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जीएसटी का ख़ौफ़

इन दिनों जीएसटी एक बड़े मुद्दे के रूप में लोगों में चर्चा का विषय बनी हुई है। साथ ही लोगों को इस बात का डर सताने लगा है कि न जाने आने वाले दिनों में किस-किस चीज़ के लिए जीएसटी देनी पड़े। अख़बारों और पत्रिकाओं में जीएसटी को लेकर तरह-तरह के कार्टून और लेख प्रकाशित हो रहे हैं। विपक्षी राजनीतिक दल केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी को इस पर घेरने की कोशिश में लगे हुए हैं। लेकिन खुलकर विरोध नहीं हो रहा है। कभी दो फ़ीसदी वैट के लिए लोग धरने दिया करते थे; लेकिन अब आठ फ़ीसदी से लेकर 28 फ़ीसदी जीएसटी वसूले जाने पर भी लोग पहले जैसा विरोध नहीं है।

जीएसटी लागू करने के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा था कि पहले दूध, दही, अनाज सब पर टैक्स लगता था, यह पहली बार है कि इन चीज़ों को टैक्स मुक्त रखा गया है। लेकिन यह सफ़ेद झूठ था। ब्रिटिश हुकूमत के बाद शायद यह पहली बार हुआ है कि आटा, दाल, चावल, खाद्य तेल और दही जैसी चीज़ों पर भी जीएसटी लगा दिया गया है।
अभी हाल ही में आगरा रेलवे स्टेशन पर बने पेशाबघरों में पेशाब करने पर भी 12 फ़ीसदी जीएसटी ने सुर्ख़ियाँ बटोरीं। पेशाब पर भी जीएसटी लगाने को लेकर लोगों को कई शंकाएँ होने लगी हैं। चर्चा इस बात की है कि कहीं केंद्र सरकार आने वाले समय में हर चीज़ पर जीएसटी न लगा दे। लोगों की शंका जायज़ है, क्योंकि रेलवे स्टेशन के पेशाबघर में पेशाब करने के 100 रुपये और उस पर 12 रुपये जीएसटी के वसूले जाने का मामला सामने आने के बाद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आने वाले समय में कोई भी चीज़ जीएसटी से मुक्त होगी। स्पष्ट है जब पेशाब करने पर किसी एक आदमी को 112 रुपये देने पड़ सकते हैं, तो बाक़ी चीज़ों के बदले कितना पैसा देना पड़ेगा? इसकी कल्पना की जा सकती है। यह कोई मामूली बात नहीं है। जहाँ अब तक पेशाब करने का कहीं कोई पैसा नहीं देना होता था, वहीं अगर इस काम के लिए भी जेब ढीली करनी पड़ेगी, वह भी बड़ी रक़म चुकाकर, तो हर कोई चौंकेगा भी और डरेगा भी। मुर्दाघर में दाह संस्कार पर 18 फ़ीसदी जीएसटी की ख़बरें भी पिछले दिनों ख़ूब चलीं।

सरकार ने जिस जीएसटी को 1 जुलाई, 2017 को 101वें संविधान संशोधन अधिनियम-2016 के तहत अधिनियमित करके यह कहकर लागू किया कि इससे कई-कई टैक्स देने के झंझट से लोगों को राहत मिलेगी और नुक़सान होने से बचेगा। लेकिन इसके लागू होते ही झंझट बढऩे लगे और टैक्स भी। व्यापारियों ने शुरू से ही जीएसटी का विरोध किया। अब जिस तरह से एक-एक करके कई चीज़ों पर जीएसटी लागू हो चुकी है, उससे एक बात तो साफ़ है कि भविष्य में बाक़ी चीज़ों पर भी जीएसटी लागू होगी।

इसी बात को लेकर देश भर में कई जगह जीएसटी के विरोध में लोग उतरने लगे हैं। व्यापारियों के बाद अब कर्मचारी भी इसका विरोध कर रहे हैं। बीमा पर जीएसटी लगने के बाद बीमा एजेंटों का धरना-प्रदर्शन करना इस बात का गवाह है।

इधर उन व्यापारियों के यहाँ छापेमारी होने लगी है, जिन पर जीएसटी चोरी का आरोप अथवा शक है। मध्य प्रदेश के खंडवा ज़िले में इसी महीने जीएसटी टीम ने दो बड़े सरिया व्यापारियों के ठिकानों पर छापेमारी की। इसके अलावा बीबीएन की एक औद्योगिक इकाई पर दक्षिण प्रवर्तन क्षेत्र परवाणु की ओर से जीएसटी में हेराफेरी को लेकर कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। कम्पनी अगर इस नोटिस का जवाब नहीं देती है, तो इस कम्पनी को 62 करोड़ रुपये की जीएसटी चोरी और उस पर ब्याज तो चुकाना ही होगा, साथ ही ज़ुर्माना भी झेलना पड़ सकता है। अब तक देखा गया है कि लोन लेने और उसकी क़िस्तें चुकाने पर भी जीएसटी देनी पड़ती है। लेकिन अब इनकम टैक्स जमा करने पर जीएसटी वसूले जाने की चर्चा भी छिड़ गयी है।

बात जीएसटी लागू होने की नहीं है, बात तो उन लोगों की परेशानी की है, जिनकी आय बहुत कम अथवा केवल घर चलाने भर की है। बात उन लोगों की है, जो विकट ग़रीब हैं और अभावों भरा जीवन जी रहे हैं। ऐसे लोग जीएसटी कहाँ से देंगे? कितने ही लोग हैं, जिनकी आय पहले से घटी है। कितने ही लोग ऐसे हैं, जिनके पास कमाने के संसाधन नहीं हैं। स्पष्ट है कि जब खाने-पीने की चीज़ों पर भी जीएसटी लगने से देश के ग़रीब-से-ग़रीब नागरिक भी इसे बिना चुकाये नहीं बच सकेगा।

सरकार की महँगाई रोकने की असफलता और हर चीज़ पर जीएसटी लगाने की ज़िद ने दो तस्वीरें देश के सामने रखी हैं। एक, अब महँगाई रोकना और रोज़गार देना सरकार के वश की बात नहीं है। दूसरी, ग़रीबों की थाली से रूखी-सूखी रोटी भी छिनने की नौबत आ चुकी है। जीएसटी को लेकर स्थिति अभी से इतनी असहनीय हो चुकी है कि लोगों के पास सिवाय विरोध के अब और कोई चारा नहीं बचा है। स्पष्ट है कि जीएसटी भारतीय उद्योग एवं व्यापार के लिए एक बड़ी और लम्बे समय की समस्या पैदा करेगी, जिसका नुक़सान लोगों को सीधे तौर पर होगा।

लोगों को परेशानी से बचाने के लिए सरकार को जीएसटी लागू करने से पहले इसकी समस्याओं को समझना चाहिए था। इन समस्याओं में स्पष्टता की कमी सबसे बड़ी कमी है। सरकार ने जीएसटी को लेकर ग़रीबों को ज़रा भी ध्यान में नहीं रखा। उसने जीएसटी को लेकर लोगों को जो सपने दिखाये थे, उन पर भी पानी डाल दिया। अब व्यापारियों को जीएसटी चोरी के नोटिस धड़ल्ले से मिल रहे हैं। इसलिए ज़रूरी है कि सरकार जीएसटी से जुड़ी समस्याओं को अब गम्भीरता से ले और शीघ्र ही उसका निदान भी निकाले। क्योंकि जीएसटी को लेकर सबसे बड़ा ख़तरा इसके सरलीकरण के नाम पर लाया गया एक जजिया की तरह है, जिसकी वसूली हर आदमी से एक ही पैमाने के आधार पर जबरन हो रही है। सीधी बात है कि जीएसटी की वसूली व्यापारी ग्राहकों से करेंगे। धनाढ्य लोगों को भी इससे कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। लेकिन ग़रीबों की समस्याएँ बढ़ेंगी।

ज्ञातव्य है कि जीएसटी से पहले जो अप्रत्यक्ष कर का क़ानून था, उसमें सुधार की आवश्यकता तो थी; लेकिन इस बहाने से इस हद तक वसूली नहीं की जानी चाहिए थी। अभी भी समय है कि अनावश्यक तरीके से कई चीज़ों पर लगायी गयी जीएसटी को सरकार वापस लेकर लोगों को राहत प्रदान करे, ताकि ग़रीबों की थाली में पहले से ही कम भोजन में और कमी नहीं आये।

एकता की क़वायद

कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा और नीतीश की कोशिशें क्या रंग लाएँगी?

विपक्ष 2024 के आम चुनाव के लिए कमर कस रहा है। कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा और दिल्ली आकर नीतीश कुमार की विपक्ष के नेताओं से मुलाक़ात, ये दोनों ही गतिविधियाँ सत्ता पक्ष की भाजपा को चुनौती देने की तैयारी के लिहाज़ से काफ़ी अहम हैं। उधर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव भी सक्रिय हैं, जिससे लगता है कि विपक्ष बिखराव से बाहर निकलकर किसी सर्वसम्मत फार्मूले के तहत एक मंच पर आ सकता है, या दो ध्रुवों में एकजुट हो सकता है; भले इसमें अभी वक़्त लगे। पूरे हालात और भविष्य की सम्भावनाओं को लेकर बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-

राहुल गाँधी के महँगे नीले जूते और हज़ारों की टी-शर्ट पर तंज! महँगाई, बेरोज़गारी के विरोध में और देश में एकता के लिए कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा को कमतर आँकने का यह भाजपा का तरीक़ा था। जवाब में कांग्रेस को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महँगे पेन, सूट और चश्मे की क़ीमत बतानी पड़ी। उधर भाजपा से अलग हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी सितंबर के पहले पखवाड़े राजधानी दिल्ली में सक्रिय रहे। उन्होंने राहुल गाँधी से शुरू कर शरद पवार, मुलायम सिंह / अखिलेश यादव, सीताराम येचुरी और अरविंद केजरीवाल सहित कई बड़े नेताओं से मुलाक़ात की, जिसका मक़सद विपक्ष को एक धुरी पर लाने की शुरुआत करना था। भले संगठित और आक्रामक भाजपा के मुक़ाबले विपक्ष की यह कोशिशें शुरुआत भर हों, भविष्य में इनके वृहद आकार लेने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। और यदि विपक्ष का एक बड़ा हिस्सा साथ आता है, तो निश्चित ही साल 2024 के लिए भाजपा को अपनी रणनीति में बदलाव के लिए मजबूर होना पड़ेगा।


बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भाजपा से अलग होने के बाद अब उसी के ख़िलाफ़ विपक्ष को एकजुट करने की उनकी कोशिश बहुत मायने रखती है। नीतीश विपक्षी दलों को यह सन्देश भी दे रहे हैं कि कांग्रेस के बिना विपक्ष ताक़तवर नहीं हो पाएगा। हालाँकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी. राव ग़ैर-कांग्रेसी विपक्षी मंच खड़ा करना चाहते हैं। राव हाल में जब पटना आये थे, उन्होंने कोशिश की थी कि नीतीश अगले चुनाव में प्रधानमंत्री उम्मीदवार होने की बात स्वीकार करें; लेकिन नीतीश ने ऐसा करने से मना कर दिया।

दो बार से लगातार सत्ता में बैठी भाजपा के भीतर भी अगले चुनाव को लेकर चिन्ताएँ हैं। भाजपा के बड़े नेताओं ने भले ख़ुद को जनता के सामने एक ऐसी पार्टी के रूप में पेश करने का तरीक़ा सीख लिया है, जिसे कोई हरा नहीं सकता और जो आने वाले कुछ और दशक तक सत्ता में रहेगी। इसका कारण नरेंद्र मोदी की नेतृत्व क्षमता पर उसका अतिविश्वास है। लेकिन पार्टी के नेता यह भी जानते हैं कि यह सम्भव नहीं है। जनता कब किसी सरकार से ऊब जाए और उसे सत्ता से बाहर कर दे, इसकी भविष्यवाणी नहीं की सकती।

लिहाज़ा विपक्ष की एकता की कोशिशों से चिन्तित भाजपा भी है। लेकिन उसकी चतुराई यह है कि वह इसे ज़ाहिर नहीं होने देती। कांग्रेस का नेतृत्व कमज़ोर दिखे इसके लिए भाजपा एक रणनीति के तहत नीतीश के साल 2024 में प्रधानमंत्री पद का दावेदार होने की बातों हो हवा दे रही है। ख़ुद नीतीश साफ़ रूप से कह चुके हैं कि वह उम्मीदवार नहीं है। हालाँकि उनकी पार्टी के नेता गाहे-ब-गाहे कह देते हैं कि नीतीश प्रधानमंत्री उम्मीदवार हैं। उनके ऐसा कहने की राजनीतिक ज़रूरतें हो सकती हैं।

नीतीश की सक्रियता
भाजपा से अलग होने के बाद भाजपा के ख़िलाफ़ नीतीश कुमार की सबसे बड़ी पहल सितंबर के पहले हफ़्ते दिखी, जब वह दिल्ली आये। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गाँधी से सबसे पहले मुलाक़ात की। उसके बाद वह कई और नेताओं से मिले। इनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के मुख्यालय में पार्टी महासचिव डी. राजा से उनकी मुलाक़ात भी शामिल है। नीतीश ने माकपा नेता सीताराम येचुरी से भी भेंट की और विपक्षी एकता को लेकर चर्चा की। उनसे मुलाक़ात के बाद नीतीश ने कहा कि उनके माकपा के साथ पुराने और लम्बे सम्बन्ध हैं। कहा कि वह जब भी दिल्ली आते हैं, माकपा कार्यालय जाना नहीं भूलते।
येचुरी का कहना है कि नीतीश कुमार की विपक्ष में वापसी और भाजपा के ख़िलाफ़ लड़ाई का हिस्सा बनने की उनकी इच्छा भारतीय राजनीति के लिए एक महत्त्वपूर्ण बदलाव है। येचुरी कहते हैं- ‘पहली बात तो मक़सद विपक्षी दलों को एकजुट करने का है, प्रधानमंत्री उम्मीदवार का चयन करने का नहीं। जब समय आएगा, हम प्रधानमंत्री पद का दावेदार चुनेंगे और आपको बताएँगे।’ नीतीश हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और इंडियन नेशनल लोकदल (आईएनएलडी) सुप्रीमो ओम प्रकाश चौटाला से भी मिले।

राहुल गाँधी के बाद नीतीश जनता दल(यू) के प्रमुख एच.डी. कुमारस्वामी से मिले। उनकी एक और महत्त्वपूर्ण मुलाक़ात राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के मुखिया शरद पवार से भी हुई। हाल में पवार के क़रीबी सहयोगी पार्टी नेता प्रफुल्ल पटेल ने कहा था कि उनके नेता पवार न तो कभी प्रधानमंत्री पद के दावेदार रहे, न ही उन्होंने आगे के लिए ऐसी कोई मंशा जतायी है। नीतीश पुराने मित्र और बिहार के मुख्यमंत्री रहे राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव के अलावा अस्वस्थ चल रहे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव और उनके पूर्व मुख्यमंत्री बेटे सपा नेता अखिलेश यादव से भी मिले।

निश्चित ही यह क़वायद भाजपा को परेशान करने वाली है; लेकिन ख़ुद विपक्ष इस शुरुआत को कितना आगे तक लेकर जाएगा? यह देखने वाली बात होगी। इस कोशिश की निरंतरता पर भी उसका साथ होना सम्भव होगा।

विपक्ष का चेहरा
लोकसभा के साल 2024 के चुनाव के लिए भाजपा के पास निश्चित ही नरेंद्र मोदी इकलौता चेहरा हैं। भले भाजपा के भीतर मोदी की शख़्सियत को लेकर विचारों की भिन्नता हो, मोदी और शाह पार्टी में इतने ताक़तवर हैं कि उन्हें हटाने की बात करने की हिम्मत कोई पार्टी में जुटा नहीं सकता। मोदी के नज़दीकी नेता तो यह भी दावा करते हैं कि आरएसएस भी आज की तारीख़ में मोदी को हटाने की नहीं सोच सकता, क्योंकि वे पार्टी के लिए अपरिहार्य हो चुके हैं। बेशक वरिष्ठ और कामयाब केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को मोदी-शाह के लिए चुनौती माना जाता हो, उन्हें हाल में पार्टी के सबसे ताक़तवर बोर्ड से बाहर कर दिया गया था।

ऐसे में विपक्ष के लिए सन् 2014 में भाजपा की चुनौती जितनी बड़ी है, उतनी ही बड़ी चुनौती यह भी है कि मोदी के ख़िलाफ़ उसका चेहरा कौन होगा? भाजपा कांग्रेस को कमज़ोर दिखाने के लिए नीतीश कुमार को विपक्ष का चेहरे बनाने की मीडिया और सोशल मीडिया में मुहिम को $खूब हवा दे रही है। ख़ुद नीतीश कुमार दिल्ली में आकर कह चुके हैं कि वह प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं। लेकिन हाल में उनकी दिल्ली यात्रा और सक्रियता से यह उत्सुकता बढ़ी है कि क्या बिहार का यह दिग्गज सचमुच विपक्षी एकता के लिए ऐसा कर रहा है, या उनकी अपनी भी कोई महत्त्वाकांक्षा है। लेकिन यहाँ सबसे दिलचस्प बात यह है कि विपक्षी एकता के लिए नीतीश जब दिल्ली आये, तो वह सबसे पहले कांग्रेस नेता राहुल गाँधी से मिले। इससे ज़ाहिर होता है कि नीतीश कांग्रेस को विपक्षी एकता के लिए कितना महत्त्वपूर्व कारक (फैक्टर) मानते हैं।

‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, नीतीश साल 2024 के लिए कांग्रेस की योजना का बड़ा हिस्सा हैं। पार्टी उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय रखना चाहती है। नीतीश देश की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता का बड़ा और निर्विवाद चेहरा हैं। ज़ाहिर है हाल तक भाजपा का साथी होने के बावजूद नीतीश भाजपा के ख़िलाफ़ एक बड़ा और ज़्यादा स्वीकार्य चेहरा हैं। वैसा ही जैसा राहुल गाँधी हैं, जो हाल तक अकेले ही भाजपा सरकार से लड़ते रहे हैं। नीतीश की छवि बेशक राहुल गाँधी की तरह देशव्यापी न हो, उत्तर भारत और उससे बाहर भी क्षेत्रीय दलों में उनके लिए समर्थन राहुल गाँधी से इसलिए ज़्यादा होगा; क्योंकि राहुल गाँधी और कांग्रेस की मज़बूती क्षेत्रीय दलों के लिए ख़तरा है, नीतीश की नहीं।

लिहाज़ा नीतीश की क़वायद क्या रंग लाती है और कांग्रेस उनकी विपक्षी एकता की क़वायद का कितना बड़ा हिस्सा रहती है, यह देखना दिलचस्प होगा। इस का एक बड़ा कारण है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी फ़िलहाल कांग्रेस से दूर दिख रही हैं। हाल में राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति के चुनाव में उनके कांग्रेस से मतभेद सामने आये थे। तृणमूल कांग्रेस के ही नेता यशवंत सिन्हा, जो राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के साझे उम्मीदवार थे; को कांग्रेस ने तो समर्थन दिया था; लेकिन उप राष्ट्रपति के चुनाव में कांग्रेस की मार्गरेट अल्वा को ममता की तृणमूल ने समर्थन नहीं दिया और मतदान से दूर रही थी।

देखा जाए, तो नीतीश कुमार के मुक़ाबले ममता बनर्जी ज़्यादा बड़ी देशव्यापी छवि रखती हैं। दक्षिण से उत्तर तक लोग उन्हें जानते हैं। अनुभवी भी हैं। यह माना जाता है कि वह प्रधानमंत्री पद के लिए कोशिश कर सकती हैं। ऐसे में कांग्रेस से उनका तनाव विपक्षी एकता में आड़े आ सकता है। यह माना जाता है कि नीतीश कांग्रेस को साथ रखने के लिए ममता को मनाने की कोशिश कर सकते हैं। हालाँकि यदि ममता या राहुल गाँधी (कांग्रेस) में से एक को चुनने की नौबत आ गयी, तो नीतीश कांग्रेस के साथ जाएँगे।

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के.सी. राव भी फ़िलहाल कांग्रेस से अलग लाइन पकड़े हुए हैं। हाल में वह पटना में नीतीश कुमार के साथ मंच साझा कर चुके हैं। राव नीतीश के मुँह से बुलवाना चाहते थे कि वह (नीतीश) प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं; लेकिन नीतीश बड़ी सफ़ाई से बच निकले थे। लेकिन यह माना जाता है कि कांग्रेस से ही निकले राव अंतत: कांग्रेस के साथ खड़े हो सकते हैं; क्योंकि वे भाजपा के विरोधी हैं। राव ख़ुद विपक्षी एकता के लिए काफ़ी सक्रिय हैं और ममता और नीतीश सहित अन्य विपक्षी नेताओं से मिलते रहे हैं। वामपंथी दल फ़िलहाल अलग पंक्ति में हैं और विपक्ष की एकता की पहला खुलकर साथ नहीं आये हैं। वैसे नीतीश ने दिल्ली दौरे में सीपीएम के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी से मुलाक़ात की थी। लेकिन कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा के केरल में लम्बे ठहराव पर माकपा ने सवाल उठाये थे और कांग्रेस से पूछा था कि वह उत्तर प्रदेश में ऐसा क्यों नहीं करने जा रही?

विपक्ष के चेहरा बनने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी हैं। नीतीश उनसे भी मिले थे। यहाँ यह बता दें कि जब नीतीश कुमार दिल्ली के अपने समकक्ष अरविंद केजरीवाल से मिले, उस समय दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) नेता संजय झा भी मौज़ूद थे। केजरीवाल की अभी अखिल भारतीय छवि नहीं है; लेकिन वह चर्चा के केंद्र में रहते हैं। केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी पर यह भी आरोप हैं कि वह भाजपा की ‘बी’ टीम हैं। यह कहा जाता है कि भाजपा आप को उन राज्यों में इस्तेमाल करती है, जहाँ उसे कांग्रेस के मत (वोट) कटवाने हों। गुजरात और हिमाचल के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी मैदान में है, और यह माना जाता है कि जितने मत वह लेगी, उससे भाजपा नहीं, बल्कि कांग्रेस का नुक़सान होगा; क्योंकि यह सारे मत विरोधी लहर (एंटी इंकम्बेंसी) के होंगे। यदि गुजरात में आप कोई बड़ा उलटफेर कर देती है, तो निश्चित ही वह बड़ी चर्चा में आ जाएगी। पंजाब में उसने 92 सीटें जीतकर पहले ही कांग्रेस को झटका दे दिया था। ऐसी स्थिति में केजरीवाल 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए ख़ुद को विपक्ष के चेहरे के चेहरे के रूप में सामने करना चाहेंगे। और यदि कांग्रेस वहाँ भाजपा को हरा देती है, तो निश्चित ही वह विपक्ष की धुरी बन जाएगी।

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एच.डी. कुमार स्वामी भी सक्रिय हैं। इसी तरह तत्कालीन जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे और वरिष्ठ नेता फ़ारूक़ अब्दुला भी विपक्षी एकता की बैठकों का हमेशा हिस्सा रहते हैं। कुमार स्वामी से लेकर अब्दुल्ला और पीडीपी की नेता महबूबा मुफ़्ती कांग्रेस के साथ हाल के दशकों में गठबंधन में रहे हैं। ऐसे में उन्हें कांग्रेस के साथ जाने में शायद ही दिक़्क़त आये। हालाँकि वह स्थिति के मुताबिक, किसी के भी साथ जा सकते हैं। अभी तक की स्थिति देखें, तो ऐसा भान होता है कि अंतत: 2024 तक मामला राहुल गाँधी और नीतीश कुमार के बीच अटकेगा। कौन चेहरा बने? इसका फ़ैसला इन दो में से होगा। कांग्रेस लोकसभा में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है। लिहाज़ा विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए उसका वज़न तो रहेगा ही। लेकिन विपक्ष के कितने दल यूपीए दलों के अलावा उसके साथ खड़े होते हैं, यह देखने वाली बात होगी।

अरे…, घबरा गये क्या? भारत जोड़ो यात्रा में उमड़े जनसैलाब को देखकर। मुद्दे की बात करो, बेरोज़गारी और महँगाई पर बोलो। बाक़ी कपड़ों पर चर्चा करनी है, तो मोदी जी के 10 लाख के सूट और 1.5 लाख के चश्मे तक बात जाएगी। बताओ, करनी है भाजपा?’’
(राहुल की टी-शर्ट पर कांग्रेस का भाजपा को जवाब)

पदयात्राओं का इतिहास

कन्याकुमारी, जो उगते और डूबते सूरज को देखने के लिए देश भर के सैलानियों के आकर्षण का केंद्र है; से शुरू हुई कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा क्या पार्टी का सूर्य फिर चमका पाएगी? यह कहना अभी मुश्किल है। यात्रा का समापन कश्मीर में होना है, जहाँ दशकों तक कांग्रेस के साथ रहे ग़ुलाम नबी आज़ाद बाग़ी होकर अपनी अलग पार्टी बना रहे हैं। लेकिन यह सच है कि कांग्रेस के बड़े नेताओं के ज़मीन पर उतरने से पार्टी के आम कार्यकर्ता और नेता ख़ुश हैं और उन्हें भाजपा के ख़िलाफ़ अभियान चलाने का अवसर मिला है। कांग्रेस के लिए अच्छी बात यह है कि बड़ी संख्या में सिविल सोसायटी के लोग भी पदयात्रा से जुड़ चुके हैं। रिपोर्ट्स देखें, तो राहुल गाँधी और कांग्रेस को दक्षिण में इस यात्रा के दौरान जबरदस्त समर्थन मिला है।

‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, इसके बाद कांग्रेस एक और यात्रा आयोजित करने की योजना बना चुकी है, जो पूर्व से पश्चिम तक होगी। पूर्वोत्तर राज्यों से शुरू होकर यह सम्भावित यात्रा उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और गुज़रात से होकर गुज़रेगी।
चूँकि भारत जोड़ो यात्रा में पार्टी जनता के मुद्दों को लेकर मैदान में उत्तरी है, इसलिए जनता भी इसमें दिलचस्पी दिखा रही है। भले बड़े टीवी चैनल पदयात्रा की कवरेज को लेकर ठण्डा रुख़ अपनाये हों और इसके पीछे उनकी अपनी मजबूरी हो; लेकिन इसमें कोई दो-राय नहीं कि जहाँ-जहाँ से पद यात्रा गुज़र रही है, जनता की इसमें अच्छी भागीदारी दिख रही है।

यदि हाल के दशकों में ऐसी किसी बड़ी राजनीतिक पदयात्रा की बात करें, तो कभी युवा तुर्क कहे जाने वाले दिवंगत प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की भारत यात्रा याद आती है। उनकी वह यात्रा भी कन्याकुमारी से ही 6 जनवरी, 1983 को शुरू होकर 25 जून, 1983 को दिल्ली के राजघाट पर आकर पूर्ण हुई थी। इसका यह लाभ हुआ कि चंद्रशेखर की पार्टी जनता दल का कर्नाटक और कुछ हद तक तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में विस्तार हो गया। बाद में चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने, भले कुछ ही महीनों के लिए।

इसके बाद मुरली मनोहर जोशी की तिरंगा यात्रा और लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा भी भाजपा का विस्तार करने में बहुत मददगार साबित हुईं। नहीं तो इससे पहले भाजपा को दो सीटों वाली पार्टी ही कहा जाता था। इनके अलावा राज्य स्तर पर दलों और नेताओं ने यात्राएँ निकाली हैं; लेकिन कांग्रेस की पदयात्रा निश्चित ही राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में है। भले बेरोज़गारी, महँगाई और देश की एकता की बात उसके एजेंडे में हो, पार्टी का बड़ा ध्येय मोदी सरकार के ख़िलाफ़ माहौल तैयार करना और ख़ुद की ज़मीन हासिल करना है। राहुल गाँधी की यह क़वायद उस (पप्पू) छवि से बाहर निकलने की भी है, जो भाजपा ने एक सुनियोजित अभियान चलाकर 2014 के बाद उनकी बनायी है। राहुल गाँधी को लेकर लोगों की राय बदले, यह पार्टी के लिए बहुत ज़रूरी है। वह अध्यक्ष बनेंगे या नहीं? यह तो पता नहीं; पार्टी में देशव्यापी छवि वाले नेता निश्चित रूप से राहुल ही हैं। ऐसा भी नहीं है कि भाजपा द्वारा गढ़ी गयी उनकी पप्पू वाली छवि को सभी लोग सही ही मानते हों। बहुत-से लोग राहुल गाँधी से प्रभावित दिखते हैं। यह राहुल ही हैं, जिन्होँने देश के सबसे प्रमुख मुद्दों को समय रहते उठाया है। किसी भी राष्ट्रीय सर्वे में लोकप्रियता के लिहाज़ से आज भी प्रधानमंत्री मोदी के बाद लोग राहुल गाँधी को ही वोट करते हैं। इसी साल होने वाले गुज़रात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा के चुनावों और नवंबर से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र से पहले राहुल गाँधी और कांग्रेस की यह पद यात्रा कुल 150 दिन में देश के 12 राज्यों और दो केंद्र-शासित प्रदेशों से गुज़रकर 3,570 किलोमीटर का सफ़र तय करके जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर में समाप्त होगी। वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह कह चुके हैं कि राहुल गाँधी पूरी यात्रा के दौरान साथ पैदल चलेंगे। बीच में वह गुज़रात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव प्रचार करने ज़रूर जा सकते हैं।

तमिलनाडु के कन्याकुमारी से यात्रा शुरू करने के पीछे एक मक़सद दक्षिण में अपने पाँव और मज़बूती से जमाना है, जहाँ भाजपा अपनी एंट्री की पूरी कोशिश कर रही है। हालाँकि यात्रा चुनाव वाले राज्यों गुज़रात और हिमाचल से नहीं गुज़रेगी। पार्टी के कुछ नेता मानते हैं कि दोनों राज्यों को शामिल किया जाना चाहिए था। ‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, यात्रा में 119 लोग ऐसे हैं, जो पूरी पदयात्रा करेंगे।

ख़ास बात यह भी है कि राहुल गाँधी इस पदयात्रा के दौरान सुख-सुविधा वाले होटल में नहीं रुक रहे हैं, बल्कि रात अन्य नेताओं की तरह कंटेनर में ही बिता रहे हैं। पार्टी ने नेताओं के रुकने के लिए ट्रक में यह कंटेनर बनाया है। इसमें मोबाइल टॉयलेट्स हैं। कुल 60 कंटेनर हैं, जिनमें कुल मिलाकर 230 लोग रह सकते हैं। कन्याकुमारी से भारत जोड़ो यात्रा तिरुवनंतपुरम, कोच्चि, नीलांबुर, मैसूर, बेल्लारी, रायचूर, विकाराबाद, नांदेड़, जलगाँव, जामोद, इंदौर, कोटा, दौसा, अलवर, बुलंदशहर, दिल्ली, अम्बाला, पठानकोट और जम्मू से होते हुए श्रीनगर में समाप्त होगी।
कांग्रेस आरोप लगा रही है कि भारत जोड़ो यात्रा से भाजपा घबरा गयी है और राहुल गाँधी के जूतों और टी-शर्ट की बात कर रही है, ताकि यात्रा में उठाये जा रहे मुद्दों से जनता का ध्यान भटका सके। कांग्रेस नेता यह भी आशंका जाता रहे हैं कि भाजपा फिर ईडी पर दबाव डालकर राहुल गाँधी को पूछताछ के बहाने बुलाकर यात्रा से दूर करने की कोशिश करे। फ़िलहाल यात्रा के शुरू के आठ दिन तक ऐसा नहीं हुआ है।

यात्रा के दौरान राहुल गाँधी लगातार लोगों से मिल रहे हैं और उनसे बातचीत भी कर रहे हैं। निश्चित ही राहुल को इस दौरान पार्टी को लेकर और मोदी सरकार के कामकाज पर भी फीडबैक मिलेगा। यह पार्टी के काम आएगा। यात्रा में शामिल पार्टी के एक नेता ने ‘तहलका’ से कहा- ‘जनता से मिले सहयोग से हम बेहद उत्साहित हैं। जनता में वर्तमान केंद्र सरकार के कामकाज और नीतियों के प्रति नाराज़गी तेज़ हो रही है। देश को तोडऩे की कोशिश से जनता नाराज़ है और परिवर्तन चाहती है।’

राहुल गाँधी की यात्रा में बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश व बिहार पर ध्यान केंद्रित नहीं रखा गया है। उत्तर प्रदेश में बुलंदशहर को ज़रूर यात्रा छुएगी और इसके बाद सीधे दिल्ली में दस्तक देगी। यह सब पार्टी की रणनीति का हिस्सा है; क्योंकि कांग्रेस ने फ़िलहाल यात्रा में उन जगहों को शामिल किया है, जहाँ उसकी ज़मीन है और वे सीधे विपक्षी पार्टी को चुनौती देती है। कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान में यह यात्रा कार्यकर्ताओं को उत्साह से भरेगी, ऐसा भरोसा पार्टी को है। यात्रा का चेहरा राहुल गाँधी ही हैं, और निश्चित ही इससे दोनों को फ़ायदा होगा। वैसे कांग्रेस इसके बाद एक और पदयात्रा की तैयारी कर रही है, जो पूर्व से पश्चिम तक चलेगी। ‘तहलका’ को मिली जानकारी के मुताबिक, पार्टी अब लगातार ज़मीन पर रहेगी और मोदी सरकार पर दबाव बनाती रहेगी। अगली यात्रा में पार्टी की योजना पूर्वोत्तर राज्यों से शुरू होकर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और गुज़रात को छूने की है। कांग्रेस समझ चुकी है कि उसके ज़मीन पर उतरने से भाजपा में बेचैनी बढ़ी है।

कांग्रेस विपक्षी एकता से पहले ख़ुद को ज़मीन पर मज़बूत करने की क़वायद में जुट गयी है, ताकि मोदी सरकार के ख़िलाफ़ माहौल तैयार किया जा सके और ख़ुद को विपक्ष के नेतृत्व के लिए खड़ा किया जा सके। वर्तमान यात्रा को दक्षिण में ज़्यादा वक़्त देकर कांग्रेस भाजपा के दक्षिण में विस्तार के प्रयास को कुन्द करना चाहती है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि आज भी दक्षिण राज्यों में भाजपा की अपेक्षा कांग्रेस के पैर कहीं ज़्यादा मज़बूत हैं, भले क्षेत्रीय दल उसे वहाँ रोकने की कोशिश करें; क्योंकि कांग्रेस का फैलाव उनके अपने ही अस्तित्व को ख़तरे में डालता है।


“हिंसा और नफ़रत के दम पर आप चुनाव तो जीत सकते हैं; लेकिन इसके दम पर और कुछ भी नहीं कर सकते। कुछ लोगों ने इस समय भारत जोड़ो यात्रा की ज़रूरत के बारे में पूछा है। मैं कहना चाहता हूँ कि भारत के पास कई महत्त्वपूर्ण लक्ष्य हैं। हमें लाखों गरीब लोगों की पीड़ा को कम करना है। यह आसान नहीं है। अगर भारत बँटा हुआ है। क्रोधित है। अपने लिए घृणा से भरा हुआ है; तो ऐसी स्थिति में उन महत्त्वपूर्ण लक्ष्यों को पाना सम्भव नहीं हो सकता। भाजपा और संघ की विचारधारा नफ़रत फैलाने वाली है, और हमारी यह यात्रा उन दोनों की विचारधारा के ख़िलाफ़ है।’’
राहुल गाँधी
कांग्रेस नेता


“मैं न तो प्रधानमंत्री पद का दावेदार हूँ और न ही इसके लिए इच्छुक हूँ। आज फिर सब एक साथ हैं और हमारा पूरा ध्यान सभी वाम दलों, क्षेत्रीय दलों, कांग्रेस को एकजुट करने पर है। हम सभी के साथ आने के बड़े मायने होंगे।’’
नीतीश कुमार
मुख्यमंत्री, बिहार


“जो अपने को अपनी पार्टी से भी नहीं जोड़ सके, वो भारत जोडऩे की यात्रा पर निकले हैं। यह देखकर बड़ी हैरानी हो रही है। राहुल गाँधी आप पहले अपना घर, पार्टी जोड़ लेते; तब देश जोडऩे की बात करते। यह सिर्फ इनका छलावा है और दिखावा है।’’
रविशंकर प्रसाद
भाजपा नेता


“विपक्षी दलों, देश और संविधान को बचाने के लिए नीतीश की कोशिश एक सकारात्मक संकेत हैं।’’
सीताराम येचुरी
माकपा नेता

ज़रूरी है आरक्षण की समीक्षा

जनवरी, 2019 में 103वें संविधान संशोधन में अनुच्छेद-15 और 16 में खण्ड (6) सम्मिलित करके आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्ण वर्ग के लिए 10 फ़ीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया। इसकी संवैधानिक वैधता को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी है, जिस पर 13 सितंबर को पाँच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ सुनवाई करेगी। महात्मा गाँधी ‘यंग इंडिया’ में लिखे गये अपने लेख ‘जाति बनाम वर्ग’ में लिखते हैं- ‘जाति व्यवस्था वर्ग व्यवस्था से इसलिए बेहतर है कि जाति सामाजिक स्थायित्व के लिए सर्वोत्तम सम्भव समायोजन है।’ हालाँकि वर्तमान में ऐसा नहीं है। भारतीय समाज में जातिवाद का स्वरूप सदैव से विघटनकारी रहा है। वास्तव में जातिवाद मानव द्वारा मानव के उत्पीडऩ का सबसे सुनियोजित षड्यंत्र है। भारतीय समाज में जातिवाद का इतिहास बड़ा वीभत्स रहा है। किन्तु आज उस कड़वे अतीत का प्रयोग विभाजनकारी राजनीति को बढ़ावा देकर सत्ता हथियाने के लिए हो रहा है। दरअसल यह लोकतंत्र में ऐतिहासिक रूप से पिछड़ी, दमित, दलित जातियों की भागीदारी में वृद्धि का संवैधानिक मार्ग है।
आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) तबक़े को 10 फ़ीसदी आरक्षण का मूल उद्देश्य प्रतिनिधित्व का सही निरूपण है, न कि आर्थिक समानता स्थापित करना। यह आरक्षण ग़रीबी उन्मूलन का कार्यक्रम नहीं है। ईडब्ल्यूएस के लिए आरक्षण शुरुआत से ही एक राजनीतिक एवं अनुचित निर्णय था। जिन जातियों को लक्ष्य करके यह लागू हुआ, उन्हें पहले से सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व हासिल है। यह उम्मीद कि इससे आरक्षण का विरोध कम हो जाएगा, ग़लत साबित हुई। वास्तव में इससे आरक्षण की सुलग रही अंदरूनी आग और भडक़ी है, यहाँ तक कि आरक्षण को 100 फ़ीसदी तक ले जाने की माँग शुरू हो गयी। जिसको सवर्ण, पिछड़ी और अनुसूचित जाति-जनजातियों में जनसंख्या के प्रतिशत के आधार पर विभाजित किया गया हो।

भारत में राजनीतिक लाभ के लिए संविधान की अवहेलना का इतिहास रहा है। मंडल मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पिछड़ों के 27 फ़ीसदी आरक्षण को लागू रखते हुए निर्णय दिया था कि सकल आरक्षण 50 फ़ीसदी से अधिक नहीं होगा (इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ, 1992)। किन्तु तमिलनाडु में आरक्षण को 69 फ़ीसदी किये जाने सम्बन्धी क़ानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कर न्यायिक समीक्षा के अधिकार से दूर रखा गया। इस प्रक्रिया को सन् 2016 में केंद्र सरकार ने आगे बढ़ाते हुआ ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू कर दिया।

देश में मनोनुकूल न्यायिक निर्णय की माँग की एक नयी प्रथा स्थापित हो चुकी है। उदाहरणस्वरूप, सर्वोच्च न्यायालय ने जब मंडल कमीशन के आधार पर पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को स्वीकार किया, तब उसे लोकतंत्र का रक्षक कहा गया। किन्तु वही न्यायालय जब हरिजन एक्ट के दुरुपयोग की समीक्षा कर उसमें सुधार करना चाहता है, तब यही प्रशंसक वर्ग संख्या बल के आधार पर आगजनी, तोड़-फोड़, उपद्रव के बलबूते सरकार पर दबाव बनाकर न्यायालय के निर्णय को संवैधानिक संशोधन द्वारा अस्वीकृत करा देता है। हरिजन एक्ट में सुधार के विरोध में यह उचित तर्क है कि निर्णय अपवादों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। परन्तु प्रताडि़तों की सुध भी ली जानी चाहिए और प्रताडक़ों को दण्डित किया जाना चाहिए। लेकिन आरक्षण के नाम पर हिंसात्मक आन्दोलन एक परिपाटी बन चुका है। पिछले कुछ वर्षों में गुर्जर, जाट, मराठा और पाटीदार आदि जातियों ने विध्वंसक आन्दोलनों द्वारा आम जनता को आतंकित करने के साथ-साथ सरकार व प्रशासन को मजबूर कर अपनी माँगें मनवाने की कोशिश की। अदम गोंडवी ठीक ही लिखते हैं-

‘कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले,
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है।’

भारतीय समाज सम्भवत: दुनिया का सबसे विचित्र समाज है, जहाँ जातिगत नेतृत्व निरंतर स्वयं को सर्वाधिक पिछड़ा और दलित बनाये रखने और सरकार से अपनी माँगें मनवाने की ज़िद पर अड़े हैं। संविधान सभा का विचार था कि समाज में समानता आने पर धीरे-धीरे इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाएगा। लेकिन राजनीति की कलुषित दृष्टि ने इसे स्थायी विघटनकारी स्वरूप में ढाल दिया है। अब यह समझना कठिन है कि आरक्षण का संघर्ष कहाँ जाकर रुकेगा?

जब सभी को आरक्षण की चाशनी पसन्द है, तो फिर आरक्षण की उपयोगिता साबित करने के लिए तथाकथित सवर्णों को कोसना अनुचित ही है। दुनिया का ऐसा कौन-सा दण्डविधान है, जो पूर्वजों की ग़लतियों के लिए वर्तमान पीढ़ी को दण्डित करने को न्यायोचित ठहराता हो? आरक्षण के दावेदारों का यह तर्क कि हमारे पूर्वजों पर सवर्णों ने अत्याचार किये, बिल्कुल सही है। लेकिन वर्तमान में यह सम्भव नहीं है। किसी भी समाज में कुछ अपराधी होना अलग बात है; उससे शायद ही कोई समाज अछूता हो। फिर भी तथाकथित सवर्ण वर्ग अपने पूर्वजों के अपराधों के प्रायश्चित स्वरूप स्वतंत्रता के सात दशकों से भी अधिक समय से इस व्यवस्था को स्वीकार कर रहा है। रही सामाजिक छुआछूत की बात, तो तथाकथित पिछड़ा वर्ग हो या दलित वर्ग, सभी जातियों में यह विकृति विद्यमान है। कई जगह तो एक ही वर्ग में जातिगत भेदभाव के चलते विवाह सम्बन्ध तो दूर, खानपान तक वर्जित है। फिर इस अनुचित परम्परा के लिए अकेले तथाकथित सवर्ण जातियों को ही क्यों दोषी ठहराया जाए? रही बात पिछड़ेपन की, तो दलित और पिछड़े वर्ग के सरकारी सेवाओं में नियुक्त लोग पिछड़ा-दलितवाद के नारे के साथ आरक्षण की मलाई खा रहे हैं। वास्तव में दलित एवं पिछड़ी जातियों में पिछले 70 दशकों में उभर आया एक सम्भ्रांत वर्ग स्वयं अपनी जाति के लोगों का शत्रु बना बैठा है। यथार्थ यही है कि जो जातियाँ आरक्षण के लाभ से जितना अधिक प्रतिनिधित्व हासिल कर चूकी हैं, वही सबसे अधिक आरक्षण बचाओ-आरक्षण बढ़ाओ का शोर मचा रही हैं।

सामाजिक संघर्ष के नाम पर जातिगत गोलबंदी करने वाले लालू यादव को अपने बेटों से अधिक योग्य कोई दलित या पिछड़े वर्ग का नेता पूरे बिहार में नहीं मिला। मुलायम सिंह यादव अखिलेश यादव के परे कुछ नहीं देख पाये। संजय निषाद की निषाद पार्टी, ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा, सोनेलाल पटेल की पार्टी अपना दल, रामविलास पासवान की लोजपा, सभी की यही स्थिति है। पिछड़ावाद एवं सामाजिक असमानता के भावुक नारों के बीच इन्हें सत्ता सुख चाहिए। असल इन लोगों का पूरा ज़ोर इस बात पर रहता है कि उनकी जाति और वर्ग के लोग इनके पीछे गोलबंद होकर इन्हें सत्ता में बनाये रखें। किन्तु जब सत्ता की अधिकारिता विभाजन की बात आती है, तो ये अपने वर्ग क्या, अपनी जाति के लोगों के साथ उसे बाँटने को तैयार नहीं होते। आरक्षण और राजनीतिक संघर्ष में इन जातिवादी नेताओं को साथ सबका चाहिए; लेकिन सत्ता में किसी की भागीदारी बर्दाश्त नहीं है। इस सम्बन्ध में सबसे बड़ा आश्चर्यजनक रु$ख जागृत दलित नेतृत्व का अनुपम उदाहरण कहलाने वाली मायावती जैसी जुझारू राजनेत्री का रहा। उनसे अधिक सामाजिक संघर्ष को कौन समझ सकता है? लेकिन वह भी परिवारवाद का मोह नहीं त्याग पायीं।

आज जिस जातिगत जनगणना की माँग हो रहीं है, उसके मूल में आरक्षण लाभ से अधिक राजनीतिक लाभ की मंशा है। इसके लिए सबसे अधिक उत्सुकता पिछड़े वर्ग से आने वाली सशक्त जातियों, यादव, मौर्य, कुर्मी आदि के नेताओं की ओर से है। इन्हें लगता है कि जातिगत जनगणना से प्राप्त आँकड़ों के आधार पर वे सवर्णों के विरुद्ध पिछड़ों एवं दलितों की गोलबंदी का मोर्चा खोल देंगे। लेकिन यह मामला ख़ुद की अंतर्विरोधों से घिरा है। जातिगत जनगणना के परिणाम पिछड़ों में अगड़ी बन चुकी जातियों के ख़िलाफ़ उसी वर्ग की वास्तविक पिछड़ी जातियों के तीव्र विरोध के रूप में सामने आएगा। पिछड़ा वर्ग की उप-श्रेणियों के निर्धारण हेतु अक्टूबर, 2017 में गठित रोहिणी आयोग की रिपोर्ट पिछले चार दशकों की पिछड़ा वर्ग की राजनीति की दशा-दिशा बदल देगी। वे, जो जाति आधारित राजनीति के बूते सत्ता हथियाने का मुग़ालता पाले बैठे हैं; उनका भ्रम भी दूर हो जाएगा।
आज वास्तविक पिछड़ा और दलित वर्ग भी समझने लगा है कि उसकी प्रगति के वास्तविक शत्रु उन्हीं की जातियों-वर्गों के लोग हैं। प्रश्न है कि जो जातियाँ सत्ता में अपने ही वर्ग को लोगों, यहाँ तक कि अपने परिवार के अलावा अपनी ही जातियों के लोगों को आगे नहीं आने दे रहे, वे किस सामाजिक समता और समान अवसरों के नारा दे रहे हैं?

सन् 2015 की सिविल सेवा परीक्षा में पहली रैंक हासिल करने वाली अनुसूचित जाति की महिला अभ्यर्थी प्री एग्जाम आरक्षण की वजह से पास कर पायीं। उनके माता-पिता आई.ई.एस. अधिकारी रहे थे। अन्यत्र दलित वर्ग से ही आने वाली एक आईएफएस अधिकारी, जो दिसंबर, 2013 में वीजा धोखाधड़ी का आरोप में सुर्ख़ियों में रहीं; के पिता भी आईएएस अधिकारी रहे हैं। ऐसे अनगिनत उदाहरण भरे पड़े हैं। क्या ऐसे लोगों को आरक्षण का लाभ मिलना उचित है? अगर मुलायम सिंह और लालू यादव, रामविलास पासवान, जगजीवन राम के परिवार पिछड़े हैं; तो इस देश को अगड़ा होने की परिभाषा बतायी जानी चाहिए। सत्य तो यही है कि आज बौद्धिक, राजनीतिक एवं मीडिया जगत का एक वर्ग दलित और पिछड़ेपन को गौरवान्वित (ग्लोरिफाइड) करने में लगा है, जिसका ध्येय जातिगत विभाजन को हमेशा ही चर्चा में रखकर सामाजिक विभाजन बनाये रखना है।

जिस जन्मना विशेषाधिकार का विरोध स्वतंत्रता आन्दोलन के दौर से होता रहा है, वर्तमान में उसी को संवैधानिक आधार पर पोषित किया जा रहा है। अमेरिकी दार्शनिक जॉन डेवी लिखते हैं- ‘अतीत में रुचि, वर्तमान की सुरक्षा तथा सुखद भविष्य के निर्माण के लिए किया जाता है।’ लेकिन भारत में जातिवाद एवं वर्ण-व्यवस्था का इतिहास कुरेदकर देश में प्रतिद्वंद्वी वर्ग स्थापित किये जा रहे हैं। समझना होगा कि प्रतिशोध एवं प्रतिस्पर्धा में लिप्त वर्ग सदैव राष्ट्र तथा समाज के लिए घातक सिद्ध होते हैं। इससे एक बात तो तय है कि जिस लक्ष्य को लेकर संविधान सभा ने आरक्षण का प्रावधान किया था, वर्तमान में यह व्यवस्था अपने लक्ष्य से भटक चुकी है। अब यह तय कर पाना कठिन है कि इनमें दोष किसका कम और किसका अधिक है? इसलिए यह सही हो सकता है कि आरक्षण आर्थिक स्थिति के आधार पर होना चाहिए। अन्यथा हर जाति, वर्ग के ग़रीबों का ह$क छिनता रहेगा और यह राष्ट्र की प्रगति में सबसे ज़्यादा बाधक है। भारत विभाजन पर लिखा गया फैज़ का यह शे’र आरक्षण के संघर्ष से उपजी भावना को निरूपित करता है –

‘ये दाग़-दाग़ उजाला, ये शब गज़ीदा सहर;
वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं।’ (सुब्ह-ए-आज़ादी, अगस्त-1947)।

स्वतंत्रता के इस अमृत-काल में यह नितांत आवश्यक है कि आरक्षण की समीक्षा हो। जानना ज़रूरी है कि आरक्षण अपने उद्देश्य में कितना सफल हुआ है? साथ ही इसके दुरुपयोग, लक्षित लाभार्थियों तक पहुँचने में होने वालीं समस्याओं का समाधान हो। सबसे ज़रूरी इसका एक सर्वमान्य स्वरूप निर्धारित हो; जो समाज को जोड़े, न कि उसके लिए विघटनकारी सिद्ध हो।

(लेखक राजनीति एवं इतिहास के जानकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

तस्करों के निशाने पर बेटियाँ

जुलाई के महीने की बरसाती साँझ अभी ढलनी शुरू नहीं हुई थी। लेकिन घटाओं से अटा हुआ आकाश गहरे अँधियारे के साथ जयपुर की सरहदों पर उतर आया था। बादल बदहवास थे, कडक़ रहे थे; लेकिन बरस नहीं रहे थे। तभी सन्नाटे में डूबे पुलिस कंट्रोल का फोन बज उठा। इससे पहले कि ड्यूटी पर तैनात हवलदार नपे-तुले अंदाज़ में बोलता, किसी मासूम की सुबकती हुई आवाज़ सुनायी दी- ‘अंकल मुझे यहाँ से निकालो…, मुझे मम्मी के पास जाना है। …मुझे डर लग रहा है। ये लोग मुझे डराते हैं। …मुझे जवाहर नगर के मकान में कमरे में बन्द कर रखा है। … अंकल! प्लीज जल्दी करो…।’ इससे पहले कि बोखलाया हुआ हवलदार कुछ पूछता फोन कट चुका था। ख़बर रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। अगले ही पल स्टॉफ सँभला और जवाहर नगर थाना प्रभारी अरुण पूनिया को इत्तला दी। जिस मोबाइल नंबर से फोन किया गया था, पूनिया ने तत्काल उस पर सम्पर्क किया। लडक़ी की आवाज़ काँप रही थी। लगता था कि वह ख़ौफ़ से थर्रायी हुई थी। …डरी-सहमी हुई सी लरजती आवाज़ में बमुश्किल इतना ही बता पायी- ‘मैं जवाहर नगर सेक्टर-1 में बत्रा परिवार के बंगले में क़ैद हूँ….।’’ पुलिस को हरकत में आने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा। पीसीआर चेतक पर तैनात पुलिस ने कोई 10 मिनट में बत्रा परिवार का घर तलाश लिया और लडक़ी को दस्तयाब कर लिया।

17 वर्षीय चिरैया (दस्तयाब लडक़ी का काल्पनिक नाम) ने अपनी व्यथा बयाँ करते हुए बताया- ‘मैं ओडिशा की रहने वाली हूँ। कोई दो महीने पहले उसकी मुँह बोली मौसी अनीता उसे यह कहकर दिल्ली ले आयी कि वहाँ उसे काम दिलाएगी। दिल्ली में मौसी उसे अनुज नामक व्यक्ति को सौंपकर चली गयी। बाद में अनुज ने उसे प्रकाश नामक व्यक्ति के हवाले कर दिया। प्रकाश उसे जयपुर ले आया, जहाँ उसने 51,000 रुपये लेकर बत्रा परिवार को मुझे सौंप दिया। बत्रा परिवार मुझसे जमकर काम कराता। यंत्रणा देता। डराता-धमकाता और रूखी-सूखी देकर कमरे में बन्द रखता। …गाँव नहीं जाने देता।’

उधर बत्रा परिवार के अनुज बत्रा परिवार का कहना था कि हमें दो जुड़वाँ बच्चों की देखभाल करानी थी। हमने जय माता दी एजेंसी के प्रकाश से सम्पर्क किया। बातचीत के वह इस लडक़ी को बालिग़ बताते हुए 51,000 रुपये लेकर इसको हमारे हवाले कर गया। हमने जन्म प्रमाण-पत्र माँगा, तो प्रकाश यह कहकर चला गया कि 15-20 दिन में भिजवा देगा। लेकन अभी तक नहीं भिजवाया। लडक़ी गाँव जाना चाहती थी; लेकिन हमने सुरक्षा की दृष्टि से उसे अकेले नहीं जाने दिया। पुलिस ने बत्रा परिवार के अनुज, रुचि, प्रकाश और अनीता के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया है।

मोहब्बत में फँसाकर बेचा
दीपा (काल्पनिक नाम) अरमान की मोहब्बत में इस क़दर दीवानी थी कि हर पल उसकी आँखों में अरमान का ही चेहरा समाया रहता था। तन-से-तन मिला, तो कथित मोहब्बत भी गहरी होती चली गयी। देह की अनवरत यात्रा ने दीपा में कामना का ग़ज़ब तूफ़ान पैदा कर दिया था। अब उसकी आरज़ू अलग-अलग रहकर मिलने से कहीं आगे दबाव तक बढ़ गयी थी कि अब शादी कर लो। जिस लडक़े पर दीपा जान छिडक़ती थी, वह इसे मज़हब के तराजू पर तोलने लग गया कि हमारी शादी मुमकिन नहीं। रिश्तों की बुनियाद सच पर नहीं, झूठ पर टिकी थी; लिहाज़ा उसने कहा कि कहीं भाग चलते हैं। भोली-भाली दीपा को कहाँ पता था कि प्रेमी के मन में दग़ाबाज़ी का ख़याल पल रहा है। यही हुआ कि अरमान दीपा को ओडिशा (उड़ीसा) से भगा लाया, और कोटा के बारां शहर में 50,000 रुपये में बेचकर फ़रार हो गया। ख़रीददार ने लडक़ी का देह-शोषण किया। जब जी भर गया, तो कोटा के नयापुरा निवासी कुंजबिहारी मीणा को 50,000 रुपये में बेच दिया। जब पुलिस को इसकी भनक लगी, तो उसने लडक़ी को दस्तयाब कर लिया। अभी आरोपियों की तलाश जारी है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
अपराध विषेशज्ञों का कहना है कि प्रेम के नाम पर बहेलियों की तरह लड़कियों को फँसाने और बेच देने का खेल आज कल ख़ूब चल रहा है। लड़कियाँ समझ ही नहीं पातीं कि जो शख़्स झूठी मोहब्बत का मुखौटा पहने है, वह उसका जिस्म टटोल रहा होता है। यह बात सिर्फ़ किताबी लगती है कि बदलते ज़माने के साथ स्त्रियों में शौर्य और परिपक्वता का समावेश हुआ है। जिस स्त्री शरीर को पुरुष समाज में आज भी बहुतायत में लोग चीज़ यानी वस्तु समझते हैं, उसी शरीर को महिलाएँ हथियार बनाकर सबक़ सिखाना सीख गयी हैं। लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे पूरी तरह जुदा है। आम पुरुषों को लड़कियों में जिस्म ही दिखता है। ऐसे पुरुष मुखौटा भले ही शराफ़त का ओढ़ लें; लेकिन उनकी आँखें औरतों का जिस्म ही टटोलती रहती हैं। हाल यह है कि लालच देकर या मोहब्बत के नाम पर या ज़ोर-जबरदस्ती, जैसे भी हो बड़े पैमाने पर बच्चियों को, किशोरियों को, युवतियों को, यहाँ तक कि महिलाओं को जिस्मफ़रोशी के धन्धे में धकेला जा रहा है। हाल यह है कि महिला तस्करी का कारोबार एक बड़े और विश्वव्यापी कारोबार में तब्दील हो चुका है।

दुनिया का तीसरा बड़ा अपराध
ड्रग्स और हथियारों की तस्करी के बाद मानव तस्करी दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध है। आज क़रीब 80 फ़ीसदी मानव तस्करी जिस्मफ़रोशी के लिए होती है। नई दिल्ली के पश्चिमी इलाक़ों में घरेलू नौकर उपलब्ध कराने वाली 500 एजेंसियाँ हैं। इनके ज़रिये छोटी बच्चियों को बेचा जाता है। इनसे ज़्यादातर को घरेलू काम के बजाय जिस्मफ़रोशी करने वालों को बेच दिया जाता है। राजस्थान के अलवर में खैरथल और गाजूकी सरीखे ऐसे ठौर-ठिकाने हैं, जहाँ इन लड़कियों को जल्दी से जवान बनाने के लिए ऑक्सीटोसीन नामक इंजेक्शन दिये जाते हैं।

एक प्रतिष्ठित पत्रिका ने बड़े मार्मिक शब्दों में इस ह$कीक़त का मुजाहिरा किया है कि ‘यहाँ न सपनों की दुनिया है, न ख़्वाबों का हमसफ़र, अन्धे हैं तमाम रास्ते, जहाँ रूह को बेचकर हर बात होती है। यहाँ इशारों में जिस्मों को ख़रीदा जाता है। लड़कियों को बहला-फुसलाकर ले जाने में स्थानीय एजेंट काम करते हैं। ऐसे एजेंट गाँवों में बेहद ग़रीब परिवारों की कम उम्र की बच्चियों पर नज़र रखकर उनके परिवारों को शहरों में अच्छी नौकरी का झाँसा देते हैं। कहीं-कहीं लड़कियों को प्रेमजाल में फँसाकर भगा लिया जाता है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि सन् 2021 में 6,533 मानव तस्करी के मामले सामने आये। रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि इसमें केवल मानव तस्करी-रोधी इकाइयों में दर्ज मानव तस्करी के मामले हैं। ज़ाहिर है कि और भी कई मामले ऐसे हो सकते हैं, जो इन इकाइयों तक पहुँचे ही नहीं। ज़्यादातर मामले वेश्यावृत्ति करवाने और चाइल्ड पोर्नोग्राफी के हैं। सबसे ज़्यादा बाल वेश्यावृत्ति के लिए राजस्थान में मानव तस्करी हो रही है। मानव के बढ़ते मामल राजस्थान पुलिस के लिए चुनौती बने हुए हैं। नेशनल क्राइम ब्यूरो रिकॉर्ड के आँकड़ों की मानें, तो मानव तस्करी में राजस्थान देश में दूसरे नंबर पर है।

प्रयास नाकाफ़ी
हालाँकि कई संस्थाओं के सहयोग से पुलिस लगातार बाल-वेश्यालयों और बाल-मज़दूरी के मामलों की धरपकड़ के अभियान चलाती है। लेकिन इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है। अलवर के खैरथल गाजूकी और बूँदी के रामगढ़ आदि इलाक़ों की बात करें, तो वहाँ के लोगों पर खेलाबड़ी के नाम से इस धन्धे से जुड़े हुए हैं। इसकी आड़ में यहाँ मर्द आस-पास के गाँवों से बच्चियों को उड़ाने और बेचने के कारोबार से भी जुड़े हुए हैं। स्कूलों में ग़रीब लड़कियों को पढ़ाने के नाम से भी कई धन्धेबाज़ जुड़े हुए हैं। लेकिन इनकी पोल बेनक़ाब होने पर ही खुलती है। मसलन केरल के जिस स्कूल मे बच्चियों को पढ़ाने के नाम से ले जाया जा रहा था। असल में वो स्कूल था ही नहीं। राजस्थान पुलिस ने वहाँ से बाल-वेश्यवृत्ति में फँसी एक दर्ज़न लड़कियों को मुक्त करवाया। आदिवासी इलाक़ों से लड़कियों की तस्करी के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। राजस्थान पुलिस ने बदहवास हालत में मिलीं छत्तीसगढ़ से बाँसवाड़ा की एक दर्ज़न लड़कियों को मुक्त करवाया।

मानव तस्करी बहुत बड़े पैमाने पर की जा रही है, जिसमें कम उम्र के बच्चों, ख़ासतौर से लड़कियों को निशाना बनाया जा रहा है। भारत में कई संस्थाएँ हैं, जो यौन तस्करी (सेक्स ट्रैफिकिंग) से पीडि़त लोगों के लिए काम करती है। इसकी प्रमुख डॉ. सुनीता कृष्णन का प्रज्ज्वला नाम का एनजीओ है। डॉ. सुनीता ख़ुद एक दुष्कर्म पीडि़ता रह चुकी हैं। उनकी यह संस्था तस्करी की शिकार महिलाओं और बच्चियों के लिए पुनर्वास कराने का काम करती है। प्रज्ज्वला जिस्मफ़रोशी में लिप्त महिलाओं के बच्चों उज्ज्वल भविष्य के लिए भी काम करती है, ताकि वे एक बेहतर जीवन जी सकें। सुनीता कहती है कि चकला घरों से महिलाओं को बचाकर लाना बेहद मुश्किल काम होता है। इस दौरान अक्सर उन पर हमले भी किये गये हैं।

मांस निर्यात में भारत बन रहा अग्रणी!

अवैध बूचड़ख़ानों की संख्या वैध बूचड़ख़ानों से क़रीब दो गुना है ज़्यादा

इस साल अप्रैल महीने में भारत में दोबारा हलाल मीट (मांस) को लेकर बहस हुई थी। बहस की शुरुआत कर्नाटक के कुछ हिन्दू संगठनों द्वारा हिन्दुओं से होसातोड़ाकु के दिन हलाल मीट न ख़रीदने की अपील करने से हुई। इस मुद्दे पर बहस से राजनीति शुरू हो गयी और ऐसी राजनीति हुई कि हलाल और झटका मीट का मामला पूरे देश में बहस का मुद्दा बना।

इस विवाद में आग में घी डालने का काम कर्नाटक पशुपालन विभाग की उस चिट्ठी ने किया, जो उसने जनवरी, 2020 में बृहत बेंगलूरु महानगर पालिका को 01 अप्रैल को लिखी थी। कर्नाटक पशुपालन विभाग ने चिट्ठी में लिखा कि मिनिस्ट्री ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री के अधीन आने वाले एग्रीकल्चरल ऐंड प्रोसेस्ड फूड एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी ने रेड मीट (लाल मांस) नियमावली (मैनुअल) से हलाल शब्द हटाकर जानवरों को आयात करने वाले देशों के नियमों से काटा है। मुस्लिम संगठनों ने इस पर आपत्ति जतायी थी। यह बहस इतनी बढ़ी कि कई मांस बेचने वाले कुछ होटलों, रेस्टोरेंट और दुकानों पर हलाल, तो कुछ पर झटका आदि लिखा जाने लगा।

कर्नाटक में होसातोड़ाकु का मतलब नये साल की शुरुआत होता है। भाजपा, जो कि इस तरह के मुद्दों पर हर हाल में आगे रहती है; इस मुद्दे पर भी राजनीति करने में आगे ही रही। कई भाजपा नेताओं के हलाल और झटका को लेकर बयान आये। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव सी.टी. रवि ने तो हलाल मीट को आर्थिक जेहाद तक कह दिया। स्टेट ऑफ द ग्लोबल इस्लामिक इकोनॉमी रिपोर्ट 2020-21 कहती है कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हलाल मीट का निर्यातक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2020-21 में भारत ने 14.2 अरब डॉलर (2021 में क़रीब 1,057.9 अरब रुपये) का हलाल मीट निर्यात किया था। इतना ही नहीं, भारत दुनिया के 70 से ज़्यादा देशों में मीट और एनिमल प्रोडक्ट्स का निर्यात करता है।

सरकारी आँकड़े बताते हैं कि भारत ने वित्त वर्ष 2020-21 में भैंसों (नर और मादा) का 10.86 लाख मीट्रिक टन मीट दुनिया भर में निर्यात किया, जिसकी कुल क़ीमत 23,460 करोड़ रुपये थी। वहीं गोमांस (बीफ) निर्यात 16 लाख टन से ज़्यादा किया है। माना जा रहा है कि साल 2026 तक भारत क़रीब 19.30 लाख टन गोमांस का निर्यात करेगा। मांस निर्यात पर एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भाजपा की सरकार केंद्र में आने के बाद गोमांस निर्यात बढ़ा है। सन् 2017 में मांस निर्यात को लेकर लोकसभा में सरकार की ओर से ही कहा गया था कि मांस निर्यात 17,000 टन बढ़ गया है।

सवाल यह है कि भारत में वैध बूचड़ख़ाने कितने हैं? स्टेट ऑफ द ग्लोबल इस्लामिक इकोनॉमी की रिपोर्ट की मानें, तो भारत में केवल 111 बूचड़ख़ाने ही ऐसे हैं, जहाँ पशुओं को काटने के लिए तय मानकों और दिशा-निर्देशों का पालन किया जाता है। जबकि 1,707 बूचड़ख़ाने पूरे देश में रजिस्टर्ड हैं। बाक़ी अवैध तरीक़े से चोरी-छिपे चलने वाले बूचड़ख़ानों की संख्या वैध बूचड़ख़ानों से क़रीब दोगुनी है। पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा), जो कि एक पशु संरक्षक संस्था है; के अनुसार, भारत में अवैध बूचड़ख़ानों की संख्या 30,000 से भी ज़्यादा है। इसके अलावा लाखों की संख्या में पशु काटकर उनका मांस बेचने वाली दुकानें भी भारत में हैं।

मध्य प्रदेश के नीमच निवासी आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने साल 2021 में एक आरटीआई डाली थी, जिसके जवाब में भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने बताया था कि देश के अधिकतर राज्यों में अवैध बूचड़ख़ाने चल रहे हैं। एफएसएसएआई ने आरटीआई के जवाब में कहा कि मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, दादरा व नगर हवेली, दमन व दीव और चंडीगढ़ में एक भी बूचड़ख़ाना खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम-2006 के तहत पंजीकृत नहीं है। लाइसेंस प्राप्त यानी पंजीकृत बूचड़ख़ानों में तमिलनाडु में सबसे ज़्यादा 425 पंजीकृत (रजिस्टर्ड) हैं। वहीं मध्य प्रदेश में 262, महाराष्ट्र में 249, पंजाब में 112, छत्तीसगढ़ में 111, राजस्थान में 84, हिमाचल प्रदेश में 82, लक्षद्वीप में 65, उत्तर प्रदेश में 58 बूचड़ख़ाने पंजीकृत हैं। इसके अलावा असम में 51, केरल में 50, कर्नाटक में 30, जम्मू-कश्मीर में 23, उत्तराखण्ड में 22, हरियाणा में 18, दिल्ली में 14, झारखण्ड में 11, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में नौ तथा बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में पाँच-पाँच बूचड़ख़ाने पंजीकृत हैं। वहीं गोवा, गुजरात व मणिपुर में चार-चार और पुदुचेरी में दो बूचड़ख़ाने पंजीकृत हैं, तो आंध्र प्रदेश व मेघालय में एक-एक बूचड़ख़ाना पंजीकृत है।

वित्त वर्ष 2019-20 की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में भैंसों (मादा) की संख्या क़रीब 10.98 करोड़, गायों की संख्या 14.51 करोड़, बकरियों की संख्या क़रीब 15 करोड़, भेड़ों की संख्या क़रीब 7.5 करोड़, 2.5 लाख, गधों की संख्या 1.2 लाख है। इनमें से भैंसों, ऊँटों और गधों की संख्या पहले के मुक़ाबले तेज़ी से घटी है, जो कि चिन्ताजनक है। एक अनुमान के अनुसार, हर साल क़रीब 20 फ़ीसदी जानवर मांस के लिए काट दिये जाते हैं।

सवाल यह है कि सन् 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान उस समय प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नरेंद्र मोदी ने भारत से बड़ी मात्रा में मीट का निर्यात करने का आरोप यूपीए सरकार पर लगाते हुए तत्कालीन सरकार की कड़ी आलोचना की थी। अगर किसी को याद हो, तो उस भाषण को याद किया जाना चाहिए, जिसमें सांसद और प्रधानमंत्री चुने जाने से पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था- ‘भाइयों-बहनों आपका कलेजा रो रहा या नहीं, मुझे नहीं मालूम; लेकिन मेरा कलेजा चीख-चीखकर पुकार रहा है। …और आप कैसे चुप हैं? कैसे सह रहे हैं? मैं समझ नहीं पा रहा हूँ।’

मोदी का यह बयान मीट निर्यात को लेकर ही था। लेकिन सन् 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद गोरक्षा के नाम पर विभिन्न हिन्दू संगठनों ने एक अभियान चलाया, जिसमें भाग लेने वालों ने कई जगह गायों को ले जाने वाले लोगों की बुरी तरह पिटाई भी की थी। भीड़ द्वारा पिटाई यानी मॉब लिंचिंग का यह सिलसिला क़रीब दो-ढाई साल तक चला। इस डर से गायों को पालने वालों में ज़्यादातर ने गायों को पालना कम कर दिया, जिसके चलते आज आवारा पशुओं; ख़ासकर गोवंश की संख्या में काफ़ी तेज़ी से इज़ाफ़ा हो चुका है। 20वीं पशुगणना-2019 के अनुसार, अकेले उत्तर प्रदेश में क़रीब 11.84 लाख आवारा गोवंश हैं। इतना ही नहीं, भारत से मांस का निर्यात भी तेज़ी से बढ़ा है, और बढ़ ही रहा है। एक रिपोर्ट की मानें तो गोमांस निर्यात के मामले में पूरी दुनिया में भारत सबसे ऊपर है और पिछले आठ वर्षों से बढ़ते-बढ़ते अब नंबर-1 पर पहुँच चुका है। भैंसों (नर-मादा) के मांस के निर्यात में भी भारत पहले स्थान पर पहुँच चुका है। इस ओर सरकार को ध्यान देने की ज़रूरत है। सवाल सिर्फ़ इतना ही नहीं है, सवाल यह भी है कि भाजपा नेताओं पर, ख़ासकर गोवा के नेताओं पर गोमांस खाने के आरोप लगते रहे हैं। क्या यह सही है? इसमें कोई दो-राय नहीं कि राजनीतिक इच्छा के बिना कुछ भी नहीं होता। आजकल तो सत्ताएँ हर मामले में इतनी दख़ल रखती हैं कि अगर कोई उनके ख़िलाफ़ होकर काम करे, तो कर ही नहीं सकता। फिर अवैध तरीक़े से पशु कैसे कट सकते हैं?

आजकल जब डॉक्टरों के अलावा नेता भी शाकाहार की ओर लौटने की सलाह दे रहे हैं। हिन्दू संगठन शाकाहारी होने की माला जप रहे हैं; तब भारत से बड़ी मात्रा में मांस निर्यात का मुद्दा कहाँ $गायब हो गया है? यह बात साफ़ है कि हमारे देश में हर धर्म के लोग रहते हैं और तक़रीबन सभी धर्मों में कम या ज़्यादा संख्या में मांस का सेवन करते हैं। यहाँ तक कई धर्मों में बलि प्रथा का चलन है, जिससे हिन्दू धर्म भी अछूता नहीं है। ऐसे में अगर कोई किसी को मांस खाने को लेकर पीटता है, और जानवरों का क़त्ल बढ़ता है, तो सवाल यही उठता है कि आखिर केंद्र सरकार मांस खाने और बेचने के मामले पर एक स्पष्ट नीति क्यों नहीं बनाती?

क्या रंगभेद का शिकार हुए सुनक?

LONDON, ENGLAND - JULY 17: (ONE MONTH FREE EDITORIAL USE; NO ARCHIVING) In this handout image provided by ITV, Conservative leadership candidate Rishi Sunak and Liz Truss during Britain's Next Prime Minister: The ITV Debate at Riverside Studios on July 17, 2022 in London, England. At 7pm on Sunday 17th July Live on ITV, Julie Etchingham hosts an hour-long debate in London with the five Conservative Party leadership contenders, vying to become Britains Prime Minister. All five candidates have agreed to take part and over the course of the 60-minute programme, they will debate with each other in response to questions put by the host. Taking place on the eve of the next round of voting, Rishi Sunak, Penny Mordaunt, Liz Truss, Tom Tugendhat, and Kemi Badenoch will debate the issues dominating the campaign. Each candidate will have the opportunity to make a closing statement. ITV is the UKs biggest commercial broadcaster and the programme will give the audience the opportunity to get to know more about the candidates and help them decide who has the qualities to be our new Prime Minister. Britains Next Prime Minister: The ITV Debate will also be streamed live on ITV Hub, as well as through ITV.com/news, ITV News YouTube channel, facebook and on Twitter. (Photo by Jonathan Hordle / ITV via Getty Images)

ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनने के बाद लिज़ ट्रस के सामने हैं ढेरों चुनौतियाँ

क्या ऋषि सुनक भारतीय मूल के नहीं होते, तो अपनी योग्यता के बूते ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन गये होते? बहुत-से हलक़ों में यह सवाल रहे हैं कि रंगभेद ऋषि सुनक और प्रधानमंत्री की कुर्सी के बीच दीवार बन गया। सुनक या उनके समर्थकों ने अपनी हार से पहले या बाद में भले ऐसी कोई बात नहीं की; लेकिन जिस तरह तत्कालीन प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने सुनक के ख़िलाफ़ कंजर्वेटिव पार्टी के भीतर अभियान चलाया, रंगभेद समर्थक नेताओं को विरोध के लिए आगे किया और सुनक की छवि बिगाडऩे की कोशिश की, उससे सुनक की हार में रंगभेद को एक कारण मानने वालों की कमी नहीं है।

भारतीय मूल के उद्यमी और कंजरवेटिव पार्टी के दानदाता लॉर्ड रामी रोजर ने तो सितंबर के शुरू में ही एक वीडियो जारी करके कहा था कि अगर ऋषि सुनक चुनाव हार जाते हैं, तो ब्रिटेन को रंगभेदी देश के रूप देखा जा सकता है। लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि यह आम चुनाव नहीं था, बल्कि सिर्फ़ कंजर्वेटिव पार्टी (ब्रिटेन की कुल आबादी का महज़ 0.25 फ़ीसदी) के भीतर का चुनाव था। आम चुनाव होते, तो शायद लिज़ पर सुनक भारी पड़ते।

वैसे लिज़ ट्रस और ऋषि सुनक के बीच मुक़ाबला कड़ा रहा। दोनों में 20,927 वोटों का अन्तर रहा। कंजर्वेटिव सांसदों की वोटिंग में सुनक शीर्ष पर बने हुए थे; लेकिन बाद में प्रतिनिधि समर्थन में वह पिछड़ गये। एक सर्वे कम्पनी यूगोव ने अपने एक सर्वे में दावा किया था कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद की रेस में स्विंग वोटर्स के बीच ऋषि सुनक ज़्यादा लोकप्रिय हैं। सर्वे के मुताबिक, सुनक ऐसे मतदाताओं के बीच पसंदीदा हैं, जिन्होंने सन् 2019 के आम चुनाव में पहली बार कंजरवेटिव पार्टी को वोट दिया था।

हैरानी की बात है कि कंजर्वेटिव पार्टी के सांसद लिज़ के हक़ में नहीं थे। सर्वे में हिस्सा लेने वाले ग़ैर-कंजर्वेटिव लोग कह रहे थे कि लिज़ सबसे कमज़ोर प्रधानमंत्री साबित होंगी। ऋषि पार्टी सांसदों की पहली पसन्द थे। हर सांसद उनकी क़ाबिलियत से वाक़िफ़ था। इसके बावजूद सुनक महँगाई कम करने और टैक्स रिलीफ के मुद्दों पर अपने स्टैंड से पीछे नहीं हटे। यह समझदार नेता की पहचान है। इसके बावजूद लिज़ जीत गयीं। सुनक टोरी सदस्यों के बीच मतदान के दौरान प्रतिद्वंद्वी ट्रस से पिछड़ गये। मार्गरेट थैचर और टेरेसा मे के बाद लिज़ ट्रस (47) ब्रिटेन की तीसरी महिला प्रधानमंत्री हैं।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के रूप में बोरिस जॉनसन ने 7 जुलाई को जब इस्तीफ़ा दिया था, तो उससे पहले उनके ख़िलाफ़ इस्तीफ़ा देने वालों में पूर्व चांसलर ऋषि सुनक सबसे पहले नेता थे। जॉनसन इस बात को कभी नहीं भूले और अपने समर्थकों को लगातार सुनक के ख़िलाफ़ सक्रिय रखा।

जीत के बाद लिज़ ट्रस ने कहा- ‘कंजर्वेटिव पार्टी की नेता चुनी जाने के बाद मुझे गर्व महसूस हो रहा है। देश के नेतृत्व के लिए मुझ पर विश्वास जताने के लिए धन्यवाद। इस मुश्किल समय में देश की अर्थ-व्यवस्था को आगे बढ़ाने और पूरी क्षमता को उजागर करने के लिए मैं साहसिक क़दम उठाऊँगी।’ उधर ऋषि सुनक ने जीत पर ट्रस को बधाई दी और उनके साथ चलने का सभी कंजर्वेटिव सदस्यों का आह्वान किया। उन्होंने कहा- ‘कंजर्वेटिव पार्टी एक परिवार है। अब हम नयी प्रधानमंत्री लिज़ ट्रस के पीछे एकजुट हैं; क्योंकि वह मुश्किल वक़्त में देश की कमान सँभालने जा रही हैं।’

लिज़ ट्रस को पाला बदलने में माहिर माना जाता रहा है। राजनीतिक करियर की शुरुआत में लिज़ लिबरल डेमोक्रेट थीं और बाद में मौके के अनुसार कंजर्वेटिव हो गयीं। यही नहीं, जब लिज़ कॉलेज में थीं, तो मोनार्की (राजशाही) की जबरदस्त विरोधी थीं। उनके पुराने भाषण इस बात के गवाह हैं। लेकिन बाद में पाला बदलकर लिज़ बकिंघम पैलेस और शाही खानदान की पक्षधर हो गयीं और आख़िर महारानी से ही उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। एक और उदाहरण बोरिस जॉनसन के दौर में ब्रिटेन के यूरोपीय यूनियन से बाहर निकलने (ब्रेक्जिट) का मुद्दा है। एक समय यूरोपीय यूनियन में रहने की वकालत करने वाली लिज़ बाद में ब्रेक्जिट की समर्थन बन गयीं।

लिज़ की चुनौतियाँ
प्रधानमंत्री बनने के बाद अब लिज़ ट्रस के सामने गम्भीर क़िस्म की चुनौतियाँ हैं। उन्हें बिना देरी वादा निभाते हुए टैक्स रिलीफ और बिजली बिल में राहत देनी होगी। अर्थ-व्यवस्था को सन्तुलित करना होगा; नहीं तो ब्रिटेन को मंदी की चपेट में आने से कोई नहीं रोक पाएगा।

जीत के बाद अगर लिज़ के पहले भाषण को $गौर से सुनें, तो ज़ाहिर होता है कि व्यापार और अर्थ-व्यवस्था के मास्टर कहे जाने वाले ऋषि सुनक की अपनी सत्ता में फायरब्रांड लिज़ को कितनी ज़रूरत होगी। लिज़ ने स्वीकार किया कि उन्हें ऋषि की गहरी समझ की ज़रूरत होगी। उन्होंने पार्टी में सुनक जैसे नेता के होने को $खुशक़िस्मती करार दिया। हालाँकि चुनाव प्रचार के दौरान लिज़ ने सुनक की समझदारी पर एक से ज़्यादा बार सवाल उठाये थे। उनकी जीत के बाद ब्रिटिश मीडिया में भी अब कहा जा रहा है कि क्या लिज़ $फौरन टैक्स रिलीफ जैसा चुनावी वादा पूरा कर पाएँगी या अगला चुनाव जल्द होगा? चुनाव प्रचार के दौरान चतुर लिज़ ट्रस ने सुनक की काट बड़ी मुश्किल से खोजी। ब्रिटिश मीडिया में भी इसे लेकर खूब छपा। मशहूर अखबार ‘द गार्डियन’ ने एक रिपोर्ट में कहा कि सुनक वित्त मंत्री रहे। वह अर्थ-व्यवस्था की बारीकियों को बहुत अच्छी तरह समझते थे। उन्होंने पूरे अभियान के दौरान यह साफ़ कहा कि टैक्स में कमी करने से अर्थ-व्यवस्था और लोगों के हालात बेहतर नहीं होंगे। इसके लिए दूसरे तरीक़ों से महँगाई पहले कम करनी होगी।

‘द गार्डियन’ के अनुसार, इसके विपरीत ट्रस ने लोकलुभावन वादे किये और कहा कि प्रधानमंत्री बनते ही वह सबसे पहले टैक्स रिलीफ देंगी। महँगाई और गैस की कमी जैसे मुद्दों पर बाद में भी काम किया जा सकता है। सुनक ट्रस की इस अर्थ-व्यवस्था नीति के स$ख्त विरोध में बोले और इसे अर्थ-व्यवस्था को तबाह करने का रास्ता बताया। अ$खबार के मुताबिक, सुनक बीमारी का स्थायी इलाज खोजने की बात कर रहे थे। लिज़ ने कुछ वक़्त तक इसे क़ाबू में रखने की बात कही। सवाल यही है कि क्या लिज़ $फौरन टैक्स रिलीफ का वादा पूरा कर पाएँगी?


“चुनाव कैंपेन में मुझे वोट करने के लिए हर एक का धन्यवाद। मैं अगले चुनाव में पार्टी लीडरशिप की रेस में बना रहूँगा। मैं कंजर्वेटिव पार्टी का सांसद हूँ। हमारी सरकार है। सांसद या किसी और तरी$के से ही सही, मैं अपनी सरकार की मदद करूँगा।’’
ऋषि सुनक
पराजित उम्मीदवार

महारानी का देहांत

लिज ट्रस को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाने के दो दिन बाद 8 सितंबर को ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय का 96 साल की उम्र में स्कॉटलैंड के बाल्मोरल महल में निधन हो गया। इससे पहले सिर्फ़ एक बार बलमोराल महल में सत्ता हस्तांतरण 1885 में हुआ था, जब महारानी विक्टोरिया गद्दी पर थीं। बता दें कि ब्रिटेन में नये बनने वाले प्रधानमंत्री महारानी से एक छोटे समारोह में बकिंघम पैलेस में मिलते हैं, जो सेंट्रल लंदन में है। वैसे सन् 1952 के बाद लंदन से बाहर यह आयोजन केवल एक बार हुआ, जब विंस्टन चर्चिल नयी महारानी से हीथ्रो हवाई अड्डे पर मिले थे। यह महारानी के पिता किंग जॉर्ज षष्टम् के निधन के बाद की बात है। एलिजाबेथ द्वितीय 15 प्रधानमंत्रियों के समय में ब्रिटेन की महारानी रहीं। उनके निधन के बाद प्रिंस चाल्र्स ब्रिटेन के राजा बने हैं। महारानी ने घोषणा की थी कि प्रिंस चाल्र्स जब सिंहासन पर बैठेंगे, तो उनकी पत्नी कैमिला, जो डचेस ऑफ कॉर्नवाल हैं; रानी कंसोर्ट बन जाएँगी। जब ऐसा होगा, तो कैमिला को राज माता का प्रसिद्ध कोहिनूर ताज मिलेगा। तीन बार भारत की यात्रा करने वाली एलिजाबेथ महज़ 25 साल की थीं, जब सन् 1952 में ब्रिटेन की गद्दी पर उनकी ताजपोशी हुई थी। एलिजाबेथ द्वितीय के शासन के 70 साल पूरे हो गये थे, जब उनका निधन हुआ। कुछ समय से अस्वस्थ होने के कारण महारानी कहीं आने-जाने में असमर्थ थीं। लिहाज़ा वह अपनी मुलाक़ातें लंदन के बकिंघम पैलेस की बजाय स्कॉटलैंड के बाल्मोरल कैसल में कर रही थीं। प्रधानमंत्री मोदी सहित दुनिया भर के नेताओं ने उनके निधन पर शोक जताते हुए उन्हें कई मायनों में महान् करार दिया। प्रधानमंत्री लिज़ ट्रस ने अपनी श्रद्धांजलि में कहा कि महारानी अपने पीछे एक महान् विरासत छोड़ गयी हैं और उन्होंने देश को स्थिरता और ताक़त भी प्रदान की है।

घट रहा असली दूध का उत्पादन

दुधारू पशुओं में लम्पी बीमारी और पशुपालकों की निराशा से पैदा हो रही समस्या

तक़रीबन अस्सी के दशक में मैं जब छोटा था, तो जब भी किसी बुज़ुर्ग को, ख़ासतौर पर बुज़ुर्ग महिलाओं को नमस्ते करने पर एक आशीर्वाद ज़रूर मिलता था- ‘दूधो नहाओ, पूतों फलो’ यानी तुम्हारे घर में ख़ूब दूध-घी हो और तुम्हारे कुल की वंश-बेल ख़ूब फले-फूले यानि घर बच्चों की किलकारियों से भरा रहे। लेकिन न तो अब यह आशीर्वाद किसी को मिलते देखने-सुनने में आता है और न ही दूध ही सबको मिल पा रहा है। कहने को हिन्दुस्तान दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है।

पूरी दुनिया में कुल उत्पादित दूध का 22 फ़ीसदी दूध हिन्दुस्तान में होता है। दूध के इतने उत्पादन के बावजूद न तो देश की पूरी आबादी को दूध उपलब्ध हो पा रहा है, और न ही उन सबको शुद्ध दूध मिल पा रहा है, जिन्हें दूध उपलब्ध हो पा रहा है। क्योंकि दूध तो पहले ही पानी की मिलावट के लिए जाना जाता है, और अब तो न सिर्फ़ तरह-तरह की मिलावट हो रही है, बल्कि बड़ी मात्रा में जानलेवा केमिकल्स से नक़ली दूध भी बन रहा है। लेकिन इससे दु:खद यह है कि देश में प्राकृतिक दूध उत्पादन घटता जा रहा है। प्राकृतिक इसलिए कहा, क्योंकि ये दूध गाय, भैंस और बकरी आदि से प्राकृतिक रूप से प्राप्त होता है। इस प्राकृतिक दूध की कमी के चलते केमिकल से बनने वाले नक़ली दूध में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है।

गाय-भैंस के दूध का उत्पादन घटने के कई कारण हैं। पहला तो यह कि पिछले तीन-चार दशक में हरे चारे के मैदान तक़रीबन ख़त्म हो चुके हैं। दूसरा यह कि अब पशुओं के चारे और दाने में भी पहले जैसी ताक़त और गुणवत्ता नहीं है। तीसरा यह कि पिछले कुछ दशकों से चारा लगातार महँगा होता जा रहा है। चौथा बड़ा कारण कि पशु महँगे होते जा रहे हैं और पशुओं को बीमारियाँ पहले से ज़्यादा होने लगी हैं। इन सब कारणों से ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन कम होता जा रहा है। दूध की बढ़ती माँग और असली दूध के घटते उत्पादन का परिणाम यह हुआ कि केमिकल से नक़ली दूध बनाने वाले अनाप-शनाप पैदा हो गये।

आज उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई शहर नक़ली दूध उत्पादन के अड्डे बने हुए हैं। नक़ली दूध बनने का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि वित्त वर्ष 2010-11 में हिन्दुस्तान में कुल 1,218 लाख टन दूध का उत्पादन होता था, जो वित्त वर्ष 2019-20 में बढक़र 1,984 लाख टन हो गया। लेकिन ये आँकड़े हैं; और इनमें सच्चाई कितनी है, इस पर ठीक से नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि जब गाय-भैंस का पालन गाँवों में घटा है, तो फिर उत्पादन कैसे बढ़ गया? ज़ाहिर है कि देश में तेज़ी से बढ़ रहीं नक़ली दूध की फैक्ट्रियाँ दूध उत्पादन के आँकड़ों में इज़ाफ़ा कर रही हैं। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि जितना असली दूध गायों और भैंसों से मिल रहा है, उससे तक़रीबन चार गुना ज़्यादा दूध लोगों तक पहुँच रहा है। जानकार बताते हैं कि कई दुग्ध डेयरियों में मिल्क पाउडर, पाम ऑयल और केमिकल से नक़ली दूध तैयार किया जाता है। एक किलो मिल्क पाउडर से 11 लीटर दूध तैयार किया जाता है। एक बोरी में 50 किलोग्राम मिल्क पाउडर होता है। यानी एक बोरी से 550 लीटर नक़ली दूध तैयार किया जाता है।

सवाल यह है कि अगर प्राकृतिक यानी गाय-भैंस के दूध का उत्पादन घट रहा है, तो फिर दूध उत्पादन के आँकड़े बढ़ कैसे रहे हैं? ज़ाहिर है कि नक़ली दूध ख़ूब सप्लाई हो रहा होगा; लेकिन इन नक़ली दूध बनाने वालों पर कोई शिकंजा कसने वाला नहीं है, जिससे असली दूध समझकर इसे पीने वालों को भयंकर शारीरिक नुक़सान हो रहा है।

दूध उत्पादन सहयोग समितियाँ धीरे-धीरे बन्द होती जा रही हैं। डेयरी मालिकों और प्रबंधकों ने पशुपालकों और किसानों से तो दूध कौड़ी भाव में ख़रीदना शुरू कर दिया है; लेकिन उसे बेचते सोने के भाव हैं। गाँवों में अभी भी भैंस का दूध 38-40 रुपये लीटर और गाय का दूध 23-24 रुपये लीटर ही बिकता है। यह भाव दूध की ख़रीदारी करने वाली सहकारी और निजी डेयरी समितियों के हैं। इसलिए किसानों और पशुपालकों का पशुपालन से लगातार मोह भंग होता जा रहा है। हाल यह है कि देश में दूध समितियों की संख्या घटकर क़रीब 70 फ़ीसदी रह गयी है। हालाँकि ऐसी दुग्ध डेयरी भी हैं, जो शुद्ध दूध और उससे बने उत्पादों के लिए विश्वसनीय हैं। लेकिन उनकी हदें हैं, यानी वो पूरे देश में तो दूध की सप्लाई नहीं कर सकतीं।

दरअसल गोरक्षा के नारे के बाद लोगों ने गायों का पालन कम कर दिया है, जिससे आवारा गायों और गोवंश की संख्या बहुत ज़्यादा बढ़ गयी है। ऐसे में सरकारों और बैंकों को चाहिए कि पशुपालन के बढ़ावे के लिए सब्सिडी पर लोन मुहैया कराकर ग्रामीणों के साथ-साथ शहरों में भी पशुपालन के लिए प्रोत्साहित करें। साथ ही किसानों और पशुपालकों में जागरूकता लाने की भी ज़रूरत है। ज़ाहिर है कि अगर दूध उत्पादन बढ़ेगा, तो न तो दूध पीते बच्चों को दूध की परेशानी होगी और न ही किसी को नक़ली केमिकल युक्त दूध का इस्तेमाल करना पड़ेगा। ऐसा होने पर लोग स्वस्थ रहेंगे। दूध और दूध से बने उत्पाद हर एक इंसान, ख़ासतौर पर बच्चों के विकास के लिए बहुत ज़रूरी आहार है।

आज हिन्दुस्तान में लगातार कुपोषण के बढ़ते मामले इस बात के गवाह हैं कि दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देश हिन्दुस्तान में ही लोग दूध को तरस रहे हैं। पहले शहरों में असली दूध और दूध से बने उत्पादों की चीज़ों की दिक़्क़त थी; लेकिन अब गाँवों में भी दूध और दूध से बनी चीज़ों की कमी होने लगी है।

दरअसल असली हिन्दुस्तान तो गाँवों में बसता है और इन गाँवों से ही लोगों का पेट भरता है। ज़ाहिर है कि अगर गाँवों में चीज़ें कम पैदा होंगी, तो उनकी दिक़्क़त तो पूरे देश के लोगों को होगी ही। दूध के मामले में भी यही सब हो रहा है। गाँवों में गायों और भैंसों का पालन घटने से दूध जैसे पोषक तत्त्वों से भरपूर उत्पाद की कमी लगातार नक़ली दूध बनाने वालों को प्रोत्साहित कर रही है। उत्तर प्रदेश के एक गाँव के रहने वाले किसान ने बताया कि उनके बचपन में भी उनके घर में पाँच-छ: भैंसें और गायें पलती थीं; लेकिन अब इन्हें पालना बहुत महँगा हो गया है, क्योंकि चारा बहुत-ही महँगा है; जबकि दूध वही 35-40 रुपये लीटर ही बिकता है, इसलिए वह केवल घर में दूध-घी के लिए अब एक ही भैंस पालते हैं। पहले हमारे घर में घी के घड़े भरे रहते थे। कई-कई हाँडी दूध हर रोज़ उबलता था। जिनके घर दूध नहीं होता, उन्हें मुफ़्त में दूध दे दिया करते थे। मट्ठे और दही के पैसे कभी किसी से नहीं लिये। अब सब उलट हो रहा है।

ज़ाहिर है कि ऐसे बहुत-से किसान और पशुपालक होंगे, जो केवल घर में दूध-घी की ज़रूरत को देखते हुए ही अब एकाध गाय या भैंस पाल रहे हैं। ऐसे में दूध की कमी तो होगी ही होगी। हाल यह है कि अब शहरों में ही नहीं, गाँवों में भी न पहले की तरह दूध बचा है और न घी। हालात इतने बुरे हैं कि अधिकतर बच्चों को पिलाने के लिए थैली वाला दूध पिलाना मजबूरी बनता जा रहा है, जिसमें केमिकल मिला हुआ है। इसमें कुछ हद तक मिलावटी या पूर्णतया नक़ली दूध भी हो सकता है। हैरानी की बात तो यह है कुछ लोगों को अब यह थैली वाला दूध भी जुटाना किसी चुनौती से कम नहीं है। लोगों में डर है कि उनके बच्चे बीमार न हो जाएँ, दूसरा बहुत से लोगों की कमायी काफ़ी कम हो गयी है और बहुत-से लोग पूरी तरह बेरोज़गार हो गये हैं। ऐसे में उनके रोटी के लाले पड़े हैं, फिर वो बच्चों के लिए दूध कहाँ से लाएँगे? इधर लम्पी प्रकोप ने पशुओं को ग्रस लिया है।

प्राप्त जानकारियों के अनुसार, लम्पी बीमारी से उत्तर प्रदेश में दूध के उत्पादन में तक़रीबन 21 फ़ीसदी, राजस्थान में तक़रीबन 20 फ़ीसदी, मध्य प्रदेश में तक़रीबन 20 फ़ीसदी, हरियाणा में तक़रीबन 19 फ़ीसदी और पंजाब में तक़रीबन 15 फ़ीसदी की गिरावट आयी है। इसके अलावा कई अन्य प्रदेशों में भी लम्पी बीमारी का प्रकोप जारी है। विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार, तक़रीबन 10 लाख पशु इस बीमारी की चपेट में है, जबकि हज़ारों की मौत हो चुकी है। हालाँकि लम्पी बीमारी का टीका बन गया है और टीकाकरण हो भी रहा है। सरकारों को इस बीमारी से निपटने की दिशा में और महती क़दम उठाने की आवश्यकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

घातक होते जा रहे कुत्ते-बिल्ली

दो बच्चों को लिफ्ट में, एक को पार्क में कुत्तों द्वारा काटने वाली नोएडा, ग़ाज़ियाबाद की घटनाएँ हृदयविदारक

कुत्ते और बिल्ली पालने वालों पर लागू होने चाहिए पशुपालन के सख़्त नियम

कहा जाता है कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं। मगर इस संसार में ऐसे लोग भी हैं, जो बच्चों का शोषण करते हैं; उन्हें कष्ट पहुँचाने से भी नहीं झिझकते। भौजीपुरा निवासी अध्यापक नंदराम का कहना है कि जो किसी पर अत्याचार करके भी नहीं पसीजते उन्हें निर्दयी कहा जाता है। ऐसे लोग केवल अपने ही दु:ख से दु:खी होते हैं। कहावत है जिसके पैर न हुई बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई। सच तो यह है कि लोगों को अभिमान और बिना परिश्रम के मिला पैसा निर्दयी बना देते हैं।

ग़ाज़ियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन की चार्म केसल सोसायटी में ऐसे ही पैसे वालों की कमी नहीं है। इन्हीं में से किसी एक महिला ने लिफ्ट में अपने कुत्ते से किसी स्कूल के एक मासूम बच्चे को कटवाकर ममता का गला घोंटते हुए कठोरता व निर्दयता का वीभत्स परिचय दिया है।

पूरी घटना एक लिफ्ट की है, जिसमें लगे कैमरे में घटना किसी डरावनी फ़िल्म की तरह दिखायी दे रही है। महिला अपने कुत्ते के साथ लिफ्ट में आती है। उसी लिफ्ट में पहले से स्कूल का बैग कन्धों पर टाँगे एक बच्चा पहले से खड़ा होता है। लिफ्ट के कैमरे में दिख रहा है कि महिला का कुत्ता लिफ्ट के बाहर खड़े लोगों पर भौंक रहा है। सम्भवत: वो लोग इसी डर से महिला के साथ लिफ्ट में नहीं चढ़ते हैं। मगर अन्दर खड़े मासूम की जाँघ में महिला का कुत्ता ज़ोर से काट लेता है और दोबारा काटने का प्रयास करता है। मगर निर्दयी महिला पीडि़त बच्चे के साथ ममता भरा व्यवहार करने की अपेक्षा मुस्कुराकर उस मासूम की उपेक्षा करती है। महिला की निर्दयता की हद इससे आँकी जा सकती है कि वह बेहयाई से दर्द से बिलबिलाते और तड़पते बच्चे को लिफ्ट में छोडक़र कुत्ते के साथ बाहर निकलकर चली जाती है।

महिला के इस व्यवहार की हर कोई निंदा कर रहा है। इस निंदनीय घटना के वीडियो पर तरह-तरह की टिप्पणियाँ करके लोगों ने उस निर्दयी महिला को कठोर से कठोरतम दण्ड देने की माँग की। इस मामले में कैसल चाम्र्स सोसाइटी की पूनम चंदोक पर ग़ाज़ियाबाद नगर निगम ने 5,000 रुपये का ज़ुर्माना लगाया है। इस घटना के एक सप्ताह के अन्दर ही दो कुत्तों द्वारा बच्चों को काटने की दो घटनाएँ और सामने आयीं।

एक ग़ाज़ियाबाद के संजय नगर इलाक़े में, जहाँ एक पार्क में खेल रहे बच्चे को पिटबुल कुत्ते ने काटा, जिसके चलते बच्चे को 150 टाँके लगाने पड़े। दूसरी ओर नोएडा के सेक्टर-75 की एपेक्स सोसायटी की लिफ्ट में एक युवक के कुत्ते ने लिफ्ट में खड़े किशोर को झपटकर काट लिया। यहाँ भी कुत्तेके मालिक ने निर्दयता का परिचय देते हुए झटपट निकलने में ही भलाई समझी। वहीं मुम्बई में भी लिफ्ट में ही एक पालतू जर्मन शेफर्ड कुत्ते ने जॅमेटो डिलीवरी ब्वॉय के गुप्तांग (प्राइवेट पार्ट) में काट लिया। लोगों का कहना है कि मनुष्यों से अधिक जानवरों से प्रेम करने का चलन हमारे समय की विडम्बना है। लोग कुत्ते-बिल्ली पालने में शान समझते हैं और ऐसे स्थानों पर भी अपने पालतू जानवरों को ले जाते हैं, जहाँ उन्हें नहीं जाना चाहिए।

पंजीकरण कराना हो ज़रूरी
लोगों द्वारा कुत्ता, बिल्ली इत्यादि पालना कोई नया चलन नहीं है। मगर इसके लिए मापदण्ड होने चाहिए, ताकि पशु प्रेमियों की मनमानी पर रोक लग सके। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में वहां के नगर निगम के पशु चिकित्सा विभाग द्वारा ऐसा ही नियम बनाया हुआ है। दिल्ली नगर निगम के नियमानुसार पालतू कुत्तों का पंजीकरण करके लाइसेंस न लेने वालों चेतावनी दी गयी है कि यदि लाइसेंस पंजीकरण टोकन के बिना कोई व्यक्ति पालतू कुत्ते सार्वजनिक स्थानों पर घुमाता है, तो पशु को निगम अधिग्रहित करके मालिक पर दण्ड लगाएगा। नगर निगम ने यह निर्णय पालतू कुत्तों के पंजीकरण की कम होती संख्या को लेकर उठाया है। नगर निगम के बयान में कहा गया है कि कुत्ते पालने वालों ने पंजीकरण कराने बन्द कर दिये हैं एवं पुराने पंजीकरणों का नवीनीकरण नहीं कराया है। दिल्ली नगर निगम के पशु चिकित्सा विभाग में ऑनलाइन घोड़ा बग्गी पंजीकरण, दुग्ध पशु पंजीकरण, पालतू कुत्तों व पालतू बिल्लियों के पंजीकरण कराकर लाइसेंस प्राप्त किया जा सकता है।

कुत्तों के काटने के मामले बढ़े
सन् 2021 के अनुमानित आँकड़ों की मानें, तो देश में आवारा कुत्तों की संख्या 6.2 करोड़ एवं आवारा बिल्लियों की संख्या लगभग 2.1 करोड़ हो सकती है। पशुधन संगणना के अनुमान से पता चलता है कि सन् 2019 में आवारा कुत्तों की संख्या लगभग 1.53 करोड़ एवं आवारा बिल्लियों की संख्या लगभग 91 लाख थी। इसके अतिरिक्त सन् 2018 में देश में 1.69 करोड़ से अधिक पालतू कुत्ते एवं लगभग 13.4 लाख पालतू बिल्लियाँ थीं। सन् 2014 में 1.18 करोड़ से अधिक पालतू कुत्ते एवं 11 लाख के लगभग पालतू बिल्लियाँ थीं। इसका तात्पर्य यह है कि आवारा पशुओं की संख्या के अतिरिक्त पालतू पशुओं की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।

द स्टेट ऑफ पेट होमलेसनेस इंडेक्स डाटा फॉर इंडिया की रिपोर्ट की मानें, तो संसार के सभी देशों के लगभग 24 फ़ीसदी आवारा पशु हमारे देश में हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि हमारे देश में कुत्ते व बिल्लियों की कुल संख्या में से 85 फ़ीसदी कुत्ते एवं बिल्लियाँ आवारा हैं।

पालतुओं को नहीं लगवाते टीके
पशुओं के डॉक्टर रूम सिंह कहते हैं कि पालतू कुत्ते व बिल्लियों को रेबीज का टीका लगवाना अनिवार्य है। सरकारी पशु विभागों का दायित्व बनता है कि वो कुत्ता व बिल्ली पालने वालों को रेबीज के टीकाकरण के लिए विवश करे, टीकाकरण न कराने वालों का चालान करे एवं आवारा कुत्ते व बिल्लयों का टीकाकरण भी करे। विदित हो कुत्तों के काटने से रेबीज नामक बीमारी हो जाता है। जिसे भी कुत्ता काट लेता है, अगर उसको रेबीज का टीका न लगे, तो वो पागल भी हो सकता है। बिल्ली के काटने से रेबीज, सार्कोमा एवं घातक ट्यूमर भी हो सकता है।

रेबीज से होने वाली मौतें
हमारे देश में प्रत्येक वर्ष रेबीज से लगभग 20,000 लोग मर जाते हैं। विश्व में हर वर्ष लगभग 59,000 लोग रेबीज से मरते हैं। रेबीज के प्रति जागरूकता की कमी एवं आवारा व पालतू कुत्ते व बिल्लियों को रेबीज का टीका न लगने के कारण लोग असमय मर रहे हैं। अगर लोगों को जागरूक किया जाए एवं कुत्ते व बिल्लियों को समय-समय पर रेबीज का टीका लगाया जाए, तो लाखों लोगों की जान बच सकती है। हमारे देश में कुत्तों के काटने से सबसे अधिक 97 फ़ीसदी लोग मरते हैं, जबकि तीन फ़ीसदी लोग बिल्लियों व अन्य विषैले स्तनधारियों के काटने से मरते हैं। आज सरकार के लिए आवारा कुत्ते व बिल्ली एक चुनौती बने हुए हैं, मगर इस ओर न के बराबर ध्यान दिया जा रहा है। कुत्ते व बिल्लियों के काटने से रोग होने का कारण इन पशुओं का गंदी एवं सड़े-गले मांस को भोजन बनाना है।

शून्य रेबीज मामलों का प्रयास
केंद्र सरकार का लक्ष्य है कि सन् 2030 तक रेबीज के मामले शून्य हो जाएँ। मगर समस्या यह है कि रेबीज के वार्षिक आँकड़े और देश में कुत्ते व बिल्लियों की सही संख्या के सही आँकड़े आज तक उपलब्ध नहीं हैं। केंद्र सरकार के पास भी इसका सटीक विवरण नहीं है। केंद्र सरकार ने इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सितंबर, 2021 में रेबीज उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीआरई) की घोषणा की थी। मगर केंद्र सरकार के लिए रेबीज के शून्य लक्ष्य को प्राप्त करना भी आसान नहीं है। इसका कारण स्वास्थ्य मंत्रालय व स्वाथ्य विभागों की उदासीनता है।

डॉक्टर रूम सिंह का कहना है कि इस बड़े व आवश्यक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को रेबीज व कुत्ते व बिल्लियों का सर्वे कराकर उस पर काम करना चाहिए। इसके बाद कुत्ता और बिल्ली पालने वालों पर पशुपालन के सख़्त नियम लागू होने चाहिए, ताकि उनके पालतू पशु किसी और के लिए प्राणघातक साबित न हो सकें।

सख़्ती आवश्यक
ग़ाज़ियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन में घटना से सरकारों के अतिरिक्त पशु विभागों व पुलिस विभाग को सीख लेने की आवश्यकता है। इन सभी को चाहिए कि कुत्ते व बिल्ली पालने वालों के प्रति नरम रवैया न बरतें। अगर किसी का कुत्ता अथवा बिल्ली किसी को काट लेता है, तो उस मालिक को दण्डित किया जाना अति आवश्यक होना चाहिए। इस सख़्ती से सम्भव है कि कुत्ते व बिल्ली पालने वाले सतर्क रहें और दण्डित होने के डर से अपने पशुओं को दूसरे लोगों के सम्पर्क से दूर रखें।

धारणा यह है कि जिस घर में कुत्ता या बिल्ली होते हैं, उस घर में कोई अनजान व्यक्ति किसी अपराध की नीयत से प्रवेश नहीं करता। मगर सच्चाई यह है कि पालतू कुत्ते व बिल्लियाँ उन लोगों को भी काट लेते हैं, जो इन पशुओं के पालने वालों के जानकार होते हैं। कई बार तो घर के सदस्यों को भी ये पशु काट लेते हैं। पशुओं से लोगों का प्यार होना उचित है, मगर इन पशुओं को अति से अधिक प्यार और छूट देना भी ठीक नहीं है। अगर सरकारी प्रयासों को कुत्ते व बिल्ली पालने वाले पशु प्रेमी भी इस बात का ध्यान रखें, तो इन पशुओं के काटने के मामले कम होने लगेंगे एवं वर्ष 2030 के रेबीज शून्य के केंद्र सरकार के लक्ष्य को छूने में मददगार साबित होंगे।

सियासी भँवर में झारखण्ड, हेमंत सरकार का जाना तय!

यह ख़बर झारखण्ड समेत पूरे देश को कभी भी सुनने के लिए मिल सकती है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सदस्यता जा चुकी है और वह मुख्यमंत्री नहीं रहे। बस इंतज़ार है, राज्यपाल की घोषणा का। दरअसल झारखण्ड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खदान लीज मामले में फँसे हुए हैं। ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में उनकी विधानसभा से सदस्यता जानी तय है। अर्थात् राज्य में एक बार फिर नयी सरकार का गठन होगा। झारखण्ड जैसे पिछड़े राज्य में लगातार राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण क़ायम रहना अत्यंत दु:खद है।

सन् 2014 में भाजपा को बहुमत हासिल हुआ। जब भाजपा नेता रघुवर दास ने सन् 2019 में मुख्यमंत्री के पाँच साल का कार्यकाल पूरा किया, तो लगा कि झारखण्ड की राजनीति अब परिपक्व हो गयी है। यहाँ राजनीतिक स्थिरता आ गयी है। सन् 2019 चुनाव में भी झारखण्ड की जनता ने परिपक्वता दिखाते हुए झामुमो के नेतृत्व में महागठबंधन को प्रचंड बहुमत से जिताया। झामुमो, कांग्रेस और राजद की हेमंत सोरेन के नेतृत्व में सरकार बनी। सरकार गठन के कुछ दिन बाद कोरोना संकट आ गया। इस संकट के टलते ही राजनीतिक अस्थिरता का माहौल दिखने लगा। महज़ ढाई साल बाद 2022 में झारखण्ड की राजनीति इस क़दर सियासी भँवर में फँसी कि साल गुज़रते-गुज़रते विकास की गाड़ी डगमगाने लगी है। अगस्त के दूसरे पखवाड़े से तो राज्य में केवल सरकार गिराओ और सरकार बचाओ का माहौल बना हुआ है।

सवाल उठ रहे हैं कि क्या एक बार फिर नयी सरकार का गठन होगा? महागठबंधन का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? क्या महागठबंधन में फूट होगी? क्या भाजपा जोड़तोड़ करके सरकार बनाने में कामयाब हो जाएगी? इसी राजनीतिक उथल-पुथल में सब लगे हैं, और इससे नौकरशाह भी अछूते नहीं हैं। नतीजतन इसका सीधा असर राज्य के विकास कार्यों पर हो रहा है।

भाजपा ने फरवरी में राज्यपाल से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के ख़िलाफ़ खदान लीज मामले को लेकर शिकायत की थी। उन पर ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का आरोप लगाया गया था। राज्यपाल ने चुनाव आयोग से मंतव्य माँगा था। चुनाव आयोग ने सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद पिछले महीने 25 अगस्त को अपना मंतव्य राज्यपाल को भेजा। सूत्रों के मुताबिक, आयोग ने हेमंत सोरेन की सदस्यता समाप्त करने की सिफ़ारिश की है। अब फ़ैसला राज्यपाल को लेना है, जिसका सत्ता पक्ष, विपक्ष और आम लोगों को बेसब्री से इंतज़ार है। चुनाव आयोग ने राज्यपाल रमेश बैस को अपनी रिपोर्ट में क्या दिया है? इसकी अभी तक अधिकारिक सूचना नहीं है। लेकिन अब भाजपा के लोग ख़ुश हैं और अन्दरख़ाने कोई खिचड़ी पक रही है। झामुमो और कांग्रेस के नेताओं की साँसें अटकी हुई हैं और वे राज्यपाल से मुख्यमंत्री की सदस्यता सम्बन्धित रिपोर्ट को सार्वजनिक करते हुए अस्थिर माहौल को व्यवस्थित करने की माँग मीडिया के ज़रिये कर रहे हैं।

बता दें कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सरकार बचाने की हर कोशिश में लगे हैं। गठबंधन को मज़बूती से बाँधे रखने के लिए उन्होंने 25 अगस्त से 5 सितंबर तक विधायकों को एक साथ रखा था। विधायकों को तीन दिन के लिए रायपुर भी शिफ्ट किया गया। अन्त में 5 सितंबर को तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने झारखण्ड विधानसभा का विशेष सत्र (ख़त्म हो चुके मानसून सत्र की अवधि बढ़ाकर) बुलाकर ख़ुद का बहुमत साबित कर दिया। उन्होंने विधानसभा में 81 विधायकों में 48 का समर्थन लेकर जनता को सन्देश दिया कि उनके नेतृत्व वाली सरकार को बहुमत हासिल है।

अगर हेमंत की सदस्यता गयी, तो इस बहुमत के कोई मायने नहीं रहेंगे। किसी भी परिस्थिति में जब नयी सरकार का गठन होगा, तो उसके मुखिया को एक बार फिर बहुमत साबित करना होगा। चाहे हेमंत दोबारा मुख्यमंत्री पद क्यों न सँभाल रहे हों। हालाँकि हेमंत सोरेन के पास न्यायालय जाने का रास्ता है। लेकिन इससे भी तत्काल कोई समाधान निकलने की उम्मीद नहीं है।

हर स्थिति से निपटेगी सरकार
अगर हेमंत की सदस्यता गयी, तो गठबंधन दोबारा हेमंत सोरेन को अपना नेता चुनकर मुख्यमंत्री बना सकता है। अगर प्रतिबन्ध नहीं लगा, तो ही हेमंत सोरेन अपनी ख़ाली हुई बरहेट विधानसभा सीट से छ: माह के भीतर फिर से निर्वाचित होकर इस पद पर क़ायम रह सकते हैं। हालाँकि भाजपा नेताओं का दावा है कि हेमंत सोरेन को कुछ वर्षों के लिए चुनाव लडऩे से अयोग्य क़रार भी दिया जा सकता है। ऐसा होने पर हेमंत सोरेन के लिए दोबारा मुख्यमंत्री बनना मुश्किल होगा। तब गठबंधन दल को नया नेता चुनना होगा।

राजनीतिक गलियारे में वैकल्पिक मुख्यमंत्री के तौर पर हेमंत के परिवार के विभिन्न सदस्यों के नामों पर चर्चा हो रही है। हेमंत सोरेन के छोटे भाई बसंत सोरेन भी विधायक हैं; लेकिन उन पर भी ऐसा ही एक मामला होने के कारण उनकी सदस्यता पर भी ख़तरा मँडरा रहा है। हेमंत सोरेन की भाभी एवं स्वर्गीय दुर्गा सोरेन की पत्नी सीता सोरेन भी विधायक हैं। लेकिन उनके नाम पर भी परिवार में सहमति बनना आसान नहीं है। ऐसे में गुरुजी यानी शिबू सोरेन से लेकर उनकी पत्नी रूपी सोरेन और हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन तक के नामों की चर्चा है। इन सभी विकल्पों पर झामुमो ने चर्चा कर अन्दरख़ाने तैयारी कर रखी है।

जारी रहेगी सियासत
केवल हेमंत सोरेन के अलावा सत्ता पक्ष और विपक्ष को मिलाकर राज्य के अन्य कई विधायकों की सदस्यता भी ख़तरे में है। चुनाव आयोग ने हेमंत के छोटे भाई बसंत सोरेन की सदस्यता पर भी मंतव्य राज्यपाल को भेज दिया है। वहीं भाजपा के समरी लाल जाति प्रमाण-पत्र को लेकर कटघरे में हैं। चुनाव आयोग ने उनसे स्पष्टीकरण माँगा है। झामुमो के विधायक सह पेयजल मंत्री मिथिलेश ठाकुर पर भी कम्पनी में पद पाने का आरोप है। चुनाव आयोग ने उपायुक्त ने रिपोर्ट माँगा था, जो भेजा जा चुका है। कभी भी आयोग क़दम उठा सकता है।

इसके अलावा भाजपा के बाबूलाल मरांडी और कांग्रेस के प्रदीप यादव पर विधानसभा न्यायाधिकरण में दलबदल का मामला चल रहा है। चर्चा है कि हेमंत सोरेन की सदस्यता जाने के बाद विधानसभा अध्यक्ष भी बाबूलाल मरांडी के मामले में जल्द फ़ैसला सुना देंगे, जो कि हेमंत के पक्ष में नहीं रहने की उम्मीद है। हाल के दिनों में कांग्रेस के तीन विधायक- इरफ़ान अंसारी, नमन विल्सन कोंगाड़ी और राजेश कच्छप कोलकाता में 49 लाख रुपये की नक़दी के साथ पकड़े गये थे। उन पर भी कैश कांड और दलबदल का मामला चल रहा है।

अधिकतर सरकारें रहीं अस्थिर
सन् 2000 में बिहार से कटकर झारखण्ड अलग राज्य बना था। इन 22 वर्षों में झारखण्ड पर 11 मुख्यमंत्रियों ने शासन किया है। अब 12वें मुख्यमंत्री बनने की चर्चा हो रही है। भाजपा और झामुमो के नेता पाँच-पाँच बार मुख्यमंत्री बने हैं। भाजपा के अर्जुन मुंडा और झामुमो के शिबू सोरेन को तीन-तीन बार मुख्यमंत्री बनने का मौक़ा मिल चुका है।

हेमंत सोरेन भी दूसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं। वहीं भाजपा के बाबूलाल मरांडी एक बार मुख्यमंत्री बने, तो एक बार निर्दलीय मधु कोड़ा भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं। भाजपा के रघुवर दास पाँच साल मुख्यमंत्री रहने वाले पहले और अब तक इकलौते नेता हैं। इतना ही नहीं, इन 22 वर्षों में तीन बार राष्ट्रपति शासन भी राज्य में लगा है।

राज्य में स्थिर सरकार ज़रूरी
सन् 2020 में झारखण्ड के साथ दो अन्य राज्यों- छत्तीसगढ़ और उत्तराखण्ड का भी गठन हुआ था। दोनों राज्यों में झारखण्ड जैसी स्थिति नहीं है। वहाँ पिछले 22 वर्षों में विकास का पहिया तेज़ी से घूमा है। विकास के कई काम हुए हैं। लेकिन झारखण्ड गठन का उद्देश्य भी विकास ही था; लेकिन यह राज्य हर मामले में इन राज्यों के मुक़ाबले पिछड़ा हुआ है।

युवा हो चुके राज्य के लोगों को अभी भी यही उम्मीद है कि यहाँ भी राजनीतिक परिपक्वता आएगी। राज्य में स्थिर शासन होगा। विकास होगा। जिन कारणों और सोच से अलग राज्य का गठन किया गया था, क्या उन्हें कभी कोई पूरा करेगा? अगर हाँ, तो वह दिन कब आएगा? झारखण्ड की जनता राज्य में विकास की जोह रही है, जिसके लिए राज्य में एक स्थिर सरकार का होना ज़रूरी है।

यातायात नियमों को मुँह चिढ़ातीं सडक़ दुर्घटनाएँ

प्रसिद्ध उद्योगपति और टाटा संस के पूर्व चेयरमैन साइरस मिस्त्री का 4 सितंबर को सडक़ हादसे में निधन हो गया। वह मर्सीडीज कार में अपने दोस्तों के साथ अहमदाबाद से मुम्बई जा रहे थे। रास्ते में पालघर में सूर्या नदी पर बने पुल पर दोपहर बाद उनकी कार डिवाइडर से टकरा गयी। इसमें साइरस मिस्त्री और उनके दोस्त जहाँगीर पंडोले की मौक़े पर ही मौत हो गयी। दोनों पिछली सीट पर थे। डॉ. अनाहिता पंडोले कार चला रही थीं और उनके पति डेरियस पंडोले आगे की सीट पर थे। दोनों घायल हुए और अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। मुम्बई पुलिस का कहना है कि हादसे के वक़्त साइरस मिस्त्री व जहाँगीर ने सीट बेल्ट नहीं लगायी हुई थी और हादसे के वक़्त पिछली सीट के एयरबैग भी नहीं खुले। अब इस वीआईपी सडक़ हादसे के बाद एक बार फिर से देश में सडक़ दुघटनाओं वाला मुद्दा चर्चा में है। इस हादसे के बाद से केंद्रीय सडक़ परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी इस मुद्दे से सम्बन्धित रोज़ाना बयान देते नज़र आ जाते हैं।

बहरहाल यहाँ यह ज़िक्र करना ज़रूरी है कि अनुमान है कि देश में हर दिन क़रीब 1,200 से 1,800 सडक़ दुर्घटनाएँ होती हैं, जिनमें 400 से 600 लोगों की जान चली जाती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों पर निगाह डालें, तो पता चलता है कि देश में सन् 2017 में 4,45,730 सडक़ दुर्घाटनाएँ हुईं। 1,50,093 लोगों ने अपनी जान गँवायी। सन् 2018 में ऐसे हादसों की संख्या 4,45,514 थी और मरने वालों की संख्या 1,52,780 थी। सन् 2019 में देश में 4,37,396 सडक़ दुर्घटनाएँ दर्ज की गयीं और जान गँवाने वालों की संख्या 1,54,732 दर्ज की गयी। सन् 2020 में 3,54,796 मामले सरकारी रिकॉर्ड बताता है और मरने वालों की तादाद 1,33,201 बतायी गयी। वहीं सन् 2021 में 4,03,116 सडक़ हादसों में जान गँवानों वालों की संख्या 1,55,622 है।

ग़ौर करने वाली बात यह है कि सन् 2020 में सडक़ हादसों व उनमें मरने वालों की कम संख्या के पीछे उक मुख्य वजह कोरोना महामारी के कारण हुई तालाबन्दी व अन्य बंदिशें भी हो सकती हैं। आँकड़े यह भी बताते हैं कि साल 2020 को छोड़ दिया जाए, तो सन् 2017 से लेकर सन् 2021 तक के आँकड़े ख़ुलासा करते हैं कि देश में इस दौरान हर साल औसतन क़रीब 4.4 लाख सडक़ हादसे हुए और मरने वालों की संख्या क़रीब 1.5 लाख थी। एक बात और ग़ौर करने की है कि सन् 2017 में नेशनल हाईवे पर सडक़ हादसों की संख्या 1,30,942 थी और मरने वालों की तादाद 50,859 थी। सन् 2021 में नेशनल हाईवे पर सडक़ हादसों की संख्या घटकर 1,22,204 हो गयी; लेकिन मरने वालों की संख्या 53,615 हो गयी यानी सन् 2017 की तुलना में बढ़ गयी। यह भी चिन्ता का विषय है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, अक्सर सडक़ हादसे शाम के 6:00 बजे से लेकर रात के 9:00 बजे के बीच होते हैं और दिसंबर व जनवरी माह में अधिक होते हैं। कारण इन महीनों में धुन्ध के कारण दृष्यता में बाधा आती है। हाल ही में भारत ब्रिटेन को पछाडक़र विश्व की पाँचवीं अर्थ-व्यवस्था बना है; लेकिन सडक़ हादसों के मामले में भारत विश्व मंक नंबर-एक पर है।

विश्व बैंक के अनुसार, भारत में दुनिया की महज़ एक फ़ीसदी गाडिय़ा ही चलती हैं, जबकि सडक़ हादसों में मौत के मामलों में भारत की हिस्सेदारी 11 फ़ीसदी है। सन् 2021 में प्रति हज़ार वाहन पर होने वाली मौत भी सन् 2020 की तुलना में अधिक हुई है। यह आँकड़ा सन् 2020 में 0.45 था, जो सन् 2021 में बढक़र 0.5 तक पहुँच गया। सन् 2021 में सडक़ हादसों में सबसे अधिक मौतें उत्तर प्रदेश में दर्ज की गयीं यानी देश में होने वाली कुल मौतों की 14 फ़ीसदी इस राज्य में दर्ज की गयीं। उसके बाद तमिलनाडु और महाराष्ट्र का नंबर आता है। भारत में हर साल औसतन 1.5 लाख लोग सडक़ हादसों में मर जाते हैं और 4.5 लाख घायल होते हैं। सडक़ हादसों के शिकार अधिकांश पीडि़त पैदल यात्री, साइकिल चलाने वाले, मोटरसाइकिल यानी दो पहिया वाहन चलाने चालक होते हैं। सडक़ हादसों के शिकार 84 फ़ीसदी लोग कामकाजी आयुवर्ग 18-60 की श्रेणी के होते हैं। यही नहीं, ऐसे 70 फ़ीसदी लोग ग़रीब घरों से ताल्लुक रखते हैं। ग़रीब घर सडक़ हादसों की सबसे अधिक सामाजिक व आर्थिक क़ीमत चुकाते हैं। मौत होने या घायल होने से उस परिवार की आय प्रभावित होती है, चिकित्सा पर बहुत पैसा ख़र्च होता है और उनकी सामाजिक सुरक्षा कवच तक भी सीमित पहुँच होती है। विश्व बैंक के एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि भारत में हर साल होने वाले सडक़ हादसों के चलते भारतीय अर्थ-व्यवस्था को सालाना 5-7 फ़ीसदी जीडीपी का नुक़सान होता है।

भारत सरकार का लक्ष्य आने वाले पाँच वर्षों में सडक़ हादसों में होने वाली मौतों की संख्या को 50 फ़ीसदी कम करना है। मंशा तो ठीक है; लेकिन क्या लक्ष्य हासिल कर पाएँगे। 4 सितंबर को साइरस मिस्त्री की सडक़ हादसे में हुई मौत ने बता दिया है कि भारतवासी अपनी व दूसरों की सुरक्षा को लेकर अधिक गम्भीर नहीं हैं। सेव लाइफ फाउंडेशन का सन् 2019 का एक सर्वे बताता है कि 67 लोगों ने माना कि वे कभी भी सीट बेल्ट का इस्तेमाल नहीं करते। सात फ़ीसदी लोग ही हमेशा यात्रा करते वक़्त सीट बेल्ट लगाते हैं। 26 फ़ीसदी ने माना कि वे कभी-कभार ही सीट बेल्ट का इस्तेमाल करते हैं। दो फ़ीसदी लोग ही पीछे की सीट पर बेल्ट लगाते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक, सीट बेल्ट पहनने से चालक और आगे की सीट पर बैठने वाले यात्री की मौत का जोखिम 50 फ़ीसदी तक कम हो जाता है और पीछे की सीट पर बैठने वालों में मौत का ख़तरा 25 फ़ीसदी तक कम हो जाता है। सडक़ हादसों के आँकड़ें बताते हैं कि आगे की सीट से अधिक पिछली सीट पर बैठे लोग मरते हैं। सीट बेल्ट के बिना एयर बैग भी नहीं खुलता। साइरस मिस्त्री व उनके मित्र जहाँगीर हादसे के वक़्त कार में पिछली सीटों पर थे व दोनों ने ही सीट बेल्ट नहीं लगायी थी। अक्सर देश में लोगों के बीच यह धारणा घर कर गयी है कि सीट बेल्ट सिर्फ़ आगे की सीट पर बैठने वाले लोगों के लिए ही क़ानूनन अनिवार्य है; लेकिन यह गलत है।

सेंट्रल मोटर व्हीकल रूल्स-138 (3) के अनुसार, कार की आगे वाली सीट पर बैठे व्यक्ति को तो सीट बेल्ट लगाना ही है; लेकिन पीछे की सीट पर बैठने वाले व्यक्ति को भी सीट बेल्ट लगाना अनिवार्य है। ऐसा नहीं करने पर 1,000 रुपये तक का ज़ुर्माना हो सकता है। भारत सरकार ने 1 जुलाई, 2019 से कार निर्माता कम्पनियों के लिए अगली कार सीट बेल्ट के लिए बेल्ट रिमाइंडर यानी अलार्म लगाना अनिवार्य कर दिया; लेकिन पिछली सीटों के लिए नहीं किया।

इस हादसे से सरकार ने सबक़ लिया। 6 सितंबर को केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि कार हादसे में साइरस मिस्त्री के निधन के सन्दर्भ में हमने निर्णय लिया है कि पीछे की सीट के लिए भी सीट बेल्ट बीप सिस्टम अनिवार्य होगा। सेव लाइफ फाउंडेशन व मारुति सुजुकी के एक सर्वे के अनुसार, देश में 75 फ़ीसदी कार चालक बेल्ट नहीं लगाते। 77 फ़ीसदी स्पोट्र्स यूटिलिटी व्हीकल यानी एसयूवी चालक सीट बेल्ट नहीं लगाते हैं। भारत में सडक़ जाल विश्व में दूसरे नंबर पर है। पहले नंबर पर अमेरिका है। 2013-14 में नेशनल हाईवे क़रीब 91,000 किलोमीटर था, जो 2021-22 में बढक़र 1,40,995 किलोमीटर हो गया है। भारत में हर साल वाहनों की संख्या भी बढ़ रही है। लेकिन लोगों में सडक़ सुरक्षा के नियमों की अनदेखी करना एक आम आदत नज़र आती है। लोगों में इसके प्रति जागरूकता का अभाव है। इसके अलावा सडक़ इंजीनियिरंग भी एक गम्भीर मुद्दा है। सडक़ के डिजाइन का सही नहीं होना, ब्लैक स्पॉट की पहचान, साइन बोर्ड के महत्व को नहीं समझना, तय सीमा से अधिक की गति पर वाहन चलाना, क़ानून का सख़्ती से पालन नहीं होना सरीखी कई समस्याएँ हैं।

मोटर्स व्हीकल एक्ट-1988 का सख़्ती से पालन सुनिश्चित करना किसकी ज़िम्मेदारी है? विश्व बैंक ने क़रीब दो माह पहले ही इंडिया रोड सेफ्टी प्रोजेक्ट के लिए 250 मिलियन डॉलर का क़र्ज़ मंज़ूर किया है। इस प्रोजेक्ट के तहत आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, ओडिसा व पश्चिम बंगाल में काम होगा। इसके तहत इन राज्यों में सडक़ हादसों को सडक़ सुरक्षा प्रबंधन को बेहतर बनाकर व संस्थागत सुधार के ज़रिये कम किया जाएगा। दुर्घटना के $फौरन बाद जिन आपातकालीन चिकित्सीय सेवाओं और पुर्नवास सेवाओं की ज़रूरत होती है, उन्हें भी मज़बूती प्रदान की जाएगी। देश में सडक़ों का जाल तेज़ी से फैलाया जा रहा है; लेकिन सडक़ हादसों को रोकने के लिए सरकार को एक साथ कई मोर्चों पर काम करने की ज़रूरत है। लेकिन लोगों को भी यातायात नियमों का पालन करने वाले अनुशासन में बँधना चाहिए।