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' हमारी 108 ने दुनिया के सारे रिकार्ड तोड़े हैं '

नित्यानंद स्वामी, भगत सिंह कोश्यारी, नारायण दत्त तिवारी और भुवन चंद्र खंडूड़ी के बाद डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ राज्य के पांचवें मुख्यमंत्री हैं. पिछले 10 सालों में ‘राज्य की दशा और दिशा’ पर उन्होंने मनोज रावत से बात की  

अलग राज्य बनने के बाद दस वर्षों का क्या अनुभव है?

मैं सोचता हूं कि इन वर्षों को राज्य के सुखद और आशाओं से भरे समय के रूप में देखा जा सकता है.

राज्य की माली हालत कैसी है? 

जिस दिन हमारा राज्य बना उस दिन राज्य की विकास दर 2.9 प्रतिशत थी; पिछले वर्ष हमारे राज्य की विकास दर 9.31 प्रतिशत रही. इस साल योजना आयोग ने उत्तराखंड को जीएसडीपी में देश का नंबर एक प्रदेश घोषित किया है. राज्य निर्माण के समय हमारे राज्य के लोगों की प्रतिवर्ष औसत आय 14300 रुपए थी. आज यह 42000 रुपए प्रतिवर्ष है. देश के इतिहास में केवल और केवल उत्तराखंड ही ऐसा राज्य है जिसने इतनी बड़ी छलांग लगाई है. कर राजस्व पहले 165 करोड़ रुपए आता था अब तीन हजार करोड़ रुपए आता है.

नौकरशाही तक पहुंच तो बहुत सुलभ हो गई है, लेकिन क्या प्रभावी भी हुई है?

हाल की भीषण आपदा ने सिद्ध किया कि यहां प्रभावी नौकरशाही है. हमने 35 हजार लोगों की जान बचाई.

प्रशासनिक सुधारों पर कुछ हुआ ? पंत कमेटी की रिपोर्ट का क्या हुआ?

मैं सोचता हूं कि पंत कमेटी तो दूसरे उद्देश्य के लिए थी लेकिन प्रशासनिक सुधार काफी हुआ है. गुंजाइश हमेशा बनी रहती है. नवोदित राज्य में हमें इसे और सशक्त बनाना है.

विभागों के पुनर्गठन का क्या हुआ? पहले एक ही काम को तीन विभाग करते थे, अभी भी वही हो रहा है.

हमने काफी कुछ ठीक किया है. हम यदि पुनर्गठन नहीं करते तो उत्तर प्रदेश में जितने निदेशालय थे, उतने यहां भी होते. जैसे-जैसे आवश्यकता होगी, पुनर्गठन करेंगे.

भूमि सुधार का क्या हुआ? अभी पहाड़ी क्षेत्र वर्ष 1893 के बेनाप कानून की मार झेल रहा है. 10 साल में भूमियों को वन भूमि के रूप में दर्ज करने वाला पीएल पुनिया का शासनादेश भी नहीं सुधारा गया है.

नहीं, वह एक्ट मेरे संज्ञान में है. हमने निर्णय लिया है कि पीएल पुनिया द्वारा 1997 में जारी शासनादेश पर भारत सरकार से बात करनी पड़ेगी. हमने पहले भी भारत सरकार को इस विषय में चिट्ठी लिखी थी.

कृषि क्षेत्र सिकुड़ रहा है. कृषि विकास की दर ऋणात्मक हो रही है. क्यों ?

कई क्षेत्रों में हम बहुत आगे बढे़ हैं. जब मैं पर्वतीय विकास मंत्री था तो एक-आध करोड़ का फूल उगता था. आज डेढ़ सौ करोड़ की फूलों की खेती होती है. हमारे मटर और टमाटर के सैकड़ों ट्रक दिल्ली तक जा रहे हैं. जहां कृषि उत्पादन नहीं है वहां उद्योग के क्षेत्र में आगे बढ़े हैं.

सेवा क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए राज्य में क्या प्रयास हुए?

हम आईटी के क्षेत्र में तेजी से काम कर रहे हैं. बीच में मंदी के कारण थोड़ी कमी आई थी. आशा है कि हम इन सेक्टरांे में 50 हजार लोगों को रोजगार देंगे.

आप हमेशा पहाड़ के पानी और जवानी को रोकने की बात करते हैं, लेकिन पिछले पांच साल में पलायन और बढ़ा है.

असली आंकड़े देखें तो पिछले पांच साल में हमने पलायन को रोका है. हमारे नौजवान जो बाहर जाते थे, अब वे यहां मटर, टमाटर, सब्जी बो रहे हैं. हमने हजारों लोगों को रोजगार दिया. यदि ये राज्य नहीं बनता तो इन सब लोगों को बाहर ही जाना था. यदि औद्योगिक क्षेत्र नहीं बढ़ता तो जितने हजारों-हजार लोग यहां नौकरी में लगे हैं वे सब बाहर जाते.

पंचायत एक्ट अभी तक नहीं बन पाया है.

नहीं, राज्य का पंचायत एक्ट तो बना है .

जिला नियोजन समिति का गठन अभी तक नहीं हुआ है.

नहीं, डीपीसी का तो गठन हो चुका है.

नोटिफिकेशन तो नहीं जारी हुआ है.

कुछ सदस्य नामित होने थे उसमें कमी रही होगी, मुझे आशा है कि अधिसूचना जल्दी ही जारी हो जाएगी.

आप पत्रकार भी हैं. राज्य में प्रेस मान्यता समिति ही नहीं है.

ठीक बात है. प्रेस मान्यता समिति को जल्दी ही बनाया जाएगा.

हम ‘हिमालयी नीति’ की तो बात करते हैं, लेकिन राज्य में महत्वपूर्ण विभागों की नीतियां अभी तक नहीं बनी हैं.

छोटी नीतियां तो बनती रहती हैं. व्यापक हिमालय की नीति बनेगी तो वह गांव तक आएगी. जब हिमालयी नीति बनेेगी तो अंतिम गांव के व्यक्ति तक की बनेगी.

व्यक्तिगत उपलब्धियां.

हमने स्वास्थ्य के क्षेत्र में जमकर काम किया है. हमारी 108 (आपात एंबुलेंस सेवा) ने सारे रिकॉर्ड तोड़े हैं.

कुछ ऐसा जो होना था और नहीं हो पाया.

बिलकुल नहीं. सब चीजें समय पर होती हैं. हमारे मन में कोई कसक नहीं है. हमने विजन 2020 बनाया है. हम देश को उत्तराखंड के रूप में एक ऐसा गुलदस्ता देंगे कि उसको इस पर गौरव होगा.

क्या सोचा क्या पाया

 नौ नवंबर को उत्तराखंड राज्य दस साल का हो गया. दस साल की उम्र किसी राज्य का भविष्य तय करने के लिए काफी नहीं होती, पर ‘पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं’ वाली कहावत के हिसाब से देखा जाए तो उस भविष्य का अंदाजा लगाने के लिए इतना समय काफी होता है.

ये दस साल कैसे रहे यह जानने से पहले यह जानना जरूरी होगा कि अलग राज्य की जरुरत पड़ी क्यों थी. दरअसल, तब उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहे यहां के लोगों के मन में एक कसक थी कि काश उनकी भी एक विधानसभा होती जो यहां की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों आाैर जरुरतों के अनुसार कानून और विधान बनाती और उनके पारदर्शिता से क्रियान्वयन पर नजर रखती. लोगों को तब उत्तर प्रदेश में यह भी शिकायत थी कि योजनाओं का क्रियान्वयन करने वाले कर्मचारी भी यहां के नहीं हैं, इसलिए उनका यहां से लगाव ही नहीं है. उन सबसे ऊपर योजनाओं के लिए तब दृष्टि (विजन) ही नहीं थी. जिस राज में ये सब तत्व गायब थे तो उससे ‘विकास कार्यों के क्रियान्वयन और लोकहित के लिए समर्पण’ की आशा ही नहीं की जा सकती थी. आंदोलन का तात्कालिक कारण बना पिछड़े वर्गों को 27 प्रतिशत आरक्षण जो उस समय पहाड़ी जिलों में 4 प्रतिशत भी नहीं थे. इन सभी कारणों से पहाड़ी जिलों के लोगों ने अलग राज्य की जरूरत महसूस की. जोरदार पृथक राज्य आंदोलन और बलिदानों के बाद उत्तराखंड राज्य मिला.

अब लोगों के पास अपना विधानमंडल था. नेता यहीं के थे और प्रशासकों पर उनकी अच्छी पकड़ होने की आशा थी. लोगों को लगा कि उनकी विधानसभा राज्य की जरूरतों के अनुसार कानून बनाएगी. मंत्रिमंडल द्वारा महत्वपूर्ण नीतियां बनेंगी, उनके हिसाब से शासन नियम बनाएगा और आखिर में संबंधित विभाग विधायिका द्वारा जनभावनाओं केअनुरूप बनी इन नीतियों, नियमों का क्रियान्वयन करेंेगे.

पर सपने आंखों में ही रह गए. इन 10 साल में राज्य के महत्वपूर्ण विभागों की नीतियां ही नहीं बन पाई हैं. इस दौरान न तो शिक्षा नीति बनी, न स्वास्थ्य नीति बनी और न ही राज्य की जल नीति है. राज्य का पंचायत ऐक्ट अभी तक नहीं आया तो डीपीसी के गठन न होने से राज्य के तीन जिलों को हर साल केंद्र से मिलने वाले 50 करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है. यहां राज चलाने वालों को विकास करने के लिए अपना नियोजन तंत्र विकसित करने की पूरी आजादी थी, पर इसे विकसित करने की समझ और इच्छाशक्ति होती तो कुछ होता.

दरअसल, कहने को सब कुछ अपना होने के बावजूद दृष्टि (विजन) अब भी उधार ली हुई थी. इन 10 सालों में हुए कामों और निर्णयों को देखें तो यही समझ में आता है कि अंग्रेजों से लेकर संयुक्त प्रांत व उत्तर प्रदेश वाला दृष्टिकोण अभी भी नहीं बदला है. वांछित दृष्टि न होने से हम इस पर्वतीय राज्य की आवश्यकताओं और भावनाओं के अनुरूप न तो विधान बना सके और न ही उनका क्रियान्वयन तंत्र खड़ा कर सके. इसलिए यह कहा जा सकता है कि राज्य बनने का मूलभूत मकसद पूरा नहीं हो सका.

हर आंदोलन और भाषण में उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन की बात होती है. बात भी सच थी. जब तक राज्य में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के अनुरूप हम अपने मानव संसाधन का भला नहीं कर पाएंगे तब तक राज्य में आर्थिक विकास व खुशहाली का आना असंभव है. पानी उत्तराखंड का सबसे प्रमुख संसाधन है, परंतु राज्य में सबसे अधिक जल धारण करने वाले सीमांत जिले चमोली में कुल कृषि भूमि की छह प्रतिशत भूमि ही सिंचित भूमि है. कुमाऊं के पहाड़ी जिले चंपावत की भी केवल चार प्रतिशत भूमि सिंचित है. आज भी पूरे राज्य में सिंचित कृषि भूमि का औसत केवल 14 प्रतिशत है. राज्य में उपलब्ध जल संसाधनों का प्रयोग करके राज्य को ‘ऊर्जा प्रदेश’ बनाने के सपने भी शुरुआती सालों से ही खूब दिखाए गए. राज्य की सारी नदियां निजी कंपनियों को दी जाती रहीं. सरकारों ने कंपनियों के साथ ‘लोक सहभागिता’ को जोड़ने की कोशिश ही नहीं की. इसलिए आज हर नदी पर आंदोलन हो रहे हैं. परियोजनाओं के कारण घर-घर विवाद खड़े हो उठे हैं. निजी कंपनियां कर्ज लेकर जल विद्युत परियोजनाएं बना रही हैं और सरकारी सब्सिडियों का भरपूर सुख ले रही हैं जबकि राज्य का आम आदमी उनका मुंह ताक रहा है. कहने को तो ऊर्जा नीति के अनुसार पांच मेगावाट तक की परियोजनाओं को स्थानीय निवासी बना सकते हैं, पर सरकार ने न तो इनके लिए स्थानीय लोगों को मार्गदर्शन दिया, न ही प्रोत्साहन. उचित प्रोत्साहन ही तो अपने राज्य में यहां के लोगों को चाहिए था. किसी भी सरकार ने स्थानीय समुदाय को इन परियोजनाओं से मिलने वाले लाभांश में भागीदार नहीं बनाया. किसी ने भी स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी की बात नहीं की. यह अधिकार तो राज्य के लोगों को ही होना था कि वे तय कर सकें कि उनके पानी से घराट (पनचक्की) चलें या बिजली बने. पानी कोे राज्य का बड़ा संसाधन तब माना जाता जब उसका उपयोग स्थानीय लोग लाभकारी कामों के लिए कर पाते.

यही हाल जंगलों के भी हैं. वन निगम या अन्य माध्यमों से जंगल तो कट ही रहे हैं पर इन लकड़ियों को बेचने वाले वन निगम के ये डिपो पहाड़ के छोटे कस्बों में नहीं हैं. पूरे पहाड़ में आरा मशीन पर प्रतिबंध लगा है. पहाड़ से कटकर आई महंगी लकड़ी रायवाला, हल्द्वानी और काठगोदाम में आकर चिरने के बाद बरेली तथा सहारनपुर में महंगा फर्नीचर बनकर देश भर में जाती है, पर पहाड़ों में निम्न कोटि की यूकेलिप्टस की लकड़ी के पॉलिश करे फर्नीचर पहुंच रहे हैं. दुनिया को सुख देने वाले जंगल पहाड़ के लिए वैधानिक रूप से परेशानी का कारण हो गए हैं.

जल, जंगल के बाद जमीन के लिए भी राज्य बनने के बाद कुछ नहीं हुआ. पहाड़ अभी भी पुराने भू-कानूनों के अभिशापों को झेल रहा है. एक राज्य में दो भू-कानून हैं. इन पेचीदे कानूनों के कारण राज्य में पर्याप्त भूमि होने के बाद भी आपदा पीड़ितों को आवंटित करने तक के लिए भूमि उपलब्ध नहीं है. अनिवार्य चकबंदी अभी तक नहीं हो पाई है. तराई में थारू, बोक्सा जनजाति की जमीनें कानूनों के बावजूद बड़े किसानों और माफियाओं ने हथिया लिए हैं. हरिद्वार से लेकर रामनगर तक पूरी तराई में वन भूमियों में बसे ‘खत्तों’ को आज तक राजस्व गांवों में तब्दील नहीं किया जा सका है.

मुख्यमंत्री कहते हैं कि राज्य शिक्षा का हब बन गया है, पर राज्य के दूरस्थ पहाड़ी जिलों के गांवों के स्कूल अध्यापकविहीन हैं. वहां के कस्बों के बच्चे सरकारी स्कूलों में जाते ही नहीं हैं. उच्च शिक्षा का हाल तो और बुरा है. राज्य में कुकुरमुत्ते की भांति खुले व्यावसायिक शिक्षण संस्थान अभिभावकों को लूटने के अलावा कुछ भी काम नहीं कर रहे. लाखों रु चुकाकर इन संस्थानों से निकले इंजीनियर और व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त युवक-युवतियां अच्छी नौकरी और वेतन पाने में असफल साबित होते हैं. शिक्षा के खराब स्तर के कारण राज्य के बेरोजगार प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल नहीं होते हैं. उत्तराखंड राज्य लोक सेवा आयोग के परिणामों की सूची में राज्य के निवासी मुश्किल से मिलते हैं. कभी इसी बेरोजगारी और बाहरी लोेगों द्वारा राज्य में उपलब्ध रोजगारों को हड़पने की आशंका से ही राज्य आंदोलन शुरू हुआ था.

इस तरह देखें तो राज्य के दस साल की यात्रा को कतई आशाजनक नहीं कहा जा सकता. इन दस साल में सरकारों और उसके तंत्र को चलाने वालों पर आम आदमी का भरोसा कम होता गया है. राज्य में एक ‘विशिष्ट शासक वर्ग’ पैदा हो गया है जो अब आम जन की इन नाराजगियों के लिए संवेदनहीनता की सीमा को पार कर ‘जनता की कौन परवाह करता है’ या ‘जनता तो कहती रहती है’ की बेशर्मी तक पहुंच चुका है. यह बेशर्मी जारी रही तो राज्य को ले डूबेगी.

' शायद भ्रष्टाचार के मामले में हम नंबर एक होंगे '

ये 10 साल उत्तराखंड के लिए कैसे रहे?

शहीदों के सपने थे कि अपनी सरकार होगी, अपना राज होगा, सरकार तक सीधी पहुंच होगी. राज्य बनने से पहले सभी ने समग्र विकास की भी कल्पना की थी. लोगों को लगा था कि सीमांत क्षेत्र के उन लोगों तक भी बुनियादी सुविधाएं पहुंचेंगी जो उत्तर प्रदेश के जमाने में उपेक्षित रहे. मगर ये सपने पूरे होते नहीं दिख रहे हैं.

क्या इसके लिए इस राज्य के राजनेता दोषी नहीं हैं?

10 साल का विश्लेषण करें तो साफ है कि वर्ष 2000 से लेकर 2007 तक राज्य सही दिशा में जा रहा था. राज्य बीस सूत्री कार्यक्रम में लगातार पहले स्थान पर रहा. तब आर्थिक और ढांचागत विकास में हम पहले पायदान पर आ गए थे, पर उसके बाद विकास की दिशा में विचलन आ गए. कई दीर्घकालीन योजनाओं के नतीजे कभी-कभी सालों बाद भी मिलते हैं, इसलिए विकास की समग्र और सतत सोच होनी चाहिए जो अब नहीं दिख रही है. इसलिए हम अन्य राज्यों की तुलना में पिछड़ते जा रहे हैं.

विकास तो छोड़िए, कई गांव अभी भी पानी,बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं.

दरअसल विकास के लिए जो सोच होनी चाहिए है, वह है ही नहीं. अब मौजूदा सरकार की प्राथमिकताओं में दूरदराज के गांव नहीं रह गए हैं.पहले प्रदेश के दूरदराज में भी चौबीसों घंटे बिजली रहती थी. अब राजधानी में भी 10-10 घंटे गायब रहती है. पिछले दो साल से पेयजल का संकट बढ़ गया है. पिछले साल की गर्मियों में तो समस्या और भी विकराल हो गई थी. जब तक गरीबों के लिए दर्द नहीं होगा तब तक इन समस्याओं को सुलझाने की पहल नहीं हो सकती. विकास कार्यों को सिर्फ नौकरशाही के भरोसे पर नहीं छोड़ा जा सकता है. राजनीतिक नेतृत्व को भी इनमें दिशानिर्देश देना चाहिए.

राज्य में महत्वपूर्ण नीतियां नहीं बन पाई हैं. आप लोग भी पांच साल सत्ता में रहे थे.

नीतियों का सीधा संबंध सोच से होता है. राज्य को किस दिशा में जाना है यह नीति तय करती है. नीतियां बनाने की प्रक्रिया हमने शरू कर दी थी. परंतु बाद में उन पर कुछ हुआ ही नहीं.

तो ऐसे में क्या उम्मीद की जा सकती है ?

सरकार गंभीर मुद्दों से भटक रही है. बेरोजगार सड़कों पर उतर आए हैं. जनता से किए गए वादे पूरे नहीं हो रहे हैं. उम्मीद की जा सकती है कि आने वाला समय अच्छा होगा. हम शहीदों के सपनों का उत्तराखंड बना पाएंगे.

तो अब प्राथमिकताएं क्या होनी चाहिए?

हमें बुनियादी ढांचे को मजबूत करते हुए रोजगार के अधिक से अधिक अवसर पैदा करने होंगे. कुछ क्षेत्रों की पहचान करके तेजी से उन पर कार्य करना होगा तभी हम लक्ष्यों तक पहुंच पाएंगे. राज्य सरकारों को अपने संसाधनों को बढ़ाना होगा. हर काम के लिए केंद्र की ओर देखने की मानसिकता त्यागनी होगी.

पर मुख्यमंत्री तो कहते हैं कि उत्तराखंड देश का पहले नंबर का राज्य है.

फिलहाल विकास और रोजगार देने के मामले में तो नंबर एक नहीं है. बीस सूत्री कार्यक्रम में अब हम पिछड़ गए हैं. शायद भ्रष्टाचार और बिगड़ती कानून-व्यवस्था के मामले में हम नंबर एक होंगे.

यहां भी डरना मना है

फिल्म समीक्षा

फिल्म ए फ्लैट

निर्देशक हेमंत मधुकर

कलाकार जिमी शेरगिल, संजय सूरी, कावेरी झा, हेजल

अगर भूत-वूत या आत्मा जैसी कोई चीज होती होगी तो अपनी फिल्मों को देखकर रोती बहुत होगी. बॉलीवुड में एक खास किस्म के भूत होते हैं. जब बरसों पहले किसी मेकअपमैन ने पहली बार सफेद कपड़ों वाली, चेहरे पर गिरे खुले लंबे बालों वाली आत्मा की रचना की होगी तो वह भी नहीं जानता होगा कि उसकी यह कृति अमर हो जाने वाली है. मजेदार बात यह है कि सब भूत अपना प्रोफेशनल काम यानी डराना भी एक ही तरह से करते हैं. ‘ए फ्लैट’ या ऐसी ही कोई भी फिल्म देखते हुए फिल्म लिखने और बनाने वाली टीम पर तरस बाद में आता है, पहले भूत नगरी की क्रिएटिव टीम पर तरस आता है जो इतने सालों से डराने का एक नया तरीका तक नहीं खोज पा रही. वे बस हमारे बेचारे हैंडसम नायक को ज्यादा से ज्यादा किसी हवेली या यहां फ्लैट में बंद कर देंगे (जिसका कोई काला अतीत होगा, जैसे कोई मासूम मारा गया होगा), फिर लाइटें जलाएंगे-बुझाएंगे, खूब आवाज के साथ दरवाजे खोलेंगे-बन्द करेंगे, कभी-कभी तूफान ला देंगे और जब हैंडहेल्ड कैमरे से फिल्माए गए किसी शॉट में डरा हुआ नायक आगे किसी आत्मा को खोज रहा होगा तब वह अचानक उसके ठीक पीछे खड़ी दिखेगी.

हेमंत मधुकर क्या यह नहीं जानते कि इससे तो अब बच्चे भी नहीं डरते? भले ही वह पीछे कितना भी तेज संगीत बजा लें और डरावनी या रहस्यमयी आवाजें सुनवाएं.

लेकिन आत्मा तो आत्मा है. बदला लेना उसका सनातन धर्म है. आप जानते ही हैं कि उन्हें आसानी से शांति नहीं मिलती और शांति पाने के लिए वे हमारे हीरो को इस्तेमाल करती हैं.

जिमी शेरगिल बढ़िया एेक्टर हैं लेकिन इतनी प्रत्याशित कहानी में उससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता. वे अमेरिका से लौटे हैं और अपने फ्लैट में ठहरे हैं जिसमें पहले उनके दोस्त संजय सूरी रहते थे. यहीं सारा ‘आहट’नुमा खेल शुरु होता है. हम जानते हैं कि आपने ऐसे बहुत-से सीरियल और फिल्में देखी हैं, इसलिए समझ गए होंगे कि यह कोई पुरानी मौत का चक्कर है और संजय सूरी ने ही कोई गुल खिलाया होगा. उनकी मनाली की एक गांव की गौरी हेजल से लंबी-सी धोखे वाली लवस्टोरी है. लेकिन संजय सूरी का चेहरा ही ऐसा है कि हम उन्हें धोखेबाज प्रेमी कैसे मान लें?

अब यह कहानी है प्रतिशोध के लिए तड़पती आत्मा की जिसके चक्कर में बेचारे जिमी शेरगिल को डर से बहुत सारा कांपना है और साथ ही पसीना-पसीना हो जाना है. लेकिन हेमंत मधुकर को यह याद नहीं रहता कि उनका उद्देश्य तो दर्शकों की घिग्घी बंधवाना और उनका पसीना बहाना था.

हालांकि ‘ए फ्लैट’ के पास कुछ अच्छे एेक्टर, अतीत को वर्तमान और भविष्य से जोड़ने का थोड़ा दिलचस्प तरीका और ठीक-ठाक खूबसूरत सिनेमेटोग्राफी तो है, लेकिन यह वह समय है जब हमारी ज्यादातर भूत कहानियों के डरावने हिस्से कॉमेडी फिल्म बनने के कगार पर हैं.

गौरव सोलंकी

नर्मदा से आगे जाती एक लड़ाई…

विंध्यांचल और सतपुड़ा पर्वत श्रंखलाओं के बीच बसे अपेक्षाकृत शांत निमाड़ अंचल में उस दिन शाम गहराने के साथ-साथ हलचल बढ़ती जा रही थी. पश्चिमी मध्य प्रदेश में महाराष्ट्र की सीमा से सटे इस इलाके में आदिवासियों, किसानों, पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आंदोलनकारियों के उत्साह से लबरेज जत्थों का जुटना और पहले से मौजूद लोगों का नाच-गाना जारी था. दस बजते-बजते लोगों की हलचलें कम होने लगीं और कुछ ही देर में धड़गांव (महाराष्ट्र) से इन लोगों को लेकर 15 नावों का काफिला नर्मदा के रास्ते मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले की तरफ चल पड़ा. यात्रा के दौरान रात के अंधेरे में लोगों के चेहरों पर उस आंदोलन की ऊर्जा की रोशनी साफ-साफ देखी जा सकती थी जिसे आज 25 साल पूरे हो रहे थे. शांत बहते पानी और रात के धुंधलके में वे गीत फिर उसी जीतने के भरोसे की गूंज के साथ सुनाई दे रहे थे जो नर्मदा घाटी में एक-चौथाई सदी से जारी ‘नर्मदा बचाओ अंदोलन के उतार-चढ़ाव भरे सफर और संघर्ष की ऊर्जा को अपने में समेटे हुए है.

इस यात्रा के साथ-साथ पिछले पच्चीस साल से आंदोलन की अगुआ रही मेधा पाटकर शुरुआती दिनों को याद करते हुए हमें बताती हैं, ‘मई, 1988 में जबर्दस्ती विस्थापन से पैदा हो रही समस्याओं के हल के लिए तीन राज्यों से आए 250 कार्यकर्ताओं के समूह की नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी से हुई बातचीत का कोई निर्णय नहीं निकला तब अगस्त में उन्होंने अपनी पहली नियोजित रैली निकाली थी.’ 

‘नक्सलवादियों ने अब तक क्या हासिल किया है? सरकार सिर्फ उनकी हिंसा को गंभीरता से लेती है. जबकि नर्मदा बचाओ आंदोलन कई मोर्चों पर सफलता हासिल कर चुका है’

इसके बाद आंदोलन कई दौर से गुजरा. अंतर्राज्यीय रैलियां, भूख हड़ताल, दिल्ली और प्रदेश की राजधानियों में धरना, जिला न्यायालयों से लेकर उच्चतम न्यायालय तक की लंबी कानूनी लड़ाइयों के जरिए लगातार सरदार सरोवर प्रोजेक्ट का विरोध किया गया. इस बीच 2006 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना इस आंदोलन के लिए मील का पत्थर साबित हुआ. धरना स्थल पर आंदोलनकर्मियों का साथ देने आमिर खान भी पहुंचे और सारे देश का ध्यान इस ओर गया. यही वह समय था जब नर्मदा आंदोलन के माध्यम से विस्थापन, आदिवासियों और किसानों के भूमि अधिकार और बड़े बांधों का विरोध राष्ट्रव्यापी बहस के विषय बन गए.

उड़ीसा से आयोजन में भाग लेने आए ‘नेशनल एलाइंस ऑफ पीपल्स मूवमेंट’ के संयोजक प्रफुल्ल सामंत्र कहते हैं, ‘ यह भारत में जनांदोलनों के लिए प्रबल प्रेरणास्रोत है. पूरी तरह गांधीवादी मार्ग पर चलते हुए इस प्रजातांत्रिक आंदोलन के जरिए पहली बार विस्थापित लोगों के अधिकारों की बात राज्य के सामने रखी गई है.’

आज के हालात में आंदोलन के गांधीवादी- प्रजातांत्रिक बनाम माओवादी-नक्सलवादी स्वरूप पर चर्चा करते हुए मेधा इस बात को पूरी तरह नकारती हैं कि अहिंसक होने की वजह से उनके आंदोलन को सरकार ने कभी गंभीरता ने नहीं लिया. वे कहती हैं, ‘ आप यह देखिए कि नक्सलवादियों ने अब तक क्या हासिल किया है. सरकार सिर्फ उनकी हिंसा को गंभीरता से लेती है. हमें अपने आंदोलन से कई मोर्चों पर सफलता मिली है.’   

22 अक्टूबर की रात को नावों और ट्रकों से शुरू हुई यात्रा अगले दिन सुबह जब बड़वानी पहुंची तब यहां मौजूद उत्साहित सामाजिक कार्यकर्ता और ग्रामीण ‘घाटी में लड़ाई जारी है’, ‘नर्मदा बचाओ, मानव बचाओ’ जैसे नारे, फूलमालाओं और गाजे-बाजे के साथ महाराष्ट्र और गुजरात से आए अपने साथियों का स्वागत कर रहे थे. इस आयोजन स्थल पर आंदोलन के 25 साल लंबे सफर की सफलताओं और असफलताओं को साझा करते हुए मेधा हमें बताती हैं कि बांध निर्माण में हो रही भारी जनहानि को स्वीकार किया जाना और विश्व बैंक जैसी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं को बांध निर्माण में से निवेश हटाने के लिए तैयार करना आंदोलन की प्रमुख सफलताओं में से एक है. वे कहती हैं, ‘आंदोलन के माध्यम से न सिर्फ विस्थापन के मुद्दे को भारतीय और वैश्विक स्तर पर केंद्रीय पटल में लाया गया साथ ही सरकारी भ्रामक आंकड़ों की सच्चाई भी सामने आई. पहले 7,500 परिवारों को बांध प्रभावित माना गया था. लेकिन आंदोलन के प्रयासों की वजह से सरकार को मानना पड़ा कि वास्तव में प्रभावित परिवारों की संख्या 51,000 है. इनमें से आज भी 40,000 परिवार डूब क्षेत्र में रहने को मजबूर हैं.’

आंदोलन के कार्यकर्ताओं के अनुसार 25 साल के दौरान बांध का निर्माण न रोक पाना और आदिवासियों के  वन अधिकारों को लागू न करा पाना आंदोलन की असफलता कही जा सकती है. इस बारे में मेधा कहती हैं, ‘हम वन अधिकार अधिनियम और ग्राम सभाओं के सुचारू संचालन के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं कर पाए जबकि ये मुद्दे सीधे-सीधे विस्थापन से जुड़े हैं.’ वे इसकी वजह बताती हैं, ‘अलग-अलग क्षेत्रों में चल रहे स्थानीय आंदोलनों में एकजुटता की कमी है, यदि इन्हें एक मंच पर काम करने का मौका मिले तो परिवर्तन तेजी से होगा.’

इस आंदोलन का अपनी व्यापक स्वीकार्यता को राजनीतिक स्तर पर रूपांतरित नहीं कर पाना एक बड़ी कमी माना जाता रहा है. आयोजन स्थल पर लगातार इस बात पर चर्चा हो रही थी कि प्रजातांत्रिक रूप से जनमुद्दों को सरकार के सामने रखने के बावजूद आंदोलन का चुनावी राजनीति से दूर रहना कितना सही है. मेधा इस बारे में कहती हैं, ‘राजनीति हमारे लिए अछूत नहीं है पर हम सिर्फ व्यापक स्तर पर ठोस मुद्दों पर जनचर्चा के माध्यम से सहभागी प्रजातंत्र के प्रति राजनीतिक चेतना का विकास करना चाहते हैं.’

शाम के वक्त नारों और गीतों की आवाज धीमी हो चली थी. जो लोग दिन में रैली में इकट्ठा थे, अब वे छोटे-छोटे समूहों में बंटकर बातें कर रहे थे. पूरी यात्रा और आयोजन के प्रति लोगों का उत्साह देखकर यह बात साफ जाहिर हो रही थी कि आंदोलन अब और संगठित है. उद्देश्य और सुस्पष्ट है. लड़ाई अब विस्थापन तक सीमित नहीं है. वन अधिकार, पर्यावरण, प्रजातांत्रिक विकेंद्रीकरण जैसे अन्य मुद्दे भी आंदोलन की कार्य सूची में सम्मिलित हो गए हैं.

आयोजन स्थल पर ही हमारी मुलाकात गोखरू से हुई. इस आंदोलन से शुरुआत से ही जुड़े रहे गोखरू को अपने गांव खेरिया बादल के नर्मदा के डूब क्षेत्र में आने की वजह से पुरखों का घर और जमीन छोड़नी पड़ी है. अब वे पास की पहाड़ी पर बची थोड़ी-सी जमीन पर खेती करते हैं. उन्हें नहीं पता कि इतनी-सी जमीन से वे अपना गुजारा कैसे कर पाएंगे. फिर भी इस आदिवासी-किसान ने एक बात गहराई से रट ली है कि उसे अपनी जमीन के लिए तब तक लड़ना है जब तक न्याय न मिले. गोखरू को भरोसा है कि एक दिन सरकार झुकेगी.

दूर कहीं नर्मदा अब भी बह रही है, दिन रात  में बदल रहा है और लोग गा रहे हैं. संघर्ष जारी है. 

' राम तेरे बंदों से कांपते हुए '

गीतिका

राम तेरे बंदों से कांपते हुए,

जिया किए राम-राम जापते हुए.

जीवन के बोझ तले दबे-कुटे हम,

दुनिया भर रंज-ग़म अलापते हुए.

दूर खड़ी खुशियों की टोह-टोहकर,

हासिल का इंच-इंच नापते हुए.

फिरा किए इज्जत का ताज लिए हम,

आर्टनुमा तिगड़ों से ढांपते हुए.

भगवे या नीले या लाल देश में,

रंग जा रे सत्ता को छापते हुए.

शोहरत के चार-चांद ढल गए हुजूर,

राजा को जब-तब संतापते हुए.

गालिब के हम ही तो चचा हैं हुजूर,

करते हैं उस्तादी हांफते हुए.

ग़ज़ल

सर में सौदा और कुछ था, मुंह से निकला और कुछ

गालियों ने कर दिया कोताह किस्सा और कुछ

कौन से कमरे में इज्जत, जा के चेहरा ढांप ले

अनबिके संसार के भीतर लजाया और कुछ

आपने बेची खबर, खबरों ने बेचा आपको

मीडिया ने आप-हम-सबको परोसा और कुछ

लूट इनकी, राज उनका, वोट ही तो आपका

और आगे मोहतरम देखें तमाशा और कुछ

छा गया पश्चिम का बादल, नाम है वैश्वीकरण

इस खुले हाथों लुटी दौलत का तोहफा और कुछ

वाकया था और कुछ, अफवाह फैली और कुछ

फिर दलालों की दलाली ने दलेला और कुछ

कर चुके जो कुछ महाजन, क्यूं न हम भी वह करें

देश-पूजा, भेंट-पूजा, पेट-पूजा और कुछ

धन्य गुरुघंटाल! ‘औरत-मुक्ति’ का दर्शन तेरा

स्वर्ग था कुछ और ही, तूने दिखाया और कुछ

-राम मेश्राम 

                                       

 

 

 

इस वर्ग की अन्य रचनाएं

‘साहित्य की कोपलें ‘ उभरते हुए अंकुरों को खाद-पानी देने का एक छोटा सा प्रयास है. आप भी इस वर्ग के लिए अपनी रचनाएं (फोटो और संक्षिप्त परिचय के साथ) mailto:hindi@tehelka.comपर ईमेल कर सकते हैं या फिर नीचे लिखे पते पर भेज सकते हैं.  

तहलका हिंदी, एम-76, एम ब्लॉक मार्केट, ग्रेटर कैलाश-2, नई दिल्ली-48

मैच जिताने वाला ऐक्टर

आप इन्हें ओमकारा के रज्जू के रूप में बेहतर जानते होंगे जो अपने आसपास के बड़े सितारों के बीच जब यह कहकर नदी में कूदता है कि उसे तैरना नहीं आता तो दरअसल ऐक्टिंग के पानी का वह खूबसूरत तैराक है. रज्जू की मंगेतर को नायक ने मंडप से उठा लिया है और दीपक डोबरियाल के अभिनय में यह दोहरी खूबी है कि उसे कुशलता से निभाते हुए भी वे किसी भी पल उस किरदार से सहानुभूति नहीं जगने देते. हां, वे अपने ‘अजी हां’ और ‘चल झुट्टा’ के साथ याद पक्का रहते हैं.

यूं तो यह फिल्मी व्याकरण की एक घिसी-पिटी कहावत है कि अच्छे अभिनेता एक सीन से भी आपको याद रह जाते हैं लेकिन बहुत सारे प्रतिभावान अभिनेताओं के साथ दीपक के लिए भी इस कहावत का इस्तेमाल जरूरी है. फिर वह चाहे ‘दिल्ली 6’ का हलवाई हो, ‘शौर्य’ का चुप्पा कैदी कैप्टेन हो, ‘ब्लू अम्ब्रेला’ के भला अंग्रेजी में भी कोई झूठ बोलता है? वाले कुछ सेकंड हों या गुलाल का एक दृश्य जिसमें पान की दुकान पर खड़े दीपक एक शब्द भी नहीं बोलते और उनकी हल्की मुस्कुराहट और आंखों की हरकत का कॉम्बिनेशन दिल जीत लेता है.

‘ वह ईमानदार भी है और स्वार्थी भी, बुद्धू भी है और समझदार भी ‘

पौड़ी गढ़वाल के काबरा गांव में जन्मे और दिल्ली में पले-बढ़े दीपक से यह पूछा जाए कि ऐक्टर बनने का खयाल पहली बार उनके दिल में कब आया तो जवाब में मिलने वाली जगह, जहां यह खयाल आया, वाकई दिलचस्प है. उनके स्कूल में प्रार्थना और राष्ट्रगान के तुरंत बाद वहीं हाजिरी ली जाती थी. दीपक सबसे आगे खड़े होकर रोल नंबर बोलते थे. शुरू में यह घबराहट का काम होता था जिसमें उनके पैर कांपते थे लेकिन बाद में उन्हें इसमें मजा आने लगा. और तो और, वे उसी दौरान इशारों और आवाज के उतार-चढ़ाव का इस्तेमाल करके अपने दोस्तों से बात भी कर लेते थे. तब उनमें पहली बार मंच का मोह जगा और उसका केंद्र बनने का इसके तुरंत बाद उन्होंने पढ़ाई को कॉरस्पोंडेंस के हवाले करके थिएटर की राह पकड़ ली और सात साल दिल्ली में नाटक करते रहे, छह साल अरविंद गौड़ के साथ ‘अस्मिता’ में और एक साल पं. एनके शर्मा के निर्देशन में. मां को उनका यह शौक जितना भाता था, पिताजी उतना ही अपने बेटे के करियर के लिए परेशान होते थे. उन्हें सरकारी नौकरी के लिए बेटे के ओवरएज हो जाने की फिक्र होती जा रही थी और बेटा मुंबई चला गया था. फिर संघर्ष के कुछ साल थे, लेकिन दीपक मानते हैं कि मुंबई में इतने लोग संघर्ष कर रहे होते हैं कि एक सामूहिक हौसला आपको आगे खींच ले जाता है. हालांकि वह संघर्ष एक अलग स्तर पर अब भी जारी है. अब ऑफर काफी मिलने लगे हैं लेकिन उन्हें ऐसी भूमिकाओं की तलाश है जिनमें वे अपनी सीमाओं से भी आगे जा सकें. उनके किरदारों का आकार भी बढ़ता जा रहा है और वैराइटी भी. जहां इसी शुक्रवार रिलीज हुई बेला नेगी की ‘दाएं या बाएं’ में वे मुख्य भूमिका निभा रहे हैं वहीं मृगदीप लांबा की कॉमेडी ‘तीन थे भाई’ में वे श्रेयस तलपड़े और ओम पुरी के साथ हैं. उनका चेहरा-मोहरा बॉलीवुड की मुख्यधारा के परंपरागत नायकों जैसा नहीं है और इस बात से वे कभी परेशान भी नहीं दिखते. शायद वे खुद भी मुख्यधारा की फॉर्मूला कहानियों के सांचे में खुद को असहज ही महसूस करते.

बेला नेगी उन्हें बेहद मासूम बताती हैं. उन्हें लगता है कि उनकी फिल्म के नायक के चरित्र की जितनी विरोधाभासी परतें हैं – वह ईमानदार भी है और स्वार्थी भी, बुद्धू भी है और समझदार भी – उन्हें दीपक हर बारीकी के साथ जी गए हैं. इसके बावजूद कि उनकी मुख्य भूमिका वाली पहली फिल्म ‘दाएं या बाएं’ का ठीक से प्रचार नहीं हो पाया या यह उत्तराखंड में ही रिलीज नहीं हो पा रही, जहां की यह कहानी है या वैसी फिल्मों का बाजार थोड़ा छोटा है जिन्हें वे करना चाहते हैं, दीपक के भीतर कोई गिला नहीं दिखता. उनमें एक स्थायी सकारात्मकता है जो खिलंदड़पने या बेफिक्री जैसी भी लगती है लेकिन उसकी जड़ें शायद उनके पहाड़ी गुणसूत्रों में हैं. वे उस बल्लेबाज की तरह हैं जो आपको विज्ञापनों में या अपने स्टाइलिश शॉट्स के गुण गाता हुआ भले ही न दिखे लेकिन बात उस पर छोड़ोगे तो वह मैच निकाल ले ही जाएगा.                 

' सरकारी खरीद से मोटे मुनाफे की दृष्टि हिन्दी प्रकाशकों को ‘उद्यमी’ बनने से रोके हुए है '

आपकी पसंदीदा विधा कौन-सी है ?

मुझे लगता है कि कविता अधिकांश रचनाकारों की प्रथम प्रेयसी होती है किन्तु कविता का विधागत रूप एक ही साथ सरल है तो अत्यन्त सूक्ष्म-जटिल-दुरूह भी. दूसरी ओर विषयों का आत्यान्तिक-आन्तरिक दवाब अपने अनुरूप विधा और शिल्प की तलाश कर लेता है. इन्हीं कारणों से मैं भी कविता से उपन्यास लेखन तक पहुँचा हूँ किन्तु पहले प्यार को कौन भूलता है.

इन दिनों क्या पढ़ रहे हैं ?

शताब्दी वर्ष के महाकवियों में केदारनाथ अग्रवाल उपेक्षित से रहे हैं. उन पर सामग्री खोज-खोज कर पढ़ रहा हूँ. फेलिक्स पैडल की दोनों किताबें ‘सेक्रिफाइसिंग पीपुल’ और ‘आउट ऑफ दिस अर्थः ईस्ट इन्डिया आदिवासिज एड द अल्युमिनियम कार्टेल’ अभी मेरे सामने हैं. मेरे नये उपन्यास का नायक मुण्डा जनजाति का है इसीलिए फादर हॉफमैन की ‘एन्साक्लोपीडिया मुन्डारिका’ में भी रह-रह कर डुबकी लगा रहा हूँ. साहित्य अकादमी से पुरस्कृत मैथिल कवि विवेकानन्द ठाकुर की अद्भुत काव्य रचना ‘अकेला खड़ा’ अभी खत्म की है.

आपके पसंदीदा रचनाकार कौन से हैं ?

पूर्वज, वरिष्ठ, वरीय और समकालीन सभी रचनाकारों की सुकृतियाँ मन को छूती रही हैं अतएव किन्ही का नाम लूँ किन्ही को छोड़ दूँ यह उचित नहीं है. सच कहूँ तो हिन्दी ही क्यों अन्य भारतीय भाषाओं, अंग्रेजी, रूसी, स्पेनिस, तुर्की आदि के भी सर्वकालिक महान रचनाकारों ने मेरे अभ्यान्तर को गढ़ने में जो भूमिका निभाई है उनसे उऋण नहीं हुआ जा सकता. 
किन्तु देश के जिस खनिज-वन क्षेत्र में जिन आदिवासी जनों के बीच साँसे लेता हूँ उनकी पीड़ा को शब्द देने वाले रचनाकार महाश्वेता, अरुंधति, संजीव, मैत्रेयी पुष्पा और समकालीन पंकज मित्र थोड़े ज्यादा नजदीक लगते हैं.

बेवजह मशहूर हो गई कोई रचना या लेखक ?

यह वाद-ववाद-संवाद प्रिय लोगों का प्रियतम प्रश्न है. मुझे लगता है कि विषयगत या शिल्पगत नवीनता किसी रचना को चर्चा में लाती है किन्तु उसकी गहराई ही उम्र तय करती है. लेकिन यह भी सत्य है कि केदारनाथ अग्रवाल , राही मासूम रजा, अमृतलाल नागर जैसे अनेक रचनाकार भिन्न-भिन्न कारणों से किनारे खिसका दिए गए. इनके पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता है.

हिन्दी में पढ़ने की रवायत कायम रहे इसके लिए क्या किया जाए ?

मेरे मित्र प्रसन्न कुमार चौधरी ठीक ही कहते हैं कि प्रकाशकों ने हिन्दी के बाजार की ताकत को अभी समझा ही नहीं है. छोटे शहरों-कस्बों में जो लाखो पाठक हैं  उन तक निरन्तर और सहज पहुँच बनाने की कोई कोशिश नहीं की गई. हिन्दी पट्टी के हजारो कस्बों में हिन्दी साहित्य का जुनूनी पाठक है, इनके सर्वेक्षण, पाठ्य पुस्तकों की दूकानों में साहित्यिक पुस्तकों  के लिए स्थायी जगह, आपूर्ति की निरन्तर प्रवाह, आक्रमक प्रचार-प्रसार चन्द वर्षों में ही पाँच सौ प्रतियों के संस्करण को लाख प्रतियों तक पहुँचा सकता है. पूँजी की कमी नहीं, बल्कि सरकारी खरीद से मोटे मुनाफे की दृष्टि हिन्दी प्रकाशकों को ‘उद्यमी’ बनने से रोके हुए है. यह एक साथ पढ़ने की रवायत, पाठक, रचना और रचनाकार के साथ किया जा रहा अक्षम्य अपराध है.

रेयाज़ उल हक़

कोई नृप होय…

दरभंगा जिले के कुशेश्वरस्थान प्रखंड से चलने वाली नाव दो घंटे में 12 किमी दूर समोरा घाट पहुंचाती है. यहां से हमें रामचंद्र सदा के घर जाना है. आशंका के विपरीत हमें उनका घर ढूंढ़ने में कोई दिक्कत नहीं होती क्योंकि इस इलाके में लगभग हर कोई उन्हें जानता है. कुछ देर पैदल चलकर हम मुसहरटोला पहुंचते हैं, यहीं एक किनारे पर अपनी फूस की झोपड़ी के आगे रामचंद्र से हमारी मुलाकात होती है. बीमारी से दुबले हो गए शरीर पर बैठ रही मक्खियों को भगाते हुए वे हमें बैठने को कहते हैं.

बैठते ही हमें पता चल जाता है कि हम एक ऐसे इलाके में हैं जहां गीदड़ के काटने और गोली लगने में कोई फर्क नहीं किया जाता. रामचंद्र हमें अपने 12 वर्षीय बेटे पंकज की पोस्टमार्टम रिपोर्ट दिखाते हैं. रिपोर्ट बताती है कि पंकज सदा की मौत गोली लगने से हुई थी. लेकिन दरभंगा मेडिकल कॉलेज व अस्पताल की इस रिपोर्ट और पंकज के अंतिम इलाज में कोई समानता नहीं है. कुशेश्वरस्थान प्रखंड के प्राथमिक चिकित्सा केंद्र में इस 12 वर्षीय किशोर को लगाया गया अंतिम इंजेक्शन उस दवा का था जिसे गीदड़ के काटने पर लगाया जाता है. चिकित्सा केंद्र के डॉक्टर सहित सारे गांववालों को पता था कि पंकज को गीदड़ ने नहीं काटा है बल्कि उसे गांव के एक भूस्वामी नारायण यादव के बेटे ने गोली मारी है. लेकिन इससे डॉक्टर को कोई फर्क नहीं पड़ा. उसने गीदड़ के काटने का ही इलाज किया क्योंकि उसे इलाके के प्रभावशाली लोगों से दुश्मनी मोल नहीं लेनी थी. आखिरकार इलाज के दौरान ही पंकज की मौत हो गई. इससे नाराज गांववाले लाश को लेकर दरभंगा मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल ले गए, जहां से यह पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई. लोगों के काफी दबाव के बाद किसी तरह प्राथमिकी तो दर्ज हुई लेकिन पुलिस अभी तक आरोपित हत्यारे को नहीं पकड़ सकी है. पंकज ही रामचंद्र के घर में आमदनी का एकमात्र जरिया था. वह इसी गांव के नारायण यादव के यहां काम करता था, जिनके यहां उसकी तीन साल की मजदूरी भी बाकी थी. इस साल मई में जब उसने बकाया मजदूरी मांगी तो उसे गोली मार दी गई.

यह परियोजना 2.14 लाख हेक्टेयर जमीन को बाढ़ से बचाने के लिए शुरू की गई थी, लेकिन आधी सदी से अधिक समय बीत जाने के बाद इसके कारण 4.26 लाख हेक्टेयर जमीन पानी में डूबी रहती है

इसके पहले रामचंद्र के घर में एक और मौत हो चुकी है. एक ही साल पहले उन्होंने अपनी पत्नी को भी खोया है. वे समझ भी नहीं पाए कि उनकी पत्नी को कौन-सी बीमारी हुई थी. इलाज कराने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे. वह कमजोर होती जा रही थी और फिर एक दिन उसकी मौत हो गई. आप चाहें तो रामचंद्र सदा के साथ घटी इन घटनाओं के लिए कई वजहें गिना सकते हैं. लेकिन इलाके में ऐसी नियति वाले वे अकेले नहीं हैं. 46 साल के रामचंद्र सदा वास्तव में इतनी ही साल पुरानी एक परियोजना की कीमत चुका रहे करीब 12 लाख लोगों में से एक हैं.

दरअस्ल पिछली कई सदियों से बिहार में बाढ़ की तबाही ला रही कोसी नदी को नियंत्रित करने के लिए 1955 में कोसी परियोजना शुरू की गई थी. इसके तहत कोसी के पूर्वी और पश्चिमी, दो तटबंधों का निर्माण किया गया था. इसका 125 किलोमीटर लंबा पूर्वी तटबंध वीरपुर से कोपड़िया तक फैला हुआ है और 126 किलोमीटर लंबा दूसरा पश्चिमी तटबंध नेपाल के भारदह से सहरसा के घोंघेपुर तक है. इन परियोजनाओं से 10 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की योजना भी बनाई गई और साथ में सुपौल के कटैया में एक जल विद्युत परियोजना स्थापित करके 16 मेगावाट बिजली पैदा करने के सपने भी देखे गए. लेकिन कोसी को नियंत्रित नहीं किया जा सका.

1893 में कोसी में आने वाली बाढ़ और तबाही का अध्ययन करने आए बंगाल के तत्कालीन मुख्य इंजीनियर डब्ल्यूए इंग्लिश का कहा पूरा हुआ. इंग्लिश ने कोसी पर किसी भी निर्माण कार्य से मना किया था, क्योंकि उसके अनुसार ये तटबंध इन नदियों की प्रकृति को देखते हुए तबाही लाने वाले साबित होंगे. इंग्लिश को सही ठहराते हुए बनने के बाद से इन तटबंधों ने जितनी तबाही को रोका है, उससे कहीं अधिक तबाही ये इन इलाकों में लेकर आए हैं. तटबंधों के ऊपरी इलाकों में बाढ़ और कटाव की भयानक समस्या न सिर्फ आज भी मौजूद है बल्कि यह साल दर साल बढ़ती ही जा रही है. बिहार के लोग 2008 की प्रलयंकारी बाढ़ को अब भी नहीं भूले हैं. दूसरी ओर तटबंधों के निचले इलाके में जलजमाव शुरुआत से ही एक बड़ी समस्या के रूप में उभरा. यह परियोजना 2.14 लाख हेक्टेयर जमीन को बाढ़ से बचाने के लिए शुरू की गई थी, लेकिन आधी सदी से अधिक समय बीत जाने के बाद इसके कारण 4.26 लाख हेक्टेयर जमीन पानी में डूबी रहती है. कोसी परियोजना के दूसरे फायदों की बात ही क्या की जाए. परियोजना की दोनों नहरें ही बमुश्किल अपने लक्ष्य की 6 से 10 फीसदी जमीन ही सिंचित कर पाती हैं. कोसी की धारा के साथ आने वाली गाद के कारण जलविद्युत परियोजना भी ठप पड़ी हुई है. हम इसमें पुनर्वास के उन वादों को भी शामिल नहीं करेंगे जो इस योजना से विस्थापित हुए लोगों से किए गए और कभी पूरे नहीं हुए. इन वादों में जो कुछ पूरा हुआ उसमें मुआवजे के रूप में मिली जमीन थी, लेकिन वह दशकों से जलजमाव में डूबी हुई है.

कुशेश्वरस्थान भी उन जगहों में से एक है जहां साल भर पानी जमा रहता है. और इसके लिए अकेले कोसी जिम्मेदार नहीं है. इस इलाके में तीन नदियां मिलती हैं- कोसी, कमला और बागमती. पहले कोसी पर तटबंध बना और इसके बाद 1968 में आई बाढ़ के बाद कमला पर. तीसरा तटबंध बागमती पर बना है जिसमें लगभग 8 मील तक तटबंध को खुला छोड़ दिया गया है. बाढ़-सूखे से जुड़े मामलों के जानकार दिनेश कुमार मिश्र इसे परियोजना से जुड़े अध्ययनकर्ताओं और इंजीनियरों की नाकामी का नतीजा बताते हैं. वे कहते हैं, ‘तीन नदियों के संगम स्थल पर तटबंधों का जाल बिछा दिया गया और इस पर जरा भी ध्यान नहीं दिया गया कि पानी की निकासी कैसे होगी.’

कोसी का तटबंध कुशेश्वरस्थान से 4 कोस दक्षिण में खत्म हो जाता है. इसके बाद नदी की मुक्त हुई धारा आसपास के इलाकों में फैल जाती है. पास ही में कमला नदी की धारा कोसी में मिलती है और इसका पानी भी इलाके में फैल जाता है. बागमती के तटबंध के खुले बांध से निकली गाद और पानी भी इसी इलाके में जमा होता है. बिहार राज्य खेल प्राधिकरण के पूर्व महानिदेशक और सामाजिक कार्यकर्ता रामचंद्र खां इसी इलाके के हैं. वे भी इस परियोजना के पीड़ितों में से हैं. वे बताते हैं, ‘कोसी, कमला, बलान और बागमती आदि सात नदियों को कुशेश्वरस्थान में लाकर छोड़ दिया गया है. 1956 के बाद एक-एक कर बने तटबंधों के जरिए पूर्णिया, सहरसा से डायवर्ट करके इन्हें कुशेश्वरस्थान के माथे पर छोड़ दिया गया है. कोसी, कुरसेला में गंगा से जाकर मिलती थी. पर फरक्का में बांध बनने के बाद कोसी के गंगा में जाकर मिलने का रास्ता बंद हो गया. कोसी के गंगा में मिलने के सात रास्ते पूर्णिया और भागलपुर में थे. लेकिन उसका जो मुख्य रास्ता था वह फरक्का बांध के कारण बंद हो गया. अब यह पानी खगड़िया से उत्तर घूमता रहता है. इसकी वजह से 400 वर्ग किमी इलाका डूबा हुआ है.’

जब लोगों के संसाधन जलजमाव के कारण खत्म हुए तो लोग बाहर चले गए. सरकार के लिए भी यह सुविधाजनक स्थिति थी कि लोग इस हालत के खिलाफ लड़े नहीं

इस डूबे हुए इलाके में फैले सैकड़ों गांवों में से अधिकतर नदियों के घाट पर ही बसे हुए हैं. और रामचंद्र सदा का गांव समोरा घाट इन सैकड़ों गांवों में से एक है. टापू की तरह दिखने वाले इस गांव को बाकी दुनिया से सिर्फ एक नाव ही जोड़ती है. रामचंद्र के पास अपनी कोई जमीन नहीं है. परंपरागत रूप से वे बंटाई या अधिया पर खेती करके आजीविका कमाते थे. लेकिन जब से इलाके में पानी भरना शुरू हुआ तो खेती करने की संभावनाएं कम होती गईं. जिनके पास अधिक जमीन थी और जो सामर्थ्यवान थे वे किसी तरह अपनी जमीन आदि बेच कर दूसरी जगह चले गए. लेकिन रामचंद्र सदा जैसे हजारों परिवारों के पास एक धुर जमीन भी नहीं थी. वे कहीं और जाकर कैसे बसते?  इसलिए उनके घर यहीं बने रहे और उन्होंने मजदूरी के लिए दूसरी जगहों पर पलायन शुरू कर दिया. रामचंद्र सदा भी पंजाब चले गए. दिनेश कुमार मिश्र के अनुसार इस इलाके में 1958 में जब नदियों का पानी खेतों में जमा होना शुरू हुआ, पलायन तब से शुरू हो गया था. वे कहते हैं, ‘जब लोगों के संसाधन जलजमाव के कारण खत्म हुए तो लोग बाहर चले गए. सरकार के लिए भी यह सुविधाजनक स्थिति थी कि लोग इस हालत के खिलाफ लड़े नहीं. इसके साथ ही सामाजिक संतुलन चरमराने के साथ असामाजिक तत्वों का बोलबाला भी बढ़ा.’

हालांकि परियोजना की शुरुआत में सरकार ने पुनर्वास और मुआवजे के वादे किए थे, लेकिन जब वे जमीन पर उतरे तो लोगों को उनकी निरर्थकता का एहसास हुआ. सरकार ने उन इलाकों को पुनर्वास कार्यक्रम से बाहर रखा जिनमें सिर्फ तीन महीनों तक पानी जमा रहता था. सरकार का तर्क था कि बाकी महीनों में उन पर खेती की जा सकती है. इस प्रकार परियोजना से प्रभावितों की एक बहुत बड़ी संख्या को किसी भी तरह की राहत से वंचित कर दिया गया. बाकी जिन पीड़ितों को दो किस्तों में मुआवजा मिलने की घोषणा हुई उन्हें मुआवजे की एक ही किस्त मिली. जिनके घर पानी में डूब गए थे उन्हें घर के लिए दूसरी जमीन मिली जो उनके खेतों से कई किलोमीटर दूर थी और इतनी दूर से खेती संभव न होने के कारण लोगों को अपने खेत बेच देने पड़े.

यह लगभग चार दशक पुरानी बातें हैं. अब तो लोग साल भर ही पानी से घिरे रहते हैं. बाढ़ के दिनों में नाव ही 12 लाख लोगों की सवारी होती है. पानी से घिरे लोग किसी ऊंचे टीले या तटबंध पर शरण लेते हैं. बाढ़ आए या न आए, उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता. उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं होता. लंबे समय से यह स्थिति बनी रहने के कारण इलाके का आर्थिक-सामाजिक तानाबाना तबाह हो चुका है. रोजगार के जो थोड़े-बहुत साधन थे वे भी अब खत्म हो गए हैं. यही नहीं, सरकारी सुविधाएं और सेवाएं भी इस इलाके से लगभग नदारद हैं.

लेकिन विडंबना यह है कि सरकार कुशेश्वरस्थान के गांवों को कोसी से पीड़ित गांवों में शुमार नहीं करती है. बल्कि वह तो कई गांवों के अस्तित्व तक को स्वीकार नहीं करती है. सरकार के मुताबिक सिर्फ 380 गांव ही दोनों तटबंधों के भीतर हैं जबकि तटबंध के भीतर और बाहर जलजमाव से पीड़ित गांवों की संख्या लगभग 950 है.

समोरा घाट के अलावा कुशेश्वरस्थान प्रखंड में 40 और गांव हैं जो बदहाली और तबाही लाने वाली सरकारी परियोजनाओं की कीमत चुका रहे हैं. उनमें कोई अंतर नहीं है, यहां तक कि उनके नाम भी एक जैसे हैं- कोलाघाट, टोकाघाट, तेगछाघाट, महादेवमठ घाट, कुंजभवनघाट, फुलझारीघाट, गईजोरीघाट…

उजवा घाट की दूरी समोरा घाट से दस किलोमीटर है. यहां पहुंचने के लिए एक बार फिर पैदल चलना पड़ता है. इसी पंचायत के तहत ये 40 गांव आते हैं. सात बजे शाम में ही उजवा में श्मशान जैसी शांति पसरी हुई है. हमारी मुलाकात यहां जनता दल (यू) के महादलित प्रकोष्ठ के उपाध्यक्ष रघुनाथ सदा से होती है. रघुनाथ के पास इलाके के दलितों की जमीनी जानकारी है. वे बताते हैं, ‘कुशेश्वरस्थान में दलित मुसहरों की आबादी पचास हजार के करीब है. सब भूमिहीन हैं. उनके घर भी मालिक के खेत में या सरकारी गैरमजरूआ जमीन पर बने हुए हैं. इलाके में मजदूर तो हैं लेकिन उन्हें कोई काम नहीं मिलता है. इसलिए दिल्ली, पंजाब जाने वालों की संख्या इलाके में बहुत ज्यादा है.’ रघुनाथ सदा के पास एक और खास जानकारी है. उनके अनुसार कोसी तटबंध के भीतर सैकड़ों ऐसे गांव हैं जिनका कोई नाम ही नहीं है. ऐसे गांव को नवटोला कहा जाता है. बाढ़ के दिनों में बांध पर या ऊंचे स्थान पर नवटोले बस जाते हैं. उजड़ने और बसने का सिलसिला चलता रहता है.

कोसी तटबंध के भीतर सैकड़ों ऐसे गांव हैं जिनका कोई नाम नहीं है. इन नवटोलों के उजड़ने और बसने का सिलसिला साल भर चलता रहता है

महेंद्र सदा भी उजवा में रहते हैं. सूद ने इलाके के जीवन को दीमक की तरह चाटकर किस तरह खोखला कर दिया है, महेंद्र उसके बारे में बताते हैं, ‘हमलोगों के पास न बसने की जमीन है और न खेत-पथार. मालिक से सूद लेकर घर चलाते हैं. उस सूद को चुकाने के लिए महाजन से कर्ज लेकर बाहर कमाने जाना पड़ता है. फिर कमाते रहते हैं और सूद चुकाते रहते हैं.’ और जैसा कि उजवा के ही एक बुजुर्ग रामसेवक सदा का अनुभव है, ‘मालिक का सूद जिनगी भर नहीं चुकता है.’

इन इलाकों में लंबे समय से जलजमाव ने समाज के सबसे निचले तबके के लोगों से उनके रहे-सहे संसाधन और जीविका के परंपरागत तरीके छीन लिए हैं. खेती चौपट है और बड़े पैमाने पर पलायन ने गांवों के पुराने संबंधों और संगठनों को ध्वस्त कर दिया है. लोग प्रायः बाहर रहते हैं जिनके लिए संभव नहीं होता कि वे अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों का विरोध कर पाएं. वे संगठित होकर अपने अधिकारों और योजनाओं में हिस्सेदारी की मांग भी नहीं कर पाते.

धान और दलहन इस इलाके की सबसे प्रमुख फसलें थीं. लेकिन अब वे सपना हो गई हैं. कभी पानी उतरा तो मक्के की फसल हो जाती है वरना वह भी नहीं. बहुसंख्यक आबादी मछली बेचकर जीवन गुजारती है. पहले जिनके पास खेत नहीं होते वे मवेशी पालकर इसकी भरपाई कर लेते थे. लेकिन जलजमाव ने चरागाहों और घास के मैदानों को तबाह करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है. अब पशुपालन से होने वाली आय की संभावना भी खत्म हो गई है. यहां निश्चितता सिर्फ घोंघों को लेकर है, जो भरपूर मिलते हैं और लोगों के भोजन में वे लगभग नियमित जगह पा गए हैं. घोंघों के अलावा यहां लगभग हर घर में एक जैसा ही भोजन बनता है, मक्के की रोटी और नमक के साथ लाल मिर्च.

लेकिन इस जलजमाव में एक फसल खूब लहलहा रही है. वह है कालाजार की फसल. पानी जमा होने के कारण मच्छर इस इलाके में भरपूर संख्या में मिलते हैं. अर्जुन सदा पास के दिघिया घाट के हैं. उनके अपने 10 परिजनों की मौत कालाजार से हुई है- पांच भाई, पत्नी, दो बेटियां, भाभी और पिता धनिक सदा. अकेले इस गांव में पिछले एक साल में 40 से अधिक मौतें कालाजार से हुई हैं. 90 परिवारों वाले दलितों के इस गांव में कोई भी परिवार ऐसा नहीं है जिसके किसी न किसी सदस्य की मौत हाल के कुछ वर्षों में कालाजार से नहीं हुई हो. लेकिन इन गांवों में कालाजार से मरने वाले लोगों का कोई लेखा-जोखा सरकार के पास नहीं है. प्रखंड का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ऐसी मौतों को दर्ज नहीं करता. इसी तरह डूबकर मरने, सांप के काटने से मौत और बीमारी से होने वाली मौतें भी कहीं दर्ज ही नहीं हैं. उनके ब्योरे सिर्फ गांव के लोगों को याद हैं.

दूसरे राज्यों में गए लोगों की बीमारी या दुर्घटना से जब मौत हो जाती है तो इसकी खबर तक उनके गांव नहीं पहुंच पाती. दिघिया के महेंद्र सदा बताते हैं, ‘पंजाब, हरियाणा से जब पुलिस लावारिश लाशों की सूची लेकर आती है तो वह पटना से ही लौट जाती है. ढाई सौ किलोमीटर दूर रह रहे गांववालों को जिंदगी भर अपनों की मौत की पक्की खबर नहीं मिल पाती.’ जाहिर है कि लापता लोगों की संख्या भी इस इलाके में बहुत अधिक है. रघुनाथ सदा कहते हैं, ‘असमय मौत इस इलाके में एक रूटीन खबर की तरह है.’

उजवा से बारह किलोमीटर पैदल चलने पर आता है घोंघेपुर गांव. कोसी पर बना पश्चिमी तटबंध यहीं खत्म होता है. यह घोंघेपुर दरभंगा जिले के कीरतपुर प्रखंड में पड़ता है. यहां तीन जिलों सहरसा, मधुबनी और दरभंगा की सीमाएं आकर मिलती हैं. मुसलमानों और मुसहर महादलितों का गांव भुभोल शेख भी यहीं है. तटबंध और नदियों के पानी को यहां पहुंचे आधी सदी हो चुकी है, लेकिन कोई सरकारी योजना अब तक इस गांव में नहीं पहुंची है. भूमिहीनों के इस गांव में पलायन और सूद पर लिए गए कर्जे ही जिंदगी को आगे बढ़ाते हैं. यहां की निवासी गुलशन परवीन का परिवार दस लोगों का है. उनके पति बाहर रहते हैं और वहां से कमाकर जो वे भेजते हैं वह सारी रकम इलाज और लिए गए कर्ज का सूद चुकाने में चली जाती है. यहां की रहीमा खातून बताती हैं, ‘गांव के 11 आदमियों से पाली गांव के पंचायत सेवक गंगा पासवान ने इंदिरा आवास के नाम पर दो-दो हजार रुपए लिए. लेकिन किसी को अब तक घर नहीं मिला.’ जिन लोगों ने कर्ज लेकर पंचायत सेवक को रिश्वत दी थी वे अब पंजाब-हरियाणा में मजदूरी करते उसका सूद चुका रहे हैं.

गांव में मुसहरों के 70 परिवार हैं. भूखे, निर्धन और फटेहाल परिवार. यही हालत कीरतपुर में भी है. कीरतपुर, 1967 से विधायक और मंत्री रहे महावीर प्रसाद यादव का गांव है. लेकिन इसमें और दूसरे गांवों में कोई फर्क नहीं. यहां भी नाव से ही पहुंचा जा सकता है. बेघरों और बेरोजगारों की संख्या यहां भी उतनी ही है. पलायन और कुपोषण यहां भी है. बीमारियों का इलाज यहां भी दैवी ताकतों और जंगली जड़ी-बूटियों पर अधिक निर्भर है.

जिस इलाके में सामाजिक संगठनों का अभाव हो वहां भ्रष्टाचार का हदें पार कर जाना सामान्य बात है. इन इलाकों में चल रही सभी सरकारी योजनाएं भ्रष्टाचार के चलते दम तोड़ चुकी हैं.

इसी प्रखंड में बूढ़ी इनायतपुर पंचायत के मुखिया सुधीर कुमार के प्रति लोगों में काफी रोष है. ग्रामीणों का आरोप है कि इतनी बदहाली के बावजूद उन्हें किसी योजना का लाभ नहीं मिलता. सभी योजनाओं की राशि, अनाज और राहत सामग्री प्रखंड अधिकारी और मुखिया मिलकर आपस में बांट लेते हैं. हालांकि सुधीर कुमार इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं, ‘इलाके में इतनी गरीबी है कि सबको भरपेट भोजन रिलीफ फंड से नहीं दिया जा सकता है.’ वे महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में राशि गबन करने के आरोपों को भी खारिज करते हैं. लेकिन इस पंचायत में मनरेगा के तहत 100 से अधिक लोगों के दो लाख सतहत्तर हजार रुपए की राशि को अवैध ढंग से निकाल लेने की सूची तहलका के पास है. यहां 97 महिलाओं ने आरोप लगाया है कि उनसे काम करवा लिया गया और पैसा नहीं दिया गया. दूसरी सरकारी योजनाओं अंत्योदय अनाज योजना, इंदिरा आवास योजना, वृद्धावस्था पेंशन योजना, फसल क्षति पूर्ति योजना, विधवा पेंशन योजनाओं आदि का जमीन पर पता नहीं है. बूढ़े इनायतपुर पंचायत के 120 लोगों ने वृद्धावस्थापेंशन के लिए 2007 में ही आवेदन प्रखंड विकास पदाधिकारी को दिया गया था, लेकिन पेंशन आज तक नहीं मिली है जबकि आवेदन देने वालों में से कम से कम आठ लोगों की इस दौरान मृत्यु ही हो गई. लोगों की बदहाली को थोड़ा कम किया जा सकता था, अगर योजनाएं ढंग से काम करतीं. लेकिन कोसी तटबंध के गांवों में सरकारी योजनाओं में लूट के हजारों किस्से हैं.

90 परिवारों वाले दलितों के इस गांव में कोई भी परिवार ऐसा नहीं है जिसके किसी न किसी सदस्य की मौत हाल के कुछ वर्षों में कालाजार से नहीं हुई हो

ऐसी बदहाली परिवारों को तोड़ रही है, रिश्तों को कमजोर कर रही है. कुशेश्वरस्थान से बनारस और भदोही के लिए सीधी बसें चलती हैं. इन बसों में भरकर बच्चे कालीन उद्योगों और दियासलाई के कारखानों में काम करने के लिए भेजे जाते हैं. फैक्टरी के दलाल कर्ज में गले तक डूबे माता-पिताओं के हाथ में कुछ सौ रुपए थमाकर बच्चों को ले जाते हैं. कुशेश्वरस्थान में बालमुक्ति अभियान के कार्यकर्ता घुरन सदा के अनुसार यहां बच्चों को बेचने के सैकड़ों मामले भी सामने आए हैं.

जलजमाव के इस संकट पर लगभग हर विधानसभा सत्र में चर्चा होती है लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकलता. दो दशक पहले राज्य सरकार ने इस इलाके को बर्ड सेंक्चुरी बनाने की घोषणा की थी, जिसके तहत यहां पर्यटन को भी बढ़ावा दिया जाना था. लेकिन दिनेश कुमार मिश्र इससे सहमत नहीं हैं. वे कहते हैं, ‘पीसा की मीनार का टेढ़ा होना ढांचागत नाकामी थी. यह इंजीनियरों की गलती थी. लेकिन इस पर शर्म करने की बजाय गर्व किया गया. इससे पैसा बनाया जाने लगा. इसी तरह यह जलजमाव एक बड़ी ढांचागत नाकामी है, जिस पर शर्म की जानी चाहिए. सरकार इसे भी पीसा की मीनार बनाना चाहती है. इसके नतीजे बहुत बुरे होंगे. पर्यटन के साथ फैलने वाली बुराइयां भी फैलेगी जैसे- वेश्यावृत्ति.

इसके एक समाधान के रूप में पिछले कुछ समय से मांग की जा रही है कि खगड़िया के अलौली प्रखंड के फुहिया गांव में तीनों नदियों पर तटबंध बनाकर उन्हें वहां पहुंचा दिया जाए. लेकिन मिश्र इसके और भी बुरे नतीजों की ओर इशारा करते हैं, ‘यह समस्या का कोई समाधान नहीं है. बल्कि भविष्य में यह संकट को और बढ़ाएगा क्योंकि तब वर्षा के पानी को निकलने के लिए रास्ता नहीं मिलेगा और फिर नया जलजमाव शुरू हो जाएगा.’

इस यातना से भरे त्रासद जीवन से निजात दिलाने की जिनसे उम्मीद की जाती है वे पूरी तरह संवेदनहीन हो चुके हैं. उन्हेंे गेंद को एक-दूसरे के पाले में फेंकने के सिवा कोई रास्ता नहीं दिखता. झंझारपुर से जदयू के विधान पार्षद विनोद सिंह इस त्रासदी के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार मानते हैं. वे कहते हैं, ‘तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने परियोजना का विरोध कर रहे लोगों को आश्वासन दिया था कि तटबंध के भीतर और कछार पर पड़ने वाले गांवों को पुनर्वासित किया जाएगा. कुछ गांवों को पुनर्वासित किया गया लेकिन सैकड़ों गांव आज तक पुनर्वासित नहीं हो सके. जिसके कारण इस क्षेत्र की स्थिति विकराल बनी हुई है.’

वहीं कोसी प्रभावित सिंघिया विधानसभा क्षेत्र के विधायक व कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक कुमार इससे सहमत नहीं हैं. उनका कहना है, ‘कोसी क्षेत्र के लोग बिहार सरकार के भरोसे नहीं बल्कि भगवान के भरोसे जीते हैं. लालू और नीतीश सरकारों ने तो इनका बेड़ा गर्क कर दिया है. केंद्र पोषित कोई भी योजना तटबंध के भीतर लागू नहीं हो पाई है. स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और थाने सब कागज पर चलते हैं.’

और इन सबके बीच रामचंद्र सदा हमेशा के लिए पंजाब से लौट आए हैं. वे अब कोई काम नहीं कर पाते. पत्नी की ही तरह उन्हें भी एक अनजान-सी बीमारी है. उनके पास उतने पैसे नहीं हैं कि वे डॉक्टर को दिखा सकें. दिन ब दिन बढ़ती जा रही कमजोरी उन्हें उनकी पत्नी की मौत की याद दिलाती है.

रामचंद्र दलितों के उस तबके से आते हैं जिसे सरकार ने महादलित घोषित कर रखा है. पटना में बैठे विशेषज्ञ मान रहे हैं कि विधानसभा चुनाव में जीत-हार का दारोमदार महादलितों के वोटों के झुकाव पर भी निर्भर करेगा. लेकिन शायद रामचंद्र सदा के लिए इसका कोई मतलब नहीं है. उनके साथ ही कोसी क्षेत्र के उन 12 लाख दूसरे लोगों के लिए भी, जो इस बार का वोट भी नाव पर चढ़कर देने जाएंगे या हो सकता है न भी जाएं.

'…पर क्या आजाद भारत किसी लिहाज से संपूर्ण है?'

आपने दिल्ली और कश्मीर में जो बयान दिए उनके आधार पर सरकार आपके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलाने पर विचार कर रही है. राजद्रोह आपकी नजर में क्या है? क्या आप खुद को राष्ट्रद्रोही मानती हैं? दिल्ली और श्रीनगर में ऐसे मंच से बयान देने के पीछे आपकी मंशा क्या थी जिसका शीर्षक था – आजादी: द ओनली वे?

राजद्रोह एक आदिम और लुप्तप्राय विचार है जिसे टाइम्स नाउ ने हमारे लिए दोबारा से जिंदा कर दिया है. चैनल पागलों की तरह मेरे पीछे पड़ा हुआ है और मुझे भीड़ के गुस्से के हवाले कर देना चाहता है. मेरी बिसात क्या है? इतने बड़े चैनल के लिए एक तिनका. इस तरह के माहौल में किसी लेखक को जान से मार देना बड़ी बात नहीं है, लगता है चैनल यही करना चाहता है. अगर मैं सरकार होती तो थोड़ा-सा रुककर पूछती कि कैसे एक टीवी चैनल इतने आदिम विचारों के सहारे इस तरह की हलचल मचाने और सबको अंतर्राष्ट्रीय शर्मिंदगी की राह पर ले जाने में सफल हुआ. इस वजह से कश्मीर मुद्दे का काफी हद तक अंतर्राष्ट्रीयकरण हो गया है. एक ऐसी स्थिति जिससे भारत सरकार बचना चाहती रही है.

ऐसा इसलिए भी हुआ कि भाजपा किसी भी सूरत में इंद्रेश कुमार को आरोपित करने के मामले से ध्यान भटकाना चाहती थी. उन्हें बिलकुल सटीक मौका मिल गया और टाइम्स नाउ की अगुआई में मीडिया की  मुराद पूरी हो गई. मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि मैं राजद्रोह कर रही हूं. दिल्ली के सेमिनार में शामिल होने के लिए मैंने तब हामी भरी थी जब इसका शीर्षक भी तय नहीं हुआ था. मेरे खयाल से यह उनके लिए थोड़ा उत्तेजक था जो ऐसा होने के लिए तैयार ही बैठे थे. आधी सदी से भी ज्यादा समय से कश्मीर में जो चल रहा है उसे देखते हुए मुझे यह कोई बड़ी बात नहीं लगती. श्रीनगर में आयोजित सेमिनार का विषय था- ‘कश्मीर किस ओर? दासता या आजादी?’ यह इसलिए था कि कश्मीरी युवा इस बात पर गहराई से बहस कर सकें कि उनके लिए आजादी का मतलब क्या है.  इसका मकसद लोगों को हथियार उठाने के लिए भड़काने से उलट विचार करना और  बहस को और भी संजीदा बनाना और असहज सवाल पूछना था.

आपने सैयद अली शाह गिलानी और वारवरा राव के साथ मंच साझा करने का फैसला क्यों किया? यदि आपने यह बयान व्यक्तिगत तौर पर एक लेखक के नाते दिया होता तो शायद लोग इसे ऐसे न लेते.

यह आम लोगों का मंच था जो किसी सरकारी तंत्र का हिस्सा नहीं हैं. इनके अपने-अपने व्यक्तिगत विचार हैं. वारवरा राव और गिलानी दो बिलकुल अलग विचारधाराओं के लोग हैं. यह अपने आप में इस बात का सबूत है कि वहां अलग-अलग सोच के लोग मौजूद थे. मैंने ऐसा तो नहीं कहा कि मैं हुर्रियत (गिलानी) या फिर सीपीआई (माओवादी) से जुड़ने जा रही हूं. मैंने वही कहा जो मैं सोचती हूं.

आखिर कितने लोगों ने रतन टाटा और मुकेश अंबानी से तब सवाल किए जब उन्होंने नरेंद्र मोदी से गुजरात गरिमा पुरस्कार ग्रहण किया और उन्हें गले लगाया

गिलानी बेहद मुखर पाकिस्तान समर्थक, शरिया समर्थक और जमात समर्थक हैं. अतीत में उनके हिज्बुल से रिश्ते रहे हैं, कश्मीर की अंदरूनी राजनीति में उनकी हिंसक भूमिका रही है. कश्मीर के बारे में नजरिया रखना अलग बात है लेकिन गिलानी के साथ मिलकर ऐसा करने की क्या जरूरत थी? आप भारत सरकार की तरह गिलानी की भी निंदा क्यों नहीं करतीं?

बहुत-से ऐसे कश्मीरी हैं जो गिलानी के विचारों से सहमत नहीं हैं लेकिन उनकी इज्जत करते हैं क्योंकि उन्होंने खुद को भारत के हाथों बेचा नहीं. खुद मैं उनकी कई बातों से इत्तेफाक नहीं रखती, मैंने इनके बारे में लिखा भी है. जब मैं बोल रही थी उस वक्त भी मैंने यह बात साफ कर दी थी. अगर वे एक देश के प्रमुख हों जहां मैं रहती हूं और वे अपने विचार मुझ पर थोपें तो मुझसे जितना बन पड़ेगा उनका विरोध करूंगी.

लेकिन जैसे हालात आज कश्मीर में हैं, उनकी तुलना भारत से करना और उसी अनुपात में उनकी आलोचना करना मेरे खयाल से हास्यास्पद है. भारत सरकार, सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के सदस्य और हाल ही में गए वार्ताकार, सबको पता है कि कश्मीर में जो हो रहा है गिलानी की उसमें अहम भूमिका है. जहां तक कश्मीर के अंदरूनी संघर्ष के पीछे उनकी भूमिका की बात है तो यह भी एक सच्चाई है. नब्बे के दशक में वहां भयावह घटनाएं हुईं, दिल दहलाने वाली हत्याएं हुईं, कुछ में तो गिलानी को अरोपी भी बनाया गया. लेकिन आंतरिक वर्चस्व का संघर्ष हर आंदोलन का हिस्सा होता है. आप इसकी तुलना राज्य प्रायोजित हिंसा से नहीं कर सकतीं. दक्षिण अफ्रीका में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस और काले समूहों के बीच हिंसक संघर्ष हुए जिसमें स्टीव बीको सहित सैकड़ों लोग मारे गए. तो क्या आप यह कहेंगी कि नेल्सन मंडेला के साथ किसी मंच पर बैठना अपराध है?

लेकिन सेमिनारों के जरिए उनके किए पर सवाल उठाकर, लेख लिखकर उनमें बदलाव लाने के प्रयास किए जा रहे हैं. वे अब जो बातें कहते हैं उनमें और पहले में काफी अंतर है. लेकिन मुझे यह अजीब लग रहा है कि आखिर कितने लोगों ने रतन टाटा और मुकेश अंबानी से तब सवाल किए जब उन्होंने नरेंद्र मोदी से गुजरात गरिमा पुरस्कार ग्रहण किया और उन्हें गले लगाया. वह तो कोई सेमिनार नहीं था… उन्होंने मोदी को महान प्रधानमंत्री के लायक बताया. यह सही है?

यही तर्क तो वारवरा राव पर भी लागू हो सकता है. वे आपकी तरह सामाजिक न्याय की बात और भारत राज्य की आलोचना कर सकते हैं. लेकिन माओवादी दर्शन में क्रांति का रास्ता हथियार और हिंसा से निकलता है. जबकि आप ऐसा नहीं सोचतीं. तो ऐसे में जब कश्मीर में स्थितियां नाजुक हैं आपने राव और गिलानी के साथ मंच साझा करने का विकल्प क्यों चुना?

माओवादियों के बारे में मैंने अपने विचार काफी विस्तार से लिखे हैं और यहां एक वाक्य में उसका वर्णन नहीं कर सकती. मैं वारवरा राव की कई बातों के लिए प्रशंसा करती हूं. हालांकि मैं उनकी हर बात से सहमत नहीं हूं. लेकिन आज मैं माओवाद और कश्मीर की हालत पर जो भी कह रही हूं वह मौजूदा संवेदनशील समय को देखते हुए बेहद जरूरी है, विशेषकर तब जब हमारा मीडिया भ्रांतियां फैलाने की मशीन बन गया है. यह लोगों के दिमाग को कुंद करने की कोशिश में लगा है. ये किताबी बातें नहीं हैं; ये आम जनता के जीवन, उसकी सुरक्षा और सम्मान से जुड़े मसले हैं.

मैंने कभी भारतीय सेना को बलात्कारियों का संस्थान नहीं कहा. मैंने सिर्फ यह कहा था कि सभी औपनिवेशिक ताकतें अपनी सत्ता की स्थापना स्थानीय निवासियों के एक कुलीन समूह द्वारा करती हैं

आप एक बार फिर से राष्ट्र और उसको हासिल ताकत की आलोचना कर रही हैं. आप ऐसे व्यक्ति का समर्थन क्यों कर रही हैं जो कश्मीर को भारत से छीनकर पाकिस्तान में मिलाना चाहता है, जो हमसे भी ज्यादा अराजक और अस्थिर है?

क्या आप मुझे एक भी ऐसा सबूत दे सकती हैं जिसमें मैंने कश्मीर को भारत से छीनकर पाकिस्तान से मिलाने का समर्थन किया हो? क्या सिर्फ गिलानी ही कश्मीर में आजादी की मांग कर रहे हैं? मैं कश्मीरी जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन कर रही हूं. यह गिलानी का समर्थन करने से अलग है.

और अब सवाल के दूसरे हिस्से का जवाब- हां, मैं उन लोगों में हूं जिन्हें राष्ट्र के विचार से परेशानी होती है लेकिन यह सवाल पहले उन लोगों से पूछा जाना चाहिए जो सुरक्षित व सुखमय जीवन बिता रहे हैं न कि उन लोगों से जो बर्बर कब्जे को उखाड़ फेंकने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. हो सकता है आजाद कश्मीर एक असफल राज्य बनकर रह जाए, पर क्या आजाद भारत किसी लिहाज से संपूर्ण है? क्या आज हम कश्मीरियों से वही सवाल नहीं पूछ रहे हैं जो कभी हमसे हमारे साम्राज्यवादी शासक पूछा करते थे – क्या यहां के लोग आजादी के लिए तैयार हैं?

सारा विवाद आपके भाषण के सिर्फ एक हिस्से से पैदा हुआ है-  ‘कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं है. यह ऐतिहासिक सच्चाई है.’  आपने ऐसा किस आधार पर कहा (क्योंकि इतिहास और वास्तविक शिकायतें दो अलग-अलग चीजें हैं)?

इतिहास सबको पता है. मैं यहां लोगों को प्राइमरी स्तर का इतिहास बताने नहीं जा रही हूं. क्या यह बात सही नहीं है कि जिन संदिग्ध परिस्थितियों में कश्मीर का विलय भारत में हुआ वह मौजूदा विवाद की वजह है? आखिर भारत सरकार ने वहां सात लाख सुरक्षा बल क्यों तैनात कर रखे हैं? आखिर आपके वार्ताकार क्यों आजादी के रोडमैप की बात कर रहे हैं या इसे विवादित क्षेत्र कह रहे हैं? जब भी हमारे सामने कश्मीर की जमीनी हकीकत आती है, हम आंखें क्यों फेर लेते हैं?

जो लोग आपके अभिव्यक्ति के अधिकार का समर्थन कर रहे हैं उनमें भी कइयों का मानना है कि आपका बयान दूसरे तरीके से आ सकता था मसलन- ‘कश्मीरी खुद को भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं मानते’, या फिर ‘कश्मीरी आत्मनिर्णय का अधिकार चाहते हैं जो उन्हें मिलना चाहिए.’

अगर यही बात अंग्रेज कहते कि ‘भारतीय भले ही खुद को ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा नहीं मानते हों लेकिन भारत ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा है’ तब हमें कैसा लगता? मेरे ये शुभचिंतक क्या नहीं जानते कि आम आदमी का अपनी जमीन से किस तरह का जुड़ाव होता है? क्या यही सुझाव बस्तर के आदिवासियों पर भी लागू होता है? क्या उन्हें ऐसा सोचने की आजादी है कि वे भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं है, लेकिन उनकी प्रचुर संपदा वाली जमीनें भारत का हिस्सा हैं? आदिवासी अपनी सारी परंपरा और विचार लेकर शहरी झुग्गियों में चले जाएं और अपनी जमीनें खनन कंपनियों के हवाले छोड़ दें?

आजादी के बारे में आपकी क्या राय है? आप राष्ट्र के सिद्धांत की आलोचना करती हैं तो फिर एक नए राष्ट्र के निर्माण का समर्थन कैसे कर रही हैं? आप एक ऐसे देश का विचार रख सकती हैं जिसमें सीमाएं महत्वहीन हों, पहचान का मुद्दा गौण हो.

मैं आजादी को किस तरह परिभाषित करती हूं यह बात मायने नहीं रखती. मायने रखता है कश्मीरी लोग इसे किस रूप में देखते हैं. जहां तक राष्ट्र को लेकर मेरे आलोचनात्मक नजरिए का सवाल है तो इसे कमजोर करने की प्रक्रिया हमें अपने घर से शुरू करनी होगी. नाभिकीय हथियारों को नष्ट कर, झंडे को खत्म करके, सेना को बैरक में भेजकर और राष्ट्रवादी नारेबाजी पर पाबंदी लगाकर. तभी हम दूसरों को भाषण दे सकते हैं.

आपके ऊपर आरोप है कि आपने लोगों से सेना में भर्ती होकर बलात्कारी न बनने की अपील की. यह एक सेना जैसे बड़े संस्थान को एक बड़े ब्रश से बिना देखे रंगने सरीखा है. क्या आपके बयान को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया? क्या आप बता सकती हैं कि आपने अपने भाषण में क्या कहा था?

मैं जो कहती हूं उसे न जाने कितनी बार तोड़ा-मरोड़ा गया है. मैंने कभी वह नहीं कहा जिसे टीवी की बहस दर बहस मेरे द्वारा कहा बताया जा रहा है. कई बार तो ऐसा जान-बूझकर किया गया. द पायनियर ने हेडलाइन दी कि मैंने कश्मीर को ‘भूखे नंगे हिंदुस्तान’ से अलग करने की वकालत की है. मैंने जो कहा और लिखा था वह इसके बिलकुल उलट था. 2008 में कश्मीर की सड़कों पर जब मैंने नारा सुना ‘भूखा, नंगा हिंदुस्तान, जान से प्यारा पाकिस्तान’ तब मुझे बहुत दुख हुआ था. मैंने कहा था कि इस घटना से मुझे बहुत धक्का लगा कि कश्मीरी उन लोगों का मजाक उड़ा रहे हैं जो उसी राज्य के हाथों पीड़ित थे जिनसे कि खुद कश्मीरी. मैंने कहा कि यह सतही राजनीति है. मुझे पता है कि इसके बाद भी द पायनियर मुझसे माफी नहीं मांगेगा. वे अपना झूठ जारी रखेंगे. पहले भी उन्होंने यही किया है. मैंने कभी भी भारतीय सेना को बलात्कारियों का संस्थान नहीं कहा. मैं कोई पागल नहीं हूं. मैंने सिर्फ यह कहा था कि सभी औपनिवेशिक ताकतें अपनी सत्ता की स्थापना स्थानीय निवासियों के एक कुलीन समूह द्वारा करती हैं. कश्मीर में भी यही हुआ है. वे कश्मीरी ही हैं जो स्थानीय पुलिस, सीआरपीएफ और सेना आदि में शामिल होकर खुद पर कब्जा जमाने वाली ताकत का साथ दे रहे हैं. मैंने कहा था कि अगर वे लोग इस कब्जा जमाने वाली ताकत को खत्म करना चाहते हैं तो उन्हें पुलिस में भर्ती नहीं होना चाहिए. इस तरह का मूर्खतापूर्ण घालमेल और बेतुकापन बेहद खतरनाक है. कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरी लड़ाई इसी मूर्खपने से है. जो कुछ आज टीवी पर दिखाया जा रहा है उसे अगर देश की बुद्धिमत्ता का पैमाना मान लें तो हम गंभीर संकट में हैं. आवाज का स्तर आईक्यू के स्तर का व्युत्क्रमानुपाती होता है. किस्मत से मैं खूब यात्राएं करती हूं और हर दिन ढेरों लोगों से बातचीत करने पर लगता है कि स्थितियां इतनी बुरी नहीं हैं.

आपके आलोचक हमेशा आपके ऊपर यह आरोप लगाते हैं कि आप कश्मीरी पंडितों के प्रति कभी संवेदना नहीं दिखातीं.

मेरे आलोचकों को मेरा लिखा पढ़ना चाहिए और मैं जो बोलती हूं उसे सुनना चाहिए. यहां मैं एक बात साफ कर दूं- कश्मीरी पंडितों के साथ जो हुआ वह बेहद दुखद है. मेरा मानना है कि कश्मीरी पंडितों की दुखद कहानी की पूरी जटिलताओं को सामने लाने का काम अभी बाकी है. इसमें सबकी गलती थी, आतंकवाद की, घाटी में इस्लामी विद्रोह की और भारत सरकार की भी जिसने घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन को शह दी जबकि उसे उन्हें हर हालत में सुरक्षा देनी चाहिए थी. गरीब कश्मीरी पंडित आज भी जम्मू के विस्थापन शिविरों में नारकीय जीवन जी रहे हैं. उनके अधिकारों की लड़ाई पर कुछ धूर्त नेताओं का कब्जा हो गया है. इन लोगों को गरीब बनाए रखने में इनका हित छिपा है. चिड़ियाघर के जानवरों की तरह ये इनकी गरीबी की नुमाइश करते रहते हैं. अगर सरकार ईमानदारी से चाहती तो क्या इन लोगों की दुर्दशा को दूर नहीं किया जा सकता था? मैं जब भी कश्मीर जाती हूं मुझे इस बात का एहसास होता है कि पंडितों के जाने का आम कश्मीरी मुसलमानों को गहरा दुख है. अगर यह बात सही है तो कश्मीर संघर्ष के मौजूदा नेताओं की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे पंडितों की वापसी के प्रयास करें. सिर्फ भाषणबाजी से काम नहीं चलेगा. इससे सिर्फ एक बढ़िया काम का संतोष ही नहीं मिलेगा बल्कि उनके संघर्ष को जबर्दस्त नैतिक बल भी मिलेगा. इससे उनके उस कश्मीर के विचार को भी एक आकार मिलेगा जिसके लिए वे संघर्ष कर रहे हैं. यहां इस बात को ध्यान में रखना होगा कि पंडितों की थोड़ी आबादी अभी भी घाटी में तमाम संकटों के बावजूद रह रही है, उन्हें किसी ने नुकसान भी नहीं पहुंचाया है.

भारत और उसकी क्षमताओं के प्रति आपके नकारात्मक रुख और विश्वासघाती रवैए के चलते लोग आपकी आलोचना करते हैं, बावजूद इसके कि आप इसकी सभी सुविधाओं का पूरा फायदा भी उठाती हैं. भारत के साथ आप अपने संबंधों को किस तरह से परिभाषित करेंगी?

अपने आलोचकों से मैं ऊब चुकी हूं. वे खुद ही इसका फैसला कर सकते हैं. मैं इस देश और यहां के लोगों के साथ अपने संबंधों की व्याख्या नहीं कर सकती. मैं कोई नेता नहीं हूं जिसे इन सबसे कोई फायदा उठाना है.