन्दू धर्म उपमहाद्वीप में लोगों की जीवन-शैली और मन की स्थिति है, न कि धर्म।’ इसका मतलब यह था कि चुनावों में हिन्दुत्व या हिन्दू धर्म की अपील करना जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 के तहत भ्रष्ट आचरण नहीं माना जाता है, जो धार्मिक आधार पर प्रचार करने पर रोक लगाता है। इस फ़ैसले के राजनीतिक निहितार्थ थे; क्योंकि इसने भाजपा जैसी पार्टियों को धार्मिक पहचान के बजाय सांस्कृतिक और जीवनशैली पहचान के रूप में हिन्दुत्व का उपयोग करके प्रचार करने की अनुमति दी। हालाँकि यह विवादास्पद रहा है, आलोचकों का तर्क है कि इसने भारत के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों को कमज़ोर किया है। पिछले कुछ वर्षों में इस फ़ैसले पर बहस होती रही है, जिसके कारण इसकी दोबारा जाँच की माँग उठती रही है।
यह खंड 1995 के न्यायालय के आदेश के बारे याचिकाकर्ता के प्रश्न का व्यापक विश्लेषण प्रदान करता है, जिसमें कहा गया है कि हिन्दू धर्म जीवन जीने का एक तरीक़ा है, जो क़ानूनी निर्णयों, समाचार रिपोर्ट्स और विद्वानों के संदर्भों में व्यापक शोध पर आधारित है। विश्लेषण का उद्देश्य सभी प्रासंगिक विवरणों को शामिल करना है, जिससे पाठकों को विषय के क़ानूनी, राजनीतिक और सांस्कृतिक आयामों में रुचि रखने वालों के लिए पूरी समझ सुनिश्चित हो सके।
बहरहाल साल 1995 का निर्णय मनोहर जोशी बनाम एन.बी. पाटिल मामले में था, जिसकी सुनवाई न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा के नेतृत्व में भारत के सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने की थी। इसके अलावा हाई कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया था कि जोशी का अभियान के दौरान दिया गया बयान- ‘पहला हिन्दू राज्य महाराष्ट्र में स्थापित किया जाएगा; यह धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 की धारा-123(3) के तहत एक भ्रष्ट आचरण का गठन करता है, जो धर्म के आधार पर वोट के लिए अपील करने पर रोक लगाता है।’
हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर, 1995 को इस फ़ैसले को पलट दिया था, जिसमें एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया गया कि ‘हिन्दुत्व अथवा हिन्दू धर्म उपमहाद्वीप में लोगों की जीवन-शैली और मन की स्थिति है, न कि धर्म।’ यह व्याख्या महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि इसने अदालत को यह तर्क देने की अनुमति दी कि हिन्दुत्व की अपील करना धार्मिक प्रचार के बराबर नहीं है, जिससे जोशी का चुनाव बरक़रार रहा। इस फ़ैसले का संदर्भ भारतीय क़ानून में दिया जा सकता है। हालाँकि पूर्ण पाठ तक सीधे पहुँच के लिए क़ानूनी डेटाबेस की आवश्यकता हो सकती है। रही हिन्दुत्व को धर्म को रूप में प्रचार करके चुनाव जीतने की बात, तो यह चलन आज भी बंद नहीं हुआ है। कई पार्टियों के नेता, ख़ासतौर पर भाजपा नेता और प्रधानमंत्री मोदी भले ही ये नहीं मानते हों कि हिन्दू कोई धर्म है; लेकिन अपनी राजनीतिक रोटियाँ आज भी हिन्दू धर्म के नाम पर ही सेंकते नज़र आते हैं। हिन्दुओं को ख़तरे में बताकर, हिन्दू को धर्म बताकर उसे भी ख़तरे में बताकर चुनावों में प्रचार करते हैं। और जब कहीं दंगा-फ़साद हो, तो फिर उन्हीं हिन्दू युवाओं को मरने-कटने के लिए आगे कर दिया जाता है। आज तक जितने भी हिन्दू-मुस्लिम दंगे हुए हैं, उनमें से ज़्यादादर दंगे राजनीति से प्रेरित निकले हैं। ऐसा नहीं है कि दूसरे धर्मों के लोग कुछ कम हैं; लेकिन सनातन धर्म, जिसे वैदिक धर्म भी कहते हैं; को हिन्दू धर्म बताकर लोगों को गुमराह करने की राजनीति किसी भी हाल में उचित नहीं है।
बहरहाल, हिन्दू को धर्म न मानने को लेकर न्यायालयों का तर्क इस समझ पर आधारित था कि हिन्दुत्व धर्म एक अवधारणा के रूप में केवल धार्मिक प्रथाओं से परे एक व्यापक सांस्कृतिक और सामाजिक ढाँचे को समाहित करता है। इसे भारतीय उपमहाद्वीप की विविध परंपराओं, रीति-रिवाज़ों और दर्शन को प्रतिबिंबित करने वाले जीवन के तरीक़े के रूप में वर्णित किया गया था। इस व्याख्या को ऐतिहासिक और अकादमिक विचारों के साथ संरेखित करने के रूप में देखा गया था, जैसे कि ब्रिटिश इतिहासकार मोनियर विलियम्स द्वारा जिन्होंने हिन्दू धर्म को अपनी पुस्तक धार्मिक विचार और भारत में जीवन में पंथों और सिद्धांतों का एक जटिल समूह के रूप में वर्णित किया था।
इस निर्णय का चुनावी राजनीति पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा, विशेष रूप से भाजपा जैसी पार्टियों पर; जिन्होंने हिन्दुत्व को एक वैचारिक ढाँचे के रूप में अपनाया और उसका फ़ायदा उठाया। इसने राजनीतिक अभियानों को हिन्दुत्व को एक सांस्कृतिक पहचान के रूप में लागू करने में सक्षम बनाया, जो धार्मिक अभियान के रूप में वर्गीकृत किये बिना संभावित रूप से मतदाता की भावना को प्रभावित करता है। इसलिए आज हम सबको यानी हर धर्म और वर्ग क लोगों को धर्म का सही अर्थ समझने की ज़रूरत है।
लोकसभा ने बुधवार रात वक्फ संशोधन विधेयक को बहुमत से पारित कर दिया। विधेयक के पक्ष में 288 और विरोध में 232 वोट पड़े। सभी विपक्षी संशोधन प्रस्ताव ध्वनिमत से खारिज कर दिए गए। विधेयक पर करीब 12 घंटे लंबी चर्चा हुई, जिसके बाद यह अब राज्यसभा में पेश किया जाएगा।
अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री किरेन रिजिजू ने बताया कि इस विधेयक का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन के लिए पुराने कानून में सुधार करना है, न कि किसी धर्म में हस्तक्षेप करना। उन्होंने विवादास्पद धारा 40 को हटाने की बात कही, जिसके तहत वक्फ बोर्ड किसी भी संपत्ति को वक्फ घोषित कर सकता था और केवल न्यायाधिकरण में चुनौती दी जा सकती थी।
विपक्षी सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन ने बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्य शामिल करने का प्रस्ताव रखा, जो वोटिंग में खारिज हो गया। विपक्ष ने विधेयक को असंवैधानिक बताया, जिस पर रिजिजू ने जवाब दिया कि जब 1954 से यह कानून अस्तित्व में है, तो उसमें सुधार असंवैधानिक नहीं हो सकता।
गृह मंत्री अमित शाह ने चर्चा के दौरान विपक्ष पर तुष्टीकरण की राजनीति का आरोप लगाया और कहा कि वक्फ बोर्ड को सरकारी संपत्तियों पर अधिकार देने की यह नीति अब नहीं चलेगी। उन्होंने 2013 में यूपीए सरकार द्वारा किए गए संशोधन को अराजकता फैलाने वाला बताया और कहा कि सरकार अब कठोर कानून बना रही है।
एक तरफ़ मौसम विभाग ने 2025 में भी सामान्य से अधिक गर्मी रहने का अनुमान जताया है, तो दूसरी तरफ़ एक नये अध्ययन में सामने आया है कि भारत बढ़ती गर्मी के ख़तरों के लिए तैयार नहीं है। यह अध्ययन दिल्ली स्थित शोध संगठन ‘सस्टेनेबल फ्यूचर्स कोलैबोरेटिव’ ने किया है। इस अध्ययन में नौ शहर- बेंगलूरु, दिल्ली, फ़रीदाबाद, ग्वालियर, कोटा, लुधियाना, मेरठ, मुंबई और सूरत हैं। इन नौ शहरों में 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की शहरी आबादी का 11 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बसता है। और यह शहर गर्मी के लिहाज़ से देश के सबसे अधिक जोखिम वाले शहरों में से कुछ हैं।
इस अध्ययन का विश्लेषण चरम लू के हालात से निपटने की सरकारी कार्यक्रमों व नज़रिये पर सवाल उठाता है। आम जनता को जागृत करता है कि उनकी सरकारें वास्तव में जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए क्या कर रही हैं। विश्लेषण में कहा गया है कि जिन शहरों में सर्वेक्षण किया गया है, वो शहर गर्मी की लहरों के लिए तात्कालिक उपायों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, न कि दीर्घकालिक उपायों पर।
दीर्घकालिक उपायों के नहीं किये जाने से लू से होने वाली मौतों की आशंका अधिक है। सर्वे में भाग लेने वाले 26 प्रतिशत अधिकारियों ने माना कि हीट एक्शन प्लान में आपदा प्रबंधन व अन्य विभागों का तालमेल नहीं बन पाता। 16 प्रतिशत अधिकारियों के लिए लू (हीटवेव) की समस्या प्राथमिकता सूची में ही नहीं है। 14 प्रतिशत अधिकारियों को गर्मी या लू कोई ख़ास समस्या ही नहीं लगती।
ग़ौरतलब है कि 2024 इतिहास का सबसे अधिक लू दिनों वाना साल रहा। इस दौरान देशभर में 41,789 लोगों को लू लगी, जिनमें से 143 की मौत हो गयी। दरअसल अल्पकालिक उपाय जीवन रक्षक उपाय हैं और दीर्घकालिक उपाय स्वास्थ्य प्रणालियों को बेहतर बनाने तथा जलवायु परिवर्तन के मौज़ूदा व भावी दुष्प्रभावों को कम करने के लिए पर्यावरणीय क़दम उठाने पर केंद्रित हैं।
हाल ही में एक संसदीय पैनल ने राज्यसभा में पेश अपनी रिपोर्ट में केंद्र सरकार को अपनी आपदा प्रबंधन रणनीति का विस्तार करके उसमें हीटवेव जैसे ‘नये और उभरते ख़तरों’ को शामिल करने की सिफ़ारिश की है। इसके अलावा इसने अधिसूचित आपदाओं की सूची की आवधिक समीक्षा और अद्यतन के लिए एक औपचारिक तंत्र स्थापित करने की सिफ़ारिश की है।
वर्तमान में राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (एनडीआरएफ) और राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (एसडीआरएफ) सहायता के लिए पात्र आपदाओं की अधिसूचित सूची में चक्रवात, सूखा, भूकंप, आग, बाढ़, सुनामी, ओलावृष्टि, भूस्खलन, हिमस्खलन, बादल फटना, कीब हमले, पाला और शीत लहरें शामिल हैं। बेशक संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में लू को आपदा प्रबंधन रणनीति में शामिल करने की सिफ़ारिश कर दी है; लेकिन इसके सामानंतर यह सवाल भी उठता है कि पर्यावरण संरक्षण में वन के महत्त्व को देखते हुए हक़ीक़त में सरकार इस मुद्दे पर कितनी संजीदा है।
सरकार की भारत वन स्थिति रिपोर्ट-2023 के अनुसार, भारत की 25 प्रतिशत भूमि जंगलों या पेड़ों से ढकी हुई है। देश में वर्ष 2021 में अंतिम आकलन के बाद 1,445.81 वर्ग किलोमीटर वन एवं वृक्ष में वृद्धि हुई है।
सरकारी रिपोर्ट्स अक्सर आँकड़े पेश करती हैं, उसके साथ-साथ जनता से बहुत अहम बिंदु छिपाने का भी काम करती हैं। यही इस रिपोर्ट से भी लगता है। विकास के दबाव में वनों का कटना, संरक्षण के लिए संसाधनों की कमी पर चिन्ता नहीं नज़र आती। हाईवे, पहाड़ों को काटकर सुंरगों का निर्माण, आर्थिक विकास के लिए पर्यावरण संरक्षण नीतियों की अनदेखी का सिलसिला थमता नज़र नहीं आता।
वन संरक्षण अधिनियम-1980 और वन अधिकार अधिनियम-2006 का कार्यान्वयन भी पूरी भावना के साथ नहीं हो रहा है। सरकार को वनों की स्थिरता बनाये रखने के लिए अति गंभीर होने की ज़रूरत है। वनों का कटान से जैव विविधता को भी ख़तरा है।
बढ़ती आबादी के लिए बस्तियों की ज़रूरत को पूरा करने के लिए पेड़ काटे जाते हैं, आर्थिक तरक़्क़ी के लिए जंगल ख़त्म किये जा रहे हैं। और गर्मी के मौसम में यह मुद्दा एक बार फिर प्रासंगिक हो उठा है कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति सरकार को अति सचेत व सक्रिय होने की ज़रूरत है, ताकि चरम लू के प्रकोप से लोगों व धरती को बचाया जा सके।
गुजरात में 02 अक्टूबर, 1960 से शराबबंदी क़ानून लागू है; लेकिन शराबबंदी क़ानून को शराब माफ़ियाओं ने ठेंगे पर रखा हुआ है। हर साल गुजरात पुलिस कई टन शराब ज़ब्त करती है, फिर भी गुजरात के हर इलाक़े में अवैध रूप से शराब बिकती मिल जाती है। हालाँकि अवैध शराब विक्रेता आसानी से हर किसी को शराब नहीं बेचते; लेकिन शराब पीने वालों को फिर भी आसानी से अवैध रूप से शराब की बोतलें मिल जाती हैं। कुछ जानकारों का कहना है कि अवैध शराब की बिक्री में कुछ ऊपर तक पहुँच वाले लोग मिले हुए हैं, जिन तक अवैध शराब तस्करी से होने वाली काली कमायी के रुपयों में से हिस्सा पहुँचाया जाता है।
जानकारों का कहना है कि शराब कई परचून की दुकानों तक पर मिलती है; लेकिन वे पकड़ में नहीं आते, क्योंकि किसी अनजान व्यक्ति को वे शराब नहीं बेचते। कुछ शराब माफ़िया अपने गुप्त ठिकानों से भी अवैध तरीक़े से शराब की बिक्री करते हैं। इसके अलावा ड्रग्स का नशा करने वाले भी गुजरात में बहुत मिल जाते हैं, जिनमें स्कूली बच्चों की बड़ी संख्या है। हर साल करोड़ों रुपये की क़ीमत की ड्रग्स खेप पकड़े जाने से गुजरात में बड़ी मात्रा में ड्रग्स तस्करी का पता चलता है। अभी हाल ही में होली पर गुजरात में काफ़ी मात्रा में पुलिस और नारकोटिक्स विभाग ने शराब माफ़ियाओं पर कड़ी नज़र रखी, कई जगह अवैध शराब भी ज़ब्त की गयी; लेकिन फिर भी होली पर लोग शराब के नशे में नज़र आये।
हाल की अवैध शराब तस्करी की घटनाओं के आँकड़ों से पता चलता है कि गुजरात में पुलिस, नारकोटिक्स विभाग और गुजरात पुलिस की स्टेट मॉनिटरिंग सेल (एसएमसी) की चौकसी के बावजूद शराब माफ़िया यह अवैध कारोबार बेधड़क कर रहे हैं।
गुजरात के डूंगरपुर इलाक़े के धंबोला थाने की पुलिस ने हाल ही में एक शराब माफ़िया को गिरफ़्तार करके लाखों की अवैध शराब ज़ब्त की थी। यह माफ़िया राजस्थान के मांडली में सरकारी शराब के ठेके पर सेल्समैन का काम करता था। गुजरात में अवैध शराब की सबसे ज़्यादा तस्करी उसके पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश से होती है। 23 मार्च, 2025 को राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले के पीलीबंगा इलाक़े की पुलिस ने भारत माला रोड पर गुजरात ले जायी जा रही अवैध शराब की बड़ी खेप पकड़ी। यह अवैध शराब एक ट्रक और दो लग्जरी कारों के ज़रिये गुजरात ले जायी जा रही थी, जिनमें अंग्रेजी शराब की 591 पेटियाँ मिलीं, जिनमें अवैध शराब की कुल 7,092 बोतलें थीं। इस शराब की क़ीमत क़रीब 1.7 करोड़ रुपये बतायी गयी थी। इन तीन मामलों में राजस्थान पुलिस ने चार शराब माफ़ियाओं को गिरफ़्तार किया था। पकड़ी गयी इस शराब में ट्रक में कुल 545 पेटियाँ मिलीं, जिनमें 6,540 बोतलें थीं। दो कारों में कुल 46 पेटियाँ मिलीं, जिनमें 552 बोतलें थीं। इसके अलावा मार्च के पहले हफ़्ते में ही जयपुर के दूदू में राजस्थान पुलिस ने दो ट्रकों समेत अवैध शराब के 1,563 कार्टन ज़ब्त किये थे। यह शराब पंजाब से गुजरात जा रही थी। इसके बाद 06 मार्च को सिरसा डबवाली एंटी नारकोटिक सेल पुलिस ने गुजरात के गाँव अबूबशहर में रात में अवैध शराब की 800 पेटियों से लदा एक ट्रक ज़ब्त करते हुए राजस्थान निवासी ड्राइवर रमेश कुमार को गिरफ़्तार किया। पकड़ी गयी अवैध शराब के रूप में क़रीब 10 हज़ार बीयर की बोलते मिलीं, जिनकी बाज़ार में क़ीमत क़रीब 50 लाख रुपये बतायी गयी थी। इससे एक दिन पहले हरियाणा पुलिस ने फ़तेहाबाद में अवैध शराब से भरा एक टैंकर को पकड़ा। पुलिस के मुताबिक, अवैध अंग्रेजी शराब से भरा यह तेल टैंकर पंजाब से गुजरात जा रहा था, जिसमें अंग्रेजी शराब की 905 पेटियाँ मिलीं। पुलिस ने टैंकर चालक मनोज कुमार को गिरफ़्तार करके अवैध शराब को ज़ब्त कर लिया। इससे पहले हरियाणा पुलिस ने जयपुर में तीन शराब माफ़ियाओं को चार बैगों में भरी अवैध शराब समेत पकड़ा था, जो हरियाणा से गुजरात इस शराब की तस्करी करने जा रहे थे। 27 फरवरी, 2025 को भी महाराष्ट्र उत्पादन शुल्क विभाग की टीम ने ठाणे में एक वाहन समेत 34.39 लाख रुपये की क़ीमत की अवैध शराब ज़ब्त की थी। यह शराब भी गुजरात तस्करी के लिए ले जायी जा रही थी। इससे पहले जनवरी में राजस्थान के डूंगरपुर ज़िले के बिछीवाड़ा थाना इलाक़े में पुलिस ने गुजरात से लगी रतनपुर सीमा पर अवैध शराब के 250 कार्टूनों से भरे एक कंटेनर को ज़ब्त करके दो तस्करों को गिरफ़्तार किया था। अवैध शराब की बाज़ार में क़ीमत क़रीब 15 लाख रुपये से ज़्यादा आँकी गयी थी।
आँकड़ों के मुताबिक, गुजरात पुलिस हर साल हज़ारों टन शराब ज़ब्त करती है। सिर्फ़ साल 2024 में 01 जनवरी से 31 दिसंबर तक गुजरात पुलिस की स्टेट मॉनिटरिंग सेल (एसएमसी) ने 22.51 करोड़ रुपये से ज़्यादा की देशी-विदेशी अवैध शराब ज़ब्त की थी। इस दौरान अवैध शराब माफ़ियाओं के ख़िलाफ़ 455 केस दर्ज किये गये। साल 2024 में साल 2022 और साल 2023 से ज़्यादा अवैध शराब ज़ब्त की गयी और शराब माफ़ियाओं के ख़िलाफ़ मामले भी ज़्यादा दर्ज हुए। गुजरात पुलिस ने साल 2022 में 10.40 करोड़ रुपये की अवैध शराब ज़ब्त करते हुए कुल 440 केस दर्ज किये थे, जबकि साल 2023 में 20 करोड़ रुपये से ज़्यादा की अवैध शराब ज़ब्त करते हुए शराब माफ़ियाओं के ख़िलाफ़ कुल 466 केस दर्ज किये थे। साल 2024 की अगर बात करें, तो एसएमसी ने अवैध शराब तस्करी के सबसे ज़्यादा 52 केस अहमदाबाद शहर में दर्ज किये। इसके अलावा सूरत और वडोदरा शहरों में सबसे ज़्यादा 45 मामले अवैध शराब तस्करी के दर्ज किये गये। इन सभी चार शहरों से पूरे साल में कुल 2,59,50,000 हज़ार रुपये से ज़्यादा क़ीमत की अवैध शराब ज़ब्त की गयी, जबकि 6.87 करोड़ से ज़्यादा नक़दी ज़ब्त की गयी। अवैध शराब की तस्करी के सबसे बड़े 62 मामलों में से भी 31 बड़े मामले अहमदाबाद शहर में दर्ज हुए। इसके अलावा सूरत शहर में अवैध शराब तस्करी के 20 बड़े मामले और आठ अन्य मामले दर्ज किये गये। सभी मामलों में 51 लाख रुपये से ज़्यादा क़ीमत की अवैध शराब समेत 1.29 करोड़ रुपये की नक़दी ज़ब्त की गयी। वडोदरा शहर में 10 बड़े मामले और पाँच अन्य मामले दर्ज हुए। इन मामलों में एसएमसी ने 2.91 करोड़ रुपये की नक़दी ज़ब्त की, जबकि लाखों रुपये की शराब ज़ब्त की।
जानकारों के मुताबिक, गुजरात में अवैध शराब की बिक्री शहरों से लेकर गाँवों तक में होती है, जिसमें से एक 10वाँ हिस्सा अवैध शराब भी ज़ब्त नहीं हो पाती है। जानकारों के मुताबिक, बड़े-बड़े रसूख़दारों और नेताओं की पार्टियों में गोपनीय तरीक़े से शराब की पार्टियाँ तो होती ही हैं, ड्रग्स का चलन भी बहुत है। हालाँकि इसके कोई प्रमाण अभी तक सामने नहीं आये हैं; लेकिन गुजरात में ड्रग्स की तस्करी से भी इनकार नहीं किया जा सकता। बड़े पैमाने पर ड्रग्स के शिकार बच्चों की संख्या से इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है। पिछले साल कई ऐसे बच्चे पकड़े गये थे, जो ड्रग्स की लत के शिकार थे। गुजरात में ड्रग्स तस्करी और ड्रग्स बनाने वाली फैक्ट्रियों के पकड़े जाने के कई मामले सामने आ चुके हैं। 20 मार्च, 2025 को ही गुजरात पुलिस की स्टेट मॉनिटरिंग सेल (एसएमसी) ने क़रीब 1.26 करोड़ रुपये की क़ीमत की ड्रग्स के साथ केली चीकु फ्रांसिस और अकीमवान मी डेविड नाम के दो नाइजीरियाई नागरिकों को गिरफ़्तार करके जेल भेजा था। दोनों तस्कर गुजरात के वलसाड इलाक़े के वापी में ड्रग्स की डिलीवरी करने जा रहे थे, जो कि मुंबई से गुजरात पहुँचे थे। शराब माफ़ियाओं की बात करें, तो पिछले साल गुजरात पुलिस ने मध्य प्रदेश के रहने वाले रमेश चंद्र राय नाम के एक बड़े तस्कर को गिरफ़्तार किया था, जो गुजरात समेत कई राज्यों में शराब तस्करी करता था। गुजरात के कई ज़िलों में अवैध शराब की तस्करी के अलावा ये माफ़िया मध्य प्रदेश के भी कई ज़िलों में अवैध शराब की तस्करी करता था।
गुजरात में अवैध शराब की तस्करी के अलावा ड्रग्स तस्करी भी बड़े पैमाने पर होती है। साल 2024 में गुजरात में 6,450 करोड़ रुपये की नशीली दवाओं समेत ड्रग्स ज़ब्त की गयी थी। कई बार समुद्री पोर्ट के ज़रिये विदेशों से लायी गयी ड्रग्स की बड़ी खेपें बरामद हुई हैं, जिनमें सबसे बड़ी खेप 33 टन ड्रग्स अडानी के मुंद्रा पोर्ट पर पिछले साल ही बरामद हुई थी। गुजरात में अवैध शराब और ड्रग्स की तस्करी से हर साल हज़ारों लोगों की जान चली जाती है।
लेकिन गुजरात की गिफ्ट सिटी यानी गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी में शराबबंदी अब लागू नहीं है। पिछले साल गुजरात सरकार ने गिफ्ट सिटी में शराब पीने और बिक्री पर से रोक हटा ली थी, जिसके बाद से गिफ्ट सिटी में शराब धड़ल्ले से बिक रही है। गिफ्ट सिटी में पूरी दुनिया से पर्यटक आते हैं, जिनके चलते यहाँ कई साल से शराब पीने और बेचने की छूट की माँग की जा रही थी। लेकिन जैसे ही गुजरात सरकार ने गिफ्ट सिटी शराब बेचने, पीने और परोसने के लाइसेंस दिये, यहाँ शराब पीने वालों की संख्या बढ़ गयी है। गुजरात सरकार में तक़रीबन 24 हज़ार से ज़्यादा लोग पर्यटकों की सेवा के लिए कार्यरत हैं। अनुमानित आँकड़ों के मुताबिक, गिफ्ट सिटी में पिछले एक साल में 01 मार्च से लेकर 31 दिसंबर तक 20,000 लीटर से ज़्यादा शराब की खपत हुई थी। हालाँकि ये सरकारी आँकड़े नहीं हैं। लेकिन कहा जा रहा है कि इस साल गिफ्ट सिटी में शराब की खपत और ज़्यादा बढ़ गयी है।
बलूचिस्तान में विद्रोह की ज्वाला धधक रही है। सवाल यह है कि क्या बलूचिस्तान पाकिस्तान के लिए दूसरा बांग्लादेश बनने जा रहा है? बलूचिस्तान के लोगों पर अत्याचार करने और वहाँ की सम्पदा को लूटने के पाकिस्तान हुक्मरानों और सेना पर आरोपों के बीच हाल में दो ऐसी बड़ी घटनाएँ हुई हैं, जो यह संकेत देती हैं कि बलूचिस्तान पाकिस्तान के लिए मुश्किल बन रहा है। पहली घटना में बलूच विद्रोहियों ने पाकिस्तान की एक ट्रेन को अगवा कर लिया, जबकि दूसरी घटना में पाक सैनिकों को ले जा रही बस को आत्मघाती हमले में उड़ा दिया। दोनों ही घटनाओं में पाक सेना के 200 से ज़्यादा जवानों के मरने का दावा बलूच विद्रोहियों ने किया है।
इस बीच कुछ और घटनाएँ हुई हैं, जो बताती हैं कि बलूचिस्तान में विद्रोह पाकिस्तान सरकार और सेना से सँभल नहीं रहा है। ट्रेन अपहरण और सेना के क़ाफ़िले पर आत्मघाती हमले के बाद पाक सेना ने बलूचिस्तान की मानवाधिकार कार्यकर्ता और बलूच यकजेहती समिति (बीवाईसी) की मुख्य आयोजक महरंग बलूच को गिरफ़्तार कर लिया। दिलचस्प यह है कि महरंग को 2025 के नोबेल शान्ति पुरस्कार के लिए नामित किया गया है। पाकिस्तान ने उन पर आतंकी होने का आरोप लगातार उन्हें जेल में डाल दिया, जिसके बाद दक्षिण एशिया के एमनेस्टी इंटरनेशनल क्षेत्रीय कार्यालय ने पाकिस्तानी अधिकारियों से महरंग समेत हिरासत में लिये लोगों को तुरंत रिहा करने की माँग करके उस पर दबाव बना दिया है।
बलूचिस्तान का यह विद्रोह नया नहीं है। साल 1947 में भारत के विभाजन के समय ही बलूचिस्तान अलग राज्य (देश) बनना चाहता था; लेकिन पाकिस्तान ने उसे जबरदस्ती अपने साथ मिला लिया। अब जब बलूचिस्तान में विद्रोह की चिंगारी भड़क उठी है, वहाँ के आज़ादी आन्दोलनकारी चाहते हैं कि भारत उनकी उसी तरह मदद करे, जैसे बांग्लादेश के स्वतंत्रता आन्दोलन की इंदिरा गाँधी ने मदद की थी। फ़िलहाल भारत सरकार तमाम घटनाओं पर नज़र रखे हुए है। भारत को बदली परिस्थितियों में बांग्लादेश की घटनाओं पर भी नज़र रखनी पड़ रही है, जहाँ शेख़ हसीना के तख़्तापलट के बाद स्थितियाँ भारत के लिए पेचीदा हुई हैं।
पाकिस्तान हर संभव कोशिश कर रहा है कि बांग्लादेश में उथल-पुथल जारी रखकर उसके फिर पाकिस्तान के साथ मिलने की परिस्थितियाँ बनायी जाएँ। पाकिस्तान के हर हुक्मरान और फ़ौजी जनरल के दिल में यह काँटा चुभता है कि इंदिरा गाँधी ने पाकिस्तान के टुकड़े करके पूर्वी पाकिस्तान के हिस्से को बांग्लादेश के नाम से स्वतंत्र राष्ट्र बनवा दिया था। अब पाकिस्तान की सेना और सरकार चाहती है कि बांग्लादेश को फिर अपना हिस्सा बनाया जाए। लेकिन इस बीच उसके लिए बलूचिस्तान एक बड़ी समस्या बन गया है, जिसका विद्रोह उस से थम नहीं रहा। अफ़ग़ानिस्तान में कई ताक़तें पाकिस्तान के सरहदी इलाक़ों बलूचिस्तान से लेकर ख़ैबर पख़्तूनख़्वा तक विद्रोहियों को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ हवा दे रही हैं।
पाकिस्तान भारत पर इन विद्रोहियों का समर्थन करने का आरोप लगा रहा है; लेकिन भारत ने इन आरोपों को ग़लत बताया है। हाँ, वह बलूचिस्तान की जनता के हालात पर चिन्ता जता रहा है। लेकिन एक बात साफ़ है कि पाकिस्तान जिस तरह जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों का समर्थन करता है, उन्हें ट्रेनिंग, हथियार और पैसा देता है, उसे देखते हुए बलूचिस्तान का विद्रोह उसके लिए एक सबक़ है। वहाँ बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) लगातार ताक़त हासिल कर रही है और जनता का उसे जबरदस्त समर्थन है। बीएलए पाकिस्तान से अलग होकर एक अलग राष्ट्र का आन्दोलन कर रही है। पाकिस्तान ने शुरू में कोशिश की थी कि अफ़ग़ानिस्तान जम्मू-कश्मीर में आतंक करने वाले गुटों की ट्रेनिंग अपनी धरती पर करने दे; लेकिन इसमें उसे सफलता नहीं मिली। इसका काफ़ी श्रेय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल की रणनीति को दिया जाता है।
आज स्थिति यह है कि पाकिस्तान अपने ही राज्य बलूचिस्तान में विद्रोह का सामना कर रहा है, अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में बैठे अधिकतर तालिबान गुटों से उसकी कट्टर दुश्मनी हो चुकी है और भारत से उसकी दशकों पुरानी दुश्मनी है ही। उसके लिए एक और संकट की स्थिति यह बनी है कि अमेरिका में ट्रम्प के आने के बाद अपने प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार मिलने की संभावनाओं को झटका लगा है। जैसी आर्थिक स्थिति पाकिस्तान की है, उससे उसके चारों तरफ़ परेशानियों का घेरा पड़ गया है। जनता में पाक सरकार और ख़ासकर सेना के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा बढ़ रहा है। सबसे मुश्किल घड़ी आर्मी चीफ आसिम मुनीर के लिए है, जो पाकिस्तान में सत्ता के बराबर इस्टैब्लिशमेंट वाली ताक़त रखते हैं।
हाल में पाकिस्तान में लाल टोपी के नाम से जाने जाने वाले कट्टरपंथी इस्लामी राजनीतिक कमेंटेटर ज़ैद हामिद ने जब बांग्लादेश को ऑफर दिया कि उसे 1971 के बँटवारे से पहले की स्थिति में लौटकर पाकिस्तान में फिर से शामिल हो जाना चाहिए, तो इसकी पीछे सेना और बदनाम ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई का हाथ बताया गया। कट्टर भारत विरोधी माने जाने वाले ज़ैद ने बांग्लादेश के कट्टरपंथियों से कहा कि हम (पाकिस्तान) आपको दावत देते हैं कि पाकिस्तान में वापस आकर मिल जाएँ। ‘हम आपको दोनों हाथों से समेटकर अपने सीने से लगा लेंगे। हमारे दिल में आपके लिए अब कोई नफ़रत नहीं है, क्योंकि हम जानते हैं कि वो ग़लतियाँ आपके पहले वाली नस्ल से हुई थीं।’ पाक हुकूमत और मुनीर की सेना जनता में अपने ख़िलाफ़ पैदा हो रहे ग़ुस्से से ध्यान भटकाने के लिए बांग्लादेश को तुरुप के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही है।
पाकिस्तान सरकार और सेना के घोषित भारत विरोधी रुख़ के विपरीत वहाँ की सेना के पूर्व अधिकारी कुछ और ही खेल देखते हैं। उनका आरोप है कि पाकिस्तान की वर्तमान सरकार और सेना के बड़े अधिकारी भारत से कारोबारी रिश्ते बनाने के रास्ते खोज रहे हैं। पाकिस्तानी सेना के रिटायर्ड अधिकारी आदिल रजा इसे ग्रेटर पंजाब मॉडल का नाम देते हैं। उनका दावा है कि इस मॉडल को पाक सेना के शीर्ष अधिकारियों और शरीफ़ सरकार के ताक़तवर नेताओं की लॉबी का समर्थन है और इसके पीछे रणनीति करतारपुर कॉरिडोर की तर्ज पर एक कारोबारी कॉरिडोर तैयार करना है। लिहाज़ा यह लॉबी भारत के साथ दुश्मनी ख़त्म करके कारोबारी सम्बन्ध मज़बूत करने पर जोर दे रही है, क्योंकि वह दोनों देशों के बीच एक सॉफ्ट बॉर्डर बनाना चाहती है। इसका मक़सद मुक्त व्यापार और सीमा पार आवाजाही को सुविधाजनक बनाना है।
रज़ा का आरोप है कि इस मॉडल के तहत कराची सहित सिंध, ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के साथ ग्रैंड ट्रंक रोड (जीटीआर) और भारत के बीच सॉफ्ट बॉर्डर से व्यापार के रास्ते खोलना है। हालाँकि उनकी चेतावनी है कि दोनों देशों की अर्थ-व्यवस्थाओं में ज़मीन आसमान का अंतर है और पाकिस्तान इस मॉडल को अपनाता है, तो कुछ ही वर्षों में वह भारत का एक सैटेलाइट स्टेट मात्र बनकर रह जाएगा।
यदि रज़ा की बात सही है, तो यह देखना बहुत दिलचप होगा कि भारत की तरफ़ से कौन इस तरह के कारोबारी कॉरिडोर में दिलचस्पी ले रहा है। क्या भारत सरकार पर्दे के पीछे इस पर कुछ काम कर रही है और क्या भारत के कुछ बिजनेसमैन इसमें दिलचस्पी ले रहे हैं? यहाँ यह भी सवाल है कि यदि सचमुच परदे के पीछे ऐसी किसी रणनीति को भारत सरकार का भी समर्थन है, तो क्या भारत बलूचिस्तान के मामले में फ़िलहाल तटस्थ भूमिका बनाकर रखेगा! हाल में पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार नजम सेठी ने एक निजी चैनल में बताया था कि भारत सरकार ने जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 ख़त्म किया था, तो पाकिस्तानी सेना के कोर कमांडर्स की बैठक में इस पर सहमति बन गयी थी कि इस मामले को ज़्यादा न बढ़ाया जाये।
हालाँकि सेना की सोच के विपरीत पूर्व पाक पीएम इमरान ख़ान ने संसद में न सिर्फ़ भारत के ख़िलाफ़ बयान दे दिया, बल्कि भारत से राजदूत वापस बुलाने और व्यापार बंद करने की घोषणा भी कर दी।
पाकिस्तान के सामने अब मुश्किल घड़ी है। एक तरफ़ बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी उसके ख़िलाफ़ सशत्र विद्रोह कर रही है वहीं ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में टीटीपी के पाकितान सेना पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं। अपुष्ट ख़बरों पर भरोसा करें, तो हाल के तीन हफ़्तों में इन सभी गुटों के हमलों में पाकिस्तान सेना के 300 से ज़्यादा जवान मरे गये हैं। इन घटनाओं से विचलित पाकिस्तानी सेना के प्रमुख आसिम मुनीर को कहना पड़ा कि पाकिस्तान को एक हार्ड स्टेट बनाने की ज़रूरत है। इतिहास देखें, तो बँटबारे के बाद से ही बलूचियों और पाकिस्तानी के बीच संघर्ष रहा है। जब 1947 में भारत से अलग होकर पाकिस्तान बना तो कुछ ही महीने बाद 1948 में पाकिस्तान ने बलूचिस्तान पर जबरन क़ब्ज़ा कर लिया। दरअसल बलूचिस्तान एक जनजातीय समाज है। वहाँ के लोग भाषा, जातीयता, इतिहास, भौगोलिक भेद, सांप्रदायिक असमानताओं, औपनिवेशिक कलंक और राजनीतिक अलगाव के आधार पर शुरू से ही पाकिस्तान के ख़िलाफ़ हिंसक संघर्ष में संलिप्त हो गये थे।
पाकिस्तान की दिक़्क़त यह भी है कि बलूचिस्तान भौगोलिक रूप से उसका सबसे बड़ा राज्य है और कुल जनसंख्या का सिर्फ़ छ: फ़ीसदी होने के बावजूद उसका भू-भाग पूरे पाकिस्तान का 46 फ़ीसदी है। हाइड्रोकार्बन और खनिजों से समृद्ध होने के बावजूद बलूचिस्तान को कभी पाकिस्तान ने तरजीह नहीं दी। लिहाज़ा वह देश का सबसे पिछड़ा राज्य है और वहाँ के 1.5 करोड़ लोगों में से 70 ग़रीबी की रेखा से नीचे गुज़र-बसर करते हैं। उन्हें पाकिस्तान प्रशासन, पुलिस और दूसरे संस्थानों में ऊँचे पदों से महरूम रखा गया है। लेकिन इन तमाम समस्यायों और पाकिस्तानी सेना के ज़ुल्म के बावजूद बलूच आबादी में राष्ट्रवाद की जबरदस्त भावना रही है। उनमें विद्रोह का आधार वुद्धिजीवी और युवा, ख़ासकर माध्यम वर्ग का युवा है, जो आज़ाद राष्ट्र और अपने लिए तरक़्क़ी के बड़े सपने देखता है। ऐसे बहुत से युवा, वुद्धिजीवी देश से बाहर गये और नये तेवर के साथ अब बलूचिस्तान में आज़ादी की जंग शुरू कर चुके हैं।
– इस्लामिक तरीक़े से मुर्दा दफ़नाने के लिए भारत के कई क़ब्रिस्तानों में बिकती है क़ब्रों की ज़मीन !
इंट्रो- हिन्दुस्तान में कई धर्मों के लोग रहते हैं और उनके रीति-रिवाज़ भी अपने-अपने धर्मों के हिसाब से होते हैं। इन्हीं रीति-रिवाज़ों में से एक रिवाज़ इंसानों के मरने के बाद उनके अंतिम क्रिया-कर्म का है, जिसके तौर-तरीक़े सबके अपने-अपने हैं। जैसे हिन्दुओं में शवदाह होता है, वैसे ही मुसलमानों और ईसाइयों में मुर्दे ज़मीन में दफ़नाये जाते हैं। लेकिन भारत के कई शहरों में अब मुर्दे दफ़नाने के लिए लोग पहले से ही क़ब्र की ज़मीन ख़रीदकर बुक कर रहे हैं। दिल्ली के ऐतिहासिक मेहंदियान क़ब्रिस्तान में मुर्दों को दफ़्न करने के लिए क़ब्र की ज़मीन रियल एस्टेट की तरह बेची और ख़रीदी जाती है। इस क़ब्रिस्तान के अलावा दूसरे कई क़ब्रिस्तानों में भी यह सौदा होता है और हज़ारों से लेकर लाखों रुपये तक में क़ब्रों की खुलेआम अग्रिम बुकिंग होती है। कई परिवारों के लोग घर में किसी की मौत से पहले ही कुछ प्रमुख क़ब्रिस्तानों में जगह बुक करने के लिए होड़ करते हैं, जिससे मौत के बाद भी उन्हें सम्मान मिल सके। पढ़िए, तहलका एसआईटी की ख़ास पड़ताल पर आधारित यह रिपोर्ट :-
फ्लैट, कार और विवाह के लिए हॉल बुक करना आम बात है। लेकिन कुछ लोग अब अपने प्रियजनों के लिए क़ब्र भी बुक कर लेते हैं, ताकि मरने के बाद उन्हें दफ़्न करने के लिए हमेशा के लिए एक अच्छी जगह मिल सके। यह प्रवृत्ति, जो पहले खाड़ी देशों में प्रचलित थी; अब भारत में मुसलमानों और ईसाइयों में भी फैल रही है। विडंबना यह है कि अब शान्ति से आराम करने के लिए भी योजना बनाने की आवश्यकता होती है, जिसकी क़ीमत भी चुकानी पड़ती है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, रज़ीउद्दीन अहमद अपनी पत्नी और चार बच्चों के साथ पुरानी दिल्ली में जामा मस्जिद के पास दो बेडरूम वाले फ्लैट में रहते हैं। आसमान छूती संपत्ति दरों ने उन्हें उसी घर में रहने के लिए मजबूर कर दिया है, जिसमें वह बड़े हुए थे; लेकिन मृत्यु के बाद की योजना बनाते हुए उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि उनके परिवार के लिए पर्याप्त जगह हो। 52 वर्षीय इस व्यवसायी ने 48,000 रुपये में 12 क़ब्रों की जगह क़ब्रिस्तान में बुक करायी है, ताकि उनके मरने के बाद परिवार के सदस्यों को दफ़नाने के लिए जगह ढूँढने में परेशानी न हो। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, क़रीब एक दशक पहले क़ब्रों की जगह बुक करा चुके अहमद का कहना है कि ‘कौन किसी अजनबी के बग़ल में दफ़्न होना चाहेगा? हम सब एक साथ रहेंगे।’
अहमद के चचेरे भाई शफ़ीक़ रहमान ने अपने दादा के नाम पर 88 क़ब्रें बुक करायी हैं। अहमद के अनुसार, ज़्यादा-से-ज़्यादा क़ब्रों का मालिक होना स्टेटस सिंबल माना जाता है। अहमद एक बड़े परिवार से आता है। दिल्ली के एक अन्य व्यवसायी अखमल जमाल ने दिल्ली के मेहंदियान क़ब्रिस्तान में 58 क़ब्रें बुक करायी हैं। कुछ क़ब्रिस्तान क़ब्रों की अग्रिम बुकिंग की अनुमति देते हैं, जिसकी दरें 5,000 रुपये से शुरू होकर स्थान के आधार पर लाखों रुपये तक होती हैं; बिलकुल संपत्ति ख़रीदने की तरह। क़ब्र जितनी जल्दी बुक की जाती है, छूट उतनी ही अधिक मिलती है।
‘आप अपने मृतकों को पहले से क़ब्र बुक किये बिना इस क़ब्रिस्तान (मेहंदियान क़ब्रिस्तान) में दफ़्न नहीं कर सकते। एक बार क़ब्र बुक हो जाने के बाद कोई भी अन्य व्यक्ति उस स्थान का उपयोग मुर्दा दफ़्न के लिए नहीं कर सकता। ऐसे भी उदाहरण हैं, जहाँ लोगों ने 10 साल पहले ही क़ब्रें बुक करा ली थीं। इस क़ब्रिस्तान में थोक बुकिंग भी की जा सकती है। यहाँ कई क़ब्रगाहों को एक लाख रुपये में बेचा गया है।’ -मेहंदियान क़ब्रिस्तान में क़ब्र खोदने वाले मुश्ताक़ ने क़ब्र लेने के इच्छुक ग्राहक बनकर पड़ताल करने गये ‘तहलका’ रिपोर्टर को ग्राहक समझकर बताया।
‘मैं इस क़ब्रिस्तान में रहता हूँ और पिछले 10-12 वर्षों से पक्की क़ब्रें तैयार कर रहा हूँ। यहाँ अग्रिम बुकिंग अनिवार्य है। क़ब्र की क़ीमत उसके स्थान पर निर्भर करती है। सभी पसंदीदा प्लॉट या तो बिक चुके हैं या बुक हो चुके हैं। अब उपलब्ध एकमात्र क़ब्र की ज़मीन की क़ीमत 30,000 रुपये है।’ -राजमिस्त्री पप्पू ने ‘तहलका’ रिपोर्टर से कहा।
‘अग्रिम बुकिंग के लिए हम पूरे 30,000 रुपये पहले ही ले लेते हैं। जगह बुक कर लेते हैं और भुगतान के एवज़ में रसीद जारी कर देते हैं। जब भी परिवार के लोग मुर्दे को लेकर आते हैं, तो वे हमें अग्रिम भुगतान की पर्ची दिखाते हैं और मुर्दे को दफ़नाने के लिए अपनी बुक की हुई जगह ले लेते हैं। अगर कोई इस बात का सुबूत लेकर आता है कि 20-22 साल पहले उसके परिवार के किसी सदस्य को यहाँ दफ़नाया गया था, तो हम उसी क़ब्र को दोबारा खोदकर उसमें मुर्दे को दफ़ना देते हैं।’ -मेहंदियान क़ब्रिस्तान के देखभालकर्ता और ठेकेदार मोहम्मद चाँद ने ‘तहलका’ रिपोर्टर से कहा।
मेहंदियान एक मुस्लिम क़ब्रिस्तान है, जिसे वीआईपी क़ब्रिस्तान के रूप में जाना जाता है। यह नई दिल्ली में दिल्ली गेट के पास लोक नायक जय प्रकाश नारायण (एलएनजेपी) अस्पताल के पीछे स्थित एक ऐतिहासिक क़ब्रिस्तान है, जो देश के सबसे प्रमुख क़ब्रिस्तानों में से एक है। लेखिका और इतिहासकार राणा सफ़वी ने अपनी पुस्तक ‘द फॉरगॉटन सिटीज़ ऑफ़ दिल्ली’ में इस परिसर के बारे में लिखा है। उन्होंने बताया है कि क़ब्रिस्तान-ए-मेहंदियान कभी एक विशाल क्षेत्र था, जहाँ कई फ़क़ीरों और आम लोगों की क़ब्रें थीं। मेहंदियान का इतिहास अद्भुत है। 18वीं शताब्दी के अंत में जब प्रसिद्ध इस्लामिक उलेमा (विद्वान), इतिहासकार और दार्शनिक शाह वलीउल्लाह देहलवी का इंतिक़ाल हुआ, तो उन्हें यहीं दफ़नाया गया था।
औरंगज़ेब के इंतिक़ाल से चार साल पहले मुगल वंश के अंत के समय पैदा हुए शाह वलीउल्लाह देहलवी को भारत का सबसे महान् इस्लामिक उलेमा माना जाता है। इस्लाम के दूसरे ख़लीफ़ा हज़रत उमर बिन अल ख़त्ताब (रज़ि.), जो अपने पिता की ओर से ख़लीफ़ा परिवार के दावेदार हुए; उनके पूरे परिवार को इसी क़ब्रिस्तान में उनके साथ दफ़नाया गया था। आज भी लोगों को उनकी क़ब्र के सामने घंटों बैठकर इबादत (प्रार्थना) और मराक़बह (ध्यान) करते देखा जा सकता है।
नामी उर्दू शायरों में से एक मोमिन ख़ान ‘मोमिन’ को भी इसी परिसर में दफ़नाया गया है। यहाँ बनी अन्य प्रमुख क़ब्रों में स्वतंत्रता सेनानी और इस्लामिक उलेमा मौलाना हिफ़्ज़ुर रहमान सोहरवी, पुरानी और अब बंद हो चुकी उर्दू फ़िल्म पत्रिका ‘शमा’ के पूर्व संपादक यूनुस देहलवी और भाजपा सदस्य सिकंदर बख़्त की क़ब्रें शामिल हैं। पूरे परिसर में क़ब्रों के अलावा शाह वलीउल्लाह देहलवी की दरगाह और एक मदरसा है। शाह वलीउल्लाह के पिता शाह अब्दुर रहीम द्वारा मेहंदियान परिसर में स्थापित मदरसा-ए-रहीमिया भारत के सबसे बड़े मदरसों (शैक्षिक केंद्रों) में से एक है।
मेहंदियान में कई प्रमुख क़ब्रों में से मोना अहमद, जिन्हें भारत की सबसे प्रतिष्ठित ट्रांसजेंडर माना जाता है; और उनके गुरु चमन की क़ब्रें एक छोटे से कमरे में एक साथ स्थित हैं। इन क़ब्रों की चमकदार नीली दीवारों पर क़ुरआन की आयतें लिखी हुई हैं। बैंगनी दीवार पर मोना की एक बड़ी फीकी पेंटिंग लगी हुई है, जिसमें वह एक लंबी सफ़ेद पोशाक में हैं। सन् 2017 में उनका इंतिक़ाल हो गया था। लेकिन देखभाल करने के लिए उनके भतीजे जहाँआरा अभी भी वहाँ रहते हैं। मेहंदियान भारत के सबसे ऐतिहासिक और प्रमुख मुस्लिम क़ब्रिस्तानों में से एक है, क्योंकि इसमें कई इस्लामिक उलेमाओं, स्वतंत्रता सेनानियों, उर्दू कवियों, पत्रकारों, राजनेताओं की क़ब्रें और सबसे बढ़कर शाह वलीउल्लाह देहलवी की दरगाह है। यहाँ बहुत-से क़ाबिल-ए-एहतराम (पूजनीय) लोग दफ़्न हैं, इसलिए ऐसा माना जाता है कि किसी पाक (पवित्र) आदमी के पास रहने (दफ़्न होने) से रूह (आत्मा) को जन्नत (स्वर्ग) जाने में मदद मिलती है; क्योंकि फ़क़ीर पड़ोसी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह आस-पास दफ़्न लोगों के लिए ईश्वर से क्षमा माँगें। इसी विश्वास की वजह से मज़हबी (धार्मिक) हस्तियों के पास वाली क़ब्रों की क़ीमत भी ज़्यादा होती है।
सूत्रों का कहना है कि शाह वलीउल्लाह देहलवी के पैरों की तरफ़ बनी एक क़ब्र 1,80,000 रुपये में बेची गयी थी। कई मुसलमानों के लिए ऐसी महान् हस्तियों के साथ इस क़ब्रिस्तान में दफ़्न होना गर्व की बात है। मुसलमानों में यहाँ दफ़्न होने या अपने परिजनों को दफ़्न करने की होड़ को देखते हुए कुछ लोगों ने मेहंदियान क़ब्रिस्तान में क़ब्रों की अग्रिम बुकिंग कराने का पैसा लेकर हालात का फ़ायदा उठाना शुरू कर दिया है।
‘तहलका’ रिपोर्टर ने इस बारे में पड़ताल के लिए नक़ली ग्राहक बनकर मेहंदियान क़ब्रिस्तान का दौरा किया। क़ब्रिस्तान के दाख़िली दरवाज़े (एंट्री गेट – प्रवेश द्वार) के बायीं ओर उन्हें अली-मोहम्मद शेर-ए-मेवात फाउंडेशन बोर्ड का कार्यालय दिखायी दिया, जो सन् 2018 में पंजीकृत हुआ था। इसमें बोर्ड के पदाधिकारियों के नाम लिखे हुए हैं। दाख़िली दरवाज़े पर एक चाय विक्रेता ने ‘तहलका’ रिपोर्टर को मोहम्मद चाँद नामक एक व्यक्ति के पास पहुँचाया, जिसने ख़ुद को क़ब्रिस्तान का रखवाला (देखरेख करने वाला) बताया। रिपोर्टर ने चाँद से कहा कि हम मेहंदियान में दो क़ब्रें पहले से बुक करना चाहते हैं। चाँद पहले तो उलझन में दिखा; लेकिन जब उसे बताया गया कि यह अग्रिम बुकिंग के लिए है; मुर्दे को तत्काल दफ़नाने के लिए नहीं। तब वह रिपोर्टर को एक ग्राहक समझकर संभावित भूखंड (क़ब्र के लिए जगह) दिखाने के लिए ले गया, जहाँ भविष्य में मुर्दा दफ़नाने के लिए उसने रिपोर्टर को क़ब्र की जगह दिखायी, जिसे पैसे देकर लिया जा सकता है।
रिपोर्टर : जगह के लिए आये थे।
चाँद : जगह मतलब?
रिपोर्टर : क़ब्र की जगह।
चाँद : इंतिक़ाल हुआ है?
रिपोर्टर : इंतिकाल नहीं, मतलब वो एडवांस में चाह रहे हैं; ..कब्र की।
क़ब्रों के लिए जगह दिखाते समय ‘तहलका’ रिपोर्टर ने चाँद से पूछा कि क्या उन्हें शाह वलीउल्लाह की दरगाह के अंदर दफ़नाने के लिए जगह मिल सकती है? जो किसी भी मुसलमान के लिए सबसे सम्मानजनक बात है। इसके जवाब में चाँद कहता है- नहीं।
चाँद : यहाँ मिल जाएगी।
रिपोर्टर : अंदर हज़रत के यहाँ नहीं मिल जाएगी?
चाँद : नहीं।
रिपोर्टर : आपका नाम?
चाँद : मोहम्मद चांद।
रिपोर्टर : आप अलीगढ़ से हैं, कौन-सी जगह से…।
चाँद : जमालपुर।
जब हम क़ब्र को पहले से बुक करने के लिए सही भूखंड (ज़मीन के टुकड़े) का चयन करने के लिए क़ब्रिस्तान का दौरा कर रहे थे, तो हमने दो भूखंड देखे। जब दो भूखंडों के बारे में पूछा गया, तो चाँद ने कहा कि वे पहले ही बिक चुके हैं; लेकिन उनके परिवार से कोई भी अभी तक नहीं आया है।
रिपोर्टर : (कुछ ख़ाली दिख रही जगहों की तरफ़ इशारा करते हुए) …ये जो जगह हैं, सब बिकी हुई हैं?
चाँद : ये सब बिकी हुई हैं।
रिपोर्टर : (एक दूसरी जगह की तरफ़ इशारा करते हुए) …ये भी बिकी हुई है?
चाँद : हाँ; अभी तक यहाँ कोई आया नहीं है।
रिपोर्टर : एडवांस में?
फिर चाँद ने ‘तहलका’ रिपोर्टर को क़ब्रों के लिए एक और भूखंड (ज़मीन का टुकड़ा) दिखाया और आश्वास्त करते हुए कहा कि वह जो भूखंड उन्हें दिखा रहा है, उसमें तीन-चार क़ब्रें बन सकती हैं।
रिपोर्टर : अच्छा एक ये जगह है.?
चाँद : (एक क़ब्र के बराबर में जगह की तरफ़ इशारा करते हुए) ये क़ब्र है; इसके बराबर में एक ये जगह है।
रिपोर्टर : अच्छा; एक जगह ये है (एक और जगह की तरफ़ इशारा करते हुए)। …तो ये तो एक ही हुई ना!
चाँद : और हो जाएगी (क़ब्र के लिए दूसरी जगह का इंतज़ाम कराने का आश्वासन देते हुए)।
रिपोर्टर : तीन-चार हो जाएँगी?
चाँद ने ‘तहलका’ रिपोर्टर को बताया कि पुरानी दिल्ली के मुस्लिम उलेमा और अमीर लोग बड़ी संख्या में इस क़ब्रिस्तान में दफ़्न हैं।
रिपोर्टर : तो इस क़ब्रिस्तान में बड़े लोग दफ़्न होंगे? ..एमपी, एमएलए?
चाँद : उलेमा ज़्यादा हैं। …पुरानी दिल्ली के पैसे वाले लोग भी हैं।
अब चाँद ने ‘तहलका’ रिपोर्टर को बताया कि वह इस क़ब्रिस्तान को चलाने वाली मेवात फाउंडेशन कमेटी में नहीं हैं, बल्कि वह इस क़ब्रिस्तान का केयरटेकर है और वह क़ब्रों से मुर्दों को बदलने का काम भी करता है।
रिपोर्टर : कमेटी मेंबर हैं आप?
चाँद : नहीं; हम तो केयरटेकर हैं। ..कहाँ क्या करना है? कौन-सी मय्यत को चेंज करना है। (इशारा करते हुए)…इधर से निकालकर, इधर करना है..।
रिपोर्टर : अच्छा; मय्यत भी चेंज हो जाती है?
अब चाँद ने ‘तहलका’ रिपोर्टर को क़ब्र की अग्रिम बुकिंग की दर (क़ीमत) बतायी। उसने कहा कि वह एक क़ब्र के लिए 36,000 रुपये लेगा। चाहे वो जगह दरगाह के अंदर हो या बाहर। उसने ग्राहक बने रिपोर्टर से कहा कि यदि आप क़ब्र की स्थायी संरचना (पक्की क़ब्र) बनाएँगे, तो दर अलग होगी।
चाँद : दो जगह और हैं, वो भी देख लो।
रिपोर्टर : उसका क्या रेट होगा?
चाँद : रेट सब सेम है।
रिपोर्टर : अंदर, बाहर सब क्या है?
चाँद : 30 प्लस हैं।
रिपोर्टर : (आश्चर्य से) …हैं जी!
चाँद : 36,000। …खुदाई है, पत्थर, बॉक्स बनवाना…।
रिपोर्टर : 30,000 क़ब्र का और 6,000 ऊपर का, मिस्त्री-विस्त्री का। ..36,000 की एक क़ब्र?
चाँद : दफ़नाने तक; …उसके बाद कुछ करवाएँगे अलग से, तो उसका अलग चार्ज होगा।
रिपोर्टर : पक्का करवाएँगे…।
चाँद : जो भी करवाएँगे।
जब रिपोर्टर ने यह पूछा कि यदि आज हम एक निश्चित क़ीमत पर क़ब्र बुक करते हैं और मुर्दा तीन-चार साल बाद आता है, तो क्या क़ब्र का भाव बढ़ जाएगा या वही रहेगा? इसके जवाब में चाँद ने कहा कि वह क़ब्र की अग्रिम बुकिंग की रसीद (पर्ची) जारी करेगा। क़ब्र की क़ीमत वही रहेगी; लेकिन वो रसीद मुर्दे को दफ़नाने से पहले हमें (बुकिंग करने वाले को) दिखानी होगी।
रिपोर्टर : अच्छा; अगर हमने आज बुकिंग करवा ली और इंतिकाल हुआ तीन-चार साल बाद, तो क़ीमत बढ़ती है?
चाँद : हाँ, बदलेगी क्यों नहीं; बदलेगी।
रिपोर्टर : तो वो किस हिसाब से होगी?
चाँद : नहीं; आपको वो मतलब नहीं है। …आपके पास तो पर्ची होगी।
रिपोर्टर : आप स्लिप दे देंगे एडवांस बुकिंग की; …और आगे जो क़ीमत बदलेगी. वो भी हमको देनी होगी?
चाँद : नहीं; उसकी कोई ज़रूरत नहीं है। …हमने आपको आज एक चीज़ एक रेट पे दे दी…आगे जो भी रेट बढ़ेगा 10-5 हज़ार उससे हमें क्या; …आपने कोई बिजनेस करने के लिए थोड़ी ले रखी है।
जब ‘तहलका’ रिपोर्टर ने चाँद से पूछा कि क्या मैं कुछ टोकन मनी का भुगतान करने (बयाना देने) के बाद क़ब्र की अग्रिम बुकिंग की रसीद प्राप्त कर सकता हूँ? तो इसके जवाब में चाँद ने रिपोर्टर को बताया कि अग्रिम बुकिंग की रसीद पूरी रक़म चुकाने के बाद ही दी जाती है, या कम-से-कम हमें (ग्राहक बने रिपोर्टर को) उसे (चाँद को) 10,000 रुपये का एडवांस भुगतान करना होगा।
रिपोर्टर : तो अभी मैं कोई टोकन दे जाऊँ, रसीद काट दो आप?
चाँद : रसीद जब पूरा पैसा आता है, तब देते हैं।
रिपोर्टर : अब मैं आपको 1,000-2,000 दे दूँगा?
चाँद : कम-से-कम 10,000 तो देना होगा।
रिपोर्टर : तो रसीद कट जाएगी?
चाँद : इस टाइम तो वो भी नहीं कटेगी। …ऑफ़िस बंद हो गया अब। …सुबह 8:00 बजे से 1:00 बजे तक होता है।
अब चाँद ने रिपोर्टर को बताया कि उन्हें अपनी क़ब्रों की अग्रिम बुकिंग के लिए अपना आधार कार्ड देना होगा।
रिपोर्टर : तो चाँद साहब! हमें भी डॉक्युमेंट्स (दस्तावेज़: देने पड़ेंगे क्या? …हम जो एडवांस बुकिंग करवा रहे हैं क़ब्र की, उसके लिए डॉक्यूमेंट्स देने पड़ेंगे?
चाँद : हाँ।
रिपोर्टर : क्या-क्या?
चाँद : आधार की फोटो कॉपी।
जब ‘तहलका’ रिपोर्टर की चाँद से बातचीत चल रही थी, तभी दो आदमी आये और अपनी क़ब्र की अग्रिम बुकिंग के लिए 30,000 रुपये दिये।
रिपोर्टर : ये भी एडवांस बुकिंग हैं, जो दे गये हैं अभी पैसे?
चाँद : जी हाँ।
‘तहलका’ रिपोर्टर ने 72,000 रुपये में दो क़ब्रें बुक करने को कहा। रिपोर्टर ने जब पैसों में कुछ छूट माँगी, तो चाँद ने मना कर दिया। इस बार वह रिपोर्टर को फिर से क़ब्र बुक करने के लिए एक और जगह ज़मीन दिखाने शाह वलीउल्लाह दरगाह के पास ले गया; जो दफ़नाने के लिए एक प्रतिष्ठित स्थान है; जिसके लिए उसने पहले मना कर दिया था।
रिपोर्टर : कुछ कम नहीं होगा 72 हज़ार में?
चाँद : नहीं, चलिए हम आपको एक और जगह दिखाते हैं; …शायद वो आपको पसंद आ जाए।
रिपोर्टर : कल मैं आ जाता हूँ सुबह, क्योंकि अभी तो रसीद मिलेगी नहीं।
चाँद : कल ही लेना।
रिपोर्टर : दो क़ब्रों का 72 हज़ार हो गया हमारा?
चाँद : हाँ।
यह पहली बार नहीं है कि चाँद को क़ब्र की अग्रिम बुकिंग करते हुए कैमरे में क़ैद किया गया हो। 2020 में कोरोना-काल के दौरान भी हमने उनके साथ एक सौदा किया था और मेहंदियान क़ब्रिस्तान में 30,000 रुपये में अग्रिम क़ब्र बुक कराने गये थे और उसे पैसे दिये बिना ही वहाँ से चले गये। उस सौदे में भी चाँद ने हमें (तहलका रिपोर्टर को) पूरे 30,000 रुपये देने के बाद ही क़ब्र के लिए जगह देने का वादा किया था। उसने उस समय भी कहा था कि वह भुगतान के एवज़ में रसीद जारी करेगा, जिसे हमें मुर्दा दफ़्न करने के समय दिखाना होगा। इस बातचीत में ‘तहलका’ रिपोर्टर न केवल फ़र्ज़ी ग्राहक बनकर क़ब्र की एडवांस बुकिंग करवाने के लिए वहाँ गये, बल्कि चाँद से फ़र्ज़ी तौर पर यह भी कहा कि परिवार में किसी की मौत हो गयी है और वह उसे दफ़नाने के लिए मेहंदियान क़ब्रिस्तान आये हैं।
रिपोर्टर : एक इनके रिश्तेदार हैं, उनकी ख़्वाहिश यही है कि वो मेहंदियान में ही दफ़्न हों, तो उसके लिए कोई एडवांस देना पड़ेगा जगह के लिए?
चाँद : पूरा पैसा देना पड़ेगा।
रिपोर्टर : चाहे उनका कभी भी इंतिक़ाल हो?
चाँद : हाँ; उसके लिए हम आपको एक पर्ची देंगे, वो आप लेकर जाना, उसको सँभालकर रखना। जब भी ज़रूरत हो, आ जाना।
रिपोर्टर : और वो क़ब्र की जगह एडवांस में बुक हो जाएगी?
चाँद : उस टाइम पर जब भी आपको ज़रूरत पड़ेगी, तो लेबर चार्ज दो-ढाई हज़ार रुपया देना होगा।
रिपोर्टर : अच्छा; उसका हमें कितना एडवांस देना होगा?
चाँद : वही, 30 हज़ार।
रिपोर्टर : ठीक है।
उस बातचीत में रिपोर्टर के लिए क़ब्र आवंटित करने से पहले चाँद ने उनसे पूछा कि क्या उनके किसी रिश्तेदार को 20-22 साल पहले मेहंदियान क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया था? उस स्थिति में उनके अनुसार, उन्होंने हमारे (रिपोर्टर के) रिश्तेदार की क़ब्र खोदी होगी और दूसरे मृतकों को वहीं दफ़ना दिया होगा। लेकिन रिपोर्टर ने अपने रिश्तेदार के वहाँ दफ़्न होने की बात से मना कर दिया।
रिपोर्टर : वो मय्यत को लेकर आना था।
चाँद : कहाँ से?
रिपोर्टर : शंकरपुर कैंसर से मौत हुई है, घर पर। … डॉक्टर से इलाज चल रहा था। …एक-दो साल पहले डॉक्टर ने जवाब दे दिया था।
चाँद : लेडीज हैं जेंट्स? (महिला हैं पुरुष?)
रिपोर्टर : जेंट्स।
चाँद : जगह देख लीजिए यहाँ।
रिपोर्टर : अंदर नहीं मिल सकती?
चाँद : किसी की है, क्या आपके दादा-परदादा की?
रिपोर्टर : ना। …क्या अंदर नहीं मिल पाएगी जगह?
चाँद : अगर होती, आपके किसी दादा-परदादा की 20-22 साल पहले, तो उसको ख़ुदवा देते।
रिपोर्टर : कितना ख़र्चा होगा चाँद भाई!
चाँद : 30,000 रुपये। (एक जगह की तरफ़ इशारा करते हुए) …यही सबसे अच्छी जगह है।
अब क़ब्रिस्तान में हमारी मुलाक़ात मुश्ताक़ से हुई, जो पिछले 20-22 वर्षों से क़ब्रिस्तान में क़ब्र खोदने का काम कर रहा है। मेहंदियान क़ब्रिस्तान में क़ब्रों की एडवांस बुकिंग कितनी खुलेआम और बड़े पैमाने पर चल रही है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुश्ताक़ ने ‘तहलका’ रिपोर्टर को बताया कि क़ब्र की अग्रिम बुकिंग के बिना हम (रिपोर्टर या कोई भी) अपने मृतकों को क़ब्रिस्तान में दफ़्न नहीं कर सकते। उसने रिपोर्टर को क़ब्र की अग्रिम बुकिंग के लिए चाँद से संपर्क करने को कहा।
मुश्ताक़ : चाँद नाम है, ठेकेदार है यहाँ का।
रिपोर्टर : क़ब्र वो ही ख़ुदवाते हैं?
मुश्ताक़ : हाँ।
रिपोर्टर : ये मेंहदियान क़ब्रिस्तान है ना?
मुश्ताक़ : हाँ।
रिपोर्टर : कुछ क्या एडवांस वग़ैरह?
मुश्ताक़ : ये तो वो ही बताएँगे। …आपकी जगह यहाँ पहले से है?
रिपोर्टर : नहीं; हमारी नहीं है। …पहले जगह लेनी पड़ती है क्या?
मुश्ताक़ : (एक आते हुए लड़के की तरफ़ इशारा करते हुए) …लड़का आ रहा है, ये बताएगा।
मुश्ताक़ के अनुसार, शाह वलीउल्लाह दरगाह के अंदर क़ब्र के लिए ज़मीन महँगी है। उसने ‘तहलका’ रिपोर्टर को बताया कि वहाँ जगह लेने के लिए उन्हें एक लाख रुपये ख़र्च करने होंगे; वह भी अभी जगह उपलब्ध नहीं है।
रिपोर्टर : अंदर वाली जगह कितने की है, एक लाख की थी?
मुश्ताक़ : नहीं; …थी, अब ख़त्म हो गयी।
मुश्ताक़ ने बताया कि एक बार जब हम (रिपोर्टर) क़ब्र पहले से बुक कर लेंगे, तो कोई भी उसका इस्तेमाल नहीं कर सकेगा। ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने 10 साल पहले ही क़ब्र बुक करा ली थी।
मुश्ताक़ : एक बार जगह मोल ले लोगे, तो हमेशा तुम्हारी हो जाएगी; कोई और नहीं आएगा।
रिपोर्टर : मतलब कि एडवांस बुकिंग करवानी पड़ती है, तब दफ़्न होगा।
मुश्ताक़ : हाँ।
रिपोर्टर : मतलब, एक साल पहले भी करा सकते हैं लोग एडवांस?
मुश्ताक़ : 10-10 साल पहले भी करा लेते हैं लोग।
रिपोर्टर : आप क्या करते हो?
मुश्ताक़ : क़ब्र खोदते हैं।
रिपोर्टर : कितने साल हो गये?
मुश्ताक़ : 20-22 साल।
रिपोर्टर : कितना पैसा मिलता है आपको?
मुश्ताक़ : 400 रुपये।
रिपोर्टर : एक क़ब्र का?
इस सवाल का जवाब न देकर मुश्ताक़ ने ‘तहलका’ रिपोर्टर को बताया कि लोग क़ब्रों की थोक बुकिंग करा रहे हैं।
रिपोर्टर : (कुछ ख़ुदी हुई क़ब्रों की तरफ़ इशारा करते हुए) …ये जो आगे वाली क़ब्रें हैं, ये आपने खोदी हैं?
मुश्ताक़ : हाँ।
रिपोर्टर : ये सारी एडवांस बुकिंग वाली हैं?
मुश्ताक़ : सारी नहीं। अब जैसे तुम आये हो, …अब जैसे तुम आ गये हो यहाँ; तो हम…., तीन की ले लो, चार की ले लो जगह।
रिपोर्टर : बिना जगह लिये दफ़ना नहीं सकते?
मुश्ताक़ : हाँ।
इसके बाद मुश्ताक़ ने ‘तहलका’ रिपोर्टर को पप्पू नाम के एक और आदमी से मिलवाया। पप्पू पिछले 10-12 वर्षों से इस क़ब्रिस्तान में राजमिस्त्री का काम कर रहा है और पक्की क़ब्रें तैयार कर रहा है। उसने भी रिपोर्टर से 30,000 रुपये की अग्रिम धनराशि देकर क़ब्र बुक करने को कहा।
रिपोर्टर : कबसे कर रहे हो आप ये काम?
पप्पू : 10-12 साल हो गये। …मेरा है मिस्त्री का काम। …क़ब्र को पक्का बनाते हैं।
रिपोर्टर : आप यहाँ रहते हो क़ब्रिस्तान में?
पप्पू : हाँ।
रिपोर्टर : आप मुझे टोटल ख़र्चा बता दो?
पप्पू : टोटल यहाँ का 30,000 आ जाएगा, …और वैसे आप जाइए चाँद भाई बैठे हुए हैं। उनसे बात कर लीजिए, (मोबाइल) नंबर दे रहा हूँ।
रिपोर्टर : क्या हैं वो?
पप्पू : यहाँ के मेन ही समझो।
रिपोर्टर : ये मेवात फाउंडेशन किसकी है?
पप्पू : उन्हीं की है।
मेहंदियान क़ब्रिस्तान में क़ब्रों की अग्रिम बुकिंग पर टिप्पणी करते हुए प्रसिद्ध इस्लामिक स्कॉलर डॉ. मक़सूद उल हसन क़ासमी कहते हैं- ‘मेहंदियान क़ब्रिस्तान में चल रही यह धाँधली बहुत-ही चौंकाने वाली प्रथा है। इसे तुरंत बंद किया जाना चाहिए। पूरी जगह पर अवैध क़ब्ज़ाधारियों ने क़ब्ज़ा कर रखा है और इसे उनसे मुक्त कराया जाना चाहिए।’
‘मेहंदियान भारत का एक ऐतिहासिक क़ब्रिस्तान है, जहाँ प्रसिद्ध इस्लामिक उलेमा शाह वलीउल्लाह देहलवी की दरगाह स्थित है। हर मुसलमान को इंतिक़ाल के बाद वहाँ दफ़्न होने पर फ़ख़्र (गर्व) होता है। क़ब्रों की अग्रिम बुकिंग से एकत्र किया गया पैसा कहाँ जा रहा है? इसकी जाँच होनी चाहिए।’ -डॉ. क़ासमी कहते हैं।
उन्होंने ‘तहलका’ रिपोर्टर को बताया कि भारत में सभी क़ब्रिस्तान वक़्फ़ बोर्ड के अंतर्गत आते हैं और मेहंदियान क़ब्रिस्तान भी वक़्फ़ बोर्ड की संपत्ति है। उन्होंने कहा कि वक़्फ़ बोर्ड के पदाधिकारियों को मेहंदियान में इस अग्रिम बुकिंग प्रथा पर तुरंत रोक लगानी चाहिए। एक अन्य इस्लामिक स्कॉलर ख़ालिद सलीम ने ‘तहलका’ रिपोर्टर को बताया कि क़ब्रों की अग्रिम बुकिंग अवैध है और मेहंदियान क़ब्रिस्तान वास्तव में वक़्फ़ बोर्ड की संपत्ति है।
सलीम ने बताया कि अली मोहम्मद शेर-ए-मेवात फाउंडेशन की शुरुआत इस्लामिक नेता अली मोहम्मद ने की थी, जो हरियाणा के मेवात से आये थे और दिल्ली के मेहंदियान में बस गये थे। उन्होंने बताया कि वह राजनीतिक रूप से जुड़े हुए व्यक्ति थे और इंदिरा गाँधी सहित उस समय के कांग्रेस नेताओं के साथ उनके घनिष्ठ सम्बन्ध थे। उन्होंने कहा कि इसी फाउंडेशन के बैनर तले उन्होंने भूमि पर नियंत्रण हासिल किया था।
मुस्लिम क़ब्रिस्तानों की तो बात ही क्या करें, ईसाई क़ब्रिस्तानों को भी इसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। क़ब्रों की बढ़ती संख्या और क़ब्रिस्तानों में कम पड़ती जगह के कारण माँग बढ़ रही है। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ रही है, मरने वालों को दफ़नाने के लिए जगह की तेज़ी से कमी पड़ती जा रही है। मुर्दों को दफ़्न करना सचमुच एक गंभीर मामला बन गया है, ख़ासकर ग़रीबों के लिए। कई शहरों से क़ब्रों की अग्रिम बुकिंग की ख़बरें आ रही हैं, फिर भी इस प्रथा को रोकने के लिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, टीडीपी नेता मोहम्मद अहमद ने हैदराबाद में वक़्फ़ बोर्ड के अधिकारियों को ऐसे अवैध सौदों के बारे में सूचित किया; लेकिन इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गयी। इसके अलावा इस तरह के गंभीर सौदों में धोखाधड़ी के आरोप भी बड़े पैमाने पर लग रहे हैं। एक व्यक्ति ने दावा किया कि उसके पिता ने एक क़ब्र बुक करायी थी; लेकिन जब उनका इंतिक़ाल हुआ, तो पता चला कि क़ब्रिस्तान के देखभालकर्ता ने उस जगह को किसी और को बेच दिया है। इससे भी ग़लत यह रहा कि उसने हमें पैसे वापस करने से भी इनकार कर दिया। सूत्रों से यह भी पता चला है कि जब 2004 में भाजपा नेता सिकंदर बख़्त का इंतिक़ाल हुआ, तो उन्हें एक ऐसी क़ब्र में दफ़नाया गया, जिसकी बुकिंग पहले ही 75,000 रुपये में हो चुकी थी। बाद में यह राशि पहले वाले मूल ख़रीदार को वापस कर दी गयी।
अब जबकि सरकार यह सुनिश्चित करने पर ज़ोर दे रही है कि वक़्फ़ संशोधन विधेयक-2024 संसद के दोनों सदनों से पारित हो जाए, तो उम्मीद है कि मुस्लिम क़ब्रिस्तानों के बारे में ‘तहलका’ की यह पड़ताल, जहाँ वक़्फ़ संपत्ति होने के बावजूद क़ब्रें पहले ही बेच दी जाती हैं; अधिकारियों का ध्यान आकर्षित करेगी और इस तरह की ग़ैर-क़ानूनी चलन के ख़िलाफ़ त्वरित कार्रवाई करेगी।
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बुधवार को लोकसभा में वक्फ संशोधन विधेयक पेश किया। विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए किरेन रिजिजू ने कहा, “ऑनलाइन, ज्ञापन, अनुरोध और सुझाव के रूप में कुल 97,27,772 याचिकाएं प्राप्त हुई हैं। 284 डेलिगेशन ने कमेटी के सामने अपनी बात रखी और सुझाव दिए। सरकार ने उन सभी पर ध्यानपूर्वक विचार किया है, चाहे वे जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) के माध्यम से हों या सीधे दिए गए ज्ञापन। इतिहास में पहले कभी किसी विधेयक को इतनी बड़ी संख्या में याचिकाएं नहीं मिली हैं।
कई लीगल एक्सपर्ट, कम्युनिटी लीडर्स, धार्मिक लीडर्स और अन्य लोगों ने कमेटी के सामने अपने सुझाव रखे। पिछली बार जब हमने बिल पेश किया था, तब भी कई बातें बताई थी। मुझे उम्मीद ही नहीं, यकीन है कि जो इसका विरोध कर रहे थे, उनके हृदय में बदलाव होगा और वे बिल का समर्थन करेंगे। मैं मन की बात कहना चाहता हूं, किसी की बात को कोई बदगुमां न समझे कि जमीं का दर्द कभी आसमां न समझे।”
किरेन रिजिजू ने आगे कहा, “साल 2013 में यूपीए सरकार ने वक्फ बोर्ड को ऐसा अधिकार दिया कि वक्फ बोर्ड के आदेश को किसी सिविल अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। अगर यूपीए सरकार सत्ता में होती तो संसद इमारत, एयरपोर्ट समेत पता नहीं कितनी इमारतों को वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया जाता। साल 2013 में मुझे इस बात पर बहुत आश्चर्य हुआ कि इसे कैसे जबरन पारित किया गया। 2013 में वक्फ अधिनियम में प्रावधान जोड़े जाने के बाद, दिल्ली में 1977 से एक मामला चल रहा था, जिसमें सीजीओ कॉम्प्लेक्स और संसद भवन सहित कई संपत्तियां शामिल थीं। दिल्ली वक्फ बोर्ड ने इन पर वक्फ संपत्ति होने का दावा किया था। मामला अदालत में था, लेकिन उस समय यूपीए सरकार ने सारी जमीन को डीनोटिफाई करके वक्फ बोर्ड को सौंप दिया। अगर हमने आज यह संशोधन पेश नहीं किया होता, तो हम जिस संसद भवन में बैठे हैं, उस पर भी वक्फ संपत्ति होने का दावा किया जा सकता था।”
उन्होंने कहा, “किसी ने कहा कि ये प्रावधान गैर संवैधानिक हैं। किसी ने कहा कि गैर-कानूनी हैं। यह नया विषय नहीं है। आजादी से पहले पहली बार बिल पास किया गया था। इससे पहले वक्फ को इनवैलिडेट (अवैध करार) किया गया था। 1923 में मुसलमान वक्फ एक्ट लाया गया था। ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी का आधार देते हुए एक्ट पारित किया गया था।” उन्होंने कहा, “1995 में पहली बार वक्फ ट्रिब्यूनल का प्रावधान किया गया था। इससे वक्फ बोर्ड द्वारा लिए गए किसी भी फैसले से असंतुष्ट व्यक्ति वक्फ ट्रिब्यूनल में उसे चुनौती दे सकता था। यह पहली बार था जब ऐसी व्यवस्था स्थापित की गई थी। उस समय यह भी तय किया गया था कि अगर किसी वक्फ संपत्ति से 5 लाख रुपए से ज्यादा की आय होती है, तो सरकार उसकी निगरानी के लिए एक कार्यकारी अधिकारी नियुक्त करेगी। यह व्यवस्था भी 1995 में ही शुरू की गई थी। आज यह मुद्दा इतना तूल क्यों पकड़ रहा है?”
विधेयक को सदन में पेश करते ही विपक्षी दलों ने विरोध शुरू कर दिया। कांग्रेस ने विधेयक के खिलाफ अपनी आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया कि उन्हें विधेयक की प्रति देर से प्राप्त हुई, जिसके कारण उन्हें समीक्षा के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला। कांग्रेस के नेताओं ने चर्चा के दौरान कहा कि सरकार ने इस महत्वपूर्ण विधेयक को जल्दबाजी में पेश किया है और विपक्ष को इस पर चर्चा के लिए उचित अवसर नहीं दिया गया। विधेयक पेश होने के बाद सदन में हंगामे की स्थिति देखी गई, क्योंकि विपक्षी सांसदों ने अपनी नाराजगी जाहिर की। लोकसभा में कांग्रेस के उपनेता गौरव गोगोई ने कांग्रेस पार्टी की ओर से चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा कि जेपीसी ने आवश्यक विचार-विमर्श नहीं किया। शुरू से ही सरकार का इरादा एक ऐसा कानून पेश करने का रहा है जो असंवैधानिक, अल्पसंख्यक विरोधी और राष्ट्रीय सद्भाव को बाधित करने वाला है।
वक़्फ़ (संशोधन) विधेयक को मार्च महीने की शुरुआत में लोकसभा में पेश किया जाना था; लेकिन वह सरकार की राजनीतिक मजबूरियों के कारण अटकता नज़र आ रहा है। जनता दल (यू) और तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा) जैसे सहयोगी दल कम-से-कम बिहार विधानसभा चुनाव तक विधेयक को पारित नहीं होने देना चाहते, इसलिए सरकार ने लोकसभा में बहुमत होने के बावजूद संशोधित रूप में इसे पेश करने में देरी की है। ऐसा लगता है कि सरकार विपक्ष और सहयोगी दलों के साथ टकराव का एक और दौर नहीं चाहती।
हालाँकि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने संसदीय पैनल द्वारा हाल ही में सुझाये गये बदलावों को शामिल करते हुए वक़्फ़ संशोधन विधेयक में प्रस्तावित संशोधनों को मंज़ूरी दे दी है, जिससे इस पर चर्चा और पारित होने का रास्ता साफ़ हो गया है। इसे 10 मार्च के बाद कभी भी पेश किया जाना था। लेकिन अब बजट सत्र 03 अप्रैल को समापन की ओर बढ़ रहा है तथा रमज़ान का महीना शुरू होने और जल्द ही ईद पड़ने के कारण सरकार अल्पसंख्यकों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला कोई और क़दम उठाने के लिए इच्छुक नहीं है।
भाजपा द्वारा मुसलमानों को 32 लाख ‘सौग़ात-ए-मोदी’ किट वितरित करने के साथ, संदेश स्पष्ट है- कोई भी वक़्फ़ विधेयक कम-से-कम इस बजट सत्र में पेश होने पर भी पारित नहीं होगा। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा लोकसभा में पेश किये जाने के बाद अगस्त 2024 में विधेयक को जेपीसी के पास भेजा गया था। संसदीय पैनल ने बहुमत के साथ रिपोर्ट को अपना लिया, जबकि पैनल में विपक्षी दलों के सभी 11 सांसदों ने रिपोर्ट पर आपत्ति जतायी थी। उन्होंने असहमति नोट भी पेश किये थे। पैनल द्वारा इस महीने की शुरुआत में संसद के दोनों सदनों में 655 पृष्ठों की रिपोर्ट पेश की गयी थी।
विलियम शेक्सपियर ने ‘जूलियस सीज़र’ में लिखा था कि ‘सीज़र की पत्नी को संदेह से परे होना चाहिए।’ यह पंक्ति इस अपेक्षा को रेखांकित करती है कि अधिकार के पदों पर बैठे लोगों को अनुचित कार्यों की थोड़ी-सी झलक से भी दूर रहना चाहिए। यह सिद्धांत न्यायपालिका में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, जहाँ विश्वास और निष्ठा न्याय की नींव तैयार करते हैं। हालाँकि हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के सरकारी आवास के एक स्टोर रूम में कथित रूप से बेहिसाब नक़दी मिलने से गंभीर चिन्ता पैदा हो गयी है। सर्वोच्च न्यायालय ने पारदर्शी और त्वरित जाँच के लिए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति शील नागू, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी.एस. संधावालिया और कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अनु शिवरामन की सदस्यता वाली एक जाँच समिति बनायी है।
न्यायमूर्ति वर्मा, जिन्हें अक्टूबर, 2014 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में नियुक्त किया गया था और अक्टूबर, 2021 में दिल्ली उच्च न्यायालय में स्थानांतरित किया गया था; 2031 में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। अगर उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत किया जाता है, तो उस स्थिति में उनका कार्यकाल 2034 तक बढ़ जाएगा। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा प्रस्तुत जाँच रिपोर्ट को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराकर एक अभूतपूर्व क़दम उठाया है। रिपोर्ट के निष्कर्ष कि ‘पूरे मामले की गहन जाँच की आवश्यकता है’ ने जाँच को और भी तीव्र कर दिया है। इसके अलावा अभी भी सुलगते हुए स्टोर रूम में जले हुए नोटों के ढेर को इकट्ठा करते हुए एक फायर फाइटर की छोटी वीडियो रिकॉर्डिंग इस मामले में रहस्य का तत्त्व जोड़ती है।
इस विवाद के मूल में न्यायपालिका की विश्वसनीयता और निष्ठा निहित है। न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा है कि न तो वह और न ही उनके परिवार के सदस्य नक़दी रखने के लिए ज़िम्मेदार हैं। इससे गंभीर प्रश्न उठता है कि क्या पैसा उनकी जानकारी के बिना वहाँ रखा गया था? अगर ऐसा है, तो क्या यह न्यायमूर्ति की प्रतिष्ठा को धूमिल करने और उन्हें फँसाने की एक बड़ी साज़िश का हिस्सा है? अगर इसमें कोई गड़बड़ी शामिल है, तो इसे किसने अंजाम दिया?
न्याय के संरक्षक होने के नाते न्यायपालिका को किसी भी प्रकार की अस्पष्टता नहीं रहने देनी चाहिए। न्यायपालिका से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं का यह पहला मामला नहीं है। मार्च, 2025 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति निर्मल यादव को एक अन्य न्यायाधीश के आवास पर मिले 15 लाख रुपये से जुड़े 17 साल पुराने भ्रष्टाचार के मामले में बरी कर दिया गया। इसी तरह सन् 2019 में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न के आरोपों ने गंभीर चिन्ता पैदा कर दी थी, जब उन्होंने अपने स्वयं के मामले की कार्यवाही में भाग लिया था, जिसके कारण आंतरिक समिति ने आरोपों को ख़ारिज कर दिया था। इसी तरह सन् 2020 में आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी द्वारा न्यायमूर्ति एन.वी. रमना के ख़िलाफ़ लगाये गये आरोपों को एक आंतरिक जाँच के माध्यम से निपटाया गया था, जिसके निष्कर्षों का कभी ख़ुलासा नहीं किया गया।
इस मामले में खुलेपन के महत्व को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अंतत: न्यायपालिका को उच्चतम नैतिक मानदंडों को क़ायम रखना चाहिए तथा यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न्याय न केवल हो, बल्कि न्याय होता हुआ दिखे भी। इस मामले का परिणाम भारतीय न्यायिक प्रणाली की ईमानदारी, निष्पक्षता और पारदर्शिता के प्रति प्रतिबद्धता के लिए एक महत्त्वपूर्ण लिटमस टेस्ट के रूप में काम करेगा।