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कुछ दूर तो चलकर देखें…

स्वायत्तता की दबी फाइल को बाहर निकालना और वादी में सेना की उपस्थिति स्थायी है इस भावना को खत्म करना, दो ऐसी चीजें हैं जो तुरंत की जा सकती हैंकिसी लोकतांत्रिक संप्रभु राष्ट्र के लिए दो बातें सबसे अहम होती हैं. एक, उसे हर चीज स्वीकार्य हो सकती है लेकिन देश की अखंडता के साथ समझौता नहीं. और दूसरी यह कि वह देश अपनी जनता की आकांक्षाओं और पीड़ा को ज्यादा देर तक नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकता. अब कश्मीर की तात्कालिक और 60 साल पुरानी समस्यायों का समाधान भी लोकतंत्र के इन्हीं दो सर्वमान्य सिद्धांतों के दायरे में खोजे जाने की जरूरत है. अगर स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो कश्मीर के उन बाशिंदों को जो आज भारत से अलग होने की मांग पर अड़े हैं, सीधे-सीधे यह समझना होगा कि भारत से खुद को अलग करने की मांग का नतीजा वही ढाक के तीन पात होने वाला है. उन्हें समझना होगा कि जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय एक संपूर्ण और अपरिवर्तनीय सत्य है और बात तथा आंदोलन की कोई भी गुंजाइश केवल उसके केंद्र के साथ संबंधों को पुनर्परिभाषित करने, उनमें कुछ नई व्यवस्थाओं की स्थापना पर ही बन सकती है.

दूसरी ओर कश्मीर पर कोई भी निर्णय ले सकने और धारा 370 खत्म करने की जिद पर अड़े लोगों को कश्मीरी लोगों की आकांक्षाओं और पीड़ा को भलीभांति समझना और इसके लिए संविधान के दायरे में जो संभव हो करना होगा. उन्हें यह समझना होगा कि लोकतंत्र में तंत्र की व्यवस्था लोगों के लिए ही होती है और यदि इस तंत्र में लोग ही शामिल न हों या जबरन किए गए हों तो उसका कोई मतलब ही नहीं.

1947 में जम्मू-कश्मीर के भारत से विलय का अनुरोध न केवल वहां के राजा ने बल्कि कश्मीर में लोकतंत्र की स्थापना के लिए आंदोलन चला रहे वहां के सबसे बड़े और प्रभावशाली संगठन के मुखिया शेख अब्दुल्ला ने भी अलग से किया था. पाकिस्तान ने भी कश्मीर पर हमला इसीलिए बोला था. उसे पता था कि जो एक साल का ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ उसने किया है उसके खत्म हो जाने के बाद भी कश्मीर उसके हाथ नहीं आने वाला क्योंकि वहां का ज्यादातर जनमानस भारत के साथ विलय का पक्षधर था. यही वजह थी कि नेहरू जी ने भी अपनी तरफ से ही पाकिस्तानी सेना के कश्मीर से खदेड़े जाने के बाद जनमत संग्रह की बात यह कहते हुए कही थी कि वे कश्मीर की मजबूरी का फायदा उठाकर नहीं बल्कि उसकी जनता की मांग पर उसे अपने साथ रखने के पक्षधर हैं. बाद में भी वे संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के मुताबिक 1956 तक जनमत संग्रह कराने के लिए तैयार थे बशर्ते पाकिस्तान पहले अपने कब्जे वाले कश्मीर से हट जाए. 1956 में जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा ने भारत के साथ विलय का अनुमोदन कर दिया और मामले को अब ज्यादा उलझने से बचाने के लिए भारत ने इसी को पूरे जम्मू-कश्मीर की भावनाओं का प्रतिबिंब मान लिया.

तो फिर कभी इस कदर भारत के पक्ष में होने वाला कश्मीर की जनता का मानस आज इस तरह भारत विरोधी क्यों दिखाई दे़ रहा है? दरअसल, ऐसा होने के पीछे भी ‘बाहरी ताकतों’ से ज्यादा हम खुद जिम्मेदार हैं. जिस तरह से हिंदी के पैरोकारों की राजभाषा बनाने की उतावली और बेसिरपैर कोशिशों ने हिंदी को हमेशा के लिए देश में अंग्रेजी की पुछल्ली भाषा बनाकर छोड़ दिया है कुछ-कुछ उसी प्रकार कश्मीर के मामले में भी हुआ. धारा 370 हटाने और कश्मीर के भारत में संपूर्ण विलय के लिए जम्मू प्रजा परिषद और जनसंघ द्वारा चलाए आंदोलनों और जल्दबाजी में कश्मीर के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव लाने की कोशिशों ने सारे मसले को बिगाड़कर रख दिया. इससे घाटी में अलगाव और संप्रदायपरस्त ताकतों को सर उठाने में मदद मिली. इन ताकतों की ताकत को ज्यादा और भारत की धर्मनिरपेक्षता की ताकत को कम आंककर शेख अब्दुल्ला के सुर भी बदलने लगे. 1953 में अब्दुल्ला की गिरफ्तारी के बाद से कश्मीर भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अकर्मण्यता और सरकारों और राष्ट्रपति शासनों के आने-जाने के भीषण दुश्चक्र में फंसा रहा. चूंकि पाकिस्तान भी कश्मीर की मूल समस्या का एक स्थायी खंभा रहा है, इसलिए सेना की लगातार उपस्थिति ने भी मानवाधिकारों के हनन आदि की समस्याओं को जन्म देकर समस्या में नए आयाम जोड़ दिए.

तो अब क्या किया जा सकता है? कश्मीर समस्या के समाधान के लिए कोई एक बटन तो है नहीं. इसके कई पहलू हैं और सभी से एकसाथ निपटना संभव नहीं है. कुछ हमारे हाथ में हैं भी नहीं. मगर जो हैं उन पर तो शुरुआत की ही जा सकती है. हो सकता है उस दिशा में बढ़ने पर आगे और रास्ते खुलने लगें. तो जो तुरत-फुरत में किया जा सकता है वह है स्वायत्तता की दबी फाइल को झाड़-फूंककर बाहर निकालना और वादी में सेना की उपस्थिति स्थायी है इस भावना को खत्म करना. स्वायत्तता के मुद्दे पर कुछ घोषणाएं तुरंत ही की जा सकती हैं कुछ पर बाद में बातचीत हो सकती है. आम कानून-व्यवस्था के लिए साधारण पुलिस बल को सक्षम बनाने की जरूरत है. कुछ सुझाव उमर अब्दुल्ला सरकार को बर्खास्त करने के भी दिए जा रहे हैं लेकिन ऐसा करना न केवल सफल और निष्पक्ष चुनाव की हमारी उपलब्धि को कम कर देगा बल्कि कश्मीर के मामले में केंद्र के अनावश्यक हस्तक्षेप के आरोपों को और भी मजबूत करने का काम करेगा.

संजय दुबे, वरिष्ठ संपादक

क्या यह शख्स गिलानी की राजनीतिक विरासत का वारिस है?

आज के कश्मीर में पत्थर फेंकते नौजवानों और आजादी के नारों के बीच मसर्रत आलम के असर को नजरअंदाज करना मुश्किल है. 2008 तक बहुत कम लोग इस अलगाववादी नेता के बारे में जानते थे, लेकिन भूमिगत आलम की सक्रियता पिछले दो सालों में काफी बढ़ी है. आजादी के समर्थन में दीवारों पर नारे लिखने से लेकर फेसबुक पर प्रचार तक आलम को विरोध का ऐसा हर तरीका मालूम है जो पत्थर फेंकती भीड़ में जोश की लहर पैदा कर सके.

आलम की प्रतिष्ठा एक ऐसे नेता की है जो जनता से कटा हुआ नहीं है. दूसरे नौजवान और जाने-माने अलगाववादी नेताओं से उलट वे नारे लगाते हुए, बैनर पकड़े हुए और पत्थरबाजी में मदद करते हुए देखे गए हैं

39 वर्षीय आलम पुराने दिग्गज सैयद अली शाह गिलानी की राजनीतिक विरासत के प्रमुख उत्तराधिकारियों में से एक बनकर उभरे हैं. वे कश्मीर में मुसलिम लीग के अध्यक्ष हैं और गिलानी धड़े वाली हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के महासचिव भी. आलम 10 साल से अधिक समय तक जेल में रह चुके हैं. पुलिस सूत्र बताते हैं कि आलम के सिर पर पांच लाख रुपए का ईनाम रखा गया है, हालांकि आधिकारिक तौर पर पुलिस इसका खंडन करती है. हर हफ्ते अफवाहें इस रकम को दोगुना कर रही हैं और अब यह बढ़ती हुई 20 लाख हो गई है.

इस सबने आलम के इर्द-गिर्द एक रहस्य का जाल बुन दिया है. कश्मीर पुलिस के चरमपंथ विरोधी सेल के एक अधिकारी अपना नाम बताने से इनकार करते हुए कहते हैं, ’जेल से छूटते ही आलम वहीं से काम शुरू करता है जहां से उसने छोड़ा था. मैंने उसके जैसा धुन का पक्का अलगाववादी नेता नहीं देखा.’ कभी पाकिस्तान के समर्थक रहे आलम का इस्लामाबाद से मोहभंग उसकी कश्मीर नीति के कारण हुआ. वे अब एक स्वतंत्र कश्मीर के लिए लड़ रहे हैं. पुलिस सूत्रों का कहना है कि वे पाकिस्तान की नजरों में तब चढ़ गए जब उन्होंने परवेज मुशर्रफ से अपनी मुलाकात के दौरान उनके चार सूत्री फॉर्मूले को रुखाई से नकार दिया था. कश्मीर के एक प्रतिष्ठित मिशनरी स्कूल के छात्र रहे आलम एक संपन्न मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आते हैं. 10 साल की उम्र में अपने पिता को खो देने के बाद वे अपनी मां और बहन के साथ अपने दादा के साथ रहते थे. पुराने शहर में उनके परिवार की कपड़ों की कई दुकानें थीं और उनके बचपन के दोस्त बताते हैं कि अपने कपड़ों, जूतों और पॉकेट मनी की वजह से वे अलग ही पहचाने जाते थे. एसपी कॉलेज से विज्ञान में ग्रेजुएट आलम जब 1987 में राजनीतिक आंदोलन से जुड़े तब वे 16 साल के थे और मुसलिम युनाइटेड फ्रंट की रैलियों में शामिल होते थे, जो 1987 में चुनाव लड़ रही अलगाववादी पार्टियों का गठबंधन था. उनके एक पुराने दोस्त याद करते हैं, ’एक बार हमारे पास बैनर खरीदने के लिए पैसे नहीं थे तो उसने अपने नए जूते बेच दिए थे.’ ये वही बदनाम चुनाव थे, जिनके बाद घाटी में हथियारबंद जनउभार भड़का था.

आलम 1990 के दशक की शुरुआत में चरमपंथी आंदोलन में शामिल हुए और हिज्बुल्लाह धड़े के कमांडर बने. वे उन कुछ लोगों में से थे जिन्होंने कोई दूसरा नाम अपनाने से इनकार कर दिया जैसा उन दिनों चलन था. एक वरिष्ठ आजादी समर्थक नेता, जो आलम को 1997 से जानते हैं, बताते हैं कि उनके उभार ने कश्मीर में अलगाववादी नेतृत्व के भविष्य के लिए उम्मीदें पैदा की हैं. आलम को लेकर उन्हें बहुत उम्मीदें हैं. वे कहते हैं, ’वह एक नई पीढ़ी का अलगाववादी नेता है जो जनता के बीच लोकप्रिय हो गया है. उम्मीद है कि वह इस रास्ते पर आगे बढ़ता रहेगा.’ आलम की प्रतिष्ठा एक ऐसे नेता की है जो जनता से कटा हुआ नहीं है. दूसरे नौजवान और जाने-माने अलगाववादी नेताओं से उलट वे नारे लगाते हुए, बैनर पकड़े हुए और पत्थरबाजी में मदद करते हुए देखे गए हैं. 2008 में जब अमरनाथ भूमि हस्तांतरण विवाद के दौरान बड़े पैमाने पर आजादी समर्थक प्रदर्शन हुए थे, आलम ने ’रगड़ा’ की योजना बनाई. रगड़ा एक ऐसा नाच है जिसमें लोग एक घेरे में कंधे से कंधा मिलाकर अपने पैरों पर आगे-पीछे होते हुए भारत विरोधी नारे लगाते थे. इस साल आलम ने नया नारा उछाला, गो इंडिया, गो बैक.

जैनादार मोहल्ले में आलम के पुराने घर में उनकी मां, बहन और बीवी एक बेहद गरीबी भरा जीवन जी रही हैं, जिसे बार-बार पड़ने वाले पुलिस के छापों ने और बदतर बना दिया है. कपड़ों की दुकान बंद हो चुकी है. लेकिन आलम की राजनीतिक योजनाएं काम कर रही हैं. उन्होंने राजनीतिक कुशलता और सादगी भरी अपनी पहचान का मेल बखूबी किया है.  

' दोनों तरफ के कश्मीर का एकीकरण किया सकता है '

भारत और पाकिस्तान, दोनों देश कश्मीर मसले पर ज्यादा कठोर रुख अपनाने की नीति पर चलते रहे हैं. सूबे में भ्रष्टाचार, विकास, बिजली या रोजगार से जुड़ी दिक्कतों को दूर करने की बजाय आप कश्मीर पर  कड़ा रुख बनाए रखना चाहते हैं. लेकिन ऐसा करके हमने जनता को  आंदोलन के लिए मजबूर कर दिया है. यह वक्त इस तरफ ध्यान देने का है कि जम्मू और कश्मीर में क्या होना चाहिए. यदि हम आगे बढ़ने को तैयार हैं तो देश की राजनीतिक व्यवस्था में इस बात की पूरी गुंजाइश है कि कश्मीरी लोगों की जरूरतों और उनकी इच्छाओं को पूरा किया जा सके. पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी चाहती है कि भारत-पाक सरहद को बेमानी बनाते हुए दोनों कश्मीर एक कर दिए जाएं. साथ ही अन्य बाध्यताएं भी दूर की जाएं. मसलन हम यहां भारत और पाकिस्तान दोनों देश की मुद्रा चला सकते हैं.

हम एक संयुक्त विधान परिषद का गठन कर सकते हैं जिसमें दोनों तरफ के सदस्य हों. नई दिल्ली अपनी तरफ से पांच सदस्यों को नामांकित कर सकती है, पाकिस्तान अपनी तरफ वाले कश्मीर से

हम एक ऐसा संयुक्त तंत्र बना सकते हैं जहां दोनों तरफ के प्रतिनिधि मिलकर एक सलाहकार परिषद की तरह काम कर सकें. भले वे कानूनी मसलों पर बात न करें पर आम कश्मीरियों की दोनों ओर के कश्मीरियों को साथ देखने की इच्छा तो पूरी हो ही जाएगी.  हमें दोनों तरफ के कश्मीर को जोड़ने वाले रास्तों को भी खोलना चाहिए. कश्मीर की भौगोलिक स्थिति काफी अच्छी है. पहले कश्मीर से गुजरने वाले रास्ते मध्य एशिया, दक्षिण एशिया सहित चीन तक जाते थे, लेकिन सेना के आने के बाद ये सारे बंद कर दिए गए. सड़क मार्ग से हम सिर्फ नई दिल्ली से जुड़े हुए हैं लेकिन सर्दियों में वह भी बंद हो जाता है. कश्मीर की जनता चाहती है कि ये सारे रास्ते खोले जाएं.

हम सरहद पार के कश्मीर को भी देश का हिस्सा कहते हैं और इसलिए हमारी विधान सभा में उनके लिए कई सीटें आरक्षित हैं. तो हम एक संयुक्त विधान परिषद का गठन कर सकते हैं जिसमें दोनों तरफ के सदस्य हों. नई दिल्ली अपनी तरफ से पांच सदस्यों को नामांकित कर सकती है, पाकिस्तान अपनी तरफ वाले कश्मीर से. इस परिषद को सलाहकार की भूमिका अदा करने दी जाए, यह प्रतीकात्मक रूप से कश्मीर का एकीकरण होगा. इससे हमारी संप्रभुता पर कोई असर नही पड़ेगा क्योंकि हम पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर को अपना ही हिस्सा मानते रहे हैं. इस तरह जम्मू और कश्मीर सार्क सहयोग की एक मिसाल बन जाएगा. और यह सब भारतीय संविधान के दायरे में ही होगा. इसके बाद आपको सिर्फ एक ही काम करना है, कश्मीर के लिए सारी दुनिया को खोल देना. यहां वीजा कार्यालय खोले जा सकते हैं ताकि अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा होने पर हम यहां से सीधे ही कहीं भी जा सकें. इन उपायों से कश्मीरी आवाम एक तरह की आजादी महसूस करेगी.

आप उन्हें तकनीकी रूप से आजादी नहीं दे सकते, लेकिन देश की संप्रभुता से समझौता किए बगैर हम जो कर सकते हैं वह तो करना चाहिए. दूसरी जरूरी बात है आर्थिक आत्मनिर्भरता. हमें लगता है कि सिंधु जल संधि में हमारे साथ भेदभाव बरता गया है. हम इसे रद्द नहीं कर सकते क्योंकि हमारे देश और पाकिस्तान दोनों को इससे फायदा हो रहा है. लेकिन हमारे देश को हमें हो रहे नुकसान की भरपाई करनी चाहिए. हमारे पास संसाधनों के नाम पर सिर्फ जलस्रोत हैं और इनका उपयोग न कर पाने की वजह से हर साल हमें  50 हजार करोड़ रुपए का नुकसान होता है. स्वशासन का मतलब सत्ता का विकेंद्रीकरण भी है, हम चाहते हैं कि जम्मू, लद्दाख और लेह को भी बराबर का फायदा मिले. हम जम्मू और कश्मीर का एकीकरण चाहते हैं. यदि प्रदेश का राज्यपाल जम्मू से होगा तो वहां के लोगों को सत्ता की भागीदारी का एहसास होगा.
संविधान की धारा 356 को हटाया जाना चाहिए. यदि जनता सरकार चुनती है तो आपातकालीन स्थितियों के अलावा सरकार हटाने का हक भी जनता को ही होना चाहिए. अगर हम ये कदम उठाते हैं तो महीनों की ढलान को काबू में किया जा सकता है. आज कश्मीरियों के पास बंदूकें नहीं हैं. लेकिन अब वे ज्यादा मजबूती से एकजुट हैं. आप बंदूकों की लड़ाई तो और ज्यादा बंदूकें जुटाकर लड़ सकते हैं लेकिन जब लोगों की भावनाएं एक होने लगती हैं तब ऐसा करना मुश्किल होता है.

कश्मीर मसले पर राजनीतिक प्रक्रिया फिर से शुरु हो इसके लिए जरूरी है कि संवाद शुरु हो. इसके लिए सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम को हटाया जाए और चरणबद्ध तरीके से सेना की वापसी सुनिश्चित की जाए. यदि आप लोगों को लोकतंत्र की बुनियादी आजादी देने से मना करते हैं तो यह आप खुद अपनी चुनावी प्रक्रिया का अपमान करते हैं. विरोध की आवाज तेजी से बढ़ती है, यह लोगों को एकजुट करती है और इससे असुरक्षा बढ़ती है. देश और कश्मीर के बीच बिगड़ते संबंधों की यही वजह है.

हीरो या नीरो

दुर्लभ बात यह नजर आती है कि दिल्ली या अन्य राज्यों के उलट यहां आम जनता तो धूप से बचाने वाले तंबू के नीचे है मगर राज्य का मुख्यमंत्री ऐसी सड़ी गर्मी में भी चिलचिलाती धूप में बैठा हुआ है. सभी को कुछ न कुछ कहना है. तकरीबन डेढ़ घंटे के बाद उमर की बारी आती है. वे हिंदी में बोलते हैं, ‘अक्सर हमारे बीच की बातचीत एकतरफा हो जाती है. हमें इसे सही करना है. जम्मू और कश्मीर से जुड़ा सबसे बड़ा मसला हमारे हाथ में नहीं है. ये नई दिल्ली और इस्लामाबाद के हाथों में है.’

कश्मीरियों के लिए गले लगना उनकी एक जरूरत सरीखा है. वे अपने स्नेह को खुलकर जताने के लिए जाने जाते हैं. मगर उमर ऐसा करने के प्रति सहज ही नहीं हो पाते

‘हर बार जब हम कश्मीर के मुद्दे के हल के करीब पहुंचते हैं तो कुछ ऐसा हो जाता है कि हम फिर वहीं पहुंच जाते हैं. आज हालत यह हो गई है कि दो देशों के विदेश मंत्री एक-दूसरे पर प्रेस कॉन्फ्रेंसों में आरोप लगा रहे हैं. मैं अल्लाह से दुआ करता हूं कि वह नेताओं को हमें करीब लाने की हिम्मत दे.’ अब वे उस बात पर आ जाते हैं जो उनकी नजर में आज सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है. ‘हम एक के बाद एक हड़तालों से कश्मीर समस्या हल नहीं कर सकते. इससे हम अनपढ़ों वाला राज्य बन जाएंगे. हमारे बच्चे कुछ नहीं कर सकेंगे. हम केवल भीख मांगने लायक रह जाएंगे. क्या हम यही चाहते हैं? सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह हमें पैसा देते हैं. हम उनके शुक्रगुजार हैं. आपकी मदद के लिए धन्यवाद. मगर यदि वे यह सोचते हैं कि पैसों से यह मुद्दा हल हो सकता है तो यह सही नहीं है. यह एक राजनीतिक समस्या है जो 1953 में शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी के साथ शुरू हुई थी.’

मगर श्रीनगर की सड़कों, जहां पिछले कुछ सप्ताहों से पत्थर और आंसू गैस के गोले उड़ रहे हैं,  पर कोई उन्हें सुनने को तैयार ही नहीं. आजकल यहां के एक आम दिन की शुरुआत बेहद शांत-सी होती है. दुकानें नहीं खुलतीं, औरतें ज्यादातर घरों में ही रहती हैं. धीरे-धीरे युवा इकट्ठे होने लगते हैं और आधा दिन होते-होते शांति कोलाहल में तब्दील होने लगती है. शुक्रवार की एक दोपहर को श्रीनगर के रामबाग इलाके में करीब 500 लोगों की भीड़ इकट्ठा है. यह पत्थर फेंकने वालों की भीड़ है. प्रशासन ने हाल ही में एक स्थानीय समाचार चैनल को उकसाऊ  खबरों के लिए प्रतिबंधित कर दिया है और भीड़ को इसके पीछे उसे खबरों से दूर करने की साजिश की बू आ रही है. कुछ लोगों के सुरक्षा बलों के हाथों मारे जाने की खबरें हवा में हैं.

इसी भीड़ में एक बेहद दुबला-पतला सा 12वीं कक्षा का छात्र अशरफ भी शामिल है. चीखने-चिल्लाने-नारेबाजी से उसका गला बैठा हुआ है. ‘वे (सुरक्षा बल) हमें स्कूल नहीं जाने देते, दूध नहीं खरीदने देते. सुबह-सुबह उन्होंने दूध के पैकेट लेकर घर लौट रहे एक आदमी को गोली मार दी. हम उन्हें राज नहीं करने देंगे. उन्हें वापस जाना ही होगा. हमें आजादी चाहिए,’ अशरफ बिना रुके बोलता जाता है. पत्थर फेंकने वालों ने अब एक मोर्चे जैसा रूप ले लिया है और वे खतरनाक तरीके से करीब आधा किमी दूर खड़े कुछ पुलिसवालों की ओर बढ़ चले हैं. इनमें से कइयों के चेहरे ढके हुए हैं. अचानक वे गालियों और पत्थरों की बौछार करते हुए भागने लगते हैं.

‘वे (सुरक्षा बल) हमें स्कूल नहीं जाने देते, दूध नहीं खरीदने देते. सुबह-सुबह उन्होंने दूध के पैकेट लेकर घर लौट रहे एक आदमी को गोली मार दी. हम उन्हें राज नहीं करने देंगे. उन्हें वापस जाना ही होगा. हमें आजादी चाहिए,’

पुलिसवालों के हाथों में लाठियां, बांस की बनी ढालें और कुछ के सर पर हेलमेट हैं. वे बड़े बेचारे-से लगते हैं जिन्हें ऐसी परिस्थितियों से निपटने का कोई प्रशिक्षण और अनुभव नहीं है. पुलिसवाले बचने और इसके लिए छुपने का प्रयास करते हैं. रेडियो पर सहायता की गुहार लगाई जाती है और थोड़ी ही देर में बख्तरबंद गाड़ियों का एक काफिला वहां पहुंच जाता है. आंसू गैस के गोले दागे जाते हैं. चारों ओर और फेफड़ों में बस धुंआं ही धुआं. सड़कों पर ईंट-पत्थरों का ढेर लग जाता है. पत्थरबाज गलियों की ओर रुख कर लेते हैं. अब बारी पुलिस कांस्टेबलों की है. वे पत्थर फेंकने लगते हैं. शाम तक कई बार इस चक्र को दोहराया जाता है. पिछले कुछ समय से कश्मीर का आम दिन कुछ-कुछ ऐसा होता रहा है.
बमुश्किल 18 महीने पहले उमर को कश्मीर में एक बड़ी उम्मीद के बतौर देखा गया था. मगर अपनी दूसरी सभा के लिए

हेलिकॉप्टर में बैठकर जाते उमर आज खुद ही उस उम्मीद के प्रति आश्वस्त नजर नहीं आते. जैसे ही हम उड़ान भरते हैं, उमर अपने आईपैड में खो जाते हैं. वे संगीत सुनते हुए अंग्रेजी की किताब पढ़ रहे हैं. हम बीच-बीच में उनसे बातें करते जाते हैं. वे बताते हैं कि वे इंटरनेट पर किताबें और फिल्में किराए पर लेते हैं, यानी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के प्रति उनका लगाव अब फिर से लौट आया है. जब वे मुख्यमंत्री बने ही थे तो असेंबली में किसी मुद्दे पर बहस के दौरान अपने ब्लैकबेरी फोन से उलझे हुए थे. इस पर हुए विवाद के बाद उन्होंने ब्लैकबेरी फोन से तौबा कर ली थी. मगर आज वे और उनके निजी सचिव ही दो ऐसे व्यक्ति हैं जो जम्मू और कश्मीर में आईपैड इस्तेमाल करते हैं.

उमर आज जैसे हैं उन्हें वैसा बनाने में उनके बोर्डिंग स्कूल – लॉरेंस स्कूल सनावर – का भी बहुत बड़ा योगदान है. वे आज भी अपने में ही रहने वाले व्यक्ति हैं. वे बहुत सख्त कॉर्पोरेट अनुशासन को पसंद करते हैं जिस वजह से परिणाम उनके लिए बहुत महत्व रखता है. इसके उलट उनके पिता फारुख अब्दुल्ला बेहद खुले मिजाज के व्यक्ति थे. उमर को देखकर उनमें भावनाओं की कमी होने का सा एहसास होता है जो उनके लोगों से जुड़ने की राह की सबसे बड़ी बाधा है. हालांकि अच्छे प्रशासकों को भावनाओं को बहुत ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए मगर कश्मीर इस मामले में अपवाद है. जहां हर चीज एक प्रकार से भावनाओं से ही संचालित होती हो वहां उमर के जैसा होना चीजों को थोड़ा और उलझा देता है.

कश्मीरियों के लिए गले लगना उनकी एक जरूरत सरीखा है. वे अपने स्नेह को खुलकर जताने के लिए जाने जाते हैं. मगर उमर ऐसा करने के प्रति सहज ही नहीं हो पाते. अकसर उनके चेहरे पर कोई भाव ही नहीं होता जिसकी वजह से लोग उन्हें समझ नहीं पाते और थोड़ा सशंकित रहते हैं. अपने इस व्यवहार की वजह से वे आज युवाओं, प्रौढ़ों, महिलाओं, बुिद्धजीवियों, विपक्षी पार्टियों सभी के निशाने पर हैं.

चूंकि वे सार्वजनिक रूप से कम ही दिखाई देते हैं और यदि ऐसा होता भी है तो वे ज्यादा सहज नजर नहीं आते इसलिए ऐसा आभास होता है कि जैसे सब-कुछ उनके नियंत्रण में नहीं है. इसीलिए उनके विरोधी यह आरोप लगाते हैं कि राज्य का प्रशासन राज्यपाल एनएन वोहरा देखते हैं और कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी गृहमंत्री चिदंबरम संभालते हैं. उमर को इन चुनौतियों का एहसास है. वे एक सुबह हमसे थोड़ा खुलकर बात करते हैं, ‘मुझे कई मोर्चों पर जूझना पड़ रहा है. हमारा पड़ोसी हमेशा कश्मीर समस्या को सुर्खियों में बनाए रखना चाहता है. भारत सरकार राजनीतिक संवाद की प्रक्रिया को जारी नहीं रख पा रही है. मुझे लोगों के अंदर घर करते जा रहे इस एहसास से भी निपटना है कि शांति प्रक्रिया में कोई प्रगति नहीं हो रही है, न तो बाहरी स्तर पर न ही अंदरूनी स्तर पर. सूबा भीषण बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहा है. विपक्ष की भूमिका पूरी तरह नकारात्मक हो चुकी है. वे इस नीति पर चल रहे हैं कि यदि वे शासन नहीं कर सकते तो किसी को करने भी नहीं देंगे. मुझे हर तरह के उन निहित स्वार्थों का सामना करना पड़ रहा है जो जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थितियां बहाल होते नहीं देखना चाहते. मेरी उम्र भी मेरे लिए एक चुनौती ही है. मैं अभी महज 40 साल का ही हूं. वे चाहते हैं कि मैं शुरुआत में ही असफल हो जाऊं ताकि उन्हें आज से 30 साल बाद मेरे लिए चिंता नहीं करनी पड़े.’

सब-कुछ बुरी तरह उलझा हुआ है. एक तरफ भारत है तो दूसरी तरफ पाकिस्तान, पत्थरबाज हैं, धड़ों में बंटी हुई हुर्रियत पार्टी है, आतंकवादी हैं, सशस्त्र बल हैं और इनके अलावा अमेरिका व अफगानिस्तान भी इससे जुड़े हैं. राज्य में इस समय आक्रोश अपने चरम पर है. और इसका कोई एक कारण नहीं है. तमाम घटनाओं की एक मिली-जुली प्रतिक्रिया है जो गुस्से के रूप में उमर और सुरक्षा बलों के खिलाफ देखने को मिल रही है. हर लिहाज से उमर इस वक्त देश की सबसे संवेदनशील जिम्मेदारियों में से एक संभाल रहे हैं. वे ऐसा ठीक से कर पाएं इसके लिए उन्हें अपनी कॉर्पोरेट शैली में काम करने की आदत का तालमेल गर्मजोशी और अपनेपन से बैठाना होगा.

इस समय कश्मीर के लोगों की उग्र प्रतिक्रियाओं के मूल में विद्रोह की बजाय प्रतिरोध ज्यादा दिख रहा है. यही वजह है कि काफी विचार-विमर्श के बाद उमर और उनकी पार्टी इससे निपटने की एक रणनीति पर पहुंच चुके हैं. रणनीति यह है कि प्रदर्शनकारियों को थका दिया जाए. इसका मतलब है कि उमर विवाद के राजनीतिक पक्ष की बात करते हुए कानून और व्यवस्था को बहाल करने पर जोर देंगे. वे कहते हैं, ‘मैं लोगों को बातचीत के लिए तैयार करने की कोशिश करूंगा. हो सकता है कि यह खुले में होने की बजाय चुपचाप हो. मुझे पता है कि भारत सरकार ने भी इस दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश की थी लेकिन जमीन पर कुछ हो उससे पहले ही ऐसे हालात पैदा हो गए कि यह बंद हो गई. यदि ज्यादा कुछ नहीं भी होता है तब भी उस बातचीत में शामिल कुछ पक्षों को भारत सरकार के साथ मतभेदों को कम करने के लिए एक लंबे दौर की सार्थक बातचीत की शुरुआत करते देख कर मुझे खुशी होगी.’ उमर आगे कहते हैं,’ एक दिक्कत यह है कि जो लोग इस प्रक्रिया में शामिल होना चाहते हैं उनकी शर्त होती है कि भारत सरकार बिना शर्त बातचीत करे जबकि वे अपने साथ शर्तों की पूरी सूची लेकर बात करना चाहते हैं. आप सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून हटाना चाहते हैं, राज्य से सेना हटाने की बात कहते हैं कैदियों को राहत देने की बात की जाती है. इन सारे मसलों पर फैसला बातचीत के बाद ही हो सकता है. बातचीत के पहले ही इन पर एकराय बन जाए, यह मुमकिन नहीं है.’

कश्मीर मसले पर सरकार की गुपचुप बातचीत की रणनीति का असर पिछले दिनों देखने को भी मिला. हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के कट्टरपंथी धड़े के नेता सैयद अली शाह गिलानी ने पांच अगस्त को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करके रेलवे स्टेशन जलाने की घटना की तरफ इशारा करते हुए कहा कि वे ऐसा नहीं चाहते. उन्होंने लोगों से गांधीवादी तरीके से प्रदर्शन करने की भी अपील की. उस दिन श्रीनगर में कड़ाई से कर्फ्यू लागू किया गया था और वहां सड़कों पर सन्नाटा छाया हुआ था. इस पर लोगों का कहना था कि उमर ने ही गिलानी को प्रेस कॉन्फ्रेंस आयाेजित करने के लिए तैयार किया था ताकि राज्य के सभी इलाकों में अमन बहाली का संदेश दिया जा सके.

वैसे इस घटना का महत्व हालात पर तात्कालिक रूप से काबू पाने की कोशिश के सिवा और कुछ नहीं है. जहां तक कश्मीर समस्या के स्थायी समाधान की बात है तो इस पर किसी नई सोच के प्रमाण कश्मीर में जरा भी नहीं मिलते. इस बात से उमर भी इत्तेफाक रखते हैं, ‘शायद इस मसले पर नए सिरे से कोई सोचना ही नहीं चाहता. मुझे पता है कि प्रदर्शन के दौरान लोगों के मरने में अलगाववादियों के छिपे हुए स्वार्थ हैं. जैसे ही कोई युवा मारा जाता है, इन लोगों को अपना आंदोलन एक और हफ्ते चलाने का मौका मिल जाता है’, वे आगे जोड़ते हैं, ‘लेकिन मुझे यह समझ में नहीं आता कि पीडीपी का इससे क्या फायदा है. अलगाववादियों का आंदोलन जितना ज्यादा बढ़ेगा, पीडीपी को उतना ही ज्यादा राजनीतिक नुकसान उठाना होगा. मैं जब आम लोगों से मिलने के लिए कंगन, हंदवाड़ा और दूसरी जगहों पर घूम रहा था तब पीडीपी को एक ही काम करना मुफीद लग रहा था- सचिवालय में तालाबंदी करना. उनके विधान सभा में 21 विधायक हैं. मैं यह नहीं कहता कि वे व्यापक स्तर पर जनसंपर्क की कोशिश करें. लेकिन जो हो रहा है इसके खिलाफ कुछ तो बोल ही सकते थे. मुझे उनकी तरफ से एक भी सकारात्मक आवाज सुनाई नहीं दी.’

उमर एक ऐसा कदम उठाने का प्रयास भी कर रहे हैं जो सड़कों पर एक बड़े बदलाव का कारण बन सकता है. वे कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी पुलिस के हाथों में देने की कोशिशों में लगे हुए हैं. वे कहते हैं, ‘यह जरूरी है कि हमारे कुछ सुरक्षा बलों को कानून और व्यवस्था की बहाली के लिए अलग तरह का प्रशिक्षण दिया जाए. यहां इंडियन रिजर्व पुलिस की पांच बटालियनें हैं जिन्हें एक विशेष कमांडो ट्रेनिंग के लिए भेजा जाना था ताकि उन्हें आतंकवाद विरोधी अभियान में इस्तेमाल किया जा सके. लेकिन हमें अब एहसास हो रहा है कि हमारी प्राथमिकता कानून व्यवस्था की बहाली है. हमने फैसला किया है कि इन बटालियनों को कानून व्यवस्था से निपटने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स की तर्ज पर प्रशिक्षित किया जाए, भीड़ को नियंत्रित करने के लिए उन्हें ऐसे हथियार दिए जाएं जिनसे किसी की जान जाने का जोखिम न हो. हमें कुछ इस तरह की चीजें करनी होंगी.’

कश्मीर का आधुनिक राजनीतिक इतिहास बताता है कि राज्य में इस तरह के संकट नए नहीं हैं. हां, उमर के लिए यह एक नई शुरुआत जरूर है. वे भारत के सबसे कम उम्र के और सबसे संवेदनशील राज्य के मुख्यमंत्री हैं. हो सकता है कि आने वाले दिनों में उनसे कुछ और गलतियां हों, और जो इस पद पर रहते हुए किसी से भी हो सकती हैं. लेकिन ताजा संकट के अनिश्चित समाधान के बावजूद एक तयशुदा बात यह है कि उन्हें नायक या जलते कश्मीर का नीरो बनते देखना भारत में हालिया दिनों की सबसे दिलचस्प राजनीतिक घटना बनने वाला है. 

नत्था! और हमारा अंधा होना… : पीपली लाइव

फिल्म पीपली लाइव

 

निर्देशक अनुषा रिजवी

 

कलाकार रघुवीर यादव, ओमकार दास, नवाजुद्दीन

 

आप बाहर निकलते हैं और रो लेना चाहते हैं. क्या यह पूरी फिल्म के दौरान बार-बार जोर-जोर से हंसने का पछतावा है? शायद हो, शायद कुछ और हो. शायद अनुषा रिजवी इस तरह से हम पर हंस रही हों कि कैसे बेशर्मी से गरीबी और मृत्यु के दृश्यों में हम मुंह फाड़कर हंस पाते हैं. हां, वे इसे इसी तरह बनाना चाहती थी और पॉपकोर्न के थैलों के बीच किसी और तरह इसे बनाना शायद मुमकिन भी नहीं था. हमने हिन्दी फिल्मों को बस इस एक कोने में ले जाकर छोड़ दिया है. हम कोई गंभीर बात नहीं सुनेंगे. सुनाओगे तो चिल्लाकर उसका विरोध करेंगे या इगनोर कर देंगे. हम महात्मा गांधी को सिरे से खारिज करते हैं, जब तक वह ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ न हो. हम गाँवों की कहानियों पर थूकते हैं, जब तक वह ‘वेलकम टू सज्जनपुर’ न हो. हम नहीं जानते कि विदर्भ कहां है और कौन बेवकूफ किसान हैं, जो अपनी जान दे रहे हैं और हम जानना भी नहीं चाहते. ऐसे में ‘पीपली लाइव’ उस आखिरी हथियार ‘हंसी’ के साथ आती है और हमें हमारे समय की सबसे मार्मिक कहानियां ठहाकों के बीच सुनाती है. यही सबसे त्रासद है.

 

अनुषा रिजवी और उनके सह-निर्देशक पति महमूद फारुकी दास्तानगोई की परंपरा से आते हैं और इसीलिए उनका हाथ आपकी नब्ज पर है. वे सबसे हताश कर देने वाली बातों पर रसीले चुटकुले गढ़ सकते हैं और आप ध्यान दीजिए, पसीने से भीगा एक मजदूर जब हर रोज वही गड्ढ़ा खोद रहा है, तब आप अकेले हैं जो हंस रहे हैं. फिल्म तो उसके साथ खड़ी होकर उसकी तकलीफ में रो रही है. यही कला है. या जादू.

 

ऐसा ही जादू रघुवीर यादव में है और उनसे ज्यादा नवाजुद्दीन में, जिनके छोटे से चरित्र के पास फिल्म की सबसे ज्यादा दुविधाएं हैं. एक स्थानीय अखबार का पत्रकार राकेश ही फिल्म के दो हिन्दुस्तानों के बीच की कड़ी है. वही है जो गढ्ढ़ा खोदने वाले होरी महतो और अंग्रेजी समाचार चैनल की एंकर नंदिता मलिक को करीब से देखता है और ऐसा देखने के बाद कोई संवेदनशील आदमी चैन से कैसे रह सकता है? वह बेचैन होता है, लेकिन बेचारा है मगर फिर भी घटनाएं उसी से होकर बदलती हैं.   नत्था, जो हर जगह है, मरता हुआ या जीते हुए मरने की कामना करता हुआ, धूल से पटे चेहरे के साथ जिसे आप दैवीय विनम्रता से गुड़गांव की भव्य इमारतें रचते हुए देखते हैं, जिसके खेत उसी बैंक ने कर्ज के बदले हथिया लिए हैं, जो टीवी पर रोज यह विज्ञापन दिखाता है कि वह हमेशा आपके साथ खड़ा रहेगा या सर उठा के जियो. कैसे जियो भाई? क्या उसके पास सर झुका कर या कीचड़ में धंसाकर भी जीते रहने का विकल्प छोड़ा गया है? यह उसी नत्था की तलाश है, जिसकी खबर टीवी पर आने पर आप शिल्पा शेट्टी या सानिया मिर्जा की खोज में चैनल बदल देते हैं. लेकिन पा लेने के बावजूद यह उसी नत्था को हमेशा के लिए खो देने की भी कहानी है क्योंकि आप उसे दिन में हजार बार देखते हैं और एक बार भी नहीं देखते. कोई फिल्म हमें कितना बदलेगी?

औपनिवेशिक शोषण के आइबिस पर

फरवरी, 2008 में जब मॉरिशस के प्रधानमंत्री नवीनचंद्र रामगुलाम अपने पूर्वजों के गांव बिहार के भोजपुर जिले में हरिगांव आए थे तो राजधानी से लेकर हरिगांव तक जश्न का माहौल था. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर रामगुलाम के परिजन तक  बिछुड़े परिजनों के मिलने के मौके पर बहुत खुश थे. लेकिन इन बातों में कहीं भी उस औपनिवेशिक शोषण के दुष्चक्र का जिक्र नहीं था जिसने लाखों किसानों को तबाह किया था और जो इन जगहों से गुलामों की तरह लोगों को जहाज पर लादकर मॉरिशस और दुनिया के दूसरे हिस्सों में ले जाने के लिए जिम्मेदार था.

लेकिन लगभग उन्हीं दिनों सुदूर अमेरिका में बैठे एक भारतीय लेखक अमिताभ घोष का उपन्यास प्रकाशित हुआ- सी ऑफ पॉपीज. हाल ही में इस किताब का हिंदी अनुवाद पेंगुइन ने अफीम सागर  नाम से छापा है. थोड़े कमजोर अनुवाद के बावजूद यह एक जरूरी उपन्यास है, जो मुख्यतः उत्तर प्रदेश और बिहार के किसानों की नियति के बारे में बताता है. इन किसानों को ईस्ट इंडिया कंपनी ने कर्ज देकर अफीम उगाने पर बाध्य किया. लेकिन फसल खरीदने की व्यवस्‍था ऐसी थी कि कर्ज कभी खत्म नहीं होता. किसान धीरे-धीरे तबाह हो जाते और आखिरकार गुलामों के रूप में खरीद लिए जाते, जिन्हें कलकत्ता से जहाज में लादकर मॉरिशस भेज दिया जाता.

कलकत्ता में आइबिस नामक जहाज पर मॉरिशस जाने के लिए जो लोग सवार हैं वे सभी इस औपनिवेशिक दुष्चक्र में फंसे हैं. एक अमेरिकी अश्वेत, एक फ्रांसीसी अनाथ युवती, एक कंगाल राजा और सैकड़ों गुलाम किसान. यह उपन्यास हमें 1830 के दशक के औपनिवेशिक भारत की यात्रा पर ले जाता है, जहां मनुष्य की आजादी और सभ्यता के नाम पर ब्रिटिश साम्राज्य अमेरिका से लेकर चीन तक तबाही फैला रहा था तथा गुलामों और अफीम के व्यापार के जरिए मोटा मुनाफा निचोड़ रहा था. कुछ लोग संपन्न हो रहे थे और दूसरे हजारों कंगाल. यह उपन्यास इसी प्रक्रिया की कहानी कहता है. आइबिस के यात्रियों की अपनी-अपनी जिंदगियां इतनी कुशलता से बुनी गई हैं कि सभी अपनी राह चलते हुए लुटेरी कंपनी के नजर नहीं आने वाले लेकिन सर्वव्यापी फंदे में फंस कर आखिरकार आइबिस पर आ गिरते हैं.

उपन्यास की दो विशेषताएं अलग से पहचानी जा सकती हैं. लेखक आधुनिकता का दावा करने वाले अंग्रेेज अधिकारियों की परतें खोल देता है जो अपनी सत्ता और मुनाफे के लिए उत्पीड़क, क्रूर और मध्ययुगीन ऊंची जातियों के साथ खड़े थे और उनकी ताकत को भी बनाए हुए थे. दूसरी विशेषता यह है कि उपन्यास में दुनिया भर के उत्पीड़ित वर्ग अपरिचित होने के बावजूद आपस में जुड़ जाते हैं. जहाज पर अमेरिकी अश्वेत हों या गाजीपुर का एक दलित या एक चीनी कैदी, संकट के समय वे एक-दूसरे की मदद करते हैं. वे अपने उत्पीड़कों के खिलाफ विद्रोहों में भी खुद को एक साथ पाते हैं.

अफीम सागर बांग्ला उपन्यासकार मानिक बंद्योपाध्याय के पद्मा नदीर मांझी की याद दिलाता है. पद्मा नदीर मांझी में भी कमोबेश एसी ही कहानी कहने की कोशिश की गई है. तीन उपन्यासों की श्रृंखला का यह पहला उपन्यास खत्म करते-करते यह लगने लगता है कि आज भी भारत समेत तीसरी दुनिया के अधिकतर देश औपनिवेशिक शोषण के उसी आइबिस पर सवार हैं जिसकी यात्रा सदियों पहले शुरू हुई थी. नाविकों और पहरेदारों के चेहरे भले बदल गए हों.

रेयाज उल हक

' निराला ब्राह्मणवाद से ग्रसित लेखक हैं '

आपकी पसंदीदा लेखन शैली क्या है?

फिक्शन. मैं कहानी लिखता रहा हूं. अभी एक उपन्यास पर काम चल रहा है, शायद इस साल पूरा हो जाए. डायरी जरूर लिखता हूं. मैं उम्र के इस पड़ाव पर हूं जिसमें बस लिखने के लिए लिखना नुकसानदेह ही होता है, अगर लिखने लायक आपके पास कुछ खास न हो. मुझे जब संवाद बनाना होता है तो लिखता हूं और उसके लिए जरूरी विधा अपना लेता हूं. हां, कविता कभी मेरा माध्यम नहीं रही.

अभी क्या पढ़ रहे हैं?

अभी एक बहुत बढ़िया उपन्यास पढ़ा, रणेंद्र का ग्लोबल के देवता. इसी समीक्षा भी लिखी है हंस के लिए. वाकई बहुत मौजू और खूबसूरत उपन्यास है. मिथकीय पौराणिकता के बीच जिस देवासुर संग्राम की चर्चा सुनते आ रहे थे, उसको समझा इसके जरिए. यह जाना कि आज भी 10 हजार की संख्या में असुर झारखंड में रह रहे हैं. हमने तो समझा था कि असुर अनार्य है, वे काले होते हैं. लेकिन यह धारणा टूट गई. यह धातु बनानेवाली जाति है, जिसका देवासुर संग्राम के समय से हम दमन करते आए हैं. आज भी उनका दमन जारी है. वही लोग नक्सली हैं और बहुत संख्या में मारे गए हैं. उपन्यास के माध्यम से रणेंद्र ने बहुत अच्छे से दर्शाया है कि किसी जाति को बहिष्कृत करने और फिर शामिल करने की क्या प्रक्रिया रही है. बहिष्करण और शामिल करने की यह प्रक्रिया को समझना हमारा बड़ा सांस्कृतिक संकट रहा है. लंबे दौर में हमने इसे समझने की कोशिश की. इस उपन्यास के जरिए इसे समझा.

वे रचनाएं या लेखक जिन्हें आप बेहद पसंद करते हों?

प्रेमचंद, मुक्तिबोध, रेणु बार बार अपनी ओर खींचते हैं. खास कर एक जटिल और नजदीक के लगते हैं मुक्तिबोध. उन्होंने कहानियां, कविताएं, डायरी, समीक्षा, आलोचना लिखी. उन्हें पढ़ कर सीखा कि लेखक की चिंता और प्रतिबद्धता, मूल्य, समर्पण कैसा होना चाहिए. जहां तक सीखने की बात है, मार्क्वेज से लेकर काफ्का और चेखव सबसे सीखा है. जब मैं रूसी साहित्य पढ़ता था, जो मेरा प्रिय है तो मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित होने के बावजूद मुझे गोर्की के बजाय चेखव अब भी बहुत पसंद आते हैं.

कोई जरूरी रचना जिसपर नजर नहीं गई हो?

संस्कृत की एक प्रगतिशील धारा भी रही है. अश्वघोष और शूद्रक जैसे महत्वपूर्ण कवियों को नजरअंदाज किया गया. अश्वघोष का बुद्धचरितम का लीला भाग तो हमारे पास रहा, लेकिन ज्ञान प्राप्ति के बाद विचार वाला भाग नष्ट कर दिया गया, जिसे चीन से अनुवाद करके मंगाया गया है. उसका संस्कृत वाला भाग नहीं बचा है. आखिर अश्वघोष की चर्चा क्यों नहीं होती. कालिदास पर अश्वघोष के प्रभाव को लोगों ने रेखांकित किया है. इतने महत्वपूर्ण कवि को क्यों नजरअंदाज करते रहे हैं. क्योंकि वे बौद्ध थे. सूर्यनारायण चौधरी ने बुद्धचरितम का अनुवाद किया है. संस्कृत की प्रगतिशील परंपरा पर काम नहीं हुआ…एसा समझा गया कि यह तो ब्राह्मणवाद की भाषा है, रूढ़ मूल्यों की भाषा है. जबकि इसमें जो प्रतिरोध की संस्कृति रही है, उसकी बार-बार उपेक्षा की गई है. वर्चस्व की संस्कृति की हमने ज्यादा परवाह की है.

कोई रचना जो बेवजह मशहूर हो गई हो?

राम की शक्ति पूजा और तुलसीदास समेत निराला की रचनाएं. भाषा के मामले में निराला की जो काव्य क्षमता है, वह आकर्षित करती है. मैं राम की शक्ति पूजा पर बार-बार रीझता हूं. अपने शाब्दिक शौष्ठव में यह अद्भुत कविता है. मंत्रों या आयतों की तरह यह आकर्षित तो करती है, लेकिन जब मैं इसका अर्थ ढूंढ़ने की कोशिश करता हूं तो निराश होता हूं. मुझे समझ में नहीं आता कि कवि कहना क्या चाहता है, वह हमें किस ओर ले जाना चाहता है. मुक्तिबोध की अंधेरे में कविता में आज के आदमी की पीड़ा झलकती है. लेकिन निराला की इस रचना में एक पूजा का दूसरी पूजा से उत्तर देना, एक दासता का गहरी दासता से उत्तर देना- यह समझ में नहीं आता. मेरे मन में सवाल उठता है कि यह है क्या. उन दिनों देश में राष्ट्रीय आंदोलन चल रहा था और निराला तुलसीदास लिख रहे थे, जिसमें सांस्कृतिक एकांगीपन और सांप्रदायिक पुट है. यह पढ़ने पर हिंदू महासभा से जुड़े लेखक की रचना लगती है. अगर मुझे निराला और (मैथिलीशरण) गुप्त में से चुनना होगा तो गुप्त ज्यादा प्रगतिशील दिखते हैं, मैं उन्हें चुनूंगा. मुझे गुप्त जी ज्यादा आधुनिक लगते हैं. वे ज्यादा उदार हैं, उनमें निराला जैसी कट्टरता नहीं है. गुप्त में भागवत भाव है. हिंदुत्व का भाव नहीं है जो निराला में है. ब्राह्मणवाद से ज्यादा ग्रसित लेखक हैं निराला. वे रामनामी हैं. गुप्त हिंदू हैं इस पर उन्हें शर्म नहीं है पर उनके लिए दूसरे धर्मवाले भी बुरे नहीं हैं. जबकि निराला कहते हैं कि दूसरे धर्मवाले गर्त में हैं. निराला कहते हैं कि दूसरे सारे गलत हैं और मैं ठीक हूं. इस आधार पर हिंदी का मिजाज क्या है, उसने किस तरह अपने रचनाकारों देखा है. इस पर चर्चा नहीं हुई है.

पढ़ने की परंपरा को कायम रहे, इसके लिए क्या किया जाना चाहिए?

बिना पढ़े मुझे तो मुक्ति नही मिलती. यह आनेवाली पीढ़ी के ऊपर है कि वह कौन से रास्ता अपनाती है. पढ़ने के संदर्भ में किताबों को लिया जाता है लेकिन किताब भी हमेशा इस रूप में नहीं रही. बहुत दिनों तक श्रुति में बातें चलन में रही, बातों को एक दूसरे से याद किया गया. बहुत बाद में जा कर उनका ग्रंथन हुआ. ताल पत्रों पर आंका गया. कुछ ही सौ सालों से किताबें इस रूप में हैं. कंप्यूटर के बाद किताबों का एक रूप बदल सकता है. मैं उससे भयभीत नहीं हूं. मैं भले न समझ पाऊं पर पीढ़ियों में इसके जरिए विमर्श जीवित रहेगा. जरूरी है कि पढ़ने से अधिक विमर्श जीवित रहे, सोचने समझने की प्रवृत्ति जीवित रहे. आज की हमारी पीढ़ी से अधिक सेकुलर है और समझदार है. लोग समझते हैं कि आज की पीढी बहुत सांप्रदायिक हो गई है और गांधी की पीढ़ी बहुत उदार थी. लेकिन वह गांधी की ही पीढ़ी थी कि एक मुसलमान कलाकार को अपना नाम दिलीप कुमार या मीना कुमारी रखना पड़ता था. उनके मूल नाम तक बहुत कम लोगों को पता होते थे. हमारी पीढ़ी में नक्सलवाद पर जिस तरह बात होती थी आज की पीढ़ी में उसी तरह नहीं हो रही है. नई पीढ़ी के बच्चे ऑपरेशन ग्रीन हंट के लिए तैयार नहीं है. यह वही पीढ़ी है जिसे आप कंप्यूटर की औलाद और कम पढ़ा लिखा समझ रहे हैं. जबकि आज तो नामवर सिंह की पीढ़ी इस ग्रीन हंट पर चुप है. यह आज की ही पीढ़ी है जो इसके खिलाफ विरोध दर्ज करा रही है अरुंधति को समझ रही है और उसके साथ है. नामवर की पीढ़ी तो 1084वें की मां पढ़ कर रोनेवाली पीढ़ी थी. वह विरोध जतानेवाली पीढ़ी नहीं थी. आज की पीढ़ी ज्यादा जानकारी रखती है. जानकारी रखना और सोचना ही अधिक महत्वपूर्ण है. यह जरूरी नहीं कि हमारी कहानियों को पढ़ कर नई पीढ़ी बालू से तेल निकालती रहे. पढ़ना, सोचना और एक विवेक का निर्माण करना यह प्रक्रिया तेज हुई है कमजोर नहीं हुई है.

रेयाज उल हक

बुलंद ख्वाबों की ऊंची परवाज

हैदराबाद के उपनगरीय इलाके साइबराबाद में साइना नेहवाल का अपार्टमेंट किसी शादी वाले घर की तरह सजा हुआ है. भारतीय बैडमिंटन की इस शीर्ष महिला खिलाड़ी को इंडोनेशिया सुपर सीरीज जीते हुए दो हफ्ते बीत चुके हैं लेकिन उन्हें बधाई देने वालों की भीड़ कम नहीं हो रही. घर में टीवी देख रही साइना की मां ऊषा नेहवाल, हमसे बैडमिंटन की तकनीक पर बात करते हुए कहती हैं, ‘ पहले उसका (साइना का) हाफ-स्मैश उतना अच्छा नहीं था. मजबूत शरीर वाले खिलाड़ियों के सामने यह बहुत जरूरी है.’ ऊषा खुद बैडमिंटन की राज्यस्तरीय खिलाड़ी रह चुकी हैं. आजकल वे टीवी पर राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सभी मैचों पर बारीक नजर रखती हैं ताकि उन्हें अपनी बेटी के प्रतिद्वंद्वियों के बारे में पहले से पता हो.

हैदराबाद के पॉश इलाके में बने इस भव्य अपार्टमेंट में नेहवाल परिवार हाल ही में शिफ्ट हुआ है. कुछ साल पहले तक यह परिवार भी हाथखींच कर खर्च करने वाले आम मध्यवर्गीय परिवारों जैसा था. हां, एक चीज इसे जुदा करती थी और वह यह कि यहां हर बात में अकसर बैडमिंटन जरूर शामिल होता था. ऊषा बताती हैं कि साइना जब स्कूल में थी तो राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भाग लेने के दौरान वे भी उसके साथ जाती थीं और बैडमिंटन कोर्ट की दर्शक दीर्घा में बैठकर चीयरलीडर्स की तरह अपनी बेटी का उत्साह बढ़ाया करती थीं.

अपने आदर्श टेनिस खिलाड़ी रोजर फेडरर की तरह साइना भी मानती हैं कि जीत की राह काफी हद तक आपका आंतरिक संघर्ष है. वे कोर्ट पर शांत रहने की उनकी आदत से भी बेहद प्रभावित थींसाइना का परिवार नए अपार्टमेंट में अभी पूरी तरह शिफ्ट नहीं हुआ है. मेंहदीपट्टनम के अपने पुराने घर में ट्रॉफियों के बीच बैठे साइना के पिता हरवीर सिंह को 1998 के वे दिन आज भी याद हैं जब उनका स्थानांतरण हरियाणा के हिसार से हैदराबाद हुआ था. उसी साल दिसंबर में उनकी कंपनी एक बैडमिंटन प्रतियोगिता आयोजित करने वाली थी. आयोजन की जिम्मेदारी सिंह संभाल रहे थे. एक दिन जब वे साइना के साथ स्थानीय स्टेडियम पहुंचकर व्यवस्थाओं का जायजा ले रहे थे तभी आठ वर्षीया साइना अपने हमउम्र बच्चों के साथ बैडमिंटन खेलने लगी. सिंह बताते हैं, ‘उसे देखकर एक कोच ने  मुझसे कहा कि वह बहुत खूबसूरती से रैकेट पकड़ती है.’ कोच ने सिंह से यह भी कहा कि अगले साल बैडमिंटन के ग्रीष्मकालीन शिविर में वे साइना को जरूर लाएं.

गरमी की वे छुट्टियां सिंह और नेहवाल परिवार के लिए सबसे महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुईं. उस दौरान सिंह हर दिन सुबह चार बजे उठते थे और साइना को अपनी स्कूटर से 25 किमी दूर बैडमिंटन एकेडमी छोड़ने जाते थे. भावुक होते हुए सिंह कहते हैं, ‘ वह रास्ते में सो जाती थी, मुझे भी लगता था कि इतने छोटे बच्चे के लिए यह काफी तनाव भरी कवायद है.’ उस समय यह कवायद एक तरह से पूरे परिवार की जिम्मेदारी बन गई थी जिसने बाद में इस परिवार की प्राथमिकताएं तय कर दीं. अब यहां बैडमिंटन पहले था, बाकी सारे काम पीछे. कमाई का एक बड़ा हिस्सा रैकेट-शटल खरीदने और सबसे अच्छे कोच की फीस देने में खर्च होने लगा था. एक विलक्षण प्रतिभा निखरने लगी थी.

बधाई देने वालों से मुलाकात के बाद साइना हमें बताती हैं कि जब उनके सहपाठी खिलौने और वीडियो गेम में उलझे रहते थे तो उनके लिए बैडमिंटन एक काम होता था और साथ में मनोरंजन भी. वे कहती हैं, ‘ यह मुश्किल था लेकिन लगातार अभ्यास एक आदत बन गई.’ अपनी मां और रैकेट के साथ देश भर में घूमते हुए वे जल्दी ही एक और अनुभव की आदी हो गईं. वे कहती हैं, ‘खेलते-खेलते मुझे जीत की लत लग गई.’ राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में जीत के इस सिलसिले के बीच 2004 उनके करियर का सबसे महत्वपूर्ण साल साबित हुआ. इसी साल उन्हें पुलेला गोपीचंद के रूप में एक साथी, मार्गदर्शक और कोच मिला. 2001 में गोपीचंद ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप जैसी प्रतिष्ठित प्रतियोगिता जीत चुके थे. बैडमिंटन जैसे खेल में भारत को यह उपलब्धि अचानक मिली थी. इसके बाद और इससे आगे हम भारतीयों के सामने और कोई नहीं था. गोपीचंद ने 2002 में पहली बार साइना पर ध्यान दिया था. उस समय वे अपनी चोट से उबर रहे थे और बैडमिंटन की कोचिंग देने के बारे में मन बना चुके थे. गोपीचंद बताते हैं, ‘ वह उस समय कुछ नाटी और मोटी थी, लेकिन जुझारूपन उसमें कूट-कूटकर भरा था.’

2006 में साइना की विश्व रैंकिंग 186 थी. उसी साल उन्होंने विश्व में चोटी की कई खिलाड़ियों को हराकर फिलीपींस ओपन जीत लिया. 16 साल की इस  खिलाड़ी के लिए यह जीत काफी अहम थी. साइना कहती हैं, ‘ इसके बाद मुझे भरोसा हो गया कि मैं दुनिया के सबसे अच्छे खिलाड़ियों को हरा सकती हूं.’

हाल की सफलताओं के बाद इस बात की भी चर्चा हो रही है कि कहीं अपनी नाम से मिलते-जुलते नाम वाली हैदराबाद की एक और चर्चित खिलाड़ी की तरह ग्लैमर और सफलता की चकाचौंध साइना का ध्यान खेल से न हटा दे. हालांकि उनकी मेहनत और खेल के प्रति रवैए से इस बारे में आश्वस्ति जगती है. साइना जब 10 साल की थीं तब से बैडमिंटन खेल रही हैं. हर सुबह सात बजे से अभ्यास में जुट जाने वाली और दिन में 12 घंटे बैडमिंटन खेलने वाली इस भारतीय शटलर के लिए यह खेल जीवन रेखा बन चुका है. प्रतियोगिताओं के दौरान दबाव दूर रखने के लिए योग का सहारा लेने वाली साइना बैडमिंटन पर योगियों की शब्दावली में बात करती हैं, ‘खेलना मेरे लिए ध्यान करने जैसा है.’ अपने आदर्श टेनिस खिलाड़ी रोजर फेडरर की तरह साइना भी मानती हैं कि जीत की राह काफी हद तक आपका आंतरिक संघर्ष है. वे कहती हैं, ‘मैं बचपन में उनका खेल देखती थी, कोर्ट पर शांत रहने की उनकी आदत से मैं बहुत प्रभावित थी. उनको देखकर यह पता लगाना मुश्किल है कि वे मैच हार रहे हैं या जीत रहे हैं. मैं भी खेल के दौरान कोर्ट पर शांत रहने की कोशिश करती हूं.’ शायद साइना की यही सबसे बड़ी खूबी है जिसकी बदौलत उन्हें लगातार तीन प्रतियोगिताओं – इंडियन ओपन ग्रांपी, और उसके बाद सिंगापुर व इंडोनेशिया सुपरसीरीज, जिन्हें बैडमिंटन का ग्रैंड स्लैम माना जाता है, में जीत मिली. इन प्रतियोगिताओं की जीत की आधारशिला तकरीबन एक साल पहले तब रखी गई थी जब उन्होंने फैसला किया कि वे अपनी रैंक सुधारने की बजाय बड़ी प्रतियोगिताएं जीतने पर ध्यान देंगी. अब आने वाले महीनों में उन्हें राष्ट्रमंडल खेल, एशियाड और विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में भाग लेना है. इन प्रतियोगिताओं के लिए भी साइना की यही रणनीति है. हालांकि ये प्रतियोगिताएं गोपीचंद और साइना के लिए एक बड़े लक्ष्य- लंदन में 2012 में आयोजित ओलंपिक में स्वर्ण पदक के बीच की सीढ़ियां भर हैं.

बैडमिंटन में रची-बसी साइना के लिए क्या इससे इतर भी जिंदगी है? वे कुछ देर ठहरकर हमें बताती हैं कि इतवार के दिन वे घर में फिल्में देखना और आराम करना पसंद करती हैं. और बाहर जाकर खाना भी. उनके पसंदीदा कलाकार शाहरुख खान के बारे में चर्चा के दौरान ही आप यह बता सकते हैं कि वह अपनी हमउम्र 20 साल की लड़कियों जैसी हैं.

साइना  की चमत्कारिक सफलता क्या भारत में इस खेल, जो एक लंबे अरसे तक शौकिया तौर पर ही खेला जाता रहा, को नई ऊंचाइयां दे पाएगी?  पुलेला गोपीचंद नम्मीगड्डा अकादमी, जहां साइना अभ्यास करती हैं, के ग्रीष्मकालीन बैडमिंटन शिविर में इस साल शामिल होने वाले बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी इस बात की उम्मीद तो जगाती ही है और यह भी बताती है कि इस साइना जैसी विलक्षण प्रतिभा की उपलब्धियां उनको मिली ट्रॉफियों से कहीं आगे जाती हैं. 

बेहाल बुंदेले बदहाल बुंदेलखंड – 1

अपनी वीरता और जुझारूपन के लिए प्रसिद्ध बुंदेलखंड में कई सालों के सूखे, इसके चलते पैदा कृषि संकट और इनसे निपटने की योजनाओं में भ्रष्टाचार ने पलायन और आत्महत्याओं की एक अंतहीन श्रृंखला को जन्म दे डाला है. तसवीरें और रिपोर्ट रेयाज उल हक

बुंदेलखंड को मिले 3,506 करोड़ रुपए के पैकेज से महोबा जिले के पवा गांव की रामकली को समय पर और नियमित रूप से राशन मिल जाने की कम ही संभावना है. उतनी ही कम संभावना इस बात की भी है कि उन्हें और उनके तीन बेटों और एक बहू के पांच सदस्यों वाले परिवार को साल में 100 दिनों का सुनिश्चित रोजगार मिल जाएगा. और इस बात की संभावना तो बिल्कुल ही नहीं है कि उनके परिवार के ऊपर चढ़ चुके एक लाख रुपए के कर्ज का बोझ इस पैकेज से कम हो जाएगा. बेशक, इस पैकेज से उनके पति के लौट आने की भी कोई उम्मीद नहीं है.

रामकली के पति कहीं गए नहीं हैं. 22 जनवरी की शाम को पास ही बन रही नाली का काम करके लौटने के बाद वे जेब में रोटियां रखकर कहीं चले गए थे. रात गहराने के बाद भी जब वे नहीं लौटे तो रामकली ने अपने बेटों और रिश्तेदारों के साथ उनकी तलाश शुरू की. उन्हें सुंदरलाल को खोजने में बहुत परेशानी नहीं हुई. गांव के पास ही एक पेड़ पर लटकती उनकी लाश मिल गई थी. सुंदरलाल ने खुद को फांसी लगा ली थी.

सुंदरलाल की आत्महत्या की कई सारी और एक-दूसरे में बुरी तरह उलझी हुई वजहें हैं. उनकी मौत के पीछे गरीबी, सूखा, इससे निपटने में सरकार की नाकामी, लोगों को राहत देने के लिए चलाई जा रही योजनाओं में भ्रष्टाचार और पंचायती राज के लुभावने चेहरे के पीछे छिपे सामंती समाज के क्रूर चेहरे की मिली-जुली कहानी है. इनको एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता. जिस समय सुंदरलाल ने आत्महत्या करने के अपने फैसले पर अमल किया, उस समय उनके िसर पर लगभग एक लाख रुपए का कर्ज था, जिसे उन्होंने अपनी बेटी की शादी तथा अपने बेटों और बहू की बीमारी के इलाज के लिए गांव के कई लोगों से लिया था. सुंदरलाल एक ऐसे गांव में रहते थे जहां न इलाज के लिए कोई सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र है और न ही कोई ढंग का डॉक्टर. उनके पास राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून के तहत एक जॉब कार्ड था, जिसपर अंतिम बार काम 2007 में दिया गया था – पिछले चार वर्षों में कुल मिलाकर 65 दिनों का काम, और मजदूरी के रूप में 3,500 रुपए. जाहिर है, यह राशि छह लोगों के परिवार का 4 साल तो क्या छह महीने पेट भरने के लिए भी काफी नहीं थी. उनके राशन कार्ड पर पिछले दस में से तीन महीने गांव के कोटेदार ने राशन नहीं दिया था. जाहिर है कि उनकी समस्याओं को मीडिया के मायावती बनाम राहुल गांधी समीकरण की मदद से नहीं समझा जा सकता. सुंदरलाल की यह कहानी पूरे बुंदेलखंड की 2 करोड़ 10 लाख की आबादी की कहानी से कमोबेश मिलती-जुलती है. इसलिए उनकी समस्याओं को समझने की कोशिश समूचे बुंदेलखंड की समस्याओं को समझने सरीखी है.

99.8% किसानों को 2009 में खरीफ की फसल पर नुकसान उठाना पड़ा. इनमें से 74 प्रतिशत को 50 से 100 प्रतिशत तक का नुकसान उठाना पड़ा. 33 प्रतिशत लोगों को कोई सहायता नहीं मिली

सुंदरलाल का चार भाइयों का परिवार जितना आज बिखरा हुआ है उतना तब भी नहीं बिखरा था. जब उनके पिता शिवदयाल कोरी 1992 में कारसेवा के लिए अयोध्या जाने के बाद फिर कभी नहीं लौटे थे. कुछ समय बाद सभी भाइयों ने आपस में जमीन बांट ली और खेती करने लगे. अभी एक दशक पहले तक उनके साथ कोई समस्या नहीं थी. उनकी जमीन पर इतनी दाल और गेहूं हो जाती थी कि काम चल जाता था. हालांकि मजदूरी तब भी करनी पड़ती थी, लेकिन वह गांव में ही मिल जाती थी. समस्या तब शुरू हुई जब दस साल पहले बारिश ने धोखा देना शुरू किया. इससे पानी की कमी होने लगी. कुएं सूखने लगे और डीजल इंजन वाले पंप सेट से सिंचाई करने की हैसियत गांव के अधिकतर लोगों की नहीं थी. इसका सीधा असर खेती पर पड़ा और धीरे-धीरे खेतों की बुवाई कम होती गई. जमीन परती रहने के कारण गांव में काम मिलना बंद हो गया तो भुखमरी से बचने के लिए सुंदरलाल को गांव छोड़ना पड़ा. वे अब कानपुर के ईंट भट्ठों पर काम करने आ गए.

ईंट भट्ठे पर दो लोगों को एक दिन में 1,200 ईंटें बनाने पर मजदूरी मिलती थी 240 रुपए. इस कमाई से पेट तो भर जाता था लेकिन परिवार चलाने के लिए सिर्फ पेट भरना ही काफी नहीं होता. घर में दूसरी जरूरतें भी पड़ती हैं. शादियां और बीमारी उन वजहों में सबसे ऊपर हैं जिनमें सबसे अधिक खर्च होता है. सुंदरलाल की एक बेटी है और तीन बेटे. सात साल पहले जब खरेला में उन्होंने अपनी बेटी की शादी की तब सूखे का तीसरा साल था. उन्हें कर्ज लेना पड़ा था. वह तो किसी तरह चुक गया, लेकिन असली संकट तब सामने आया जब उनका छोटा बेटा बीमार पड़ा.

करण की उम्र 15 के आसपास है. लगभग एक साल पहले उसके बीमार पड़ने पर सुंदरलाल उसका इलाज कराने ग्वालियर और फिर झांसी लेकर गए. वे इस बीमारी से परिचित थे. यह उनके दोनों बड़े बेटों को भी हो चुकी थी. लेकिन झांसी के डॉक्टर करण को ठीक नहीं कर पाए. तब तक सुंदरलाल के िसर पर एक लाख रुपए का कर्ज चढ़ चुका था. आखिरकार वे करण को लेकर एक बाबा की शरण में गए.

करण की बीमारी अब कुछ ठीक है, लेकिन सुंदर अब इस दुनिया में नहीं हैं.

सुंदरलाल के भाई कल्लू उनके अंतिम दिनों को याद करते हुए बताते हैं, ‘वे हमेशा रोते रहते थे. बोलते थे कि पैसा बहुत खर्च हो गया. उन्हें टेंशन बहुत रहती थी.

सुंदरलाल के लिए ये दिन बहुत यातनामय रहे थे. सूखे के कारण अपने हिस्से की डेढ़ बीघा जमीन में वे कुछ बो नहीं पा रहे थे. उनकी आय का एकमात्र जरिया दिहाड़ी मजदूरी था, जिसका कोई भरोसा नहीं था. गांव के दूसरे 75 प्रतिशत लोगों की ही तरह सुंदरलाल अब कर्ज के उसी जाल में फंस चुके थे जो कभी खत्म होने का नाम नहीं लेता.

अपने घर के सूनेपन की आदत डालने की कोशिश करते हुए रामकली बुदबुदाती हैं, ‘सूखे और कर्ज ने उनकी जान ले ली. अगर बारिश हो रही होती तो शायद वे इतने निराश नहीं हुए होते. तब काम मिलने की उम्मीद थी. हमने पहले भी कर्ज चुकाए थे.

कर्ज एक तरह से गांव के लोगों के लिए जीने की शर्त बन गए हैं. लेकिन गांव के अधिकतर लोगों के पास इतनी जमीन नहीं है कि बैंक से आसानी से कर्ज मिल सके. इसके अलावा, अगर जमीन हो भी तो बैंकों की दौड़ लगाना और अधिकारियों को कमीशन देना सबके बस की बात नहीं. फिर बैंकों के साथ एक और समस्या है. उनसे आपको जब जरूरत हो तब और बार-बार कर्ज नहीं मिल सकता. एेसे में लोगों की आखिरी आशा गांव के महाजनों पर ही टिकी रहती है.

रामविशाल राजपूत रहते पवा में हैं, लेकिन वे पास ही के चितैयां गांव में स्थित प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक हैं. वे गांव के उन लोगों में से एक हैं जिनसे सुंदरलाल ने कर्ज लिया था. किसी बाहरी व्यक्ति के सामने लोगों को कर्ज देने का राज खुल जाने के कारण वे थोड़ी झिझक में हैं और हमारे सवालों के जवाब देने के दौरान संभलने की कोशिश करते हैं, ‘मैंने सुंदर को तीन हजार रुपए दिए थे, क्योंकि उसका एलआईसी में बीमा था और उसकी किश्त जमा करने लायक उसके पास पैसे नहीं थे.

रामविशाल उस समय एक मीटिंग में थे जब उन्होंने सुंदरलाल की मौत की खबर सुनी. उन्हें दुख तो हुआ था, लेकिन शायद वे अकेले आदमी थे, जिन्हें इसकी आशंका पहले से थी. मौत से 6 दिन पहले हुई अपनी आखिरी भेंट में सुंदरलाल ने उनसे बैंक में जमा अपने रुपए के बारे में पूछा था. वे बताते हैं, ‘सुंदर के बैंक खाते में 20 हजार रुपए थे. उसने पूछा था कि अगर उसने आत्महत्या कर ली तो उसके खाते में जमा रकम उसके परिवार को मिल पाएगी कि नहीं. वह बहुत परेशान था. उसका दिमाग खराब हो गया था. मैंने समझाया कि एेसा नहीं करना, नहीं तो पैसे डूब जाएंगे.

रामविशाल एेसा जताते हैं कि उन्हें चिंता अपने पैसों के डूब जाने की नहीं, लोगों के बरबाद होने की अधिक है. वे जबर्दस्ती की मुस्कान के साथ कहते हैं, ‘इन लोगों के करम ही ऐसे हैं कि ये हमेशा कर्ज में बने रहेंगे. ये जुआ खेलकर अपने पैसे बरबाद कर देते हैं और फिर शादी-ब्याह के लिए कर्ज में फंसते हैं.

लेकिन जो सवाल हैं वे रामविशाल की चिंता से कहीं अधिक जटिल हैं. ये वे सवाल हैं जो बुंदेलखंड के सात जिलों के लाखों किसानों की जिंदगी से जुड़े हैं. यह उनकी खुशहाली और उनके सपनों से जुड़े सवाल हैं. इन सवालों का संबंध उन योजनाओं के औचित्य से है जो इन जिलों में सूखे से निपटने के नाम पर चलाई जा रही हैं. इन सवालों का संबंध उन पागलपन भरी नीतियों से भी है जो सूखे से हो रही भारी तबाही के बावजूद इसकी वजहों को और बढ़ावा दे रही हैं. इसका संबंध समाज की उस उत्पीड़क व्यवस्था से भी है जो पानी की कमी को कुछ समुदायों के लिए अधिक तकलीफदेह बना रही है. सबसे बढ़कर ये सवाल सरकार की कार्यप्रणाली और जनता की भलाई को लेकर उसकी मंशा से जुड़े हुए हैं. आने वाले पन्नों में हम इन सवालों को समझने और सुलझाने की कोशिश करेंगे. हम यह भी देखने की कोशिश करेंगे कि जिस व्यवस्था पर अपनी योजनाओं के जरिए बुंदेलखंड को मिले पैकेज से लोगों को राहत दिलाने का जिम्मा है वह उसके साथ कैसे पेश आती है जो उसका लाभ उठाना चाहता है.

5000 किसानों ने पांच साल में बुंदेलखंड में आत्महत्या की है. अधिकतर मामलों की वजह किसानों द्वारा कर्ज न चुका पाना है. बांदा में 80 से अधिक और महोबा में 62 आत्महत्याओं के मामले

हमारी कहानी में जो शब्द बार-बार आएगा वह है बुंदेलखंड. लेकिन यह महज एक शब्द नहीं है. यह मध्य भारत के दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैला एक विशाल पठारी इलाका है, जो लगभग श्रीलंका के बराबर है. यहां करीब 70 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में 2 करोड़ 10 लाख की आबादी रहती है. उत्तर प्रदेश में इसके सात और मध्य प्रदेश में छह जिले आते हैं. जो जिले उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में पड़ते हैं वे हैं- झांसी, महोबा, हमीरपुर, बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर और ललितपुर. बुंदेलखंड का जितना हिस्सा उत्तर प्रदेश में है उसमें दिल्ली जैसे 20 शहर समा सकते हैं. 

बुंदेल, चंदेल, छत्रसाल और झांसी की रानी लक्ष्मी बाई जैसे शासकों के कारण मशहूर रहा यह इलाका अब भी आल्हा-ऊदल की यादों में जीता है. महोबा के चंदेल राजा परमाल के दरबार के इन दो योद्धाओं को महोबा ही नहीं, बुंदेलखंड के किसी भी शहर और कस्बे में निकल जाइए, आप एक मिनट के लिए भी भूल नहीं सकते. चौराहों और इमारतों पर उनकी वीरता के किस्से बताती प्रतिमाएं और प्रतीक चिह्न मिलेंगे. बाहर से आए किसी आदमी से बात करते हुए यहां के लोग आल्हा-ऊदल का जिक्र जरूर करते हैं.

अब इसमें एक चीज और जुड़ गई है – सूखा.

पिछले एक दशक से अधिक समय से बुंदेलखंड लगातार सूखा झेल रहा है. 2008 को छोड़कर जब इस इलाके में पर्याप्त बारिश हो गई थी, इस दौरान यहां औसत से बहुत कम बारिश हुई है. महोबा जैसे जिले  में तो 2008 में औसत से 66  प्रतिशत कम बारिश हुई थी. सूखे की गंभीरता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एक सर्वेक्षण के अनुसार बुंदेलखंड के अधिकतर किसान पिछले साल खरीफ फसल की अपनी लागत भी हासिल नहीं कर पाए. एेसे में, जब इलाके की 80 फीसदी आबादी खेती और पशुपालन से होने वाली आय पर निर्भर है, खेती चौपट होने के कारण आपदा जैसी स्थितियां तो बननी ही हैं.

सूखा बुंदेलखंड के लोगों के लिए नई बात नहीं है, नई बात जो है वह है इससे होने वाली तबाही. सूखे ने उत्तर प्रदेश के हिस्से के बुंदेलखंड की आधी से ज्यादा खेती को तबाह कर दिया है. गहराते सूखे को देखते हुए केंद्र सरकार ने 2008 में नेशनल रेनफेड एरियाज अथॉरिटी के जेएस सामरा के नेतृत्व में एक केंद्रीय टीम गठित की थी. 2008 में आई उसकी रिपोर्ट के अनुसार 19वीं और 20वीं शताब्दी के 200 वर्षों में इस इलाके में केवल 12 वर्ष सूखा पड़ा था. यानी इस अवधि में सूखा पड़ने का औसत हर 16 वर्ष में एक बार का था. लेकिन 1968 से लेकर पिछली शताब्दी के आखिरी दशक में औसतन पांच साल में एक बार सूखा पड़ने लगा. और अब तो पिछले दस साल से बुंदेलखंड पानी की बूंद-बूंद को तरस रहा है.

सूखे के लंबे इतिहास को देखते हुए यहां कुछ दशक पहले तक तालाबों, कुओं और हौजों का जाल बिछा हुआ था. पानी के ये पारंपरिक स्रोत दो तरह से काम करते थे. एक तो इनसे साल भर पानी मिलता था, दूसरे बारिश का पानी इनके जरिए भूमिगत जल को बढ़ाता था. लेकिन पिछली आधी सदी से भी अधिक समय से इन ढांचों पर ध्यान देना बंद कर दिया गया, जिसने इस पूरे तंत्र को ध्वस्त कर दिया. स्थानीय जरूरतों पर ध्यान नहीं दिया गया और आंख मूंदकर नई तकनीक को अपनाया गया.

ललितपुर जिले में इस विडंबना का सबसे बड़ा उदाहरण देखने को मिलता है. यहां छोटे-बड़े कुल सात बांध और पांच निर्माणाधीन बांधों के चलते यह जिला एशिया का वह इलाका है जहां बांधों की सघनता सबसे ज्यादा है. बावजूद इसके यहां कृषियोग्य भूमि का एक छोटा-सा हिस्सा ही सिंचित हो पाता है. राजस्व विभाग के आंकड़े बताते हैं कि जिले में पिछले साल कुल 3.4 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में से सिर्फ 27 हजार हेक्टेयर भूमि को ही इन बांधों से पानी मिल पाया था. 

महोबा के इतिहास पर किताब लिखने वाले बुजुर्ग समाजसेवी वासुदेव चौरसिया पुराने दिनों को याद करते हैं, ‘पहले पानी की कमी होने पर लोग कुआं खोदते थे. यह पानी के उचित इस्तेमाल और फिर से रिचार्ज करने के नियम पर काम करता था. लेकिन अब झट से एक हैंडपंप लगा दिया जाता है.

अकेले महोबा शहर में ही बासुदेव चौरसिया की बात को सही ठहराने के अनेक उदाहरण मिल जाएंगे. एेसे अनेक कुएं हैं जो पहले पानी के अच्छे स्रोत हुआ करते थे, लेकिन अब उनके पास हैंड पंप लगा दिए जाने के कारण वे सूख गए हैं. महोबा शहर को मदन सागर जैसे तालाबों के अलावा मदनौ और सदनौ दो कुओं से पानी मिला करता था. मदनौ कुआं अब ढक दिया गया है और सदनौ कुएं पर अतिक्रमण करके घर बना लिया गया है.

मदन सागर महोबा शहर के एक छोर पर स्थित है. यह शहर के किनारों पर बने और आपस में नहरों के जरिए जुड़े चार तालाबों में से सबसे बड़ा है, जिसपर यह शहर पीने के पानी के लिए पिछले 900 साल से निर्भर था. यह तालाब अपने इतिहास में कभी नहीं सूखा, लेकिन 2007 में वह भी सूख गया. पानी की आपूर्ति बनाए रखने के लिए तालाब में एक नहर के जरिए मध्य प्रदेश के उर्मिल बांध से पानी लाया जाता है, पर इस साल उर्मिल बांध भी सूख गया है.

यही हाल कीरत सागर तथा दूसरे सागरों का भी है. उनको आपस में जोड़ने वाली नहरें कूड़े से भरी हुई हैं, इसलिए बाहर के पानी के तालाबों में आने की संभावना कम ही है. केवल उनके पेंदे में थोड़ा-बहुत पानी बचा रह गया है, जिससे शहर के लोगों को पानी की आपूर्ति हो रही है. अगर बारिश नहीं हुई तो कुछ दिनों में यह पानी भी खत्म हो जाएगा. तब शहर के लोगों को सिर्फ टैंकरों का आसरा रह जाएगा.

सरकारी टैंकरों की संख्या पर्याप्त नहीं होती और लोग प्रायः निजी टैंकरों पर निर्भर रहते हैं, जो महंगे पड़ते हैं. इनपरप्रतिमाह करीब 1,000-1,200 रुपए खर्च करने पड़ते हैं. यह रकम आधिकारिक गरीबी रेखा के चार गुणा से थोड़ा ही कम है. जाहिर है, बहुसंख्यक आबादी के लिए टैंकर का पानी भी दुर्लभ है.

जब शहरों का यह हाल है तो गांवों में तो स्थिति और भी भयावह है. जालौन स्थित परमार्थ समाज सेवी संस्थान द्वारा लगभग 2 साल पहले जालौनबांदा, महोबा, हमीरपुर, ललितपुर, झांसी और चित्रकूट के 119 गांवों में किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि इनमें से सिर्फ 7 प्रतिशत (आठ गांवों) में साल भर पीने का पानी रहता है, जबकि 74 गांवों में सिर्फ एक महीने पीने का पानी मिलता है. पानी के लिए महिलाओं को घंटों पैदल चल कर जाना होता है. इसके अलावा गांवों के सामंती ढांचे के कारण सूखे से दलितों और दूसरी नीची जातियों के लिए संकट और बढ़ गया है.

58% कर्ज निजी स्रोतों से लिए जाते हैं जिनमें सूदखोर भी शामिल हैं. किसानों पर 1 अरब 25 करोड़ 47 लाख रुपए का सरकारी कर्ज भी है. सहकारी समितियों ने भी एक अरब रु से अधिक का कर्ज दिया

एेसा नहीं है कि सरकार ने पेयजल पर खर्च नहीं किया है. 2008 में आई वाटरएड इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार ने बुंदेलखंड में लोगों को पीने का पानी मुहैया कराने और मिट्टी के संरक्षण के लिए 2002 से 2007 के बीच 29,2.50 करोड़ रुपए खर्च किए हैं. लेकिन ठीक इसी अवधि में पीने के पानी का संकट भी बढ़ा है. हम इसे उक्त रिपोर्ट में ही देख सकते हैं. उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड  के 7 जिलों के 60 गांवों में चर्च्स ऑक्जिलियरी फॉर सोशल एक्शन (कासा) तथा जनकेंद्रित विकास मंच द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक आधे से अधिक जल स्रोत सूख गए हैं या बेकार पड़े हैं. इसके आंकड़ों के अनुसार 486 कुओं, 56 तालाबों में से क्रमशः 266 कुएं, 29 तालाब बेकार पड़े हुए हैं. बारिश के न होने के अलावा एक बड़ा कारण इनकी मरम्मत का न होना है.

अगर हम इस आंकड़े में कुछ और तथ्यों को जोड़ दें तो यह हमें पानी के अभाव से जुड़ी दूसरी सबसे बड़ी समस्या की ओर ले जाएगा. उक्त सर्वेक्षण हमें यह भी बताता है कि इन इलाकों की 6 नदियों और 26 नालों में से 4 नदियां और 25 नाले सूखे और बेकार पड़े हैं या उनपर अतिक्रमण हो चुका है. इस बीच सरकारी खर्च कई गुणा बढ़ा है, पर हालात और खराब हुए हैं. इसलिए आज बुंदेलखंड में पेयजल के बाद दूसरी सबसे बड़ी समस्या सिंचाई के पानी की है.

ललितपुर का उदाहरण हमारे सामने है ही और यदि महोबा के अर्जुन सागर बांध की हालत भी देख ली जाए तो यह साफ हो जाता है कि सरकार पैसा चाहे कितना भी खर्च करे लेकिन किसानों की वास्तविक समस्या हल हो ही यह कतई जरूरी नहीं है. यह बांध 1950 के दशक में बना था और इससे कुल 26,551 हेक्टेयर इलाके की सिंचाई हो सकती है. अप्रैल से पहले इसके फाटकों में ग्रीजिंग हो जानी चाहिए थी ताकि जब बारिश हो और पानी आए तो कोई दिक्कत न हो. लेकिन देखने से लगता है कि इसके फाटकों को वर्षों से किसी ने छुआ तक नहीं है. फाटकों और दूसरे उपकरणों में जगह-जगह जंग लगी हुई है और उन्हें देखकर ही समझ आ जाता है कि एक लंबे समय से इसकी ओर कोई सरकारी कर्मचारी फटका भी नहीं है. वैसे भी, पानी की कमी के कारण पिछले साल बांध से एक एकड़ खेत की भी सिंचाई नहीं हो सकी थी. बांध इस हद तक खाली रहता है कि इसके भीतर लोगों ने खेत बना लिए हैं. कमोबेश यही हाल दूसरी योजनाओं का भी है.

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हम इतना कैसे हंस पाते तेरे बिन लादेन?

फिल्म तेरे बिन लादेन

निर्देशक  अभिषेक शर्मा

कलाकार अली जाफर, प्रद्युम्न सिंह, सुगंधा गर्ग, पीयूष मिश्रा, निखिल रत्नपारखी, राहुल सिंह, बैरी जॉन

अनीस बज्मी, डेविड धवन, साजिद खान, रोहित शेट्टी और हेराफेरी के बाद वाले प्रियदर्शन के लिए ‘तेरे बिन लादेन’ का एक स्पेशल शो आयोजित किया जाना चाहिए ताकि अगली बार जव वे अपनी यातनामयी फिल्मों को ‘हंसी का तूफान’ (अंग्रेजी में लाफ रायट) कहकर प्रचारित कर रहे हों, तब उनकी आत्मा का एक हिस्सा उन्हें कोसे या कम से कम कचोटे ही.

तो साहेबान, ये अभिषेक शर्मा हैं जिन्हें गले से लगाने के लिए आपको अपनी सकुचाती हुई बांहें पूरी खोल लेनी चाहिए और उनसे इस बात पर रूठ जाना चाहिए कि जब हम ‘गोलमाल 2’ देख रहे थे और ‘गोलमाल 3’ बनने की खबरों से आतंकित हो रहे थे या ‘फिर हेराफेरी’, ‘पार्टनर’, ‘वेलकम’, ‘कम्बख्त इश्क’ और ‘हाउसफुल’ देखने के बाद बॉलीवुड की कॉमेडी की दुर्दशा पर आंसू बहाकर अपना फर्ज अदा कर रहे थे, तब वे क्यों नहीं आए? लेकिन रूठने के तुरंत बाद आपको चाहिए कि मुस्कुराएं और फिर फिल्म का कोई भी दृश्य याद करके ठहाका मारकर हंसें.

यह हमारे उपमहाद्वीप की अमेरिकापरस्ती और लादेन के हव्वे पर सबसे करारा व्यंग्य है. यह लादेन की सारी संकल्पना (आपको आपत्ति हो तो ‘संकल्पना’ को ‘सच’ पढ़ें) का मजाक उड़ाकर उसका डर खत्म करती है. यह अपने गानों में बार-बार नायक के अमेरिका जाने के सपने की तह में जाकर उसका मजाक उड़ाती है. इसके मुख्य पात्र अरबी में ‘….हबीबी जॉर्ज बुश’ गाते हुए नाचते हैं. यह बिना हथियार के अमेरिका के अहंकार को मारने जैसा है और आपको इसका अर्थ नहीं पता लेकिन आप जानते हैं कि ‘तले हुए पकौड़ों के शौकीन’ बुश अगर कभी इसे किसी के साथ देखेंगे तो उससे नजरें नहीं मिला पाएंगे.

यह पाकिस्तान की कहानी है और सबसे सुखद आश्चर्य में डालने वाली बात यह है कि हिन्दी फिल्मों की मुख्यधारा के उलट यह उसकी बात अपने देश की तरह करती है. इसके मूल में पाकिस्तान के लिए इतना अपनापन है कि यह वहां की व्यवस्था का मजाक उड़ाते समय इतनी बेपरवाह रहती है (और बदतमीज नहीं होती) जैसे अपने देश का मजाक उड़ा रही हो. पाकिस्तान में स्टेज पर राजनैतिक और सामाजिक व्यंग्यों की (जो कभी कभी फूहड़ भी हो जाते हैं) एक पूरी संस्कृति है और इस फिल्म में भी उनकी शालीन सोहबत दिखती है.

फिल्म के नकली लादेन को अपने मुर्गों से बहुत प्यार है और अगर आप फिल्म की अन्दर वाली परत में झांकेंगे तो पाएंगे कि ये वही निरीह पाकिस्तानी और अफगानी हैं जिन्हें मारने के लिए अमेरिका कई बिलियन डॉलर झोंकने को तैयार था/है. अमेरिकी फौज मुर्गों को मार भी देती है. लेकिन आखिर में आपको उस पर तरस ही आता है. कोई अच्छा राजनैतिक व्यंग्य वही काम करता है जो दस साल का तानाशाही शासन या दस लाख की फौज नहीं कर सकती. इसी तरह ‘तेरे बिन लादेन’ भी अमेरिका और लादेन, दोनों का मजाक उड़ाती है और इस तरह उन्हें फिल्म की अपनी दुनिया में ‘बेचारा’ कर देती है.

अभिषेक शर्मा, दिबाकर और कुछ-कुछ ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ तक वाले हीरानी की कतार में आ खड़े हुए हैं और खूब हंसने के इन घंटों में भी यह हंसी की बात नहीं है

गौरव सोलंकी