पंजाब कांग्रेस में पूर्व क्रिकेटर और पूर्व सांसद नवजोत सिंह सिद्धू के पार्टी प्रदेश अध्यक्ष बनने से राजनीतिक हलचल तेज़ हो गयी है। देश भर में इस बात की चर्चा है कि कांग्रेस पंजाब में बदलाव के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों में भी कुछ अलग करना चाहती है। सिद्धू के पंजाब इकाई के अध्यक्ष बनते ही उन्हें बधाई देने वालों का ताँता लग गया है। 117 सीटों वाले पंजाब में इन दिनों कांग्रेस के पास 77 विधायक हैं। इनमें से क़रीब 62 सिद्धू के साथ हैं। हालाँकि सिद्धू का दावा है कि उनके साथ इससे ज़्यादा विधायक खड़े हैं।
पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भले ही कई दिन तक ख़ामोश रहे, लेकिन सन्तुष्ट नहीं थे। उनकी चुप्पी को राजनीतिक गलियारों में नाराज़गी माना जा रहा था। क्योंकि वह न तो नवजोत सिंह सिद्धू को बधाई देने के लिए मिले थे और न ही उनसे कोई बात की थी। तब कैप्टन के मीडिया सलाहकार रवीन ठुकराल ने सिद्धू के पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद कहा था कि नवजोत सिंह सिद्धू ने मुख्यमंत्री से समय नहीं माँगा है। मुख्यमंत्री के रुख़ में कोई बदलाव नहीं है, वह सिद्धू से तब तक नहीं मिलेंगे, जब तक वह सोशल मीडिया पर मुख्यमंत्री पर हमले वाले मामले को लेकर सार्वजनिक रूप से माफ़ी नहीं माँग लेते। लेकिन बाद में 23 जुलाई को दोनों नेताओं साथ में मंच साझा किया। सिद्धू की ताजपोशी में शामिल कैप्टन ने कहा कि हम पंजाब के लिए एक साथ काम करेंगे। न केवल पंजाब के लिए, बल्कि भारत के लिए। इससे पहले सिद्धू ने पंजाब भवन में कैप्टन के साथ चाय पर मुलाक़ात की। दोनों नेताओं की इस मुलाक़ात को सकारात्मक बताया गया।
विदित हो, जब सिद्धू भाजपा में थे, तब कांग्रेस पर उनके व्यंग्यबाणों और कांग्रेस में आने के बाद कैप्टन के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला था, जिसे कैप्टन शायद भुला नहीं पा रहे होंगे। हालाँकि इससे पहले कैप्टन ने उनसे मिलने पहुँचे पूर्व पंजाब प्रभारी हरीश रावत से कहा कि वे पार्टी हाईकमान के आदेशों का पालन करेंगे। इधर प्रदेश अध्यक्ष बनते ही नवजोत सिंह सिद्धू ने पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ अपने पिता की एक तस्वीर ट्वीट करके यह दिखाने की कोशिश की है कि वह पुराने और पारम्पारिक कांग्रेसी हैं।
उन्होंने लिखा- ‘उनके पिता भी एक कांग्रेसी थे। समृद्धि, विशेषाधिकार और स्वतंत्रता को केवल कुछ के बीच नहीं, बल्कि सभी के साथ साझा करने वाले उनके पिता शाही घराने को छोड़कर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हुए थे। देशभक्ति के लिए उन्हें मौत की सज़ा सुनायी गयी थी। आज उसी सपने को पूरा करने के लिए और पंजाब कांग्रेस को मज़बूत करने के लिए जो विश्वास व महत्त्वपूर्ण ज़िम्मेदारी उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने सौंपी है; उसके लिए वह गाँधी परिवार का धन्यवाद करते हैं।’
सिद्धू ने एक और ट्वीट में कहा कि ‘जीतेगा पंजाब’ के मिशन को पूरा करने के लिए वह पंजाब में कांग्रेस परिवार के हर सदस्य के साथ मिलकर काम करेंगे। बता दें कि सिद्धू से पहले कांग्रेस के पंजाब प्रभारी उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत थे।
अब प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के अलावा पंजाब में चार कार्यकारी अध्यक्ष सुखविंदर सिंह डैनी, संगत सिंह गिलजियां, कुलजीत सिंह नागरा और पवन गोयल भी होंगे। सुखविंदर सिंह डैनी दलित नेता हैं और 2017 में पहली बार चुनकर विधानसभा पहुँचे हैं। पवन गोयल प्लानिंग बोर्ड, फ़रीदकोट के चेयरमैन हैं। वह पुराने कांग्रेसी हैं।
संगत सिंह गिलजियां पंजाब लैंड यूज एंड वेस्ट बोर्ड के डायरेक्टर, एआईसीसी और पीपीसीसी के सदस्य और गाँव के सरपंच रह चुके हैं। वह पिछड़ा वर्ग के नेता हैं और 2007, 2012 व 2017 में लगातार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं।
कुलजीत सिंह नागरा जाट सिख हैं और अभी सिक्किम, नगालैंड और त्रिपुरा के कांग्रेस प्रभारी हैं। वह 1995 से लेकर 1997 तक नागरा पंजाब युवा कांग्रेस के महासचिव भी रहे हैं और 2012 व 2017 में विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं।
पवन गोयल मालवा क्षेत्र से हैं और पंजाब में जाति सन्तुलन बनाने का काम करेंगे, जिससे पंजाब में कांग्रेस वोटबैंक कम-से-कम बरक़रार रहे। बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह किसी भी क़ीमत पर सिद्धू को पंजाब इकाई का अध्यक्ष बनाये जाने के पक्ष में नहीं थे और इसके लिए उन्होंने अपने धुरविरोधी प्रताप सिंह बाजवा से भी हाथ मिलाया। लेकिन उनकी यह जुगत भी उनके काम नहीं आयी।
हालाँकि कांग्रेस जानती है कि कैप्टन एक पुराने और निपुण राजनीतिज्ञ हैं, जो पंजाब में राजनीति की लम्बी पारी खेल चुके हैं और दूसरी बार पंजाब के मुख्यमंत्री के तौर पर कुर्सी पर विराजमान हैं। उन्होंने दोनों बार मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में कांग्रेस की तरफ़ से दावेदारी करके शिरोमणि अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल से कुर्सी छीनी है। उन्हें पंजाब का एक दमदार और गहरी सोच वाला नेता माना जाता है। लेकिन अब पंजाब को एक दमदार युवा चेहरा चाहिए था।
यूँ भी कैप्टन ने पिछली बार ख़ुद ही आख़िरी बार मुख्यमंत्री बनने की इच्छा ज़ाहिर की थी। लेकिन अब उनके कुर्सी मोह से नहीं लगता कि वह अभी राजनीति से संन्यास लेना चाहते हैं। शायद इसीलिए शुरू-शुरू में वह सिद्धू से इतने नाराज़ रहे कि उन्होंने एक लंच पार्टी रखी, जिसमें सिद्धू को आमंत्रित तक नहीं किया। कैप्टन के इस निर्णय को भी पार्टी नेतृत्व के फ़ैसले के विरोध के तौर पर देखा जा रहा है। हालाँकि मुख्यमंत्री कार्यालय की तरफ़ से इस तरह की ख़बरों का उस समय खण्डन किया गया था।
इधर प्रदेश अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी सँभालने के बाद सिद्धू की चुनौतियाँ बड़ी हैं और अब उनके कन्धों पर एक बड़ी ज़िम्मेदारी है, जिसमें सफल होकर ही वह भविष्य में एक सफल राजनीतिज्ञ बन सकेंगे। साथ ही पंजाब अध्यक्ष के रूप में उनकी सफलता / असफलता उनके भविष्य का रास्ता तय करेगी। फ़िलहाल तो वह पंजाब के मंत्रियों, विधायकों, नेताओं से मुलाक़ात में जुटे हैं। क्योंकि अगले साल ही पंजाब में विधानसभा चुनाव हैं। नवजोत सिंह सिद्धू अपने सन् 1983 से लेकर सन् 1999 तक के 17 साल के क्रिकेट करियर के बाद क्रिकेट कमेंटेटर (टीकाकार) के रूप में उभरे और इसके बाद राजनीति की तरफ़ रुख़ किया।
सन् 1988 में उन्हें गुरनामसिंह नाम के एक शख़्स की ग़ैर-इरादतन हत्या के सिलसिले में सह-आरोपी बनाया गया और पटियाला पुलिस ने गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया था। उन पर गुरनामसिंह की हत्या में मुख्य आरोपी भूपिन्दर सिंह सन्धू की सहायता का आरोप था, जिसे उन्होंने शुरू से ही सिरे से नकारा था। सन् 2004 में उन्होंने भाजपा के टिकट पर अमृतसर लोकसभा चुनाव जीता। जब वह सांसद बन गये, तो उनके ख़िलाफ़ फिर पुराने मामले की फाइल खोल दी गयी और सन् 2006 में उन पर मुक़दमा चलाया गया और ग़ैर-इरादतन हत्या के लिए उन्हें तीन साल क़ैद की सज़ा सुनायी गयी। सज़ा का आदेश होते ही उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से जनवरी, 2007 में त्याग-पत्र देकर उच्चतम न्यायालय में याचिका लगा दी।
उच्चतम न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा उन्हें दी गयी सज़ा पर रोक लगाते हुए फरवरी, 2007 में अमृतसर लोकसभा सीट से दोबारा चुनाव लडऩे की अनुमति दे दी। इसके बाद सन् 2007 में हुए उप-चुनाव में उन्होंने सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के पंजाब राज्य के पूर्व वित्त मंत्री सुरिन्दर सिंगला को भारी अन्तर से हराकर अमृतसर की सीट पर फिर से क़ब्ज़ा कर लिया। सन् 2009 के लोकसभा चुनाव में भी वे अमृतसर की सीट से तीसरी बार विजयी हुए। हालाँकि सन् 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद उनके भाजपा से राजनीतिक सम्बन्ध बिगडऩे लगे और उन्होंने सन् 2016 में भाजपा का दामन छोड़कर सन् 2017 में कांग्रेस का हाथ पकड़ लिया।
इसके बाद सन् 2018 में सिद्धू को तब एक और झटका लगा, जब पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के उस फ़ैसले का समर्थन किया, जिसमें 1998 के ग़ैर-इरादतन मामले में सिद्धू को दोषी ठहराया गया था। सन् 2019 के लोकसभा चुनावों में आठ संसदीय सीटें जीतने के बाद अमरिंदर सिंह का राजनीतिक क़द और बढ़ा और उन्होंने सिद्धू पर सीधा निशाना साधना शुरू किया। इसके बाद सिद्धू ने अमरिंदर सिंह को घेरना शुरू कर दिया।
इस लड़ाई में अमरिंदर ने सिद्धू को एक नॉन-परफॉर्मर कहा और उनसे स्थानीय निकाय विभाग वापस ले लिया। उन्हें सन् 2019 में अमरिंदर मंत्रिमंडल से भी इस्तीफ़ा देना पड़ा। अब सिद्धू ने कांग्रेस से अपने पुराने सम्बन्धों और युवा नेता व वाक्पटुता के बल पर पंजाब नेतृत्व की कुर्सी हथियाने की ओर पहला क़दम बढ़ा दिया है, जो कि काफ़ी महत्त्वपूर्ण और अब उनके पंजाब अध्यक्ष बनने को कैप्टन पर उनकी जीत के रूप में देखा जा रहा है।
कुछ राजनीति के जानकार यह भी मान रहे हैं कि कांग्रेस नवजोत सिंह सिद्धू की वाक्पटुता और राजनीतिक पैंतरों का इस्तेमाल पाँच राज्यों में होने वाले चुनावों, विशेष रूप से पंजाब के साथ-साथ उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में कर सकती है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि सिद्धू न केवल अपनी बातों से जनता का मन मोह लेते हैं, बल्कि राजनीतिक मंच पर विपक्ष को पूरी तरह घेर लेते हैं। उनका दिमाग़ भी बहुत तेज़ है और भाषाओं, प्रदेशों व क्षेत्रों के मुद्दों पर उनकी गहरी पकड़ है। ज़ाहिर है कांग्रेस को वैसे भी हरीश रावत को पंजाब से छुट्टी देनी थी; क्योंकि सम्भवत: उत्तराखण्ड में कांग्रेस की तरफ़ से वही मुख्यमंत्री चेहरा होंगे और पार्टी की जीत सुनिश्चित करेंगे। वहीं पंजाब में भी अब कांग्रेस को नया और युवा चेहरा चाहिए था। कुछ राजनीतिज्ञों का मानना है कि पंजाब में अगर कांग्रेस फिर से सत्ता में आयी, तो सम्भव है कि सिद्धू को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाया जाए, जो कि वह चाहते भी हैं।
(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में शोधार्थी हैं।)
सिद्धू सिद्ध करेंगे कांग्रेस का मनोरथ?
पेगासस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अगले हफ्ते हो सकती है सुनवाई
पेगासस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अगले हफ्ते सुनवाई हो सकती है। जानकारी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते केस को लिस्ट कर सकता है।
कपिल सिब्बल ने पेगासस मामले में वरिष्ठ पत्रकार की याचिका को न्यायाधीश एन वी रमना के समक्ष रखा और जल्द सुनवाई की मांग की है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि वो अगले हफ्ते मामले की सुनवाई करेंगे लेकिन वर्क लोड भी देखना होगा।
गौरतलब है कि शीर्ष अदालत में ‘द हिंदू’ के पूर्व मुख्य संपादक एन राम और संस्थापक एशियानेट, शशि कुमार (निदेशक एसीजे) द्वारा एक और याचिका दाखिल की गई है। इसमें सुप्रीम कोर्ट से पेगासस स्पाइवेयर पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में के एक मौजूदा या सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में जांच की मांग की गई है। सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर ये तीसरी याचिका है।
पिछले कई दिनों से पेगासस मामले को लेकर संसद के मॉनसून सत्र में विपक्षी सांसदों के हंगामे के कारण कार्यवाही लगातार बाधित हो रही है।
कुछ दिन पहले वैश्विक मीडिया संघ ने खबर दी थी कि पेगासस स्पाईवेयर का इस्तेमाल मंत्रियों, नेताओं, सरकारी अधिकारियों और पत्रकारों समेत करीब 300 भारतीयों की निगरानी करने के लिए किया गया है।
मेडिकल कॉलेजों में ओबीसी को 27% और गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण
केंद्र सरकार ने चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए उन छात्रों को बड़ी राहत दी है, जो मेडिकल के क्षेत्र में जाना चाहते हैं। अन्य पिछली जाति यानी ओबीसी के लिए अब मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए 27 फीसदी आरक्षण लागू करने का फैसला किया गया है। इसके साथ ही गरीब सवर्णों के लिए भी दस फीसदी सीटें आरक्षित होंगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर लिखा, हमारी सरकार ने वर्तमान शैक्षणिक वर्ष 2021-22 से अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट मेडिकल/ डेंटल कोर्स यानी एमबीबीएस, एमडी, एमएस, डिप्लोमा, बीडीएस और एमडीएस के लिए ऑल इंडिया कोटा यानी एआईक्यू स्कीम में ओबीसी के लिए 27 फीसदी आरक्षण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 10 फीसदी आरक्षण प्रदान करने का एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है।
इसी मामले को लेकर गत 26 जुलाई को एक अहम बैठक हुई थी, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी ने बैठक में केंद्रीय मंत्रालयों को इस मुद्दे के समाधान का निर्देश दिया था। जिसके बाद ओबीसी और ईडब्ल्यूएस वर्ग के उम्मीदवारों के लिए ये फैसला लिया गया। इस निर्णय से हर साल एमबीबीएस में लगभग 1500 ओबीसी छात्रों और पोस्ट ग्रेजुएट में 2500 ओबीसी छात्रों के साथ ही एमबीबीएस में करीब 550 ईडब्ल्यूएस छात्रों और पीजी में करीब 1000 गरीब सवर्ण छात्रों को दाखिला मिल सकेगा।
सरकार का ये यह फैसला प्रत्येक वर्ष देश के हजारों युवाओं को बेहतर मौका प्रदान करने में मदद करेगा और हमारे देश में सामाजिक न्याय के क्षेत्र में एक प्रतिमान स्थापित करेगा। इससे पहले तमिलनाडु में हाईकोर्ट ने मेडिकल सीटों में दाखिले में ओबीसी आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार से सुनवाई मामले में अपना पक्ष रखने को कहा था।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी बयान में कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को हुई एक बैठक में लंबे समय से लंबित इस मुद्दे के प्रभावी समाधान का संबंधित केंद्रीय मंत्रालयों को निर्देश दिया था। मेडिकल अभ्यर्थियों की ओर से चिकित्सा शिक्षा के अखिल भारतीय कोटे में ओबीसी आरक्षण देने की लंबे समय से मांग की जा रही थी।
धनबाद जिला न्यायाधीश उत्तम आनंद हत्या मामले में बार एसोसिएशन प्रमुख ने की सीबीआई जांच की मांग
धनबाद जिला न्यायाधीश उत्तम आनंद हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के प्रमुख विकास सिंह ने आज सुप्रीम कोर्ट से सीबीआई द्वारा जांच की मांग की है।
52 वर्षीय जिला न्यायाधीश उत्तम आनंद बुधवार सुबह सैर पर निकले थे, जिसके बाद एक ऑटो रिक्शा चालक ने पीछे से आकर उनहे टक्कर मार दी थी। वह घटनास्थल पर लहूलुहान होकर गिर पड़े, बाद में अस्पताल में उनकी मौत हो गई थी।
घटना के सीसीटीवी फुटेज से साफ नज़र आ रहा है कि जज को टक्कर जानबूझकर मारी गई थी।
बार एसोसिएशन प्रमुख विकास सिंह ने कोर्ट में कहा कि न्यायपालिका को स्वतंत्र और न्यायिक अधिकारी को सुरक्षित होना चाहिए।
उनके अनुसार यह सुनियोजित साजिश का मामला है। उन्होंने कहा कि सीसीटीवी फुटेज में साफ दिख रहा है कि सड़क किनारे चल रहे जज को ऑटो ने जानबूझकर टक्कर मारी है।
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने विकास सिंह से इस मामले का जिक्र सीजेआई के सामने करने को कहा है और कहा कि वह भी मुख्य न्यायाधीश को इस बारे में बताएंगे।
गौरतलब है कि धनबाद में जज को टक्कर मारने वाले ऑटो चालक और उसके एक और साथी को गिरफ्तार कर लिया गया है।
‘अच्छे दिन’ बहुत देख लिए, अब‘सच्चे दिन’ देखना चाहते हैं : ममता बनर्जी
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने बुधवार को विपक्षी नेताओं से मुलाकात की। इसस पहले मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि मेरा फोन पहले ही टैप किया जा चुका है। अगर अभिषेक बनर्जी का फोन टैप हो रहा है और मैं उनसे बात करती हूं तो अपने आप ही मेरा फोन भी टैप हो जाएगा। उन्होंने कहा कि पेगासस ने सभी की जान को खतरे में डाल दिया है। बनर्जी ने मोदी सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि हमने ‘अच्छे दिन’ बहुत देख लिए, अब हम ‘सच्चे दिन’ देखना चाहते हैं।
ममता बनर्जी ने कहा कि जीडीपी का मतलब अब गैस-डीजल-पेट्रोल हो गया है। सरकार जनता की जेब से पैसा ले रही है, लेकिन इसके पास कोरोना वायरस के टीके उपलब्ध कराने के लिए पैसा नहीं है। उन्होंने कहा कि अब पूरे देश में खेला होगा। यह एक हमेशा चलती रहने वाली प्रक्रिया है…जब 2024 का आम चुनाव मोदी बनाम देश होगा।
मोदी सरकार की लोकप्रियता पर सवाल उठाते हुए टीएमसी सुप्रीमो ने कहा, नरेंद्र मोदी 2019 में लोकप्रिय हुआ करते थे, उन्होंने (कोरोना से) मरने वालों की संख्या का रिकॉर्ड नहीं रखा है। अंतिम संस्कार नहीं होने दिए गए और शवों को गंगा नदी में फेंक दिया गया। जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है वह इसे कभी नहीं भूलेंगे और न ही माफ करेंगे।
विपक्ष का चेहरा होने के सवाल पर ममता बनर्जी ने कहा कि मैं कोई राजनीतिक भविष्यवक्ता नहीं हूं, यह इस पर निर्भर करता है कि स्थिति कैसी है। इस बीच, ममता बनर्जी ने कांग्रेस अध्यक्षत सोनिया गांधी से भी मुलाकात की। कांग्रेस के ट्विटर हैंडल से दोनों नेताओं की फोटो भी शेयर की गई। ममता ने कहा कि संसद सत्र पूरा होने के बाद विपक्षी दलों को जरूर मुलाकात करते रहना चाहिए।
कर्नाटक में बसवराज बोम्मई ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली
बीएस येद्दियुरप्पा कर्नाटक के चार बार मुख्यमंत्री रहे, लेकिन एक भी बार उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। भाजपा सरकार के दो साल के मौके पर इस्तीफे के बाद मंगलवार को बसवराज बोम्मई को नया मुख्यमंत्री का चेहरा चुना गया। बसवराज बोम्मई ने बुधवार को कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली है। राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई।
राज्य में मंत्रिमंडल का विस्तार बाद में किया जाएगा। बुधवार को शपथ लेने से पहले लिंगायत समुदाय से ताल्लुक रखने वाले बोम्मई शपथ से पहले अंजनेय मंदिर में भगवान का आशीर्वाद लेने गए। शपथ लेने से पहले उन्होंने कहा कि आज हम एक कैबिनेट बैठक करेंगे, इसके बाद एक वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक की जाएगी। राज्य में कोरोना के हालात और बारिश व बाढ़ को लेकर हालात की समीक्षा की जाएगी।
61 वर्षीय कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई जल संसाधन एवं सहयोग मंत्रालय के साथ-साथ उन्होंने हवेरी और उडुपी जिलों के प्रभारी मंत्री के तौर पर भी काम कर चुके हैं। 1960 में जन्मे बोम्माई मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक हैं और उन्होंने अपनी सियासी पारी की शुरुआत राज्य में जनता दल के साथ की थी। बोम्मई अभी राज्य के गृह मंत्री के साथ संसदीय कार्य मंत्री और कानून मंत्री का पद भी संभाल रहे थे। बोम्मई को बीएस येदियुरप्पा का करीबी माना जाता है। बोम्मई के पिता एसआर बोम्मई भी कर्नाटक के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
बता दें कि राज्य में दो साल बाद चुनाव होने हैं, जिसमें लिंगायत समुदाय को साधना भाजपा के लिए जरूरी था। कर्नाटक की आबादी में लिंगायत समुदाय की भागीदारी करीब 17 फीसदी है। 224 सदस्यीय विधानसभा सीटों पर 100 से ज्यादा सीटों पर लिंगायत समुदाय प्रभावी माना जाता है। बसवराज 2008 में भाजपा में शामिल हुए और तभी लगातार पार्टी में अपने काम के बल पर पैठ बनाते गए।
1 अगस्त से उत्तराखंड में कक्षा 6-12 तक के स्कूलों को खोलने की सरकार ने दी मंजूरी
कोरोना वायरस की तीसरी लहर आने की चेतावनी के बावाजूद उत्तराखंड कैबिनेट ने 1 अगस्त से कक्षा 6-12 के छात्रों के लिए राज्य में स्कूलों को फिर से खोलने की मंजूरी दे दी है।
सरकार ने देश में करोना के बढ़ते केसिस को देखते हुए साल 2021 में 10वीं और 12वीं दोनों की बोर्ड परीक्षाओं को रद्द कर ऐतिहासिक फैसला लिया था ।
उत्तराखंड राज्य सरकार ने 1 जुलाई से राज्य के सभी स्कूल डिजिटल माध्यम से खोलने का फैसला किया था. राज्य के स्कूलों में 30 जून, 2021 तक बंद रहे।
नए अपडेट के मुताबिक उत्तराखंड बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन (UBSE) 10वीं-12वीं की बोर्ड परीक्षा के परिणाम इस हफ्ते जारी कर सकता है. बता दें, कोरोना वायरस की दूसरी लहर के कारण परीक्षा रद्द कर दी गई थी।
बताया जा रहा है कि कक्षा 12वीं के सभी छात्रों को उनके कक्षा 10वीं, 11वीं और प्री-बोर्ड परिणामों के आधार पर चिह्नित किया जाएगा. अंकन का अनुपात 30:30:40 होगा.
यूबीएसई बोर्ड परिणाम 2021 के लिए अंतिम मिनट की तैयारी को पूरा करने में व्यस्त है और आने वाले कुछ दिनों में उनके घोषित होने की संभावना है।










