Home Blog Page 469

वफ़ादार को ताज! थरूर के मुक़ाबले कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव में खडग़े का हाथ ऊपर

कांग्रेस में लम्बी कसरत और उठापटक के बाद आख़िर अध्यक्ष के चुनाव की तस्वीर साफ़ हो गयी है। ग़ैर-गाँधी के इस चुनाव में शशि थरूर और मल्लिकार्जुन खडग़े में टक्कर है, और हालात साफ़ संकेत कर रहे हैं कि कोई उलटफेर नहीं हुआ, तो अनुभवी और गाँधी परिवार के क़रीबी खडग़े कांग्रेस के अगले अध्यक्ष होंगे। जीतने पर जगजीवम राम के बाद वह कांग्रेस के दूसरे दलित अध्यक्ष होंगे। भले ग़ैर-गाँधी अध्यक्ष बने, खडग़े को गाँधी परिवार का ही प्रतिनिधि माना जाएगा। बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-

यह संयोग ही था कि जिस दिन राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा शशि थरूर के गृह राज्य केरल से मल्लिकार्जुन खडग़े के गृह राज्य कर्नाटक पहुँची, दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए ख़ुद को पीछे कर खडग़े के नाम का समर्थन कर दिया। खडग़े और थरूर दोनों ने ही अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाख़िल किये हैं और साफ़ दिख रहा है कि गाँधी परिवार के वफ़ादार के रूप में खडग़े का कांग्रेस अध्यक्ष चुना जाना लगभग तय है। सन् 1998 में जब सोनिया गाँधी पार्टी की अध्यक्ष बनीं, उसके बाद खडग़े, (यदि चुने गये तो) पहले ग़ैर-गाँधी कांग्रेस अध्यक्ष होंगे। इससे पहले सीताराम केसरी गाँधी परिवार से बाहर के अध्यक्ष थे। यह भी हो सकता है कि नेताओं के आग्रह को मानते हुए थरूर नाम वापस ले लें और खडग़े को सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने जाने का रास्ता साफ़ कर दें।

खडग़े के रूप में 10 जनपथ ने एक तीर से कई निशाने साध लिये हैं। सबसे बड़ा यह कि राजनीतिक विरोधी भाजपा को चुप कराने के लिए अध्यक्ष पद परिवार से बाहर के व्यक्ति को दे दिया है। हालाँकि यह भी तय है कि भाजपा का हमला फिर भी भविष्य में गाँधी परिवार पर ही सीमित रहेगा। दूसरे, एक वफ़ादार को पार्टी अध्यक्ष बनाकर सन्देश दे दिया कि वफ़ादारी का पुरुस्कार मिलता ही है। भले खडग़े ज़मीन से उठकर आये नेता हों और उनका संसदीय और राजनीतिक अनुभव किसी भी नेता के मुक़ाबले काफ़ी हो, वह कहलाएँगे गाँधी परिवार के वफ़ादार ही।

उधर खडग़े के मुक़ाबले उतरे थरूर को गाँधी परिवार का वफ़ादार नहीं कहा जा सकता और वह जी-23 में भी रहे हैं। कोई सन्देह नहीं कि थरूर भले मैदान में उतरे हैं, वह ख़ुद कह चुके हैं कि भले दोस्ताना मुक़ाबले के लिए ही सही, वह चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष पद की दौड़ में एक नामांकन के.एन. त्रिपाठी ने भी भरा है। हालाँकि न उनके जीतने की कोई उम्मीद है, और न ही उनका चर्चा है। लिहाज़ा प्रमुख रूप से खडग़े और थरूर ही मैदान में हैं।


राजस्थान का घटनाक्रम

राजस्थान की घटना के बाद ही खडग़े का नाम तय हुआ। पार्टी आलाकमान के भेजे दूतों के सामने पार्टी के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थक विधायकों ने जैसा व्यवहार किया उसने एक समय तय मानी जा रही गहलोत की कांग्रेस अध्यक्ष पद पर ताजपोशी के रास्ते में रोड़ा अटका दिया। जब यह सारा घटनाक्रम हुआ और सोनिया गाँधी के इस घटना के प्रति नाराज़गी की बात सामने आयी, तो गहलोत दिल्ली दौड़े। यह माना जाता है कि उन्होंने फोन पर गाँधी से इस घटनाक्रम पर माफ़ी माँगी और कहा कि इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं थी।

इसके बाद देर रात सोनिया गाँधी और प्रियंका गाँधी के बीच नये अध्यक्ष को लेकर चर्चा हुई, जिसमें खडग़े का नाम तय हुआ। हालाँकि इस बीच मध्य प्रदेश के दिग्गज और दो बार मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह ने भी कहा कि वे अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ेंगे। लेकिन नामांकन के आख़िरी दिन उन्होंने ख़ुद को पीछे करके खडग़े के नाम का समर्थन कर दिया, जो स्वाभाविक रूप से गाँधी परिवार की पसन्द बन चुके थे।

देखें, तो कांग्रेस में जगजीवन राम के बाद कोई भी दलित पार्टी का अध्यक्ष नहीं बना है। जगजीवन राम 1970-71 में कांग्रेस के अध्यक्ष थे। याद रहे, इसी साल जुलाई में जब ईडी ने सोनिया-राहुल को नेशनल हेराल्ड मामले में पूछताछ के लिए अपने दफ़्तर बुलाया था, उस समय संसद में विरोध का मोर्चा खडग़े ने ही सँभाला था। खडग़े के नामांकन में जिस तरह कांग्रेस के तमाम बड़े जुटे उससे ज़ाहिर हो जाता है कि गाँधी परिवार उनके साथ है। आनंद शर्मा जैसे नेता, जो हाल के महीनों में गाँधी परिवार को लेकर विपरीत विचार रखते रहे हैं; भी इस मौक़े पर उपस्थित थे। इसी तरह महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वी राज चव्हाण ने इस मौक़े पर कहा कि उन्हें जी-23 का नाम मीडिया ने दिया और वह कभी भी पार्टी से बाहर नहीं थे। वह सिर्फ़ पार्टी की बेहतरी की बात कर रहे थे। इसके विपरीत थरूर के साथ कोई बड़ा नेता नहीं था। यहाँ तक कि उन्हें अपने गृह राज्य केरल से भी समर्थन नहीं मिल पाया।

गहलोत और पायलट का भविष्य

कांग्रेस में अब इन दोनों नेताओं के भविष्य की बड़ी चर्चा है। राजस्थान के घटनाक्रम के बाद दोनों दिल्ली में पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी से मिले और अपनी अपनी बात उनके सामने रखी। मुलाक़ात के बाद गहलोत के चेहरे और पायलट के चेहरे की भाषा से समझा जा सकता है कि गहलोत को राजस्थान की घटना से ख़ुद पर अफ़सोस है और वह महसूस करते हैं कि उनसे बड़ी ग़लती हो गयी। नहीं भूलना चाहिए कि राजस्थान की घटना से पहले गहलोत ख़ुद कह चुके थे कि वह कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ रहे हैं।

यह साफ़ है कि देर-सबेर सचिन पायलट राजस्थान में कांग्रेस की सूबेदारी सँभालेंगे। गहलोत कब तक मुख्यमंत्री रहेंगे, कहना मुश्किल है। पार्टी के संगठन मंत्री केसी वेणुगोपाल का यह बयान नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी कुछ दिन में राजस्थान के मुख्यमंत्री को लेकर फ़ैसला करेंगी। इस बयान का कोई अर्थ निकाला जाए, तो यही है कि गहलोत की कुर्सी को लेकर कोई फ़ैसला पार्टी कर सकती है। अर्थात् उनकी कुर्सी जाने का ख़तरा भी मँडरा रहा है।

गहलोत के क़रीबी तीन बड़े नेताओं को कांग्रेस अनुशासन समिति नोटिस जारी कर चुकी है, जबकि इसके बाद बाक़ायदा एक ब्यान में पार्टी ने इन सभी नेताओं को अनुशासन की सीमा नहीं लाँघने का निर्देश दिया है। निश्चित ही जो हुआ, वह पार्टी आलाकमान के निर्देशों की नाफ़रमानी तो थी ही। पार्टी ने राजस्थान के बहाने जो सन्देश दिया, वह यही है कि आलाकमान की नाफ़रमानी करने के क्या मायने क्या हैं। भाजपा में ऐसा हुआ होता, तो शायद इन नेताओं को कब का बाहर कर दिया गया होता।

पार्टी इस समय भारत जोड़ो पद यात्रा चला रही है और उसमें जुट रही भीड़ से नेता उत्साहित हैं। तो क्या मल्लिकार्जुन खडग़े को अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस दक्षिण भारत में अपने पाँव मज़बूत करना चाहती है? लगता तो यही है। दक्षिण में कांग्रेस की इस क़वायद के पीछे भाजपा का वहाँ ख़ुद को मज़बूत करने की कोशिश भी है। कांग्रेस को पता है कि उत्तर भारत में नरेंद्र मोदी के चलते उसके लिए फ़िलहाल बहुत ज़्यादा सम्भावनाएँ नहीं हैं। यही कारण है कि गुजरात और हिमाचल जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव इसी साल होते हुए भी कांग्रेस की पदयात्रा दक्षिण राज्यों पर ज़्यादा केंद्रित लगती है।

भाजपा ने कांग्रेस की इस यात्रा को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रिया दी है, उससे भी ज़ाहिर होता है कि उसे दक्षिण में कांग्रेस की इस कोशिश से चिन्ता है। वह इसके बाद दोबारा दक्षिण में सक्रिय हुई है। देखा जाए, तो दक्षिण कांग्रेस के लिए राजनीतिक ख़ज़ाने जैसा रहा है। भले कांग्रेस का बुरा दौर चल रहा हो, भविष्य में जनता क्या फ़ैसला करेगी, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। सन् 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस यदि दक्षिण में अपनी उपस्थिति जगाने में सफल रहती है, तो यह उसकी बड़ी सफलता होगी। खडग़े अध्यक्ष के रूप में इसमें बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं।

यह भी तय है कि कांग्रेस उत्तर भारत को भाजपा के लिए खुले मैदान की तरह नहीं छोड़ेगी। भविष्य में उसका उत्तर भारत पर केंद्रित एक और पदयात्रा का कार्यक्रम है। यह उत्तर प्रदेश और गुजरात के अलावा अपनी सत्ता वाले राजस्थान और छत्तीसगढ़ के साथ साथ भाजपा के मध्य प्रदेश पर ज़्यादा केंद्रित होगा। इसमें कोई दो-राय नहीं कि भारत जोड़ो यात्रा से कांग्रेस देश की जनता का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने में सफल रही है।

भले उत्तर भारत के मीडिया या टीवी चैनल इस यात्रा को ज़्यादा तरजीह न दे रहे हों, दक्षिण के स्थानीय मीडिया में राहुल गाँधी को ख़ूब जगह मिली है। युवाओं और बच्चों के आलावा महिलाओं से उनके बतियाने की उनकी तस्वीरें भी ख़ूब वायरल हुई हैं। पार्टी का आरोप रहा है कि भाजपा जानबूझकर यात्रा की चर्चा को दबाने की कोशिश करती रही है, क्योंकि उसमें इस यात्रा की सफलता से काफ़ी बेचैनी है। हालाँकि भाजपा इससे इनकार करती रही है।

खडग़े कांग्रेस की भविष्य की राजनीति में फिट बैठते हैं। वह वरिष्ठ भी हैं और निर्विवाद भी। अध्यक्ष के रूप में उनके लिए काम करना इसलिए भी कठिन नहीं होगा। दूसरे अब सोनिया गाँधी, राहुल और प्रियंका रणनीति पर फोकस कर सकेंगे और खडग़े अध्यक्ष बनने पर पार्टी मामलों को देख सकेंगे।

अभी होगा फेरबदल
यह तय है कि कांग्रेस में अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया पूरी होते ही राज्य इकाइयों के साथ-साथ एआईसीसी और सीडब्ल्यूसी में बड़ा फेरबदल देखने को मिलेगा। चूँकि खडग़े चुनाव के ज़रिये जीतकर अध्यक्ष बनेंगे, पार्टी के भीतर जी-23 की माँग भी पूरी हो गयी है। ऐसे में खडग़े जो भी टीम बनाएँगे, उस पर गाँधी परिवार की पूरी छाप होगी। जानकारों के मुताबिक, आने वाले समय में विरोध के स्वर उठाने वालों को किनारे कर दिया जाएगा, क्योंकि ज़्यादातर नियुक्तियाँ राहुल गाँधी की पसन्द के नेताओं से होंगी। बता दें कि ख़ुद खडग़े राहुल गाँधी की टीम के सदस्य हैं। ऐसे में खडग़े भले अपने अनुभव से पार्टी को नयी दिशा दें, छाप उस पर राहुल गाँधी की ही होगी। हाल के समय में राज्यों में राहुल गाँधी ने अपनी पसन्द के कई नेताओं की नियुक्तियाँ करवायी थीं, यह सिलसिला अब बिना विरोध चलेगा।

‘तहलका’ की जानकारी के मुताबिक, चुनाव के बाद सोनिया गाँधी के सामने पार्टी की चेयरपर्सन या सलाहकार बनने का प्रस्ताव रखा जा सकता है। अभी यह भी तय नहीं है कि सोनिया गाँधी अगला चुनाव लड़ेंगी या नहीं। लेकिन उनका विपक्षी दलों के नेताओं से जैसा तालमेल है, उसे देखते हुए पार्टी को उनकी हमेशा ज़रूरत रहेगी।


नेहरू / गाँधी परिवार के अध्यक्ष

2 पंडित नेहरू : 5 साल
2 इंदिरा गाँधी : 7 साल
2 राजीव गाँधी : 6 साल
2 सोनिया गाँधी : 22 साल (19 पूर्ण, 3 साल अंतरिम)
2 राहुल गाँधी : 2 साल

कांग्रेस के अध्यक्ष
देश की सबसे पुरानी पार्टी और भारत के हर विकास और संकट को सत्ता में रहकर अन्य दलों के मुक़ाबले ज़्यादा क़रीबी से देखने वाली कांग्रेस में नया अध्यक्ष बनने की तैयारी है। यदि नज़र दौड़ाएँ, तो सन् 1947 में स्वतंत्रता के बाद अब तक कांग्रेस के 19 अध्यक्ष बने, जिनमें नेहरू-गाँधी परिवार से पाँच जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी अध्यक्ष रहे। हालाँकि कुल 75 वर्षों में से 41 साल नेहरू-गाँधी परिवार के सदस्य अध्यक्ष रहे और इनमें से भी सबसे लम्बा 22 साल का कार्यकाल सोनिया गाँधी का रहा। नेहरू-गाँधी परिवार से बाहर के नेताओं की बात करें, तो इनमें जे.बी. कृपलानी, बी. पट्टाभि सीतारमैया, पुरुषोत्तम दास टंडन, यूएन ढेबर, नीलम संजीव रेड्डी, के. कामराज, एस. निजलिंगप्पा, जगजीवन राम, शंकर दयाल शर्मा, डी.के. बरुआ, राजीव गाँधी, पी.वी. नरसिम्हा राव, सीताराम केसरी, सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी प्रमुख रहे हैं।

कई बार टूटी है कांग्रेस

आज़ादी के बाद से आज तक कांग्रेस कई बार टूटी है। जे.बी. कृपलानी से लेकर ग़ुलाम नबी आज़ाद तक कांग्रेस ने टूटने के गहरे ज़ख़्म कई बार झेले हैं। राजस्थान में पार्टी के संकट का भले बिना टूटे हल निकल आये, देश में बने अधिकतर क्षेत्रीय दल कांग्रेस से ही निकले हैं। वैसे तो कांग्रेस सबसे पहले आज़ादी से पूर्व तब टूटी थी, जब सन् 1923 में चौरी चौरा कांड के बाद गाँधी जी के असयोग आन्दोलन वापस लेने के विरोध में चितरंजन दास, नरसिंह चिंतामन केलकर, मोतीलाल नेहरू और बिट्ठलभाई पटेल कांग्रेस से अलग हो गये और कांग्रेस स्वराज्य पार्टी बना ली। इसके बाद सन् 1939 में सुभाष चंद्र बोस ने भीतरी खींचतान से परेशान होकर कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया और भारतीय फारवर्ड ब्लॉक का गठन किया। आज़ादी के बाद की बात करें, तो सन् 1951 में आचार्य जे.बी. कृपलानी जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल से सैद्धांतिक मतभेद के कारण कांग्रेस से बाहर चले गये। उन्होंने किसान मज़दूर पार्टी का गठन किया, जिसका बाद में समाजवादी पार्टी में विलय हो गया। कांग्रेस से एक और बड़े नेता की विदाई सन् 1956 में स्वतन्त्र भारत के दूसरे गवर्नर जनरल और प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी के रूप में हुई, जिन्होंने इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी गठित की। तीन साल बाद सन् 1959 में कांग्रेस में पहली बड़ी टूट हुई, जब उसकी राजस्थान, गुजरात, बिहार और ओडिशा की राज्य इकाइयों में बग़ावत के बाद के.एम. जॉर्ज के नेतृत्व में केरल कांग्रेस बनी। इसके बाद किसान नेता चरण सिंह सन् 1967 में कांग्रेस छोडक़र चले गये और भारतीय क्रान्ति दल का गठन किया।

इसी पार्टी को आज राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के नाम से जाना जाता है। नेहरू-गाँधी परिवार में मोती लाल के बाद कांग्रेस से अलग होकर पार्टी बनाने वाली इंदिरा गाँधी दूसरी नेता थीं। सन् 1969 में जब उन्हें कांग्रेस से बर्ख़ास्त करने का फ़रमान जारी हुआ, तो उन्होंने कांग्रेस (आर) का गठन कर लिया, जो बाद में कांग्रेस(आई) कहलायी। यही पार्टी आज तक अस्तित्व में है और इसे अब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) कहते हैं। हालाँकि इसके बाद भी कांग्रेस से कई नेता बाहर गये, जिन्होंने अलग दल बना लिये। इनमें पहला बड़ा नाम वी.पी. सिंह का था, जिन्होंने राजीव गाँधी से अलग होकर अरुण नेहरू के साथ जनमोर्चा का गठन किया। बाद में जनमोर्चा भी एकजुट नहीं रहा और उसके नेताओं ने जनता दल, जनता दल (यू), राजद और समाजवादी पार्टी जैसी क्षेत्रीय दल बनाये। एक और बड़ा विद्रोह कांग्रेस में सन् 1999 में हुआ, जब पहले शरद पवार, तारिक अनवर और पी.ए. संगमा ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) बनायी और उसी साल ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का गठन किया। इसके बाद आंध्र प्रदेश में कांग्रेस से अलग जाकर वाईएसआर कांग्रेस और जनता कांग्रेस, ओडिशा में बीजू जनता दल, जबकि जम्मू-कश्मीर में मुफ़्ती मोहम्मद सईद और उनकी बेटी महबूबा मुफ़्ती ने पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) बना ली। इनमें से कई दल राज्यों में सत्ता में भी आये या आज भी हैं। सोनिया गाँधी के कांग्रेस का ज़िम्मा सँभालने के बाद यह टूट हुई। हालाँकि उनके ही नेतृत्व में कांग्रेस का यूपीए गठबंधन केंद्र में सत्ता में आया। इसके बाद कुछ नेता कांग्रेस से बाहर गये। हालाँकि उनमें से ज़्यादातर भाजपा में शामिल हुए। इनमें असम में हिमंत बिस्वा सरमा, मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया, उत्तर प्रदेश में जितिन प्रसाद जैसे नाम शामिल हैं। सन् 2021 में कांग्रेस में पंजाब में बड़ी टूट हुई, जब कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस छोडक़र पंजाब लोक कांग्रेस बनायी और सितंबर, 2022 में इसका भाजपा में विलय कर दिया। इस दौरान सुनील जाखड़ भी भाजपा में शामिल हो गये थे। इसी साल कांग्रेस का मुस्लिम चेहरा माने जाने वाले ग़ुलाम नबी आज़ाद कांग्रेस से विदा हो गये और गृह राज्य जम्मू कश्मीर में डेमोक्रेटिक आज़ाद पार्टी का गठन कर लिया।

खडग़े का सफ़र

मज़दूर आन्दोलन से राजनीतिक सफ़र की शुरुआत करने वाले मल्लिकार्जुन खडग़े ज़मीन पर कितने मज़बूत हैं, यह इस बात से साफ़ हो जाता है कि सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहार में जब कांग्रेस 54 सीटों पर ही सिमट गयी थे और पार्टी के बड़े-बड़े दिग्गज चुनाव में पटखनी खा गये थे, खडग़े ने कर्नाटक के गुलबर्ग से चुनाव जीता था। जीत का फ़ायदा उन्हें यह मिला कि पार्टी ने लोकसभा में कांग्रेस दल का नेता बना दिया।

क़रीब 50 साल से ज़्यादा समय से खडग़े राजनीति में पैर जमाये हुए हैं। कांग्रेस में उनकी पहली बड़ी शुरुआत तब हुई, जब सन् 1969 में कर्नाटक के गुलबर्गा शहर का उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद सन् 1972 में वह विधायक बन गये और जनता में अपनी जबरदस्त पैठ के चलते सन् 2008 तक लगातार विधायक चुने जाते रहे। खडग़े अपने राजनीतिक करियर में नौ बार विधायक बने। सन् 2009 में पार्टी ने उन्हें गुलबर्गा लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया और उन्होंने जीत हासिल की। इसके बाद सन् 2014 में भी वह इसी सीट से सांसद बने।

इसके बाद सन् 2019 में महाराष्ट्र में जब धुर-विरोधी शिवसेना के साथ गठबंधन की बात आयी, तो पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने उन पर भरोसा जताते हुए उन्हें दूत बनाकर वहाँ भेजा। खडग़े ने पार्टी अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया और मिशन में सफल रहे।

एक मौक़े पर सन् 2013 में खडग़े कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे थे। हालाँकि उन्हें केंद्र की राजनीति में रहने का आग्रह किया गया, जिसके बाद सिद्धरमैया कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने। उस समय खडग़े मनमोहन सिंह सरकार में केबिनेट मंत्री थे। कर्नाटक के चुनाव के बाद उन्हें रेल मंत्री बना दिया गया। खडग़े पाँच साल (सन् 2009 से सन् 2014) तक मनमोहन सिंह सरकार में मंत्री रहे। खडग़े भले सन् 2019 के लोकसभा चुनाव में हार गये; लेकिन उन्हें पार्टी ने बिना देर किये राज्यसभा भेज दिया। ग़ुलाम नबी आज़ाद का कार्यकाल जब ख़त्म हुआ, तो खडग़े ही राज्यसभा में पार्टी के नेता बने।

खडग़े की छवि वैसे ईमानदार नेता की रही है। कोई बड़ा विवाद भी उनके नाम नहीं। हालाँकि सन् 2000 में खडग़े तब संकट में फँसते दिखे थे, जब चंदन तस्कर वीरप्पन ने कन्नड़ सुपरस्टार राजकुमार का अपहरण किया था। खडग़े के प्रदेश के गृह मंत्री रहते यह हुआ। लिहाज़ा विपक्ष ने उन पर कई सवाल उठाये थे। अब 2022 में नेशनल हेराल्ड मामले में प्रवर्तन निदेशालय की टीम ने उनसे पूछताछ की थी। इसके अलावा कभी उन पर भ्रष्टाचार या कोई गम्भीर आरोप कभी नहीं लगा है।

खडग़े की एक और ख़ासियत यह है कि दक्षिण भारत का होने के बावजूद उन्हें बोलना अच्छा लगता है। वह सदन में हमेशा हिन्दी में अपनी बात रखते रहे हैं। उन्हें राहुल गाँधी का नजदीकी माना जाता है और लोकसभा में राहुल गाँधी ने रफाल से लेकर नोटबंदी, महँगाई और बेरोज़गारी पर जब भी बोला, खडग़े ने इन मुद्दों को आगे तक बढ़ाने का काम बख़ूबी किया। खडग़े के परिवार में पत्न राधाबाई और तीन बेटियाँ और दो बेटे हैं। एक बेटे का कर्नाटक के बेंगलूरु में स्पर्श नाम से अस्पताल है, जबकि दूसरा बेटा विधायक है। सन् 2019 चुनाव के दौरान घोषणा में खडग़े ने अपनी सम्पत्ति 10 करोड़ के क़रीब ज़ाहिर की थी।

आज़ाद ने बना ली नयी पार्टी
कांग्रेस से बाहर होने के बाद आख़िर वरिष्ठ नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री ग़ुलाम नबी आज़ाद ने 26 सितंबर को अपनी नयी पार्टी के नाम की घोषणा कर दी। उन्होंने अपनी नयी पार्टी का नाम डेमोक्रेटिक आज़ाद पार्टी रखा है। पार्टी के नाम की घोषणा के बाद आज़ाद ने कहा कि वह नवरात्रि के शुभ अवसर पर पार्टी की शुरुआत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी का नाम डेमोक्रेटिक आज़ाद पार्टी है। उन्होंने कहा कि पार्टी की अपनी सोच होगी, किसी से प्रभावित नहीं होगी। आज़ाद का मतलब होता है स्वतंत्र। नीचे से चुनाव होंगे और एक हाथ में ताक़त नहीं रहेगी और जो हमारा संविधान होगा उसमें प्रावधान होगा पूर्ण लोकतंत्र के आधार पर। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में किसी भी पार्टी का नाम रखना मुश्किल होता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आज़ाद भविष्य में क्या फ़ैसला करते हैं। उनके भाजपा के साथ जाने की अटकलें लगती रही हैं; लेकिन अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। वह भाजपा के विरोधी रहे हैं। लेकिन यह तय है कि आज़ाद ने अपनी राजनीति गृह राज्य तक सीमित रखने का फ़ैसला किया है। उनके साथ कुछ लोग गये हैं; लेकिन ज़िला इकाइयाँ अभी भी मूल कांग्रेस के साथ हैं। लिहाज़ा उनका रास्ता उनका सरल नहीं दिखता।

अनुच्छेद-370 ख़त्म होने के बाद जम्मू-कश्मीर में काफ़ी बदल गया है। राजनीति का रंगरूप भी। ख़ुद आज़ाद का कहना है कि अनुच्छेद-370 ख़त्म होने के बाद जब वह पहली बार सूबे में आये, तो यहाँ ट्रांसपोर्ट ख़त्म हो गया था। दुकानें ख़त्म हो गयी थीं, और 70 फ़ीसदी इंडस्ट्री बन्द हो गयी थीं। उनके मुताबिक, उन्होंने पता किया कि ऐसा क्यों हुआ? तो पता लगा कि उनमें अधिकतर सामान श्रीनगर जाता था। फ़िलहाल आज़ाद जम्मू-कश्मीर पर फोकस कर रहे हैं और यदि भाजपा के साथ उनके जाने की बात सामने आती है, तो कश्मीर में उन्हें लेने-के-देने पड़ जाएँगे।


थरूर का राजनीतिक सफ़र

कांग्रेस के भीतर अभी तक जी-23 के धड़े के साथ रहने वाले शशि थरूर पूर्व राजनयिक हैं। सन् 2009 के बाद से वह केरल के तिरुवनंतपुरम से लोक सभा सदस्य हैं। सन् 2009 से सन् 2010 तक वह मनमोहन सिंह सरकार में विदेश राज्य मंत्री और सन् 2012 से सन् 2014 तक मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री रहे। सन् 2007 तक वह संयुक्त राष्ट्र के करियर अधिकारी थे। थरूर सन् 2006 में यूएन महासचिव पद के लिए चुनाव लड़ चुके हैं। हालाँकि बान की मून की तुलना में वह दूसरे स्थान पर रहे।

एक उपन्यासकार के रूप में भी उनकी अच्छी पहचान है। उन्होंने सन् 1981 से कथा और ग़ैर-कथाओं की 17 बेस्टसेलिंग पुस्तकें लिखी हैं। यह पुस्तकें भारत के इतिहास, संस्कृति, फ़िल्म, राजनीति, समाज, विदेश नीति और अधिक सम्बन्धित विषयों पर हैं। मार्च, 2009 में थरूर ने केरल के तिरुवनंतपुरम में कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में पहली बार चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार में राज्य मंत्री बनाया गया। इसके बाद मई, 2009 में उन्होंने विदेश मामलों के राज्य मंत्री के रूप में शपथ ली। मई, 2014 में थरूर ने तिरुवनंतपुरम से फिर से चुनाव जीता और मोदी की लहर में भाजपा के उम्मीदवार राजगोपाल को क़रीब 15,700 वोटों के अन्तर से हराया। अब वह कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में उम्मीदवार हैं।

अपंग क़ानून

चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के छात्रावास की लड़कियों के निजी वीडियो की रिकॉर्डिंग और उसके प्रसार और वायरल होने की ख़बर ने जहाँ भय और क्रोध की आँधी पैदा की, वहीं इसकी ज़रूरत भी अब महसूस होने लगी है कि निजता के अधिकार के लिए एक सुरक्षित क़ानून बने। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में इसकी माँग ज़ोर पकडऩे लगी है। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ में एसोसिएट प्रोफेसर और डीन संगीता लाहा की ‘तहलका’ के इस अंक की कवर स्टोरी ‘निजता में ताक-झाँक’ बताती हैं कि हाल में छात्राओं के निजी वीडियो के कथित रूप से लीक पर क्यों विवाद पैदा हुआ है। मोहाली स्थित चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में छात्राओं की निजता के सार्वजानिक होने से इस मुद्दे की संवेदनशीलता और बढ़ गयी है। इस घटना के बाद छात्रों के ग़ुस्से से उपजे प्रदर्शन के बाद जिस तरह यह घटना राष्ट्रीय सुर्ख़ियों में आयी और चिन्तित माता-पिता अपनी बेटियों को घर ले जाने के लिए अगले दिन यूनिवर्सिटी परिसर पहुँच गये, उससे गम्भीरता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

छात्रावास में साथी छात्राओं के आपत्तिजनक वीडियो के कथित रूप से साझा होने ने इस निजी यूनिवर्सिटी में भय, अफ़वाहों और अशान्ति का माहौल बना दिया। घटना सामने आने के बाद कुछ गिरफ़्तारियाँ भी हुई हैं। हालाँकि अधिकारियों ने दावा किया कि किसी तरह की गोपनीयता भंग नहीं हुई है। लेकिन तब तक चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के प्रो-चांसलर डॉ. आर.एस. बावा ने एक बयान में कहा- ‘सोशल मीडिया पर ऐसा कहा गया कि 60 आपत्तिजनक एमएमएस साझा किये गये, जिसके बाद कुछ लड़कियों ने आत्महत्या का प्रयास किया। यह पूरी तरह से झूठ और निराधार है। यूनिवर्सिटी की प्रारम्भिक जाँच के दौरान किसी भी छात्र से कोई वीडियो नहीं मिला, सिवाय एक लडक़ी के शूट किये गये निजी वीडियो के। इसे उसने अपने प्रेमी के साथ साझा किया था।’

वैसे घटना की ख़बर जंगल में आग की तरह फैल गयी थी। छात्रों का सवाल है कि अगर कोई वीडियो नहीं था, तो यूनिवर्सिटी की पोस्ट ग्रेजुएट प्रथम वर्ष की एक छात्रा, जो विवाद के केंद्र में थी; को सेना के एक कर्मचारी (कथित प्रेमी) और हिमाचल प्रदेश के शिमला ज़िले के रोहड़ू गाँव के एक मूल निवासी के साथ गिरफ़्तार क्यों किया गया?

निजता का उल्लंघन वाली इस घटना ने यूनिवर्सिटी के मेनेजमेंट, क़ानून और समाज के सामने कई सवाल खड़े कर दिये हैं। यह जगाने वाली घटना है, क्योंकि देश में हर दिन और हर घंटे इसी तरह की घटनाएँ होती रहती हैं। क़ानूनी प्रावधानों के बारे में जागरूकता की कमी, सामाजिक कलंक के डर और क़ानून लागू करने वाली एजेंसियों के भरोसे की कमी के कारण ऐसी अधिकांश घटनाओं की रिपोर्ट नहीं की जाती है। इस मामले में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने इस प्रकरण की जाँच शुरू करवायी है, जिसमें कहा गया है कि बेटियाँ पंजाब की गरिमा और गौरव हैं। मजिस्ट्रियल जाँच के आदेश के अलावा एक विशेष जाँच दल का गठन किया गया है। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने भी इस मामले में स$ख्ती से निपटने के लिए पंजाब के डीजीपी को पत्र लिखा है। इसके बाद घटना की प्राथमिकी धारा-66(ई) आईटी अधिनियम (गोपनीयता का उल्लंघन) के तहत दर्ज की गयी, जिसमें आरोपियों पर दृश्यरतिकता यानी छिप-छिपकर देखने (जो आईपीसी की धारा-354 (सी) के तहत एक अपराध है) का आरोप लगाया गया है।

इस घटना ने एक बार फिर निजता के अधिकार को सुरक्षित रखने का साफ़ सन्देश दिया है? वास्तव में छात्राओं की निजता का उल्लंघन बड़ी चिन्ता का विषय है, जो सार्वजनिक रूप से उभरे रोष के बीच इस बात पर ज़ोर देता है कि निजता की रक्षा की जानी चाहिए। इन मामलों से यह भी ज़ाहिर हुआ है कि उपलब्ध क़ानून साइबर अपराधों से निबटने में नाकाम रहा है।

जिनपिंग कमज़ोर हो रहे या मज़बूत!

अक्टूबर के अधिवेशन में चीनी राष्ट्रपति को और ताक़त देने की तैयारी

चीन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के तख़्तापलट और नज़रबन्दी की ख़बरों के बीच बड़ी ख़बर यह है कि सत्तारूढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) ने अक्टूबर में होने वाली पार्टी की 20वीं राष्ट्रीय कांग्रेस के आयोजन की तैयारियाँ तेज़ कर दी हैं। यह माना जाता है कि जिनपिंग अगले पाँच साल के लिए एक और पारी खेलने की पूरी तैयारी कर चुके हैं। यह पहली बार नहीं है, जब जिनपिंग के ख़िलाफ़ विद्रोह की ख़बरें (अफ़वाहें) सामने आयी हैं। सच यह है कि अक्टूबर के अधिवेशन में चीनी राष्ट्रपति को और ताक़त देने की तैयारी कर ली गयी है, जो उनसे पहले सिर्फ़ माओ त्से तुंग को हासिल थी।

वैसे इस तरह की तख़्तापलट की ख़बरें पाँच साल पहले भी उड़ी थीं, जब सीसीपी में चुनाव था। शी जिनपिंग लगातार तीसरी बार पार्टी के महासचिव और चीनी सैन्य आयोग के चेयरमैन अर्थात् राष्ट्रपति बनने की ज़मीन तैयार करते रहे हैं। हालाँकि हाल में सोशल मीडिया पर उनके तख़्तापलट की ख़बरें ख़ूब चली हैं। अब जबकि 16 अक्टूबर शुरू होने वाली सीसीपी की राष्ट्रीय कांग्रेस को महीने से भी कम समय रह गया है, जिनपिंग को लेकर अफ़वाहों का दौर जारी है। सवाल यह है कि क्या सचमुच शी जिनपिंग की गद्दी ख़तरे में है? अभी तक जिनपिंग मज़बूती से सत्ता में बने हुए हैं। उनको चुनौती दिख रही है; लेकिन उनकी गद्दी कोई छीन लेगा, इसकी सम्भावना तो नहीं ही दिख रही है। ऐसे में उनको लेकर आ रही ख़बरें कोरी अफ़वाहें भी हो सकती हैं।

वैसे देखा जाए, तो जिनपिंग नवंबर, 2021 में ही और मज़बूत हो गये थे, जब चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति ने सुनहरे युग के लिए चीनी विशेषताओं वाले समाजवाद पर शी जिनपिंग के विचार को अंगीकार कर लिया था। तब उसकी तरफ़ से यह दावा किया गया था- ‘यह वर्तमान काल में चीनी संस्कृति और लोकाचार का सबसे बेहतर प्रतीक है और चीनी सन्दर्भ में माक्र्सवाद को अपनाने में एक नयी सफलता का प्रतिनिधित्व करता है।’

तैयारियाँ बताती हैं कि सीसीपी के हफ़्ता भर चलने वाली राष्ट्रीय कांग्रेस में जिनपिंग की महानता को महिमामंडित किया जाने वाला है, और उन्हें अगले पाँच साल के लिए फिर चेयरमैन चुन लिया जाएगा। याद रहे, सन् 2018 में जिनपिंग के अनिश्चित-काल तक सत्ता में बने रहने का रास्ता तब खुल गया था, जब चीन के राज्य संविधान में संशोधन किया गया था। जानकारों के मुताबिक, तमाम अफ़वाहों के बावजूद जिनपिंग निश्चित तौर पर फिर से सीसीपी के महासचिव और केंद्रीय सैन्य आयोग (सीएमसी) के चेयरमैन बनने जा रहे हैं। अफ़वाहें यह थीं कि समरकंद में आयोजित एससीओ की बैठक के बाद शी जिनपिंग को नज़रबन्द कर लिया गया और उन्हें सत्ता से हटा दिया गया। यहाँ तक कि भारत के बड़े राजनीतिक नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने भी इसे लेकर एक ट्वीट साझा किया। सोशल मीडिया में बीजिंग के पास हुआनलेई काउंटी में सडक़ों पर सेना की असामान्य मूवमेंट का दावा किया गया। लेकिन इसकी कभी भी पुष्टि नहीं हुई। वैसे भी चीन से इस तरह की सूचना बाहर आना लगभग असम्भव है। लिहाज़ा अफ़वाहें पाँव पसारती गयीं।

वैसे यह कहा जाता है कि चीन के पूर्व राष्ट्रपति हूं जिंताओ और पूर्व चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ जिनपिंग के विरोधी रहे हैं। हाल में चीन के एक बड़े सुरक्षा अधिकारी सिन लिजुन को राजनीतिक कारणों से जेल में डाल दिया गया था। सिन पर आरोप था कि वह सरकार के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं। इससे पहले एक मंत्री को भी जेल में डाल दिया गया था। समर्थक इसे शी जिनपिंग का विरोधियों को कड़ा सन्देश बताते हैं, जबकि विरोधी आरोप लगाते रहे हैं कि जिनपिंग अपने विरोधियों को ठिकाने लगा रहे हैं।

अफ़वाहें तब शुरू हुईं, जब चीनी मानवाधिकार कार्यकर्ता जेनिफर जेंग ने अपने ट्विटर हैंडल पर एक वीडियो पोस्ट कर दावा किया कि पीएलए (चीनी सेना) बीजिंग की ओर बढ़ रही है। जेंग के दावे में कहा गया कि पीएलए के सैन्य वाहन 22 सितंबर को बीजिंग की ओर जा रहे हैं। बीजिंग के पास हुआनलाई काउंटी से शुरू होकर हेबेई प्रान्त के झांगज़ियिक शहर में समाप्त होता है। यह 80 किलोमीटर लम्बा है। अफ़वाह यह भी थी कि सीसीपी के सीनियर्स की तरफ़ से उन्हें पीएलए के प्रमुख के पद से हटाने के बाद शी जिंगपिंग को गिरफ़्तार कर लिया गया। हालाँकि जेंग के दावे वाले वीडियो में वहाँ की खिडक़ी ही दिख रही है और सडक़ पर अन्य कोई सैन्य वाहन नहीं दिख रहा।
चीनी लेखक गॉर्डन चांग ने जेंग के वीडियो को री-ट्वीट करते हुए दावा किया कि बीजिंग में जाने वाले सैन्य वाहनों का यह वीडियो देश में 59 फीसदी उड़ानों की ग्राउंडिंग और वरिष्ठ अधिकारियों की जेलों के तुरन्त बाद का है। बहुत धुआँ है, जिसका मतलब है कि सीएसपी के भीतर कुछ भडक़ा है। हालाँकि यह अफ़वाहें तब ग़लत साबित हो गयीं, जब हाल ही में जिनपिंग चीन के बीजिंग में सार्वजनिक तौर पर नजर आये।

ख़बरें हैं कि अक्टूबर के अधिवेशन में सीसीपी के संविधान में संशोधन किया जाने वाला है। सम्भावना है कि इसके ज़रिये जिनपिंग को और ताक़तवर बना दिया जाएगा। सीपीसी की नीति निर्धारक समिति, जो 25 सदस्यीय पोलित ब्यूरो है; की बैठक सितंबर में हुई थी, जिसमें सदस्यों ने इसे बहुत महत्त्वपूर्ण अधिवेशन बताया। इस बैठक में जो सबसे ख़ास बात थी, वह यह थी कि इसमें जिनपिंग के नेतृत्व को सराहा गया और कहा गया कि वह चीन का नेतृत्व करते रहेंगे।

बैठक में कहा गया कि जिनपिंग के मज़बूत नेतृत्व में अभी तक हासिल उपलब्धियों को जारी रखते हुए पूरी पार्टी और तमाम चीनी जनता को एकजुट रखने के प्रयास किये जाने चाहिए। नहीं भूलना चाहिए कि चीन के संस्थापक माओ त्से तुंग के बाद जिनपिंग ही ऐसे नेता हैं, जिन्हें आधिकारिक रूप से मुख्य नेता कहा गया है। जिनपिंग से पहले तमाम नेता दो से पाँच साल के कार्यकाल के बाद ही सेवानिवृत्त हुए हैं। जिनपिंग तीसरी बार पार्टी के सर्वोच्च नेता बनते हैं, तो वह पहले ऐसे नेता होंगे।

चीन के जानकार कहते हैं कि सीपीसी के संविधान में बदलाव से पार्टी महासचिव और राष्ट्रपति और सेना प्रमुख जिनपिंग को पार्टी अध्यक्ष की उपाधि प्रदान करने के साथ ही उनकी शक्तियों में विस्तार किया जाएगा। उनसे पहले माओ ही पार्टी अध्यक्ष रहे हैं। अधिवेशन में सीसीपी केंद्रीय समिति में नये प्रधानमंत्री और पदाधिकारियों की घोषणा भी होगी। प्रधानमंत्री पद पर दूसरे स्तर के नेता ली क्वींग के अलावा किसी को चुना जाएगा, क्योंकि ली सेवानिवृत्ति की घोषणा कर चुके हैं।

किसे बचाने निकले भागवत?

कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा से डरी भाजपा को मज़बूत करने निकले भागवत या अपनी शाख़ बचाने!

कहा जाता है कि गिरने से सब डरते हैं। राजनीतिक पतन के संकेतों ने आज यह सिद्ध कर दिया है कि कोई भी कितना ताक़तवर हो जाए; लेकिन लोकतंत्र में उसे डरना भी होगा और झुकना भी होगा। भाजपा का पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत कुछ इसी दशा में मस्जिद पहुँचे और वहाँ के इमाम डॉ. उमर अहमद इलियासी से मिले। ये ऑल इंडिया इमाम ऑर्गेनाइजेशन का भी दफ़्तर है। इस मौक़े पर डॉ. इलियासी ने कहा कि हमारा डीएनए एक ही है, सिर्फ़ इबादत करने का तरीक़ा अलग है। मोहन भागवत राष्ट्रपिता और राष्ट्रऋषि हैं। वह पारिवारिक कार्यक्रम में उनके बुलावे पर आये थे। उनके साथ सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल, वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश और रामलाल भी मौज़ूद थे।

बहरहाल सवाल यह है कि मोहन भागवत को पहली बार मस्जिद जाने की और उसके बाद मदरसा जाने की क्या आवश्यकता पड़ गयी? वह किसको बचाना चाहते हैं? नरेंद्र मोदी की सत्ता को या स्वयं की शाख़ को? क्योंकि देखा जा रहा है कि मोदी जैसे-जैसे ताक़तवर हुए हैं, अपनी चला रहे हैं। साथ ही मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी के बीच कुछ अनबन भी लगती है। क्योंकि हाल ही में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आरएसएस की अखिल भारतीय समन्वय बैठक के दौरान मोहन भागवत ने प्रधानमंत्री के भोजन का निमंत्रण टाल दिया, वहीं इमाम के घर भोजन के निमंत्रण पर पहुँच गये। या फिर कहीं भागवत पसमांदा मुसलमानों के उस वोट बैंक को भाजपा की झोली में डलवाने की कोशिश में तो नहीं लग गये हैं, जिसे प्रधानमंत्री मोदी भी अपने वोट बैंक में शामिल करने के लिए लगातार कोशिश में लगे रहे हैं।

कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मोहन भागवत कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा से डरी हुई भाजपा को एक बार फिर मज़बूत करने की कोशिश में कर रहे हैं। देखने वाली बात यह है कि साल 2014 और साल 2019 में मोदी ने भाजपा को केंद्र में जिस स्तर पर पहुँचाकर बड़ी जीत हासिल की थी, क्या उनकी वह सियासी चमक अब कहीं खो चुकी है? और इसलिए पहली बार मोहन भागवत को उनके बचाव में उतरकर न चाहते हुए भी मस्जिद में जाना पड़ा? इसमें कोई दो-राय नहीं कि सन् 2014 के बाद से अब तक के जितने भी चुनाव देश में भाजपा ने लड़े हैं, वो मोदी के दम पर लड़े हैं। हालाँकि पश्चिम बंगाल में ममता द्वारा और बिहार में नीतीश कुमार द्वारा उन्हें मात देने के बाद मोदी की उस जादुई चमक की हवा तो निकली ही है; लेकिन अब गुजरात में केजरीवाल के मुफ़्त बिजली पानी के डंके और पुराने भाजपाई शंकर सिंह वाघेला द्वारा अपना सियासी दल बना लेने ने इसे और फीका कर दिया है। इन गतिविधियों भाजपा और उसकी प्रमुख जोड़ी मोदी-शाह की परेशानी पर पसीना ला दिया है, जिससे जोड़ी में एक डर नहीं, तो कम-से-कम हार की शंका तो पैदा ज़रूर हो चुकी है। ऐसे में भागवत का 22 सितंबर को मस्जिद जाकर इमामों के इमाम से मिलना और उसके बाद मदरसा जाना। इससे पहले उनसे संघ के ही एक कार्यालय में पाँच मुस्लिम बुद्धिजीवी मिलना। यह सब जताता है कि भाजपा और संघ में कहीं-न-कहीं 2024 के चुनावी-रण को लेकर बेचैनी है।

हालाँकि इन मुलाक़ातों को लेकर कहा यह जा रहा है कि पाँचों बुद्धिजीवियों ने काफ़ी दिनों पहले पत्र लिखकर मोहन भागवत से मिलने की अनुमति माँगी थी। वहीं सदर-ए-इमाम कह रहे हैं कि मोहन भागवत उनके बुलावे पर उनके घर के एक कार्यक्रम में हाज़िर हुए थे। ज़ाहिर है कि इमाम के घर जाने का मतलब मस्जिद में भी जाना था; क्योंकि इमाम रहते ही वहीं हैं। लेकिन सवाल यह है कि भागवत मस्जिद जाने के बाद मदरसा क्यों गये? माना जा रहा है कि इसके कहीं-न-कहीं राजनीतिक मायने ज़रूर निकलते हैं।

यहाँ सवाल यह भी उठता है कि क्या मोहन भागवत इस बार के 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की कमान ख़ुद सँभालेंगे? क्या यह मोदी की विदाई की तैयारी है? यह सवाल भी इसलिए, क्योंकि संघ के इतिहास में कभी कोई प्रमुख इस तरह अपनी पुत्र पार्टी के लिए मुस्लिम समुदाय से नहीं मिला है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जो हिन्दू भाजपा और मोदी से नाराज़ हैं, उनका मत (वोट) इस बार भाजपा की झोली से छिटक जाने का संघ और भाजपा दोनों को ही डर है, और इसी वोट की पूर्ति के लिए भागवत मुसलमानों को मनाने में जुट गये हैं?

लेकिन इसके विपरीत चरमपंथी इस्लामिक संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के तमिलनाडु और केरल समेत तकरीबन 15 ठिकानों पर राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने छापेमारी शुरू कर दी थी। पीआईएफ के कई नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया। देखने वाली बात है कि एक तरफ़ नरेंद्र मोदी की केंद्र में सरकार आने के बाद मुसलमानों में खलबली मची रही है और दूसरी ओर योगी के बुलडोजर से मुस्लिम समुदाय में ख़ौफ़ छाया हुआ है। एक तरफ़ योगी मदरसों व मस्जिदों में अवैध निर्माण ढूँढ रहे हैं। दूसरी तरफ़ पीएफआई के ठिकानों पर छापेमारी चल रही होती है; और तीसरी तरफ़ मोहन भागवत नाराज़ मुस्लिम समुदाय को मनाने के लिए इमाम प्रमुख डॉ. इलियासी से मिलते हैं, मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मिलते हैं और मदरसे में जाते हैं। राजनीतिक जानकारों का एक तीसरा पक्ष यह भी कह रहा है कि हिन्दुस्तान के मुसलमानों पर लगातार बढ़ रहे दबाव, कुछ जगह पर हुए दंगे और इसी वजह से एशिया के मुस्लिम देशों द्वारा हिन्दुस्तानी मुसलमानों को न सताने के लिए केंद्र की मोदी सरकार पर दबाव डाला जा रहा है। इसलिए मोहन भागवत को मस्जिद और मदरसों का दौरा करना पड़ रहा है। वरिष्ठ पत्रकार और ज़दीद मरकज़ के संस्थापक संपादक हिसाम सिद्दीक़ी इसे मुसलमानों की आँखों में धूल झोंकने जैसा बता रहे हैं। उनका कहना है कि पाँच मुस्लिम बुद्धिजीवी, जो मोहन भागवत से मिले, उनका दुरुपयोग किया जा रहा है। बहरहाल यह तो सभी जानते और मानते हैं कि आरएसएस यानी संघ प्रमुख की इच्छा के बग़ैर भाजपा में एक पत्ता भी नहीं हिलता। ऐसे में भाजपा की डूबती कश्ती को पार लगाना आरएसएस का उत्तरदायित्व ही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि इमाम द्वारा भागवत को राष्ट्रऋषि और राष्ट्रपिता कहना क्या मुसलमानों को सीधा सन्देश है कि वे मोहन भागवत के ख़िलाफ़ नहीं जाएँ, यानी मुसलमानों को भाजपा के पक्ष में वोट देना चाहिए।

बहरहाल यह तस्वीर साफ़ हो चुकी है कि देश के लगातार बदल रहे माहौल के बीच संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मुसलमानों से बातचीत करके माहौल को भाजपा के पक्ष में करने की ज़िम्मेदारी स्वयं सँभाल ली है। एक मुस्लिम नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि अगर संघ सीधे तौर पर कभी भी मुसलमानों के विरोध में नहीं आया। लेकिन उसके समर्थक दल बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद् और अन्य कई दल सीधे-सीधे मुस्लिमों के विरोध में रहे हैं, जिनको संघ ने कभी रोका भी नहीं। इसी प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह भी मुसलमानों के विरोध में खुलकर कभी सामने नहीं आये। लेकिन गोरक्षा, लव जिहाद, हिजाब, टोपी और दाढ़ी आदि पर कई जगह विरोध हुआ, अत्याचार हुआ, जिस पर वे कभी नहीं बोले। एक तरफ़ संघ और भाजपा बयान देते हैं कि मुसलमानों के बग़ैर देश में लोकतंत्र की कल्पना नहीं की जा सकती, और दूसरी तरफ़ मुसलमानों के प्रति नफ़रत का ज़हर फैलाया जा रहा है। यहाँ एक ख़ास पहलू यह भी है कि एक तरफ़ तो भाजपा, जिसका मतलब अब केवल मोदी हो चुका है; केंद्र की मोदी सरकार ने अपनी पार्टी के मुस्लिम नेताओं को साल 2019 के बाद साइड लाइन करना शुरू कर दिया है और दूसरी तरफ़ मोहन भागवत मुसलमानों के साथ अचानक जाकर खड़े हुए, तो इस पर हैरानी और आशंका दोनों ही होना स्वाभाविक है।

बहरहाल मुस्लिम समुदाय मोहन भागवत से कितना प्रभावित होता है और भविष्य में उसकी चुनाव को लेकर क्या रणनीतियाँ तय होती हैं? इसके लिए इंतज़ार ही करना पड़ेगा। फ़िलहाल सवाल यह उठ रहा है कि क्या मोहन भागवत के मुसलमानों के प्रति अचानक उमड़े इस प्रेम के चलते मुस्लिम समुदाय को भाजपा की मोदी सरकार और हिन्दू संगठनों की तरफ़ से राहत मिलेगी? क्या इससे मुसलमानों का कुछ भला होगा? क्या मुसलमान भाजपा के प्रति दोस्ताना रवैया अपनाने को तैयार होंगे? क्योंकि जब चुनाव होते हैं या क्रिकेट मैच होता है, या फिर कोई आतंकी हमला देश में होता है, तो $गद्दारी का ठप्पा मुसलमानों पर ही लगाया जाता है।

हालाँकि हिन्दुओं में एक तबक़ा ऐसा भी है, जो मुसलमानों से भेदभाव नहीं करता। वहीं मुसलमानों का भी एक तबक़ा इंसानियत को तवज्जो देता है। यहाँ यह भी बताना आवश्यक है कि आज़ादी की लड़ाई हिन्दू और मुस्लिम कन्धे-से-कन्धा मिलाकर ही लड़े थे, तभी देश अंग्रेजों के चंगुल से आज़ाद हुआ था। आज अगर मोहन भागवत मुसलमानों से बिना किसी राजनीतिक हित के मिले होते, तो इसका देश में कुछ और ही सन्देश जाता। ख़ैर, इसे अपने मुँह से राजनीतिक हित कहना भी उचित नहीं है; क्योंकि राजनीति में बहुत-सी बातें स्पष्ट होते हुए भी उन पर पर्दा डालना ही पड़ता है। देखते हैं कि संघ के मुखिया मोहन भागवत की यह क़वायद 2024 में भाजपा को फिर से सत्तासीन करने में कितनी सहायक सिद्ध होती है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

पीएफआई पर नकेल

पाँच साल के प्रतिबन्ध से टूटी आतंक को पालने वाले संगठन की कमर

सन् 2006 में दक्षिण भारत के तीन मुस्लिम संगठनों का विलय करके बने संगठन पॉपुलर फ्रंट आफ इण्डिया (पीएफआई) पर आख़िर नकेल डाल दी गयी। टेरर (आतंकी) फंडिंग का आरोप झेल रहे पीएफआई पर हाल के हफ़्तों में ताबड़तोड़ छापे पड़े हैं और उसके कई पदाधिकारियों को गिरफ़्तार किया गया है। पीएफआई तो तभी आशंका के घेरे में आ गया था, जब सन् 2012 में केरल में ओमन चांडी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने उच्च न्यायालय को सूचित किया था कि पीएफआई प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) का दूसरा रूप है, जिस पर सन् 2006 में यूपीए सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था। पीएफआई सन् 2012 में ही केंद्र सरकार और एजेंसियों के रडार पर आ गया था। अब मोदी सरकार ने पीएफआई पर शिकंजा कसते हुए संगठन को ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर पाँच साल का प्रतिबन्ध लगा दिया है।

केरल सरकार के न्यायालय को दिये हलफ़नामे में कहा गया था कि पीएफआई कार्यकर्ताओं पर हत्या के 27 मामले दर्ज हैं। बता दें जिन तीन मुस्लिम संगठनों का विलय करके पीएफआई अस्तित्व में आया था, वे तीनों संगठन सन् 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बने थे। इनमें केरल का नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट, कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी और तमिलनाडु का मनिथा नीति पसराई शामिल थे। ‘तहलका’ की जानकारी बताती है कि देश की सबसे बड़ी जाँच एजेंसी एनआईए छापों में मिले साक्ष्यों के आधार पर राज्यों में पुलिस के ज़रिये अलग-अलग एफआईआर दर्ज करवा रही है।

दरअसल काफ़ी पहले से पीएफआई के ख़िलाफ़ एक दर्ज़न से ज़्यादा मामलों की जाँच कर रही है। वह 350 से ज़्यादा आरोपियों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दाख़िल कर चुकी है। पीएफआई के ख़िलाफ़ मनी लॉन्ड्रिंग के मामले भी प्रवर्तन निदेशालय की तरफ़ से दायर किये हैं। इनकी जाँच अभी जारी है।

सरकार ने पीएफआई के ख़िलाफ़ जो कार्रवाई की है, वह यूएपीए अर्थात् ग़ैर-क़ानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम के तहत की है। इस क़ानून का मुख्य उद्देश्य आतंकी गतिविधियों को रोकना होता है। इसके तहत पुलिस ऐसे आतंकियों, अपराधियों या संदिग्ध लोगों को चिह्नित करती है, जो आतंकी गतिविधियों में शामिल होते हैं; आतंकी गतिविधि के लिए लोगों को तैयार करते हैं; या फिर ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं। ऐसे मामलों में एनआईए यानी राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) के पास काफ़ी शक्तियाँ हैं। इसी क़ानून के तहत पीएफआई और उसके सहयोगी संगठनों के ख़िलाफ़ जाँच एजेंसियों और सरकार ने की है।

सरकार ने प्रतिबन्ध वाला क़दम टेरर फंडिंग मामलों में पीएफआई नेताओं पर दो दौर के बड़े देशव्यापी छापों के बाद उठाया। सरकार का कहना था कि पीएफआई कई आपराधिक आतंकी मामलों में शामिल रहा है। अभी तक की जाँच में सामने आया है कि पीएफआई के लोग बार-बार हिंसक और विध्वंसक गतिविधियों में शामिल रहे हैं। साथ ही पीएफआई के कई संस्थापक सदस्य सिमी के नेता रहे हैं और उसका सम्बन्ध जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश से भी रहा है। भारत में दोनों ही संगठन प्रतिबन्धित हैं।

पीएफआई के ख़िलाफ़ देश भर में पिछले कई दिन से छापेमारी चल रही थी, जिसके बाद ये बड़ी कार्रवाई की गयी। पीएफआई पर छापेमारी के दौरान कई अहम सुबूत एजेंसियों के हाथ लगे हैं। इनमें टेरर लिंक के आरोप भी शामिल हैं। यह रिपोर्ट लिखे जाने तक पीएफआई से जुड़े 270 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। यह छापे देश के 23 राज्यों में मारे गये, जिनमें केरल, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, दिल्ली, महाराष्ट्र, असम और मध्य प्रदेश भी शामिल हैं। सबसे ज़्यादा 75 लोगों को कर्नाटक से हिरासत में लिया गया। एजेंसी की तरफ़ से कहा गया है कि पीएफआई धनशोधन और विदेश से वैचारिक समर्थन प्राप्त करने के अलावा देश के अधिकारों और देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा ख़तरा बन रहा था।

याद करें, तो पीएफआई का गठन 2006 में हुआ था। जाँच एजेंसियों की छापेमारी के बाद मिले दस्तावेज़ बताते हैं कि पीएफआई देश के 23 राज्यों में सक्रिय है। देखें तो, पीएफआई का विस्तार ही सिमी पर प्रतिबन्ध लगने के बाद हुआ। कर्नाटक और केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में संगठन की ख़ासी पकड़ उजागर हुई है। इन छापों के बाद प्रदर्शन भी देखने को मिले, जिससे ज़ाहिर होता है कि पीएफआई किस स्तर पर सक्रिय था। पीएफआई ने अल्पसंख्यकों के अलावा दबे-कुचलों को सशक्त बनाने के नाम पर आन्दोलन शुरू किया और फिर अपने असली काम में जुट गया, जिसमें देश के ख़िलाफ़ लोगों को तैयार करना और आतंकी फंडिंग शामिल थी।

कैसे कसा शिकंजा?
पीएफआई पर शिकंजा कसने की शुरुआत तब हुई, जब बिहार के फुलवारी शरीफ़ में इसका मोड्यूल पकड़ा गया। इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह ने पीएफआई के देशव्यापी नेटवर्क को ध्वस्त करने को लेकर एक्शन प्लान बनाने और टेरर फंडिंग पर शिकंजा कसने के लिए एजेंसियों को निर्देश दिये थे। इसी दौरान यह भी जानकारी सामने आयी थी कि पीएफआई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमले की योजना बना रहा है। फुलवारी शरीफ़ में जो दस्तावेज़ तैयार किये गये उनमें ‘गज़वा-ए-हिन्द का लक्ष्य-2047’ रखा गया था। यह माना जाता है कि यह लक्ष्य भारत को मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिए था।

पीएफआई के दस्तावेज़ों से एजेंसियाँ को तुर्की, पाकिस्तान और मुस्लिम देशों से मदद (टेरर फंडिंग) के सुबूत भी मिले हैं। ज़ाहिर है पीएफआई देश के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर तबाही की तैयारी कर रहा था। फुलवारी शरीफ़ की घटना के बाद पीएफआई पर नकेल कसने के लिए केंद्र और राज्य एजेंसियों को जोड़ा गया और एनआईए को नोडल एजेंसी का ज़िम्मा मिला।

एनआईए ने तेज़ी से काम करते हुए राज्यों के एंटी टेररिस्ट स्क्वाड और स्पेशल टास्क फोर्स के प्रमुखों के साथ बैठकें करके पीएफआई की गतिविधियों से जुड़ी तमाम जानकारी साझा करने को कहा। इसके बाद जो जानकारियाँ सामने आयीं, वो उसके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई के लिए पुख़्ता आधार बनीं। ईडी को भी जाँच में शामिल किया गया, क्योंकि मामला अवैध रूप से विदेशी धन आने का भी था। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, रिसर्च अन्य एनालिसिस विंग (रॉ), आईबी, एनआईए के बड़े अधिकारी उन बैठकों में जुटे, जिन्हें गृह मंत्री शाह ने बुलाया था। पूछताछ में ज़ाहिर हुआ कि पीएफआई हत्याओं और जबरन वसूली के मामलों में शामिल है। अगस्त के आख़िर में एक बैठक के बाद ईडी को पीएफआई की फंडिंग, विदेश से मदद और अवैध लेन-देन से जुड़ी शुरुआती रिपोर्ट तैयार करने की ज़िम्मेदारी दी गयी। राज्य पुलिस को योजना में शामिल किया गया।

इसके बाद छापों की घड़ी आयी, जिसे गुप्त नाम ऑपरेशन ऑक्टोपस दिया गया। इसके बाद पूरी तैयारी के साथ छापे मारे गये और संदिग्ध लोगों को गिरफ़्तार कर कड़ी पूछताछ की गयी। पहली देशव्यापी छापेमारी 22 सितंबर को एक साथ 11 राज्यों में हुई। ईडी, एनआईए और राज्यों की पुलिस ने 11 राज्यों से पीएफआई से जुड़े 106 लोगों को अलग-अलग मामलों में गिरफ़्तार किया। एनआईए ने पीएफआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओएमएस सलाम और दिल्ली अध्यक्ष परवेज़ अहमद को गिरफ़्तार किया।

कुछ लोगों को एनआईए के दिल्ली हेडक्वार्टर लाया गया। गृह मंत्री अमित शाह ने देश भर में पीएफआई के ख़िलाफ़ जारी रेड को लेकर एनएसए, गृह सचिव और डीजी एनआईए के साथ बैठक की। गिरफ़्तार पीएफआई केडर और कट्टरपंथी नेताओं से पूछताछ में जो ख़ुलासे हुए, वो एजेंसियों के लिए ख़ासे चौंकाने वाले थे। इसमें यह भी ज़ाहिर हुआ कि पीएफआई ने देश भर में अपना ख़ुफ़िया तंत्र विकसित कर लिया था। उसकी इंटेलिजेंस विंग हर ज़िले में काम कर रही थी, जो जासूसी कर सूचनाएँ एकत्र करती थी।

सहयोगियों पर भी शिकंजा
केंद्र सरकार ने पीएफआई के जिन सहयोगियों पर भी प्रतिबन्ध लगाया है, उनमें रिहैब इंडिया फाउंडेशन (आरआईएफ), कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (सीएफआई), ऑल इंडिया इमाम काउंसिल (एआईआईसी), नेशनल कंफेडरेशन ऑफ ह्यूमन राइट ऑर्गेनाइजेशन (एनसीएचआरओ), नेशनल वूमेंस फ्रंट, जूनियर फ्रंट, एम्पावर इंडिया फाउंडेशन और रिहैब फाउंडेशन, केरल शामिल हैं। अब देश में राष्ट्रव्यापी प्रतिबंधित संगठनों की संख्या 43 हो गयी है।

चीतों पर चिन्तन

यह सन् 2009 की बात है। तब नरेंद्र मोदी ही गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उस समय दो जोड़ी चीते सिंगापुर प्राणी उद्यान से गुजरात के जूनागढ़ स्थित देश के प्राचीनतम सक्करबाग़ प्राणी उद्यान (साल 1863 में स्थापित) में लताये गये थे। इन चीतों के बदले एक एशियाई शेर और दो शेरनियाँ सिंगापुर प्राणी उद्यान को दिये गये थे।
12 साल की उम्र के बाद प्राकृतिक कारणों से चीतों की इन दोनों जोड़ों की मौत हो गयी। आख़िरी चीते की मृत्यु सन् 2017 में हुई। तब 63 साल के बाद चीते भारत लौटे थे। लिहाज़ा अब 70 साल बाद चीतों के देश में लौटने का दावा सही प्रतीत नहीं होता। भारत के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में आठ चीतों को लाने का सभी ने, ख़ासकर वन्य संरक्षण प्रेमियों ने स्वागत किया है। लेकिन यह भी सच है कि इवेंट मैंनेजमेंट के इस ज़माने में आठ चीतों को लाने की प्रक्रिया को राजनीतिक प्रचार का हिस्सा बना दिया गया। जबकि सच यह है कि परियोजना चीता की शुरुआत सन् 2009 में यूपीए की सरकार के समय हुई और उस पर सारा काम हो गया था; लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की रोक के बाद यह परियोजना ठन्डे बस्ते में चली गयी।

छानबीन बताती है कि जूनागढ़ के 84 हेक्टेयर में फैले सक्करबाग़ प्राणी उद्यान के एक आधिकारिक नोट में यह कहा गया है कि भारत से एशियाई चीतों के विलुप्त होने की आधिकारिक घोषणा सन् 1952 में हुई थी। नोट के मुताबिक, इस प्रजाति के चीते अब सिसिर्फ़ ईरान में ही हैं। नोट में आगे कहा गया है कि अस्सी के दशक में भारत के एक से ज़्यादा प्राणी उद्यानों में विदेश से कुछ अफ्रीकी चीते लाये गये थे। हालाँकि उनके आहार, विपरीत पर्यावरण स्थितियों और प्रजनन सम्बन्धी दिक़्क़तों के चलते उनकी आबादी बढ़ाने में सफलता हासिल नहीं हो सकी।

यह दिलचस्प बात है कि सन् 2009 में हुए प्रयास के पीछे भी भारत में विलुप्त चीता प्राजति के संरक्षण की इच्छा और कोशिश उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की ही थी। रिकॉर्ड के मुताबिक, 24 मार्च, 2009 को मोदी की अध्यक्षता में एक सार्वजनिक समारोह करके जूनागढ़ के सक्करबाग़ प्राणी उद्यान में दो जोड़ी चीतों को सिंगापुर प्राणी उद्यान से लाया गया था। उस मौक़े पर तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी ने मीडिया से कहा था कि यह देश में चीतों के सफलतापूर्वक प्रजनन कराने के राज्य सरकार के प्रयासों का हिस्सा है।

दरअसल सिंगापुर प्राणी उद्यान ने सन् 2006 में अफ्रीकी चीतों के बदले सक्करबाग़ प्राणी उद्यान से एशियाई शेरों को उन्हें देने का प्रस्ताव रखा और अगस्त में केंद्रीय चिडिय़ाघर प्राधिकरण ने इस प्रस्ताव पर मुहर लगा दी। विपरीत पर्यावरण स्थितियों के बावजूद उद्यान के अधिकारियों के बेहतर प्रबंधन और उचित देखभाल का असर था कि यह जोड़े 12 साल की आयु तक जीवित रहे।

हालाँकि उद्यान के उस समय सहायक निदेशक नीरव मकवाना के एक नोट के मुताबिक, तीन साल बाद (2012) तक इन जोड़ों का मिलन नहीं करवाया जा सका। इसका नतीजा यह हुआ कि उनकी आबादी में वृद्धि की कोशिशें सिरे नहीं चढ़ीं। आधिकारिक नोट कहता है कि स्कॉटलैंड के एक विशेषज्ञ भ्रूणविज्ञानी की देख-रेख में किये जाने वाले प्रजनन के सहायक प्रयास का प्रस्ताव लागू ही नहीं किया गया। बता दें इस उद्यान में 1,300 से अधिक वन्य प्राणी हैं और हर साल क़रीब 12 लाख लोग उद्यान में इन वन्य प्राणियों को देखने आते हैं।

कब शुरू हुआ अभियान?

बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के जर्नल में बताया गया है कि चीते भारत में हमेशा से रहे हैं। हालाँकि धीरे-धीरे ये लुप्त होते गये। पर्यावरण विशेषज्ञ दिव्य भानु सिंह की पुस्तक ‘द एंड ऑफ अ ट्रेल-द चीता इन इंडिया’ में बताया गया है कि मुगल बादशाह अकबर के पास 1,000 चीते थे। उनके मुताबिक, अकबर के बेटे जहाँगीर ने चीतों के ज़रिये 400 से ज़्यादा हिरण पकड़े। भारत में 20वीं शताब्दी की शुरुआत से भारतीय चीतों की आबादी में तेज़ी से गिरावट आयी और यह कुछ सैकड़ों तक सीमित हो गये। सन् 1918 से 1945 के बीच 200 चीते आयात किये गये; लेकिन इसके बावजूद सन् 1940 के दशक में चीतों की संख्या इतनी कम हो गयी कि इनका शिकार कमोवेश बन्द हो गया।

रिपोट्र्स बताती हैं कि सन् 1947 में कोरिया के राजा रामानुज प्रताप सिंहदेव ने देश के आख़िरी तीन चीतों का शिकार कर दिया। इसके बाद 67 साल (2009 तक) भारत में चीते नहीं दिखे। सन् 1952 में स्वतंत्र भारत में वन्यजीव बोर्ड की पहली बैठक में जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने मध्य भारत में चीतों की सुरक्षा को विशेष प्राथमिकता देने का आह्वान करते हुए इनके संरक्षण के लिए साहसिक प्रयोगों का सुझाव दिया था।

बाद में सन् 1970 के दशक में सरकार ने विदेश से चीते भारत लाने पर विचार शुरू किया। इंदिरा गाँधी की सरकार के समय एशियाई शेरों के बदले में एशियाई चीतों को भारत लाने के लिए ईरान के शाह के साथ बातचीत शुरू की हुई। हालाँकि बाद में भारत सरकार ने ईरान में एशियाई चीतों की कम आबादी और अफ्रीकी चीतों के साथ इनकी अनुवांशिक समानता को ध्यान में रखते हुए अफ्रीकी चीते लाने का फ़ैसला किया।

चीतों को भारत लाने की कोशिशें सन् 2009 तेज़ हुईं। गुजरात सरकार के दो जोड़ी चीते लाने के अलावा केंद्र सरकार की तरफ़ से इस मामले में गम्भीर कोशिश शुरू हुई। अब जिस परियोजना चीता का श्रेय आज मोदी सरकार ले रही है, उसकी शुरुआत सन् 2008-09 में मनमोहन सिंह की यूपीए की सरकार के दौरान हुई थी। उस समय वन और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश अफ्रीका के इसके लिए चीता आउटरीच सेंटर की यात्रा की। सन् 2010 और सन् 2012 के बीच 10 स्थलों का सर्वेक्षण किया गया।

मध्य प्रदेश में कूनो राष्ट्रीय उद्यान नये चीतों को लाकर रखने लिए तैयार माना गया, क्योंकि इस संरक्षित क्षेत्र में एशियाई शेरों को लाने के लिए भी काफ़ी काम किया गया था। पर्यावरण और वन मंत्रालय ने 300 करोड़ रुपये ख़र्च कर चीतों को बसाने की योजना को औपचारिक रूप दे दिया था; लेकिन सन् 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने इस परियोजना पर रोक लगा दी थी और क़रीब सात साल बाद सन् 2020 में न्यायालय ने यह रोक हटायी।

भारत में चीते लाने की योजना तत्कालीन केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश की थी। यदि सर्वोच्च न्यायालय की रोक नहीं लगी होती, तो देश में 10 साल पहले ही चीते आ गये होते। सर्वोच्च न्यायालय ने सन् 2010 में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की अर्जी पर सुनवाई शुरू की थी, जिसमें नामीबिया से अफ्रीकी चीतों को भारत में लाने की अनुमति माँगी गयी थी। न्यायालय ने तब भारत में चीते फिर बसाने के लिए विशेषज्ञों का एक पैनल गठित किया। तब सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि वह ख़ुद परियोजना की निगरानी करेगी।

पैनल ने चीतों को बसाने के लिए तीन स्थानों मध्य प्रदेश में कूनो पालपुर, गुजरात में वेलावदार राष्ट्रीय उद्यान और राजस्थान में ताल छापर अभयारण्य की सिफ़ारिश की। कूनो राष्ट्रीय उद्यान मूल रूप से मध्य प्रदेश में गुजरात के एशियाई शेरों को रखने के लिए तैयार किया गया था। हालाँकि बाद में यह चीतों के पुनर्वास की शुरुआत के लिए पसन्दीदा स्थान बन गया।

सरकार ने जब इस परियोजना को मंज़ूरी दी, तब मंत्रालय ने अदालत की तरफ़ से बनाये पैनल के सदस्यों वन्यजीव विशेषज्ञ एम.के. रंजीत सिंह, एक अमेरिकी आनुवांशिकी विज्ञानी स्टीफन ओ ब्रायन और सीसीएफ के लारी मार्कर से विचार-विमर्श करने के बाद सन् 2010 में नामीबिया से 18 चीतों को मँगाने का प्रस्ताव किया था।

चीतों की क़ीमत और उनका ख़र्च

आपको जानकार आश्चर्य होगा कि औपनिवेशिक-कालीन स्रोतों के मुताबिक, उस ज़माने में एक प्रशिक्षित चीते की क़ीमत 150 रुपये से 250 रुपये के बीच थी। वहीं जंगल से पकड़े गये किसी चीते की क़ीमत 10 से 20 रुपये के बीच थी। लेकिन आज के दौर में एक शावक (चीते के छोटे बच्चे) की क़ीमत भी 3,00,000 से 16,00,000 रुपये के बीच है। अब मोदी सरकार जो आठ चीते भारत लायी है, उन पर 96 करोड़ का ख़र्च आया है। पर्यावरण और वन मंत्रालय के मुताबिक, इस परियोजना की स्पोर्ट के लिए इंडियन ऑयल ने भी अतिरिक्त 50 करोड़ रुपये देगा, जिसमें आठ करोड़ की पहली किश्त उसने दे दी है। विशेष रूप से बने विमान में क़रीब 8,000 किलोमीटर का सफ़र कर यह चीते भारत आये, जिनमें से तीन को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कूनो उद्यान में छोड़ा। इनमें तीन मादा हैं। कूनो राष्ट्रीय उद्यान में अधिकतम तापमान 42 डिग्री, जबकि न्यूनतम छ: से सात डिग्री सेल्सियस तक रहता है, जिसे चीतों के लिए मुफ़ीद माना जाता है। चीता ह$फ्ते में एक बार ही शिकार करता है और उसे एक बार में सात से आठ किलो मटन चाहिए होता है। ख़बर आयी थी कि इन चीतों को खाने के लिए 200 के क़रीब हिरन / चीतल कुनो पार्क में छोड़े जा रहे हैं, जिस पर ख़ासा बवाल हुआ। कभी अपने शिकार को साझा न करने वाले चीते को महीने में चार और साल में 50 जानवर चाहिए होते हैं। कूनो पार्क के पास नदी होने से पानी की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है। एक चीते को पालने में 5,00,000 से 14,00,000 रुपये तक का सालाना ख़र्च होता है।

कौशल विकास समय की माँग

कुछ सप्ताह पूर्व कोर्सेरा द्वारा वैश्विक कौशल रिपोर्ट (ग्लोबल स्किल्स रिपोर्ट) 2022 जारी की गयी, जिसमें भारत को समग्र कौशल दक्षता के मामले में 68वाँ स्थान मिला है। अगर बात एशिया स्तर पर करें, तो भारत को 19वाँ स्थान हासिल हुआ है। इस रिपोर्ट को भारतीय मीडिया में वैसी तवज्जो नहीं मिली, जैसी मिलनी चाहिए थी। इस रिपोर्ट के अनुसार, डाटा विज्ञान में देश की दक्षता सन् 2021 की 38 फ़ीसदी से घटकर सन् 2022 में 26 फ़ीसदी हो गयी है, जो कुल 12 रैंक की गिरावट है। वहीं दूसरी तरफ़ देश में प्रौद्योगिकी प्रवीणता का स्तर 38 फ़ीसदी से बढक़र 46 फ़ीसदी हो गया है। इसमें भारत ने अपनी रैंकिंग को छ: स्थान तक मज़बूत किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोपीय देश स्विट्जरलैंड में सबसे अधिक कुशल शिक्षार्थी हैं। डेनमार्क और बेल्जियम जैसे विकसित यूरोपीय देश भी कुशल शिक्षार्थियों की संख्या की दृष्टि से टॉप देशों में शामिल हैं। भारतीय राज्यों में पश्चिम बंगाल कौशल दक्षता के मामले में अन्य राज्यों से बहुत आगे है। देश में डिजिटल कौशल दक्षता का उच्चतम स्तर दिखाते हुए इसने कर्नाटक जैसे प्रौद्योगिकी कौशल राज्य को भी पीछे छोड़ दिया है।

कोर्सेरा की इस रिपोर्ट से हमें यह स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि विश्व के अलग-अलग देशों में कौशल अर्जित करने में बड़ा अंतराल है। भारत जैसे विशाल देश जहाँ जनसंख्या की लिहाज़ से दुनिया में सबसे ज़्यादा आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती हैं, वहाँ लोगों को ख़ासकर युवा वर्ग को डिजिटली कौशल बनाना समय की माँग है। हाल ही में भारत समेत पूरी दुनिया में विश्व युवा कौशल दिवस मनाया गया। भारतीय सन्दर्भ में हमें इस दिवस का महत्त्व अच्छे से समझना होगा। पिछले कुछ वर्षों में भारत के शहरों में तो डिजिटल व्यवस्था काफ़ी मज़बूत हुई है और इसका फ़ायदा शहरी समाज को मिल भी रहा है; लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में हमें हालात को बेहतर करने होंगे।
भारत सरकार ने सन् 2015 में डिजिटल इंडिया कार्यक्रम शुरू किया था, जिसका प्रमुख उद्देश्य भारतीय समाज को डिजिटल रूप से सशक्त बनाना तथा इसे ज्ञान अर्थ-व्यवस्था में बदलना था, ताकि आम लोगों की ज़िन्दगी को बेहतर और आसान बनाया जा सके। इस कार्यक्रम के माध्यम से महानगरों से लेकर पंचायतों तक छोटे-बड़े सरकारी विभागों को डिजीटल रूप से विकसित करने पर ज़ोर दिया गया। डिजिटल व्यवस्था के कारण आज शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, प्रशासन, कृषि, पर्यटन, बाज़ारीकरण इत्यादि क्षेत्रों में बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। देश में ई-क्रान्ति से आज डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन व्यापार बहुत आसान हो गये हैं। ऑनलाइन एजुकेशन स्टार्टअप्स को नयी रफ़्तार मिली है। हालाँकि ग्रामीण क्षेत्र में इंटरनेट की धीमी रफ़्तार, डिजिटल निरक्षरता तथा लगातार बिजली की कटौती कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर शीघ्र ध्यान देने की ज़रूरत हैं।

कोरोना-काल में भारत समेत सैकड़ों देशों में काम करने के तरीक़ों में व्यापक परिवर्तन देखने को मिले हैं। इस दरमियान डिजिटाइजेशन की तरफ़ दुनिया तेज़ी से बढ़ी है और एक प्रकार की हाइब्रिड कार्य संस्कृति पनपी है, जिसने सभी देशों को बुनियादी डिजिटल व्यवस्था को मज़बूत करने के लिए बाध्य किया है। यूनेस्को समेत कई बड़े संस्थानों के पहले के रिपोट्र्स यह बताते हैं कि भारत में शिक्षित युवा वर्ग की एक बड़ी आबादी जॉब पाने की योग्यता नहीं रखती। देश के अलग-अलग क्षेत्रों की कई नियोक्ता कम्पनियों को अक्सर शिकायत होती हैं कि यहाँ के युवा वर्ग में मार्केट के हिसाब से ज़रूरी स्किल्स नहीं होते।
आज के इस तकनीक आधारित समय में नौकरी पाने की लालसा रखने वाले भारतीय युवा वर्ग को यह बात स्पष्टता से समझने की ज़रूरत है कि नये कौशल अर्जित करने से ही उन्हें नौकरी मिल पाएँगी तथा वे अपने करियर में लम्बे समय तक टिके रह पाएँगे। देश के नागरिकों ख़ासकर ग्रामीण युवा वर्ग को चाहिए कि केंद्र तथा राज्य सरकार द्वारा चलाये जा रहे फ्री ऑनलाइन तथा ऑफलाइन स्किल्स ओरिएंटेड कोर्सेज से जुडक़र ट्रेनिंग लें और अपने भविष्य को बेहतर बनाएँ।

(लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया में शोधार्थी हैं।)

सत्ता का दुरुपयोग

पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने बीसीसीआई को अपने संविधान में संशोधन करने की इजाज़त दे दी। इसके बाद अब बीसीसीआई के सचिव जय शाह का पुन: अगले तीन वर्षों तक अपने पद पर बने रहना सुनिश्चित हो गया है। बात छोटी-सी है, और प्रथमदृष्टया सामान्य लगती है। लेकिन इसके निहितार्थ स्वार्थी सत्ता की गहरी जड़ें हैं। ऐसी कौन-सी विशिष्ट परिस्थितियाँ थीं कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह को इस लाभ के पद पर बनाये रखने के लिए बीसीसीआई को नियमों में बदलाव को लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक जाना पड़ा। देश के लिए अब तक यह समझ पाना अत्यंत दुष्कर है कि गृहमंत्री अमित शाह के बेटे होने के अतिरिक्त जय शाह में ऐसी कौन-सी क़ाबिलियत या दिव्य गुण है, जिसके चलते उन्हें बीसीसीआई के सचिव पद पर प्रतिष्ठित किया गया है। जय शाह ने तो क्रिकेट या सार्वजनिक जीवन में ऐसी कोई उपलब्धि भी हासिल नहीं की है।

स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के समक्ष दो बड़ी चुनौतियों- भ्रष्टाचार और परिवारवाद की चर्चा की। लेकिन समस्या यह है कि प्रधानमंत्री और भाजपा वंशवाद एवं भ्रष्टाचार का विरोध तो चाहते हैं, परन्तु अपनी सुविधानुसार। जिस भाजपा में अनुराग ठाकुर, पूनम महाजन, पंकज सिंह, पंकजा मुंडे, पीयूष गोयल, निर्मला सीतारमण, रविशंकर प्रसाद, धर्मेंद्र प्रधान, विजय गोयल जैसे नेता वंशवाद की एक विस्तृत पैदावार हैं; कम-से-कम उसे तो वंशवाद और परिवारवाद की आलोचना करने का नैतिक अधिकार नहीं ही है। भाजपा की रीति-नीति से प्रतीत होता है कि कांग्रेस, सपा, राजद आदि विपक्षी दलों का वंशवाद देश के लिए चुनौती है और भाजपा का परिवारवाद लोकतंत्र को मज़बूती प्रदान कर रहा है। सत्य तो यही है कि चाहे किसी भी दल द्वारा प्रश्रय दिया गया हो; लेकिन वंशवाद-परिवारवाद भारत के लिए दुर्दम्य रोग बन चुका है। इधर देश की नौकरशाही संस्थागत भ्रष्टाचार के निरंतर नये मानक बना रही है। लेकिन सुशासन का नारा बुलंद करती सरकार इस पर मौन साधे बैठी है। इसका नमूना देखिए, वार्षिक रिपोर्ट-2021 में केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) ने भ्रष्टाचार के मामले में सरकारी विभागों के रवैये पर नाराज़गी जताते हुए कहा था कि विभिन्न सरकारी विभागों ने भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों को दण्डित करने की उसकी सिफ़ारिशों को नहीं माना; जबकि इनमें अनियमितताओं और ख़ामियों के गम्भीर मामले सामने आये थे। यही नहीं, उत्तराखण्ड से लेकर उत्तर प्रदेश तक के लोक सेवा आयोगों में कुव्यवस्था और भ्रष्टाचार सिर चढक़र बोल रहे हैं। नियुक्तियों में धाँधलियों के द्वारा संघर्षशील युवाओं के भविष्य को पैरों तले रौंद रहे इन भ्रष्ट महकमों को ईडी और सीबीआई के जाँच के अंतर्गत कब लाया जाएगा? उत्तर प्रदेश में पशुपालन विभाग में हुए करोड़ों के घोटाले और सरकारी अधिकारियों के स्थानांतरण में हुई गड़बडिय़ों के दोषियों को कब दण्डित किया जाएगा? ऐसे कई यक्ष प्रश्न हैं।

ग़ौर करें, तो 2014 में सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार ने कमोबेश पूर्व की कांग्रेसी सरकारों की उसी कार्यशैली को अपना लिया है, जिसकी वह स्वयं हमेशा आलोचना करती रही है। मसलन अपनी सुविधानुसार नियमों को तिलांजलि दे देना। भाजपा ने सत्ता में आते ही नृपेंद्र मिश्र को सचिव बनाने के लिए नियमों में बदलाव करवाया। वास्तव में यह बहुमत के दुरुपयोग का उदाहरण है।

अब डॉ. शाह फैसल के मामले को ही लीजिए; इस पूर्व आईएएस ने नौकरी छोडक़र जब राजनीति शुरू की, तब अनुच्छेद-370 के विरोध में वह इतने दुराग्रही हो गये कि भारत सरकार विरोधी पक्ष को लेकर तुर्की आदि शत्रु देशों और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय हेग में जाने का प्रयास करते हुए दिल्ली हवाई अड्डे पर पकड़े गये। उन्हें पीएसए के तहत गिरफ़्तार किया गया। जून, 2020 में रिहाई के पश्चात् उन्होंने राजनीति से किनारा किया और मोदी सरकार की नीतियों की प्रशंसा करते हुए वापस नौकरशाही में लौटने की इच्छा जतायी। अब केंद्र सरकार ने उन्हें संस्कृति मंत्रालय में उप सचिव नियुक्त किया है। कल्पना कीजिए कि अगर कांग्रेस या किसी अन्य विपक्षी दल की सरकार द्वारा यह किया गया होता, तो पूरी भाजपा राष्ट्रवाद का ध्वज और तुष्टिकरण विरोधी नारे के साथ सरकार पर टूट पड़ी होती। लेकिन दिव्य शक्ति सम्पन्न मोदी सरकार ने यह निर्णय अगर किया है, तो अवश्य ही इसमें कोई गूढ़ रहस्य होगा। फिर इस पर आम अज्ञानी जनता कैसे प्रश्न उठा सकती है?

दूसरा उदाहरण देखें, एक क्रिकेट मैच के दौरान गृहमंत्री के बेटे एवं बीसीसीआई के सचिव जय शाह ने तिरंगे के प्रति कैसा क्षुद्र व्यवहार किया, यह पूरे देश ने देखा। यदि अमित शाह के बेटे के बजाय किसी ग़ैर-भाजपा नेता के बेटे या किसी ग़ैर-हिन्दू ने राष्ट्रीय ध्वज हाथ में लेने से इनकार किया होता, तब भाजपा पूरे देश को राष्ट्रवाद सिखाती। लेकिन इस मुद्दे पर पार्टी के सारे बयानवीर और तथाकथित राष्ट्रवादी एकदम मौन रहे। वर्तमान में सरकार की नीतियाँ विरोधाभासों से भरी हैं। एक तरफ़ डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने एवं कैशलेस इकोनॉमी के गुण गाये जा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ़ प्रत्येक यूपीआई ट्रांजेक्शन पर शुल्क लागू करने की बातें हो रही हैं। ऐसे ही एक तरफ़ मेक इन इंडिया और स्वदेशी उद्योग विस्तार के दावे हैं और दूसरी तरफ़ चीनी उत्पादों पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। पिछले पाँच वर्षों के आँकड़ों से पता चलता है कि भारत का चीन से व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। सन् 2017 में यह 51 अरब डॉलर था, जो सन् 2021 में बढक़र 69.4 अरब डॉलर हो गया था। भारत के मोबाइल बाज़ार के 50 फ़ीसदी से अधिक हिस्से पर चीनी कम्पनियों का ही क़ब्ज़ा है। उस पर सीमा विवाद को लेकर भाजपा कुछ नहीं बोलती, सिवाय एकाध बार चीन को देख लेने की घोषणा के। गोवंश संरक्षण के मुद्दे पर भाजपा का रुख़ सदैव आक्रामक रहा है, बल्कि इस मुद्दे ने भाजपा के चुनावी अभियानों को धार दी है। परन्तु लम्पी वायरस के कहर से पूरे उत्तर भारत में तड़प-तड़पकर मर रही गायों की सुध लेने की न सरकार में किसी को फ़ुर्सत है और न ही उन तथाकथित गोरक्षकों को, जिन्होंने सन् 2014 में केंद्र में मोदी सत्ता स्थापित होने के बाद तीन-चार साल तक लोगों को पीटा। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में गायों की बड़ी आबादी मिटाकर वीगन मूवमेंट एवं अमेरिकी सोया मिल्क खपत बढ़ाने के लिए मानव निर्मित लम्पी वायरस एफएमडी वैक्सीनेशन के ज़रिये गायों में प्रसारित किया गया है। लेकिन सरकार आश्चर्यचकित रूप से अनभिज्ञ बनी बैठी है।

बीती 15 अगस्त के अपने अभिभाषण में प्रधानमंत्री ने कहा था कि कभी-कभी हमारी प्रतिभाएँ भाषा के बन्धनों में बँध जाती हैं। यह ग़ुलामी की मानसिकता का परिणाम है। हमें हमारे देश की हर भाषा पर गर्व होना चाहिए। किन्तु विडम्बना देखिए कि हिन्दी समेत सभी भारतीय भाषाओं के सम्मान की रक्षा का नारा देती यही सरकार प्राथमिक शिक्षा तक में अंग्रेजी थोपने में लगी है। और देश को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रतिष्ठा की स्थापना का दिवास्वप्न दिखाया जा रहा है। भाजपा सरकार के कार्यकाल में सरकारी नौकरियों में अंग्रेजी की अनिवार्यता बढ़ती गयी है। दूसरी ओर प्रशासन के भारतीयकरण पर तक़रीरें हों रहीं हैं। केंद्र सरकार और भाजपा देश में फैली समस्याओं से अपरिचित नहीं हैं; लेकिन फिर भी वह इनके प्रति उदासीन बनी हुई है। सम्भवत: कहीं-न-कहीं निरंतर चुनावी विजय ने पार्टी नेताओं को घमण्ड से भरते हुए सत्ता में रहने का एक निश्चिंत भाव पैदा कर दिया है। इसकी सबसे प्रमुख वजह भाजपा को मिलने वाला अंधसमर्थन है।

दरअसल पार्टी के पास हिन्दुत्व का ब्रह्मास्त्र है, जिसने अब तक उसे पिछले आठ वर्षों से चुनावी संघर्ष में लगातार बढ़त दिला रखी है। इसी के चलते पार्टी यह मुग़ालता पाल बैठी है कि उसे प्राप्त यह बहुमत स्थायी रूप ले चुका है। किन्तु यदि ऐसे ही पार्टी का सैद्धांतिक भटकाव जारी रहा, तो जल्द उसका पतन शुरू हो सकता है। क्योंकि लोकतंत्र में बहुमत या जनसमर्थन कभी भी स्थायी नहीं होता। भाजपा को यह समझना होगा कि अब तक जिन राजनीतिक कुप्रथाओं की वह आलोचना करती रही है, उससे बढक़र नकारात्मक परम्पराएँ स्थापित करने के उसके ही कृत्य भविष्य में पार्टी को जनता के कटघरे में खड़ा करेंगे। तब भाजपा की भी वैसी ही स्थिति होगी, जैसी आज कांग्रेस की है कि वह अपनी ऐतिहासिक ग़लतियों के लिए मुँह छुपाये फिर रही है और जनाधार तलाश रही है। बहुमत के दुरुपयोग के कारण महत्त्वपूर्ण पक्ष का सिकुडऩा और संघर्षहीन विपक्ष भी हैं। यहाँ सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी विपक्ष की थी, जो आम जनता को सरकार के भटकाव से परिचित कर उसे अपने विरोध से जोड़ता, ताकि सत्ता को चेताया जा सके। लेकिन विपक्ष स्वयं ही दिशाहीन एवं किंकर्तव्यविमूढ़ है। उसका नेतृत्व ऐसे अयोग्य वंशवाद के उत्पाद नेताओं के पास है, जिनको जन-सरोकारों से जुड़े मामलों को न जानने की फ़र्सत है और न ही उनमें कोई रुचि। उनका स्वार्थ अपना अस्तित्व बचाने में और उनकी ऊर्जा येन केन प्रकारेण सत्ता पाने की जुगत में ख़र्च हो रही है। अत: सरकार और सत्ता का प्रभाव सर्वत्र फैलना स्वाभाविक ही है।

रही बात नरेन्द्र मोदी की, तो श्रीममद्गवद्गीता में अर्जुन द्वारा भगवान कृष्ण से किया गया प्रश्न याद आता हैं :-

‘अयति: श्रद्धयोपेतो योगात्चलितमानस:।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।।’

अर्थात् हे कृष्ण! उस असफल योगी की गति क्या है, जो प्रारम्भ में श्रद्धापूर्वक आत्म-साक्षात्कार की विधि ग्रहण करता है; किन्तु बाद में भौतिकता के कारण उससे विचलित हो जाता है और योगसिद्धि को प्राप्त नहीं कर पाता? यह प्रश्न मोदी के कार्य-व्यवहार के लिए सटीक है। उनकी राजनीति अब आत्मकेंद्रित हो चुकी है। विशेषकर प्रधानमंत्री के रूप में उनकी दूसरी पारी पर ग़ौर करें, तो वह आत्ममुग्ध एवं अति-स्वकेंद्रित नज़र आते हैं। उनकी ऊर्जा अपने आभामण्डल के विस्तार के प्रयास में अधिक लगी हुई है। सम्भवत: वह ख़ुद को इतिहास-पुरुष साबित करने की जद्दोजहद में लगे हैं। कहीं-न-कहीं उन्हें स्वयं के अपराजेय होने का भान हो गया है। लेकिन सर्वोच्चता की स्थिति सदैव नहीं रहती। यूनानी राजनीतिज्ञ पोलीबियस इस अवधारणा के समर्थक हैं कि इतिहास के क्रम में विकास तथा विनाश का नियम शाश्वत्, सर्वव्यापी एवं अटल है। लोकतंत्र में किसी सत्ता को बहुमत और जनसमर्थन की प्राप्ति का अर्थ स्वेच्छाचारिता एवं अधिनायकवाद की स्वीकृति क़तई नहीं होता। यदि किसी भी लोकप्रिय सरकार को यह भ्रम होता है, तो इसका अर्थ है कि उसने लोकतांत्रिक मूल्यों एवं जनशक्ति की अवधारणा को ठीक से आत्मसात नहीं किया है। इसी देश में इंदिरा गाँधी की सरकार ऐसी ही ग़लतफ़हमी के शिकार होने का दण्ड भुगत चुकी है। इतिहास वर्तमान के लिए बहुत बड़ी सीख होता है। लेकिन यह उसी के लिए सार्थक है, जो इससे ग्रहण करने की क्षमता रखता हो। अन्यथा इतिहास द्वारा ख़ुद को दोहराने की उक्ति सर्वविदित ही है।

(लेखक राजनीति एवं इतिहास के जानकार हैं। ये उनके अपने विचार हैं।)

विश्व और राष्ट्रीय डाक दिवस पर विशेष बचानी होगी डाक की साख

सूचनाओं का आदान-प्रदान इंसानों में ही नहीं, बल्कि धरती पर मौज़ूद सभी प्रकार के प्राणियों में होता है। फ़र्क़ यह है कि अन्य प्राणी सिर्फ़ आमने-सामने रहकर ही अपनी ही प्रजाति के दूसरे प्राणियों से अपनी भावनाओं का आदान-प्रदान करने में सफल होते होंगे; लेकिन इसमें वो पूरी तरह सफल होते होंगे, इसमें भी सन्देह है। लेकिन इस आदान-प्रदान के लिए इंसानों के पास कई तरह की सुविधाएँ मौज़ूद हैं, जैसे- बोली, लेखन, इशारा, हावभाव आदि। इन सबमें भाषा सबसे मज़बूत सम्प्रेषण का ज़रिया है। यही वजह है कि इंसान अपनी बात कहीं दूर-दराज़ के इलाक़े में बैठे व्यक्ति को भी पहुँचा सकता है।

इसी व्यवस्था के तहत इंसानों ने दूर बैठे किसी व्यक्ति को सन्देश पहुँचाने के लिए अपने आरम्भ-काल से ही कोई-न-कोई तरीक़ा निकाल रखा है। राजतंत्र के दौर में दूसरे राजाओं के पास दूतों द्वारा सन्देश भेजने की परम्परा रही, जबकि जनता में सन्देश पहुँचाने के लिए ढोलची संदेशवाहक होता था, जो गली-गली घूम-घूमकर ढोल या नगाड़ा पीटकर लोगों में सन्देश दिया करता था।

जब राजतंत्र का धीरे-धीरे अन्त होने लगा, तो डाक व्यवस्था की शुरुआत हुई। हालाँकि यह व्यवस्था पहले जर्मनी में शुरू हुई, फिर भारत में और फिर पूरी दुनिया में। सन् 1990 के दशक में जब इंटरनेट की शुरुआत हुई, तब यह चर्चा शुरू हो गयी थी कि 120 वर्षों से ज़्यादा समय से चली आ रही सूचना संचार की जीवन रेखा बनी डाक व्यवस्था दुनिया से ख़त्म हो जाएगी। हालाँकि पूरी तरह नहीं, तो एक बड़े स्तर तक यह बात बिल्कुल सही साबित हुई। आज जिसके लिए डाक व्यवस्था का शुभारम्भ हुआ यानी सन्देश सम्प्रेषण का काम डाक घरों से 80 फ़ीसदी तक उठ चुका है।

देखने में आया है कि इंटरनेट से केवल डाक सेवा ही ख़त्म नहीं हुई, बल्कि लोगों की भावनाएँ भी मरी हैं। लोगों की लिखने-पढऩे की आदत में बदलाव आया है। लेकिन हो सकता है कि दुनिया में कुछ ऐसे गाँव भी होंगे, जहाँ के कुछ लोग अभी भी चिट्ठी लिखते होंगे और कुछ लोग चिट्ठी के इंतज़ार में रहते होंगे। लेकिन कभी यह डाक सेवा ही एक मात्र ऐसी सेवा थी, जिससे हर इंसान जुड़ा हुआ था।

बता दें अंतरराष्ट्रीय डाक सेवा दिवस 9 अक्टूबर, 1969 को शुरू हुई। वहीं भारतीय डाक दिवस 10 अक्टूबर को मनाया जाता है। इससे ऐसा लगता है, जैसे भारत में डाक व्यवस्था एक दिन बाद शुरू हुई। लेकिन ऐसा नहीं है। भारत में पहला डाक घर इससे भी पहले साल 1774 में वॉरेन हेस्टिंग्स ने कोलकाता (तब कलकत्ता) में खोला था। भारतीय सीमा के बाहर पहला डाक घर दक्षिण गंगोत्री, अंटार्कटिका में साल 1983 में शुरू हुआ।

सन् 1986 में स्पीड पोस्ट की शुरुआत भारत में हुई, जबकि सन् 1980 में भारतीय डाक सेवा ने मनी ऑर्डर की शुरुआत की। हालाँकि भारत में डाक सेवा की स्थापना सन् 1766 में ही लार्ड क्लाइव ने कर दी थी। वहीं 9 अक्टूबर, 1874 को स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में दुनिया के 22 देशों के बीच एक सन्धि हुई, जिसके बाद यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का गठन किया गया था। 1 जुलाई, 1876 को भारत यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन की सदस्यता लेने वाला पहला एशियाई देश बना। सन् 1852 में स्टाम्प टिकट की शुरुआत हुई।

इस तरह सन् 2022 में आते-आते इस बार हम भारतीय डाक सेवा का 248वें राष्ट्रीय डाक सेवा दिवस में प्रवेश कर चुके हैं। जबकि विश्व डाक दिवस का यह 148वाँ साल है, यानी भारतीय डाक व्यवस्था दुनिया की डाक व्यवस्था से भी 100 साल पुरानी कही जाए, तो गलत नहीं होगा। हालाँकि भारत से भी पहले सन् 1,600 में जर्मनी की सरकार ने ड्यूश पोस्ट नाम से डाक सेवा की शुरुआत की थी, जिसका मुख्यालय बॉन में आज भी है। इस तरह डाक सेवा शुरू करने का श्रेय जर्मनी को जाता है। लेकिन इससे पहले भी भारत में राजा-महाराजा दूतों के द्वारा लिखित सन्देश भिजवाते थे, जो कि एक प्रकार की डाक सेवा ही थी।

ऐसे में अगर यह कहा जाए कि डाक सेवा का आइडिया भारतीय संस्कृति की देन है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जहाँ तक डाक घर स्थापित करने की बात है, तो भारत में इसकी स्थापना के एक साल बाद सन् 1775 में अमेरिका में यूएस मेल नाम से इसकी स्थापना हुई। आज भले ही इंटरनेट ने भारतीय डाक सेवा को बड़ा नुक़सान पहुँचाया है। लेकिन इस व्यवस्था को भारतीय सम्प्रेषण का एक अभिन्न अंग ही कहा जाएगा, क्योंकि आज भी डाकघरों के ज़रिये काफ़ी काम होते हैं। साथ ही समय के साथ-साथ डाकघरों ने अपनी कार्यप्रणाली में काफ़ी बदलाव किया है।

दिलचस्प है कि भारतीय डाक व्यवस्था में पिनकोड का बड़ा महत्त्व है। पिन कोड में पिन का मतलब पोस्टल इंडेक्स नंबर होता है, जिसकी शुरुआत पता आसानी से ढूँढने और समझने के लिए 15 अगस्त, 1972 को केंद्रीय संचार मंत्रालय में एक अतिरिक्त सचिव श्रीराम भिकाजी वेलणकर ने की थी। इससे पहले चिट्ठियों के भटकाव की शिकायतें बहुत रहती थीं। छ: अंकों के पिन कोड ने सही पते पर चिट्ठी, मनी ऑर्डर और दूसरी डाक सेवाओं को पहुँचाने में बड़ी मदद की।

क्या बन्द हो जाएँगे डाकघर?
बहुत-से लोगों के मन में यह सवाल उठ सकता है कि क्या भविष्य में डाक घर बन्द हो जाएँगे? तो इसका जवाब है- नहीं। क्योंकि डाक घर अब केवल चिट्ठी भेजने का काम ही नहीं करते, बल्कि मनी ऑर्डर, रजिस्ट्री, एफडी, सावधि जमा, बीमा, सामान की डिलीवरी, बैंकिंग और आधार आदि में परिवर्तन व सुधार में सहयोग भी करते हैं।
हालाँकि भारतीय डाक घरों को समय के हिसाब से और अधिक आधुनिक होने की आवश्यकता है, जिसके लिए उन्हें अपने काम की गति को और बढ़ाना होगा। इसमें भारत सरकार को डाक घरों की मदद की करनी चाहिए। साथ ही डाक घरों में रिक्त पदों के लिए भरना होगा। डाक घरों की बेकार पड़ी बिल्डिंगों को दोबारा चालू करना होगा। शहरों से लेकर दूर-दराज़ के ग्रामीण इला$कों तक इसे इंटरनेट की मज़बूत सेवा की तरह नये-नये फीचर्स के साथ मज़बूती प्रदान करनी होगी।

मोबाइल से आगे क्या?
सवाल यह है कि कि दिन-रात नयी-नयी खोजों में लगे वैज्ञानिकों के आविष्कार इस दुनिया का बहुत कुछ दे रहे हैं, तो बहुत कुछ छीनकर बर्बाद भी कर रहे हैं। मोबाइल इसमें दोनों तरह की भूमिका निभा रहा है। आज मोबाइल एक ऐसा आवश्यक हथियार बन चुका है, जिसके ब$गैर किसी का भी रहना मुश्किल हो चुका है, तो वहीं वह उपभोक्ता के लिए ही घातक सिद्ध हो रहा है।

अब लोग सोच रहे हैं कि क्या कभी मोबाइल से आगे भी कुछ ऐसा भविष्य में उनके हाथ में होगा, जो इसे भी ख़त्म कर देगा? क्योंकि जब लोगों के पास डाक व्यवस्था नयी-नयी थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि रेडियो, टीवी और टेलीफोन जैसी भी कोई व्यवस्था कभी सामने आएगी। जब लोगों के पास रेडियो, टीवी और टेलीफोन की व्यवस्था थी, तब किसी ने नहीं सोचा था कि लोगों के पास कम्प्यूटर, मोबाइल और इंटरनेट जैसी कोई चीज़ भविष्य में होगी। और आज जब इंटरनेट लोगों के पास है, तो उसकी गति और सुविधा बढ़ाने के लिए 2जी से लेकर 9जी तक का आविष्कार हो चुका है। अब सवाल यह है कि क्या भविष्य में इससे भी आगे की चीज़ इंसान के पास होगी।

कुरियर बनाम डाकघर

आजकल एक होड़ कुरियर और डाकघरों के बीच छिड़ी हुई है। इसमें कोई दो-राय नहीं कि सामान पहुँचाने के मामले में कुरियर सेवा ने डाक सेवा को कहीं पीछे छोड़ रखा है। लेकिन आज भी डाक सेवा पर लोगों का जो भरोसा बना हुआ है, वो कुरियर सेवा के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है। साथ ही कुरियर सेवा डाक सेवा के मुक़ाबले कहीं महँगी है। ऐसे में अगर डाक घर अपनी सामान पहुँचाने की सेवाओं को और मज़बूत तथा तेज़ कर दें, तो डाक घरों की आय में भी वृद्धि होगी, साथ ही उनके पास काम ज़्यादा होगा और वो कुरियर सेवा को मात दे सकेंगे। लेकिन इसके लिए डाक व्यवस्थापकों और सरकार में इच्छा शक्ति होनी बहुत ज़रूरी है।

देखने वाली बात यह है कि आज डाक घरों के पास कई तरह के काम करने की परमीशन हैं, जबकि कुरियर वालों के पास केवल सामान इधर-से-उधर पहुँचाने की ही सुविधा है, फिर भी इस एक काम के दम पर कुरियर सेवा ने पिछले 14-15 वर्षों में जितना पैसा कमाया है, उतना डाक सेवा ने नहीं कमाया है। ऐसे में डाक व्यवस्थापकों और सरकार को इस बारे में सोचना तो चाहिए।

साइबर अपराधियों का आसान निशाना हैं महिलाएँ

पंजाब में एक निजी यूनिवर्सिटी में हाल में सामने आये एमएमएस मामले ने सरकार और समाज के सामने यह गम्भीर सवाल उठा दिया है कि साइबर अपराधियों के लिए महिलाएँ अभी भी आसान लक्ष्य क्यों हैं? इसके लिए क़ानून आदि को लेकर बता रहे हैं सनी शर्मा :-

साइबर क्राइम आज के समय में एक गम्भीर समस्या बन गया है। हैकिंग, मॉर्फिंग, सेक्सटॉर्शन, निजता का उल्लंघन विभिन्न प्रकार के साइबर अपराध होते हैं। साइबर क्राइम की चपेट में सबसे ज़्यादा महिलाएँ और बच्चे हैं। 29 अगस्त, 2022 को जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के अनुसार, सन् 2019 के मुक़ाबले सन् 2021 में साइबर अपराध की घटनाओं की संख्या में 18.4 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है; लेकिन महिलाओं के ख़िलाफ़ ऐसे मामलों की संख्या में उल्लेखनीय रूप से 28 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है।

डाटा कहता है कि सन् 2021 में रिपोर्ट की गयी 52,974 घटनाओं में से 10,730 घटनाएँ, जो कुल अपराध का 20.2 फ़ीसदी हैं; महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध के मामलों के रूप में दर्ज की गयीं। डाटा से पता चलता है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ साइबर अपराधों में मुख्य रूप से साइबर ब्लैकमेलिंग, धमकी, साइबर पोर्नोग्राफी, अश्लील यौन सामग्री की पोस्टिंग / प्रकाशन, साइबर स्टॉकिंग, बदमाशी, मानहानि, मॉर्फिंग और नक़ली प्रोफाइल बनाने के उदाहरण शामिल हैं।

हालाँकि एनसीआरबी के आँकड़ों के अनुसार, पंजाब महिलाओं के ख़िलाफ़ साइबर अपराध के मामले में शीर्ष राज्यों में शामिल नहीं था। लेकिन पिछले साल नारकोटिक्स ड्रग्स ऐंड साइकोट्रोपिक सबस्टेंस (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में पंजाब फिर से अपराध दर (प्रति लाख जनसंख्या) की सूची में सबसे ऊपर है, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी आँकड़ों में कहा गया है। विवरण के अनुसार, पंजाब में 2021 में 32.8 फ़ीसदी अपराध दर (प्रति लाख जनसंख्या) दर्ज की गयी, जो देश में सबसे अधिक थी। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब की अनुमानित जनसंख्या सन् 2021 में 304.04 लाख थी और इस वर्ष के दौरान राज्य में एनडीपीएस अधिनियम के 9,972 मामले दर्ज किये गये थे।

महिलाओं के ख़िलाफ़ साइबर अपराध बेखौफ़ होकर रुक-रुककर होते रहते हैं। सन् 2001 में रितु कोहली का मामला भारत में साइबर स्टॉकिंग का पहला मामला था। पीडि़ता ने एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत की, जो इंटरनेट पर चैट करने के लिए अपनी पहचान का इस्तेमाल कर रहा था। उसने आगे शिकायत की कि अपराधी उसका पता ऑनलाइन भी बता रहा था और अश्लील भाषा का इस्तेमाल कर रहा था। उसके सम्पर्क विवरण भी लीक हो गये थे, जिसके कारण विषम घंटों में बार-बार कॉल आती थी। नतीजतन आईपी पते के आधार पर पुलिस ने पूरे मामले की जाँच की और आखिरकार अपराधी मनीष कथूरिया को गिरफ़्तार कर लिया।

पुलिस ने रितु कोहली का शील भंग करने के आरोप में भारतीय दण्ड संहिता की धारा-509 के तहत मामला दर्ज किया है। लेकिन भारतीय दण्ड संहिता की धारा-509 केवल एक महिला के अस्मिता पर हमले या अपमान के उद्देश्य से एक शब्द, हावभाव या कार्य को सन्दर्भित करती है और जब वही चीज़ें इंटरनेट पर की जाती हैं, तो उक्त धारा में इसके बारे में कोई उल्लेख नहीं है।

भारत के साइबर क़ानूनों में न तो साइबर स्टॉकिंग के लिए कोई विशेष प्रावधान था और न ही महिलाओं की सुरक्षा के लिए कोई अन्य धारा। अनुभाग में उल्लिखित शर्तों में से कोई भी साइबर स्टॉकिंग के तहत नहीं आता है। इस प्रकार रितु कोहली के मामले ने सरकार को पूर्वोक्त अपराध के सम्बन्ध में और उसी के तहत पीडि़तों की सुरक्षा के सम्बन्ध में क़ानून बनाने की तत्काल आवश्यकता के प्रति सचेत किया।

परिणामस्वरूप सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम-2008 (आईटीएए 2008) में धारा-66(ए) जोड़ी गयी। यह धारा एक अवधि के लिए कारावास का प्रावधान करती है, जिसे तीन साल तक बढ़ाया जा सकता है। इसके तहत संचार सेवा आदि के माध्यम से आपत्तिजनक सन्देश भेजने के लिए ज़ुर्माना लगाया जा सकता है।

लेकिन क्या विभिन्न अधिनियम महिलाओं को साइबर अपराध से बचाने के लिए पर्याप्त हैं? इस पर अभी भी सवालिया निशान है। अतीत में राजस्थान की एक निजी यूनिवर्सिटी में एक शिक्षिका को उसके अन्तिम वर्ष के छात्रों द्वारा धमकी दी गयी थी कि या तो वह उनके अंक बढ़ाएँ या वे छात्र समूहों में उनके निजी वीडियो प्रसारित करेंगे। शिक्षिका ने पुलिस को सूचना दी। जाँच में सामने आया कि वीडियो स्वयं रिकॉर्ड किये गये थे और उसी यूनिवर्सिटी में अन्तिम वर्ष के छात्र (अपने प्रेमी) को भेजे गये थे। उसने उन्हें अपने दोस्तों के साथ साझा किया, जो शिक्षिका को ब्लैकमेल कर रहे थे।

एक अन्य मामले में एक महिला को व्हाट्स ऐप पर अपनी 13 वर्षीय बेटी की एक निजी तस्वीर मिली, जिसमें एक सन्देश के साथ उसकी इसी तरह की तस्वीरों की माँग की गयी थी। सन्देश भेजने वाले ने लिखा कि अगर उसने मना किया, तो उसकी बेटी की तस्वीर इंटरनेट पर वायरल हो जाएगी। सन्देश एक अंतरराष्ट्रीय वर्चुअल नंबर से आये थे। पुलिस ने नाबालिग़ के प्रेमी के आईपी एड्रेस को ट्रैक किया, जिसने ख़ुलासा किया कि लडक़ी ने ख़ुद उसे ये तस्वीरें माँगने पर भेजी थीं।

एक अन्य मामले में 10वीं कक्षा की लडक़ी और उसके प्रेमी (कॉलेज के प्रथम वर्ष के छात्र) ने सम्भोग करते हुए अपना वीडियो शूट किया। उसके प्रेमी का मानना था कि वह उसे धोखा दे रही है। इसी प्रतिशोध से उसने यह वीडियो लडक़ी के पिता को इस सन्देश के साथ भेजा- ‘आपकी बेटी मेरे प्रति वफ़ादार नहीं है।’

लडक़ी ने उसे आईने के सामने शूट की गयी 100 से अधिक निजी तस्वीरें भेजी थीं, और वह उन्हें फेसबुक पर निजी फोटो फोल्डर में सहेजता रहा। पुलिस ने उसके सोशल मीडिया अकाउंट से सभी तस्वीरें हटा दीं और सुनिश्चित किया कि उसके पास कोई बैकअप नहीं है।

राज्य पुलिस के साइबर सेल पर साइबर अपराध की ऑनलाइन सूचना दी जा सकती है। इन्हें ष्4ड्ढद्गह्म्ष्ह्म्द्बद्वद्ग.द्दश1.द्बठ्ठ पर भी रिपोर्ट किया जा सकता है। आईटी अधिनियम-2000 में कोई विशेष प्रावधान नहीं हैं, जो विशेष रूप से महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध से निपटते हैं; जैसा कि भारतीय दण्ड संहिता, या उस मामले के लिए आपराधिक प्रक्रिया संहिता के प्रावधान हैं।

हाल में सरकार ने साइबर अपराधों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए एक रोड मैप तैयार करने के लिए एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया। समूह की सिफ़ारिशों के आधार पर सरकार द्वारा महिलाओं और बच्चों के ख़िलाफ़ साइबर अपराध (सीसीपीडब्ल्यूसी) योजना को मंज़ूरी दी गयी है। जिन अपराधों को विशेष रूप से महिलाओं के ख़िलाफ़ लक्षित किया जाता है, उन्हें साइबर-स्टॉकिंग, साइबर मानहानि, साइबर-सेक्स, अश्लील सामग्री का प्रसार और किसी के गोपनीयता डोमेन में अतिक्रमण के रूप में गिना जा सकता है; जो आजकल बहुत आम है।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा-67 प्रकाशन, प्रसारण और इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रसारित और प्रकाशित करने वाली किसी भी सामग्री को यौन रूप से स्पष्ट कार्य या आचरण को दण्डनीय बनाती है। इसका मतलब है कि भारत में साइबर पोर्नोग्राफी देखना गैर-क़ानूनी नहीं है। केवल ऐसी सामग्री को डाउनलोड करने, देखने और संग्रहित करने से कोई अपराध नहीं होता है। यह कैसा विरोधाभास है?