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मेडिकल टूरिज्म में भारत की बड़ी छलांग, विदेशी मरीजों की पहली पसंद

MedicalTourism
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ब्यूरो ऑफ इमिग्रेशन के आंकड़ों के अनुसार, 2019 में इलाज के लिए भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या करीब 6.9 लाख थी। कोरोना काल के दौरान यह संख्या घट गई थी, लेकिन अब हालात सुधरने लगे हैं। साल 2023 में लगभग 6.59 लाख विदेशी मरीज इलाज के लिए भारत आए, जबकि 2024 में यह आंकड़ा 6.44 लाख तक पहुंच गया। वहीं 2025 में जनवरी से नवंबर तक करीब 4.5 लाख विदेशी नागरिक मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए भारत पहुंचे हैं।

पर्यटन मंत्रालय ने बताया कि मेडिकल और हेल्थ टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए एक राष्ट्रीय रणनीति और रोडमैप तैयार किया गया है। इसे केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, राज्य सरकारों और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े संगठनों को भेजा गया है, ताकि मिलकर इस सेक्टर को आगे बढ़ाया जा सके।

सरकार ने विदेशी मरीजों की सुविधा के लिए ई-मेडिकल वीजा और ई-मेडिकल अटेंडेंट वीजा की व्यवस्था को और आसान बनाया है। इससे मरीजों और उनके साथ आने वाले परिजनों को भारत आने में कम परेशानी होती है।

इसके अलावा, सेवा निर्यात संवर्धन परिषद (SEPC) ने एक खास वेबसाइट भी बनाई है, जहां इलाज से जुड़ी पूरी जानकारी मिलती है। इस पोर्टल पर मान्यता प्राप्त अस्पतालों, हेल्थ सेंटर्स, डॉक्टरों, वीजा प्रक्रिया और दूसरी जरूरी जानकारियां उपलब्ध कराई गई हैं। पर्यटन मंत्रालय ने इस वेबसाइट का लिंक अपनी आधिकारिक साइट पर भी दिया है।

सरकार का मानना है कि भारत में कम खर्च में बेहतर इलाज, अनुभवी डॉक्टर, आधुनिक अस्पताल और आयुष पद्धतियों (योग, आयुर्वेद, यूनानी आदि) की वजह से दुनिया भर के लोग यहां इलाज के लिए आ रहे हैं। यही वजह है कि मेडिकल टूरिज्म को भविष्य की बड़ी संभावना माना जा रहा है।

पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने लोकसभा में बताया कि मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देना सरकार की प्राथमिकता में शामिल है और आने वाले समय में इस सेक्टर से रोजगार और विदेशी मुद्रा दोनों बढ़ने की उम्मीद है।

कुल मिलाकर, भारत धीरे-धीरे मेडिकल टूरिज्म के ग्लोबल हब की ओर बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में इसमें और तेजी आने की संभावना है।

AI समिट से दिल्ली बनी ‘महंगी राजधानी’, होटल कमरों के दाम आसमान पर

Price Increase
Price Increase

समिट के दौरान दिल्ली के मशहूर होटलों में एक रात का किराया लाखों रुपये में पहुंच गया है। कुछ लग्जरी सुइट्स के रेट टैक्स मिलाकर ₹30 लाख से भी ज्यादा बताए जा रहे हैं। वहीं, आम तौर पर ₹2 से ₹3 लाख में मिलने वाले कमरे समिट के दिनों में 10 से 15 गुना महंगे हो गए हैं। होटल बुकिंग प्लेटफॉर्म्स के अनुसार, दिल्ली के लिए होटल सर्च में करीब 6 गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

द लीला पैलेस, द ओबेरॉय, ताज पैलेस और द ललित जैसे बड़े होटलों में लगभग 95 फीसदी तक ऑक्यूपेंसी हो चुकी है। जहां थोड़े बहुत कमरे बचे भी हैं, वहां एक रात का किराया ₹70,000 से ₹1 लाख के बीच पहुंच चुका है। इस समिट में करीब 35,000 से ज्यादा देश-विदेश के डेलिगेट्स के शामिल होने की उम्मीद है, जिससे होटल, कैटरिंग, ट्रांसपोर्ट और इवेंट मैनेजमेंट सेक्टर को बड़ा फायदा हो रहा है।

इस समिट का असर सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है। नोएडा और गुरुग्राम के होटलों में भी तेजी से बुकिंग बढ़ी है। कई विदेशी मेहमान अब अपने बिजनेस ट्रिप को घूमने-फिरने के मौके में बदल रहे हैं। समिट खत्म होने के बाद जिम कॉर्बेट, मसूरी और मुक्तेश्वर जैसे हिल स्टेशनों के लिए भी बुकिंग कराई जा रही है।

टूरिज्म एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह ट्रेंड भारत के लिए अच्छा संकेत है, क्योंकि इससे ‘बिजनेस प्लस घूमना’ यानी Bleisure Travel को बढ़ावा मिल रहा है। एआई समिट ने एक तरफ भारत की टेक ताकत को दुनिया के सामने रखा है, तो दूसरी तरफ होटल और टूरिज्म इंडस्ट्री को भी जबरदस्त बूस्ट दिया है।

कुल मिलाकर, AI Impact Summit 2026 ने दिल्ली को कुछ दिनों के लिए दुनिया के सबसे महंगे और हाई-प्रोफाइल शहरों की कतार में खड़ा कर दिया है।

दिल्ली में AI का महाकुंभ, जुटेंगे दुनिया के दिग्गज

AI SUMMIT
AI SUMMIT

यह समिट ऐसे समय पर हो रही है जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का असर आम लोगों की जिंदगी में साफ दिखने लगा है। हेल्थकेयर, शिक्षा, बैंकिंग, खेती और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में AI तेजी से इस्तेमाल हो रहा है। इसी वजह से यह सम्मेलन भारत के लिए काफी अहम माना जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक इस समिट के लिए 35 हजार से ज्यादा रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं। इसमें गूगल और अल्फाबेट के सीईओ सुंदर पिचई, एनवीडिया के फाउंडर जेन्सन हुआंग, डीपमाइंड के सीईओ डेमिस हासाबिस, माइक्रोसॉफ्ट के प्रेसिडेंट ब्रैड स्मिथ और क्वालकॉम के सीईओ क्रिस्टियानो आमोन के शामिल होने की संभावना है। इसके अलावा OpenAI के सीईओ सैम ऑल्टमैन भी भारत आने वाले हैं।

भारत से भी कई बड़े उद्योगपति और टेक लीडर्स इस समिट में हिस्सा ले सकते हैं, जिनमें मुकेश अंबानी, सुनील भारती मित्तल और नंदन नीलेकणी जैसे नाम शामिल हैं। माना जा रहा है कि इंफोसिस, HCL, इंटेल और एडोबी जैसी कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारी भी इस कार्यक्रम में मौजूद रहेंगे।

टेक लीडर्स के साथ-साथ इस समिट में दुनिया के कई देशों के मंत्री, नीति निर्माता और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। बताया जा रहा है कि करीब 15 से 20 देशों के राष्ट्र प्रमुख, लगभग 50 मंत्री और 40 से ज्यादा ग्लोबल सीईओ इस कार्यक्रम का हिस्सा बन सकते हैं। बिल गेट्स और वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के प्रमुख भी इसमें शामिल हो सकते हैं।

इस समिट का मकसद AI से जुड़ी तकनीक, नीति और उसके सामाजिक असर पर खुलकर चर्चा करना है। यहां यह तय करने की कोशिश होगी कि AI का इस्तेमाल कैसे सुरक्षित, जिम्मेदार और आम लोगों के हित में किया जाए।

कुल मिलाकर, इंडिया AI समिट 2026 भारत के लिए एक बड़ा मौका है, जहां देश खुद को ग्लोबल AI लीडर के रूप में पेश कर सकता है। इस आयोजन से भारत की टेक पहचान और मजबूत होगी और दुनिया को यह संदेश जाएगा कि AI के भविष्य में भारत की भूमिका अहम रहने वाली है।

मथुरा में एक परिवार की दर्दनाक मौत, गांव में पसरा सन्नाटा

जानकारी के मुताबिक, सोमवार रात के बाद से परिवार के किसी सदस्य को बाहर नहीं देखा गया था। मंगलवार सुबह जब काफी देर तक दरवाजा नहीं खुला तो आसपास के लोगों ने आवाज लगाई, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद पुलिस को बुलाया गया। पुलिस ने दरवाजा खुलवाया तो घर के अंदर सभी पांचों लोगों के शव मिले।

मौके पर घर के अंदर रखा सामान भी जांच के दायरे में लिया गया। शुरुआती जांच में आशंका जताई जा रही है कि परिवार ने किसी जहरीले पदार्थ का सेवन किया होगा, हालांकि इसकी अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस ने सभी शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है ताकि मौत के सही कारणों का पता चल सके।

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यह मामला आत्महत्या का हो सकता है, लेकिन हर पहलू से जांच की जा रही है। परिवार किन हालात में इस कदम तक पहुंचा, इसका अभी खुलासा नहीं हो पाया है। न तो कोई सुसाइड नोट मिला है और न ही अब तक किसी तरह का पारिवारिक विवाद सामने आया है।

घटना के बाद गांव में मातम पसरा हुआ है। पड़ोसी और रिश्तेदार इस खबर से सदमे में हैं। लोगों का कहना है कि परिवार सामान्य तरीके से रह रहा था और किसी को अंदाजा भी नहीं था कि ऐसा कुछ हो सकता है। बच्चों की मौत से पूरे गांव का माहौल और भी ज्यादा गमगीन हो गया है।

फिलहाल पुलिस परिवार की आर्थिक स्थिति, रिश्तों और हाल के दिनों की गतिविधियों की जांच कर रही है। आसपास के लोगों से पूछताछ की जा रही है ताकि घटना की वजह सामने आ सके। प्रशासन ने भरोसा दिलाया है कि मामले की निष्पक्ष जांच होगी और जो भी सच है, वह जल्द सामने आएगा।

यह घटना एक बार फिर समाज के सामने मानसिक दबाव और पारिवारिक समस्याओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है। पुलिस लोगों से अपील कर रही है कि किसी भी तरह की परेशानी में अकेले न रहें और समय पर मदद लें।

भारत से मैच पर पाकिस्तान का यू-टर्न, बांग्लादेश बना बड़ी वजह

cricket match
cricket match

बांग्लादेश ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए भारत में अपने मैच खेलने से इनकार कर दिया था। उसने आईसीसी से मांग की थी कि उसके मुकाबले किसी दूसरे देश में कराए जाएं। आईसीसी ने यह मांग नहीं मानी और इसके बाद बांग्लादेश टूर्नामेंट से अलग हो गया। इस फैसले पर पाकिस्तान ने खुलकर बांग्लादेश का समर्थन किया और भारत के खिलाफ अपना मैच भी न खेलने का ऐलान कर दिया।

लेकिन सोमवार को हालात तेजी से बदले। आईसीसी ने साफ कर दिया कि बांग्लादेश पर कोई जुर्माना नहीं लगाया जाएगा और उसे आने वाले वर्षों में एक और आईसीसी टूर्नामेंट की मेजबानी का मौका मिलेगा। इस फैसले से बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड संतुष्ट हो गया और उसने पाकिस्तान से अनुरोध किया कि वह “क्रिकेट के हित में” भारत के खिलाफ मैच खेले।

इसके बाद पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड, आईसीसी और बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड के बीच बैठक हुई। बांग्लादेश ने पाकिस्तान का समर्थन करने के लिए धन्यवाद कहा और खुद ही भारत के खिलाफ मैच खेलने की अपील कर दी। वहीं पाकिस्तान सरकार ने भी हस्तक्षेप करते हुए टीम को खेलने की मंजूरी दे दी।

इस पूरे घटनाक्रम से साफ हो गया कि पाकिस्तान का बहिष्कार फैसला पूरी तरह बांग्लादेश से जुड़ा हुआ था। जब बांग्लादेश को आईसीसी से राहत मिल गई और उसे भविष्य में फायदे का भरोसा मिला, तो उसने पाकिस्तान से अपना रुख बदलने को कहा। नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान ने भी अपना यू-टर्न ले लिया।

अब सारी खींचतान खत्म हो चुकी है और 15 फरवरी को कोलंबो में भारत और पाकिस्तान आमने-सामने होंगे। यह मुकाबला सिर्फ क्रिकेट का नहीं, बल्कि राजनीति और कूटनीति से जुड़े फैसलों का भी नतीजा माना जा रहा है। क्रिकेट फैंस के लिए राहत की बात यह है कि लंबे विवाद के बाद अब मैदान पर खेल देखने को मिलेगा।

भारत से मैच से पहले नकवी का विवादित बयान, आसिम मुनीर का नाम लेकर बढ़ाया सियासी ताप

मैच
मैच

पाकिस्तान पहले इस मैच को लेकर कई दिनों तक असमंजस में रहा। कभी बॉयकॉट की बात कही गई तो कभी ICC पर दबाव बनाने की कोशिश की गई। आखिरकार अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट बोर्ड और कुछ मित्र देशों के समझाने के बाद पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ खेलने पर सहमति जता दी। लगा कि मामला शांत हो गया है, लेकिन तभी नकवी के बयान ने फिर से हलचल पैदा कर दी।

मोहसिन नकवी ने कहा कि न तो वह, न पाकिस्तान सरकार और न ही फील्ड मार्शल आसिम मुनीर किसी दबाव या धमकी से डरते हैं। उन्होंने ICC और भारत का नाम लेकर यह बयान दिया, जिसे कई लोग गैरजरूरी और उकसावे वाला मान रहे हैं। क्रिकेट से जुड़ा मामला अचानक सेना और सरकार की ताकत दिखाने वाला बयान बन गया।

आसिम मुनीर हाल के महीनों में पाकिस्तान की राजनीति और सेना दोनों में चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। उन्हें पिछले साल सैन्य संघर्ष के बाद फील्ड मार्शल बनाया गया था और पाकिस्तान सरकार उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रतीक बताती है। ऐसे में नकवी द्वारा उनका नाम क्रिकेट विवाद से जोड़ना कई सवाल खड़े कर रहा है।

राजनीतिक और खेल विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान सिर्फ घरेलू जनता को संदेश देने के लिए दिया गया है। इससे यह दिखाने की कोशिश की गई कि पाकिस्तान किसी दबाव में नहीं झुकता। लेकिन इससे यह भी साफ हो गया कि क्रिकेट को भी अब सियासी रंग दिया जा रहा है।

गौर करने वाली बात यह है कि पाकिस्तान सरकार पहले मैच न खेलने की बात कर रही थी, लेकिन बाद में यू-टर्न लेते हुए खेलने का फैसला किया। सरकार ने कहा कि यह फैसला अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की भावना बनाए रखने के लिए लिया गया है। हालांकि नकवी के बयान ने इस फैसले को भी विवादों में ला खड़ा किया है।

अब सबकी नजर 15 फरवरी के मुकाबले पर है, जहां मैदान पर क्रिकेट होगा, लेकिन मैदान के बाहर बयानबाजी और राजनीति का असर भी साफ नजर आएगा। यह मुकाबला सिर्फ खेल नहीं, बल्कि दो देशों के बीच तनाव भरे रिश्तों की एक और झलक बनता दिख रहा है।

SIR पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ममता सरकार को बड़ा झटका

SIR
SIR

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि वोटर लिस्ट को सही और पारदर्शी बनाना लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि राज्यों को इस प्रक्रिया में दखल देने की जरूरत नहीं है और चुनाव आयोग को अपना काम स्वतंत्र रूप से करने दिया जाए।

इस मामले में सबसे गंभीर बात तब सामने आई जब अदालत को बताया गया कि पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग के अधिकारियों को धमकाया जा रहा है और कुछ जगहों पर उनके साथ हिंसा की घटनाएं हुई हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्य के डीजीपी को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने पूछा है कि चुनाव आयोग के अधिकारियों को सुरक्षा क्यों नहीं दी जा रही और इस मामले में क्या कार्रवाई की गई है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि कई जगह पुलिस एफआईआर तक दर्ज नहीं कर रही है। इस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में रुकावट डालना बेहद गंभीर मामला है और इसे तुरंत रोका जाना चाहिए।

वहीं, पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट से जुड़े काम की समय सीमा को बढ़ा दिया गया है। पहले यह प्रक्रिया 14 फरवरी तक पूरी होनी थी, लेकिन अब इसे एक हफ्ते आगे बढ़ा दिया गया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सभी नियुक्त अधिकारी समय पर अपनी ड्यूटी जॉइन करें और निष्पक्ष तरीके से काम करें। चुनाव आयोग को यह अधिकार भी दिया गया है कि जरूरत पड़ने पर अधिकारियों में बदलाव कर सके।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद साफ हो गया है कि SIR की प्रक्रिया जारी रहेगी। अदालत का कहना है कि मतदाता सूची को सही करना किसी सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि लोकतंत्र के हित में है। आने वाले दिनों में इस फैसले का असर पश्चिम बंगाल की राजनीति पर भी साफ दिखाई दे सकता है।

लेबर कोड के खिलाफ 12 फरवरी को देशव्यापी हड़ताल, मजदूर-किसान संगठनों का बड़ा ऐलान

Naveen Bansal
Naveen Bansal

ट्रेड यूनियनों का आरोप है कि चार नए लेबर कोड मजदूरों के अधिकार छीनने का काम कर रहे हैं। इन कानूनों से यूनियन बनाने और सामूहिक सौदेबाजी का अधिकार कमजोर हुआ है। हड़ताल करने की प्रक्रिया को भी कठिन बना दिया गया है। संगठनों का कहना है कि इससे मालिकों को फायदा और मजदूरों को नुकसान होगा। ठेका प्रथा को बढ़ावा मिलने से स्थायी नौकरियों की संख्या घटेगी और असुरक्षा बढ़ेगी।

मजदूर संगठनों ने सरकार से चारों लेबर कोड वापस लेने की मांग की है। इसके साथ ही उनका कहना है कि मनरेगा को मजबूत किया जाए, न्यूनतम मजदूरी बढ़ाई जाए और निजीकरण की नीति पर रोक लगे। यूनियनों का आरोप है कि रेलवे, बिजली, बैंक, बीमा, बंदरगाह और दूसरे सार्वजनिक क्षेत्रों को निजी हाथों में देने की तैयारी हो रही है, जिससे रोजगार पर खतरा पैदा हो रहा है।

हड़ताल की मांगों में ड्राफ्ट सीड बिल और बिजली संशोधन बिल को वापस लेने की बात भी शामिल है। संगठनों का कहना है कि ये कानून किसानों और उपभोक्ताओं के हितों के खिलाफ हैं और बड़ी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाए जा रहे हैं। इसके अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के बजट में कटौती पर भी विरोध जताया गया है।

ट्रेड यूनियनों का दावा है कि इस हड़ताल में बैंकिंग, परिवहन, कोयला, फैक्ट्री, निर्माण, बीमा, डाक विभाग और ग्रामीण क्षेत्रों के मजदूर शामिल होंगे। कई राज्यों में प्रदर्शन, रैलियां और सभाएं भी आयोजित की जाएंगी। छात्र और युवा संगठनों से भी इस आंदोलन में शामिल होने की अपील की गई है।

सरकार का कहना है कि लेबर कोड सुधारों का मकसद उद्योगों को आसान बनाना और रोजगार के नए अवसर पैदा करना है। लेकिन मजदूर संगठनों का तर्क है कि इससे सिर्फ कॉरपोरेट कंपनियों को फायदा होगा और आम कामगारों की सुरक्षा खत्म हो जाएगी।

अब सबकी नजर 12 फरवरी पर टिकी है। अगर यह हड़ताल बड़े पैमाने पर सफल होती है तो देश के कई हिस्सों में कामकाज प्रभावित हो सकता है। मजदूर संगठनों का कहना है कि यह आंदोलन मजदूरों, किसानों और आम जनता के अधिकारों की रक्षा के लिए जरूरी है।

ट्रेड डील और असम सीएम के वीडियो पर घमासान: संसद में आज फिर हंगामे के आसार

आम बजट
आम बजट

बैठक में इंडिया गठबंधन के कई दलों के नेता शामिल हुए। इसमें तय किया गया कि संसद के भीतर दोनों मुद्दों को जोरदार तरीके से उठाया जाएगा और सरकार से जवाब मांगा जाएगा। विपक्ष का कहना है कि ये दोनों मामले देशहित और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़े हैं, इसलिए इन पर चर्चा जरूरी है।

भारत-अमेरिका ट्रेड डील को लेकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार ने समझौते में अमेरिकी हितों को ज्यादा महत्व दिया है। विपक्ष चाहता है कि सरकार साफ बताए कि इस डील से देश के किसानों, छोटे व्यापारियों और उद्योगों को क्या फायदा होगा। पहले इस मुद्दे पर चर्चा के लिए स्थगन प्रस्ताव भी लाया गया था, लेकिन उसे मंजूरी नहीं मिली। इसके बाद अब संसद में विरोध और हंगामा तय माना जा रहा है।

दूसरा बड़ा मुद्दा असम के मुख्यमंत्री से जुड़ा एक कथित वीडियो है। आरोप है कि यह वीडियो असम बीजेपी के सोशल मीडिया अकाउंट से शेयर किया गया था, जिसमें प्रतीकात्मक रूप से एक खास समुदाय को निशाना बनाते हुए दिखाया गया। हालांकि बाद में वीडियो हटा लिया गया, लेकिन कांग्रेस ने इसे फिर से सामने लाकर सरकार की नैतिक जिम्मेदारी पर सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष का कहना है कि इस तरह की सामग्री समाज में नफरत फैलाने का काम करती है।

सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले खरगे के घर हुई बैठक में यह तय हुआ कि बजट चर्चा के साथ-साथ इन दोनों मुद्दों को भी संसद के भीतर जोर-शोर से उठाया जाएगा। विपक्षी नेताओं का मानना है कि सरकार इन सवालों से बचने की कोशिश कर रही है।

अब सबकी नजर आज की संसद की कार्यवाही पर टिकी है। क्या सरकार इन आरोपों पर जवाब देगी या फिर एक बार फिर सदन हंगामे की भेंट चढ़ जाएगा, यह देखने वाली बात होगी। फिलहाल इतना तय है कि संसद का माहौल आज काफी गर्म रहने वाला है।

घर उजड़ा, अब वोट का डर: असम में स्पेशल रिवीजन से क्यों सहमे लोग?

SIR
SIR

नौगांव और होजाई जिलों में सैकड़ों परिवार अस्थायी झुग्गियों में रह रहे हैं। उनका कहना है कि जब उनका स्थायी पता बदल गया, तो उन्हें नोटिस भेजकर वोटर लिस्ट की जांच के लिए बुलाया गया। कई लोग बार-बार दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं और अपने दस्तावेज दिखा रहे हैं। इसके बावजूद मन में डर बैठा है कि कहीं नाम लिस्ट से हट न जाए।

एक महिला ने कहा, “अगर वोटर लिस्ट से नाम कट गया तो हम क्या करेंगे? पहले घर चला गया, अब नागरिकता पर सवाल उठ रहा है। रात को नींद नहीं आती।” ऐसे ही कई लोग कहते हैं कि वे सालों से असम में रह रहे हैं, लेकिन अब अचानक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

दरअसल, स्पेशल रिवीजन के तहत बूथ लेवल ऑफिसर घर-घर जाकर यह जांच कर रहे हैं कि वोटर सही पते पर रह रहा है या नहीं। जिन लोगों का पता बदल गया है, उनसे नए सिरे से जानकारी मांगी जा रही है। प्रशासन का कहना है कि यह प्रक्रिया किसी को परेशान करने के लिए नहीं, बल्कि वोटर लिस्ट को सही और अपडेट रखने के लिए है।

अधिकारियों के मुताबिक, जिनका नाम गलती से कट भी जाता है, उन्हें फिर से जोड़ने का मौका मिलेगा। इसके लिए फॉर्म भरकर नया पता दर्ज कराया जा सकता है। जिला प्रशासन का कहना है कि योग्य नागरिक का नाम हटाया नहीं जाएगा और यह पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया है।

वहीं, इस मुद्दे पर राजनीति भी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के कुछ बयानों को लेकर खासतौर पर बंगाली मूल के मुसलमानों में नाराजगी और डर दोनों हैं। लोगों का कहना है कि उन्हें बार-बार शक की नजर से देखा जा रहा है। दूसरी तरफ बीजेपी का कहना है कि वोटर लिस्ट का काम चुनाव आयोग करता है और इसमें सरकार की कोई दखल नहीं है।

चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इस प्रक्रिया में लाखों नामों की जांच की गई है। मृत वोटरों, दोहरे नामों और पता बदल चुके वोटरों को चिन्हित किया गया है ताकि मतदाता सूची साफ और सही बनाई जा सके।

लेकिन जिन परिवारों के घर उजड़ चुके हैं, उनके लिए यह सिर्फ एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं बल्कि जीवन का बड़ा सवाल बन गई है। उन्हें डर है कि अगर वोटर लिस्ट से नाम कट गया तो उनकी पहचान और अधिकार दोनों पर असर पड़ेगा।

अब सबकी नजर 10 फरवरी को जारी होने वाली अंतिम वोटर लिस्ट पर टिकी है। लोग उम्मीद कर रहे हैं कि उनके नाम इसमें बने रहेंगे और उन्हें दोबारा अपनी नागरिकता साबित करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। असम में फिलहाल यही सवाल सबसे बड़ा बन गया है – “क्या घर के बाद अब वोट भी छिन जाएगा?”