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सीआरपीएफ दिवस

गिरता जा रहा अर्धसैन्य बल का मनोबल

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा अग्निपथ योजना के माध्यम से तीनों सेनाओं में भर्ती किये जाने से जहाँ पात्र युवा ख़ुश हैं, वहीं वे युवा जो सेना में भर्ती होने की तैयारी में जुटे थे, काफ़ी नाराज़ हैं। इसकी मूल वजह कम समय के लिए सेना में सेवा का मौक़ा तो है ही, साथ ही यह भी है कि अब सेनाओं में वो सुविधाएँ नहीं मिलेंगी, जो अब तक मिलती रही हैं। जहाँ तक सैन्य संगठनों में सेवा के बदले मेवा का सवाल है, तो वैसे तो सैनिकों को बहुत बेहतर कुछ नहीं मिलता है; लेकिन जो मिल रहा था, उसमें भी अब धीरे-धीरे कटौती होती जा रही है। वहीं कुछ सैन्य संगठन काफ़ी समय से अपने हक़ की आवाज़ उठाते रहे हैं; लेकिन उन्हें उतनी सुविधाएँ कभी नहीं मिलीं, जितनी आर्मी, वायु सेना और नौसेना को मिलती रही हैं। ऐसा ही एक सैन्य बल केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ भी है।

केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की स्थापना 27 जुलाई, 1939 को क्राउन रिप्रेजेंटेटिव पुलिस के रूप हुई थी। लेकिन तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 19 मार्च, 1950 को सीआरपीएफ को झण्डा यानी ‘प्रेसिडेंट कलर्स’ प्रदान किया था। उसके बाद 28 दिसंबर, 1950 को सीआरपीएफ अधिनियम लागू हुआ। इस दौरान इस सैन्य बल को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल यानी सीआरपीएफ का दर्जा प्रदान किया गया। केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल ने इसी साल यानी 19 मार्च, 2022 को जोश और औपचारिक उत्साह के साथ अपना 83वाँ स्थापना दिवस मनाया। अब 27 जुलाई को सीआरपीएफ दिवस मनाया जाएगा।

इस अर्ध सैन्य बल के गौरवशाली इतिहास आठ दशक बीत चुके हैं। आज भारत में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में कुल 243 बटालियन हैं। यह बल विशेष बटालियनों के अलावा महिला बटालियन, आरएएफ बटालियन, कोबरा बटालियन, सिग्‍नल बटालियन, विशेष ड्यूटी ग्रुप और पीडीजी सहित अनेक समूह केंद्र, प्रशिक्षण संस्थाएँ, सीडब्ल्यूएस, एडब्ल्यूएस, एसडब्‍ल्‍यूएस और 100 बिस्तरों वाले चार कम्‍पोजिट अस्पतालों और 50 बिस्तरों वाले 17 कम्‍पोजिट अस्पतालों के गठन से बना हुआ एक बड़ा संगठन है।

सीआरपीएफ की भूमिका

देश के हर कोने में सेवाएँ देने वाले केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों के केंद्र भी देश भर में हैं। अपनी सेवा और ईमानदारी से इस सैन्य संगठन बल ने लोगों और राज्‍य प्रशासनों के द्वारा सबसे ज़्यादा स्वीकार्य बल का दर्जा हासिल किया हुआ है। दंगों और आपदा से लेकर आतंकी गतिविधियों से निपटने के लिए शीघ्र सेवा के लिए इस सैन्य संगठन के जवानों को बुलाया जाता है। इसके अतिरिक्त किसी ख़ास हस्ती की सुरक्षा करने में भी इन्हें तैनात किया जाता है। यह अर्धसैन्य बल राज्‍य पुलिस के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से काम करता है। इस संगठन का काम भीड़ को नियंत्रित करना। दंगे रोकना। आतंकियों को मार गिराना, उन्हें गिरफ़्तार करना। वामपंथी उग्रवाद से निपटना। हिंसक इलाक़ों में चुनावों के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बनाये रखना। अति विशिष्ट व्यक्तियों और महत्त्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की सुरक्षा करना। पर्यावरण के हनन को रोकना, उसकी निगरानी करना। स्‍थानीय वनस्पतियों और जीवों का संरक्षण करना। युद्ध में शत्रुओं का सामना करना। प्राकृतिक आपदाओं के समय बचाव एवं राहत कार्य करना। क़ानून व्‍यवस्‍था बनाने में मदद करना। इसके अलावा इन्हें हवाई अड्डों, पुलों, पॉवरहाउस, दूरदर्शन केंद्रों, ऑल इंडिया रेडियो स्टेशनों, ख़ास केंद्रों, राष्ट्रीय बैंकों, अन्य सरकारी स्थलों, राज्यपालों और मुख़्यमंत्रियों के आवासों की सुरक्षा करने के लिए तैनात किया जाता है। बेहद अशान्त क्षेत्रों, आतंकी, माओवादी और नक्सल प्रभावित जगहों पर केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की बहुत ख़ास भूमिका होती है।

इस बल का 7.5 फ़ीसदी हिस्सा उत्‍तरी-पूर्व राज्यों- जम्‍मू और कश्मीर, बिहार, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और नागालैंड, त्रिपुरा और मिजोरम के ख़ास लोगों की सुरक्षा में तैनात रहता है। इसके अलावा प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर आवास स्थल तक, अन्य केंद्रीय मंत्रियों और गणमान्य व्यक्तियों के आवासों और दफ़्तरों की सुरक्षा के लिए भी इसके जवान 24 घंटे तैनात रहते हैं। वहीं 17.5 फ़ीसदी हिस्सा राज्यों के सचिवालयों पनबिजली परियोजनाओं, जेल, आतंकवाद प्रभावित इलाक़ों, केंद्र व राज्‍य सरकारों के ख़ास प्रतिष्ठानों की रक्षा के लिए तैनात रहता है। इसके अलावा धार्मिक स्थलों पर भी सीआरपीएफ जवानों की तैनाती रहती है। अपनी जान जोखिम में डालकर हर मुसीबत का सामना करने वाले देश के इस ख़ास बल के जवान का यह योगदान, न सिर्फ़ सरकार के लिए विचारणीय है, बल्कि देश के हर नागरिक की नज़र में सम्मान योग्य है।

त्याग में आगे

केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल देश का सबसे बड़ा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल है, जिसका अतीत भी गौरवशाली रहा है और वर्तमान भी गौरवशाली है। इस बल के जवानों की वीरता की गाथाएँ साहसपूर्ण और प्रेरणादायक हैं। इस अर्ध सैन्य बल के जवानों की जान हमेशा जोखिम में रहती है। चाहे वो देश के अन्दर की बात हो या देश की सीमाओं की बात हो; केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवान हमेशा जान जोखिम में डालकर मुसीबतों से निपटने के लिए तत्पर रहते हैं। लेकिन अफ़सोस की बात है कि उन्हें वो सम्मान और वेतन नहीं मिलता, जिसके वे हक़दार हैं। साथ ही उन्हें आर्मी की तरह सुविधाएँ भी नहीं मिलतीं और न रिटायर होने पर पेंशन की वैसी सुविधा ही है।

इस बल में पराक्रमी जवानों को जॉज क्रॉस, किंग पीएमजी, अशोक चक्र, कीर्ति चक्र, वीर चक्र, शौर्य चक्र, पद्म श्री, पीपीएफएसएमजी, पीपीएमजी, पीएमजी, आईपीएमजी, विशिष्ट सेवा मेडल, युद्ध सेवा मेडल, सेना मेडल, वीएम पुलिस मेडल और जीवन रक्षक पदक मिलते हैं। इस अर्ध सैन्य बल में जवानों की ट्रेनिंग बेहद स$ख्त और आग के दरिया को पार करने जैसी होती है। बावजूद इसके इस सम्मानित बल के जवानों को कई बार ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से बिना किसी लिखित आदेश के कुछ ताक़तवर लोग मौखिक आदेश के दम पर अपनी और अपने निवासों की सुरक्षा में तैनात करवा लेते हैं। इस बल में जवानों की कैटेगरी बटालियन के आधार पर पहचानी जाती है।

आत्महत्या के बढ़ते मामले

यह दुर्भाग्य की बात है कि तन-मन से देश की सेवा करने वाले केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों को अपनी ड्यूटी पर कभी-कभी इतना तनाव मिलता है कि वे आत्महत्या करने तक को मजबूर हो जाते हैं। यह कहना शायद ही सही हो कि किसी दूसरे सैन्य बल के मुक़ाबले केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवान ज़्यादा आत्महत्या करते हैं। अभी हाल ही में राजस्थान के एक जवान ने ड्यूटी के दौरान ख़ुद को गोली मार ली। इसी साल 10 या 11 मार्च को दौरान पचपेड़ी थाना क्षेत्र में एक सीआरपीएफ के जवान ने ड्यूटी के दौरान ख़ुद को गोली मार ली। कुकुर्दीकेरा निवासी 25 वर्षीय चंद्रभूषण जगत नाम के इस जवान की तैनाती 113वीं बटालियन, गढ़चिरौली में आरक्षक के रूप थी। इससे पहले 3-4 मार्च को पूर्वी उत्तर प्रदेश के चंदौली ज़िले में विधानसभा चुनाव के लिए ड्यूटी पर तैनात केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवान ने ख़ुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। यह जवान ए/8 उड़ीसा बटालियन कम्पनी में तैनात था।

एक रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2021 में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 58 जवानों ने आत्महत्या की थी। इसके अलावा नक्सल प्रभावित इलाक़ों में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवान सबसे ज़्यादा शहीद होते हैं। आँकड़े बताते हैं कि देश के सभी सैन्य संगठनों में सबसे ज़्यादा क़रीब 57 फ़ीसदी जवान केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के ही शहीद होते हैं। देश में सभी बलों को मिलाकर वर्ष 2019 में 15 राजपत्रित अधिकारी समेत 622 जवान शहीद हुए, वर्ष 2020 में 14 राजपत्रित अधिकारी समेत 691 जवान शहीद हुए, जबकि वर्ष 2021 में 18 राजपत्रित अधिकारी समेत 729 जवान शहीद हुए। भूस्खलन की कई घटनाओं में भी सीआरपीएफ के जवानों की मौत हुई है। गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2015 से वर्ष 2020 के बीच मुठभेड़ों की तुलना में बीएसएफ, सीआरपीएफ और एसएसबी सहित केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के जवानों के आत्महत्या की संख्या 680 है, जो मुठभेड़ में शहीद हुए जवानों की संख्या से दोगुने से ज़्यादा है।

न्यायालय का लचीला बर्ताव

एक वकील की मजबूरी को ध्यान में रखते हुए मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने युवा माँ वकीलों को सुनवाई में दी सुविधानुसार तारीख़ व समय लेने की छूट

मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ के न्यायाधीश जी.आर. स्वामीनाथन ने युवा माता वकीलों के लिए एक पहल की है। उन्होंने ऐसी महिला वकीलों की मदद करने के लिए उन्हें न्यायालय में उनके मामलों की सुनवाई के लिए विशेष (स्पेसिफिक) टाइम स्लॉट (उनके मुताबिक समय) देने की मंज़ूरी वाली नीति अपनायी है। और यह नीति 5 जुलाई से लागू भी हो गयी है। यह ख़ास सुविधा न्यायाधीश जी.आर. स्वामीनाथन के ही न्यायालय के लिए है और मदुरै पीठ में वकालत करने वाली महिला वकील इस नीति से बेहद ख़ुश हैं।

न्यायाधीश स्वामीनाथन के ज़ेहन में इसका विचार कैसे आया? इसके पीछे की घटना की ज़िक्र उन्होंने स्वयं बार एसोसिएशन के वकीलों के नाम लिखे एक पत्र में किया है। उन्होंने लिखा- ‘बीते दिनों एक मामले में उन्होंने पास ओवर दिया और मामले को 4:00 बजे के बाद सुनने को कहा। उनके पास ओवर देते ही वकील ने हिचकिचाते हुए कहा कि न्यायालय इस मामले को अगले दिन सुन ले। वजह पूछने पर वकील ने बताया कि उसे 3:30 बजे अपने बच्चे को स्कूल से पिकअप करना होता है, इसलिए वह 4:00 बजे मामले की सुनवाई में शामिल नहीं हो सकता। मैंने वकील के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। मगर इस वाक़िये ने मुझे सोचने पर विवश कर दिया कि न्यायालय में कामकाजी महिलाएँ भी प्रैक्टिस करती हैं, जो घर की ज़िम्मेदारी के साथ-साथ वकालत करती हैं। उन्हें भी इस तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता होगा। ऐसे में मुझे लगता है कि मैं ऐसी महिलाओं की कुछ मदद करूँ। इसलिए मैंने तय किया है कि ऐसी महिला वकील, जो युवा माँ हैं; वे न्यायालय के न्यायालय अधिकारी को पहले से अपनी समस्या बता सकती हैं, जिससे कि उन्हे एक तय स्लॉट उसके मामले की सुनवाई के लिए दिया जा सके।’

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि न्यायाधीश जी.आर. स्वामीनाथन ने यह विशेष रियायत देते वक़्त शर्त भी साथ लगा दी है। पहली शर्त यह कि वह वकील उस समय पूरी तैयारी के साथ आएगी, ताकि न्यायालय का कम-से-कम समय ले। दूसरी शर्त यह है कि यह सुविधा सिर्फ़ स्वतंत्र रूप से वकालत करने वाली महिला वकीलों के लिए है, न कि किसी लॉ फर्म में काम करने वाली महिला वकीलों के लिए। उन्होंने इस बात पर ख़ास बल दिया है कि वे महिला वकील, जो किसी ऑफिस से सम्बद्ध हैं, अपने वरिष्ठ पुरुष साथी को लाभ पहुँचाने के लिए तय स्लॉट नहीं माँग सकतीं। कहने का तात्पर्य यह है कि इस नीति का दुरुपयोग न हो, इसका भी विषेश ध्यान रखा गया है। इस पहल के बारे में सर्वोच्च न्यायालय की वकील अमिता जोसफ का कहना है कि यह वक़्त की माँग है कि बार में महिला वकीलों की भागीदारी बढ़ाने के लिए लचीली नीतियों व विकल्पों को वरीयता दी जाए। न्यायिक कामकाजी घंटे युवा महिला वकीलों की राह में बाधक भी हो सकते हैं। क्योंकि जब बच्चों की ज़रूरतें उनके पेशेवर काम से टकराती हैं, जैसे कि अभिभावक-अध्यापक मीटिंग आदि का वक़्त। यह नीति एकल माँओं के लिए, जिन्हें अपने बच्चे भी पालने हैं और काम भी करना है; वरदान है। युवा महिला वकीलों को ऐसी नीतियों व पहलों की दरकार है।

दरअसल न्यायालय में स्वतंत्र वकालत करने वाली युवा महिला वकीलों के सामने कई चुनौतियाँ होती हैं। वे क़ानून की पढ़ाई करने के बाद अपने करियर को आगे ले जाने के लिए मेहनत करना चाहती हैं; लेकिन इसके साथ ही उन पर शादी करने का पारिवारिक व सामाजिक दबाव भी होता है। शादी के बाद माँ बनने का दोगुना दबाव होता है। फिर माँ बनने के बाद पुरुष प्रधान समाज में बच्चे के देखरेख की अधिकांश ज़िम्मेदारियाँ भी उसके कंधों पर होती हैं। मदुरै पीठ की एक महिला वकील टी. सैयद अम्मा ने एक अंग्रेजी के एक दैनिक अख़बार को बताया कि इस तरह की पहल युवा माँ वकीलों को केवल एक राहत ही नहीं प्रदान करती, बल्कि उनके भीतर एक विश्वास भी पैदा करती हैं कि वे माँ बनने के बाद अदालत में अपनी प्रैक्टिस जारी रख सकती हैं। इस नीति के कारण बहुत-सी युवा महिला वकील, जिन्होंने बच्चे को जन्म देने के बाद पै्रक्टिस छोड़ दी थी; उनके लौट आने की सम्भावना को बढ़ा दिया है।

दरअसल महिला वकीलों की ऐसी आवाज़ें ऐसी पहल के महत्त्व को दर्शाती हैं। ग़ौरतलब है कि सामान्य तौर पर महिला वकीलों के लिए एक पेशेवर वकील बनने की राह पुरुषों की तुलना में अधिक कठिन है। समाज अपने लैंगिक पूर्वाग्रहों के चलते उनकी तर्क क्षमता पर भरोसा ही नहीं करता। उसके दिमाग़ में वकालत पुरुषों का पेशा है, वाली सोच बहुत गहरी बैठी हुई है।

दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति रेखा पाली को एक मर्तबा एक मामले की सुनवाई के दौरान एक पुरुष वकील ने सर कहकर सम्बोधित किया, तो न्यायमूर्ति ने कहा- ‘मैं सर नहीं हूँ। मैं उम्मीद करती हूँ कि आप इस अन्तर को पहचान सकते हो।’ सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश सुजाता मनोहर ने एक कॉन्फ्रेंस में बताया था कि जब वह न्यायालय में प्रैक्टिस करती थीं, तब उनके पुरुष सहकर्मी उनसे कहते थे कि वह न्यायालय परिसर में अपने लिए एक अच्छा पति तलाशने आयी है।

न्यायालय का माहौल भी अक्सर महिला वकीलों के लिए अनुकूल नहीं होता। बार काउंसिल के सदस्य ही उन्हें सम्मान नहीं देते। उनकी राय को अक्सर दबाने का जतन किया जाता है। अगर कोई महिला वकील अदालत में ऊँची आवाज़ में अपनी दलीलें देती है, तो उसकी अलोचना की जाती है; जबकि पुरुष ऐसा करते हैं, तो यह उनकी ताक़त मानी जाती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि अब लड़कियाँ क़ानून की पढ़ाई में दिलचस्पी दिखा रही हैं और लॉ कॉलेज के आँकड़े इसकी तस्दीक़ करते हैं। लॉ ग्रेजुएशन में लड़कों व लड़कियों की संख्या लगभग बराबर है; लेकिन ग्रेजुएशन के बाद क़ानून की पढ़ाई करने वालों में लड़कों की संख्या अधिक है। देश में क़रीब 17 लाख वकीलों ने अपनी पंजीकरण कराया हुआ है, इसमें लड़कियों की संख्या महज़ 15 फ़ीसदी है। युवा कामकाजी महिला वकीलों के लिए न्यायालय परिसर में क्रैच (मध्यटेक) की सुविधा उनकी कई दिक़्क़तों को दूर कर सकती है। लेकिन इस दिशा में देश में बहुत-ही धीमी गति से काम हो रहा है। यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय में ही 2018 में क्रैच की सुविधा प्रदान की गयी और दिल्ली उच्च न्यायालय में तो इसी मई महीने से ही क्रैच की सुविधा शुरू हुई है।

महिला वकीलों को उनके पेशे में आगे बढऩे के लिए प्रोत्साहित करने के लिए न्यायाधीश जी.आर. स्वामीनाथन सरीख़ी कई पहलों / रियायतों की ज़रूरत है। मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमणा ने एक कार्यक्रम में कहा था कि क़ानून व न्यायपालिका में पेशेवर महिलाओं की बहुत कमी है। क़ानून के पेशे को महिलाओं का स्वागत करना चाहिए और यह भी याद रखना चाहिए कि महिला वकीलों को अपने पेशे में भी बहुत संघर्ष करना पड़ता है। बहुत-ही कम महिलाएँ शीर्ष पर पहुँच पाती हैं और वहाँ भी उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इस समय सर्वोच्च न्यायालय में 33 न्यायाधीश हैं, उसमें से चार महिलाएँ हैं और यह आज़ाद भारत के इतिहास में रिकॉर्ड है। चार महिला न्यायाधीशों के नाम हैं- इंदिरा बनर्जी, हिमा कोहली, बेला एम. त्रिवेदी और बीवी नागरत्ना।

अटकलें हैं कि बी.वी. नागराज सर्वोच्च न्यायालय की अगली मुख्य न्यायाधीश हो सकती हैं और अगर वह बनती हैं, तो वह भारत की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश होंगी। देश के 25 उच्च न्यायालयों में 713 न्यायाधीश हैं, जिनमें महिला न्यायाधीश 94 हैं यानी महज़ 13.18 फ़ीसदी। मद्रास उच्च न्यायालय में 13 महिला न्यायधीश हैं, और यह संख्या देश में सबसे अधिक है। इसके बाद दिल्ली है, जहाँ 12 न्यायाधीश हैं। फिर तेलगांना है, जहाँ 10 न्यायाधीश हैं। ओडिसा, राजस्थान, सिक्किम, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड उच्च न्यायालय में एक-एक महिला न्यायाधीश हैं। मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा, बिहार और उत्तराखण्ड के उच्च न्यायालयों में एक भी महिला न्यायाधीश नहीं है। निचले न्यायालयों में महिला न्यायधीशों की संख्या कम है; लेकिन उतनी नहीं, जितनी कि उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय में है। निचले न्यायालयों में भर्ती प्रवेश परीक्षा से होती है, जबकि उच्च न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय में ऐसा नहीं होता। कई ऐसे राज्य भी हैं, जिन्होंने निचले न्यायालयों में इसके लिए आरक्षण प्रणाली अपनायी हुई है। वहीं असम, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा व राजस्थान में निचले न्यायालयों में महिला न्यायिक अधिकारियों की तादाद भी क़रीब 40 से 50 फ़ीसदी है। भारत उन देशों की सूची में आता है, जहाँ कामकाजी महिला श्रम सबसे कम है। सरकारी सर्वे भी यही कहते हैं और निजी संस्थान भी यही इशारा करते हैं। ऐसे में युवा कामकाजी महिलाओं को श्रम बल से जोड़े रखना एक बहुत बड़ी चुनौती है। न्यायाधीश जी.आर. स्वामीनाथन ने इस दिशा में जो पहल की है, चाहे उससे लाभान्वित होने वाली महिलाओं की संख्या सीमित ही है। पर उनके अनुभव जब दस्तावेज़ की शक्ल में सामने आएँगे, तो ऐसी पहल के दूरगामी असर का आकलन करना आसान होगा।

झारखण्ड में पेंशन पर रार

सरकार के लिए आसान नहीं है पुरानी पेंशन लागू करने की राह

पुरानी पेंशन योजना लागू करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कर्मचारी धीरे-धीरे लामबंद हो रहे हैं। केंद्र सरकार पर कर्मचारी दबाव बना रहे हैं। उधर राजस्थान और छत्तीसगढ़ से पुरानी पेंशन योजना लागू करने की उठी बात देश के अन्य राज्यों तक पहुँच रही है। नतीजन इस पर राजनीति भी ख़ूब हो रही है। राज्य की सरकारों पर भी इसका दबाव बढ़ता जा रहा है। झारखण्ड भी इससे अछूता नहीं है। यहाँ राज्यकर्मियों ने पुरानी पेंशन योजना लागू करने के लिए सरकार पर दबाव बना रखा है। दबाव में फँसे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पिछले दिनों 15 अगस्त तक पुरानी पेंशन योजना लागू करने की घोषणा कर दी है। अब अधिकारीगण घोषणा को अमलीजामा पहनाने के लिए माथापच्ची कर रहे हैं। जबकि ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि पुरानी पेंशन योजना लागू करने की डगर आसान नहीं है। अगर मामले को सही तरीक़े से नहीं सँभाला गया, तो भविष्य में राज्यकर्मी क़ानूनी दाँव-पेंच में फँस सकते हैं। पेंशन के मामले में न्यायालय की शरण लेना मजबूरी बन सकती है।

कब बन्द हुई पुरानी पेंशन योजना?

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने पुरानी पेंशन योजना की जगह नयी पेंशन योजना को लागू करने का ऐलान किया था। इसके अनुसार 01 अप्रैल, 2004 के बाद जो भी सरकारी नौकरी में आये, उन्हें नयी पेंशन योजना से जोड़ा गया।

नयी पेंशन योजना को शुरू में कुछ राज्यों नें नहीं माना; लेकिन धीरे-धीरे अधिकतर राज्यों ने इसे अपना लिया। हालाँकि नयी पेंशन योजना लागू होने के कुछ साल बाद ही इसका विरोध शुरू हो गया। इस विरोध का राजनीतिक दलों ने $फायदा उठाना शुरू किया। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, राजस्थान समेत कई राज्यों में राजनीतिक दलों ने चुनावी घोषणा में पुरानी पेंशन योजना को बहाल करने का वादा करने लगे।

राज्यकर्मी इसे लेकर धीरे-धीरे लामबंद होने लगे और सरकार पर लागू करने के लिए दबाव बढऩे लगा। झारखण्ड के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। वर्तमान हेमंत सोरेन सरकार ने चुनाव पूर्व राज्यकर्मियों से पुरानी पेंशन योजना लागू करने का वादा किया था। हेमंत सोरेन की सरकार दिसंबर, 2019 में बनी। अब ढाई साल बाद सरकार पर इसे लागू करने के लिए दबाव बढ़ गया है।

पेंशन जयघोष महासम्मेलन

झारखण्ड में लगभग 1.87 लाख राज्यकर्मी हैं। सन् 2004 से पहले नियुक्त हुए कर्मी, जो पुरानी पेंशन योजना में हैं; उनकी संख्या 63,800 है। 01 अप्रैल, 2004 या उसके बाद सेवा में आये कर्मियों की संख्या 1.27 लाख है। जबकि मौज़ूदा में 1.70 लाख पेंशनभोगी कर्मी हैं।

झारखण्ड की राजधानी रांची के ऐतिहासिक मोरहाबादी मैदान में राज्यकर्मी पुरानी पेंशन की माँग को लेकर आन्दोलन कर रहे थे। पिछले दिनों इसी क्रम में पेंशन जयघोष महासम्मेलन के तहत हज़ारों की संख्या में राज्य कर्मी जुटे। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने यहाँ ऐलान किया कि सरकार पुरानी पेंशन योजना राज्य में 15 अगस्त से पहले लागू कर देगी। अगली बार योजना को लागू करने के मौक़े पर कार्यक्रम में शामिल होंगे।

नयी पेंशन योजना के क़ानूनी पेच

छत्तीसगढ़ और राजस्थान ने पुरानी पेंशन योजना को लागू कर दिया है। झारखण्ड सरकार ने इसका अध्ययन कराया। वहाँ की सरकार ने पुरानी पेंशन योजना तो लागू कर दी; लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ है। मामला अभी भी फँसा हुआ है।

झारखण्ड के वित्त विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, राष्ट्रीय पेंशन योजना के लिए पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (पीएफआरडीए) का गठन किया गया है। इसके लिए एक्ट भी बनाया गया है। राज्य सरकार और पीएफआरडीए के बीच समझौता भी हुआ है। नयी पेंशन योजना के लिए बने एक्ट और राज्य सरकार व पीएफआरडीए के साथ हुए समझौते के तहत नयी पेंशन योजना को बीच में छोड़कर निकलने का कोई क़ानूनी प्रावधान नहीं है। दूसरी सबसे बड़ी समस्या है कि कर्मियों के वेतन से कटौती और सरकार द्वारा दी गयी राशि की वापसी। सन् 2004 से अब तक लगभग राज्यकर्मियों के 17,000 करोड़ रुपये नयी पेशन योजना के तहत दिये गये हैं। यह राशि अगर वापस नहीं होगी, तो राज्य सरकार के लिए पुरानी पेंशन योजना को लागू करना कठिन होगा। राज्य सरकार के पास 17,000 करोड़ रुपये अपने मद से देने के लिए राशि नहीं है। नतीजतन नयी पेंशन योजना से निकलने के लिए पीएफआरडी और राज्य सरकार के बीच आपसी सहमति ज़रूरी है। नहीं तो मामला क़ानूनी दाँव-पेंच में फँस सकता है।

वित्त विभाग के अधिकारियों की मानें अगर नयी पेंशन योजना को जबरन छोड़कर पुरानी में जाने से मामला लिटिगेशन में भी फँस सकता है। सरकार को न्यायालय जाने की ज़रूरत पड़ सकती है।

केंद्र से मदद की उम्मीद कम

ऐसा नहीं कि पुरानी पेंशन योजना लागू करने का दबाव केवल राज्य सरकार पर है। कर्मी केंद्र सरकार पर भी दबाव बना रहे हैं। देश भर से दिल्ली तक में आन्दोलन किया गया है और केंद्र सरकार से लगातार पुरानी पेंशन को लागू करने की माँग की जा रही है। हालाँकि केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि पुरानी पेंशन योजना बहाल करने का फ़िलहाल कोई इरादा नहीं है। लोकसभा में पूछे गये एक सवाल के जवाब में सरकार ने कहा था कि पुरानी पेंशन योजना को फिर से बहाल करने का कोई भी प्रस्ताव सरकार के विचाराधीन नहीं है। यानी राज्यों को पुरानी पेंशन योजना में लौटने और जमा राशि की वापसी में केंद्र सरकार से फ़िलहाल मदद की उम्मीद कम ही है।
पेंशन पर राजनीति पड़ेगी भारी!

सरकारी कर्मी किसी भी राजनीतिक दल के लिए वोट बैंक के हिसाब से बड़ा महत्त्व रखते हैं। लिहाज़ा सरकारी कर्मियों के मामले को लेकर राजनीति भी ख़ूब होती है। पिछले आठ साल से पेंशन को लेकर भी राजनीति हो रही है। मगर पेंशन की राजनीति दोधारू तलवार है। जानकारों की मानें, तो देर-सवेर राजनीतिक दलों को इसका ख़ामियज़ा भुगतना होगा। राज्य सरकार की वित्तीय स्थिति गड़बड़ा सकती है। साथ ही कर्मियों को भी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

झारखण्ड, छत्तीसगढ़, राजस्थान जैसे राज्य जहाँ चुनाव पूर्व राजनीतिक दल ने पुरानी पेंशन योजना लागू करने का वादा किया और बाद में सरकार बनने पर दवाब में लागू करना पड़ रहा है। वहाँ राह में कई रोड़े आने वाले हैं। जबरन पुरानी पेंशन को लागू कर क़ानूनी लड़ाई में मामला फँसा, तो फ़ैसला किस पक्ष में जाएगा? यह कहना मुश्किल है। दूसरी बात अगर क़ानूनी लड़ाई न लड़कर राज्य सरकार अपने मद से एनपीएस में जमा राशि को कर्मियों को देगी, तो राज्य पर वित्तीय संकट आएगा। अगर मामले को छत्तीसगढ़ और राजस्थान की तरह भविष्य में निपटारे के आधार पर छोड़कर लागू कर दिया गया, तो रिटायर करने वाले कर्मियों पर संकट आएगा। क्योंकि अगर कर्मिंयों की सेवानिवृत्ति तक मामला नहीं निपटा, तो उनकी पेंशन की कुछ राशि एनपीएस में, और कुछ राशि पुरानी पेंशन में रहेगी। ऐसी स्थिति में पेंशन भुगतान में समस्या होगी। सम्भव है कि कर्मियों को व्यक्तिगत क़ानूनी लड़ाई लडऩी पड़े। झारखण्ड में अभी तक इन झंझावतों से निकले का रास्ता नहीं मिला है। मामला पेचीदा है और लटका हुआ है। जिस आसानी से पुराने रास्ते लौटने की घोषणा की गयी, उतनी आसानी से लौटना सम्भव नहीं है।

नयी और पुरानी पेंशन योजना में अन्तर

 जीपीएफ की सुविधा।
 पेंशन के लिए वेतन से कटौती नहीं।
 सेवानिवृत्ति पर निश्चित पेंशन यानी अन्तिम वेतन का 50 फ़ीसदी गारंटी।
 पूरी पेंशन सरकार देती है।
 सेवानिवृत्ति पर ग्रेच्युटी (अन्तिम वेतन के अनुसार) में 16.5 माह का वेतन।
 सेवाकाल में मृत्यु पर डेथ ग्रेच्युटी की सुविधा जो सातवें वेतन आयोग ने 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये कर दी।
 सेवाकाल में मृत्यु होने पर आश्रित को पारिवारिक पेंशन एवं नौकरी।
 हर छ: माह बाद महँगाई भत्ता, जीपीएफ से ऋण लेने की सुविधा।
 जीपीएफ निकासी (रिटायरमेंट के समय) पर कोई आयकर नहीं।
 सेवानिवृत्ति के बाद मेडिकल भत्ता, सेवानिवृत्ति के बाद मेडिकल बिलों की प्रतिपूर्ति।


“वित्त विभाग पुरानी पेंशन स्कीम में लागू करने पर काम कर रही है। इसे कैसे लागू किया जाए, इसके लिए रास्ता निकाला जा रहा है। अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुँचा गया है। किसी नतीजे पर पहुँचने के बाद ही कैबिनेट मंज़ूरी समेत अन्य प्रक्रियाओं को पूरा किया जा सकेगा।”
अजय कुमार सिंह
प्रधान सचिव, वित्त विभाग

नयी पेंशन योजना

 जीपीएफ की सुविधा नहीं है।
 वेतन से प्रतिमाह 10 फ़ीसदी कटौती।
 निश्चित पेंशन की गारंटी नहीं।
 यह पूरी तरह शेयर बाज़ार व बीमा कम्पनियों पर निर्भर होगी।
 नयी पेंशन बीमा कम्पनी देगी। यदि इसमें कोई समस्या आती है, तो पेंशन धारक को बीमा कम्पनी से ही लडऩा पड़ेगा।
 सेवानिवृत्ति के बाद मेडिकल भत्ता बन्द, मेडिकल बिलों की प्रतिपूर्ति नहीं होगी।
 पारिवारिक पेंशन खत्म।
 लोन की कोई सुविधा नहीं (विशेष परिस्थितियों में जटिल प्रक्रिया के बाद ही केवल तीन बार रिफंडेबल लिया जा सकता है)
 सेवानिवृत्ति पर अंशदान की जो 40 फ़ीसदी राशि वापस मिलेगी, उस पर आय कर (इनकम टैक्स) लगेगा।
 पेंशन स्कीम पूरी तरह शेयर बाज़ार पर पर आधारित, जो जोखिम पूर्ण हो सकता है।
 महँगाई व वेतन आयोग का लाभ नहीं मिलेगा।

कहीं श्रीलंका की राह पर तो नहीं भारत!

भारत की लगभग 3.8 बिलियन (380 करोड़) अमेरिकी डॉलर की मदद के बावजूद श्रीलंका उबर नहीं सका। खाद्य पदार्थों, दवाओं से लेकर पैसे तक की बड़ी भारतीय मदद उसे आर्थिक संकट से उबार नहीं सकी। चीन ने श्रीलंका को डुबोया, तो भारत ने अपना पड़ोसी धर्म निभाया। पर श्रीलंका की सरकार ने ही जनता से धोखा किया था, फिर उसे कौन बचा सकता था?

जब गाड़ी पलटने को आती है, तो सबसे पहले ड्राइवर कूदकर भागता है। लेकिन यह तभी होता है, जब ड्राइवर अनुभवी नहीं होता। श्रीलंका में सरकार चलाने वाले अनुभवहीन थे या नहीं थे, यह तो नहीं पता; पर यह सब जानते हैं कि लम्बे समय से घोटालों और अय्याशी की दलदल में फँसे महिंदा राजपक्षे भी श्रीलंका की आर्थिक गाड़ी के पलटने के दौरान इसी तरह कूदकर फ़रार हो गये। अब उनके बड़े भाई और श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे भी भाग खड़े हुए।

दरअसल यह सदियों से सोयी जनता के जागने के चलते हुआ। क्योंकि ग़ुस्से में आगबबूला जनसैलाब का डर उन्हें जान का दुश्मन और मौत का साया लगा। मौत से हर कोई भागता है, चाहे कितना भी पैसे वाला और ताक़तवर क्यों न हो। यही हुआ, जब जनता ने राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के आधिकारिक आवास पर धावा बोला, तो उन्हें जान बचाकर भागने की सूझी। इससे पहले उन्हें देश की फ़िक्र नहीं थी। होती, तो अपने छोटे भाई से भाई का रिश्ता नहीं निभाते, बल्कि आगे बढ़कर सज़ा देते। यह तो होना ही था।

दोषियों को बचाकर राजा भी बहुत दिनों तक बचा नहीं रह सकता। अगर गोटबाया श्रीलंका की ग़ुस्साई जनता से बचकर नहीं भागे होते, तो सम्भवत: वे उसके ग़ुस्से का शिकार होते। जिस तरह भीड़ ने महिंदा राजपक्षे की तरह रानिल विक्रमसिंघे के घर को भी फूँका, उससे तो यही ज़ाहिर है। रानिल के इस्तेमाल की माँग यह बताती है कि अब श्रीलंका की जनता का किसी शासन-प्रशासन पर भरोसा नहीं रहा। हालाँकि प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को देश का कार्यवाहक राष्‍ट्रपति बना दिया गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री पद से अपना इस्तीफ़ा देने की बात भी कही, ताकि ऑल पार्टी सरकार के लिए रास्ता खुल सके। गोटबाया इस्तीफ़े पर हस्ताक्षर करके फ़रार हो चुके हैं। देश क़र्ज़ में डूबा हुआ है और अब बिना सरकार के चल रहा है। सम्भव है वहाँ कोई नया योग्य व्यक्ति देश की बाग़डोर सँभाले, यदि वह 113 सांसदों का समर्थन हासिल कर ले तो। श्रीलंका और इंटरनेशनल मोनेटरी फंड (आईएमएफ) के बीच क़र्ज़ पर भी बातचीत हो रही है। देश में आपातकाल लागू है।

बस तीन साल पहले ही श्रीलंका को एक उभरती हुई अर्थ-व्यवस्था माना जा रहा था। ठीक भारत की तरह। देखने वाली बात यह है कि भारत में भी बहुत कुछ वैसा ही हो रहा है, जैसा श्रीलंका में हुआ था। तो क्या भारत में भी आने वाला समय संकट भरा है? यहाँ के नेताओं के लक्षण तो ऐसे ही दिखते हैं। कई भारतीय उद्योगपति विकट क़र्ज़ में डूबे हैं। सबसे अधिक क़र्ज़ हाल ही में भारत के सबसे अमीर, बल्कि एशिया के सबसे अमीर गौतम अडानी हैं। दर्ज़नों उद्योगपति करोड़ों-करोड़ों रुपये लेकर फ़रार हो चुके हैं। कई बैंक डूब चुके और कई संकट में हैं। स्विस बैंक में काला धन बढ़ता ही जा रहा है। देश में शिक्षा का स्तर बढऩे के बजाय घटा है।

सामान्य लोगों की आय कम हो रही है और महँगाई दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। देश में अमीरों की पूँजी बढ़ रही है। दो बार कोयला संकट होने का हल्ला हो चुका है। बेरोज़गारी दर बढ़ चुकी है। रुपया डॉलर के मुक़ाबले कमज़ोर होता जा रहा है। अगर अन्य पड़ोसी देशों की बात करें, तो नेपाल और पाकिस्तान के भारत से भी बुरे हालात हैं। वहाँ भी श्रीलंका की तरह ही संकट कभी भी पैदा हो सकता है। जनता का विद्रोह बड़ी-बड़ी सत्ताओं को उखाड़कर फेंक देती है, जिससे बड़े-बडे तानाशाहों का ग़ुरूर काफ़ूर हो जाता है। कुर्सी के लिए देश की जनता में फूट डालने का यही नतीजा निकलता है। इससे भारत को भी सीख लेनी चाहिए। जिस तरह काठ की हाँडी बार-बार चूल्हे पर नहीं चढ़ती, उसी प्रकार भ्रम और छल की सत्ता लम्बे समय तक नहीं रहती। भारत सरकार के लिए यह वक़्त श्रीलंका से सबक़ लेकर जनहित में काम करने का है, न कि लोगों को धर्म में उलझाकर केवल अपनी सरकार बनाने की सोचने का।

एक ब्रेक लें कोहली

प्रशंसकों को पक्का भरोसा, मज़बूत वापसी करेंगे विराट

विराट कोहली ऑफ फार्म हैं। कुछ महीने से नहीं, ढाई साल से। क्या कोहली को अपनी फार्म वापस लाने और मानसिक रूप से तैयार करने के लिए ख़ुद को छ: महीने के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से दूर कर लेना चाहिए? विराट क्रिकेट के दिग्गज हैं और जानते हैं कि उन्हें क्या करना है। लेकिन यह भी सच है कि क्रिकेट के जानकार और उनके असंख्य प्रशंसक मानते हैं कि कोहली को नये सिरे से क्रिकेट मैदान में मज़बूत वापसी करनी चाहिए। विराट के इस ख़राब प्रदर्शन का कारण उनका मशीन बन जाना भी है; क्योंकि वह लगातार क्रिकेट खेले हैं।

यहाँ सवाल यह भी है कि क्या कोहली जैसा दिग्गज और अनुभवी खिलाड़ी मानसिक रूप से दबाव में जा सकता है? उनकी फार्म का इतने लम्बे समय तक ख़राब रहना ख़ुद उनके जैसे क़द के खिलाड़ी के लिए चिन्ता का कारण होगा; लेकिन यहाँ एक और सवाल यह है कि नम्बर तीन पर खेलने के लिए देश में इतने खिलाड़ी हैं कि आसानी से कोहली की जगह पा सकते हैं। लिहाज़ा उनके प्रशंसकों में यह भी चिन्ता है कि कोहली के लिए ज़्यादा दिन तक ख़राब प्रदर्शन के कारण टीम में बने रहना आसान नहीं होगा। उनके आलोचक तो अभी से यह बात कहने लगे हैं।

इंग्लैंड के ख़िलाफ़ पाँचवें टेस्ट में कोहली भले बदक़िस्मत रहे। लेकिन दिग्गज वही होता है, जो हार की धूल झाड़कर जल्द ही उठ खड़ा होता है। कोहली में अभी काफ़ी क्रिकेट है और उनसे अपेक्षा की जाती है कि अपना विराट रूप दिखाकर नयी ताक़त के साथ मैदान में उतरेंगे। बैटिंग में बेहतर प्रदर्शन न करने के बावजूद आज भी कोहली की मैदान में ऊर्जा देखने लायक है। कैच वह छोड़ते नहीं, बल्कि असम्भव को भी वह कैच में बदल देते हैं। भारतीय खिलाडिय़ों की बात करें, तो हमने देखा है कि कपिल देव से लेकर सचिन तेंदुलकर जैसे दिग्गज भी एक समय अपने करियर में ख़राब फार्म से जूझे थे। दुनिया में ऐसे बहुत उदाहरण हैं कि जब लगता था कि खिलाड़ी अब ख़त्म हो गया। लेकिन उन्होंने ऐसी वापसी की कि दुनिया ने दाँतों तले उँगलियाँ दबा लीं।

खिलाड़ी कोहली अभी 33 साल के हैं और कुछ और साल की क्रिकेट अभी उनमें बा$की है। ऐसे में कोहली के लिए ज़रूरी है कि वह एक छोटा ब्रेक लें और नयी ऊर्जा के साथ फिर मैदान में लौटें। खिलाडिय़ों के लिए ऐसी रणनीति ज़रूरी होती है। इसका कारण यह है कि उन्हें बहुत-से दबावों से गुज़रना होता है। कोहली ऐसे दबावों से गुज़रे हैं; क्योंकि तीनों फार्मेट की कप्तानी का बोझ वर्षों उन्होंने ढोया। लगातार क्रिकेट खेली और जीत-हार के दबाव झेले। निश्चित ही इसका असर उनके प्रदर्शन पर पड़ा है।

कोहली का बल्ला हाल के आईपीएल सीज़न में भी ख़ामोश ही रहा। उनकी ख़राब फॉर्म का यह दौर ढाई साल से जारी है। हाल में वरिष्ठ क्रिकेटर रवि शास्त्री ने भी सुझाव दिया था कि कोहली को कुछ ववक़्त के लिए ब्रेक लेना चाहिए। उन्होंने तो कोहली को आईपीएल के 2022 के सीज़न से हट जाने की भी सलाह दी थी। हालाँकि कोहली ने यह सीज़न खेला। विराट लम्बे ववक़्त से लगातार क्रिकेट खेल रहे हैं। वह आईपीएल में सबसे ज़्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज़ हैं। लेकिन इसके बावजूद पिछला सीज़न उनके लिए कुछ ख़ास नहीं रहा, भले इस बार उन्होंने ख़ुद को कप्तानी के बोझ से मुक्त कर लिया था।

शास्त्री विराट को ब्रेक लेने की सलाह देते हुए इसके कारण भी बताते हैं। उनके मुताबिक, विराट ने लगातार क्रिकेट खेला है। शास्त्री कहते हैं- ‘विराट के लिए ब्रेक ले लेना ही बुद्धिमानी होगा। उन्होंने कई साल तक सभी फॉर्मेट की कप्तानी की। कभी-कभी सन्तुलन बनाना पड़ता है। अंतरराष्ट्रीय करियर को लम्बा करने के लिए आईपीएल जैसे टूर्नामेंट को छोडऩा बेहतर $फैसला होता। आप 14-15 साल से लगातार खेल रहे हैं। लम्बा खेलने के लिए आपको वह रेखा खींचनी होगी, जहाँ ऑफ सीज़न में आप एक ब्रेक लेकर नये सिरे से शुरुआत करते हैं।’

विराट को ख़राब फॉर्म का ख़ामियाज़ा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) की रैंकिंग में भी झेलना पड़ा है। वह हाल के महीनों में टेस्ट की बल्लेबाज़ी रैंकिंग में लगातार नीचे हुए हैं, जबकि डेढ़ साल पहले तक वह टॉप-5 में थे। अब उनकी टेस्ट रैंकिंग 10वीं है। ओडीआई में भी वह अब तीसरे नंबर पर हैं, जबकि टी20 में उनकी रैंकिंग 21वीं है, जो काफ़ी नीचे है। यह आँकड़े जुलाई के पहले ह$फ्ते के हैं। जो विराट आज से ढाई साल पहले टेस्ट में 27 शतक और एक दिवसीय में 43 शतक (कुल मिलाकर 70 शतक) बना चुके थे, वह आज भी वहीं खड़े हैं। उस समय लग रहा था कि विराट सचिन के 100 शतक का रिकॉर्ड तोड़ देंगे। लेकिन जैसे ही वह ऑफ फार्म हुए, उनका आँकड़ा यहीं रुक गया। भारत का यह दिग्गज संघर्ष करना जानता है; लिहाज़ा उम्मीद है कि उनके प्रशंसक मैदान में फिर उनका जलवा देखेंगे।

फॉर्म खोने के कारण

कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि अलग-अलग खिलाडिय़ों में फॉर्म खोने के अलग-अलग कारण होते हैं। किंग कोहली के मामले में कहा जाता है कि किसी शॉट को $गलत खेलने और उसमें सुधार न कर पाने के कारण वह वर्तमान में दिक़्क़त झेल रहे हैं। जैसे यह माना जाता है कि एक समय कोहली जिस एक ही गेंद पर तीन अलग-अलग शॉट खेल सकते थे, उसी गेंद को आज वह मिडिल करने में दिक़्क़त महसूस कर रहे हैं।

उन्हें हाल के महीनों में हमने 20 और 50 के बीच रन बनाने के लिए जूझते हुए देखा है। जबकि यही कोहली थे कि हम मैदान में उनसे शतक की पक्की उम्मीद करते थे और वह शतक ठोकते भी थे। लेकिन हाल के महीनों में वह एक ही तरह के शॉट खेलते हुए आउट हुए हैं या एक ही गेंदबाज़ ने उन्हें बार आउट किया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह एक तरह का मानसिक पैटर्न है, जिसमें एक ही जैसी चीज़ एक ही तरीक़े से घटती है। विराट के साथ ऐसा हो रहा है। यह भी देखा गया है कि रन न बनाने के दबाव के कारण आजकल विराट क्रीज पर पहुँचते ही तेज़ शॉट खेलकर अपना आत्मविश्वास मज़बूत करने की कोशिश करते हैं, जो एक तरह का मानसिक कारण है। वह दिखाना चाहते हैं कि वह फ्लॉप या ऑफ फार्म नहीं हैं। लेकिन वास्तव में वह ऑफ फार्म हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे में विराट के लिए ज़रूरी यह है कि वह क्रीज पर ज़्यादा समय बिताएँ और फिर आक्रमण करें।

तमाम चीज़ों के बावजूद विराट एक ‘विराट’ खिलाड़ी हैं। एक ख़राब दौर भले कुछ लम्बा रहा हो, पर यह उनके सुनहरे करियर और उनकी प्रतिभा पर सवाल खड़ा नहीं करता। वह क्रिकेट के विचारक हैं। इसलिए सभी मानते हैं कि वह एक दमदार वापसी करेंगे और मैदान पर फिर उनका जलवा होगा।

“यह समझना चाहिए कि कुछ चीज़ें नियंत्रित नहीं की जा सकती हैं। आपके पास केवल वही चीज़ें हैं, जिन पर आप काम कर सकते हैं, जो कि मैदान पर और जीवन में भी कड़ी मेहनत से होती हैं। मैं मैदान पर जो कुछ भी करता हूँ, वह मेरे लिए विकास का एक चरण है। मेरी ड्राइव कभी ख़त्म नहीं होगी। जिस दिन मेरी ड्राइव चली जाएगी, मैं यह गेम नहीं खेलूँगा।’’
विराट कोहली
क्रिकेटर

मखमली रस्सी

मनुष्य बड़ा भावुक होता है। परन्तु मनुष्य से अधिक निर्दयी भी कोई नहीं है। ये दोनों लक्षण हर मनुष्य में होते हैं। अलग बात है कि जिसमें भावुकता अधिक होती है, उसमें निर्दयता कम होती है; तथा जिसमें निर्दयता अधिक होती है, उसमें भावुकता कम होती है। परन्तु यह कला हर व्यक्ति को नहीं आती कि उसे कहाँ भावुक होना चाहिए और कहाँ निर्दयी बन जाना चाहिए। यही वजह है कि मनुष्य को जहाँ भावुक होना चाहिए, वहाँ वह निर्दयी हो जाता है और जहाँ निर्दयी होना चाहिए, वहाँ भावुक हो जाता है।

वास्तव में अधिकतर लोगों की ये दोनों अवस्थाएँ अपने-पराये का भेद करते हुए उजागर होती हैं। यही कारण है कि अधिकतर लोग न्यायसंगत व्यवहार नहीं करते। ये लोग अपनी तथा अपनों की ग़लतियों पर परदा डालने का प्रयास करते हैं, तो दूसरों की ग़लतियों का बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार-प्रसार करते हैं। यहाँ तक कि कई बार कुछ लोग बिना ग़लती के भी दूसरे को दण्डित करने की कोशिश में रहते हैं। सामने वाले को सिर्फ़ इसलिए बदनाम करते हैं, क्योंकि उन्हें उस व्यक्ति से अकारण ही चिढ़ होती है।

आजकल तो हाल यह है कि अगर कोई सच बोलता है, तो लोग उसका खुलकर या छिपकर विरोध करते हैं। अगर मामला दूसरे धर्म से जुड़ा हो या कोई समतावादी-मानवतावादी हो, या फिर दूसरे धर्म का व्यक्ति हो, तो यह घृणाग्नि और अधिक धधकने लगती है। भले ही सामने वाले से कोई लेना-देना न हो। आजकल अलग-अलग धर्मों के लोगों में जिस तरह से वैमनस्यता बढ़ती जा रही है, वह इसी घृणाग्नि का परिणाम है। परन्तु लोग शायद नहीं समझ रहे हैं कि यह घृणाग्नि भवष्यि में किसी भी धर्म को मानने वालों के लिए हितकर नहीं होगी। आजकल दुनिया में हर धर्म में कुछ लोग ऐसे हैं, जो अपने-अपने धर्म के लोगों को धर्म के नाम पर एक भावनात्मक अधर्म-चक्र में फँसाकर भड़का रहे हैं, ताकि वे लोग दूसरे धर्म के लोगों पर हमलावर हो सकें, और धर्म के इन ठेकेदारों की दूकान चलती रहे।

लोग लड़ते-मरते हैं, तो लड़ते-मरते रहें; इससे उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। लेकिन जो लोग अपने इन पूज्यनीयों अर्थात् धर्म के ठेकेदारों के कहने पर अपने धर्म और कथित रूप से अपने ईश्वर या देवता / पैगम्बर / दूत की रक्षा के लिए ख़ून-ख़राबा करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, वे यह भी नहीं जानते कि इसकी अनुमति न उनका धर्म देता है और वे जिस ईश्वर / देवता / पैगम्बर / दूत को मानते, न वे इसकी अनुमति देते हैं। लेकिन फिर भी लोग घृणा, रक्तपात व वैनस्य करने से बाज़ नहीं आते।

आज के दौर में जिस तरह लोग लगातार कट्टर होते जा रहे हैं, उससे यह तो स्पष्ट दिख रहा है कि आने वाला समय पूरी दुनिया के लिए अत्यधिक घातक साबित हो सकता है; विशेषकर भारत के लिए। वर्तमान समय में जिस तरह से छोटी-छोटी बातों पर कट्टरपंथी लोग निर्दोषों का रक्त बहा रहे हैं, अगर इस पर रोक नहीं लगायी गयी, तो ये आग और तूल पकड़ सकती है।

ऐसे में आवश्यक है कि सरकार तथा क़ानून व्यवस्था देखने वाले विभाग उत्पातियों तथा रक्तपात करने वालों को कड़ी-से-कड़ी सज़ा दें। न केवल उन्हें सज़ा दें, बल्कि इस तरह की घटनाओं के पीछे जो लोग हैं, उन्हें भी खोजकर हत्या करने वालों से अधिक कठोर सज़ा दें। क्योंकि अगर यह नहीं किया गया, तो कट्टपंथियों और उनके पीछे परदे में छिपकर षड्यंत्र रचने वाले और अधिक घातक हो जाएँगे। इससे अधिक आवश्यक यह है कि किसी भी धर्म के किसी भी व्यक्ति को किसी दूसरे के धर्म में हस्तक्षेप करने, उसे कोसने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। फिर भी लोग अगर अनैतिकता तथा अत्याचार पर उतरें, तो सरकार और प्रशासन का काम है कि उन्हें रोके।

यह सच है कि लोग धार्मिकता की आड़ में रचे जा रहे षड्यंत्रों को नहीं समझते। न ही वे यह समझते हैं कि जिस कट्टरता के खोल में रहकर वे क्रोध की आग के अपने भीतर सुलगा रहे हैं, वह आग एक दिन उन्हें तथा उनके ही कुल को जलाकर राख कर देगी। इसीलिए उन्हें समझाना होगा कि कट्टरता न तो किसी भी धर्म का हिस्सा है और न ही यह किसी भी धर्म में बर्दाश्त की जानी चाहिए।

वास्तव में धर्म लोगों को आपस में बाँधे रखने की एक ऐसी मखमली रस्सी है, जो उपदेशों के ज़रिये उन लोगों को बाँधे रखती है, जो उसे पसन्द करते हैं या उस धर्म में जन्म लेते हैं। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति उसमें बँधे रहने के लिए बाध्य अथवा दूसरे धर्म के प्रति अराजक होने के लिए स्वतंत्र है। आज भारत में जिस प्रकार विभिन्न धर्मों एवं विभिन्न विचारों के लोग रहते हैं, उन्हें मानवता रूपी रस्सी से बाँधकर ही इस महान् देश को सुरक्षित व मज़बूत बनाया जा सकता है। मैं बड़ा, तू छोटा; मैं महान्, तू निकृष्ट; मैं ऊँच, तू नीच की अवधारणा इस देश को खोखला और कमज़ोर कर देगी। महान् बनने के लिए हमें दूसरों के प्रति भावुक और अपने धर्मपालन के लिए तपस्वी व कठोर होना पड़ेगा।

विराट कोहली को वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ टी-20 सीरीज में आराम

आफ फार्म चल रहे दिग्गज खिलाड़ी विराट कोहली को वेस्ट इंडीज़ के खिलाफ 29 जुलाई से शुरू हो रही 5 मैचों की टी-20 सीरीज़ के लिए नहीं चुना गया है। विराट कोहली के साथ जसप्रीत बुमराह को भी आराम दिया गया है। स्पिनर आर अश्विन की टी20 टीम में वापसी हुई है।

वेस्टइंडीज के खिलाफ पांच मैचों की इस टी20 सीरीज के लिए टीम इंडिया का गुरुवार को ऐलान किया गया। कोहली और बुमराह को जहाँ आराम दिया गया है वहीं केएल राहुल और कुलदीप यादव को टीम में जगह मिली है। हालांकि, दोनों को फिटनस रिपोर्ट क्लीयर होने पर ही टीम में शामिल किया जाएगा।

दिग्गज स्पिनर रविचंद्रन अश्विन की टीम में वापसी हुई है। बता दें आर अश्विन टी20 वर्ल्ड कप के बाद भारत की टी20 टीम में नहीं चुने गए थे। रोहित शर्मा कप्तान रहेंगे जबकि हार्दिक पांड्या, ऋषभ पंत टीम में शामिल हैं।

भारत-वेस्टइंडीज के बीच यह सीरीज 29 जुलाई से शुरू होगी। उससे पहले वनडे सीरीज खेली जाएगी। वनडे सीरीज का पहला मैच 22 जुलाई को खेला जाएगा।

टी20 टीम – रोहित शर्मा, इशान किशन, केएल राहुल, सूर्यकुमार यादव, दीपक हुड्डा, श्रेयस अय्यर, दिनेश कार्तिक, ऋषभ पंत, हार्दिक पंड्या, रवींद्र जडेजा, अक्षर पटेल, आर अश्विन, रवि बिश्नोई, कुलदीप यादव, भुवनेश्वर कुमार, आवेश खान, हर्षल पटेल और अर्शदीप सिंह।

वनडे शेड्यूल – पहला वनडे 22 जुलाई, दूसरा 24 जुलाई और तीसरा 27 जुलाई (सभी मैच पोर्ट ऑफ स्पेन)।

टी20 शेड्यूल – पहला मैच त्रिनिडाड 29 जुलाई, दूसरा 1 अगस्त सेंट किट्स, तीसरा 2 अगस्त सेंट किट्स, चौथा 6 अगस्त लॉडरहिल, पांचवां 7 अगस्त लॉडरहिल।

ज़ुबैर को 27 तक न्यायिक हिरासत में भेजा; एंकर रोहित मामले में सुनवाई अगले हफ्ते

हाथरस केस में फैक्ट-चेकर मोहम्मद ज़ुबैर को न्यायालय ने गुरुवार को 27 जुलाई तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया। उधर राहुल गांधी के बयान को अलग तरीके से पेश करने के मामले में जी न्यूज एंकर रोहित रंजन की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अगले हफ्ते सुनवाई करेगा।

जुबैर के खिलाफ उत्तर प्रदेश में कई एफआईआर दर्ज कराई गई हैं, जिसमें हाथरस में दो एफआईआर दर्ज हैं। ज़ुबैर की गिरफ्तारी के बाद 4 जुलाई को हाथरस में उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।

उधर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बयान वाले वीडियो को अलग तरीके से पेश करने के मामले में जी न्यूज के एंकर रोहित रंजन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर पुलिस की गिरफ्तारी से संरक्षण की जो मांग की है उसपर सर्वोच्च अदालत अगले हफ्ते सुनवाई करेगी।

जी हिंदुस्तान संपादक की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे ने सीजेआई एनवी रमना को बताया कि एंकर रोहित रंजन कोर्ट के आदेशों से सुरक्षित हैं, लेकिन संपादक को संरक्षण नहीं मिला है। पुलिस ने उनको समन भी भेजा है। सीजेआई ने कहा कि वो अगले हफ्ते इस मामले को देखेंगे।

नक्सल अभियान में 17 लोगों की जुडिशियल किलिंग की जांच से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियान के दौरान आदिवासियों की जुडिशियल किलिंग (न्यायेतर हत्या) की स्वतंत्र जांच करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। यह याचिका 2009 में दायर की गयी थी। सर्वोच्च अदालत ने याचिकाकर्ता को 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

मामले के सुनवाई पूरी होने के बाद 19 मई को सर्वोच्च अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। फैसले में सर्वोच्च अदालत ने इस चीज की जांच की भी अनुमति दी है कि कुछ लोग और संगठन न्यायालय का इस्तेमाल कथित तौर पर वामपंथी चरमपंथियों के बचाने के लिए तो नहीं कर रहे हैं।

न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार और 12 अन्य लोगों की तरफ से दाखिल याचिका पर गुरुवार को फैसला सुनाया। अदालत ने याचिकाकर्ता कुमार को चार हफ्ते के भीतर 5 लाख रुपये जुर्माना जमा करने का आदेश दिया। राशि जमा नहीं करने की स्थिति में कुमार के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

याद रहे याचिकाकर्ता को माओवादियों के साथ सहानुभूति रखने वाले के तौर पर जाना जाता है। उन्होंने ने दंतेवाड़ा में साल 2009 में तीन अलग-अलग घटनाओं में 17 आदिवासियों की हत्या के मामले में छत्तीसगढ़ पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग की थी। कुमार ने मौत को लेकर अपनी तरफ से रिकॉर्ड गए बयानों के आधार पर याचिका दायर की थी।

संसद में कुछ शब्दों और वाक्यों पर लगा बैन, विपक्ष ने शब्दों के चयन पर आपत्ति दर्ज की

लोकसभा सचिवालय ने असंसदीय शब्द 2021 शीर्षक के तहत कुछ शब्दों और वाक्यों की सूची तैयार की है, जिन्हें संसद की कार्यवाही के दौरान इस्तेमाल करना गलत और असंसदीय माना जाएगा। संसद के दोनों सदनों में शब्दों के इस्तेमाल को लेकर नई गाइडलाइन जारी की गई है।

बता दे इस सूची को सभी सांसदों को भेजा गया है और विपक्षी सासंद इसकी आलोचना कर रहे है। इन नए नियमों के मुताबिक गद्दार, घड़ियाली आंसू, जयचंद, शकुनी, भ्रष्ट जैसे कई शब्दों और मुहावरों पर रोक लगा दी गई है।

यदि कोई लोकसभा सचिवालय द्वारा जारी की नई बुकलेट के अनुसार ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करेगा तो वह अमर्यादित आचरण माना जाएगा और ये सदन की कार्यवाही का हिस्सा नहीं होंगे। विपक्ष ने शब्दों के चयन पर गहरी आपत्ति दर्ज की है।

तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने ट्वीट कर कहा कि, “कुछ ही दिनों में संसद का सत्र शुरू होने वाला है। सांसदों पर पाबंदी लगाने वाला आदेश जारी किया गया है, अब हमें संसद में भाषण देते समय इन बुनियादी शब्दों का उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। शर्म आनी चाहिए, दुर्व्यवहार किया, धोखा दिया, भ्रष्ट, पाखंड, अक्षम। मैं इन शब्दों का इस्तेमाल करूंगा। मुझे निलंबित कर दीजिए। लोकतंत्र के लिए लड़ाई लडूंगा।“

टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने भी ट्वीट कर कहा है कि, “आपके कहने का यह मतलब है कि अब मैं लोकसभा में यह भी नहीं बता सकती ही हिंदुस्तानियों को एक अक्षम सरकार ने कैसे धोखा दिया है, जिन्हें अपनी हिपोक्रेसी पर शर्म आनी चाहिए?”

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता जयराम रमेश ने ट्वीट कर कहा कि, “मोदी सरकार की असलियत बताने के लिए विपक्ष द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले सभी शब्दों को अब ‘असंसदीय’ माना जाएगा। अब आगे क्या विषगुरु?”

आपको बता दें, संसद की कार्यवाही के दौरान संसद के सदस्य कर्इ बार ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर जाते है जिन्हें सभापति या अध्यक्ष के आदेश से बाद में रिकॉर्ड या कार्यवाही से निकाल दिया जाता है।