Home Blog Page 470

रोज़गार के झाँसे में परोसी बेरोज़गारी

राजनीति में सब जायज़ नहीं हो सकता। अगर ऐसा होता है, तो यह लोकतंत्र की हत्या करने का एक षड्यंत्र है। यह उसी जनता को मारने का षड्यंत्र है, जिसने नेताओं को चुनकर इसलिए आला अधिकारियों से भी ऊपर का दर्जा दिया है, ताकि वे आला अधिकारियों को भ्रष्टचार करने से रोकें और जनसेवा करें। इसलिए राजनीति में योग्यता को नहीं, बल्कि जनसमर्थन को वरीयता दी गयी है। ऐसा माना जाता है कि जनसमर्थन उसी को ज़्यादा मिलता है, जो ज़्यादा अच्छा और ईमानदार होता है। लेकिन आज के नेताओं को भ्रष्टाचार का जन्मदाता कहा जाए, तो ग़लत नहीं होगा। इन नेताओं की ग़लतियों और कुकर्मों की सज़ा अगर जनता समय रहते उन्हें नहीं देती है, तो उसे इसके बेहद भयंकर परिणाम भुगतने ही होंगे। आजकल एक बड़ा वर्ग अपनी ऐसी ही ग़लती की सज़ा भुगतने की स्थिति में आ चुका है। आने वाले दिनों में इसका पछतावा और भी ज़्यादा लोगों को होगा, यह तय है। तेज़ी से लोगों का रोज़गार छिन रहा है। व्यापारिक क्षेत्र में मंदी की मार है। महँगाई दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। इतने पर भी सरकार अपनी पीठ थपथपाने में लगी है।

हाल ही में जारी हुए सीएमआई के आँकड़े इस बात का संकेत हैं। इन आँकड़ों के अनुसार, देश पिछले चार वर्षों में चार करोड़ रोज़गार छिन चुके हैं। कहना ही होगा कि हर साल दो करोड़ नौकरियाँ देने की बात कहने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्मचारियों की संख्या 45 करोड़ से घटाकर 41 करोड़ कर दी है। यह आरोप प्रो. अरुण कुमार का है। प्रो. अरुण कुमार ने कहा है कि सरकारी बयानों में कहा जा रहा है कि हमारी अर्थ-व्यवस्था छ: या पाँच फ़ीसदी की रफ़्तार से बढ़ रही है। लेकिन वास्तव में आर्थिक विकास दर पाँच, छ: या सात फ़ीसदी की दर से नहीं, बल्कि शून्य फ़ीसदी की दर से बढ़ रही है। प्रो. अरुण कुमार ने कहा है कि सरकारी आँकड़ों में असंगठित क्षेत्र के आँकड़े शामिल ही नहीं किये जाते हैं, जबकि असंगठित क्षेत्र ही सबसे ज़्यादा प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा है कि जिस दिन विकास दर में असंगठित क्षेत्र के आँकड़े उसमें जोड़ लिये जाएँगे, तो पता लग जाएगा कि विकास दर शून्य या एक फ़ीसदी है। प्रो. अरुण कुमार का कहना है कि वास्तव में अर्थ-व्यवस्था की विकास दर पाँच फ़ीसदी से भी कम है।

प्रो. अरुण कुमार से पहले भी एक अर्थशास्त्री ने पिछले साल आरोप लगाया था कि मोदी सरकार ने सात वर्षों में सात करोड़ लोगों के रोज़गार छीन लिये। इसके साथ ही मोदी सरकार ने कई साल से रोज़गार के सही आँकड़े भी पेश नहीं किये हैं। मोदी के कार्यकाल में सरकारी विभागों में ख़ाली पड़े कई पदों पर भर्ती प्रक्रिया के लिए प्रपत्र (फॉर्म) ख़ूब भरवाये गये हैं। लेकिन उनके माध्यम से एक मोटी रक़म जमा करके परीक्षाएँ ही नहीं करायी गयी हैं। यदि कहीं परीक्षा हो गयी है, तो वहाँ परिणाम घोषित नहीं किये गये हैं। कहीं-कहीं साक्षात्कार नहीं लिया गया है। इसे बेरोज़गारों से सरकार द्वारा कमायी करना कहें, तो ग़लत नहीं होगा।

आँकड़े बताते हैं कि असंगठित क्षेत्र में 94 फ़ीसदी कर्मचारी काम करते हैं। असंगठित क्षेत्र से 45 फ़ीसदी उत्पादन होता है। इसका मतलब यह है कि अगर रोज़गार घट रहे हैं, तो उत्पादन भी घट रहा है। असंगठित क्षेत्र में कृषि क्षेत्र सबसे बड़ा है। लेकिन सबसे ज़्यादा दुर्दशा का शिकार आज यही क्षेत्र है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि सरकार के नोटबंदी और जीएसटी जैसे बेअक़्ली वाले फ़ैसलों से असंगठित क्षेत्र बुरी तरह से ढह गया। गिरती जीडीपी के बारे में अर्थशास्त्री और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी बोल चुके हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी बोल चुके हैं। सरकार के फ़ैसले से नाराज़ होकर तो उन्होंने इस्तीफ़ा तक दे दिया था। हाल यह है कि नोटबंदी से न तो कालाधन आया। न आतंकवाद की कमर टूटी। ऐसे ही न ही जीएसटी से व्यापार में पारदर्शिता आयी। न लोगों पर दोहरे-तिहरे टैक्स की मार पडऩी बन्द हुई। न महँगाई घटी। कई बैंक डूब गये। कुछ के घाटे पर पर्दा डालने के लिए उन्हें दूसरी बैंकों में मर्ज कर दिया गया। आँकड़ों के अनुसार, एक साल में स्विस बैक में भारतीयों का पैसा 1.5 गुना हो गया है। सन् 2020 के अन्त तक भारतीयों के स्विस बैंक में 20,700 करोड़ रुपये थे, जो कि मंदी, कोरोना और नोटबंदी के बाद भी वर्ष 2021 में ही लगभग 4,800 करोड़ रुपये हो गया था। इतने पर भी कई उद्योगपति भारतीय बैंकों से लाखों करोड़ का ऋण लेकर भाग गये। अब अडाणी को मोटा क़र्ज़ बैंकों ने दे रखा है। वर्तमान में अडाणी समूह की सात कम्पनियाँ शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध हैं। इनमें से वित्त वर्ष 2021-22 के अन्त तक छ: कम्पनियों पर 2.3 लाख करोड़ रुपये का क़र्ज़ था। इसमें शुद्ध क़र्ज़ 1.73 लाख करोड़ रुपये है। कहा जा रहा है कि इनमें से कभी भी कोई भी कम्पनी दिवालिया हो सकती है। ऐसा हुआ तो कोई न कोई बैंक भी ध्वस्त होगी।

इधर आँकड़े कह रहे हैं कि असंगठित क्षेत्र के आठ प्रमुख उद्योगों की वृद्धि दर 7.3 फ़ीसदी से घटकर 2.1 फ़ीसदी हो चुकी है। इससे उत्पादन घटा है और असंगठित क्षेत्र संकट में आ गये हैं। सन् 2021 में केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में एक सवाल के जवाब में 30 नवंबर 2021 तक के आँकड़े पेश किये। उन्होंने कहा कि देश भर में सन् 2014 के बाद से अभी तक क़रीब 2,800 विदेशी कम्पनियाँ भारत से बोरिया-बिस्तर लेकर जा चुकी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सन् 2014 से 2021 तक 10,756 विदेशी कम्पनियाँ भारत में स्थापित भी हुई हैं। साथ ही 30 नवंबर, 2021 तक कुल 12,458 विदेशी कम्पनियाँ भारत में सक्रिय थीं।

नौकरी जाने के आँकड़े इतने ज़्यादा हैं कि उनका रिकॉर्ड सरकार के पास नहीं है। साथ ही भारत में हर वर्ष 18 से 21 साल के तक़रीबन 4.3 करोड़ युवा नौकरी के लिए तैयार होते हैं। इन युवाओं को सरकारी नौकरी मिलना तो दूर, असंगठित क्षेत्र में भी नौकरी नहीं मिल रही है।

मोदी सरकार से पहले वित्त वर्ष 2012-13 में निवेश की दर 37 फ़ीसदी की दर से बढ़ी थी। लेकिन अब निवेश की दर 30 फ़ीसदी से भी काफ़ी नीचे पहुँच चुकी है। जबकि भारत की मुद्रा का विदेशी निवेश और कालेधन में बेतहाशा वृद्धि हुई है।

कराधान की बात करें तो जीएसटी लागू होने के दौरान लगभग 1.2 करोड़ लोगों ने इस नयी व्यवस्था के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया था। लेकिन जीएसटी फाइल करने वालों की संख्या सिर्फ़ 70 लाख ही है। सरकार ने जीएसटी के माध्यम से ज़्यादा टैक्स जमा करने के विचार से जीएसटी प्रक्रिया में अब तक 1,400 से ज़्यादा बदलाव भी कर लिये, तब भी टैक्स भरने वालों की संख्या नहीं बढ़ सकी।

कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार ने सात वर्षों में 12 करोड़ युवाओं का रोज़गार छीना है। अब एक बार फिर मोदी अगले डेढ़ साल में 10 लाख नौकरियाँ देने का वादा कर चुके हैं। उन्होंने ट्वीट के ज़रिये सभी केंद्रीय विभागों और मंत्रालयों को आदेश दिया है कि वे अगले डेढ़ साल में 10 लाख युवाओं को नौकरी दें। इसी साल सेना में अग्निपथ योजना के तहत अग्नि वीरों की भर्ती भी हुई है। लेकिन इस घोषणा के अनुसार, 75 फ़ीसदी अग्निवीर चार साल बाद बाहर कर दिये जाएँगे। पिछले साल ही सरकारी आँकड़ों में कहा गया था कि सेना में सवा लाख से ज़्यादा पद रिक्त पड़े हैं।

वित्त वर्ष 2020-2021 तक के आँकड़े देखने पर पता चलता है कि मंत्रालयों और विभागों में कुल 9,79,327 पद ख़ाली थे। सन् 2014 के बाद से बीते आठ वर्षों में सरकारी नौकरियों के लिए कुल 22,05,99,238 (22 करोड़, 5 लाख, 99 हज़ार 238) आवेदन आये। जबकि सरकार ने केवल 0.3 फ़ीसदी अर्थात् 7,22,311 (7 लाख, 22 हज़ार, 311) लोगों को स्थायी नौकरी दी है।

अगर यही रफ़्तार नौकरी जाने की रही और 0.3 फ़ीसदी की दर नौकरी देने की रही, तो अगले 20 वर्षों में भारत में केवल 10-12 फ़ीसदी लोगों की ही नौकरी बचेगी।

हिजाब नहीं, बदलाव चाहती हैं महिलाएँ

इन दिनों ईरान और हिजाब ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा हुआ है। 13 सितंबर को इस्लामिक देश ईरान की राजधानी तेहरान में वहाँ की मोरल पुलिस ने एक 22 साल की युवती महसा अमीनी को इसलिए हिरासत में ले लिया, क्योंकि उसने हिजाब नहीं पहना हुआ था। पुलिस हिरासत में लिये जाने के तीन दिन बाद यानी 16 सितंबर को महसा की मौत हो गयी। इस मौत से आक्रोशित ईरानी लोग विरोध-प्रदर्शन करने लगे, जो कि अभी भी जारी हैं। अब हिजाब की अनिवार्यता के विरोध में ईरान में विरोध-प्रदर्शनों ने उग्र रूप ले लिया है। महिलाएँ इस विरोध को लेकर फ्रंट पर हैं; लेकिन पुरुष भी उनका साथ दे रहे हैं। प्रदर्शन करने वाली महिलाओं की माँग है कि हिजाब की अनिवार्यता ख़त्म कर देनी चाहिए। उन्हें इस बात की आज़ादी होनी चाहिए कि वे हिजाब पहनें या नहीं।

हिजाब की अनिवार्यता का क़ानून उनके लिए बेडिय़ों जैसा है। ईरान के विभिन्न शहरों में महिलाओं द्वारा चौराहे पर अपने हिजाब जलाने व अपने बाल काटने वाली तस्वीरें बहुत वायरल हो रही हैं। वहाँ की महिलाओं का मानना है कि हिजाब उनके व्यक्तित्व को कमज़ोर करता है। हिजाब उनसे उनकी पहचान छीनता है। महिलाएँ हिजाब क़ानून, मॉरल पुलिस के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रही हैं। वे आज़ादी के अधिकार की माँग कर रही हैं। उनका कहना है कि महिलाओं को क्या पहनना है, और क्या नहीं पहनना है, इसका चयन करने का अधिकार उनके ही पास होना चाहिए, न कि सरकार यह फ़ैसला करे। वैसे किसी भी देश के पास यह अधिकार नहीं होना चाहिए।

ग़ौरतलब है कि ईरान में शरिया क़ानून लागू है। ईरान में सन् 1930 के दशक में शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी का शासन था। रज़ा पहलवी का महिलाओं के प्रति कट्टरवादी नज़रिया नहीं था। उन्होंने महिलाओं के हिजाब पहनने पर रोक लगा दी थी। 70 के दशक तक ईरान में महिलाएँ पश्चिमी सभ्यता वाले कपड़े भी आराम से पहनती थीं। हालाँकि कई महिलाएँ हिजाब भी पहनती थीं, पर स्वेच्छा से; उन पर कोई दबाव नहीं था और न ही नक़ाब आज की तरह ड्रेस कोड का अनिवार्य हिस्सा था।

दरअसल सन् 1979 में वहाँ इस्लामिक क्रान्ति हुई, और पहलवी राजवंश सत्ता से बाहर कर दिया गया। फिर वहाँ के कट्टरपंथी नेता अयातुल्ला ख़ोमैनी के अधीन एक धार्मिक गणतंत्र की स्थापना हुई। क्रान्ति का विरोध करने वालों को सख़्त सज़ाएँ दी गयीं। यहाँ तक कि राजा पहलवी को ईरान छोडक़र भागना पड़ा। अयातुल्ला ख़ोमैनी ने कड़ा शरिया क़ानून लागू कर दिया और महिलाओं की आज़ादी पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिये गये। इस तरह ईरान ने सन् 1981 में एक अनिवार्य हिजाब क़ानून पारित किया। इस्लामी दण्ड संहिता के अनुच्छेद-638 में कहा गया है कि महिलाओं के लिए सार्वजनिक रूप से या सडक़ पर हिजाब के बिना दिखायी देना अपराध है। इस्लामिक क्रान्ति के बाद लड़कियों की शादी की उम्र 18 वर्ष से घटाकर 13 वर्ष कर दी गयी। ईरान में विवाहित महिलाएँ अकेले देश नहीं छोड़ सकती हैं। नौ साल से अधिक आयु वाली लड़कियों और महिलाओं के लिए ड्रेस कोड का पालन अनिवार्य है। इसके तहत उन्हें हिजाब से सिर, चेहरा, गर्दन और बालों को ढकना अनिवार्य है।

इसके साथ ही घर से बाहर निकलने पर उनके बदन पर ढीले कपड़े होने चाहिए। इसका उल्लघंन करने पर महिलाओं को सज़ा देने व आर्थिक ज़ुर्माने का भी प्रावधान है। सज़ा के तौर पर उन्हें कोड़े भी मारे जा सकते हैं। लड़कियाँ और महिलाएँ इसका पालन सख़्ती से कर रही हैं या नहीं, यह देखने के लिए या यह कहें कि महिलाओं के मन में इस क़ानून का ख़ौफ़ पैदा करने के लिए ईरान की सरकारत ने नैतिक (मोरल) पुलिस की स्थापना की और उसे काफ़ी अधिकार भी दे दिये। ऐसी पुलिस का स्टॉफ पुलिस वैन में सार्वजनिक सथलों पर गश्त लगाकर महिलाओं की निगरानी करता है। उसका काम यह देखना है कि लड़कियों व महिलाओं का पहनावा क़ानून का उल्लघंन करने वाला तो नहीं है। पुलिस पर यह भी सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी डाली गयी है कि हर लडक़ी, महिला उचित कपड़ों में ही बाहर निकले। वह लड़कियों और महिलाओं से सवाल कर सकती है कि उनके बाल हिजाब से बाहर क्यों दिखायी दे रहे हैं? उन्होंने चमकीले / भडक़ीले / तंग / बदन दिखाने वाले कपड़े क्यों पहने हुए हैं? इस पुलिस के जवान इस प्रकार की कमी या आरोप में किसी भी महिला या युवती को हिरासत में ले सकते हैं। महसा अमीनी को भी तेहरान में मॉरल पुलिस ने 13 सितंबर को ड्रेस कोड का उल्लघंन करने के आरोप में ही हिरासत में लिया था। पुलिस का कहना है कि उसका हिजाब ड्रेस कोड के अनुरूप नहीं था, जबकि उसकी माँ ने पत्रकारों को बताया कि उनकी बेटी के कपड़े हमेशा नियमों के अनुरूप थे।

ईरान के सुरक्षा बलों ने एक बयान जारी कर कहा कि हिजाब नियमों पर सरकारी शैक्षिक प्रशिक्षण प्राप्त करते समय महसा अचानक गिर गयी, उसे दिल का दौरा पड़ा और उसकी मौत हो गयी। ईरान के वर्तमान राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी भी ड्रेस कोड को लेकर बहुत सख़्त हैं। रायसी को देश के रूढि़वादी अभिजात वर्ग का समर्थन हासिल है। राष्ट्रपति रायसी ने इसी साल जुलाई में हिजाब और शुद्धता क़ानून को नये प्रतिबंधों के साथ लागू करने के लिए एक आदेश पारित किया था। सरकार ने अनुचित हिजाब पर सख़्ती करने के साथ ही हील्स पहनने के ख़िलाफ़ एक आदेश भी जारी किया था। ईरान में महिलाएँ पिछले कुछ समय से अनिवार्य हिजाब नीति का विरोध कर रही हैं। और राष्ट्रपति रयासी हिजाब विरोधी आन्दोलन को इस्लामी समाज में नैतिक भ्रष्टाचार का एक संगठित प्रचार मानते हैं।

मीडिया रिपोट्र्स के मुताबिक, 12 जुलाई, 2022 को ईरान की अभिनेत्री रोश्नो को हिजाब नहीं पहनने पर गिरफ़्तार किया गया। कई दिनों तक उसे यातनाएँ दी गयीं और फिर नेशनल टीवी पर उनसे माफ़ी मँगवायी गयी। ख़बर यह भी है कि पिछले कुछ महीनों से ईरान में कड़े ड्रेस कोड को अमल कराने के लिए महिलाओं की गिरफ़्तारी के मामले बढ़े हैं। कई महिलाओं ने इस बात को सरकारी टीवी चैनल के कैमरे पर स्वीकार किया है। वैसे ईरान में हिजाब के ख़िलाफ़ विरोध का मुद्दा नया नहीं है। वर्ष 2014 में हिजाब के ख़िलाफ़ माय स्टील्थ फ्रीडम नामक फेसबुक पेज बनाया गया। इस पेज के ज़रिये एकत्रित हुई महिलाओं ने सोशल मीडिया पर मेरी गुम आवाज़, मेरा कैमरा, मेरा हथियार जैसी कई पहल कीं।

मई, 2017 में व्हाइट वेडनेस-डे यानी सफ़ेद बुधवार अभियान चलाया गया। इस अभियान से जुड़ी महिलाएँ सफ़ेद पोशाक में हिजाब के विरोध में प्रदर्शन करती हैं। वर्तमान में इस अभियान से दुनिया भर के क़ेरीब 70 लाख लोग जुड़े हुए हैं और इनमें से 80 फ़ीसदी ईरानी हैं। ईरान में हिजाब के ख़िलाफ़ जारी वर्तमान विरोध-प्रदर्शन सन् 2019 के बाद से सबसे बड़ा बताया जा रहा है। सन् 2019 का विरोध-प्रदर्शन ईंधन की क़ीमतों की वृद्धि को लेकर था। दुनिया के 195 देशों में से 57 देश मुस्लिम बहुल हैं। इन 57 देशों में से आठ में शरिया का कड़ाई से पालन होता है। केवल ईरान व अफ़ग़ानिस्तान ऐसे दो देश हैं, जहाँ हिजाब पहनना अनिवार्य है। इसका उल्लंघन करने पर सख़्त सज़ा दी जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि हिजाब के ख़िलाफ़ मुहिम राजनीतिक और धार्मिक तानाशाही पर चोट है, न कि धर्म के ख़िलाफ़। ईरान में हिजाब पहनने की अनिवार्यता के विरोध में प्रदर्शन जारी है, तो भारत के कर्नाटक सूबे में हिजाब को जबरन हटाने का विरोध मुद्दा बना हुआ है।

ग़ौरतलब है कि सितंबर माह में कर्नाटक हिजाब विवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने 10 दिन तक चली लम्बी सुनवाई के बाद फ़ैसला सुरक्षित रख लिया है। सर्वोच्च न्यायालय तय करेगा कि कर्नाटक में स्कूलों में हिजाब पर पाबंदी का फ़ैसला सही है, या नहीं। कर्नाटक सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश हेमंत गुप्ता की पीठ से कहा कि कक्षा में हिजाब पहनना मौलिक अधिकार नहीं है। स्कूल के बाहर, स्कूल बस में और स्कूल परिसर में हिजाब पहनने पर रोक नहीं है। यह रोक सिर्फ़ कक्षाओं में ही है। अब सब की निगाहें सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले पर टिकी हैं और उम्मीद की जा रही है कि यह फ़ैसला 16 अक्टूबर या उससे पहले आ सकता है।

उधर ईरान में महिलाओं ने हिजाब की अनिवार्यता के ख़िलाफ़ अपने कड़े तेवरों से ईरान की कट्टरपंथी सरकार के समक्ष मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। यही नहीं, महिला प्रतिनिधियों की हिजाब के साथ राजनयिक बैठकों में शिरकत करने पर ईरानी महिलाएँ पश्चिमी देशों को फटकार लगा रही हैं। उनका मानना है कि हिजाब अनिवार्यता को ख़त्म करने के लिए ईरान की सरकार पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने की भी ज़रूरत है।

अब भाजपा की कसौटी पर कैप्टन

पंजाब लोक कांग्रेेस के भाजपा में विलय से मौज़ूदा राज्य की राजनीति में किसी उलटफेर की सम्भावना नहीं है। कभी कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के भाजपा में शामिल होने के कई अर्थ हैं। वह पंजाब लोक कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं और भाजपा मंख भी हैं। हालाँकि कुछ माह पहले गठित अमरिंदर की इस पार्टी का कोई वुजूद नहीं है। लिहाज़ा यह कहना कि विलय से भाजपा को मज़बूती मिलेगी, ठीक नहीं होगा। कैप्टन के साथ दो पूर्व सांसद और आधा दर्ज़न पूर्व विधायक भी भाजपाई हो गये हैं। इससे पहले कांग्रेस के चार पूर्व मंत्री भी भाजपा में शामिल हो चुके हैं। निकट भविष्य में कई और वरिष्ठ कांग्रेसी भी कैप्टन की वजह से भाजपा में आ सकते हैं। कैप्टन की पत्नी और पटियाला से कांग्रेस की सांसद परणीत कौर अभी पार्टी में बनी हुई हैं। वे कब तक कांग्रेस में बनी रह सकती हैं। देर-सबेर उन्हें भी हाथ छोडक़र कमल थामना ही होगा।

दरअसल कांग्रेस से भाजपा में आये पूर्व मंत्री, पूर्व विधायक और वरिष्ठ नेता भाजपा की विचारधारा से प्रभावित होकर नहीं, बल्कि अपनी उपेक्षा और सत्ता से दूरी के चलते अपने आका से भविष्य की उम्मीद लेकर आये हैं। सवाल यह है कि क्या वे पार्टी की विचारधारा को भी अपना सकेंगे? अगर ऐसा नहीं कर पाते हैं, तो उनके लिए कम-से-कम भाजपा में ज़्यादा अवसर नहीं होंगे। कुछेक को छोडक़र कोई जनाधार वाला नेता नहीं है। कांग्रेस से भाजपा में थोक में शामिल हुए नेताओं में ज़्यादातर कैप्टन के समर्थक हैं। कांग्रेस में कैप्टन के बिना उनका कोई महत्त्व नहीं था। पार्टी में उनकी उपेक्षा होती इससे बेहतर क्यों नहीं पार्टी ही बदल ली जाए?

निकट भविष्य में भाजपा राज्य में अपने आधार को मज़बूत कर सकती है और शीर्ष नेतृत्व भी यही चाहता है। राज्य से 13 लोकसभा की सीटें हैं और भाजपा छ: से ज़्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है। फ़िलहाल यहाँ से सन्नी देओल गुरदासपुर से और सोमप्रकाश होशियारपुर से सांसद हैं। विधानसभा चुनाव में जिस तरह से आम आदमी प्रचंड बहुमत से सत्ता में आयी है, उस लक्ष्य को पाना आसान भी नहीं है। लेकिन संगरूर लोकसभा उप चुनाव में आम आदमी पार्टी प्रत्याशी की हार और अकाली सिमरनजीत सिंह मान की जीत भाजपा को कुछ उम्मीद बँधाती है। इन्हीं सब बातों को देखते हुए भाजपा पंजाब में अपने संगठन को मज़बूत और सशक्त नेतृत्व जैसे पहुलओं को ध्यान में रख रही है।

संगठनात्मक रूप से मज़बूत मानी जाने वाली भाजपा के पास पंजाब में कोई जनाधार वाला नेता नहीं है। कैप्टन यह कमी पूरी कर सकते हैं। सितंबर, 2021 में कांग्रेस आलाकमान ने कैप्टन को जिस तरह से अपमानित कर मुख्यमंत्री नहीं रहने दिया, वह टीस उनके मन में रही। कैप्टन को कांग्रेस में नहीं; लेकिन राज्य का राजनीति में सक्रिय रहना था। लिहाज़ा उन्हें कोई विकल्प तलाशना ही था। उन्हें भाजपा में ही कुछ सम्भावना दिखी। लिहाज़ा उनकी शीर्ष नेतृत्व से निकटता बढ़ी। विधानसभा चुनाव भी कैप्टन की पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस और भाजपा ने मिलकर लड़ा। तभी से कयास लगने लगे थे कि देर-सबेर कैप्टन भाजपा में जाएँगे। लेकिन उनसे पहले कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे सुनील जाखड़ भाजपा में शामिल हो गये।

कभी अकाली दल से राजनीति में आये कट्टर कांग्रेसी कैप्टन में नेतृत्व की क्षमता ज़रूर है; लेकिन उम्र के जिस दौर से वह गुज़र रहे हैं, उसमें उनकी सक्रियता ही आड़े आएगी। ऐसे में वह भाजपा के लिए कितने कारगर साबित होंगे, यह वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों से स्पष्ट होगा। चूँकि विधानसभा चुनाव तो इसी वर्ष हुए हैं और कैप्टन और उनकी पार्टी का प्रदर्शन शून्य रहा है। पंजाब में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस से अपमानित अपनी रणनीति से सन् 2002 और सन् 2017 में कांग्रेस को सत्ता में लाने का श्रेय उन्हें ही है। क्या कुछ वैसा करिश्मा वह वर्ष 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए कर सकते हैं?

कैप्टन को भाजपा में अहम ज़िम्मेदारी ज़रूर दी जाएगी। वह केंद्रीय राजनीति में जाने के इच्छुक नहीं हैं, इसलिए उन्हें प्रदेश स्तर पर अहम ज़िम्मेदारी मिल सकती है। उनके अलावा कभी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे सुनील जाखड़ की योग्यता को देखते हुए ज़िम्मेदारी दी जाएगी। जाखड़ और कैप्टन में तालमेल अच्छा रहा है, लिहाज़ा वह पार्टी को मज़बूती देंगे। लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा शीर्ष नेतृत्व पंजाब में पार्टी को आम आदमी पार्टी के मुक़ाबले में खड़ा करना चाहता है। पूर्व मंत्रियों, विधायकों और वरिष्ठ नेताओं के पाला बदल से कांग्रेस कमज़ोर हुई है, भाजपा इसी का फ़ायदा उठाना चाहती है। दो सांसद और दो विधायकों वाली भाजपा लोकसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद है। अगर ऐसा हो सका, तो हरियाणा की तरह भाजपा पंजाब में अपने बूते ही चुनाव लड़ेगी।

फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव से पहले शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के साथ उसका गठजोड़ रहा है। भाजपा सत्ता में भी भागीदार रही है; लेकिन बावजूद इसके पार्टी का आधार शहरों तक ही सीमित रहा है। आज भी पंजाब में भाजपा का जनाधार शहरों तक है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में पार्टी कहीं नहीं दिखती। तीन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ शिअद ने एनडीए से नाता तोड़ लिया था। कभी हरियाणा में भी भाजपा सहयोगी दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ती रही है; लेकिन अब वह अपने दम पर मैदान में उतरती है। क्या पता शीर्ष नेतृत्व पंजाब में भी हरियाणा जैसे पहलू को देख रही हो; लेकिन इसके लिए ज़मीनी स्तर पर बहुत मेहनत करने की ज़रूरत है।

पंजाब में कभी कांग्रेस और अकाली दल ही आमने-सामने रहते थे। फिर मुक़ाबले में भाजपा को बल मिला और मामला त्रिकोणीय हो गया। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के मुक़ाबले में आने से अब मुक़ाबला त्रिकोणीय नहीं, बल्कि चतुर्कोणीय में बदल गया, जो आगे और दिलचस्प होगा। इस समय प्रदेश में सबसे मज़बूत स्थिति में आम आदमी पार्टी है। अब सरकार के कामकाज पर उसका भविष्य निर्भर करता है। पहला झटका उसे संगरूर उप चुनाव में देखने को मिल चुका है। भगवंत मान के मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी संगरूर लोकसभा चुनाव सीट ख़ाली हो गयी थी। आम आदमी पार्टी को जीत में कोई संशय नहीं लग रह था; लेकिन नतीजा अप्रत्याशित रहा और यहाँ से अकाली दल मान (अमृतसर) के सिमरनजीत सिंह मान विजयी रहे।

विधानसभा चुनाव के बाद आप के लिए यह सबसे बड़ा झटका रहा। वैसे भी सरकार की लगभग छ: माह के शासनकाल में भगवंत मान सरकार की कोई विशेष उपलब्धि नहीं दिख रही है। पंजाब में आप के विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त का मामला भी चल रहा है; लेकिन ऐसे आरोपों में ज़्यादा दम नहीं दिखता। 117 में से 92 विधायक आम आदमी पार्टी के हैं। कितने लोगों की ख़रीद-फ़रोख़्त की जा सकती है? इससे भाजपा को क्या हासिल हो जाएगा? उसके पास तो दो विधायक और कांग्रेस के पास 18 जबकि बहुमत के लिए 59 का जादुई आँकड़ा चाहिए। हाँ, यह आम आदमी पार्टी में फूट पैदा करने और सरकार को अस्थिर करने का कोई प्रयास ज़रूर हो सकता है।

पंजाब में भाजपा को पाँव जमाने के लिए गाँवों तक पहुँचना होगा, इसके बिन नेतृत्व चाहे जो करे, अच्छे नतीजे देना मुश्किल का काम है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कांग्रेस से आये इन नेताओं की वजह से पार्टी की पंजाब में पैठ और आधार मज़बूत होने और लोकसभा चुनाव में आधी से ज़्यादा सीटों पर क़ाबिज़ होने की बात कहीं सपना न बनकर रह जाए। फ़िलहाल भाजपा का विधानसभा चुनाव में वोट फ़ीसदी केवल 6.6 फ़ीसदी है, जबकि इसके मुक़ाबले में आम आदमी पार्टी का 42.01 फ़ीसदी, कांग्रेस का 22.98 फ़ीसदी और शिरोमणि अकाली दल का 18.38 फ़ीसदी है। भाजपा को कमोबेश पंजाब में शून्य से ही शुरुआत करनी है और इसके लिए ज़ोरदार नेतृत्व की ज़रूरत है। पंजाब में अब भी भाजपा को शहरी पार्टी माना जाता है, जबकि राज्य में वही पार्टी सत्ता हासिल करती है, जिसका गाँवों में भरपूर आधार होता है। अभी लोकसभा चुनाव में डेढ़ साल से ज़्यादा का समय है। इस दौरान पार्टी संगठन में कैप्टन और उनके समर्थकों को क्या और कैसी ज़िम्मेदारी मिलती है, यह देखने की बात होगी।

अगर कैप्टन और सुनील जाखड़ के अलावा कई पूर्व मंत्रियों को संगठन में कोई बड़ी ज़िम्मेदारी दी जाती है, तो इससे पार्टी को अपनी जड़े जमाने में मदद मिलेगी। वर्ष 2024 लोकसभा चुनाव के नतीजे बता देंगे कि कैप्टन और उनके समर्थकों की बदौलत पंजाब में भाजपा ने अपना आधर कितना मज़बूत किया है। जब जब कांग्रेस में कैप्टन को फ्री हैंड मिला है, उन्होंने अच्छे नतीजे दिखाये हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह तो कैप्टन समेत थोक में आये कांग्रेसियों की वजह से पार्टी को भविष्य में मज़बूत होता देख रहे हैं।

मन्दिर तो है, मूर्ति और पुजारी ग़ायब!

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मन्दिर एवं आरती को लेकर पूरे प्रदेश में हंगामा मचा पड़ा है। संत महंत से बुलडोजर बाबा बनने के बाद अब योगी भगवान बने गोरखपुर मठ के महंत एवं प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की इतनी निंदा हुई कि वह अपनी इस पूजा-अर्चना पर चुप्पी भले ही साधे रहे, मगर पुलिस को सक्रिय अवश्य कर दिया। अब पुलिस मन्दिर बनाकर योगी की पूजा करने वाले प्रभाकर मौर्य को सिद्दत से ढूँढ रही है।

कहा जा रहा है कि प्रभाकर ने राम नगरी से केवल 15 किलोमीटर दूर स्थित पूराकलंदर थाना क्षेत्र के अयोध्या-प्रयागराज हाईवे के किनारे स्थित कल्याण भदरसा मजरे में अपने ही चाचा की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करके उसे हड़पने की नीयत से उस पर योगी आदित्यनाथ का मन्दिर बना डाला। मगर उसके इस भगवान ने उसकी रक्षा नहीं की। अब मन्दिर से मुख्यमंत्री योगी की मूर्ति भी नदारद है। पुलिस की दबिश के बाद अब प्रभाकर मौर्य के पिता ने भी उसकी ग़लतियों को स्वीकार कर लिया है।

इधर योगी की आरती एवं पूजा-अर्चना पर घमासान मचा हुआ है। कुछ लोग इसे उचित ठहरा रहे हैं, तो कुछ अनुचित। प्रश्न यह उठने लगा है कि कहीं योगी तो इतने महत्त्वाकांक्षी नहीं हो गये कि अब वह लोगों के भगवान बनना चाहते हैं? इस बारे में एक निजी महाविद्यालय के प्राध्यापक प्रदीप कहते हैं कि जीवन में ऊँचा उठने की आकांक्षा तो सबकी होती है, मगर भगवान बनने की आकांक्षा कुछ ही लोगों को होती है। हिन्दू शास्त्रों में भगवान से अपनी तुलना करने अथवा भगवान बनने की आकांक्षा करने वालों को राक्षस कहा गया है। मगर यह घोर कलियुग है। यहाँ जो जितना बड़ा पापी है, वही लोगों की दृष्टि में भगवान है। कोई व्यक्ति भगवान तभी बनता है, जब वो सामाजिक बन्धनों से ऊपर उठकर समाज की सेवा करता है। इस प्रकृति की विभूतियों को लोग अपना भगवान मानने लगते हैं, यह एक अलग बात है। मगर यहाँ न तो कोई सामाजिक बन्धनों से ऊपर उठा है एवं न ही समाज की सेवा में लगा है। यहाँ जो कुछ भी हो रहा है, वो अपने लाभ, स्वार्थ एवं सुख के लिए राजनीति से प्रेरित है।

नाम प्रकाशित न करने की विनती करते हुए एक स्थानीय भाजपा नेता ने योगी आदित्यनाथ की आरती व पूजा-अर्चना पर कहा कि देखिए, हम तो साधारण व्यक्ति हैं। अगर हमें इस स्तर की राजनीति आती होती, तो हम भी कम-से-कम मंत्री तो होते ही। हम तो आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित भारतीय जनता पार्टी के एक छोटे से सिपाही हैं तथा पार्टी की सेवा में जुटे हुए हैं। किन्तु योगी आदित्यनाथ को इस प्रकार की गतिविधियों पर स्वयं ध्यान देते हुए उनका मन्दिर बनाने वालों के अतिरिक्त आरती एवं पूजा-अर्चना करने वालों की कड़ी फटकार लगानी चाहिए। इससे उनका क़द और भी ऊँचा हो जाता। हालाँकि वह इस प्रकार के ढकोसलों से कोसों दूर रहने वाले एक बड़े सन्त हैं एवं ऐसी हरकतें स्वीकार नहीं करेंगे। क्योंकि ऐसा नहीं करने से उनकी गरिमा को बड़ी ठेस पहुँचेगी।

इस वर्तमान समय में उन्हें इस बात का ध्यान है कि वह अब प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं तथा उनके सिर पर पूरे प्रदेश के विकास का दारोमदार है। प्रदेश में हो रहे अपराधों पर उन्हें ध्यान देने की आवश्यकता है। दूसरी बार भी सत्ता मिलने के बाद भी अगर वह कान में तेल डालकर बैठे रहेंगे, तो उन पर काम न करने वाले मुख्यमंत्री का ठप्पा लगते देर नहीं लगेगी। इस वर्तमान में प्रदेश में बहुत सारे काम करने को पड़े हैं। योगी को इस वर्तमान में उन पर ध्यान देने की परम् आवश्यकता है। जनता में जो उनका मान-सम्मान एवं उनके प्रति जो विश्वास है, अभी उसे बनाये रखने में ही उनकी भलाई है।

एक भाजपा कार्यकर्ता ओंमकार ने कहा कि नरेंद्र मोदी जी, योगी आदित्यनाथ इस राष्ट्र की आन, बान और शान हैं। वह हम सबके लिए पूज्यनीय तो हैं ही, देश के लिए कल्याणकारी भी हैं। अगर योगी ख़ुद इससे नाराज़ हैं, तो यह उनकी महानता है।

भौजीपुरा के कमुआ गाँव के मास्टर नंदराम कहते हैं कि सदियों से एक कहावत चली आ रही है कि चमत्कार को नमस्कार है। योगी आदित्यनाथ कई प्रकार से चमत्कृत हैं। आज वह जिसके सिर पर हाथ रख दें, उसके वारे-न्यारे हो जाएँगे। इसका कारण उनका प्रदेश का मुख्यमंत्री होना तो है ही, भविष्य में उनके प्रधानमंत्री बनने की बात चलने का भी है। अब ऐसे शहद लगे मुँह को कौन नहीं चाटेगा? योगी की आरती एवं पूजा-अर्चना करने वाले उस पुजारी ने भी यही किया है। सभी जानते हैं कि जिसकी सरकार देश अथवा किसी प्रदेश में बनती है, उसके हाथ में इतना कुछ होता है कि वह मनचाहे रूप से अपनों को लाभ पहुँचा सकता है। सम्भव है कि पुजारी ने भी ऐसा ही कुछ सोचा हो कि अगर योगी आदित्यनाथ उन पर कृपा कर दें, तो उसके भी ठाठ हो जाएँ।

चौधरी यशवंत सिंह कहते हैं कि जनता में जिन देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा है, वो उनकी पूजा करती है। अगर कोई एक पुजारी कहीं छोटा-सा मन्दिर बनवाकर किसी नेता की आरती करने लगे अथवा पूजा करने लगे, तो इससे घबराने की आवश्यकता नहीं है। यह सब कोई नया खेल नहीं है। योगी से पहले मोदी का भी मन्दिर बना था तथा उसमें पूजा भी हुई थी। मगर नरेंद्र मोदी ने चतुराई दिखाते हुए अपनी मूर्ति पूजा पर रोक लगाते हुए मूर्ति को ढकवा दिया। योगी को भी यहाँ इसी समझदारी से कार्य करने की आवश्यकता है। अगर वो अपने प्रति इस तरह के काम करने वालों को नहीं रोकेंगे, तो इससे उन्हीं की हानि होगी। क्योंकि जनता के भगवान हिन्दू ग्रंथों में वर्णित भगवान हैं। अत: जनता अचानक आदमी के रूप में मिले किसी भगवान को कभी स्वीकार नहीं कर सकती।

बहेड़ी के गाँव गौंटिया के मन्दिर के पुजारी सन्त कमलेश्वर जी कहते हैं कि यह अपनी-अपनी आस्था का प्रश्न हो सकता है कि कौन, किसकी पूजा कर रहा है? मगर हिन्दू धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि कोई आदमी भगवान बनने के योग्य तभी हो सकता है, जब वह अंतर्यामी होने के साथ साथ सभी से बैर-भावना भुलाकर सबको गले से लगाये एवं सबका भला करे। अगर योगी में ये तीनों लक्षण हों, तो उन्हें भगवान मानने में कोई आपत्ति नहीं है। अन्यथा उन्हें पुजारियों से कहना चाहिए कि वे उस एक परमपिता परमात्मा की उपासना करें, जिसने सबको रचा है।

जो भी हो किसी व्यक्ति विशेष की पूजा-अर्चना एवं आरती करना सबके मन को तो नहीं भाया है। जो लोग इसे पसन्द कर रहे हैं, उनके अपने तर्क हैं तथा जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, उनके अपने तर्क हैं। यह मुद्दा धार्मिक है, इसके चलते इस पर अपनी कोई टिप्पणी उचित नहीं है। देखना है कि योगी आदित्यनाथ अपनी इस पूजा-अर्चना एवं आरती के राजनीति में किस प्रकार उपयोग करते हैं? जनता जनार्दन इसे किस रूप में स्वीकार अथवा अस्वीकार करती है। योगी आदित्यनाथ को तो शायद यह रास आया नहीं।

राजनीतिक शतरंज का मोहरा

झारखण्ड में उठे 1932 खतियान और ओबीसी को 27 फ़ीसदी आरक्षण के मुद्दे

झारखण्ड में पिछले एक-दो महीने से राजनीतिक शतरंज की बिसात बिछी हुई है। इसे खेलने वाले राजनीतिक दल हैं। जनता इसका मोहरा है, जिसे राजनीतिक दल अपने हिसाब से चल रहे हैं। एक तरफ़ ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की कुर्सी हिलडुल रही है, तो दूसरी तरफ़ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जाँच में हर दिन नये ख़ुलासे हो रहे हैं।

इस ख़ुलासे की आँच में नेता, नौकरशाह और इनके क़रीबी अन्य लोग झुलस रहे हैं। विकास की गति धीमी है। इस अनिश्चितता के बीच हर दल अपने वोट बैंक को मज़बूत करने में जुटा है। राजनीतिक लाभ के लिए गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे। हेमंत सरकार कैबिनेट ताबड़तोड़ निर्णय ले रही है। इन्हीं में से एक निर्णय सन् 1932 के खतियान पर स्थानीयता और दूसरी ओबीसी को 27 फ़ीसदी आरक्षण है। दोनों ही मुद्दे राज्य के लिए गम्भीर हैं। इतिहास गवाह है कि पिछले 22 साल में जब-जब इन मुद्दों को छेड़ा गया, झारखण्ड को झुलसना पड़ा है। इसके बावजूद राज्य में एक बार फिर स्थानीयता और ओबीसी आरक्षण का राजनीतिक जिन्न निकल आया है। अबकी बार किस दिशा में जाएगा? यह तो आने वाला वक़्त बताएगा। फ़िलहाल राज्य की राजनीतिक सरगर्मी तेज़ है।

22 साल बाद भी नागरिकता का सवाल

कहते हैं राजनीति में मुर्दे कभी मरते नहीं हैं। उन्हें कभी भी उखाडक़र उपयोग में लाया जा सकता है। ऐसा ही राज्य के कुछ मुद्दे हैं, जिन पर राजनीति होती रहती है। बिहार से अलग होकर झारखण्ड राज्य का गठन के सन् 2000 में हुआ था। राज्य गठन के 22 साल बाद आज भी अहम सवाल है कि झारखण्डी कौन? यानी यहाँ के स्थानीय निवासी कौन हैं?

यह मसला राज्य की राजनीति का केंद्र बिन्दु है। इस मुद्दे पर मिट्टी डालने की जगह हर दल समय-समय पर गड़े मुर्दे को उखाडक़र राजनीति करता रहा है। राज्य गठन के बाद भाजपा के बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में पहली सरकार बनी। उनकी सरकार ने साल 2002 में राज्य की डोमिसाइल नीति घोषित की। इसके तहत भी सन् 1932 के सर्वे सेटलमेंट को स्थानीयता का आधार माना गया था, जिसके बाद हिंसा भडक़ गयी। उस हिंसा में छ: लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी थी। बाद के दिनों में बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री की कुर्सी छोडऩी पड़ी थी। झारखण्ड उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वी.के. गुप्ता, न्यायमूर्ति गुरुशरण शर्मा, न्यायमूर्ति एस.जे. मुखोपाध्याय, न्यायमूर्ति एल. उरांव और न्यायमूर्ति एम.वाई. इकबाल की खंडपीठ ने इससे सम्बन्धित जनहित याचिकाओं की सुनवाई करते हुए सरकार के इस निर्णय पर तत्काल रोक लगा दी थी। इसके बाद भाजपा नेता अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री बने। उन्होंने स्थानीय नीति तय करने के लिए तीन सदस्यीय समिति बना दी। समिति ने अपनी रिपोर्ट भी दी; लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ा। भाजपा के रघुवर दास 2014 में मुख्यमंत्री बने। रघुवर दास ने स्थानीय नीति को परिभाषित कर घोषित किया, जिसमें कई तरह के प्रावधान करते हुए सन् 1985 के समय से राज्य में रहने वालों को स्थानीय माना गया। उसका थोड़ा-बहुत विरोध हुआ; लेकिन लागू हो गया। राज्य में वर्तमान में यही नीति लागू है। झामुमो के नेतृत्व में सन् 2019 में सरकार बनी। ढाई साल बाद सरकार ने संकट के दिनों में इस मुद्दे को फिर से छेड़ दिया है।

हर दिन बढ़ रही हेमंत की मुसीबत
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में फँसे हुए हैं। राज्यपाल रमेश बैस ने चुनाव आयोग से अनुशंसा लेने के बाद भी अभी तक फ़ैसला नहीं सुनाया है। पिछले महीने 25 अगस्त से राज्यपाल के फ़ैसले का इंतज़ार किया जा रहा है। राज्यपाल क्यों फ़ैसला नहीं कर रहे, इसकी अधिकारिक जानकारी किसी के पास नहीं है। चर्चा है कि भाजपा सटीक समय का इंतज़ार कर रही है, इसलिए राज्यपाल रुके हैं। उधर खनन और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में ईडी की कार्रवाई अलग चल रही है। मुख्यमंत्री के विधायक प्रतिनिधि पंकज मिश्रा ईडी की हिरासत में हैं।

ईडी ने पंकज मिश्रा पर दाख़िल चार्जशीट में कहा है कि मिश्रा के यहाँ छापेमारी में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का एक बैंक पासबुक और चेकबुक के मिलने से राजनीतिक गलियारे में हलचल मच गयी है। मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार अभिषेक प्रसाद को कई बार पूछताछ की जा चुकी है। इसके अलावा बच्चू यादव, अभिषेक झा, प्रेम प्रकाश समेत कई अन्य लोग, जिनकी नेताओं और ब्यूरोक्रेसी के साथ संदिग्ध साँठगाँठ है; ईडी उनसे पूछताछ कर रही। हर दिन नये-नये ख़ुलासे हो रहे हैं। हेमंत सोरेन के ख़िलाफ़ इन सभी मामलों को लेकर कोर्ट में अलग से पीआईएल पर सुनवाई चल रही है। हर दिन उनकी मुसीबत बढ़ रही।

मुसीबत के बीच बड़ा दाँव

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ख़ुद पर आयी मुसीबत के बीच बड़ा दाँव खेल दिया है। उन्होंने मंत्रिमंडल से सन् 1932 खतियान वालों को स्थानीयता और पिछड़ा वर्ग को 27 फ़ीसदी आरक्षण से सम्बन्धित विधेयक पारित कर दिया है। अब इसे विधानसभा से पारित कराकर केंद्र को भेजेंगे। साथ ही दोनों मामलों को नौंवी अनुसूची शामिल करने की अनुशंसा भी की जाएगी। ख़ास बात है कि हेमंत सोरेन ख़ुद मार्च में संपन्न हुए बजट सत्र के दौरान स्थानीयता में सन् 1932 के खतियान लागू करने में समस्या बतायी थी। उन्होंने कहा था कि खतियान आधारित स्थानीय नीति न्यायालय में टिक नहीं पाएगी। इसके छ: महीने बाद बग़ैर किसी होमवर्क के अचानक कैबिनेट से इसे मंज़ूरी दे दी गयी। यानी अब जिनके पास सन् 1932 का खतियान होगा, वही झारखण्ड के स्थानीय होंगे। इसी तरह ओबीसी को 27 फ़ीसदी आरक्षण का मामला भी बग़ैर किसी सर्वे के पारित कर दिया गया। हालाँकि अभी विधेयक को विधानसभा से पारित होना है। राज्यपाल से मंज़ूर होना है। इसके बाद लागू होगा।

दुविधा में हाथ और लालटेन
राज्य में गठबंधन की सरकार है। झामुमो के नेतृत्व में सरकार है। कांग्रेस और राजद गठबंधन में शामिल है। झामुमो के सन् 1932 के खतियान की तीर ने हाथ (कांग्रेस) और लालटेन (राजद) को दुविधा में डाल दिया है। रांची, धनबाद समेत कोल्हान का क्षेत्र इस फ़ैसले से सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहा।

झारखण्ड से कांग्रेस के एक मात्र सांसद गीता कोड़ा और पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने सन् 1932 खतियान आधारित स्थानीय नीति का विरोध किया है। उनकी बग़ावत से कांग्रेस सहमी हुई है। इसी तरह पार्टी से 17 विधायकों में से आधे इसके विरोध में हैं। राजद की समस्या भी लगभग वैसी ही है। एक समय में राजद के झारखण्ड में 11 विधायक थे। अभी केवल एक विधायक हैं। राजद झारखण्ड में अपनी जगह बनाने का प्रयास कर रही है। उसके ज़्यादातर मतदाता वे हैं, जो वर्षों पहले नौकरी की तलाश में आकर झारखण्ड में बसे। लिहाज़ा राजद भी समर्थन और विरोध को लेकर दुविधा में है। इन सब के बीच भाजपा वेट एंड वॉच की स्थिति में है। चूँकि प्रदेश भाजपा की चाभी केंद्र के पास है। इसलिए प्रदेश नेता सँभलकर बयानबाज़ी कर रहे। वह सही वक़्त का इंतज़ार कर रहे।

मास्टर स्ट्रोक या घाटे का सौदा
राजनीतिक गलियारे में स्थानीयता और ओबीसी आरक्षण पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का निर्णय मास्टर स्ट्रोक कहा जा रहा है। हालाँकि कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की धारणा इससे इतर है। इसका मुख्यमंत्री और झामुमो को कितना $फायदा पहुँचा यह आने वाला वक़्त ही बता पाएगा। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि हेमंत सोरेन राजनीतिक दाँव लगाते हुए जनता को सन्देश देने का प्रयास किया है कि झामुमो अपने चुनावी वादे से पीछे नहीं हटी। वह भी जानते हैं कि सन् 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीयता सम्भव नहीं है। इसलिए अभी तक मामले को टाल रखा था। ओबीसी के 27 फ़ीसदी आरक्षण का मामला है। दोनों ही मामला शायद ही लागू हो पाये। उधर इस मामले में जनता भी दो हिस्से पक्ष और विपक्ष में है। अब देखना है कि दोनों का मुद्दों का हश्र क्या होता है। राजनीतिक खेल में कहीं झारखण्ड एक बार फिर जलने की ओर तो नहीं बढ़ रहा? या फिर सही में इस बार हल निकल आएगा।

बदल रहा है बद्रीनाथ, चार धाम महामार्ग परियोजना से धार्मिक पर्यटन को लगे पंख

हम ठहरे मैदानी इलाक़े में रहने वाले। अचानक बद्रीनाथ जाने का कार्यक्रम तय हुआ। बिना देरी किये रात 2:00 बजे हम हरिद्वार से चार लोग (तीन महिलाएँ और एक ड्राइवर) अपनी गाड़ी से चल पड़े। रात के सन्नाटे में ऋषिकेश में प्रवेश किया। चारों तरफ़ टिमटिमाती रोशनी, चौड़ी सडक़ें और शान्त वातावरण। यात्रा को लेकर मन में एक कौतूहल। ऋषिकेश निकलते ही मुनि की रेती से घुमावदार रास्ते के साथ ही पहाड़ चढऩे का सिलसिला शुरू हो गया। अभी सुबह नहीं हुई थी। पहाड़ी क्षेत्र में चल रहे थे, यह तो महसूस हो रहा था कि पहाड़ों की ऊँचाई का अनुमान नहीं है। पौ फटते ही हमारी गाड़ी एक लंगर स्थल के पास खड़ी हो गयी, जहाँ हमें नाश्ता मिल गया।

उसके बाद हम श्रीनगर पहुँचे। यहाँ आकर महसूस हुआ कि हम किसी आम पहाड़ की यात्रा पर नहीं थे। आध्यात्मिक क्षेत्र की जैसे पहली सीढ़ी का अहसास हुआ।

देवप्रयाग के बाद आया रुद्रप्रयाग, जहाँ से रास्ता बदला। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर पर्वत शृंखला। ऊँचे, नीचे और तंग रास्तों से होते हुए 11:00 बजे के क़रीब हम जोशीमठ पहुँचे। यहाँ की सडक़ें काफ़ी अच्छी बन गयी हैं। ऐसा लगा, मानो बद्रीनाथ पास ही हो। लेकिन चारों तरफ़ आसमान छूते पर्वत सीधी और कठिन चढ़ाई वाले देख अचम्भा हो रहा था। मानो यही पर्वत धरती का शिखर हैं। लेकिन यह सच न था। न जाने कितने पर्वत पार किये। हम दोपहर 1:30 बजे बद्रीनाथ पहुँच चुके थे।

भारत के प्रमुख धामों में उत्तराखण्ड में बद्रीनाथ धाम सबसे प्राचीनतम क्षेत्र है, जिसकी स्थापना सतयुग में हुई मानी जाती है। बद्रीनाथ को विशालपुरी और बद्री विशाल भी कहा जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि आदि युग में नर और नारायण त्रेता में भगवान राम, द्वापर में भगवान वेदव्यास और कलियुग में शंकराचार्य ने बद्रीनाथ में शान्ति पाकर धर्म और संस्कृति का शंखनाद किया। तभी से यह क्षेत्र बद्रीनाथ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। यह यात्रा बहुत समय पहले काफ़ी कठिन थी। बड़े बुज़ुर्ग बताते हैं कि लोग यात्रा से पहले अपना अन्तिम संस्कार करवा लेते थे। ऊबड़-खाबड़ रास्ते होने के कारण लोग पैदल चलते थे। बड़ी मुश्किल से 500 या 600 के क़रीब यात्री ही पहुँच पाते थे। लेकिन चारधाम महामार्ग की चौड़ी सडक़ें बन जाने से यात्री अब काफ़ी ख़ुश दिखायी देते हैं। कई तपस्वी आज भी पैदल यात्रा करते दिखायी देते हैं।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परिकल्पना के अनुसार, बद्रीनाथ धाम को और अधिक विकसित करने की परियोजना पर काम चल रहा है। उत्तराखण्ड के पर्यटन विभाग के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, राज्य सरकार द्वारा भारत सरकार के सहयोग से सामाजिक उत्तरदायित्व के ज़रिये 277 करोड़ रुपये की लागत से बद्रीनाथ धाम का विकास कार्य करवाया जा रहा है। 9 फरवरी, 2022 को देहरादून में एक कार्यक्रम में बोलते हुए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का कहना था कि पहले चार धाम यात्रा छ: महीने ही होती थी। ज़मीन खिसकने के कारण हादसे होते रहते थे। उन्होंने स्विट्जरलैंड से कंसलटेंट बुलाकर चारधाम सडक़ परियोजना पर चर्चा की। इसके बाद उत्तराखण्ड की 12,500 करोड़ रुपये की लागत से चार धाम ऑल वेदर रोड परियोजना बनी। वर्तमान में 563 किलोमीटर की सडक़ बनकर तैयार हो चुकी है और उम्मीद है कि दिसंबर, 2022 तक यह परियोजना पूरी हो जाएगी।

इस परियोजना को उत्तराखण्ड की जीवन रेखा बताते हुए गडकरी का कहना था कि ऋषिकेश से बद्रीनाथ धाम 253 किलोमीटर की दूरी पर है। रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, चमोली से माना गाँव तक 128 किलोमीटर सडक़ का काम 1,735 करोड़ रुपये की लागत से किया जा रहा है। पर्यावरण और पारिस्थितिकी को महत्त्वपूर्ण मानते हुए मंत्री का कहना था कि इसमें पेड़ काटे नहीं जाएँगे, बल्कि प्रत्यारोपित किये जाएँगे। बद्रीनाथ धाम सनातनियों का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान होने के साथ-साथ साहित्य और इतिहास की साधना के लिए भारत-तिब्बत सीमा का प्रहरी भी रहा है। शंकराचार्य ने इसे सुनियोजित सैनिक शिविर का रूप दिया था। इसलिए इस स्थान का सैनिक महत्त्व भी है। क्योंकि हिमालय के दो दर्रे माना और नीति यहीं आकर निकलते हैं। पुस्तक ‘भारत के तीर्थ स्थान’ में जानकारी मिलती है कि समुद्र तल से 3,133 मीटर की ऊँचाई पर नारायण पर्वत के मूल में बद्रीनाथ धाम स्थित है। बेर के घने जंगल होने के कारण इसका नाम बद्री पड़ा। यहाँ नर और नारायण दो पर्वत हैं।

नारायण पर्वत से भारी भरकम ब$र्फ की शिलाएँ खिसकती रहती हैं; लेकिन मन्दिर को कभी कोई नुक़सान नहीं होता है। अलकनंदा नदी के दायें तट पर नारायण का 45 फीट ऊँचा मन्दिर है। पूर्व दिशा में इसका मुख्य द्वार है, जिसे सिंहद्वार भी कहते हैं। जो बेहद सुन्दर और प्राचीन नागर वास्तु शैली में बना हुआ है। मन्दिर में भगवान नारायण की पद्मासन में बैठी हुई मूर्ति है, जो काले शालिग्राम पत्थर की बनी हुई है। दायीं ओर नर-नारायण, बायीं ओर गरुड़ और कुबेर की मूर्ति है। मन्दिर के गुम्बद के ऊपर रानी अहिल्याबाई होलकर द्वारा भेंट किया गया कलश चढ़ा है। गढ़वाल राइफल्स द्वारा भेंट किया गया एक बड़ा घंटा लटक रहा है। गर्भ ग्रह के दरवाज़े चाँदी के हैं। मन्दिर के प्रमुख पुरोहित को रावल कहते हैं कि बद्रीनाथ धाम के बारे में अलग-अलग मिथका, कथाएँ और प्रसंग मिलते हैं। लेकिन यह मान्यता है कि यह पवित्र स्थल भगवान विष्णु की तपस्या का गवाह रहा है, जिसके आध्यात्मिक आकर्षण का वर्णन स्वामी विवेकानंद ने भी अपनी लेखनी में किया है। इस बारे में बुद्ध से जुड़ी तिब्बती दंतकथा भी मिलती है।

कैसे और कब जाएँ बद्रीनाथ?

बद्रीनाथ धाम की यात्रा करने का उचित समय मई से नवंबर तक का रहता है। बरसात के दिनों में थोड़ा-सा मुश्किल होता है। बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग-58 पर स्थित है। इस पर राज्य परिवहन की बसें चलती हैं। इसके अलावा प्राइवेट वाहन और टैक्सियाँ भी चलती हैं। ऋषिकेश से बद्रीनाथ की दूरी 297 किलोमीटर है। बद्रीनाथ से सबसे नज़दीक देहरादून हवाई अड्डे का जौली ग्रांट है, जहाँ से बस और प्राइवेट टैक्सी से जाया जा सकता है।

10 वर्षों में बद्रीनाथ पहुँचे यात्रियों की संख्या (पर्यटन विभाग, देहरादून से मिली जानकारी के अनुसार)
वर्ष 2012 9,41, 092
वर्ष 2013 4,97,386
वर्ष 2014 1,50,060
वर्ष 2015 3,66,455
वर्ष 2016 6,54,355
वर्ष 2017 9,20,466
वर्ष 2018 10, 48, 051
वर्ष 2019 11,74,013
वर्ष 2020 1,55,055
वर्ष 2021 1,99, 409

दिग्गजों की विदाई, रोजर फेडरर और सेरेना विलियम्स को हमेशा किया जाएगा याद

दुनिया की टेनिस मानो अचानक सूनी-सी हो गयी है। कुछ समय पहले तक हम यह सोच भी नहीं सकते थे कि टेनिस के मैदान में हम महान् सेरेना और फेडरर को नहीं देख पाएँगे। लेकिन दोनों के लगभग एक ही समय में इस खेल से संन्यास ने टेनिस प्रेमियों में उदासी भर दी है। खिलाड़ी आएँगे और चले जाएँगे; लेकिन जीत के बाद सेरेना का ख़ास अंदाज़ में ट्रॉफी के साथ फोटोशूट और फेडरर की मुस्कराहट अब मैदान पर नहीं दिखेंगे। ढेरों रिकॉड्र्स से इतर इन दोनों ने दर्शकों को ढेर सारी और भी यादें दीं, जो भूले नहीं भूलायी जा सकेंगी। सेरेना और फेडरर के टेनिस से प्रेम और उनके स्टेमिना का इस बात से पता चलता है कि दोनों ने 41 साल की उम्र में संन्यास लिया, जिसे कड़े मुक़ाबले वाले अंतरराष्ट्रीय पटल पर बड़ी उम्र माना जाता है।

पहले बात फेडरर की, जिन्होंने कहा कि वह ग्रैंड स्लैम से संन्यास ले रहे हैं। बहुत कम को पता होगा कि यह महान खिलाड़ी स्कूल का ड्रॉप आउट था। लेकिन टेनिस में उसने जो किया, वह इतिहास बन गया। दर्ज़नों रिकॉर्ड उन्होंने नाम किये और अपने व्यवहार से दर्शकों का दिल जीत लिया। स्विटजरलैंड के फेडरर पशुओं को भी बहुत प्यार करते हैं और उनके फार्म में गाय भी है। जब 21 साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला विंबलडन टाइटल जीता, तब किसी ने उन्हें तोहफ़े में एक दुर्लभ और महँगी नस्ल की गाय दी, जिसका नाम फेडरर ने जूलियट रखा।

फेडरर जब 16 साल के थे, उन्होंने स्कूल छोड़ दिया; लेकिन वे मातृभाषा स्विस के अलावा नौ और भाषाएँ जानते हैं। वह इतने सहज और आम इंसान हैं कि उनके आलू-सब्ज़ी ख़रीदते हुए दर्ज़नों फोटो या वीडियो आप इंटरनेट पर देख सकते हैं। कुल मिलाकर फेडरर विवादों से दूर ही रहे। उन्होंने टेनिस में जो हासिल किया, वह अपनी मेहनत और खेल के प्रति समर्पण से हासिल किया। और जो लोकप्रियता अर्जित की, वह अपने सौम्य व्यवहार से। फेडरर ग्रास कोर्ट के शहंशाह रहे। हालाँकि लाल बजरी के कोर्ट में भी उन्होंने दिग्गजों को हराया।

फेडरर अपने वचन के भी पक्के थे। एक बार उन्होंने छ: साल के एक बच्चे इज़हान अहमद को दिया वचन वर्षों बाद निभाया। दरअसल फेडरर ने सन् 2017 में अपने इस फैन इज़हान से टेनिस खेलने के वादा किया था। इज़हान ने उनसे सवाल किया था कि क्या वह 7-8 साल और अपना खेल जारी रख सकते हैं; क्योंकि वे बड़ा होकर उनके साथ टेनिस खेलना चाहता है। फेडरर ने जब हाँ कहा, तो इज़हान को विश्वास नहीं हुआ। लिहाज़ा उसने पूछा कि क्या आप वादा कर रहे हैं? इस पर फेडरर का जवाब था- ‘यस, पिंकी प्रॉमिस।’

अगस्त, 2022 में जब उन्होंने इज़हान से किया वादा निभाया, तो न केवल उसके साथ पिज्जा पार्टी की, बल्कि इटैलियन फूड कम्पनी बैरिला के साथ पार्टनरशिप में बनाया वीडियो भी शेयर किया, जो काफ़ी वायरल हुआ। फेडरर ने ट्विटर पर अपने संन्यास की घोषणा करके सभी प्रशंसकों को उदास कर दिया। इसमें उन्होंने लिखा- ‘मैं 41 साल का हूँ। मैंने 24 साल में 1500 से अधिक मैच खेले हैं। टेनिस ने मेरे साथ पहले से कहीं अधिक उदारता से व्यवहार किया है।’ फेडरर ने पत्नी मिर्का का धन्यवाद करते हुए कहा कि वह हर मिनट उनके साथ खड़ी रहीं।

यह महान् खिलाड़ी पुरुष सिंगल्स में सबसे ज़्यादा ग्रैंड स्लैम ख़िताब (20) जीतने के मामले में नडाल और जोकोविक के बाद तीसरे नंबर पर है। फेडरर ने 28 जनवरी, 2018 को ऑस्ट्रेलियन ओपन के रूप में आख़िरी ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीता था। हालाँकि इस ख़िताब के बाद फेडरर पर उम्र का असर दिखने लगा और पहले वाले फेडरर नहीं रहे। फेडरर ने करियर में 8 विम्बलडन, 6 ऑस्ट्रेलियन ओपन, पाँच यूएस ओपन और एक फ्रेंच ओपन ख़िताब जीता। ओलंपिक में भी एक गोल्ड और एक सिल्वर मेडल भी उनके नाम है।

साल 2018 तक सबसे ज़्यादा ग्रैंड स्लैम का रिकॉर्ड अपने नाम बरक़रार रखने वाले फेडरर पिछले चार साल में चोटों से काफ़ी परेशान रहे, जिससे वह अपना सर्वश्रेष्ठ नहीं दिखा सके। फेडरर के नाम कुल 103 टाइटल हैं, जो जिमी कॉनर्स (109) से छ: कम हैं। फेडरर जिमी कॉनर्स (1274) के बाद दूसरे सबसे ज़्यादा सिंगल्स मैच (1251) जीतने वाले खिलाड़ी भी हैं। वह सबसे लम्बे वक़्त (237 सप्ताह) तक नंबर-वन रैंकिंग पर रहे।

फेडरर 36 साल 320 दिन की उम्र में एटीपी रैंकिंग में नंबर-वन रहने वाले सबसे उम्र दराज़ खिलाड़ी भी हैं। फेडरर ने सबसे ज़्यादा आठ विंबलडन पुरुष सिंगल्स टाइटल जीते और साल 2017 में 35 साल 342 दिन की उम्र में विंबलडन टाइटल जीतकर सबसे उम्रदराज़ खिलाड़ी बने। साल 2005-06 में उन्होंने लगातार 10 ग्रैंड स्लैम फाइनल खेलने वाला रिकॉर्ड भी बनाया। फेडरर ने तीन कैलेंडर वर्षों- 2006, 2007 और 2009 में में चारों ग्रैंड स्लैम फाइनल खेले जो रिकॉर्ड है। ग्रास कोर्ट पर लगातार सबसे ज़्यादा 65 मैच जितने वाले खिलाड़ी भी फेडरर हैं।

सेरेना विलियम्स

सेरेना को निर्विवाद रूप से ओपन ईरा की महानतम् महिला टेनिस खिलाड़ी माना जाता है। अपने 27 साल के लम्बे और लाजवाब करियर में विलियम्स ने कई रिकॉर्ड बनाये और अपने खेल से टेनिस प्रेमिययों को मंत्रमुग्ध किया। यूएस ओपन उनका आख़िरी ग्रैंड स्लैम रहा। महान् होने के बावजूद कुछ विवाद भी उनके नाम जुड़े। लेकिन यह सेरेना विलियम्स ही थीं, जिन्होंने 16 की उम्र में डेब्यू किया और 17 की उम्र में ही पहला ग्रैंड स्लैम जीत लिया था। वह ढाई दशक तक टेनिस कोर्ट की महारानी रहीं। उन्होंने इस दौरान वह सब उपलब्धियाँ हासिल की, जिनकी एक खिलाड़ी कल्पना करता है। टेनिस कोर्ट से विदाई की स्पीच के दौरान विलियम्स का भावुक होना इस बात का प्रमाण है कि टेनिस से उन्हें कितनी मोहब्बत थी। लगभग रोते हुए सेरेना ने कहा- ‘मैं सेरेना नहीं होती, अगर वीनस (सगी बहन और टेनिस स्टार) नहीं होती। मैं माँ बनने और सेरेना के डिफरेंट वर्जन को एक्सप्लोर करने के लिए तैयार हूँ।’

सेरेना ने महज़ चार साल की उम्र में ही रैकेट थाम लिया था। उनके पिता रिचर्ड विलियम्स चाहते थे कि कम-से-कम एक बेटी टेनिस स्टार बने। सेरेना का जन्म मिशिगन में हुआ था; लेकिन छोटी उम्र में ही उनका परिवार कैलिफोर्निया आ गया। सेरेना की माँ ओरेसीन प्राइस और पिता रिचर्ड ने ही उन्हें ट्रेनिंग दी। जब वह 13 साल की थीं, तब पिता उन्हें 6-6 घंटे कड़ी धूप में ट्रेनिंग करवाते थे।

सन्त 1996 में पहला प्रोफेशनल टेनिस टूर्नामेंट खेलने वाली सेरेना ने 24 साल पहले मार्टिना हिंगिस को हराकर साल 1999 में करियर का पहला और सबसे कम उम्र में ग्रैंड स्लैम जीता। उन्होंने 39 मेजर टाइटल जीते, जिनमें 23 सिंगल्स और 14 महिला डबल्स और दो मिक्स्ड डबल्स शामिल हैं। सेरेना के नाम चार ओलंपिक मेडल भी हैं।
सेरेना ने साल 2017 में आख़िरी ग्रैंड स्लैम टाइटल जीता था। सेरेना ने छ: ग्रैंड स्लैम 32 साल की उम्र के बाद जीते। उन्होंने 22 साल की उम्र तक टेनिस के चारों मेजर टूर्नामेंट जीत लिये थे। इस दौर में उनकी बहन वीनस विलियम्स ही उनकी सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी रहीं। सेरेना मार्गरेट कोर्ट के 24 ग्रैंड स्लैम ख़िताब जीतने के रिकॉर्ड को तोडऩे का लक्ष्य हासिल नहीं कर पायीं। उन्होंने करियर में 23 ग्रैंड स्लैम एकल और बहन वीनस के साथ 14 युगल ख़िताब जीते। चार ओलंपिक स्वर्ण पदक भी जीते। सितंबर, 2017 में सेरेना ने बेटी को जन्म देने के सिर्फ़ ढाई महीने बाद ही कोर्ट पर वापसी की। उसके बाद विंबलडन साल 2018 और 2019, यूएस ओपन साल 2018 और 2019 के फाइनल खेले; लेकिन जीत नहीं सकीं।

सेरेना के नाम दो गोल्डन स्लैम हैं। गोल्डन स्लैम हासिल करने वाली सेरेना पहली खिलाड़ी बनी थीं। बहन वीनस के साथ मिलकर डबल्स में भी उन्होंने यह कारनामा दोहराया। सेरेना विवादों के कारण भी चर्चा में रहीं। अंपायर को चोर कहने से लेकर पिता रिचर्ड विलियम्स पर मैच फिक्स के आरोप लगने तक। साल 2002 के यूएस ओपन में वह कैट सूट पहनकर खेलने उतरीं और इस ड्रेस पर काफ़ी हंगामा हुआ।

बन्द हों नफ़रत की दुकानें

धर्म को अगर अना और प्रतिष्ठा की वस्तु मानकर उस पर अन्धे होकर अति गर्व किया जाएगा, तो दूसरे धर्म के लोगों से अनायास ही नफ़रत होने लगेगी। यह ठीक उसी प्रकार है, जैसे किसी स्वार्थी माँ को सिर्फ़ अपने बच्चे अच्छे लगते हैं और दूसरों के बच्चे बहुत बुरे। ऐसी माँ भी अपने बच्चों को अना और प्रतिष्ठा का स्वरूप मानकर अन्धी होकर उस पर अतिशय गर्व करती है। ऐसे लोगों में ईश्र्या कूट-कूटकर भरी होती है। इसी ईश्र्या की वजह से किसी भी धर्म के लोग अपने से विलग दिखने वाले लोगों से अकारण ही बैर रखते हैं। लेकिन संसार में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो सभी धर्मों और उन धर्मों के लोगों की इज़्ज़त करते हैं। उनके मान-सम्मान में उतना ही प्यार रखते है, जितना कि अपने धर्म के प्रति। कुछ लोग तो ऐसे हैं, जो अपने धर्म के साथ-साथ दूसरे धर्म की विरासतों को संजोकर रखते हैं।

अजमेर समेत राजस्थान के लगभग चार ज़िलों में तो ऐसे कई परिवार भी हैं, जो सनातन धर्मी भी हैं और मुस्लिम भी। ये लोग चीता मेहरात समुदाय के हैं। इन समुदायों के लिए धर्म तो मायने रखते हैं, किन्तु झगड़े की कोई गुंजाइश यहाँ नहीं है। एक ही परिवार में हर व्यक्ति दोनों धर्म के त्योहार मनाता है। एक ही घर में पिता पूजा करता है, तो पुत्र नमाज़ पढ़ता है। कहीं पुत्र पूजा करता है, तो पिता नमाज़ पढ़ता है। कई लोग तो ऐसे हैं, जो एक साथ दोनों धर्मों के अनुसार कर्मकांड भी करते हैं। बड़ी बात है कि इस चीता मेहरात समुदाय के लोगों की संख्या लगभग 10 लाख है।

इस समुदाय के लोग बताते हैं कि उनका ताल्लुक़ चौहान राजाओं से रहा है। इसके चलते पहले इस समुदाय के अधिकतर पूर्वज सनातन धर्मी ही थे, परन्तु मुस्लिम समुदाय में व्यवहार और शादी-विवाह आदि के चलते इन्होंने क़रीब 700 साल पहले इस्लाम को भी अपना लिया। आज भी इस समुदाय के लोगों के घरों से जब बारात निकलती है, तो दूल्हे को मन्दिर और मस्जिद दोनों जगहों पर आशीर्वाद लेने जाना होता है। शादी में कलश पूजन होता है, फेरे भी लिये जाते हैं। अगर कोई निकाह भी करना चाहता है, तो वह भी कर सकता है। इस पर किसी को कोई भी आपत्ति नहीं होती।

इस तरह की परम्परा आसान नहीं है और न ही हर जगह यह होता है। शायद ही पूरी दुनिया में अन्यत्र कहीं कोई ऐसा अनोखा उदाहरण देखने को मिले। क्योंकि इतनी बड़ी संख्या में एक-एक परिवार में दो धर्मों का निर्वहन करना और फिर भी आपस में कोई मतभेद, कोई तनाव न होना, पूरे देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लोगों के लिए मिलजुलकर रहने की एक बड़ी सीख है। सीख यह कि सभी को एक-दूसरे के धर्म और उनकी परम्पराओं की क़द्र करनी चाहिए। हालाँकि दुनिया में लाखों लोग ऐसे हैं, जो दूसरे धर्म में शादी-व्यवहार करके एक-दूसरे के साथ बिना किसी धार्मिक विवाद के निर्वहन करते हैं। लेकिन एक जगह इतने लोग मिलजुलकर रहते हों, ऐसा देखने को नहीं मिलेगा। अनेक मामलों में एक-दूसरे को निभाना मुश्किल हो जाता है। दो धर्मों के मामले की तो बात ही अलग है। कई लोग तो अपने साथी, ख़ासतौर पर महिलाओं पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने लगते हैं। यह भी उचित नहीं है। कुछ लोग अपनी मर्ज़ी से ही दूसरे धर्मों और उनके मानने वाले लोगों का सम्मान करते हैं। यह एक अच्छी बात है। लेकिन आजकल यह चलन से बाहर होता जा रहा है। एक दौर ऐसा भी था, जब पहले सिख गुरु गुरुनानक मक्का चले गये थे। आज तो किसी साधु-सन्त का भी दूसरे धर्म के तीर्थ स्थल पर जाना मुश्किल है।

हालाँकि अब पहले जैसे साधु, सन्त या फ़क़ीर नहीं रहे, जो समाज बन्धनों से दूर भूखे-प्यासे रहकर भी ख़ुश रहा करते थे। लेकिन समाज के कल्याण के लिए जीते थे। वहीं आज के कथित साधु, सन्त और फ़क़ीर समाज को लूटने में लगे हैं। किसी में कोई योग्यता नहीं दिखती। करोड़ों की सम्पत्ति बटोरकर बैठे इन तथाकथित धर्माचार्यों का काम अब समाज को रास्ता दिखाना नहीं, बल्कि उसे भटकाना हो गया है। ये आपस में नहीं लड़ते; लेकिन लोगों में एक-दूसरे के प्रति नफ़रत फैलाकर अपने स्वार्थ के लिए उन्हें लड़वाते रहते हैं।

क्या ऐसा नहीं हो सकता कि अब समाज ही इन तथाकथित धर्माचार्यों को राह दिखाये? एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को दूसरे धर्म या जाति का मानने से पहले एक इंसान समझे। अगर कोई ऐसा नहीं समझता, तो उसके इंसान और बुद्धिमान होने का कोई फ़ायदा नहीं। सभी एक-दूसरे का सम्मान करें, उनकी रीतियों का सम्मान करें और उनमें शामिल होकर उन्हें प्यार बाँटें, तो नफ़रत बोने वालों की दुकान ही बन्द हो जाए। यह तभी हो सकता है, जब लोग धर्म को अपने घर में ही रखें। पूजा-पाठ, इबादत, प्रार्थना जो भी करें, घर में ही करें। बाहर निकलें, तो सिर्फ़ एक इंसान की तरह पेश आएँ। यहाँ मुझे शायर विकास वर्मा ‘बाबा’ का एक शेर याद आ रहा है :-

‘मज़हब को अपने घर में ही महदूद कीजिए,
जब-जब सडक़ पे निकला है, तौहीन ही हुई।’

पीएम मोदी ने देश में 5G सेवाओं की शुरुआत की, बोले नए युग में देश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को 5G सेवाओं की शुरुआत की। यह सुविधा फिलहाल देश के चुनिंदा शहरों में उपलब्ध होगी। इस अवसर पर पीएम मोदी ने कहा कि इस सेवा के साथ भारत एक नए युग में प्रवेश कर रहा है।

जानकारी के मुताबिक साल 2030 तक इस सेवा के उत्तरोत्तर पूरे देश को कवर करने की उम्मीद है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रगति मैदान में एक प्रदर्शनी का भी निरीक्षण किया। भारतीय मोबाइल कांग्रेस (आईएमसी) के छठे संस्करण का उद्घाटन करने के बाद पीएम ने कहा कि हाल के सालों में भारत ने संचार क्षेत्र में बहुत तरक्की की है।

इससे पहले रिलायंस जियो के चेयरमैन आकाश अंबानी ने जल्द ही लॉन्च होने वाली 5जी सेवाओं के बारे में प्रधानमंत्री को जानकारी दी। देश में 5G सेवाओं की लॉन्चिंग के साथ देश टेक्नोलॉजी के एक नए युग में प्रवेश कर गया है। यह लॉन्चिंग भारतीय मोबाइल सम्मेलन के छठे संस्करण में हुई जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया।

बता दें यह सम्मेलन प्रमुख विचारकों, उद्यमियों, इनोवेटर्स और सरकारी अधिकारियों को एक साथ लाते हुए डिजिटल टेक्नोलॉजी को तेजी से अपनाने, इसके प्रसार से होने वाले अद्वितीय अवसरों पर विचार-विमर्श करने और विभिन्न प्रस्तुतियों के लिए एक साझा मंच प्रदान करेगा।

भारत पर 5जी का कुल आर्थिक प्रभाव 2035 तक 450 अरब अमेरिकी डॉलर तक होने का अनुमान है। बता दें 4जी की तुलना में 5G नेटवर्क कई गुना तेज गति देता है और बाधा रहित संपर्क मुहैया कराता है। साथ ही अरबों जुड़े डिवाइसों को वास्तविक समय में डेटा साझा करने में सक्षम बनाता है।

देश की अबतक की सबसे बड़ी दूरसंचार स्पेक्ट्रम की नीलामी में रिकॉर्ड 1.5 लाख करोड़ रुपये की बोलियां प्राप्त हुई थीं। इसमें उद्योगपति मुकेश अंबानी की जियो ने 87,946.93 करोड़ रुपये की बोली के साथ बेचे गए सभी स्पेक्ट्रम का लगभग आधा हिस्सा हासिल किया है।

भारत के सबसे धनी व्यक्ति गौतम अडानी के समूह ने 400 मेगाहर्ट्ज के लिए 211.86 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी। इसका इस्तेमाल हालांकि, सार्वजनिक टेलीफोन सेवाओं के लिए नहीं किया जाता है। वहीं, दूरसंचार क्षेत्र के दिग्गज सुनील भारती मित्तल की भारती एयरटेल ने 43,039.63 करोड़ रुपये की सफल बोली लगाई, जबकि वोडाफोन-आइडिया ने 18,786.25 करोड़ रुपये में स्पेक्ट्रम खरीदा है।

प्राकृतिक गैस कीमतों में 40 फीसदी वृद्धि के बाद कमर्शियल एलपीजी सस्ती हुई

एक दिन पहले प्राकृतिक गैस की कीमतों में रिकॉर्ड 40 फीसदी की बढ़ोतरी करने के बाद इंडियन ऑयल ने शनिवार को कमर्शियल रसोई गैस सिलेंडर के रिफिल की कीमत 25.5 रुपये कम करने की घोषणा की है। हालांकि, घरेलू उपयोग वाली रसोई गैस की कीमतों में जनता को कोई राहत नहीं दी गयी है।

प्राकृतिक गैस की कीमतों में रिकॉर्ड 40 फीसदी की बढ़ोतरी के बाद देश में बिजली उत्पादन, उर्वरक बनाने और वाहन चलाने में इस्तेमाल होने वाली गैस महंगी हो जाने की आशंका जताई गई है। तेल मंत्रालय के पेट्रोलियम योजना और विश्लेषण प्रकोष्ठ शुक्रवार को एक आदेश में पुराने गैस क्षेत्रों से उत्पादित गैस के लिए भुगतान की जाने वाली दर को मौजूदा 6.1 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट से बढ़ाकर 8.57 डॉलर प्रति एमबीटीयू कर दिया।

इसी दर पर देश में उत्पादित गैस के लगभग दो तिहाई हिस्से की बिक्री होगी। इन दरों में भारी वृद्धि से सीएनजी और पीएनजी की कीमतों में बढ़ोतरी होने की आशंका है, जो पहले से ही पिछले एक साल में 70 फीसदी से अधिक बढ़ चुकी हैं।

उधर शनिवार को दिल्ली में कमर्शियल रसोई गैस सिलेंडर के रिफिल की कीमत 25.5 रुपये कम कर दी गई है। इंडियन ऑयल ने 19 किलोग्राम के कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत में यह कमी की है। दिल्ली में कीमत 25.50 रुपये प्रति सिलेंडर घटी है। यह कीमत 1885 रुपये से घटकर 1859.50 रुपये प्रति रिफिल हो गई है। कोलकाता में कीमत 26 रुपये प्रति सिलेंडर घटी है। कोलकाता में अब कीमत 1959 रुपये और मुंबई में 1811 रुपये ह गई है.

कामर्शियल गैस की कीमत में एक जुलाई को दिल्ली में 2021 रुपये और कोलकाता में 2140 रुपये थी, छह जुलाई को इन शहरों में कीमत क्रमश: 2012.50 और 2132 थी जबकि पहली अगस्त को कीमत क्रमश: 1976.50 और 2095.50 थी। एक माह पहले पहली सितंबर को दिल्ली में कीमत 1885 और कोलकाता में 1995.50 रुपये थी।

घरेलू उपयोग वाली रसोई गैस की कीमतों में तो कोई परिवर्तन नहीं किया गया है लेकिन कमर्शियल उपयोग के लिए होटलों, रेस्टोरेंटों आदि में उपयोग की जाने वाली रसोई गैस के दाम घट गए हैं।