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वडोदरा, गुजरात

Saranआज भले ही वे दो ध्रुवों पर हों, लेकिन एक समय था जब वे एक ही धुरी पर घूमते थे. भाजपा से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और वडोदरा लोकसभा सीट पर उन्हें चुनौती देने उतरे कांग्रेस महासचिव मधुसूदन मिस्त्री, दोनों का ही संघ से पुराना नाता रहा है. मोदी 80 के दशक में संघ से राजनीति में आए तो मिस्त्री ने तब राजनीति का दामन थामा जब 1995 में शंकर सिंह बाघेला ने गुजरात भाजपा से बगावत की और राष्ट्रीय जनता पार्टी बनाई. 1999 में इसका कांग्रेस में विलय हो गया और मिस्त्री भी कांग्रेस में आ गए. साझा अतीत के अलावा दोनों विरोधियों में और भी कई समानताएं हैं. मोदी और मिस्त्री दोनों ही जमीनी राजनीति और चुनावी प्रबंधन में माहिर हैं. यही नहीं, गुरु गुड़ ही रहा और चेला शक्कर हो गया की कहावत को दोनों ने चरितार्थ किया है. मोदी, अपने राजनीतिक गुरू लालकृष्ण आडवाणी को पीछे छोड़ चुके हैं और मिस्त्री वाघेला को.

लोकसभा चुनाव के रण में पहली बार और वह भी प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा लिए उतर रहे मोदी के लिए वडोदरा शायद सबसे जोखिम रहित सीट है. 1996-98 के अपवाद को छोड़ दें तो 1991 से लेकर आज तक यह उनकी पार्टी के पास ही रही है. 1991 में यहां से भाजपा ने दीपिका चिखलिया को मैदान में उतारा था जो तब तक रामानंद सागर के धारावाहिक रामायण में सीता की भूमिका करके काफी मशहूर हो चुकी थीं. राम मंदिर लहर ने सीता मैय्या को संसद पहुंचाया और वडोदरा को लंबे समय के लिए भाजपा के पाले में. 2009 में पार्टी के बालकृष्ण शुक्ला ने यह सीट करीब डेढ़ लाख वोटों के विशाल अंतर से जीती थी. वडोदरा में पड़ने वाली 10 विधानसभा सीटों में से नौ भाजपा के पास हैं. शहर के भाजपाई कहने भी लगे हैं कि वाराणसी और वडोदरा, दोनों की स्पेलिंग वी से शुरू होती है इसलिए मोदी के लिए वी से ही शुरू होने वाली विक्टरी यानी विजय तय हो गई है.

लेकिन क्या ऐसा वास्तव में है? वडोदरा से पहले कांग्रेस ने नरेंद्र रावत को टिकट दिया था. वे पार्टी विकेंद्रीकरण के लिए चलाई जा रही राहुल गांधी की खास कवायद प्राइमरीज के जरिये चुनकर आए थे. लेकिन जब मोदी ने यहां से उम्मीदवारी की घोषणा कर दी तो रावत ने दौड़ से हटने का फैसला कर लिया. माना जा रहा है कि कांग्रेस यह संदेश नहीं देना चाहती थी कि वह मोदी को आसान लड़ाई दे रही है इसलिए उसने मिस्त्री को मैदान में उतारा है. राहुल गांधी के काफी करीबी माने जाने वाले मिस्त्री को चुनाव प्रबंधन की कला में भी माहिर माना जाता है. 2011 में केरल और 2013 में कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत का श्रेय उनकी रणनीतियों को दिया जाता है. बताते हैं कि 2004 में गुजरात की साबरकांठा लोकसभा सीट पर मिस्त्री को हराने के लिए मोदी और उनके सबसे विश्वस्त सिपहसालार अमित शाह की जोड़ी ने पूरा जोर लगा दिया था, लेकिन वे नाकामयाब रहे. हालांकि 2009 में यह जोड़ी मिस्त्री पर भारी पड़ी. इस बार क्या होगा, देखना दिलचस्प होगा. टिकट मिलने के बाद मिस्त्री का कहना था, ‘मैं काफी सालों से इस मौके का इंतजार कर रहा था.  मोदी को वडोदरा से चुनाव लड़ने दीजिए. मैं भी वहां से लडूंगा और उन्हें हराऊंगा.’

लेकिन उत्तरी गुजरात के साबरकांठा या बनासकांठा जैसे आदिवासी इलाकों में मजबूत पकड़ रखने वाले मिस्त्री वडोदरा जैसे शहरी इलाके में कितने वोट खींच पाएंगे? अहमदाबाद में सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक हरिणेश पंड्या एक अखबार से बातचीत में कहते हैं, ‘ अब मुद्दा यह नहीं है कि वडोदरा में कौन जीतेगा या हारेगा, बल्कि यह है कि अब यहां वास्तव में एक मुकाबला होगा जिसे मोदी को भी गंभीरता से लेना होगा. अब यहां उन्हें वॉकओवर जैसी स्थिति नहीं रही.’ अब वाराणसी और वडोदरा, दोनों ही मोर्चों को मोदी हलके में नहीं ले सकते. यहां उन्हें पहले से ज्यादा ऊर्जा खर्च करनी पड़ेगी जिसका असर देश में बाकी जगहों पर उनके अभियान पर पड़ेगा.

यह भी दिलचस्प है कि भाजपा से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और कांग्रेस महासचिव मधुसूदन मिस्त्री की भिड़ंत कई तरह से हो रही है. वडोदरा में दोनों सीधे लड़ रहे हैं तो कई मोर्चों पर उनकी लड़ाई अप्रत्यक्ष है. मिस्त्री पर दिल्ली की गद्दी के लिए अहम माने जाने वाले उस उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस की नैय्या पार लगाने का जिम्मा है जहां से लोकसभा की 80 सीटें आती हैं. इसी सूबे में भाजपा की जिम्मेदारी उन अमित शाह ने संभाली हुई है जिन पर आज मोदी सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं. वे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व वाली पांच सदस्यीय चुनाव समन्वय समिति में भी हैं. इसलिए उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश में कांग्रेस के टिकट वितरण पर उनका अहम प्रभाव रहा है. उधर, देश भर में भाजपा पर छाए मोदी प्रभाव पर तो शायद ही किसी को शक हो. यानी लड़ाई के कई पहलू हैं तो नतीजों के भी होंगे ही.

मथुरा, उत्तर प्रदेश

Mathuraबागपत के अलावा मथुरा संसदीय सीट भी जाटलैंड की हॉट सीट मानी जाती है. अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी यहां के सांसद हैं. लेकिन मशहूर फिल्म अदाकारा हेमा मालिनी ने इस बार मथुरा को हॉट होने की एक और वजह दे दी है. ड्रीमगर्ल को भारतीय जनता पार्टी ने यहां से अपना उम्मीदवार बनाकर जयंत चौधरी के मुकाबले खड़ा किया है जिसके बाद से मथुरा लोकसभा सीट ग्लैमरस होने के साथ ही रोचक मुकाबले के लिए भी तैयार हो गई है.

इस सीट पर लोक दल का अच्छा खासा प्रभाव माना जाता है. काफी जद्दोजहद के बाद भी भाजपा यहां की जाट बिरादरी के वोट में सेंध नहीं लगा पा रही थी. हालांकि यहां से चुनाव लड़ने के लिए भाजपा के कई दिग्गजों ने दावेदारी की थी लेकिन पार्टी ने हेमा की ग्लैमरस छवि के साथ ही जाट पृष्ठभूमि वाले अभिनेता धर्मेंद्र की पत्नी होने के डबल डोज के सहारे ही मथुरा फतह की आस लगाई है.

जानकारों का मानना है कि इस रणनीति पर अगर ठीक से काम किया गया तो जयंत चौधरी के लिए मुकाबला मुश्किल हो सकता है. गौरतलब है कि कांग्रेस ने फिल्म अभिनेत्री नगमा को मेरठ से तथा आम आदमी पार्टी ने पूर्व टीवी एंकर शाजिया इल्मी को गाजियाबाद से उतार कर पश्चिम यूपी के चुनावी माहौल को पहले से ही ग्लैमरस कर दिया है. ऐसे में माना जा रहा है कि हेमामालिनी को मथुरा से उतार कर भाजपा मोदी लहर के साथ ही इस लहर का लाभ भी लेने की फिराक में हैं. एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पिछले लंबे वक्त से हेमा मालिनी इस इलाके में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुतियां देती रही हैं तथा राज्यसभा सदस्य रहते हुए अपनी सांसद निधि के कुछ हिस्से को वृंदावन तथा मथुरा में खर्च भी कर चुकी हैं. ऐसे में यह बात भी उनके पक्ष में जा सकती है.

हालांकि मथुरा संसदीय सीट का इतिहास टटोला जाए तो मालूम पड़ता है कि महिला प्रत्याशियों के लिए यहां की राजनीतिक जमीन कभी भी उपजाऊ नहीं रही है. 65 साल के संसदीय इतिहास में मथुरा से कोई भी महिला सांसद नहीं रही. यहां तक कि जाट बिरादरी के बड़े नेता चौधरी चरणसिंह की पत्नी गायत्री देवी और बेटी तक को यहां हार का सामना करना पड़ा है. इस लिहाज से देखा जाए तो हेमा मालिनी के लिए यह चुनाव बड़ी चुनौती है. ऐसे में अगर वे यहां से जीतती हैं तो यह एक रिकार्ड भी होगा. महत्वपूर्ण बात यह भी है कि 2009 में जयंत चौधरी ने मथुरा की सीट भाजपा की मदद से ही जीती थी. उन चुनावों में लोकदल ने भाजपा के साथ गठबंधन किया था. लेकिन इस बार पार्टी ने चुनावी बैतरणी पार करने के लिए कांग्रेस से हाथ मिलाया है. ऐसे में भाजपा ने भी हेमा को जिताने के लिए पूरा जोर लगाना शुरू कर दिया है. समाजवादी पार्टी और बसपा भी मथुरा सीट पर पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर चुके हैं. इसके अलावा आम आदमी पार्टी ने भी युवा प्रत्याशी अनुज गर्ग को टिकट थमा दिया है. ऐसे में मथुरा में चुनावी जंग के रोचक और रोमांचक होने के पूरे आसार बनते दिख रहे हैं.

उत्तर-पूर्व मुंबई, मुंबई

Mumbaiउत्तर-पूर्व मुंबई लोकसभा क्षेत्र से सबसे ज्यादा बार कांग्रेसी उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है. सात बार यह सीट कांग्रेस के खाते में गई है. जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी (1977 और 1980) को छोड़कर दूसरा कोई भी उम्मीदवार, इस सीट से लगातार दो बार लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाया है. इस बार लड़ाई, त्रिकोणीय दिखती है. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के नेता संजय दीन पाटिल यहां के मौजूदा सांसद हैं. पाटिल को भारतीय जनता पार्टी उम्मीदवार किरीट सोमैया और आम आदमी पार्टी की उम्मीदवार मेधा पाटकर से कड़ी चुनौती मिलने की संभावना है. 2009 में पाटिल ने केवल 3000 मतों के अंतर से जीत दर्ज की थी. तब यह सीट भाजपा के कब्जे में थी और किरीट सोमैया यहां से सांसद थे. इस चुनाव में मनसे के उम्मीदवार शिशिर शिंदे को दो लाख के आसपास वोट मिले थे और इसी वजह से भाजपा के उम्मीदवार की हार हुई थी. परंतु इस बार स्थिति राकांपा उम्मीदवार के खिलाफ जाती दिख रही हैं. इस चुनाव में मनसे ने अलग से अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है सो ऐसा माना जा रहा है कि भगवा वोट एकमुश्त भाजपा उम्मीदवार के खाते में जाएगा. वहीं दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी की मेधा पाटकर से भी राकांपा उम्मीदवार और मौजूदा सांसद संजय दीन पाटिल को नुकसान होता दिख रहा है. पाटकर को गरीब और झुग्गी वाले इलाकों से ज्यादा वोट मिलने की उम्मीद है और यह कांग्रेस-रांकपा का वोट बैंक है. अपनी उम्मीदवारी की घोषणा होने के बाद मेधा पाटकर ने मीडिया से बात करते हुए कहाथा, “उत्तर पूर्वी मुंबई के लोगों से हमारा पुराना जुड़ाव है. हमने साल 1976 से 1979 तक उस क्षेत्र में एक हिस्से में 80 हजार परिवारों के बीच काम किया है.”  मेधा पाटकर अपने आंदोलनों को लेकर इन इलाकों में वर्षों से सक्रिय रही है और वे मराठी भी हैं. इसलिए जानकार मानते हैं कि मेधा को अलग-अलग योजनाओं से विस्थापित हुए उत्तर भारतीयों, झुग्गियों में रहने वाले गरीब मुसलमानों और स्थानीय मराठियों के वोट भी मिल सकते हैं. कई सालों से मुंबई की राजनीति पर नजर रखने वाले स्वतंत्र पत्रकार अभिमन्यु सितोले का मानना है कि इस सीट पर लड़ाई आम आदमी पार्टी की मेधा पाटकर और भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार किरीट सोमैया के बीच ही होने वाली है. वे कहते हैं, ’देखिए…मेधा के आ जाने से इस सीट पर मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है. इस सीट पर हर किस्म के वोटर हैं. जैसे मेट्रो आदि की वजह से विस्थापित हुए लोगों का वोट है. झुग्गी में रह रहे लोगों के वोट हैं और शहरी मध्यमवर्गीय मतदाता तो है ही. और एक बात, गुजराती वोटर भी यहां अच्छी संख्या में है.’ वे आगे समझाते हैं, ’फिलहाल जो सांसद हैं उनकी छवि ठीक नहीं है. वैसे भी इस सीट से कोई उम्मीदवार लगातार दो बार चुनाव नहीं जीतता और इस बार भी ऐसा ही होना तय दिखता है. लड़ाई भाजपा और आप में है. ‘आप’ के पास हर तरह के वोटर आ सकते हैं. अभी तो ऐसा लगता है कि भाजपा को बढ़त मिल जाएगी, लेकिन कुछ कहा नहीं जा सकता. अगर मध्यमवर्गीय वोटरों का एक हिस्सा ‘आप’ के पास चला गया तो भाजपा को इस बार भी यह सीट गंवानी पड़ सकती है.’

पाटलीपुत्र, बिहार

Patliputraरामदर्शन पटना की बोरिंग रोड पर बने गणेश अपार्टमेंट में दरबानी का काम करते हैं. जाति से यादव हैं. पढ़ाई-लिखाई स्कूल तक हुई है, लेकिन राजनीति उनकी रग-रग में है. उनका गांव पाटलीपुत्र में पड़ता है जो परिसीमन के बाद दूसरा चुनाव देख रहा है. हम उनसे पूछते हैं कि चाचा-भतीजी यानि मीसा और रामकृपाल की लड़ाई में कौन किस पर भारी पड़ेगा. रामदर्शन कहते हैं, ‘ई बात तो अभी ताल ठोंक के रामकृपाल भी नहीं कह सकते, मीसा भी नहीं कह सकती और ना लालू यादव बता सकते हैं तो हम कहां से बता दें? लेकिन जान लीजिए कि पाटलीपुत्र इस बार और दिलचस्प मुकाबला देखेगा. फिर कोई करिश्मा होगा जैसा 2009 में हुआ था. लालू प्रसाद यादवजी इस नई संसदीय सीट से खड़े हो गए थे कि यह तो यादव बहुल इलाका है और वे यादवों के एकछत्र-सर्वमान्य नेता हैं. लेकिन लालूजी के ही चेला रहे दूसरे यादवजी यानी रंजन यादव ने उन्हें पटखनी दे दी थी. वह भी कोई हजार-दो हजार नहीं बल्कि करीब 24 हजार मतों से.’

रामदर्शन की तरह पाटलीपुत्र में कोई भी 100 फीसदी दावे के साथ कुछ नहीं कह पा रहा. वजह भी साफ है. एक ओर लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा भारती हैं. उनके साथ लालू जैसे दिग्गज का जोर है. उनका ससुराल भी पाटलीपुत्र इलाके में ही पड़ता है, तो उसका भी असर है. जिस अंदाज में वे चुनाव प्रचार कर रही हैं, उससे उनका एक अलग तरीके का असर उभर रहा है. वे बेहद शालीन तरीके से मतदाताओं के पास जा रही हैं, उनके घर  खा-पी रही हैं और बच्चों को गोद में उठाकर प्यार से चूम भी रही हैं. यह सब चुनावी नाटक भी कहा जा सकता है, लेकिन बहुत से लोग हैं जो मानते हैं कि अब ऐसा नाटक करनेवाले भी कम दिखते हैं इसलिए मीसा ऐसा करके लोगों को आकर्षित करने में सफल हो रही हैं.

दूसरी ओर भाजपा उम्मीदवार के तौर पर रामकृपाल यादव हैं. वे लंबे अरसे से मीसा के पिता लालू प्रसाद के सबसे करीबी मित्र व सहयोगी रहे हैं. उन्हें चाचा कहने वाली मीसा उनकी ताकत भी जानती हैं. रामकृपाल की खासियत यह है कि चुनाव हो या न हो, वे एक ऐसे नेता के तौर पर जाने जाते रहे हैं, जो एक बुलावे पर लोगों के बीच हाजिर हो जाता है. भले ही वे दो दशक से भाजपा को निशाने पर लेने के अभ्यस्त रहे हों, लेकिन कभी उन्होंने जाति विशेष को निशाने पर रखकर बयान नहीं दिए. इसलिए उन्हें और उनके सहयोगियों को उम्मीद है कि रामकृपाल को यादवों का एक हिस्सा तो वोट देगा ही, यादवों के बाद पाटलीपुत्र संसदीय क्षेत्र में जो दूसरी बड़ी आबादी रखने वाले भूमिहार भी नये भाजपाई बने रामकृपाल को दिल से गले लगाएंगे और समर्थन देंगे. पाटलीपुत्र में यादवों के बाद भूमिहार, कुरमी, कुशवाहा, वैश्य, महादलित, मुस्लिम और अतिपिछड़े समुदाय के वोट हैं. इस संसदीय क्षेत्र में छह विधानसभा क्षेत्र आते हैं. फिलहाल तीन पर भाजपा का कब्जा है, दो पर जदयू और एक पर राजद का. रामकृपाल को उम्मीद है कि संसदीय क्षेत्र में तीन भाजपाई विधायक होने का फायदा उन्हें मिलेगा. भूमिहार उन्हें खुलकर समर्थन देंगे और कुशवाहा वोट छिटककर उनके पाले में आएगा. हालांकि इस बीच रणवीर सेना के सुप्रीमो रहे ब्रहमेश्वर मुखिया के बेटे इंदुभूषण भी पाटलीपुत्र से ही निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर परचा भरकर रामकृपाल का खेल बिगाड़ने की कोशिश में हैं. माना जा रहा है कि वे भूमिहार समुदाय के वोट काटेंगे क्योंकि भूमिहारों का एक खेमा है, जो भाजपा से नाराज है.

उधर, अपनी बेटी के जरिये राजनीति कर रहे लालू की पूरी ऊर्जा यादवों को साधने में लगी हुई है. जिस दिन रामकृपाल ने राजद से अलग होने के संकेत दिए थे, उस दिन लालू प्रसाद ने एक प्रेस कांफ्रेंस की थी. इसमें उन्होंने मीसा को यादव जाति के उन तीन पूर्व व वर्तमान विधायकों के साथ बिठाया जिनका ताल्लुक पाटलीपुत्र इलाके से कभी-न-कभी रहा है. वे यादवों को संकेत देना चाहते थे कि रामकृपाल ने पाला बदला है, लेकिन यादव नेता इधर ही हैं. इतना ही नहीं, जब कुख्यात रीतलाल यादव ने निर्दलीय परचा भरने का एलान किया तो बिना वक्त गंवाए लालू उनके घर पहुंचे. मानमनौव्वल की कवायद में उन्होंने रीतलाल को संत पुरुष बताते हुए रातों-रात महासचिव पद भी उनके  हवाले कर दिया.

चाचा-भतीजी की इस लड़ाई के अलावा पाटलीपुत्र में रंजन यादव भी केंद्रीय भूमिका में हैं. जदयू के वर्तमान सांसद रंजन यादव के समर्थकों में इस बार ज्यादा उत्साह है. उनके अपने ठोस तर्क हैं. उन्हें चाचा-भतीजी के बीच यादव मतों के बिखराव से फायदे की उम्मीद है. वे कुरमी, महादलित और मुस्लिम समुदाय के एकमुश्त वोटों की भी उम्मीद कर रहे हैं.  उनके एक समर्थक कहते भी हैं, ‘ रंजन यादव जब लालू प्रसाद को हरा दिए तो मीसा और रामकृपाल की क्या बिसात.’

बागपत, उत्तर प्रदेश

Baghpatहर बार के चुनाव में अलग-अलग राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन करने के बावजूद राष्ट्रीय लोक दल को उत्तरप्रदेश की पश्चिमी बेल्ट से अच्छा खासा वोट मिलता रहा है. इसका सबसे बड़ा कारण इस इलाके का जाट बाहुल्य होना है. अकेले पार्टी के सर्वेसर्वा अजित सिंह की ही बात करें तो बागपत संसदीय क्षेत्र के रास्ते से वे अब तक छह बार संसद पहुंच चुके है. इस बार भी उन्होंने चौधरी परिवार की परंपरागत मानी जाने वाली इसी सीट से दावेदारी ठोकी है. लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने उनके खिलाफ एक ऐसे शख्स को मैदान में उतार दिया है जो अनका ही हम बिरादर है. इसके अलावा इस शख्स के बारे में बारे में एक रोचक बात यह भी है कि 1989 में जब अजित सिंह पहली बार केंद्र सरकार में मंत्री बने तो वह निजी सचिव की हैसियत से उनका खास मददगार था. डेढ़ साल पहले मुंबई पुलिस के आयुक्त की नौकरी छोड़ कर राजनीति में आए इस शख्स का नाम है डाक्टर सत्यपाल सिंह.

इस तरह देखा जाए तो एक पुराने सहयोगी ने दो दशक बाद प्रतिद्वंदी के रूप मंे सामने आकर अजित सिंह के लिए निष्कंटक मानी जाने वाली बागपत की जमीन में प्रथम दृष्टया कुछ स्पीड ब्रेकर तो खड़े कर ही दिए हैं. यदि नए परिसीमन के हिसाब से भी देखा जाए तो मोदीनगर विधानसभा क्षेत्र के बागपत में शामिल होने से भी कुछ समीकरण बदल सकते हैं. राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि यह इलाका मुजफ्फरनगर जिले से पूरी तरह लगा हुआ है और ऐसे में वहां हुए दंगे की आंच भी बागपत सीट पर असर डाल सकती है.

इन सब परिस्थितियों का गुणा भाग करके समाजवादी पार्टी ने भी विधायक गुलाम मोहम्मद को टिकट थमाकर मुस्लिम वोट साधने की पूरी जुगत भिड़ा ली है. यानी ऐसे में यदि कुल लगभग 30 प्रतिशत जाट वोटों का थोड़ा बहुत भी बंटवारा और 18 फीसदी के करीब मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण होता है तो छोटे चौधरी के लिए 1998 जैसा संकट पैदा हो सकता है. 1998 में अजित सिंह बागपत से चुनाव हार गए थे. उस वक्त भाजपा प्रत्याशी सोमपाल शास्त्री ने उनका विजय रथ रोका था. इसके अलावा मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण ने भी अजित सिंह का तब बड़ा नुकसान पहुंचाया था. इस बार भी इस तरह की परिस्थितियों के बनने को लेकर तरह तरह की चर्चाएं हैं. भाजपा प्रत्याशी सत्यपाल सिंह ने मोदी लहर का सहारा लेने के साथ ही बागपत के पिछड़ेपन को मुद्दा बना अजित सिंह को घेरने का अभियान लगातार छेड़ा हुआ है. चुनाव प्रचार में कोई कसर नहीं छोड़ने के मूड में दिख रहे सत्यपाल सिंह ने अपने संसदीय क्षेत्र में नरेंद्र मोदी की रैली करवाने के साथ ही फिल्मी पर्दे पर हैंडपंप उखाड़ने वाले जाट बिरादरी के अभिनेता सन्नी देओल का रोड शो तक करवा दिया है. इसके अलावा चूंकि लोकदल ने इस बार कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है लिहाजा केंद्र सरकार के खिलाफ दिख रहा देशव्यापी गुस्सा भी अजित सिंह के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है.

हालांकि इस सबके बावजूद कई जानकार हैं जो अब भी बागपत में अजित सिंह की संभावना मजबूत मानते हैं. उनका मानना है कि भले ही मुजफ्फरनगर दंगों को लेकर जाट बिरादरी अजित सिंह के रवैये से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है लेकिन केंद्रीय सेवाओं में जाटों को आरक्षण दिला कर उन्होंने अपने बिखरे वोट बैंक को समेटने में काफी हद तक सफलता हासिल कर ली है. गौरतलब है कि मुजफ्फरनगर दंगों के बाद अजित सिंह ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश का रुख नहीं किया था जिससे जाटों में उनके प्रति नाराजगी बढ़ी थी. बागपत में 10 अप्रैल को वोट डाले जाने हैं.

1998 के चुनाव को छोड़ दें तो जाट लैंड का केंद्र मानी जाने वाली बागपत सीट संसदीय सीट पर 1977 से लेकर 2009 तक चौधरी परिवार का एकछत्र राज रहा है. बावजूद इसके वर्तमान हालात को देखते हुए इतना तो कहा ही जा सकता है कि एक आईपीएस अधिकारी की आमद नें 2009 में साठ हजार से ज्यादा मतों से से जीतने वाले आईआईटी खड़गपुर के पूर्व छात्र अजित सिंह के सामने रोमांचक बिसात तैयार कर दी है.

चांदनी चौक, दिल्ली

chandni-chowkकहते हैं कि 17वीं सदी में महान मुगल शासक शाहजहां ने चांदनी चौक को आबाद किया. सोच भले ही उनकी रही हो, लेकिन इस इलाके की रूपरेखा शाहजहां की बेटी जहांआरा ने बनाई थी. तब इसकी मुख्य सड़क के बीच से एक नहर बहती थी. चांदनी रात के दौरान आसमान में रोशन चांद और नीचे नहर में बहता पानी एक दूसरे से मिलकर पूरे इलाके में झिलमिलाती चांदनी का खूबसूरत नजारा बिखेर देते थे. ऐसा माना जाता है कि इसी सुंदरता से प्रभावित होकर इलाके का नाम चांदनी चौक रख दिया गया.

हालांकि आज स्थिति इसके बिल्कुल उलट है. आज के चांदनी चौक में सड़कों पर केवल वाहनों का रेला दिखता है. सड़क के दोनों तरफ एक के बाद एक दुकानंे दिखती हैं और इधर से उधर आते-जाते ठेला गाड़ी और रिक्शे भी. आज का चांदनी चौक व्यापार, जामा मस्जिद और पतली गलियों के लिए जाना जाता है.

इलाके के इतिहास और वर्तमान पर एक नजर मारने के बाद यहां का चुनावी गणित देखा जाए. यहां से कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार मैदान में हैं. भारतीय जनता पार्टी ने इस सीट पर अपने प्रदेश अध्यक्ष डॉ. हर्षवर्धन को उतारा है तो कांग्रेस ने अपने अनुभवी नेता और केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल को. कपिल सिब्बल ने 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को इस क्षेत्र से जीत दिलाई है. उधर, आम आदमी पाटी ने पत्रकार से नेता बने आशुतोष को मैदान में उतारा है.

कांग्रेस जहां महाघोटालों, महंगाई और सत्ताविरोधी लहर से जूझ रही है तो वहीं आप के उम्मीदवार केजरीवाल के मैदान छोड़ने से परेशान हंै. उधर, नरेंद्र मोदी के नाम वाली हवा इस क्षेत्र में बहती नहीं दिख रही है. ऐसे में यहां के नतीजे लोगों के लिए चौंकाने वाले हो सकते हैं. आम आदमी पार्टी की स्थिति चांदनी चौक में कुछ खास अच्छी नहीं है. महज 49 दिनों में दिल्ली की सत्ता का त्याग करने का पार्टी का फैसला अब उसके लिए नकारात्मक असर वाला साबित होता दिख रहा है.

फिर भी इस इलाके में लड़ाई दिलचस्प है. किसी एक उम्मीदवार को बहुत बढ़त मिल रही हो ऐसा दिखता नहीं है. 2008 में परिसीमन के बाद इस संसदीय सीट में 10 विधानसभा सीटें शामिल कर दी गई थीं. चांदनी चौक संसदीय क्षेत्र में 14 लाख के करीब वोटर हैं. यह संसदीय सीट दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों मंे क्षेत्रफल और वोटरों की संख्या, दोनों लिहाज से सबसे छोटी है. चांदनी चौक से अब तक चुने गए 14 सांसदों में नौ कांग्रेसी रहे हैं. बीते एक दशक से कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल यहां से सांसद हैं. उनसे पहले पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष जेपी अग्रवाल 1984, 1989 और 1996 में इसी सीट से सांसद बने. भाजपा नेता विजय गोयल भी यहां से लगातार दो बार जीत चुके हैं. चांदनी चौक क्षेत्र में व्यापारी वर्ग की संख्या काफी है. इस सीट पर 30 से 35 प्रतिशत व्यापारी वर्ग का कब्जा है. 2008 के परिसीमन से पहले इस सीट पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में होते थे. ऐसा माना जाता था कि इसी वजह से कांग्रेस के प्रत्याशी भारी अंतर से जीत दर्ज कराते रहे हैं. परिसीमन के बाद जो बदलाव इस सीट पर हुए हैं उसके बाद ऐसा माना जा रहा है कि कांग्रेस प्रत्याशी कपिल सिब्बल के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं. बीते विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने इलाके की 10 में से चार विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी. कांग्रेस के हाथ दो सीटें आई थीं जबकि भाजपा ने तीन सीटें अपनी झोली में डाली थीं.

जीत-हार की इन बातों से इतर सबसे दिलचस्प बात यह है कि पुरानी दिल्ली की इस महत्वपूर्ण सीट पर लोकसभा का यह चुनाव स्थानीय मुद्दों जैसे सीवर लाइन, साफ-सफाई और पार्किंग पर लड़ा जा रहा है. तो जो भी इन मुद्दों पर ज्यादा लोगों को खुद से जोड़ पाएगा उसकी जीत की संभावना बढ़ जाएगी.

चंडीगढ़

chandigarhपूर्व केंद्रीय मंत्री हरमोहन धवन, पूर्व सांसद सतपाल जैन और चंडीगढ़ इकाई के भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन चंडीगढ़ सीट से भाजपा के दावेदार थे. तीनों ही अपने-अपने स्तर से टिकट पाने के भरसक प्रयास भी कर रहे थे. लेकिन कुछ दिन पहले जब चंडीगढ़ सीट से किरण खेर का नाम भाजपा प्रत्याशी के रूप में घोषित हुआ तो तीनों दावेदार ठगे से रह गए. हरमोहन धवन और संजय टंडन ने तो संयुक्त रूप से पार्टी हाईकमान को यह भी कहा कि टिकट उन दोनों में से किसी को भी दे दिया जाए तो वे एक-दूसरे का पूरा समर्थन करेंगे. लेकिन भाजपा ने किरण खेर के नाम पर ही अंतिम मोहर लगाई. नतीजा यह है कि यहां भाजपा सबसे ज्यादा भितरघात की शिकार हो रही है.

इस सीट का चर्चाओं में आने का एक कारण कांग्रेस द्वारा पवन बंसल को टिकट दिया जाना भी है. बंसल यहां से चार बार सांसद रह चुके हैं. लेकिन पिछले साल रेलवे रिश्वत कांड में उन पर आरोप लगे थे और उन्हें रेल मंत्री के पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था. भले ही सीबीआई ने उन्हें क्लीन चिट दे दी थी लेकिन उनका भांजा विजय सिंगला ही इस घूसकांड का मुख्य आरोपित है. बंसल को टिकट दिए जाने से भी दिलचस्प यह है कि आज भी उनके जीतने की संभावना भाजपा से कहीं ज्यादा मानी जा रही है. चंडीगढ़ उच्च न्यायालय के अधिवक्ता मनीष बाली बताते हैं, ‘भाजपा अब टक्कर में ही नहीं रह गई है. यहां के सभी मुख्य चेहरे बाहरी व्यक्ति को टिकट दिए जाने से नाराज हैं. कार्यकर्ता ही भाजपा के साथ नहीं हैं. इसका सीधा फायदा पवन बंसल को है. बंसल का मुकाबला अब आप से है.’

आप ने यहां से युवा और चर्चित चेहरे गुल पनाग को उतारा है. 5.87 लाख मतदाताओं वाली इस सीट में 2.65 लाख महिलाएं हैं. लगभग 50 प्रतिशत मतदाता यहां 45 साल से कम उम्र के हैं जिनमें से लगभग दो लाख 30 से भी कम उम्र के हैं. युवाओं से भरी इस सीट पर गुल पनाग को सबसे मजबूत दावेदार माना जा रहा है. एबीपी न्यूज-नील्सन सर्वे ने भी यह सीट गुल पनाग के नाम ही की है. गुल पनाग अपना चुनाव प्रचार भी बिलकुल यहां के युवाओं के अनुसार ही कर रही हैं. बुलेट पर सवार होकर अपने युवा साथियों के साथ वे जहां भी जा रहीं हैं उनको जबरदस्त जनसमर्थन मिल रहा है.

इस सीट पर मोदी की हालिया रैली से भाजपा की स्थिति में कुछ सुधार जरूर देखा जा रहा है. रैली के दौरान चंडीगढ़ भाजपा के सभी बड़े चेहरे पहली बार किरण खेर के साथ नजर आए. मोदी ने यहां लोगों से अपील की है कि ‘किरण खेर को जिताकर सीट मेरी झोली में डाल दो.’ इसके जवाब में अरविंद केजरीवाल ने अपनी चंडीगढ़ रैली में कहा है ‘मैं सीट झोली में नहीं डालूंगा बल्कि गुल पनाग को आपकी सेवा में लगा दूंगा.’

चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के छात्र हरकीरत सिंह बताते हैं, ‘यहां किरण खेर को जो भी वोट मिलेगा वो मोदी के कारण ही मिलेगा. हरमोहन धवन को अगर भाजपा टिकट देती तो उनकी जीत पक्की थी. लेकिन किरण खेर का जीतना बहुत मुश्किल है. यूनिवर्सिटी के ज्यादातर युवा तो गुल पनाग के ही साथ हैं.’ चंडीगढ़ सीट में निम्न आय वर्ग के मतदाताओं का भी एक तबका है. इसी मतदाता वर्ग को यहां निर्णायक भी माना जाता है. कांग्रेस अधिकतर इस वर्ग को रिझाने में कामयाब रही है. स्थानीय लोगों के अनुसार यदि इस बार भी कांग्रेस ऐसा कर पाई तो जीत बंसल की भी हो सकती है.

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

Ghaziabadगाजियाबाद सीट पर चुनाव दिलचस्प होगा क्योंकि भाजपा ने ‘फौजी’, कांग्रेस ने ‘मौजी’ और आप ने ‘भौजी’ को टिकट दिया है.’ सोशल मीडिया पर इस सीट की चर्चा कुछ इसी तरह से हो रही है. इस चर्चा में ‘फौजी’ हैं पूर्व थल सेना अध्यक्ष जनरल वीके सिंह, ‘मौजी’ हैं राज बब्बर और ‘भौजी’ हैं आप प्रत्याशी शाजिया इल्मी. गाजियाबाद सीट पर टक्कर इन्हीं तीनों के बीच मानी जा रही है. दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इस संसदीय सीट के अंतर्गत पांच विधान सभाएं आती हैं. इनमें से चार पर बसपा का कब्जा है. इसके बावजूद भी बसपा प्रत्याशी मुकुल उपाध्याय को जीत की दौड़ से लगभग बाहर ही समझा जा रहा है. वैसे कुछ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बसपा यदि दलित और ब्राह्मणों दोनों को साधने में कामयाब रही तो उपाध्याय भी जीत के करीब पहुंच सकते हैं.

यह सीट इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि पहली बार भारतीय सेना का सबसे बड़ा अधिकारी लोकसभा चुनाव में उतरा है. लेकिन जनरल वीके सिंह को यहां अपने ही लोगों का विरोध भी झेलना पड़ रहा है. भाजपा कार्यकर्ता किसी स्थानीय को टिकट दिए जाने की मांग कर रहे थे. उनका मानना है कि जनरल वीके सिंह का यहां कोई व्यक्तिगत जनाधार नहीं है. कार्यकर्ता काले झंडे दिखाकर जनरल सिंह का विरोध भी कर चुके हैं. ऐसे में थल सेना के पूर्व अध्यक्ष अपनी पहली चुनावी उड़ान सिर्फ मोदी की कथित हवा के भरोसे ही भर रहे हैं. इस सीट का पारंपरिक तौर से भाजपा का होना जनरल सिंह को जरूर मजबूती देता है. 2004 लोकसभा चुनाव को यदि अपवादस्वरूप छोड़ दिया जाए तो 1991 से इस सीट पर भाजपा प्रत्याशियों का ही कब्जा रहा है.

सेना के जवानों से खेतों के किसानों की ओर बढ़ रहे जनरल सिंह को मुख्य चुनौती इल्मी और फिल्मी से है. दिल्ली विधान सभा चुनावों में मात्र 326 वोटों से हारने वाली शाजिया इल्मी के साथ लोगों की सहानुभूति है. गाजियाबाद का आम आदमी पार्टी की कर्मभूमि होना भी शाजिया को मजबूत करता है. पार्टी का मुख्य कार्यालय और अरविंद केजरीवाल का घर दोनों इसी संसदीय क्षेत्र में हंै. स्थानीय लोग बताते हैं कि दिल्ली में आप की सरकार के दौरान इस क्षेत्र में भी पार्टी की लोकप्रियता बढ़ रही थी. लेकिन सरकार गिरने के बाद से यहां पार्टी कुछ कमजोर हुई है.

पैराशूट प्रत्याशी होने की जो चुनौती भाजपा और आप की है, कांग्रेस प्रत्याशी राज बब्बर की भी पहली चुनौती वही है. उनकी दूसरी है अपना ही दिया हुआ एक बयान. पिछले साल गरीबी रेखा पर बहस के दौरान बब्बर ने कहा था कि ‘भरपेट भोजन तो 12 रुपये में ही मिल जाता है.’ अब विपक्षी उन्हें इस बयान पर घेर रहे हैं. वैसे जनरल सिंह और शाजिया के मुकाबले राज बब्बर फिल्मी सितारा होने के कारण एक जाना पहचाना चेहरा जरूर हैं. 45 प्रतिशत ग्रामीण आबादी वाले इस संसदीय क्षेत्र में यह तथ्य उनको फायदा पहुंचा सकता है. देश की पांच सबसे बड़ी सीटों (मतदाताओं की संख्या के अनुसार) में से एक इस सीट पर लगभग 15 प्रतिशत मुस्लिम हैं. लेकिन कांग्रेस के इन पारंपरिक वोटों का इस बार इल्मी और फिल्मी में बंटवारा तय है.

भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह की वर्तमान सीट होने के कारण यह भाजपा की नाक का भी सवाल मानी जा रही है. परंपरागत तौर से भाजपा और कांग्रेस की इस सीट पर पिछले 52 साल से कोई भी महिला जीत दर्ज करने में नाकाम रही है. इस तथ्य के बावजूद भी आप ने इल्मी को यहां से मैदान में उतार कर लड़ाई को त्रिकोणीय बना दिया है. सोशल मीडिया की भाषा पर ही लौटें तो यह फौजी, मौजी और भौजी की दिलचस्प लड़ाई है.

आजमगढ़, उत्तर प्रदेश

Azamgarhआजमगढ़ की लड़ाई प्यादे और वजीर की लड़ाई है. ऐसा इसलिए क्योंकि आजमगढ़ के मौजूदा सांसद रमाकांत यादव ने कभी मुलायम सिंह की उंगली पकड़ कर राजनीति का ककहरा सीखा था. इस लिहाज से आजमगढ़ दिग्गजों की लड़ाई वाले इस खांचे में फिट नहीं होता. लेकिन इसकी भौगोलिक स्थितियों पर नजर डालने पर हम पाते हैं कि अकेले मुलायम सिंह ने ही इसे  दिग्गजों की लड़ाई में शुमार कर दिया है. आजमगढ़ के एक सिरे पर बनारस है और दूसरे सिरे पर गोरखपुर. यानी इसके दाहिने कोने पर नरेंद्र मोदी हैं और बाएं कोने पर योगी आदित्यनाथ. इन दो दक्षिणपंथी नेताओं के बीच में खड़े होकर मुलायम सिंह ने आजमगढ़ की लड़ाई को बड़ा बना दिया है. इस कस्बेनुमा शहर का इतिहास बताता है कि सपा के अस्तित्व में आने के बाद से यह उनके गढ़ के रूप में स्थापित हुआ है. थोड़ा और अतीत में झांकें तो हम पाते हैं कि इस शहर का देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस से मुहब्बत का रिश्ता कभी नहीं रहा. अधिकतर समय इसे समाजवादी भाते रहे हैं. जिले के बड़े नेता और फिलहाल मध्य प्रदेश के राज्यपाल रामनरेश यादव ने भी सूबे का मुख्यमंत्री पद जनता पार्टी में रहते हुए प्राप्त किया था.

समाजवादियों की जिले पर पकड़ आज भी कायम है. यहां की 10 में से नौ विधानसभा सीटें सपा के कब्जे में हैं. ऐसा होने के पीछे इसकी जनसांख्यिकी की बड़ी भूमिका रही. जिन दो समुदायों की नींव पर मुलायम सिंह ने अपनी पार्टी खड़ा करने का सपना देखा था वे दोनों ही आजमगढ़ में प्रचुरता में हैं. जिले का लगभग 22 फीसदी वोटर यादव है. इसी तरह यहां लगभग 2.5 लाख मुसलिम मतदाता हैं. आजमगढ़ ही नहीं बल्कि अगल बगल की मऊ, गाजीपुर, जौनपुर सीटों पर भी यही समीकरण प्रभावी है. इन दोनों का मिलना हमेशा मुलायम सिंह के लिए फलदायी सिद्ध हुआ है.

लेकिन फिलहाल स्थितियां थोड़ा अलग हैं. सुरक्षित इलाका होने के बावजूद मुलायम सिंह या उनका परिवार कभी भी इस इलाके से चुनाव लड़ने के लिए नहीं उतरा. यह पहली बार हो रहा है. 2014 में मुलायम सिंह के आजमगढ़ जाने की वजहें दिलचस्प हैं. 2008 में दिल्ली के बटला हाउस इलाके में हुई मुठभेड़ के बाद से आजमगढ़ धार्मिक पहचानों में बुरी तरह से बंट गया है. बटला हाउस के नतीजे में यहां धार्मिक पहचान वाली एक पार्टी उलेमा काउंसिल का उदय भी हो चुका है. धार्मिक आधार पर हुए दोफाड़ का नतीजा यहां 2009 के लोकसभा चुनाव में साफ दिखा. भाजपा इस इलाके में राममंदिर आंदोलन के दौरान भी कभी अपने पांव नहीं जमा सकी थी, जबकि यह जिला अयोध्या से महज 80 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद है. उसी भाजपा के उम्मीदवार रमाकांत यादव ने यहां 50 हजार वोटों से जीत दर्ज की. तो जो आजमगढ़ 90-92 के पागलपन भरे दौर में अपना मन-मिजाज बनाए रख सका था वह  अब सिर्फ धार्मिक पहचान के खांचों में सोचता है.

इसी दौरान कुछ और घटनाएं भी हुईं हैं जिनमें मुलायम सिंह के आजमगढ़ से लड़ने के सूत्र छिपे हैं. मुजफ्फरनगर के दंगों ने हालात बदल दिए हैं. मुसलमान मुलायम सिंह से बुरी तरह बिदका हुआ है. इन्हीं दंगों के साए में मुलायम सिंह ने आजमगढ़ से अपने लोकसभा चुनाव का श्रीगणेश किया था और मुसलमान भरे जलसे से पूरी तरह नदारद था. बटला हाउस से लेकर मुजफ्फरनगर तक जिस तरह की स्थितियां बनी हैं उनमें आजमगढ़ मुसलिम राजनीति की धुरी बनकर उभरा है. इसके बाकी निहितार्थ चाहे जो रहें पर एक नतीजा स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि मुसलमानों में सपा को लेकर मोहभंग की स्थिति है. दूसरा अहम बदलाव यह हुआ है कि आजमगढ़ के जुड़वां शहर बनारस से भाजपा के नरेंद्र मोदी ने चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. बनारस हिंदू आस्था का केंद्र है और मोदी जैसे दक्षिणपंथी नेता के लिए इस शहर के अपने राजनीतिक निहितार्थ हैं. तीसरी बात जिस यादव पर अब तक मुलायम सिंह अपना एकाधिकार मानते आ रहे थे उसने भी बदली परिस्थितियों में मुलायम सिंह के यादव पर भाजपा के यादव को तरजीह देना शुरू कर दिया, जिसका एक नमूना 2009 के लोकसभा चुनाव में दिखा. इन तीन परिस्थितियों ने मुलायम सिंह और समाजवाद पार्टी के भीतर चिंता की एक लहर पैदा की है. इससे निपटने के लिए मुलायम सिंह ने आजमगढ़ का दांव चला है. वे पूरी तरह से आजमगढ़ के हो गए हैं, ऐसा कहने और मानने की कोई वजह नहीं है क्योंकि उन्होंने मैनपुरी की अपनी सीट अभी छोड़ी नहीं है. जानकार मानते हैं कि इस समय मुलायम सिंह के सामने दो प्राथमिक चुनौतियां हैं- पहली यादव-मुसलिम वोटबैंक को एकजुट और स्थायी रखना दूसरा, दूसरे बेटे प्रतीक यादव को राजनीति में स्थापित करना. पहली चुनौती के लिए उन्हें आजमगढ़ जीतना जरूरी है और दूसरी चुनौती के लिए मैनपुरी.

अमृतसर, पंजाब

Amritsarअमृतसर लोकसभा सीट से भाजपा के अरुण जेटली और कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह के बीच का मुकाबला वैसे तो कई आरोपों प्रत्यारोपों के बीच लड़ा जा रहा है. लेकिन जिस एक मुद्दे को कांग्रेस की तरफ से सबसे ज्यादा उछाला जा रहा है वह है अरुण जेटली के बाहरी होने का मसला. कांग्रेस जनता को समझा रही है कि जेटली को वोट मत दीजिए. यह आदमी जीत जाएगा तो फुर्र हो जाएगा. आपके बीच अमृतसर में नहीं रहेगा.

अमृतसर सीट से चुनाव लड़ने की इच्छा जेटली के मन में कोई तीन साल पहले से ही कुलबुला रही थी, लेकिन पूर्व क्रिकेटर एवं अमृतसर से तीन बार सांसद नवजोत सिंह सिद्धू के न तो सीट खाली करने की कोई संभावना दिखाई दे रही थी और न ही उनसे सीट झपटने की कोई तरकीब सूझ रही थी. लेकिन पिछले दो सालों में सिद्दू और भाजपा की पंजाब में सहयोगी अकाली दल के बीच हुए संघर्ष खासकर अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर बादल के साले एवं रसूखदार मंत्री विक्रम मजीठिया से उनकी भिड़ंत उनके अमृतसर से राजनीतिक विस्थापन का कारण बनी.

सिद्दू की पत्नी और भाजपा विधायक नवजोत कौर सिद्दू कहती हैं, ‘स्थानीय भाजपा ने अकालियों के साथ मिलकर हमारे खिलाफ षड़यंत्र किया है. ठीक है. हमें टिकट नहीं दिया गया. लेकिन हमसे पार्टी का चुनाव में प्रचार करने की उम्मीद क्यों की जा रही है. हम अमृतसर में चुनाव प्रचार नहीं करेंगे. हमसे कहा गया कि सिद्दू को हटाना गठबंधन की मजबूरी है. तो ठीक है गठबंधन बचाएं आप.’

खैर, सिद्दू का अमृतसर से टिकट कटवाने के बाद जेटली को यहां से जिताना अब अकाली दल के लिए नाक का प्रश्न बन गया है. अमृतसर की नौ विधानसभा सीटों में से चार अकाली दल के पास हंै. अमृतसर पंजाब के माझा क्षेत्र में आता है. यहां अकाली दल का अच्छा खासा प्रभाव है. साथ में अमृतसर में सिखों की जनसंख्या 67 फीसदी के करीब है. ऐसे में अकाली दल को सीट निकालने का भरोसा है.

कुछ समय पहले तक जेटली की अमृतसर से जीत में किसी को कोई बाधा दिखाई नहीं दे रही थी. लेकिन कांग्रेस पार्टी द्वारा सीट से राज्य के अपने कद्दावर नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के उतारने पर मामला कांटे का हो गया है. हालांकि अमरिंदर लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए इच्छुक नहीं थे, लेकिन पार्टी हाईकमान के कहने पर वे राजी हुए. एएनआई से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार रॉबिन कहते हैं, ‘पहले ये जेटली के लिए केकवॉक था लेकिन कैप्टन के आने के बाद मुकाबला कड़ा हो गया है.’

खैर, कांग्रेस ने जेटली के खिलाफ बाहरी होने का जो सबसे बड़ा मुद्दा उठाया है उसका जवाब देने की जेटली भरसक कोशिश कर रहे हैं. पंजाबी में चुनावी सभाओं से लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करने के साथ ही जेटली लगातार अमृतसरी जनता को बता रहे हैं कि उनकी पैतृक जड़ें पंजाब से ही निकलती हैं.

जेटली भले ही बाहरी हों लेकिन वे पंजाब और अमृतसर के लिए कितने फायदेमंद हो सकते हैं, शायद यही बताने के लिए अकाली नेता और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल आम जनता को संबोधित करते हुए कहते हैं, ‘जेटली कल की केंद्र सरकार में उप प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री बनने वाले हैं. ऐसा होने पर पंजाब के विकास के लिए फंड की कमी नहीं पडेगी. ऐसे में अमृतसर का खूब विकास होगा.’

राज्य में कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली नेता तथा पूर्व मुख्यमंत्री होने के अलावा एक और महत्वपूर्ण कारण है जिस पर कांग्रेस को भरोसा है कि वह अमरिंदर सिंह के पक्ष में जाएगा. अमरिंदर सिंह ने ऑपरेशन ब्लू स्टार के विरोध में कांग्रेस पार्टी और संसद सदस्यता से उस समय त्यागपत्र दे दिया था. ऐसे में पार्टी को उम्मीद है कि स्वर्ण मंदिर के इस शहर में अमरिंदर को सिखों का अभूतपूर्व समर्थन जरूर मिलेगा.

रॉबिन कहते हैं, ‘जेटली के साथ एक दिक्कत और है कि वे अपनी जीत को लेकर पूरी तरह से अकालियों पर आश्रित हैं. इसके अलावा जेटली की छवि एक बेहद सॉफ्ट नेता की है जो अमृतसर की तबीयत से मेल नहीं खाती. यहां की जनता आक्रामक नेताओं को पसंद करती है. जिसके तेवर तीखे हों. इस मामले में भी कैप्टन जेटली पर भारी पड़ते दिख रहे हैं.’

अमृतसर लोकसभा सीट के इतिहास को देखें तो इस सीट से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आरएल भाटिया छह बार जीत कर संसद जा चुके हैं. हालांकि 2004 में जब भाजपा ने इस सीट से नवजोत सिद्दू को उतारा तब से इस सीट पर भाजपा का कब्जा है. लेकिन भाजपा के लिए चिंता की बात यह है कि 2009 के लोकसभा चुनावों में सिद्धू कांग्रेस के ओम प्रकाश सोनी से मात्र 6900 वोटों से जीत सके. इसके अतिरिक्त पिछले पांच सालों में बीजेपी सांसद सिद्दू के खिलाफ स्थानीय जनता में काफी नाराजगी देखी गई. ऐसे में कइयों को यह भी आशंका है कि कहीं इस नाराजगी का ठीकरा जेटली पर न फूटे.