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कश्मीर में पर्यटकों की धूम

ग़ैर-कश्मीरियों और कश्मीरी पंडितों की लक्षित हत्याएँ ख़ूबसूरत घाटी में आने वाले पर्यटकों की भावना को कम करने में विफल रही हैं। एक तरह से कश्मीर में आने वाले पर्यटकों की बड़ी संख्या ने शान्तिभंग करने की कोशिश करने वालों को ठेंगा दिखाया है।
सन् 2021 में क़रीब 7,00,000 पर्यटकों के मुक़ाबले कश्मीर घाटी ने जनवरी और मई, 2022 के बीच 8,00,000 से अधिक पर्यटकों को अपनी मनमोहक उपस्थिति से आश्चर्यचकित और मंत्रमुग्ध कर दिया है। यह क्या दर्शाता है? कश्मीर के पर्यटन विभाग के निदेशक जी.एन. इट्टू कहते हैं कि विभाग ने कश्मीर में सभी मौसमों में पर्यटकों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया है। इट्टू ने कहा कि यह पहली बार है जब कश्मीर में वसंत के मौसम को बढ़ावा दिया जा रहा है।
पिछले साल कश्मीर पर्यटन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के रूप में असामान्य ब्रांड एंबेसडर मिला। प्रधानमंत्री ने तब एक ट्वीट में कहा था- ‘जब भी आपको अवसर मिले, जम्मू-कश्मीर का दौरा करें और सुन्दर ट्यूलिप उत्सव देखें। ट्यूलिप के अलावा आप जम्मू-कश्मीर के लोगों के गर्मजोशी भरे आतिथ्य का अनुभव करेंगे।’

मोदी ने ट्वीट में इस जगह और इसके लोगों दोनों की विशिष्टता पर प्रकाश डाला। अमित शाह के जम्मू-कश्मीर दौरे के बाद के ट्वीट ने भी इसी तरह की भावनाओं को प्रतिध्वनित किया। आँकड़ों से पता चलता है कि जनवरी और फरवरी में 1,62,664 घरेलू पर्यटकों और 490 विदेशियों ने कश्मीर घाटी का दौरा किया। साल 2022 के पहले तीन महीनों के दौरान गुलमर्ग, सोनमर्ग और पहलगाम में ब$र्फ का आनन्द लेने के लिए 3,00,000 से अधिक पर्यटक कश्मीर पहुँचे। उसके बाद श्रीनगर की डल झील के आसपास वसंत पर्यटन हुआ। अधिकारियों का कहना है कि श्रीनगर में जबरवान रेंज की तलहटी में कश्मीर के ट्यूलिप गार्डन में सीजन के खुलने के 10 दिन के भीतर 2,00,000 पर्यटक आये थे।

श्रीनगर हवाई अड्डे ने 4 अप्रैल को इतिहास में अब तक का सबसे व्यस्त दिन देखा, जब 15,014 लोग कश्मीर में 90 उड़ानों के जरिये आये और यहाँ से वापस गये। श्रीनगर में लगभग सभी होटलों के 60,000 कमरे, जो लगभग एक लाख पर्यटकों को समायोजित कर सकते हैं; जून के पहले सप्ताह तक बुक किये जा चुके थे। दरअसल कश्मीर में इस साल पर्यटकों की रिकॉर्ड संख्या देखी जा रही है। तीन साल की मंदी के बाद अकेले मार्च में क़रीब 2,00,000 पर्यटक घाटी में आये। उद्योग जगत के सूत्रों ने बताया कि इस बार इतनी भीड़ है कि इस साल जून के मध्य तक होटल पूरी तरह से बुक हो चुके हैं।

जम्मू और कश्मीर पर्यटन विभाग और केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय के आँकड़ों से संकेत मिलता है कि जनवरी और 15 मई, 2022 के बीच पर्यटकों की संख्या बढ़कर 7,00,000 हो गयी, जो पिछले 10 साल में सबसे अधिक है। यह पिछले साल इसी अवधि में देखे गये 1,25,000 पर्यटकों से चार गुना से अधिक है। पर्यटन मंत्रालय के एक अधिकारी के हवाले से मीडिया रिपोट्र्स के मुताबिक, अक्टूबर 2021 से मार्च 2022 के बीच कम से कम 80,00,000 लोगों ने केंद्र शासित प्रदेश का दौरा किया। कश्मीर होटल्स एंड रेस्टोरेंट ऑनर्स फेडरेशन के अध्यक्ष अब्दुल वाहिद मलिक ने कहा कि वर्तमान में श्रीनगर में 80-90 फ़ीसदी हाई-एंड (लग्जरी) होटल हैं।

श्रीनगर हवाई अड्डे के निदेशक कुलदीप सिंह ने कहा कि 28 मार्च को हमारे पास 7,824 यात्रियों के साथ 45 आगमन उड़ानें और 7,190 यात्रियों के साथ 45 प्रस्थान उड़ानें थीं। इस दौरान 15,014 यात्रियों के साथ कुल 90 उड़ानें इस हवाई अड्डे के इतिहास में सबसे ज़्यादा हैं।
कश्मीर में हाल के दिनों में ग़ैर-कश्मीरियों की लक्षित हत्याओं के बाद सोशल मीडिया पर हताश टिप्पणियों की बाढ़ आ गयी है, जो एक तरफ़ कश्मीर की बिगड़ती स्थिति और दूसरी तरफ़ ‘द कश्मीर फाइल्स’ फ़िल्म और इसी तरह के विषयों के बारे में बात करती हैं।
हालाँकि लक्षित हत्याओं की बाढ़ से बेपरवाह पर्यटकों ने इस गर्मी में रिकॉर्ड संख्या में घाटी का दौरा किया है। पिछले साल 7,00,000 पर्यटकों की थोड़ी शर्म के मुक़ाबले, कश्मीर घाटी ने जनवरी और मई 2022 के बीच 8,00,000 से अधिक पर्यटकों को देखा है। कश्मीर में पर्यटन फल-फूल रहा है। डल झील रंगीन शिकारों के एक व्यस्त शहर जैसा दिखता है। रिपोर्ट बताती हैं कि होटल तो फुल हैं ही, बाज़ार भी पर्यटकों से भरे हुए हैं और रेस्तरां में पैर रखने की जगह नहीं है। पर्यटक कश्मीरी व्यंजनों का आनन्द उठाते हुए सबसे अच्छे पल बिता रहे हैं।
अप्रैल, 2022 में घाटी में रिकॉर्ड 2.8 लाख पर्यटक आये, जो लगभग तीन दशक में सबसे अधिक हैं। पर्यटन विभाग के अधिकारियों को उम्मीद है कि भीड़ जून तक जारी रहेगी और पूरे साल पर्यटकों के आगमन में वृद्धि होगी। अब 30 जून से अमरनाथ यात्रा के बाद इस सीजन में आठ लाख से अधिक तीर्थयात्रियों के आने की उम्मीद है।

गुलमर्ग, सोनमर्ग, पहलगाम, डल झील और वुलर झील सहित पर्यटकों की अधिकतम संख्या को आकर्षित करने वाले मुख्य स्थलों के अलावा, राज्य पर्यटन विभाग ने 75 नये गंतव्य खोले हैं, जिनमें बुंगस, लोलाब, गुरेज और डोडी पथरी शामिल हैं।
साहसिक पर्यटन और साहसिक खेल गतिविधियों अधिक लोकप्रिय हो रही हैं, क्योंकि अधिक पर्यटक घाटी में अपने प्रवास के दौरान ट्रैकिंग, कैंपिंग, माउंटेन बाइकिंग, रिवर राफ्टिंग, पैराग्लाइडिंग और हॉट एयर बैलून राइड का चयन कर रहे हैं। टूर ऑपरेटरों के हवाले से मीडिया रिपोट्र्स बताती हैं कि पर्यटकों का औसत प्रवास एक से दो सप्ताह का होता है।

पर्यटकों की भीड़ के बीच होटल के कमरे ढूँढना आसान नहीं है, क्योंकि वे दोगुनी दरों पर मिलते हैं। कश्मीर में पर्यटन की वापसी कोरोना वायरस के विकट प्रकोप के बाद की अवधि में शुरू हुई, जब प्रमुख भारतीय पर्यटन स्थल, केरल तक में पर्यटन को कोरोना वायरस ने बुरी तरह प्रभावित किया है। पर्यटन विभाग के अधिकारी इस सफलता का श्रेय आक्रामक मार्केटिंग, अखिल भारतीय प्रचार और प्रभावी कोरोना-प्रबंधन को देते हैं, जिसमें कैब ड्राइवरों से लेकर होटल मालिकों तक सभी हितधारकों का टीकाकरण हुआ है। सीधी शाम की उड़ानों की शुरुआत ने जम्मू-कश्मीर में पर्यटन के लिए एक मौक़ा दिया है और श्रीनगर के शेख़-उल-अलाम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर रात की उड़ानों का संचालन शुरू हो चुका है। इस प्रकार यात्रियों को हर समय घाटी में प्रवेश करने की अनुमति मिलती है।

विभिन्न रिपोर्टों से पता चलता है कि कश्मीर घाटी में सामान्य स्थिति की भावना मज़बूत हुई है और ग़ैर-कश्मीरियों और कश्मीरी पंडितों की लक्षित हत्या आतंकवादियों द्वारा उभरती शान्ति और विश्वास को भंग करने के लिए हताशा का क़दम हो सकता है। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2021 से मार्च 2022 के बीच कम-से-कम 80 लाख लोगों ने जम्मू-कश्मीर का दौरा किया। पर्यटन और संस्कृति सचिव सरमद हफ़ीज़ ने कहा कि चूँकि जम्मू-कश्मीर सरकार ने पर्यटन को प्राथमिकता के रूप में लिया है, इसलिए पर्यटकों को कश्मीर आने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए पूरे भारत में विज्ञापन अभियान शुरू किये गये हैं। सरकार ने जम्मू-कश्मीर में 75 कम ज्ञात स्थलों की पहचान की है, जिनमें शीर्ष पर्यटन स्थल बनने की क्षमता है।

हालाँकि ज़्यादातर लोगों का कहना है कि विकास प्रक्रिया की शृंखला में बुनियादी ढाँचा एक कमज़ोर कड़ी बना हुआ है। जबकि मुख्य सड़कें उपेक्षा की स्थिति में हैं। यह ज्ञात है कि हर इन सड़कों को भारी हिमपात झेलना होता है, लिहाज़ा समस्या का कुछ समाधान खोजने की ज़रूरत है। अनियमित बिजली आपूर्ति और अन्य आधुनिक सुविधाओं की कमी भी बड़ा मुद्दा है। बुनियादी ढाँचे की कमी हमेशा पर्यटकों के लिए एक बाधा है और यह स्थिति जितनी जल्दी ठीक हो जाए, उतना अच्छा है। तनावपूर्ण सुरक्षा स्थिति अब इस दिशा में आवाजाही को रोकने का बहाना नहीं है। यदि पर्यटक और व्यावसायिक क्षमता का पूरी तरह से दोहन करना है, तो कश्मीर के लिए एक महत्त्वपूर्ण बदलाव देखना अनिवार्य है। यह समय है जब सभी वास्तविक हितधारक, जिनके मन में कश्मीर की भलाई है; जो उन लोगों को अलग-थलग करने में हाथ मिलाते हैं, जिनकी मंशा शत्रुतापूर्ण है।
यह परिपक्व होने और कड़ी मेहनत और महान् बलिदान के परिणामस्वरूप अर्जित लाभ को मज़बूत करने की दिशा में काम करने का समय है। जम्मू-कश्मीर को रचनात्मक योगदान की ज़रूरत है न कि अवसरवाद की। एक दर्दनाक अतीत को इस तरह से जीने या विलाप करने से कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है, जो एक उज्ज्वल भविष्य पर छाया हो। इसके बजाय यह आगे देखने और उज्ज्वल भविष्य के लिए काम करने का समय है। लक्षित हत्याओं के दौरान भी पर्यटकों की आमद से पता चलता है कि कश्मीर बाधाओं के बावजूद पर्यटकों को लुभा सकता है।

अचानक नहीं हुआ कानपुर में दंगा!

झगड़े से देश तो क्या परिवार भी नहीं चल सकता। मगर झगड़ा कभी न हो सके, इसकी कल्पना तब तक कल्पना ही रहेगी, जब तक क़ानून व्यवस्था गड़बड़ रहेगी। अध्यापक नरेश गंगवार कहते हैं कि उग्र लोग हर धर्म ओर हर समाज में हैं, मगर राजनीति उन्हें और अधिक उग्र बना देती है। दंगे भी ऐसे ही लोगों को इस्तेमाल करके करवाये जाते हैं, ये कभी अपने आप नहीं होते। इसमें राजनेता सदैव अपना लाभ देखते हैं, मगर सामान्य वर्ग बुरी तरह से पिस जाता है। हो न हो कानपुर दंगों के पीछे भी यही सब साज़िश निकलेगी, मगर उसके लिए सही रूप से जाँच होनी चाहिए। विदित हो कि कानपुर में हुए दंगों के पीछे भी पुलिस प्रशासन इसी साज़िश के सूत्र जुटाकर दंगे वाली घटना के प्रमाण जुटा तथा खंगाल रही है।

सूत्रों का कहना है कि कानपुर दंगों की योजना दंगा होने से नौ दिन पहले ही बन गयी थी। यहाँ प्रश्न किया जा सकता है कि अगर पुलिस प्रशासन को यह बात पहले से पता थी, तो वह सोता क्यों रहा? और अगर उसे इतनी बड़ी साज़िश की हवा ही नहीं लगी, तो क्यों नहीं लगी? कानपुर के बेकनगंज क्षेत्र की जिस नयी सड़क पर दंगे हुए वहाँ एक समुदाय के लोगों के पास पहले से ही पत्थर, हथियार कहाँ से आये? अब तक प्रकाशित समाचारों से पता चला है कि दंगा करने वालों में दर्ज़नों नाम पुलिस प्रशासन की हिट लिस्ट में हैं, जिनमें से 40 के नाम तथा फोटो दो-तीन दिन में ही पुलिस ने सार्वजनिक भी कर दिये। कानपुर निवासी आकाश कहते हैं कि दोपहर तक किसी को नहीं पता था कि कुछ अनर्थ होने वाला है। दोपहर बाद अचानक पूरे शहर में हालात बिगडऩे लगे और देखते-ही-देखते दुकानों तथा घरों के दरवाज़े बन्द होने लगे, पुलिस गश्त करने लगी। दंगों का पता बाद में फोन के माध्यम से लोगों को लगा। एक भाजपा कार्यकर्ता ने क्रोध भरे लहज़े में कहा कि उस दिन मुसलमानों की दुकानें बन्द थीं। वे लोग पहले से ही तैयारी करके बैठे थे कि कांड करना है। अगर यह बात सही है, तो इसका मतलब है कि दंगा अचानक नहीं हुआ।
विदित हो कि कानपुर दंगों का सबसे पहला निशाना चंद्रेश्वर हाता में रहने वाले लगभग 100 हिन्दू परिवार बने। समाचार पत्रों के माध्यम से ऐसी कथित सूचनाएँ भी आयी हैं कि हाता में कई दशकों से दंगों की साज़िशें रची जाती रही हैं। अंतत: 3 जून को जुमे की नमाज़ के बाद मुस्लिम समुदाय की भीड़ ने हिन्दू बहुल इलाक़ों में दुकानों को जबरदस्ती बन्द करवाने की कोशिश की, पथराव किया, हवाई फायरिंग की, जिससे दंगा भड़क उठा।

यह दंगा तब हुआ, जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कानपुर के दौरे पर थे। पुलिस प्रशासन ने तुरन्त ही दंगों पर क़ाबू पाने हुए वीडियो फुटेज खंगाले तथा दंगाइयों को हिरासत में लिया। बताते हैं कि सैकड़ों लोग पुलिस प्रशासन की निशानदेही पर हैं। कुछ को पुलिस हिरासत में अदालत ने भेजा है, तो कुछ के ऊपर मुक़दमे दर्ज कर लिये गये हैं। कमिश्नर विजय सिंह मीणा तथा दूसरे अधिकारी इस मामले में बहुत गम्भीर हैं। हों भी क्यों नहीं, आख़िर मामला मात्र दंगों का ही नहीं है, बल्कि देश के सर्वोच्च नागरिकों राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री की सुरक्षा का पहले है।

पुलिस प्रशासन के सूत्रों का कहना है कि सभी दोषियों पर एफआईआर दर्ज कर ली गयी है तथा उनके ख़िलाफ़ गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की जा रही है। दंगाइयों की सम्पत्ति भी ज़ब्त की जाएगी तथा उनके मकानों पर बुलडोज़र भी चलेगा। दंगों के बाद उत्तर प्रदेश के एडीजी लॉ एंड आर्डर प्रशांत कुमार का एक बयान आया था, जो यह स्पष्ट करता है कि बेकनगंज के हाता में नमाज़ के बाद मुसलमानों ने स्थानीय दुकानों को बन्द कराने का प्रयास किया, जिसके बाद टकराव व पत्थरबाज़ी हुई। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस फोर्स घटनास्थल पर पहुँची और पथराव करने वाली भीड़ को क़ाबू करने का प्रयास किया। जब भीड़ बेक़ाबू दिखी, तब पुलिस को मजबूर होकर लाठीचार्ज करने के साथ-साथ आँसू गैस के गोले छोडऩे पड़े।

इधर, कानपुर में हुए दंगों की साज़िश करने में एम.एम. जौहर फैंस एसोसिएशन के अध्यक्ष हयात जफ़र हाशमी, ऑल इंडिया जमीअतुल क़ुरैशी एक्शन कमेटी तथा उसके ज़िला अध्यक्ष व सपा से महानगर सचिव निजाम क़ुरैशी के नाम सामने आये हैं। हालाँकि दंगों में नाम आने के बाद अब सपा ने क़ुरैशी को बर्ख़ास्त करने की बात कही है। हालाँकि दंगों में सामान्य वर्ग के लोग कभी शामिल नहीं होते, क्योंकि उनके आगे घर की समस्याओं का कोई पार नहीं होता। कानपुर दंगों में भी यही हुआ, वहाँ के कई मुस्लिम परिवार और अधिकतर हिन्दू परिवार दंगों में शामिल नहीं थे। कानपुर दंगों के कुछ ही दिन बाद उत्तर प्रदेश में कई जगह दंगे हुए, जिन पर क़ाबू पा तो लिया गया, लेकिन बुलडोज़र कार्रवाई और धार्मिक विवाद से लोगों में आक्रोश तो है। दिल्ली में भी मुस्लिम समाज के लोगों ने भी नूपुर शर्मा के बयान को लेकर प्रदर्शन किये। रिपोर्ट लिखे जाने तक पुलिस ने कानपुर से लेकर प्रयागराज तक के 300 से भी ज़्यादा दंगा आरोपियों को हिरासत में लिया। कई लोगों के घरों पर बुलडोज़र भी चला।

पुलिस के जवान भी हुए घायल
पुलिस प्रशासन का कहना है कि कानपुर हिंसा में 13 पुलिस के जवान घायल हुए। वहीं दंगा करने वाले दोनों पक्षों के 30 लोग घायल हुए। इसके अतिरिक्त सम्पत्ति का भी भारी नुक़सान हुआ है। दुकानों, गाडिय़ों में तोडफ़ोड़ के अतिरिक्त दुकानों में लूटपाट की बात सामने आयी है। पुलिस प्रशासन ने दंगाइयों पर लूटपाट, मारपीट, दंगा करने समेत कई धाराओं में एफआईआर दर्ज की है। दंगाइयों की पहचान सीसीटीवी और वीडियो फुटेज की मदद से की गयी है। घटना की गम्भीरता को समझते हुए कानपुर में भारी पुलिस बल तथा दंगे वाले स्थान पर अतिरिक्त पुलिस बल भी तैनात किया गया है। मगर पुलिस ने पहले जिन 40 लोगों की दंगाई बताकर तस्वीरें जारी कीं, उनमें से कई चेहरे दो व तीन बार भी लगा दिये। इससे ऐसा लगा कि पुलिस प्रशासन ने दंगा मामले में ठीक से छानबीन नहीं की। हालाँकि बाद में पुलिस ने अपना दोष माना तथा इसे सुधारने की बात कही। पुलिस की दूसरी लापरवाही यह है कि दंगा करने वालों में सभी आरोपी एक ही समाज से दिखाने का प्रयास उसने किया, जबकि दंगों में यह बात सामने आयी है कि दूसरे पक्ष के कुछ लोग भी दंगों में थे, पुलिस ने भी अपने बयानों में यही कहा है कि दंगों में दोनों तरफ़ से हमले हुए। कुछ सूत्रों ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच जमकर पथराव, फायरिंग के अतिरिक्त पेट्रोल बम चले थे।

कफ्र्यू की अफ़वाह
कानपुर में हिंसा के बाद बरेली में हालात बिगडऩे होने की झूठी सूचना फैलाने के आरोप में बरेली के दो स्थानीय यूट्यूब चैनलों पर कोतवाली पुलिस ने धार्मिक उन्माद फैलाने और साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाडऩे की कोशिश के साथ ही आईटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की है। पुलिस का कहना है कि चैनल आरए नॉलेज वल्र्ड और बरेली प्रोडक्शन नाम के दो यूट्यूब चैनलों ने बरेली में कफ्र्यू लगने के समाचार दिखाकर लोगों को भ्रमित करके साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाडऩे का काम किया था। ज़िला प्रशासन ने दोनों चैनलों को तत्काल प्रभाव से बन्द करा दिया। इन चैनलों ने वीडियो डालकर समाचार चलाये कि बरेली में भड़का दंगा, लगा कफ्र्यू, 3 जुलाई तक लगी धारा-144; जबकि यह सब झूठ था।

सतर्क रहना आवश्यक
उत्तर प्रदेश में कई जगह दंगों का बहुत पुराना इतिहास रहा है। मुज़$फ्फ़रनगर, मेरठ, बरेली, रामपुर, गोरखपुर, कानपुर, इटावा तथा कई अन्य ऐसे क्षेत्र रहे हैं, जो दंगों की आग में झुलस चुके हैं। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को उत्तर प्रदेश के साम्प्रदायिक गणित को समझना होगा, ताकि वहाँ सौहार्द तथा भाईचारे का माहौल बनाकर रखा जा सके। प्रदेश में कहीं भी अपराध, अराजकता न पनप सके, इसके लिए पुलिस प्रशासन तथा राजकीय प्रशासन को सतर्कता बरतने की ज़रूरत है। राम राज्य का सपना दिखाने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को वास्तव में प्रदेश में राम राज्य की स्थापना करनी होगी। बुलडोज़र का डर दिखाकर लोगों में भय फैलाने की अपेक्षा लोगों में विश्वास जगाना होगा कि प्रदेश में वे पूरी तरह सुरक्षित हैं। न्याय व्यवस्था को भी इसके लिए आगे आकर अपनी भूमिका निभानी होगी।

तालिबान सरकार से सुर साधने की क़वायद

भारतीय अधिकारियों की काबुल में बैठक के हैं कई मायने

सीमा पर बदलते हालात, ख़ासकर चीन के लगातार लद्दाख़ और अरुणाचल प्रदेश के भारतीय सीमा के पास के क्षेत्रों में निर्माण के बीच भारत के अधिकारियों ने पहली बार अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता पर क़ाबिज़ तालिबान नेतृत्व से बातचीत की है। पाकिस्तान में सत्ता में बदलाव और जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों में बढ़ोतरी के बाद एशिया क्षेत्र में भारत की यह पहली बड़ी कूटनीतिक गतिविधि है। भारत के लिए तालिबान से बेहतर सम्बन्ध रखने के कई कारण हैं, जिनमें सबसे बड़ा है- आतंकियों को भारत के ख़िलाफ़ ट्रेनिंग के लिए अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन इस्तेमाल न होने देना। भारत की अफ़ग़ान अधिकारियों से बातचीत तालिबान के साथ रिश्तों में अहम मोड़ है। भारत भविष्य में अफ़ग़ानिस्तान को अपनी परियोजनाओं को मदद के अलावा मानवीय मदद तो जारी रखेगा ही, अफ़ग़ान सेना के भारत में प्रशिक्षण और किसी हद तक ट्रेड का रास्ता भी खुल सकता है। सम्भावना है कि काबुल में हालात के मुताबिक भारत अपना दूतावास फिर खोलने की पहल भी करे।

नहीं भूलना चाहिए कि जब अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान सत्ता में आया, तभी से चीन और पाकिस्तान की कोशिश भारत की उसके (अफ़ग़ानिस्तान के) साथ इंगेजमेंट (व्यापार) को कम करने की रही है। भारत उचित समय का इंतज़ार करता रहा है और अब डोवल की पहल पर भारतीय अधिकारियों की काबुल में अफ़ग़ान नेतृत्व से बातचीत हुई है। देखा जाए, तो इन कुछ महीनों में तालिबान ने भारत के साथ टकराव वाली कोई बात नहीं की है। बैठक के बाद अजित डोवल ने कहा भी कि ‘भारत अफ़ग़ानिस्तान में एक महत्त्वपूर्ण हितधारक था और रहेगा। लम्बे अरसे से भारत के अफ़ग़ानिस्तान की जनता के साथ ख़ास सम्बन्ध रहे हैं और आने वाले समय में भी इसे कुछ भी नहीं बदल सकता है।’ लेकिन डोवल ने एक बात और कही, जो कहीं ज़्यादा अहम है। डोवल ने कहा- ‘कोई भी अफ़ग़ानिस्तान के मामलों से भारत को दूर रखने का ख़्वाब न देखे। भारत अपने पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान के मसलों पर एक महत्त्वपूर्ण पक्षकार है, था, और आगे भी रहेगा; चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों और कितनी भी बदल जाएँ।’ ताजिकिस्तान की राजधानी दुशान्बे, जहाँ अफ़ग़ानिस्तान के वर्तमान की पड़ताल और भविष्य की रणनीति पर चर्चा हुई; में भी डोवल भारत के अफ़ग़ानिस्तान को लेकर स्टैंड पर दृढ़ दिखे। क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद के तहत हुए इस मंथन में भारत के अलावा ताजिकिस्तान, रूस, क़ज़ाक़िस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान, किर्गिज़िस्तान और चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एक साथ जुटे थे। एक समय ख़ुद को अफ़ग़ानिस्तान की नीतियों में बड़ा ‘हिस्सेदार’ मानने वाला पाकिस्तान इस बैठक में आया ही नहीं।

दुशान्बे में नई दिल्ली घोषणा-पत्र को ही आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई और भारत ने मज़बूती से अपना पक्ष रखा। पाकिस्तान तो तभी दबाव में आ गया था, जब भारत ने पिछले साल नवंबर में अफ़ग़ानिस्तान पर तीसरे क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद का आयोजन किया था। दुशाम्बे के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद के तहत सभी देशों के एनएसए ने आतंकवाद पर जैसा रुख़ अपनाया, वह भारत की लाइन पर ही था। इन एनएसए ने अफ़ग़ानिस्तान से आतंकवाद ख़त्म करने की बात कही। उनका साफ़ कहना था कि अफ़ग़ानिस्तान में शान्ति और स्थिरता सुनिश्चित करना बैठक की प्राथमिक ज़िम्मेदारी है।
अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान के क़ब्ज़े के बाद उस देश में भारतीय पक्ष की यह पहली आधिकारिक बैठक थी। इस बैठक को लेकर पाकिस्तान की प्रतिक्रिया आते देर नहीं लगी। पाकिस्तान विदेश कार्यालय के प्रवक्ता आसिम इफ़्तिख़ार ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान में भारत की भूमिका के सन्दर्भ में पाकिस्तान के विचार जगज़ाहिर हैं। ज़ाहिर है पाकिस्तान ने इस बैठक से बेचैनी महसूस की। उसके लिए यह ख़बर भी चोट की तरह थी, जिसमें काबुल में भारतीय दूतावास दोबारा से खोले जाने की सम्भावना जतायी गयी थी। भारतीय विदेश मंत्रालय की वरिष्ठ अधिकारियों की इस टीम की तालिबानी नेतृत्व से पहली बातचीत को लेकर तालिबान के रक्षा मंत्री ने भी सकारात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘भारत ने हमेशा हमारी दिल खोलकर मदद की है और हमें भारत से बड़ी उम्मीदें हैं।’

दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि लम्बे समय से अफ़ग़ान सैनिक भारत में प्रशिक्षण लेते रहे हैं। इस मसले पर अफ़ग़ानिस्तान के रक्षा मंत्री मुल्ला याक़ूब ने हाल में कहा कि यदि तालिबान सरकार को अपने सैनिक प्रशिक्षण के लिए भारत भेजने में कोई समस्या नहीं होगी। उनका कहना है कि अफ़ग़ान-भारत सम्बन्ध मज़बूत हों और इसके लिए ज़मीन तैयार हो, इसमें कोई समस्या नहीं है।

अफ़ग़ानिस्तान के सैनिक दूसरे देशों में प्रशिक्षण लेते रहे हैं। तालिबान सरकार उन्हें देश में वापस लौटने का आग्रह कर चुकी है। मुल्ला के मुताबिक, कई सैनिक वापस लौटे भी हैं। उनका कहना है कि भारत में रह रहे सैनिकों को लेकर अफ़ग़ान सरकार को जानकारी है और उनसे लौटने का अनुरोध किया गया है। भारतीय अधिकारियों की काबुल की बैठक में तालिबान के वरिष्ठ सदस्यों से मुलाक़ात में कई मसलों पर बातचीत हुई। अफ़ग़ान अधिकारी चाहते थे कि भारत काबुल में अपना दूतावास फिर खोल दे। इस मसले पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा था कि पिछले साल 15 अगस्त के बाद अफ़ग़ानिस्तान में सुरक्षा की स्थिति बिगडऩे के चलते भारतीय अधिकारियों को वापस लाने का $फैसला हुआ था। हालाँकि वहाँ स्थानीय कर्मचारियों ने दूतावास परिसर का रखरखाव करना जारी रखा है।
भारतीय टीम उन कुछ साइट्स पर भी गयी, जहाँ भारत की सहायता वाली परियोजनाएँ चल रही हैं। यह दौरा इसलिए भी अहम रहा कि भारतीय राजनयिक टीम अगस्त, 2021 में तालिबान राज आने के बाद पहले बार काबुल गयी। वैसे भारत की इससे पहले क़तर और उसके बाद रूस में तालिबान प्रतिनिधियों से मुलाक़ात हुई हैं। ‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, भारत आने वाले समय में अफ़ग़ानिस्तान में कम कर्मचारियों के साथ भारतीय दूतावास में कामकाज शुरू कर सकता है। जानकारी के मुताबिक, एक सिक्योरिटी ऑडिट हाल में इस सिलसिले में किया गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल इस सारी कसरत के मुख्य कर्ताधर्ता हैं।

भारत का मुख्य मक़सद विभिन्न आतंकवादी गुटों को प्रशिक्षण के लिए अफ़ग़ान धरती का इस्तेमाल न होने देना है। इसमें भारत अभी तक सफल रहा है। अफ़ग़ान सरकार में शामिल कई गुट हैं, जिनमें कुछ ऐसे हैं, जो अलक़ायदा जैसे आतंकी संगठनों के हिमायती हैं। ऐसे में भारत के लिए यह क़वायद आसान नहीं रही है। लेकिन $िफलहाल ऐसी रिपोर्ट नहीं हैं कि यह खूँख़ार गुट अफ़ग़ानिस्तान में किसी तरह की ट्रेनिंग ले रहे हैं। पाकिस्तान की बदनाम एजेंसी आईएसआई पहले ऐसी ट्रेनिंग का हिस्सा रही है।


“तालिबान भारत के साथ सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बनाना चाहता है। हम इस बात पर प्रतिबद्ध हैं कि वो अपनी ज़मीन का इस्तेमाल किसी भी देश के ख़िलाफ़ नहीं होने देगा। हम भारत की भेजी मदद की सराहना करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि भारत अफ़ग़ानिस्तान के लोगों को अपनी सहायता जारी रखेगा।’’
मुल्ला याक़ूब
रक्षा मंत्री, तालिबान

भारत की मदद
जहाँ तक मदद की बात है, भारत अफ़ग़ानिस्तान को गेहूँ और दवाइयों के अलावा अन्य तरह की मानवीय सहायता भी पहुँचा रहा है। अफ़ग़ानिस्तान में भले अभी भारतीय दूतावास बन्द है, भारत अभी तक 22,000 मीट्रिक टन गेहूँ और 15 टन दवाएँ अफ़ग़ानिस्तान को भेज चुका है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, मानवीय सहायता के शिपमेंट में भारत पहले ही अफ़ग़ानिस्तान को 20,000 मीट्रिक टन गेहूँ, 13 टन दवाएँ, कोरोना टीके की 5,00,000 ख़ुराक और गर्म कपड़े भेज चुका है। इन खेपों को भारत ने काबुल में गाँधी चिल्ड्रन अस्पताल, डब्ल्यूएचओ और डब्ल्यूएफपी सहित संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसियों को सौंपा। हाल की बैठक के बाद भारत अफ़ग़ानिस्तान को अधिक चिकित्सा सहायता और खाद्यान्न भेजने की प्रक्रिया शुरू कर चुका है। अफ़ग़ानिस्तान अस्थिरता के अलावा भुखमरी और बीमारी का संकट भी झेल रहा है।

अग्निपथ योजना के खिलाफ बिहार में प्रदर्शन जारी, ट्रेन में आग लगाई, भाजपा एमएलए पर हमला

केंद्र सरकार की मंगलवार को घोषित अग्निपथ योजना का विरोध बढ़ता जा रहा है। जहाँ कुछ पूर्व जनरलों ने सेना में अस्थाई भर्ती नीति को गलत बताया है वहीं प्रमुख दल कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने भी इस नीति का विरोध किया है। उधर बिहार में दो दिन से इस योजना के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे युवाओं ने गुरुवार को छपरा कैमूर में ट्रेन को आग लगा दी जबकि नवादा में भाजपा की महिला विधायक की गाड़ी पर हमले की खबर है।

कई शहरों में युवाओं ने सड़कों पर उतरकर इस योजना का विरोध करते हुए प्रदर्शन किये हैं। बिहार के अलावा यूपी, हरियाणा और हिमाचल में भी विरोध प्रदर्शन होने की ख़बरें हैं। बिहार में पटना, बक्सर और मुजफ्फरपुर में सेना में भर्ती की तैयारी कर रहे छात्रों ने प्रदर्शन किया और नारेबाजी की।

अग्निपथ योजना का विरोध कर रहे युवाओं ने छपरा कैमूर में ट्रेन में आग लगा दी। आरा बुलंदशहर में पुलिस और प्रदर्शनकारी एक दूसरे के आमने-सामने आ डटे जिससे स्थिति तनावपूर्ण हो गयी।

उधर हरियाणा के रोहतक जिले से खबर है कि वहां दो साल से सेना की भर्ती की तैयारी कर रहे एक युवक ने कथित तौर पर अग्निपथ योजना के खिलाफ आत्महत्या कर ली। उसने रोहतक के पीजी हॉस्टल के कमरे में फंदा लगा कर आत्महत्या कर ली। यह युवक सचिन जींद जिले के लिजवाना का रहने वाला था।

पीजीआई रोहतक थाना ने शव पोस्टमार्टम के लिए भेजा है। परिजनों रिपोर्ट्स के मुताबिक सचिन के परिजनों ने बताया कि सेना में भर्ती की चार साल की योजना से वह निराश हो गया और संभवता इसी के चलते उसने आत्महत्या कर ली।

उधर बिहार के नवादा में अग्निपथ योजना का विरोध कर रहे युवकों ने भाजपा विधायक अरुणा देवी की गाड़ी पर हमला कर दिया और उसमें तोड़फोड़ की।

इस बीच हरियाणा के हिसार में अग्निपथ योजना के खिलाफ कंवारी बस अड्डे पर युवाओं ने प्रदर्शन किया। कुछ देर रास्ता भी जाम किया गया। उन्होंने अधिकारियों को एक ज्ञापन भी सौंपा।

विरोधियों की फाइल

विपक्षियों और विरोधियों पर कार्रवाई के लिए तैयार हो चुकी हैं फाइल्स

जब सत्ता हाथ में हो और उसका नशा इस क़दर सवार हो कि सत्ता पक्ष किसी को कुछ न समझे, तो तानाशाही, अकड़ और मनमानी स्वाभाविक रूप से हावी हो जाती हैं। विरोधी सुरों को दबाने की केंद्र सरकार की कोशिश से यही ज़ाहिर होता है। सत्ता में आने के बाद पिछले आठ साल से केंद्र सरकार ने हर तरह के विरोधियों पर, चाहे वो लेखक हों, समाजसेवी हों, पत्रकार हों, नौकरशाह हों, किसान हों या फिर नेता हों, सभी पर खुले रूप से राष्ट्रद्रोह के तहत या दूसरे तरीक़ों से दोषी ठहराकर या फिर गुप्त तरी$के से कार्रवाई की है। लोकतंत्र में कहा गया है कि किसी सरकार को राष्ट्रहित और जनहित वाली सरकार बनाने में मज़बूत विपक्ष की बहुत बड़ी भूमिका होती है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई भी इस बात को मानते थे। लेकिन मौज़ूदा केंद्र सरकार ने विपक्ष और विरोध की आवाज़ को दबाने के लिए न सिर्फ़ संसद सत्रों से प्रश्नकाल को ख़त्म करने की कोशिश की है, बल्कि उन्हें दबाने के लिए हर तरह से क़ानून को अपने हाथ की कठपुतली बनाने की पूरी कोशिश की है।

दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी किसी भी तरह देश की केंद्र की सत्ता पर हावी रहना चाहती है। इसके लिए इस जोड़ी ने विरोधियों को दबाने के लिए उनके कारनामों की फाइल्स का सहारा लेना शुरू कर दिया है। भाजपा के गोपनीय सूत्र बताते हैं कि तक़रीबन 150 विरोधी नेताओं की फाइलें केंद्र की मुट्ठी में हैं। इनमें विपक्ष के ही नहीं, विरोधी सुर वाले सत्ता पक्ष के लोग भी हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और उनके बेटे राहुल गाँधी की नेशनल हेराल्ड वाली फाइल तो खुल भी चुकी है। लेकिन जो जानकारी बाहर निकलकर सामने आ रही है, उसके मुताबिक, क़रीब 122 सांसदों और विधायकों की फाइल्स तैयार की जा चुकी हैं, जिन्हें केंद्र सरकार चुनाव के दौरान हथियार के तौर पर इस्तेमाल करेगी।

दिल्ली नगर निगम के चुनाव टालकर दिल्ली में स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन पर भी कथित तौर पर इसी के तहत कार्रवाई हुई है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो यहाँ तक दावा कर चुके हैं कि केंद्र सरकार मनीष सिसोदिया पर भी अवैध और $गैर-क़ानूनी तरी$के से कार्रवाई की तैयारी कर रही है। हिमाचल में आम आदमी पार्टी के लोगों को तोड़ा और जो नहीं टूटे, उन्हें गिर$फ्तार करना इसी साज़िश का हिस्सा है।

नेशनल हेराल्ड मामले में तो ईडी ने सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को समन भी जारी कर दिये हैं। हालाँकि सोनिया गाँधी बीमार हो गयी हैं। हालाँकि ईडी ने उनकी पेशी में राहत देते हुए तारीख़ बढ़ा दी है। वहीं राहुल गाँधी को 13 जून से बार-बार ईडी ने बुलाया। हर बार उनसे लम्बी पूछताछ हुई। इससे पहले वह सत्याग्रह करने की कोशिश में थे; लेकिन सरकार ने पुलिस घेरेबंदी से उन्हें और उनके समर्थकों को रोक लिया। इस बीच कांग्रेस नेताओं ने इकट्ठा होकर प्रदर्शन करने की कोशिश भी की।

दरअसल नेशनल हेराल्ड एक न्यूज पेपर रहा है, जिसे साल 1938 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने महात्मा गाँधी की सहमति से शुरू किया था। इस न्यूज पेपर को शुरू करने का उद्देश्य वही था, जो आज की केंद्र सरकार का है कि मीडिया से जनता तक अपनी बात अपने हिसाब से पहुँचाने के लिए अपना ही कोई न्यूज पेपर होना चाहिए। फ़र्क़ यह है कि उस समय नेशनल हेराल्ड को कांग्रेस ने ख़ुद खोला था; लेकिन आज की केंद्र सरकार भाजपा या अपने किसी नेता के नाम से मीडिया हाउसेस नहीं चला रही, बल्कि पूँजीपतियों या दूसरे लोगों के उन न्यूज चैनल्स और न्यूज पेपर्स को बढ़ावा दे रही है, जो उसके मन की बात करते हैं।

ख़ैर, नेशनल हेराल्ड न्यूज पेपर को चलाने के लिए एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड नाम की एक कम्पनी खोली गयी। नेशनल हेराल्ड में क़रीब 5,000 स्वतंत्रता सेनानी स्टेक होल्डर थे और उस समय इस न्यूज पेपर को अंग्रेजी में शुरू किया गया। इसके बाद नवजीवन न्यूज पेपर हिन्दी में और क़ौमी आवाज़ न्यूज पेपर उर्दू में निकलने शुरू हुए। शुरुआत से इस कम्पनी में कांग्रेस और गाँधी परिवार के लोग ही रहे। लेकिन यह कम्पनी 2008 में घाटे की वजह से सभी न्यूज पेपर्स को बन्द कर दिया गया। क्योंकि उस समय इस कम्पनी पर क़रीब 90 करोड़ रुपये का क़र्ज़ हो गया। इसके अलावा इसके स्टेक होल्डर भी घटकर बहुत कम रह गये थे। यह क़र्ज़ कैसे हुआ, यह जाँच का विषय है, जिस पर कांग्रेस ने कभी ग़ौर नहीं किया। अब सवाल यह उठा कि इस क़र्ज़ को निपटाया कैसे जाए? इसके लिए कांग्रेस ने एसोसिएट्स जर्नल्स लिमिटेड को पार्टी फंड से बिना ब्याज के 90 करोड़ रुपये का क़र्ज़ दिया, जिसके चलते यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड को एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड में 99 फ़ीसदी की हिस्सेदारी मिल गयी। यंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना कांग्रेस की मनमोहन सिंह सत्ता के दौरान 23 नवंबर 2010 को की गयी, जिसमें सबसे पहले दो लोग- सुमन दुबे और सैम पित्रोदा, जिनका पूरा नाम सत्यनारायण गंगाराम पित्रोदा है; शामिल हुए। 13 दिसंबर, 2010 को इसमें राहुल गाँधी को शामिल किया गया और 22 जनवरी, 2011 को इस कम्पनी में सोनिया गाँधी, मोती लाल बोहरा और ऑस्कर फर्नांडीज के नाम और शामिल किये गये। इस कम्पनी में सोनिया और राहुल गाँधी की 38-38 (कुल 76) फ़ीसदी की हिस्सेदारी है, जबकि बाक़ी की 24 फ़ीसदी हिस्सेदारी पहले मोतीलाल बोहरा और ऑस्कर फर्नांडिस के पास थी, अब उसमें मोती लाल बोहरा की जगह शायद दूसरे नाम हैं। क्योंकि साल 1997 में मोती लाल बोहरा की मृत्यु हो गयी थी, जिसके बाद उनकी जगह 2021 में पवन कुमार बंसल का नाम जोड़ा गया था। नेशनल हेराल्ड मामले में पवन कुमार बंसल को भी पूछताछ की जा चुकी है।

ख़ैर, अब इस मामले में केंद्र सरकार प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के माध्यम से सोनिया गाँधी पर कार्रवाई करना चाहती है। कांग्रेस का कहना है कि नेशनल हेराल्ड मामले में ईडी की जाँच का कोई मतलब नहीं बनता। क्योंकि ईडी केवल मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों को देख सकती है, जबकि यह मामला मनी लॉन्ड्रिंग का नहीं है। बता दें कि नेशनल हेराल्ड का मामला इनकम टैक्स के पास भी है।

दरअसल इस मामले की शिकायत तो 2012 में कांग्रेस की सरकार में ही भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने की थी; लेकिन उस दौरान इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। सुब्रमण्यम स्वामी ने इस मामले में सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और कम्पनी के अन्य स्टेक होल्डर्स पर धोखाधड़ी की साज़िश रचने और यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड के ज़रिये पैसे के ग़बन का आरोप लगाया था। लेकिन 2014 में सत्ता भाजपा (एनडीए) के हाथ लगते ही अदालत ने सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ समन जारी कर दिये। इसके बाद इसी साल अगस्त में ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के तहत मामला दर्ज किया। साल 2015 में सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने 50-50 हज़ार रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही जमानत राशि देकर दिल्ली के पटियाला कोर्ट से जमानत ली थी। मामले में कार्रवाई चलती रही। बता दें कि इस मामले में कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी, उनके बेटे और कांग्रेस नेता राहुल गाँधी, पार्टी के दिवंगत नेता मोतीलाल बोहरा, ऑस्कर फर्नांडीस, सुमन दुबे, सैम पित्रोदा और यंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड आरोपी हैं। साल 2016 में ये लोग सर्वोच्च न्यायालय की शरण में गये। सर्वोच्च न्यायालय ने सभी आरोपियों को सर्वोच्च न्यायालय ने व्यक्तिगत पेशी से छूट दे दी; लेकिन कार्रवाई रद्द करने से इन्कार कर दिया। पिछले साल आरोपियों के नाम फिर नोटिस जारी हुआ और फरवरी, 2021 में सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी को नोटिस जारी किये थे। अब ईडी और इनकम टैक्स ने इस मामले में कार्रवाई शुरू कर दी है।

दरअसल नेशनल हेराल्ड मामले में गाँधी परिवार पर कई गम्भीर आरोप हैं, जिसमें एक इक्विटी लेन-देन से सम्बन्धित है, जिसमें सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी पर एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड को महज़ 50 लाख का भुगतान करके कम्पनी की 2,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा की सम्पत्ति अपने हक़ में करने का आरोप है।

अब जब इसी साल का शीत सत्र नये संसद भवन में शुरू होने जा रहा है, तो सवाल यह है कि क्या इस नये संसद भवन में जाने से पहले कांग्रेस की कमर तोडऩे की केंद्र सरकार की तैयारी है, ताकि उसके नेता इस नये संसद भवन की सीढिय़ाँ न चढ़ सकें, यानी कांग्रेस ही ख़त्म होने की कगार पर आ जाए।

नया संसद भवन, जिसे ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेहद ज़रूरी कामों की लिस्ट में डालकर बनवाया है, क्या विपक्षी दलों के बैठने के लिए नहीं बना है? क्या वहाँ से भविष्य में केवल एक ही स्वयंभू सत्ता चला करेगी? ऐसे सवाल भी हैं, जो लोगों के ज़ेहन में उठने ही चाहिए। सवाल यह भी है कि अगर विपक्ष रहित सत्ता किसी के हाथ में होगी, तो क्या वह लोकतांत्रिक और निष्पक्ष रह सकेगी?

(लेखक दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक हैं।)

धार्मिक उन्माद फैलाने वाले दोषी

महान् लेखक, कवि, नाटककार एवं दार्शनिक वाल्तेयर लिखते हैं- ‘हमारे सम्मान का पात्र वह है, जो हमारे मस्तिष्क पर सच्चाई के साथ प्रभाव डालता है; वह नहीं जो हिंसा के माध्यम से प्रभुत्त्व स्थापित करता है।’
हालाँकि भारतीय राजनीति व समाज में ऐसे लोग दुर्लभ हो गये हैं, जो कर्म एवं वचन से सम्मान पाने के उत्तराधिकारी हों। सदैव विवादित तथा कोलाहलपूर्ण वातावरण में अपना आधार खोजना भारतीय राजनीति का एक दुर्गुण रहा है। इसीलिए ज्ञानवापी मामले के बीच ही पैगम्बर के तथाकथित अपमान के मुद्दे पर देश की सियासत गरमायी हुई है। नूपुर शर्मा एवं नवीन जिंदल के निष्कासन के साथ ही अंतत: भाजपा ने इस मामले के पटाक्षेप का प्रयास किया; लेकिन ये विवाद थमता नहीं दिख रहा। 70 के दशक से धार्मिक एकता के नाम पर वोटबैंक की जो राजनीति शुरू हुई, वह 90 के दशक तक धार्मिक ध्रुवीकरण में बदल गयी। वर्तमान विवाद उसी प्रक्रिया का अगला चरण है। छद्म पंथनिरपेक्षता के नाम पर तुष्टिकरण की जो राजनीति कांग्रेस सपा और राजद जैसे दलों ने की, उसी के प्रतिपक्ष में जनसंघ और उसकी उत्तराधिकारी पार्टी भाजपा ने भी धार्मिक, व सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा बुलंद किया।

इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भाजपा के इस आश्चर्यजनक उत्कर्ष में विपक्ष का तुष्टिकरण और भाजपा के धार्मिक ध्रुवीकरण का बराबर योगदान है। असल में इस समय हिन्दुत्व का नारा भाजपा के हाथ एक ऐसे ब्रह्मास्त्र की तरह लग गया है, जिसका इस्तेमाल वह अपनी सफलता के साथ-साथ नाकामियों को छिपाने के लिए आसानी से कर रही है। उसी के समानांतर विपक्ष अपनी तुष्टिकरण की नीति को और दृढ़ता के साथ लेकर आगे बढ़ा रहा है। सत्य यही है कि सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, यहाँ कोई भी उचित के साथ नहीं, बल्कि अपनी अनुकूलता के साथ खड़ा है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ है कि पिछले कुछ वर्षों में धर्म एवं पन्थ के मुद्दों ने देश के सभी आवश्यक सामाजिक-राजनीतिक मसलों को नेपथ्य में धकेल दिया है। जबकि अभी हमारे सामने कई ऐसे मूलभूत प्रश्न हैं, जिन पर भारत के भविष्य के राजनीतिक-सामाजिक जीवन को ध्यान में रखते हुए विचार करना आवश्यक है। कई दफ़ा घटनाओं की विकरालता के प्रभाव के कारण उनकी वास्तविकता या उनमें निहित कारणों की अनदेखी कर दी जाती है।

धार्मिक-पंथीय आस्था व मान्यताएँ समाज के लिए आवश्यक होती हैं। लोक संस्कृतियों में उनकी उपयोगिता भी है। किन्तु उन्हें देश व समाज की रक्षा से ऊपर प्राथमिकता देना अनुचित है। डॉ. लोहिया भारतीय राजनीति में जातिवाद को एक बीमा की तरह मानते थे; लेकिन सबसे उत्तम श्रेणी का बीमा तो धर्म हो गया है। देश के राजनीतिक दल धर्म के सुविधाजनक मुद्दे से आगे बढ़ ही नहीं पा रहे हैं। ज्ञानवापी पर चैनल्स की मुर्ग़ा-कुश्ती से उपजे विवाद में अब अरब देशों के कूद पडऩे के बाद यह मामला सुलझने के बजाय और उलझता जा रहा है। इसमें संशय नहीं है कि नूपुर शर्मा का बयान ग़लत था; लेकिन अरब देशों का भारत के आंतरिक मामले में दख़ल देना भी उचित नहीं है। डच सांसद गिर्ट वाइल्डर्स ने नूपुर शर्मा के बयान का समर्थन करके और संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने उसका विरोध करके वैश्विक स्तर पर एक लम्बी बहस को जन्म देने का प्रयास किया।

इस पूरे विवाद के मूल दोषी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया के मंच हैं, जो बहुत आसानी से आग लगाकर बच जाते हैं। इस मामले में मीडिया को भी वादी बनाया जाना चाहिए। पिछले एक दशक से भारतीय न्यूज चैनल्स पर होने वाले वाद-विवाद (डिबेट) दुनिया के सबसे ग़ैर-ज़रूरी कार्यक्रम बन गये हैं। इनसे सिर्फ़ उन्मादी भीड़ पैदा होती है। किसी भी टीवी डिबेट को देखिए, आपको एक भी संतुलित बयान नहीं मिलेगा और न ही कोई सार्थक बात सुनने को मिलेगी। आख़िर तक आप नहीं समझ पाएँगे कि इस बहस का निष्कर्ष क्या निकला? कई दफ़ा डिबेट के मसले ही अनौचित्यपूर्ण होते हैं। विभिन्न न्यूज चैनल्स पर में बुलाये जाने वाले लोगों के व्यक्तित्व, योग्यता, कार्यानुभव से दर्शक बहुत हद तक अनभिज्ञ होते हैं। यहाँ तक कि वे किस संस्था और किस समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं; इसका भी समुचित ज्ञान नहीं होता। ऐसे लोगों को न्यूज चैनल्स द्वारा उकसाया जाता है, जो ग़ैर-ज़िम्मेदाराना तथा उत्तेजक बयान देते रहते हैं। कभी-कभी तो इनकी भाषा इतनी अभद्र होती है कि चैनल बदलना पड़ जाता है। ऐसा सिर्फ़ अपरिचित चेहरों के साथ नहीं है, बल्कि राजनीति के परिचित चेहरे भी इससे अलग नहीं हैं। चैनल्स पर चलने वाली बहसें देश की राजनीति का विद्रूप चेहरा दिखा रही हैं।

कुछ समय पूर्व एक टीवी डिबेट के दौरान अति-उत्तेजना में कांग्रेस के प्रवक्ता राजीव त्यागी की हृदय गति रुक जाने से मृत्यु ही गयी थी। एक अन्य बहस में भाजपा एवं सपा के प्रवक्ता आपस में मारपीट करते नज़र आये। ऐसे और भी अभद्र व्यवहार वाले दृश्यों को यह न्यूज चैनल्स बड़ी ही रुचि के साथ प्रसारित करते हैं। यह समझ पाना कठिन है कि न्यूज चैनल्स का इन कार्यक्रमों के पीछे वास्तविक मंतव्य क्या है? ये आख़िर देश के राजनीतिक विमर्श को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? ऐसा लगता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस देश को हिंसा की आग में झोंककर ही रहेगा।
याद कीजिए, जब राम मन्दिर विवाद मामले में उच्चतम न्यायालय का निर्णय आने वाला था, तब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ऐसा माहौल बना रखा था, मानो सड़कों पर दोनों समुदायों के लोग हिंसा करने को तैयार बैठे हैं और निर्णय आते ही देश में गृह युद्ध छिड़ जाएगा। लेकिन वास्तविकता में सामान्य जनजीवन बिलकुल शान्तिपूर्ण था। हाँ, एक उत्सुकता ज़रूर थी। लेकिन ऐसा कोई अशान्ति का माहौल नहीं था, जैसा मीडिया ने बना रखा रखा था। रूस-युक्रेन युद्ध को ही लें, तो इस दौरान भारतीय मीडिया के उग्र एवं ग़ैर-ज़िम्मेदाराना रवैये की विश्व भर में काफ़ी आलोचना हुई थी। अगर कभी यह देश हिंसा की आग में झुलसा, तो उसकी पूरी ज़िम्मेदारी आज की घटिया राजनीति और भोंपू मीडिया पर ही पड़ेगी। स्पष्ट शब्दों में कहें तो आज जिस तरह से पत्रकारिता का स्तर गिरा है, उसके लिए सबसे ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ज़िम्मेदार है। किसी भी व्यवसाय के अपने आंतरिक द्वंद्व होते हैं; लेकिन एक व्यवसाय के रूप में मीडिया ने नैतिकता के सारे प्रतिमान ध्वस्त कर दिये हैं। व्यावसायिक लाभ के लिए पत्रकारिता जैसे सम्मानित और ज़िम्मेदार पेशे को किस तरह कलंकित एवं अपमानित किया जा सकता है, इसका सबसे पुख़्ता उदाहरण आज के दौर में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रस्तुत कर रहा है।

एक दौर था, जब किसी व्यक्ति द्वारा ख़ुद का परिचय एक पत्रकार के रूप में देने पर लोग उसे सम्मान की नज़र से देखते थे। आज पत्रकार होने का अर्थ अविश्वास व शंका हो गया है, जो हास्यास्पद है। कई बार तो बहुत गम्भीर पत्रकार अपना परिचय इस रूप में देना भी पसन्द नहीं करते। आज पत्रकारिता कई ख़ेमों में बँटी हुई है। कोई सत्ता के साथ है, तो कोई विपक्ष के। किन्तु कोई भी भारत के लोकतंत्र के साथ खड़ा नहीं दिख रहा है। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। यह प्रजातंत्र में जनता की आवाज़ होता है। लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि भारत का मीडिया तो ख़ुद ही सत्ता एवं पूँजीवाद के सामने नतमस्तक है। इसके साथ ही मुस्लिम पक्ष की उग्रतापूर्ण प्रतिक्रिया की भी आलोचना होनी चाहिए। इस मामले में मिली सहानुभूति को उन्होंने अपनी जाहिलियत और स्तरहीन विरोध के कारण गँवा दिया। किसी व्यक्ति का दोष तय करना, उसे दण्ड देना न्यायालय व क़ानून का काम है। मुस्लिम पक्ष द्वारा जिस प्रकार की अभद्र भाषा में नूपुर शर्मा एवं नवीन जिंदल को मारने, घर जलाने, सिर क़लम करने और हाथ काटने जैसी धमकियाँ जिस तरह से सोशल मीडिया पर दी जा रही हैं, वो नितांत ही असभ्य, अशोभनीय एवं ग़ैर-ज़िम्मेदाराना हैं।

इसके अतिरिक्त अपने पंथीय सम्मान को लेकर व्यग्र रहने वाले मुसलमानों का एक समूह टीवी डिबेट ही नहीं, बल्कि ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्स ऐप और इंस्टाग्राम जैसी सोशल मीडिया साइट्स पर भी सनातन समाज के विरुद्ध उकसावेपूर्ण और अनर्गल बयानबाज़ी करता रहता है। शिवलिंग को लेकर की जाने वाली अभद्र टिप्पणियाँ इसका प्रमाण हैं, जिसके उत्तर में सनातन पक्ष द्वारा भी इसी तरह की बयानबाज़ी की गयी। इसमें भी अपुष्ट एवं भ्रामक ख़बरों का प्रयोग होता रहता है, जिससे समाज में उत्तेजना और अराजकता फैलती है। इस पर भी लगाम कसना ज़रूरी है। क़ुरआन की सूरह अल कहफ़ की आयत संख्या-6 के अनुसार, ‘ऐ ईमान वालो! अगर कोई बिन-भरोसे की तबीयत वाला आदमी तुम्हारे पास कोई ख़बर ले आवे, तो उस बात की जाँच कर लिया करो। कहीं ऐसा न हो कि बेख़बरी, नादानी में किसी क़ौम पर जा पड़ो, फिर तुमको अपने किये पर पछताना पड़े।’
यह सीख सभी के लिए उपयोगी है। किसी भी लोकतंत्र के लिए धर्म, संस्कृति, राजनीति, समाज इत्यादि से जुड़े विभिन्न विषयों पर बहस-मुबाहिसे से चलना आवश्यक है। लेकिन भारत में समस्या यह है कि इन दिनों बहस के सारे मुद्दे सिर्फ़-और-सिर्फ़ धर्म पर केंद्रित हो गये हैं। ऐसी सोच विघटनकारी साबित होगी। स्वधर्म के प्रति आग्रह में कोई बुराई नहीं, किन्तु जब यह भावना अन्य धर्म, समाज या उनसे जुड़े लोगों के प्रति दुराग्रह रूप ले लेती है, तब यह विखंडनवाद को धार देते हुए राष्ट्र तथा समाज के लिए अनिष्टकारी सिद्ध होने लगती है। दुर्भाग्य यही है कि हमारा देश अब तेज़ी से धार्मिक टकराव की तरफ़ बढ़ रहा है, जिसमें सभी पक्ष बराबर के दोषी हैं। उचित हो कि हम सब त्वरित प्रयास से नियति से किये गये अपने वादे पर क़ायम रहें और सभी धर्मों में पढ़ाये गये अहिंसा के पाठ को याद रखे।

ईडी की कार्रवाई से कांग्रेस गदगद!

राजनीति में कौन अपना है और कौन पराया, इस पर कम ही महत्त्व दिया जाता है। लेकिन मौक़े की तलाश में सियासतदान सदैव रहते हैं। जैसा कि मौज़ूदा समय में कांग्रेस पार्टी को ईडी के बहाने ही सही, पर केंद्र की मोदी सरकार के ख़िलाफ़ मौक़ा मिल ही गया है। बीते आठ वर्षों से केंद्र की सत्ता से बेदख़ल कांग्रेस पार्टी अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी को एक मौक़े की तलाश थी, जो उसे सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई से मिल गया है। इससे कांग्रेस के नेता, कार्यकर्ता और समर्थक तो एकजुट हुए ही हैं, बल्कि काफ़ी लोगों के मन में भी केंद्र सरकार की दण्डनीति के प्रति आक्रोश दिख रहा है। कांग्रेस इसी तलाश में रही है कि कांग्रेस के क़द्दावर नेता से लेकर कार्यकर्ता जाग जाएँ, पार्टी के पक्ष में जनसमर्थन हासिल हो और केंद्र की मोदी सरकार के विरोध में एक माहौल बन सके।

जो कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता नहीं कर पा रहे थे, वो काम 13 जून को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने बड़ी आसानी से कर दिया है। ‘तहलका’ ने इस विषय में देश के विभिन्न राज्यों के लोगों से बातचीत की। कुछ लोगों ने कहा कि भाजपा द्वारा जो माहौल बनाया जा रहा था कि कांग्रेस के दिन लद गये हैं, उसे झटका लगा है। क्योंकि ईडी ने कांग्रेस नेता राहुल गाँधी को अपने कार्यालय में बुलाकर जो व्यवहार किया है, उससे कांग्रेस के प्रति लोगों की सहानुभूति और बढ़ी है। पहले ही जो लोग कांग्रेस के भ्रष्टाचार से असन्तुष्ट थे, अब मौज़ूदा सरकार में बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी और दण्डनीति से तंग आकर फिर से कांग्रेस को याद करने लगे हैं।

ईडी की कार्रवाई को लेकर जानकारों का कहना है कि कांग्रेस इस घटनाक्रम को एक अवसर के रूप में देख रही है। ईडी की इस कार्रवाई को लेकर कांग्रेस के नेता पूरे देश में एक माहौल बनाने के लिए तत्पर हैं। कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि 13 जून को शुरू हुआ सत्याग्रह अगले कई दिनों तक देश भर में जारी रहेगा।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अमरीश सिंह का कहना है कि जिस तरह आपातकाल के बाद इंदिरा गाँधी के विरोध में तत्कालीन जनता पार्टी सरकार ने कार्रवाई की थी और उसके विरोध में जो सहानुभूति कांग्रेस और इंदिरा गाँधी के प्रति लोगों के मन में उभरी थी, वही सहानुभूति कांग्रेस के प्रति फिर से उभरती दिख रही है। विपक्ष सहित जनता इस बात को मान रही है कि केंद्र सरकार बदले की भावना से लोगों के ख़िलाफ़ ईडी, सीबीआई और तमाम जाँच एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है। उनका कहना है कि सरकार रोज़गार देने में असफल है। बढ़ती महँगाई को क़ाबू करने में असफल है। देश में जो दो समुदायों के बीच तनाव चल रहा है, उसको भी वह क़ाबू नहीं कर पा रही है। ऐसे में केंद्र सरकार अपनी कमियों को छिपाने के लिए और जनता का ध्यान भटकाने के लिए विपक्ष को फँसाने का काम कर रही है, जिससे भाजपा को कुछ हासिल नहीं होगा।
अमरीश सिंह का कहना है कि बदले की भावना से पीडि़त केंद्र की मोदी सरकार ने कांग्रेस पार्टी को बैठे-बिठाये यह मुद्दा थमा दिया है, जिससे कांग्रेसी गदगद हैं और इसे भुनाने में लगे हैं।

कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला का कहना है कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने नेशनल हेराल्ड समाचार पत्र से जुड़े कथित धनशोधन के एक मामले में कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी से 10 घंटे तक पूछताछ की। इसके बाद फिर से 14 जून को उन्हें दोबारा पेशी पर बुला लिया। बिना मतलब ईडी द्वारा इस तरह की कार्रवाई पूरी तरह से ग़लत है। यह क़ानून का दुरुपयोग है। उन्होंने कहा कि पुलिस ने मार्च से पहले ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक को हिरासत में ले लिया था, जबकि कई नेताओं को नज़रबंद कर दिया था। उन्होंने बताया कि हद तो यह है कि पुलिस ने प्रदर्शन से एक दिन पहले से ही लोगों की धरपकड़ शुरू कर दी थी। दिल्ली को छावनी में तब्दील कर दिया गया।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का कहना है कि ईडी ने राहुल गाँधी को सुबह से बैठाकर लम्बी पूछताछ की। इससे भी काम नहीं चला, तो फिर से दबाब बनाने के लिए दोबारा पूछताछ को बुला लिया। राहुल गाँधी ने क्या ग़लत किया है? उन्होंने तो सिर्फ़ अख़बार को क़र्ज़ दिया है। इसमें कुछ ग़लत नहीं है। उन्होंने बताया कि इस कम्पनी (यंग इंडिया) से सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी एक रुपया भी नहीं ले सकते हैं। इसमें कोई लाभ भी नहीं उठा सकते हैं। यह सब प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और तमाम जाँच एजेंसियों को भली भाँति मालूम है।

कांग्रेस के रणनीतिकारों ने ‘तहलका’ को बताया कि कई बार सियासत में दाँव उलटा पड़ जाता है, जैसा कि भाजपा और मोदी सरकार पर अब सब कुछ उलटा पडऩे वाला है। क्योंकि कांग्रेस को जिस तरीक़े से परेशान किया जा रहा है, उससे पूरे देश में अब भाजपा के ख़िलाफ़ एक माहौल बनने लगा है। उनका कहना है कि जिस अंदाज़ में देश भर के कांग्रेसी नेता गाँधी परिवार के साथ हो रहे दुव्र्यवहार को लेकर एकजुट हो गये हैं, वह कांग्रेस के हित में है। अब कांग्रेस बड़ी लड़ाई को अंजाम देने के मूड में है। कांग्रेस सड़कों पर उतरने को तैयार है। उन्होंने बताया कि कांग्रेस अब गाँव-गाँव तक इस सत्याग्रह आन्दोलन को ले जाने की तैयारी में है।

कांग्रेस के नेता अनिल चौधरी का कहना है कि कांग्रेस की नेता सोनिया गाँधी कोरोना से जूझ रही हैं, उनका दिल्ली के निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है। भाजपा वाले जानबूझकर उनके परिवार वालों के ख़िलाफ़ षड्यंत्र रच रहे हैं। इसका ख़ामियाज़ा आने वाले दिनों में भाजपा को देखने को मिलेगा, क्योंकि आगामी चुनावों में जनता उसे सबक़ सिखाएगी।

तहलका विचार
राजनीति देश के विकास के लिए होनी चाहिए, न कि सत्ता हथियाने और देश के दोहन के लिए। देश की जनता भले ही विवश हो; लेकिन किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति विशेष को इसकी इजाज़त नहीं देती। जनता को मतदान की ताक़त इसीलिए दी गयी थी, ताकि वह अपनी इच्छा से अपने और देश हित के लिए लोकतांत्रिक सरकार चुन सके। लेकिन आज़ादी के बाद अब तक जो भी सरकारें बनी, उनमें से 99 फ़ीसदी भ्रष्टाचार की दलदल में धँसती गयीं। बावजूद इसके किसी भी भ्रष्ट नेता पर तब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई, जब तक वह सत्ता में रहा। नेशनल हेराल्ड मामले में अगर गड़बड़ी है, तो कांग्रेस नेताओं पर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन क्या सत्ता पक्ष के नेता दूध के धुले हुए हैं? कई नेता ऐसे हैं, जिन पर भ्रष्टाचार, बलात्कार, धन शोधन, घोटालों के आरोप हैं। लखपति नेता विधायक या सांसद बनते ही करोड़पति हो चुके हैं। उन पर कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए? उन पर कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए, जिनके पास सत्ता में आते ही चंद महीनों में अकूत सम्पत्ति आ गयी? क़ानून न्यायसंगत तभी माना जा सकता है, जब वह सभी के लिए समान रूप से लागू हो। सरकार को देशवासियों के प्रति समदर्शी और उदार होना चाहिए, न कि अपने-पराये के क्रूर और भेदभावपूर्ण रवैये वाला।

ईडी की कार्रवाई से भाजपा कांग्रेस को भ्रष्ट सिद्ध करके अवसर तलाश रही है। इसी की आड़ में वह सत्ता की ताक़त से विपक्ष की जड़ें काटना चाहती है। वहीं कांग्रेस यह सन्देश देकर कि उसके साथ द्वेशपूर्ण भावना से ग़लत तरीक़े से कार्रवाई की जा रही है, जनता सहानुभूति बटोरना चाहती है। इस तरह दोनों ही अवसर की तलाश में हैं।

काटना होगा किडनी रैकेट्स का जाल

देश में किडनी (गुर्दा) ख़रीदने व बेचने का अवैध धंधा इन दिनों फिर से चर्चा में है। हाल ही में पुणे व दिल्ली में पुलिस ने किडनी के इस अवैध धंधे से जुड़े कई लोगों को गिरफ़्तार किया है। दरअसल मई में पुणे पुलिस ने वहाँ के एक क्लीनिक से कुछ संदिग्धों को गिरफ़्तार किया, जिन्होंने किडनी कथित तौर पर अवैध प्रत्यारोपण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। इस धंधे में शामिल कुछ दलालों ने सारिका सुतार नामक एक महिला को 15 लाख में एक किडनी बेचने के लिए तैयार किया। फिर उसे क्लीनिक में जमा कराये गये दस्तावेज़ों में रोगी अमित सांलुके की पत्नी के रूप में दर्शाया गया, अर्थात् फ़र्ज़ी दस्तावेज़ बनाये गये और अस्पताल प्रशासन को भी ऐसे दस्तावेज़ पर कोई शक नहीं हुआ। यह हक़ीक़त तब सामने आयी, जब दलालों ने सारिका सुतार को किडनी प्रत्यारोपण के बाद वादे के मुताबिक 15 लाख रुपये की रक़म न देकर उससे कम रक़म देकर वहाँ से जाने को कहा। सारिका ने ख़ुद अस्पताल प्रशासन के सामने सच्चाई बतायी और उसके बाद पुलिस ने संदिग्धों की गिरफ़्तारी की।

जून में दिल्ली में जिस किडनी रैकेट का भंडाफोड़ हुआ है, वह भी चौंकाने वाला है। दिल्ली पुलिस के मुताबिक, 10वीं पास कुलदीप 777 किडनी प्रत्यारोपण करता था। 46 वर्षीय आरोपी कुलदीप ने पुलिस को बताया कि 10वीं के बाद उसने ओटी टेक्नीशियन का डिप्लोमा हासिल करके कई अस्पतालों में काम किया था। इस दौरान डॉक्टरों को सर्जरी करते देख उसने यह सब सीख लिया। उसने हरियाणा के गोहाना में एक क्लीनिक खोला और वहाँ अवैध तरीक़े से किडनी प्रत्यारोपण का धंधा चला रहा था। इस काम में उसके साथ कई डॉक्टर, दलाल व अन्य लोग भी शामिल थे। पुलिस ने इस मामले में जिन 11 लोगों को गिरफ़्तार किया है, उनमें तीन डॉक्टर भी शामिल हैं। मुख्य आरोपी कुलदीप इस काम में कितना पारंगत है, इसका अंदाज़ा इससे भी लगाया जा सकता है कि वह प्राइवेट अस्पतालों से डॉक्टरों को लुभाने के लिए दिल्ली के लुटियन जोन में स्थित होटलों में कई सेमिनार व कार्यक्रम भी आयोजित करवाता था। पुलिस के अनुसार, इस गैंग के लोग डॉक्टरों को ख़ुद को हेल्थकेयर ग्रुप का सदस्य बताते थे। बहरहाल इस किडनी रैकेट के बारे में भी पुलिस को असम से आये एक ग़रीब व्यक्ति ने बताया जो तीन लाख के बदले अपनी एक किडनी देने यहाँ आया था। वह इस गैंग के फेसबुक पेज के ज़रिये जुड़ा था। उसकी किडनी प्रत्यारोपण की सारी प्रक्रियाएँ लगभग पूरी हो चुकी थीं। लेकिन दिवाकर नामक इस व्यक्ति ने अपनी किडनी देने से पहले पुलिस को यह जानकारी दे दी और पुलिस फिर सक्रिय हो गयी।

विडंबना यह है कि कई बार किडनी ख़रीदने व बेचने के मामले सामने आने के बाद भी यह अवैध धंधा देश में चल रहा है। कभी-कभार किसी रैकेट का पर्दाफ़ाश हो जाता है और इस पर पुलिस, सम्बन्धित सरकारी एजेंसियाँ सक्रिय भूमिका में नज़र आती हैं; लेकिन फिर कुछ दिनों के बाद सब कुछ ओझल हो जाता है। आख़िर ऐसा क्यों? मानव अंगों की तस्करी एक बहुत बड़ी समस्या है। इसे रोकना एक बहुत बड़ी चुनौती तो है; लेकिन नामुमकिन नहीं। दरअसल देश में हर साल लाखों बीमार लोगों को अंग प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है। लेकिन माँग और आपूर्ति में बहुत बड़ा फ़ासला है। इसलिए देश में बड़े पैमाने पर अंगदान के लिए जागरूकता फैलाने व एक जन-आन्दोलन चलाने की ज़रूरत है, ताकि लोग स्वेच्छा से अंगदान का संकल्प ले सकें। अंगदान दिवस का प्राथमिक उद्देश्य देश में अंगदान और प्रत्यारोपण को बढ़ावा देना है, ताकि अंग विफलता से पीडि़त लोगों को सही वक़्त पर एक नयी ज़िन्दगी मिल सके।

ग़ौरतलब है कि अंग प्रत्यारोपण से अभिप्राय सर्जरी के माध्यम से एक व्यक्ति के स्वस्थ अंग को निकालने और उसे ऐसे व्यक्ति के शरीर में प्रत्यारोपित करने से है, जिसका अंग किन्हीं कारणों से काम नहीं कर रहा हो। एक कड़ी सच्चाई यह है कि देश में अंगदान को लेकर उतनी गम्भीरता से अभियान नहीं चलाया गया, जितनी गम्भीरता से चलाये जाने की ज़रूरत है। इसी कारण देश में हर साल अंग विफलता के कारण क़रीब पाँच लाख लोग मर जाते हैं। अंगदान ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें किसी व्यक्ति (जीवित या मृत) दोनों स्वस्थ अंगों और ऊतकों को लेकर किसी अन्य ज़रूरतमंद व्यक्ति के शरीर में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। प्रत्यारोपित होने वाले अंगों में दोनों किडनी, लीवर, फेफड़े, हृदय, आँत और अग्नाशय शामिल होते हैं। ऊतकों के रूप में कोर्निया, त्वचा, हृदय वाल्व, कार्टिलेज हड्डियों का प्रत्यारोपण होता है। इन अंगों में सबसे अधिक माँग किडनी की है। इसलिए अवैध किडनी प्रत्यारोपण का धंधा का$फी फल-फूल रहा है। देश में तक़रीबन 1.5 से 2 लाख गुर्दों (किडनियों) की हर साल ज़रूरत होती है। जबकि 50,000 यकृत (लीवर) प्रत्यारोपण की ज़रूरत होती है। लेकिन हर साल तक़रीबन 5000 से लेकर 9000 किडनियाँ ही प्रत्यारोपित हो पाती हैं। 20,000 लोग किडनी डायलिसिस से काम चलाते हैं। शेष अपनी जान गँवा देते हैं। किडनी शरीर से निकालने के बाद 24 से 36 घंटे तक सही रहती है। वहीं लीवर 8 से 12 घंटे तक व फेफड़े चार से पाँच घंटे तक ही प्रत्यारोपण के योग्य रहते हैं।

ग़ौरतलब है कि 80 व 90 के दशक में भारत विश्व में किडनी बाज़ार के रूप में मशहूर था। किडनी रैकेट इस स्तर पर फैल चुका था कि अकेले मुम्बई तत्कालीन बम्बई में ही हर महीने 100 किडनी प्रत्यारोपित होती थीं। दरअसल किडनी की जितनी माँग है, उसके अनुपात में आपूत्ति बहुत ही कम है। इस हालात के मद्देनज़र बहुत-से लोग किडनी ख़रीदने व बेचने के अवैध धंघे से जुड़ गये हैं। इसमें कम पढ़े-लिखे व शिक्षित दोनों ही तरह के लोग हैं। विडंबना यह है कि इस रैकेट से जुड़े लोग अक्सर ग़रीबों और कम आय वाले लोगों को अपने जाल में फँसाते हैं। ऐसा अनुमान है कि अवैध रूप से हर साल क़रीब 2,000 किडनियों की बिक्री देश में होती है। किडनी रैकेट्स के बढ़ते जाल के मद्देनज़र भारत सरकार ने मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम-1994 बनाया था। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए मानव अंगों के निष्कासन, भण्डारण और प्रत्यारोपण को विनियमित करना है। साथ ही यह मानव अंगों के वाणिज्यिक प्रयोग को भी प्रतिबन्धित करता है।

इस अधिनियम में किसी ग़ैर-सम्बन्धी के अंग प्रत्यारोपण को ग़ैर-कानूनी घोषित किया गया था। बाद में इस अधिनियम में संशोधन किया गया। मानव अंग प्रत्यारोपण (संशोधन) अधिनियम-2011 पारित किया गया। इस अधिनियम में मानव अंगदान की प्रक्रिया को और आसान बनाया गया। साथ ही इसके दायरे को और अधिक व्यापक कर उसमें ऊतकों को भी शामिल किया गया। इसके बाद मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण नियम-2014 भी आया। सन् 2011 व सन् 2014 के संशोधित अधिनियम के बाद अंगदान करने सम्बन्धी व अन्य नियमों में बदलाव किये गये, संशोधन के बाद मृत व्यक्ति को भी दानकर्ता की सूची में डाल लिया गया। इसी तरह नज़दीकी रिश्तेदार के अलावा दोस्तों व ससुराल पक्ष से भी अंग लेने की इजाज़त मिल गयी; लेकिन दान करने वाले व अंग लेने वाले के बीच में किसी भी प्रकार का पैसा का लेन-देन नहीं होना चाहिए। संशोधन के बाद स्वैप ट्रांसप्लांटेशन की भी इजाज़त मिल गयी, यानी इसमें एक जोड़ी के डोनर किडनी को दूसरे के साथ बदल दिया जाता है। इसके अलावा हृदय गति के अचानक रुकने से मरने वाले लोगों के अंग निकालकर भी प्रत्यारोपण की इजाज़त दी गयी। इससे पहले सिर्फ़ ब्रैन डेड की श्रेणी में आने वाले लोगों से ही अंग लेने की इजाज़त थी। इसके साथ ही क़ानून का उल्लघंन करने वालों के लिए सज़ा बढ़ाकर 10 साल व आर्थिक दण्ड एक करोड़ रुपये कर दिया।

भारत सरकार की मंशा हर इंसान को स्वस्थ व प्रसन्न देखना है। सरकार ने अंग विफलता वाले मामले में अवैध धंधे पर शिंकजा कसने के लिए क़ानून तो बना दिया; लेकिन उस पर अमल उतनी सख़्ती से नहीं हो सका। अवैध काम करने वालों के मन में क़ानून का डर नहीं होना भी एक तरह से सरकार की विफलता ही मानी जाएगी। अगर सरकार इस दिशा में सख़्ती से काम करे, तो देश में मानव अंगों का अवैध धंधा रुक सकता है, जो अभी तक गुपचुप तरीक़े से न जाने कितनी जगह जारी होगा।

बुज़ुर्गों को शिक्षित कर रहे बच्चे

 झारखण्ड की एक बच्ची द्वारा माँ को पढ़ाने से प्रेरित हुए ग्रामीण
 बच्चों ने एक साल में क़रीब 16,000 बुज़ुर्गों को बनाया साक्षर

पढ़ाई को बचपन से जोड़ा गया है। लेकिन इसकी कोई उम्र नहीं होती। प्राचीन ग्रन्थों को देखें, तो गर्भावस्था में भी शिक्षा मिलती थी। सुभद्रा के गर्भ में रहकर अभिमन्यु ने चक्रव्यूह-भेदन की कला सीख ली थी। हाल ही में सिने अभिनेता अभिषेक बच्चन की एक फ़िल्म दसवीं पास। इस फ़िल्म में दिखाया गया है कि अभिषेक एक क़द्दावर नेता और प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। उन्हें भ्रष्टाचार में जेल होती है। वहाँ वह 10वीं पास करने की ठान लेते हैं। वह जेल से ही 10वीं की पढ़ाई करके परीक्षा पास करते हैं। बाद में मंत्री बनकर शिक्षा का प्रचार करते हैं और कहते हैं कि पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती है। इससे ज्ञान बढ़ता है। सोचने की शक्ति बढ़ती है। जीवन स्तर बदलता है।

यह फ़िल्म की बात है; पर यह एक सच्चाई भी है। झारखण्ड की बात करें, तो शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो को मंत्री बनने के बाद ताना सुनना पड़ा कि वह केवल 10वीं पास हैं। जगरनाथ महतो पारिवारिक परेशानी के कारण आगे नहीं पढ़ पाये थे। महतो 10वीं पास के ताने से इतने आहत हुए कि अपनी पुरानी ख़्वाहिश को पूरा करने में जुट गये। मंत्री बनने के बाद उन्होंने पहला काम किया 11वीं में कॉलेज में नामांकन लिया। वह परीक्षा भी दे रहे हैं।

यह सही है कि पढ़ाई के लिए सबसे अच्छा बचपन माना गया है। लेकिन कई ऐसे लोग हैं, जो कारणवश पढ़ाई के सपने को पूरा नहीं कर पाते हैं। समाज में इस तरह के लोग उम्र के एक पड़ाव पर जाकर शिक्षा हासिल करते हैं। केरल के कोल्लम में रहने वाली 105 साल की भागीरथी अम्मा ने राज्य साक्षरता मिशन के तहत चौथी कक्षा के बराबर की परीक्षा पास करके मिसाल क़ायम कर दी। पढ़ाई करना उनकी बचपन की ख़्वाहिश थी।

देहरादून के निवासी मोहनलाल ओनएनजीसी से उप महाप्रबंधक के पद से रिटायर हुए। उन्होंने अपने सपनों को साकार करने के लिए रिटायरमेंट के बाद दोबारा पढ़ाई शुरू की। दो साल पहले इग्नू से मास्टर इन टूरिज्म में डिग्री हासिल की। इस तरह के कई उदाहरण हमारे देश में भरे पड़े हैं। ऐसा ही कुछ पढ़ाई का सिलसिला इन दिनों झारखण्ड के लातेहार में चल रहा है। $खास बात यह है कि इस शिक्षा की अलख जगा रहे बच्चे अपने माँ-बाप के साथ-साथ आसपास के लोगों को भी साक्षर बना रहे हैं।

प्रौढ़ शिक्षा का नाम बदला
केंद्र सरकार ने प्रौढ़ शिक्षा को एक बार फिर नये सिरे से शुरू करते हुए इसका नाम न्यू इंडिया साक्षरता कार्यक्रम (नव भारत साक्षरता कार्यक्रम) रखा था। अब सरकार ने इसका नाम भी बदलकर ‘सभी के लिए शिक्षा’ रखा है। वित्त वर्ष 2022-2027 की अवधि में शिक्षा को एक नये रूप में लेकर आने की योजना है। इस योजना का उद्देश्य न केवल आधारभूत साक्षरता और संख्यात्मकता प्रदान करना है, बल्कि 21वीं सदी के नागरिक के लिए आवश्यक अन्य घटकों को भी शामिल करना है।

झारखण्ड की साक्षरता दर
झारखण्ड की भौगोलिक स्थिति, यहाँ के रहन-सहन, परिवेश, ग़रीबी आदि के कारण साक्षरता दर काफ़ी कम रही है। हालाँकि बीते कुछ वर्षों में इसमें सुधार आया है; लेकिन अभी और सुधार की ज़रूरत है। राज्य में सन् 1961 में केवल 21.14 साक्षरता दर थी। उस वक़्त महिलाओं का केवल 6.11 फ़ीसदी हिस्सेदारी थी। सन् 1991 में साक्षरता दर 41.59 फ़ीसदी पर पहुँची। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार साक्षरता दर 66.41 फ़ीसदी थी। राज्य के शिक्षा विभाग के आँकड़ों के मुताबिक, सन् 2018 में साक्षरता दर 73.20 फ़ीसदी थी। लेकिन कोरोना वायरस के कारण साक्षरता कार्यक्रम पर बुरा असर पड़ा। हालाँकि एक बार फिर इस अभियान को शुरू किया गया है।

नक्सली इलाक़े में शिक्षा की अलख
झारखण्ड की राजधानी रांची से लगभग 125 किलोमीटर की दूरी पर 3,622 वर्ग किलोमीटर में फैला लातेहार ज़िला है। इसकी आबादी लगभग 7.26 लाख है। इसमें 3.69 लाख पुरुष और 3.57 लाख महिलाएँ हैं। कुल आबादी में 66 फ़ीसदी से अधिक अनुसूचित जाति (लगभग 45.54 फ़ीसदी) और बाक़ी अनुसूचित जनजाति के लोग हैं।

लातेहार अपनी समृद्ध प्राकृतिक सुंदरता, वन, वन उत्पादों और खनिज के लिए जाना जाता है। यह ज़िला कभी घोर नक्सल प्रभावित था। गोलियों की आवाज़ इलाक़े में गूँजा करती थी। पिछले कुछ वर्षों में नक्सल प्रभाव कम हुआ, तो इलाक़े में बदलाव आने लगा। अब कई जगहों पर गोलियों की जगह ककहरा (वर्णमाला पढऩे) की आवाज़ आने लगी है।

पढ़ रहे बुज़ुर्ग
लातेहार में बच्चों द्वारा बुज़ुर्गों को पढ़ाने की घटना खेल-खेल में ही शुरू हुई। स्थानीय लोगों का कहना है कि ज़िले के सुदूर इलाक़े में एक गाँव है, जहाँ के आठवीं कक्षा में एक बच्ची पढ़ती थी। एक दिन उसकी माँ बच्ची के साथ किसी काम से स्कूल जाना पड़ा। वहाँ अध्यापक ने बच्चों को मिलने वाली सुविधा से सम्बन्धित किसी काग़ज़ पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा। बच्ची की माँ अनपढ़ थी, वह न ही काग़ज़ पर लिखा समझ सकी और न हस्ताक्षर कर सकी।

शिक्षक और बेटी द्वारा काग़ज़ पर लिखी बातें बताने पर उन्होंने अँगूठा लगाया। इस पूरे घटनाक्रम ने बच्ची को शर्मिंदा किया। उसने माँ को कहा कि वह उसे पढऩा-लिखना सिखाएगी। बच्ची रोज़ाना स्कूल से आने के बाद माँ को पढ़ाने-लिखाने लगी। धीरे-धीरे वह महिला पूरा-पूरा वाक्य पढऩे लगी और कुछ-कुछ लिखने भी लगी। आस-पड़ोस की महिलाओं को यह देख अच्छा लगा। वे भी फ़ुरसत के समय बच्ची से पढऩे लगीं। इस तरह क्षेत्र में बुज़ुर्गों की पहली पाठशाला की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे क्रम बढ़ता गया, और एक गाँव से दूसरे गाँव होते हुए यह सिलसिला लातेहार के कई गाँवों तक पहुँच गया।

प्रशासन का लक्ष्य
लातेहार ज़िले की जनसंख्या 7.26 लाख है। यहाँ की साक्षरता दर 2011 की जनगणना के अनुसार 59.51 फ़ीसदी थी। मौज़ूदा में साक्षरता दर का आँकड़ा थोड़ा बढ़ गया है। स्थानीय प्रशासन पूर्ण साक्षर ज़िला बनाने के लिए प्रयासरत है। इसके तहत प्रौढ़ शिक्षा (सभी के लिए शिक्षा) योजना पर काम शुरू किया गया है। स्थानीय प्रशासन ने पिछले दिनों अनुभव कि किया बच्चों की मदद से प्रौढ़ शिक्षा को बढ़ावा मिल सकता है।

खेल-खेल में शुरू की गयी पाठशाला का नतीजा सफल साबित हुआ है। इसे देखकर प्रशासन भी बच्चों की मदद लेने की तैयारी में है। स्थानीय बच्चों का कहना है कि स्कूल के शिक्षक ने उन्हें अपने माता-पिता और आसपास के लोगों को पढ़ाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उन्हें भी बुज़ुर्गों को पढ़ाने में बहुत आनन्द आता है। ज़िले के शिक्षा विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार, पिछले एक वर्ष में लगभग 16 हज़ार बुज़ुर्गों को बच्चों ने साक्षर बनाया है। यह आँकड़ा मार्च, 2022 तक का है। नये वित्तीय वर्ष में इसे संगठित रूप दे कर आगे बढऩे की योजना पर काम चल रहा है। ज़िले में 772 गाँव हैं। हर गाँव से निरक्षर लोगों का आँकड़ा लिया जा रहा है। इस महीने के अन्त तक ज़िले के विभिन्न गाँव में एक बार फिर बुज़ुर्गों के लिए बच्चों की पाठशाला शुरू हो जाएँगे। इस बार रात्रि पाठशाला भी शुरू करने की योजना है, क्योंकि दिन में महिलाएँ तो समय निकाल लेती हैं; लेकिन पुरुष समय नहीं निकाल पाते। रात्रि पाठशाला से पुरुषों को लाभ होगा।


“ज़िला के उपायुक्त के नेतृत्व में साक्षरता कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जा रहा है। बच्चों ने खेल-खेल में जिस तरह से अपने माता-पिता, परिवार और आस-पड़ोस को साक्षर बनाया वह सराहनीय है। आने वाले दिनों में साक्षरता कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए बच्चों की भी मदद लेने की योजना है। इस वित्तीय वर्ष में ज़िले के एक लाख लोगों को साक्षर बनाने का लक्ष्य है। इसलिए लातेहार में भले ही अभी केवल साक्षर बनाने की योजना पर काम शुरू हुआ हो; लेकिन सम्भव है कि कुछ बुज़ुर्ग महिला-पुरुष केरल की भागीरथी अम्मा की तरह चौथी कक्षा या इससे आगे की पढ़ाई भी कर लें।’’
निर्मला कुमारी बरेलिया
ज़िला शिक्षा अधीक्षक, लातेहार

पुरुषों को रोने दें!

जब जॉनी डेप और एम्बर हर्ड मामले की ख़बर दुनिया भर में फैली, तो इसने सभी का ध्यान खींचा। क्योंकि यह दो मशहूर हस्तियों के बीच अत्यधिक प्रचारित अदालती लड़ाई का मामला था। दूसरी बात यह एक ऐसे व्यक्ति से जुड़ी थी, जो एक बेहद सफल और बहुत लोकप्रिय हॉलीवुड अभिनेता था। इस अभिनेता का अपनी पूर्व पत्नी पर अंतरंग साथी हिंसा (आईपीवी) और खुले तौर पर उस मानसिक और भावनात्मक शोषण का आरोप था, जो उसे अपनी पत्नी की तरफ़ से झेलना पड़ा।

यह कोई ब्रेकिंग न्यूज नहीं है कि पुरुष भी अपनी हिंसक, भावनात्मक और मानसिक रूप से बीमार साथी की तरफ़ से शारीरिक, भावनात्मक और मानसिक रूप से पीडि़त होते हैं। हालाँकि शायद ही कोई पुरुष यह सच कहने के लिए सामने आता है। क्योंकि ज़्यादातर समय पुरुष इस बात से इन्कार करते हैं कि उनके साथ दुव्र्यवहार किया जा रहा है। अगर किसी मौक़े पर वे इस तथ्य का सामना करने के लिए तैयार भी हैं कि वे एक अपमानजनक रिश्ते में हैं। ख़ासतौर से शारीरिक प्रताडऩा का शिकार हैं, तो भी एक पुरुष के लिए सामाजिक प्रतिक्रिया के कारण यह स्वीकार करना आसान नहीं है। हमारे पुरुष प्रधान समाज में पत्नी की तरफ़ से शारीरिक रूप से हावी होना और दुव्र्यवहार करना अमानवीय माना जाता है। दु:ख की बात है कि अगर यह सामने आता है कि कोई व्यक्ति ऐसी प्रताडऩा का सामना कर रहा है, तो वह सहानुभूति पाने के बजाय बेतुके चुटकुलों का पात्र बन जाता है। इसलिए जब हॉलीवुड सुपरस्टार डेप ने अदालत में अपने निजी जीवन के बारे में कुछ चौंकाने वाले विवरणों का ख़ुलासा किया, तो सभी ने उस पर तुरन्त ध्यान दिया। आईपीवी के ख़िलाफ़ उनकी आवाज़ और एम्बर द्वारा उनकी पत्नी के भावनात्मक शोषण को सुना गया और गम्भीरता से लिया गया।

ख़ुद से हुई हिंसा के बारे में डेप ने ख़ुलासा किया कि एम्बर उसे थप्पड़ मारती थी और धक्का देती थी। एक बहस के दौरान उसने डेप पर वोदका की बोतल फेंकी। जब डेप ने अपने बचाव की कोशिश की, तो ऐसा करते हुए बोतल से उसकी दाहिनी मध्यमा उँगली पर इतना गहरा ज़ख़्म हो गया कि हड्डी दिखने लगी। अभिनेता ने कहा कि वह कभी-कभी ख़ुद को एक बेडरूम या बाथरूम में बन्द करके हिंसक बहस से ख़ुद को दूर कर लेते था, और उसने कभी हर्ड (पत्नी) को नहीं पीटा। डेप ने गवाही में कहा कि मेरा मुख्य लक्ष्य पीछे हटकर अपना बचाव करना भर होता था।
हालाँकि डेप न केवल आईपीवी के अन्तिम पड़ाव पर थे, बल्कि उन्हें भावनात्मक शोषण भी झेलना पड़ रहा था। उन्होंने कहा कि उनके (मेरे और पत्नी हर्ड के) बीच अक्सर तर्क होते थे, जिनमें ग़ुस्से से नाम पुकारना और डराना-धमकाना शामिल था। उनके मुताबिक, यह मेरे प्रति शुद्ध घृणा की तरह था।

तथ्य यह है कि डेप इस मामले में जिस तरह सामने आये, उससे उम्मीद है कि अन्य पुरुष, जो चुपचाप पीडि़त होते हैं; अब सामने आने और मदद लेने का साहस करेंगे। क्योंकि हमेशा महिलाएँ ही ऐसी स्थिति का शिकार नहीं होती हैं, बल्कि पुरुषों को भी प्रताडि़त किया जाता है। हमें एक समाज के रूप में इसे स्वीकार करने की आवश्यकता है। साल 2005 में गठित सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन (एसआईएफएफ), जो अपनी जीवनसाथी द्वारा हिंसा, मानसिक और भावनात्मक उत्पीडऩ का सामना कर रहे पुरुषों के अधिकार की लड़ाई लडऩे के साथ-साथ उन्हें परामर्श, सहायता और समर्थन देता है। इस समूह के मुताबिक, स्व-स्वीकार्य रूप से ऐसे पुरुषों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है और हर ह$फ्ते चार या पाँच लोग समूह में शामिल होते हैं।

भारत की बात करें, तो वर्ष 2004 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) ने ख़ुलासा किया कि देश में लगभग 1.8 फ़ीसदी महिलाओं ने अपने पतियों के ख़िलाफ़ हिंसा का सहारा लिया था। आँकड़ों के मुताबिक, ग्रामीण भारत की कहानी कुछ अलग नहीं लगती। ग्रामीण हरियाणा इसका नमूना है, जहाँ 21-49 आयु वर्ग के विवाहित पुरुषों के एक अध्ययन में 51.5 फ़ीसदी पुरुषों ने यातना या आईपीवी का सामना किया; जबकि 10.5 फ़ीसदी पुरुषों ने अपनी पत्नियों के हाथों हिंसा झेली।

हालाँकि अपमानजनक रिश्ते केवल हिंसा के बारे में नहीं हैं, उनमें भावनात्मक और मानसिक शोषण भी शामिल है। रिलेशनशिप एक्सपट्र्स के मुताबिक, लोगों के लिए यह पहचानना आसान नहीं है कि वे मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक रूप से अपमानजनक रिश्ते में हैं। आधा समय तो उन्हें इसकी भनक तक नहीं लगती। हालाँकि कुछ व्यवहार सम्बन्धी लक्षण हैं, जिन्हें विवाह सलाहकार और मनोवैज्ञानिक एक पति या पत्नी द्वारा किये जा रहे मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक शोषण से पहचानते हैं। उदाहरण के लिए यदि आपका जीवनसाथी आपके प्रति अति-आलोचनात्मक या निर्णयात्मक है, तो आप एक अपमानजनक विवाह में हैं। आप उनके और आपके परिवार के लिए कुछ भी हासिल नहीं करते हैं। वे शायद ही कभी उन्हें ख़ुश करने के आपके प्रयासों की सराहना करते हैं। जब आप उनकी किसी बात के लिए सहमत नहीं होते हैं, तो आपका जीवनसाथी नाराज़ या परेशान हो जाता है। वह बिना अनुमति के आपके ईमेल, टेक्स्ट मैसेज, सोशल मीडिया, लैपटॉप या फोन की जाँच करके अपनी सीमाओं को नियंत्रित कर रहा है। आपकी सीमाओं की अनदेखी कर रहा है, और आपकी गोपनीयता पर हमला कर रहा है।
आपको यह भी महसूस करना चाहिए कि आप भावनात्मक रूप से अपमानजनक रिश्ते में हैं, यदि आपका जीवनसाथी अधिकारपूर्ण और अनुचित रूप से ईष्र्यालु है। साथ ही जब आप आसपास नहीं होते हैं, तो लगातार कॉल करता है। इससे आप यदि अकेले या परिवार या दोस्तों के साथ समय बिताना चाहते हैं, तो आप परेशान हो जाते हैं। यदि वह आपकी दुनिया का केंद्र बनना चाहता है और आपको अपने जीवन के अन्य महत्त्वपूर्ण लोगों जैसे आपके माता-पिता, भाई-बहन, विस्तारित परिवार, दोस्तों से अलग-थलग करना चाहता है या अन्य गतिविधियों का आनंद लेने से आपको रोकना चाहता है, तो यह आप पर हावी होने की कोशिश है।

एक अपमान करने वाला जीवनसाथी आप पर बेवफ़ाई का आरोप लगाता है। आपकी बार-बार जाँच करता है और आपको यह बताकर अपराधबोध कराता है कि उसने आपके लिए एक लाख बलिदान किये हैं। वह आपको हर समय एक अपराधबोध से देखता है और सन्देह के घेरे में रखता है। आपको अपर्याप्त महसूस कराता है और आत्महत्या करने की धमकी देता है, या बच्चों को आपसे दूर ले जाता है। ऐसे जीवनसाथी आमतौर पर आपकी उपलब्धियों, आशाओं और सपनों को कम करके आपको नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। अपने तर्कहीन व्यवहार के बारे में बात करने से इन्कार करते हैं या अपनी ग़लतियों और कार्यों की ज़िम्मेदारी नहीं लेते हैं। वे अपनी विफलता के लिए आपको या किसी और को दोष देते हैं। तर्कहीन होते हैं, और जब आपने कुछ ग़लत किया है, तो स्नेह वापस ले लेते हैं।

शोध से पता चलता है कि लगभग 43 फ़ीसदी पतियों ने अपनी पत्नियों द्वारा किये गये दुव्र्यवहार, अपमान, उत्पीडऩ और निराशा के कारण आत्महत्या करने पर विचार किया है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, विश्व स्तर पर आत्महत्या करने वाले पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में दोगुनी है। मैं यह नहीं कह रही हूँ कि सभी आत्महत्याएँ एक अपमान करने वाले पति या पत्नी के कारण होती हैं; लेकिन इन आँकड़ों पर भरोसा करें, तो यह उनमें से एक बड़ा कारण है, जिसका फ़ीसद बहुत है।

जैसा कि आँकड़े बताते हैं कि पुरुष अधिक कमज़ोर होते हैं, क्योंकि वे यह मानने से इन्कार करते हैं या छिपाते हैं कि वे एक अपमानजनक रिश्ते में हैं। वे इन्कार की स्थिति में रहते हैं और इसके बारे में बात नहीं करते हैं। यहाँ तक कि अगर उन्हें पता चलता है कि वे एक अपमानजनक रिश्ते में हैं, तो वे किसी से मदद तक नहीं माँगते। क्योंकि दूसरे व्यक्ति के साथ साझा करने की बात तो दूर है, वे ख़ुद इसे स्वीकार करने में शर्मिंदगी महसूस करते हैं। आख़िर एक मर्दाना आदमी कैसे कमज़ोर हो सकता है या किसी के द्वारा चालाकी या बदसलूकी का शिकार हो सकता है, ख़ासकर एक महिला के हाथों। लेकिन कई लोग यह सब चुपचाप सहते रहते हैं। क्योंकि उनके दिमाग़ में यह भरा है कि वे दु:ख उठाने के लिए ही हैं। क्योंकि असली मर्द रोते नहीं हैं। असली मर्द अपनी भावनाओं के बारे में बात नहीं करते हैं। यह कहेंगे कि डर लगता है, तो लोग क्या कहेंगे? अगर मैं किसी को बता दूँ कि मेरी पत्नी मुझे मार रही है या भावनात्मक रूप से गाली दे रही है, तो वे मुझे डरपोक या जोरू का ग़ुलाम कहेंगे। महिलाओं की ही तरह पुरुष भी तलाक़ के सामाजिक और आर्थिक परिणामों, लम्बी क़ानूनी लड़ाई, अपने बच्चों तक पहुँच खोने, अपने साथियों और सहकर्मियों की नज़र में सम्मान खोने के कारण इस स्थिति तक क़दम उठाने से बचते हैं।

सबसे बुरी बात यह है कि ख़ुद को और अपने परिवार को झूठे मामले में फँसाने का ख़ौफ़ भी रहता है, क्योंकि भारतीय दण्ड संहिता के तहत कई क़ानून महिलाओं के पक्ष में हैं। अच्छे कारण के लिए भी, क्योंकि बड़ी संख्या में महिलाओं को इसके संरक्षण की आवश्यकता है। हालाँकि हम इस तथ्य को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते हैं कि बहुत-सी महिलाएँ अपनी सुरक्षा के लिए बनाये गये क़ानूनों का दुरुपयोग करती हैं। गुरुग्राम के उस 31 वर्षीय पुरुष के परिवार से पूछो, जिसने 6 मई को एक होटल में आत्महत्या कर ली; क्योंकि उसकी पत्नी और उसके दूसरे परिजन उसे परेशान कर रहे थे और झूठे मामले में फँसाने की धमकी दे रहे थे।

आप कह सकते हैं कि अधिक लिंग-तटस्थ घरेलू हिंसा क़ानूनों और महिलाओं द्वारा क़ानूनों के दुरुपयोग की आवश्यकता के बारे में यह तर्क और धारा-498(ए) जैसे क़ानूनों में दुरुपयोग के प्रावधान को लागू करने की आवश्यकता (एक महिला के पति या रिश्तेदार के साथ क्रूरता के अधीन) या दहेज़ अधिनियम की धारा-4 को भुला दिया गया है। लेकिन इसे सख़्ती से कुचलने की ज़रूरत है। क्योंकि यह दु:ख की बात है कि भारत में अपनी पत्नी के हाथों हिंसा और भावनात्मक शोषण का सामना करने वाले पुरुष ख़ुद को बचाने के लिए कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि क़ानून उन्हें पीडि़त के रूप में नहीं मानता है। दुनिया भर के अधिकांश देशों के विपरीत भारत में घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ क़ानून दोनों लिंगों को सुरक्षा प्रदान नहीं करते हैं। उदाहरण के लिए विदेशों में प्रताडि़त और प्रताडि़त पति अदालतों से बचाव आदेश माँग सकते हैं; लेकिन भारत में दुव्र्यवहार का शिकार होने वाले पतियों के पास वह विकल्प नहीं है। हम क़ानूनी तौर पर भारतीय समाज में कई सकारात्मक बदलाव देख रहे हैं। अब भारत को भी क़ानूनी तौर पर अपने जीवनसाथी या परिवार के सदस्यों के हाथों घरेलू हिंसा या भावनात्मक और मानसिक शोषण का सामना करने वाले पुरुषों को अधिक समर्थन करना चाहिए।

हालाँकि एक अनुपयोगी और असंगत क़ानूनी व्यवस्था को छोड़कर क्या हम एक समाज के रूप में अपने आप को सभी दोषों से मुक्त कर सकते हैं? क्या हम भी समान रूप से दोषी नहीं हैं? क्या हम अपने लड़कों को हमेशा कठिन होने और इसे एक मर्द की तरह लेने के लिए कहकर मर्दानगी की पुरातन, यहाँ तक कि मध्ययुगीन धारणा के साथ नहीं जी रहे हैं? क्या हम उन पुरुषों का भी मज़ाक़ नहीं उड़ाते, जो अपनी भावनाओं के सम्पर्क में हैं और उन्हें बहन कहते हैं? इसके लिए दूसरों से ज़्यादा पुरुष ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि जब कोई महिला आईवीपी या मानसिक शोषण की शिकायत करती है, तो उसके जीवन में महिलाएँ उस पर हँसती नहीं हैं या उसे ख़ारिज नहीं करती हैं। वे इसे गम्भीरता से लेती हैं और पीडि़ता के साथ सहानुभूति रखती हैं, उसे दिलासा देती हैं और उसके साथ खड़ी होती हैं। वे उसे मदद लेने की सलाह भी देती हैं और कुछ मामलों में उसके लिए मदद भी देती हैं। लेकिन पुरुष क्या करते हैं? वे अविश्वास और उपहास में हँसते हैं, जब उन्हें पता चलता है कि एक आदमी को उसकी पत्नी ने पीटा था। वे उसे जोरू का ग़ुलाम करार दे देते हैं। तो क्या भाईचारा केवल शराब की मेज तक सीमित है, और शरारत भर करने के लिए है? जब कोई अन्य पुरुष घरेलू प्रताडऩा का शिकार हो रहा हो, तो मानव-संहिता कहाँ जाती है? इस क्षेत्र में पुरुष एक दूसरे का समर्थन क्यों नहीं करता?

क्या हमने कभी सोचा है कि इस मध्ययुगीन मानसिकता को बदलने का समय आ गया है कि मर्द को दर्द नहीं होता या लड़के रोते नहीं हैं। क्या यह सही समय नहीं है कि हम एक समाज के रूप में उन पुरुषों के प्रति अधिक सहानुभूतिपूर्ण बनें, जो अपने जीवनसाथी के हाथों पीडि़त हैं? सिर्फ़ इसलिए कि एक आदमी शान्ति बनाये रखने के लिए चुप रहता है या क्योंकि वह अपने बच्चों को खोना नहीं चाहता, उसकी क़ीमत किसी इंसान से कम नहीं हो जाती। हमें उसकी तरफ़ मदद का हाथ बढ़ाना चाहिए या सहानुभूतिपूर्ण सहयोग करना चाहिए। उस व्यक्ति का मज़ाक़ नहीं उड़ाया जाना चाहिए, जो यह स्वीकार करने का हौसला दिखा रहा है कि वह अपनी पत्नी से शारीरिक या भावनात्मक शोषण का सामना कर रहा है। क्योंकि ख़ुद ऐसा स्वीकार करने के लिए हिम्मत चाहिए होती है, बाक़ी की तो बात ही छोडि़ए।
हमें यह महसूस करने की ज़रूरत है कि एक पुरुष का शारीरिक और भावनात्मक शोषण एक वास्तविकता है, और हमें इसे हल करने की आवश्यकता है। उसके लिए हमें कितने और जॉनी डेप या एम्बर हर्ड चाहिए? आख़िर हमें पुरुषों में यह धारणा रखने की आवश्यकता है कि अगर कोई शारीरिक और भावनात्मक रूप से अपमानजनक रिश्ते में है, तो उसका अपनी समस्याओं के बारे में बात करना ठीक है। आख़िर हम कितनी और आत्महत्यायों का इंतज़ार करेंगे? क्या ऐसे मुद्दों पर हँसना और आहत भावनाओं को हवा देना ठीक है? समय आ गया है कि पुरुष को रोने दें!

(लेखिका पायनियर में वरिष्ठ संपादक हैं।)