Home Blog Page 64

मर्यादा की लक्ष्मण रेखा

शिवेन्द्र राणा

पिछले दिनों भारत के लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक अप्रिय स्थिति पैदा हो गयी, जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सर्वोच्च न्यायालय से 14 प्रश्नों पर जवाब माँगे, जिनमें क्या राज्यपाल फ़ैसला लेते समय मंत्रिपरिषद् की सलाह से बँधे हैं? क्या राष्ट्रपति या राज्यपाल के फ़ैसले को अदालत में चुनौती दी जा सकती है? क्या राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल के फ़ैसलों पर अदालत समय-सीमा तय कर सकती है? क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद-142 का प्रयोग करके राष्ट्रपति या राज्यपाल के फ़ैसलों को बदल सकता है? इत्यादि सवाल शामिल थे। ये सवाल अनायास ही नहीं किये गये हैं। इसकी वजह है- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 08 अप्रैल, 2025 को दिया गया निर्णय।

दरअसल, तमिलनाडु विधानसभा द्वारा वर्ष 2020 से 2023 के बीच 12 विधेयक पारित किये गये, जिन्हें राज्यपाल आर.एन. रवि द्वारा रोक लिया गया। इसके बाद अक्टूबर, 2023 में तमिलनाडु सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में वाद दाख़िल किया, तब राज्यपाल ने 10 विधेयकों को बिना हस्ताक्षर लौटा दिया एवं अन्य दो को राष्ट्रपति के विचारार्थ भेज दिया। जब राज्य सरकार ने उन 10 विधेयकों को पुन: पारित करके राज्यपाल को भेजा, तब राज्यपाल ने उन्हें भी राष्ट्रपति को निर्णय हेतु अग्रसारित कर दिया। तत्पश्चात् तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 08 अप्रैल को अनुच्छेद-142 का इस्तेमाल करते हुए आदेश दिया कि इन सभी 10 विधेयकों को पारित माना जाए। इसके बाद ही न्यायपालिका एवं विधायिका के मध्य अधिकार के अतिक्रमण का यह अप्रिय विवाद उत्पन्न हुआ है, जिसे महामहिम राष्ट्रपति के हस्तक्षेप ने गंभीर बनाया है।

जम्हूरियत में संवैधानिक संस्थाओं के द्वारा संवैधानिक मर्यादाओं का अतिक्रमण करने पर टकराव बढ़ने लगता है। संविधान किसी भी देश की वो आधारभूत विधि है, जिसके अंतर्गत राज्य व्यवस्था के मूल सिद्धांत विहित होते हैं। संविधान की कसौटी ही सर्वत्र राष्ट्रीय विधियों एवं कार्यपालक कार्यों की विधिमान्यता एवं उनकी वैधता का आधार बनती है। भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का बुनियादी ढाँचा ही इस लोकतांत्रिक स्वरूप पर निर्धारित करता है, जो न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका जैसे मुख्य स्तंभों के विभाजित स्वरूप की रचना करता है, जो मूलत: संविधान समर्थित हैं। ऐसे में लोकतंत्र की मज़बूत स्तंभ न्यायपालिका या संसद एक-दूसरे के क्षेत्राधिकार में अतिक्रमण और हस्तक्षेप करेंगी, तो ये दोनों संविधान की शुचिता की निर्धारित रेखा के अनुपालन की ज़िम्मेदारी और अन्य संवैधानिक अंगों से कैसे सुनिश्चित कर पाएँगी?

असल में भारत में सन् 1970 के दशक में अमेरिकी न्यायपालिका से प्रभावित न्यायिक सक्रियता के सिद्धांत ने बीतते समय के साथ न्यायपालिका में न्यायिक संयम को संभवत: समाप्त कर दिया है। अमेरिकी लोकतंत्र में न्यायिक संयम की अवधारणा का एक तर्क यह भी है कि न्यायालय मूलत: अलोकतांत्रिक है; क्योंकि यह अनिर्वाचित तथा लोकमत के प्रति अग्रहणशील एवं अनुत्तरदायी है। ऐसे में उसे यथासंभव मामलों को सरकार की लोकतांत्रिक संस्थाओं को ही सुपुर्द कर देना चाहिए। किन्तु प्रतीत होता है कि भारतीय न्यायपालिका ने केवल अमेरिकी न्यायिक विचार को ही लिया, उसकी अवधारणा से कुछ सीखने की कोशिश नहीं की। वर्ष 2007 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी एक मामले पर न्यायिक संयम की बात करते हुए टिप्पणी की थी कि न्यायालय विधायिका एवं कार्यपालिका के कार्य अपने हाथ में न लें तथा संविधान में निर्धारित शक्तियों के बँटवारे और सरकार के प्रत्येक अन्य अंगों का सम्मान करते हुए दूसरे के कार्यक्षेत्र में अतिक्रमण नहीं करें। जजों को अपनी सीमा जान लेनी चाहिए और सरकार चलाने की कोशिश बिलकुल नहीं करनी चाहिए।

यह सही है कि संविधान प्रदत्त अधिकारों के अंतर्गत निर्णय लेना न्यायपालिका का अधिकार है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में न्यायपालिका का रवैया संवैधानिक मूल्यों के प्रति हठवादी रहा है, जिसका सबसे प्रमुख उदाहरण है- कॉलेजियम सिस्टम के विरुद्ध न्यायिक नियुक्ति आयोग (2014) को असंवैधानिक घोषित करना। यह सर्वविदित संवैधानिक तथ्य है कि संसद को न्यायपालिका के सभी स्तरों के गठन, संगठन, अधिकारिता तथा शक्तियों के विनियमन सम्बन्धी विधियों के प्रवर्तन में पूर्ण सक्षमता प्राप्त है। अनुच्छेद-124 इस संसदीय शक्ति का उद्घोषक है। इसके अतिरिक्त अनुच्छेद-124(4), 218, 121, 122(1), 212(1), 136, 323(क), 323(ख) जैसे तमाम संवैधानिक उपबंध न्यायपालिका के विषय में संसदीय शक्ति के अधिकारों की पुष्टि करते हैं। तब सवाल यह भी उठता है कि एनजेएसी (99वें संविधान संशोधन अधिनियम-2014) को ख़ारिज करके क्या न्यायपालिका ऐसे आचरण से स्वयं को लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक पृथक सत्ता अधिष्ठान के रूप में प्रतिष्ठित करने का अनैतिक प्रयास नहीं कर रही है?

हालाँकि ऐसा नहीं है कि केंद्र सरकार ने अपने अधिकारों का अतिक्रमण नहीं किया है। उसने भी कई बार सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को अपने हितों को साधने के लिए कई बार ऐसा किया है एवं न्यायाधीशों पर अपनी इच्छानुसार निर्णय देने का दबाव बनाने और अपने मनपसंद न्यायाधीशों को लाभ पहुँचाने तक की घटनाएँ किसी से छिपी नहीं हैं। लेकिन फिर भी भले ही अपने ध्येय वाक्य में सर्वोच्च न्यायालय यतो धर्मस्ततो जय: की घोषणा करे, किन्तु यथार्थ में इस मामले में उसके द्वारा संवैधानिक धर्म का ईमानदारी से पालन नहीं हुआ है। आख़िर देश की जनता के बहुमत से निर्वाचित मंत्रिमंडल द्वारा सिफ़ारिश किये गये एवं राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त राज्य के सर्वोच्च संवैधानिक प्रमुख अर्थात् राज्यपाल को अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर उसके संवैधानिक कृत्य हेतु निर्देशित करने का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय न्यायपालिका का विधायिका तथा कार्यपालिका को निर्देशित करने हेतु संवैधानिक अतिक्रमण का प्रयास है। हालाँकि इस विवाद में न्यायालयी पक्ष की अति सक्रियता को राजनीतिक वजहों से समर्थन देने वाला वर्ग यह नहीं समझना चाहता कि वस्तुत: उक्त विवाद किसी सरकार, पार्टी या संस्थान से जुड़ा हुआ है ही नहीं। असल में प्रश्न लोकतांत्रिक संरचना में संवैधानिक मूल्यों के प्रति समादर का है।

किसी पार्टी की विचारधारा अथवा किसी सरकार की कार्यशैली से असहमति रखना या उसकी आलोचना सहज जनतांत्रिक वृत्ति है, बल्कि असहमतियों का वजूद तो जम्हूरियत की ज़िन्दादिली का सुबूत है। लेकिन तमिलनाडु राज्यपाल के कर्तव्य क्षेत्र की संवैधानिक परिधि के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय रॉबिन हुड टाइप का क्रांतिकारी क़दम समझने वाले संविधान की मूल अवधारणा एवं व्यवस्थापन के विधायी सिद्धांत के महत्व को उक्त संवैधानिक विवाद के अनुरूप भविष्य में उपजने वाली भावी समस्याओं को नहीं समझ पा रहे हैं। हालाँकि यह भी एक सत्य है कि न्यायपालिका की यह आलोचना तब तक एकपक्षीय नज़र आती है, जब तक इस विवाद के संवैधानिक संदर्भ की ओट में राजनीतिक संघर्ष के मूल कारण को नहीं समझते हैं। असल में न्यायपालिका का अधिकार का यह अतिक्रमण तमिलनाडु राज्य सरकार के बहुमत की निर्वाचित जनतांत्रिक सत्ता के विशेष आग्रह की परिणीति है।

संविधान के छठे भाग के अनुच्छेद-153 से 167 तक राज्य की कार्यपालिका का वर्णन है, जिसके अनुसार राज्यपाल राज्य का कार्यकारी प्रमुख (संवैधानिक मुखिया) होता है। इस रूप में वह केंद्र सरकार के प्रतिनिधि का भी दायित्व निभाता है। परन्तु यह विधायी आदर्श केवल सैद्धांतिक टैबू-टैटम है। वास्तविकता में ये महामहिम के रूप राज्य सरकार के नियंत्रण में लगे केंद्र सरकार के राजनीतिक एजेंट होते हैं।

विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों के संदर्भ में संविधान प्रदत्त चार प्रकार की वीटो शक्तियाँ- स्वीकृति प्रदान करना, अपनी स्वीकृति रोक लेना, स्थगन वीटो एवं विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए सुरक्षित रखना राज्यपाल को प्राप्त हैं। लेकिन कटु वास्तविकता यह है कि इन सभी वीटो का प्रयोग राज्यपाल अपने नियोक्ता केंद्र सरकार के इशारे पर उसकी सुविधानुसार करते हैं। ऐसे में जब केंद्र एवं राज्य में दो भिन्न दलों, उसमें भी प्रतिद्वंद्वी विचारधारा एवं आपस में एक-दूसरे के प्रति विपक्षी ख़ेमे से जुड़े पार्टियों की सरकार हो, तो स्थिति टकरावपूर्ण एवं अधिकांशत: राजनीतिक विद्वेष से भरी होती है। चूँकि 42वें संविधान संशोधन (1976) के बाद राष्ट्रपति पर तो मंत्रिमंडल की बाध्यता सुनिश्चित हुई; लेकिन राज्यपाल ऐसे किसी उपबंध से मुक्त रहे और केंद्र सरकार की सरपरस्ती तो होती ही है। इसलिए भी उनमें राज्यों की निर्वाचित सरकारों के निर्णयों की अवहेलना करने का साहस आया है। वैसे अक्सर संविधान विशेषज्ञों ने इनकी आलोचना जनतंत्र पर मुसल्लत कर दिये गये सफ़ेद हाथी के रूप में की है, जो सरकारी ख़ज़ाने पर भी बोझ हैं; और कार्यपालिका के कार्य प्रणाली में अनावश्यक रोक भी।

अत: उक्त संवैधानिक विवाद हेतु राज्यपाल आर.एन. रवि की संविधान की आड़ में प्रदर्शित राजनीतिक हठधर्मिता भी कम उत्तरदायी नहीं है। इसलिए तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी ठीक ही थी कि राज्यपाल ने ईमानदारी से काम नहीं किया। तथा आप (राज्यपाल) संविधान से चलें; पार्टियों की मर्ज़ी से नहीं। परन्तु इस स्वीकार्य तर्क के बावजूद भी समझना होगा कि संवैधानिक मूल्यों की गरिमा संविधान के सैद्धांतिक निरूपण में निहित है, जिसका तदर्थ स्थिति में समर्थन इसलिए भी ज़रूरी है, ताकि राष्ट्र की लोकतांत्रिक व्यवस्था में शुचिता एवं सम्मान दोनों सुरक्षित रह सकें एवं भविष्य में ऐसी कोई समरूप अवस्था उत्पन्न न हो या संवैधानिक टकराव की स्थिति पैदा न हो।

‘धर्मो रक्षति रक्षित:’ की भारतीय ज्ञान परंपरा के लाक्षणिक अर्थ- ‘धर्म की रक्षा कीजिए, धर्म आपकी रक्षा करेगा’ की भाँति संविधान के मूल सिद्धांतों का परोक्ष संदेश भी समतुल्य है कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा कीजिए और संविधान आपके लोकतंत्र और उसकी स्थापित व्यवस्था की संरक्षा करेगा।

प्रकृति और पशु-पक्षियों के रक्षक हैं किसान

योगेश

किसान प्रकृति और धरती के सबसे निकट रहते हैं। इसलिए किसानों को पशु-पक्षी अपना मित्र मानते हैं और किसान भी उनसे मित्रता का भाव रखते हैं। अगर इन पशु-पक्षियों की संख्या कम या ज़्यादा हो जाती है, तो किसानों को इसका नुक़सान उठाना पड़ता है। ज़रूरत से ज़्यादा बारिश, ज़्यादा सूखा, हवा का आँधी-तूफ़ान में बदल जाना और पशु-पक्षियों की संख्या कम-ज़्यादा किसानों को नुक़सान पहुँचाते हैं। किसान मनुष्य हैं, जो सबसे ज़्यादा संवेदनशील होते हैं और अपनी फ़सलों में सभी पशु-पक्षियों के लिए हिस्सा रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। लेकिन किसानों के लिए पक्षियों की संख्या घटना और आवारा पशुओं की संख्या बढ़ना संकट पैदा करती जा रही है, जिसके लिए वे मनुष्य ही ज़िम्मेदार हैं, जो अपने लाभ के लिए जंगलों को उजाड़ रहे हैं और पशु-पक्षियों की हत्या कर रहे हैं।

मनुष्य ने पुरातन समय से अपने फ़ायदे के लिए पशु-पक्षियों और प्रकृति को लगातार नुक़सान पहुँचाया है और वह अब भी रुकने का नाम नहीं ले रहा है, जबकि धरती कई बार बड़े-बड़े भूकंपों और सुनामी जैसे तूफ़ानों के द्वारा यह संकेत दे रही है कि बस अब मनुष्य का अतिक्रमण को धरती और सहन नहीं कर सकती। मनुष्य का हिंसक स्वार्थ धरती पर रहने वाले सभी जीवों को भयंकर नुक़सान पहुँचा रहा है। कहने को मनुष्य को भगवान ने सोचने-समझने की शक्ति दी है, सही-ग़लत की पहचान करने की बुद्धि दी है और सबसे बड़ी बात धरती पर राज्य करने के साथ-साथ अपने लिए हर सुख जुटाने की सामर्थ दी है। लेकिन मनुष्य ही आज धरती के विनाश में सबसे प्रमुख हिस्सेदारी निभा रहा है। मनुष्य को न जाने क्यों संतुष्टि नहीं है, विशेषकर हर तरह से सुविधा-सम्पन्न लोगों को संतुष्टि बिलकुल भी नहीं है। कहने को उनके पास कोई भी कमी नहीं है। ऐसे लोग धरती पर सबसे ज़्यादा विनाश करते आये हैं और विनाश ही करते जा रहे हैं। जंगली जानवरों और पालतू पशुओं से लेकर पक्षियों तक की दुर्दशा और उनके विनाश में मनुष्य, विशेषकर अवैध काम करके संपत्ति बनाने और तस्करी करने वालों ने जो घिनौना काम किया है, वो कसाइयों और आखेटों से कम नहीं है।

हमारे देश में धनवान बनने की भूख बड़े-बड़े लोगों में बहुत ज़्यादा है, जो इसकी पूर्ति के लिए पशुओं का मरवा रहे हैं और जंगलों को काट रहे हैं। जंगलों को काटकर जंगली पशु-पक्षियों की हत्या भी कर रहे हैं और धरती पर विनाश का पाप भी कर रहे हैं। लेकिन अगर धरती पर पशु-पक्षियों और प्रकृति की रक्षा करने वाला कोई है, तो वे किसान हैं। किसानों ने हमेशा से पशु-पक्षियों और प्रकृति की रक्षा की है। उन्होंने धरती पर खेती करके पशु-पक्षियों और तमाम जीवों का पालन-पोषण किया है, बल्कि इंसानों का भी पेट भरा है और हमेशा दया का भाव दिखाते हुए अपने द्वार पर आये हुए लोगों को, यहाँ तक कि कुत्ते या दूसरे पशु-पक्षियों को भी भूखा नहीं रखा है। इसलिए किसानों को अन्नदाता और धरती का भगवान कहा जाता है। क्योंकि किसान जानते हैं कि पशु-पक्षी और प्रकृति की वजह से ही मनुष्यों को जीवन मिलता है और ये सब मनुष्यों के ऐसे मित्र हैं, जिन्हें मनुष्यों से प्यार और भूख मिटाने की मदद के अलावा कोई दूसरा लालच नहीं है। लेकिन फिर भी मनुष्य पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों का कई तरह से दुश्मन बना हुआ है। मनुष्य धरती पर उजाड़ ही नहीं कर रहे हैं, वे धरती को बुरी तरह गंदा भी कर रहे हैं। मनुष्यों द्वारा फैलायी गयी गंदगी, विशेषकर कूड़े-कचरे और प्रदूषण ने लाइलाज बीमारियों को जन्म दिया है।

धरती पर उसके द्वारा डाली जा रही गंदगी और प्रदूषण का निस्तारण धरती पर रहने वाले कीट-पतंगे और पशु-पक्षी करते हैं और पानी में उसके द्वारा डाली गयी गंदगी को मछलियाँ और दूसरे जलीय जीव साफ़ करते हैं। हालाँकि कुछ पशु-पक्षी और जीव मनुष्य के लिए घातक, जानलेवा और बीमारियाँ देने वाले भी होते हैं। मनुष्य ऐसे पशु-पक्षियों और जीवों को हमेशा के लिए नष्ट नहीं कर सकता। कई पशु-पक्षियों से तो मनुष्य ही डरते हैं और सीधे पशु-पक्षियों से फ़ायदा उठाते हैं, उन्हें मार तक देते हैं। लेकिन किसान ऐसा नहीं करते; क्योंकि किसान उन्हीं कीट-पतंगों को मारते हैं, जो उनकी फ़सल के लिए नुक़सानदायक होते हैं। किसान जब खेत में काम करते हैं, तो उनके आसपास बहुत से पक्षी घूमते रहते हैं। खेतों की जुताई और फ़सलों की कटाई के समय पक्षी अपने भोजन की तलाश किसानों के आगे-पीछे चलते रहते हैं। ये पक्षी उन कीट-पतंगों को ही खाते हैं, जो फ़सलों और भूमि के लिए नुक़सानदायक होते हैं।

पक्षी किसानों के अलावा दूसरे मनुष्यों को भी लाभ पहुँचाते हैं। अगर कोई पशु मर जाए, तो कौवे, चील-गिद्ध, कुत्ते, भेड़िये ओर कीड़े उनका मांस और हड्डियों को खाकर सफ़ाई का काम करते हैं। मनुष्यों द्वारा नालियों में डाली जाने वाली गंदगी को नालियों के कीड़े साफ़ करते हैं। हवा में फैली गंदगी को पेड़-पौधे, पानी की गंदगी को जलीय पौधे, मछलियाँ और दूसरे जलचर साफ़ करते हैं। धरती पर मनुष्यों द्वारा डाली जा रही गंदगी को ज़मीन पर गंदगी साफ़ करने वाले कीड़े-मकोड़े, सूअर और दूसरे कुछ पशु-पक्षी साफ़ करते हैं। लेकिन मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए पशु-पक्षियों के अलावा कीट-पतंगों और दूसरे जीवों को भी मार रहे हैं। मनुष्यों की इन गंभीर हरकतों के कारण पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों की संख्या में बहुत तेज़ी से गिरावट तो आ रही है। कई तरह के पशु-पक्षी और कीड़े-मकोड़े तो पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। 

 वैसे तो किसानों के मित्र की उपाधि केंचुए को मिली हुई है; लेकिन दूसरे पशु-पक्षी और कीट-पतंगे भी किसानों के मित्र हैं। किसानों के मित्र केंचुए के अलावा मित्र पशु-पक्षी, कीट-पतंगे और पेड़-पौधों के नष्ट होने से उन्हें अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कृषि भूमि को पोला बनाकर उपजाऊ बनाने वाले केंचुए बहुत मदद करते हैं। लेकिन गौरैया, छोटी चिड़िया, तीतर, टिटौली, मोर, बटेर, बगुला, कौआ, मुर्गा-मुर्गी, बत्तख, काली चिड़िया, कठफोड़वा, चमगादड़, शिकारा, बाज और गिद्ध भी किसानों के मित्र हैं, जो फ़सलों को नुक़सान पहुँचाने वाले कीट-पतंगों को खाते हैं। कीट-पतंगों में भँभीरी, तितली, पप्पू कीड़ा, मधुमक्खी, भँवरे, तिलचट्टा आदि किसानों के मित्र हैं। कीड़ों और दूसरे थलचर जीवों में केंचुआ, गुबरैला, चींटियाँ, चींटे, मेंढक, छिपकली आदि किसानों के मित्र हैं। किसानों के मित्र पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों और दुसरे थलचरों के निरीक्षण से पता चला है कि ज़्यादातर पक्षी अपने बच्चों के लिए पूरे दिन चुग्गा लाते हैं, जिनमें ज़्यादातर वे कीड़े-मकोड़े होते हैं, जो किसानों की फ़सलों को नुक़सान पहुँचाते हैं। इन पक्षियों में कठफोड़वा इकलौता ऐसा पक्षी है, जो 24 घंटे में लगभग 300 बार अपने बच्चों के लिए चुग्गा लाता है, जिसमें कीड़े-मकोड़े बड़ी संख्या में होते हैं।

किसानों की फ़सलों की पैदावार बढ़ाने में पक्षी और छोटे-छोटे उड़ने वाले कीट-पतंगों के अलावा केंचुआ, मेंढक, गुबरैला, चींटियाँ, चींटे, छिपकली बहुत सहायक होते हैं। वहीं पशुओं में पालतू पशु किसानों के लिए बहुत सहायक होते हैं। गाय-भैंस, बैल, भैंसा, गधा, ऊँट, घोड़ा, मुर्गा-मुर्गी, बत्तख आदि खाद और दूध, अंडे और श्रम के हिसाब से किसानों के मित्र होते हैं; लेकिन कुत्ता खेतों की रखवाली के हिसाब से किसानों का मित्र पशु है। कबूतरों को छोड़कर ज़्यादातर पक्षी किसानों के खेतों से कीड़े-मकोड़ों को पकड़कर खाते हैं। हालाँकि कई पक्षी किसानों के मित्र कीट-पतंगों को भी खा जाते हैं, जिससे उनकी संख्या कम होने लगती है। हालाँकि कीट-पतंगों को मारने के पीछे किसान भी ज़िम्मेदार हैं। क्योंकि जब किसान अपने खेतों में कीटनाशकों का छिड़काव करते हैं, तो उनकी फ़सलों को नुक़सान पहुँचाने वाले कीटों के साथ-साथ उनके मित्र कीट-पतंगे भी मर जाते हैं। फ़सलों में कीटनाशकों और यूरिया आदि के डालने से किसानों के मित्र कीट-पतंगे और मित्र पक्षी भी खेतों में काम आते हैं, जिससे पैदावार पर तो बुरा असर पड़ता ही है, फ़सलों के ज़हरीला होने का ख़तरा भी बन जाता है।

कुछ वर्षों से किसानों ने पशुपालन भी कम कर दिया है, जिससे वे अब जैविक खाद नहीं बना पाते और न ही पशुओं से कृषि करते हैं। एक सर्वे के आँकड़ों के अनुसार, सिर्फ़ 20 प्रतिशत किसान अब देश में पशुओं से खेती करते हैं, जबकि किसानों ने 30 प्रतिशत तक पशुपालन कम कर दिया है। वहीं आवारा पशुओं की बढ़ती संख्या भी किसानों के लिए सिरदर्द बनी हुई है। आवारा पशुओं के अलावा कहीं-कहीं बंदरों का आतंक भी दिखायी देता है, जो कि फ़सलों को अकारण ही उजाड़ देते हैं। आवारा पशुओं में नीलगाय, सांड, गाय, हाथी, बंदर, बारहसिंघा, जंगली भैंस-भैंसा, ऊदबिलाव सबसे ज़्यादा किसानों की फ़सलों को नुक़सान पहुँचाते हैं। थलचरों में चूहे सबसे नुक़सान पहुँचाते हैं। कीट-पतंगों में टिड्डी, अनाज और फल खाने वाले पक्षी और फ़सलों को खाने वाले वाले कीट किसानों को नुक़सान पहुँचाते हैं। कृषि विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि इन नुक़सानों से बचने के लिए किसानों के परंपरागत जैविक खेती करनी चाहिए और वापस से पशुपालन करना चाहिए। लेकिन किसानों के आगे भूमि कम होने के चलते पशुपालन में समस्या आती है।

पहले पशुपालन करने वाले किसान अपने पशुओं को चराने के लिए ख़ाली मैदानों और जंगलों के आसपास लेकर जाते थे। लेकिन अब ख़ाली मैदानों की भी कमी है और जंगलों की भी कमी है, जिसके चलते अब वही किसान पशुपालन कर पाते हैं, जो घर में ही पशुओं के चारे आदि का इंतज़ाम कर पाते हैं। पानी के लिए तालाब भी बहुत कम बचे हैं। जंगलों के कटने और तालाबों के पट जाने से पशु-पक्षी मर रहे हैं। लेकिन मनुष्य भूल रहे हैं कि ये पशु-पक्षी किसानों के ही नहीं, सभी मनुष्यों के मित्र हैं। किसानों के अलावा सभी मनुष्यों के हित संवर्धन के लिए पर्यावरण के साथ पशु-पक्षी संरक्षण को बचाने की ज़रूरत है, नहीं तो प्रकृति के साथ ही पर्यावरण में असंतुलन बढ़ जाएगा, जो मनुष्य जीवन को संकट में डाल देगा।

3डी प्रिंटिंग में उड़ान भर रहा चीन

एक दौर था, जब फोटोग्राफी ख़ास अंदाज़ में होती थी। फोटो स्टूडियो में दीवार पर बनी पेंटिंग या पर्दा लगाकर फोटोग्राफी की जाती थी। फोटो खिंचवाने के कई दिन बाद फोटो मिला करते थे। फोटोग्राफर को फोटो बनाने के लिए काफ़ी मेहनत भी करनी होती थी। निगेटिव धोने से लेकर फोटो प्रिंट करने तक की एक ख़ास तकनीक होती थी। धीरे-धीरे फोटो खींचने में निगेटिव का रोल ख़त्म हो गया और फोटो खिंचवाने वालों को फोटो मिलने के इंतज़ार का समय भी कम हुआ। मोबाइल के आने पर फोटोग्राफरों की दुकानों पर जाकर फोटोग्राफी और उसके साथ-साथ वीडियोग्राफी करवाने का क्रेज भी काफ़ी कम हुआ। ये सब लोगों के हाथ में कैमरे आने से तो हुआ ही, अब पिछले एक दशक से मोबाइल आने से और कम हुआ।

पहले जब फोटोग्राफी एक पैशन हुआ करता था, तब कैमरा चलाना एक हुनर माना जाता था और कैमरामैन भी बड़े सलीक़े से सारे एंगल मिलाने के बाद कैमरे का फ्लैश बटन दबाता था, जिसके साथ ही एक फ्लैश लाइट चमकती थी, जो फोटो खिंचवाने वालों को फोटो खिंच जाने के लिए आश्वस्त करती थी। लेकिन कैमरे और मोबाइल हाथ में आने से फोटो खींचने और वीडियोग्राफी हर कोई करना जान गया, भले ही उसे इसकी सही जानकारी हो या न हो। हालाँकि अब भी फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी एक पैशन और अच्छा व्यवसाय बना हुआ है। लेकिन ज़्यादातर लोग इसके लिए प्रोफेशनल फोटोग्राफर और वीडियोग्राफर के पास ख़ास मौक़ों पर ही जाते हैं। बाक़ी ज़रूरतें लोग अपने निजी कैमरे, या ज़्यादातर मोबाइल से ही पूरी कर लेते हैं। क्योंकि क़रीब-क़रीब हर हाथ में एंड्रॉयड मोबाइल के आ जाने से हद से ज़्यादा फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी हो रही है। लोगों में मोबाइल से सेल्फी लेने, फोटो खींचने और वीडियो बनाने का क्रेज काफ़ी ज़्यादा है।

एक अनुमान के मुताबिक, भारत में हर रोज़ सिर्फ़ मोबाइलों के ज़रिये क़रीब 450 करोड़ से ज़्यादा फोटो खींचे जा रहे हैं, जबकि 200 करोड़ से ज़्यादा रील बन रही हैं। यानी एक व्यक्ति हर रोज़ औसतन तीन से चार फोटो खींच रहा है और तीन व्यक्ति औसत दो रील बना रहे हैं। हालाँकि ऐसा नहीं है कि भारत में हर व्यक्ति ही फोटो खींच रहा है और हर व्यक्ति रील बना रहा है। लेकिन एंड्रॉयड मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वाले ज़्यादातर लोग हर रोज़ फोटो खींचने, सेल्फी लेने और रील बनाने में लगे हैं। लेकिन इससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि भारत में हर रोज़ लोग औसत चार से पाँच घंटे रील देखने में बिता रहे हैं, जो कि चिन्ताजनक स्थिति है।

अब मोबाइल से फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी से भी आगे निकलकर 3डी प्रिंटर और 3डी मूर्ति बनाने की तकनीक आ चुकी है। चीन ने एक ऐसी 3डी मशीन ईजाद की है, जिसमें फोटोग्राफी के स्टूडियो की तरह ही लोगों की फोटो की जगह अपनी मूर्ति बनायी जाती है। ये मूर्ति दो इंच से लेकर पाँच फीट तक की बनायी जा सकती है।

दरअसल, चीन ने जो 3डी प्रिंटिंग मशीन बनायी है, उसके दो भाग हैं। एक भाग में 3डी प्रिंटर किसी भी व्यक्ति की हू-ब-हू मूर्ति बनाने का काम करता है और दूसरे भाग में एक गोल रोलिंग रूम होगा, जो अपनी मूर्ति बनवाने वाले व्यक्ति की चारों तरफ़ स्कैनिंग करके 3डी प्रिंटर को व्यक्ति के आकार को पहुँचाने का काम करता है। इस स्कैनिंग रूम के अंदर फ़िलहाल पाँच लोग तक खड़े हो सकते हैं। इस स्कैनिंग रूम के अंदर लोग जिस पोजीशन में खड़े होंगे, उसी पोजिशन में उनकी 3डी मूर्ति बनकर एक घंटे के अंदर मिल जाएगी। इस 3डी मूर्ति में लोगों के हेयर स्टाइल से लेकर पहले हुए जेवरात, कपड़े, जूते-चप्पल और चेहरे के हाव-भाव तक हू-ब-हू बनकर निकलते हैं। अभी चीन द्वारा बनायी गयी 3डी प्रिंटिंग मशीन एक बार में किसी व्यक्ति या लोगों को स्कैन करने में 15 से 20 मिनट का समय लेती है और उनकी 3डी मूर्ति बनाने में एक घंटे के क़रीब समय लगता है। डेढ़-दो साल पहले चीन द्वारा बनायी गयी ये 3डी मशीन शुरू-शुरू में 12 घंटे तक ले रही थी, जिसमें मूर्ति भी उतनी साफ़ नहीं आ पा रही थी, जितनी साफ़ और हू-ब-हू मूर्ति होनी चाहिए। लेकिन चीन के वैज्ञानिकों ने कड़ी मेहनत और दिमाग़ का इस्तेमाल करके 3डी प्रिंटिंग मशीन बनाने में ही नहीं, बल्कि चौकाने वाली 3डी प्रिंटिंग मशीन बनाने में जो महारत हासिल की है, उसकी माँग भविष्य में बहुत तेज़ी से बढ़ने वाली है। हालाँकि अभी चीन के वैज्ञानिक इस मशीन पर एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं। चीन के वैज्ञानिक चाहते हैं कि वे एक ऐसी 3डी मशीन दुनिया के सामने लेकर आएँ, जो सेकंडों में स्कैनिंग रूम में खड़े व्यक्ति का हुलिया स्कैन करके मिनटों में उसकी हू-ब-हू मूर्ति बना दे। वैज्ञानिक चाहते हैं कि इस 3डी मूर्ति बनाने के समय लोगों के बालों का रंग, पहने हुए कपड़ों का रंग और जूते-चप्पलों का रंग, गहनों का रंग, सब कुछ हू-ब-हू बनाया जा सके।

3डी प्रिंटिंग और एआई के इस दौर में चीन के वैज्ञानिक लोगों की स्कैनिंग करके उनकी मूर्ति बनाने का चमत्कार कर चुके हैं। हालाँकि फोटो से मूर्ति उतनी परफेक्ट नहीं बन सकेगी, जितनी परफेक्ट मूर्ति किसी व्यक्ति को स्कैन करके बन सकती है। सोचिए, जब यह मशीन और डेवलप होगी, तो चलते-फिरते लोगों की मूर्ति भी बना सकेगी। हो सकता है कि भविष्य में सीसीटीवी में रिकॉर्ड लोगों की मूर्तियाँ भी ज़रूरत पड़ने पर बनवायी जा सकें। इसके अलावा खुले मैदान में घूम रहे लोगों या किसी पार्टी में इकट्ठे हुए लोगों की भी 3डी मूर्ति बना सके। अगर यह संभव हो सका, तो पुलिस को अपराधियों को पकड़ने में आसानी हो जाएगी। इसके अलावा लोगों को जब अपनी मूर्ति बनवाने का मौक़ा कहीं भी मिलने लगेगा, तो लोग दीवारों पर अपने फोटो टाँगने से बेहतर अपनी मूर्तियाँ बनवाना उचित समझेंगे।

3डी प्रिंटिंग मशीनें एक तरह के मॉडलिंग सॉफ्टवेयर के साथ काम करती है, जिसमें किसी व्यक्ति या चीज़ को स्कैन करके उसकी 3डी मूर्ति तैयार करती है। फोटो से 3डी मूर्ति बनाने में भी यही तकनीकी प्रक्रिया काम करती है; लेकिन फोटो से 3डी मूर्ति बनाने के लिए मशीन फोटो को अपलोड करके उसके आधार पर एक 3डी मॉडल तैयार करेगी, जिसके बाद उस तस्वीर का आकलन करके मूर्ति बना देगी। हालाँकि फोटो से 3डी मूर्ति बनाने में ज़रूरी नहीं कि व्यक्ति या किसी चीज़ की हू-ब-हू सब कुछ तैयार हो सके, क्योंकि मशीन फोटो का फ्रंट हिस्सा ही स्कैन कर पाएगी, बाक़ी का हिस्सा कल्पना के आधार पर मशीन बनाएगी, जिसके हू-ब-हू होने की गारंटी नहीं दी जा सकती। लेकिन फिर भी यह एक कमाल की तकनीक है, जिसके मार्केट में आते ही धूम मच जाएगी और लोग अपनी 3डी मूर्ति बनवाना चाहेंगे।

3डी मूर्ति बनाने में हाथ से मूर्ति बनाने की अपेक्षा कम ख़र्च आएगा और उससे कम समय में 3डी मूर्ति बनकर तैयार हो जाएगी। 3डी प्रिंटिंग मूर्ति एक तरह के कृत्रिम मैटेरियल से बनेगी, जिसमें प्लास्टिक, सिंथेटिक, पत्थर का पाउडर, चीनी मिट्टी आदि का उपयोग किया जा सकता है। 3डी मूर्ति बनाने के अलावा मूर्ति और तस्वीर कुरेदने के लिए 3डी प्रिंटिंग मशीन प्लास्टिक, धातुओं और पत्थरों का भी उपयोग भी कर सकेगी। यानी इस मशीन के द्वारा पुरातन समय की पत्थरों को काटकर की जाने वाली मूर्तिकला और चित्रकला की तरह ही ये 3डी मशीन मूर्तियाँ बनाएगी और चित्रकला भी कर सकेगी। इसके लिए मशीन समय भी कम लेगी और मूर्तिकला से ज़्यादा सफ़ाई से मूर्ति बना सकेगी।

3डी प्रिंटिंग और 3डी मूर्ति बनाने के अलावा 3डी मशीनों के ज़रिये चीन 3डी सेटेलाइट आसमान में भेजने की तैयारी भी कर रहा है। जानकारी के मुताबिक, साल 2028 तक चीन चांग ई-8 अंतरिक्ष यान लॉन्च करने की योजना भी बना रहा है। हर क्षेत्र में आगे निकलने की कोशिश कर रहा चीन अपने अंतरराष्ट्रीय चंद्र अनुसंधान स्टेशन (आईएलआरएस) से चाँद पर रहने की तरकीबें निकालने के लिए प्रयोग कर रहा है। चीन ने ज़मीन के अलावा चाँद की मिट्टी का उपयोग करके चाँद पर ईंटें बनाने की कोशिश कर रहा है और इसके बाद वह उस मिट्टी से 3डी मूर्ति बनाने की कोशिश करेगा।

चीन चाँद पर अपने नागरिकों को बसाने की कोशिश में लगा है, जिसे लेकर वह परीक्षण भी कर रहा है। अगर चीन इसमें सफल हो जाता है, तो वह चाँद की ज़्यादातर ज़मीन पर चीन क़ब्ज़ा कर लेगा, जिसके चलते चाँद पर भी वह वहाँ रहने या ज़मीन ख़रीदने को शौक़ीन लोगों को ज़मीन बेचने का काम कर सकता है। चीन के वैज्ञानिक, आम लोग 3डी मूर्ति बनाने व 3डी प्रिंटिंग तैयार करने में कामयाब होने पर काफ़ी खुश हैं। चीन जानता है कि आने वाला वक़्त नयी तकनीक और आधुनिकता से भरपूर होगा, जिसमें जल्दी क़दम रखने पर उसे बिना कंपटीशन वाला मार्केट भी मिल सकता है, जिसमें वो अपनी इस तकनीक से ईजाद मशीनों की बिक्री करके अरबों रुपये कमा सकता है। बता दें कि चीन ने दुनिया के हर बाज़ार में अपना दबदबा काफ़ी हद तक बनाया हुआ है, जिसके चलते उसकी जीडीपी बहुत अच्छी है और आर्थिक स्थिति भी बहुत मज़बूत है।

देश भर में पाकिस्तान और चीन के जासूस सक्रिय सीमा पार लेन देन में काफी वृद्धि

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली , 4 जून
देश में पाकिस्तानी जासूसों और स्लीपर सेल्स के बढ़ते नेटवर्क के बीच अब एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। वित्त मंत्रालय की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि बीते 10 सालों में देश में सीमा पार लेनदेन (क्रॉस-बॉर्डर ट्रांजेक्शन) की संख्या में बेतहाशा इजाफा हुआ है।
सूत्रों के मुताबिक, 2014–15 से लेकर 2023–24 के बीच कुल 16 करोड़ 68 लाख 43 हजार 425 करोड़ क्रॉस-बॉर्डर वायर ट्रांजेक्शन रिपोर्ट(CBWTR) दर्ज किए गए हैं। इनमें से अधिकांश लेनदेन अचानक, असामान्य रूप से और संदेहास्पद स्थितियों में किए गए हैं, जिन्हें मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकी फंडिंग से जोड़कर देखा जा रहा है।
वित्त मंत्रालय के इंटेलिजेंस विभाग से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि आतंकियों को मिलने वाली फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग पर लगाम लगाने के लिए फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय है औरऔर प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी देश के भीतर सतर्क है।
फिर भी इन ट्रांजेक्शनों में जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई है, जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बन गई है।ये वो लेनदेन हैं जो अचानक होते हैं और इन पर पहले से नजर नहीं होती।
2002 के मनी लॉन्ड्रिंग कानून के तहत कोई भी वित्तीय संस्था अगर ₹5 लाख या उससे ज्यादा का अंतरराष्ट्रीय लेनदेन करती है, तो उसे उसकी जानकारी तुरंत सरकार को देनी होती है। यह नियम सभी सरकारी, निजी, अंतरराष्ट्रीय बैंक, बीमा कंपनियाँ, म्युचुअल फंड्स और सहकारी संस्थाओं पर लागू होता है।
वित्त मंत्रालय ने 2013-14 से ‘क्रॉस-बॉर्डर वायर ट्रांजेक्शन रिपोर्ट’ का संकलन शुरू किया। इससे पहले, अंतर्राष्ट्रीय लेनदेन को अलग से दर्ज नहीं किया जाता था। 2013-14 में केवल 61231 लेनदेन किये गये। हालाँकि, 2014-15 से 2023-24 तक के दस वर्षों में सीमा पार वायर लेनदेन की आंकड़े लाखों से सीधे करोड़ों में पहुंच चुके हैं।
2019–20 और 2020–21 में सबसे ज्यादा ट्रांजेक्शन दर्ज किए गए। ये सभी लेनदेन ₹5 लाख से लेकर ₹4 करोड़ रुपये तक के रहे हैं।

वर्ष लेनदेन की संख्या

2023–24 12,95,64,06
2022–23 13,66,83,80
2021–22 13,68,52,50
2020–21 3,61,24,141
2019–20 3,95,53,003
2018–19 1,07,19,253
2017–18 94,07,903
2016–17 90,91,149
2015–16 1,53,05,924
2014–15 1,66,332

पहलगाम हमले के बाद खुफिया एजेंसियों ने अलग-अलग इलाकों से पाकिस्तान के लिए जासूसी कर रहे करीब 15 जासूसों को गिरफ्तार किया है। इसमें सरकारी कर्मचारी, ब्लॉगर, इंजीनियर आदि शामिल हैं। इससे पता चलता है कि आईएसआई ने भारत में जासूसों का एक नेटवर्क बनाया था। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के हमले को विफल करने में चीन ने पाकिस्तान की मदद की थी। ऐसे में इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि देश में चीनी जासूस भी सक्रिय हों।
ऑपरेशन सिंदूर’ के समय भारत पर हमले को रोकने के लिए चीन ने भी पाकिस्तान का साथ दिया था। ऐसे में अब ये भी आशंका जताई जा रही है कि चीनी एजेंट भी भारत में सक्रिय हो सकते हैं।
इन सभी एजेंटों तक फंडिंग कैसे पहुंचती है, यह अभी तक साफ नहीं हो पाया है। लेकिन CBWTR में दर्ज संदिग्ध ट्रांजेक्शनों की संख्या यह जरूर संकेत देती है कि फंडिंग का रास्ता डिजिटल और अंतरराष्ट्रीय लेनदेन से होकर गुजरता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने बाढ़ प्रभावित असम और सिक्किम के मुख्यमंत्री से की बात

नई दिल्ली: पूर्वोत्तर राज्यों में बाढ़ के कारण स्थिति गंभीर बनी हुई है। इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को पूर्वोत्तर राज्यों के कई मुख्यमंत्रियों से बाढ़ के कारण उत्पन्न हुई स्थिति पर बात की। साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार की ओर से हर संभव मदद का आश्वासन दिया।

जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा, सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग और मणिपुर के राज्यपाल अजय भल्ला से बात की। इस दौरान उन्होंने भारी बारिश और बाढ़ के कारण उत्पन्न हुई स्थिति के बारे में भी जानकारी ली। प्रधानमंत्री ने उन्हें हर संभव मदद और समर्थन का आश्वासन दिया।

इससे पहले, सोमवार को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने पूर्वोत्तर राज्यों के कई हिस्सों में हो रही लगातार भारी बारिश पर गहरी चिंता जताई थी।

जे.पी. नड्डा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के माध्यम से प्रभावित लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त की और भाजपा की राज्य इकाइयों और कार्यकर्ताओं को राहत कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेने का निर्देश दिया है।

नड्डा ने अपनी पोस्ट में लिखा, “पूर्वोत्तर राज्यों के कुछ हिस्सों में लगातार हो रही भारी बारिश से प्रभावित लोगों के लिए बहुत चिंतित हूं। मैंने भाजपा की राज्य इकाइयों और कार्यकर्ताओं को जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार हर संभव सहायता प्रदान करने का निर्देश दिया है। मैं प्रभावित क्षेत्रों में सभी से आग्रह करता हूं कि वे आवश्यक सावधानी बरतें, अनावश्यक यात्रा से बचें और स्थानीय अधिकारियों की सलाह का पालन करें।”

बीते रविवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम (हिमंत बिस्वा सरमा), अरुणाचल प्रदेश (पेमा खांडू) और सिक्किम (प्रेम सिंह तमांग) के मुख्यमंत्रियों और मणिपुर के राज्यपाल (अजय कुमार भल्ला) से टेलीफोन पर बातचीत कर बाढ़ की स्थिति के बारे में जानकारी ली थी।

विभिन्न पूर्वोत्तर राज्यों के अधिकारियों के अनुसार, 29 मई से जारी बारिश और बाढ़ के दौरान हुई 34 मौतों में असम में कम से कम 10 लोग मारे गए, इसके बाद अरुणाचल प्रदेश में नौ, मेघालय और मिजोरम में छह-छह, त्रिपुरा में दो और नागालैंड में एक व्यक्ति की मौत हुई।

पूर्वोत्तर राज्यों के आपदा प्रबंधन अधिकारियों ने बताया कि ये मौतें डूबने, भूस्खलन और जलभराव के कारण हुई हैं।

महाराष्ट्र में कहीं पानी, कहीं प्यास

के. रवि (दादा)

महाराष्ट्र में पीने के पानी की दिक़्क़त बढ़ती जा रही है। ये दिक़्क़त कोई आज की नहीं है, पर इसका समाधान नहीं होने के चलते बढ़ती जा रही है। वहीं दूसरी तरफ़ बारिश के पानी की आफ़त जब बरसात के महीने में महाराष्ट्र पर टूटती है, तो महाराष्ट्र के कई गाँव और कई शहर पानी में डूबने लगते हैं। पहली ही बरसात में महाराष्ट्र के कई इलाक़ों समेत मुंबई में बृहन्मुंबई नगर पालिका के काम की तो पोल खुल ही गयी है, महाराष्ट्र सरकार के मेट्रो के काम भी पोल खुल गयी है, जो पहली ही बरसात में किसी झोपड़पट्टी से भी बुरी तरह तहस-नहस हो गया। अफ़सोस यह है कि महाराष्ट्र में अब तक रही सरकारोंं से लेकर मौज़ूदा महायुति सरकार ने भी इसका कोई ख़ास समाधान न किया है, जिसका ख़ामियाजा मुंबईकरों को झेलना पड़ता है। मायानगरी के नाम से दुनिया भर में मशहूर मुंबई सरकार को और सरकारी विभागों को ख़ूब सारा पैसा टैक्स के रूप में देती है; पर मुंबईकरों को इसके बदले बदहाली के अलावा कुछ नहीं मिलता। इसके चलते जहाँ पानी की आफ़त बरसात में नहीं आती, जहाँ की सीवर लाइनें ठीक काम करती हैं और जहाँ पीने के पानी भी आराम से मिल जाता है, मुंबई में वहाँ फ्लैटों की क़ीमत ही करोड़ों रुपये होती है।

दूसरी तरफ़ मुंबई में पानी सप्लाई करने वाली झीलों में पानी काफ़ी कम होने के चलते बृहन्मुंबई नगर निगम ने मुंबईकरों के पानी की सप्लाई में कटौती कर रही है। मई के महीने में मुंबईकरों को पानी के लिए कई बार परेशान रहे हैं। बृहन्मुंबई नगर निगम ने ऐलान किया है कि मुंबई में पानी की सप्लाई में 30 मई से पाँच प्रतिशत और 05 जून से 10 प्रतिशत कटौती की जाएगी। इस जानकारी को साझा करने के साथ ही बृहन्मुंबई नगर निगम ने मुंबईकरों को पानी की बचत करने की सलाह दी है। बृहन्मुंबई नगर निगम का कहना है कि पिछले साल बरसात कम होने के कारण पिछली बार के मुक़ाबले इस बार डैम में 5.64 प्रतिशत पानी कम है। बृहन्मुंबई नगर निगम के सूत्रों ने बताया है कि मुंबई की झीलों में दो महीने से भी कम समय तक की सप्लाई का पानी बचा है। अपर वैतरणा, मध्य वैतरणा, तानसा, भातसा, मोडक सागर, तुलसी और विहार झीलों से हर दिन मुंबईकरों को लगभग 3,850 एमएलडी से ज़्यादा पानी की आपूर्ति की जाती है; पर अब इन झीलों में पानी कम होने के चलते आपूर्ति कम हो पा रही है।

सप्लाई के पानी की दिक़्क़त के साथ मुंबई की सीवर लाइन, नालों में पड़ी गंदगी और बरसात में बाढ़ की आफ़त भ्रष्टाचार के नमूने हैं, जिसका इल्ज़ाम लगातार बृहन्मुंबई नगर निगम पर लगता रहता है। मुंबईकरों का कहना है कि जिस नगर निगम को देश के हर नगर निगम से ज़्यादा टैक्स मिलता है, उसमें भ्रष्टाचार व्याप्त होना कोई अनोखी बात नहीं है; पर इतना भ्रष्टाचार भी ठीक नहीं कि अभी तक मुंबई की इन चार समस्याओं का इलाज ही नहीं हुआ है। मुंबईकरों का सीधा सवाल है कि अभी तक बृहन्मुंबई नगर निगम ने इन समस्याओं का हल क्यों नहीं निकाला है?

कुछ लोगों को ऐसा आरोप है कि बृहन्मुंबई नगर निगम के अधिकारी और कर्मचारी सिर्फ़ कमायी करते हैं, काम नहीं। बरसात आने पर जब सड़कों से लेकर बिल्डिंगों तक में पानी भर जाता है, तभी मुंबईकरों में भी हाहाकार मचता है और बृहन्मुंबई नगर निगम के भी अधिकारियों-कर्मचारियों की नींद खुलती है। उसके बाद सब भूल जाते हैं।

असल में मुंबई में नालों और सीवर की सफ़ाई का काम ठीक से कभी नहीं होता है। टूटे हुए नालों और सीवरों की मरम्मत का काम भी पूरी तरह से नहीं होता है। बृहन्मुंबई नगर निगम जहाँ समस्या होती है, वहीं इलाज करने की कोशिश करता रहता है। पूरे मुंबई शहर के सीवरों को बरसात के आने पर साफ़ करना नामुमकिन है और बृहन्मुंबई नगर निगम यही करता है। पर साल के पूरे 365 दिन सफ़ाई का काम हो, तो मुंबई में बरसात में बिल्डिंगों में पानी नहीं भर सकेगा।

महाराष्ट्र में मानसून दस्तक दे चुका है, जो मुंबईकरों के लिए हर साल परेशानी लेकर आता है। कई बार बरसात का इतना पानी भर जाता है कि मुंबई थम जाती है। बिल्डिंगों में सीवर मिला हुआ बरसात का पानी भर जाता है, जिसकी दुर्गंध पानी निकलने के बाद भी कई दिनों तक रहती है। बरसात का पानी भरने से लोगों का बहुत सामान ख़राब होता है।

मौसम विभाग ने बरसात का अलर्ट जारी करते हुए लोगों से सावधानी बरतने की अपील करते हुए पश्चिमी महाराष्ट्र के कई इलाक़ों के अलावा मुंबई, नवी मुंबई, कोंकण, रायगढ़ के लिए रेड अलर्ट जारी किया है, जबकि ठाणे और पालघर के लिए ऑरेंज अलर्ट और पुणे, नासिक, कोल्हापुर, सिंधुदुर्ग, रत्नागिरी और सतारा के लिए येलो अलर्ट जारी किया है।

सेना, सिन्दूर और सियासत

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो यह संभव नहीं कि किसी के शरीर में ख़ून की जगह सिन्दूर बहे। लेकिन जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक भरी जनसभा में यह कहा, तो ज़्यादातर लोगों ने इसे राजनीतिक (सियासी) डायलॉग माना। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के सिन्दूर को इस तरह अपनी सियासी के केंद्र में ले आने के बीच एक कड़वा सच यह है कि पहलगाम में 26 बहनों का सिन्दूर उजाड़ने वाले चार आतंकी अभी भी नहीं पकड़े गये हैं। लेकिन प्रधानमंत्री की पार्टी भाजपा के बड़े नेता आये दिन शहीदों की विधवाओं, सेना की नायिकाओं के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं और सीमा पार भारत के नौ आतंकी ठिकानों पर हमले में बचे सभी आतंकी सरगना नये सिरे से ख़ुद को खड़ा करने में जुटे हैं।

प्रधानमंत्री के बयानों को शायद इसलिए भी राजनीति से जुड़ा माना जाता है कि इस तरह की घटनाएँ चुनावों के आसपास हुई हैं। साल 2019 में लोकसभा के चुनाव थे और अब बिहार के चुनाव हैं। यह चुनाव भाजपा के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण माने जा रहे हैं। एक नयी बात भारत के इतिहास में यह हुई कि भारत-पाकिस्तान के बीच हाल के लघु युद्ध में देश की नायिका के रूप में उभरी सेना की कर्नल सोफ़िया क़ुरैशी के माता-पिता ने प्रधानमंत्री मोदी के गुजरात के वडोदरा में उनके राजनीतिक रोड शो में हिस्सा लिया। पहले तो यह पता नहीं चल सका कि उन्होंने ऐसा ख़ुद की इच्छा से किया या इसके पीछे स्थानीय भाजपा नेताओं की इच्छा थी। सोफ़िया की माता हलीमा क़ुरैशी और पिता ताज मोहम्मद क़ुरैशी ने बाद में प्रधानमंत्री से हुई मुलाक़ात को ज़िन्दगी का अविस्मरणीय पल भी बताया। लेकिन जब एक मीडियाकर्मी ने सोफ़िया की माँ से सवाल किया कि क्या आपको स्पेशली इनवाइट किया गया था आज? तो उन्होंने बताया कि वहाँ लोकल कलेक्टर ऑफिस (ज़िलाधिकारी कार्यालय) से कॉल था। मीडियाकर्मी ने पूछा कि अच्छा, ये आपको लोकल कलेक्टर ऑफिस से कॉल आया था कि आप जाइए रोड शो के लिए आज? इस पर हलीमा क़ुरैशी ने कहा कि हाँ; बुलाया गया था।

प्रधानमंत्री मोदी एक चतुर राजनीतिक हैं। यह माना जाता है कि उनके पास अनेक इनपुट थे, जो यह संकेत कर रहे थे कि जिस तरह से भारत-पाक के बीच युद्ध-विराम की घोषणा हुई और यह घोषणा भी अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ़ से हुई, उसका देश के लोगों में अच्छा संकेत नहीं गया है। सच है कि लोगों में इससे नाराज़गी थी। अभी भी इस पर सवाल उठ रहे हैं। ऊपर से भाजपा के बड़े नेताओं की शहीदों की विधवाओं, कर्नल सोफ़िया को लेकर लगातार अपमानजनक टिप्पणियों ने भाजपा को रक्षात्मक कर दिया। भाजपा की राजनीति कितने निचले स्तर को छू चुकी है, इसका एक उदाहरण भाजपा के बड़े नेता अमित मालवीय ने राहुल गाँधी का आधा चेहरा पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर के आधे चेहरे से मिक्स करके उसे बाक़ायदा अपने एक्स हैंडल पर पोस्ट करके दिया। भाजपा नेताओं के अलावा देश में इसे किसी ने भी पसंद नहीं किया। जिन राहुल गाँधी की दादी इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री रहते पाकिस्तान के दो टुकड़े करवा दिये और उनके सेना प्रमुख को भारत के सामने हथियार डालने के लिए मजबूर किया, उन राहुल गाँधी का इस तरह अपमान करना किसी को अच्छा नहीं लगा। देश के लोग अब सोचने लगे हैं कि भाजपा जिस दिशा में देश को ले जा रही है, उसके नतीजे कितने भयंकर होंगे।

राजनीतिक रूप से हुए इन सभी नुक़सानों को कवरअप करने के लिए ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी को मैदान में आना पड़ा है। युद्ध-विराम में ट्रम्प की मध्यस्थ की भूमिका सामने आने और ट्रम्प के भारत तथा पाकिस्तान को एक ही क़तार में खड़ा करने के साथ यह कहने कि व्यापार के बदले भारत (और पाकिस्तान) युद्धविराम को मान गये, से भारत में यह संदेश गया है कि भारत का नेतृत्व ट्रम्प के दबाव में काम कर रहा है। इसके अलावा भाजपा नेताओं के शर्मनाक बयानों और लोगों में इस बात पर हैरानी होना कि पहलगाम के चार हत्यारे आतंकी कहाँ ग़ायब हो गये और पाक के आतंकी ठिकानों पर हमलों में एक भी बड़ा आतंकी क्यों नहीं मारा गया? जैसे सवाल जनता में उठने के कारण भी भाजपा रक्षात्मक हुई। इसके बाद भाजपा ने ध्यान भटकाने के लिए कांग्रेस, ख़ासकर राहुल गाँधी को निशाना बनाना शुरू किया। ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने राजस्थान के बीकानेर की जनसभा में दावा कर दिया कि उनकी नसों में ख़ून नहीं, गरम सिन्दूर दौड़ रहा है। निश्चित ही प्रधानमंत्री हाल में हुए नुक़सान और जनता में गये नकारात्मक संदेश से ख़ुद को और पार्टी को बाहर लाने की क़वायद में जुट गये हैं। उन्हें पता है कि देश की सुरक्षा के मामले में जनता की भावनाएँ अलग तरीक़े से काम करती हैं और राजनीति में बड़ा नुक़सान करने की क्षमता रखती हैं। लिहाज़ा अब रोज़ पाकिस्तान पर शाब्दिक हमले हो रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में आतंकी घटनाओं की ख़बरें अभी भी जारी हैं; लेकिन राजनीतिक शोर में उन्हें दबाने की कोशिश हो रही है।

भारत-पाकिस्तान के लघु युद्ध के बाद जब सेना की वर्दी में प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीरें देश की सड़कों के किनारे होर्डिंग में लगी दिखीं, तभी यह अहसास हो गया था कि अब पहलगाम के 26 लोगों की शहादत राजनीति की सूली पर चढ़ने वाली है।

राजनीति बड़ी निष्ठुर चीज़ है। दर्द-दु:ख सबको अपने लिए इस्तेमाल करती है। सैनिकों की बहादुरी और क़ुर्बानियों को भी। लिहाज़ा अब देश में सिन्दूरिया सागर की गर्जना है। ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी राजनीति की इस रैली को लीड कर रहे हैं। वह नित नये नारे देश को दे रहे हैं। पाकिस्तान को हर भाषण में ख़बरदार कर रहे हैं। निश्चित ही मोदी इस तरह की राजनीति के उस्ताद खिलाड़ी हैं। लेकिन क्या भारत पाकिस्तान के लघु युद्ध के समय की परिस्थितियों में जनता के भीतर उठे सवाल ख़त्म हो गये हैं? शायद नहीं। पहला सवाल यह कि युद्ध-विराम के बाद ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने पाक अधिकृत कश्मीर की बात करके इस मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण कर दिया। दूसरा सवाल- युद्ध की इतनी भीषण स्थिति में क्यों एक भी देश भारत के साथ खड़ा नहीं हुआ? जबकि सरकार का दावा था कि दुनिया में भारत का डंका बज रहा है। युद्ध में इस तरह अकेले पड़ जाने को जानकार मोदी सरकार की विदेश और कूटनीति और राजनीतिक नाकामी बता रहे हैं। इससे समर्थकों की तरफ़ से सोशल मीडिया के ज़रिये बनायी प्रधानमंत्री मोदी की विश्व गुरु की छवि को धक्का लगा है।

एक और सवाल इस दौरान उभरा है कि पाकिस्तान क्यों जश्न मना रहा है? जबकि हमारे मुताबिक वो युद्ध हारा है। वहाँ के सेनाध्यक्ष असीम मुनीर फील्ड मार्शल का दर्जा पा गये हैं। ऐसा क्या हुआ कि युद्ध के बाद पाकिस्तान में कहीं निराशा का माहौल नहीं है? कोई युद्ध हारे, तो वहाँ की सत्ता और सेना में गहन निराशा होती है, यह स्वाभाविक है। युद्ध में हार को चेहरे से छिपाया नहीं जा सकता। साल 1971 के युद्ध को याद कर लीजिए। महीनों पाकिस्तान में सत्ताधीशों और सेना के जनरलों के चेहरे लटके रहे थे। जनता में भी निराशा थी। इसमें कोई दो-राय नहीं कि मई के युद्ध में हमारी सेना ने अपनी शक्ति दिखाकर साबित किया कि वह महान् सेना है। लेकिन अचानक युद्ध-विराम के पीछे के क्या कारण थे? यह तो राजनीतिक फ़ैसला था ना! इसी पर सवाल भी हैं। सेना पर तो हर भारतवासी को भरोसा है। प्रधानमंत्री मोदी ने युद्ध-विराम के बाद सिन्दूर को अपनी राजनीति का नया नारा बनाया है, तो पाक अधिकृत कश्मीर को अपनी राजनीति के लक्ष्य (बेंचमार्क) के रूप में सामने रखा है। निश्चित ही यह चुनौतीपूर्ण लक्ष्य है; क्योंकि चीन भी पीओके में बैठा है। चीन और तुर्की पाकिस्तान को शक्तिशाली कर रहे हैं। यदि मोदी बतौर प्रधानमंत्री इस लक्ष्य को हासिल नहीं करते हैं, तो इंदिरा गाँधी के बाद उनकी तरह का इस मायने में बड़ा नेता कहलाने का उनका सपना सपना ही रह जाएगा। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की घटना होने पर फिर पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर आक्रमण की बात उन्होंने की थी; लेकिन आतंकी अभी भी सक्रिय दिख रहे हैं और उनसे हमारे सुरक्षा बलों की मुठभेड़ भी हो रही हैं।

फ़िलहाल मोदी ‘सिन्दूर मेरी रगों में ख़ून की जगह दौड़ रहा है।’ ‘पाकिस्तानी रोटी नहीं खाना चाहते, तो मेरी गोली तो है ही।’ जैसे जुमले अपनी सभाओं में चला रहे हैं। वह भारत-पाकिस्तान के हाल के टकराव से सबसे ज़्यादा प्रभावित जम्मू-कश्मीर अभी एक बार भी नहीं गये हैं, जहाँ पुँछ और राजौरी में 26 नागरिकों को पाकिस्तान के हमलों में जान गँवानी पड़ी है। जबकि सुरक्षा बलों के 18 जवानों-अधिकारियों ने भी शहादत दी है। वह पहलगाम भी नहीं गये हैं, जहाँ 26 लोगों को आतंकवादियों ने अपनी गोलियों से भून दिया। विपक्ष के नेता राहुल गाँधी वहाँ जा चुके हैं और प्रभावित लोगों का दु:ख-दर्द बाँट आये हैं। दज़र्नों घर पाकिस्तान की गोलीबारी से तबाह हो गये हैं। उनके प्रभावितों को तत्काल आर्थिक मदद (एक्स ग्रेसिया) अभी तक नहीं मिली है। देशभक्ति सिर्फ़ राजनीति करने और जुमले उछालने की चीज़ नहीं है। देशभक्ति देश के लोगों के सुख-दु:ख में उनके साथ खड़ा होने का नाम है।

शत्रुता का भाव

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दोबारा जबसे अमेरिका की कमान सँभाली है, भारत उनकी आँखों में तिनके की तरह चुभ रहा है। इसके चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उनसे दोस्ती का दावा अब उन्हें भी समझ आने लगा है, जो नमस्ते ट्रम्प के आयोजन में भारत सरकार के 100 करोड़ रुपये के ख़र्च पर भी उछल-उछलकर इसे मोदी की बहुत बड़ी उपलब्धि बता रहे थे। लेकिन ये लोग चुप हैं। बिलकुल प्रधानमंत्री मोदी और उनके मुरीद भाजपाइयों की तरह। क्या कहेंगे? जवाब ही नहीं है। लंगोटिया दोस्ती की पोल खुल गयी और बोलने जैसा कुछ किया नहीं है। इसलिए सबको गुमराह करने के लिए रगों में गर्म सिंदूर दौड़ा दिया। चीन के अतिक्रमण, पाकिस्तान की हिमाक़त, अमेरिका की धौंस और देश में व्याप्त अराजकता, भ्रष्टाचार, महँगाई, ग़रीबी, बेरोज़गारी, अपराध पर जवाब देने के लिए हक़ीक़त में 56 इंच का सीना चाहिए।

कहा जाता है- नीयत साफ़, तो मंज़िल आसान। सारा खेल नीयत का है। नीयत में खोंट हो, तो आदमी कहीं बोलने लायक नहीं होता; और अगर कहीं बोलता भी है, तो उसे झूठ का सहारा लेना पड़ता है। नाटक करना पड़ता है। यह किसी एक व्यक्ति विशेष की बात नहीं है। संसार में ऐसे लोगों की भरमार है। निजी अनुभव के आधार पर कहा जा सकता है कि छ: तरह के लोग आँखों में आँखें डालकर बात करने लायक नहीं रहते- धोख़ेबाज़, क़ज़र्दार, दलाल, ग़ुलाम, अहसान में दबे हुए और जिनकी नग्नता जगज़ाहिर हो। अब तो भारत में ऐसे-ऐसे लोग हैं, जो इन लक्षणों से कहीं आगे बुराइयों का पहाड़ बने हुए हैं।

आज भारत के दुश्मन देशों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। जो देश कभी अंग्रेजों के ख़िलाफ़ भारत की आज़ादी के लिए लड़ने को तैयार थे, वे भी आज भारत को पीठ दिखा रहे हैं। पड़ोसी देशों ने भारत को इतना कमज़ोर मान लिया है कि वे गाहे-ब-गाहे भारत को आँख दिखाने की कोशिश करते रहते हैं। चीन की लगातार भारत के सीमावर्ती राज्यों में घुसपैठ, पाकिस्तान के द्वारा लगातार सीजफायर और आतंकवादियों के हमले, अमेरिका का भारत के ख़िलाफ़ लगातार बयानबाज़ी करना और कमज़ोर देशों का आँख दिखाना भारत की मौज़ूदा सरकार के मिकम्मेपन की वो मिसालें हैं, जिन्हें इतिहास माफ़ नहीं करेगा।

इसके अलावा देश में तमाम तरह की समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं, जिनमें धर्म और जाति के नाम पर सरेआम हो रही हत्याएँ, मारपीट और बलात्कार की घटनाएँ, बेरज़गारी, हर तरफ़ बढ़ती नफ़रत, तनाव, कई पुलिसकर्मियों का क्रूर चेहरा, लगातार होता भ्रष्टाचार, बढ़ती ग़रीबी, कालाबाज़ारी, बढ़ता कालाधान, पूँजीपतियों को फ़ायदा पहुँचाने की सोच, नेताओं के शर्मनाक बयान और उनकी क्रूरता एवं अश्लीलता के वीडियो, सरकार से सवाल करने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई जैसी तमाम घटनाएँ भारत की गरिमा को धक्का पहुँचाने वाली हैं। इस सबके बावजूद प्रधानमंत्री मोदी का चुनावों में डूबे रहना और देश-विदेश की यात्राएँ करते रहना इस बात के सुबूत हैं कि उनकी नसों में बह रहा गर्म सिन्दूर अपने ही लिए घातक है, बाहर वालों के लिए नहीं। वह बिना सोचे-समझे कुछ भी बोल देते हैं। इसलिए अब उनके किसी भी बयान को लोग गंभीरता से नहीं लेते हैं। देश-विदेश में बहुत-से लोग तो उनकी हँसी उड़ाने लगे हैं।

कम-से-कम आज़ादी के बाद भारत के इतिहास में यह पहली बार है, जब प्रमुख संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति का इस तरह दुनिया भर में मज़ाक़ उड़ रहा है। कितने ही लोग प्रधानमंत्री पद की गरिमा का सम्मान करके भी प्रधानमंत्री मोदी का सम्मान नहीं कर रहे हैं और सार्वजनिक तौर पर उन्हें भला-बुरा कह रहे हैं। लेकिन इसके लिए ज़िम्मेदार कौन है? क्या लोग इसके लिए ज़िम्मेदार हैं? लोग तो आख़िर वही हैं, जिन्होंने 2014 में मोदी का ज़ोरदार स्वागत किया था और लगातार चुनकर केंद्र की सत्ता में पहुँचाया भी है। एक समय था, जब कोई मोदी के बारे में ज़रा-सी भी नकारात्मक टिप्पणी कर देता था, तो ज़्यादातर लोग उससे झगड़ जाते थे। फिर महज़ 11 साल में ऐसा क्या हो गया कि देश के ज़्यादातर लोग प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ खड़े नज़र आने लगे हैं? अभी हाल ही में एक सर्वे रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि देश के 70 प्रतिशत लोग प्रधानमंत्री मोदी के टी.वी. पर आते ही चैनल बदल देते हैं। मन की बात के सुनने वाले घटते जा रहे हैं।

कहा जाता है कि अपनी इज़्ज़त अपने हाथ में होती है। लेकिन अपनी इज़्ज़त भी बचाना तभी संभव है, जब व्यक्ति समझदार और ईमानदार हो। केवल ताक़त के भरोसे इज़्ज़त बचाना अगर संभव होता, तो बड़े-बड़े धनवान फ़क़ीरों के चरणों में नतमस्तक नहीं होते। संसार में धनवानों का सम्मान लोग अपनी ज़रूरत और धन के कारण ही करते हैं। इस हृदयविहीन सम्मान की पूरी इमारत स्वार्थ और डर पर टिकी होती है। लेकिन ज्ञानी कमज़ोर भी हों, तो भी उनका सम्मान होता है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी को चाहिए कि वह सोच-समझकर बोलें और देश की समृद्धि एवं विकास के लिए काम करें; सिर्फ़ स्व-सत्ता के लिए नहीं।

आतंक की जीवन-रेखा: काला धन और विदेशी मुद्रा रैकेट

22 अप्रैल को पहलगाम में आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत के बाद नई दिल्ली ने आतंकवाद को समर्थन देने की पाकिस्तान की भूमिका को उजागर करने के प्रयास तेज़ कर दिये हैं। पाकिस्तान का यह समर्थन आतंकी प्रशिक्षण और संभार-तंत्र से आगे सतत वित्तीय सहायता तक विस्तृत है। 33 देशों में शुरू किये गये कूटनीतिक अभियान के बीच पाकिस्तान का मुक़ाबला करने के राष्ट्र के संकल्प के अनुरूप ‘तहलका’ द्वारा की गयी एक हालिया पड़ताल से पता चला है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के हाई अलर्ट पर रहने के बावजूद अवैध विदेशी मुद्रा व्यापार का अवैध विनिमय (लेन-देन) फल-फूल रहा है।

इस बार ‘तहलका’ की आवरण कथा ‘विदेशी मुद्रा रैकेट और आतंकवाद’ में ‘तहलका’ रिपोर्टर ने पाया कि दिल्ली के निज़ामुद्दीन क्षेत्र में मुद्रा डीलर नियामकीय निगरानी को पूरी तरह से दरकिनार करते हुए खुलेआम मुद्रा बदलने का काम कर रहे हैं; फिर भी क़ानून प्रवर्तन एजेंसियाँ ​आँखें मूँदे बैठी हैं। यह स्मरणीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘नो मनी फॉर टेरर’ कॉन्फ्रेंस के दौरान पाकिस्तान की तरफ़ इशारा करते हुए कहा था कि कुछ देश आतंकवाद को विदेश नीति के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इसके अतिरिक्त कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने पनामा की यात्रा के दौरान पिछले दो दशकों में न्यूयॉर्क और मैड्रिड से लेकर मुंबई तक हुए हमलों के पैटर्न का हवाला देते हुए पाकिस्तान पर ‘आतंकवाद को बढ़ावा देने की नीति’ चलाने का आरोप लगाया था।

बता दें कि 26/11 के हमलों के बाद प्रस्तुत किये गये ठोस सुबूतों के बावजूद पाकिस्तान ने एक भी आतंकवादी को दोषी नहीं ठहराया है। आतंकवाद को लेकर बढ़ती चिन्ताओं के बीच भारत द्वारा विदेश में इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी गयी है कि पाकिस्तान अक्टूबर, 2022 में वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ) की ग्रे सूची से हटाये जाने के बावजूद आतंकवाद के वित्तपोषण पर अंकुश लगाने की अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में विफल रहा है। भारत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए भी आग्रह कर रहा है। क्योंकि भारत को आशंका है कि विदेशी सहायता का उपयोग आतंकवाद को वित्तपोषित करने और प्रतिबंधित आतंकवादी समूहों को समर्थन देने में किया जा रहा है। पाकिस्तान का उच्च रक्षा व्यय उसके राष्ट्रीय बजट का लगभग 18 प्रतिशत है, जो कि हथियारों के आयात में वृद्धि, विशेष रूप से आईएमएफ सहायता की अवधि के दौरान; विदेशी सहायता को सैन्य तथा संभावित रूप से आतंकवाद-सम्बन्धी उद्देश्यों की ओर पुनर्निर्देशित करने का संकेत करता है।

विशेषज्ञों ने काले बाज़ार में मुद्रा विनिमय की भूमिका पर भी प्रकाश डाला है, जो लंबे समय से टैक्स चोरी से जुड़ा हुआ है और स्लीपर सेल को बढ़ावा देने, आतंकियों को हथियार मुहैया कराने तथा चरमपंथी बुनियादी ढाँचे को समर्थन देने में भी भूमिका निभा रहा है। भारत की वित्तीय ख़ुफ़िया इकाई (एफआईयू) ने पहले भी हवाला नेटवर्क, अवैध विदेशी मुद्रा गतिविधि, तस्करी और आतंकवाद के बीच सम्बन्धों पर नज़र रखी है। हालाँकि प्रवर्तन एजेंसियों की सुस्ती से ये गतिविधियाँ अनियंत्रित रूप से बढ़ रही हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल ने इस वित्तीय सहायता को आतंकवाद की जीवन-रेखा कहा है।

यह विचार हाल ही में भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन के दौरान भी दोहराया गया। लेकिन अंतरराष्ट्रीय ध्यान पाकिस्तान की बाहरी भागीदारी पर केंद्रित है, जबकि आंतरिक वित्तीय रिसाव की बढ़ती समस्या को नज़रअंदाज़ करना कठिन होता जा रहा है। आतंकवाद का वित्तपोषण किसी भी समाज में आतंकवाद को बनाए रखने वाले तीन सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्वों में से एक है। इसके साथ ही इससे ग़लत मानसिकता और हथियारों का प्रवाह भी होता है। धन के बिना आतंकवादियों की भर्ती करना, उनके लिए प्रशिक्षण शिविर चलाना या हथियारों की आपूर्ति सुनिश्चित करना असंभव है। जैसा कि अधिकारी और जाँचकर्ता तेज़ी से स्वीकार कर रहे हैं कि आतंकवाद सिर्फ़ विचारधारा पर नहीं पनपता है, बल्कि वह नक़दी पर चलता है, जो अवैध तरीक़े से संचरित होती है। और इस नक़दी के अधिकांश हिस्से का लेन-देन आतंक की छत्रछाया में होता है।

विदेशी मुद्रा रैकेट और आतंकवाद

आतंकवाद की छाया में फल-फूल रहा विदेशी मुद्रा रैकेट

इंट्रो- सन् 2016 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी की थी, तब कहा था कि इससे आतंकवाद की कमर टूट जाएगी। लेकिन तबसे अनेक आतंकी घटनाएँ बताती हैं कि आतंकवाद की कोई कमर नहीं टूटी है। आतंकवादियों के दो संबल हैं- पहला और प्रमुख है वित्तपोषण यानी धन, और दूसरा है हथियार। अगर ये दो चीज़ें उन्हें न मिलें, तो आतंकी घटनाओं पर हमेशा के लिए रोक लग सकती है। लेकिन आतंकवादियों के वित्तपोषण के रास्ते कई हैं, जिनमें से एक उन्हें हवाला के ज़रिये विदेशी मुद्रा का मिलना है, जिसका वैध-अवैध लेन-देन लगातार हो रहा है। विदेशी मुद्रा का अवैध लेन-देन करने के लिए बाक़ायदा रैकेट चल रहे हैं। पहलगाम आतंकी हमले के बाद बढ़ी राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच ‘तहलका’ ने ऐसे ही अवैध विदेशी मुद्रा रैकेट चलाने वालों का पता लगाया है, जो बेरोकटोक आसानी से अवैध रूप से यह काम कर रहे हैं। इस तरह के अवैध विदेशी मुद्रा व्यापार से आतंकवाद का वित्तपोषण होता है। पढ़िए, तहलका एसआईटी की यह ख़ास रिपोर्ट :-

सन् 2008 के मुंबई हमलों के बाद 22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम में आम नागरिकों पर हुए सबसे घातक आतंकवादी हमले से देश हिल गया। पाकिस्तान से आये चार सशस्त्र आतंकवादियों ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम की बैसरन घाटी में पर्यटकों पर हमला कर दिया, जिसमें 26 नागरिक मारे गये। पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा की शाखा द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) ने इसकी ज़िम्मेदारी ली है। आतंकवादियों ने हिन्दू पर्यटकों को निशाना बनाया और गोली मारने से पहले उनका धर्म पूछा। हालाँकि इस घटना में एक नेपाली पर्यटक और एक स्थानीय मुस्लिम की भी आतंकियों ने हत्या कर दी। एम4 कार्बाइन और एके-47 से लैस आतंकवादी घने देवदार के जंगलों से घिरी बैसरन घाटी के पर्यटक स्थल में घुस गये और नरसंहार को अंजाम दिया।

जवाब में भारत ने उन आतंकी ठिकानों को नष्ट करने के लिए ऑपरेशन सिन्दूर शुरू किया, जिनके बारे में उसका मानना ​​है कि वह (पाकिस्तान) हमले के पीछे था। भारतीय सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान और पाकिस्तान के क़ब्ज़े वाले कश्मीर में नौ आतंकवादी स्थलों पर हमला किया और 100 आतंकवादियों को मार गिराने का दावा किया। पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए भारत के सीमावर्ती राज्यों में ड्रोन हमले किये और गोलाबारी की। बदले में भारत ने मिसाइलों और ड्रोन से हमला किया, जिससे कम-से-कम पाकिस्तानी वायुसेना के आठ ठिकानों को भारी नुक़सान पहुँचा। दोनों पड़ोसी देशों के बीच कम तीव्रता वाला संघर्ष उस समय अचानक रुक गया, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम कराने का श्रेय लेते हुए इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। हालाँकि भारत सरकार ने ट्रम्प के दावे को तुरंत ख़ारिज कर दिया। इस रिपोर्ट के लिखे जाने के समय तक दोनों देश युद्ध विराम की स्थिति में थे।

हालाँकि हमले के लगभग एक महीने बाद भी पहलगाम नरसंहार के संदिग्ध अभी भी फ़रार हैं। 13 मई को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने तीन लोगों की तस्वीरें जारी कीं, जिनके पहलगाम हमले में शामिल होने का संदेह है। जाँच में तेज़ी लाने के लिए अधिकारियों ने उनकी गिरफ़्तारी में सहायक सूचना देने वाले को 20 लाख रुपये का नक़द इनाम देने की भी घोषणा की। सूत्रों का कहना है कि स्थानीय समर्थन के बिना इतना भीषण हमला संभव नहीं था। पहलगाम की घटना भारत में दशकों से हो रहे आतंकवादी हमलों की लम्बी श्रृंखला में नवीनतम घटना है। देश को आतंकवाद मुक्त बनाने के लिए उत्तरोत्तर सरकारों ने विभिन्न क़दम उठाये हैं; लेकिन आतंकवादियों ने बार-बार हमला करके इन प्रयासों पर पानी फेर दिया है।

आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में अवैध वित्तपोषण किसी भी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। यह सवाल दशकों से हर भारतीय के मन में रहा है कि आतंकवादियों को भारत में हमला करने के लिए धन और सैन्य सहायता कहाँ से मिलती है? हालाँकि व्यापक रूप से माना जाता है कि इन हमलों के पीछे पाकिस्तान का हाथ है; लेकिन स्थानीय स्तर पर इनका समर्थन कौन कर रहा है? उन्हें कौन धन मुहैया करा रहा है? और यह धन आतंकवादियों तक किस रास्ते से पहुँच रहा है? पहलगाम हमले के बाद ये सवाल एक बार फिर केंद्र में आ गये हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, विदेशी मुद्रा घोटाला ऐसा ही एक रास्ता हो सकता है। इन घोटालों के माध्यम से शोधित धन कई माध्यमों से होकर गुज़र सकता है, जिसमें संभावित रूप से विदेशी मुद्रा बाज़ार भी शामिल है; और आतंकवादी संगठनों या व्यक्तियों तक पहुँचाया जा सकता है। यह विदेशी मुद्रा विनिमय मार्ग अब तक जाँच से बचा हुआ हो सकता है। लेकिन क्या इसका उपयोग पहलगाम हमलावरों को धन मुहैया कराने के लिए किया गया था? यह अभी भी जाँच का विषय है। भारत में वित्तीय ख़ुफ़िया इकाई (एफआईयू) ने पहले भी आतंकवाद और तस्करी से जुड़े अवैध मुद्रा प्रवाह का पता लगाया है।

भारत में विदेशी मुद्रा लेन-देन विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) द्वारा विनियमित होता है। बिना उचित बिल या रसीद के किया गया कोई भी लेन-देन अवैध माना जाता है। यदि ऐसी गतिविधि में संलिप्त पाया गया, तो मुद्रा परिवर्तक (विनिमयकर्ता यानी करेंसी डीलर) और ग्राहक दोनों को क़ानूनी परिणाम भुगतने होंगे। अधिकृत विदेशी मुद्रा परिवर्तकों को प्रत्येक लेन-देन के लिए रसीद जारी करना आवश्यक है। यह ख़रीद के प्रमाण के रूप में कार्य करता है। भारतीय क़ानून के अनुपालन को सुनिश्चित करता है, और ग्राहकों को भविष्य के विवादों से बचाता है। पहलगाम हमले के बाद दिल्ली सहित प्रमुख भारतीय शहरों को हाई अलर्ट पर रखा गया। ऐसे समय में जब सभी सुरक्षा एजेंसियाँ ​​सतर्क थीं, ‘तहलका’ ने दिल्ली में अवैध विदेशी मुद्रा लेन-देन पर एक स्टिंग ऑपरेशन किया। ‘तहलका’ रिपोर्टर ने निज़ामुद्दीन दरगाह और उसके पुलिस स्टेशन के नज़दीक स्थित निज़ामुद्दीन इलाक़े में नक़ली ग्राहक बनकर कई मनी एक्सचेंजरों से मुलाक़ात की। हमें आश्चर्य हुआ कि हाई अलर्ट के बावजूद सभी मनी एक्सचेंजर्स, जो भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अधिकृत होने का दावा करते हैं; अवैध विदेशी मुद्रा लेन-देन करते हैं, जो ‘तहलका’ के गुप्त कैमरे में क़ैद हुए हैं।

‘हम आपको दो लाख रुपये की भारतीय मुद्रा के बदले सऊदी रियाल देंगे। बिना किसी बिल, पासपोर्ट या वीजा के। लेकिन अगर एजेंसियाँ ​​आपको अवैध रूप से विदेशी मुद्रा ले जाने के आरोप में पकड़ती हैं, तो यह हमारी ज़िम्मेदारी नहीं होगी।’ -दरगाह निज़ामुद्दीन इलाक़े में अनम एक्सचेंज नाम से काम करने वाले मनी एक्सचेंजर के ज़ैद ने ‘तहलका’ रिपोर्टर से कहा।

‘मैं तुम्हें दो लाख रुपये के बदले चीनी युआन, पाँच लाख रुपये के बदले ब्रिटिश पाउंड और एक लाख रुपये के बदले रूसी रूबल दूँगा और वह भी बिना किसी वैध दस्तावेज़ या बिल के।’ – एसजीएस फॉरेक्स प्राइवेट लिमिटेड नाम से कम्पनी चलाने वाले इस इलाक़े के एक अन्य मनी एक्सचेंजर नईम ख़ान ने ‘तहलका’ रिपोर्टर से कहा।

‘भारतीय मुद्रा में दो लाख रुपये के बदले हम आपको नक़द अमेरिकी डॉलर देंगे। हम आपको कोई बिल नहीं देंगे, न ही आपसे कोई दस्तावेज़ माँगेंगे।’ -दरगाह निज़ामुद्दीन इलाक़े में शिफ़ा फॉरेक्स चलाने वाले सरफ़राज़ ने ‘तहलका’ रिपोर्टर से कहा।

‘भारत में बिना दस्तावेज़ों के विदेशी मुद्रा ख़रीदना अवैध है। लेकिन मैं यह काम वर्षों से करता आ रहा हूँ। मैं अपने भरोसेमंद एक्सचेंजर्स से बिना किसी काग़ज़ी कार्रवाई के विदेशी मुद्रा प्राप्त करता हूँ। अगर तुम चाहो, तो मैं तुम्हारे लिए भी इसका प्रबंध कर सकता हूँ।’ – स्वतंत्र दलाल प्रशांत सिंह उर्फ़ ​​पिंटू ने ‘तहलका’ रिपोर्टर से कहा।

निज़ामुद्दीन विदेशी मुद्रा डीलरों पर ध्यान केंद्रित करने से पहले आइए प्रशांत सिंह उर्फ़ ​​पिंटू की बात करें। पिंटू एक स्वतंत्र ऑपरेटर है, जो वर्षों से डॉलर और सोने की तस्करी में संलिप्त रहा है और हवाला मार्ग के ज़रिये थाई मुद्रा को भारत में लाने के लिए जाना जाता है। ‘तहलका’ के समक्ष उनके क़ुबूलनामे से डॉलर तस्करी और हवाला धन के आवागमन के व्यापक नेटवर्क का ख़ुलासा हुआ है। पहलगाम हमले से काफ़ी पहले ‘तहलका’ रिपोर्टर ने पिंटू से मुलाक़ात की थी। उस समय उसने हमारे रिपोर्टर को बताया कि वह लंबे समय से सोने और डॉलर दोनों की तस्करी करता रहा है। हालाँकि उसने कहा कि डॉलर की तस्करी अधिक लाभदायक है। पिंटू ने क़ुबूल किया कि वह भारतीय बाज़ार (काले बाज़ार) से अवैध रूप से अमेरिकी डॉलर ख़रीदता है, उन्हें थाईलैंड ले जाता है, उन्हें थाई बाथ (थाईलैंड की मुद्रा) में परिवर्तित करता है, और हवाला चैनलों के माध्यम से धन को भारत वापस लाता है। उसने कहा कि चूँकि उसे थाईलैंड में अच्छी विनिमय दर मिलती है, इसलिए उसे वापसी पर अच्छा-ख़ासा लाभ मिलता है। बातचीत में पिंटू ने अपने तस्करी नेटवर्क की कार्यप्रणाली का भी ख़ुलासा किया कि कैसे थाईलैंड से सोना लाया जाता है और अमेरिकी डॉलर भारत से बाहर ले जाये जाते हैं, जिन्हें थाई बाथ में परिवर्तित किया जाता है और हवाला के माध्यम से भारतीय मुद्रा के रूप में वापस भेजा जाता है। मार्जिन मामूली लग सकता है; लेकिन उसका नेटवर्क मज़बूत और समय की कसौटी पर खरा उतरा है।

पिंटू : हम काम करते हैं डॉलर (अमेरिकी मुद्रा) और गोल्ड (सोने) में। …और दोनों के प्रॉफिट अलग-अलग हैं। अगर हम 100 ग्राम गोल्ड लेते हैं 50,000 रुपये बचते हैं। 100 ग्राम की वैल्यू (क़ीमत) हुई 5-5.5 लाख रुपये। और डॉलर में बैठते हैं 8.5 लाख। …एक पूरा बंडल आता है, उसमें हमें दो रुपये 25 पैसे बचते हैं, तो वो उसमें 2,500 रुपये अप्रॉक्स (लगभग) बचते हैं।

रिपोर्टर : ये लाते कहाँ से हो आप, …गोल्ड और डॉलर?

पिंटू : ये थाईलैंड से लाते हैं। गोल्ड थाईलैंड से लाते हैं; …डॉलर इंडिया से लेकर जाते हैं।

रिपोर्टर : कहाँ जाते हो?

पिंटू : बैंकॉक में।

रिपोर्टर : डॉलर इंडिया से लेकर जाते हो? …वहाँ उसे इंडियन करेंसी में चेंंज करवाते हो?

पिंटू : नहीं; …थाई करेंसी में चेंज करवाते हैं। उसके बाद हम इसको हवाला लगवाकर इंडिया में लाते हैं। …इंडिया में पैसा रिटर्न आ जाता है, इंडियन करेंसी में। तो हमें सब मिलाकर 20-22 हज़ार बचते हैं।

अब पिंटू ने ‘तहलका’ रिपोर्टर को बताया कि कैसे डॉलर की तस्करी ने भारत और बैंकॉक के बीच निरंतर लूप में कई वाहक और छोटी खेपों का उपयोग करके जाँच से बचने के लिए ख़ुद को अनुकूलित किया है। प्रत्येक चरण में थोड़ा लाभ होता है। लेकिन प्रक्रिया को दोहराने से वह बढ़ता है। यह नेटवर्क यात्रा लागत की भरपाई कपड़े और इलेक्ट्रॉनिक्स सामान के साथ करता है।

रिपोर्टर : 20-22 हज़ार रुपये कितने पर बचते हैं?

पिंटू : आरएस (रुपये) आठ लाख पर। …पर ट्रिप (प्रत्येक चक्कर)। जैसे मैं आज गया वहाँ पर एक्सचेंज करवाया और मैंने रिटर्न मारे और पैसे इंडिया में आ गये। अब इंडिया में वो बंदे रिटर्न में फिर गया, …तो साइकिलिंग सिस्टम है।

रिपोर्टर : नहीं; जो पैसे हवाला से इंडिया में आये, वो फिर बहार जाते हैं?

पिंटू : फिर हमारा दूसरा लड़का, …हम अकेले काम तो करते नहीं हैं; तो वो पैसे वापस आ गये, तो आज जीतू भाई वापस जाएगा, वो पैसे लेकर। तो आज आरएस 25,000 का प्रॉफिट आया, कल भी आरएस 25 के (25 हज़ार) का प्रॉफिट आएगा।

रिपोर्टर : कितने पर 25 के (हज़ार) का बताया आपने?

पिंटू : 8.5 लाख पर।

रिपोर्टर : 8.5 लाख पर आरएस 25 हज़ार का प्रॉफिट आपको?

पिंटू : पाएगा और हम साइकिलिंग में इसको 20-25 दिन में 2.5 लाख कर देते हैं। …ये प्रॉफिट है।

रिपोर्टर : मतलब, एक चक्कर में आरएस 25 थाउजेंड, तो 10 चक्कर में 2.5 लाख्स?

पिंटू : हाँ; ये प्रॉफिट है और टिकट का जो निकलता है, हम साथ में कपड़ा भी लाते हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम भी लाते हैं, और भी बहुत सारा सामान; …तो हम टिकट और कस्टम उस में कर लेते हैं।

बातचीत के दौरान पिंटू ने स्वीकार किया कि वह बिना किसी काग़ज़ी कार्रवाई के काले बाज़ार से डॉलर ख़रीदकर कर (टैक्स) का भुगतान करने से बचता है। उसने बताया कि क़ानूनी तरीक़े से मुद्रा लेन-देन करने पर बिलों और जीएसटी के कारण उनका लाभ ख़त्म हो जाएगा।

रिपोर्टर : ये बताइए, इसमें टैक्स किसका बचा?

पिंटू : टैक्स देखो; अगर हम प्रॉपर तरीक़े से जाएँगे, तो पूरा बिल बनेगा। तो जो चीज़ हमें 8.5 लाख की पड़ रही है, वो फिर हमें 8.70 (लाख) की पड़ेगी; …ज़्यादा ही पड़ेगी। जीएसटी मिलाकर तो जो हमारी बचत है, वो सारी उसमें चली जाएगी।

अब पिंटू ने बताया कि वह कैसे पकड़े बिना हवाई अड्डे की सुरक्षा से डॉलर की तस्करी करने में कामयाब हो जाता है। वह मुद्रा को इस तरह से छुपाता है कि एक्स-रे मशीन भी इसका पता नहीं लगा सकती। उसने इस काम में कभी-कभी रिश्वत देने की बात भी स्वीकार की। लेकिन पिंटू ने यह भी कहा कि अंतिम क्षण में होने वाली परेशानी से बचने के लिए यह काम बहुत होशियारी से छिपाकर ही किया जाता है।

पिंटू : वो वहाँ जाकर कुछ भी करें, वो पैसे हमें इक्वल-इक्वल (बराबर-बराबर) हो गया। अगर हम यहाँ से कस्टम को कुछ कट दे देते हैं, 5,000 – 3,000 रुपीज; …3,000-4,000 पर बंदा चला जाता है। उसको पता होता है। मगर फिर भी हम उस पैसे को बहुत मैनिपुलेट करके ले जाते हैं। ऐसा नहीं कि जेब में डाला चल दिये। क्यूँकि रिस्क होता है। कल को वो मुकर गया, …कह दिया मेरा सीनियर आ गया था, मैं क्या कर सकता हूँ। इसलिए बहुत मैनिपुलेट करके ले जाते हैं।

रिपोर्टर : जैसे 10,000 डॉलर हैं, उसे आप अलग-अलग रखते हैं…?

पिंटू : ऐसे सिस्टम में रखते हैं कि वो एक्स-रे में भी नहीं आता।

रिपोर्टर : ऐसा भी है? …वो एक्स-रे में आएगा भी नहीं!?

पिंटू ने ‘तहलका’ रिपोर्टर को आगे बताया कि कैसे वह बिना किसी काग़ज़ी प्रक्रिया के आधिकारिक मुद्रा नियमों को दरकिनार करके प्रतिदिन क़ानूनी सीमाओं से कहीं अधिक मात्रा में मुद्रा का लेन-देन करता है और जाँच से बचने के लिए बिना बिल वाले ऑफ-द-रिकॉर्ड लेन-देन को प्राथमिकता देता है।

रिपोर्टर : अच्छा; डॉलर कैसे ख़रीद सकता है कोई? …उसमें कोई डिस्काउंट की ज़रूरत नहीं होती?

पिंटू : बिल के संग चाहिए, तो बहुत कुछ है। …इंडिया में ना आप साल में बस एक बार 10,000 डॉलर भेज सकते हो, अपने पासपोर्ट में। उसके बाद आप दोबारा जाओगे, तो वो नहीं देंगे। क्यूँकि आपने एक ही बार में भेज दिया।

रिपोर्टर : अच्छा; साल में एक पासपोर्ट पर 10,000 रुपये आ सकते हैं?

पिंटू : सिर्फ़ 5,000…।

रिपोर्टर : और आप कितना लाते हो?

पिंटू : सर! हमें पेपर चाहिए ही नहीं, वो कच्चे में देते हैं। हमें कच्चे में ही चाहिए। जीएसटी नहीं कटवाना। अगर पक्के में चाहिए, पैसे अकाउंट से कटेंगे।

रिपोर्टर : आप पासपोर्ट भी नहीं दिखाते होंगे?

पिंटू : मैं कुछ नहीं दिखाता।

रिपोर्टर : आप कितने ले लेते हो साल में?

पिंटू : साल में, …मैं डेली के 25,000 डॉलर ले लेता हूँ।

रिपोर्टर : तो बहुत आगे निकल गये आप तो?

पिंटू ने स्पष्ट रूप से हवाई अड्डों के माध्यम से डॉलर की तस्करी को सुविधाजनक बनाने के लिए सीमा शुल्क अधिकारियों को रिश्वत देने की बात स्वीकार की और यह दावा किया कि यह प्रणाली अच्छी तरह से काम कर रही है। उसने कई हवाई अड्डों के नाम भी बताये, जहाँ नियमित इस तरह अवैध मुद्रा लेकर लोगों का आना-जाना रहता है और खुले तौर पर रिश्वत की माँग की जाती है।

पिंटू : देखो सर! बिना ऑफिसर के काम करना तो बेव$कूफ़ी है। कल को कोई बात होती है, तो मैं बोल भी सकता हूँ सर थोड़ा-सा देख लीजिए। …अगर आप लेते हैं, तो कहीं-न-कहीं रियायत भी करेंगे। वो भी ज़रूरी है। xxxx एयरपोर्ट में कोई 10 लाख, …50 लाख से नीचे बात ही नहीं करता। जितने पैसे, उतना ही काम होता है; …और सीधा-सीधा होता है।

रिपोर्टर : यहाँ से भी xxxx एयरपोर्ट से काम हो रहा है, मतलब?

पिंटू : xxxx? …ऐसा कोई एयरपोर्ट नहीं है, जहाँ से ये काम न होता रहा हो।

रिपोर्टर : यही काम? …डॉलर का?

पिंटू : डॉलर का, गोल्ड का। …गोल्ड में रिस्क बहुत है।

रिपोर्टर : आप सिर्फ़ बैंकॉक से ही कर रहे हो?

पिंटू : हाँ; बीच में मैंने दुबई से किया था; …सेकेंड लॉकडाउन के समय। ….दुबई बहुत एक्सपेंसिव (महँगा) है, तो हमारा नहीं बन पाया था।

अब पिंटू ने बताया कि भारत से डॉलर बाहर ले जाने की सीमा क्या है और यह भी स्वीकार किया कि वह किस प्रकार से करोल बाग़ से अवैध रूप से डॉलर ख़रीदकर भारतीय नियमों को तोड़कर सीमा से कहीं अधिक डॉलर ले जाता है।

रिपोर्टर : नहीं, आप ये कह रहे हो डॉलर की एक लिमिट है इंडिया से बाहर ले जाने की?

पिंटू : इंडिया से बाहर ले जाने की सिर्फ़ इंडिया में ही लिमिट है। विदेश वालों की नहीं।

रिपोर्टर : एक बंदे की क्या लिमिट है?

पिंटू : एक बंदे को आरएस 1,500-2,000 तक यूएस डॉलर।

रिपोर्टर : आप कितना ले जाते हो?

पिंटू : 1,500-2,000…।

रिपोर्टर : ये डॉलर आपके पास कहाँ से आते हैं?

पिंटू : हम ख़रीदते हैं लोकल मार्केट से, …यहाँ पर करोल बाग़ से।

पिंटू यह स्वीकार करता है कि बिना दस्तावेज़ों के विदेशी मुद्रा ख़रीदना अवैध है। लेकिन वह बैंकों और अधिकृत एजेंटों के माध्यम से क़ानूनी तरीक़े की तुलना अवैध तरीक़े से ही यह सब करता हैं, जिसमें कोई पहचान, जाँच शामिल नहीं होती। वह ‘तहलका’ रिपोर्टर को इस काम में रुचि रखने वाला आम आदमी समझकर अपने नेटवर्क के माध्यम से उन्हें थोक में डॉलर या यूरो की व्यवस्था करके देने का भी वादा करता है।

रिपोर्टर : अच्छा; बिना पासपोर्ट के डॉलर नहीं ख़रीद सकते इंडिया में?

पिंटू : ख़रीद सकते हैं।

रिपोर्टर : लेकिन वो इल्लीगल होगा?

पिंटू : ब्लैक मार्केटिंग होगा। ..(जैसे)24 रुपये रेट है; लेकिन वो 25 देंगे।

रिपोर्टर : लेकिन वो लीगलाइज्ड नहीं होगा?

पिंटू : नहीं; आप प्रूफ कैसे करोगे?

रिपोर्टर : अगर लीगलाइज्ड करवाना है, तो पासपोर्ट देना पड़ेगा?

पिंटू : लीगली लेना है, तो बैंक से लेना होगा। व्हाइट होगा। पूरा जीएसटी कटेगा। …फिर व्हाइट कॉलर होगा, तो आप कहीं भी जाओगे, दिखा सकते हो, ये मेरे बिल है इट्स (इत्यादि)…। आप जवाब दे सकते हो ना!

रिपोर्टर : तो विदआउट डिस्काउंट ऐसे है लोगों को?

पिंटू : हाँ।

रिपोर्टर : आपकी सेटिंग कैसी है?

पिंटू : सेटिंग नहीं, आपको भी मिल जाएँगे। मैं नंबर दे देता हूँ आपको; …आज तो नहीं। मगर 20-25 हज़ार लोगों के पास होते ही हैं।

रिपोर्टर : दिल्ली में ही?

पिंटू : हाँ।

रिपोर्टर : आप दिलवा दोगे बिना पासपोर्ट, वीजा के?

पिंटू : हाँ; डॉलर, यूरो, …कुछ भी।

रिपोर्टर : बिना पासपोर्ट के?

पिंटू : हाँ।

यह ‘तहलका’ की पड़ताल का एक हिस्सा था, जिसमें यह उजागर हुआ कि कैसे एक दलाल अवैध रूप से भारत से बैंकॉक डॉलर ले जा रहा है और उन्हें थाई मुद्रा में परिवर्तित करने के बाद हवाला के माध्यम से रुपये में बदलकर भारत वापस ला रहा है। लेकिन इसके बाद ‘तहलका’ एसआईटी अपनी जाँच को पहलगाम आतंकी हमले के ठीक बाद आगे बढ़ाते हुए बिना किसी दस्तावेज़ के अवैध रूप से एक बदलने वाले मुद्रा विनिमयकर्ताओं (मनी एक्सचेंजर्स) का पर्दाफ़ाश किया गया है। इसी सिलसिले में ‘तहलका’ रिपोर्टर की मुलाक़ात ज़ैद से हुई, जो दिल्ली के दरगाह निज़ामुद्दीन इलाक़े में अनम एक्सचेंज नाम से मुद्रा विनिमय का कारोबार चलाता है। रिपोर्टर ने ज़ैद से कहा कि उन्हें भारतीय मुद्रा में दो लाख रुपये मूल्य के सऊदी रियाल की ज़रूरत है। तब ज़ैद ने बिना किसी क़ानूनी प्रक्रिया, बिना दस्तावेज़ या बिना बिल के रियाल उपलब्ध कराने पर सहमति जतायी। हालाँकि उसने रिपोर्टर से कहा कि पकड़े जाने पर जोखिम आपका रहेगा।

ज़ैद : रियाल कितना चाहिए?

रिपोर्टर : दो लाख इंडियन करेंसी का।

ज़ैद : (किसी से फोन पर पूछते हुए) …रियाल कितने का है? 23.20 पैसे का है।

रिपोर्टर : 23.20 पैसे एक सऊदी रियाल का? …कितना हो गया दो लाख का?

ज़ैद : 8,620…।

रिपोर्टर : 8,620 सऊदी रियाल मिल जाएँगे दो लाख के? …कोई डाक्यूमेंट तो नही देने पड़ेंगे?

ज़ैद : अगर बिल बनवाना है, तो देने पड़ेंगे।

रिपोर्टर : नहीं, बिल नहीं बनवाना।

ज़ैद : अपने रिस्क पर लेकर जाना फिर।

रिपोर्टर : अपना रिस्क, मतलब?

ज़ैद : रोक लें तो हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं रहेगी।

रिपोर्टर : ठीक है, वो तो हमारा रिस्क है। उसमें फिर ये है कि पासपोर्ट, वीजा हमें कुछ नहीं देना?

ज़ैद : नहीं।

ज़ैद के बाद ‘तहलका’ रिपोर्टर ने निज़ामुद्दीन इलाक़े में एसजीएस फॉरेक्स प्राइवेट लिमिटेड के नाम से मुद्रा विनिमय का काम करने वाले नईम ख़ान से कहा कि उन्हें (रिपोर्टर को) पाँच लाख रुपये के पाउंड (ब्रिटिश मुद्रा), दो लाख रुपये के रूबल (रशियन मुद्रा) और एक लाख रुपये के युआन (चाइनीज मुद्रा) चाहिए। इस पर नईम ‘तहलका’ रिपोर्टर को उनकी विनिमय दर (एक्सचेंज रेट) बताकर बिना किसी दस्तावेज़ और बिना बिल के मुद्रा बदलने को तैयार हो गया।

रिपोर्टर : ब्रिटिश पाउंड?

नईम : कितना है?

रिपोर्टर : पाँच लाख इंडियन करेंसी।

नईम : ब्रिटिश चाहिए आपको?

रिपोर्टर : हम्म! क्या रेट है?

नईम : 114.90…।

रिपोर्टर : 113.90 का एक पाउंड? …और रशियन का?

नईम : अभी हैं नहीं हमारे पास, …5-6 के (हज़ार) हैं।

रिपोर्टर : 5-6 के, …उसका क्या रेट है?

नईम : 1.05 पैसे।

रिपोर्टर : एक रुपये पाँच पैसे? …और चाइनीज?

नईम : है।

रिपोर्टर : चाइनीज का क्या रेट है?

नईम : 12.80 है।

रिपोर्टर : 12.80 रुपये? …दो लाख का कितना हो गया?

नईम : चाइनीज 15,625 रुपये।

रिपोर्टर : विद्आउट बिल मिल जाएगा ना?

नईम : बिल चाहिए इसका?

रिपोर्टर : नहीं चाहिए।

नईम : पाँच लाख का पाउंड चाहिए; …दो लाख का?

रिपोर्टर : …रूबल (रशियन करेंसी)।

नईम : और येन (जापानी करेंसी)?

रिपोर्टर : एक लाख का, तीनों के सही रेट लगा लो? …नईम भाई! बताएँ फिर, …डिस्काउंट तो नहीं चाहिए?

नईम : नहीं।

रिपोर्टर : मैं फिर एक घंटे में आ जाऊँ?

नईम : हाँ; आ जाओ।

अब ‘तहलका’ रिपोर्टर ने सरफ़राज़ नाम के एक मुद्रा विनिमयकर्ता से मुलाक़ात की। सरफ़राज़ भी निज़ामुद्दीन में शिफ़ा फॉरेक्स में मनी एक्सचेंज का कारोबार चलाता है। सरफ़राज़ बिना किसी पहचान या दस्तावेज़ माँगे तुरंत दो लाख रुपये को अमेरिकी डॉलर में बदलने के लिए सहमत हो गया। उसने इस बात पर ज़ोर दिया कि वह मुद्रा विनिमय की जो दर बता रहा है, वह उचित है। साथ ही यह आश्वासन दिया कि इसमें कोई काग़ज़ी प्रक्रिया की ज़रूरत नहीं है। यह सौदा अनियमित, हाथों और चिन्तामुक्त है।

रिपोर्टर : मनी एक्सचेंज हो जाएगा?

सरफ़राज़ : कितना?

रिपोर्टर : दो लाख इंडियन करेंसी। …क्या रेट है?

सरफ़राज़ : 8,660…।

रिपोर्टर : 8,660?

सरफ़राज़ : हाँ।

रिपोर्टर : कितने डॉलर मिलेंगे यूएस?

सरफ़राज़ : 100 डॉलर, …8,660 का रेट है।

रिपोर्टर : दो लाख का कितना हो गया?

सरफ़राज़ : 2,309 डॉलर।

रिपोर्टर : 2,309 डॉलर यूएस? …कुछ डिस्काउंट तो नहीं देने पड़ेंगे?

सरफ़राज़ : कैश।

रिपोर्टर : वीजा, पासपोर्ट देने की ज़रूरत तो नहीं है?

सरफ़राज़ : नहीं, नहीं।

रिपोर्टर : कुछ और अच्छा रेट मिल जाए?

सरफ़राज़ : बेस्ट (बढ़िया) है, …बेस्ट रेट है।

रिपोर्टर : पूरा होगा दो लाख। बिलिंग वग़ैरह नहीं चाहिए हमें। …डिस्काउंट वग़ैरह?

सरफ़राज़ : कुछ नहीं।

अब ‘तहलका’ रिपोर्टर ने निज़ामुद्दीन इलाक़े के एक अन्य मुद्रा विनिमयकर्ता अरफ़िन राजपूत से संपर्क किया, जो नोडल फॉरेक्स के नाम से अपना मुद्रा विनिमय का व्यापार चलाता है। दूसरे मुद्रा विनिमयकर्ताओं की तरह ही अरफ़िन राजपूत भी पाँच लाख रुपये को यूरो में बदलने को तैयार था, जिसके लिए उसने यह काम बिना किसी पासपोर्ट, बिना वीजा और बिना बिल के करने में रुचि दिखायी।

रिपोर्टर : यूरो मिल जाएगा यूरो? …पाँच लाख इंडियन करेंसी का?

अरफ़िन : मिल जाएगा।

रिपोर्टर : क्या रेट है?

अरफ़िन : 58 रुपये 70 पैसे।

रिपोर्टर : 58 रुपये 70 पैसे? …रुपये 58, 79 पैसे?

अरफ़िन : हाँ।

रिपोर्टर : दो लाख इंडियन करेंसी का कितना हो गया? …सॉरी पाँच लाख का?

अरफ़िन : ये हो गये तुम्हारे 5,065 (फाइव थाउजेंड सिक्सटी फाइव)।

रिपोर्टर : 5,065 रुपये। …डिस्काउंट तो नहीं चाहिए कुछ?

अरफ़िन : न।

रिपोर्टर : पासपोर्ट, वीजा की ज़रूरत तो नहीं? …बिल भी नहीं

चाहिए हमें।

अरफ़िन : न।

हम सभी को सन् 2015 का कुख्यात विदेशी मुद्रा घोटाला याद है, जिसमें सीबीआई ने बैंक ऑफ बड़ौदा और एचडीएफसी बैंक के कर्मचारियों सहित कई लोगों को गिरफ़्तार किया था। सन् 2017 में व्यापार आधारित धन शोधन के एक बड़े मामले में, जिसे विदेशी मुद्रा घोटाला भी कहा गया; सीबीआई ने 2015-2016 के दौरान फ़र्ज़ी आयात की आड़ में लगभग 2,253 करोड़ रुपये के विदेशी धन भेजने के लिए 13 निजी कम्पनियों और अज्ञात बैंक अधिकारियों के ख़िलाफ़ जाँच शुरू की। पिछले वर्ष 2024 में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने ग्राहकों को ठगने वाले 75 अनधिकृत विदेशी मुद्रा डीलरों की सूची जारी की।

पहलगाम आतंकी हमले के बाद शुरू की गयी ‘तहलका’ की दूसरे भाग की जाँच ने दिल्ली के निज़ामुद्दीन इलाक़े में विदेशी मुद्रा डीलरों के माध्यम से चल रहे तस्करी और हवाला नेटवर्क को उजागर किया है; वह भी स्थानीय पुलिस स्टेशन की नाक के नीचे। ‘तहलका’ रिपोर्टर के गुप्त कैमरे में क़ैद हुए मुद्रा विनिमयकर्ताओं ने दावा किया कि वे आरबीआई से अधिकृत हैं। लेकिन वे स्पष्ट रूप से क़ानूनी नियमों को तोड़कर काम कर रहे हैं; वह भी तब, जब देश पहलगाम हमले के बाद हाई अलर्ट पर है। यह सर्वविदित है कि ग्राहक अक्सर काग़ज़ी प्रक्रिया से बचने तथा केवल नक़द में ही लेन-देन करने के लिए ऐसे डीलरों को प्राथमिकता देते हैं। ये मुद्रा विनिमयकर्ता अवैध रूप से उस अवैध प्रक्रिया से काम करते हैं, जिसे सामान्य भाषा में काला बाज़ार कहा जाता है। जैसा कि नाम से पता चलता है, मुद्रा विनिमय एक ऐसा क्षेत्र, जिसमें विभिन्न देशों की मुद्राओं (करेंसीज) को बदलने का काम होता है। लेकिन यही काम मुद्राओं के अवैध विनिमय से लेकर कर (टैक्स) चोरी और हवाला के ज़रिये आतंकवाद के लिए वित्तपोषण तक का ज़रिया बना हुआ है, जिसका केंद्र अवैध रूप से मुद्राओं को बदलने वाले ऐसे ही मुद्रा विनिमयकर्ता हैं। इस समानांतर अर्थव्यवस्था के प्रति आँखें मूँद लेने से इस कालाबाज़ारी का जोखिम और भी बढ़ जाता है, जिसे लोग सुविधाजनक रूप से लेन-देन, क़ानूनी प्रक्रिया और पैसे बचाने के चक्कर में नकार देते हैं।