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बालेन सरकार ने बदला नियम, सीमा पार खरीदारी पर 5 गुना बढ़ी छूट

काठमांडू: नेपाल सरकार ने भारत-नेपाल सीमा से खरीदारी करने वाले नागरिकों को बड़ी राहत देते हुए कस्टम ड्यूटी (सीमा शुल्क) छूट की सीमा पांच गुना बढ़ा दी है। अब सीमा पार से व्यक्तिगत उपयोग के लिए लाए गए ₹500 तक के सामान पर कोई कस्टम ड्यूटी नहीं देनी होगी। इससे पहले यह सीमा केवल ₹100 थी।

नेपाल सरकार का यह फैसला ऐसे समय आया है जब सीमा शुल्क को लेकर लागू किए गए सख्त नियमों के कारण सीमा क्षेत्रों में विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। कुछ महीने पहले बालेन शाह सरकार ने भारत से खरीदे गए ₹100 से अधिक मूल्य के सामान पर कड़ी निगरानी और शुल्क वसूली शुरू की थी, जिससे सीमा पार रहने वाले लोगों और व्यापारियों में नाराजगी बढ़ गई थी।

नेपाल राजपत्र में प्रकाशित नए प्रावधान के अनुसार, भूमि सीमा मार्ग से आने-जाने वाले यात्री अब ₹500 तक के व्यक्तिगत उपयोग और घरेलू सामान को शुल्क-मुक्त ला सकेंगे। हालांकि इस छूट का लाभ केवल गैर-व्यावसायिक सामान पर ही मिलेगा और जरूरत पड़ने पर खरीदारी का उचित कारण बताना होगा।

सरकार का मानना है कि इस फैसले से सीमा क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को राहत मिलेगी, जो रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भारत के बाजारों पर निर्भर रहते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे सीमा पार व्यापारिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल सकता है और हाल के दिनों में पैदा हुए असंतोष को कम करने में मदद मिलेगी।

नेपाल सरकार ने छात्रों के लिए भी एक विशेष रियायत की घोषणा की है। भारत में पढ़ाई करने वाले नेपाली छात्र अब एक लैपटॉप, टैबलेट या कंप्यूटर बिना कस्टम ड्यूटी के ला सकेंगे। इस कदम को शिक्षा और डिजिटल पहुंच को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

दूसरी बार बढ़े LPG के दाम, तीन महीने में फिर महंगी हुई रसोई गैस

नई दिल्ली: आम उपभोक्ताओं को महंगाई का एक और झटका लगा है। घरेलू रसोई गैस (LPG) सिलेंडर की कीमत में ₹29 की बढ़ोतरी कर दी गई है। नई दरें 7 जून से देशभर में लागू हो गई हैं। इस बढ़ोतरी के बाद 14.2 किलोग्राम वाले घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत दिल्ली में ₹913 से बढ़कर ₹942 हो गई है।

तेल कंपनियों द्वारा की गई यह बढ़ोतरी पिछले तीन महीनों में घरेलू LPG की दूसरी मूल्य वृद्धि है। नई कीमतों का असर करोड़ों परिवारों के मासिक बजट पर पड़ने की आशंका है, क्योंकि देश के अधिकांश घरों में खाना पकाने के लिए LPG का इस्तेमाल किया जाता है।

जानकारी के अनुसार, अलग-अलग राज्यों और शहरों में स्थानीय करों तथा परिवहन लागत के कारण सिलेंडर की अंतिम कीमत में थोड़ा अंतर हो सकता है। हालांकि ₹29 की बढ़ोतरी पूरे देश में लागू की गई है।

उद्योग सूत्रों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में जारी उतार-चढ़ाव और तेल कंपनियों पर बढ़ते वित्तीय दबाव के बीच यह फैसला लिया गया है। हाल के महीनों में वैश्विक ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर घरेलू बाजार पर भी देखने को मिला है।

विशेषज्ञों का मानना है कि LPG की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी का असर मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर सबसे अधिक पड़ सकता है। वहीं, उपभोक्ताओं को सलाह दी गई है कि वे अपने शहर की नवीनतम LPG दरों की जानकारी संबंधित तेल कंपनी की वेबसाइट या अधिकृत वितरकों से प्राप्त करें।

इस बढ़ोतरी के साथ एक बार फिर घरेलू रसोई का खर्च बढ़ गया है और आने वाले दिनों में महंगाई को लेकर बहस तेज होने की संभावना है।

15 साल के वैभव सूर्यवंशी ने रचा इतिहास, तोड़ा सचिन तेंदुलकर का 37 साल पुराना रिकॉर्ड

नई दिल्ली: भारतीय क्रिकेट को एक नया युवा सितारा मिल गया है। महज 15 साल की उम्र में वैभव सूर्यवंशी का भारतीय टी20 टीम में चयन हो गया है। इसके साथ ही उन्होंने क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर का 37 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया है।

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) ने आयरलैंड और इंग्लैंड के खिलाफ आगामी टी20 सीरीज के लिए टीम की घोषणा की है। इस टीम में बिहार के समस्तीपुर के रहने वाले वैभव सूर्यवंशी को पहली बार मौका मिला है। चयन के समय उनकी उम्र सिर्फ 15 वर्ष है, जिससे वह भारतीय पुरुष सीनियर टीम के लिए चुने जाने वाले सबसे युवा खिलाड़ी बन गए हैं।

इससे पहले यह रिकॉर्ड सचिन तेंदुलकर के नाम था, जिन्होंने 16 साल की उम्र में भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलना शुरू किया था। वैभव का चयन भारतीय क्रिकेट में एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है।

वैभव ने आईपीएल 2026 में राजस्थान रॉयल्स के लिए शानदार प्रदर्शन कर चयनकर्ताओं का ध्यान खींचा। उन्होंने पूरे सीजन में 776 रन बनाए और अपनी विस्फोटक बल्लेबाजी से कई रिकॉर्ड अपने नाम किए। उनके प्रदर्शन से प्रभावित होकर चयन समिति ने उन्हें राष्ट्रीय टीम में शामिल किया। मुख्य चयनकर्ता अजीत अगरकर ने भी माना कि वैभव के प्रदर्शन को नजरअंदाज करना संभव नहीं था।

वैभव की इस उपलब्धि को बिहार और भारतीय क्रिकेट के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वह इसी तरह प्रदर्शन करते रहे तो आने वाले वर्षों में भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े सितारों में शामिल हो सकते हैं। फिलहाल सभी की नजरें उनके संभावित अंतरराष्ट्रीय पदार्पण पर टिकी हैं।

पश्चिम एशिया संकट के बीच PM मोदी की बड़ी आर्थिक बैठक, विकास की रफ्तार पर मंथन

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी तनाव और उसके वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे प्रभाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्यों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की। बैठक में भारत की आर्थिक स्थिति, विकास की गति को बनाए रखने और वैश्विक चुनौतियों से निपटने की रणनीति पर विस्तार से चर्चा हुई।

बैठक के दौरान परिषद के सदस्यों ने पश्चिम एशिया संकट के भारत और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का आकलन प्रस्तुत किया। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, निवेश और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े मुद्दों पर भी विचार-विमर्श किया गया। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का भारत की विकास यात्रा पर न्यूनतम असर पड़े।

सूत्रों के अनुसार, चर्चा का एक बड़ा हिस्सा आर्थिक सुधारों को गति देने, निवेश आकर्षित करने तथा ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ और ‘ईज ऑफ लिविंग’ को और बेहतर बनाने पर केंद्रित रहा। प्रधानमंत्री मोदी ने आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने और सुधारों के लाभ आम लोगों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

बैठक में प्रधानमंत्री ने आर्थिक आत्मनिर्भरता और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग पर भी बल दिया। उन्होंने नागरिकों से जहां संभव हो, घर से काम (वर्क फ्रॉम होम) को प्राथमिकता देने, ईंधन की खपत कम करने और अगले एक वर्ष तक गैर-जरूरी विदेशी यात्राओं से बचने का आग्रह किया। साथ ही स्वदेशी उत्पादों के उपयोग को बढ़ावा देने, खाद्य तेल की खपत में संयम बरतने, प्राकृतिक खेती अपनाने तथा सोने की खरीदारी में अनावश्यक खर्च से बचने की अपील की।

यह बैठक ऐसे समय हुई है जब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस उपलब्धि का श्रेय सुधारों और देशवासियों की मेहनत को दिया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की आर्थिक स्थिति मजबूत बनी हुई है। ऐसे में सरकार विकास की गति को बनाए रखने के साथ-साथ संभावित बाहरी जोखिमों से अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने की दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रही है।

‘हिंदू-मुस्लिम नहीं, रोजगार चाहिए’: जंतर-मंतर से अभिजीत दीपके का सरकार पर हमला

नई दिल्ली: सोशल मीडिया पर शुरू हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) अभियान शनिवार को जमीनी आंदोलन में बदलता नजर आया, जब बड़ी संख्या में युवा दिल्ली के जंतर-मंतर पर एकत्र हुए। अमेरिका से दिल्ली पहुंचे CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने मंच से सरकार और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह कोई योजनाबद्ध राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि नाराज छात्रों और युवाओं की आवाज है।

जंतर-मंतर पर जुटी भीड़ को संबोधित करते हुए दीपके ने कहा कि पिछले कई दिनों से लोग पूछ रहे थे कि सोशल मीडिया पर अभियान चलाने से क्या होगा। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर पर उमड़ी भीड़ ही इस सवाल का जवाब है। दीपके ने दावा किया कि आने वाले दिनों में लाखों छात्र इस आंदोलन से जुड़ सकते हैं।

अपने संबोधन में उन्होंने रोजगार, परीक्षा प्रणाली और युवाओं से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। दीपके ने कहा कि वर्षों से देश में युवाओं को धार्मिक और जातीय राजनीति में उलझाया गया, लेकिन इससे रोजगार और शिक्षा की समस्याओं का समाधान नहीं हुआ।

CJP की मुख्य मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की है। संगठन का आरोप है कि हाल के वर्षों में परीक्षा प्रबंधन, भर्ती प्रक्रियाओं और शिक्षा व्यवस्था में गंभीर खामियां सामने आई हैं। प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने की अपील की गई।

जंतर-मंतर पर भारी पुलिस बल और बैरिकेडिंग की व्यवस्था की गई थी। बड़ी संख्या में छात्र, युवा और मीडिया कर्मी मौके पर मौजूद रहे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह प्रदर्शन तय करेगा कि सोशल मीडिया से निकला यह अभियान भविष्य में एक बड़े जन आंदोलन का रूप ले पाता है या नहीं।

भारत-बांग्लादेश संबंधों के जटिल दौर में दीनेश त्रिवेदी संभालेंगे कमान

यह नियुक्ति ऐसे समय हो रही है जब पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा की नई सरकार बनी है। सरकार बनने के बाद शुभेंदु अधिकारी ने घोषणा की कि चुनाव के दौरान किए गए वादे के अनुसार अवैध घुसपैठियों को बांग्लादेश वापस भेजा जाएगा। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस रुख का समर्थन किया है। प्रतिदिन सीमा पर घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जा रहा है। व्यवहारिक रूप से इसे “पुशबैक” कहा जा सकता है, हालांकि भारत के विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक रूप से कहा है कि वह पुशबैक नहीं करेगा और वापसी की प्रक्रिया बांग्लादेश सरकार से चर्चा के बाद होगी।

बांग्लादेश अपनी सीमा सुरक्षा बलों के माध्यम से इसका प्रतिरोध करने का प्रयास कर रहा है। उसका कहना है कि अज्ञात पहचान वाले लोगों को घुसपैठिया बताकर वापस भेजा जा रहा है और वह इसका कड़ा विरोध करता है। इससे सीमा पर तनाव बढ़ रहा है और कुछ स्थानों पर झड़पें भी हुई हैं।

घुसपैठ के मुद्दे पर भाजपा और शुभेंदु अधिकारी के रुख की बांग्लादेश में प्रतिक्रिया हुई है। दूसरी ओर बांग्लादेश चीन और पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान के सेना प्रमुख के बांग्लादेश आने की भी चर्चा है।

मोहम्मद यूनुस के कार्यकाल में भी चीन और पाकिस्तान के साथ निकटता बढ़ाने का प्रयास किया गया था। यूनुस चीन गए थे और वहां कुछ ऐसे बयान दिए थे जिन्हें भारत-विरोधी माना गया। यहां तक कि भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र और सिलीगुड़ी के निकट स्थित “चिकन नेक” क्षेत्र के संदर्भ में पाकिस्तान के साथ मिलकर दबाव बनाने जैसी बातें भी कही गई थीं।

हालांकि, यदि बीएनपी चुनाव जीतकर सत्ता में आती है तो उसके नेता तारिक रहमान ने भारत के साथ मजबूत संबंध बनाए रखने की बात कही है। भारत ने भी बांग्लादेश के साथ द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।

हाल ही में भारत ने तारिक रहमान के पिता तथा दिवंगत राष्ट्रपति जियाउर रहमान को श्रद्धांजलि दी। 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा रेडियो पर सबसे पहले उन्होंने ही की थी। भारत ने उनके मुक्तিযुद्ध समर्थक रुख का सम्मान किया।

इतना ही नहीं, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने खालिदा जिया के निधन के बाद आयोजित अंतिम संस्कार में भाग लिया। बाद में बांग्लादेश के विदेश मंत्री भारत आए और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई।

लेकिन हाल में तारिक रहमान के कार्यालय तथा बांग्लादेश के कई समाचारपत्रों ने बताया है कि वे चीन यात्रा की तैयारी कर रहे हैं। चर्चा है कि यदि वे सीधे चीन नहीं भी जाते तो मलेशिया में ठहराव लेकर चीन जा सकते हैं। भारत आने से पहले चीन जाना एक ऐसा कूटनीतिक संदेश माना जा सकता है जो भारत के लिए सुखद नहीं होगा।

ऐसी स्थिति में भारत चाहता है कि तारिक रहमान फिलहाल अपनी चीन यात्रा स्थगित कर दें, कम से कम तब तक जब तक दीनेश त्रिवेदी ढाका में अपना कार्यभार ग्रहण नहीं कर लेते। बदले में भारत वीजा नीति में ढील देने पर विचार कर सकता है। बांग्लादेश लंबे समय से भारतीय वीजा व्यवस्था को सामान्य करने की मांग कर रहा है। भारत ने विदेश मंत्री स्तर की वार्ता में इसका आश्वासन भी दिया था, हालांकि अभी तक इसे लागू नहीं किया गया है। संभावना है कि दीनेश त्रिवेदी के कार्यभार संभालने के बाद इस दिशा में कदम उठाए जाएं।

बांग्लादेश की एक और महत्वपूर्ण मांग गंगा जल बंटवारा समझौते से जुड़ी है, जिसकी अवधि नवंबर में समाप्त हो रही है। बांग्लादेश चाहता है कि भारत इसके स्थान पर एक नया समझौता करे और पूर्व की तरह 30 वर्ष की अवधि वाला समझौता दोहराया जाए।

इस विषय पर हाल ही में कोलकाता में दोनों देशों के तकनीकी और जल विशेषज्ञों की बैठक हुई थी। भारत ने बातचीत जारी रखने की इच्छा जताई है, हालांकि उसका मानना है कि 30 वर्ष के बजाय कम अवधि का समझौता अधिक उपयुक्त होगा। फिर भी भारत ने इस मुद्दे पर कोई नकारात्मक रुख नहीं अपनाया है और बांग्लादेश को सकारात्मक संकेत मिलने की उम्मीद है।

दीनेश त्रिवेदी की प्रधानमंत्री के साथ भी लंबी बैठक हुई है। बैठक का विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया, लेकिन इतना स्पष्ट है कि एक करियर राजनयिक के बजाय एक अनुभवी राजनीतिक नेता को उच्चायुक्त बनाकर भेजने का उद्देश्य दोनों देशों के संबंधों को नई ऊर्जा देना है। गंगा समझौते पर भी उनके ढाका पहुंचने के बाद कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा सकते हैं।

हालांकि, यदि बांग्लादेश चीन यात्रा की योजना में बदलाव नहीं करता और भारत को कड़ा संदेश देना चाहता है, तो स्थिति और जटिल हो सकती है। बांग्लादेश की ओर से कहा जा रहा है कि यदि तारिक रहमान चीन जाते भी हैं तो वे वहां भारत-विरोधी बयान नहीं देंगे। यूनुस ने जो रास्ता अपनाया था, उस पर वे नहीं चलेंगे।

बांग्लादेश का मानना है कि वह भारत और चीन दोनों के साथ अच्छे संबंध बनाए रख सकता है। शेख मुजीबुर रहमान की विदेश नीति भी यही कहती थी कि सभी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए जाएं।

भारत का कहना है कि बांग्लादेश में बिजली संकट बढ़ रहा है। जमात-ए-इस्लामी बिजली दरों में वृद्धि के खिलाफ आंदोलन कर रही है। इस संकट को दूर करने में भारत महत्वपूर्ण सहायता दे सकता है।

भारत का यह भी मानना है कि यदि बांग्लादेश अत्यधिक रूप से चीन पर निर्भर हो जाता है तो अंततः उसका नुकसान हो सकता है। श्रीलंका का उदाहरण सामने है, जहां चीन के प्रभाव के कारण आर्थिक और रणनीतिक कठिनाइयां पैदा हुईं। भारत का मानना है कि जिस प्रकार शेख हसीना ने उस जाल से दूरी बनाए रखी, उसी प्रकार बीएनपी भी सावधानी बरतेगी।

कुल मिलाकर स्थिति जटिल है, लेकिन दोनों पक्षों का मानना है कि बातचीत और कूटनीतिक संवाद के माध्यम से समस्याओं का समाधान संभव है।

‘डबल इंजन’ और बंगाल के विकास की संभावनाएँ

‘डबल इंजन’—यह एक ऐसा शब्द है जिसका इस चुनावी राजनीति में व्यापक रूप से प्रचार हुआ है। कई मामलों में विपक्ष के हाथों यह उपहास का विषय भी बना। लेकिन यदि ‘डबल इंजन’ का वास्तविक अर्थ केंद्र और राज्य के बीच के विवादों को समाप्त कर किसी राज्य को विकास के सकारात्मक मार्ग पर आगे बढ़ाना है, तो यह निश्चित रूप से सभी के स्वागत और समर्थन का विषय है।

शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा सरकार का पश्चिम बंगाल में गठन एक ऐतिहासिक घटना है। जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अपने राज्य में भाजपा कभी सत्ता में नहीं आ सकी थी। पहली बार भाजपा पश्चिम बंगाल की सत्ता पर आसीन हुई है। 1977 के बाद यह पहला अवसर है जब कोई अखिल भारतीय (पैन-इंडियन) राजनीतिक दल राज्य में सत्ता में आया है। जनसमर्थन के आधार पर यह केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल माना जाता है।

स्वतंत्रता के बाद जवाहरलाल नेहरू और डॉ. बिधान चंद्र राय के दौर में एक अर्थ में ‘डबल इंजन’ व्यवस्था थी। बाद में जब सिद्धार्थ शंकर राय मुख्यमंत्री बने, तब भी दिल्ली और कोलकाता दोनों एक ही राष्ट्रीय दल के अधीन थे। ज्योति बसु के लंबे मुख्यमंत्री काल में केंद्र में मित्रवत सरकारें आईं। कांग्रेस और भाजपा सरकारों के साथ भी संबंध सुधारने की कोशिशें हुईं, लेकिन वास्तविक ‘डबल इंजन’ सरकार कभी नहीं बनी।

पश्चिम बंगाल की नई सरकार के महत्वपूर्ण मंत्री और चिंतक स्वपन दासगुप्ता ने हाल ही में एक साक्षात्कार में एक महत्वपूर्ण बात कही। उनका कहना था कि उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता पश्चिम बंगाल के प्रशासन का ‘डी-पॉलिटिसाइजेशन’ यानी राजनीतिक प्रभाव से मुक्त करना है—चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या अन्य कोई क्षेत्र। सीपीएम शासन से लेकर तृणमूल सरकार के पंद्रह वर्षों तक एक प्रकार का ‘पार्टी-सोसाइटी’ विकसित हो गया था। अब उम्मीद है कि यह ‘डबल इंजन’ सरकार संघीय ढांचे के भीतर पश्चिम बंगाल को विकास के मार्ग पर आगे बढ़ाएगी।

सामान्य लोगों में इस उम्मीद को लेकर भारी आशावाद दिखाई देता है। सिर्फ एक महीने के भीतर कई महत्वपूर्ण निर्णय तेजी से लिए जा सके हैं। केवल वित्तीय संकट से राहत या केंद्र द्वारा आवंटित धन की स्वीकृति ही नहीं, बल्कि नीतिगत स्तर पर कई टकरावों से राज्य को मुक्ति मिलने की संभावना भी बनी है। बचपन से हमने केंद्र और राज्य के बीच संघर्ष देखा है। कभी मालभाड़ा समानीकरण नीति, कभी जीएसटी—हर विषय पर केंद्र द्वारा उपेक्षा के आरोप लगते रहे हैं। सर्वसम्मति की राजनीति तक पहुँचना कभी आसान नहीं रहा।

एक समय यही केंद्र-विरोधी और कांग्रेस-विरोधी संघर्ष सीपीएम के नेतृत्व में चला था।

सितंबर 1966 में जब प्रफुल्ल चंद्र सेन मुख्यमंत्री थे और ज्योति बसु विपक्ष के नेता, तब उन्होंने सरकारी नीतियों के विरोध में लगातार 48 घंटे के बंद का आह्वान किया था। इस बंद के विरोध में सैकड़ों रिक्शाचालक, फेरीवाले और छोटे दुकानदार सुबह-सुबह ज्योति बसु के घर का घेराव करने पहुँचे। उनके नारे थे—“ज्योतिबाबू जवाब दीजिए, बंद के दो दिन हम क्या खाएँगे?”

उनके बैनरों पर लिखा था—

“बंद का आह्वान वापस लो,

हमें जीने और कमाने दो।

दिन कमाएँ, दिन खाएँ,

बंगाल बंद में भूखे जाएँ।”

प्रदर्शनकारियों ने पत्रकारों को बताया कि ज्योति बसु इस घेराव से नाराज़ हो गए थे। उन्होंने कहा था—“मैं अभी-अभी दुर्गापुर से रातभर जागकर लौटा हूँ। मुझे आराम की जरूरत है। आप लोग मेरे पास क्यों आए हैं? प्रफुल्ल बाबू के पास जाइए।”

जब पत्रकारों ने पूछा कि 48 घंटे का बंद क्यों, तो ज्योति बसु ने जवाब दिया—“12 घंटे और 24 घंटे के बंद कर के देख लिया, कोई परिणाम नहीं निकला। इसलिए 48 घंटे का बंद।”

यही थी बंद और हड़ताल की राजनीति।

(स्रोत: आनंदबाजार पत्रिका)

हालाँकि मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने बंद की संस्कृति को काफी हद तक समाप्त कर दिया। बुद्धदेव भट्टाचार्य भी बंद और हड़ताल के विरोधी थे, जबकि उस समय तृणमूल कांग्रेस कई बार बंगाल बंद का आह्वान करती थी। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र को बंद से प्रभावित न होने देने के लिए बुद्धदेव बाबू ने काफी प्रयास किए थे।

सीपीएम की ‘घेराव राजनीति’ इतनी प्रसिद्ध हुई कि ‘घेराव’ शब्द ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में शामिल हो गया। लेकिन इस संस्कृति में बदलाव की आवश्यकता थी। ममता बनर्जी ने बंद संस्कृति को काफी कम किया, लेकिन वे पश्चिम बंगाल में विकास और औद्योगिक उछाल नहीं ला सकीं। उलटे यह धारणा बनी कि राज्य में ‘विऔद्योगीकरण’ हो रहा है।

बड़े-बड़े उद्योगपति निवेश सम्मेलनों में आते हैं, बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन अंततः कुछ स्थानीय व्यवसायियों को छोड़कर बाहरी निवेश उस स्तर पर नहीं आता जैसा गुजरात में देखने को मिलता है। जिस प्रकार गुजरात में विदेशी निवेश आता है, क्या वैसा पश्चिम बंगाल में होता है?

वर्तमान केंद्र-राज्य संबंधों को समझने के लिए एक उदाहरण पर्याप्त होगा। कोलकाता हवाई अड्डे का आधुनिकीकरण अत्यंत आवश्यक है। देश के अधिकांश हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण और निजीकरण हो चुका है। हवाई यात्रा करने वाले लोग जानते हैं कि कोलकाता हवाई अड्डा कई मामलों में पीछे रह गया है।

जब बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री थे, तब इसके निजीकरण और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई थी। उस समय नागरिक उड्डयन मंत्री शाहनवाज़ हुसैन ने सुझाव दिया था कि हवाई अड्डे के परिसर में स्थित मस्जिद को कहीं और स्थानांतरित कर दिया जाए ताकि दूसरा रनवे बनाया जा सके। बुद्धदेव बाबू इस प्रस्ताव से सहमत थे।

लेकिन अंततः यह योजना सफल नहीं हो सकी क्योंकि पार्टी नेतृत्व को आशंका थी कि मस्जिद हटाने से राजनीतिक नुकसान होगा और मुस्लिम मतदाता तृणमूल कांग्रेस की ओर चले जाएँगे। इसलिए अंतिम स्वीकृति नहीं मिली।

ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद भी पूर्ण निजीकरण को मंजूरी नहीं मिली। उन्होंने एयरपोर्ट अथॉरिटी से ही आधुनिकीकरण का काम कराने को कहा। परिणामस्वरूप कुछ सेवाओं का निजीकरण हुआ, लेकिन व्यापक बदलाव संभव नहीं हो पाया। धीरे-धीरे और अधूरे तरीके से हुए कामों के कारण योजना संबंधी कमियाँ भी सामने आईं।

लेख के अनुसार, शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद मस्जिद को स्थानांतरित कर हवाई अड्डे के आधुनिकीकरण का निर्णय तुरंत लिया गया। विकास के दृष्टिकोण से यदि अब कोलकाता हवाई अड्डे का पूर्ण आधुनिकीकरण और निजीकरण होता है, तो इससे पश्चिम बंगाल की ‘ब्रांड वैल्यू’ बढ़ेगी। हवाई अड्डों और बंदरगाहों का ढाँचा मजबूत किए बिना भारी उद्योगों में निवेश आकर्षित नहीं किया जा सकता।

पश्चिम बंगाल एक ऋणग्रस्त राज्य है। वित्त आयोग के अनुसार केरल, पंजाब और पश्चिम बंगाल लंबे समय से भारी ऋण के बोझ तले हैं। जब प्रणब मुखर्जी वित्त मंत्री थे, तब इस संकट के समाधान का प्रयास किया गया था। प्रणब मुखर्जी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मिलकर कोशिश भी की, लेकिन कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका।

अशोक मित्र और असीम दासगुप्ता के वित्त मंत्री रहने के दौरान जो ओवरड्राफ्ट संस्कृति विकसित हुई थी, उसे बदलकर बाजार से पूंजी जुटाने की नीति अपनाने की सलाह केंद्र ने दी थी। लेकिन राजनीतिक टकरावों के कारण कोई सर्वसम्मत समाधान लागू नहीं हो पाया। समस्या आज भी बनी हुई है।

अब पश्चिम बंगाल के लोग आशा कर रहे हैं कि प्रशासनिक जटिलताएँ दूर होंगी। नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक लाहिड़ी राज्य पर विशेष ध्यान देंगे। शुभेंदु अधिकारी अपने प्रमुख सलाहकार सुब्रत गुप्ता के साथ प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, नीति आयोग और मुख्यमंत्री कार्यालय के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर पाएँगे।

नोट: यह अनुवाद मूल बंगाली लेख के विचारों, राजनीतिक दृष्टिकोण और दावों को यथासंभव यथावत रखते हुए किया गया है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के हैं और अनुवाद का उद्देश्य केवल भाषाई रूपांतरण है।

अभिषेक बनर्जी की प्राइवेट सिक्योरिटी पर उठे गंभीर सवाल

कोलकाता : तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी पर कथित हमले ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं। सबसे बड़ा सवाल उनकी प्राइवेट सिक्योरिटी पर है। अभिषेक बनर्जी के पास उनकी ट्रस्टेड प्राइवेट सिक्योरिटी है। ये वे सिक्योरिटी वाले हैं जो परछाई की तरह अभिषेक बनर्जी के साथ रहते हैं, पर वे उस दिन नहीं दिखे।  यह वह प्राइवेट सिक्योरिटी है जो उनके एकदम करीब रहती है।

सवाल उठता है कि सभी का अचानक गायब हो जाना, नेताओं का चले जाना, मोटरसायकिल वाले समर्थकों का भी वहां से पहले ही प्रस्थान कर जाना, ये सब क्या कुछ और कहानी बयां नहीं कर रहे हैं।

वायरल वीडियो में उनके साथ उनकी डिजिटल टीम के लोगों को जरूर देखा जा रहा है, जहां एक युवती हर क्षण का वीडियो रिकार्ड कर रही है। जब वे पार्टी कर्मी के घर पहुंचे हैं, वहां भी उनकी डिजिटल टीम मौजूद थी। सारी टीम मौजूद थी तो फिर सिक्योरिटी टीम कहां गयी ? जहां अभिषेक बनर्जी पर भीड़ के हमले या अंडा फेंके जाने की बात की जा रही है, वह स्थान कोई गली में नहीं था, बल्कि चौड़ी सड़क थी।

अभिषेक अक्सर बाहर जाते समय एसयूवी का उपयोग करते हैं। इस मामले में देखा गया कि वह एसयूवी छाेड़ कर अचानक मोरसाइकिल से गंतव्य की ओर रवाना हुए। गौर करने लायक बात यह भी है कि मोटरसाइकिल पर पहले वे हेलमेट नहीं पहने थे लेकिन उन्हें कुछ क्षण बाद ही हेलमेट मुहैया करा दी गयी। वह भी नयी हेल्मेट। गांव गिरांव में इस तरह हेलमेट का प्रचलन नहीं है। यह भी देखने लायक बात थी कि सोनारपुर उनके जाने के पहले उनके समर्थकों का बड़ा हिस्सा मोटरसाइकिल लिये हुए उनकी अगवानी करने को खड़ा था, पर बाद में वहां से सब चले गये। अभिषेक वहां से एक् पार्टी कर्मी के साथ मोटरसाइकिल पर निकले।

आश्चर्य की बात यह है कि मौके पर स्थानीय सांसद या पार्टी का विधानसभा कैंडिडेंट भी नदारद थे। यहां तक कि कोई वरिष्ठ नेता भी वहां मौजूद नहीं था। दूसरी तरफ टीएमसी का आरोप है कि मौके पर सीआरपीएफ का एक जवान इशारा करके किसी को बुला रहा था। अब वह ट्रैफिक व्यवस्था देख रहा था कि किसी को इशारा कर था, यह नहीं पता।

उल्लेखनीय है कि लगभग 26 दिन बाद अभिषेक बनर्जी पब्लिक में निकले और लोगों से मिलने का प्रयास किया। वहां जो कुछ हुआ उसके बाद मामला अस्पतालों पर दोषारोपण तक पहुंच गया, क्योंकि कोई भी अस्पताल गंभीर चोट नहीं होने के कारण उन्हें एडमिट करने को तैयार नहीं था। फिलहाल तबीयत खराब होने के कारण वह आराम कर रहे हैं। वे जल्द स्वस्थ हों मगर उनकी सिक्योरिटी के ऊपर कई सवालिया निशान उठ रहे हैं कि उनकी प्राइवेट सिक्योरिटी एकदम चाक चौबंद हुआ करती थी वह इस घटना के समय कहां थी और क्या कर रही थी?

दक्षिण दिल्ली के होटल में भीषण आग, 21 की मौत, कई घायल; विदेशी मेडिकल टूरिस्ट भी शामिल

दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर में बुधवार सुबह एक पांच मंजिला होटल और रेस्तरां की इमारत में भीषण आग लग जाने से कम से कम 21 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। अधिकारियों ने इसकी पुष्टि की है।

आग सुबह करीब 8:50 बजे हौज रानी इलाके की तंग गलियों में स्थित ‘मिकासा इन’ होटल के बेसमेंट में लगी। इसी इमारत के बेसमेंट में ‘लेमन ग्रीन’ रेस्तरां भी संचालित हो रहा था।

होटल के रेस्तरां में शेफ के तौर पर काम करने वाले केसर सिंह ने इस खौफनाक मंजर को बयां करते हुए कहा, “सुबह करीब 8:00 बजे मैंने इलेक्ट्रिक स्टोव चालू करने की कोशिश की, तभी अचानक तेज लपटें उठने लगीं। मुझे तुरंत अहसास हुआ कि आग पहले ही फैल चुकी है और मैंने फौरन अपने सहायक को अलर्ट किया।”

आपातकालीन कॉल मिलने के बाद दिल्ली फायर सर्विस (DFS) ने शुरुआत में छह फायर टेंडर और आपातकालीन वाहन मौके पर भेजे। लेकिन आग की भयावहता को देखते हुए तुरंत अतिरिक्त दमकल गाड़ियां, वॉटर बाउज़र और क्विक-रिस्पॉन्स व्हीकल तैनात किए गए।

दमकल कर्मियों ने धुएं से भरे बेसमेंट में घुसकर सबसे पहले तीन लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला, जिन्हें कैट्स (CATS) एम्बुलेंस के जरिए तुरंत अस्पताल ले जाया गया।

37 लोग रेस्क्यू, जांच जारी

सुबह 11:20 बजे तक दिल्ली फायर सर्विस के जवानों, पुलिस टीमों और स्थानीय निवासियों के संयुक्त प्रयासों से इमारत में फंसे 37 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया। सभी रेस्क्यू किए गए लोगों को इलाज और मेडिकल जांच के लिए विभिन्न स्थानीय अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, होटल में ठहरे अधिकांश लोग विदेशी नागरिक थे, जो इलाज के सिलसिले में भारत आए हुए थे।

फिलहाल आग पर काबू पा लिया गया है, लेकिन आग लगने के सटीक कारणों का अभी पता नहीं चल पाया है। अधिकारियों ने मामले की जांच शुरू कर दी है और विस्तृत विवरण का इंतजार है।

तहलका की पड़ताल: स्टे माफिया का खेल

दिल्ली के बाटला हाउस में बिल्डरों से जबरन वसूली का खेल चलता है। इस वसूली के लिए बाकायदा अदालती प्रक्रियाओं का दुरुपयोग किया जाता है। तहलका एसआईटी की इस रिपोर्ट से पता चलता है कि बाटला हाउस के अनधिकृत निर्माण में तेजी ने स्टे माफिया को जन्म दिया है। ये स्टे माफिया अदालती आदेशों, पुलिस की मिलीभगत और कानूनी देरी का फायदा उठाकर बिल्डरों से जबरन वसूली करते हैं। तहलका एसआईटी की यह रिपोर्ट :-

भारत भर की अदालतों ने बार-बार चेतावनी दी है कि जनहित याचिका (पीआईएल) जैसे सम्मानजनक मंच का दुरुपयोग अक्सर व्यक्तियों या विशिष्ट परियोजनाओं को निशाना बनाने के लिए तेजी से ब्लैकमेल और जबरन वसूली के साधन के रूप में किया जा रहा है। पिछले कई वर्षों में न्यायपालिका ने अपने फैसलों के माध्यम से इस तरह के दुर्व्यवहार को रोकने के लिए बार-बार प्रयास किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पाया है कि जनहित याचिकाओं का इस्तेमाल कभी-कभी दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में बुनियादी ढांचे और पुनर्विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए किया जाता है, जो कभी-कभी प्रतिस्पर्धियों या आर्थिक लाभ चाहने वाले निहित स्वार्थों के इशारे पर होता है। अदालतों की राय में कथित अनधिकृत निर्माणों को चुनौती देने वाले कई मामले ब्लैकमेलिंग प्रकार के मुकदमे के समान हैं, जिनका उद्देश्य जनहित की सेवा करने से कम और बिल्डरों से पैसा निकालने से अधिक है।
गुजरात उच्च न्यायालय ने हाल ही में जनहित याचिका का दुरुपयोग करने (जेल के पास स्थित एक निर्माण को ध्वस्त करने की मांग करते हुए व्यक्तिगत लाभ के लिए एक तंत्र का उपयोग करने) के लिए एक याचिकाकर्ता पर 20 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका का इस्तेमाल नागरिकों को ब्लैकमेल करने के आरोप में एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) पर 10 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई पुनर्विकास परियोजना के खिलाफ प्रेरित जनहित याचिका दायर करने के लिए एक सोसाइटी पर लगाए गए 1 लाख रुपए के जुर्माने को बरकरार रखा है।
ये मामले इस बात का केवल एक पहलू दर्शाते हैं कि किस प्रकार कानूनी तरीकों का कथित तौर पर जबरन वसूली के लिए हथियार के रूप में दुरुपयोग किया जा रहा है। तहलका की नवीनतम पड़ताल कथित तौर पर दबाव बनाने के एक अन्य साधन- अदालती स्थगन आदेशों पर केंद्रित है। स्थगन आदेश एक न्यायिक निर्देश है, जो किसी मामले के निपटारे तक कानूनी कार्यवाही को अस्थायी रूप से रोक देता है या यथास्थिति बनाए रखता है। जांच से पता चलता है कि कुछ मामलों में इस तरह के आदेशों का कथित तौर पर ब्लैकमेल और जबरन वसूली के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के जामिया नगर में स्थित बाटला हाउस इलाका पहली बार 2008 में हुए विवादास्पद पुलिस मुठभेड़ के बाद राष्ट्रीय सुर्खियों में आया, जो एक आतंकवाद विरोधी अभियान से जुड़ा था। इस खुलासे ने इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) नेटवर्क को बड़ा झटका दिया था। इस घटना ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया और जनता की राय को बुरी तरह से विभाजित कर दिया। लगभग दो दशक बाद यह अनधिकृत बस्ती एक बार फिर ध्यान आकर्षित कर रही है। लेकिन इस बार अवैध निर्माण गतिविधियों से जुड़े एक फलते-फूलते स्टे ऑर्डर माफिया के आरोपों को लेकर।
बाटला हाउस एक अनधिकृत बस्ती बनी हुई है, जहां संपत्ति का पंजीकरण औपचारिक रूप से नहीं होता है और लेनदेन अक्सर जनरल पॉवर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) व्यवस्था के माध्यम से किए जाते हैं। इसके बावजूद घनी आबादी वाला यह मुस्लिम बहुल इलाका एक प्रमुख आवासीय केंद्र के रूप में विकसित हो गया है, जहां अपार्टमेंट्स की कीमतें करोड़ों में हैं। बाटला हाउस मामले में तहलका की पड़ताल से पता चलता है कि कैसे कुछ गैर सरकारी संगठन और व्यक्ति कथित तौर पर अवैध निर्माणों पर अदालती रोक का इस्तेमाल स्थानीय बिल्डरों से पैसे वसूलने के साधन के रूप में कर रहे हैं। इस इलाके के बिल्डर अक्सर इस घटना को स्टे माफिया कहते हैं। स्टे माफिया और उनके अवैध वसूली के खेल के बारे में तहलका ने कई कथित पीड़ितों से बात की, जिन्होंने विस्तार से बताया कि यह गिरोह किस तरह काम करता है।
‘यह 800 वर्ग गज का एक भूखंड है, जिसे अधिकारियों द्वारा वर्षों पहले सील कर दिया गया था। इसके बावजूद निर्माण कार्य जारी रहा, अपार्टमेंट बनाए गए और करोड़ों में बेचे गए। लोग वर्षों से इस इमारत में रह भी रहे हैं। कागजों पर तो यह इमारत सीलबंद है, लेकिन असल में यहां लोग रह रहे हैं।’ -कथित पीड़ित जावेद ने तहलका के गुप्त रिपोर्टर को बताया।
‘इस 800 वर्ग गज के भूखंड के मालिक प्रभावशाली लोग हैं, इसलिए अदालत द्वारा भवन निर्माण पर रोक लगाए जाने के बाद भी उन्होंने निर्माण कार्य नहीं रोका। उन्होंने उन ब्लैकमेलर्स को भी पैसे नहीं दिए, जिन्होंने कथित तौर पर उनसे 4-5 करोड़ रुपए की मांग की थी। लेकिन अब इतने वर्षों के बाद उन्हें एक और अनधिकृत मंजिल के निर्माण के लिए भुगतान करना पड़ सकता है, क्योंकि इस मामले की देखरेख कर रहे वर्तमान न्यायाधीश बहुत सख्त हैं।’ -जावेद ने तहलका रिपोर्टर को बताया।
‘बाटला हाउस इलाके में एक इमारत का निर्माण करते समय मुझे भी ब्लैकमेल किया गया था। उन्होंने मेरी इमारत पर अदालत से रोक आदेश प्राप्त कर लिया और 17 लाख रुपए की मांग की। अंततः यह सौदा 6 लाख रुपए में तय हुआ, जिसके बाद उन्होंने रोक आदेश वापस ले लिया।’ -जावेद ने कहा।
‘अदालती आदेशों के जरिए ब्लैकमेल करने वाले गिरोहों में कथित तौर पर शामिल लोग अलग-अलग पृष्ठभूमि से आते हैं। कुछ लोग गैर सरकारी संगठनों से जुड़े हैं। कुछ स्थानीय समाचार पत्र चलाते हैं। कुछ झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों या पुरानी दिल्ली से हैं, और यहां तक कि बिहार के लोग भी दिल्ली के आधार कार्ड का इस्तेमाल करके इस कथित जबरन वसूली रैकेट में शामिल हैं।’ -जावेद ने बताया।
‘ब्लैकमेलर बाटला हाउस में किसी भी अनधिकृत इमारत का निर्माण शुरू होने का इंतजार करते हैं। वे पहली छत की पटिया के लगने का इंतजार करते हैं, ताकि परियोजना में और अधिक पैसा लगाया जा सके। दूसरी छत बनने तक लाखों रुपए खर्च हो चुके होते हैं। इसके बाद स्टे माफिया इमारत की तस्वीरें खींचता है और इसे अवैध निर्माण बताते हुए स्टे ऑर्डर जारी करवाने के लिए अदालत का रुख करता है। अदालत द्वारा स्थगन आदेश जारी होते ही कथित ब्लैकमेलिंग की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।’ -जावेद ने बताया।
‘स्थगन आदेश एक दीवानी मुकदमे का हिस्सा होता है और ऐसे मामलों को सुलझने में वर्षों लग सकते हैं। ब्लैकमेलर अदालत से लंबी अवधि के लिए स्थगन की मांग करते रहते हैं। निर्माण कार्य लंबे समय तक रुका रहने से बिल्डर निराश हो जाते हैं और अंततः कई लोग समझौता करने और पैसे देने के लिए सहमत हो जाते हैं।’ -एमसीडी इंजीनियर आदिल ने तहलका के रिपोर्टर से बात करते हुए यह आरोप लगाया।
‘पुलिस द्वारा अनधिकृत क्षेत्रों में निर्मित प्रत्येक छत के लिए कथित तौर पर पैसे लेना एक नियमित प्रक्रिया है। सौदे के आधार पर प्रति छत की दर 50,000 रुपए से लेकर 70,000 रुपए तक होती है। मैंने अपने छः मंजिला भवन के निर्माण के दौरान पुलिस को 2.5 लाख रुपए का भुगतान किया था।’ -बाटला हाउस के निवासी सलीम ने तहलका के रिपोर्टर से बात करते हुए यह दावा किया।
बाटला हाउस इलाके में तहलका रिपोर्टर की मुलाकात सबसे पहले जावेद (बदला हुआ नाम) से हुई। जावेद ने तहलका रिपोर्टर को कथित स्टे माफिया के नेटवर्क के बारे में विस्तार से बताया। जावेद के अनुसार, ब्लैकमेलर बाटला हाउस में अनधिकृत भूखंडों पर निर्माण शुरू होने का इंतजार करते हैं। जावेद ने कहा कि वे पहली छत की पटिया के बनने का इंतजार करते हैं, ताकि बिल्डर निर्माण में और अधिक पैसा लगाए।
दूसरी छत बनने तक बिल्डर लाखों रुपए खर्च कर चुका होता है। इसके बाद कथित स्टे माफिया इमारत की तस्वीरें खींचता है और इसे अवैध निर्माण बताते हुए स्टे ऑर्डर जारी करवाने के लिए अदालत का रुख करता है। जावेद ने आगे कहा कि अदालत द्वारा स्थगन आदेश जारी होते ही कथित ब्लैकमेलिंग की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस बातचीत से यह भी संकेत मिलता है कि इस प्रक्रिया में बिचौलियों, वकीलों और अन्य लोगों की कथित संलिप्तता होती है।
रिपोर्टर : ये मामला क्या है स्टे वाला?
जावेद : अब ये जो जगह है, ये जो प्लॉटिंग हुई है, ये XXXXX के खेत थे। उनके वालिद साहब के ये प्लॉट थे, खेत थे। भैंस पालते थे। तरक्की हुई, मकान बनने शुरू हो गए, बिल्डिंग बन गई। अब ये बिल्डिंग है, ये 800 गज की बिल्डिंग है। अब इस फ्लोर पर स्टे ले आए। लेंटर डाला, पहला लेंटर पड़ गया। दूसरा पड़ गया। तीसरे लेंटर पर कोर्ट चले गए, स्टे ले आए- ये बिल्डिंग इल्लीगल है।
रिपोर्टर : मान लीजिए मैं बिल्डिंग बना रहा हूं…?
जावेद : चलो ठीक है, आप बिल्डिंग बना रहे हो, ये प्लॉट है, अब मुझे आपसे पैसे लेने हैं….।
रिपोर्टर : आपको मुझे ब्लैकमेल करना है? पैसे लेने हैं?
जावेद : हां, मतलब मैं आपसे लूट रहा हूं, 420 कर रहा हूं… पुलिस के साथ करूंगा, लीगल रूल से करूंगा…।
जावेद (आगे) : मुझे क्या है, पहले बिल्डिंग बनाना शुरू कर दी, पहले लेंटर में मैं कुछ नहीं करूंगा, क्यूंकि मैं चाहूंगा आपके 50-60 लाख और लग जाएं। यानी 100 गज का प्लॉट है, आपने 2 करोड़ का प्लॉट बेचा, …अब जैसे ही दूसरा लेंटर चलेगा, मैं जाऊंगा, इसके फोटो खिंचवाऊंगा. इसके पीछे चेन है पेपर की, जो किसान बैठे हुए हैं- ‘ये प्लॉट हमारा है। ये अवैध तरीके से बना रहे हैं।’ मैं जाके वकील के थ्रू कोर्ट में अर्जी लगा दूंगा। कोर्ट फोन करेगा- ‘फला बिल्डिंग बन रही है, उसको रोको।’ कोर्ट लिखकर दे देगा। पुलिस वाले आएंगे, पुलिस वाले बोलेंगे- ‘तेरी बिल्डिंग पर स्टे है।’ पुलिस मिली हुई है, दोनों तरफ से। वो काम रुक गया। अब आप परेशान, किसने स्टे लिया? मेरी बिल्डिंग रुकवाई किसने? अब मैं अंदर खाने में अपनी डिमांड रख के किसी को भेजूंगा, कि मुझे 20 लाख चाहिए, 25 लाख चाहिए। अब जितने भी एनजीओ चला रहे हैं, वो ये काम करते हैं। वो अंदर खाने कर रहे हैं, झोंपड़-पट्टी वाली जो  औरतें हैं, उनके नाम से किसी से डाल देंगे, जो यहां नहीं रहती… बस अब आप ढूंढते रहो, कराया मैंने है…।

आगे की बातचीत में जावेद बताते हैं कि कथित तौर पर अदालत से स्टे ऑर्डर प्राप्त करने वाले लोग बिल्डरों के साथ सीधे संपर्क से कैसे बचते हैं। उनका दावा है कि इस तरह के अभियानों के पीछे के असली लोग छिपे रहते हैं और अपनी मांगों को रखने के लिए बिचौलियों का इस्तेमाल करते हैं। इस बातचीत से पर्दाफाश होने का डर भी सामने आता है, जिसमें जावेद का कहना है कि रिकॉर्डिंग या स्टिंग ऑपरेशन से बचने के लिए सीधी मुलाकातों से बचा जाता है।
रिपोर्टर : एक चीज बताइए, जो स्टे लेने जा रहा है, उसका नाम, एड्रेस कोर्ट से मिल जाएगा?
जावेद : सब होता है, लेकिन मैं आपसे मिलूंगा नहीं।
रिपोर्टर : पर्सनली नहीं मिलूंगा?
जावेद : नहीं।
रिपोर्टर : ऐसा क्यूं?
जावेद : देखिए, मैं आपसे मिलूंगा नहीं, पुलिस नहीं ढूंढेगी, आप ढूंढोगे।
रिपोर्टर : आप मिलोगे नहीं, ऐसा क्यूं?
जावेद : अगर मैं आपसे पर्सनली मिलूंगा, क्या पता आप मेरी वीडियो बना लो, बैठा लो, एक्सपोज कर दो। मेरा काम ही ये है, लोगों से चोरी-चोरी करना…।

आगे की बातचीत में जावेद बताते हैं कि कैसे कथित स्टे रैकेट प्रॉक्सी पहचान और कमजोर लोगों का उपयोग करके काम करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि स्टे माफिया ब्लैकमेल करने के लिए अदालती स्टे प्राप्त करने के लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल करते हैं। उनके अनुसार, वे कभी-कभी झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों में रहने वाली महिलाओं से संपर्क करते हैं, उन्हें थोड़ी सी रकम देते हैं। उनके हस्ताक्षर लेते हैं और उनके नाम पर रहने की व्यवस्था सुरक्षित कर लेते हैं। अक्सर इन महिलाओं को इसकी जानकारी भी नहीं होती है। उन्होंने दावा किया कि कई बार बिहार में बैठे लोग कथित तौर पर दिल्ली के आधार कार्ड का इस्तेमाल करके स्टे ऑर्डर प्राप्त कर लेते हैं।
जावेद : अब ये तो मेरा काम हो गया। अब आप समझ लो, आगे झोंपड़-पट्टी है, 3-4 लेडीज पड़ी हैं, मैंने 500 देकर उसके साइन करा लिए। अब ढूंढ लो, अब पुलिस आएगी।
रिपोर्टर : अच्छा, उस औरत को 10-20 हजार देकर उसके नाम से स्टे करा दिया?
जावेद : स्टे करा दिया…।
रिपोर्टर : उसको पता भी नहीं है?
जावेद : वो मिलेगी ही नहीं। झोंपड़-पट्टी में कहां ढूंढोगे आप…, ऐसे भी लोग हैं, वो बिहार बैठकर स्टे ले रहे हैं।
रिपोर्टर : बिहार बैठकर स्टे ले रहे हैं?
जावेद : हां, आधार कार्ड यहां का बना हुआ है। बिहार के लोग मिले हुए हैं, व्हाट्सएप पर लिखा।
रिपोर्टर : और डिमांड कितनी करते हैं- 20-25 लाख?
जावेद : हां, मतलब बिल्डर कमाएगा भी और नहीं भी कमाएगा।

जावेद ने आगे बताते हैं कि बाटला हाउस क्षेत्र में बिल्डर अंततः कथित तौर पर स्टे माफिया द्वारा बनाए गए दबाव के आगे झुक जाते हैं और निर्माणाधीन इमारतों से अदालती स्टे हटवाने के लिए पैसे देते हैं, ताकि काम फिर से शुरू हो सके। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस तरह के समझौते बिचौलियों के द्वारा पुलिस की मिलीभगत से होते हैं।
जावेद : मैं दबंग आदमी हूं, मेरी बिल्डिंग रुक गई, पुलिस वालों को बुलाया…कहेंगे XXXX है।
रिपोर्टर : हैं?
जावेद : XXXXX यहां पर मशहूर है स्टे माफिया। बहुत सारे नाम हैं, XXXXX छोटा सा है… वो हाथ नहीं आएगा, वो 6 महीने से गायब है। आप बौखला गए। आपकी 1.5 करोड़ की एम*-बी* एक कर दी… आपने, 2 फ्लैट बेच भी दिए इस बीच में। आप बौखला गए। अब आप कहोगे फैसला करा दो। लास्ट में टूट जाते हो आप।
रिपोर्टर : आप कैसे कहोगे?
जावेद : पुलिस से कहेंगे, या अपना बंदा भेजूंगा।
रिपोर्टर : XXXX का असली नाम क्या है?
जावेद : XXXX ही है।
रिपोर्टर : कहां रहता है?
जावेद : छोटा सा है, यहीं रहता है।
जावेद (आगे) : और एक है आपका बाल्टी चौक पर XXXX… उसका अखबार भी है… XXXX बहुत मशहूर है।
Reporter- XXXX?
जावेद : आईटीओ पर उसका ऑफिस है… घर उसका जसोला में है। उसके नाम पर XXXXX चौक बना रखा है- XXXX चौक।

इसके बाद जावेद ने तहलका से एक चौंकाने वाला दावा किया। उन्होंने बाटला हाउस में 800 वर्ग गज के भूखंड पर बनी एक इमारत की ओर इशारा किया, जिसके बारे में उनका आरोप है कि इसे अधिकारियों ने वर्षों पहले सील कर दिया था। इसके बावजूद इमारत के अंदर अपार्टमेंट बनाए गए और खरीदारों को बेच दिए गए, क्योंकि कथित तौर पर बिल्डर प्रभावशाली है। उन्होंने आगे दावा किया कि लोग इमारत में रहना जारी रखे हुए हैं, जबकि कागजों पर इसे सील कर दिया गया है। जावेद ने यह भी आरोप लगाया कि निरीक्षण के लिए आने वाले अधिकारियों को बिल्डर द्वारा भुगतान किया जाता है और बदले में वे सकारात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत कर देते हैं।
रिपोर्टर : तो अभी कौन-सी बिल्डिंग सील है आपकी?
जावेद : ये पूरी बिल्डिंग, ये 800 गज है पूरी।
रिपोर्टर : 800 गज, और सील कितनी है?
जावेद : पूरी।
रिपोर्टर : 800 गज सील है…?
जावेद : एक ही प्लॉट है ना।
रिपोर्टर : और कब से सील है?
जावेद : जबसे बनी है, 3 साल हो गए।
रिपोर्टर : 2-3 साल से सील है… लोग तो रह रहे हैं यहां पर?
जावेद : वो तो दिखाने के लिए…. क्यूंकि ‘पंक्चर’ (टोकन डिमोलेशन टू अवॉइड एक्शन- कार्रवाई से बचने के लिए सांकेतिक विध्वंस) कर रखा है ना!
जावे (आगे) : वो आपका डीसीपी, पुलिस, सब साथ हैं। थाने में पैसे खिलाया…।
रिपोर्टर : मतलब कोर्ट का आदमी नहीं आता चेक करने?
जावेद : आता है।
रिपोर्टर : आप इतने साल से पैसे खिला रहे हो, कितने खिला दिए होंगे?
जावेद : इन लोगों ने बहुत पैसा खिला दिया।
रिपोर्टर : इन लोगों ने या आपने?
जावेद : मेरा नहीं है इसमें। मेरा सिर्फ XXXX है, वो भी किराए पर।
रिपोर्टर : ऑनर कौन है इस बिल्डिंग के?
जावेद : XXXXX.
रिपोर्टर : अच्छा, ये बिल्डिंग कागजों में तो सील है, वैसे लोग रह रहे हैं इसमें?
जावेद : हां।
रिपोर्टर : तो यहां ब्लैकमेलर कौन था, किसने लगाया था स्टे?
जावेद : पुरानी दिल्ली की 2 लेडीज।
रिपोर्टर : पुरानी दिल्ली की… और ये बना कब था?
जावेद : 5 साल हो गए।
रिपोर्टर : जिन लोगों ने स्टे लिया है, उनको पैसे नहीं खिलाए?
जावेद : एक्चुअली दबंग लोग…. पैसे खिलाए नहीं- ‘हम तो निकाल लेंगे।’
रिपोर्टर : और डिमांड कितनी आई थी?
जावेद : 4-5 करोड़।
रिपोर्टर : 4-5 करोड़ की डिमांड आई थी?
जावेद : अब तो देने पड़ेंगे।
रिपोर्टर : अब क्यूं देंगे? अब तो बिक ही गई बिल्डिंग।
जावेद : अब तो फ्लोर ऊपर  और डलेगा… 800 गज पर 2 फ्लोर में अभी..।.
रिपोर्टर : जैसे ये बनाए हैं, वैसे ही वो भी बन जाएगा?
जावेद : नहीं सर, अब ये कोर्ट में चला गया है।
रिपोर्टर : लेकिन कोर्ट में तो पहले ही चला गया ये?
जावेद : बन गया था, मगर अब जो जज बैठा है, वो सख्त है।

जावेद ने आगे बताया कि कैसे कथित स्टे माफिया अंततः बिल्डरों के साथ समझौता कर लेते हैं। उनके अनुसार, इस तरह के निर्माणों के पीछे जो लोग होते हैं, वे अंततः बिल्डरों से पैसे वसूलने और जगह खाली करने के लिए लिखित आश्वासन देने के लिए आगे आते हैं। जावेद ने दावा किया कि बाटला हाउस में कई इमारतों को कथित तौर पर अदालती रोक के नाम पर इस तरह की जबरन वसूली का सामना करना पड़ा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बिल्डरों पर दबाव डालने के लिए स्टे ऑर्डर प्राप्त करने में परिचितों या दोस्तों का भी इस्तेमाल किया जाता है।
रिपोर्टर : अब XXXXX के बारे में बताएं?
जावेद : अब आपने बिल्डिंग बनाई, 2 फ्लोर डाल दिए, 2 करोड़ का प्लॉट लिया 100 गज का, 2 करोड़ का हो गया। 20 लाख का लेंटर डाल दिया, 2 करोड़ 20 लाख हो गए। एक लेंटर और डाल दिया, एक लेंटर डलता है 6-7 लाख का। फिर… ‘ये अवैध तरीके से बना है।’ पुलिस काम रुकवा देगी। पुलिस आएगी- ‘तेरे पर स्टे आ गया।’ वो अब परेशान होगा। उसके बाद में यहां का लोकल हूं, मेरी जान-पहचान है। मैं पता लगाऊंगा कि फलां आदमी ने इस पर स्टे लिया है। फिर उसको पकड़ो स*…को, वो हाथ में आएगा। उसे मारोगे? …मार नहीं सकते। जान से मार देंगे, तब भी आप फंसोगे एंड में आकर लुट जाते हो. अब आता है फैसले का टाइम। मैंने 20 मांगे, आपने 10 किए, 8 करे।
रिपोर्टर : जब फाइनल स्टेटमेंट होता है, तो वो लोग आते हैं सामने?
जावेद : पैसा आएगा और लिखकर देगा। वो आएगा और लिखकर देगा। पुलिस भी पैसा खाएगी। वकील ने पैसा खाया है, तो वो भी खाएगा।
रिपोर्टर : तो ऐसा तो बहुत सारी बिल्डिंग्स पर हो चुका होगा?
जावेद : मेरे हिसाब से तो अनलिमिटेड है।
रिपोर्टर : अनलिमिटेड बिल्डिंग पर ऐसा हो चुका है, बाद में स्टे हट जाता है?
जावेद : हट जाता है। ‘पंक्चर’ (टोकन डिमोलेशन टू अवॉइड एक्शन – कार्रवाई से बचने के लिए सांकेतिक विध्वंस) होते ही, बात खत्म। लेटर भी 1 नहीं, 4-5 डलेंगे। उसके बाद ‘पंक्चर’ होना शुरू होगा। एक लेटर में नहीं हटेगा पंक्चर।
रिपोर्टर : तो ये 2 लोग हैं, जो ये सब कर रहे हैं?
जावेद :  इसमें दाढ़ी वाले भी हैं, और जो आपके साथ बैठे हैं, पता नहीं चलता, वो भी होते हैं।
रिपोर्टर : तो ये तो करोर्स (करोड़ों) कमा लिए होंगे इन्होंने?
जावेद : हां, अब आप XXXXX को ही देख लो, अखबार निकालता है, एनजीओ चलाता है…।

इस बातचीत में जावेद निर्माण गतिविधि से संबंधित अदालत के स्टे ऑर्डर के साथ अपने कथित अनुभव का वर्णन करते हैं। उन्होंने दावा किया कि भवन निर्माण विवाद के संबंध में उन्हें भी कथित तौर पर ब्लैकमेलिंग का सामना करना पड़ा था। उनके अनुसार, प्रारंभिक तौर पर 17 लाख रुपए की मांग की गई थी। लेकिन बातचीत के बाद उन्होंने 6 लाख रुपए का भुगतान किया, जिसके बाद रोक हटा दी गई, जो उनके द्वारा वर्णित बातचीत के माध्यम से होने वाले समझौतों के एक पैटर्न को दर्शाती है।
रिपोर्टर : आपके ऊपर हुई है कोई बिल्डिंग?
जावेद : मेरे साथ तो बहुत बड़ा कांड हुआ है…।
रिपोर्टर : आपने कितने खिलाए थे?
जावेद : मैंने 6 लाख खिलाए, 17 लाख मांगे थे।
रिपोर्टर : मतलब, 17 लाख की डिमांड थी, 6 लाख खिलाए?
जावेद : हां।
रिपोर्टर : उसके बाद स्टे हट गया?
जावेद : हट गया।

जावेद ने आगे आरोप लगाया कि चूंकि बाटला हाउस एक अनधिकृत क्षेत्र है और बिल्डरों को अनुमत ऊंचाई सीमा से अधिक निर्माण करने की अनुमति नहीं है। इसलिए तथाकथित स्टे माफिया बिल्डरों को ब्लैकमेल करने के लिए इस कमजोरी का फायदा उठाते हैं। उनके अनुसार, पैसे लेने के बाद भी पुलिस अधिकारी कभी-कभी बिल्डरों को निर्माण रोकने के लिए कहते हैं, जिससे उनके पास बात मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। उनका यह भी मानना है कि ऐसे मामले कभी-कभी व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित होते हैं।
रिपोर्टर : और वैसे भी ये एरिया अन-ऑथोराइज्ड है, बना नहीं सकते आप। इसलिए बिल्डर भी कमजोर हो जाता है।
जावेद : जी, जी…, पुलिस भी कमजोर रहती है, फिर मजबूरी में करना पड़ता है। एसएचओ पैसा खाने के बाद भी कहता है- ‘रुक जाओ…।’
रिपोर्टर : ये सारे बिल्डर के साथ होता है?
जावेद : जिसकी जिससे दुश्मनी हो, सबके साथ नहीं होता…।

जावेद के बाद तहलका की मुलाकात आदिल (बदला हुआ नाम) नामक एक अधिकारी से हुई, जो दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) में इंजीनियर हैं और बाटला हाउस इलाके में रहते हैं। दिल्ली में अनधिकृत निर्माण से संबंधित मामलों में एमसीडी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आदिल के अनुसार, स्टे के मामलों में दीवानी मुकदमे होते हैं, जो अदालतों में वर्षों तक चल सकते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि स्टे की मांग करने वाले लोग बार-बार स्टे लेकर जानबूझकर कार्यवाही को लंबा खींचते हैं, जिससे उन बिल्डरों को निराशा होती है, जिनकी परियोजनाएं रुक जाती हैं। उनके अनुसार, कई बिल्डर अंततः समझौते के लिए सहमत हो जाते हैं और कथित तौर पर स्टे हटाने के लिए पैसे का भुगतान करते हैं। आदिल ने आगे दावा किया कि कुछ मामलों में 10-15 लाख रुपए का भुगतान करने के बाद स्टे ऑर्डर हटा दिया जाता है।
रिपोर्टर : काम रुक गया, स्टे आ गया? …उसके बंद क्या होता है?
आदिल : उसके बाद स्टे चलेगा। 99.99 पर्सेंट ये हारेंगे। बट टाइम कितना लगेगा, ये आप जानते हो या वो जानते हैं।
रिपोर्टर : 20 साल लगेंगे?
आदिल : भाई, सिविल शूट है। मेरी सेटिंग हो जाए कोर्ट में, मैं जाऊंगा अहमद के पास- ये ले भाई 5000 रुपए. वैसे तो बड़ी रकम होगी। मैं कहूंगा ये 5000 रुपए ले ले, 6 महीने बाद की डेट लगा दे…। अब ये 6 महीना किराया भी देंगे। वेट भी करेंगे। ये बोलेंगे- ‘भाई, सेटलमेंट करा दो, मेरी जान छुड़वा दो।’
रिपोर्टर : सेटलमेंट कैसे होता है?
आदिल : सेटलमेंट ऐसे होता कि ये अपने पैसे लेंगे।
आदिल (आगे) : मैंने 10 लाख आपने ले लिए।
रिपोर्टर : 10-15 लाख देकर स्टे हटा दिया?
आदिल : इनका वकील रिट अप्लाई कर देगा, स्टे खत्म हो जाएगा। अब दोबारा कंन्स्ट्रक्शन चालू करेंगे।
रिपोर्टर : उसमें एमसीडी का क्या रोल होता है?
आदिल : एमसीडी का ये रोल होता है कि जिस टाइम पर हमें पार्टी बनाते हैं ना ये लोग- ‘अनाथोराइज्ड बन रहा है, रोक दो।’
रिपोर्टर : ये आपको लिखकर देना होता है?
आदिल : हम तो देंगे।

आदिल के बाद तहलका रिपोर्टर की मुलाकात बाटला हाउस के निवासी सलीम (बदला हुआ नाम) से हुई, जिन्होंने दावा किया कि उन्होंने अपने घर के निर्माण के दौरान पुलिसकर्मियों को रिश्वत दी थी। सलीम के अनुसार, इस तरह के भुगतान दिल्ली की अनधिकृत कॉलोनियों में निर्माण गतिविधि का एक नियमित हिस्सा हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि हर छत की पटिया के निर्माण तक के लिए पैसे दिए जाते हैं। सौदे के अनुसार यह राशि अलग-अलग होती है। सलीम ने दावा किया कि उसने छः मंजिला इमारत के निर्माण के दौरान पुलिस को लगभग 2-2.5 लाख रुपए का भुगतान किया था।
रिपोर्टर : आपने कितने पैसे दिए पुलिस को?
सलीम : पुलिस को मैंने 2-2.5 लाख दिए हैं बस।
रिपोर्टर : वो किस बात के?
सलीम : बिल्डिंग बन रही है।
रिपोर्टर : ये जो आपका घर बन रहा है, इसी में दिए हैं?
सलीम : हम्म।
रिपोर्टर : पूरी बिल्डिंग तुड़वा कर बनवा रहे हो तुम?
सलीम : नहीं, सिर्फ ग्राउंड फ्लोर बना हुआ था उसमें।
रिपोर्टर : पूरी बिल्डिंग बनवा रहे हो?
सलीम : हां, 6 फ्लोर बन रही है।
रिपोर्टर : तो आपको स्टे नहीं आया?
सलीम : हर किसी को थोड़ी आता है स्टे।
रिपोर्टर : 2 लाख तो फिर भी दे दिए आपने?
सलीम : पुलिस वालों को तो लाना ही लाना है…।
रिपोर्टर : 2 लाख किस चीज के दिए तुमने?
सलीम : अलग-अलग।
रिपोर्टर : लेंटर फिक्स होता है- 50 हजार, 60 हजार, 70 हजार। जैसा आपका सौदा फिक्स हो जाए?
सलीम : 2-2.5 लाख।
रिपोर्टर : सस्ते में निपट गए तुम तो?
सलीम : जब लेंटर पड़ता है तो हजार रुपए पीसीआर वाला भी ले जाता है।
रिपोर्टर : रजिस्ट्री तो नहीं है, अन-ऑथोराइज्ड  हो पूरा?
सलीम : पूरा जामिया ही अन-ऑथोराइज्ड है…।
सलीम (आगे) : जिस जगह हम तुम बैठे हैं, वहां फ्लैट्स की कीमत 2 करोड़ तक पहुंच गई है।
रिपोर्टर : बिना रजिस्ट्री के?
सलीम : बिना रजिस्ट्री के।
रिपोर्टर :अन-ऑथोराइज्ड?
सलीम : अन-ऑथोराइज्ड ।

अगस्त 2025 में प्रकाशित लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि न्यायिक प्रक्रिया को राष्ट्रीय राजधानी में अनधिकृत निर्माण में शामिल लोगों से पैसे वसूलने का एक उपकरण बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। ‘यद्यपि यह न्यायालय इस तथ्य को स्वीकार करता है कि अनधिकृत निर्माण के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई की जानी चाहिए, लेकिन साथ ही इस न्यायालय का उपयोग ऐसे निर्माण करने वाले व्यक्तियों से धन की उगाही करने के उपकरण के रूप में नहीं किया जा सकता है।’ न्यायालय ने टिप्पणी की।
तहलका की पड़ताल ने ठीक यही बात उजागर की है कि कैसे अदालती प्रक्रियाओं का कथित तौर पर दुरुपयोग करके बाटला हाउस में अनधिकृत निर्माण में शामिल लोगों से पैसे वसूले जा रहे हैं। तथाकथित स्टे माफिया का मकसद किसी जनहित की सेवा करना नहीं है, बल्कि बिल्डरों पर पैसा वसूलने के लिए दबाव डालना है। अदालत को मुकदमे के पीछे के असली इरादे की जानकारी दिए बिना ये लोग ऐसा करते हैं। बटला हाउस एक अनधिकृत कॉलोनी होने के कारण इस तरह की गतिविधियों के लिए उपजाऊ जमीन तैयार कर चुका है, जहां अवैध निर्माण और कथित जबरन वसूली एक साथ फल-फूल रहे हैं।
इस पड़ताल में  निवासियों और बिल्डरों के अनुसार, पुलिसकर्मियों की कथित मिलीभगत का भी खुलासा हुआ, जो पैसे लेकर अवैध निर्माण को बेरोकटोक जारी रहने देते हैं। इससे प्रवर्तन और जवाबदेही की व्यापक विफलता सामने आती है, जहां उल्लंघन तब तक पनपते रहते हैं, जब तक कि वे जबरदस्ती और लाभ के अवसर नहीं बन जाते। यदि अधिकारियों ने प्रारंभिक चरण में ही अवैध निर्माण के खिलाफ दृढ़तापूर्वक और लगातार कार्रवाई की होती, तो शायद बुलडोजर की बहुत कम आवश्यकता होती, जो आज भारत के राजनीतिक और प्रशासनिक विमर्श में सबसे अधिक ध्रुवीकरण करने वाले प्रतीकों में से एक उपाय बन गया है।