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तृणमूल कांग्रेस ने चुनाव आयोग से की शिकायत, मतदाता सूची में गड़बड़ियों पर जताई चिंता

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली, 1 जुलाई
तृणमूल कांग्रेस (AITC) ने मंगलवार को दिल्ली स्थित निर्वाचन सदन के बाहर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुनाव आयोग (ECI) के साथ हुई बैठक की जानकारी दी। पार्टी सांसद कल्याण बनर्जी और मंत्री फिरहाद हाकिम ने कई अहम मुद्दों पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई।
कल्याण बनर्जी ने कहा कि आयोग का दावा है कि “कोई मतदाता पीछे न छूटे”, लेकिन हाल के सर्कुलर ‘पात्रता पहले, समावेश बाद में’ की नीति को दर्शाते हैं। उन्होंने मांग की कि 2024 तक जिनका नाम मतदाता सूची में था, उन्हें बिना शर्त बनाए रखा जाए। आयोग ने इसे गंभीरता से लेने की बात कही।
उन्होंने 1987 से 2003 तक के जन्म प्रमाणपत्र, फर्जी वोटरों की अचानक एंट्री, और चुनाव से पहले 50–60 वर्षीय नए मतदाताओं के बल्क में जोड़ने पर सवाल उठाया। पार्टी ने प्रस्ताव रखा कि नामांकन से 3–4 महीने पहले तक कोई नया नाम जोड़ा जाए तो राजनीतिक दलों को इसकी सूचना मिले और जांच का अधिकार भी दिया जाए।
आधार कार्ड अनिवार्यता के मुद्दे पर ECI ने स्पष्ट किया कि यह बाध्यकारी नहीं है और इसे लेकर पुनः समीक्षा की जाएगी। दक्षिण 24 परगना के चंपाहाटी में 4,500 फर्जी वोटरों की शिकायत पर भी जांच का आश्वासन मिला।
फिरहाद हाकिम ने कहा कि केंद्रीय बलों की भूमिका को सीमित किया जाए और राज्य पुलिस को भी बूथ के भीतर तैनात किया जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्यपाल और केंद्रीय मंत्री चुनावों के दौरान पक्षपातपूर्ण तरीके से यात्रा करते हैं। आयोग ने आश्वासन दिया कि इस पर भी कार्रवाई होगी।
पार्टी ने मांग की कि 2024 को मतदाता सूची का आधार वर्ष बनाया जाए और सभी नए नाम जोड़ने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए। AITC ने आयोग और न्यायपालिका में आस्था जताई और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया की उम्मीद जाहिर की।

चार बड़ी योजनाओं को मोदी कैबिनेट की मंजूरी

अंजलि भाटिया

नई दिल्ली, 1 जुलाई
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंगलवार को 99,446 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय के साथ रोजगार से जुड़ी प्रोत्साहन (ईएलआई) योजना को मंजूरी दे दी, ताकि अगले दो वर्षों में देश भर में 3.5 करोड़ से अधिक नौकरियों के सृजन का समर्थन किया जा सके। मीडिया को जानकारी देते हुए केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि यह योजना मुख्य रूप से विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार सृजन पर ध्यान केंद्रित करेगी, जबकि नए श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करेगी। उन्होंने कहा, “योजना के दो भाग हैं – एक पहली बार काम करने वाले कर्मचारियों के लिए और दूसरा उन नियोक्ताओं के लिए जो अतिरिक्त निरंतर नौकरियां पैदा करते हैं।
मंत्रिमंडल का यह निर्णय केंद्रीय बजट 2020 में इस योजना की पहली बार घोषणा किए जाने के कुछ महीनों बाद आया है।
योजना का भाग ए औपचारिक कार्यबल में पहली बार प्रवेश करने वालों को लक्षित करता है। लगभग 1.92 करोड़ ऐसे श्रमिकों को लाभ मिलने की उम्मीद है। 1 लाख रुपये तक के मासिक वेतन वाले प्रत्येक पात्र कर्मचारी को छह और बारह महीने की निरंतर सेवा के बाद दो किस्तों में एक महीने का वेतन (15,000 रुपये तक) मिलेगा। दूसरी किस्त के लिए वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम को सफलतापूर्वक पूरा करना होगा। लाभ का एक हिस्सा बचत साधन में रखा जाएगा, जिससे दीर्घकालिक बचत की आदतों को बढ़ावा मिलेगा।
भाग बी उन नियोक्ताओं को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित है जो अतिरिक्त श्रमिकों को काम पर रखते हैं। ईपीएफओ के साथ पंजीकृत प्रतिष्ठानों को निरंतर काम पर रखना होगा – कम से कम दो नए कर्मचारी (यदि उनके पास 50 से कम कर्मचारी हैं) या पांच नए कर्मचारी (यदि 50 से अधिक कर्मचारी हैं) – प्रत्येक कर्मचारी को कम से कम छह महीने तक बनाए रखना होगा।
नियोक्ताओं को वेतन के स्तर के आधार पर प्रति अतिरिक्त कर्मचारी प्रति माह 1,000 रुपये से लेकर 3,000 रुपये तक का भुगतान किया जाएगा। विनिर्माण क्षेत्र के लिए, प्रोत्साहन विंडो दो के बजाय चार साल तक बढ़ाई जाएगी। लाभ 1 अगस्त, 2025 और 31 जुलाई, 2027 के बीच बनाई गई नौकरियों पर लागू होंगे। कर्मचारियों को भुगतान आधार-आधारित प्रणालियों का उपयोग करके प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) के माध्यम से किया जाएगा, जबकि नियोक्ताओं को प्रोत्साहन उनके पैन-लिंक्ड खातों के माध्यम से दिया जाएगा। वैष्णव ने कहा कि इस योजना से ईपीएफओ कवरेज का विस्तार करके भारत के कार्यबल के औपचारिकीकरण में भी सुधार होने की उम्मीद है, खासकर युवाओं के बीच। सरकार को उम्मीद है कि इससे नौकरी की सुरक्षा बढ़ेगी, स्थिर आय होगी और सामाजिक सुरक्षा मजबूत होगी। यह योजना महामारी के बाद से रोजगार को बढ़ावा देने के लिए केंद्र के सबसे महत्वाकांक्षी कदमों में से एक है, जिसमें पहली बार काम करने वाले कर्मचारियों और विनिर्माण-आधारित विकास पर स्पष्ट ध्यान दिया गया है।

बॉक्स- केंद्रीय मंत्रिमंडल ने  तमिलनाडु में एनएच-87 के परमाकुडी-रामनाथपुरम खंड के चार लेन के निर्माण को मंजूरी दे दी, जिसकी लागत 1,853 करोड़ रुपये होगी। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मंत्रिमंडल की बैठक में लिए गए निर्णयों की जानकारी देते हुए कहा कि इस परियोजना को 1,853 करोड़ रुपये की पूंजीगत लागत पर हाइब्रिड एन्युटी मोड (एचएएम) पर विकसित किया जाएगा। वर्तमान में, मदुरै, परमाकुडी, रामनाथपुरम, मंडपम, रामेश्वरम और धनुषकोडी के बीच संपर्क मौजूदा 2-लेन राष्ट्रीय राजमार्ग 87 (एनएच-87) और संबंधित राज्य राजमार्गों पर निर्भर है, जो विशेष रूप से घनी आबादी वाले हिस्सों और गलियारे के साथ प्रमुख शहरों में उच्च यातायात मात्रा के कारण काफी भीड़भाड़ का अनुभव करते हैं।

 इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए, परियोजना परमाकुडी से रामनाथपुरम तक एनएच-87 के लगभग 46.7 किलोमीटर हिस्से को 4-लेन में अपग्रेड करेगी। इससे मौजूदा कॉरिडोर पर भीड़भाड़ कम होगी, सुरक्षा में सुधार होगा और परमाकुडी, सथिराकुडी, अचुंदनवयाल और रामनाथपुरम जैसे तेजी से बढ़ते शहरों की गतिशीलता की जरूरतें पूरी होंगी।
इस परियोजना से लगभग 8.4 लाख व्यक्ति-दिन प्रत्यक्ष और 10.45 लाख व्यक्ति-दिन अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होगा। 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने  व्यापक खेलो भारत नीति, 2025 को मंजूरी  दी है जिसका लक्ष्य 2047 तक भारत को शीर्ष पांच खेल राष्ट्रों में से एक बनाना है।अश्वनी वैष्णव ने बतया  नई खेल नीति मौजूदा राष्ट्रीय खेल नीति 2001 का स्थान लेगी। ये भारत को एक वैश्विक खेल महाशक्ति के रूप में स्थापित करने तथा 2036 ओलंपिक खेलों सहित अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों में उत्कृष्टता के लिए एक मजबूत दावेदार के रूप में स्थापित करने के लिए एक दूरदर्शी और रणनीतिक रोडमैप प्रस्तुत करेगी।

छह साल बाद रेल किराए में इजाफा, एक जुलाई से लागू होंगी नई दरें

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली: भारतीय रेलवे ने लगभग छह वर्षों के बाद मेल-एक्सप्रेस सहित प्रीमियम ट्रेनों के किरायों में वृद्धि का निर्णय लिया है। यह नई दरें एक जुलाई 2025 से प्रभाव में आएंगी और एक जुलाई अथवा इसके बाद बुक किए गए टिकटों पर लागू होंगी। हालांकि, एक जुलाई से पहले की गई एडवांस बुकिंग पर यह नियम लागू नहीं होगा।उपनगरी सेवा (लोकल-पैसेंजर टे्रनें) और मासिक-त्रैमासिक सीजन टिकट के यात्रियों के किराये में बढ़ोत्तरी नहीं की गई है।
रेलवे बोर्ड ने सोमवार को इस संबंध में अधिसूचना जारी की। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों में अनारक्षित द्वितीय श्रेणी, स्लीपर श्रेणी और गैर-वातानुकूलित प्रथम श्रेणी के किरायों में प्रति किलोमीटर एक पैसे की वृद्धि की गई है, जबकि सभी वातानुकूलित श्रेणियों में यह वृद्धि प्रति किलोमीटर दो पैसे की होगी।
साधारण पैसेंजर श्रेणी की ट्रेनों में अनारक्षित श्रेणी के टिकट की दरों में 500 किलोमीटर तक की दूरी की यात्रा के लिए कोई वृद्धि नहीं की गयी है, जबकि 501 किलोमीटर से 1500 किलोमीटर तक दूरी के टिकट पर पांच रुपये, 1501 से 2500 किलोमीटर के टिकट के लिए 10 रुपये तथा 2501 से 3000 किलोमीटर तक किराये पर 15 रुपये बढ़ाये गये हैं।
अधिकारी ने बताया कि उक्त ट्रेनों के स्लीपर श्रेणी और प्रथम श्रेणी के किरायों में आधा पैसा प्रति किलोमीटर बढ़ाया गया है। उपनगरीय और मासिक या त्रैमासिक सीज़न टिकट की दरों में कोई वृद्धि नहीं की गयी है।
उन्होंने बताया कि तेजस राजधानी, राजधानी, शताब्दी, दूरंतो, वंदे भारत, हमसफर, अमृत भारत, तेजस, महामना, गतिमान, अंत्योदय, गरीब रथ, जन शताब्दी, युवा एक्सप्रेस, गैर उपनगरीय पैसेंजर ट्रेनों, अनुभूति कोच एवं विस्टाडोम कोच आदि के मूल किराये नयी दरों के हिसाब से होंगे। आरक्षण शुल्क, सुपरफास्ट आदि शुल्क पूर्व की तरह लागू रहेंगे। इसी प्रकार माल एवं सेवा कर (जीएसटी) भी पहले की तरह लागू रहेगा।

गौरतलब है कि रेलवे ने पिछली बार व्यापक रूप से किरायों में वृद्धि वर्ष 2014 में की थी. सभी श्रेणियों के किराये में 14.2 प्रतिशत और माल भाड़े में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि की गयी थी। वर्ष 2019 में मेल-एक्सप्रेस ट्रेनों में अनारक्षित श्रेणी में यात्रियों को प्रति किलोमीटर दो पैसे बढ़ाये गये थे। स्लीपर श्रेणी के किराये में दो पैसे और प्रथम श्रेणी के किराये में भी दो पैसे की बढ़ोतरी की गयी है। साधारण ट्रेनों के द्वितीय श्रेणी के किराये में प्रति किलोमीटर एक पैसे और स्लीपर श्रेणी के लिए भी किराये में एक पैसे की बढ़ोतरी की गयी थी। प्रथम श्रेणी के किराये में एक पैसे की बढ़ोतरी की गयी थी। सभी वातानुकूलित श्रेणियों में एक समान चार पैसे प्रति किलोमीटर की बढ़ोतरी की गयी थी। यह वृद्धि जनवरी 2020 से लागू हुई थी।

UPI से लेकर पैन तक…एक जुलाई से बदल जाएंगे यह नियम

नई दिल्ली:  जुलाई, 2025 से कई नए वित्तीय नियम लागू होने जा रहे हैं, जिसका आपकी जेब पर सीधा असर हो सकता है। इनमें यूपीआई चार्जबैक, नए तत्काल ट्रेन टिकट बुकिंग और पैन कार्ड के नियमों में बदलाव शामिल हैं।

नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) की ओर से हाल ही में सिस्टम को आसान बढ़ाने के उद्देश्य से यूपीआई चार्जबैक नियमों में बदलाव किया गया है।

मौजूदा समय में बहुत अधिक दावों के कारण सभी चार्जबैक रिक्वेस्ट को खारिज कर दिया जाता है। ऐसे में सही चार्जबैक रिक्वेस्ट को प्रोसेस करने के लिए बैंक को यूपीआई रेफरेंस कंप्लेंट सिस्टम (यूआरसीएस) के जरिए एनपीसीआई के पास जाकर केस को व्हाइटलिस्ट करना पड़ता है।

15 जुलाई के बाद एनपीसीआई की इसमें कोई भूमिका नहीं रहेगी। अगर बैंक को कोई चार्जबैक रिक्वेस्ट सही लगती है तो उसे वह एनपीसीआई से व्हाइटलिस्ट किए बिना प्रोसेस कर सकती है।

यूपीआई चार्जबैक एक औपचारिक विवाद है जिसे यूजर तब उठाता है जब कोई लेनदेन विफल हो जाता है या जब भुगतान की गई सेवा या उत्पाद वितरित नहीं किया जाता है। यह यूजर को बैंक या भुगतान सेवा प्रदाता से धन वापसी की मांग करने की अनुमति देता है।

नए पैन कार्ड का आवेदन करने के लिए एक जुलाई से आपके पास आधार कार्ड होना जरूरी है। इससे पहले आप किसी भी वैध दस्तावेज या जन्म प्रमाणपत्र के जरिए पैन कार्ड के लिए आवेदन कर सकते थे।

जुलाई 2025 से तत्काल टिकट बुकिंग के कई नए नियम लागू हो जाएंगे। 1 जुलाई 2025 से आईआरसीटीसी की वेबसाइट या इसके मोबाइल ऐप के जरिए तत्काल ट्रेन टिकट के लिए आधार सत्यापन अनिवार्य हो जाएगा।

गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स नेटवर्क (जीएसटीएन) ने 7 जून, 2025 को घोषणा की थी कि मासिक जीएसटी भुगतान फॉर्म जीएसटीआर-3बी को जुलाई 2025 से एडिट नहीं किया जा सकेगा।

इसके अतिरिक्त, जीएसटीएन ने कहा था कि करदाताओं को देय तिथि से तीन वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद जीएसटी रिटर्न दाखिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

त्रिपुरा भाजपा अध्यक्ष पद पर पेच, केंद्र-राज्य नेतृत्व में सहमति न बनने से चुनाव टला

अंजलि भाटिया 

नई दिल्ली ,28 जून- त्रिपुरा में भाजपा के नए राज्य अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर पार्टी के भीतर असहमति गहराती जा रही है। शुक्रवार को केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण द्वारा 29 जून 2025 को अध्यक्ष पद के चुनाव की अधिसूचना जारी की गई थी, जिससे संगठनात्मक प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की उम्मीद बनी थी। लेकिन चंद घंटों में ही यह अधिसूचना वापस ले ली गई और चुनाव को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया।

भाजपा सूत्रों के मुताबिक, यह निर्णय राज्य नेतृत्व और केंद्रीय नेतृत्व के बीच संभावित उम्मीदवार को लेकर सहमति नहीं बन पाने के कारण लिया गया है। मुख्यमंत्री माणिक साहा और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के बीच इस मुद्दे पर मतभेद साफ नजर आ रहे हैं

केंद्र की ओर से भगवान दास का नाम प्रस्तावित किया गया था, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे हैं और पार्टी व सरकार में कई अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। लेकिन मुख्यमंत्री साहा ने उनके नाम का विरोध करते हुए उन्हें स्वीकारने से इनकार कर दिया है। राज्य सरकार के सूत्रों के अनुसार, भगवान दास के एक करीबी रिश्तेदार पर गंभीर आपराधिक मामले लंबित हैं, जिससे उनकी छवि पर असर पड़ा है।

मुख्यमंत्री माणिक साहा की ओर से टिंकू रॉय और नबेंदु भट्टाचार्य के नाम आगे बढ़ाए गए हैं, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व को ये नाम संगठनात्मक दृष्टि से उपयुक्त नहीं लग रहे हैं। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, मुख्यमंत्री इस पद को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय बना चुके हैं और अन्य विकल्पों को खारिज कर रहे हैं। उनके सुझाए गए नाम पार्टी की राज्य इकाई की मुख्यधारा से दूर माने जा रहे हैं।

सूत्रों की मानें तो माणिक साहा किसी तीसरे, समझौता उम्मीदवार के पक्ष में अंततः राजी हो सकते हैं। हालांकि, अब तक इस पर कोई औपचारिक सहमति नहीं बन पाई है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और त्रिपुरा भाजपा की पूर्व अध्यक्ष प्रतिमा भौमिक का नाम भी चर्चा में आया था, लेकिन पार्टी सूत्रों के अनुसार, उनके कुछ पारिवारिक विवादों के चलते उन्हें गंभीर दावेदार नहीं माना जा रहा है।

पूर्व अध्यक्ष राजीब भट्टाचार्य के राज्यसभा भेजे जाने के बाद भाजपा के सामने नए अध्यक्ष की तलाश एक जटिल चुनौती बन गई है। 2018 में 25 वर्षों के वाम शासन को खत्म कर सत्ता में आई भाजपा के लिए त्रिपुरा पूर्वोत्तर में एक अहम रणनीतिक राज्य रहा है। लेकिन मौजूदा गतिरोध यह संकेत देता है कि राज्यों में नेतृत्व चयन को लेकर पार्टी के भीतर सामंजस्य बनाना अब पहले जितना आसान नहीं रह गया है।

गरीबी रेखा का पुनर्मूल्यांकन हो

ग्रामीण परिदृश्य बदलने में मनरेगा का योगदान, डेली वेज बढ़ाए जाने की मांग।

बृज खंडेलवाल द्वारा

गरीबी के खिलाफ जंग में मनरेगा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अगर 25 करोड़ लोग गरीबी की रेखा से ऊपर उठे हैं, तो ग्रामीण रोजगार स्कीम्स ने इस क्रांति को सफल अंजाम दिया है, बेशक क्रियान्वयन बेहतर और भ्रष्टाचार मुक्त हो सकता था।

इस तथ्य को भी स्वीकारा जा सकता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में मुद्रा प्रवाह बढ़ा है, जिससे जीवन स्तर में हल्के बदलाव दिखने लगे हैं। सरकार की दो दर्जन से ज्यादा योजनाएं बदलाव का इंजन बन रहीं हैं।

दक्षिण के प्रांतों में, मध्य प्रदेश और गुजरात में ग्रामीण योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन से गरीबी उन्मूलन की दिशा में खासी प्रगति हुई है। बिहार, पश्चिम बंगाल, यूपी, झारखंड आदि राज्य प्रयासरत हैं दौड़ का हिस्सा बनकर आगे निकलने के लिए। फ्री राशन स्कीम जो कोविड काल में मजबूरी में शुरू हुई, अभी भी चल रही है। ये  एक बहुत जबरदस्त बफर या shock absorber बनके उभरी है। आने वाले समय में गरीबी की परिभाषा बदलनी होगी। क्योंकि सत्यजीत राय की फिल्मों के जैसे गरीबी अब नहीं दिखती, बल्कि शहरों के स्लम्स, झुग्गी झोंपड़ियों में रहने वाले मोबाइल, टीवी, मोबाइक, ऐसी, आदि सुविधाएं उपयोग करने की हैसियत रखते हैं।

बीस साल पहले, कभी जनता पार्टी द्वारा शुरू किए गए “अंत्योदय” और “रोज़गार के बदले अनाज” जैसी योजनाओं से शुरू हुआ भारत का सामाजिक सुरक्षा अभियान, 2005 में मनरेगा के ज़रिए एक क़ानूनी हक़ बन गया था।

लेकिन अब यह सवाल उठ रहा है: क्या केंद्र सरकार की हालिया नीतियों ने इस योजना की आत्मा को  घायल तो नहीं कर दिया है?

मनरेगा—जिसे अब महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) कहा जाता है—एक समय गांव के गरीबों के लिए राहत की सांस था। यह योजना इस वादे पर टिकी थी कि हर ग्रामीण परिवार को साल में 100 दिन का रोज़गार मिलेगा, वो भी मांगने पर सिर्फ़ 15 दिन के भीतर। लेकिन अब सरकार द्वारा वित्तीय वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में खर्च पर 60% की सीमा लगाने का फ़ैसला इस योजना को गंभीर संकट में डाल सकता है।

यह योजना सिर्फ़ मज़दूरी देने तक सीमित नहीं थी। गांवों में जल संरक्षण, सिंचाई, सड़क और अन्य ज़रूरी ढांचे तैयार कर कृषि को सहारा भी दिया गया। फिर भी, पिछले कुछ वर्षों में इस योजना की हालत कुछ बिगड़ती जा रही है। कुल बजट का हिस्सा GDP का महज़ 0.26% रह गया है, जबकि विशेषज्ञ इसे 1.7% तक बढ़ाने की सलाह दे रहे हैं।

सबसे बड़ा संकट मज़दूरी के भुगतान में देरी है। मार्च 2025 तक ₹21,000 करोड़ सिर्फ़ पुराने बकायों को चुकाने में खर्च हो चुके थे। नई मज़दूरी के लिए पैसे ही नहीं बचे। मज़दूरों को महीने–दो महीने तक मज़दूरी नहीं मिलती, जिससे वे क़र्ज़ में डूब जाते हैं।

ऊपर से मज़दूरी दरें भी शर्मनाक रूप से कम हैं—₹202 से ₹357 प्रतिदिन—जो 2009 की महंगाई दर के आधार पर तय की गई थीं। विशेषज्ञों ने बार-बार नए आधार वर्ष 2014 को लागू करने की माँग की, लेकिन सरकार ने कान नहीं दिए। मजदूरी न्यूनतम वेज एक्ट के तहत तय की जानी चाहिए। कम मजदूरी की वजह से गांव से शहर की तरफ पलायन रुक नहीं पा रहा है।

औसतन हर परिवार को साल में केवल 50 दिन का काम ही मिल पा रहा है। 100 दिनों का वादा पूरा होने की दर महज़ 7% है। ज़ाहिर है, नीति और हक़ीक़त के बीच बहुत बड़ा फ़ासला है।

भ्रष्टाचार रोकने के नाम पर आधार लिंक भुगतान और मोबाइल ऐप से हाज़िरी जैसे तकनीकी उपाय लागू किए गए हैं। लेकिन इससे असली ज़रूरतमंद—बूढ़े, अनपढ़, स्मार्टफोन या इंटरनेट से वंचित लोग—योजना से बाहर हो रहे हैं। ग्राम पंचायतों की भूमिका भी कमज़ोर हो गई है। सामाजिक ऑडिट, जो एक समय निगरानी का असरदार ज़रिया था, अब सिर्फ़ दिखावा बनकर रह गया है। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में केंद्र और राज्य की सियासी खींचतान का खामियाज़ा आम मज़दूर भुगत रहा है—उसे रोज़गार भी नहीं और जवाब भी नहीं।

कई राज्यों में मनरेगा में भारी घोटालों की ख़बरें भी सामने आई हैं। लेकिन जांच का रवैया भी राजनीतिक मंशा पर निर्भर दिखता है—कहीं कार्रवाई, तो कहीं चुप्पी।

बिहार के पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि अगर यही हाल रहा, तो जलवायु परिवर्तन और अनियमित मानसून की मार झेल रहे किसान और मज़दूर और ज़्यादा परेशान होंगे। नोटबंदी और कोरोना जैसे संकटों में भी यही योजना ग्रामीण भारत का सहारा बनी थी।”

अगर सरकार वाक़ई ग्रामीण कल्याण को लेकर संजीदा है, तो उसे चाहिए कि 60% खर्च की सीमा हटाकर योजना को उसकी मूल भावना—मांग पर आधारित रोज़गार—की ओर लौटाए। बजट को कम से कम GDP के 1.7% तक बढ़ाया जाए, मज़दूरी दरें समयानुसार सुधारी जाएं और भुगतान में देरी खत्म की जाए।

नितीन गडकरी की वार्षिक टोल पास योजना से निजी वाहन चालकों को बड़ी राहत

दिल्ली से मुंबई का सफर सिर्फ ₹30 में संभव! हालांकि दिल्ली–मुंबई एक्सप्रेसवे पर योजना लागू होगी या नहीं, इस पर अब भी संशय

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली- केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितीन गडकरी द्वारा हाल ही में घोषित की गई वार्षिक टोल पास योजना निजी वाहन चालकों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है। इस योजना के तहत यात्री सिर्फ ₹30 के टोल में दिल्ली से मुंबई तक का 1386 किलोमीटर लंबा सफर तय कर पाएंगे।
गडकरी के अनुसार, ₹3,000 में मिलने वाले वार्षिक पास से वाहन चालक 200 टोल प्लाज़ा पार कर सकते हैं, जिससे एक टोल की औसत लागत सिर्फ ₹15 पड़ेगी। चूंकि दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर सिर्फ दो टोल बिंदु होंगे। एक दिल्ली में और दूसरा मुंबई में इसलिए पूरा सफर केवल ₹30 टोल टैक्स में संभव होगा।
वर्तमान में दिल्ली से मुंबई के बीच सफर करने पर लगभग ₹2,100 तक का टोल शुल्क लगता है। ऐसे में वार्षिक पास योजना लागू होने पर वाहन चालकों को हजारों रुपये की बचत हो सकती है।
दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे का लगभग 80% काम पूरा हो चुका है।1386 किलोमीटर लंबा यह मार्ग पूर्णतः एक्सेस कंट्रोल्ड (प्रवेश-नियंत्रित) होगा, जिससे सफर केवल 12 घंटे में पूरा हो सकेगा।
यहां कुल 15 टोल प्लाज़ा प्रस्तावित हैं, लेकिन शुल्क केवल एक्जिट पॉइंट पर वसूला जाएगा। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई यात्री दिल्ली से मुंबई जाता है, तो उसे केवल मुंबई के टोल प्लाज़ा पर टोल भरना होगा।
हालांकि इस योजना ने वाहन चालकों में उत्साह पैदा किया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि वार्षिक टोल पास योजना दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर लागू होगी या नहीं।
राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के अधिकारियों का कहना है कि यह हाईवे एक प्रीमियम इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना है, और इस पर वार्षिक पास लागू करना आर्थिक रूप से व्यवहारिक नहीं होगा।
हालांकि, एक्सप्रेसवे का बाकी बचा हुआ 20% कार्य पूरा होने के बाद ही इस पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

क्या जेवर एयरपोर्ट के पास खुल रहे मेगा लैदर शूज पार्क से आगरा के लाखों जूता कारीगरों का जीवन स्तर बेहतर होगा?

बृज खंडेलवाल द्वारा

ऐतिहासिक इमारतों के अलावा, आगरा क्षेत्र अपने कुशल कारीगरों के हुनर के लिए मशहूर है। आयरन फाउंड्री उद्योग, ग्लास वेयर, लैदर शूज, पेठा दालमोट, मार्बल इनले वर्क, हैंडीक्राफ्ट्स, से आगरा की पहचान पूरे विश्व में है।

आगरा ने  चमड़ा जूता उद्योग की वजह से मुग़ल काल से ही बेहतरीन क्वालिटी के जूते और चमड़े का सामान बनाने में नाम कमाया। लेकिन आज यही उद्योग, जो कभी शहर की शान और आर्थिक रीढ़ था,  संकट से गुज़र रहा है। छोटी-छोटी दुकानों और कारखानों में चल रहा यह कारोबार अब बदहाली, सुरक्षा के अभाव और पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझ रहा है। 

आगरा का चमड़ा उद्योग सदियों पुराना है। मुग़ल बादशाहों के ज़माने में यहाँ बने जूते और चमड़े के सामान की देश-विदेश में डिमांड थी। हींग की मंडी से शुरू हुआ ये कारोबार, आज शहर भर में फैला है और आगरा की इकॉनमी का आधार है। अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़ल ने भी ‘आइन-ए-अकबरी’ में आगरा के मोचियों और चर्मकारों का ज़िक्र किया है। ब्रिटिश काल में भी यह उद्योग फलता-फूलता रहा और आगरा के जूते यूरोप तक निर्यात किए जाते थे। आज़ादी के बाद, छोटे कारीगरों और कुटीर उद्योगों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया, लेकिन बदलते वक्त और सरकारी उपेक्षा ने इस उद्योग को पीछे धकेल दिया।   

आज आगरा के जूता उद्योग की हालत बेहद दयनीय है। जीवनी मंडी, मंटोला, बिजलीघर, चक्की पाट, जगदीश पूरा,  लोहा मंडी, नई मंडी जैसे इलाकों में सैकड़ों छोटी-छोटी फैक्ट्रियाँ और वर्कशॉप्स चल रही हैं, जहाँ मजदूरों को अंधेरी, तंग और गंदी गलियों में काम करना पड़ता है। इन जगहों पर न तो हवा का ठीक से बंदोबस्त है, न ही सुरक्षा के कोई इंतज़ामात। नतीजा यह कि आए दिन आग लगने और केमिकल विस्फोट की घटनाएं होती रहती हैं। 

जीवनी मंडी एरिया की श्रीजी इंडस्ट्रीज में लगी भीषण आग ने कई मजदूरों की जान ले ली थी और अनेकों परिवारों को तबाह कर दिया था। इस तरह की घटनाएं इस उद्योग की लापरवाही और सरकारी निगरानी के अभाव की ओर इशारा करती हैं।  

एक रिपोर्ट के मुताबिक, आगरा के जूता उद्योग में काम करने वाले 60% से ज़्यादा मजदूर टीबी, सांस की बीमारियों और त्वचा रोगों से पीड़ित हैं। चमड़े को प्रोसेस करने में इस्तेमाल होने वाले केमिकल्स, जैसे क्रोमियम और गोंद (एडहेसिव), मजदूरों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं। महिलाएं, जो घरों में जूते सिलने का काम करती हैं, उन्हें भी कम मज़दूरी और अस्वस्थ हालात का सामना करना पड़ता है। 

इसके अलावा, नशे की लत, मजदूरों की सेहत को और बर्बाद कर रही है। मजबूरी में काम करने वाले ये लोग अक्सर थकान और तनाव से बचने के लिए नशे का सहारा लेते हैं, जो उनकी मुसीबतों को और बढ़ा देता है। 

आगरा की टैनरियों से निकलने वाला कचरा और ज़हरीले पदार्थ नालियों और यमुना नदी को प्रदूषित करते हैं। चमड़ा प्रोसेसिंग में इस्तेमाल होने वाले केमिकल्स पानी में मिलकर लोगों की सेहत के लिए खतरा बन रहे हैं। सरकारी नियमों की अनदेखी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की लापरवाही ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।  

हालांकि, अब इस उद्योग को बचाने के लिए कुछ पहल हो रही हैं। जेवर हवाई अड्डे के पास 100 एकड़ में बनने वाला मेगा फुटवियर पार्क एक बड़ा कदम है। यह प्रोजेक्ट 3000 करोड़ रुपये के निवेश से बनाया जा रहा है और इसमें मॉडर्न फैक्ट्रियाँ, वर्कशॉप्स और सुरक्षित वातावरण होगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या छोटे कारीगरों और मजदूरों तक इसका फायदा पहुँच पाएगा? 

इसके अलावा, अछनेरा में प्रस्तावित लेदर पार्क भी एक बड़ी उम्मीद थी, हालांकि यह प्रोजेक्ट सालों से अटका हुआ है। अगर इसे जल्दी पूरा किया जाए, तो आगरा के जूता उद्योग को नया जीवन मिल सकता है। 

औद्योगिक क्षेत्रों का विकास: छोटी वर्कशॉप्स को संगठित औद्योगिक क्षेत्रों में शिफ्ट किया जाए।  सुरक्षा मानकों का पालन हो: फैक्ट्रियों में आग सुरक्षा और वेंटिलेशन का ठीक बंदोबस्त हो।  मजदूरों के स्वास्थ्य की देखभाल की जाए: नियमित मेडिकल कैंप और बीमा योजनाएं लागू की जाएँ।  प्रदूषण नियंत्रण: टैनरियों के कचरे का सही तरीके से निपटान किया जाए।  सरकारी और प्राइवेट सहयोग से इस उद्योग को मॉडर्नाइज किया जाए। साथ ही आगरा विश्व विद्यालय इस इंडस्ट्री पर रिसर्च कराकर नवाचार प्रोत्साहित करे।

आगरा का जूता उद्योग सिर्फ एक कारोबार नहीं, बल्कि शहर की पहचान और हज़ारों परिवारों की रोज़ी-रोटी है। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह उद्योग खत्म हो जाएगा। सरकार, उद्योगपतियों और समाज को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा, ताकि आगरा के जूते फिर से दुनिया भर में अपनी धाक जमा सकें।

राजमार्गों पर उन्नत प्रबंधन प्रणाली से यातायात नियमों का पालन सख्त, दुर्घटनाओं में आएगी कमी

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली- सड़क सुरक्षा को सुदृढ़ करने और वाहन चालकों पर जुर्मानों का बोझ कम करने के उद्देश्य से केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने राजमार्गों पर उन्नत यातायात प्रबंधन प्रणाली (Advanced Traffic Management System – ATMS) लागू करने का निर्णय लिया है। यह प्रणाली अत्याधुनिक डिजिटल तकनीकों से लैस है और यातायात नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन में मददगार साबित हो रही है।
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी 2014 से ही सड़क दुर्घटनाओं और मौतों को कम करने की दिशा में प्रयासरत हैं। इसी कड़ी में अब देश के प्रमुख राजमार्गों पर इस नई तकनीक से निगरानी और चालान प्रणाली को सुदृढ़ किया जा रहा है।
भारतीय राजमार्ग प्रबंधन कंपनी लिमिटेड (IHMCL) के मुख्य उत्पाद अधिकारी अमृत सिन्हा ने बताया कि फिलहाल यह प्रणाली 5,000 किलोमीटर राजमार्गों पर लागू की जा चुकी है। इसमें द्वारका एक्सप्रेसवे और दिल्ली-गुरुग्राम एक्सप्रेसवे जैसे महत्वपूर्ण मार्ग शामिल हैं।
अमृत सिन्हा ने बातया की उदाहरण के तौर पर द्वारका एक्सप्रेसवे के 56 किलोमीटर के क्षेत्र में 110 एआई-सक्षम कैमरे लगाए गए हैं, जो घटना पहचान एवं प्रवर्तन प्रणाली (VIDES) से जुड़े हैं। ये कैमरे ट्रिपल राइडिंग, बिना हेलमेट या सीटबेल्ट के वाहन चलाना, उल्टी दिशा में गाड़ी चलाना, तेज रफ्तार, ओवरटेकिंग, पैदल यात्री की आवाजाही और राजमार्ग पर पशुओं की मौजूदगी जैसे कुल 14 प्रकार के उल्लंघनों की स्वतः पहचान कर चालान जारी करते हैं।
प्रणाली के अंतर्गत चालान स्वचालित रूप से संबंधित व्यक्ति को डिजिटल माध्यम से भेजा जाता है। अधिकारियों का मानना है कि इस तकनीक से न केवल नियमों के उल्लंघन में कमी आएगी, बल्कि सड़क सुरक्षा को भी बल मिलेगा।
यह प्रणाली अगले दो से तीन वर्षों में महाराष्ट्र सहित देश भर के 50,000 किलोमीटर चार-लेन और उससे अधिक चौड़ाई वाले राजमार्गों पर लागू की जाएगी। फिलहाल यह दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे के कोटा खंड में भी प्रभावी रूप से कार्य कर रही है।
सरकार का उद्देश्य है कि तकनीक के माध्यम से यातायात नियमों का पालन सुनिश्चित हो और दुर्घटनाओं की दर में ठोस गिरावट आए।

शहरों में घर खरीदना अब गरीबों के बस की बात नहीं: राहुल गांधी

अंजलि भाटिया
नई दिल्ली- कांग्रेस के नेता और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने शहरी भारत में बढ़ती महंगाई और आम आदमी की कठिनाइयों को लेकर केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि आज शहरों में घर खरीदना गरीबों और मध्यवर्गीय परिवारों के लिए सिर्फ एक सपना बनकर रह गया है।राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए लिखा,
हां, आपने सही पढ़ा — घर खरीदना अब गरीबों के बजट से कोसों दूर है। भारत के सबसे अमीर 1% लोगों के पास देश की 40% संपत्ति है, जबकि 50% गरीबों के हिस्से में सिर्फ 3% संपत्ति आती है।
उन्होंने आगे लिखा कि ये वही चमकते हुए बड़े शहर हैं, जिन्हें अवसरों और तरक्की का केंद्र बताया जाता है। लेकिन सच्चाई ये है कि यहां आम आदमी सिर्फ संघर्ष करता है — महंगी शिक्षा, इलाज, पेट्रोल-डीजल और अब घर खरीदने का सपना भी उसकी पहुंच से बाहर हो गया है।
राहुल ने कहा कि बीते 10 वर्षों में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के सपनों को कुचला गया है। जहां एक तरफ अरबपति पूंजीपति और रियल एस्टेट लॉबी मुनाफा कमा रही है, वहीं दूसरी तरफ एक आम भारतीय सिर छुपाने की छत के लिए भी जूझ रहा है।
कांग्रेस नेता ने सरकार पर आर्थिक नीतियों को केवल अमीरों के हित में बनाने का आरोप लगाया और कहा कि यदि बदलाव नहीं हुआ तो आने वाला समय और भी मुश्किल भरा हो सकता है।
राहुल ने कहा कि कांग्रेस का विज़न एक ऐसा भारत है, जहां हर वर्ग के लोगों को बराबरी का मौका और गरिमापूर्ण जीवन जीने का हक मिले।