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सोनाली फोगाट हत्याकांड, चुप्पी ने बढ़ाया सुधीर का हौसला

ख़ुद को शेरनी कहने वाली अभिनेत्री और राजनीतिक सोनाली फोगाट का बिना मुक़ाबले अन्त झकझोरने वाला रहा। सरेआम सरकारी अधिकारी की सैंडल से पिटायी करने वाली और बिग बॉस में महिला सहभागी को बाहर देख लेने की धमकी देने वाली और बिंदास अंदाज़ वाली सोनाली को मौत उसी भरोसेमंद व्यक्ति सुधीर सांगवान ने सहयोगी सुखविंदर से मिलकर दी, जिस पर उसे सबसे ज़्यादा भरोसा करती थी। सुधीर सांगवान के ख़िलाफ़ कोई बात नहीं सुनना चाहती थी। उसके कामकाज की सभी तरह की डील वही करता था।

वह उसी भरोसेमंद सुधीर की बड़ी साज़िश में फँस चुकी थी और चाहकर भी नहीं निकल सकती थी। वह लगभग दो-तीन साल से ख़ौफ़ के साये में जी रही थी। लोकलाज के भय से उसने अपने को निजी सहायक सुधीर सांगवान के सुपुर्द कर दिया। जैसा वह कहता सोनाली को वैसा ही करना पड़ता था। वह दुनिया के सामने चाहे जितना बोल सकती थी; लेकिन सुधीर के सामने वह गूँगी गुडिय़ा से ज़्यादा नहीं थी। वो क्या राज़ है, जिसके चलते वेतन पाने वाला नौकर अपनी मालकिन को कठपुतली की तरह नचाने लगा और एक दिन उसकी डोर काट दी?

सोनाली के भाई रिंकु ढाका ने पुलिस में दी शिकायत में कहा है कि सुधीर सांगवान ने सोनाली से दुष्कर्म के वीडियो बना रखे थे और उनकी आड़ में वह ब्लैकमेल करता आ रहा था। सवाल यह कि सुधीर ने ऐसा अश्लील और आपत्तिजनक वीडियो धोखे से बनाया और उसे वायरल कर उसे बदनाम करने की धमकी देकर ब्लैकमेल कर रहा था, तो सोनाली ने पुलिस में शिकायत क्यों नहीं की? अपनी ससुराल या मायके में इस ब्लैकमेल के बारे में कभी कुछ क्यों नहीं बताया? परिवार वाले सुधीर को अच्छा आदमी नहीं मानते थे, बावजूद इसके सोनाली उसे ठीक मानती थी। सोनाली के फोन भी सुधीर के पास ही रहते थे। वह जिससे चाहता बात कराता, जिसे नहीं चाहता, नहीं कराता। सोनाली की ज़िन्दगी अब पिंजरे में क़ैद बुलबुल जैसी हो गयी थी। यह सब सोनाली ने होने दिया और किसी को बताया नहीं यह उसकी ग़लती रही, जिसका ख़ामियाज़ा उसे अपनी मौत से चुकाना पड़ा। पहले पिता और अब माँ को खोने के बाद करोड़ों रुपये की सम्पत्ति की मालिकन बनी यशोधरा अकेले रह गयी है। हालाँकि ननिहाल और पिता के परिजन हैं; लेकिन उसकी ज़िन्दगी डगर कठिन ही रहेगी।

पहले धोखे से और फिर शायद आपसी सहमति से सुधीर के अश्लील वीडियो बनाने की बात सही हो सकती है, क्योंकि इसके बिना कोई ऐसा कारण नहीं कि नौकर मालिकन को अपने इशारे पर चला सके। करोड़ों की सम्पत्ति रखने वाली सोनाली संयुक्त परिवार में रहती थी। वह और उसकी वहन एक ही घर में ब्याही हुई है। सोनाली अपने ख़िलाफ़ साज़िश का ख़ुलासा कर सकती थी; लेकिन कभी इसकी हिम्मत नहीं जुटा सकी। गोवा में 22 अगस्त की रात उसने अपनी बहन को फोन कर अपने साथ कुछ अनहोनी होने की आशंका जतायी थी। उसने तीन दिन बात हिसार (हरियाणा) साज़िश का ख़ुलासा घर आकर करने की बात भी कही थी; लेकिन बात पूरी नहीं हो सकी और वही रात उसके लिए मनहूस साबित हुई। अगली सुबह उसकी मौत हो गयी।

ज़्यादातर आपराधिक घटनाओं के पीछे ज़र (धन-सोना) ज़ोरू (पत्नी) और ज़मीन कहीं न कहीं ज़रूर रहती है। इस घटना में इन तीनों को देखा जा सकता है। कहा भी जाता है कि जर, जोरू और ज़मीन ज़ोर की नहीं, तो किसी और की। यहाँ ज़ोर मतलब ताक़त से है और सुधीर सांगवान के पास यह थी। सोनाली के हिस्से में करोड़ों की ज़मीन भी थी। गुडग़ाँव में किराये के एक मकान के काग़ज़ातों में सुधीर ने सोनाली को पत्नी के रूप में दर्शाया भी है। सोनाली को भी इसकी जानकारी रही हो होगी; लेकिन उसने कभी इसका विरोध नहीं किया।

कुछ साल पहले सोनाली के पति संजय फोगाट की रहस्यमयी हालात में मौत हो गयी थी। इसे ख़ुदकुशी की घटना माना गया था। पति की मौत सोनाली के लिए गहरा धक्के जैसा था। आख़िर कब तक वह अकेलेपन में ज़िन्दगी व्यतीत करती? वह घरेलू महिला ज़रूर थी; लेकिन उसे लोगों में अपनी प्रतिभा दिखाने का जबरदस्त शौक़ था। उसने अपनी शुरुआत मीडिया से की और बाद में टिकटॉक वीडियो आदि के माध्यम से उसने अपने को उभारने की कोशिश की। सोशल मीडिया पर ग्लेमर्स वीडियो से उसकी आलोचना भी बहुत होती थी। हरियाणा जैसे पारम्परिक राज्य में जाट होने के नाते उसकी आलोचना भी होने लगी; लेकिन सोनाली ने उसकी कभी परवाह तक नहीं की। समुदाय में घूँघट की परम्परा को उसने निभाने से स्पष्ट मना कर दिया था। वह खुले विचारों की थी और मॉडलिंग आदि को ख़राब नहीं समझती थी। वीडियो, फ़िल्मों और शो आदि के माध्यम से उसे ख़ूब प्रचार मिला। इसके बाद उसने राजनीति को भी आजमाया और उन्हें पूरा सम्मान भी मिला। भाजपा महिला विंग में उन्हें अहम ज़िम्मेदारी दी गयी। हरियाणा में सन् 2019 में विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें आदमपुर विधानसभा से टिकट दी; लेकिन वह कांग्रेस के कुलदीप बिश्नोई से हार गयी।

इससे कुछ समय पहले रोहतक के सुधीर सांगवान उनके पास पार्टी कार्यकर्ता के रूप में सामने आया। वह सोनाली की टीम के साथ जुड़ गया और धीरे-धीरे उसने अपनी जगह तैयार कर ली। उसने सोनाली के भरोसेमंद लोगों को किनारे लगाना शुरू कर दिया और वह निजी सहायक बन गया। सोनाली को ऐसे बाहुबली की ज़रूरत भी थी, जिसके संरक्षण में वह बिना डर के अपनी राजनीतिक सक्रियता जारी रख सके। सुधीर ने इसी का फ़ायदा उठाया, क्योंकि वह जानता था कि सोनाली को उस जैसे व्यक्ति की ही ज़रूरत है। धीरे-धीरे उसने मालकिन का पूरा कामकाज सँभाल लिया। अब वह कहने को निजी सहायक था; लेकिन सोनाली पर उसका पूरा नियंत्रण हो चुका था। एलएलबी पास सुधीर के पत्नी और बच्चे भी हैं; लेकिन वह कभी-कभार ही अपने घर जाया करता था। ज़्यादातर समय सोनाली के साथ ही रहता था। एक साज़िश के तहत उसने फार्म हाउस में रखे नौकरों और खाना आदि बनाने वालों को हटा दिया। सब कुछ वही देखने लगा और सोनाली के कभी इसका विरोध तक नहीं किया। सोनाली के हिस्से में खेती की महँगी ज़मीन के अलावा मकान और कई दुकानें भी आती हैं। उसकी पुश्तैनी सम्पत्ति भी करोड़ों में है। सन् 2019 के दौरान चुनाव आयोग में दिये शपथ-पत्र के मुताबिक, सोनाली के पास क़रीब 2.75 करोड़ की चल और अचल सम्पत्ति है।

सोनाली की मौत के पीछे सुधीर सांगवान का मक़सद सम्पत्ति हड़पने का ही था। सोनाली के 10 करोड़ रुपये से ज़्यादा के फार्म हाउस को 5,000 रुपये महीने लीज पर लेने के काग़ज़ भी उसने बना रखे थे। सुधीर ने सोनाली को पुरानी मर्सिडीज तोहफ़े में धी; लेकिन यह उसके नाम दिल्ली के पते पर पंजीकृत थी। यह पता भी ग़लत था और बाद में यह गाड़ी उसने कहाँ ग़ायब कर दी, पता ही नहीं चला। कोई भी गाड़ी सोनाली के नाम पर नही है। सुधीर का मक़सद सोनाली को धीम ज़हर देकर किनारे लगाना था; लेकिन इससे पहले वह महँगी सम्पत्ति अपने नाम करा लेना चाहता था। पुश्तैनी सम्पत्ति हड़पना तो मुश्किल था; लेकिन करोड़ों रुपये का निवेश करा उसने काफ़ी कुछ अपने नाम करा लिया होगा।

बिना किसी कार्यक्रम के सुधीर सांगवान सोनाली के साथ अपने सहयोगी सुखविंदर के साथ गोवा जाना, हरियाणा पुलिस के गनमैन का साथ न होना साज़िश का हिस्सा है। गोवा पहले भी ये लोग जाते रहे हैं; लेकिन इस बार मक़सद कुछ और रहा होगा। ड्रग्स देने तैयारी पहले से थी। इसके लिए सुधीर और सुखविंदर ने 12,000 में होटल के कर्मी दत्ता प्रसाद गांवकर से मेथामफेटाइन ख़रीदा। सोनाली की 22 अगस्त की रात की अपनी बहन के साथ हुई बातचीत को सुधीर ने सुन लिया होगा। उसे राज़ के पर्दाफ़ाश होने का ख़तरा था। कर्लिज रेस्तरां में डांस के दौरान सोनाली सहज नहीं थी। बावजूद इसके सुधीर सांगवान उसे जबरदस्ती बोतल से कुछ पेय पदार्थ पिलाते हुए नज़र आता है। दो घंटे से ज़्यादा समय तक सोनाली को बाथरूम में क्यों रहने दिया? उसे अस्पताल तभी ले जाया गया, जब उसकी मौत हो चुकी थी।

मौत की वजह अस्पष्ट
प्रतिबंधित मेथामफेटाइन (एमडीएमए) शरीर में उत्तेजना पैदा करती है। ज़्यादा सेवन शरीर के सेंट्रल नर्वस सिस्टम को डैमेज करने से मौत हो सकती है। मौत की वजह फ़िलहाल यही है। अभी विसरा रिपोर्ट नहीं आयी है, उससे बहुत कुछ स्पष्ट हो सकेगा। हिसार के संतनगर घर और फार्म हाउस की सीसीटीवी फुटेज से कई राज़ खुलेंगे। सुधीर ने पुलिस जाँच में सोनाली के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहने की बात कही है। सहमति और असहमति के बीच क्या कुछ हुआ? यह पुलिस जाँच से स्पष्ट होगा। निजी सहायक का चौबीसों घेटे मालिकन के पास रहना बहुत कुछ संकेत करता है। करोड़़ों रुपये की सम्पत्ति के काग़ज़ात, एटीएम कार्ड, मोबाइल फोन, गाडिय़ों की चाबियाँ निजी सहायक के पास रहना बताता है कि वह सोनाली के लिए कितना भरोसेमंद व्यक्ति था? अभी लाखों-करोड़ों रुपये के लेन-देन का भी ख़ुलासा होगा। मौत को लेकर पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी स्पष्ट नहीं है।

अवैध मदरसों पर सख़्ती की तैयारी

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने कड़े निर्णयों के लिए चर्चा में बने रहते हैं। योगी सरकार दो के बनते ही वो बुलडोज़र नीति के लिए चर्चा में रहे वहीं अब कथित रूप से अवैध मदरसों पर कार्रवाई के लिए चर्चा में हैं। देखने वाली बात है कि योगी सरकार ने आज़ादी के अमृत महोत्सव के उत्सव में मदरसों को भी आदेश जारी किया था कि सभी मदरसों में 15 अगस्त को हर घर तिरंगा अभियान के तहत तिरंगा लहराने एवं राष्ट्रगान गाने समेत दूसरे सांस्कृतिक कार्यक्रमों की वीडियोग्राफी करनी होगी। मगर अब उन्हीं मदरसों का सर्वे कराया जा रहा है। जानकार कह रहे हैं कि योगी सरकार द्वारा वैध मदरसों और अवैध मदरसों की जाँच की जा रही है। इस जाँच में जो भी अवैध मदरसे पाये जाएँगे, उन पर योगी बाबा का बुलडोज़र चलेगा।

कुल मिलाकर प्रदेश में मदरसों के सर्वे का कार्य तीव्र गति से चल रहा है। सर्वे के कार्य में एसडीएम, बीएसए और डीएमओ कर रहे हैं। मदरसों की भूमि की वैधता एवं अवैधता का ब्योरा लेखपालों से माँगा जा रहा है। सरकार के अल्पसंख्यक मंत्रालय द्वारा इन अधिकारियों को आदेश दिया गया है कि वे इसी वर्ष 15 अक्टूबर तक सर्वे कार्य पूरा करके 25 अक्टूबर तक सरकार को रिपोर्ट उपलब्ध कराएँ। सूत्र बताते हैं कि अवैध अर्थात् ग़ैर-मान्यता प्राप्त मदरसों का सर्वे कुल 12 बिन्दुओं पर हो रहा है, जिसके लिए एक फार्म भरा जाएगा। इसमें मदरसे का नाम, मदरसे को संचालित करने वाली संस्था का नाम, मदरसे का स्थापना वर्ष, मदरसे की स्थिति का विवरण, मदरसे के भवन के उपयोग एवं उसमें छात्रों को दी जाने वाली सुविधाओं का विवरण, मदरसे में पढऩे वालों की संख्या का विवरण, मदरसे में कुल शिक्षकों की संख्या, मदरसे में लागू पाठ्यक्रम का विवरण, मदरसे की आय के स्रोत का विवरण, मदरसों में पढऩे वाले छात्र-छात्राएँ दूसरी जगह पढ़ते हैं अथवा नहीं, मदरसे निजी संस्था या समूह से सम्बद्ध हैं या नहीं एवं उल्लिखित बिन्दुओं पर मदरसा संचालकों की ओर से उपलब्ध करायी गयी जानकारी पर उनकी टिप्पणी। एक स्थानीय भाजपा नेता ने कहा कि सरकार ने अवैध मदरसों की जाँच आरम्भ कर दी है, शीघ्र ही उन पर कार्रवाई होगी और अवैध मदरसा संचालकों की मुश्किल बढ़ेगी। क्योंकि मदरसों में बच्चों में कट्टरपंथी सोच को बढ़ावा दिया जा रहा है।

इधर मदरसों के सर्वे को लेकर मुसलमानों में रोष है। मगर मुस्लिम नेताओं और कुछ लोगों को छोडक़र कोई भी मुस्लिम इस पर बातचीत नहीं कर रहा है। एआईएमआईएम प्रमुख असदउद्दीन ओवैसी कह रहे हैं कि मदरसे संविधान के अनुच्छेद-30 के अनुसार स्थापित हैं, तो उत्तर प्रदेश सरकार सर्वेक्षण क्यों करा रही है? वहीं एक मुस्लिम नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ मुसलमानों से दुश्मनी निकाल रहे हैं, जिसका असर यह हो रहा है समस्त प्रदेश के मुस्लिम डरे हुए हैं। केंद्र में भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। केंद्र सरकार भी मुसलमानों के साथ भेदभाव कर रही है। अब उत्तर प्रदेश में मदरसों पर असम की तरह बुलडोज़र चलवाया जाएगा। मगर इससे मुसलमान क़ुरान पढऩा नहीं छोड़ देंगे। योगी आदित्यनाथ नहीं जानते कि मुसलान अपने बच्चों को सबसे पहले क़ुरआन ही पढ़ाता है।

विदित हो कि प्रदेश में कुल 16,500 मदरसे सरकार से मान्यता प्राप्त हैं। इनमें से 560 मदरसों को सरकारी लाभ मिल रहा है तथा इनमें पढ़ाने वाले अध्यापकों को सरकार वेतन देती है। सूत्र बताते हैं कि इतने पर भी प्रदेश में हज़ारों मदरसे बिना मान्यता के चल रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि इन मदरसों के नियम, पाठ्यक्रम आदि को भी सार्वजनिक नहीं किया जाता है, जो कि अति आवश्यक है। देखना होगा कि क्या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मदरसों के मामले में क्या कार्रवाई करते हैं? सूत्र बताते हैं कि सरकार प्रदेश में वैध एवं विद्यालयों के अनुरूप मान्यता प्राप्त शैक्षणिक योग्यता प्रदान करने वाले मदरसों को चलने देगी, अन्य सभी को बन्द किया जाएगा।

हिमाचल में फिर आएगी भाजपा : खन्ना

इसी साल नवंबर में हिमाचल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसके चलते सभी पार्टियों, ख़ासकर भाजपा पूरे दमख़म से तैयारी में लगी है। दावा कर रहे हैं कि मोदी मैजिक के बलबूते भाजपा की सरकार ही दोबारा प्रदेश में बनेगी। ऐसे में हर किसी की ज़ुबान पर सवाल है कि क्या पिछले 35 साल से एक ही पार्टी की सरकार दोबारा न बनने के रिकॉर्ड को तोड़ते हुए भाजपा हिमाचल प्रदेश में लगातार दूसरी बार विजयी होगी? इसी को लेकर भाजपा के उपाध्यक्ष और हिमाचल के प्रभारी अविनाश राय खन्ना से अनिल मनोचा की बातचीत के अंश :-

परम्परागत रूप से हिमाचल में दो ध्रुवीय चुनावी मुक़ाबले होते रहे हैं। सबसे आख़िरी बार जब प्रदेश में कोई तीसरा मोर्चा (लोकतांत्रिक मोर्चा) बना था, तब उसे 4-5 फ़ीसदी ही मत मिले थे। उससे पहले दिवंगत सुख राम की हिमाचल विकास कांग्रेस (हिविकां) थी, जिसे क़रीब छ: फ़ीसदी मत मिले थे। जब मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने हिमाचल में प्रवेश करने की कोशिश की, तो लोगों ने उसे चुनावों में पूरी तरह ख़ारिज़ कर दिया था और वह महज़ एक ही सीट जीत सकी थी। इसके बाद कभी उन्होंने राज्य में कोशिश नहीं की। राज्य में आख़िरी बार सन् 1998 में गठबंधन सरकार बनी थी, जब भाजपा ने सुख राम की हिविकां से तालमेल किया था।

पूर्व सांसद और हिमाचल प्रदेश भाजपा प्रभारी अविनाश राय खन्ना ने हिमाचल भवन में ‘तहलका’ को बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 24 सितंबर को पहाड़ी राज्य में एक सभा को सम्बोधित करेंगे। इससे सत्तारूढ़ भाजपा के पक्ष में माहौल बनेगा। उन्होंने कहा कि मोदी फैक्टर और मौज़ूदा सरकार का प्रदर्शन राज्य में उस परम्परा को उलट देगा, जिसने पहले कभी एक ही पार्टी को चुनाव में नहीं दोहराया था। उन्होंने कहा कि हिमाचल इस बार नया इतिहास लिखेगा। आम आदमी पार्टी (आप) के मैदान में उतरने के प्रभाव के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि आप ज़्यादा आधार नहीं बना पाएगी। ज़मीनी स्तर पर उसकी मौज़ूदगी नहीं है। आप के दिल्ली मॉडल की हवा निकल चुकी है।

उन्होंने दावा किया कि अंतत: लड़ाई भाजपा और कांग्रेस के बीच ही होगी। हालाँकि उन्होंने यह भी कहा कि पुरानी पार्टी (कांग्रेस) अब एक विभाजित घर है। भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल भाजपा के हक़ में जनादेश के लिए घर-घर जा रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि लोग भाजपा के साथ जाएँगे, ताकि प्रदेश में डबल इंजन की सरकार चलती रहे।

पंजाब से ताल्लुक़ रखने वाले और राज्य में काफ़ी प्रभाव रखने वाले पूर्व सांसद खन्ना ने कहा कि लोग पंजाब में भाजपा की तरफ़ देख रहे हैं। क्योंकि मतदाताओं से किया एक भी वादा पूरा करने में आप विफल रही है। भाजपा, जिसने पहले शिरोमणि अकाली दल के कनिष्ठ सहयोगी के रूप में पंजाब का चुनाव लड़ा था; वह राज्य विधानसभा और लोकसभा की सभी सीटों पर चुनाव लडऩे के लिए स्वतंत्र है। यह जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने का अवसर और चुनौती होगी। पंजाब एक सीमावर्ती राज्य होने के कारण अपनी लम्बित समस्याओं को हल करने के लिए डबल इंजन द्वारा चलाया जाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि पंजाब में पार्टी का मज़बूत आधार है और यह जीवंत राज्य को देश में एक शीर्ष राज्य बनाकर अपने प्राचीन गौरव की ओर ले जाएगी। उन्होंने अपनी भूमिका को लेकर कहा कि भाजपा के अनुशासित सिपाही के रूप में वह पार्टी द्वारा उन्हें जो भी काम सौंपा जाएगा, करेंगे।

अयोग्य शिक्षक किये भर्ती

पंजाब के बाद हिमाचल विश्वविद्यालय के शिक्षकों की नियुक्ति जाँच के घेरे में

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा पंजाब में 1,158 सहायक प्रोफेसरों के चयन को रद्द करने के बाद पड़ोसी हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में हाल ही में संकाय की भर्ती जाँच के दायरे में आ गयी है। ऐसा लगता है मानो पंजाब में नियुक्तियों की ही तरह कहानी की पुनरावृत्ति हुई हो, जिसके लिए प्रक्रिया अक्टूबर, 2021 में राज्य में विधानसभा चुनाव से पहले शुरू हुई थी। हिमाचल में नवंबर, 2022 तक चुनाव होने जा रहे हैं।

पंजाब में राज्य के कॉलेजों में 1,158 सहायक प्रोफेसरों की भर्ती 19 साल बाद 2021 में की गयी थी। पदों का विज्ञापन 19 अक्टूबर, 2021 को निकाला गया था। 03 दिसंबर को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की भर्ती प्रक्रिया को आगे बढऩे से रोक दिया था। भर्ती मानदण्ड को चुनौती देने वाली याचिकाओं में आरोप थे कि मानदण्ड पूरी तरह मनमाने और भेदभावपूर्ण थे और केवल अतिथि संकाय, अंशकालिक और कॉलेजों में काम करने वाले अनुबंध शिक्षकों को कार्य अनुभव के बदले प्राथमिकता दी गयी थी। यह भी आरोप लगाया गया था कि 20 से 22 नवंबर तक आयोजित परीक्षा से पहले पंजाबी और गणित के प्रश्न पत्र सार्वजनिक हो गये थे।

आरोपों के दृष्टिगत उच्च न्यायालय ने 3 दिसंबर को नियुक्तियों पर रोक लगाने का आदेश दिया था। हालाँकि बाद में दायर याचिका में आरोप लगाया गया था कि नियुक्तियों पर रोक के आदेश का उल्लंघन किया गया था और उस रात चयन-पत्र जारी किये गये, जब उच्च न्यायालय द्वारा आदेश पारित किया गया था और कुछ में तो पिछली तारीख़ वाले मामले भी थे। उच्च न्यायालय ने 23 दिसंबर को राज्य सरकार को भर्ती से सम्बन्धित रिकॉर्ड सील करने और इसे मुख्य सचिव की हिफ़ाज़त में रखने का निर्देश दिया था।

आरटीआई में ख़ुलासा
अब स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) ने एक चौंकाने वाला ख़ुलासा करते हुए दावा किया है कि सतर्क छात्रों द्वारा हासिल की गयी 13,000 पेज की आरटीआई से ज़ाहिर होता है कि भर्ती प्रक्रिया फ़र्ज़ी थी और निर्धारित मानदंडों का उल्लंघन करके की गयी। छात्रों ने आरोप लगाया कि पिछले दो साल, जबसे देश कोरोना महामारी की चपेट में है, तबसे एचपीयू फैकल्टी सदस्यों के लिए फ़र्ज़ी भर्ती प्रक्रिया में शामिल था।

एसएफआई ने आरटीआई के ज़रिये क़रीब 145 चयनित शिक्षकों का रिकॉर्ड माँगा। छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय के जन-सूचना अधिकारी ने सूचना देने में देरी की। छात्रों ने आरोप लगाया कि अधिनियम के तहत पहली अपील करने के बाद भी उन्हें जानकारी नहीं दी गयी। राज्य सूचना आयोग के समक्ष दूसरी अपील के बाद जाकर छात्रों को 13,000 पृष्ठों की सूचना प्रदान की गयी। छात्रों ने दावा किया कि लगभग 26,000 रुपये ख़र्च करने और विश्वविद्यालय के जागरूक छात्रों, कर्मचारियों और शिक्षकों की सहायता लेने के बाद एसएफआई कार्यकर्ताओं और वकीलों ने यूजीसी के कुछ चयन मापदण्डों पर गहन शोध किया। छात्रों ने यह भी दावा किया कि 145 चयनित सहायक प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के प्रश्नपत्रों की जाँच के बाद क़रीब 70 फ़ीसदी अपात्र लोगों की भर्ती की गयी है। उन्होंने आरोप लगाया कि चयनित शिक्षकों को उनके प्रकाशित शोध पत्रों में अंक दिये गये, जो यूजीसी के सहकर्मी समूह में नहीं हैं; और जो प्रकाशित प्रश्न-पत्र की समीक्षा करने के लिए अधिकृत हैं।

इंटरनेशनल जर्नल ऑफ एनालिटिकल एंड एक्सपेरिमेंटल मॉडल एनालिसिस, वॉल्यूम-ङ्गद्यद्य अंक 01 जनवरी, 2020 में प्रकाशित कुछ पेपर का सन्दर्भ देते हुए छात्रों ने कहा कि एक ही पत्रिका में प्रकाशित संयुक्त पत्र पर दिये गये कुल 10 अंकों के मुक़ाबले केवल एक उम्मीदवार को 12.6 अंक दिये गये हैं। छात्रों ने इसे राज्य के उच्च शिक्षा में एक निम्नतम् बताते हुए कहा कि ऐसे शिक्षकों का चयन किया गया है, जिनकी पीएचडी डिग्री यूजीसी के नियमों के अनुरूप नहीं है।

नियमों की धज्जियाँ उड़ायीं
छात्रों ने कहा कि दो शोध पत्रों के अनिवार्य प्रकाशन के अलावा योग्यता की चार अन्य परतें हैं, ताकि सक्षम संकाय सदस्यों की भर्ती हो सके। पीएचडी उम्मीदवार की डिग्री नियमित तरीक़े से होनी चाहिए और पीएचडी थीसिस का मूल्यांकन कम-से-कम दो बाहरी परीक्षकों से होना चाहिए और ओपन पीएचडी उम्मीदवार की मौखिक परीक्षा आयोजित की जानी चाहिए थी। उम्मीदवारों को अपने पीएचडी के आधार पर कम-से-कम दो प्रश्न-पत्र प्रस्तुत करने चाहिए। यूजीसी या आईसीएसएसआर या ईएसआईआर या किसी समान एजेंसी द्वारा प्रायोजित या वित्त पोषित या समर्थित सम्मेलनों या सेमिनार में काम किया होना चाहिए। इन शर्तों की पूर्ति को सम्बन्धित विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार या डीन (शैक्षणिक मामले) द्वारा प्रमाणित किया जाना ज़रूरी है। छात्रों ने बताया कि जिन उम्मीदवारों ने नेट क्वालिफाई भी नहीं किया है और पीएचडी नहीं हैं, उन्हें एसोसिएट प्रोफेसर के पदों के लिए चुना गया है। तथ्य यह है कि आवश्यक पाँच शर्तों को पूरा नहीं करने वाले उम्मीदवारों का भी चयन कर लिया गया था।

शॉर्टलिस्ट किये गये उम्मीदवारों का नाम लिए बिना छात्र संगठन एसएफआई ने दावा किया कि कई को अंग्रेजी, हिन्दी, माइक्रोबायोलॉजी, बायो-साइंसेज, केमिस्ट्री, पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन, लॉ, गणित, जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन, सोशियोलॉजी, पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट में कथित तौर पर फ़र्ज़ी अनुभव हासिल करने के बाद फ़र्ज़ी प्रक्रिया के तहत शॉर्टलिस्ट किया गया था। कई शिक्षकों को उनके अनुभव के प्रमाण-पत्र दिये गये, जो शॉर्टलिस्टिंग अधिकारियों के समक्ष उनके स्वयं के प्रस्तुतीकरण का खण्डन करते हैं। सहायक प्राध्यापकों को 8 और 10 वर्ष के अध्यापन अनुभव के लिए 10 अंक दिये गये थे। हालाँकि शिक्षण अनुभव प्रमाण पत्र उनकी पीएचडी की अवधि (नियमित आधार पर किये गये) के साथ ओवरलैप होते हैं। जिन संस्थानों से ये प्रमाण-पत्र प्राप्त हुए हैं, उन्होंने वेतन पर्ची या वेतन पर्ची या वित्तीय प्रमाण भी जारी नहीं किया है।

सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई) के तहत एकत्रित जानकारी के अनुसार विभागीय शैक्षणिक समिति से कोई चर्चा नहीं हुई, जबकि जब भी कोई सीट बनती है, तो कार्यभार के आधार पर सम्बन्धित विभाग से हर तरह से प्रस्ताव तैयार किया जाता है। कुछ को आर्थिक रूप से कमज़ोर (ईडब्ल्यूएस) और ओबीसी प्रमाण-पत्रों के तहत चुना गया। हैरानी की बात यह है कि इस कक्षा में चयनित शिक्षकों ने लिखित में दिया कि आवेदन तक वह पिछले 7-8 साल से नियमित रूप से 15600-39100-60006 के वेतनमान पर अन्य संस्थानों में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में काम कर रहे थे।

एसएफआई ने सवाल किया कि यह जाँच का एक विषय है कि उन्हें ईडब्ल्यूएस प्रमाण-पत्र कैसे मिला। फिर कई शॉर्टलिस्ट किये गये उम्मीदवारों के पास निम्न में से कोई भी सम्पत्ति नहीं है, ग्रामीण क्षेत्रों में एक हेक्टेयर से अधिक की कृषि भूमि और शहरी क्षेत्रों में 500 वर्ग मीटर भूमि, ग्रामीण और शहरी आवासीय फ्लैट या क्षेत्रों में 2,500 वर्ग फुट से अधिक का घर।

शिक्षकों की नियुक्ति कार्यकारिणी द्वारा की जाती है; लेकिन इस मामले में ईसी की बैठक में प्रस्तावित मद में शिक्षकों के साक्षात्कार का परिणाम उसी दिन घोषित कर दिया गया। जबकि यह एक बहुत-ही महत्त्वपूर्ण बात है और उस पर उचित चर्चा के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जाना चाहिए।

यूआईआईटी में नियुक्तियाँ
ऐसे शिक्षकों का चयन किया गया है, जिनका टेली शीट में शैक्षणिक स्कोर 100 में से केवल 30, 32 और 40 है और दूसरी ओर प्रतिभाशाली और अनुभवी उम्मीदवारों की कथित रूप से अनदेखी की गयी है। यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (यूआईआईटी) का कामकाज प्रशासनिक और वित्तीय नियमों के ख़िलाफ़ कार्रवाई को लगातार बढ़ावा दे रहा है। कई प्रकार के शिक्षकों और ग़ैर-शिक्षण पदों का निर्माण, उनके विभाग की अकादमिक समिति, अध्ययन बोर्ड में निर्णय के बाद कथित तौर पर अकादमिक सर्कल की अनदेखी और उन्हें सीधे कार्यकारी परिषद् (ईसी) में ले जाना इसके बड़े उदाहरण हैं।

भर्ती प्रक्रिया में 80 और 20 अंक अन्तिम चयन में और अन्तिम मेरिट में 80 अंक अकादमिक अनुभव और प्रकाशन आदि के लिए और 20 अंक साक्षात्कार के लिए विभाजित किये गये थे। लेकिन एसएफआई ने आरोप लगाया कि चयन शत्-प्रतिशत साक्षात्कार के आधार पर किया गया। कई मामलों में अन्तिम चयन के लिए अकादमिक अनुभव और प्रकाशन के अंकों पर विचार ही नहीं किया गया था।

आपकी प्लेट में क्या है?

हाई ब्लड प्रेशर और तम्बाकू से भी ख़तरनाक है ग़लत खानपान

चाय के साथ बिस्कुट, नाश्ते में पराँठा, मक्खन और दूध, लन्च (दोपहर के भोजन) में रोटी-सब्जी, नाश्ते और लन्च के बीच में डिब्बाबन्द फ्रूट जूस और कोल्ड ड्रिंक्स इत्यादि। शाम की चाय में फिर तले-भुने स्नैक्स या फिर शाम को बाहर का जंक फूड, टिक्की-चाट, गोलगप्पे और रात को भारी-भरकम भोजन। आजकल एक आम भारतीय की जीवन-शैली में ऐसा ही प्रतिदिन का आहार शामिल है। ख़ासकर बच्चों की पसन्द जंक फूड, तो बड़ों का भारी-भरकम भोजन बन चुका है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किये गये सर्वेक्षण, शोध और अध्ययनों से पता चलता है कि देश में पौष्टिक आहार की कमी और भुखमरी के आँकड़े डराने वाले हैं। भारत की अर्थ-व्यवस्था जहाँ तेज़ी से आगे बढ़ रही है, वहीं खाद्य पदार्थों की आसमान छूती क़ीमतों से एक आम नागरिक की थाली में से पौष्टिक आहार कम हो रहे हैं।

वैश्विक पोषण रिपोर्ट-2021 के अनुसार, भारत उन 88 देशों में है, जो साल 2025 तक वैश्विक पोषण लक्ष्यों को पूरा करता नज़र नहीं आता। सन् 2010 के बाद ग़लत आहार के कारण होने वाली मौतों की संख्या में 15 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है। एक अध्ययन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर उच्च रक्तचाप और तम्बाकू से होने वाली मौतों से भी अधिक लोग ग़लत आहार की वजह से मरते हैं।

यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के हेल्थ मैट्रिक्स एंड इवोल्यूशन इंस्टीट्यूशन के डॉक्टर अशकान अफ़शीन का कहना है कि स्वास्थ्यवर्धक भोजन की कम मात्रा जैसे साबुत अनाज और स्वास्थ्य के लिए अहितकर जैसे मीठे पेय पदार्थ वैश्विक स्तर पर पाँच में से एक मौत के लिए ज़िम्मेदार हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2019-21 के अनुसार, भारत में लोगों की सेहत और पोषण के स्टेटस को लेकर कोई ख़ास सुधार नहीं है। विकिपीडिया के अनुसार, जीडीपी में 50 फ़ीसदी की बढ़ोतरी (2013) के बावजूद एक-तिहाई से ज़्यादा कुपोषित बच्चे भारत में हैं। एसएफएओ की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में लगभग 194.4 मिलियन लोग कुपोषित हैं। वैश्विक भुखमरी सूचकांक-2019 की रैंकिंग में भारत 117 देशों में से 102 में स्थान पर, जबकि वैश्विक भुखमरी सूचकांक-2020 में भारत 107 देशों में 94वें स्थान पर रहा है। वैश्विक भुखमरी सूचकांक-2021 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत 116 देशों की सूची में 101 में पायदान पर है। भुखमरी की तीव्रता स 27.9 फ़ीसदी है। कुपोषण के कारणों में अपर्याप्त भोजन, पौष्टिक तत्त्वों की कमी, आर्थिक कारण, धार्मिक कारण, जानकारी का अभाव और दोषपूर्ण पाचन है। वहीं इसके लक्षण झटपट भोजन करना, खेलने में अरुचि होना। अपच और क़ब्ज़ रहना, बच्चों में लम्बाई न बढऩा, वज़न कम होना, ख़ून न बनना आदि हैं।

पीजीआई चंडीगढ़ के डायटेटिक्स डिपार्टमेंट द्वारा सन्तुलित आहार की जागरूकता के लिए राष्ट्रीय पोषण माह के दौरान चंडीगढ़ के सेक्टर-10 के सरकारी स्कूल में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शीर्षक था- ‘पोषण भी, पढ़ाई भी।’ इसके तहत बच्चों को आहार के सभी पोषक तत्त्वों के बारे में बताया गया। हेल्दी टिफिन रेसिपी में न्यूट्री बाइट, सोया रैप, मल्टीग्रेन बनाना पैन केक, वेजिटेबल बाजरा उत्तपम, स्प्राउटेड कटलेट, मल्टीग्रेन वेजिटेबल सैंडविच बनाना सिखाया गया। विशेषज्ञों का कहना था कि पोषण शारीरिक विकास और अच्छे स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक है। विभाग की अध्यक्ष डॉ. नैंसी साहनी ने कहा कि लोगों को पता ही नहीं है कि आजकल वे क्या खा रहे हैं? जो प्लेट में रखा गया है, उसका स्रोत क्या है? कहाँ और कैसे बनाया गया है? ख़ासकर जॅमैटो, स्विग्गी के प्रति आज की पीढ़ी बिल्कुल भी जागरूक नहीं है कि ये हमारे मुँह में डाल क्या रहे हैं? जीवन शैली की ऐसी समस्याएँ, जो पहले प्रौढ़ावस्था में शुरू होती थीं, वो अब बचपन में हो रही हैं। यही वजह है कि आजकल युवा उम्र में ही हृदयाघात (हार्ट अटैक) के मामले बढ़ रहे हैं।

डॉ. नैंसी ने बताया कि पीजीआई में ज़्यादातर ऐसे रोगी आते हैं, जिनका खानपान ग़लत होता है। जैसे हृदय और मधुमेह (शुगर) के रोगी। या फिर उनका खानपान सन्तुलित व सही नहीं होता है। मेडिकल थेरेपी तब तक पूरी नहीं हो पाती, जब तक डाइट सही न हो। डाइट के प्रति सेंसिटाइज होने की सबको ज़रूरत है। जो लोग बाहर से तंदुरुस्त लगते हैं, देखने में आता है कि वे असल में तंदुरुस्त नहीं होते। इसलिए हमें पता होना चाहिए कि हमारी प्लेट में क्या है? उसका आधार (बेस) क्या है? कहाँ से आया है? कैसे बनाया गया है? क्या वो शुद्ध दालों, शुद्ध फलों, शुद्ब ताज़ा सब्ज़ियों, शुद्ध प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट्स आदि से तैयार है? बेशक हमारे देश में शाकाहारी लोग ज़्यादा हैं; लेकिन फिर भी उनमें मोटापा अधिक क्यों है? क्योंकि उनका ज़्यादा स्रोत कार्बोहाइड्रेट होता है। प्रोटीन स्रोत बहुत कम। हमारे नाश्ते में, लन्च में और डिनर में रोटी-सब्ज़ी है; लेकिन प्रोटीन कहाँ है? स्नेक्स जो हम खा रहे हैं, उनमें वसा (फैट) कितना है?

हमारा खानपान कैसे, किस समय क्या और किस तरह खाना चाहिए? यह सब पता होना चाहिए। अगर हम अपनी सुबह में चाय और बिस्कुट ले रहे हैं, तो ग़लत है। अगर चाय के नट्स ले रहे हैं, तो ठीक है। प्रोटीन की बात करें, तो 0.821 ग्राम, एक किलोग्राम के लिए। जितना शरीर का वज़न हो, उसी हिसाब से। अगर 50 किलो है, तो प्रोटीन की मात्रा 50 या 60 ग्राम होनी चाहिए। अगर नॉर्मल व्यक्ति है, तो वसा 25 से 30 ग्राम यानी पाँच-छ: चम्मच तेल या घी लिया जा सकता है। नाश्ते में अनाज, दूध, दही, सुबह में फल, दोहपहर के भोजन में फाइबर वाले खाद्य, जैसे- सलाद और कंपलेक्स कार्बोहाइड्रेट लेना ज़रूरी है। अगर सुबह नाश्ते में अकेले कॉर्नफ्लेक (भुने हुए मकई के दाने) खा लिये, तो उतना काफ़ी नहीं। वह सिर्फ़ कार्बोहाइड्रेट हो जाएगा। कंपलेक्स कार्बोहाइड्रेट, जैसे- चिल्ला, आटा, बाजरा, दलिया आदि ले सकते हैं।

जंक फूड, पैक्ड फूड, डिब्बाबंद जूस और कोल्ड ड्रिंक्स आदि स्वस्थ भोजन में नहीं गिने जाते। आज की तेज़ रफ़्तार जीवन शैली में शुद्ध और स्वादिष्ट परम्परागत भोजन को छोडक़र लोग फास्ट फूड के आदी हो चुके हैं, जिससे वे कई बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। आजकल लोगों में क़ब्ज़, मोटापा, थकान, तनाव, हृदय रोग, मधुमेह, ऑस्टियोपोरोसिस, फैटी लीवर, एनीमिया, कमज़ोरी, रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने जैसी बीमारियाँ आम हो चुकी हैं।

आयुर्वेद में भोजन के नियम

भोजन की हमारे शरीर और मन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका है। भोजन का हमारे शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसीलिए लोक भाषा में कहा जाता है कि जैसा अन्न वैसा मन। प्राचीन योगी आहार का महत्त्व भली-भाँति समझते थे। उन्होंने अनुभव किया था कि भोजन की आदतें शरीर और मन को सन्तुलित बना सकती हैं। हर व्यक्ति के लिए आदर्श आहार (आइडियल फूड) में अनाज, दुग्ध उत्पाद, फल, सब्ज़ियाँ, सूखे मेवे, शहद और पोषक जड़ी-बूटियों को शामिल किया जा सकता है, जिनके सेवन से अधिक सहनशक्ति और स्थायित्व प्राप्त होता है। ज़्यादा मसालों का सेवन स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं माना गया। ऐसा भोजन जो खट्टा, तला हुआ और भारी हो, योगाभ्यासी के लिए वर्जित माना जाता है। आयुर्वेद में भोजन ग्रहण करने के लिए तीन नियमों का निर्देश दिया गया है- हितभुक् यानी हितकारी भोजन करना। मितभुक् यानी सन्तुलित मात्रा में भोजन करना। ऋतभुक् यानी ऋतु के अनुसार भोजन करना।

इसके अलावा भोजन को ठीक से चबाकर खाना चाहिए। उचित मात्रा में पानी पीना रोग नाशक होता है। शान्ति से किया गया भोजन पौष्टिक और सुपाच्य होता है। योगाभ्यासी के लिए तीन वक़्त का भोजन आवश्यक माना गया है। प्रत्येक भोजन के समय व्यक्ति को पेट भर खाने की सलाह नहीं दी गयी है। आधा पेट भोजन करना चाहिए। एक-चौथाई पानी और एक-चौथाई हवा के लिए ख़ाली छोडऩा चाहिए। प्रत्येक भोजन के बीच अंतराल चार घंटे का होना चाहिए।

नफ़रत के सौदागर

कैच छूटने पर क्रिकेटर अर्शदीप सिंह को ख़ालिस्तानी कहना शर्मनाक

अपनी फ़िल्मों के लिए आमिर ख़ान को देश-विरोधी करार देकर उनकी फ़िल्मों के वहिष्कार की अपील की जाती है। अपने हक़ के लिए किसान जब आन्दोलन करते हैं, तो उन्हें ख़ालिस्तानी और दलाल बता दिया जाता है। क्रिकेट के एक मैच में दबाव भरे क्षणों के बीच जब युवा क्रिकेटर अर्शदीप सिंह से कैच छूट जाता है, तो उन्हें ख़ालिस्तानी और पाकिस्तान-समर्थक कहकर ट्रोल करके उनका हौसला तोड़ा जाता है। लेकिन एक गर्भवती महिला से रेप और उसके परिजनों की हत्या के दोषियों को सरकार की तरफ़ से जब छोड़ा जाता है, तो उनका फूलमालाओं से स्वागत कर उन्हें संस्कारी की उपाधि दी जाती है। क्या इन घटनाओं से दुनिया में हमारे देश को लेकर यह सन्देश नहीं जा रहा है कि यदि आप यहाँ बहुसंख्यक का हिस्सा नहीं हैं, तो आपकी हर ग़लती जानबूझकर किया गया अपराध है और आप देशद्रोही भी कहलाएँगे। और तो और अल्पसंख्यकों से मानवीय भूल हो जाना भी अपराध है; क्योंकि उन्हें हमेशा परफेक्ट दिखते रहना ज़रूरी है। लेकिन अगर आप बहुसंख्यक हैं, तो घृणित अपराध करके भी आप फूल-मालाओं से स्वागत के अधिकारी हैं। क्या यही न्यू इण्डिया है?

पूर्व कप्तान विराट कोहली और हरभजन सिंह जैसी हस्तियाँ हैं, जो पंजाब के युवा क्रिकेटर अर्शदीप सिंह के पाकिस्तान के साथ मैच में कैच छूट जाने और उसके बाद उनकी भयंकर क़िस्म की ट्रोलिंग होने के बावजूद उनका हौसला बनाये रखने के लिए उनके साथ दृढ़ता से खड़ी दिखती हैं। पूर्व क्रिकेटर आकाश चोपड़ा ने तो अपनी प्रोफाइल पिक्चर ही अर्शदीप की लगा दी। फ़िल्मी जगत से भी अर्शदीप को काफ़ी समर्थन मिला। लेकिन नफ़रत फैलाने वालों की फ़ौज इतनी बड़ी और संसाधनों से इतनी ज़्यादा सक्षम है कि पल भर में ही नफ़रत का ज़हर फैला देती है।

अर्शदीप की ट्रोलिंग समाज के एक ख़ास तबक़े अर्थात् सोशल मीडिया के नफ़रतियों की तरफ़ से शुरू हुई, और जल्द ही इसका कनेक्शन पाकिस्तान से जोड़ दिया गया। यदि मान लें कि अर्शदीप को ख़ालिस्तानी कहने के पीछे पाकिस्तान में बैठे कुछ लोगों की ही साज़िश थी, तब भी आप अपने देश के युवा खिलाड़ी अर्शदीप सिंह के साथ खड़े होते नहीं दिखे। यदि अर्शदीप को ख़ालिस्तानी कहने वाला मैसेज एक घंटे में ही हमारे देश के लाखों लोगों के पास पहुँच गया, तो ज़ाहिर है कि इसे वायरल करने के पीछे हमारे ही समाज के नफ़रती तबक़े का मक़सद था। याद कीजिए किसान आन्दोलन के दौरान किसानों को भी ऐसी ही घृणित शब्दों से इस नफ़रती ब्रिगेड ने बदनाम करने की भरपूर कोशिश की थी।

खिलाड़ी ख़राब प्रदर्शन के लिए ट्रोल होते हैं, यह कोई नयी और बड़ी बात नहीं। लेकिन उनके धर्म को देखकर उन पर नस्ली टिप्पणियाँ करना निश्चित ही बहुत ख़राब बात है। इसके दुष्परिणामों को लेकर सोचा नहीं जा रहा। एक खिलाड़ी, जो कैच छूट जाने के बाद ख़ुद ग्लानि महसूस कर रहा था, उसे ख़ालिस्तानी कहना क्या संकेत देता है? क्या यह प्रतिभा से भरे एक युवा खिलाड़ी की हिम्मत तोड़ देने की साज़िश नहीं है? वह भी कथित धार्मिक भावनाएँ भडक़ाकर अपने राजनीतिक साधने के लिए!

जिन आसिफ़ अली का कैच अर्शदीप से छूटा था, उनका विकेट बाद में अर्शदीप ने ही लिया। कह सकते हैं कि कैच छूटने की ग़लती उन्होंने उसी मैच में सुधार ली। लेकिन नफ़रतियों को तो अपना खेल खेलना था, उन्होंने जमकर खेला। कोई रोकने वाला नहीं था उन्हें। ट्रोलर्स ने अपने शब्दों से जैसा व्यवहार अर्शदीप से किया, उससे उनके परिजन भी काफ़ी चिन्तित हुए। यह एक अकेला उदाहरण नहीं है, जहाँ ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि अल्पसंख्यक ख़ुद को असुरक्षित महसूस करें। ऐसे अनेक उदाहरण हाल के समय में सामने आये हैं। निश्चित ही यह एक ख़तरनाक भविष्य का संकेत है।

अर्शदीप कैच छूटने से कितने शर्मिंदा और दु:खी थे, यह एक घटना से साबित हो जाता है, जब वह मैच के बाद पवेलियन लौटे, तो उन्होंने अपनी माता बलजीत कौर को गले लगा लिया और भावुक हो गये। निश्चित ही जब उन्होंने ख़ुद को ख़ालिस्तानी कहने वाले कमेंट देखें होंगे, तो उन्हें दु:ख हुआ होगा। हालाँकि बलजीत कौर ने कहा कि ग़लती किसी से भी हो जाती है। लोगों का काम है कहना, कहने दो; कोई बात नहीं। लोग अगर खिलाड़ी को बोल रहे हैं, तो उससे प्यार भी करते हैं। इस सबको हम सकारात्मक ले रहे हैं।

उसके पिता दर्शन सिंह ने कहा- ‘जो लोग अब आलोचना कर रहे हैं, वही लोग अर्शदीप सिंह को आने वाले समय में सिर-आँखों पर बैठाएँगे।’ बेशक एक पिता अपने युवा बेटे का हौसला बनाये रखने के लिए ऐसा कह रहे होंगे; लेकिन सच यह है कि देश में नफ़रतियों की ब्रिगेड से बेहतर की उम्मीद नहीं की जा सकती।

देश की एजेंसियों ने अर्शदीप सिंह के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा होने की जाँच भी शुरू की है। यह पता नहीं कि इस नफ़रती माहौल को बनाने में वास्तव में कौन गुनहगार है? लेकिन अर्शदीप को ट्रोल होता देख पाकिस्तान के खिलाड़ी मोहम्मद हफ़ीज़ भी उनके समर्थन में आगे आये। हफ़ीज़ ने घटना के बाद ट्वीट में लिखा- ‘सभी भारतीय टीम के प्रशंसकों से मेरा अनुरोध है कि खेल में हम इंसान होने के नाते ग़लतियाँ करते हैं। कृपया इन ग़लतियों पर किसी को अपमानित न करें।’

अर्शदीप सिंह को सोशल मीडिया पर ट्रोल करके निशाना बनाने के बीच यह ख़बर भी आयी कि विकीपीडिया पर अर्शदीप सिंह के पेज पर बड़ा बदलाव नजर आया और वहाँ पर अर्शदीप का ‘ख़ालिस्तानी’ संगठन से सम्बन्ध जोड़ दिया गया। ज़ाहिर है अर्शदीप के पेज से छेड़छाड़ हुई। यह भी कहा गया कि इस मामले में भारत सरकार ने कड़ा रुख़ अपनाया और आईटी मंत्रालय ने विकीपीडिया को इस मामले को लेकर नोटिस भेजकर उससे जवाब तलब किया है। इसके बाद विकीपीडिया ने अर्शदीप के प्रोफाइल को ठीक कर दिया।

भाजपा नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने तो इस मामले में फैक्ट चेकर मोहम्मद ज़ुबैर का ही हाथ बता दिया और दिल्ली पुलिस को चिट्ठी लिखकर ज़ुबैर को गिरफ़्तार करने की माँग कर डाली। सिरसा के आरोप के मुताबिक, पाकिस्तान ने ज़ुबैर को इस्तेमाल किया।

अर्शदीप का जुनून
बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि देश की टीम से खेलने के अपने जूनून को पूरा करने के लिए अर्शदीप ने पिता दर्शन सिंह का कनाडा जाने का सुझाव नहीं माना था। दरअसल साल 2017 में लगातार बेहतर प्रदर्शन के बावजूद अर्शदीप को बड़ा मौक़ा नहीं मिल पा रहा था। ऐसे में पिता ने बेटे के भविष्य की चिन्ता करते हुए उसे कनाडा शिफ्ट होकर नौकरी की सलाह दी, जहाँ उनके बड़े भाई पहले से हैं। लेकिन अर्शदीप को तो नीली जर्सी का जूनून था। उसने पिता से एक साल का समय माँगा। पिता राज़ी हो गये। आख़िर अर्शदीप का उसी साल पंजाब की अंडर-19 टीम में चयन हो गया। नीली जर्सी के प्रति अर्शदीप के जूनून को एक घटना से समझा जा सकता है। चोट के बाद अर्शदीप के रनअप में कमी आ गयी थी। कोच जसवंत राय के मुताबिक, अर्शदीप ने उनसे कार का एक टायर माँगा। फिर 15 दिन बाद ट्रक का टायर लाने को कहा। कबाड़ी की दुकान से जसवंत टायर लाये और उसे दे दिया। टायर ख़ुद से बाँधकर रनअप पर दौडऩे से कुछ ही दिन में अर्शदीप ने रनअप पर पुरानी गति हासिल कर ली। जब पंजाब की तरफ़ से खेलते हुए अंडर-23 में राजस्थान के ख़िलाफ़ अर्शदीप ने में हैट्रिक सहित आठ विकेट लिये, तो आईपीएल के फ्रेंचाइजी भी उनके दीवाने हो गये। अर्शदीप नीलामी में बेस प्राइस 20 लाख रुपये में किंग्स इलेवन पंजाब का हिस्सा बन गये। आईपीएल-2020 में अर्शदीप ने आठ मैचों में नौ विकेट, आईपीएल-2021 में 12 मैचों में 18 विकेट और आईपीएल-2022 में 14 मैचों में 10 विकेट लिये। आईपीएल के अब तक के अपने 37 मैच में अर्शदीप 40 विकेट ले चुके हैं। आज अर्शदीप अपने जूनून के चलते देश की टीम में हैं। उन्हें डेथ ओवर्स और यॉर्कर का मास्टर कहा जाता है।


“प्रेशर मैच में किसी से भी ग़लतियाँ हो सकती हैं। अर्शदीप सिंह अभी युवा हैं और धीरे-धीरे इन चीज़ों के बारे में सीख जाएँगे।’’
विराट कोहली
क्रिकेटर

लोगों का पागलपन

एक बार मैंने शास्त्रों और कई भाषाओं के विज्ञाता, लेखक, कवि एवं शिक्षक अपने बड़े गुरु जी डॉ. उमाकान्त शर्मा जी से पूछा- ‘गुरु जी! धर्मों और जातियों में लोगों का बँटवारा होना चाहिए? क्या यह उचित है?’ उन्होंने दो-टूक कहा- ‘सब पागलपान है।’ मैंने फिर पूछा- ‘गुरु जी! तो क्या हमें किसी से भेदभाव नहीं करना चाहिए?’ उन्होंने कहा- ‘जैसा व्यवहार आपका किसी के प्रति होगा, वह आपसे वैसा ही व्यवहार करेगा।’ गुरु जी की बात सुनकर मैंने एक निर्णय तो उसी दिन ले लिया कि किसी से भेदभाव नहीं करना है। अगर किसी के कर्म बहुत बुरे हों, तो उसका विरोध अलग बात है। हालाँकि धर्म और जाति एक तरह का पागलपन है, यह बात उस समय मेरी उतनी समझ में उतनी नहीं आयी, जितनी कि अब आती है।

गुरु जी के कथन को सरल रूप में मैंने कुछ इस प्रकार समझा कि जब सभी के अन्दर ईश्वर का अंश आत्मा के रूप में मौज़ूद है, जो कि एक ही है; तो फिर किसी से भेदभाव क्यों किया जाए? जब सभी के शरीर में गन्दगी भरी है। जब सभी में कोई-न-कोई कमी है, तो फिर किसी से द्वेष क्यों? जब सभी जन्म से ही शूद्र हैं और सभी के शरीर से नित्य मल निकलता रहता है, तो फिर कौन पवित्र और कौन अपवित्र? लेकिन वास्तव में लोगों ने नफ़रत को अपने मन में ठीक उसी तरह बैठा लिया है, जैसे किसी कुएँ में पानी की तलछटी पर गन्दगी बैठी होती है। लोगों के पवित्र मन में भेदभाव की गन्दगी का यह आलम है कि वे अपने से इतर धर्म के लोगों से बिना कारण के ही नफ़रत करते हैं। अगर उनके आसपास किसी दूसरे धर्म के लोग न हों, तो वे अपने ही धर्म के उन लोगों से नफ़रत करते हैं, जो उनकी जाति के नहीं होते। अगर उनके आसपास अपने धर्म की दूसरी जातियों के लोग भी न हों, तो वे अपनी ही जाति में गोत्रों के आधार पर भेदभाव करते हैं। और अगर उनके आसपास अपनी ही जाति के दूसरे गोत्रों के लोग न हों, तो वे अपनी ही जाति के लोगों से भेदभाव करते हैं। हद तो यह है कि अगर आसपास अपनी भी जाति के लोग न हों, तो परिवार के सदस्यों में ही मतभेद और भेदभाव दिखता है।

हर धर्म के अन्दर इसी तरह का भेदभाव साफ़ दिखता है। दुर्भाग्य यह है कि धर्म की दुहाई भी सब देते हैं, और धर्म पर चलते भी नहीं हैं। दुनिया में सबसे ज़्यादा जनसंख्या वाले ईसाई कहते हैं कि सब गॉड अर्थात् ईश्वर की सन्तानें हैं। गॉड ने ही सबको पैदा किया है। गॉड ही सबकी रक्षा करता है। गॉड सबका पालनहार है। अगर ऐसा है, तो ईसाई आपस में तीन धड़ों- कैथोलिक, ऑर्थोडॉक्स और प्रोटेस्टेंट में बँटे हुए क्यों हैं? उनमें जातिवाद क्यों है? वे दुनिया के बाक़ी लोगों से इतनी नफ़रत क्यों करते हैं? इसका अर्थ है कि ईसाई अपने ईश्वर की वाणी पर भरोसा नहीं करते, या फिर उन्होंने अपने धर्म को नहीं समझा है। अगर समझते, तो इतनी तुच्छ सोच नहीं होती।

इस्लाम धर्म की भी यही कहानी है। इस्लाम धर्म के लोग कहते हैं कि ख़ुदा ही सबसे बड़ा है। इस कायनात अर्थात् सम्पूर्ण सृष्टि पर उसी का हुक्म चलता है। उसी ने सभी को पैदा किया है। उसी की इच्छा से सब हो रहा है। अगर ऐसा है, तो इस्लाम धर्म को मानने वाले दूसरे धर्म के लोगों से भेदभाव क्यों करते हैं? दूसरे धर्म के लोगों से तो दूर की बात, ख़ुद इस्लाम को मानने वाले लोग आपस में बुरी तरह बँटे पड़े हैं। आज दुनिया का दूसरी सबसे ज़्यादा जनसंख्या वाला यह धर्म शिया, सुन्नी और इनकी दर्ज़नों उप शाखाओं तथा सैकड़ों जातियों में बँटा पड़ा है। क्या इस्लाम को मानने वाले ख़ुदा की इस बात पर यक़ीन नहीं करते कि सब उसी के बन्दे हैं?

दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी जनसंख्या द्वारा माने जाने वाला सनातन धर्म कहता है कि सम्पूर्ण सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने की है। सम्पूर्ण सृष्टि का पालन पोषण भगवान विष्णु करते हैं और सम्पूर्ण सृष्टि के संहारक भगवान शिव हैं। सनातन धर्म यह भी कहता है कि ईश्वर एक ही है। सब उसी की माया है। पूरे ब्रह्माण्ड में जो कुछ है, उसी का है। सभी प्राणी उसी की सन्तान हैं। अगर ऐसा है, तो सनातन धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोगों से द्वेष क्यों करते हैं? उनमें आपस में इतना भेदभाव क्यों है? एक धर्म में दर्ज़नों पन्थ, सैकड़ों जातियाँ और एक-एक जाति में दर्ज़नों-दर्ज़नों गोत्र कैसे बन गये? क्यों सनातन धर्मी अपने ही धर्म की यह बात नहीं मानते कि पूरा विश्व एक परिवार है, इसलिए सभी से प्रेम करो। इसी तरह शेष धर्मों और पन्थों के लोग दूसरे धर्मों को मानने वालों से तो भेदभाव करते ही हैं, अपने ही धर्म के लोगों से भी ख़ूब भेदभाव करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि या तो सभी धर्मों के मानने वाले अपने-अपने धर्मों की बातों पर भरोसा नहीं करते, या उन्हें ईश्वर में विश्वास नहीं है। या तो सब ईश्वर की ताक़त को पहचानते नहीं है, या ईश्वर को चुनौती दे रहे हैं। कहना ही होगा कि धर्म, पन्थ और जातियों को लेकर भेदभाव लोगों का पागलपन ही है। क्या कभी लोग इस पागलपन से बाहर निकल सकेंगे?

जान से मारने की धमकी के बाद बोले आज़ाद, खुदा कसम कभी भी डोवल से नहीं मिला

कांग्रेस से अलग होने के बाद वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद आजकल अपने गृह सूबे में नई पार्टी बनाने की संभावनाएं टटोल रहे हैं। एक कार्यक्रम में जब उन्होंने आतंकियों से हथियार छोड़ने की अपील की तो उन्हें यह कहकर जान से मारने की धमकी मिली है कि उन्होंने सूबे में आने से पहले गृह मंत्री अमित शाह और एनएसए अजित डोवल से मुलाकात की थी। अब आज़ाद ने सफाई दी है कि वे कभी डोवल से नहीं मिले।

आज़ाद ने हाल में यह भी कहा था कि जम्मू कश्मीर में अब धारा 370 कभी बहाल नहीं होगी। इसके बाद भी उनके खिलाफ कश्मीर में नाराजगी दिखी थी। हालांकि, उन्हें मिल रही धमकी और डोवल से उनकी मुलाकात को लेकर आज़ाद ने सफाई दी है। आज़ाद ने कहा – ‘मैं कभी भी अजित डोवल से नहीं मिला हूं। मैं खुदा की कसम खाता हूं। हां, मैं अमित शाह मिला हूं क्योंकि वह गृह मंत्री हैं और ये मुलाकात संसद में हुई थी।’

उनकी पुरानी पार्टी कांग्रेस पहले से ही उनपर हमलावर है और उन्हें भाजपा के इशारों पर नाचने वाला नेता बता रही है। कांग्रेस का कहना है आज़ाद ‘मोदी-फाईड’ हो गए हैं।

इस बीच आज़ाद को अब आतंकी धमकी मिली है। कश्मीर के अनंतनाग जिले के डाक बंगले में कल एक जनसभा में आजाद ने कहा कि उन्हें ऐसी जानकारी मिली है कि लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) से जुड़े ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी है।

आजाद ने कहा – ‘मैंने ऐसी रिपोर्ट के बारे में सुना है कि आतंकी मुझे मारने की धमकी दे रहे हैं। वे कह रहे हैं कि मैं यहां आने से पहले गृह मंत्री अमित शाह और एनएसए अजित डोवल से मिला था। लेकिन डोवल से मुलाकात की गलत है। जहाँ तक गृह मंत्री शाह से मिलने की बात है मैं विभिन्न दलों के नेताओं से मिलता हूं क्योंकि यह मेरे काम का हिस्सा है’।

समरकंद में आज पुतिन-मोदी भेंट; मोदी, चिनफिंग रात्रिभोज में नहीं हुए शामिल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो इस समय शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में हिस्सा लेने के लिए उज्बेकिस्तान के समरकंद में हैं, आज (शुक्रवार) रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भेंट करेंगे। इस बीच पिछली रात पीएम मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग औपचारिक रात्रिभोज सहित एससीओ के सम्मेलन पूर्व समूह के कार्यक्रमों में शामिल नहीं हुए। मोदी समरकंद पहुंचने वाले नेताओं में सबसे आखिरी नेता थे।

एससीओ के राष्ट्राध्यक्षों की 22वीं बैठक आज शुरू हो रही है। बता दें आठ देशों के इस समूह भारत, रूस, चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान शामिल हैं। इसकी स्थापना 2001 में चीन के शंघाई में हुई थी। पीएम मोदी संगठन के शीर्ष नेताओं की बैठक में शामिल होंगे।

इस आयोजन की पिछली रात की रात्रिभोज के बाद जारी अनौपचारिक तस्वीर में मोदी और चिनफिंग दिखाई नहीं दिए। समरकंद में होने के बावजूद चिनफिंग को मेजबानों की तरफ से साझा किए गए वीडियो में नहीं देखा गया। वीडियो में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को मेजबान उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शवकत मिर्जियोयेव के साथ ठीक सामने चलते देखा जा सकता है।

संगठन के सहयोगी नेताओं ने आयोजन स्थल परिसर में एक वृक्षारोपण कार्यक्रम में भी हिस्सा लिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक चिनफिंग ने शाम सामूहिक कार्यक्रम से पहले ही दिन में उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति के साथ अलग से पौधा रोपा।

पीएम मोदी आज एससीओ शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे, जो नेताओं के स्वागत और एक समूह फोटो के साथ शुरू होगा और उसके बाद नेताओं की प्रतिबंधित प्रारूप में बैठक होगी। दोपहर भोज के बाद मोदी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शवकत मिर्जियोयेव और ईरानी राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी के साथ द्विपक्षीय बैठक करेंगे।

यूपी में भारी बारिश से दो हादसों में तीन बच्चों सहित 12 लोगों की मौत

भारी बारिश ने उत्तर प्रदेश में दो घटनाओं में 12 लोगों की जान ले ली है। लखनऊ में निर्माणाधीन दीवार गिरने से जहाँ 9 लोगों की जान चली गयी वहीं उन्नाव में एक कमरा गिरने से 3 बच्चों की मौत हो गयी।

जानकारी के मुताबिक राजधानी लखनऊ में पिछले 24 घंटे में काफी नुक्सान हुआ है। लखनऊ कैंट के दिलकुशा इलाके में एक दीवार ढहने से 9 लोगों की मौत हो गई। इस हादसे में दो लोग घायल हुए हैं। यह हादसा शुक्रवार तड़के 3.30 बजे का है।

इस बीच भारी बारिश के चलते जिला प्रशासन ने सभी स्कूलों को बंद रखने का आदेश जारी किया है। राज्य के अन्य जिलों में भी भारी बारिश की खबर है। उन्नाव में बारिश से मिट्टी का कमरा ढहने की घटना में 3 बच्चों की मौत हो गई है। हादसे में बच्चों की माता गंभीर घायल हो गयी है।

लखनऊ कैंट के घायलों को सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया है। डॉक्टरों ने दोनों को खतरे से बाहर बताया है। जिलाधिकारी ने हादसे में सभी मृतकों के परिजनों को चार-चार लाख रुपये मुआवजा देने का ऐलान किया है और घायलों के समुचित इलाज का निर्देश दिया है।