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मराठी मानुस!

मेलससन बनर्सन मूल देश अमेलरका
मेलससन बनर्सन मूल देश अमेलरका
मेलससन बनर्सन मूल देश अमेलरका

‘कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी’ वाले हमारे देश में सुदूर देश/गांव की भाषा समझना आम लोगों के लिए भी व्यवहारिक दिक्कतें खड़ी कर देता है. और अगर समझने के बाद उसका ज्ञाता होना और उसमें शिक्षक की तरह निपुण होकर छोटे बच्चों को पढ़ाया जाना भी शामिल हो तो भाषा की यह मुश्किल हद दर्जे की दुरूह हो जाती है. जैसा की मशहूर भाषाविद नोम चोमस्की कहा करते हैं, ‘बच्चों में कई भाषाओं को एक साथ सीखने-समझने की क्षमता वयस्कों से ज्यादा होती है.’ लेकिन अमेरिका की मेक्सिन बर्नसन कुछ अलग ही तरह की वयस्क और भाषाविद हैं. उन्होंने भारत की एक क्षेत्रीय भाषा मराठी वयस्क होने पर ही सीखी. और इस गहराई के साथ आत्मसात कर ली कि अब वे कई सालों से महाराष्ट्र के सतारा जिले के फाल्टन कस्बे में गरीब बच्चों को मराठी सिखाती हैं. लेकिन 76 वर्षीय मेक्सिन की उपलब्धि यहीं खत्म नहीं होती.

मेक्सिन को फाल्टन में भूले-बिसरे तबकों के गरीब दलित बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए प्रगत शिक्षण संस्था जैसी एक सार्थक पहल करने के लिए भी जाना जाता है. इस संस्थान में दलित वर्ग से आए बच्चे सामान्य श्रेणी के बच्चों के साथ इस तरह घुल-मिलकर पढ़ते हैं सामाजिक ऊंच-नीच यहां सूक्ष्मदर्शी की जांच में भी पकड़ में न आए. हमारे देश के कई सरकारी और गैर-सरकारी स्कूल इस असमानता से पटे पड़े हैं और महंगे प्राइवेट स्कूलों के इस दौर ने इस खाई को और गहरा कर दिया है. ऐसे समय में एक छोटे कस्बे में यह सफल प्रयोग करने का श्रेय मेक्सिन को जाता है जिनका मानना है, ‘भाषाई अनुसंधान से यह साबित होता है कि अगर सभी तबकों के बच्चे साथ मिलकर पढ़ते हैं तो बर्ताव और बात करने के तरीके से यह पता करना बेहद मुश्किल होता है कि वह कथित निचले तबके से आता है.’ यही फलसफा इस संस्था को और साथ ही मेक्सिन को अलहदा रूप देता है. यही इस संस्था की सच्ची शिक्षा भी है.

मिशीगन, अमेरिका के एक छोटे-से कस्बे एस्कनाबा में जन्मी मेक्सिन के पिता नार्वे से विस्थापित हो अमेरिका आए थे और मां का परिवार फिनलैंड से. भारत से पहला परिचय ग्यारहवीं क्लास में हुआ जब एक पत्रकार ने 1950 के अपने भारत भ्रमण का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे आजादी के बाद भारत सिर्फ तीन साल में ही लोकतांत्रिक तरीके से बेहतर ढंग से आगे बढ़ रहा है. वे बताती हैं, ‘वह बात बड़ी रोचक और साथ ही विस्मित करने वाली थी क्योंकि भारत के पड़ोसी चीन ने ठीक विपरीत साम्यवादी रास्ता अपनाया हुआ था. तभी मैंने फैसला कर लिया था कि मैं एक दिन खुद भारत जाकर यह लोकतांत्रिक प्रयोग जरूर देखूंगी.’ शुरू से ही मिली-जुली संस्कृति में पढ़ने वाली मेक्सिन ने कोलंबिया विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एमए करने के बाद भारत आकर हैदराबाद के विवेकवर्धनी कालेज में अंग्रेजी लेक्चरर के तौर पर पढ़ाना शुरू किया. इसी समय मेक्सिन ने पहली बार मराठी सीखी और मराठी का क्रेश कोर्स करने पुणे भी गई. दो साल यहां काम करने के बाद मेक्सिन अपनी पीएचडी के लिए वापस अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिलवेनिया लौट गईं. यहां उनका विषय था भाषाविज्ञान और भारतीय भाषाएं. वहीं उनकी मुलाकात इरावती पर्वे नाम की एक शिक्षिका से हुई. चूंकि मेक्सिन के शोध का विषय मराठी की विभिन्न बोलियों पर था और इरावती ने फाल्टन कस्बे का सोशल सर्वे किया हुआ था, इसलिए इरावती ने शोध के लिए मेक्सिन को फाल्टन जाने की सलाह दी. इस तरह वे 1966 में अपनी पीएचडी के लिए फाल्टन आई और फिर यहीं की होकर रह गयी. ‘मैं 1966 में भारत आई और 1972 तक आते-आते मुझे लगने लगा कि अंदर ही अंदर मैं भारत में ही रहने का फैसला कर चुकी हूं.’ इसके बाद भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन देने की वजह बताते हुए मैक्सिन कहती हैं, ‘मैं यहां तभी रुकना चाहती थी जब मैं भारतीय समाज को अपना पूरा योगदान दे सकूं और वह देश की नागरिकता हासिल करने के बाद ही संभव था.’

इसी दौरान मेक्सिन ने कुछ और शिक्षकों के साथ मिलकर स्कूल नहीं जाने वाले दलित बच्चों के लिए ‘आपली शाला’ की नींव रखी. वे बताती हैं, ‘शुरू में हमने इसे शिक्षा के वैकल्पिक प्रोग्राम की तरह लिया ताकि जो गरीब दलित बच्चे स्कूल नहीं जा सकते थे उन्हें लिखना-बोलना-पढ़ना सिखाया जा सके. लेकिन हमें जल्द ही यह बात समझ आ गई कि हमारा मुख्य काम उन बच्चों को मुख्यधारा के स्कूलों में दाखिला दिलवाना, उन्हें पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करना और कक्षा में सफल बनाना है.’ 1978 से 1985 तक वे आपली शाला संभालती रहीं और अपना भाषा संबंधी शोध भी करती रहीं. साथ ही अपनी जीविका के लिए हर साल कुछ वक्त के लिए अमेरिका जाकर कालेज के छात्रों को मराठी भी पढ़ाती रहीं. मेक्सिन आगे कहती हैं, ‘इस दौरान काफी लोगों ने कहा कि मुझे एक पूर्णकालिक स्कूल खोलना चाहिए. लेकिन मैंने हर बार इस विचार का विरोध किया क्योंकि मैं सरकारी स्कूलों की शिक्षा प्रणाली पर ज्यादा विश्वास करती थी न कि प्राइवेट स्कूलों की. इसलिए जो भी मुझसे स्कूल खोलने के लिए कहता तो मेरा सीधा जवाब होता कि मैं अपना वक्त दलितों के बच्चों को पढ़ाने के लिए लगाना चाहती हूं न कि एलीट क्लास के बच्चों को.’ मगर धीरे-धीरे उन्हें यह समझ आने लगा कि अच्छी शिक्षा की जरूरत दलितों के अलावा दूसरे बच्चों को भी है. इस बात को समझते हुए उन्होंने 1984 में प्रगत शिक्षण संस्था को पंजीकृत कराया. इसके अंतर्गत कमला निंबकर बालभवन की शुरुआत हुई. बालवाड़ी से शुरू हुए इस स्कूल में हर साल एक नई कक्षा जुड़ती गई और अब यहां दसवीं तक की कक्षाएं लगती है. 1997 में निकले दसवीं के पहले बैच के सभी 14 बच्चे पास हुए और तब से अब तक दसवीं का रिजल्ट 100 फीसदी रहा है.

कमला निंबकर बालभवन में दाखिल होते ही आप समझ जाएंगे कि यह स्कूल बाकी स्कूलों से कितना अलग है. हो सकता है आपको किसी कक्षा में छात्र छोटे-छोटे समूहों में सब्जियां और फल काटते हुए मिलें जिनको मिलाकर कुछ देर में सलाद बनाया जाएगा. साथ ही एक शिक्षक भी मिले जो बता और पूछ रहा हो कि किस सब्जी या फल में कौन-सा विटामिन है. यह भी हो सकता है कि अगली कक्षा में किसी पाठ का नाट्य रूपांतर चल रहा हो जिसमें छात्रों के अलावा शिक्षक भी कोई पात्र अभिनीत कर रहा हो. इस स्कूल की नींव रखते वक्त ही कुछ नियम बना दिए गए थे जिन्हें आज भी कोई नहीं तोड़ता. स्कूल में सभी धर्म-संप्रदाय-जाति के बच्चों को दाखिला मिलेगा और पिछड़ी जाति के बच्चों के दाखिले के लिए सम्मिलित रूप से विशेष प्रयास किए जाएंगे. स्कूल का वातावरण बोझिल न होकर हंसी-खुशी और आजाद ख्यालों का होगा. पढ़ाई का माध्यम मराठी होगा लेकिन अंग्रेजी भी पहली कक्षा से ही पढ़ाई जाएगी और उसपर जरूरी ध्यान दिया जाएगा. यहां कक्षाएं बड़ी और हवादार हैं, लाइब्रेरी में अनेकों विषयों की किताबों की भरमार है, लड़के-लड़कियां साथ पढ़ते-खेलते हैं और शिक्षकों को बाहर ट्यूश्न देने की मनाही है. कमला निंबकर बालभवन के छात्रों की प्यारी मेक्सिन मौसी के अनुसार, ‘मैंने शुरू में ही फैसला कर लिया था कि यह स्कूल शिक्षा के मरुस्थल में सिर्फ एक खूबसूरत उद्यान की तरह नहीं होगा बल्कि एक ऐसा केंद्र होगा जहां पर दूसरे स्कूलों को भी बेहतर बनाने के लिए काम किया जाएगा, खासतौर पर सरकारी स्कूलों को.’ इसीलिए यहां एक प्रोग्राम चलाया जाता है जिसमें संस्थान के शिक्षक दूसरे सरकारी स्कूलों में नियमित तौर पर जाकर वहां के छात्रों को कुछ नया सिखाने का प्रयास करते हैं.

1986 में मेक्सिन ने इस अवधारणा के साथ इस स्कूल की नींव रखी थी कि यहां बच्चे जाति आधारित असमानता को नजरअंदाज करते हुए हंसते-खेलते शिक्षा प्राप्त कर सकें और जहां सिर्फ इम्तिहानों में अच्छे नंबर लाना ही आखिरी मंजिल न हो. आज, यहां की शिक्षा कार्यप्रणाली,  ‘ हमारी हिंदुस्तानी शिक्षा प्रणाली की कमजोर जड़ों को कैसे मजबूत किया जाए?’  वाले सवाल का एक बेहतर जवाब बन चुकी है.

उपनिवेशवाद का प्रतिवादी

फोटोः रेयाज उल हक
फोटोः रेयाज उल हक
फेलिक्स पैडल: मूल देश इंग्लैंड. फोटोः रेयाज उल हक

उनके निजी जीवन के बारे में लिखना जितना मुश्किल है, उतना ही सहज है उनसे आदिवासियों और उनके संघर्षों के बारे में बात करना. पहली नजर में ही विनम्र और आत्मीय लग जाने वाले फेलिक्स जॉन पैडल को आप विकासवाद के सिद्धांत के जनक चार्ल्स डार्विन के वंशज के रूप में जान सकते हैं लेकिन वे इसपर बात करने में संकोच करते हैं. यह संकोच अपनी निजी जिंदगी के तथ्यों को बात करते हुए और बढ़ जाता है. हालांकि खनन व हथियार उद्योग के बीच रिश्ते, विश्व की सत्ता संरचना पर विश्व बैंक की हुकूमत, दुनिया की राजनीतिक नब्ज में दौड़ते कर्जे और भ्रष्टाचार को पहचानने की कोशिश करते हुए वे बहुत आसानी से आपको उस दुनिया में ले जाते हैं जो इंसानों के शोषण के लिए विकसित की जा रही है.

फेलिक्स उसी लंदन जन्मे और पलेबढ़े हैं जहां मौजूद लंदन मेटल एक्सचेंज दुनिया के खनिज व्यापार और इसके साथ ही हथियारों के निर्माण की एक अहम कड़ी है. और इसीलिए फेलिक्स की दिलचस्पी भारत में जगी जहां दुनिया के सबसे पुराने समुदाय बसते हैं. जहां की खनिज संपदा पर पूरी दुनिया के कॉरपोरेट जगत की निगाह शुरू से रही है. वे याद दिलाते हैं कि किस तरह हिटलर या उसके एक धातुविज्ञानी ने कहा था, ‘जिसका ओडिसा के लोहे पर कब्जा होगा वह दुनिया पर कब्जा कर सकता है.’

फेलिक्स उस भारत के बारे में सुनते आए थे जहां की संपदा और संसाधनों पर ब्रिटेन का साम्राज्य खड़ा था. एक ब्रिटिश मनोविश्लेषक जॉन हंटर पैडल और हिल्डा बर्लो, हिल्डा चार्ल्स डार्विन की परपोती थीं, के बेटे फेलिक्स को भारत के संसाधन और ब्रिटिश समाज की संपन्नता के बीच के संबंध हमेशा से अपनी ओर खींचते थे. उनके चिंतन का केंद्र यह भी रहा कि आखिर समाज कैसे बनते हैं. उनके बीच फर्क कैसे आते हैं.

इन सवालों के जवाब की तलाश करते हुए फेलिक्स खनन की दुनिया तक पहुंचे जहां उनकी नजर एंथ्रोपोलॉजिस्ट यानी मानवशास्त्री की थी. उन दिनों वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के छात्र थे और गंभीरता से खनन उद्योग और मानव समाजों पर इसके प्रभावों का अध्ययन करना चाहते थे. उनकी क्लास में पढ़ने वाले उनके एक दोस्त अमिताभ घोष (जिन्होंने सी ऑफ पॉपीज और द हंगरी टाइड जैसे उपन्यास लिखे हैं) ने सलाह दी कि ऑक्सफोर्ड के समाजशास्त्र के अध्यापक बस दिमागी खेल खेलते रहते हैं अगर गंभीरता से पढ़ाई और अध्ययन करना है तो दिल्ली विश्वविद्यालय जाना चाहिए.

भारत में आने के फैसले ने उनके जीवन की दिशा बदल दी. या कहें कि एक तरह से तय कर दी. 1979 में एक छात्र के रूप में भारत आने वाले फेलिक्स हमेशा के लिए भारत में बस जाने वाले थे. हालांकि तब वे यह बात नहीं जानते थे. तब तो उन्हें मानवशास्त्र के एक उत्सुक और उत्साही छात्र के रूप में शोध करना था. उन आदिवासी समुदायों के बीच रहना था जो पिछली अनेक शताब्दियों से उस जमीन पर रहते आ रहे थे जिसके नीचे अथाह खनिज भंडार था. ये वे समुदाय हैं जिनकी जिंदगी की बुनियादी गतिविधियां जिन प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर हैं, वे आधुनिक उद्योगों और युद्धों के लिए महत्वपूर्ण बनते जा रहे थे.

दिल्ली विश्वविद्यालय में उन्हें जेपीएस ओबरॉय और वीणा दास जैसे अध्यापक मिले जिन्होंने आदिवासी समाजों और उनमें प्रचलित रीति-रिवाजों को समझने में मदद की. फेलिक्स ने अपने अध्ययन की शुरुआत आदिवासी समाज और ब्रिटिश उपनिवेशवाद के बीच के एक अजीब-से अंतर्विरोध से की. ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने जिन आदिवासी इलाकों पर कब्जा किया उनमें धरती को संतुष्ट करने के लिए इंसानों की बलि दी जाती थी. पश्चिमी समाज के लिए यह अमानवीय, बर्बर जीवनशैली थी. लेकिन फेलिक्स ने इस पर गौर किया कि इसके बावजूद यह रिवाज कम से कम इंसानी जिंदगी की पवित्रता और इसके महान मूल्य की तरफ इशारा करता है. उन्होंने देखा कि आधुनिक कहे जाने वाले समाजों में हिंसा का स्तर कहीं ज्यादा है. उनके मुताबिक, ‘एक मुट्ठी भर अभिजात वर्ग के मुनाफे के लिए चलाए जा रहे युद्ध और हथियारों के उद्योग और कारोबार जिस तरह टकरावों को बढ़ावा देते हैं वे न सिर्फ समाज पर हिंसा को थोपते हैं बल्कि वे इंसानी जिंदगी की महत्ता को भी पूरी तरह नकारते हैं. इस तरह पश्चिमी समाजों से पैदा हुई ताकत और अधिकार दूसरी संस्कृतियों के लोगों को सभ्य बनाने के नाम पर उन पर थोपे जाते हैं. इस पूरी प्रक्रिया में जो क्रूरता और अमानवीयता शामिल होती है, वह इंसानी बलि से कई गुणा अधिक है.’

फेलिक्स ने अपने शोध को ओडिशा के कोंड आदिवासी समुदाय पर केंद्रित किया और इस समाज पर ब्रिटिश उपनिवेशवाद के प्रभावों की कई पहलुओं से पड़ताल की. इस शोध के लिए वे आदिवासी समुदायों के बीच कई वर्षों तक रहे और इस दौरान वे एक छात्र या शोधकर्ता के बतौर नहीं बल्कि आदिवासियों से सीखने और उन्हें समझने की ललक के साथ गए. वे अपने उस देश की क्रूरताओं और अमानवीय शोषण से रूबरू थे जिसका साम्राज्य दुनिया को सभ्य बनाने के अभियान पर था और हर उस चीज का प्रतिनिधि और मालिक होने का दम भरता था जो दुनिया में अच्छी और महत्वपूर्ण थी. फेलिक्स 1830 से 1860 के दशकों के बीच औपनिवेशिक हमले में कोंड आदिवासी समुदाय के दर्जनों गांवों को तबाह किए जाने और अनगिनत हत्याओं की यादों को जी रहे समुदाय के साथ अपने दिन और रातें बिता रहे थे.

फेलिक्स ने आदिवासी समाज को ही क्यों चुना? वे हंसते हैं, ‘इसके लिए आदिवासी इलाकों को लेकर ब्रिटिश औपनिवेशिक आकर्षण जिम्मेदार है. मेरे मन में हमेशा यह सवाल उठता रहा कि ब्रिटिश लोग भारत में शासन करने क्यों आए? और भारत में भी हमेशा वे आदिवासी इलाकों को अपने कब्जे में लाने की कोशिश क्यों करते रहे? और क्यों वे कभी इन इलाकों पर पूरा कब्जा नहीं जमा पाए? आदिवासियों से मेरे लगाव की यह वजह थी, यह बात भी मुझे उनकी तरफ खींचती थी कि आखिर वह क्या था, जिसकी वजह से आदिवासियों ने कभी अपना संघर्ष नहीं छोड़ा और हमेशा लड़ाई जारी रखी.’

एक बार आदिवासी इलाके में लंबा समय गुजार लेने के बाद फेलिक्स को बार-बार वे गांव अपनी तरफ खींचते रहे. भारत में अपने निवास के बीसवें साल में वे स्थायी रूप से ओडिशा में बस गए- अपनी उड़िया आदिवासी पत्नी के साथ रायगढ़ा जिले के एक दूर-दराज के गांव में. अपने आलोचकों और कार्यकर्ताओं के प्रति मौजूदा सरकारों के दमनकारी तौर-तरीकों के कारण फेलिक्स इस गांव की पहचान को आम करने से बचते हैं.

लेकिन ओडिशा के इन गांवों में रहते हुए उन्होंने दुनिया में सत्ता के सारे तौर- तरीकों को पहचानने की कोशिश की है. वे बताते हैं, ‘दुनिया में सत्ता की संरचना जिस तरह काम करती है उसे आप आदिवासी इलाकों में बहुत आसानी से पहचान और समझ सकते हैं. यहां की पुलिस, एनजीओ, मिशनरियों और व्यवस्था के दूसरे अंगों का जो रवैया होता है वह दुनिया की सत्ता संरचना के वास्तविक चरित्र का प्रतिनिधित्व करता है.’ दुनिया पर शासन कर रहा सत्ता तंत्र तरक्की को अपने हरेक कदम के जायज तर्क के रूप में पेश करता है. लेकिन एक मानवशास्त्री के रूप में वे तरक्की के इस दावे पर शक करते हैं. इसके लिए इतिहास भी उन्हें काफी ताकत मुहैया कराता है जिसमें तरक्की के साथ जोड़ी जाने वाली सारी सभ्यताएं असल में युद्धों और हथियारों के कारोबारों के दम पर स्थापित हुई थीं- चाहे वह रोमन सभ्यता हो या यूनानी सभ्यता. तब से लेकर आज तक हर साल युद्धों और लड़ाइयों में अथाह पैसा खर्च किया जाता है और इसे तरक्की के तर्क के साथ जायज ठहराया जाता है.

फेलिक्स दलील देते हैं, ‘यह कैसी तरक्की है, जिसमें सीआरपीएफ आदिवासियों को मारती है उनकी जान ले लेती है और उनको यह तक भरोसा नहीं है कि वह पुलिस या अदालत के पास जाएगा तो उन्हें इंसाफ मिलेगा? विकास तो तब कहा जाएगा जब आदिवासी को ऐसा यकीन हो. अभी तो आदिवासी इस कथित विकास की कीमत चुका रहे हैं. रास्ते और कारखाने बनाने को तरक्की बताया जा रहा है, जबकि ये गरीबों को और गरीब बनाते हैं.’

अपने शुरुआती अध्ययन में आदिवासी समुदायों पर गौर करने के बाद अब फेलिक्स दुनिया की अर्थव्यवस्था, हथियार उद्योग और खनन उद्योग के आपसी रिश्ते और पर्यावरण आदि मुद्दों पर गहरे अध्ययन में लगे हैं. वे इसे साफ करते हैं कि कैसे विकास की मौजूदा राजनीति के पीछे बड़ी कॉरपोरेट कंपनियां और विश्व बैंक की लुटेरी नीतियां हैं जो दुनिया भर के देशों को कर्जे में उलझा कर जनता और उसके संसाधनों को लूट रही हैं. उनका मानना है कि विश्व बैंक दुनिया की सत्ता संरचना को कर्जे के जरिए नियंत्रित करता है. वह इसके लिए निजीकरण को एक जरूरी औजार के रूप में इस्तेमाल करता है और भ्रष्टाचार का मुद्दा इसमें एक अहम भूमिका निभाता है. वे एक मिसाल देते हैं, ‘मान लीजिए विश्व बैंक के लोग अगर भुवनेश्वर आएंगे तो वे यहां के स्वास्थ्य मंत्रालय में भ्रष्टाचार को खोजेंगे. कहेंगे कि स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण कर दीजिए. लेकिन वे कभी नहीं देखेंगे कि खनन उद्योग में काम कर रही निजी कंपनियों में कितना भ्रष्टाचार है.’

यह फेलिक्स का शोध ही था जिसने कुछ साल पहले बॉक्साइट, जिसके अयस्क से अल्युमिनियम बनता है, के खनन के लिए वेदांता कंपनी द्वारा नियामगिरी पहाड़ की खुदाई का विरोध कर रहे कार्यकर्ताओं के पक्ष में मजबूत दलीलें मुहैया करवाई थीं. इस शोध में फेलिक्स ने दिखाया है कि किस तरह बमबार हवाई जहाजों, एटम बमों और दूसरी युद्ध सामग्री के निर्माण में अल्युमिनियम सबसे महत्वपूर्ण धातु है और आज के युद्ध बिना अल्युमिनियम के मुमकिन नहीं हैं.

फेलिक्स के अध्ययन को पेश करने वाली तीन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं- पहली किताब सैक्रिफाइसिंग पीपुल है, जो उनके डॉक्टरल शोध का संशोधित रूप है. दूसरी किताब आउट ऑफ दिस अर्थ है, जिसमें अपने सह लेखक समरेंद्र दास के साथ मिलकर फेलिक्स ने अल्युमिनियम की बढ़ती मांग, हथियार उद्योग और बॉक्साइट के खनन के कारण उत्तरी भारत के आदिवासियों की जिंदगी की तबाही के बारे में बताया है. तीसरी किताब इकोलॉजी इकोनॉमी है, जो उन्होंने अजय दांडेकर और जीमोल उन्नी के साथ मिलकर लिखी है. इसमें पर्यावरण के लिहाज से बेहतर अर्थव्यवस्था की तलाश की गई है.

फेलिक्स एक स्वतंत्र मानवशास्त्री के रूप में व्याख्यान देते हैं, निबंध लिखते हैं और एक कार्यकर्ता के रूप में आदिवासियों के बीच भी रहते हैं. साथ ही, उनको संगीत का बेहद शौक है और वे बहुत अच्छी सांगीतिक प्रस्तुतियां भी देते हैं. उन्हें वायलिन पर बॉब डेलान के उन गीतों को गाते हुए सुना जा सकता है जिनमें गैरबराबरी और नाइंसाफी के खिलाफ गुस्से की गूंज है. और लगभग हर बार उनका यह गुस्सा भारत में युद्धों, बड़े बांधों, खनन, विस्थापन और जनसंहारों के खिलाफ आवाजों के साथ जुड़ जाता है.

‘मेरा सरोकार स्त्री को लेकर मौज-मस्ती वाला नहीं है’

फोटोः पूजा सिंह
फोटोः पूजा सिंह
फोटोः पूजा सिंह

आपका नया उपन्यास  ‘फरिश्ते निकले’  एक तरह से यौन हिंसा की शिकार ग्रामीण स्त्रियों की कहानियों का कोलाज है. इन कहानियों के माध्यम से आप क्या बताना चाहती हैं?
उपन्यास में दो मुख्य पात्र हैं- बेला बहू और उजाला. इनकी ही कहानी मुख्य हैं. बाकी स्त्रियों की कहानियां पूरक हैं. ये दोनों स्त्रियां चाहती तो प्रेम हैं पर उन्हें प्रेम नहीं मिलता, यौन प्रताड़ना मिलती है. यह कितनी दुखदायी बात है कि प्रेम चाहने वाली स्त्री को समाज यौन हिंसा का पुरस्कार देता है. मेरा प्रश्न इस समाज से है कि आज भी स्त्रियों को यही सजा क्यों मिलती है? प्रेम का हक स्त्री को क्यों नहीं है? उपन्यास में लिली, बसंती आदि और भी लड़कियां हैं. इनके घर से भागने के पीछे कोई न कोई कारण जरूर रहा है. उदाहरण के लिए बसंती डाकुओं को खाना पहुंचाती है जिसके बदले में उसे पैसा मिलता है और घर का खर्च चलता है. यानी वह जरिया बन जाती है घर में पैसा लाने का. अब यह क्या है? वेश्यावृत्ति तो दिखाई देती है पर इस विनिमय को हम क्या कहेंगे? समाज को भी इससे समस्या नहीं है. स्त्री का सबकुछ करना स्वीकार है पर प्रेम करना स्वीकार नहीं है. इस उपन्यास में एक और बात ध्यान देने लायक है जब उजाला का बलात्कार हुआ तो उसे सीने से लगाने वाली बेला बहू ही है कोई पुरुष नहीं. मैं यह कहना चाहती हूं कि स्त्री-स्त्री की दुश्मन नहीं बल्कि उसका विस्तार है.

बेला बहू विवाह संस्था के भीतर भी उत्पीड़ित है और प्रेम में भी. प्रेम उन्हें विवाह से भी बदतर स्थिति में पहुंचा देता है. ऐसे में स्त्री के पास विकल्प क्या है?
मेरे हर उपन्यास में एक विकल्प है. स्त्री के सच्चे साथी के रूप में एक पुरुष पात्र मेरे उपन्यासों में जरूर मौजूद होता है. इस उपन्यास में ऐसा साथी बलवीर है. दरअसल बेला बहू ने विवाह की अमानवीयता से किसी तरह छुटकारा पाने के लिए प्रेम का सहारा लिया पर उन्हें प्रेम की आड़ में एक शिकारी ही मिला जैसे जीवन के तमाम फैसले हमेशा सही नहीं होते वैसे ही प्रेम में चयन का फैसला भी गलत हो सकता है, किंतु इसमें बेला बहू का कोई कसूर नहीं है. उन्होंने तो पूरी ईमानदारी से प्रेम किया. प्रेम में धोखा नहीं मिलता तो उनकी मुक्ति संभव थी. मेरा मानना है कि सच्चा प्रेम ही विकल्प है.

आपकी स्त्री पात्र इतनी सशक्त और चेतना संपन्न होते हुए भी प्रेम के मामले में एकदम बेबस और लाचार क्यों नजर आती हैं? उनकी सोचने-समझने की शक्ति कहां चली जाती है?
प्रेम में हर स्त्री का बुद्धि विवेक एक सा नहीं होता. वैसे भी प्रेम का बुद्धि और तर्क से विरोध का ही रिश्ता है. मेरी स्त्रियां निश्छल और ईमानदार हैं. इसी कारण प्रेम में धोखा खाने के बाद उनका प्रतिरोध अपने तीव्रतम रूप में दिखाई देता है. मेरी स्त्रियां अगर निश्छल प्रेम नहीं करती तो क्रांति भी नहीं कर सकती थी. जब कोमल भावनाओं की हत्या होती है तभी वह अपने प्रचंडतम रूप में अभिव्यक्त होती है. मेरा मानना है कि प्रेम स्त्री की ताकत का बीज है.

आपके रचना संसार में ऐसी विवाहित या अविवाहित स्त्रियों की भरमार है जो अपने रोजमर्रा के जीवन में पुरुषों की यौन हिंसा झेलने को अभिशप्त है तो दूसरी तरफ नई पीढ़ी की कुछ बहुप्रचारित लेखिकाओं की रचनाओं में स्त्रियां पुरुषों के साथ बराबरी पर सौदेबाजी कर रही हैं. आपमें और इनमें इतना अंतर कैसे है?
मेरे लेखन का क्षेत्र इनके लेखन के क्षेत्र से भिन्न है. गांव की स्त्री का दुख उसकी आवाज और उसकी मुक्ति के रास्ते इनके लेखन से नदारद हैं. जब हम खाप पंचायतों की कहानियां लिखेंगे तो वहां समानता कैसे दिखेगी. हम खाप पंचायतों के फरमानों का क्या करें? गांव की तो छोड़ दीजिए ये लोग अपनी कहानियों में जो स्थितियां दिखा रही हैं क्या वह शहरों की भी वास्तविकता है? क्या शहरों में यौन हिंसा और बलात्कार की घटनाएं नहीं हो रही हैं. आज दिल्ली जो ‘रेप कैपिटल’ बन गई है, वह क्या है? वह जो दिखा रही हैं वह बड़े शहरों के एक छोटे से तबके की सच्चाई हो सकती है जो अपवाद है. शहरों में भी स्त्रियां कम उत्पीड़ित नहीं हैं. यह अपने-अपने सरोकार का सवाल है. मेरा सरोकार स्त्री को लेकर मौज-मस्ती वाला नहीं है.

आपकी रचनाओं में आई ग्रामीण स्त्रियां शहरों की पढ़ी-लिखी स्त्रियों की तुलना में अधिक संघर्षशील और चेतना संपन्न हैं. क्या आप मानती हैं कि आधुनिक शिक्षा और आधुनिकता ने स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में कुछ खास नहीं किया है?
चेतना सिर्फ किताबों से नहीं अनुभव और संघर्ष से पैदा होती है. मैंने शहरों में अनेकों डिग्रीधारी स्त्रियों को देखा है जो स्त्री चेतना से पूरी तरह रहित हैं. दरअसल, शहरी समाज ने इस ‘मिथ’ को गढ़ा कि ग्रामीण स्त्रियां मूर्ख और जाहिल होती हंै. मैंने अपनी रचनाओं के द्वारा इसी मिथ को तोड़ा है. मैं खुद ग्रामीण स्त्री हूं. मेरी चेतना को शहर ने पैदा नहीं किया है. शहरों की पढ़ी-लिखी लेखिकाओं की तुलना में मेरी रचनाएं क्या स्त्री चेतना से कम संपन्न हंै? ग्रामीण स्त्रियां शहरी स्त्रियों की तुलना में अधिक कर्मठ, साहसी और ईमानदार होती हैं.

अापने पितृसत्ता पर निर्मम प्रहार किए हैं. बावजूद इसके हिंदी साहित्य में आपका मुखर विरोध पुरुष रचनाकारों ने नहीं बल्कि स्त्री रचनाकारों ने किया है. यह विरोध आज भी उसी तरह जारी है. लेखिकाओं द्वारा अपने विरोध को कैसे देखती हैं?
स्त्री रचनाकारों का यह विरोध मेरे द्वारा पितृसत्ता को निशाने पर लेने के कारण नहीं है. यह आपसी ईर्ष्या-द्वेष के कारण हो सकता है. इन लेखिकाओं को लगा कि हम लोगों के बीच यह गांव की स्त्री कहां से आ गई. ठीक उसी तरह जैसे आज राजनीतिक दलों को लग रहा है कि यह केजरीवाल कहां से आ गया? मुझे लगता है कि उनका विरोध स्वाभाविक ही था क्योंकि वे बीस-तीस वर्षों से लिख रही थी और साहित्य में बिल्कुल नई होने के बावजूद मेरा ‘इदन्नमम’ उपन्यास आया और तहलका मच गया. यहीं से मैं सबको खटकने लगी. इसके बाद मेरे उपन्यास एक-एक करके जबरदस्त चर्चित होते गए और उसके साथ मेरा विरोध भी बढ़ता गया.

इस विरोध का बड़ा कारण राजेंद्र यादव के साथ आपका घनिष्ठ जुड़ाव तो नहीं था क्योंकि राजेंद्र यादव ने हिंदी में स्त्री विमर्श के नाम पर देह विमर्श को आगे बढ़ाया और आप उसकी प्रतीक बना दी गईं. उनके साथ जुडऩे से आपको साहित्यिक लाभ हुआ या हानि?
मैं बताना चाहती हूं कि जब ‘इदन्नमम’ आया तो उसमें स्त्री विमर्श जैसा कुछ भी नहीं था, फिर भी उसका विरोध हुआ. राजेंद्र यादव ने जिस तरह से उस पर पांच समीक्षाएं हंस में छापीं, मुझे लगता है इस कारण इस उपन्यास का विरोध शुरू हो गया. वैसे अन्य जगहों पर भी उसकी अच्छी समीक्षाएं आई थीं जहां राजेंद्र यादव का कोई दखल नहीं था. मैं आज तक तय नहीं कर पायी हूं कि राजेंद्र यादव से साहित्यिक संबंध के कारण मुझे लाभ हुआ या हानि. कुछ लोगों का मानना है कि इससे मेरा नुकसान हुआ है. जो पुरस्कार वगैरह मुझे मिल सकते थे, नहीं मिले. उनके सारे विरोधी उनसे कहीं अधिक मेरा विरोध करने लगे. लेकिन मैं इस साहित्यिक संबंध को अपने लिए अच्छा ही मानती हूं.

bookविभूति नारायण राय प्रकरण को लेकर राजेंद्र यादव से आपकी जबरदस्त लड़ाई हुई. लोगों का कहना है कि राजेंद्र यादव से जितने फायदे लेने थे आपने ले लिया. अब आप उनसे अलग दिखना चाहती थीं इसलिए इसे बहाना बनाया.
पता नहीं यह क्यों कहा गया? यह बहाना नहीं था विरोध का कारण था. अगर फायदे की ही बात है तो मुझे तो बहुत पहले अलग हो जाना चाहिए था. मैंने तो यह तथाकथित फायदा तो बहुत पहले ही उठा लिया था. इस बात में कहीं से कोई तथ्य नहीं है. उन्होंने विभूति नारायण राय के पक्ष में तीन-तीन संपादकीय लिखे. जब मैं स्त्रियों के पक्ष में वी एन राय के खिलाफ लड़ रही थी तो राजेंद्र यादव को कैसे माफ कर देती जो वी एन राय के पक्ष में खड़े हो गए थे.

फिर उन्हीं वी एन राय से संवाद के लिए आप कैसे तैयार हो गईं?
तब दो-तीन साल हो चुके थे. पाखी के संपादक ने कहा कि हम उसी विषय पर आप दोनों के बीच संवाद करना चाहते हैं. मैंने कहा कि अगर आप समझते हैं कि मैं डर रही हूं तो ऐसी बात नहीं है, मैं आऊंगी. बल्कि सच तो यह है कि जब वी एन राय ने सुना कि मैं आ रही हूं तो वे कतराने लगे. मैं यह भी देखना चाहती थी कि जिस व्यक्ति ने अपनी अभिव्यक्ति के लिए माफी मांगी है वह वास्तव में भी कुछ बदला है या सिर्फ पद बचाने के लिए माफी मांगी है. मैंने देखा उनकी सोच में कोई बदलाव नहीं आया है.

आप विवाह संस्था की तमाम सुविधाओं का लाभ उठा रही हैं. सफल वैवाहिक जीवन भी जी रही हैं. ऐसे में आपको विवाह संस्था की मुखालफत करने का नैतिक आधिकार कैसे है? आप खुद उदाहरण प्रस्तुत करतीं.
विवाह संस्था को मैं त्याग भी सकती थी, किंतु दूसरे पक्ष की भी तो भूमिका होती है जो जाने नहीं देती. मैं विरोध के लिए विरोध नहीं करती. विवाह संस्था में अगर पति साथी की तरह चले तो मैं उसके कतई विरोध में नहीं हूं. मेरा विरोध उन जकड़बंदियों से है जो स्त्री का जीवन दूभर कर देते हैं. सबसे कठिन होता है पुरुष को बदलना. छोड़ना तो आसान है. अगर स्त्री एक पुरुष को छोड़कर दूसरे के पास जाती है तो वह भी वैसा ही मिलता है. इसलिए मेरा कहना है कि स्त्रियां पुरुषों को छोड़ें नहीं, उन्हें बदलें. अगर बदलाव की कोई गुंजाइश ही न हो तो बात अलग है. मैंने भी अपने पति को बदला है.

‘आजकल थका-थका लगता है, डॉक्टर सा’ब’

मनीषा यादव
मनीषा यादव
मनीषा यादव

क्या ‘थकान लगना’ भी कोई बीमारी है? या कि यह मात्र अन्य बीमारियों का एक लक्षण मात्र है? या कि यह कुछ भी नहीं- बस मन की एक स्थिति है? दरअसल, तीनों ही बातें सही हो सकती हैं.

जब भी आपको बेहद थका-थका लगे और आप इस सिलसिले में अपने डॉक्टर से मिलने जाएं तो इन तीनों ही संभावनाओं के बारे में मन को तैयार करके जाएं. यही काफी नहीं. पहले मेरी लिखी यह टिप्पणी भी पढ़ लें. समझ लें. फिर बाकायदा तैयार होकर जाएं. वर्ना प्राय: आप कोई टॉनिक या विटामिन की गोलियों का नुस्खा झुलाते हुए

वापस आएंगे.

थकान को लेकर कुछ बातें जान लें और कुछ प्रश्नों का उत्तर तैयार रखें :

1. यह सब थकान ही है, या हम किसी और तकलीफ को थकान का नाम दे रहे हैं?
यह बात सबसे महत्वपूर्ण है. प्राय: हम अपनी ही तकलीफ को बेहद उड़ती-उड़ती और लापरवाह भाषा में डॉक्टर को बताते हैं. ‘सर, दो-चार-दस दिनों से, कुछ बुखार-फुखार टाइप हो रहा है’- ऐसा कहकर आप मात्र भ्रम ही पैदा करते हैं. तो पहले यह तय करें कि जो भी आपको हो रहा है वह थकान ही है? कहीं काम करने पर सांस फूल जाती हो और उसे ही आप थकान का नाम देकर कम आंकने की कोशिश तो नहीं कर रहे? कहीं जरा सी मेहनत  में ही आंखों के सामने अंधेरा या चक्कर तो नहीं आ जाते जिसे आप थकान बता रहे हो? कहीं जरा सा परिश्रम करने पर छाती तो भर नहीं जाती और आगे चलने से रोकती है- और इसे थकान मान बैठे हों आप?

मेरे पास बहुत बार ऐसे ही मरीज आते हैं. मालूम पड़ा कि एक सौ तीन बुखार है पर वे उसकी बात ही नहीं कर रहे. वे कह रहे हैं कि सर, बड़ी थकान लग रही है. बस. यदि बुखार होगा तो थकान तो होगी ही न. थकान का अर्थ थकान ही है. बैठे-बैठे भी हाथ-पांव थके से लगते हैं. काम करने की मानो क्षमता ही नहीं बची. हाथ-पांव टूटते से हैं. उठते ही नहीं. हम मानते हैं कि यह सब थकान के कारण हो सकता है, सो इसे भी थकान का नाम दे देते हैं. यदि डॉक्टर जल्दी में हो या गहराई से न पूछे तो उनसे कोई बड़ी बीमारी छूट सकती है. तो सोच समझकर अपनी तकलीफ सही से पूछें.

2. क्या थकान के साथ और भी कोई लक्षण हैं?
यदि थकान किसी अन्य बीमारी की वजह से हो रही है तो और लक्षण भी अवश्य होंगे. कई बार थकान इतनी ज्यादा होती है कि  हम दूसरे ‘छोटे-मोटे’ लक्षणों पर ध्यान ही नहीं देते. डॉक्टर को पूरी बात न बताई तो वह आपके हाथ में टॉनिक नाम का ‘जांबाजी का द्रव्य’ पकड़ा देगा.

सोचिए थकान के साथ कुछ और तो नहीं हो रहा?

कहीं हल्का बुखार तो नहीं हो रहता? (यह टीबी हो सकती है. मलेरिया तक ऐसा कर सकता है. औरतों में विशेषतौर पर, पेशाब तथा ‘पेल्विक’ क्षेत्र के इंफेक्शन ऐसे हो सकते हैं कि हल्का बुखार हो और बेहद थकान लगे. वैसे तो शरीर में किसी भी इंफेक्शन के चलते यह हो सकता है.)

सोचिए कि पेशाब और प्यास का क्या हाल है?(डायबिटीज का पहली बार पता कई बार इसी तरह से चलता है. बहुत थकान तो लगती ही है, साथ में कई बार, बहुत प्यास और बार-बार पेशाब भी लगती है.)

क्या आपका वजन भी कम हुआ है? (डायबिटीज, टीबी, कैंसर, हाईपरथायराइड आदि में थकान के साथ वजन भी गिर सकता है.)

क्या वजन बढ़ रहा है? थकान खूब लगती है और लोग यह कह रहे हैं कि ‘हेल्थी’ हो रहे हो बॉस! (वजन का बढ़ना थायरॉयड की हाइपोथायरायडिज्म नामक बीमारी, कई और इंडोक्राइन बीमारियों, डिप्रेशन तथा डायबिटीज में हो सकता है. डायबिटीज में वजन बढ़ भी सकता है और घट भी सकता है. इस लिहाज से यह बड़ी मायावी बीमारी है.)

भूख कैसी है?

क्या थकान हरदम रहती है या बस कभी-कभी? ‘डॉक्टर साहब, कभी तो एकदम बढ़िया लगता तो है, कभी बहुत थकान लगती है.’ या आपको ऐसा तो नहीं लगता कि सुबह उठकर तो बड़ी थकान रहती है, पर ‘एक बार काम करने लग जाऊं तो सब ठीक लगने लगता है.’ (यह सब मानसिक अवसाद, तनाव आदि के कारण हो सकता है.)

3. आप किसी और बीमारी के लिए कोई और दवाइयां तो नहीं ले रहे?
हो सकता है कि आपकी थकान किसी दवा के कारण हो? ब्लडप्रेशर से लेकर सूजन कम करने की दवाइयां तक आपमें बेहद कमजोरी कर सकती हैं. आप तो यह मानकर चलें कि कोई भी दवा ऐसा कर सकती है. इसमें आयुर्वेदिक, हकीमी, यूनानी, देसी जड़ी-बूटी आदि भी शामिल हैं. यदि कोई भी दवाई ले रहे हों तो डॉक्टर के पास जाते समय वे दवाइयां, प्रिस्क्रिप्शन आदि भी लेकर जाएं. खुद भी इंटरनेट पर जाकर या दवाई के रैपर को पढ़कर समझने की कोशिश कर सकते हैं कि यह दवाई का दुष्प्रभाव तो नहीं?

4.  प्राय: थकान का कोई कारण नहीं निकलता परंतु अपनी जांच अवश्य करा लें.
थकान लगती है तो जांच तो आवश्यक है. एनीमिया से लेकर टीबी, कैंसर, लीवर की बीमारी- कुछ भी निकल सकता है. प्राय: कुछ भी नहीं निकलता. यह सब मात्र तनाव, बहुत काम और डिप्रेशन के कारण भी लग सकता है. आजकल विशेषतौर पर मानसिक डिप्रेशन का यह एक महत्वपूर्ण शुरुआती लक्षण हो सकता है. आप कहेंगे कि मैं तो बिल्कुल डिप्रेस नहीं. बस यह बिना बात की थकान ही लगी रहती है. तो मित्र यह बिना बात की थकान नहीं है. वो कहते हैं न कि यूं ही कोई बेवफा नहीं होता.

5. विटामिन डी, बी-12 तथा विटामिन सी आदि की कमी, खून में आयरन की कमी आदि भी थकान पैदा करते हैं.
पर उन पर बातें फिर कभी.

करिश्मे का इंतजार

फोटोः एएफपी

नरेंद्र मोदी का विकास का मॉडल जैसा भी हो, प्रचार का मॉडल बेहद शानदार है. लोगों को उनसे करिश्मे की उम्मीद है, लेकिन खतरा भी यहीं से पैदा होता है

इन दिनों हर तरफ नरेंद्र मोदी के करिश्मे की चर्चा है. हालांकि यह करिश्मा अभी हुआ नहीं है, लेकिन लोगों को इसके होने पर कुछ ऐसा यकीन है जैसे यह किसी निकट भविष्य का नहीं, निपट वर्तमान का सच है. मोदी कइयों की निगाह में अभी से प्रधानमंत्री हो चुके हैं.

दूसरा करिश्मा यह है कि गुजरात में नरेंद्र मोदी ने जो किया, लोग उसको भूलने को तैयार दिख रहे हैं और उसकी जगह वह सबकुछ याद कर रहे हैं जो उन्होंने पता नहीं, किया या नहीं.

गुजरात का जो भी विकास है, वह गुजरातवासियों के अलावा और बहुत सारे लोगों की भी देन है. लेकिन नरेंद्र मोदी का प्रताप यह है कि सबके श्रेय की जमीन हड़पने में वे कामयाब हैं. और यह छुपाने में भी कि इस विकास के बावजूद भारतीय समाज में जो भी आर्थिक-सामाजिक विषमताएं हैं, वे गुजरात के शहरों-गांवों में भी वैसी ही हैं. लोग जैसे मान चुके हैं कि उन्होंने एक बहुत खुशहाल गुजरात बनाया है और पूरे देश को भी ऐसा ही बना डालेंगे. इस लिहाज से गुजरात के विकास का मॉडल जैसा भी हो, उसके प्रचार का मॉडल बेहद शानदार है.

कहा जा सकता है कि संसदीय राजनीति अंततः जनता की मान्यताओं, उसके विश्वासों से ही तय होती है और अगर मोदी यह विश्वास जीतने में कामयाब हैं तो उन्हें प्रधानमंत्री बनने का भी हक है. खुद मोदी यह मान कर चल रहे हैं कि यह विश्वास उन्होंने हासिल कर लिया है. इसीलिए हाल के दिनों में उनके टीवी इंटरव्यू उनका एक बदला हुआ रूप लेकर आते हैं. एक ऐसे नेकदिल, भले नेता का, जो सबकुछ भूलने को तैयार है और सबको साथ लेकर आगे बढ़ने का जज्बा दिखा रहा है.

लेकिन इस नेकदिली में बदलने की भावना कितनी है और राजनीतिक मजबूरियां कितनी यह एक बड़ा सवाल है. राष्ट्रीय राजनीति की पेचीदगियों से दो-चार होते हुए नरेंद्र मोदी को कई बातें समझ में आ गई हैं. एक तो यही कि यहां किसी इकहरी पहचान से काम नहीं चलेगा. यही वजह है कि उन्होंने अचानक नई पहचानें खोजनी और पेश करनी शुरू कर दीं हैं. उन्होंने गुजरात में तीन विधानसभा चुनाव लड़े लेकिन कभी यह राज नहीं खोला कि कभी बचपन में वे चाय भी बेचा करते थे. इस बारे में उनकी स्मृति महज कुछ महीने पहले लौटी. इसी तरह वे अपनी पिछड़ा पहचान को लेकर भी कभी बहुत सजग और उत्साहित नहीं दिखे. लेकिन इन चुनावों में उन्हें भाजपा के पिछड़े चेहरे की तरह पेश किया जा रहा है. अब वे महिलाओं, दलितों और बुनकरों के भी पैरोकार बन रहे हैं.

जाहिर है, यह भारतीय राजनीति का दबाव है जो नरेंद्र मोदी को बदलने पर मजबूर कर रहा है. इस लिहाज से आश्वस्त हुआ जा सकता है कि यदि वे भारत के प्रधानमंत्री बन गए, जिसका उन्होंने खुद को भरोसा-सा दिला रखा है, तो वे अपने सार्वजनिक व्यवहार में बदले हुए नरेंद्र मोदी होंगे. चाहे न चाहे, समरसता की भाषा बोलने वाले और सबके लिए थोड़ी-थोड़ी जगह निकालने वाले.

यानी नरेंद्र मोदी से डरने की जरूरत नहीं है. वे उसी सूरत में प्रधानमंत्री बन पाएंगे जब खुद को बदलेंगे और अगर वे चाहते होंगे कि उनका प्रधानमंत्रित्व दीर्घजीवी हो तो उन्हें अपनी विचारधारा में भी जरूरी फेर-बदल करने होंगे. आखिर जिस देश के वे प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं वह बहुत बड़ा और बड़ी अपेक्षाएं रखने वाला देश है. लेकिन इन अपेक्षाओं के पंख जैसे भी हों, इनके पांव कहां हैं?

नरेंद्र मोदी की जो तथाकथित लहर बताई जा रही है, उसके पीछे बहुत से कारण हैं. सच तो यह है कि 2010 में अन्ना का आंदोलन शुरू होने से पहले भाजपा एक हताश पार्टी थी. टीम अन्ना ने यूपीए के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाया जिसे मध्यवर्ग का व्यापक समर्थन मिला. बढ़ती हुई महंगाई ने इस आग में घी का काम किया. अब नरेंद्र मोदी के पीछे बड़े पूंजीपतियों का हाथ देखने वाले केजरीवाल तब सिर्फ कांग्रेसी नेताओं का भ्रष्टाचार देख रहे थे. लेकिन टीम अन्ना और उसकी कोख से निकली आम आदमी पार्टी ने जो ऊर्जा और उम्मीद पैदा की, जो आवेग फूंका, वह खुद उन्हें नहीं संभाल सकी. इसी के बाद देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने नरेंद्र मोदी चले आए. उनके पीछे आरएसएस और भाजपा के दोयम दर्जे के नेताओं का बल था. इस बल के सहारे पहले उन्होंने पार्टी के भीतर के असंतोष को दबाया और फिर विराट प्रचार-उपक्रम के जरिये यह हवा बनाई कि नरेंद्र मोदी आएंगे तो सारे दुख दूर हो जाएंगे.

लेकिन वे अगर आ गए और सारे दुख दूर न हुए तो? खतरा दरअसल यहीं से पैदा होता है. इसके बाद भाजपा समझाना चाहेगी कि देश भर में गुजरात मॉडल लागू करने के रास्ते की बाधाओं को उसी तरह हटाना होगा जैसे गुजरात में हटाया गया. इसके बाद उन तमाम उदार और प्रगतिशील लोकतंत्रवादियों को ठिकाने लगाया जाएगा जो विराट पूंजी और बाजारवाद के खिलाफ हैं.

लेकिन इतने भर से दुख कम नहीं हुए तो? इसके बाद लागू होगा राष्ट्रवाद का वह एजेंडा जिसके आगे बड़े-बड़े दुख छोटे जान पड़ते हैं. चीन और पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात अभी ही की जा रही है. वह न संभव हुआ तो अपने यहां ऐसे तत्वों से निबटा जाएगा जो चीन और पाकिस्तान के साथ दोस्ती भरे रिश्ते रखना चाहते हैं.

अगर यह सब न हो और नरेंद्र मोदी अपने नए अवतार में बिल्कुल लोकतांत्रिक हो जाएं तो सबसे अच्छा. लेकिन इतिहास इसकी तस्दीक नहीं करता. लोकतांत्रिक सरकारों की विफलता से पैदा हताशा को एक मसीहाई मुद्रा के साथ अपने हक में मोड़ते हुए फासीवादी ताकतें ऐसे ही सत्ता पर काबिज होती रही हैं. इसकी कीमत आने वाले वक्तों को चुकानी पड़ती है.

अगर-मगर के बीच!

फोटोः कृष्ण मुरारी ककशन
फोटोः कृष्ण मुरारी ककशन
फोटोः कृष्ण मुरारी ककशन
फोटोः कृष्ण मुरारी ककशन

27 अप्रैल की बात है. बिहार के सहरसा में एक चुनावी सभा निबटाकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मधेपुरा के लिए उड़ान भरी ही थी कि अचानक तेज आंधी चलने लगी. चारों तरफ धूल छा गई. हेलीकॉप्टर डगमगाने लगा. मजबूरी में पायलट को वहीं इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी जहां से वह थोड़ी ही देर पहले उड़ा था. इसके बाद नीतीश कुमार को सड़क के रास्ते जाना पड़ा.

परेशान करने वाली कुछ ऐसी ही धूल और आंधी इन दिनों नीतीश कुमार के लिए चुनावी सर्वेक्षणों में  छाई हुई है. कई सर्वेक्षण और विश्लेषण बिहार में उनकी पार्टी जदयू को चुका हुआ मान चुके हैं. उनके मुताबिक राज्य में भाजपा की लहर है और जदयू, राजद-कांग्रेस गठबंधन से भी पीछे रहने वाला है.

लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? क्या सच में नीतीश कुमार और जदयू को चुका हुआ मान लिया जाए? इसी से यह सवाल भी उठता है कि अगर इस लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी को करारी शिकस्त मिलती है तो क्या बिहार की राजनीति में भी उनका पराभव शुरू हो जाएगा? क्या अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भी वे हाशिये के नेता बन जाएंगे?

इस सवाल को हम कइयों के सामने उछालते हैं. मुख्यतौर पर जदयू, भाजपा और राजद के नेताओं के सामने. जदयू, राजद और भाजपा नेताओं से बात करने का कोई खास मतलब नहीं निकलता. सब रटा-रटाया जवाब देते हैं. एक पंक्ति वाले सवाल का दो-तीन पंक्तियों में संक्षिप्त जवाब. भाजपा खेमे के वाक्य अलग-अलग होते हैं, लेकिन मतलब कुछ ऐसा होता है-‘ अगर-मगर लगाकर काहे पूछ  रहे हैं कि अगर नीतीश कुमार की करारी हार हो जाए! वे बुरी तरह हार चुके हैं.’ राजद के नेताओं का जवाब भी कुछ वैसा ही होता है लेकिन वे एक-दो कदम और आगे बढ़कर कहते हैं, ‘ नीतीश कुमार की कहानी खत्म हो चुकी है बिहार में. एक बार फिर राजद की सरकार आने वाली है.’ और इन दोनों के बाद जब जदयू के नेताओं से बात होती है तो वे गुस्से में आ जाते हैं और कहते हैं कि ‘भविष्यवक्ता नहीं बनिए, रिजल्ट आने दीजिए, सब सच सामने आएगा. देख लीजिएगा कि जदयू सबसे बड़ी पार्टी रहेगी.’

चुनाव परिणाम से पहले इस सवाल का जवाब ऐसा ही मिलेगा, इसकी पूरी उम्मीद भी थी. लेकिन चुनाव की घोषणा के बाद से ही राजनीतिक पंडितों के विश्लेषणों, मीडिया हाउसों के सर्वेक्षणों और शहरी चौक-चौराहों पर जमने वाली चौपालों ने जिस तरह का माहौल बना दिया है, उसमें यह सवाल काल्पनिक होते हुए भी राजनीतिक गलियारों में तैर रहा है कि क्या लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद नीतीश कुमार विधानसभा चुनाव में भी हाशिये के नेता बन जाएंगे.

इसका जवाब मुश्किल भी है और आसान भी. आसान उनके लिए, जो एकांगी भाव से पॉपुलर मीडिया और एक मुखर वर्ग द्वारा बनाए गए माहौल के आधार पर बिहार की राजनीति का आकलन कर रहे हैं. वे सीधे कह देते हैं कि बिल्कुल, लोकसभा में हार के बाद नीतीश को बिहार की सत्ता से भी बेदखल होना पड़ेगा और अगले साल होनेवाले विधानसभा चुनाव में भी उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. जो विश्लेषक पॉपुलर मीडिया की बनाई राय और मुखर वर्ग द्वारा बनाए गए माहौल से अलग अपनी राजनीतिक समझ भी रखते हैं और उस आधार पर गहराई से अध्ययन कर पड़ताल करते हैं, वे कहते हैं कि ऐसा कहना अभी संभव नहीं. उनकी मानें तो लोकसभा चुनाव में नीतीश की पार्टी की हार का मतलब बिहार की राजनीति में भी उनका अंत कतई नहीं माना जाना चाहिए.

दोनों ही तरह के विश्लेषकों की राय को एक सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता. लेकिन लोकसभा चुनाव परिणाम का बिहार की राजनीति पर क्या असर पड़ सकता है, नीतीश कुमार की राजनीति पर कितना प्रतिकूल असर पड़ सकता है, इसके बारे में फटाफट राय बनाने की बजाय बिहार की राजनीति में फिलहाल बने समीकरण देखने होंगे, इतिहास के कुछ पन्ने पलटने होंगे और साथ ही इस बार के लोकसभा चुनाव में  तीन प्रमुख दलों जदयू, भाजपा और राजद द्वारा अपनाई गई चुनावी रणनीति को भी देखना-समझना होगा.

कैसी-कैसी मुश्किलें
लोकसभा चुनाव में अगर सच में जदयू को बुरी हार मिली तो क्यों नीतीश कुमार के लिए बिहार में सत्ता को बनाए-बचाए रखना भी मुश्किल हो जाएगा और क्यों वे अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में हाशिये की तरफ जा सकते हैं, इसके पीछे कई तर्क एक साथ दिये जाते हैं. लोकसभा चुनाव के नतीजे आने में तो अभी देर है, लेकिन उसके पहले ही कई ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं जिनसे नीतीश चक्रव्यूह में घिरते नेता जैसे दिखे और कई बार बेहद कमजोर भी. इस लोकसभा चुनाव में नीतीश की पार्टी अनुमानों-आकलनों के विपरीत जाकर दहाई में भी सीटें लाती है तो भी कुछ चीजें हैं जो उसके लिए विधानसभा चुनाव में परेशानी का सबब होंगी. जैसे हालिया दिनों में पहली बार ऐसा हुआ जब जदयू के भीतर ही नीतीश के खिलाफ बोलने वाले कई नेताओं का उभार हुआ. शिवानंद तिवारी को तो नीतीश ने बाहर का रास्ता दिया दिया, लेकिन कई नेता हैं जो जदयू में रहते हुए ही नीतीश पर निशाना साधते रहे हैं. नीतीश के खासमखास मित्र व राज्य में मंत्री नरेंद्र सिंह से लेकर वृषण पटेल तक उनके खिलाफ बोलते रहे.

रणनीति पासवान (दायें) और उपेंद्र कुशवाहा को साथ करकेमोदीनीत भाजपा ने नीतीश की घेरेबंदी की है
रणनीति पासवान (दायें) और उपेंद्र कुशवाहा को साथ करकेमोदीनीत भाजपा ने नीतीश की घेरेबंदी की है. फोटोः पीटीआई

दूसरी अहम घटना पार्टी से निकलनेवाले नेताओं के रूप में हुई. नीतीश ने अपने दल से जितने लोगों को मजबूरी में बाहर निकाला, लगभग उतने ही महत्वपूर्ण नेताओं ने उनका साथ भी छोड़ा. उनकी कैबिनेट में महत्वपूर्ण सहयोगी रहीं दो महिला मंत्रियों का चुनाव के पहले ही साथ छोड़ देना प्रतिकूल संदेश देनेवाला रहा. इनमें एक रेणु कुशवाहा थीं और दूसरी परवीन अमानुल्लाह. नीतीश महिलाओं के मजबूत नेता माने जाते रहे हैं. इस हिसाब से कैबिनेट से दो महिलाओं के एक-एक कर निकल जाने से गलत संदेश गए. उसके बाद नीतीश के खास सिपहसालार रहे रणवीर यादव, जिन्होंने बीते साल एक सभा में हवा में कार्बाइन लहराकर सुर्खियां बटोरी थीं, की पत्नी और जदयू विधायक कृष्णा यादव भी पलटी मारकर राजद के टिकट पर चुनाव लड़ने मैदान में आ गईं. बाहुबली मुन्ना शुक्ला की पत्नी व जदयू विधायक अन्नु शुक्ला ने पिछले लोकसभा चुनाव में वैशाली से जदयू के टिकट पर चुनाव लड़कर राजद के रघुवंश प्रसाद सिंह जैसे नेता को कड़ी चुनौती दी थी. उन्होंने भी इस बार टिकट नहीं मिलने पर वैशाली से निर्दलीय लड़ने का फैसला कर नीतीश कुमार को झटका ही दिया.

इन्हें फुटकर बातें भी कह सकते हैं जिनका चुनाव के पहले होना संभावित भी था. लेकिन बड़े नुकसान के भी कुछ संकेत मिले जिनका असर नीतीश कुमार की राजनीति पर अगले कुछ समय में पड़ेगा. परवीन अमानुल्लाह ने साथ छोड़ा तो इसकी धमक राजधानी पटना और परवीन के विधानसभा क्षेत्र साहेबपुर कमाल तक ही सुनाई पड़ी. (हालांकि एक वर्ग है जो मानता है कि इसका थोड़ा बहुत असर मुस्लिम मतदाताओं पर भी पड़ेगा क्योंकि परवीन अमानुल्ला की एक पहचान सैयद शहाबुद्दीन की बेटी के रूप में भी रही है), लेकिन इससे भी बड़ा नुकसान लोकसभा चुनाव शुरू होने के बाद हुआ जिसका असर पूरे बिहार में माना गया और जिसकी भरपाई करने में नीतीश कुमार और उनकी पार्टी को वक्त लग सकता है. यह घटना मुस्लिम बहुल किशनगंज संसदीय सीट  से जदयू उम्मीदवार अख्तरुल ईमान द्वारा अचानक ही मैदान से हट जाने के रूप में घटित हुई. अख्तरुल हालिया वर्षों में तेज-तर्रार और वाचाल मुस्लिम नेता के तौर पर बिहार में उभरे हैं. वे कुछ माह पहले ही राजद से पलटी मारकर नीतीश कुमार की पार्टी में शामिल हुए थे. लेकिन किशनगंज से टिकट लेकर उन्होंने ऐन वक्त पर चुनाव न लड़ने का फैसला कर डाला. उन्होंने कांग्रेस-राजद गठजोड़ का समर्थन करके संकेत दे दिया कि भाजपा से लड़ने में और दूसरे शब्दों में कहें तो नरेंद्र मोदी को रोकने में लालू यादव और कांग्रेस ही सक्षम पार्टी है, जदयू नहीं. नीतीश कुमार की पार्टी मंे कई लोग हैं जो ऐसा मानते हैं. जदयू के एक राज्यसभा सांसद कहते भी हैं, ‘ईमान प्रकरण से चुनाव में हमें एक बड़ा झटका लगा और बड़े नुकसान की भी गुंजाइश है.’

जानकार मानते हैं कि भाजपा से अलगाव के बाद नीतीश कुमार जिस वोट बैंक के सहारे चुनावी मैदान में उतरे हैं उसमें एक अहम फैक्टर मुस्लिम मतदाताओं का ही है. जदयू को पता है कि अगर इस समूह को उनकी पार्टी नहीं संभाल पाएगी तो फिर लालू प्रसाद को मजबूत होने से रोकना आसान नहीं होगा. कारण यह कि लालू प्रसाद कांग्रेस के साथ मिलकर सांप्रदायिकता से लड़ने वाले और भाजपा को रोकन ेवाले नेता के तौर पर फिर से स्थापित होंगे और इसका असर बिहार की राजनीति पर भी पड़ेगा. बिहार में आगे की राजनीति जारी रखने के लिए भी नीतीश को मुस्लिमों का वोट सहेजना जरूरी होगा क्योंकि इस बार के लोकसभा चुनाव में अचानक ही सवर्णों का एक बड़ा खेमा और विशेषकर भूमिहार जाति उनसे बहुत दूरी बना चुकी है. भूमिहारों का अचानक ही नीतीश से खिसक जाना उनके लिए काफी नुकसानदेह हो सकता है. इसलिए नहीं, क्योंकि भूमिहारों की आबादी बड़ी है बल्कि इसलिए क्योंकि भूमिहारों और यादवों को बिहार की राजनीति में सबसे मुखर जाति माना जाता है. धारणा रही है कि एक राजनीतिक माहौल बनाने में इन दोनों जातियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. भूमिहारों और उसके जरिये सवर्णों के एक बड़े समूह का नीतीश से मुंह मोड़ना इसलिए भी बुरा साबित हो सकता है, क्योंकि नीतीश कुमार पर अपने आठ-नौ सालों के कार्यकाल में इस जाति विशेष को तरजीह देने का आरोप भी लगता रहा है. कुरमी को ताज, भूमिहारों को राज जैसे नारे उछाले जाते रहे हैं.

इस तरह देखें तो अगर सच में मुस्लिम मतदाताओं ने इस लोकसभा चुनाव में नीतीश से मुंह मोड़ लिया होगा और सवर्णों का एक खेमा यही पैटर्न अपनाए रखेगा तो आगे के दिनों में जदयू की राह बेहद मुश्किल होती जाएगी. इसकी दूसरी वजह यह भी है कि भाजपा बहुत ही चतुराई से नीतीश के कोर वोट बैंक यानी कोईरी-कुरमी गठजोड़ में से कोईरी मतदाताओं के एक बड़े समूह को भी तोड़ने में एक हद तक सफल  रही है. ऐसा उसने राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के नेता उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी से चुनावी गठजोड़ के जरिये किया है.

भाजपा सिर्फ इस समीकरण को तोड़ने में ही सफल नहीं रही बल्कि यह हवा फैलाने में भी कामयाब रही कि नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव में लालू 12-14 प्रतिशत की आबादी वाली यादव जाति के नेता हैं, जबकि नीतीश कुमार 3-4 प्रतिशत की आबादी वाली जाति कुरमी के नेता रह गए हैं. भाजपा इस कोशिश में रही कि लड़ाई राजद और भाजपा के बीच शिफ्ट हो ताकि आगे बिहार की राजनीति करने में आसानी हो. दूसरी ओर लालू प्रसाद यादव इस संदेश को बार-बार फैलाते रहे कि सांप्रदायिकता से लड़ने में वे और उनकी पार्टी ही सक्षम हैं. नीतीश कुमार इन दोनों अफवाहों के बीच फंसे नेता की तरह दिखे और रोजाना चुनावी सभाओं में मंचों से सफाई देते रहे कि प्रोपेगेंडा वार चल रहा है. साथ ही यह भी कहते रहे कि वे लोकसभा चुनाव के बाद किसी भी हाल में भाजपा के साथ नहीं जा सकते. नीतीश इसलिए यह संदेश देते रहे, क्योंकि वे जानते हैं कि भाजपा और राजद यह अफवाह फैलाने में सफल रहे हैं कि नीतीश इस चुनाव के बाद स्थितियों की दुहाई देकर कभी भी भाजपा के साथ जा सकते हैं.

नीतीश कुमार के पुराने सहयोगी रहे पूर्व राज्यसभा सांसद शिवानंद तिवारी कहते हैं, ‘मैं खुद आश्चर्यचकित हूं. इस तरह का ट्रेंड विकसित होगा बिहार में, ऐसा माहौल बनेगा और नीतीश कुमार की पार्टी की ऐसी हालत होगी…इतना नहीं सोचा था.’ तिवारी आगे कहते हैं, ‘लालू यादव कांग्रेस के साथ जाकर एक बार फिर नए किस्म का सामाजिक समीकरण बनाने में सफल रहे और भाजपा ने घेरेबंदी करके नीतीश के अपने ही वोट बैंक में संेधमारी कर दी. अगर भाजपा और राजद को बड़ी जीत हासिल होती है, जिसकी पूरी संभावना है तो फिर बिहार में नीतीश कुमार के लिए विधानसभा चुनाव में भी बड़ी मुश्किलें होंगी.’ तिवारी समेत कई लोग यह मानते हैं कि इससे एक किस्म का मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ेगा और भाजपा-राजद मतदाताओं के मनोविज्ञान को बदलने की कोशिश करेंगे. अगर संयोग से केंद्र में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन जाते हैं या भाजपा की सरकार बन जाती है तो भाजपा के नेता बिहार में यही माहौल बनाएंगे कि केंद्र में जिसकी सरकार है, अगर उसकी ही सरकार राज्य भी में हो तो यह विकास के लिए महत्वपूर्ण होगा. उसके पहले ही नरेंद्र मोदी जैसे नेता यह एलान करके कि अगर वे पीएम बनते हैं तो बिहार पर विशेष ध्यान रखेंगे, नीतीश को उनकी ही बिसात पर मात देने की कोशिश कर चुके हैं. दूसरी ओर लालू प्रसाद यह बताने की कोशिश करेंगे कि जैसे लोकसभा चुनाव में भाजपा से लड़ने में वे और कांग्रेस ही सक्षम रहे, उसी तरह बिहार में भाजपा को रोकना है तो वे ही सक्षम हो सकते हैं. तिवारी कहते हैं, ‘नीतीश सबसे कड़ी चुनौती के दौर से गुजर रहे हैं और सवर्णों का विशेषकर एक जाति विशेष का उनका अचानक साथ छोड़कर जाना यह भी संदेश देगा कि नीतीश का कोई ठोस सामाजिक समीकरण नहीं था.’

नीतीश के दूसरे पूर्व संगी और विधान पार्षद रहे प्रेम कुमार मणि एक चौंकाने वाली संभावना जताते हैं. वे कहते हैं ‘अगर भाजपा की बड़ी जीत हो जाती है तो फिर हो सकता है कि सामाजिक न्याय की दोनों शक्तियां लालू प्रसाद और नीतीश कुमार एक ही खेमे में आ जाएं. दोनों दलों और नेताओं के लिए भाजपा ही चुनौती होगी इसलिए दोनों को साथ आने के लिए स्थितियां भी मजबूर करेंगी.’ मणि आगे कहते हैं, ‘नीतीश कुमार ने यह मान लिया था कि 2009 के लोकसभा चुनाव या 2010 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने सिर्फ अपने बूते इतनी बड़ी जीत हासिल की जबकि दोनों ही बार जीत मूल रूप से भाजपा की थी. नीतीश कुमार की पार्टी के पास अपना कोई संगठन नहीं था, कार्यकर्ता नहीं थे. भाजपा के कार्यकर्ता ही मतदाताओं को बूथ तक लाने का अभियान चलाते रहे. नीतीश कुमार तो महज उत्प्रेरक रहे. भ्रम में पड़कर नीतीश ने खुद को ही मुख्य ताकत मान लिया.’

पुनजीर्वन? कांग्रेस केसाथ गठजोड़ लालू प्रसाद यादव को नया जीवन दे सकता है
पुनजीर्वन? कांग्रेस केसाथ गठजोड़ लालू प्रसाद यादव को नया जीवन दे सकता है. फोटोः एपी

शिवानंद तिवारी या प्रेम कुमार मणि, लगभग एक भाव में ही बात करते हैं. दोनों की बातों को पूरी तरह से खारिज भी नहीं किया जा सकता. लेकिन इसके इतर दूसरे तर्क भी दिए जा रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘ नीतीश के लिए कड़ी चुनौती जरूर है, लेकिन अभी से सीटों की घोषणा करना ठीक नहीं. हां, यह जरूर होगा कि नीतीश कुमार जितने कमजोर होंगे, लालू प्रसाद यादव उतने ही मजबूत होंगे. सामाजिक न्याय की धारा में विश्वास करने वाले मतदाता तुरंत नीतीश से छिटककर भाजपा के पाले में नहीं चले जाएंगे बल्कि वे कांग्रेस या राजद के साथ जाना चाहेंगे.

सबके अपने तर्क होते हैं और ये सारे तर्क चुनाव के बाद परिणाम आने के बाद की संभावनाएं बताते हैं. वैसे नीतीश के लिए एक दूसरी मुश्किल तो चुनाव के फौरन बाद ही खड़ी हो सकती है. उनके जो विधायक बगावत करके लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं उन्हें चुनाव बाद पार्टी की साख के लिए निष्कासित करना होगा. अगर ऐसा हुआ तो सरकार के तुरंत अल्पमत में भी आ जाने का खतरा होगा. भाजपा और लालू प्रसाद यादव अगर मजबूत होते हैं तो इन दोनों दलों का दांव तुरंत विधानसभा में विश्वासमत पेश करने का होगा. इस बार विश्वास मत में पास हो जाना नीतीश के लिए उतना आसान नहीं होगा. कांग्रेस लोकसभा चुनाव राजद के साथ लड़ रही है, लेकिन वह विधानसभा में नीतीश को समर्थन दिए हुए है. लोकसभा चुनाव बाद लालू को अगर अपेक्षित सफलता मिलती है तो वे तुरंत कांग्रेस पर समर्थन वापसी का दबाव बनाएंगे. भाजपा को अगर अपार सफलता मिलती है तो वह भी चाहेगी कि नीतीश कुमार की सरकार गिरे ताकि जदयू में भगदड़ की स्थिति बने और नीतीश कुमार एक साल और सरकार में बने रहकर नई घोषणाओं के जरिये खुद को और अपनी पार्टी को मजबूत न कर सकें.

यह सब संभावनाएं चुनाव के बाद की हैं जो वर्तमान विश्लेषणों, आकलनों, अनुमानों, सर्वेक्षणों आदि को सच मान लेने और आने वाले परिणाम के बाद की स्थितियां बयां करती हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सच में यह सब आसानी से होगा और लोकसभा चुनाव में नीतीश करारी हार का सामना करेंगे. और अगर करारी हार का सामना करेंगे तो फिर बिहार में भी औंधे मुंह गिरेंगे?

शायद यह इतना आसान नहीं होगा. दरअसल बिहार के राजनीतिक इतिहास में ऐसे कई पन्ने हैं जो बताते हैं कि यहां की जनता लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बड़ा फर्क करती रही है.

क्यों नीतीश को चुका बताना संभव नहीं?
कई जानकारों के मुताबिक पहली बात तो यह है कि बिहार में सीटों का आकलन अब तक सिर्फ मीडिया द्वारा बनाए गए माहौल के आधार पर किया जा रहा है. जातीय गणित और सामाजिक समीकरण क्या कहते रहे हैं, क्या कह रहे हैं, इस पर बहुत बात नहीं की जा रही. दूसरी बात यह है कि अगर नीतीश कुमार की सीटें कम होती ही हैं तो वह पहले से ही तय-सा भी है, क्योंकि वह तब भी होना संभावित था, जब वे भाजपा के साथ मिलकर लड़ते. वजह साफ है. 2009 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार और भाजपा ने साथ मिलकर बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से 32 पर जीत हासिल की थी. यानी 80 प्रतिशत सीटों पर इन दोनों पार्टियों ने कब्जा जमाया था. उसमें भी 40 में से 20 सीटों पर जदयू को जीत हासिल हुई थी. यानि आधी सीटों पर. यह नीतीश कुमार की पार्टी के लिए करिश्माई जीत थी. एक तरह से यह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का संभावित चरम भी था. एक बार चरम पर पहुंचने के बाद स्वाभाविक उतार का दौर आता है. इसलिए यह भाजपा के विपक्ष में गए बिना भी बहुत हद तक संभव था कि नीतीश कुमार 20 सीटों के आंकड़े से नीचे उतरते.

अब सवाल यह है कि आखिर नीतीश की पार्टी कितनी सीटों पर सिमटेगी. इसका जवाब इतना आसान नहीं और न ही जितनी आसानी से अनुमान लगाकर नीतीश के ध्वस्त होने की भविष्यवाणी की जा रही है, वह सही है. लेकिन अगर ऐसा हुआ भी और नीतीश कुमार की बड़ी हार हो भी जाती है तो भी क्या उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि अगले साल विधानसभा चुनाव में भी उनकी हालत पतली रहेगी? इसका सीधा सा जवाब यह है कि ऐसा तो कतई नहीं कहा जा सकता. वर्तमान स्थितियों के अनुसार भी और इतिहास को देखकर भी.

मौजूदा हालात देखें तो व्यक्तित्व के आधार पर नीतीश बिहार में सबसे कद्दावर नेता हैं. बिहार के चार-पांच प्रमुख नेताओं में कोई अभी वैसा नहीं दिखता जिसकी राज्य में अपनी एक खास छवि हो और जिसे राज्य का राजपाट चलाने के लिए संभावनाओं से भरा नेता माना जाए. भाजपा के नेता और राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भाजपा की ओर से बिहार में मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदार हो सकते हैं. लेकिन बेदाग नेता होते हुए भी उनकी अपील पूरे राज्य में नहीं मानी जाती. राजद मुखिया लालू प्रसाद यादव खुद चुनाव लड़ने से वंचित हो चुके नेता हैं और इस बार के लोकसभा चुनाव में अपनी पत्नी राबड़ी देवी और बेटी मीसा भारती के जरिये अपना राजनीतिक भविष्य संवारने की कोशिश में हैं. मीसा को पाटलीपुत्र से उतारने की कीमत वे रामकृपाल जैसे नेता को खोकर चुका चुके हैं. राबड़ी को सारण से चुनावी मैदान में उतारकर वे अपने ही दल में विरोध का स्वर झेल चुके हैं. राबड़ी बीते विधानसभा चुनाव में भी सारण से ही सटे दो यादव बहुल विधानसभा क्षेत्रों राघवपुर और सोनपुर से मैदान में उतरी थीं, लेकिन दोनों जगहों से हार गईं. जाहिर सी बात है कि जब लालू प्रसाद को अपनी बेटी और पत्नी को चुनाव मैदान में उतारने से ही पार्टी के अंदर बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ी तो अपनी जगह उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करने की भी सोचेंगे तो पहले उनकी पार्टी में ही बवाल मचेगा. दूसरा, बिहार अब शायद उस प्रयोग के लिए आसानी से तैयार नहीं होगा.

इन दोनों बड़े दलों के बाद रामविलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा आदि जैसे नेता बचते हैं. लेकिन जानकारों के मुताबिक अब उनमें वह संभावना नहीं दिखती. ऐसे में बिहार में मुख्यमंत्री पद के लिए नीतीश कुमार ही पहली पसंद के तौर पर बने रहेंगे. वैसे यह बात भाजपा भी जानती है कि लोकसभा में भले ही नरेंद्र मोदी की लहर के भरोसे वह अधिक सीटें हासिल कर ले, लेकिन विधानसभा में नीतीश कुमार का विरोध करना और राज्य के मुख्यमंत्री पद के लिए विकल्प के तौर पर किसी दूसरे नाम की चर्चा करना इतना आसान नहीं होगा. शायद इसीलिए सुशील मोदी जैसे नेता लोकसभा चुनाव शुरू होने के पहले से ही यह कहते रहे हैं कि बिहार की जनता समझदार है. वह लोकसभा में मोदी को चुनेगी, नीतीश कुमार बिहार के लिए ठीक हैं.

यह तो फिर भी बिहार में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में व्यक्तित्व के आधार पर लड़ी जाने वाली लड़ाई का अनुमान हुआ. उससे इतर इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो नीतीश की पार्टी की लोकसभा चुनाव में बुरी हार हो भी जाए तो इसका मतलब यह नहीं है कि विधानसभा चुनाव में भी उन्हें इतनी आसानी से खारिज कर दिया जाए.  इतिहास में बहुत पीछे गए बगैर हालिया दो लोकसभा चुनावों और उसके आगे पीछे हुए विधानसभा चुनावों का ट्रेंड देखें तो दूसरे संकेत मिलते हैं.

2004 के ही लोकसभा चुनाव की बात करें तो लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद, रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा और कांग्रेस ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. तीनों मिलकर बिहार की 40 में से 29 सीटों पर कब्जा जमाने में सफल हुए थे. राजद को 22, लोजपा को चार और कांग्रेस को तीन सीटें मिली थी. यानी लालू प्रसाद बहुत मजबूत होकर उभरे थे. लेकिन अगले ही साल फरवरी 2005 में जब विधानसभा का चुनाव हुआ तो वही लालू प्रसाद भारी नुकसान का सामना करते हुए 75 सीटों पर ही सिमट गए. फिर उसी साल नवंबर में जब दुबारा विधानसभा चुनाव हुआ तो लालू यादव की पार्टी और गिरते हुए 52 सीटों तक आ गई.

2009 के लोकसभा चुनाव आते-आते लालू यादव की पार्टी चार सांसदों वाली पार्टी हो गई, लोजपा सांसदविहीन पार्टी बन गई और कांग्रेस तीन से दो पर आ गई.

2009 के लोकसभा चुनाव में तो ऐसे नतीजे आए,, लेकिन कुछ ही महीने बाद जब बिहार में करीब 19 सीटों पर विधानसभा चुनाव हुए तो लालू प्रसाद का अचानक उभार हुआ. नीतीश कुमार की पार्टी की करारी हार हुई. उसके अगले ही साल 2010 में विधानसभा चुनाव का मौका आया. चुनावी विश्लेषक और पंडित फिर से उप चुनाव के नतीजों का हवाला देते हुए यह भविष्यवाणी करने लगे कि इस बार नीतीश कुमार की पार्टी की करारी हार होनेवाली है. लेकिन हुआ उल्टा. उपचुनाव में करारी हार का सामना कर चुके नीतीश कुमार, उनकी पार्टी और साथ में भाजपा ने ऐतिहासिक सफलता हासिल की. चुनावी पंडितों का विश्लेषण एक सिरे से धराशायी हो गया.

कुछ ऐसा ही 1994 में हुए एक संसदीय उपचुनाव के बाद हुआ था. 1994 में बिहार की वैशाली सीट पर किशोरी सिन्हा जनता दल की उम्मीदवार बनी थीं. वे कोई मामूली उम्मीदवार नहीं थीं. बिहार के सबसे चर्चित व बड़े रसूख वाले कांग्रेसी परिवार की बहू थीं. बिहार विभूति अनुग्रह नारायण सिन्हा की बहू, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा की पत्नी, निखिल कुमार की मां. लालू तब उफानी दिनों में थे, लेकिन जनता दल की उम्मीदवार किशोरी सिन्हा तब एक निर्दलीय प्रत्याशी आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद से चुनाव हार गई थीं. उस समय के चुनावी विश्लेषकों के विश्लेषण अब भी अखबारों के पन्नों में दर्ज हैं. एक संसदीय सीट पर लालू प्रसाद की पार्टी की हार के बाद पूरे बिहार में माहौल बनाने की कोशिश हुई कि अब लालू प्रसाद के राज का अंत होगा. 1995 में बिहार में विधानसभा चुनाव होना था. चुनाव हुआ. लालू ने तब के अविभाजित बिहार की 324 सीटों में से 167 सीटें जीतकर तमाम अनुमानों और आकलनों को ध्वस्त कर दिया था. लेकिन विधानसभा चुनाव में ऐसा प्रदर्शन करने वाले वही लालू प्रसाद यादव जब 1999 में लोकसभा चुनाव हुआ तो अविभाजित बिहार की 54 लोकसभा सीटों में से सात पर सिमट गए थे.

मतलब साफ है कि बिहार की राजनीति में लोकसभा चुनाव के आधार पर विधानसभा चुनाव की परिणति और विधानसभा चुनाव के आधार पर लोकसभा में प्रदर्शन के अनुमान पिछले दो दशक से लगातार ध्वस्त होते आ रहे हैं. इसलिए बिना चुनाव परिणाम आए अभी से ही लोकसभा चुनाव में नीतीश की करारी हार की घोषणा और उसके बाद बिहार में भी हाशिये के नेता बन जाने का पूर्वानुमान शायद एकांगी भाव से की जा रही व्याख्या है और हड़बड़ी में सतही विश्लेषण जैसा भी.

अब बंदूक नहीं ’हल’

फोटो: शैलेंद्र पांडेय
फोटो: शैलेंद्र पांडेय

छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित जिले दंतेवाड़ा के जिला पुलिस अधीक्षक नरेंद्र खरे ने पिछले दिनों एक बयान दिया कि अब माओवादियों से गोली से नहीं बल्कि बोली से बात होगी. जब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी बस्तर में राजनीतिक सभा करने आए तो उन्होंने भी खरे की बात को अपने शब्दों में आगे बढ़ाया कि मरना-मारना अब बहुत हो गया, अब नक्सली बंदूक छोड़ हल थाम लें. राज्य के मुख्य सचिव विवेक ढांड भी धुर नक्सल प्रभावित इलाकों में जाकर बैठक ले रहे हैं. ये कुछ ऐसे संकेत हैं जिनसे छत्तीसगढ़ सरकार की नक्सलवाद विरोधी नीति में एक व्यापक बदलाव के संकेत मिल रहे हैं.

अप्रैल, 2010 में ताड़मेटला में तब तक के सबसे बड़े नक्सल हमले में 76 जवानों की मौत के बाद दंतेवाड़ा ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था. केंद्र सरकार को भी दंतेवाड़ा में हुए इस हत्याकांड के बाद मानना पड़ा था कि नक्सलवाद केवल राज्यों की नहीं बल्कि राष्ट्र की समस्या है. तब नक्सलवाद से अपने दम पर जूझ रहे राज्यों के लिए केंद्र स्तर पर एकीकृत योजना बनाने की कसरत शुरू हुई थी. इसी कड़ी में तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने दो बार छत्तीसगढ़ आकर नक्सल रणनीति की दिशा तय करने के लिए बैठकें भी ली थीं. अब एक बार फिर बस्तर से ही माओवाद के खात्मे के लिए दिशा और दशा तय की जा रही है. यह दशा और दिशा क्या होगी यह जानने के पहले दंतेवाड़ा एसपी नरेंद्र खरे के पूरे बयान पर गौर फरमाना जरूरी है. खरे का कहना है कि पुलिस का पूरा जोर अब नक्सलियों की आत्मसमर्पण की नीति को बेहतर बनाने पर होगा और वर्ष 2014 में पुलिस माओवादियों को आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित करेगी. खरे यह भी कहते हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार आंध्र प्रदेश की तर्ज पर आत्मसमर्पण नीति को और बेहतर बनाने पर विचार कर रही है.

इसी कड़ी में जब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी बस्तर आए तो उन्होंने सबसे पहले माओवादियों से बंदूक छोड़ने की अपील की. उन्होंने बस्तर से लेकर झारखंड़ के लोहरदगा तक हर सभा में यही कहा कि मरने-मारने का समय चला गया है. अब नक्सलियों के हाथों में बंदूक नहीं हल होना चाहिए. मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि नक्सल प्रभावित इलाकों का विकास उनकी प्राथमिकता में शामिल है. मोदी ने जगदलपुर में माओवादियों से अपील करते हुए नारा दिया, ‘सबके साथ सबका विकास.’

नक्सलियों पर मोदी का बयान आया और उसके बाद से ही छत्तीसगढ़ की नक्सल नीति में तेजी से परिवर्तन के संकेत मिलना भी शुरू हो गए हैं. शुरुआत हुई प्रदेश के नए नवेले मुख्य सचिव विवेक ढांड की धुर नक्सल प्रभावित जिलों दंतेवाड़ा और सुकमा में बैठकों से. इनमें राज्य के वरिष्ठ आईएएस अफसर भी उनके साथ थे. ढांड ने स्थानीय अफसरों से मिलकर वहां की कठिनाइयों को भी जाना. यहां यह भी ध्यान देने लायक बात है कि तीन साल पहले राज्य सरकार ने सभी विभागों के सचिवों से बस्तर में महीने में एक रात बिताने को कहा था मगर यह नियम जमीनी हकीकत नहीं बन पाया. बस्तर को सिर्फ पुलिस के भरोसे छोड़ दिया गया था. लेकिन अब मुख्य सचिव की कोशिशों के बाद हालात बदलने की दिशा में गंभीर कोशिश दिख रही है.

वहीं पुलिस मुख्यालय (पीएचक्यू) ने भी छत्तीसगढ़ में नक्सलियों को आत्म-समर्पण के लिए प्रोत्साहित करने के लिए नई तैयारी शुरू कर दी है. उच्च पदस्थ पुलिस सूत्रों की मानें तो पीएचक्यू नक्सलियों की आत्मसमर्पण नीति में बड़ा बदलाव करने जा रहा है. बदलाव के पहले चरण में पति-पत्नी नक्सलियों के एक साथ समर्पण करने पर उनको ढाई लाख रुपये तत्काल देने की तैयारी की जा रही है. यह धनराशि नक्सली दंपति को अपना नया जीवन शुरू करने के लिए दी जाएगी. एडीजी नक्सल ऑपरेशन आरके विज का कहना है, ‘ आत्मसमर्पण करने के बाद नक्सलियों के सामने सबसे बड़ी समस्या नया जीवन शुरू करने की होती है. इस समय सबसे ज्यादा आर्थिक संकट सामने आता है जिससे कई बार नक्सली दोबारा जंगल की राह पकड़ लेते हैं. इसलिए इस बार हमारा फोकस उनकी आर्थिक स्थिति पर है ताकि वे दोबारा हिंसा का रास्ता न अपनाएं.’

दरअसल बीते सालों में छत्तीसगढ़ में बंदूक छोड़कर मुख्य धारा में शामिल होने वाले माओवादियों की संख्या काफी निराशाजनक रही है. वहीं दूसरी ओर आंध्र प्रदेश में आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों की संख्या छत्तीसगढ़ की तुलना में काफी ज्यादा है. वहां नक्सलियों को आत्मसमर्पण करने पर काफी बेहतर मुआवजा और नौकरी दी जाती है. जबकि छत्तीसगढ़ में आकर्षक व प्रभावी नीति न होने से पिछले दस साल में एक भी बड़े नक्सली ने आत्मसमर्पण नहीं किया है. सूबे में हथियारों के हिसाब से समर्पण की कीमत तय की जाती है. इसमें एलएमजी के साथ समर्पण करने वाले नक्सली को 4.50 लाख रुपए दिए जाते हैं. वहीं एके 47 के साथ 3 लाख रुपये, एसलआर के साथ 1.50 लाख, थ्री नॉट थ्री के साथ 75 हजार, 12 बोर की बंदूक के साथ 30 हजार दिए जाते हैं. यह राशि भी लंबी प्रक्रिया के बाद मिल पाती है. जबकि ओडिशा और आंध्र प्रदेश में समर्पण के साथ ही मुआवजे की राशि प्रदान की जाती है. पुनर्वास नीति के तहत उन्हें तत्काल मकान दिया जाता है या नौकरी दी जाती है. इन राज्यों में गिरफ्तारी या एनकांउटर का खतरा नहीं रहता.

फिलहाल राज्य सरकार ने आत्मसमर्पण  करने वाले नक्सलियों के लिए अलग-अलग पदों के हिसाब से अलग-अलग इनाम घोषित कर रखा है. यदि सेंट्रल कमेटी का सचिव आत्मसमर्पण करता है तो इनाम की राशि 12 लाख रुपये होती है. वहीं सेंट्रल मिलेट्री कमीशन प्रमुख के लिए 10 लाख, पोलित ब्यूरो सदस्य के लिए सात लाख, स्टेट कमेटी सदस्य के लिए तीन लाख, पब्लिकेशन कमेटी के सदस्य के लिए दो लाख, एरिया कमेटी सचिव के लिए 1.5 लाख, अन्य एरिया कमेटी सचिव के लिए 1 लाख, एलओसी कमांडर को समर्पण पर 50 हजार रुपये की राशि दी जाती है. छत्तीसगढ़ में वर्ष 2004 के बाद मुआवजा राशि नहीं बढ़ाई गई है. इस बारे में प्रदेश के गृहमंत्री रामसेवक पैकरा कहते हैं, ‘नक्सलवाद राष्ट्रीय मुद्दा है. इस पर व्यापकता से विचार किए जाने की जरूरत है. दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि माओवादी हिंसा की काट विकास है. ऐसे में नक्सल प्रभावित सभी राज्यों को मिल बैठकर इस समस्या पर समग्र नीति बनाने की जरुरत है. जिसकी दिशा में काम शुरू हो चुका है. अलग-अलग राज्यों में माओवादियों को लेकर अलग-अलग नीति का होना भी परेशानी को बढ़ाने का ही काम कर रहा है. इसलिए केंद्र में अपनी सरकार आने पर हमारी कोशिश होगी कि नक्सलवाद को लेकर देश में एकीकृत नीति बनाने की दिशा में पहल हो.’

स्वामी अग्निवेश की राय इस बारे में अलहदा है. वे मानते हैं, ‘ यदि संविधान में उल्लेखित अधिकारों को सही तरीके से आदिवासियों तक पहुंचा दिया जाए तो इस समस्या का हल बगैर किसी कसरत के निकल आएगा. यदि नक्सल प्रभावित इलाकों में शांति चाहिए तो सबसे पहले जेलों में बंद निरपराध आदिवासियों को छोड़ना होगा. दूसरा यह कि पांचवी और छटी अनुसूची को लेकर जल्द निर्णय लेना होगा. ग्राम सभाओं को अधिकार देने होंगे. लेकिन दुर्भाग्य से छत्तीसगढ़ सरकार ने ऐसे कई मौके गवाएं हैं. जब वह आगे बढ़कर इस समस्या का जड़ से समाधान कर सकती थी. फिलहाल भी भाजपा की ऐसी कोई इच्छाशक्ति नहीं दिखती.’

फोटोः विनय शर्मा
फोटोः विनय शर्मा

इस वक्त छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के आरोप में बंद कुछ लोगों की रिहाई की दिशा में भी तेजी दिखाई देने लगी है. नक्सलियों की रिहाई के लिए बनाई गई उच्च स्तरीय समिति की अध्यक्ष निर्मला बुच बताती हैं, ‘ हमने करीब 150 सिफारिशें की हैं. इनमें जमानत के वक्त राज्य सरकार किसी प्रकार की आपत्ति नहीं करेगी. हमारी समिति की सिफारिश के कारण कई नक्सलियों को जमानत भी मिली है. हमने नक्सलियों के सभी मामलों की समीक्षा की है. हम लगातार बैठक कर रहे हैं. चुनाव शुरु होने के पहले भी हमने बैठक ली थी. चुनाव खत्म होते ही हमारी एक बैठक होनी है.’ निर्मला बुच मध्य प्रदेश की मुख्य सचिव भी रह चुकी हैं. वर्ष 2012 में नक्सलियों ने तत्कालीन सुकमा कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन को अगवा कर लिया था. उन्हें छोड़ने के बदले नक्सलियों ने जेलों में बंद अपने साथियों की रिहाई की शर्त रखी थी. इसी के जवाब में बुच की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति बनाई गई थी. इसमें राज्य के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी को सदस्य बनाया गया था. निर्मला बुच सरकार की तरफ से नक्सलियों के मध्यस्थों से बात भी कर रही थीं.

इस समय राज्य की जेलों में (जिनमें पांच केंद्रीय कारागार भी शामिल हैं) तकरीबन 1400 ऐसे आरोपित या सजायाफ्ता बंदी हैं, जिनपर नक्सली होने या नक्सली समर्थक होने का आरोप है. जेल सूत्रों की मानें तो इनमें कट्टर नक्सली कम, जन मिलिशिया और संघम सदस्य ज्यादा हैं. आंकड़ों पर नजर डालें तो जगदलपुर जेल में नक्सली मामलों के 332 विचाराधीन कैदी बंद हैं. साथ ही यहां 25 सजायाफ्ता कैदी भी रखे गए हैं. दंतेवाड़ा जेल में नक्सली मामलों के करीब 350 विचाराधीन कैदी बंद हैं. कांकेर जेल में नक्सली मामलों के करीब 250 और दुर्ग जेल में तकरीबन 100 विचाराधीन कैदी बंद हैं. अंबिकापुर जेल में लगभग 100 और रायपुर में 150 कैदी हैं, जो नक्सली होने के आरोप में बंद हैं.

बहरहाल एनडीए की सरकार केंद्र में बने या न बने छत्तीसगढ़ में इस बहाने शुरू हुई कवायदों से यह जरूर स्पष्ट हो रहा है कि नक्सलवाद पर बनी सरकारी नीति आनेवाले समय में बड़े बदलाव से गुजरने वाली है.

परछाई पर लड़ाई

फोटोः एएफपी
श्रीनगर में धारा 370 के समर्थन में होता एक प्रदर्शन. फोटोः एएफपी
श्रीनगर में धारा 370 के समर्थन में होता एक प्रदर्शन. फोटोः एएफपी

भाजपा ने अपने घोषणापत्र में जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने की बात क्या की यह विवादास्पद मुद्दा एक बार फिर गर्म हो गया. अलग-अलग पार्टियों ने अपने-अपने राजनीतिक हितों के हिसाब से इसे लेकर बयानबाजी शुरू कर दी. गौरतलब है कि यह धारा भारतीय गणतंत्र में जम्मू-कश्मीर को एक विशेष दर्जा देती है. 1947 में विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह पहले आजाद रहना चाहते थे, लेकिन बाद में वे भारत में विलय के लिए राजी हो गए. जम्मू-कश्मीर में पहली अंतरिम सरकार बनाने वाले नेशनल कॉफ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्ला ने भारतीय संविधान सभा से बाहर रहने की पेशकश की थी. इसके बाद भारतीय संविधान में धारा 370 का प्रावधान हुआ जिसमें जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार दिए गए. 1951 में राज्य को संविधान सभा अलग से बुलाने की अनुमति दी गई. , 1956 में इस संविधान का काम पूरा हुआ और 26 जनवरी, 1957 को राज्य में यह विशेष संविधान लागू कर दिया गया.  इसके प्रावधानों के मुताबिक संसद जम्मू-कश्मीर के लिए रक्षा, विदेश मामले और संचार जैसे विषयों पर कानून बना सकती है, लेकिन किसी अन्य विषय से जुड़ा कानून वह राज्य सरकार की हामी के बिना लागू नहीं कर सकती. इसी विशेष दर्जें के कारण जम्मू-कश्मीर पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती जिसमें कोई संवैधानिक संकट पैदा होने पर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है.  इसी दर्जे के कारण 1976 का शहरी भूमि कानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता जिसके अनुसार भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि खरीदने का अधिकार है. यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते. भारतीय संविधान की धारा 360 जिसमें देश में वित्तीय आपातकाल लगाने का प्रावधान है, वह भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होती. यही वजह है कि लंबे समय से इस धारा पर अलग-अलग दलों का अलग-अलग रुख रहा है.

लेकिन देखा जाए तो राजनीतिक रोटियां सेंकने के अलावा ऐसे रुख का कोई खास मकसद नहीं. इसकी वजह यह है कि अमल के हिसाब से देखें तो बीते 67 सालों के दरम्यान धारा 370 का वजूद काफी हद तक खत्म हो चुका है. हाल ही में एक अखबार में प्रकाशित अपने लेख में चर्चित अर्थशास्त्री और जम्मू-कश्मीर सरकार के सलाहकार रहे हसीब द्रबू का कहना था कि अपने आज के स्वरूप में धारा 370 एक छाया से ज्यादा कुछ नहीं है. उन्होंने इसकी तुलना भूसे से की जिसमें से बीज काफी पहले अलग हो चुका हो.

अपने लेख में द्रबू धारा 370 के तहत ऐसे दस विशेषाधिकार गिनाते हैं जो जम्मू-कश्मीर को एक स्वायत्त इकाई बनाते हैं और जिनका बीते समय के दौरान क्षरण हुआ है. इनमें जम्मू-कश्मीर के लिए एक अलग संविधान से लेकर एक अलग झंडा, भारत के बाकी हिस्सों से यहां आने वालों के लिए एक दाखिला परमिट की अनिवार्यता, राज्य का अपना राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री यहां तक कि अपनी मुद्रा भी शामिल है. द्रबू बताते हैं कि कैसे ये सारे अधिकार राष्ट्रपति के आदेश या जम्मू-कश्मीर और भारत के संविधान में हुए संशोधनों के चलते खत्म हो गए हैं.

द्रबू कहते हैं कि भारत के राष्ट्रपति द्वारा जारी किए गए कई संवैधानिक आदेशों ने जम्मू-कश्मीर के संविधान की शक्तियों को खत्म कर दिया है. वे लिखते हैं, ‘इसकी 395 धाराओं में से 260 ऐसी हैं जिन्हें भारतीय संविधान की धाराओं ने निरस्त कर दिया है. बाकी 135 धाराएं भारतीय संविधान से ही मेल खाती हैं.’ द्रबू आगे कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर के संविधान की शक्ति को जिस चीज ने सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई वह था इस संविधान के विषय में जारी हुआ दूसरा संशोधन आदेश. उनके मुताबिक 1975 में आए इस आदेश ने राज्य के विधानमंडल से राज्यपाल की नियुक्ति और चुनाव आयोग के गठन जैसे अहम मुद्दों पर राज्य के संविधान में संशोधन करने का अधिकार भी छीन लिया.

धारा 370 पर भाजपा के रुख से घाटी में राजनीतिक पार्टियां भी सक्रिय हो गई हैं. उनका कहना है कि किसी भी हाल में यह धारा बहाल रखी जाएगी. उधर, अलगाववादी कह रहे हैं कि उनका इससे कोई मतलब नहीं है जबकि सिविल सोसायटी का तर्क है कि इस धारा में अब बचाने के लिए खास कुछ नहीं बचा है.

भाजपा के अपना घोषणापत्र जारी करते ही जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का कहना था कि धारा 370 हटाने से कश्मीर के साथ भारत का संवैधानिक रिश्ता खतरे में पड़ जाएगा. उनका कहना था, ‘जहां तक धारा 370 हटाने का सवाल है तो यह जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के पूरे सवाल पर फिर से बहस के बिना नहीं किया जा सकता. अगर भाजपा फिर से इस सवाल को जिंदा करना चाहती है तो हम इस मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार हैं.’ पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद ने भी कुछ ऐसी ही चेतावनी देते हुए कहा,  ‘धारा 370 राज्य और बाकी देश के बीच संवैधानिक संबंध की व्यवस्था देती है और इस संबंध के आधार से जुड़े सवालों पर बात किए बिना इसे खत्म नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि धारा 370 पर कोई सौदेबाजी नहीं हो सकती और जो लोग इसे हटाने की बात कर रहे हैं उन्हें राज्य की संवैधानिक स्थिति का पता नहीं है और वे लोग देश को गुमराह कर रहे हैं.’

लेकिन संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि इस धारा में से वे प्रावधान काफी पहले ही निकल चुके हैं जो इसे प्रभावी बनाते थे और जम्मू-कश्मीर को भारत में एक विशेष दर्जा देते थे. अपनी किताब अ कॉन्स्टियूशनल हिस्ट्री ऑफ जम्मू एंड कश्मीर में एजी नूरानी पूर्व गृह मंत्री और अंतरिम प्रधानमंत्री रहे गुलजारी लाल नंदा का हवाला देते हैं जिन्होंने धारा 370 को एक छिलका बताया था. ‘आप इसे रखें या नहीं, सच यही है कि इसके भीतर का माल पूरी तरह निकाला जा चुका है. इसमें अब कुछ नहीं बचा.’  नूरानी के मुताबिक नंदा ने धारा 370 को एक ऐसा सुराख कहा था जिसने जम्मू-कश्मीर के संविधान में संशोधनों और वहां केंद्रीय कानूनों के क्रियान्वयन को आसान कर दिया. संविधान में संशोधन की सामान्य प्रक्रिया बहुत कड़ी शर्तों वाली होती है, लेकिन धारा 370 में संशोधन की प्रक्रिया बहुत सरल है. ऐसा राष्ट्रपति के आदेश से किया जा सकता है.

तो क्या अब इस धारा में कुछ भी ऐसा नहीं जो जम्मू-कश्मीर के लिए इसे अहम बनाता हो. नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता मोहम्मद शफी कहते हैं, ‘सब कुछ खत्म नहीं हुआ है. यह धारा अब भी कुछ अर्थों में जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देती है.’ शफी ही राज्य की ऑटोनमी रिपोर्ट के सूत्रधार हैं जो जम्मू-कश्मीर की उस स्वायत्तता की बहाली की मांग करती है जो अब वजूद में नहीं है. 1999 में इस रिपोर्ट पर राज्य विधानसभा ने बहुमत से एक प्रस्ताव पारित किया था जिसे तत्कालीन एनडीए सरकार ने खारिज कर दिया था. शफी कहते हैं, ‘धारा 370 अब भी जम्मू-कश्मीर और नई दिल्ली के बीच के संबंध को निर्धारित करती है और इसे हटाने या इसमें सुधार करने का फैसला राज्य की संविधान सभा की सहमति के बाद ही किया जा सकता है जिसका वजूद 1957 में खत्म हो गया था. इसलिए कोई भी सुधार तभी हो सकता है जब एक और संविधान सभा बनाई जाए और उसे इस मुद्दे पर बहस की इजाजत मिले. अगर ऐसा हुआ तो राज्य के भारत में विलय जैसे बड़े सवाल भी परिदृश्य में आएंगे.’

पीडीपी के वरिष्ठ नेता नईम अख्तर कहते हैं, ‘धारा 370 अब भी एक चारदीवारी की तरह है. केंद्र अब भी अपने किसी कानून को राज्य की सूची में नहीं ला सकता जब तक कि उस पर राज्य सरकार की सहमति न हो. हालांकि इस धारा की वास्तविक अहमियत अब ज्यादा प्रतीकात्मक ही है. यह कश्मीर को स्थानीय पहचान का अहसास देती है और यह आभास भी कि इस पहचान की रक्षा करने के लिए एक संवैधानिक बचाव है.’ अख्तर भाजपा से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की इस बात को खारिज करते हैं कि धारा 370 की वजह से राज्य का विकास रुका. वे कहते हैं, ‘जम्मू-कश्मीर सामाजिक सुधार के लिहाज से ऐतिहासिक विधेयक पारित करने में दूसरे राज्यों से आगे रहा है. आरटीआई को ही लीजिए. 2004 में हमने इसे पारित किया. केंद्र से पहले. इसी तरह 2003 में ही हम जवाबदेही कमीशन बनाकर ऐसा करने वाला पहला राज्य बन चुके थे. राज्य का मुख्यमंत्री भी इसके अधीन है. केंद्र में तो अब लोकपाल विधेयक पारित हुआ है. और आप क्रांतिकारी भूमि सुधारों को कैसे भूल सकते हैं? यह इसलिए संभव हुआ कि जम्मू-कश्मीर के पास एक अलग संविधान था. देश के दूसरे हिस्सों की तरह कश्मीर से किसानों की खुदकुशी की खबरें नहीं आ रहीं तो ऐसा इन सुधारों के चलते ही हुआ है.’

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सिमटती धारा

  • अपने मूल रूप में धारा 370 में प्रावधान था कि सुरक्षा, विदेश मामले, वित्त और संचार को छोड़कर किसी विषय से जुड़ा कानून जम्मू-कश्मीर में लागू करने से पहले संसद को राज्य सरकार से सहमति लेनी होगी. लेकिन अब जम्मू-कश्मीर को स्वायत्त दर्जा देने वाले ऐसे प्रावधान खत्म कर दिए गए हैं.
  • जम्मू-कश्मीर के पास अपना संविधान है, लेकिन उसे अब यह अधिकार नहीं कि वह इसमें कोई संशोधन कर सके.
  • जम्मू-कश्मीर के संविधान में सदर-ए-रियासत (राज्य के मुखिया जिसे राज्य का ही विधानमंडल चुनता था) और प्रधानमंत्री की व्यवस्था थी. अब इसे राज्यपाल और मुख्यमंत्री से बदल दिया गया है.
  • जम्मू-कश्मीर के पास अपना एक राष्ट्रीय ध्वज होता था. राष्ट्रीय शब्द को अब हटा दिया गया है और इसे सरकारी झंडा कर दिया गया है.
  • मूल रूप में धारा 370 में जम्मू-कश्मीर के लोग भारत के नागरिक नहीं थे. अब हैं. पहले देश के दूसरे हिस्सों के नागरिकों को जम्मू-कश्मीर जाने के लिए परमिट लेना होता था. सामान भी वहां एक कस्टम बैरियर से होकर जाता था. अब ये व्यवस्था खत्म कर दी गई है.
  • जम्मू-कश्मीर के लोगों पर भी अब देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने की अनिवार्यता है.
  • जम्मू-कश्मीर को लेकर संसद उन्हीं विषयों पर कानून बना सकती थी जो केंद्रीय सूची में आते हैं. अब ऐसा नहीं है.
  • सर्वोच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र पहले सिर्फ धारा 131 तक सीमित था जो केंद्र और राज्यों के बीच विवाद से संबंधित है. अब सर्वोच्च अदालत न सिर्फ राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कानूनों की समीक्षा कर सकती है बल्कि राज्य सरकार द्वारा लिए गए किसी प्रशासनिक कदम की न्यायिक समीक्षा भी कर सकती है.

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शीतयुद्ध की बढ़ती गर्मी

टकराव पूवीर् यूक्रेन में एक टैंक पर रूस का झंडा लहराकर गश्त करते रूस समथर्क,
टकराव पूवीर् यूक्रेन में एक टैंक पर रूस का झंडा लहराकर गश्त करते रूस समथर्क,
पूर्वी यूक्रेन में एक टैंक पर रूस का झंडा लहराकर गश्त करते रूस समर्थक
पूर्वी यूक्रेन में एक टैंक पर रूस का झंडा लहराकर गश्त करते रूस  समर्थक

यूक्रेन की अंतरिम सकार के अमेरिका-भक्त प्रधानमंत्री अर्सेनी यात्सेन्युक शनिवार 26 अप्रैल के दिन इटली की राजधानी रोम में थे. पत्रकारों को संबोधित करते हुए मात्र 39 साल के यात्सेन्युक ने आरोप लगाया, ‘रूसी युद्धक विमानों ने पिछली रात यूक्रेनी वायुसीमा का सात बार अतिक्रमण किया है. यूक्रेन को युद्ध शुरू करने के लिए भड़काना ही इसका एकमात्र उद्देश्य हो सकता है.’ कुछ देर पहले अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता स्टीवन वॉरन ने भी यही आरोप लगाया था. यह बताने का कष्ट दोनों में से किसी  ने नहीं किया कि रूसी विमान कब और कहां यूक्रेनी वायुसीमा के भीतर घुसे थे. यात्सेन्युक यह कहने से भी नहीं चूके कि रूस यूक्रेन पर कब्जा करना और ‘तीसरा विश्वयुद्ध छेड़  देना चाहता है.’ आरोपों की गहमा-गहमी वाले उसी दिन अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, इटली और ब्रिटेन के प्रमुखों ने एक टेलीफोन-सम्मेलन के माध्यम से रूस के विरुद्ध नए प्रतिबंध लगाने का भी निर्णय किया. ये प्रतिबंध यथासंभव 28 अप्रैल से लागू हो जाने थे.

एक ही सप्ताह पहले, 17 अप्रैल को जेनेवा में रूस, अमेरिका और यूक्रेन के विदेश मंत्रियों तथा यूरोपीय संघ की विदेशनीति प्रभारी कैथरीन ऐश्टन के बीच वार्ता हुई थी.  घंटों चली इस चार-पक्षीय बातचीत में आशा के विपरीत कुछ ऐसे कदम तय हुए थे, जिनसे लग रहा था कि अब स्थिति बेहतर बनेगी. यूक्रेन की और दुनिया भर की जनता राहत की सांस ले सकेगी. हालांकि सब को आश्चर्य हुआ था कि ‘जेनेवा घोषणा’ के नाम से प्रचारित इस सहमति को पत्रकारों के सामने अमेरिकी और रूसी विदेशमंत्री ने साथ मिल कर नहीं, बल्कि अलग-अलग पेश किया. इस सहमति में, जो कोई औपचारिक समझौता नहीं है, यूक्रेन में तनावों को घटाने और नागरिक सुरक्षा को बढ़ाने के लिए आवश्यक कदमों को बताते हुए कहा गया हैः

  • सभी पक्ष हर तरह के बलप्रयोग, डराने-धमकाने और उकसावों से दूर रहेंगे.
  • सभी हथियारबंद अवैध गिरोहों (ग्रुपों) को निहत्था किया जाएगा. अवैध कब्जों वाले भवन उनके कानूनी मालिकों को लौटाए जाएंगे. यूक्रेनी शहरों और गांवों में अवैध कब्जों के अधीन सड़कों, मैदानों और सार्वजनिक स्थानों को खाली कराया जाएगा.
  • ऐसे प्रदर्शनकारी, जो अपने हथियार डाल देंगे और अपने कब्जे वाले मकानों को खाली कर देंगे, क्षमादान के अधिकारी होंगे, बशर्ते कि उन्होंने कोई गंभीर अपराध नहीं किए हैं.
  • इस घोषणा को अगले दिनों में लागू करने के दौरान जहां भी आवश्यक हो, वहां ‘यूरोपीय सुरक्षा और सहयोग संगठन ‘(ओएससीई) के पर्यवेक्षक यूक्रेनी अधिकारियों के साथ सहयोग करेंगे. अमेरिका, यूरोपीय संघ और रूस इस काम में सहयोग देने और अपने पर्यवेक्षक उपलब्ध कराते हुए इसे सफल बनाने का वचन देते हैं.
  • (यूक्रेनी) संविधान-रचना की पूर्वघोषित प्रक्रिया पारदर्शी होगी और किसी को उससे बाहर नहीं रखा जाएगा. इसके लिए यूक्रेन के सभी अंचलों और राजनीतिक निकायों के बीच व्यापक राष्ट्रीय संवाद तथा सार्वजनिक टीका-टिप्पणियों और सुझावों की संभावना उपलब्ध कराई जाएगी.

असहमतिपू्र्ण सहमति
हैरानी की बात यही नहीं थी कि अमेरिका और रूस के विदेशमंत्री एकसाथ पत्रकारों के समक्ष नहीं आए, दोनों ने  अपनी सहमति की अलग-अलग असहमतिपूर्ण व्याख्या की. सबसे पहले रूसी विदेशमंत्री लावरोव आए. उन्होंने कहा कि सहमति यूक्रेन के ‘सभी अंचलों के सभी सशस्त्र गिरोहों को निहत्था करने पर हुई है.’ घोषणा की लिखित शब्दावली में ‘सभी अंचल’ लिखा तो नहीं मिलता, लेकिन उसमें लिखे ‘सभी हथियारबंद अवैध गिरोहों’ का तर्कसंगत मतलब यही होना चाहिए कि हथियारबंद गिरोह चाहे जहां हों, चाहे जिस अंचल में हों और चाहे जिस पक्ष के समर्थक या विरोधी हों, उन्हें निहत्था किया जाएगा. यानी, राजधानी किएव के मैदान-चौक पर अब भी डेरा डाले या उसके आस-पास के भवनों पर अब भी अधिकार जमाए उन हथियारबंद लोगों को भी निहत्था किया जाएगा, जो पश्चिमी देशों के भक्त व इस समय की अंतरिम सरकार के समर्थक हैं. यह हो नहीं सकता कि रूसी पक्ष तो रूस समर्थकों को निहत्था करना मान ले, किंतु रूस-विरोधियों को हथियार रखने की छूट दे दे.

लेकिन, अमेरिकी विदेशमंत्री जॉन केरी यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रभारी कैथरीन ऐश्टन के साथ जब पत्रकारों के सामने आए तो वे यही पट्टी पढ़ाते लगे कि सहमति पू्र्वी यूक्रेन के रूस समर्थक सशस्त्र लोगों के हथियार छीनने पर ही हुई है. उन्होंने इस बात का कोई जिक्र नहीं किया कि किएव में अड्डा जमाए हथियारबंद गिरोहों का क्या होगा. जेनेवा घोषणा के पहले दिन से ही अमेरिका रट लगाए हुए है कि रूस पूर्वी यूक्रेन के रूसी-भाषी पृथकतावादियों पर लगाम लगा कर उनके कब्जे वाले भवनों को खाली कराए, जबकि रूस कह रहा है कि यही काम यूक्रेनी अंतरिम सरकार पहले अपनी राजधानी में तो कर दिखाए. यूक्रेन की अंतरिम सरकार भी इस घोषणा के बाद से ऐसा ही व्यवाहर कर रही है, मानो उसे केवल पूर्वी अंचलों के रूस-समर्थक विद्रोहियों के ही हथियार छीनने और उनके होश ठिकाने लगाने हैं. सरकार ने एक बार भी यह नहीं बताया कि उसने राजधानी किएव में अब तक क्या किया है.

दंगाइयों की सरकार
उल्लेखनीय है कि 21 फरवरी से सत्तारूढ़ यूक्रेन की वर्तमान अंतरिम सरकार दंगाई प्रदर्शनकारियों के उन संगठनों व राजनीतिक पर्टियों की मिली-जुली सरकार है, जो अंशतः घोर-दक्षिणपंथी और नस्लवादी हैं. यूक्रेन को यूरोपीय संघ और अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी सैन्य-संगठन नाटो का सदस्य बनाना उनका ध्येय है. नवंबर 2013 से ही प्रदर्शनकारी राजधानी किएव के उस भव्य मैदान-चौक पर अड्डा जमाए बैठे हैं, जिसके चारों ओर सरकारी मंत्रालय, कार्यालय और व्यापारिक प्रतिष्ठान हैं. उनके अनवरत हिंसक प्रदर्शनों, धरनों और कब्जा-अभियानों से हार मानकर देश के निर्वाचित राष्ट्रपति विक्तोर यानुकोविच को 21 फरवरी की ही रात आनन-फानन में भागना पड़ा. राष्ट्रपति के भागते ही प्रदर्शनकारियों और संसद की कुछ विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने मिल कर उसी रात सत्ता हथिया ली. यूक्रेन को रूसी प्रभावक्षेत्र से बाहर निकालने के लिए व्याकुल अमेरिका और यूरोपीय संघ की तभी से बांछें खिल गई हैं. उन्हें अपनी मनोकामना पूरी होती लग रही है.

337 वर्षों तक सोवियत संघ का अभिन्न अंग रहने के बाद यूक्रेन 1991 में एक स्वतंत्र देश बना था. बताया जाता है कि स्वतंत्र यूक्रेन  को अपनी तरफ खींचने के प्रचार-अभियानों और राजनीतिक हेराफेरियों पर अमेरिका तभी से कम से कम पांच अरब डॉलर बहा चुका है. खुद यूक्रेन में स्थित सुविज्ञ सूत्रों से (लेखक को) पता चला है कि किएव में धरना देने वाले प्रदर्शनकारियों और दंगाइयों को, उनके जोश-खरोश और योगदान के अनुसार, प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन 100 से 500 डॉलर तक दिए गए हैं. देश में जहां-जहां रूस विरोधी प्रदर्शन होते हैं, अमेरिका या उसके मित्र देशों के पैसों के बल पर होते हैं. एक सूत्र का तो यह भी कहना है कि पूर्वी यूक्रेन के दोनबास क्षेत्र में रहने वाले रूसी-भाषियों की ओर से जो रूस-समर्थक प्रदर्शन चल रहे व कब्जा-अभियान हो रहे हैं, उनके लिए भी पैसा अमेरिका से ही आता है. अमेरिका यह पैसा अपने यहां रहने वाले रूसी करोड़पतियों के माध्यम से भेजता है, ताकि उसका अपना नाम सामने न आ सके और वह इस पैसे को रूस के मत्थे मढ़ कर उसके विरुद्ध प्रतिबंधों का औचित्य सिद्ध कर सके.

जेनेवा वार्ता के बाद अमेरिका और रूस के विदेशमंत्री
जेनेवा वार्ता के बाद अमेरिका और रूस के विदेशमंत्री

किएव की यात्रा के लिए लगा तांता
यह बात बहुत दूर की कौड़ी जरूर लगती है, पर रूस को नीचा दिखाने और उसकी अर्थव्यवस्था चौपट करने पर तुले अमेरिका और उसकी कठपुतली यूक्रेनी सरकार के लिए सब कुछ संभव है. दोनों ने मिल कर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन पर पूर्वी यूक्रेन के रूसी-भाषियों को उकसाने और उन्हें हथियार दे कर यूक्रेन के मामलों में हस्तक्षेप करने के आरोपों की झड़ी लगा रखी है. सीमापार रूसी सैनिकों के जमाव पर वे ‘भेड़िया आया, भेड़िया आया’ वाली गुहार लगा रहे हैं. जबकि तथ्य यह है कि किएव में रूस-विरोधी प्रदर्शन शुरू होने के पहले ही दिन से लेकर अब तक — केवल राष्ट्रपति ओबामा को छोड़ कर– उपराष्ट्रपति जो बाइडन और विदेशमंत्री जॉन केरी सहित अमेरिका के सभी प्रमुख नेता, मंत्री, सेनेटर, धन्नासेठ किएव के फेरे लगा चुके हैं– कुछ तो कई बार. यही हाल यूरोपीय संघ वाले देशों के नेताओं का भी है. पैसे भी खूब लुटाए जा रहे हैं. यह सब दखलंदाजी नहीं तो क्या कोई तीर्थ यात्रा और धार्मिक चढ़ावा है? कोई रूसी नेता या मंत्री तो वहां अभी तक देखने में नहींआया!

यही नहीं, स्वयं यूक्रेनी सरकार के परम शुभचिंतक जर्मनी के सार्वजनिक प्रसारण नेटवर्क ‘एआरडी’ की एक साहसिक खोजपूर्ण टेलीविजन रिपोर्ट से इस बीच यह भी सिद्ध हो चुका है कि किएव के मैदान-चौक पर यानुकोविच-विरोधी उग्र प्रदर्शनों के अंतिम दिनों में वहां हुई गोलीबारी में 100 से अधिक जो लोग मारे गए, उनमें बहुत से ऐसे भी प्रदर्शनकारी थे, जो उन गोलियों से मारे गए, जो पास के होटल ‘उक्राइने’ (यूक्रेन) पर कब्जा जमाए हथियारबंद प्रदर्शनकारियों के ही एक गिरोह ने छिपकर चलाईं. यानी, प्रदर्शनकारियों के ही एक गुट ने अहिंसक प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं. लेकिन, न तो अमेरिका इन लोगों की धरपकड़ की मांग कर रहा है और न अंतरिम सरकार ने ही मामले की सही छानबीन में कभी दिलचस्पी दिखाई. उसने सरकारी वकील की एक दिखावटी जांच द्वारा रूसी गुप्तचर सेवा को दोषी बता कर अपने हाथ झाड़ लिए. कोई नहीं जानना चाहता कि गोली चलाने वाले लोग कौन थे और उन्हें मशीनगनें भला कहां से मिलीं.

‘धोबी पर बस न चले तो गधे के कान ऐंठे’
स्वयं आज भी अपनी नाक के नीचे बैठे हथियारबंद प्रदर्शनकारियों और सरकारी भवनों के कब्जाधारियों पर उंगली उठाने में असमर्थ अंतरिम सरकार ने, जेनेवा वार्ताओं के एक ही दिन पहले, ‘धोबी पर बस न चले, तो गधे के कान ऐंठे’ वाली कहावत को चरितार्थ करता एक ‘आतंकवाद-विरोधी’ सैनिक अभियान छेड़ा. पूर्वी यूक्रेन में दोन्येत्स्क क्षेत्र के रूस-समर्थक विद्रोहियों को निहत्था करने और लगभग एक दर्जन शहरों व कस्बों में उनके कब्जे वाले सरकारी भवनों को खाली कराने के लिए टैंक-सवार सैनिक रवाना किए गए. लेकिन, पहले छह टैंक जैसे ही क्रामातोर्स्क नाम के कस्बे में पहुंचे, सैनिकों ने अपने टैंकों पर रूसी झंडे फहरा दिए. कुछ स्थानीय निवासी अपनी आंखों पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे, तो कुछ उनके साथ मिल कर खुशियां मनाने लगे. ‘किएव ने हमें भुला दिया है,’ इन सैनिकों ने कहा, ‘हमें हफ्तों से ठीक से खाना तक नहीं मिला है.’ उन्होंने बताया कि वे यूक्रेनी वायुसेना की 25 वीं ब्रिगेड के सैनिक हैं और पहलू बदलकर अब रूस-समर्थक विद्रोहियों के साथ मिल गए हैं. 15 किलोमीटर दूर के करीब एक लाख जनसंख्या वाले स्लाव्यांस्क में जब वे पहुंचे तो उनका और भी जोरदार स्वागत हुआ. सैनिक भी दिग्भ्रमित हैं. लगभग एक दशक से चल रही क्रांतियों-प्रतिक्रांतियों और राजनीतिक उठा-पटक के कारण सेना और पुलिस का मनोबल रसातल में पहुंच गया है.

किएव के दंगाइयों की हू-बहू नकल
अपनी नाक इस बुरी तरह कटने के बाद किएव की अंतरिम सरकार ने उसी सप्ताहांत पड़ रहे ईस्टर त्यौहार के बहाने से अपना अभियान रोक दिया. पूर्वी यूक्रेन के रूसी-भाषी विद्रोही भी धरना देने, सड़कों पर और सरकारी भवनों के सामने बाधाएं खड़ी करने और उन पर कब्जा जमा लेने के हूबहू वही कारगर तरीके अपना रहे हैं, जो यूक्रेन के रूस-विरोधी प्रदर्शनकारी राजधानी किएव में भारी सफलता के साथ दिखा चुके हैं. उनकी मांग अपने क्षेत्र का रूस में विलय करने से अधिक इस बात को लेकर है कि यूक्रेन को एक संघात्मक शासन-व्यवस्था वाला देश बनाने के लिए जनमतसंग्रह कराया जाए, रूसी भाषा की प्रधानता वाले पूर्वी तथा दक्षिणपूर्वी यूक्रेन को सच्चे स्वायत्तशासी अधिकार दिए जाएं. लेकिन यूक्रेन की अंतरिम कठपुतली सरकार और उसके यूरोपीय-अमेरिकी सूत्रधार यही रट लगाए हुए हैं कि पूर्वी यूक्रेन के रूसी-भाषी रूस के चाटुकार पृथकतावादी हैं जिनके जरिये रूस अपना विस्तार करना और यूक्रेन को अपनी मुठ्ठी में कसे रखना चाहता है.

पश्चिम का रामबाण तर्क
पश्चिमी देश इस बात में कोई बुराई नहीं देखते कि वे स्वयं भी तो यूक्रेन को अपनी मुठ्ठी में कसना चाहते हैं. रूस का तो वह फिर भी तीन सदियों तक हिस्सा रहा है जबकि जर्मनी, फ्रांस या अमेरिका से तो उसका कुछ भी लेना-देना नहीं है. ऐसी आपत्तियों पर पश्चिम का सबसे रामबाण तर्क होता है– हम लोकतंत्र हैं. मानो लोकतंत्र होना सदा-सर्वदा सच्चा और सही होने का ऐसा जन्मसिद्ध एकाधिकार है, जो केवल अमेरिका और उसके पिट्ठुओं की बपौती है. उन्हीं के पास यह जानने की दैवदृष्टि भी है कि कौन सच्चा लोकतंत्र है और कौन नहीं.

चारपक्षीय जेनेवा वार्ताओं के बाद यूक्रेन की अंतरिम सरकार ने देश के पूर्वी भाग के रूस-समर्थकों के विरुद्ध अपना कथित ‘आतंकवाद-विरोधी’ अभियान फिर से छेड़ दिया है. पहले ही दिन एक हेलीकॉप्टर मार गिराया गया जबकि स्लाव्यांस्क के पास गोलियों की बौछार से क्षतिग्रस्त एक अंतोनोव-30 परिवहन विमान जैसे-तैसे उतरने में सफल रहा. किएव की सरकार अपने सुरक्षाबलों की निष्ठा पर क्योंकि अब भी पूरा विश्वास नहीं कर सकती, इसलिए वह अमेरिका के माध्यम से रूस पर दबाव डलवा रही है कि रूस अपने समर्थकों को अनुशासित करे. अमेरिका ने रूस के विरुद्ध प्रतिबंधों का विस्तार करने के साथ-साथ रूस से लगी सीमा वाले पोलैंड, एस्तोनिया, लातविया और लिथुआनिया में अपने 600 अतिरिक्त सैनिक भेजने और इन देशों की हवाई निगरानी बढ़ा देने की घोषणा की है.

पर्यवेक्षक पकड़े गए
‘यूरोपीय सुरक्षा एवं सहयोग संगठन’ की ओर से उसके ‘स्पेशल मॉनिटरिंग मिशन’ (विशेष पर्यवेक्षण मिशन) के करीब 140 पर्वेक्षक वैसे तो पहले से ही यूक्रेन में तैनात हैं और अपनी रिपोर्टें संगठन के सभी देशों के पास भेजते रहते हैं. लेकिन, यूक्रेनी सरकार ने देश के पूर्वी हिस्से की टोह लेने के लिए एक और दल ‘मिलटरी वेरिफिकेशन टीम’ (सैनिक सत्यापन टीम) के कुछ सदस्यों को भी संभवतः अलग से बुला रखा है.

जर्मन सेना ‘बुंडेसवेयर’ के नेतृत्व में गठित इस टीम के एक दर्जन सदस्यों को स्लाव्यांस्क के रूसियों की जनमिलिशिया ने 26 अप्रैल को बंदी बना लिया. वे किसी वर्दी में नहीं थे, बल्कि सामान्य कपड़े पहने हुए थे. उन में से चार जर्मनी के हैं, बाकी यूक्रेन, चेक गणराज्य, डेनमार्क, स्वीडन और पोलैंड के बताए जाते हैं. 27 अप्रैल को उन्हें मीडिया के सामने पेश करने के बाद स्वीडिश बंदी को मधुमेह का रोगी होने कारण रिहा कर दिया गया. स्लाव्यांस्क के स्वघोषित मेयर व्याचेस्लाव पोनोमार्येव ने उन पर ‘नाटो के भेदिये’ होने का आरोप लगाया और कहा कि उन्हें यूक्रेनी सरकार द्वारा बंदी बनाए गए रूसी-भाषी जनमिलिशिया के सदस्यों के साथ अदला-बदली से ही रिहाई मिल सकती है. रूसी विदेशमंत्रालय ने आश्वासन दिया है कि विदेशी बंदियों को शीघ्र ही छुड़ाने की हर संभव कोशिश की जायेगी.

मीडिया में पुतिन की अत्यधिक आलोचना एक तरह से उनका हित ही कर रही है.
मीडिया में पुतिन की अत्यधिक आलोचना एक तरह से उनका हित ही कर रही है.

रूसी सैनिक-जमाव
उधर अमेरिका उपग्रहों से ली गई पुरानी तस्वीरों के माध्यम से सिद्ध करने में लगा है कि रूस ने यूक्रेनी सीमा के पास 40 से 50 हजार सैनिक जमा कर रखे हैं, जो किसी भी समय सीमा पार कर सकते हैं. लेकिन, मॉस्को में पैदा हुए और वहीं पढ़े-लिखे सैन्य-विशेषज्ञ अलेक्सांदर गोल्त्स का कहना है कि वे बीती फरवरी से ही वहां हैं पर यूक्रेन पर कब्जा करने के लिए कतई पर्याप्त नहीं हैं. पुतिन के आलोचक गोल्त्स ने एक जर्मन दैनिक से कहा कि यह सैन्यबल छाताधारी (पैराशूट) सैनिकों तथा थल सेना की 3-4 विशिष्ट इकाइयों को मिला कर बने एक त्वरित हस्तक्षेप बल के आदिरूप (प्रोटोटाइप) जैसा है और यूक्रेन के किसी प्रादेशिक भूभाग तक को हड़पने के योग्य नहीं हैं. यूक्रेन में ‘यदि कोई नई सीमा खींचनी है, तो कम से कम एक लाख जवानों की जरूरत पड़ेगी. यदि हम सारी बातों को विवेकसम्मत ढंग से सोचें, तो यूक्रेन पर आक्रमण का आदेश संभव नहीं लगता,’ गोल्त्स का कहना है. उन्होंने याद दिलाया कि अमेरिका सहित संसार का कोई भी देश नागरिक जनता के प्रतिरोध पर कभी विजय प्राप्त नहीं कर पाया. इसे पुतिन भी जानते हैं.

अमेरिका-भक्तों के माथे पर शिकन
दूसरी ओर राष्ट्रपति बराक ओबामा रूस को ईंट का जवाब पत्थर से देने की कुछ ऐसी उतावली में लगते हैं कि अमेरिका के सबसे विश्वस्त जर्मनी जैसे भक्तों के माथे पर भी शिकन पड़ने लगी है कि वे आखिर चाहते क्या हैं. 25 अप्रैल को अमेरिकी विदेशमंत्री जॉन केरी ने जी-7 के सभी देशों के सरकार प्रमुखों को फोन कर हड़काया कि ‘सात दिनों से रूस सही दिशा में कोई ठोस कदम उठाने से मना कर रहा है.’ उन्होंने सभी सात देशों को मजबूर कर दिया कि वे एक साझी घोषणा में रूस से कहें कि वह हफ्ते भर के अंदर पूर्वी यूक्रेन के रूस समर्थकों की नकेल कसे, वरना बहुत बुरा होगा. लेकिन, यूक्रेन की अंतरिम सरकार से कोई आग्रह, कोई अपील नहीं की गई. इसी से स्पष्ट हो जाना चाहिए कि यूक्रेन-संकट को, जिसे यूरोपीय संघ और अमेरिका ने ही मिल कर पैदा किया, किसी संभावित युद्ध तक ले जाने में दिलचस्पी और उतावली किस की है.

स्थिति यह हो गई है कि पश्चिमी सरकारें और सारे मीडिया मिलकर रूसी राष्ट्रपति के विरुद्ध एक स्वर में जितना अधिक प्रलाप कर रहे हैं, आम जनता का उनके ऊपर से विश्वास उतना ही उठता जा रहा है. कम से कम जर्मनी में तो यही देखने में आ रहा है. पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले पाठक-पत्रों और वेबसाइटों पर छपने वाली पाठकों की टिप्पणियों में उन लोगों का पलड़ा काफी भारी है, जो पश्चिमी सरकारों के इरादों के प्रति शंका और राष्ट्रपति पुतिन के प्रति समझ दिखा रहे हैं. मीडिया वाले हैरान हैं और नेता परेशान. इन प्रतिक्रियाओं में ऐसे बहुत सारे तथ्यों का उल्लेख मिलता है, जो और सरकारें तो छिपाती ही हैं, मीडिया वाले भी दबा देते हैं.

एन वक्त सिपाही पस्त

फोटोः प्रमोद अधिकारी

राजकुमार ताड़माली अब चालीस के हो चुके हैं. ताड़ी के मौसम में पेड़ से ताड़ी उतारने का काम करते हैं. बीस साल पहले इसी धंधे ने उनका एक सपना लगभग छीन लिया था. सपना हेलीकॉप्टर देखने का. 1993 में आजमगढ़ से 12 किलोमीटर दूर जहानागंज बाजार में मुलायम सिंह यादव आने वाले थे, हेलीकॉप्टर से. मुलायम अपनी नवगठित समाजवादी पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए गांव-गांव का दौरा कर रहे थे. इसी क्रम में जहानागंज बाजार में भी उनकी जनसभा होनी थी. छोटे से बाजार में उस समय तक किसी ने भी हेलीकॉप्टर नहीं देखा था. सबकी तरह ही तब उन्नीस साल के राजकुमार भी मुलायम सिंह और हेलीकॉप्टर को देखने की इच्छा रखते थे. राजकुमार की दिक्कत यह थी कि उनके पास ताड़ी भरी दो लभनी (ताड़ी निकालने वाला मिट्टी का बर्तन) थीं. बाजार में उनका कोई स्थायी ठिकाना नहीं था. इसी बीच हेलीकॉप्टर की आवाज आई और पूरे बाजार में अफरा-तफरी मच गई. सारे लोग रैली-स्थल की ओर भागने लगे. थोड़ी ही देर में पूरे बाजार में सन्नाटा पसर गया. लेकिन राजकुमार ताड़ी की वजह से फंसे रह गए. बाजार की एक महिला ने आकर उनसे पूछा कि बाबू तुम हेलीकॉप्टर देखने नहीं गए. राजकुमार ने मन मसोस कर बताया कि ताड़ी साथ में है. उस महिला ने उनकी ताड़ी अपने घर में रखवा कर उन्हें हेलीकॉप्टर देख आने के लिए कहा. राजकुमार भागते हुए रैली स्थल पर पहुंचे थे. इस तरह हेलीकॉप्टर देखने की उनकी इच्छा पूरी हो गई और वे मुलायम सिंह के अनन्य भक्त बन गए.

राजकुमार अब भी ताड़ी बेचते हैं. पर अब पेड़ से ताड़ी कम उतरती है तो कभी-कभी पानी मिलाकर भी काम चला लेते हैं. ताड़ी में पानी की तरह ही राजकुमार का मुलायम प्रेम भी अब उतना गाढ़ा नहीं रहा. मुलायम सिंह एक बार फिर से आजमगढ़ में हैं. वे यहीं से चुनाव लड़ रहे हैं. पर राजकुमार इस बार उन्हें देखने नहीं गए. वजह पूछने पर वे बड़ा दिलचस्प उत्तर देते हैं, ‘हेलीकॉप्टर भी देख लेहली औ मुलायम के भी देख लेहली. बीस साल से खाली मुलायमै हेलीकॉप्टर पर बैठत हौवैं. केहु दूसर ना बैठल अब तक.’ (हेलीकॉप्टर भी देख लिए और मुलायम को भी. बीस साल से केवल मुलायम ही हेलीकॉप्टर पर बैठे हैं. किसी दूसरे को मौका नहीं मिल रहा.) ताड़माली उत्तर प्रदेश की अन्य पिछड़ा वर्ग की सौतेली श्रेणी में आते हैं. यहां पिछड़ों के नाम पर यादवों का वर्चस्व है.

1993 से मुलायम सिंह आजमगढ़ से अपने चुनावी अभियान का श्रीगणेश करते आएं हैं. इस बार स्थिति अलग है. इस बार वे स्वयं आजमगढ़ सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं. आजमगढ़ से चुनाव लड़ने का फैसला मुलायम सिंह ने आखिरी समय में किया है. वे खुद इसकी वजह बताते हैं, ‘अगर नरेंद्र मोदी बनारस से चुनाव नहीं लड़ते तो मुझे आजमगढ़ नहीं आना पड़ता.’ जाहिर सी बात है कि मोदी के बनारस आने से पूर्वांचल की 32 सीटों का समीकरण बदल गया है. भाजपा बनारस इकाई के विधि प्रकोष्ठ के अध्यक्ष दीपक मिश्रा कहते हैं, ‘पिछले दो लोकसभा चुनाव में पूर्वांचल में हमारी स्थिति दयनीय हो गई थी. लेकिन मोदी जी के आने से यह बदलाव आया है कि हर सीट पर हम पहले या दूसरे नंबर की लड़ाई में आ गए हैं.’ यह वही स्थिति है जिसको खत्म करने के लिए मुलायम सिंह ने आजमगढ़ का रुख किया है. पर मुलायम के इस कदम का पूर्वांचल की बाकी सीटों पर कोई असर पड़ता दिख नहीं रहा है. इसके विपरीत आजमगढ़ की सीट भी उनके लिए आसान साबित नहीं हो रही है. ‘माई’ का फार्मूला उनके गले की फांस बन गया है. उनके खिलाफ दो मुसलमान और एक यादव खड़ा है और तीनों की अपने इलाकों में अच्छी-खासी पैठ है.

लंबे समय से आजमगढ़ समेत पूर्वांचल का इलाका समाजवाद का गढ़ रहा है. सन सतहत्तर में यहां की जनता ने तत्कालीन केंद्रीय इस्पात मंत्री और इंदिरा कैबिनेट का अहम हिस्सा रहे चंद्रजीत यादव को हराकर जनता पार्टी के रामनरेश यादव को संसद भेजा था. इसके बाद से कांग्रेस यहां कभी उबर नहीं पायी. हालांकि बाद में मुलायम सिंह यादव के समाजवादी नेता बनने के बाद समाजवाद का दायरा दो समुदायों – यादव और मुसलिम – के बीच सिमट गया. समाजवाद का गढ़ यह अभी भी है लेकिन अब यह गढ़ समाजवादी विचारधारा की वजह से नहीं बल्कि धार्मिक ध्रुवीकरण और यादव मतदाताओं की बड़ी जनसंख्या के कारण है.

मुलायम सिंह के आजमगढ़ आने से पहले तक इस सीट पर कई खेल हुए थे. पहले राज्य के वरिष्ठ मंत्री बलराम यादव ने लोकसभा का टिकट ठुकराया, उसके बाद हवलदार यादव को उम्मीदवार घोषित किया गया था. उसके भी थोड़ा पहले जाएं तो मुलायम सिंह के दूसरे पुत्र प्रतीक यादव को आजमगढ़ से लड़ाने के लिए तथाकथित सपा कार्यकर्ताओं का एक झुंड धरना-प्रदर्शन तक कर चुका है. लेकिन आजमगढ़ में सपा की स्थिति का भान नेताजी समेत सबको था. पहले नंबर का नतीजा भविष्य के गर्भ में था लेकिन तीसरे स्थान पर समाजवादी पार्टी का आना तय था. इसकी वजहें बेहद सीधी-सपाट थीं. मुजफ्फरनगर का दंगा और पिछले ढाई साल के दौरान समाजवादी पार्टी का कामकाज.

इतिहास ने मुलायम सिंह और अखिलेश यादव को एक अवसर दिया था. इतना बड़ा बहुमत अब तक प्रदेश में किसी पार्टी को नसीब नहीं हुआ था. यह परिवर्तन की आकांक्षा वाला मत था. यह मत अखिलेश यादव के रूप में एक नए खून को था. यह मत नई राजनीति को था, यह मत महत्वाकांक्षी युवाओं का था. लेकिन इस चीज को समझने में समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह यादव बुरी तरह से चूक गए. अखिलेश यादव सरकार का चेहरा बने और पीछे से मुलायम सिंह यादव ने इस सरकार को उन्हीं तौर-तरीकों से चलाने की कोशिश की जिनका इस्तेमाल वे पिछले बीस सालों से करते आ रहे थे. जातिवाद को बढ़ावा देकर, पंथवाद को बढ़ावा देकर, कानून व्यवस्था की दुर्गति करके. लगा कि सपा ने 2007 की करारी हार से कोई सबक ही नहीं सीखा. नतीजा सामने था, ढाई साल में ढाई सौ सांप्रदायिक और जातीय दंगे. यह गृहमंत्रालय की ताजा रिपोर्ट है. इसी में मुजफ्फरनगर का दंगा भी शामिल है. उत्तर प्रदेश ने ऐसा भयावह दंगा पिछले दो दशकों में पहली बार देखा. इस दंगे के पीड़ितों में एक बड़ी संख्या मुसलमानों की है. वही मुसलमान जिसके सहारे मुलायम सिंह ने माई का जिताऊ फार्मूला तैयार किया था. बात सिर्फ दंगों तक ही सीमित नहीं रही. इसके बाद स्वयं मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी के नेताओं ने ऐसे-ऐसे बयान दिए जिससे मुसलमानों का मन उनके प्रति और खट्टा होता गया.

जोरदार अभिनंदन मुलायम धिंह के नामांकन के बाद आजमगढ़ में धनकला रोडशो
जोरदार अभिनंदन मुलायम धिंह के नामांकन के बाद आजमगढ़ में धनकला रोडशो. फोटोः प्रमोद अधिकारी

आजमगढ़ से मुलायम सिंह के चुनाव लड़ने की घोषणा के वक्त राजनीतिक हलकों में इस बात पर एकराय थी कि नेताजी ने इस चुनाव का मास्टर स्ट्रोक खेला है. संभावना व्यक्त की जाने लगी थी कि उनके इस कदम से पूर्वांचल में मोदी के उभार को रोकने में कामयाबी मिलेगी. सपा की आजमगढ़ इकाई के वरिष्ठ नेता शादाब अहमद कहते हैं, ‘आज मुजफ्फरनगर से बड़ा मुद्दा मोदी को रोकना है. नेताजी के आजमगढ़ आने से मुसलमानों में एक उम्मीद पैदा हुई है.’ हालांकि निजी बातचीत में कुछ दूसरे सपा नेताओं की चिंता सामने आ जाती है. उन्हें इस बात का गहराई से अहसास है कि मुलायम सिंह का रास्ता आसान नहीं है. आजमगढ़ से मुलायम सिंह का सिर्फ जीतना ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि उनके कद के हिसाब से जीत का अंतर होना भी जरूरी है. जो लोग सिर्फ मुलायम सिंह के कद और जातिगत समीकरण पर अपनी उम्मीदें टिकाए बैठे है चुनाव के नतीजे उन्हें चौंका सकते हैं. शहर के प्रतिष्ठित शिब्ली कॉलेज में समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष जहूर अहमद बताते हैं, ‘इस शहर का मिजाज हमेशा से एंटी एस्टैबिलिशमेंट वाला रहा है. यह बात इस बार मुलायम सिंह के खिलाफ जा सकती है. मुजफ्फरनगर भी उनके लिए चिंता का सबब होना चाहिए. हालांकि उनके आने से छिटका हुआ मुसलिम वोट कुछ हद तक सपा के पक्ष में गोलबंद हुआ है.’

आंकड़े सपा के पक्ष में हैं. जिले की दस में से नौ विधानसभा सीटें सपा के पास हैं. पांच विधायक अखिलेश यादव की सरकार में मंत्री हैं. पर एक सीट जो सपा के हाथ में नहीं है वही मुलायम सिंह के लिए चिंता का सबब है. मुबारकपुर विधानसभा सीट से बसपा के विधायक शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली मुलायम सिंह के गले की फांस बन गए हैं. जमाली 2012 के विधानसभा चुनाव में सारी सपा लहर को धता बताकर बसपा के टिकट पर चुनाव जीते थे. इलाके के बड़े व्यापारियों में शुमार जमाली को बसपा ने इस बार लोकसभा का उम्मीदवार बनाया है. जमाली को बसपा के दलित वोट बैंक (2.5 लाख) के अलावा बड़ी संख्या में मुसलिम वोटों का आसरा है. यह वह मुसलिम वोट है जो किसी भी कीमत पर मुजफ्फरनगर और तमाम दूसरे दंगों को भूलने के लिए तैयार नहीं है. सपा के एक वरिष्ठ नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘मुसलमानों में नाराजगी इतनी ज्यादा है कि मुलायम सिंह लाख कोशिश कर लें पर चालीस फीसदी मुसलिम वोट दूसरी पार्टियों को जाएगा ही.’ अपने समुदाय से मिल रहे समर्थन का अहसास गुड्डू जमाली के समर्थकों को भी है. उनके एक नजदीकी साथी कहते हैं, ‘या तो हम जीतेंगे या रमाकांत. मुलायम सिंह को हर हाल में हारना होगा.’ रमाकांत यादव भाजपा के लोकसभा उम्मीदवार और यहां के वर्तमान सासंद हैं.

मुलायम सिंह के सामने हालत कोढ़ में खाज वाली है. एक अन्य मुसलिम नेता राष्ट्रीय उल्मा काउंसिल के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना आमिर रशादी भी मुलायम सिंह के खिलाफ मैदान में उतर गए हैं. उल्मा काउंसिल का जन्म 2008 में दिल्ली के बटला हाउस में हुए एनकाउंटर के विरोध में हुआ था. उस मुठभेड़ में जिले के संजरपुर गांव के तीन लड़कों को पुलिस ने मार गिराया था. पुलिस का दावा था कि ये लड़के दिल्ली में हुए सीरियल बम धमाकों में लिप्त थे. इसी बटला हाउस की छाया में 2009 के लोकसभा चुनाव हुए थे जिसमें पहली बार राष्ट्रीय उल्मा काउंसिल ने आजमगढ़ और आसपास की सीटों से अपने उम्मीदवार उतारे थे. तब आजमगढ़ सीट से उल्मा काउंसिल ने शहर के मशहूर डॉक्टर जावेद को मैदान में उतारा था. डॉ. जावेद का बेटा भी बटला हाउस मुठभेड़ में मारा गया था. भावुकता के उस उफान में उल्मा काउंसिल को 60,000 वोट मिले थे. और पहली बार इस जिले में भाजपा का कमल खिला था. जितने वोट काउंसिल को मिले थे लगभग उतने ही वोट से रमाकांत यादव चुनाव जीते थे. अब वही उल्मा काउंसिल एक बार फिर से मुलायम सिंह की राह में खड़ी है. हालांकि स्थानीय सपा नेता और प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री नफीस अहमद उन्हें सिरे से खारिज करते हैं, ‘मुसलमान रशादी पर रत्ती भर विश्वास नहीं करता है. मौलाना भटक गए हैं. उनके लिए मुसलमानों का कोई महत्व नहीं है बस अपनी महत्वाकांक्षा के लिए वे राजनीति कर रहे हैं.’

आजमगढ़ की फिजाओं में ये हवा फैली हुई है कि मौलाना रशादी मुलायम सिंह के साथ सौदा करके चुनाव से हट सकते हैं. रिहाई मंच के एक नेता के मुताबिक रशादी ने मुलायम सिंह के सामने महासचिव पद की मांग रखी है. स्वयं मौलाना इस बात की तस्दीक करते हैं कि सपा और बसपा के लोग उनके संपर्क में हैं, साथ ही वे किसी भी तरह की सौदेबाजी से इनकार करते हैं, ‘हम टिकाऊ हैं, बिकाऊ नहीं है. मुलायम सिंह को आजमगढ़ से बैरंग वापस भेजना हमारा मकसद है.’ एक बात तय दिख रही है कि अगर मौलाना दम भरकर आजमगढ़ का चुनाव लड़ जाते हैं तो जो मुसलमान वोट 2009 में दो हिस्सों में बंटा था वह इस बार तीन हिस्सों में बंट जाएगा. भाजपा को इसी बंटवारे और मोदी लहर का भरोसा है.

एक अकेले मुलायम सिंह की जान आजमगढ़ में कई मोर्चों पर फंसी हुई है. भाजपा ने फिर से रमाकांत यादव को टिकट देकर उनके दूसरे स्थायी स्तंभ (यादव) को ढहाने की भी तैयारी कर रखी है. यादव वोटों में पड़ रही दरार सपा की एक और चिंता है. यह बात स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है कि युवा यादव वोटरों में मोदी के प्रति रुझान है. साथ ही हाल के कुछ दिनों में आजमगढ़ और आस-पास के जिलों में यादवों के बीच उपजाति का भी विचार तेजी से सामने आया है. जानकारों का कहना है कि इसके पीछे संघ की प्रोपैगैंडा मशीनरी काम कर रही है. इसका मकसद यादव वोटों को दो फाड़ करना है. विचार यह है कि यादवों की दो उपजातियां हैं ग्वाला और ढंढ़ोर. कहानी इस तरह से फैलाई गई है कि आजमगढ़ समेत पूर्वांचल के ज्यादातर यादव ग्वाला हैं जो कि अन्य यादवों से श्रेष्ठ हैं. शहर के सिविल लाइन चौराहे पर स्थिति गोयल कैफे में बैठे कुछ युवाओं को 23 वर्षीय अनिल यादव बड़े गर्व के साथ यह कहानी सुनाते हैं ‘हम लोग ग्वाला अहीर हैं, मुलायम सिंह ढंढ़ोर हैं.’ अनिल से बात करने पर पता चलता है कि उन्हें भी श्रेष्ठता की यह कहानी हाल ही में पता चली है. मुलायम सिंह और उनके रणनीतिकारों को इस नए यथार्थ से भी जूझना है. चुनावों में इसके प्रभाव को लेकर कुछ भी कह पाना नामुमकिन है.

इन तमाम झंझावातों के बावजूद राजनीतिक पंडितों की राय है कि नतीजे आने से पहले मुलायम सिंह को खारिज करना या उनके बारे में कोई भविष्यवाणी करना समझदारी नहीं होगी. अखाड़े में चरखा दांव के महारथी रहे मुलायम सिंह यादव ने राजनीति में भी कई बार चरखा दांव से अपने विरोधियों को ठिकाने लगाया है. 1989 में वीपी सिंह के समर्थन से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह ने 1990 में वीपी सिंह को छोड़ चंद्रशेखर का हाथ पकड़ कर अपनी सरकार बचा लेने का कारनामा किया था. 1992 उन्होंने चंद्रशेखर का भी साथ छोड़ दिया और अपनी खुद की समाजवादी पार्टी बना ली. 1998 में मुलायम सिंह के चरखा दांव की शिकार सोनिया गांधी भी हो चुकी हैं. तब राजग की सरकार गिरने पर सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की प्रबल संभावना थी, मुलायम सिंह ने भी उन्हें समर्थन का आश्वासन दिया था लेकिन अंत समय में सोनिया के विदेशी मूल को बहाना बनाकर वे समर्थन देने से पीछे हट गए. सोनिया देखती रह गईं. इसी तरह 2012 में उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर ममता बनर्जी को गच्चा दे दिया था.

पिछले कुछ दिनों के दौरान अगर हम मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक गतिविधियों और उनके बयानों पर ध्यान दें तो पाते हैं कि एक बार फिर से वे राजनीति का चरखा दांव चल रहे हैं. सीधी भाषा में कहें तो वे साम-दाम-दंड-भेद सबका इस्तेमाल कर रहे हैं. बुलंदशहर में जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने शिक्षामित्रों को सीधे-सीधे धमका दिया, ‘हमारी सरकार ने आप लोगों के लिए तमाम सहूलियतें दी हैं. अब आप हमें वोट दीजिए वरना चुनाव के बाद सारी सुविधाएं वापस ले ली जाएंगी.’ मुरादाबाद में वे एक कदम और आगे चले गए, ‘लड़के हैं गलती हो जाती है. रेप के मामले में फांसी दी जाएगी? बंबई में तीन लड़कों को फांसी दे दी गई है. हम इसे खत्म करेंगे.’

दरअसल मुलायम सिंह को अहसास है कि प्रधानमंत्री बनने का उनका यह आखिरी अवसर था और उत्तर प्रदेश सरकार के कारनामों ने उनकी संभावना को बुरी तरह से पलीता लगाया है. हताशा और निराशा की हालत में आजमगढ़ में दिया गया उनका पिछला बयान काबिले गौर है, ‘युवाओं को आपने बहुत कुछ दिया है. उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया है. हमें भी तो दिल्ली में कुछ बना दो. मुझे प्रधानमंत्री कब बनाओगे?’ मुलायम ने यह बयान 24 अप्रैल को आजमगढ़ में अपना पर्चा दाखिल करने के बाद जनसभा में दिया था. वे किसी निरीह की तरह गुहार लगा रहे थे. इससे कुछ ही क्षण पहले का घटनाक्रम ध्यान देने लायक है. मुलायम सिंह अपना भाषण खत्म करके जा चुके थे. जनता का हुजूम आईटीआई मैदान से बाहर निकलने लगा था. तभी अचानक से एक बार फिर से मुलायम सिंह की आवाज माइक पर गूंजी. भीड़ वापस मैदान की तरफ मुड़ गई. इस मौके पर मुलायम सिंह ने यह गुहार लगाई. इसका जनता के ऊपर कुछ असर भी देखने को मिला. भीड़ से निकल रहे लोगों में इस बात पर चर्चा हो रही थी कि इतना बड़ा नेता कुछ मांग रहा है तो उन्हें विचार करना चाहिए.

जिस पार्टी ने 2012 में चमत्कृत करने वाली सफलता हासिल की थी वह अचानक ही रसातल में क्यों पहुंच गई? मुलायम सिंह जैसे नेता को गिड़गिड़ाने की नौबत क्यों आई? जितनी सीटें विधानसभा चुनाव में सपा को मिली थीं उनके हिसाब से सपा का आंकड़ा लोकसभा में चालीस सीटों के पार जाता दिख रहा था. लेकिन मुलायम सिंह जैसा पका हुआ नेता भी उस जनमत को पढ़ने में नाकाम रहा. जहूर साहब के शब्दों में, ‘मुलायम सिंह ये नहीं समझ पाए कि ये जवाबदेही का वोट है. आज का वोटर नेताओं को दूसरा मौका देने को कतई तैयार नहीं है. शायद मुलायम सिंह को यह बात अब समझ आ जाए.’

बीते ढाई सालों का सपा शासन दंगों, लैपटॉप और बेरोजगारी भत्ता जैसी चीजों के लिए जाना जाएगा. दिक्कत यह हुई कि दंगे और कानून व्यवस्था लैपटॉप और बेरोजगारी पर भारी दिख रहे हैं. भाजपा ने समय के साथ बदलते हुए अपनी हांडी को डेवलपमेंट, सुशासन में लपेट दिया है जबकि मुलायम सिंह अपनी हांड़ी को उसी रूप में चढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. ध्रुवीकरण और भयादोहन की राजनीति वाली हांडी. चौरासी कोसी से लेकर मुजफ्फरनगर की नाकामी मुलायम सिंह से आजमगढ़ में बड़ी कीमत वसूल रही है. बहुत संभव है कि येन-केन प्रकारेण मुलायम आजमगढ़ का चुनाव जीत जाएं लेकिन उन्हें इस बात का गहराई से  अहसास हो जाएगा कि उनके मार्के वाली राजनीति के दिन अब लद चुके हैं.