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‘बाहरी होना हमें दूसरों पर एक स्पष्ट बढ़त देता है’

राजमोहन गांधी. उम्र- 79. लेखक, शिक्षाविद्. पूर्वी दिल्ली
राजमोहन गांधी. उम्र-79.
लेखक, शिक्षाविद्. पूर्वी दिल्ली. फोटोः पुष्कर व्यास

मेरा फैसला यह था कि मैं राजनीति में नहीं जाऊंगा. मैंने सोचा था कि यह जो अप्रत्याशित और असाधारण आंदोलन (लोकपाल आंदोलन) है, मैं उसे समर्थन दूंगा. फिर मैंने सोचा कि लाखों युवा इसमें शामिल हैं और मैं सिर्फ किनारे खड़ा देख रहा हूं. हालांकि अपने अकादमिक जीवन से मैं खुश था फिर भी मैं जानता था कि मैं आखिर में इस धारा में शामिल हो ही जाऊंगा.

आप ने यह धारणा बना दी है कि कोई भी, कहीं भी, किसी भी बड़ी राजनीतिक पार्टी से जुड़े बिना और किसी बड़े वोट बैंक के बगैर राजनीति में दाखिल हो सकता है. यह समझ बढ़ रही है कि हां, किसी और क्षेत्र में काम करने के बावजूद भी आप राजनीति में दाखिल हो सकते हैं और न सिर्फ दाखिल हो सकते हैं बल्कि जीत भी सकते हैं.

जहां तक मुद्दों की बात है तो भ्रष्टाचार सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि एक स्थानीय मुद्दा भी है. शिक्षा की गुणवत्ता की बात हो, अस्पतालों या बुनियादी सुविधाओं की दुर्दशा या फिर रोजमर्रा की जिंदगी में होने वाली तकलीफें, भ्रष्टाचार की मार सबसे ज्यादा आम आदमी पर ही पड़ती है.

मेरे चुनाव क्षेत्र पूर्वी दिल्ली में बुनियादी ढांचे की बदहाली और झुग्गी झोपड़ी कालोनियों के नारकीय हालात, दो ऐसे मुद्दे हैं जिन पर तत्काल कुछ करने की जरूरत है. अगर मैं जीता तो प्रभावी बदलाव लाने के लिए मैं एमसीडी, डीडीए सहित दिल्ली की तमाम प्रशासकीय इकाइयों के साथ मिलकर काम करूंगा.

हालांकि मुझे लगता है कि यह दो कारकों पर निर्भर करेगा. पहला यह कि आप अगली सरकार का हिस्सा होगी या नहीं या फिर मैं विपक्ष में बैठूंगा. दोनों ही स्थितियों में मेरी भूमिका अलग होगी, लेकिन हर स्थिति में बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याओं पर समग्रता से ध्यान देना होगा.

दूसरा कारक यह है कि सुधारों की हमारी जो महत्वाकांक्षी योजना है, उसमें विपक्ष के अड़ंगा लगाने की पूरी संभावना है. इसके बावजूद हम अपना काम करते रहेंगे.

आज कांग्रेस से लोग निराश हैं. भाजपा के प्रति एक अनिश्चितता का माहौल है. ऐसे में मुझे लगता है कि राजनीतिक व्यवस्था में बाहरी होना एक ऐसा तथ्य है जो हमें दूसरों पर बढ़त देता है. दोनों मुख्य पार्टियों की सरकारों का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है जबकि हमने 49 दिन की अपनी सरकार में प्रशासन के मोर्चे पर अच्छा काम किया है.

हमारा एक भी मंत्री या विधायक ऐसा नहीं है जिसने सरकार में रहते हुए किसी से एक भी रुपया मांगा हो और इस दावे को अब तक किसी ने भी नहीं झुठलाया है. पिछले कुछ सालों के दौरान कौन सी राज्य सरकार है जो ऐसा दावा करने की स्थिति में हो? इसलिए दिल्ली में अगला मौका मिलने या राष्ट्रीय स्तर पर कोई अवसर मिलने के बाद यही वह आधार है जिसे हमें बचाना होगा और उस पर अपनी इमारत खड़ी करनी होगी. अगर हमने अपनी यह प्रतिष्ठा गंवा दी तो यह हमारे लिए बहुत बुरा होगा.

(अवलोक लांगर से बातचीत पर आधारित)

‘ईमानदारी से देशसेवा करने की इच्छा रखने वाले लोगों के पास भी अब एक विकल्प है’

मीरा सान्याल । 53 । पूर्व सीईओ, आरबीएस। मुंबई दक्षिण
मीरा सान्याल । 53 । पूर्व सीईओ, आरबीएस। मुंबई दक्षिण
मीरा सान्याल. उम्र-53. पूर्व सीईओ, आरबीएस. मुंबई दक्षिण
मीरा सान्याल. उम्र- 53. पूर्व सीईओ, आरबीएस. मुंबई दक्षिण

अपनी जिंदगी में अब तक ज्यादातर मेरा काम नीतिगत मामलों से ही जुड़ा रहा है. हालांकि मैं बैंकिंग क्षेत्र में थी, लेकिन मैंने सरकार, योजना आयोग और रिजर्व बैंक के साथ कई श्वेत पत्रों पर काम किया है. मैं अपनी जिंदगी के उस दौर का आनंद ले रही थी. लेकिन 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले ने मुझे बदल दिया. मुझे लगा कि हममें से बहुत से लोग जो हो रहा है उसका ठीक से  विश्लेषण किए बिना सिर्फ हर चीज की आलोचना किए जा रहे हैं. घर पर बैठकर व्यवस्था की बुराई करने में हम लोगों का कोई सानी नहीं. मुझे लगा कि कम से कम मेरे लिए तो वक्त आ गया है कि सिर्फ आलोचना करने से आगे जाकर कुछ किया जाए.

यही वजह है कि मैं 2009 के आम चुनाव में लड़ी थी. यह मेरी जिंदगी के सबसे अच्छे तजुर्बों में एक था. मैं चुनाव हार गई, लेकिन मैंने बहुत कुछ सीखा. उसी समय मुझे महसूस हो गया था कि बाकी जिंदगी मुझे यही करना है. आम आदमी पार्टी ने सच्चे संवाद का एक मंच तैयार किया है. अगर हम ऐसा विकास चाहते हैं जिसमें सबकी भागीदारी हो और जिसका लाभ सबको मिले तो इसके लिए हमें सबकी बात सुननी होगी. आप ने मेधा पाटकर और मुझे जैसे लोगों को साथ लाने और एक-दूसरे से बात करने का काम किया है. हम लोग चाहते हैं कि काम के अवसर भी बढ़ें और उसके साथ पर्यावरण भी सुरक्षित रहे. विकास के लिए आम आदमी पार्टी की यही नीति है. हमारा प्रचार जाति और वर्ग के आधार पर नहीं हो रहा है. हम उन मुद्दों की बात कर रहे हैं जो जाति, वर्ग, धर्म और भाषा से परे जाकर हम सबको प्रभावित करते हैं. समस्याएं दो हैं—भ्रष्टाचार और अक्षम प्रशासन. हममें से कइयों को लगता है कि भारत एक अहम मोड़ पर पहुंच गया है और अक्षम प्रशासन देश का भविष्य चौपट कर रहा है. अब तक हम भी यही मानते थे कि फिलहाल राजनीतिक परिस्थितियों में हमारे पास ले देकर वही पुराने विकल्प हैं. 2009 में जब मैंने चुनाव लड़ने का फैसला किया तो कॉरपोरेट जगत में मेरे कई दोस्त थे जिन्होंने मुझसे कहा कि वे भी राजनीति में आना चाहते हैं. पर उन्हें लगता था कि इसमें बहुत ही ज्यादा गंदगी है. आप ने एक विकल्प पेश किया है. इसने उन बुद्धिमान लोगों को एक रास्ता दिया है जो ईमानदारी और आदर्शों के बूते देश की सेवा करना चाहते हैं. इसलिए इसके जरिये अच्छे लोग राजनीति में आ रहे हैं. मुझे यकीन है कि जिन बहुत से लोगों ने अतीत में वोट नहीं दिया है वे इस बार जरूर अपने अधिकार का इस्तेमाल करेंगे.

अपने चुनाव क्षेत्र में मैं दो चीजें कर रही हूं—सफाई यात्रा और स्वराज बैठक. हम लोकल ट्रेन में सवार हो जाते हैं, हर स्टेशन पर उतरते हैं और वहां सफाई करते हैं. हम अपने निर्वाचन क्षेत्र में पैदल घूमते हैं और चलते-चलते झाड़ू लगाते हैं. हम लोगों से जुड़ रहे हैं. हम यहां व्यवस्था की सफाई करने आए हैं और इसके जरिये हम यही दिखाते हैं.

जो मुद्दे हैं उनमें से एक अहम मुद्दा यह है कि लोगों के लिए सस्ते मकान की व्यवस्था कैसे हो जिससे वे इज्जत की जिंदगी जी सकें. मुद्दा यह भी है कि उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करने वाला माहौल कैसे बने. इसमें लालफीताशाही को खत्म करना, प्रक्रियाओं को सरल बनाना और भ्रष्टाचारियों को दंडित करना शामिल है.

दरअसल लोग भ्रष्टाचार को लेकर गुस्से में हैं और स्वच्छ प्रशासन की उम्मीद कर रहे हैं. ऐसे प्रशासन में मेरे हिसाब से छह बुनियादी चीजें होनी चाहिए—सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी, अच्छी सड़कें और बिजली.

(जी विष्णु से बातचीत पर आधारित)

‘ नेताओं ने प्रशासन को पंगु बना दिया है’

एचएस फुल्का ।  58 । वकील। लुधियाना, पंजाब. फोटोः प्रभजोत धिल
एचएस फुल्का । 58 ।
वकील। लुधियाना, पंजाब. फोटोः प्रभजोत धिल

वकालत के पेशे के अलावा मैं पंजाब में सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रहा हूं. मैंने शिक्षा, नशाबंदी और खेती-किसानी से जुड़े मुद्दों पर काम किया है. पिछले एक साल के दौरान मैंने देखा कि सामाजिक सेवा में सक्रिय मुझे जैसे कई लोग राजनीति के अखाड़े में भी उतर गए. उन्होंने एक राजनीतिक पार्टी शुरू की और वे इस देश में एक आंदोलन लाने के लिए काम कर रहे हैं. दरअसल यह व्यवस्था इतनी भ्रष्ट हो गई थी कि ठीक सोच रखने वाला आदमी राजनीति में आने की सोच भी नहीं सकता था.  सोच भी ले तो वह इसमें घुस नहीं सकता था. लेकिन आप ने एक मंच बनाया. मुझे लगता है कि ये पेशेवर लोग, जिन्होंने अपने अपने क्षेत्रों में बहुत काम किया है, वह बदलाव लाने के लिए सबसे बेहतर लोग जिसकी आज देश को जरूरत है. मुझे लगता है कि पंजाब को इस तरह के आंदोलन की बहुत जरूरत है. राजनेताओं ने राज्य के प्रशासन को बिलकुल लाचार बना दिया है. उनकी मर्जी के बिना कुछ नहीं होता. नशे की समस्या ने राज्य का बुरा हाल कर दिया है. किसानों को बहुत नुकसान हो रहा है. कई इसके चलते आत्महत्या को मजबूर हैं. शिक्षा का स्तर भी खराब है.

मैं इन क्षेत्रों में पिछले कुछ सालों से काम कर रहा हूं. हमने एक सामुदायिक व्यवस्था बनाई है ताकि किसान कम कीमत पर अच्छी क्वालिटी का कच्चा माल खरीद सकें और उससे बने उत्पाद बेचकर फायदा कमा सकें. यह काम वे मिलकर करते हैं. इससे किसान अब दोगुना मुनाफा कमा रहे हैं. मैं इस मॉडल को पूरे राज्य में दोहराना चाहता हूं. मुझे यह भी लगता है कि हमें नशे की समस्या से सीधे टकराना होगा. इसके लिए कई स्तरों पर एक साथ काम करने की जरूरत है. समस्या के खिलाफ लोगों को जागरूक करना होगा. इसमें लक्षणों की शुरुआत में ही पहचान और पुनर्वास केंद्रों का बड़ा नेटवर्क बनाना शामिल है. इसके साथ ही हमें रोजगार प्रशिक्षण का भी बंदोबस्त करना होगा.

मैं मानता हूं कि कहीं न कहीं इस व्यवस्था में पहली बार काम करने के चलते इसे बदलने में कई दिक्कतें होंगी. पूरी व्यवस्था पहले से ही हमारे खिलाफ काम कर रही है. लेकिन हमें ऐसे लोग नहीं चाहिए जिनका अनुभव बस इस पारंपरिक व्यवस्था में ही काम करने का हो. हम यह व्यवस्था बदलना चाहते हैं. अगर हम इसी व्यवस्था के लोगों को लाते हैं तो वे इस व्यवस्था के हिसाब से ही काम करेंगे. ऐसे में काम बनने की बजाय बिगड़ेगा.

वकील होने के नाते मैं व्यवस्था पर दबाव बना सकता था, लेकिन कानूनी प्रक्रिया मुझे बांध देती थी. आपको अदालत जाना होता है, मामला लड़ना होता है और नतीजे का इंतजार करना होता है. यह एक लंबी प्रक्रिया है. एक प्रशासक के रूप में आप सीधे काम कर सकते हैं.

अवलोक लांगर से बातचीत पर आधारित

‘ मैं पांच और 10 रु के टिकट बेचकर अपने चुनाव प्रचार के लिए खर्च जुटा रहा हूं’

के अर्केश। 60 ।
के अर्केश। 60 । पूर्व डीआईजी, सीआरपीएफ। चिक्कबल्लापुर, कर्नाटक
के अर्केश. उम्र-60.
के अर्केश. उम्र-60 वर्ष. पूर्व डीआईजी, सीआरपीएफ. चिक्कबल्लापुर, कर्नाटक. फोटोः केपीएन

मैं एक निम्नमध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुख रखता हूं. मैं 37 साल पुलिस सेवा में रहा हूं. उससे पहले मैं लेक्चरर और सामाजिक कार्यकर्ता हुआ करता था. जब भूमि सुधार लागू हुए तो मैंने कर्नाटक में किराएदारों को संगठित करने का काम किया था. पुलिस में रहते हुए मैं पूर्वोत्तर, पंजाब और कश्मीर में उग्रवादियों से लड़ा हूं और दंडकारण्य इलाके में नक्सलियों से भी. मैंने देश के अलग-अलग हिस्सों में सांप्रदायिक हिस्सा को भी काबू किया है.

कानून तोड़ने वाले तो आसानी से पहचाने जा सकते हैं. लेकिन देश में कई राजनेता भी हैं जो सम्माननीय हैं, लेकिन अपराधों में संलिप्त हैं. भ्रष्ट राजनेताओं और भ्रष्ट नौकरशाहों में एक गुपचुप सहमति बनी हुई है. मैंने आम आदमी पार्टी को चुना क्योंकि इसने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई छेड़ी.

हमारे यहां पानी अहम मुद्दा है. यह एक शुष्क जलवायु वाला इलाका है जहां कुछ नलकूप तो 1200 फीट गहरे हो गए हैं, लेकिन उनमें से कुछ ही हैं जिनमें वास्तव में पानी आता है. किसान पानी की कमी से त्रस्त हैं और राजनेता उनसे वादा कर रहे हैं कि पश्चिमी घाट में बहने वाली एक नदी का पानी उन तक पहुंचाया जाएगा और यह पानी का एक स्थायी स्रोत होगा. इसे नेत्रवती डाइवर्जन प्रोजेक्ट नाम दिया गया है.

इससे पहले भी कई बार पंप, सुरंग और नहरों के जरिये पश्चिमी घाट से पानी लाने के वादे किए गए थे. लेकिन वे वादे के वादे ही रहे.

विकास किसी भी तरह का हो, उसके कुछ असर होते हैं. हमें देखना पड़ेगा कि उसके कितने बुरे असर हैं और कितने अच्छे. पहले इस बात का आकलन हो कि ऐसे पानी लाने का पश्चिमी घाट के पर्यावरण पर कोई बुरा असर न हो. इस समस्या के व्यावहारिक हल भी हैं, लेकिन राजनेताओं और नौकरशाहों ने कभी उन पर गंभीरता नहीं दिखाई. मोइली ने सिंचाई परियोजना की किसी तकनीकी समझ के बिना ही इस परियोजना का वादा कर दिया. इसे आसान भाषा में धोखा कहा जाता है.

किसानों को फायदा मिले, इसे सुनिश्चित करने के कई रास्ते हैं. उदाहरण के लिए हम इस्राइल के किसानों से काफी कुछ सीख सकते हैं जिन्होंने किसानी के क्षेत्र में कई ऐसी ईजाद की हैं जिससे बहुत कम पानी में ही बहुत अच्छी खेती की जा सकती है. अगर वे ऐसा कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं?

मुझे दिख रहा है कि लोग अब बदलाव चाहते हैं. मैं पांच और 10 रु के टिकट बेचकर अपना प्रचार अभियान चला रहा हूं. लोगों को समझ में आ रहा है कि प्रचार के लिए नेता को पैसे देना बेहतर है बजाय इसके कि वह नेता पैसे देकर उनका वोट खरीदे.

(जी विष्णु से बातचीत पर आधारित)

‘हम जैसे लोगों को लोकसभा जाकर कानून बदलने होंगे’

दयामणि बरला. उम्र-44 वर्ष. सामाजिक कार्यकर्ता. खूंटी, झारखंड
दयामणि बरला. उम्र-44 वर्ष.
सामाजिक कार्यकर्ता. खूंटी, झारखंड. फोटोः राजेश कुमार

सारी जिंदगी मैं समाज सेवा के काम में रही हूं. झारखंड में जनता के लिए काम करने के चलते मेरा हमेशा सरकार, माफिया और बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों से सीधा टकराव हुआ है. व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है और इस बदलाव के लिए आपको व्यवस्था के भीतर ही दाखिल होना होगा अब समय आ गया है कि हम जैसे लोग जो जनता के लिए काम करते हैं, न सिर्फ वह काम जारी रखें बल्कि लोकसभा में भी जाएं और वहां ऐसे कानून बदलें जो आदिवासियों का हक मारने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं.

आज हर तरफ विकास की बात होती है. लेकिन इन कथित विकास परियोजनाओं में ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्टाचार का बोलबाला है. अगर एक कुआं बनने के लिए तीन-चार लाख रु आते हैं तो उनमें से योजना तक सिर्फ डेढ़ लाख रु ही पहुंचते हैं. बाकी स्थानीय पार्टी कार्यकर्ता, जिला कलेक्टर, विधायक और संबंधित मंत्री खा जाते हैं. आधे से ज्यादा पैसा तो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जा रहा है. आदिवासियों का हक मारा जा रहा है.

सरकार के लिए विकास का मतलब है किसानों और आदिवासियों को विश्वास में लिए बिना राज्य के संसाधनों का दोहन करना. जब स्थानीय लोग विरोध करते हैं तो उन पर माओवादी होने का ठप्पा लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है.

विकास का मतलब झारखंड में एम्स या आईआईटी क्यों नहीं है? क्यों वहां आज भी एक टीचर के भरोसे स्कूल चल रहा है? वहां कोई कृषि केंद्र क्यों नहीं है? जरूरत इस बात की है कि ऐसे विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाए तो टिकाऊ हो और जिससे स्थानीय समाज को भी फायदा हो.

मैं विकास की एक ऐसी व्यवस्था बनाना चाहूंगी जो 40 फीसदी आरक्षित वनभूमि का फायदा उठाकर चले. ऐसे लघु उद्योग क्यों नहीं हो सकते जिनके लिए कच्चा माल जंगल से आए. ऐसी फैक्ट्रियां बनाकर हम नौजवानों को हथियारों से दूर कर सकते हैं और शांति बहाल कर सकते हैं. लेकिन ऐसे विकास के बारे में कोई बात नहीं करना चाहता क्योंकि बड़े उद्योगों के साथ डील करके तो करोड़ों कमाने की व्यवस्था हो जाती है.

(अवलोक लांगर से बातचीत पर आधारित)

‘ हम एक राजनीतिक क्रांति ला रहे हैं और लोग इसकी अहमियत समझते हैं’

हाबंग पेंग. उम्र- 56 वर्ष. पूर्व सूचना आयुक्त. अरुणाचल पश्चिम
हाबंग पेंग. उम्र- 56  पूर्व सूचना आयुक्त. अरुणाचल पश्चिम

मैं आम आदमी पार्टी से इसलिए जुड़ा क्योंकि मैं देश को बदलना चाहता हूं. अच्छे लोग राजनीति में नहीं आ रहे. सभी स्तरों पर भयंकर कुशासन है. देश को कॉरपोरेट कंपनियों ने चलाना शुरू कर दिया है. जब मैं सूचना आयुक्त था तो मेरा सामना काफी भ्रष्टाचार से हुआ. जब अरविंद केजरीवाल ने मुझे आप में आने का आमंत्रण दिया तो मैं तुरंत राजी हो गया. इस तरह मैं आप का संस्थापक सदस्य बना.

पार्टी को पूर्वोत्तर में अच्छा समर्थन मिल रहा है. लोग हमारी विचारधारा पसंद कर रहे हैं. हम एक राजनीतिक क्रांति कर रहे हैं और लोग इसकी अहमियत समझते हैं. असम में हमारे आठ उम्मीदवार हैं. मणिपुर और त्रिपुरा में दो-दो और मिजोरम, मेघालय और सिक्किम में एक-एक. अरुणाचल से मैं आप का अकेला उम्मीदवार हूं. मैं आपको आश्वस्त करता हूं हम पूर्वोत्तर से आप का कोई न कोई प्रतिनिधि संसद में भेजेंगे. कांग्रेस और भाजपा के कुशासन के चलते पूर्वोत्तर के लोग खुद को अलग-अलग महसूस कर रहे हैं. चीनी सीमा पर काफी काम हुआ है. अच्छी सड़कें और बुनियादी सुविधाएं वहां आई हैं. हमारी सरकार को यहां भी ऐसा करना चाहिए था. पूरे पूर्वोत्तर में सड़कों की हालत बहुत खराब है. आखिर में एक दिन पूर्वोत्तर मुख्यधारा के भारत का हिस्सा बनेगा और ऐसा होने में आप की महत्वपूर्ण भूमिका होगी.

जी विष्णु से बातचीत पर आधारित

चुनावी रण के समीकरण

मुख्यमंत्री रनशंक (बाएं) के सामने हैं
UK
हरीश रावत की पत्नी रेणुका हरिद्वार सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री निशांक(बाएं) के सामने हैं.

लोकसभा चुनाव की रोशनी में उत्तराखंड के राजनीतिक भविष्य को लेकर दो मुख्य सवाल हवा में तैर रहे हैं. पहला, चुनाव में सत्तारूढ़ कांग्रेस का क्या होगा? दूसरा, चुनाव के बाद सूबे की राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा? कांग्रेस की निगाहें मुख्यमंत्री हरीश रावत पर हैं. रावत दोहरे दबाव में हैं. वे ठीक ऐसे वक्त में चुनाव का सामना कर रहे हैं जब उन्हें चारधाम यात्रा शुरू होने से पहले सड़कों का निर्माण कराने का वादा भी पूरा करना है. दोनों ही चुनौतियां साथ-साथ कदमताल कर रही हैं. दो मई से चार धाम यात्रा शुरू होनी है और सात मई को सूबे में मतदान होना है. इसलिए मुख्यमंत्री को भी दोनों ही मोर्चों पर बराबर कदमताल करनी पड़ रही है. आपदा से अंदर ही अंदर सुलग रही नाराजगी कांग्रेस की बड़ी चिंता का कारण मानी जा रही है. प्रत्याशी उतारे जाने से पूर्व रावत पहले चरण का प्रचार करके लौटे हैं. वे करीब 20 से ज्यादा चुनावी सभाएं कर चुके हैं. उनके चेहरे पर पसरी चिंता बता रही है कि आपदा प्रभावित इलाकों की रिपोर्ट सही नहीं है. अपनी इस चिंता और खीझ को वे छुपा नहीं पा रहे हैं. इसीलिए उनकी नाराजगी मीडिया के लोगों पर फूट रही है. 16 अप्रैल को मुख्यमंत्री बीजापुर गेस्ट हाउस स्थित अपने अस्थायी आवास पर जब मीडियाकर्मियों से मुखातिब हुए तो उनके तेवरों से साफ जाहिर हो रहा था कि आपदाग्रस्त इलाकों की रिपोर्टिंग को लेकर वे नाखुश हैं. तीखी से तीखी बात को नरमी से और द्विअर्थी संवादों में कह जाने वाले हरीश रावत बोले, ‘डेंजर और सेंसेटिव में फर्क करना जानिए. मैं ब्लंट नहीं हूं. क्या मुझे ब्लंट होना पड़ेगा.’

मुख्यमंत्री की यह चिंता क्या वाकई चारधाम यात्रा को लेकर है? या फिर चुनाव में आपदा से उपजे हालात ने उन्हें बेचैन कर दिया है? माजरा जो भी हो, लेकिन कांग्रेस को यह भय तो सता ही रहा है कि पिछले बरस आई प्राकृतिक आपदा कहीं राजनैतिक आपदा में न बदल जाए. तमाम उपायों के बावजूद आपदा के घावों से रिसता दर्द सरकार और पार्टी दोनों का संकट बना है. ये लोक सभा चुनाव रावत के लिए अग्निपरीक्षा सरीखे हैं. सूबे की पांच लोक सभा सीटों में से दो पर उनकी प्रतिष्ठा सीधे-सीधे दांव पर लगी है. वे हरिद्वार से सांसद हैं. इस सीट पर उनकी पत्नी रेणुका रावत चुनाव लड़ रही हैं. उन्हें चुनाव में हरीश रावत का बोया काटना हैं. ये चुनाव रेणुका की हार या जीत ही नहीं केंद्रीय मंत्री और सांसद के तौर पर हरीश रावत के कामकाज का जनादेश भी होगा. उधर, अल्मोड़ा उनकी जन्म भूमि है. इस सीट पर वे चार मर्तबा सांसद रह चुके हैं. इस लिहाज से उन पर इस सीट से कांग्रेस को जिताने का भी दबाव है. अल्मोड़ा से उनके सिपहसालार और मौजूदा सांसद प्रदीप टम्टा मैदान में हैं.

हालांकि रावत कह चुके हैं कि उन पर पांचों सीटें जिताने का जिम्मा है. लेकिन हरिद्वार और अल्मोड़ा को उनके राजनीतिक भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है. इस बात का इल्म शायद उनको भी है. तमाम मौकों पर वह संकेत कर चुके हैं कि लोकसभा चुनाव के नतीजे सूबे का भावी भविष्य तय करेंगे. दरअसल, नतीजों की उम्मीद में ही कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें उत्तराखंड की कमान सौंपी है. रावत के जेहन में भी कांग्रेस के युवराज की यह हिदायत ‘नसीहत नहीं नतीजे’ हर पल तैर रही होगी. यही वजह है कि मुख्यमंत्री बनने के दिन से उन्हें दम लेने का समय नहीं है. आचार संहिता लागू होने से पहले तक वे लोक लुभावन घोषणाओं में जुटे रहे और अब उन्हें चुनावी दौरों से फुरसत नहीं मिल रही.

उनकी इसी तेजी ने खुद को ‘कम्फर्ट जोन’ में मान रही भाजपा को ‘एक्टिव मोड’ में ला दिया है. सूबे में नेतृत्व परिवर्तन की कवायद से पहले पार्टी पांचों सीटें अपनी जेब में मानकर चल रही थी. लेकिन अब उसे अपनी रणनीति में बदलाव करने पड़ रहे हैं. उसकी गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि चुनाव में उसने तीन-तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों को उतार दिया है. गढ़वाल सीट पर मेजर जनरल(सेनि) बीसी खंडूड़ी मैदान में हैं. हरिद्वार में रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ और नैनीताल से भगत सिंह कोश्यारी.

गढ़वाल खंडूड़ी की पारंपरिक सीट है. कांग्रेस का प्रत्याशी घोषित होने तक भाजपा यहां जीत पक्की मानकर चल रही थी. लेकिन उसके अपने ही सिपाही और मौजूदा सांसद सतपाल महाराज ने उसे झटका दे दिया. महाराज ने पहले तो समर में उतरने से मना कर दिया था, लेकिन जब पार्टी ने दबाव बनाया तो वे भाजपा के चुनावी रथ पर सवार हो गए. महाराज के साथ आने से भाजपा का उत्साह स्वाभाविक है. गढ़वाल सीट पर महाराज का असर है. इस संसदीय क्षेत्र के 14 विधायकों में से 10 सीधे-सीधे महाराज कैंप के माने जाते हैं. इनमें एक महाराज की धर्मपत्नी अमृता रावत भी हैं. महाराज के पार्टी छोड़ने के बाद ये सभी बेशक कांग्रेस में अपनी निष्ठा जता चुके हैं, मगर जानकार मानते हैं कि चुनाव में कुछ भी हो सकता है.

उधर, महाराज की विदाई के बाद कांग्रेस कई दिनों तक किंकर्तव्यविमूढ़ रही. जब तक कांग्रेस ने इस सीट पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारा, भाजपा खंडूड़ी की एकतरफा जीत को लेकर आश्वस्त थी. पार्टी नेता दम भरते दिखे कि वे जनरल की जीत का नहीं बल्कि जीत की ‘लीड’ का हिसाब लगा रहे हैं. मगर कांग्रेस ने अपने पत्ते खोले तो अब भाजपा में हलचल शुरू हो गई है. पूर्व सैन्य अफसर की टक्कर में कांग्रेस ने सैनिक कल्याण मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत को मैदान में उतारा है. छवि और धाक के मामले में हरक जनरल के आस-पास भी न हों, पर जोड़तोड़ की राजनीति के वे खिलाड़ी हैं. 2012 में वे रूद्रप्रयाग विधान सभा से चुनाव जीतकर इसका नमूना पेश कर चुके हैं. तब वे डोईवाला से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन कांग्रेस की खेमेबाजी के चलते उन्हें ऐन चुनाव से पहले रूद्रप्रयाग का टिकट थमा दिया गया था. तब भी हरक चुनाव जीत गए. माना जा रहा है कि यह चुनाव हरक के लिए संभावनाओं के दरवाजे खोल रहा है. जानकारों के मुताबिक उनके मन में ये कसक हमेशा रही है कि गढ़वाल में वे ठाकुर नेताओं के एक क्षत्रप के तौर पर पहचाने जाएं. महाराज के रहते ये मुमकिन नहीं था. लेकिन अब यह ‘चांस’ बन रहा है. हरक समर्थकों का मानना है कि चुनाव में अगर वे कोई करिश्मा कर गए तो क्षत्रप के तौर पर स्थापित हो जाएंगे. इसीलिए वे समर में खंडूड़ी को ‘वाक ओवर’ देने के कतई मूड में नहीं हैं. उन्होंने सैन्य बहुल इस सीट पर मेजर जनरल की टक्कर में दो-दो जनरलों को अपने साथ ले लिया है. एक दौर में महाराज और खंडूड़ी के खासमखास रहे लेफ्टिनेंट जनरल टीपीएस रावत हरक के साथ खड़े हैं. दो महीने आम आदमी पार्टी में रहने के बाद वे खंडूड़ी को हराने के लिए कांग्रेस में शामिल हुए हैं. उनके साथ लेफ्टिनेंट जनरल गंभीर सिंह नेगी भी हैं जिन्हें गढ़वाल सीट पर उतारने का इरादा पार्टी ने अंतिम क्षणों में बदल दिया था. हरक ने भाजपा के तीन पूर्व विधायकों, केदार सिंह फोनिया, अनिल नौटियाल और जीएल शाह को भी अपने साथ मिला लिया है. भाजपा से निष्कासित ये तीनों नाम खंडूड़ी विरोधी खेमे के हैं.

मगर भाजपा की मानें तो यह सारी जोड़तोड़ लीड के अंतर को तो कम कर सकती है, लेकिन कांग्रेस की तयशुदा हार को नहीं बदल सकती. भाजपा प्रवक्ता प्रकाश सुमन ध्यानी कहते हैं,‘ कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती खुद कांग्रेस है. वह पहले अपनी अंतर्कलह से ही निपट ले. उत्तराखंड का इतिहास राष्ट्रीय धारा में बहने का रहा है. समूचे राष्ट्र में मोदी लहर चल रही है. इस आंधी से कांग्रेस को कोई नहीं बचा सकता.’

साफ है कि इन चुनाव को भाजपा मोदी लहर पर केंद्रित कर देना चाहती है. मगर मोदी लहर के असर को कांग्रेस मानने को तैयार नहीं. मुख्यमंत्री हरीश रावत कहते हैं,‘उत्तराखंड में सिर्फ विकास की लहर है. जनता तरक्की चाहती है. सुनियोजित तरीके से जनता का ध्यान मुद्दों से हटाकर व्यक्ति विशेष पर केंद्रित करने की नाकाम कोशिश हो रही है.’

दो चिर प्रतिद्वंदी दलों के बीच सिमटी इस चुनावी जंग में तीसरे विकल्प के तौर पर आम आदमी पार्टी, यूकेडी व वामपंथियों का साझा मोर्चा अपनी-अपनी सामर्थ्य के हिसाब से मैदान में है. मगर उनसे दिल्ली सरीखे करिश्मे की उम्मीद नहीं की जा सकती. मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में है और हर सीट पर दोनों दलों की अलग-अलग चुनौतियां हैं. नेतृत्व परिवर्तन के बाद विजय बहुगुणा और हरीश रावत की भूमिकाएं बदल जाने के बाद इसका असर टिहरी सीट पर पड़ सकता है. जहां खड़े होकर रावत कभी बहुगुणा पर निशाने साधते थे, वहां आज बहुगुणा हैं.  रावत चाहते थे कि टिहरी सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा चुनाव लड़ें, लेकिन बहुगुणा ने पत्नी की बीमारी का बहाना बना दिया. वे अपने बेटे साकेत के लिए टिकट के जुगाड़ में लगे रहे. बेटे का टिकट फाइनल होने के बाद बहुगुणा देहरादून में डेरा डाल चुके हैं. उपचुनाव में हार के बाद साकेत टिहरी सीट पर खासे सक्रिय रहे हैं, लेकिन सत्ता से पिता की विदाई के बाद उनके लिए टिहरी का समर आसान नहीं रह गया है जहां भाजपा ने शाही परिवार की माला राज्यलक्ष्मी शाह को फिर से मैदान में उतारा है.

तीर्थनगरी हरिद्वार में मुख्यमंत्री की पत्नी रेणुका और पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के मैदान में होने से हरिद्वार हॉट सीट बन गई है. निशंक अपनी जीत को लेकर आश्वस्त हैं. वे कहते हैं,‘मैंने क्षेत्र में काम किया है. मुस्लिम समुदाय में भी मुझे समर्थन मिल रहा है. मेरे पक्ष में लहर नहीं जुनून है.’

मगर हरिद्वार के चुनावी समीकरण काफी उलझे हुए हैं. इस सीट पर मुस्लिम व दलित वोटों की तादाद 35 फीसदी से भी अधिक है. इस वोट बैंक पर बसपा की नजर है. बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी हाजी इस्लाम को उतारा है. बसपा जितना बेहतर प्रदर्शन करेगी, उसका सियासी नुकसान कांग्रेस को होगा. यही वजह है कि कांग्रेस का भी पूरा फोकस इसी वोट बैंक पर है. निशंक के लिए सबसे बड़ी चुनौती भितरघात को ‘मैनेज’ करने की भी है. उनकी घेराबंदी के लिए कांग्रेस त्रिपाठी अयोग की जांच रिपोर्ट का जिन्न बोतल से बाहर निकाल सकती है. मुख्यमंत्री इसका संकेत कर चुके हैं. फिलहाल पार्टी में बहुचर्चित महाकुंभ और स्टर्डिया घोटाले का ब्रहमास्त्र छोड़ने के सियासी नफे-नुकसान को लेकर मंथन चल रहा है.

नैनीताल और अल्मोड़ा (सुरक्षित) में भी मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही माना जा रहा है. नैनीताल में कांग्रेस ने दो बार के सांसद केसी सिंह बाबा पर फिर से दांव खेला है. भाजपा के भगत सिंह कोश्यारी उनके सामने हैं. अल्मोड़ा में भाजपा के अजय टम्टा और निवर्तमान सांसद प्रदीप टम्टा के बीच मुकाबला है. सारे क्षत्रपों के मैदान में होने से युद्ध में अकेले पड़े टम्टा मोदी लहर के सहारे चुनावी वैतरणी पार कर लेना चाहते हैं.

भाजपा की निगाह लोक सभा चुनाव के बाद के हालात पर भी लगी है. ये चुनाव सूबे में राजनीतिक आपदा की आहट भी दे रहे हैं. जानकारों का मानना है कि दिल्ली में तख्ता पलटा तो उसकी आंच उत्तराखंड पर आएगी. सहयोगियों के समर्थन पर टिकी रावत सरकार की यही सबसे बड़ी बेचैनी है.

राजनीति में कितनी संस्कृति?

इन दिनों दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र- यानी हमारा देश- अपनी नई सरकार चुन रहा है. बदलाव, विकास, सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, महंगाई, सड़क, बिजली, पानी रोजगार, अधिकार, सुरक्षा – ऐसे न जाने कितने सारे मुद्दे हैं जिनको लेकर राजनीतिक दल और नेता जनता को तरह-तरह के आश्वासन दे रहे हैं. एक व्यावसायिक अनुबंध के तहत रचे और तैयार किए गए गीत के सहारे देश को न झुकने देने, न बिकने देने की सौगंध खाई और दिलाई जा रही है.

लोकतंत्र के इस पूरे शोर में लेकिन साहित्य और संस्कृति कहां है? क्या किसी भी राजनीतिक दल के पास उसका कोई साहित्यिक या सांस्कृतिक एजेंडा है? कभी भारतीय जनता पार्टी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करती थी, लेकिन तब भी उसके आशय सांस्कृतिक नहीं हुआ करते थे और अब तो लगता है कि इस पुराने नारे से भी उसने मुक्ति पा ली है. किसी भी दूसरे दल के पास- जिनमें सैफई महोत्सव कराने वाले समाजवादी शामिल हों या बदलाव की बात करने वाली आम आदमी पार्टी- संस्कृति को लेकर कोई सोच नहीं दिखाई पड़ती. देश में सबसे व्यापक सांगठनिक आधार वाली कांग्रेस के घोषणापत्र में भी संस्कृति के नाम पर कुछ नहीं है. सबसे वैचारिक माने जाने वाले वाम दलों के अपने साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठन तो हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि वामपक्ष के नीति नियंताओं को इन संगठनों की कोई खास जरूरत नहीं है- उनके सांस्कृतिक उद्यमों की तो कतई नहीं. वाम को बंगाल से अपदस्थ करने वाली तृणमूल कांग्रेस ने शुरू में कुछ लेखकों-संस्कृतिकर्मियों को लेकर जो संवेदनशीलता दिखाई थी, उसका एक तरह से विलोप हो चुका है. यही हाल दक्षिण भारत के राजनीतिक दलों का है.

लेकिन सवाल है, राजनीति की इस लड़ाई में साहित्य और संस्कृति मुद्दा क्यों हो? क्या कविता और कहानी का सवाल रोटी और रोजगार के सवाल से बड़ा है? क्या नृत्य या नाटक विकास या सांप्रदायिकता की चुनौतियों से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हैं? या क्या हिंदी या किसी भी भारतीय भाषा का कोई लेखक हिंदी फिल्मों में काम कर रहे किसी मामूली से अभिनेता के मुकाबले भी कहीं ज्यादा असर रखता है? या क्या किसी हिंदी लेखक या संस्कृतिकर्मी ने ऐसे सामूहिक प्रयत्न किए हैं कि वे ऐसी व्यापक अपील पैदा कर सकें जिनसे मजबूर होकर भारतीय लोकतंत्र उन्हें उनका दाय दे? कुछ सहमतनुमा आयोजनों को छोड़ दें तो क्या लेखकों और संस्कृतिकर्मियों ने सांप्रदाकिता के विरुद्ध या सामाजिक न्याय के पक्ष में या फिर सामाजिक-लैंगिक या आर्थिक बराबरी के लिए ऐसी कोई लड़ाई छेड़ी है जिसे देश की जनता याद रखे और साहित्यकारों को अपना प्रतिनिधि माने? कम से कम हिंदी के संदर्भ में- क्या यह सच नहीं है कि उसका लेखक अपने समाज का एक बेचेहरा प्राणी है जिसे कोई नहीं पहचानता?  और क्या अपनी ऐसी उपेक्षित हैसियत के लिए खुद वह भी ज़िम्मेदार नहीं है?

ये बड़े निर्मम सवाल हैं जो एक तरह से लेखक और संस्कृतिकर्मी को कठघरे में खड़ा करते हैं. लेकिन किसी भी समाज को संस्कृतिकर्मियों की जरूरत हो या न हो, संस्कृति की जरूरत होती है. समाज किसी कवि या कथाकार को मान्यता दे या न दे, वह अपने भीतर कोई कविता या कथा अगर बचाकर नहीं रख पाता तो वह एक बेजान समाज होता है. आखिर समाज-संस्कृति या सभ्यता का सफर हमारी स्मृति के संचय का भी सफर है- उन कथाओं और कविताओं का भी जिन्होंने समाज विज्ञान के किसी भी दूसरे अनुशासन के मुकाबले अपने समाज का कहीं ज्यादा सच्चा और मानवीय अभिलेख तैयार किया और किसी भी दूसरे शास्त्र के मुकाबले सभ्यता को कहीं ज़्यादा साफ रोशनी दिखाई- सिर्फ जीत में ही नहीं, पराजय में भी उसका साथ दिया और सिर्फ रोशनी में ही नहीं, बल्कि रोशनी से ज्यादा अंधेरे में उसे उसकी दुविधाओं, उसके द्वंद्वों और उसकी शक्ति से उसका परिचय कराया. अगर यह कविता और कहानी नहीं होती, थपकियां देकर सुलाने वाली लोरियां नहीं होतीं, आवाज़ देकर जगाने वाले गीत नहीं होते, हमें अपनी विडंबनाओं से आंख मिलाना सिखाने वाली कथाएं नहीं होतीं तो हम रोशनी की मरीचिका और विकास की अनिद्रा में भटकते कहीं ज्यादा हिंसक और पशुवत समाज होते.

दुर्भाग्य से आज हम धीरे-धीरे ऐसे ही समाज में बदलते जा रहे हैं- ऐसे स्मृतिविहीन समाज में जिसके  लिए विकास का मतलब चिकनी-चौड़ी सड़कें, चमचमाते मॉल और बहुमंजिला इमारतें भर हैं. हम यह भी सोचने को तैयार नहीं हैं कि यह विकास किन शर्तों पर आ रहा है, किन वर्गों द्वारा लाया जा रहा है और अंततः कैसे वह हमें एक आक्रामक, सरोकारविपन्न और आत्महीन उपभोक्ता समाज में बदल कर छोड़ दे रहा है. इस समाज में श्रेष्ठता की एकमात्र कसौटी कारोबारी किस्म की सफलता है और आगे बढ़ने की आपाधापी में सबकुछ को छोड़ सकने की, हर किसी को छल सकने की कुशलता है. यही वजह है कि लड़ाई चाहे सांप्रदायिकता के खिलाफ हो या सामाजिक न्याय के पक्ष में, भ्रष्टाचार के खिलाफ हो या पारदर्शिता के पक्ष में- वह सिर्फ राजनीतिक नारों में बदल कर रह जा रही है, वह धरातल पर न लड़ी जा रही है, न उसे लड़ने का कोई इरादा दिख रहा है. सिर्फ साधनों और सफलता के पीछे भागते ऐसे बेजान और विपन्न समाज जब अपनी मुक्ति की राह खोजते हैं तो वे बस किसी मसीहा का इंतजार करते हैं जो दरअसल सबसे पहले उन लोगों को कुचलता है जिन्होंने उसका रास्ता बनाया है. यह भी इन दिनों हम होता हुआ देख रहे हैं.

बेशक, ऐसा समाज सिर्फ राजनीति ने नहीं, हमने भी बनाया है. हमारे राजनीतिक नारों में दिखाई पड़ने वाला खोखलापन, हमारे राजनीतिक आश्वासनों में झलक पड़ने वाली बेईमानी शायद इसलिए भी है कि हमने शब्दों का अवमूल्यन कर डाला है, कला को बाजार के हवाले कर दिया है और मुक्तिबोध के शब्दों में ऐसे ‘कीर्ति व्यवसायी’ हो गए हैं जिनके लिए कविता-कहानी या कोई भी साहित्यिक उद्यम अपने लिए छोटे लाभ अर्जित करने का जरिया भर रह गए हैं.

लेकिन राजनीति और साहित्य के बीच घटती इस दूरी का, लोकतंत्र के महापर्व में वास्तविक संस्कृति की अनुपस्थिति का खामियाजा सिर्फ लेखकों और संस्कृतिकर्मियों को नहीं, पूरे समाज को भुगतना पड़ेगा. राजनीति के एजेंडे पर संस्कृति हो और वह सच्चे अर्थों में हो, यह जरूरी है. क्योंकि ऐसा कोई सांस्कृतिक एजेंडा होगा और उसको देखने की मजबूरी होगी तभी यह बात समझ में आएगी कि लोगों के होने का क्या मतलब होता है, उनकी खुशहाली की परिभाषा क्या होती है और कैसे हम विकास के इस्पाती बियावानों में भटकते जानवरों की तरह नहीं, मनुष्य की तरह एक स्वस्थ समाज की कल्पना और कामना कर सकते हैं. सवाल है, राजनीति यह एजेंडा लाएगी क्यों? यह काम तो अंततः संस्कृति के मोर्चे पर ही करना होगा- आखिर हमारे एक पुरखे ने ही कहा है कि साहित्य समाज के आगे जलने वाली मशाल है.

पलटी से पलटा पासा

अख्तरुल के फैसले से जद (यू) किशनगंज लोकसभा सीट बिना लड़े ही हार गया है.
अख्तरुल के फैसले से जद (यू) ककशनगंज
लोकसभा सीट बिना लड़े ही हार गया है.

15 अप्रैल को 16वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव का अहम दिन था. 17 अप्रैल को संपन्न हुए दूसरे चरण के मतदान के लिए सार्वजनिक तौर पर प्रचार करने का आखिरी दिन. बिहार में नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह जैसे तमाम दिग्गज एक- दूसरे पर वाकप्रहार करने में लगे हुए थे कि शाम तक एक बड़ी खबर ने सभी खबरों को दरकिनार कर दिया. जद(यू) के किशनगंज प्रत्याशी अख्तरुल ईमान ने घोषणा कर दी कि वे चुनाव नहीं लड़ेंगे. ईमान ने यह घोषणा तब की जब किशनगंज में नाम वापस लेने की आखिरी तिथि भी गुजर चुकी थी.

ईमान के इस फैसले से बिहार के सियासी गलियारे में भूचाल-सा आ गया. मुस्लिम मतों को एकीकृत करने में लगे लालू यादव के लिए यह खबर खुशियों की सौगात लेकर आई. उधर, अतिपिछड़े और महादलितों के बाद मुस्लिम समुदाय के मतों पर ही उम्मीद टिकाए नीतीश कुमार की पार्टी लिए खबर अंदर तक हिला देनेवाली थी. कांग्रेस की खुशी स्वाभाविक थी, क्योंकि ईमान ने अपनी उम्मीदवारी कांग्रेस प्रत्याशी व किशनगंज के मौजूदा सांसद और कांग्रेस नेता असरारुल हक के लिए ही छोड़ी थी. अपने बयान में उन्होंने कहा, ‘आरएसएस के इशारे पर भाजपा सीमांचल के इलाके में नफरत की सियासत करना चाहती है. गुजरात के दंगाइयों को हम यहां पांव नहीं पसारने देना चाहते, इसलिए यह फैसला लिए.’

एक तो वैसे ही कई सर्वे बता रहे हैं कि बिहार में नीतीश कुमार का जादू बिखर रहा है. तिस पर जद(यू) के लिए यह झटका कोढ़ में खाज की तरह आया है. अख्तरुल ईमान कोई बड़े नेता तो नहीं, लेकिन हालिया वर्षों में अपने तेज-तर्रार बयानों और सीमांचल इलाके में मुसलमानों की गोलबंदी करने की वजह से वे चर्चित नेता के तौर पर उभरे थे. किशनगंज से लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी बनने के पहले तक वे राजद के विधायक थे. वे उन विधायकों के गुट में शामिल थे जिन्होंने हाल ही में एक ही दिन सामूहिक तौर पर राजद से नाता तोड़ लिया था. अब अख्तरुल द्वारा किशनगंज पर अपना दावा छोड़ देने और अपने साथ-साथ जद(यू) को भी आत्मसमर्पण करवा देने के बाद सियासी गलियारे में यही सवाल प्रमुखता से उठ रहे हैं कि आखिर उन्होंने ऐसा क्यों किया.

इस मुद्दे पर विभिन्न दलों के नेताओं ने अपने-अपने हिसाब से बयान दिए. लेकिन नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव की ओर से कोई ठोस बयान तुरंत नहीं आए. वजहें कई रही होंगी, लेकिन एक प्रमुख वजह यह मानी गई कि लालू ने नीतीश कुमार की बिछाई बिसात पर ही उन्हें मात दे दी. चुनाव के पहले राजद से अख्तरुल समेत नौ नेताओं को अपने पाले में करने की कोशिश कर जद(यू) ने राजद को औंधे मुंह गिराने की कोशिश की थी.कहा जा रहा है कि अब अख्तरुल ने बीच चुनाव में नीतीश की उम्मीदों पर पानी फेरा है तो यह अख्तरुल के विश्वासघात का मामला कम है और लालू द्वारा हिसाब-किताब बराबर करने का मामला ज्यादा.

सवाल यह है कि उनके ऐसा करने से किसे सबसे ज्यादा फायदा होगा और किसे नुकसान. बिहार में करीब 16 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं. इस समूह पर भाजपा को छोड़कर सबकी नजर है. लालू प्रसाद का मुसलमानों के बीच पुराना आधार रहा है. नीतीश कुमार मुसलमानों के बीच नये चैंपियन बने हैं. कांग्रेस को इस बार मुसलमानों का वोट अपेक्षाकृत आसानी से मिलने की बात कही जा रही है क्योंकि अल्पसंख्यक समुदाय में यह धारणा साफ तौर पर बनी है कि अगर दिल्ली के तख्त पर नरेंद्र मोदी को रोकना है तो उसमें सबसे ज्यादा कारगर कांग्रेस ही होगी.

जानकारों के मुताबिक बिहार में सबसे सघन मुस्लिम आबादी (69 फीसदी) वाले संसदीय क्षेत्र किशनगंज से अख्तरुल का दावेदारी छोड़ना जद(यू) को नुकसान पहुंचाएगा. दरअसल इससे सीमांचल की दूसरी सीटों पर भी यह साफ संदेश गया है कि नीतीश कुमार नहीं बल्कि राजद-कांग्रेस नरेंद्र मोदी को रोकने में सक्षम है. अख्तरुल के इस फैसले से खुश होकर भी भाजपा मायूस है. इसकी वजह यह है कि इस बार किशनगंज की सीट पर दो मजबूत मुस्लिम उम्मीदवारों के रहने से उसे हिंदू मतों के ध्रुवीकरण और पार्टी प्रत्याशी दिलीप जायसवाल की जीत की उम्मीद थी, लेकिन अख्तरुल के इस दांव से भाजपा के लिए समीकरण बदल गए हैं.

इस बार राजद और जद(यू), दोनों ही पार्टियों ने लोकसभा चुनाव में मुसलमानों को अपने पक्ष में करने के लिए सबसे बड़ा दांव खेला है. नीतीश कुमार की पार्टी जद(यू) ने इस बार भाजपा से अलगाव के बाद अप्रत्याशित तौर पर मुस्लिम प्रत्याशियों की संख्या में वृद्धि की है. उसने बिहार में पांच मुस्लिम प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है. राजद ने जद(यू) को भी पछाड़ते हुए छह प्रत्याशियों को टिकट दिया है. भाजपा और लोजपा ने एक-एक मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारा है और राजद से समझौते के बाद 12 सीटों पर चुनाव लड़ रही कांग्रेस ने सिर्फ एक मुस्लिम प्रत्याशी असरारुल हक को ही टिकट दिया है जो मौजूदा सांसद हैं–उसी किशनगंज से, जहां मुस्लिमों की आबादी सर्वाधिक है और जहां जद(यू) के उम्मीदवार अख्तरुल ईमान ने उन्हें समर्थन दे दिया है. पिछले लोकसभा चुनाव में किशनगंज की सीट पर भाजपा ने जद(यू) को चुनाव लड़ने दिया था. लेकिन जीती कांग्रेस जबकि जद(यू) पर वहां मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप भी लगे थे.

कोण कई लड़ाई वही

 अर्जुन मुंडा और दूसरे नेताओं के साथ विघतवरण महतो.
अर्जुन मुंडा और दूसरे नेताओं के साथ विघतवरण महतो.

झारखंड के कई नेताओं के मन में इस बात की कसक रहती है और वे अक्सर शिकायत भी करते रहते हैं कि पड़ोस का बिहार, बिहार की राजनीति, बिहार के नेता तो हमेशा चर्चा में रहते हैं, लेकिन झारखंड की राजनीति की थाह उस तरह से नहीं ली जाती. यहां की राजनीति पर तभी बात होती है, जब सत्ता का परिवर्तन होता है. वैसे उनकी बात एक बड़ी हद तक सही ही है. इस बार के लोकसभा चुनाव में भी झारखंड का कुछ-कुछ वैसा ही हाल है. बिहार की राजनीति में क्या हो रहा है, उसकी खबरें रोज मिर्च-मसाले के साथ आ रही हैं, लेकिन पड़ोस के झारखंड की राजनीति में क्या हो रहा है, इस पर न कहीं कोई ज्यादा चर्चा है न बात जबकि झारखंड में भी घटनाएं कोई कम नहीं घट रहीं.

14 संसदीय सीटों वाले झारखंड में राजनीतिक लड़ाई बिहार से कम दिलचस्प स्थिति में नहीं है. फिलहाल लगभग आधी सीटों पर भाजपा का कब्जा है. पार्टी अपने इस पुराने गढ़ को न सिर्फ बचाना चाहती है, बल्कि और मजबूत करना चाहती है इसलिए आरएसएस के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले की ऊर्जा यहां लगी हुई है और उनके दिशा-निर्देश में संघ परिवार की पूरी ताकत भी. यहां तीन सीटों को बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इनमें एक जमशेदपुर की है, दूसरी हजारीबाग की और तीसरी राजधानी रांची की. जमशेदपुर वह सीट रही है जहां से भाजपा के सांसद राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा हुआ करते थे. लेकिन उनके द्वारा सीट खाली करने पर वहां डॉ अजय कुमार का कब्जा हो गया, जो पूर्व आईपीएस अधिकारी थे और बाबूलाल मरांडी की पार्टी झारखंड विकास मोर्चा से चुनाव लड़कर विजयी हुए थे. भाजपा किसी भी तरह से यह सीट वापस चाहती है और इसके लिए मुंडा पर चुनाव लड़ने का दबाव भी था. लेकिन बताया जा रहा है कि राज्य में आगामी दिनों में विधानसभा चुनाव की संभावना को देखते हुए अर्जुन मुंडा किसी भी तरह राज्य की राजनीति से अलग होकर सांसद बनकर अपनी संभावनाओं के द्वार को बंद नहीं करना चाहते थे इसलिए वे वहां से चुनाव लड़ने को तैयार नहीं हुए. मुंडा की जगह वहां भाजपा ने विद्युतवरण महतो को उम्मीदवार बनाया है जो हाल ही में झारखंड मुक्ति मोर्चा का दामन छोड़ भाजपा में शामिल हुए थे. इसे लेकर भाजपा में नाराजगी भी है लेकिन अर्जुन मुंडा की पसंद के उम्मीदवार होने की वजह से खुलेआम विरोध नहीं हो रहा. दूसरी महत्वपूर्ण सीट हजारीबाग है जहां से भाजपा के वरिष्ठ नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा चुनाव जीतते रहे हैं. इस बार उन्होंने अपने बेटे जयंत सिन्हा को उम्मीदवार बना दिया है. जयंत अपने पिता की विरासत संभालते हुए आसानी से जीत हासिल कर लेंगे, कहना मुश्किल है क्योंकि वहां उनका इस बार मुकाबला कांग्रेस के चर्चित व युवा विधायक सौरव नारायण सिंह से हो रहा है जो हजारीबाग के राजघराने से ताल्लुक रखते हैं. साथ ही जयंत की टक्कर भाजपा के ही पूर्व विधायक रहे लोकनाथ महतो से भी है. लोकनाथ इस चुनाव में आजसू पार्टी से चुनावी मैदान में हैं.

लेकिन सबसे दिलचस्प मुकाबला तो राजधानी रांची की सीट पर है. यहां लड़ाई बहुकोणीय है. भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार रामटहल चौधरी हैं, जो पूर्व में कई बार सांसद रह चुके हैं. भाजपा से ही टिकट की उम्मीद पूर्व आइपीएस अधिकारी अमिताभ चौधरी लगाये हुए थे. कुछ माह पहले जब नरेंद्र मोदी की सभा हुई थी तो उसकी तैयारी में नरेंद्र मोदी के पक्ष में उन्होंने अपने होर्डिंग-पोस्टर आदि भी लगाए थे, लेकिन ऐन वक्त पर भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया तो वे बाबूलाल मरांडी की पार्टी झाविमो का दामन थामकर चुनाव मैदान में उतरे हैं. कांग्रेस के वर्तमान सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय भी रांची से ही मैदान में हैं. हाल में कई वजहों से उनकी लोकप्रियता का ग्राफ गिरा है इसलिए बताया जाता है कि उनके नाम पर नैया पार होने की उम्मीद उनकी अपनी पार्टी कांग्रेस को भी नहीं थी, लेकिन रांची संसदीय सीट से ही राज्य के पूर्व उप मुख्यमंत्री और आजसू पार्टी के मुखिया सुदेश महतो के उतर जाने से सुबोध की मुश्किलें कुछ कम हुई हैं. माना जा रहा है कि महतो कुरमियों के नेता हैं और रांची संसदीय सीट के अंतर्गत आनेवाली दो विधानसभा सीटों पर उनकी पार्टी का कब्जा है, इसलिए वे जो भी वोट काटेंगे भाजपा के खाते से ही काटेंगे. यह भी कहा जा रहा है कि सुदेश खुद की जीत से ज्यादा भाजपा उम्मीदवार रामटहल की हार के लिए चुनाव लड़ रहे हैं. रांची और आसपास के इलाके में रामटहल की पहचान भी भाजपा नेता के साथ ही कुरमियों के नेता के तौर पर है और सुदेश हालिया वर्षों में उभर रहे कुरमियों के सबसे बड़े नेता हैं. सुदेश जानते हैं कि यदि रामटहल इस बार चुनाव हार जाते हैं तो संभवतः वे राजनीति से आउट हो जाएंगे और उसके बाद फिर उन्हें कुरमियों का सर्वमान्य व सबसे बड़े नेता के तौर पर स्थापित होने में सहूलियत मिलेगी. कांग्रेस के लिए एक मुश्किल रांची से ही सटे मांडर विधानसभा के विधायक और राज्य के पूर्व मंत्री व चर्चित आदिवासी नेता बंधु तिर्की का तृणमुल कांग्रेस का उम्मीदवार बनकर मैदान में उतरना भी है. बंधु की पकड़ आदिवासी वोटों पर ठीक-ठाक मानी जाती है और उसमें भी विशेषकर ईसाई मतों पर उनकी गहरी पकड़ है इसलिए वे कांग्रेस का वोट भी काटेंगे, ऐसा माना जा रहा है. आम आदमी पार्टी ने यहां मुस्लिम उम्मीदवार उतारकर कांग्रेस के लिए एक और मुश्किल पैदा की है. इस तरह राजधानी रांची में कोई नहीं कह पा रहा कि ऊंट किस करवट बैठेगा.

समर्थकों के साथ कांग्रेस प्रत्याशी सुबोधकांत सहाय
समर्थकों के साथ कांग्रेस प्रत्याशी सुबोधकांत सहाय

इन सबके बीच झारखंड में सबसे कांटे की टक्कर इस बार झारखंड में संथाल परगना इलाके की प्रमुख सीट दुमका पर है. यहां से दो आदिवासी दिग्गज नेता आमने-सामने हैं. एक तरफ आदिवासियों के सबसे चर्चित नेता,झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख और राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पिता शिबू सोरेन हैं तो दूसरी तरफ झारखंड विकास मोर्चा के प्रमुख व राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी. संथाल परगना आदिवासी बहुल इलाका है और झामुमो का गढ़ माना जाता है. बताया जा रहा है कि बाबूलाल मरांडी ने यहां से चुनाव लड़ने का फैसला कर एक तरह से जोखिम लिया है, लेकिन इसके पीछे उनका बड़ा मकसद भी है. हालिया दिनों में भाजपा ने भी तेजी से संथाल परगना में अपने आधार का विस्तार किया है. बाबूलाल जानते हैं कि अगर वे शिबू सोरेन को परास्त कर देंगे तो इसका संदेश पूरे राज्य में जाएगा और आदिवासियों के नये बड़े नेता के तौर पर उन्हें स्थापित होने में सहूलियत होगी. बाबूलाल मरांडी पहले भी शिबू पर जीत हासिल कर चुके हैं, लेकिन तब वे भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता हुआ करते थे.

लड़ाई और भी कई सीटों पर दिलचस्प है. राज्य में एक सीट ऐसी भी है, जहां भाकपा माले की स्थिति काफी अच्छी मानी जा रही है. कोडरमा सीट से भाकपा माले के प्रत्याशी राजकुमार यादव मैदान में हैं.राजकुमार कई बार यहां चुनाव लड़ चुके हैं और हमेशा मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रहे हैं. इस बार उनकी स्थिति अच्छी होने से उनके पक्ष में संभावना की बात भी कही जा रही है.

झारखंड मुक्ति मोर्चा ने राज्य में सरकार बनाने और बचाने के एवज में अधिकांश सीटें कांग्रेस को दे दी हैं इसलिए उसके पास अपने सबसे बड़े नेता शिबू सोरेन की प्रतिष्ठा बचाने के अलावा बहुत कुछ बड़ा नहीं है. लेकिन कांग्रेस की परीक्षा इस राज्य में इसलिए होनी है, क्योंकि राज्य बनाने का श्रेय लेने के बाद से भाजपा उतार-चढ़ाव के बावजूद इस गढ़ में मजबूत स्थिति में रही है.

कुल मिलाकर इस चुनाव में खोने-पाने की मुख्य लड़ाई कांग्रेस और भाजपा ही लड़ रही है. बीच में इन दोनों पार्टियों के एकाधिकार और मजबूत वर्चस्व को तोड़ने के लिए झामुमो, आजसू, झाविमो समेत कई पार्टियां मजबूती से दस्तक दे रही हैं.