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अग्निशमन के अधूरे इंतज़ाम

18 मई की सुबह हैदराबाद के ऐतिहासिक चार मीनार स्थल से महज़ 100 मीटर की दूरी पर स्थित गुलजार हाउस की एक इमारत में लगी भीषण आग से आठ बच्चों सहित 17 लोगों की मौत हो गयी। अग्नि विभाग की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार, आग शॉर्ट सर्किट की वजह से 18 मई की सुबह क़रीब 5:30 बजे लगी, जब अधिकांश निवासी सो रहे थे।

ग़ौरतलब है कि गुलजार हाउस हैदराबाद की एक बहुत पुरानी इमारत है और यह हैदराबाद की संकरी गलियों में स्थित है। यह इलाक़ा मोती निर्मित गहनों के कारण दुनिया भर में अपनी एक ख़ास पहचान रखता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह आग वहाँ कई दशकों से बसे एक परिवार की मोती की दुकान में लगी, जिसका घर दुकान की ऊपर वाली मंज़िल पर था। इस हादसे में मरने वाले 17 सदस्य एक ही परिवार के थे और धुएँ में दम घुटने से उनकी मौत हुई। तेलंगाना राज्य सरकार ने इस आग-दुर्घटना की व्यापक जाँच के लिए छ: सदस्यीय समिति का गठन किया है। देश में रिहायशी भवनों, झुग्गी-झोंपड़ियों, अस्पतालों, स्कूलों, औद्योगिक भवनों में आग लगने की घटनाएँ अक्सर सुनने को मिलती हैं, जिनसे लोगों की जान और माल को ख़तरा होता है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की दिसंबर, 2023 को प्रकाशित रिपोर्ट ‘एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया 2022’ के अनुसार, वर्ष 2022 में देश की आग लगने की 7,566 घटनाओं में 7,435 लोगों की जान गयी। इनमें से आधी से अधिक मौतें आवासीय इमारतों और घरों में आग लगने की वजह से हुई हैं। एनसीआरबी के आँकड़े दर्शाते हैं कि देश में आग की दुर्घटनाओं में कमी आयी है और इससे होने वाली मौतें भी 1996 में 27,561 से घटकर 2022 में 7,435 हो गयी हैं; लेकिन अग्नि-सुरक्षा पर काम करने वाले एक नागरिक समूह बियोन्ड कार्लटन का मानना है कि इन आँकड़ों की क्रॉस चेकिंग की ज़रूरत है। बियोन्ड कार्लटन ने 15 फरवरी, 2025 को ‘भारत में अग्नि-सुरक्षा कार्लटन से परे परिप्रेक्ष्य’ नामक एक रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बर्न रजिस्ट्री, अस्पताल डाटा और अग्निशमन विभाग जैसे अन्य डाटा स्रोतों का उपयोग करके ही सही डाटा का पता लगाया जा सकता है। रिपोर्ट में अन्य विसंगतियों की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। जैसे- मौतों की संख्या की तुलना में घायलों की संख्या बेहद कम लगती है। यही नहीं, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो पुलिस से डेटा एकत्र करता है, न कि अग्निशमन सेवाओं से। भारत सरकार के पास उपलब्ध अग्निशमन केंद्रों और अग्निशमन कर्मियों का नवीनतम डाटा 2018 का है, जो संसाधनों की भारी कमी को दर्शाता है।

दरअसल मानव बस्तियों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों आदि में आग की घटनाओं की वजहें हैं- ज़्यादातर रसोई में ईंधन इस्तेमाल में लापरवाही, बिजली से जुड़ी लापरवाही और शॉर्ट सर्किट, धूम्रपान और खुले में आग जलाना, उद्योगों में हानिकारक रसायन और ज्वलनशील पदार्थों का ग़ैर-ज़िम्मेदाराना इस्तेमाल करना और आग से जुड़े सुरक्षा-उपायों को नज़रअंदाज़ करना। यूँ तो राष्ट्रीय भवन संहिता (एनबीसी), 2016 में संरचनाओं के निर्माण, रखरखाव और अग्नि-सुरक्षा के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश शामिल हैं, जिनमें प्रमुख घातक आग के ख़तरे को कम करने वाली डिजाइन और सामग्रियों के संदर्भ में बताया गया है कि दीवारों, छत, अग्नि-निकास आदि में उपयोग की जाने वाली अग्नि-प्रतिरोधी सामग्रियों का इस्तेमाल करना। एनसीबी यह भी सुनिश्चित करती है कि इमारतों में आग लगने की सूरत में सचेत करने और इसे बुझाने से सम्बन्धित प्रौद्योगिकियों को शामिल किया जाए। जैसे-आग का पता लगाने के लिए स्वचालित अलार्म प्रणाली, पानी के छिड़काव के लिए स्वचालित स्प्रे, फायरमैन लिफ्ट, अग्नि-अवरोधक आदि। लेकिन सबसे मुख्य सवाल यह है कि देश में ज़रूरत के अनुपात में अग्निशमन केंद्रों और अग्निशमन कर्मियों की कमी है। इस पर सरकार कब ध्यान देगी? इसके साथ ही एनसीबी के दिशा-निर्देशों पर अमल करने में अक्सर जो उदासीनता नज़र आती है, उस नज़रिये में गंभीरता नज़र आनी चाहिए। अक्सर कार्रवाई करने वाले सरकारी कर्मचारी, अधिकारी अपनी जेबें गर्म करने के चक्कर में अग्नि-सुरक्षा के मानकों का निरीक्षण करने, अग्निशमन सम्बन्धित नियमों, दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करने वालों के प्रति कठोर कार्रवाई करने से बचते हैं। जिस तरह से जलवायु परिवर्तन के कारण धरती अब पहले की अपेक्षा साल-दर-साल अधिक गर्म हो रही है और इंसान की एयरकंडीशनर पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, इंसान के व्यवहार में बदलाव की यह प्रक्रिया भी आग लगने की घटनाओं में वृद्धि का एक कारण सामने आया है।

आग की घटनाएँ कम-से-कम हों और उनमें जान-माल की हानि भी बहुत कम हो, इसके लिए चौतरफ़ा अभियान और बेहतर प्रयासों की ज़रूरत है। स्कूलों, दफ़्तरों और रिहायशी इलाक़ों में इससे बचाव, अग्निशमन उपकरणों के इस्तेमाल की जानकारी सम्बन्धित अभियान बराबर चालू रहने चाहिए। अग्निशमन उपकरणों के रखरखाव के प्रति सम्बन्धित विभागों को सचेत रहना, सरकार का अग्निशमन विभागों के आधुनिकीकरण के लिए अधिक वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना। भारत, जहाँ दुनिया की सबसे अधिक आबादी है; शहरीकरण की प्रक्रिया की रफ़्तार बहुत तेज़ है। शहरों में आबादी का घनत्व बढ़ रहा है, ऐसे में सरकार और समाज दोनों को मिलकर ठोस काम करने की ज़रूरत है।

यूक्रेन का रूस पर सबसे बड़ा ड्रोन हमला

यूक्रेन और रूस के बीच जारी संघर्ष ने एक नया और खतरनाक मोड़ ले लिया। रूस ने जहां यूक्रेन के कई शहरों पर लगातार 9 घंटे तक मिसाइल और ड्रोन से भीषण हमले किए, वहीं यूक्रेन ने जवाबी कार्रवाई करते हुए रूस के भीतर अब तक का सबसे बड़ा ड्रोन ऑपरेशन चलाया। यूक्रेनी सेना ने दावा किया है कि उसने रूस के 4 एयरबेस को निशाना बनाते हुए बम गिराए और कम से कम 40 से अधिक बमवर्षक विमानों को नष्ट कर दिया।

रूस द्वारा यूक्रेन पर किए गए हमलों के कुछ ही घंटों बाद, यूक्रेन ने रूस के सुदूर साइबेरिया क्षेत्र में एक जबर्दस्त ड्रोन हमला कर पलटवार किया। इसे इस युद्ध की अब तक की सबसे बड़ी ड्रोन कार्रवाई बताया जा रहा है।

शनिवार देर रात रूस ने कीव, खारकीव, ओडेसा, ज़ापोरिज्जिया और दनिप्रोपेत्रोव्स्क समेत यूक्रेन के कई शहरों को मिसाइलों और ड्रोन से निशाना बनाया। एक सैन्य प्रशिक्षण केंद्र पर हुए हमले में 12 लोगों की मौत हो गई और 60 से अधिक घायल हो गए। नागरिक क्षेत्रों, घरों, बैंक शाखाओं और गोदामों को भी नुकसान पहुंचा। कीव में दर्जनों मकान क्षतिग्रस्त हो गए, हालांकि जानहानि की कोई खबर नहीं है। यूक्रेन का कहना है कि रूस ने लगभग 9 घंटे तक हवाई हमले जारी रखे।

रूसी हमलों के कुछ ही घंटों के भीतर, यूक्रेन ने रूस के चार सैन्य एयरबेस पर ड्रोन हमले किए। यूक्रेनी मीडिया और रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, यह हमला रूस के अंदरूनी हिस्से साइबेरिया तक पहुंचा। यूक्रेनी सेना ने दावा किया कि पहला हमला साइबेरिया में एक रूसी सैन्य इकाई पर किया गया। इसके बाद बेलाया और ओलेन्या एयरबेस सहित चार ठिकानों पर एक साथ हमले किए गए। इन हमलों में कम से कम 40 रूसी बमवर्षक विमानों को तबाह कर दिया गया, जिनमें रूस के अत्याधुनिक Tu-95 और Tu-22M3 जैसे बमवर्षक विमान शामिल हैं। यूक्रेन के इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है, लेकिन इस घटना ने निश्चित रूप से दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है।

गिरता ही जा रहा शिक्षा का स्तर

शिक्षा इंसान को समझदार ही नहीं बनाती, बल्कि पैसा कमाने लायक बनाने के अलावा उसे ज़िन्दगी जीने का तरीक़ा भी सिखाती है। लेकिन आज जब पूरी दुनिया विज्ञान में हैरान कर देने वाले चमत्कारिक प्रयोग कर रही है, तब दुनिया के पहले शिक्षित देश और विश्व गुरु कहलाने वाले हिंदुस्तान में शिक्षा का स्तर बेहद गिरता जा रहा है। सवाल यह है कि शिक्षा के इस गिरते स्तर के लिए ज़िम्मेदार कौन है? मेरे ख़याल से इसके लिए किसी एक को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। क्योंकि इसके लिए कोई एक व्यक्ति या एक समाज ज़िम्मेदार है भी नहीं। मसलन, शिक्षा के गिरते स्तर के लिए न सिर्फ़ शिक्षक ज़िम्मेदार हैं, न सिर्फ़ विद्यार्थी ज़िम्मेदार हैं, न सिर्फ़ समाज  ज़िम्मेदार है, न सिर्फ़ शिक्षा पद्धति ज़िम्मेदार है और न सिर्फ़ सरकारें ज़िम्मेदार हैं, बल्कि ये सब इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। और इनके अलावा मोबाइल, नशा, अपराध, क़ानून व्यवस्था, ख़ासतौर पर शिक्षा के लिए बनी क़ानून व्यवस्था भी ज़िम्मेदार हैं। लेकिन फिर भी अगर यह तय किया जाए कि शिक्षा के गिरते स्तर के लिए सबसे बड़ा ज़िम्मेदार कौन है? तो इसमें पाँच बड़े ज़िम्मेदार नज़र आएँगे। पहले नंबर पर सरकारें, दूसरे नंबर पर शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा के लिए बना क़ानून, तीसरे नंबर पर शिक्षक, चौथे नंबर पर पैरेंट्स और पाँचवें नंबर पर विद्यार्थी। बाक़ी सब चीज़ें इनकी वजह से ही शिक्षा में अड़चन और हानिकारक बनती नज़र आती हैं।

बहरहाल, अभी हाल ही में पूरे देश में बोर्ड परीक्षाओं के रिजल्ट घोषित हुए हैं। सबसे पहले सरकारी नौकरी के लिए सबसे प्रमुख परीक्षा यूपीएससी का रिजल्ट घोषित हुआ और उसके बाद 10वीं और 12वीं बोर्ड की परीक्षाओं के रिजल्ट घोषित हुए। लेकिन जिस प्रकार से हरियाणा बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन के 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों का इस बार का रिजल्ट ख़राब रहा है, वो बेहद चौंकाने वाला और शर्मनाक है। हरियाणा बोर्ड में 12वीं में कुल 85.66 फ़ीसदी विद्यार्थी ही पास हुए हैं, जबकि कई स्कूलों का रिजल्ट काफ़ी निराशाजनक रहा है।

इससे भी हैरत की बात ये है कि हरियाणा के 18 स्कूल ऐसे हैं, जहाँ 12वीं का एक भी विद्यार्थी पास नहीं हो सका है। हरियाणा बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन ने इसे देखते हुए राज्य के इंटरमीडिएट स्कूलों का आकलन किया है, जिसमें 100 ऐसे स्कूल पाये गये हैं, जहाँ विद्यार्थियों का परीक्षा रिजल्ट बेहद ख़राब औसतन महज़ 35 फ़ीसदी ही रहा है। और जिस प्रकार से हरियाणा बोर्ड के 18 स्कूलों में एक भी 12वीं का विद्यार्थी पास नहीं हुआ है, उनकी स्थिति तो हरियाणा बोर्ड ही नहीं, हरियाणा सरकार को बताने में भी शर्म आ रही है। हरियाणा बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन के अध्यक्ष डॉ. पवन कुमार कह रहे हैं कि अधिकांश ऐसे स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या भी बहुत कम थी, कुछ जगहों पर केवल एक या दो विद्यार्थी ही थे। लेकिन जहाँ कम विद्यार्थी थे, वहाँ का तो रिजल्ट और अच्छा आना चाहिए; क्योंकि ऐसे में विद्यार्थियों को पढ़ने में आसानी रहती है और अपने अध्यापक से सवाल पूछने या अच्छी तरह पढ़ाई करने का मौक़ा भी ख़ूब रहता है। हालाँकि उन्होंने ये स्वीकार किया है कि परिणाम निराशाजनक रहे। उन्होंने कुल 13 विद्यार्थियों वाले एक स्कूल का उदाहरण भी दिया, जहाँ सभी विद्यार्थी फेल हो गये। इसके साथ ही बोर्ड ने इस प्रकार के ख़राब रिजल्ट आने पर चिन्ता व्यक्त करते हुए सुझाव दिया है कि ख़राब रिजल्ट वाले स्कूलों के अध्यापकों के ख़िलाफ़ कड़े क़दम उठाये जाने चाहिए और सम्बन्धित शिक्षा निदेशालय को इन स्कूलों और अध्यापकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए एक रिपोर्ट भी सौंप दी है।

बहरहाल, स्कूलों के ख़िलाफ़ और पढ़ाने वाले अध्यापकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी ही चाहिए; लेकिन क्या इसके लिए विद्यार्थी ज़िम्मेदार नहीं हैं? क्या उन विद्यार्थियों के माँ-बाप ज़िम्मेदार नहीं हैं? और क्या सरकार इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं है? क्या इसके लिए लचर क़ानून व्यवस्था ज़िम्मेदार नहीं है? मेरे कहने का मतलब यह है कि शिक्षा के गिरते स्तर और विद्यार्थियों की अवारागर्दी, माँ-बाप की लापरवाही, अध्यापकों की लापरवाही और क़ानूनी मजबूरी भी, स्कूल प्रबंधन की ढिलाई, शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा बजट को लेकर सरकार की कमी और विद्यार्थियों के पक्ष में बने लचर क़ानून की भी कमी ही है, जिसके चलते इतना ख़राब रिजल्ट हरियाणा बोर्ड में 12वीं के विद्यार्थियों का आया, जो इससे पहले कभी नहीं आया होगा। अध्यापकों की मजबूरी यह है कि वे विद्यार्थियों को क्लास में न आने या न पढ़ने पर पीट नहीं सकते। उन पर बहुत सख़्ती नहीं कर सकते। साल 2014 में केंद्र की सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने साल 2015 में ही किशोर न्याय अधिनियम-2015 लागू किया, जिसके तहत अध्यापक यदि बच्चों को न पढ़ने या शैतानी करने पर मारपीट नहीं सकता और न पढ़ने के लिए ज़्यादा दबाव बना सकता है।

अगर कोई अध्यापक ऐसा करता है, तो विद्यार्थी के पैरेंट्स उस अध्यापक के ख़िलाफ़ इस क़ानून की धारा-82 के तहत थाने में एफआईआर दर्ज करा सकते हैं, जिससे अध्यापक के ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी। इसके पहले कांग्रेस के नेतृत्व में बनी यूपीए की केंद्र सरकार राइट टू एजुकेशन एक्ट-2009 लेकर आयी थी, जिसकी धारा-17 के मुताबिक, कोई भी शिक्षक किसी भी विद्यार्थी को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित नहीं कर सकता। इन क़ानूनों के अलावा भारतीय संविधान का अनुच्छेद-21 भी विद्यार्थियों की गरिमा और सुरक्षा के पक्ष में है, जिसके तहत हर व्यक्ति को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार है। ऐसे में विद्यार्थियों को किसी भी तरह से प्रताड़ित करने पर अध्यापकों के लिए धारा-82 के तहत सज़ा का प्रावधान तो है ही। धारा-82(1) के तहत विद्यार्थियों को शारीरिक दंड देने पर अध्यापक को 10,000 रुपये ज़ुर्माना भरना पड़ सकता है और तीन साल की जेल हो सकती है या दोनों ही हो सकते हैं। इसके अलावा धारा-82(2) के तहत अध्यापक को बर्ख़ास्त कर दिया जाएगा, जो कि अनिवार्य है। इसके साथ ही धारा-82(3) के तहत अगर अध्यापक / अध्यपाकों के जाँच में सहयोग न करने पर उन्हें तीन महीने की जेल और संस्था / स्कूल पर एक लाख रुपये का ज़ुर्माना लगाये जाने का प्रावधान है। ऐसे क़ानून बने होने पर कोई अध्यापक या स्कूल विद्यार्थियों को जबरन कैसे पढ़ा सकता है? बल्कि वे तो विद्यार्थियों की कमियाँ या ग़लतियाँ होने पर भी उन्हें मारने और सज़ा देने से बचना ही चाहेंगे।

पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आये हैं, जिनमें विद्यार्थियों को मारने-पीटने पर पैरेंट्स ही स्कूल जाकर अध्यापकों से लड़ने लगे हैं और कइयों ने तो अध्यापकों के ख़िलाफ़ एफआईआर तक दर्ज करायी है। एक वो ज़माना था कि जब बच्चा नहीं पढ़ता था या शैतानी करता था, तो स्कूल में जमकर पिटाई होती थी और जब यह बात घर वालों को पता चलती थी, तो घर में और पिटाई होती थी। यहाँ तक कि स्कूल में बिना ग़लती के भी पिटाई हो जाती थी; लेकिन कोई पैरेंट्स कभी अध्यापक से लड़ने नहीं जाते थे। उलटा और अगर कहीं कोई अध्यापक या क्लास टीचर रास्ते में पिता या दादा को मिल जाते थे, तो यह पूछते थे कि हमारा बच्चा ठीक से पढ़ रहा है कि नहीं? ऊपर से यह और कह देते थे कि उसे सुधारकर रखना। अगर नहीं पढ़े, तो मारना। तब न घर में बहस करने की हिम्मत होती थी और न स्कूल-कॉलेज में, चाहे ग़लती हो या न हो। आत्महत्या तो उस समय विद्यार्थियों के लिए बहुत दूर की बात होती थी। लेकिन अब तो अध्यापकों के ज़रा-सी बात कह देने भर से विद्यार्थी उन्हें पीटने को तैयार हो जाते हैं। कई जगह ऐसे मामले सामने आ भी चुके हैं। स्कूल जाना या नहीं जाना, क्लास रूम में बैठना या नहीं बैठना, ये सब विद्यार्थियों की मर्ज़ी पर निर्भर हो चुका है। अध्यापक अपनी इज़्ज़त और जान बचाने के लिए विद्यार्थियों से कुछ नहीं कह पाते या उन्हीं विद्यार्थियों से कहते हैं, जो पढ़ना चाहते हैं। माँ-बाप भी अब बच्चों से कुछ पूछना उचित नहीं समझते, वे सिर्फ़ रिजल्ट देखने के लिए साल भर इंतज़ार करते हैं।

लेकिन समस्या यह भी है कि जो माँ-बाप अपने बच्चों पर पढ़ने का ज़्यादा दबाव बनाते हैं, उनमें से कई विद्यार्थी आत्महत्या जैसा आपराधिक क़दम उठा लेते हैं। इसके चलते पैरेंट्स भी डरे-सहमे रहते हैं कि कहीं उनका बच्चा या बच्ची कोई ग़लत क़दम न उठा ले। आँकड़ों के मुताबिक, साल 2021 में 1,64,033 विद्यार्थियों (छात्र-छात्राओं) ने देश में आत्महत्या की थी, तो साल 2022 में आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों की संख्या बढ़कर 1,70,924 पहुँच गयी। साल 2022 में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, बीते एक दशक में छात्रों में आत्महत्याओं के मामलों में 50 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई, जबकि छात्राओं की आत्महत्याओं के मामलों में 61 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई।

बहरहाल, अगर ठीक से शिक्षा के गिरते स्तर और विद्यार्थियों में बढ़ते आत्महत्या के मामलों पर ग़ौर किया जाए, तो कई कमियाँ दिखायी देंगी, जिन्हें ठीक करने की ज़रूरत है। इस मामले में किसी एक को पूरी तरह ज़िम्मेदार भी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि अगर सरकारें चाहें, तो इन कमियों को बड़ी आसानी से दूर कर सकती हैं। लेकिन कई राज्यों में सरकारी स्कूलों की दुर्दशा, शिक्षा के बजट की कमी और बंद हो रहे स्कूलों जैसे मुद्दों पर अगर ध्यान दिया जाए, तो शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो सकता है। इसके अलावा देश में एक शिक्षा नीति, एक पाठ्यक्रम भी लागू होना चाहिए, जिससे ग़रीब और अमीर सबके बच्चे न सिर्फ़ एक जैसी शिक्षा हासिल कर सकें, बल्कि उनमें भेदभाव और हीन भावना पैदा न हो और शिक्षा का स्तर सुधर सके।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

रेडियो उपकरण ऑनलाइन खरीदना हुआ मुश्किल, केंद्र सरकार का फैसला

नई दिल्ली: उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के तहत केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) ने शुक्रवार को ई-कॉमर्स साइटों पर रेडियो उपकरणों की अवैध लिस्टिंग और बिक्री पर अंकुश लगाने के लिए नए मानदंड जारी किए हैं। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर वॉकी-टॉकी सहित रेडियो उपकरणों की अवैध लिस्टिंग और बिक्री की रोकथाम और विनियमन के लिए दिशानिर्देश, 2025 का उद्देश्य वायरलेस उपकरणों की अनधिकृत बिक्री रोकना है, जिनसे उपभोक्ता सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा हो सकता है।

मंत्रालय ने कहा कि ये उपकरण उपभोक्ताओं को उनकी कानूनी स्थिति के बारे में गुमराह कर सकते हैं। साथ ही कानून प्रवर्तन और आपातकालीन सेवाओं द्वारा उपयोग किए जाने वाले महत्वपूर्ण संचार नेटवर्क में हस्तक्षेप कर सकते हैं। दूरसंचार विभाग (डीओटी) और गृह मंत्रालय (एमएचए) के साथ व्यापक अंतर-मंत्रालयी परामर्श के बाद इन दिशानिर्देशों को अंतिम रूप दिया गया।

जांच में पाया गया कि वायरलेस ऑपरेटिंग लाइसेंस की जरूरत या लागू कानूनों के अनुपालन के बारे में जरूरी और स्पष्ट खुलासे के बिना ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर वॉकी-टॉकी बेचे जा रहे हैं। वॉकी-टॉकी के लिए प्रोडक्ट लिस्टिंग में यह साफ नहीं किया गया है कि डिवाइस को इस्तेमाल करने के लिए संबंधित प्राधिकरण से लाइसेंस की जरूरत है या नहीं।

दिशानिर्देशों के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि केवल अधिकृत और अनुपालक वॉकी-टॉकी उपकरण ही ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर ग्राहकों के लिए पेश किए जाएं। इसके अलावा, प्रोडक्ट लिस्ट में फ्रीक्वेंसी और अन्य तकनीकी पैरामीटर की जानकारी देना जरूरी होगा। जारी दिशानिर्देश ऐसे भ्रामक विज्ञापनों या उत्पाद विवरणों पर प्रतिबंध लगाते हैं, जो उपभोक्ताओं को उपकरणों के कानूनी उपयोग के बारे में गलत जानकारी दे सकते हैं।

नए दिशानिर्देश उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के अनुसार उल्लंघनों के लिए दंड और प्रवर्तन व्‍यवस्‍था की रूपरेखा भी तय करते हैं।

मंत्रालय की ओर से जानकारी दी गई है कि इन दिशानिर्देशों के साथ विभाग का लक्ष्य उचित जानकारी के माध्यम से उपभोक्ता जागरूकता को बढ़ावा देना है। साथ ही, विक्रेता की साख और प्रमाणीकरण का सत्यापन अनिवार्य करना, अनधिकृत लिस्टिंग के लिए स्वचालित निगरानी और निष्कासन तंत्र लागू करना है। इसके अलावा, जारी दिशानिर्देश अनुपालन न करने की स्थिति में दंड और प्लेटफॉर्म दायित्व लागू करना भी सुनिश्चित करते हैं।

NEET PG 2025 की परीक्षा दो शिफ्ट में नहीं, सुप्रीमकोर्ट का आदेश

नई दिल्ली:  सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को निर्देश दिया कि 15 जून को तय नेशनल एलिजिबिलिटी-कम-एंट्रेंस टेस्ट-पोस्ट ग्रेजुएट (NEET-PG) 2025 परीक्षा दो शिफ्ट के बजाय एक ही शिफ्ट में आयोजित की जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि NEET PG 2025 परीक्षा को दो शिफ्ट में ना कराया जाए। कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसा किया जाता है तो इससे मनमानी और कठिनाई के अलग-अलग स्तर पैदा हो सकते हैं। कोर्ट ने नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन यानी NBE से साफ तौर पर कहा है कि वह एक शिफ्ट में ही परीक्षा आयोजित कराने की व्यवस्था करें। सुप्रीम कोर्ट ने NEET PG 2025 परीक्षा को दो शिफ्ट मे कराए जाने के नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान ये बात कही है। ये याचिका यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट की तरफ से दाखिल की गई है। याचिका में कहा गया है कि ये परीक्षा पूरे देश में एक ही सत्र में आयोजित कराई जाए। पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। NEET PG की परीक्षा 15 जून को होनी है।

न्यायमूर्ति संजय कुमार और एन वी अंजरिया की पीठ ने कहा कि दो पालियों में परीक्षा आयोजित करना “मनमानी” को जन्म देता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि दो अलग-अलग प्रश्नपत्रों का कठिनाई स्तर या सरलता कभी भी एक तरह की नहीं हो सकती। इसलिए, एकरूपता और निष्पक्षता के लिए एक ही शिफ्ट में इम्तिहान करवाना जरूरी है, ताकि तमाम उम्मीदवारों को समान मौका मिले।

सरकार ने खरीफ की फसलों की MSP 50% बढ़ाई

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने धान, कपास, सोयाबीन, अरहर समेत खरीफ की 14 फसलों की मिनिमम सपोर्ट प्राइस बढ़ा दी है। केंद्रीय कैबिनेट ने आज यानी 28 मई को यह फैसला लिया। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि धान की नई एमएसपी 2,369 रुपए तय की गई है, जो पिछली एमएसपी से 69 रुपए ज्यादा है।

वैष्णव ने कहा कि सरकार ने बीते 10 साल में लगातार एमएसपी में बढ़ोतरी की है और हालिया फैसले से 7 करोड़ से अधिक किसानों को फायदा होगा। दालों में अरहर का समर्थन मूल्य 450 रुपये बढ़ाकर 8,000 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है, जबकि उड़द का एमएसपी 400 रुपये बढ़ाकर 7,800 रुपये प्रति क्विंटल और मूंग का एमएसपी 86 रुपये बढ़ाकर 8768 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है।

– सरकार ने बुधवार को संशोधित ब्याज सहायता योजना (एमआईएसएस) को 2025-26 के लिए जारी रखने को मंजूरी दे दी, जिसके तहत किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के माध्यम से सस्ती दर पर अल्पकालिक ऋण मिलता है। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि मौजूदा 1.5 प्रतिशत ब्याज सहायता के साथ वित्त वर्ष 2025-26 के लिए एमआईएसएस को जारी रखने का निर्णय केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा लिया गया। इस योजना को जारी रखने से सरकारी खजाने पर 15,640 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। एमआईएसएस के तहत, किसानों को केसीसी के माध्यम से 7 प्रतिशत की रियायती ब्याज दर पर 3 लाख रुपये तक का अल्पकालिक ऋण मिलता है, जिसमें पात्र ऋण देने वाली संस्थाओं को 1.5 प्रतिशत ब्याज सहायता प्रदान की जाती है। इसके अतिरिक्त, समय पर ऋण चुकाने वाले किसान शीघ्र पुनर्भुगतान प्रोत्साहन (पीआरआई) के रूप में 3 प्रतिशत तक के प्रोत्साहन के पात्र होते हैं, जिससे केसीसी ऋण पर उनकी ब्याज दर प्रभावी रूप से 4 प्रतिशत तक कम हो जाती है।

बडवेल नेल्लोर फोरलेन हाईवे को मंजूरी
यह हाईवे बडवेल-गोपरावम गांव (NH-67) से लेकर गुरुविंदापुडी (NH-16) तक बनेगा। इसकी कुल लंबाई: 108.134 किलोमीटर होगी। इस फोर लेन बनाने की कुल अनुमानित लागत: 3653.10 करोड़ रुपये आंकी गई है। बडवेल-नेल्लोर कॉरिडोर आंध्र प्रदेश के तीन प्रमुख औद्योगिक कॉरिडोरों से कनेक्टिविटी सुनिश्चित करेगा। यह कॉरिडोर कृष्णपट्टनम पोर्ट तक की यात्रा दूरी को 142 किमी से घटाकर 108.13 किमी कर देगा। परियोजना के माध्यम से लगभग 20 लाख मानव-दिनों का प्रत्यक्ष रोजगार और 23 लाख मानव-दिनों का अप्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न होगा।

आंध्र प्रदेश में 108 किलोमीटर लंबे फोरलेन हाईवे परियोजना को मंजूरी
– परियोजना की लागत 3,653 करोड़
– BOT मॉडल पर विकसित किया जाएगा, रियायत अवधि 20 वर्ष

वर्धाबल्लारशाह रेल लाइन विस्तार
– महाराष्ट्र में वर्धा से बल्लारशाह रेल मार्ग को दोहरीकरण की मंजूरी
– माल और यात्री यातायात की क्षमता को दोगुना करेगी

रतलामनागदा रेल परियोजना
– रतलाम-नागदा रेलवे लाइन पर चौथी लाइन बिछाने को मंजूरी
– परियोजना की लागत ₹1,018 करोड़
– मध्य प्रदेश के रतलाम से नागदा तक 41 किलोमीटर लंबे रेलखंड को चार लाइन में बदला जाएगा

आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने भारतीय रेलवे में लाइन क्षमता बढ़ाने के लिए दो मल्टीट्रैकिंग परियोजनाओं को मंजूरी दी। ताकि यात्रियों और माल दोनों का निर्बाध और तेज परिवहन सुनिश्चित किया जा सके। रतलाम-नागदा तीसरी और चौथी लाइन औऱ वर्धा- बल्हारशाह चौथी लाइन को मंजूरी मिली है। परियोजनाओं की कुल अनुमानित लागत 3,399 करोड़ रुपये (लगभग) है और इन्हें 2029-30 तक पूरा किया जाएगा।

स्पेसएक्स के विशालकाय  स्टारशिप  रॉकेट की ताज़ा परीक्षण उड़ान फिर से असफल

स्पेसएक्स के विशालकाय स्टारशिप रॉकेट की ताज़ा परीक्षण उड़ान फिर से असफल हो गया। यह अंतरिक्ष यान अब तक का सबसे बड़ा औप शक्तिशाली रॉकेट था। इसे मंगल ग्रह पर कॉलोनी स्थापित करने की एलन मस्क की महत्वाकांक्षाओं के लिए अहम बताया जा रहा था। इसका 9वां टेस्ट भारतीय समयानुसार 28 मई की सुबह 5 बजे टेक्सास के बोका चिका से किया गया। हालांकि, ये टेस्ट कामयाब नहीं हो पाया।

स्टारशिप की लॉन्चिंग के करीब 30 मिनट के बाद ही रॉकेट ने अपना कंट्रोल खो दिया और इस वजह से पृथ्वी के वातावरण में एंटर करने पर ये नष्ट हो गया। ये तीसरी बार है जब स्टारशिप रॉकेट आसमान में ही नष्ट हुआ। हालांकि, मस्क की कंपनी स्पेसएक्स को इस टेस्ट के दौरान एक सफलता भी मिली है और रॉकेट के बूस्टर ने अमेरिका की खाड़ी में हार्ड लैंडिंग की है। लैंडिंग बर्न के दौरान एक सेंटर को जानबूझकर बंद कर दिया गया था, जिससे बैकअप इंजन की क्षमता के बारे में पता लगाया जा सके। इस रॉकेट की ऊंचाई 400 फीट है और यह पूरी तरह से रीयूजेबल है। बता दें, रॉकेट सफलतापूर्व लॉन्च हो गया था, लेकिन लॉन्चिंग के कुछ समय बाद ही कंट्रोल खोने की वजह से रॉकेट नष्ट हो गया। यह पूरा टेस्ट 1.06 घंटे का था। स्पेसएक्स के बयान के अनुसार, अंतरिक्ष यान तेज़ी से विखंडित हो गया और हिंद महासागर में गिरने से पहले ही टूट कर बिखर गया। एक्स पर एक पोस्ट में कंपनी ने कहा कि इस परीक्षण से उसे स्टारशिप की विश्वसनीयता में सुधार करने में मदद मिलेगी।

एलन मस्क ने टेस्ट के बाद कहा कि स्टारशिप निर्धारित शिप इंजन कटऑफ तक पहुंच गया, इसलिए पिछली उड़ानों की तुलना में काफी सुधार हुआ है। रिसाव के कारण कोस्ट और री-एंट्री फेज के दौरान मेन टैंक प्रेशर में कमी आई। उन्होंने कहा कि अब अगले तीन लॉन्च काफी तेजी से होंगे और लगभग हर 3 से 4 हफ्ते में लॉन्च किया जाएगा।

जून में गर्मी नहीं, जमकर होगी बारिश-भारतीय मौसम विभाग

नई दिल्ली: मौसम विभाग (आईएमडी) की तरफ से इस बार पूरे देश में साउथ वेस्‍ट मॉनसून पर एक बार फिर बड़ी जानकारी दी गई है। भारतीय मौसम विभाग ने बताया कि इसबार मानसून 2025 की अपने मुकर्रर वक्त से 8 दिन पहले यानी 24 मई को केरल में दस्तक दे चुका है। इसी के साथ इसबार मानसून ने पिछले 16 सालों के रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया है। इससे पहले 2009 में 23 मई को मानसून अपने निर्धारित समय से पहले पहुंचा था। मौसम विभाग मानसून अपडेट के मुताबिक, मानसून देश के ज्यादातर हिस्सों में भी तेजी से बढ़ रहा है।

IMD का मानसून अपडेटेड पुर्वानुमान 2025 बताता है कि इस बार भारत में सामान्य से ज्यादा बारिश हो सकती है, जो खासतौर पर किसानों के काफी लिए राहत की बात है। दरअसल, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने जून से सितंबर की अवधि के लिए अपने मानसून पूर्वानुमान को संशोधित किया है। इस पुर्वानुमान में काफी बदलाव देखने को मिल रहा है।

मौसम विभाग ने ताज़ा अनुमान में कहा है कि इस साल देश में औसतन 106 फिसदी बारिश हो सकती है। जबकि इसमें 4 फिसदी ऊपर या नीचे का फर्क भी हो सकता है। पहले 105 फीसदी बारिश का अनुमान था, यानि इस बार 1 फीसदी ज़्यादा बारिश होने की उम्मीद है। इसका मतलब है कि इस साल मानसून ‘सामान्य से ज्यादा’ कैटेगरी में आता है, क्योंकि जब बारिश 104 फीसदी से ज्यादा होती है, तो उसे सामान्य से ज्यादा माना जाता है। वहीं, पूरे देश में 87 CM रेनफॉल होने की संभावना, जिसका एरर परसेंट +-4 फीसदी है।

मौसम विभाग के मुताबिक, हर साल मानसून सबसे पहले दक्षिणी राज्य केरल में दस्तक देता है और धीरे-धीरे पूरे देश में फैलता चला जाता है। आमतौर पर 8 जुलाई तक यह भारत के ज्यादातर हिस्से को कवर कर लेता है। इसके बाद मानसून उत्तर-पश्चिम भारत से 17 सितंबर के आसपास पीछे हटना शुरू देता है और 15 अक्टूबर तक लोगों के बीच से पूरी तरह विदा हो जाता है। अगर पिछले कुछ सालों के आंकड़ों पर नजरल डालें तो मानसून 2024 में 30 मई, 2023 में 8 जून, 2022 में 29 मई और 2021 में 3 जून को केरल पहुंचा था। यानी हर साल शुरुआत की तारीख में थोड़ा बदलाव है।

देश के कई राज्यों में कोरोना के एक्टिव केस सामने आने लगे

Health workers collect swab samples from employees of the Indian Agricultural Research Institute (IARI) for the Covid-19 coronavirus test in New Delhi on October 8, 2020. (Photo by Prakash SINGH / AFP)

देश के कई राज्यों में कोरोना के एक्टिव केस सामने आने लगे हैं। अब तक विभिन्न राज्यों में 11 लोगों की मौत कोरोना से होने की पुष्टि हुई है वहीं 1047 एक्टिव केस हैं। एक हफ्ते में 750 से ज्यादा केस सामने आ चुके हैं वहीं दूसरी तरफ यह चर्चा शुरू हो गई है कि कोरोना केस बढऩे के बाद क्या फिर से लॉकडाऊन लग जाएगा।

हालांकि लॉकडाउन की संभावना बिल्कुल नहीं है लेकिन सवाल उठने शुरू हो चुके हैं। चिंता की बात यह है कि बीते सात दिनों में कोरोना से जान गंवाने वालों का आंकड़ा सात पहुंच गया है। कोविड की वजह से जान गंवाने वालों में महाराष्ट्र के चार, केरल के दो और कर्नाटक का एक शख्स शामिल है।

भारत के अलावा दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ देशों में भी यह दोबारा उभर रहा है। हालांकि एक्सपट्र्स का कहना है कि इसे लेकर पैनिक करने की जरुरत नहीं है। फिलहाल कोविड के लक्षण हल्के हैं, लेकिन कुछ बुनियादी सावधानियां जरूरी हैं। कोविड को लेकर आम लोगों के मन में आ रहे जरूरी सवालों के जवाब हम आपको बता रहे हैं।

ट्रंप की नीतिगत कलाबाजियां: टैरिफ यू-टर्न और वैश्विक भ्रम

शशि थरूर ने प्रेसिडेंट ट्रंप के बारे में जो टिप्पणी की, और एप्पल कंपनी को भारत से निकलने की सलाह देकर ट्रंप ने अमेरिका की इमेज को जितना नुकसान किया है वो Nixon और क्लिंटन के विवादित कार्यकालों से सौ गुना ज्यादा बताया जा रहा है। महारत हासिल है पॉलिटिकल जिमनास्ट ट्रंप को कलामंडी लगाकर थूक चाटना ! भारत पाक संबंधों पर ट्रंप का रुख और प्रतिक्रियाएं, विश्वास की खाई को और चौड़ा करती हैं।

बृज खंडेलवाल द्वारा

आपने पेड़ों पर बंदरों और सर्कस में जोकरों को अद्भुत कलाबाजियां करते देखा होगा, लेकिन जब एक वैश्विक महाशक्ति का मुखिया अपने वानर चचेरे भाइयों की नकल करता है और अप्रत्याशित उछल-कूद तथा तेजी से पीछे हटकर आपको मंत्रमुग्ध करता है, तो प्रभावित राष्ट्रों के नेता चिंतित हुए बिना नहीं रह सकते।

छह महीने से भी कम समय में, व्हाइट हाउस के इस नए किरायेदार ने जटिल अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से निपटने में अविश्वसनीय लचीलापन और कुशल पैंतरेबाज़ी दिखाई है, जिसकी उसे अपनी छवि या विश्वास की कमी की जरा भी परवाह नहीं है।

अपने दूसरे कार्यकाल में, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सुर्खियां बटोरी हैं – लगातार नेतृत्व के लिए नहीं, बल्कि नीतिगत उलटफेरों की एक हैरान करने वाली श्रृंखला के लिए, जिसने वैश्विक बाजारों को हिला दिया है और सहयोगियों को भ्रमित कर दिया है। अप्रत्याशित टैरिफ धमकियों से लेकर वैश्विक संघर्ष क्षेत्रों में कूटनीतिक उलटफेर तक, ट्रंप का दृष्टिकोण आवेगपूर्ण घोषणाओं के बाद शांत वापसी के एक पैटर्न को दर्शाता है, अक्सर बिना किसी ठोस लक्ष्य को प्राप्त किए।

2024 के अंत में, राष्ट्रपति पद फिर से हासिल करने के तुरंत बाद, ट्रंप ने कनाडा और मेक्सिको से सभी आयातों पर 25% टैरिफ की व्यापक धमकी देकर उत्तरी अमेरिकी भागीदारों को चौंका दिया। फिर भी मार्च 2025 तक, दोनों पड़ोसियों से कोई महत्वपूर्ण रियायतें न मिलने के बावजूद, ट्रंप ने 30 दिनों के लिए टैरिफ रोक दिए – केवल बाद में उन्हें पूरी तरह से निलंबित करने के लिए। यह उलटफेर, एक रहस्यमय सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से साझा किया गया, जिसने विश्लेषकों को हैरान कर दिया और भागीदारों को सतर्क कर दिया।

चीन को ट्रंप के संरक्षणवादी उत्साह से बख्शा नहीं गया था। उन्होंने चीनी आयातों पर दंडात्मक टैरिफ घोषित किए, यह दावा करते हुए कि जिन देशों ने प्रतिशोध नहीं किया, उन्हें पुरस्कृत किया जाएगा, जबकि चीन जैसे अवज्ञाकारी देशों को भुगतना पड़ेगा। लेकिन अप्रैल में, तेजी से बढ़ते बॉन्ड यील्ड और बाजार में उथल-पुथल का सामना करते हुए, प्रशासन ने 90 दिनों का विराम जारी किया, यहां तक कि चीनी इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए छूट भी बढ़ा दीं। यह चीन टैरिफ पर नौ उलटफेरों की श्रृंखला में नवीनतम था, जिसमें स्थायित्व की साहसिक घोषणाओं से लेकर चुपचाप दी गई छूटें तक शामिल थीं।

23 मई को, ट्रंप ने यूरोपीय संघ के आयातों पर 50% तक के टैरिफ की धमकी दी। बाजारों ने तुरंत – नकारात्मक रूप से प्रतिक्रिया दी। कुछ ही दिनों में, प्रशासन ने अपना रुख उलट दिया, बिना किसी ठोस रियायतों को सुरक्षित किए व्यापार वार्ता बढ़ाने पर सहमत हो गया। वास्तव में, यह “ऑन-अगेन, ऑफ-अगेन” व्यवहार बार-बार देखा गया, जिसमें 8 अप्रैल को टैरिफ वृद्धि की एक ढेर पर एक और 90-दिवसीय वैश्विक विराम को चिह्नित किया गया, जिसने दुनिया भर में व्यावसायिक आत्मविश्वास को हिला दिया था।

ट्रंप की अनियमित व्यापार नीतियों के प्रमुख निगमों के लिए सीधे परिणाम थे। उदाहरण के लिए, भारत में एप्पल का महत्वाकांक्षी विनिर्माण विस्तार आईफ़ोन पर 25% टैरिफ के डर से गंभीर रूप से बाधित हो गया था। आईपीओ (आरंभिक सार्वजनिक पेशकश) में देरी हुई, सौदे निलंबित हुए, और सीईओ अनिश्चितता के कोहरे में फंस गए।

यह पैटर्न व्यापार से कहीं आगे बढ़ गया। 2025 में ट्रंप की विदेश नीति अक्सर एक रियलिटी टेलीविजन स्क्रिप्ट जैसी दिखती थी – नाटकीय धमकियां, तेज बदलाव, और कोई स्पष्ट समाधान नहीं। पश्चिम एशिया में, प्रशासन की कोशिश सीरिया को अलग-थलग करने से लेकर प्रतिबंधों को उठाने और उसके अंतरिम नेता की प्रशंसा करने तक टेढ़ी-मेढ़ी हो गई, बावजूद इसके कि व्यक्ति के पूर्व अल-कायदा गुटों से संबंध थे। उसी समय, ट्रंप ने $2 ट्रिलियन के निवेश सौदों को सुरक्षित करने के उद्देश्य से खाड़ी दौरे के दौरान इज़राइल जैसे पारंपरिक सहयोगियों को अलग-थलग कर दिया। उनके तथाकथित यथार्थवादी बयानबाजी ने अवसरवादी, अल्पकालिक पैंतरेबाज़ी की एक श्रृंखला को छिपाया जिसने अमेरिकी विश्वसनीयता को कमजोर कर दिया।

ईरान पर, ट्रंप ने अप्रैल 2025 में बमबारी के हमलों की धमकी दी, जिससे एक और मध्य पूर्वी संघर्ष का डर बढ़ गया। लेकिन कोई सैन्य कार्रवाई नहीं हुई, और धमकी सार्वजनिक विमर्श से चुपचाप गायब हो गई। इस बीच, तेहरान को एक विरोधाभासी शांति प्रस्ताव बढ़ाया गया, जबकि अधिकतम दबाव की बयानबाजी बिना रुके जारी रही।

ट्रंप की यूक्रेन नीति ने भी इसी तरह की भ्रमित स्क्रिप्ट फॉलो की। शुरू में पुतिन की आक्रामकता को पागल बताते हुए निंदा करते हुए, ट्रंप ने प्रतिबंधों की कसम खाई यदि रूस ने युद्धविराम की मांगों को नजरअंदाज किया। लेकिन जब मॉस्को ने पालन नहीं किया, तो कोई प्रतिबंध नहीं हुए। यूक्रेनी राष्ट्रपति वलोडिमिर ज़ेलेंस्की की अपीलें अनुत्तरित रहीं, जिससे ट्रंप के लेन-देन संबंधी नेतृत्व के तहत अमेरिका की वैश्विक सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता के बारे में सवाल उठ गए।

ट्रंप के कूटनीतिक नाटकीयता 2025 के उनके स्टेट ऑफ द यूनियन संबोधन में बेतुकी ऊंचाइयों पर पहुंच गई, जहां उन्होंने मांग की कि ग्रीनलैंड को संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा अपने अधीन किया जाए। उस साल बाद में, उन्होंने जोर देकर कहा कि कनाडा महान झीलों को सौंप दे – ऐसे प्रस्ताव जिन्होंने दुनिया भर के नीति निर्माताओं के बीच हंसी और चिंता दोनों को भड़काया। स्वाभाविक रूप से, कोई भी मांग बयानबाजी से आगे नहीं बढ़ी।

मार्च में, ट्रंप ने हमास से सभी बंधकों को रिहा करने की मांग की, यदि अनदेखी की गई तो गंभीर परिणामों का संकेत दिया। अन्य धमकियों की तरह, कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिससे एक ऐसे प्रशासन की धारणा मजबूत हुई जो साहसपूर्वक दिखावा करता है लेकिन शायद ही कभी पूरा करता है।

विश्लेषकों ने नोट किया है कि ट्रंप के उलटफेर अक्सर बाजार की अस्थिरता के साथ मेल खाते हैं। उदाहरण के लिए, अप्रैल 2025 का टैरिफ विराम सीधे तेज स्टॉक गिरावट और चढ़ते बॉन्ड यील्ड के बाद आया। उनकी पोस्ट एक ऐसे पैटर्न को दर्शाती हैं जिसमें ट्रंप आर्थिक या भू-राजनीतिक तनाव को ट्रिगर करने के बाद पीछे हट जाते हैं, फिर वापसी को एक मास्टर रणनीति के हिस्से के रूप में प्रस्तुत करते हैं – बावजूद इसके कि कोई वास्तविक कूटनीतिक या व्यापारिक लाभ नहीं होता।

ट्रंप के समर्थक तर्क देते हैं कि यह शैली एक कठिन वार्ताकार को दर्शाती है जो सीमाओं का परीक्षण करने से डरता नहीं है। लेकिन आलोचक – और कई वैश्विक नेता – इसे अलग तरह से देखते हैं: एक अराजक शासन मॉडल जो परिणामों से अधिक सुर्खियों को प्राथमिकता देता है और अमेरिका के सहयोगियों को अटकलें लगाने के लिए छोड़ देता है।

वास्तव में, ट्रंप की कलाबाजियां – टैरिफ, कूटनीति और सैन्य धमकियों पर – ने न केवल भ्रम बोया है, बल्कि मौलिक रूप से बदल दिया है ।