भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने हाल ही में थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा विवाद के संदर्भ में एक हिंदू देवता की प्रतिमा को ध्वस्त करने पर गहरी चिंता और असंतोष व्यक्त किया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जयस्वाल ने इस कृत्य को “असम्मानजनक” बताते हुए कहा कि इसने दुनिया भर में हिंदू समुदाय के अनुयायियों की भावनाओं को आहत किया है।
यह प्रतिमा, जो हिंदू समुदाय के लिए सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थी, कथित तौर पर थाईलैंड और कंबोडिया के बीच विवादित क्षेत्र में स्थित थी। सीमा विवाद वर्षों से दोनों देशों के बीच तनाव का कारण बना हुआ है, लेकिन धार्मिक प्रतीक की ध्वस्तीकरण ने स्थिति को और बढ़ा दिया है, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा हो रही है।
थाईलैंड और कंबोडिया के बीच सीमा विवाद कई दशकों से चल रहा है और यह प्रेह विज्हार मंदिर के पास स्थित एक छोटे लेकिन सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण भूमि के स्वामित्व के आसपास केंद्रित है। यह क्षेत्र, जो ऐतिहासिक दृष्टि से समृद्ध है, दोनों देशों के लिए धार्मिक महत्व रखता है, और मंदिर स्वयं हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए एक पवित्र स्थान है, खासकर शैव धर्म से जुड़े अनुयायियों के लिए।
प्रतिमा, जो भगवान शिव की एक मूर्ति मानी जाती थी, दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर का प्रतीक थी। यह प्रेह विज्हार मंदिर के आसपास के क्षेत्र में स्थित थी, जो विवाद का मुख्य केंद्र है। 2008 में विश्व न्यायालय ने कंबोडिया को मंदिर का स्वामित्व दिया, लेकिन थाईलैंड इस निर्णय का विरोध करता है और इस क्षेत्र की संप्रभुता को लेकर असहमत है।
हाल के महीनों में, सीमा पर फिर से तनाव बढ़ गया है, और दोनों देशों के बीच कूटनीतिक आदान-प्रदान और सैन्य गतिविधियाँ बढ़ी हैं। प्रतिमा का ध्वस्त होना इस बढ़ते तनाव का दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम प्रतीत होता है।
इस घटना के जवाब में, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जयस्वाल ने इस कृत्य को सांस्कृतिक सम्मान और अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन बताया। “एक धार्मिक प्रतिमा का ध्वस्त होना, विशेषकर एक इतनी महत्वपूर्ण प्रतिमा का, बेहद दुखद है। यह न केवल हिंदू समुदाय के लिए अपमानजनक है, बल्कि उन सभी लोगों के लिए भी जो आपसी सम्मान, सहिष्णुता और सांस्कृतिक धरोहर के मूल्यों में विश्वास करते हैं,” जयस्वाल ने कहा।
MEA ने थाईलैंड और कंबोडिया से अपने सीमा विवाद को शांतिपूर्वक और कूटनीतिक तरीकों से हल करने की अपील की। “हम दोनों पक्षों से आग्रह करते हैं कि वे रचनात्मक संवाद में संलग्न हों और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार शांतिपूर्ण समाधान प्राप्त करें,” जयस्वाल ने कहा। भारत का यह आह्वान कूटनीतिक समाधान और क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देने की भारत की नीति को दर्शाता है।
प्रतिमा का ध्वस्त होना हिंदू धार्मिक नेताओं और वैश्विक हिंदू समुदाय में आक्रोश का कारण बन गया है। कई लोग सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी और निराशा व्यक्त कर रहे हैं, और मजबूत कूटनीतिक हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं। कई प्रमुख हिंदू संगठन इस कृत्य की निंदा कर चुके हैं, और यह दावा किया है कि यह न केवल हिंदू धर्म का अपमान है, बल्कि आपसी सम्मान और समझ के व्यापक सिद्धांतों को भी कमजोर करता है।
“यह केवल एक धार्मिक प्रतीक पर हमला नहीं है, बल्कि उन मूल्यों पर हमला है जो शांतिपूर्ण सहअस्तित्व को बढ़ावा देते हैं,” रमैश रेड्डी, हिंदू धार्मिक अधिकारों के वकील ने कहा। “हिंदू देवता, विशेषकर भगवान शिव, न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में बहुत महत्वपूर्ण हैं, और इस कृत्य ने दुनियाभर के लाखों हिंदुओं को आहत किया है।”
भारत, अमेरिका, और ब्रिटेन जैसे देशों में हिंदू मंदिरों और सांस्कृतिक संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराने की मांग की है। कुछ ने तो प्रतिमा के पुनर्निर्माण के लिए एक वैश्विक अभियान चलाने की भी याचना की है।
हिंदू प्रतिमा के ध्वस्त होने से थाईलैंड और कंबोडिया के बीच पहले से तनावपूर्ण रिश्तों में और वृद्धि हो सकती है। हालांकि दोनों देशों ने अपने रिश्तों को शांतिपूर्ण बनाए रखने की इच्छा जताई है, लेकिन प्रेह विज्हार मंदिर और इसके आसपास के क्षेत्र पर नियंत्रण को लेकर बढ़ता तनाव कूटनीतिक चुनौतियां पैदा कर रहा है।
हाल के वर्षों में सीमा पर छोटे-छोटे संघर्ष और कूटनीतिक विवाद सामान्य रहे हैं, लेकिन इस नवीनतम घटना ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। एक पवित्र धार्मिक प्रतीक को ध्वस्त करने का कृत्य अब न केवल द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित करेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निगाहों में भी आ गया है।
आगे का रास्ता
दोनों देशों से अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से भारत, कूटनीतिक वार्ता और सैन्य टकराव के बजाय शांतिपूर्ण समाधान को प्राथमिकता देने का आह्वान कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र और दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के संगठन (ASEAN) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका अहम हो सकती है, जो शांतिपूर्ण वार्ता के लिए मंच प्रदान कर सकते हैं।
इस बीच, भारत शांति और स्थिरता की वकालत करना जारी रखे हुए है, और हिंदू समुदाय इस मुद्दे पर त्वरित और न्यायपूर्ण कार्रवाई का इंतजार कर रहा है। यह मामला सांस्कृतिक प्रतीकों और धार्मिक धरोहर का सम्मान बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण अनुस्मारक बन गया है।
बंगाल बिजनेस कॉन्क्लेव में ममता बनर्जी ने वस्तु एवं सेवा कर (GST) प्रणाली की वर्तमान स्थिति को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की, जिसे उनका मानना है कि यह छोटे और मझोले उद्योगों (MSMEs) को नुकसान पहुँचा रहा है। उन्होंने उस सलाह का जिक्र किया जिसे उन्हें जीएसटी का समर्थन करने के लिए दिया गया था, जो कभी एक सकारात्मक पहल के रूप में दिखाई देती थी।
एक हालिया पोस्ट में डॉ. अमित मित्रा, पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के प्रधान मुख्य सलाहकार और कैबिनेट मंत्री, ने ममता बनर्जी के जीएसटी के पक्ष में खड़े होने में अपनी भूमिका को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा, “2009 में मैंने उन्हें यह बताया था कि MSMEs, VAT शासन के तहत 17 अलग-अलग टैक्सों के जाल में फंसी हुई थीं, जिनमें केंद्रीय उत्पाद शुल्क, वस्त्रों पर उत्पाद शुल्क, CVD, सेवा कर, और अन्य टैक्स शामिल थे। मैंने प्रस्तावित किया कि एक एकल कर व्यवस्था, जैसे GST, MSMEs को पारदर्शी और डिजिटल रूप से सक्षम तरीके से बचा सकती है।”
MSMEs के प्रति अपनी सहानुभूति के लिए जानी जाने वाली ममता बनर्जी ने GST के पक्ष में मजबूत रुख अपनाया। हालांकि, आठ साल बाद, GST का कार्यान्वयन कई समस्याओं से जूझ रहा है। एक ऐसी सरकार, जो केवल सुर्खियों में आना चाहती थी, ने जुलाई 2017 में संसद के केंद्रीय हॉल से GST की शुरुआत की, लेकिन जिस कंप्यूटर सिस्टम की आवश्यकता थी, वह तैयार नहीं था। GST नेटवर्क को हर महीने 300 करोड़ चालानों को संसाधित करने का काम सौंपा गया था, जो कि इसे संभालने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं था। इसके परिणामस्वरूप प्रशासनिक विफलताएँ आनी शुरू हो गईं।
डॉ. मित्रा, जिन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया है, ने जीएसटी प्रशासन की मौजूदा समस्याओं को और उजागर किया। उन्होंने बताया कि इसके लागू होने के बाद से सरकार ने 955 नोटिफिकेशन, 754 सर्कुलर और 192 निर्धारित फार्म जारी किए हैं। इसके अतिरिक्त, CGST अधिनियम में 86 संशोधन और CGST के नियमों में 147 संशोधन किए गए हैं। भारत सरकार के अनुसार, 2 लाख करोड़ रुपये से अधिक का धोखाधड़ी रिपोर्ट की गई है, जो सरकारी संसाधनों को नुकसान पहुँचा रही है।
डॉ. मित्रा ने निष्कर्ष निकाला, “ऑक्टोपस के पंजे फिर से लौट आए हैं, जो MSMEs को एक बार फिर से जकड़ रहे हैं, इस बार एक अक्षम, निर्लज्ज और नकारा केंद्रीय सरकार की वजह से। अब आप समझ सकते हैं कि ममता बनर्जी जीएसटी के बारे में इतनी चिंतित क्यों हैं, जो हमारे देश की 92% व्यापारों का प्रतिनिधित्व करने वाले MSMEs को धीरे-धीरे नष्ट कर रहा है।”
केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने आज हरियाणा के पंचकूला में कृषक भारती कोऑपरेटिव लिमिटेड (कृभको) द्वारा ‘सतत कृषि में सहकारिता की भूमिका’ विषय पर आयोजित सहकारी सम्मेलन को संबोधित किया। इस अवसर पर हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, केन्द्रीय सहकारिता राज्य मंत्री कृष्ण पाल गुर्जर, केन्द्रीय सहकारिता सचिव डॉ. आशीष भूटानी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि इतिहास, धर्म, अध्यात्म और परंपराओं से जुड़ा हरियाणा आज धीरे-धीरे कृषि और सहकारिता के सहयोग से किसानों की समृद्धि के नए आयाम लिख रहा है। उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष के अवसर पर कृभको द्वारा आयोजित इस सेमिनार में मिल्क चिलिंग सेंटर, HAFED का आटा मिल, RuPay प्लेटिनम कार्ड, मॉडल पैक्स का पंजीकरण और सहकारिता वर्ष का पोर्टल, जो पूरे देश की सहकारिता से जुड़ी सूचनाएं सहकारिता से जुड़े सभी किसानों तक पहुंचाएगा, का लोकार्पण किया गया।
अमित शाह ने कहा कि देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। उन्होंने कहा कि हमारी आबादी के एक बड़े हिस्से का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष जीवन-यापन खेती, किसानी तथा पशुपालन पर आधारित होता है। उन्होंने कहा कि यदि हम कृषि और पशुपालन को स्वतंत्र व्यवसाय के रूप में देखें, तो ये क्षेत्र बहुत सारे लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं। श्री शाह ने कहा कि देश में सबसे अधिक रोजगार यदि किन्हीं दो क्षेत्रों में सृजित होता है, तो वह कृषि और पशुपालन से ही होता है। लेकिन जब हम कृषि और पशुपालन को सहकारिता से जोड़ते हैं, तो यह करोड़ों लोगों को न केवल रोजगार उपलब्ध कराने का काम करता है, बल्कि उन्हें समृद्ध बनाने में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।
केन्द्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि गुजरात में आज अमूल 36 लाख महिला दुग्ध उत्पादकों को हर साल लगभग 90 हजार करोड़ रुपए वितरित करती है। यदि हम उतने ही दूध को बाजार मूल्य पर बेचें, तो वह मात्र 12 हजार करोड़ रुपए में बिकता। उन्होंने कहा कि इस 12 हजार करोड़ और 90 हजार करोड़ रुपए के बीच का जो अंतर है, वही सहकारिता की ताकत है। इसीलिए कहा जाता है कि पशुपालन, कृषि और सहकारिता—इन तीनों को जोड़कर ‘सहकार से समृद्धि’ का सृजन किया जा सकता है। शाह ने कहा कि हमने हमेशा कृषि और पशुपालन को केवल रोजगार की दृष्टि से देखा है, लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने केन्द्र में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना करके ‘सहकार से समृद्धि’ का एक नया मंत्र दिया। उन्होंने कहा कि अब रोजगार के साथ-साथ समृद्धि को भी जोड़ने का काम किया जा रहा है।
शाह ने कहा कि मोदी जी ने अपनी सरकार आने के बाद कृषि के आधार को मजबूत किया और सहकारिता के माध्यम से मजबूत की गई कृषि को किसानों को समृद्ध बनाने के लिए उपयोग किया। उन्होंने कहा कि कम पानी, कम केमिकल और कम जोखिम नई कृषि नीति की नींव है। इसमें वैज्ञानिक तरीके से सिंचाई करके कम पानी में ज्यादा फसल प्राप्त करना, प्राकृतिक खेती के माध्यम से उर्वरकों का उपयोग कम करना, तथा मिट्टी के परीक्षण से न्यूनतम जोखिम वाली फसलों का चयन करना शामिल है। उन्होंने कहा कि मिट्टी की सेहत (soil health), जल सुरक्षा (water security), संस्थागत ऋण (institutional credit), बाजार पहुंच (market access), उत्पाद का प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग, इन सभी माध्यमों से किसान की आय बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। साथ ही, धीरे-धीरे सब्सिडी पर निर्भर कृषि की जगह सस्टेनेबल फार्मिंग की दिशा में आगे बढ़ना होगा, जो सतत मुनाफा बढ़ाने वाली हो। उन्होंने कहा कि इसके लिए हमने जल और मिट्टी की सुरक्षा, उनका परीक्षण, ऑर्गेनिक फार्मिंग, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने वाली खेती, डिजिटल कृषि मिशन और सहकारिता—इन सभी वर्टिकल्स को आगे बढ़ाने का काम किया है।
केन्द्रीय सहकारिता मंत्री ने कहा कि 2014 में जब मोदी जी प्रधानमंत्री बने, तब देश का कृषि बजट 22 हजार करोड़ रुपए था, जिसे हमारी सरकार ने बढ़ाकर 1 लाख 27 हजार करोड़ रुपए करने का काम किया है। ग्रामीण विकास का बजट 80 हजार करोड़ रुपए था, जो अब बढ़कर 1 लाख 87 हजार करोड़ रुपए किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि आज कोई सरपंच ऐसा नहीं है, और हरियाणा में तो बिल्कुल भी नहीं, जिसे पिछले 10 साल में 10 करोड़, 20 करोड़ या 25 करोड़ रुपए गांव के विकास के लिए न मिले हों। यह विकास के दृष्टिकोण में बहुत बड़ा परिवर्तन आया है।श्री शाह ने कहा कि फसल बीमा को ज्यादा उपयोगी बनाया गया है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के माध्यम से हर किसान को हर साल 6 हजार रुपए दिए जा रहे हैं। एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड में 1 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया। e-NAM के माध्यम से किसानों को उचित दाम मिल रहे हैं। श्री अन्न मिशन, दलहन-तिलहन मिशन, डेयरी सेक्टर की चक्रीय व्यवस्था—इनके अलावा कई प्रकार के इनिशिएटिव्स लिए गए हैं। उन्होंने कहा कि लगभग 1 लाख करोड़ रुपए (जो योजना पूर्ण होते-होते 93 हजार करोड़ से बढ़कर 1 लाख करोड़ की हो जाएगी) के माध्यम से पिछले 10 साल में 1 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि को सिंचित करने का काम भी आगे बढ़ाया गया है। उन्होंने कहा कि ढेर सारी पहल करके कृषि क्षेत्र को मजबूत किया गया है। उन्होंने कहा कि सहकारिता मंत्रालय की स्थापना इसलिए की गई ताकि कृषि और पशुपालन के माध्यम से किसान द्वारा पैदा की जाने वाली उपज का पूरा मुनाफा किसान तक पहुँच सके।
अमित शाह ने कहा कि हमने प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS) के लिए मॉडल बायलॉज़ तैयार किए हैं, तथा मल्टीपर्पस PACS के प्रमाण-पत्र किसानों को दिए हैं। उन्होंने कहा कि हमने उर्वरक वितरण, कीटनाशक वितरण, कृषि उत्पादों की सफाई, ग्रेडिंग, मार्केटिंग, दवाइयों की दुकान, पेट्रोल पंप, गैस एजेंसी, पानी का वितरण—इन सभी सेवाओं को PACS के साथ जोड़ने का काम किया है। लगभग 30 अलग-अलग आयामों को PACS के साथ जोड़कर हमने PACS को मजबूत बनाया है। शाह ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर तीन मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ बनाए गए हैं, जिनमें एक किसानों की उपज को एक्सपोर्ट करने के लिए (National Cooperative Exports Limited – NCEL), एक ऑर्गेनिक उत्पादों की मार्केटिंग और प्रमाणीकरण के लिए (National Cooperative Organics Limited – NCOL), और एक बीज के उत्पादन, प्रोक्योरमेंट और वितरण के लिए (Bharatiya Beej Sahkari Samiti Limited – BBSSL) है। उन्होंने कहा कि इन पहलों के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने की मजबूत नींव डाली गई है।
केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि जब अमूल की स्थापना हुई थी, तब वह रोजाना मात्र 2 हजार लीटर दूध इकट्ठा करता था। आज यह देशभर में कई करोड़ लीटर (लगभग 3 करोड़ लीटर प्रतिदिन) दूध इकट्ठा करता है और इसका टर्नओवर लगभग 1 लाख 23 हजार करोड़ रुपए है। श्री शाह ने विश्वास जताया कि 15 साल बाद इस देश में अमूल जैसी कम से कम 20 संस्थाएं खड़ी होंगी, जो किसानों के लिए काम करने वाली मजबूत सहकारी संस्थाएं होंगी। उन्होंने कहा कि हरियाणा सरकार ने गन्ना किसानों को सबसे अधिक दाम देने का काम किया है और नायब सिंह सैनी सरकार ने हरियाणा के किसानों को खुशहाल बना दिया है, जो सबसे बड़ी उपलब्धि है।
अमित शाह ने कहा कि देश में कई कंपनियां टैक्सी परिचालन का काम करती हैं, लेकिन उनमें मुनाफा ड्राइवर के पास नहीं, बल्कि मालिक के पास जाता है। उन्होंने कहा कि सहकारिता मंत्रालय की पहलों के तहत हम एक-दो महीने में ही ‘भारत’ टैक्सी लॉन्च करेंगे, जिसका एक-एक आना मुनाफा हमारे ड्राइवर भाइयों के पास जाएगा।इससे हमारे ड्राइवर भाइयों के लिए रोजगार की कई नई संभावनाएँ खुलेंगी। उन्हें बीमा की व्यवस्था मिलेगी, उनकी टैक्सी पर एडवर्टाइजमेंट की व्यवस्था होगी और सारा मुनाफा अंततः उनके पास ही जाएगा। इससे ग्राहक की सुविधा भी बढ़ेगी और टैक्सी ड्राइवर भी समृद्ध होगा। उन्होंने कहा कि ‘भारत’ सहकारिता टैक्सी जल्द ही लॉन्च होने वाली है। श्री शाह ने विश्वास जताया कि देखते-देखते यह भारत की नंबर 1 टैक्सी परिचालन कंपनी बन जाएगी।
अरावली के पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील हिस्सों में निर्माण की अनुमति देने और ऊंचाई के आधार पर सीमाओं को पुनर्परिभाषित करने के फैसले ने व्यापक आक्रोश को जन्म दिया है। हैशटैग #SaveAravalli तेजी से सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा, जब हजारों कार्यकर्ताओं, नागरिकों और वकीलों ने इसका विरोध किया।
डिजिटल अभियान सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर बाढ़ की तरह आ गए, जहां याचिकाएं और इंफोग्राफिक्स के जरिए सरकार से इस निर्णय को वापस लेने और अरावली की सुरक्षा की अपील की जा रही थी। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ एक पर्वत श्रृंखला के बारे में नहीं है; यह भारत के पर्यावरणीय भविष्य की सुरक्षा के बारे में है। एक गैर सरकारी संगठन-Change.org ने भी इस संबंध में एक हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है।
फैसले के आलोचक चेतावनी दे रहे हैं कि इससे बड़े इलाकों से कानूनी सुरक्षा छिन जाएगी, जिससे शहरीकरण, खनन और वनों की कटाई का रास्ता खुलेगा। इस तरह का बिना नियंत्रण के विकास अरावली के प्राकृतिक सामंजस्य पर निर्भर नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को खतरे में डाल सकता है।
पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने इस फैसले के विनाशकारी परिणामों को लेकर चिंता जताई है। डॉ. प्रिया मेहता, जो अरावली पर दो दशकों तक शोध कर चुकी हैं, कहती हैं, “हम सिर्फ पहाड़ों की बात नहीं कर रहे हैं; हम एक अनमोल पारिस्थितिकी तंत्र की बात कर रहे हैं। अरावली खोने का मतलब है कि हम भारत के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक में मरुस्थलीकरण और जलवायु परिवर्तन से लड़ने की अपनी क्षमता खो देंगे।”
स्थानीय समुदायों, जिनमें से कई अरावली पर निर्भर हैं, ने भी इन चिंताओं को व्यक्त किया है। हरियाणा के किसान जी. एस. गुलाटी कहते हैं, “अरावली हमारी जीवनरेखा है। अगर ये नष्ट हो जाती हैं, तो हम सब कुछ खो देंगे।”
वृद्धि होती हुई संकट के मद्देनजर, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेन्द्र यादव ने राजस्थान के उदयपुर में एक कार्यशाला का उद्घाटन किया, जिसका उद्देश्य अरावली की पुनर्स्थापना के लिए रणनीतियाँ तैयार करना था। इस कार्यशाला में पारिस्थितिकी पुनर्स्थापना, समुदाय की भागीदारी और सतत आजीविका पर जोर दिया गया, जिसका उद्देश्य स्थानीय समुदायों को पारिस्थितिकी पुनर्स्थापना प्रयासों में शामिल करना और इको-टूरिज़्म और एग्रोफॉरेस्ट्री जैसे सतत प्रथाओं को बढ़ावा देना था।
जबकि पर्यावरणविद और स्थानीय समुदाय अरावली को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, कुछ सरकारी और विकास समर्थक यह तर्क देते हैं कि शहरीकरण और खनन आर्थिक विकास के लिए जरूरी हैं। उनका कहना है कि इस क्षेत्र के संसाधनों का दोहन रोजगार पैदा कर सकता है और आधारभूत संरचना के विकास को उत्तेजित कर सकता है। हालांकि, आलोचक इसे एक संकीर्ण दृष्टिकोण मानते हैं, जो तत्काल आर्थिक लाभ को दीर्घकालिक पारिस्थितिकी स्थिरता से ऊपर प्राथमिकता देता है। पर्यावरणीय वकील आर्व गु्प्ता चेतावनी देते हैं, “एक बार अगर अरावली चली गई, तो वह हमेशा के लिए चली जाएगी। इसके विनाश की कीमत किसी भी अस्थायी आर्थिक लाभ से ज्यादा होगी।”
अरावली सिर्फ संसाधनों का स्रोत नहीं हैं; वे एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी सुरक्षा कवच हैं, जिसने एक अरब वर्षों से अधिक समय तक उत्तर-पश्चिम भारत की जलवायु और पारिस्थितिकी को आकार दिया है। ये पहाड़ महत्वपूर्ण सेवाएं प्रदान करते हैं—जैसे मरुस्थलीकरण को रोकना, भूजल को पुनः भरे रखना, और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को विषैला वायु प्रदूषण से बचाना। कई पीढ़ियों से, स्थानीय समुदाय इस नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के साथ फल-फूल रहे हैं। इसका नष्ट होना विनाशकारी परिणामों का कारण बनेगा।
अरावली का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है, लेकिन उन्हें बचाने की यह आंदोलन बढ़ती हुई गति के साथ जारी है। प्रदर्शन, याचिकाएं और कानूनी चुनौतियाँ नवीनीकरण के साथ आगे बढ़ रही हैं। बढ़ते हुए जन समर्थन और वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ, अरावली के संरक्षक इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी स्वास्थ्य को बचाने के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।
एक ऐसे कदम में, जिसने जिज्ञासा के साथ-साथ संदेह भी पैदा किया है, सरकार ने लोकप्रिय MGNREGA (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) के स्थान पर G-RAM-G विधेयक पेश किया है। भले ही नाम में बदलाव सतही लगे, लेकिन इसके पीछे का परिवर्तन काफी गहरा है।
Tehelka द्वारा G-RAM-G विधेयक के विवरण में जाने से पहले, यह समझना जरूरी है कि MGNREGA का महत्व क्या रहा है, जो 2005 में शुरू होने के बाद से भारत की ग्रामीण विकास रणनीति का एक अहम हिस्सा रहा है। MGNREGA का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को प्रति वर्ष कम से कम 100 दिनों का मजदूरी-आधारित रोजगार सुनिश्चित करना था, ताकि गरीबी कम हो और ग्रामीण अवसंरचना को मजबूती मिले।
MGNREGA की प्रमुख विशेषताएँ:
रोजगार की गारंटी: MGNREGA ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति परिवार 100 दिनों के काम की गारंटी देता है। यह अपने समय में क्रांतिकारी था, क्योंकि इससे खासकर कृषि के गैर-मौसमी समय में ग्रामीण गरीबों को आय का सुरक्षा जाल मिला।
ग्रामीण अवसंरचना पर फोकस: इस कार्यक्रम के तहत हजारों किलोमीटर ग्रामीण सड़कों, सिंचाई प्रणालियों और जल संरक्षण परियोजनाओं का निर्माण हुआ। इसमें समुदाय-आधारित परियोजनाओं को बढ़ावा मिला, जिन्हें अक्सर स्थानीय ग्रामीणों द्वारा ही डिज़ाइन किया जाता था।
विकेन्द्रीकृत क्रियान्वयन: MGNREGA की एक बड़ी खासियत इसका विकेन्द्रीकरण था। पंचायतों जैसे स्थानीय निकायों को परियोजनाओं की योजना और क्रियान्वयन में भूमिका दी गई, जिससे कार्यक्रम अधिक स्थानीय और जरूरत-आधारित बना।
मजदूरी भुगतान: भुगतान अक्सर सीधे बैंक खातों में किया जाता था, ताकि पारदर्शिता बढ़े और भ्रष्टाचार कम हो। हालांकि, भुगतान में देरी और धन वितरण में अक्षमता इसकी आम आलोचनाएँ रहीं।
गरीबी कम करने और ग्रामीण अवसंरचना बनाने में सफलता के बावजूद, MGNREGA में कई समस्याएँ भी रहीं। मजदूरी भुगतान में देरी, भ्रष्टाचार और धन के दुरुपयोग जैसी चुनौतियाँ बनी रहीं। इसके अलावा, यह कार्यक्रम कौशल विकास या दीर्घकालिक टिकाऊ आर्थिक वृद्धि प्रदान करने में सीमित माना गया। इन्हीं कमियों ने संभवतः G-RAM-G ढांचे की ओर बदलाव को प्रेरित किया।
G-RAM-G विधेयक:
G-RAM-G विधेयक, MGNREGA से कुछ समानताएँ रखते हुए भी, ग्रामीण रोजगार और विकास में नए आयाम जोड़ता है। इसका नाम ही प्रतीकात्मक है—महात्मा गांधी से जुड़ी ग्रामीण कल्याण की पहचान से हटकर “RAM” की ओर, जो Rural Agricultural and Manufacturing Growth (ग्रामीण कृषि एवं विनिर्माण वृद्धि) का संक्षिप्त रूप है। RAM का समावेश केवल रोजगार नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्थाएँ बनाने की व्यापक सोच को दर्शाता है।
G-RAM-G विधेयक की प्रमुख विशेषताएँ:
व्यापक आर्थिक दृष्टिकोण: MGNREGA के विपरीत, जो मुख्यतः श्रम-आधारित रोजगार पर केंद्रित था, G-RAM-G कृषि और विनिर्माण को जोड़ते हुए समग्र आर्थिक विकास पर जोर देता है। यह “आत्मनिर्भर भारत” की परिकल्पना के अनुरूप है।
कौशल-आधारित रोजगार: इसमें कौशल विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है। कृषि-तकनीक, मशीन संचालन और डिजिटल साक्षरता जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण देकर ग्रामीण श्रमिकों को विविध क्षेत्रों में रोजगार योग्य बनाने का लक्ष्य है।
प्रौद्योगिकी का एकीकरण: ड्रोन, सैटेलाइट मैपिंग और मोबाइल ऐप्स जैसी तकनीकों के उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा, ताकि उत्पादकता बढ़े, संसाधनों का बेहतर प्रबंधन हो और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके।
निजी क्षेत्र की भागीदारी: जहाँ MGNREGA मुख्यतः सरकारी पहल थी, वहीं G-RAM-G में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को प्रोत्साहित किया गया है। इससे बेहतर अवसंरचना और दीर्घकालिक रोजगार के अवसर बन सकते हैं।
ग्रामीण उद्यमिता: केवल मजदूरी रोजगार के बजाय, ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा दिया जाएगा। कम ब्याज वाले ऋण और अनुदान देकर छोटे व्यवसायों, स्थानीय विनिर्माण और कृषि-स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन मिलेगा।
सततता और हरित पहल: जैविक खेती, नवीकरणीय ऊर्जा और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को बढ़ावा देकर टिकाऊ विकास पर जोर दिया गया है।
बढ़ा हुआ वित्तीय प्रबंधन और निगरानी: G-RAM-G के तहत अधिक धन आवंटन का वादा किया गया है, साथ ही तकनीक-आधारित निगरानी से धन के दुरुपयोग को रोकने का लक्ष्य है।
प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन: यदि स्थानीय निकाय और समुदाय तय लक्ष्यों को हासिल करते हैं, तो उन्हें अतिरिक्त धन या अनुदान के रूप में प्रोत्साहन मिलेगा।
G-RAM-G बनाम MGNREGA: तुलनात्मक विश्लेषण
रोजगार की प्रकृति: MGNREGA मुख्यतः अस्थायी मजदूरी रोजगार पर केंद्रित था, जबकि G-RAM-G कौशल-आधारित और टिकाऊ रोजगार को बढ़ावा देता है।
प्रौद्योगिकी की भूमिका: G-RAM-G में AI, ड्रोन और डिजिटल प्लेटफॉर्म का व्यापक उपयोग प्रस्तावित है, जो ग्रामीण परियोजनाओं के क्रियान्वयन को बदल सकता है।
दीर्घकालिक आर्थिक लक्ष्य: MGNREGA तत्काल राहत पर केंद्रित था, जबकि G-RAM-G दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता और आर्थिक विकास को लक्ष्य बनाता है।
निजी क्षेत्र और उद्यमिता: G-RAM-G निजी क्षेत्र की भागीदारी और ग्रामीण उद्यमिता को अधिक महत्व देता है, जबकि MGNREGA अधिक सरकारी-केंद्रित था।
वित्तपोषण और दक्षता: G-RAM-G में कड़े वित्तीय नियंत्रण और प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन से दक्षता बढ़ने की उम्मीद है।
निष्कर्ष (Crux):
MGNREGA से G-RAM-G की ओर बदलाव भारत के ग्रामीण रोजगार और विकास दृष्टिकोण में एक निर्णायक मोड़ है। कौशल विकास, उद्यमिता और प्रौद्योगिकी पर ध्यान देकर G-RAM-G ग्रामीण भारत को टिकाऊ विकास के केंद्र में बदलने का लक्ष्य रखता है।
हालाँकि, इस महत्वाकांक्षी योजना का सफल क्रियान्वयन एक बड़ी चुनौती होगा। इसकी सफलता स्थानीय क्षमताओं, नई तकनीकों को अपनाने की इच्छा और प्रभावी सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर निर्भर करेगी।
संक्षेप में, जहाँ MGNREGA को ग्रामीण कल्याण की एक ऐतिहासिक पहल के रूप में याद किया जाएगा, वहीं G-RAM-G एक साहसिक नई दिशा प्रस्तुत करता है। यह ग्रामीण गरीबी और आत्मनिर्भरता के बीच की खाई को पाटने का वादा करता है—लेकिन यह देखना बाकी है कि क्या यह अपने ऊँचे लक्ष्यों पर खरा उतर पाएगा।
असम के होजाई ज़िले में 20 दिसंबर की तड़के एक दर्दनाक हादसे में राजधानी एक्सप्रेस से टकराकर 7 हाथियों की मौत हो गई, जबकि एक हाथी गंभीर रूप से घायल हो गया। हादसे के बाद ट्रेन का इंजन समेत पाँच डिब्बे पटरी से उतर गए। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।
यह दुर्घटना नागांव ज़िले के पास रेलवे ट्रैक पर उस समय हुई जब हाथियों का एक झुंड ट्रैक पार कर रहा था। ट्रेन नई दिल्ली से गुवाहाटी जा रही थी और तेज़ रफ्तार के कारण समय रहते नहीं रुक सकी। लोको पायलट द्वारा आपातकालीन ब्रेक लगाए जाने के बावजूद टक्कर टाली नहीं जा सकी।
वन विभाग के अनुसार, मृत हाथी एक बड़े झुंड का हिस्सा थे जो रात के समय भोजन और पानी की तलाश में इस क्षेत्र से गुजर रहे थे। यह इलाका हाथियों के पारंपरिक प्रवास मार्ग के रूप में जाना जाता है।
असम के वन मंत्री प्रफुल्ल कुमार महंता ने घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि यह हादसा वन्यजीवों और बढ़ते बुनियादी ढाँचे के बीच बढ़ते संघर्ष को दर्शाता है। उन्होंने वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा और रेल मार्गों पर विशेष सतर्कता की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
इस घटना के बाद पर्यावरणविदों और वन्यजीव संरक्षण संगठनों ने रेलवे मार्गों पर सुरक्षा उपायों को और सख्त करने की मांग की है। विशेषज्ञों का कहना है कि संवेदनशील इलाकों में ट्रेन की गति सीमा तय करना और चेतावनी प्रणालियाँ लगाना आवश्यक है।
असम वन विभाग ने मामले की जाँच के आदेश दे दिए हैं और यह देखा जा रहा है कि क्या ट्रेन निर्धारित गति सीमा के भीतर चल रही थी। विभाग ने हाथियों की सुरक्षा के लिए रेलवे ट्रैकों के पास चेतावनी बोर्ड लगाने और प्रवास मार्गों पर निगरानी बढ़ाने की बात कही है।
रेलवे अधिकारियों ने भी घटना पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
गौरतलब है कि असम में लगभग 5,000 जंगली हाथी पाए जाते हैं, लेकिन आवास ह्रास और मानव–वन्यजीव संघर्ष के कारण उनकी संख्या लगातार खतरे में है। यह हादसा राज्य में वन्यजीव संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।
भारत का घरेलू विमानन क्षेत्र गंभीर उथल-पुथल से गुजर रहा है, और इसकी कीमत सिर्फ यात्री ही नहीं चुका रहे हैं। देश की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो में हालिया अव्यवस्था ने संचालन योजना, नियामकीय निगरानी और बाजार संरचना में मौजूद गहरी खामियों को उजागर कर दिया है।
हर दिन सैकड़ों उड़ानें रद्द की जा रही हैं, जिससे हजारों यात्री फंस गए हैं। लोग री-बुकिंग के लिए भटक रहे हैं और उनकी छुट्टियां, कारोबारी यात्राएं, यहां तक कि मेडिकल इमरजेंसी तक प्रभावित हो रही हैं। असर सिर्फ उड़ानों तक सीमित नहीं है।होटल बुकिंग छूटना, घंटों का नुकसान और बिगड़ी हुई योजनाएं पूरे सिस्टम की विफलता की तस्वीर पेश करती हैं।
एयरलाइन का यह कहना कि हालात “गलत आकलन और योजना की कमी” के कारण बने, पर्याप्त नहीं है। असली वजह इंडिगो की रणनीतिक चूक और नियामक की ढुलमुल प्रतिक्रिया का मेल है।
फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (FDTL) नियम, जिन्हें जुलाई से चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया और 1 नवंबर 2025 से पूरी तरह प्रभावी किया गया, पायलटों की थकान कम करने के उद्देश्य से बनाए गए थे। इनमें साप्ताहिक विश्राम अवधि बढ़ाना, रात के समय लैंडिंग की सीमा तय करना और नाइट फ्लाइंग आवर्स पर रोक शामिल है। घने घरेलू नेटवर्क और बड़ी संख्या में नाइट व रेड-आई उड़ानें संचालित करने वाली एयरलाइन के लिए इन बदलावों के असर का पूर्वानुमान लगाना कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता थी।
हकीकत यह है कि इंडिगो के पास आवश्यक संख्या में क्रू उपलब्ध नहीं था। DGCA के सामने पेश आंकड़ों के मुताबिक, स्थिर संचालन के लिए एयरलाइन को 2,422 कैप्टन और 2,153 फर्स्ट ऑफिसर की जरूरत थी, जबकि उपलब्धता सिर्फ 2,357 कैप्टन और 2,194 फर्स्ट ऑफिसर की थी। हाई-फ्रीक्वेंसी नेटवर्क में ऐसे छोटे अंतर भी डोमिनो इफेक्ट की तरह कई रूट्स पर उड़ानें रद्द होने का कारण बन जाते हैं। स्पष्ट संकेतों के बावजूद इंडिगो की तैयारी नाकाफी रही, नतीजतन हालात बेकाबू हो गए।
नियामक की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। बढ़ते जनदबाव के बीच DGCA ने FDTL नियमों में अस्थायी ढील दे दी। भले ही इसका उद्देश्य परिचालन बहाल करना रहा हो, लेकिन यह फैसला उन्हीं सुरक्षा मानकों को कमजोर करता है जिनके लिए ये नियम बनाए गए थे। पायलट संगठनों ने इसे क्रू वेलफेयर और उड़ान सुरक्षा से समझौता बताते हुए कड़ा विरोध किया है। यह स्थिति दिखाती है कि परिचालन निरंतरता और सुरक्षा अनुपालन के बीच संतुलन बनाए रखना नियामक के लिए कितना नाजुक कार्य है।
इस अव्यवस्था की मानवीय कीमत बेहद भारी रही है।त्योहारी मौसम में फंसे परिवार, यात्रा में जूझते बुजुर्ग, तबादले के बीच देरी झेलते रक्षा कर्मी और बाधित कारोबारी प्रतिबद्धताएं। विडंबना यह है कि अंतरराष्ट्रीय उड़ानें—जो कुल रद्दीकरण का छोटा हिस्सा थीं।काफी हद तक अप्रभावित रहीं, क्योंकि वहां राजस्व अधिक है और मुआवजे के नियम सख्त हैं। यह घरेलू यात्रियों की तुलना में मुनाफे को प्राथमिकता दिए जाने की ओर इशारा करता है।
सबक साफ हैं। इंडिगो को अपनी कुप्रबंधन की जिम्मेदारी लेनी होगी और DGCA को सुरक्षा मानकों की कीमत पर जनदबाव या कॉरपोरेट दबाव के आगे झुकना नहीं चाहिए। भारतीय हवाई यात्रियों को मजबूत मुआवजा अधिकार, पारदर्शी संवाद और बिना किसी पक्षपात के नियम लागू करने वाला नियामक चाहिए। परिचालन दक्षता, सुरक्षा और भरोसे की कीमत पर नहीं आ सकती। हालिया अव्यवस्था एक कड़ा संदेश है।विमानन में, और जीवन में भी, योजना और निगरानी में की गई शॉर्टकट्स के असर रनवे से बहुत आगे तक जाते हैं।
जहां तहलका की कवर स्टोरी यह उजागर करती है कि इंडिगो संकट ने भारत की टूटी-फूटी विमानन शासन व्यवस्था को कैसे बेनकाब किया, वहीं हमारी जांच रिपोर्ट चुनाव सुधारों से जुड़े स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की प्रक्रियागत बाधाओं पर से भी परदा उठाती है।
हालिया चर्चित मामला भारतीय महिला क्रिकेट टीम की उपकप्तान स्मृति मंधाना और इंदौर स्थित संगीतकार पलाश मुच्छल की शादी के अचानक रद्द होने का है। बहुप्रतीक्षित विवाह समारोह से कुछ ही दिन पहले यह रिश्ता टूट गया, जिससे प्रशंसक और मीडिया दोनों स्तब्ध रह गए। भारतीय संस्कृति में जहाँ आख़िरी समय पर शादी टूटना कभी दुर्लभ माना जाता था, अब यह घटनाएँ लगातार बढ़ रही हैं।
हर मामले के कारण अलग हो सकते हैं, लेकिन एक साझा कड़ी स्पष्ट रूप से सामने आई है—निजी रिश्तों और सार्वजनिक जीवन पर सोशल मीडिया का गहरा प्रभाव। यह लेख भारत और विदेशों में शादियाँ रद्द होने के कारणों की पड़ताल करता है और बताता है कि सोशल मीडिया, बदलते सामाजिक मूल्य और व्यक्तिगत आकांक्षाएँ इस बढ़ती प्रवृत्ति को कैसे आकार दे रही हैं।
सेलेब्रिटी रिश्ते और सोशल मीडिया का दबाव
किम कार्दशियन और कान्ये वेस्ट का तलाक़ इस बात का बड़ा उदाहरण है कि सोशल मीडिया किसी सेलेब्रिटी विवाह को किस तरह प्रभावित कर सकता है। कान्ये के विवादास्पद ट्वीट्स—जिनमें उनके वैवाहिक जीवन से जुड़ी निजी बातें भी शामिल थीं—ने रिश्ते पर सार्वजनिक दबाव बढ़ाया। किम के परिवार पर हमले और निजी मुद्दों का सार्वजनिक मंच पर आना, उनके अलगाव की वजहों में शामिल माना जाता है। सोशल मीडिया द्वारा पोषित निरंतर मीडिया कवरेज ने इस तनाव को और गहरा किया।
इसी तरह एंबर हर्ड और जॉनी डेप का तलाक़ सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोपों से भरा रहा। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर दोनों पक्षों ने अपनी बात रखने और समर्थन जुटाने की कोशिश की। #MeToo आंदोलन भी इस विवाद का हिस्सा बना। सोशल मीडिया और मीडिया ट्रायल ने रिश्ते की विषाक्तता को और बढ़ाया और विवाह टूटने में अहम भूमिका निभाई।
जस्टिन बीबर और हैली बाल्डविन का रिश्ता भी बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया के ज़रिये सार्वजनिक हुआ। जल्दबाज़ी में हुई सगाई और शादी के बाद उन्हें भारी आलोचना और अटकलों का सामना करना पड़ा। हर छोटी बात पर ऑनलाइन टिप्पणियाँ और अफ़वाहें उनके रिश्ते पर दबाव बनाती रहीं। हालाँकि दोनों ने सोशल मीडिया पर अपने रिश्ते का बचाव किया, लेकिन सार्वजनिक निगरानी ने उनके वैवाहिक जीवन पर तनाव ज़रूर डाला।
इसी तरह, ब्रैड पिट और जेनिफ़र एनिस्टन का अलगाव भी मीडिया की अत्यधिक दिलचस्पी से आंशिक रूप से प्रभावित माना गया। 2000 के दशक में “परफ़ेक्ट कपल” कहे जाने वाले इस जोड़े पर हर कदम पर नज़र रखी जाती थी, जिसने रिश्ते पर भारी दबाव डाला।
सोशल मीडिया की भूमिका
सोशल मीडिया ने लोगों के संवाद, जीवन साझा करने और रिश्ते बनाने के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। इंस्टाग्राम, फ़ेसबुक, ट्विटर और अब टिकटॉक जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स ने निजी जीवन को सार्वजनिक प्रदर्शन में बदल दिया है। संवाद आसान हुआ है, लेकिन रिश्तों पर दबाव भी कई गुना बढ़ गया है।
आज कई लोग ऑनलाइन “परफ़ेक्ट लाइफ़” दिखाने की होड़ में अवास्तविक अपेक्षाएँ पाल लेते हैं—ख़ासकर रिश्तों और शादियों को लेकर। शादी, जो परंपरागत रूप से जीवन का सबसे निजी और महत्वपूर्ण क्षण होती थी, अब एक सोशल मीडिया स्पेक्टेकल बन गई है—जहाँ हर रस्म, हर पोशाक और हर पल सार्वजनिक मूल्यांकन के दायरे में आ जाता है।
स्मृति मंधाना और पलाश मुच्छल के मामले में भी सोशल मीडिया पर मतभेदों और असंगति की अफ़वाहें फैलती रहीं। एक बार कुछ ऑनलाइन आ गया, तो वह तेज़ी से नियंत्रण से बाहर हो सकता है। नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ तनाव बढ़ाती हैं, जो कभी-कभी रिश्ता टूटने या शादी रद्द होने का कारण बन जाती हैं।
सार्वजनिक आलोचना का डर और आदर्श विवाह की छवि में फिट होने का दबाव आज शादियाँ टूटने की बड़ी वजह बन चुका है।
इसके अलावा, सोशल मीडिया तुलना की प्रवृत्ति को भी बढ़ाता है। लोग अपनी ज़िंदगी की तुलना दूसरों की फ़िल्टर-लगी, सजाई हुई ज़िंदगी से करने लगते हैं। जहाँ परिवार और समाज की भूमिका पहले से ही अहम होती है, वहाँ ऑनलाइन राय और टिप्पणियाँ चिंता और असमंजस को और गहरा कर देती हैं।
शादी को लेकर बदलती सोच और अपेक्षाएँ
ऐतिहासिक रूप से भारत में विवाह को एक पवित्र संस्था माना गया है। लंबे समय तक अरेंज मैरिज प्रमुख मॉडल रहा, जहाँ परिवार जीवनसाथी चुनने में मुख्य भूमिका निभाता था। लेकिन समय के साथ लव मैरिज, डेटिंग ऐप्स और व्यक्तिगत पसंद को सामाजिक स्वीकृति मिलने लगी है।
आज कई युवा जाति, धर्म या पारिवारिक पृष्ठभूमि से ज़्यादा अनुकूलता, समान सोच और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्व देते हैं। इस बदलाव के कारण कई लोग आख़िरी समय पर यह महसूस करते हैं कि वे सही निर्णय नहीं ले रहे हैं।
इसके साथ ही “ज़िंदगी भर का साथ” जैसी अवधारणा पर भी सवाल उठ रहे हैं। बदलते करियर, महत्वाकांक्षाएँ और व्यक्तिगत लक्ष्य लोगों को विवाह पर पुनर्विचार करने को मजबूर कर रहे हैं। ख़ासकर युवा महिलाएँ अब शिक्षा, करियर और आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता दे रही हैं। ऐसे में शादी कई बार स्वाभाविक पड़ाव की बजाय बंधन लगने लगती है।
रियलिटी टीवी और सेलेब्रिटी संस्कृति का प्रभाव
भारत में सेलेब्रिटी शादियाँ अब राष्ट्रीय तमाशा बन चुकी हैं। बॉलीवुड सितारों से लेकर क्रिकेटरों तक, हर शादी मीडिया इवेंट बन जाती है। इससे आम लोगों पर भी “परिकथा जैसी शादी” का दबाव बनता है।
लेकिन वही सेलेब्रिटी संस्कृति यह भी दिखाती है कि चमकदार शादियों के पीछे रिश्ते कितने नाज़ुक हो सकते हैं। कई चर्चित शादियाँ तलाक़ या अलगाव में बदल चुकी हैं, जिससे “परफ़ेक्ट वेडिंग” की धारणा टूटती है।
सार्वजनिक जीवन जीने वाले लोगों के लिए मीडिया कवरेज और सोशल मीडिया निगरानी शादी को भारी मानसिक बोझ बना सकती है, जिससे वे आख़िरी समय पर पीछे हटने का फ़ैसला लेते हैं।
आर्थिक दबाव
भारत में शादियों का ख़र्च आसमान छू चुका है। डेस्टिनेशन वेडिंग, महंगे वेन्यू, सजावट और रस्मों का दबाव कई परिवारों के लिए असहनीय हो जाता है। आर्थिक तनाव के कारण भी कई जोड़े शादी रद्द या स्थगित करने का निर्णय लेते हैं।
जब आर्थिक बोझ, पारिवारिक अपेक्षाएँ और सोशल मीडिया पर “परफ़ेक्ट शादी” का दबाव एक साथ पड़ता है, तो भावनात्मक रूप से तैयार न होने वाले जोड़ों के लिए पीछे हटना ही बेहतर विकल्प लगने लगता है।
तलाक़ की बढ़ती संस्कृति
शहरी भारत में तलाक़ के मामले बढ़ रहे हैं। इससे लोग विवाह को लेकर अधिक सतर्क हो गए हैं। असफल विवाह का डर कई लोगों को शादी से पहले ही पीछे हटने पर मजबूर करता है—ख़ासकर वे लोग जो पहले रिश्तों में असफल रहे हैं।
कुछ के लिए शादी रद्द करना, असफल विवाह से बचने का सुरक्षित रास्ता बन जाता है।
सांस्कृतिक और पारिवारिक दबाव
भारतीय शादियों में परिवार की भूमिका बेहद प्रभावशाली होती है। कई बार सांस्कृतिक मानदंड, सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक अपेक्षाएँ जोड़े पर भारी पड़ जाती हैं। जब किसी को ज़बरदस्ती या दबाव में शादी करनी पड़ती है, तो आख़िरी समय पर शादी रद्द करना आत्मरक्षा या विद्रोह का रूप ले लेता है।
जैसे-जैसे राज्यों में चुनावी सूचियों में विशेष गहन संशोधन का काम यानी एसआईआर किया जा रहा है, बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) लगातार ज्यादा घंटे काम करने को मजबूर हो रहे हैं। कम समय-सीमा और बढ़ते आधिकारिक दबाव के चलते वे तनाव से जूझ रहे हैं और एसआईआर में जल्दबाजी के चलते तकनीकी गड़बड़ियां भी सामने आ रही हैं। तहलका ने अपनी इस रिपोर्ट में मतदाता सत्यापन का काम सौंपे गए बीएलओ के जमीनी स्तर के अनुभवों पर विस्तार से पड़ताल की है, जिससे साफ होता है कि गड़बड़ियों के साथ-साथ चुनाव आयोग के प्रति जनता में अविश्वास भी पनप रहा है। तहलका एसआईटी की रिपोर्ट –
‘अगर मेरा बेटा वहां नहीं होता, तो मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) के कारण हुए तनाव से मेरी मृत्यु हो जाती। उसने इस पूरी प्रक्रिया में मेरी मदद की है। मैं 59 वर्षीय सरकारी स्कूल शिक्षक हूं और हृदय रोग से पीड़ित हूं। मेरे दिल में दो स्टेंट लगे हैं। मैं चीनी, तेल या नमक नहीं खा सकता। मेरा शरीर कमजोर हो गया है और मैं समय से पहले सेवानिवृत्ति लेने के बारे में सोच रहा हूँ।’ -उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ के बूथ-स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) देवेंद्र पाल सिंह ने यह बात कही। ‘मैंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से कहा कि चूंकि मैं हृदय रोगी हूं, इसलिए उन्हें मुझे एसआईआर ड्यूटी से मुक्त कर देना चाहिए। उन्होंने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि मैं चुनाव आयोग के काम से जुड़ा हुआ हूं। मुझे सरकार की एसआईआर फॉर्म को घर-घर बांटने की प्रणाली पसंद नहीं है। उन्हें ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए थी, जहां मतदाता बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) के पास जाकर जानकारी प्राप्त कर सकें। एसआईआर के उचित कार्य के लिए छः महीने भी कम हैं।’ -देवेंद्र ने जोड़ा। ‘एसआईआर सरकार की एक साजिश है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची से मुस्लिम और दलित वोटों को हटाना है। हालांकि मेरे किसी भी वरिष्ठ अधिकारी ने मुझसे कभी भी मुस्लिम वोटों को रद्द करने के लिए नहीं कहा है।’ -आगरा, उत्तर प्रदेश के एक बीएलओ साकिब मंसूर ने तहलका रिपोर्टर से कहा। ‘मेरे क्षेत्र में कम से कम 10-15 प्रतिशत मतदाताओं के नाम गायब हैं। मेरे पिता एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे और उन्होंने 2002-03 के चुनावों में बूथ अधिकारी के रूप में काम किया था। लेकिन 2003 की मतदाता सूची में मेरे पिता और माता के नाम गायब थे। मेरे पिता का निधन 2014 में हुआ था।’ -मंसूर ने जोड़ा। ‘सरकार से 5 किलो मुफ्त राशन प्राप्त करने वाले लोग इस बात से भयभीत हैं कि एसआईआर के कारण उनका राशन छीन लिया जाएगा और उनके बैंक खातों से पैसे निकाल लिए जाएंगे। इसी डर के चलते वे भरे हुए एसआईआर फॉर्म वापस जमा नहीं कर रहे हैं।’ -आगरा के एक अन्य बीएलओ वीरेंद्र सिंह ने कहा। ‘यदि हमें कम समय में अधिक काम करना पड़े, तो गलतियां होने की संभावना रहती है। एसआईआर के लिए एक महीना बहुत कम है। हम पर दबाव बढ़ रहा है। आगरा के जिला मजिस्ट्रेट अक्सर हमें वीडियो कॉल करते हैं और हमारे ठिकाने के बारे में पूछते रहते हैं।’ -आगरा के एक अन्य बीएलओ संजय बाबू ने कहा। ‘सरकार ने हमें कगार पर धकेल दिया है। मतदाताओं के लिए आदेश पारित करने के बजाय वे बीएलओ के लिए आदेश पारित कर रहे हैं। यहां तक कि संपन्न लोग भी फॉर्म भरने के बाद वापस नहीं कर रहे हैं। सरकार को मतदाताओं के लिए फॉर्म वापस करना अनिवार्य कर देना चाहिए था। या फिर उन्हें इसे बैंक खातों से जोड़ना चाहिए था और मतदाताओं को चेतावनी दी जानी चाहिए थी कि यदि वे एसआईआर फॉर्म वापस नहीं करते हैं, तो उन्हें अपने बैंक खातों के साथ परेशानी होगी।’ -उत्तर प्रदेश के नोएडा की बीएलओ रेनू चौहान ने कहा। ‘हम दिन में केवल 3-4 घंटे ही सो रहे हैं। हम न केवल फॉर्म अपडेट कर रहे हैं बल्कि मैपिंग भी कर रहे हैं, जिसमें प्रति मतदाता लगभग 15 मिनट का समय लगता है। और इन सब के बदले हमें कोई अतिरिक्त पैसा नहीं मिल रहा है। समय पर वेतन मिलना ही काफी है—हम केवल इतना चाहते हैं कि हमारे साथ दुर्व्यवहार न हो।’ -रेनू ने जोड़ा। ‘मेरे इलाके के लोग भरे हुए एसआईआर फॉर्म वापस जमा नहीं कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि अगर उनका वोट रद्द हो गया, तो उन्हें मिलने वाला 5 किलो का मुफ्त राशन बंद हो जाएगा। जब हम मतदाताओं के सामने एसआईआर फॉर्म स्कैन करते हैं, तो उन्हें संदेह होता है कि उनका वोट सीधे मोदी को जाएगा। मेरे क्षेत्र में मतदाता सूची से कुल 25 मतदाताओं के नाम गायब हैं, जहां ज्यादातर दलित और वाल्मीकि समुदाय के लोग रहते हैं। उसके बाद मुस्लिम समुदाय के लोग आते हैं।’ -आगरा के एक अन्य बीएलओ अताउल्लाह अजहर हुसैन ने कहा। भारतीय चुनाव आयोग ने देश में मतदाता सूची की एसआईआर की घोषणा सबसे पहले बिहार में की और अब भारत के नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर किए जाने के बाद से बीएलओ का नाम घर-घर में जाना जाने लगा है। एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को ठीक करना है। लेकिन विभिन्न सरकारी या अर्ध-सरकारी सेवाओं से चयनित बीएलओ को स्थानीय स्तर पर मतदाता सूचियों के प्रबंधन के लिए नियुक्त किया गया है, जो कि पूर्णकालिक चुनावी अधिकारी नहीं हैं। यह भूमिका मौजूदा लोक सेवकों को सौंपी गई एक अतिरिक्त जिम्मेदारी है। ये लोग समुदाय और भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) के बीच महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। जबसे एसआईआर की घोषणा हुई है, विपक्षी राजनीतिक दलों ने इसे केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार द्वारा विपक्षी वोटों को कम करने की साजिश बताया है। दूसरी ओर उन राज्यों से दुर्भाग्यपूर्ण खबरें आ रही हैं, जहां एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है, जिनमें कथित तौर पर एसआईआर से संबंधित कार्य दबाव के कारण बीएलओ द्वारा आत्महत्या करने की खबरें आ रही हैं। गलत काम करने वाले बीएलओ के खिलाफ की गई कार्रवाई, जिसमें एफआईआर, निलंबन और कारण बताओ नोटिस शामिल हैं; ने भी सुर्खियां बटोरी हैं। वर्तमान एसआईआर अभियान में व्यापक रूप से पूछा जाने वाला एक प्रश्न प्रपत्र जमा करने के लिए दी गई एक महीने की सीमित अवधि के बारे में है। लगभग सभी की यही राय है कि इतनी लंबी प्रक्रिया के लिए एक महीना बहुत कम है, जिससे बीएलओ पर भारी दबाव पड़ता है और कई बीएलओ संकट और तनाव से घिर जाते हैं। जमीनी हकीकत की जांच करने के लिए तहलका ने मौजूदा एसआईआर में शामिल बीएलओ पर एक रियलिटी चेक करने का फैसला किया। नोएडा, आगरा और अलीगढ़ में तैनात बीएलओ से संपर्क करके उनकी समस्याओं को समझने का प्रयास किया गया, जिनके कारण कथित तौर पर कुछ बीएलओ की मौत हो गई है। हमने अलीगढ़ के गूलर रोड के रहने वाले 59 वर्षीय देवेंद्र पाल सिंह से बात की, जो एक सरकारी स्कूल में शिक्षक और बूथ नंबर 201 पर तैनात बीएलओ हैं। उनकी कहानी अत्यंत मार्मिक है। ‘मेरे बेटे का हाल ही में सीआईएसएफ में सब-इंस्पेक्टर के रूप में चयन हुआ है और हैदराबाद में 24 नवंबर को होने वाली उसकी ज्वाइनिंग को स्थगित कर दिया गया था। इसलिए उसने एसआईआर के काम में मेरी मदद की और चुनाव आयोग की वेबसाइट पर फॉर्म अपलोड करने का सारा काम किया। बेटे के बिना मैं अपना काम पूरा नहीं कर पाता।’ -देवेंद्र ने यह खुलासा करते हुए यह भी कहा कि वह हृदय रोगी हैं और अगर उनके बेटे ने उनकी मदद न की होती, तो एसआईआर से संबंधित काम के तनाव के कारण उनकी मृत्यु हो जाती। उन्होंने खुलासा किया कि स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए जब उन्होंने अपने अधिकारियों से एसआईआर ड्यूटी से उन्हें मुक्त करने के लिए संपर्क किया था, तो उनकी सभी अपीलें खारिज कर दी गईं। उन्होंने बताया कि उनकी स्वास्थ्य स्थिति के बारे में जानते हुए भी उनके वरिष्ठ अधिकारी उन पर दबाव डालना जारी रखे हुए हैं। उन्होंने कहा कि वह दिन में 12 घंटे काम कर रहे हैं और साथ ही यह भी कहा कि एक उचित एसआईआर के लिए छह महीने भी पर्याप्त नहीं होंगे। निम्नलिखित बातचीत से देवेंद्र पर पड़ने वाले दबाव और तनाव का स्पष्ट पता चलता है कि गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के बावजूद वह लगातार बारह-बारह घंटे काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि अधिकारी जल्दबाजी में जानकारी जमा करने पर जोर दे रहे थे, ओटीपी मांग रहे थे और उन्हें मौके पर ही बैठकर डेटा दर्ज करने के लिए मजबूर कर रहे थे। गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का हवाला देने के बावजूद, ड्यूटी से राहत पाने के उनके अनुरोधों को नजरअंदाज कर दिया गया।
देवेंद्र : पूरे दिन काम कर रहे हैं सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक। रिपोर्टर : ऊपर से सरकारी कर्मचारी आप पर प्रेशर बना रहे हैं? देवेंद्र : प्रेशर तो बहुत बन रहा है। प्रेशर हमने कम कर लिया- काम जल्दी से जल्दी करिए। एक बार तहसील में फॉर्म मंगवा लिए मुझसे। अब ओटीपी मांग रहे थे, वो मैं कैसे दे दूं? उसपे फ्रॉड कॉल भी आ रही हैं। और वहां पर मुझे बिठा लिया- यहां फीड कीजिए। अब मैं हूं हार्ट पेशेंट। मेरी दवाई चल रही है। मैं अपने लड़के की हेल्प ले रहा हूं। मेरे दो स्टंट पड़े हैं पिछले साल, शरीर कमजोर हो रहा है। लेकिन काम मेहनत से कर रहे हैं। देवेंद्र (आगे) : हमने अपने खंड प्रभारी को बोला- हमारी ड्यूटी कटवा दो। हम हार्ट पेशेंट हैं। हमसे चला-फिरा नहीं जाता। दवाई 3-4 टाइम की चल रही है। तो बोले- आप निर्वाचन आयोग के अधीन हैं। रिपोर्टर : आपको लगता है कि एक महीने एसआईआर के लिए कम है? देवेंद्र : हां, कम तो है। अगर ये ढंग से एसआईआर करवाएं, तो छः महीने भी कम पड़ जाएंगे।
इस बातचीत में देवेंद्र कहते हैं कि उनके पास बड़ी संख्या में ऐसे फॉर्म जमा हो गए हैं। कुछ मतदाता फॉर्म वापस नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनके क्षेत्र में 984 मतदाता हैं, जिनमें से 150-200 मतदाता अज्ञात कारणों से अपने भरे हुए फॉर्म वापस नहीं कर रहे हैं। वह बताते हैं कि अपने पूरे क्षेत्र में फॉर्म वितरित करने के बावजूद मुश्किल से दो-तिहाई लोगों ने ही फॉर्म वापस भेजे हैं। लोग अनुपलब्ध हैं, अपना स्थान बदल चुके हैं या पारिवारिक परिवर्तनों के कारण कहीं और चले गए हैं। रिपोर्टर : आप बीएलओ बनकर जो काम कर रहे हैं इलेक्शन कमीशन का उसमें क्या दिक्कत परेशानी आ रही है? देवेंद्र : जो पर्ची (फॉर्म) हैं करीब 150-200 वो लौटकर नहीं दे रहे, कुछ पर्चियां वापिस ही नहीं आ रही। रिपोर्टर : ऐसा क्यूं? देवेंद्र : 72 परसेंट काम हो गया हमारा। रिपोर्टर : आपका कौन-सा क्षेत्र है अलीगढ़ में? देवेंद्र : 201, गुलार रोड, हमारे 984 वोटर हैं, सबको फॉर्म बंट गए। ये 72 परसेंट काम हुआ है। फॉर्म आ नहीं रहे भर के। रिपोर्टर – ऐसा क्यूं? देवेंद्र : लोग दे नहीं रहे। एक तो मिल नहीं रहे लोग। शहर में कभी रहते थे, छोड़कर चले गए, लड़कियों की शादी हो गई। मैं अलीगढ़ में टीचर हूं सरकारी स्कूल में।
देवेंद्र के अनुसार, वह अपने बेटे की मदद से एसआईआर का काम पूरा कर रहे हैं और उनके प्रयासों को उनके वरिष्ठों द्वारा भी सराहा जा रहा है। आगरा के एक अन्य बीएलओ वीरेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार से 5 किलो मुफ्त राशन प्राप्त करने वाले लोगों को डर है कि एसआईआर उनके राशन की आपूर्ति में कटौती कर देगा या उनके बैंक खातों से पैसे निकाल लेगा। इस निराधार भय के कारण वे अपने भरे हुए एसआईआर फॉर्म वापस नहीं कर रहे हैं। निम्नलिखित बातचीत से पता चलता है कि वीरेंद्र बार-बार आने के बावजूद भरे हुए फॉर्म इकट्ठा करने के लिए संघर्ष कर रहा है। वीरेंद्र : फॉर्म ले लिए हैं पब्लिक ने, मगर वापिस नहीं कर रहे हैं। हम बार-बार चक्कर लगा रहे हैं, कहते हैं- आधार कार्ड नहीं है। बहाने बना रहे हैं। करीब 200-250 वोटर हैं। टोटल 965 वोटर हैं हमारे क्षेत्र में, बूथ नंबर 403…। वीरेंद्र (आगे) : वैसे क्या है सर! समाझदार नहीं हैं, जानकार नहीं हैं। (उनको डर है) पैसे खाते से न चले जाएं। रिपोर्टर : मतलब? वीरेंद्र : मतलब (वो सोचते हैं) कोई गड़बड़ी न हो जाए, हमारा वोट न कट जाए। रिपोर्टर : ये वो लोग होंगे जिन्हें राशन मिल रहा है 5 केजी? वीरेंद्र : हां, हां।
नोएडा में रहने वाली एक अन्य बीएलओ रेनू चौहान ने तहलका को बताया कि उन्हें दिन में तीन से चार घंटे से ज्यादा नींद नहीं मिल रही है। उनके अनुसार, न तो अधिकारी और न ही आम जनता उन दबावों को समझ पाती है, जिनका उन्हें सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि इस काम के लिए उन्हें कोई अतिरिक्त वेतन नहीं मिल रहा है, समय पर वेतन मिलना ही पर्याप्त है। उन्होंने आगे कहा कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बीएलओ का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए। रेनु : न तो अधिकारियों को पता है, न पब्लिक को। हमें ही पता है, क्यूंकि हमारे ऊपर बीत रही है। सो भी नहीं पाते रात भर। ये काम करते रहते हैं, …लगे रहते हैं। रिपोर्टर : कितने घंटे काम कर रही हैं मैम? रेनू : रात को तीन बचे हम ये अपलोड करते हैं। तीन से चार घंटे की नींद ले रहे हैं। रिपोर्टर : बस? उसका कुछ एक्स्ट्रा पे करेगी गवर्नमेंट? रेनू : कुछ भी नहीं है, बस अपनी पे आनी चाहिए कम से कम। पर गालियां तो मत दिलवाओ!
रेनू चौहान को नोएडा के सेक्टर-134 में स्थित एक बहुमंजिला आवासीय सोसायटी की देखरेख का जिम्मा सौंपा गया है, जहां शिक्षित लोग रहते हैं। फिर भी यहाँ के निवासी अपने भरे हुए एसआईआर फॉर्म वापस नहीं कर रहे हैं। रेनू के अनुसार, जाने-माने लोग भी फॉर्म जमा नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि घर-घर जाकर प्रचार करते-करते वह थक चुकी हैं और सरकार ने उन्हें कगार पर धकेल दिया है। उन्होंने कहा कि बीएलओ पर और अधिक नियमों का बोझ डालने के बजाय सरकार को एसआईआर को लोगों के बैंक खातों से जोड़ देना चाहिए था और उनसे फॉर्म वापस करने के लिए कहना चाहिए था, अन्यथा उन्हें बैंकिंग संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। रिपोर्टर : लोग नहीं आ रहे? रेनू : बहुत कम आ रहे हैं। सोसायटी से लोग ही नहीं आ रहे, फॉर्म लेकर बैठ गए हैं। रिपोर्टर : मतलब, सोसायटी से भी लोग फॉर्म लेकर बैठे हैं? रेनू : हां, वेल नाउ पर्सन्स। (प्रसिद्ध व्यक्ति)। रिपोर्टर : अच्छा! रेनू : ये भी नहीं जिन्हें जानते न हों, वेल नाउ पर्सन? रिपोर्टर : मतलब, फॉर्म भरकर आपको वापस नहीं कर रहे? रेनू : हां, पता नहीं क्या चाह रहा है? रेनू (आगे) : वैसे कह रहे हैं घर-घर जाओ। कितना घर-घर जाएं भाई? रिपोर्टर : एक महीने में कैसे चला जाएगा आदमी? रेनू : गवर्नमेंट ने पागल बना रखा है। बल्कि गवर्नमेंट को इसको आपके बैंक अकाउंट से कनेक्ट करना चाहिए और बोलना चाहिए कि आपको वहां परेशानी होगी अगर आप ये (एसआईआर फॉर्म) नहीं करेंगे। उल्टा हमारे लिए उल्टे-सीधे आदेश दे दिए। उनकेे (लोगों के) लिए कोई आदेश नहीं है। आदेश सही से डाले ना, तभी तो लोग निकलकर आएंगे। तभी तो लोग आएंगे ना! कंपल्सरी करो कि आपको देना ही देना है।
रेनू चौहान ने आगे कहा कि वह न केवल फाइलें अपलोड कर रही हैं, बल्कि मैपिंग भी कर रही हैं, जिसमें प्रति मतदाता 15 मिनट का समय लगता है। वह इस बात पर जोर देती हैं कि सत्यापन प्रक्रिया धीमी और जटिल है। उनके अनुसार, एसआईआर का काम पूरा करने के लिए एक महीना पर्याप्त ही नहीं है, यहाँ तक कि पूरा एक साल भी कम पड़ जाएगा। रिपोर्टर : अपलोड करने में भी दिक्कत आ रही होगी? रेनू : अपलोड ही नहीं उसके बाद मैपिंग भी करनी है। एक मैपिंग करने में 15 मिनट जाता है। एक बंदे के लिए। रिपोर्टर : मैपिंग क्या होती है मैम? रेनू : जो आप डिटेल्स भरकर दे रहे हैं हमें? रिपोर्टर : हा-हा। रेनू : वो सारी की सारी चेकर करनी है, क्रॉस चेक करनी है कि वो बंदा वास्तव में वहां से ब्लॉन्ग कर रहा है कि नहीं कर रहा। रिपोर्टर : आपके हिसाब से कितने महीने का काम है ये? एक महीने का तो है नहीं। कितना होना चाहिए आपके हिसाब से? रेनू : इसके लिए तो पूरा साल भी कम है।
आगरा कैंट निर्वाचन क्षेत्र के बूथ नंबर 341 से एक अन्य बीएलओ संजय बाबू ने स्वीकार किया कि बीएलओ सरकार के निर्देशानुसार घर-घर नहीं जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि उन पर भी दबाव है, क्योंकि आगरा के डीएम अक्सर वीडियो कॉल के जरिए उनके ठिकाने की जानकारी लेते रहते हैं। संजय ने आगे कहा कि जब कम समय में अधिक काम करने की उम्मीद की जाती है, तो गलतियां होना स्वाभाविक है। रिपोर्टर : आप तो फिर भी घर आ गए, बहुत बीएलओज तो घर घर भी नहीं जा रहे। संजय : हां, नहीं जा रहे। रिपोर्टर : दिक्कत क्या आ रही है इसमें? संजय बाबू : प्रेशर तो हमारे ऊपर भी है, मगर हम काम कर रहे हैं। परिवार है, प्रेशर तो सबके ऊपर है। डेली डीएम मीटिंग ले रहे हैं, …ऑनलाइन वीडियो कॉल कर रहे हैं, मीटिंग लेते हैं, कहां हैं आप अपना स्टेटस दीजिए। रिपोर्टर : आपको नहीं लगता समय कम है एक महीने का? संजय : समय कम है काम ज्यादा है। जब समय कम होता है, तो गड़बड़ी होती है।
आगरा के एक अन्य बीएलओ, आकाश नागर एसआईआर कर्तव्यों का निर्वहन करते समय आने वाली व्यावहारिक बाधाओं के बारे में बताते हैं कि कई मतदाताओं ने अपना पता बदल लिया है, कई मकान भी पुराने रिकॉर्ड से मेल नहीं खा रहे हैं और दर्जनों ऐसे लोग भी हैं, जिनका पता ही नहीं लग पा रहा है। उन्होंने कहा कि वे चुनाव आयोग की वेबसाइट पर एसआईआर फॉर्म अपलोड करने के लिए सुबह तीन बजे उठते हैं, क्योंकि शाम को अक्सर सर्वर डाउन रहता है। उन्होंने कहा कि एसआईआर के लिए आवंटित समय बहुत कम है और उनके क्षेत्र में अनुपलब्ध मतदाताओं का पता लगाना बहुत चुनौतीपूर्ण है। आकाश के अनुसार, लोग ऐसे सवाल भी पूछते हैं, जिनका जवाब देना मुश्किल होता है। रिपोर्टर : प्रॉब्लम क्या-क्या आई आपको? आकाश : मेन प्रॉब्लम क्या है, कुछ व्यक्ति छोड़कर चले गए, रेंट पर ज्यादा थे, वो जा चुके हैं। हमारे 831 वोटर्स हैं, 40-50 अनट्रेकेबल हैं, बहुत मकान के तो पता ही नहीं चल रहे हैं. बिल्डिंग बन गई हैं, जैसे कश्मीरी बाजार कॉन्स्टीट्वेंसी। आकाश (आगे) : और समस्या है साइट की, सर्वर डाउन हो जाता है। सुबह तीन बजे उठा हूं, क्यूंकि सुबह नेटवर्क अच्छा होता है। मैं इरीगेशन डिपार्टमेंट में हूं। आकाश (आगे) : जो करेंट लिस्ट है वोटर्स की, एसआईआर फॉर्म उन्हीं के दिए गए हैं। आकाश (आगे) : जी सर! टाइम तो कम है, हम लोग तो गाइडलाइन के अकॉर्डिंग ही काम करेंगे। ऊपर से गाइडलाइन है, पब्लिक को समझाना पड़ता है, ऐसे-ऐसे क्वेश्चन पूछते हैं, जिनका जवाब नहीं बनता है।
आगरा के एक अन्य बीएलओ नेत्रपाल सिंह चाहर, जो सिंचाई विभाग के कर्मचारी हैं, अपने क्षेत्र में असामान्य रूप से बड़े क्षेत्र और सबसे लंबी सूची से जूझ रहे हैं। उन्होंने तहलका रिपोर्टर को बताया कि उनके इलाके में लोग भरे हुए एसआईआर फॉर्म वापस नहीं कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि अगर उनके वोट रद्द हो गए, तो उन्हें मिलने वाला 5 किलो का मुफ्त राशन भी बंद हो जाएगा। उनके अनुसार, उनके इलाके के कई निवासियों के पास एक से अधिक वोट हैं। उन्होंने आगे कहा कि उनका इलाका कैंट निर्वाचन क्षेत्र में सबसे बड़ा है, जिसमें बड़ी संख्या में मतदाता हैं और 14-15 मंजिला, कई बहुमंजिला इमारतें हैं। प्रत्येक फ्लैट में जाकर फॉर्म एकत्र करने में उनका पूरा दिन लग जाता है। नेत्रपाल : बहुत ज्यादा लंबा क्षेत्र कर दिया। सबसे बड़ी लिस्ट मेरी है 1362 की, पूरी छावनी (कैंटोनमेंट) में, मैंने 1070 फॉर्म बांट दिए। रिपोर्टर : कॉपरेट कर रहे हैं लोग? नेत्रपाल : कॉपरेट तो कर रहे हैं, फॉर्म तो ले जा रहे हैं, मगर वापिस नहीं कर रहे हैं। कई लोगों के 2 जगह वोट हैं। गांव में भी है, यहां भी। रिपोर्टर : लोगों को ये भी लग रहा है, हमारा 5 केजी राशन न कट जाए? नेत्रपाल : हां, ये भी सबसे बड़ी बात। मेरी समस्या ये है कि यहां जो फ्लैट हैं 10-12 मंजिल के, मैं अगर फॉर्म लेने जाऊंगा, तो एक दिन तो मुझे उसी में लग जाएगा। घर-घर तो जा ही रहा हूं, 14-15 माले की जो भी बिल्डिंग है अब उसमें मेरा पॉसिबल तो है नहीं एक-एक घर जाऊं। क्यूंकि एक बिल्डिंग में एक है फिर कोई दूसरी बिल्डिंग में है, मेरा पूरा दिन तो इसी काम में लग जाएगा।
नेत्रपाल सिंह चाहर ने तहलका रिपोर्टर को बताया कि उन्होंने आगरा के डीएम को सूचित किया था कि उनके क्षेत्र के आकार के कारण, जिसमें कई बहुमंजिला इमारतें हैं, चुनाव आयोग की वेबसाइट पर एसआईआर फॉर्म अपलोड करने में देरी हो रही है। उन्होंने कहा कि डीएम ने संबंधित सोसाइटियों के अध्यक्षों से संपर्क किया और निवासियों से अपने एसआईआर फॉर्म शीघ्र जमा करने का अनुरोध किया। इसके बावजूद कई बार जाने के बाद भी निवासी अपने फॉर्म वापस नहीं कर रहे हैं, क्योंकि उनका इलाका काफी बड़ा है और उसमें कई बहुमंजिला इमारतें हैं।
आगरा के मुस्लिम बहुल बूथ नंबर 334 के एक अन्य बीएलओ साकिब मंसूर, जो अहमदिया हनीफिया इंटर कॉलेज में शिक्षक हैं, ने तहलका रिपोर्टर को बताया कि उनके क्षेत्र में 10-15 प्रतिशत मतदाताओं के नाम गायब हैं। उन्होंने आगे बताया कि उनके पिता, जो एक सरकारी स्कूल शिक्षक और 2002-03 के चुनावों में बूथ अधिकारी थे; का नाम 2003 से मतदाता सूची से गायब है। उनके पिता का 2014 में निधन हो गया। रिपोर्टर : 10-15 लोगों के वोट काटे हैं या 10-15 परसेंट? मंसूर : 10-15 परसेंट। बहुत सारों के वोट कटे हुए हैं पहले से। अब मेरे वालिद-वालिदा, दोनों के वोट कटे हुए हैं। अब मैं वही तो मानूंगा, वालिद मेरे गवर्नमेंट जॉब में थे, हेडमास्टर थे, 2002-03 में बूथ ऑफिसर अधिकारी भी थे। और जब अबकी लिस्ट आई, उसमें नाम नहीं है। 2014 में डेथ हुई है पापा की। दोनों का नाम नहीं है और ऐसे बहुत सारे लोग हैं। रिपोर्टर : आपने पूछा नहीं किसी से? मंसूर : किससे पूछें? रिपोर्टर : आपने हायर (उच्च) से? मंसूर : है ही नहीं ऊपर। कहते रहते हैं जो था वो आपको प्रोवाइड करवा दिया। रिपोर्टर : कितने घंटे काम कर रहे हैं आप? मंसूर : कम से कम 18-20 घंटे काम कर रहे हैं हम। मैंने सूची दी, अब वो करेंगे ऑनलाइन, उनसे हो ही नहीं रहा है।
निम्नलिखित बातचीत उन स्थानीय मुसलमानों के बीच बढ़ते डर को उजागर करती है, जिनके नाम मतदाता सूचियों से हटा दिए गए हैं। जब मंसूर से पूछा गया कि क्या मतदाता सूची से गायब मुस्लिम मतदाता अधिकारियों पर सवाल उठा रहे हैं, तो उन्होंने जवाब दिया कि आज मुसलमान डरे हुए हैं और बड़े पैमाने पर अशिक्षित हैं। जब भी वे अपने वोटों के बारे में पूछने के लिए तहसील जाते हैं, तो उन्हें बताया जाता है कि अधिकारी बेबस हैं। मंसूर ने आगरा के एक मुस्लिम व्यापारी का भी जिक्र किया, जिसका नाम 2025 की मतदाता सूची में नहीं है। रिपोर्टर : जिन मुस्लिम्स के वोट कटे, वो हंगामा नहीं कर रहे? मंसूर : मुस्लिम जो है आजकल डरा हुआ है। उसको रास्ता नहीं मालूम। ही इज इलिटिरेट। वो तहसील जाता है, वो कहते, हम क्या करें। रिपोर्टर : और पहले था? मंसूर : खूब डाल रहे थे। रिपोर्टर : कब तक डाले उन लोगों ने? मंसूर : आरे एक बंदा तो ऐसा है, हर तीन महीने में चेक करता है, अबकी लिस्ट में उसका नाम कट गया, 25 में। जीएम फुटवियर्स कंपनी से, …सब जानते हैं उनको। उनका नाम कट गया। रिपोर्टर : अच्छा कौन, वो मालिक हैं? मंसूर : मालिक नहीं हैं वन ऑफ दि पार्टनर्स हैं, सलीम पाशा नाम है। रिपोर्टर : तो नया बन जाएगा, उसमें क्या दिक्कत है? मंसूर : नया तो बन जाएगा, पर नाम क्यूं हटाया?
मंसूर ने तहलका रिपोर्टर को बताया कि चुनाव आयोग की वेबसाइट अक्सर खराब हो जाती है, जिससे उनके जैसे बीएलओ को एसआईआर फॉर्म देर रात अपलोड करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। रिपोर्टर : डिजिटाइज करने में कोई दिक्कत? मंसूर : एप काम नहीं करता, रात को लेकर बैठते हैं हम, साइट डिस्टर्ब होती है।
मंसूर ने हमारे रिपोर्टर को बताया कि उनके बूथ पर 100 से अधिक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में कई बार दर्ज हैं। इससे पता चलता है कि डुप्लीकेट प्रविष्टियाँ कितनी व्यापक हैं, मंसूर ने ऐसे सौ से अधिक मामलों की ओर इशारा किया है। रिपोर्टर : कितने वोटर्स हैं जिनके दो जगह नाम हैं? मंसूर : बहुत हैं, मोर दैन 100। रिपोर्टर : काटा आपने उनका नाम? मंसूर : हमने तो 30 के काटे हैं, दोनों रख दिए उनके सामने, मैंने कहा बताओ कौन-सा काटना है?
अब मंसूर ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि एसआईआर सरकार की एक साजिश है, जिसका उद्देश्य मतदाता सूची से मुस्लिम और दलित वोटों को हटाना है। लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मुस्लिम वोटों को रद्द करने के लिए उन पर अपने वरिष्ठों की ओर से कोई दबाव नहीं है।
रिपोर्टर: आपको लग रहा है साजिश है गवर्नमेंट की वोट काटने की मुसलमानों के और दलित्स के?
मंसूर : क्यूं नहीं है, और जगह भी कट रहे हैं।
रिपोर्टर : कट रहे हैं? कंफर्म?
मंसूर: हां।
रिपोर्टर : यहां का जो दलित एरिया है, उसके बीएलओ का क्या कहना है? मंसूर : ये थे तो साहब अताउल्लाह, इनके पास दलित हैं, और शुजाउद्दीन के पास बनिए हैं ज्यादा। उनमें एक का भी नहीं कटा।
रिपोर्टर : बनियों में एक का भी नहीं कटा?
मंसूर : नहीं
रिपोर्टर : मुस्लिम्स में कितने लोगों के वोट कट गए होंगे आपके एरिया में?
मंसूर : 150-200…।
रिपोर्टर : आपके ऊपर कोई प्रेशर है कि मुसलमानों के वोट काटने हैं?
मंसूर : नहीं, बिलकुल नहीं।
मंसूर ने भी आम धारणा को दोहराते हुए कहा कि एसआईआर के लिए आवंटित समय बहुत कम है और उन्हें एसआईआर प्रशिक्षण बेहद भ्रामक लगा। मंसूर कार्यभार की तुलना छोटे राज्यों से करते हुए कहते हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में दी जाने वाली समय सीमा आश्चर्यजनक रूप से कम है। वह याद करते हैं कि कैसे शुरुआती प्रशिक्षण ने भी अधिकारियों को असमंजस में डाल दिया था और पर्यवेक्षक बुनियादी सवालों के जवाब देने में असमर्थ थे।
रिपोर्टर : आपको क्या लगता है ये टाइम जो मिला है, ठीक है?
मंसूर : बिलकुल कम, बिहार जैसे छोटे राज्य में 4 महीने में हुआ, ये (यूपी? बिहार से 3 गुना आबादी है।
मंसूर (आगे) : स्टार्टिंग में हुई थी ट्रेनिंग, ट्रेनिंग देने वाला बिलकुल कंफ्यूजिंग था।
रिपोर्टर : वो कैसे?
मंसूर : बता कुछ रहा है, है कुछ, बाद में कह रहा है ऐसे नहीं, ऐसे। कहने का मतलब ये है, लोगों के पास आंसर नहीं था, जो बैठे हुए थे। एसडीएम थे, पर,उनके पास आंसर नहीं था।
मंसूर (आगे) : आप अपना काम करेंगे, बेस्ट करेंगे आप। मैं क्लीयर आदमियों का काम कर रहा हूं।
अब मंसूर ने अपनी बीमारी के लिए व्यस्त एसआईआर प्रक्रिया को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि उचित नींद की कमी के कारण उन्हें सर्दी, बुखार, उल्टी और अत्यधिक थकान हुई, क्योंकि वह दिन में केवल कुछ घंटे ही सोते हैं। उन्होंने बताया कि उनके क्षेत्र में 4,500 मतदाता हैं और चार मतदान अधिकारी तैनात हैं। मंसूर ने तहलका रिपोर्टर को बताया कि 01 दिसंबर, 2025 तक उन्होंने 3,900 फॉर्म वितरित कर दिए थे, बाकी अभी भी लंबित हैं। मंसूर : कल भी तबीयत खराब हो गई हमारी, बुखार, नजला, उल्टी और कोल्ड, …जबरदस्त। रिपोर्टर : इसी बीएलओ के काम की वजह से? मंसूर : अजी रात-दिन 2-2.30 घंटे सो रहे हैं हम लोग, थकान ऐसे लग रहा है, जैसे किसी ने पीठ पर बोरे लाद दिए हों। सुबह हम वहीं थे, जब आपका फोन आया, तब आए हम निबटा के। रिपोर्टर : कितने वोटर्स हैं आपके एरिया में? मंसूर : होंगे कोई 4,500 के आसपास, 4 बीएलओ लगे हैं उसी बूथ पर। रिपोर्टर : आपका बूथ नंबर क्या है? मंसूर : 324…। रिपोर्टर : कितने फॉर्म्स बंट गए होंगे 4,500 में से? मंसूर : मान लीजिए कि 3,900 बंट चुके, और कुछ तो हैं।
मंसूर के बाद उसी दिन तहलका रिपोर्टर ने आगरा में एक अन्य बीएलओ अताउल्लाह अजहर हुसैन से मुलाकात की। अताउल्लाह बूथ नंबर 291 के 1,214 मतदाताओं के सर्वेक्षक हैं। इन वोटर्स में अधिकतर वोटर्स दलित, वाल्मीकि और मुस्लिम हैं। उन्होंने तहलका रिपोर्टर को बताया कि उनके क्षेत्र के मतदाता न केवल नाराज हैं, बल्कि एसआईआर प्रक्रिया से डरे हुए भी हैं। उन्हें डर है कि अगर उनका वोट रद्द कर दिया गया, तो वे अपना 5 किलो का मुफ्त राशन खो सकते हैं। अताउल्लाह ने आगे कहा कि पढ़े-लिखे मतदाताओं की तुलना में निरक्षर मतदाताओं को अपने दस्तावेज सुरक्षित रखने में अक्सर कठिनाई होती है। रिपोर्टर : दिक्कत क्या आ रही है? अताउल्लाह : फॉर्म्स सब्मिट करने में आ रही है, जनता फॉर्म देना नहीं चाह रही है, ये सबसे बड़ी दिक्कत है। रिपोर्ट : वजह? अताउल्लाह : वजह लापरवाही, किसी-किसी के दिल में खुराफात भी चलती है- क्यूं हमें परेशान किया जा रहा है। …हम कहते हैं, ये चुनाव प्रक्रिया है, हम किसी से राब्ता नहीं रखते, न कीचड़ उछालते हैं। अब हम बीएलओ हैं, उनको समझाते हैं, कुछ लोगों को ये भी शिकायत रहती है अगर हम उनका वोट कटवा देंगे, तो उनका राशन बंद हो जाएगा सरकार से। तो इसलिए बताना नहीं चाहते कि हमारा वोट कट जाएगा। अताउल्लाह (आगे) : पब्लिक क्या है, ये सब करवाना नहीं चाहती। कागजी तौर पर अपने आप को मजबूत नहीं रखती। जो पढ़े-लिखे हैं, वो रखते हैं। लेकिन जो पढ़े-लिखे नहीं है, उसमें दिक्कत है। रिपोर्टर : आपका एरिया कौन-सा है? अताउल्लाह : 291 है, और एरिया थोड़ा बड़ा है। और दिक्कत का क्या है, पहुचाने जाते हैं हम, लोग मिलते नहीं हैं। लेकिन आमतौर से जो मिल रहे हैं, फॉर्म उनके भर रहे हैं। रिपोर्टर : कितने वोटर्स हैं आपके एरिया में? अताउल्लाह : 1,214….। रिपोर्टर : किस टाइप के लोग ज्यादा हैं? अताउल्लाह : जाटव, वाल्मीकि समाज से हैं, और फिर मुस्लिम।
अताउल्लाह ने कहा कि उनके इलाके के कुछ मतदाता 2025 की मतदाता सूची में शामिल नहीं हैं, जबकि 2024 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने मतदान किया था। कुछ निवासियों को केवल एक ही फॉर्म मिला, जबकि अन्य को दो फॉर्म मिले- एक उनके लिए और एक चुनाव आयोग के लिए। अताउल्लाह ने बताया कि वह सुबह 9 बजे से आधी रात तक काम करते हैं। 01 दिसंबर, 2025 तक जब तहलका के पत्रकार ने उनसे मुलाकात की, तब तक उनके क्षेत्र के लगभग 40 प्रतिशत फॉर्म डिजिटाइज हो चुके थे। रिपोर्टर : 2024 में लोगों ने वोट डाला और 2925 में उनका नाम नहीं है? अताउल्लाह : हां, ऐसे भी हैं, …लेकिन जब अंदर से खंगालो तो कुछ न कुछ झोल निकलता है, जैसे 10 साल से उनका पहचान पत्र नहीं है, पुराना पहचान पत्र है दो साल से वोट नहीं डाल रहे थे। ये भी आई है शिकायत कि पिछला वोट हमने नहीं डाला तो इस बार हमारे पास फॉर्म नहीं आया। अब जैसे कि दो फॉर्म्स दिए हैं और एक हमें अपने पास रखना है, एक उनको देना है। कुछ के पास सिर्फ एक फॉर्म आया है, तो हम उनको समझाते हैं कि आप एक फॉर्म की फोटोकॉपी अपने पास रख लेना। ताकि आप मेरे को इल्जाम न लगा सकें कि इन्होंने हमको फॉर्म नहीं दिया था, ना आप सरकार को इल्जाम लगा सकते हैं कि मेरे पास फॉर्म नहीं आया। और अगर फोटो कॉपी नहीं रखवाना है, तो आप भरे हुए फॉर्म की फोटो खींचकर अपने पास रख लें। रिपोर्टर : आप कितने घंटे काम कर रहे हो? अताउल्लाह : मैं सुबह 9 बजे से रात 12 बजे तक। रिपोर्टर : कितने फॉर्म डिजिटाइज हो गए? अताउल्लाह : मेरे 584, लगभग 40 परसेंट।
अताउल्लाह ने कहा कि प्रशिक्षण के दौरान उन्हें जो कुछ भी समझाया गया, वह पूरी तरह से समझ में नहीं आया। वह कहते हैं कि उन्होंने इस प्रक्रिया को सही मायने में तभी सीखा, जब उन्होंने इस क्षेत्र में काम करना शुरू किया। उन्होंने दलित मतदाताओं के प्रभुत्व वाले और मुस्लिम आबादी की कम संख्या वाले मिश्रित क्षेत्र में लापता वोटों के बारे में लगभग 25 शिकायतों की जानकारी दी है। रिपोर्टर : ट्रेनिंग आपकी ठीक हुई? अताउल्लाह : हां, ठीक हुई। चार-पांच बार बुलाया हमको, लेकिन हमें कुछ समझ में आया, कुछ नहीं भी आया। समझ में आया जब हम काम करने लगे। रिपोर्टर : कितने वोट कट गए होंगे? अताउल्लाह : लगभग 25 मेरे पास शिकायत आई हैं। रिपोर्टर : आपके एरिया दलित डोमिनेटेड हैं? अताउल्लाह : हैं मुस्लिम और दलित। लगभग 300 वोट मुस्लिम्स के होंगे, 900 से ऊपर दलित वोट होंगे।
अब अताउल्लाह ने खुलासा किया है कि एसआईआर फॉर्म में एक क्यूआर कोड होता है। वह कहते हैं कि जब उन्होंने मतदाताओं के सामने फॉर्म स्कैन किए, तो लोगों ने मान लिया कि उनके वोट प्रधानमंत्री मोदी को जा रहे हैं और उनकी पार्टी भाजपा को मजबूत कर रहे हैं। परिणामस्वरूप उन्होंने अब मतदाताओं के सामने फॉर्म स्कैन करना बंद कर दिया है। अब वह पारदर्शिता और आश्वासन के बीच संतुलन बनाए रखने और वोटर्स की आशंकाओं को दूर करने के लिए फॉर्म वापस सौंपने से पहले उन्हें सावधानीपूर्वक स्कैन करते हैं। अताउल्लाह : फॉर्म्स दो आए हैं, या नहीं आए हैं, कुछ की शिकायत ये हमारे साथ धोखा है, कुछ की ये भी आई, हम उनका फॉर्म स्कैन कर रहे हैं, वो ये समझ रहे थे ये मोदी को जा रहा है, स्कैन किया हमने कुछ लोगों को ये भी लगा गारंटी वाला वोट मोदी को जा रहा है। रिपोर्टर : जब आप स्कैन कर रहे हो फॉर्म तो लोगों को लगता है ये मोदी के पास जा रहा है? अताउल्लाह : हां, लगता है ऐसा। रिपोर्टर : मतलब, मोदी को वोट पड़ेगा? अताउल्लाह : हां, मगर ऐसा नहीं है। स्कैन सिर्फ इसलिए होता है िक हमने फॉर्म आपको दे दिया, फॉर्म के अंदर क्यूआर कोड है। पहले में फॉर्म डेटा था, फिर स्कैन करता था। लेकिन अब में स्कैन करके फिर फॉर्म देता हूं। उनके सामने नहीं करता, क्यूंकि फिर हमें भी घेरते हैं वो लोग।
अताउल्लाह ने फिर कहा कि एसआईआर के लिए एक महीना बहुत कम है और यह कम से कम दो महीने का होना चाहिए था। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि उनके मतदान केंद्र के कुछ मतदाताओं को 2002 में मतदान करने के बावजूद 2003 की मतदाता सूची में अपना नाम नहीं मिला। अताउल्लाह : कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने 2003 में वोट डाला था, मगर लिस्ट में नाम नहीं है। रिपोर्टर : आपके हिसाब से एक महीने का टाइम सही है? अताउल्लाह : कम है, दो महीने होना चाहिए था कम से कम।
अताउल्लाह ने बताया कि एक बार उन्हें उनके वरिष्ठ अधिकारी ने निर्धारित समय के भीतर काम पूरा न करने पर कार्रवाई की चेतावनी दी है। वह कहते हैं कि उन्होंने अधिकारी से कहा कि अगर उन्हें लगता है कि उन्होंने अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाया है, तो वह कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हैं। अताउल्लाह ने उन पर्यवेक्षकों के दबाव के बारे में बताया, जो कभी-कभी डिजिटलीकरण का काम पूरा न करने पर उन पर भड़क उठते हैं। वह इस बात पर जोर देते हैं कि जनता की चिंताओं को समझना और उनका समाधान करना तकनीकी पूर्णत: जितना ही महत्वपूर्ण है। जिम्मेदारी सौंपने के सुझावों के बावजूद वह स्वयं काम का प्रबंधन करने पर जोर देते हैं। अताउल्लाह : मुझसे बहुत जगह पूछा गया- आपका डिजिटाइज हुआ कि नहीं? हमने कहा- जनता की बातें समझने में दिक्कत हो रही है हमको, और जनता के बीच रहना है, हम जनता की आशाओं को ध्यान में रखकर काम करेंगे और फॉर्म देंगे भी। तो बोले कि एकाध आप पर कार्रवाई करें? मैंने कहा- आपको लगता है कार्रवाई का काम किया है, तो आप कार्रवाई कर दें। मैंने कहा- अगर आपको लग रहा है मैं काम नहीं कर पा रहा हूं, तो आप कार्रवाई कर दें।
संकटग्रस्त बीएलओ को लेकर काफी हंगामा होने के बाद 04 दिसंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों पर यह जिम्मेदारी डाल दी कि वे उन कर्मचारियों की जगह नए कर्मचारियों की नियुक्ति करें, जो बीएलओ के काम के दबाव को सहन करने में असमर्थ हैं। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य बीएलओ की संख्या बढ़ाने और उनके कार्यभार को कम करने के लिए अतिरिक्त कर्मचारियों को भी नियुक्त कर सकते हैं। 09 दिसंबर को शीतकालीन सत्र के दौरान सरकार ने चुनाव सुधारों के व्यापक दायरे के तहत एसआईआर पर संसदीय बहस के लिए विपक्ष की सर्वसम्मत मांग पर सहमति व्यक्त की। तहलका रिपोर्टर ने जिन सभी बीएलओ से बात की, उन्होंने कई चुनौतियों को उजागर किया, जिनमें तीन प्रमुख थीं- एसआईआर के लिए अपर्याप्त समय, मतदाताओं में उनका मुफ्त 5 किलो राशन खोने के डर, जिससे वे भरे हुए फॉर्म वापस नहीं कर रहे और यह व्यापक गलत धारणा कि एसआईआर फॉर्म पर क्यूआर कोड को स्कैन करने से प्रधानमंत्री मोदी के हाथ मजबूत होंगे और उनकी पार्टी भाजपा को फायदा होगा। ये बार-बार सामने आने वाली समस्याएं इस बात को रेखांकित करती हैं कि किस प्रकार प्रक्रियात्मक कमियां और सार्वजनिक रूप से फैलाई गई गलत सूचनाएं एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक कार्य के लिए नियुक्त अग्रिम पंक्ति के अधिकारियों पर दबाव को बढ़ा रही हैं।
हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने आज आबकारी एवं कराधान विभाग की दो प्रमुख डिजिटल पहलों की शुरुआत करते हुए शासन-प्रशासन में पारदर्शिता, दक्षता और सुगमता को नई गति प्रदान की। इन डिजिटल पहलों का उद्देश्य विभागीय प्रक्रियाओं को पूरी तरह तकनीक-आधारित बनाना, सेवाओं को समयबद्ध तरीके से आमजन तक पहुंचाना और राजस्व प्रबंधन को अधिक सुदृढ़ करना है।
मुख्यमंत्री ने विभाग द्वारा विकसित “कर हितैषी” मोबाइल एप्लिकेशन का लोकार्पण किया। यह ऐप आम नागरिकों को जीएसटी चोरी की जानकारी सरल और गोपनीय तरीके से देने की सुविधा प्रदान करता है। नागरिक फर्जी बिलिंग, गलत इनपुट टैक्स क्रेडिट, बिना पंजीकरण कारोबार, बिल न देने, या लेन-देन छिपाने जैसी अनियमितताओं की सूचना फोटो, वीडियो या दस्तावेज़ों के साथ अपलोड कर सकते हैं। ऐप यह सुनिश्चित करता है कि सूचना देने वाले की पहचान संबंधित फील्ड अधिकारियों को न दिखाई दे। प्राप्त सूचना पर विभागीय अधिकारी आवश्यक जांच व कार्रवाई करेंगे।
मुख्यमंत्री ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इससे स्वैच्छिक रिपोर्टिंग को बढ़ावा मिलेगा और जीएसटी प्रशासन में पारदर्शिता मजबूत होगी।
इसके अलावा, नायब सिंह सैनी ने छः नई ऑनलाइन आबकारी सेवाओं का शुभारंभ किया। ये सेवाएँ एथेनॉल, अतिरिक्त अल्कोहल (ईएनए) और डिनेचर्ड स्प्रिट से संबंधित अनुमतियों के लिए विकसित की गई हैं। अब व्यापारिक इकाइयाँ एथेनॉल और ईएनए के आयात निर्यात तथा डिनेचर्ड स्प्रिट के निर्यात आयात की अनुमति ऑनलाइन आवेदन के माध्यम से प्राप्त कर सकेंगी। इस प्रणाली में आवेदक आवेदन की स्थिति देख सकते हैं और डिजिटल हस्ताक्षरित अनुमति पत्र डाउनलोड कर सकते हैं।
बैठक में बताया गया कि वास्तविक समय में डैशबोर्ड के माध्यम से माल की आवाजाही, अनुमतियों की समय-सीमा और अनुपालन की निगरानी की जा सकेगी। यह व्यवस्था कागजी कार्यवाही कम करेगी, दुरुपयोग की संभावनाएं रोकेंगी और उद्योगों को तेज व पारदर्शी सेवाएँ प्रदान करेगी।
मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि अन्य आबकारी सेवाओं जैसे ब्रांड लेबल पंजीकरण और लाइसेंसिंग मॉड्यूल को भी शीघ्र ऑनलाइन किया जाए, ताकि विभागीय प्रक्रियाओं को पूरी तरह तकनीक-आधारित बनाया जा सकेगा।
मुख्यमंत्री ने आबकारी एवं कराधान विभाग की कार्यप्रणाली की भी समीक्षा की। बैठक में विभाग के राजस्व प्रदर्शन, प्रवर्तन कार्रवाइयों, लंबित वसूली, तथा जीएसटी, वैट और आबकारी क्षेत्र में चल रहे डिजिटल सुधारों की प्रगति का विस्तृत मूल्यांकन किया गया।
बैठक में जानकारी दी गई कि हरियाणा ने पूरे देश में नेट एसजीएसटी संग्रह में सर्वाधिक 21 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की है, जबकि राष्ट्रीय औसत 6 प्रतिशत है। नवंबर 2025 में राज्य का नेट एसजीएसटी संग्रह 3,835 करोड़ रहा, जो पिछले वर्ष नवंबर के मुकाबले 17 प्रतिशत अधिक है। चालू वित्त वर्ष में नवंबर तक कुल जीएसटी संग्रह 83,606 करोड़ रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 7 प्रतिशत अधिक है और राष्ट्रीय औसत 5.8 प्रतिशत से बेहतर है। बढ़ते राजस्व के आधार पर हरियाणा की रैंकिंग भी सुधारकर चौथे स्थान पर पहुंच गई है। अधिकारियों ने बताया कि राज्य में 6,03,389 जीएसटी पंजीकृत करदाता हैं, जिनमें 2018 से 2025 के बीच 6.11 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज हुई है।
बैठक में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने मूल्य वर्धित कर (वैट) और सीएसटी की भी समीक्षा की। मुख्यमंत्री को अवगत कराया गया कि हरियाणा में वैट छः वस्तुओं पेट्रोल, डीजल, शराब, पीएजी, सीएनजी एवं सीएसटी वस्तुओं पर लागू होता है। वर्ष 2025-26 में नवंबर तक वैट वसूली में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसमें वन टाइम सेटलमेंट (ओटीएस) स्कीम-2025 का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस योजना के कारण सीएसटी संग्रह में 60.99 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई। योजना के 27 सितंबर 2025 को समाप्त होने के बाद विभाग ने विशेष वसूली अभियान चलाया, जिसके तहत अक्तूबर-नवंबर 2025 में 48.12 करोड़ रुपये की वसूली की गई।
बैठक के दौरान अधिकारियों ने बताया कि विभाग ने वैट मॉनिटरिंग डैशबोर्ड भी विकसित किया है, जो वास्तविक समय में वैट जमा की निगरानी करता है। साथ ही, देरी होने पर स्वतः संकेत देता है और फील्ड अधिकारियों को समय पर कार्रवाई करने में सहायता करता है। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि सभी जिले इस डैशबोर्ड का नियमित उपयोग सुनिश्चित करें, ताकि विभाग की कार्यप्रणाली में और दक्षता सुनिश्चित हो सके।
बैठक में बताया गया कि वर्ष 2025-26 में 30 नवंबर 2025 तक आबकारी राजस्व 9,370.28 करोड़ रुपये रहा, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में 8,629.46 करोड़ रुपये संग्रहित हुए थे। विभाग ने जिलावार और मदवार लाइसेंस शुल्क, आबकारी शुल्क, बॉटलिंग शुल्क, परमिट शुल्क, आयात शुल्क एवं देशी शराब पर वैट का विवरण प्रस्तुत किया गया। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कम संग्रह वाले जिलों को निगरानी बढ़ाने, निरीक्षण तेज करने और समयबद्ध सुधारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए।
इसके अलावा, 125 करोड़ रुपये की संपत्तियों की कुर्की, वर्तमान नीति वर्ष में 46.66 करोड़ रुपये की वसूली और देरी से जमा लाइसेंस शुल्क पर ब्याज की स्वचालित गणना प्रणाली के माध्यम से 16.46 करोड़ रुपये की अनिवार्य वसूली की गई है। विभाग ने QR-आधारित ट्रैक एंड ट्रेस प्रणाली, होलोग्राम प्रमाणीकरण, मैन्युफैक्चरिंग यूनिटों पर एएनपीआर कैमरे और बूम बैरियर, डिस्टिलरी में टेलीमेट्री आधारित वास्तविक समय मॉनिटरिंग तथा ऑनलाइन लाइसेंसिंग मॉड्यूल पर भी प्रगति की जानकारी दी।
मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि इन डिजिटल सुधारों को तेज गति से लागू किया जाए और इनके प्रभाव की नियमित समीक्षा की जाए ताकि पारदर्शिता, अनुपालन और सेवा-प्रदर्शन में स्पष्ट सुधार दिखाई दे। मुख्यमंत्री ने विभाग के राजस्व प्रदर्शन और डिजिटल सुधारों की सराहना करते हुए कहा कि राज्य सरकार एक पारदर्शी, तकनीक संचालित और नागरिक-हितैषी कर एवं आबकारी प्रशासन स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है, जो प्रदेश की आर्थिक वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देगा।
बैठक में मुख्यमंत्री के मुख्य प्रधान सचिव राजेश खुल्लर, आबकारी एवं कराधान विभाग की आयुक्त एवं सचिव आशिमा बराड़, आबकारी एवं कराधान आयुक्त विनय प्रताप सिंह सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।