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नरेंद्र मोदी

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इलेस्ट्रेशन: एम दिनेश

लोकसभा की 543 में से 282 सीटें जीतकर भारतीय जनता पार्टी पहली बार इतिहास में अपने बूते सरकार बनाने जा रही है. इसमें उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रहे नरेंद्र मोदी का सबसे बड़ा हाथ है. मोदी के काम करने का अपना ही तरीका है. उनके द्वारा अब तक चलाई गई गुजरात सरकार के काम करने का तरीका भी अलग ही था. खुद की उदार छवि और मजबूती से स्थापित करने की उनकी कुछ मजबूरी भी है. और मुख्यमंत्री बनने के बाद से उनके संघ से कभी उतने सहज संबंध नहीं रहे जितने शिवराज सिंह सरीखे उनकी जैसी ही पृष्ठभूमि वाले अन्य भाजपाई शासकों के रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि मोदी के नेतृत्व में सरकार चलाने वाली भाजपा का स्वरूप भविष्य में कैसा हो सकता है. क्या उनका अब तक का राजनीतिक आचरण आने वाले समय में पार्टी के किसी और दिशा में जाने के संकेत भी देता है? क्या मोदी वह व्यक्ति होंगे जिनकी वजह से आने वाले समय में समाज के सभी वर्ग भाजपा को किसी भी अन्य पार्टी की तरह स्वीकार्य मानने लगेंगे? क्या पार्टी मोदी के नेतृत्व में ही पूर्व की कांग्रेस की तरह पूरे देश में विस्तार वाली पार्टी बन जाएगी? और क्या संघ के शिंकजे से बाहर निकलकर भाजपा सही मायनों में एक स्वतंत्र राष्ट्रीय पार्टी के रूप में स्थापित हो जाएगी. धुर दक्षिणपंथी नहीं बल्कि सिर्फ दक्षिणपंथी रुझान वाली.

एक वर्ग ऐसा है जो मानता है कि भाजपा को बंदर की तरह नचाने के संघ के दिन अब खत्म हो चुके हैं. ऐसा सोचने के पीछे आधार है. और वह है नरेंद्र मोदी और संघ के बीच का पिछले एक दशक का संबंध. पिछले 10 सालों में मोदी और संघ के संबंध अर्श से फर्श पर पहुंच गए. मोदी ने पिछले 10 सालों में गुजरात में संघ और उससे जुड़े संगठन अर्थात पूरे संघ परिवार को नाथने में कोई कसर बाकी नहीं रखी.

जब 2001 में नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे तो इससे सबसे ज्यादा खुश होने वालों में संघ परिवार भी था. उसका खुश होना लाजिमी भी था. उसके कार्यालय में कपड़े धोने, कमरा साफ करने से लेकर चाय पिलाने वाला उसका स्वंयसेवक किसी राज्य का मुख्यमंत्री बना था. संघ को उम्मीद थी कि उसकी वैचारिक फैक्ट्री में तैयार हुआ उसका यह खाकी नेकर वाला लाडला राज्य का मुखिया बनने के बाद अपने परिवार की विचारधारा को जहां भी संभव हो फैलाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखेगा. संघ को विश्वास था कि उसके सपनों के ‘अखंड भारत’ – जिसकी सीमा भारतीय सीमा के पार पाकिस्तान, अफगानिस्तान और उससे भी आगे तक जाती है – के निर्माण की नींव रखने का काम उसका यही स्वंयसेवक गुजरात से करेगा.

लेकिन अखंड हिंदुस्तान और राज्य की हर दरो-दीवार को भगवा रंग से रंगना तो दूर संघ का यह मानस पुत्र संघ के अस्तित्व को ही निपटाने में लग गया. गुजरात संघ के पदाधिकारी बताते हैं कि कैसे संघ के कार्यकर्ता यदि राज्य में गोवध आदि को लेकर प्रदर्शन करते और वह जरा भी बेकाबू होता तो पुलिस उन पर न सिर्फ लाठियां भांजती बल्कि जेल की हवा खिलाने भी ले जाती. कैसे अहमदाबाद में 200 से ऊपर मंदिर मोदी के आदेश पर अतिक्रमण हटाने के लिए तोड़ दिए गए. कैसे विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगड़िया जो पूरे भारत में आगे उगलते नजर आते हैं उन्हें मोदी ने अपने प्रदेश में शांत करा दिया. और कैसे पूरे संघ परिवार को न सिर्फ मोदी ने बिखरा दिया बल्कि इससे जुड़े एक-एक संगठन को राज्य में बेअसर करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी.

फोटोः विकास कुमार
फोटोः विकास कुमार

मोदी और संघ के इसी ऐतिहासिक संबंध के आधार पर एक तबका मानता है कि मोदी अब प्रधानमंत्री बनने के बाद भी संघ से उसी तरह का व्यवहार करेंगे जैसा उन्होंने गुजरात में किया. वे संघ की हर बात को तो कम से कम नहीं ही सुनेंगे. ऐसे में जिस तरह से गुजरात भाजपा संघ परिवार के किसी नियंत्रण या निर्देश के बाहर स्वतंत्र होकर काम करती थी वैसे ही भाजपा केंद्र और अन्य राज्यों में करने लग सकती है.

यह तो हुआ एक नजरिया. एक दूसरी दृष्टि भी है जो मानती है कि भले ही गुजरात में संघ और मोदी के संबंध, तनावग्रस्त की श्रेणी में आते थे, लेकिन मोदी के दिल्ली आ जाने के बाद स्थिति दूसरी होगी. इसका सबसे बड़ा कारण है कि मोदी को गुजरात विधानसभा के चुनावों में अपना परचम लहराने के लिए संघ की जरूरत नहीं पड़ती थी. लेकिन दिल्ली स्थिति 7 आरसीआर पहुंचने के लिए जो चुनावी सड़क मोदी और भाजपा ने बनाई है, उसे बनाने में संघ ने भी अपना खून पसीना बहाया है. अर्थात मोदी को दिल्ली तक पहुंचाने में संघ ने भी बड़ी भूमिका अदा की है.

jogi_ki_jagatयह जरूर था कि मोदी का प्रधानमंत्री के लिए नाम उछलने पर संघ नेतृत्व अपने गुजरात अनुभव के कारण सशंकित था. लेकिन बाद में चौतरफा बने माहौल और कैडरों के दबाव में उसे मोदी को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के तौर पर स्वीकार करना पड़ा. इसके बाद से चुनाव अभियान के आखिरी दिन तक संघ के स्वंयसेवक मोदी को पीएम बनाने के लिए देश भर में प्रचार करते रहे. संघ के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘संघ के हमारे स्वंयसेवकों ने गांव-गांव, घर-घर जाकर लोगों से मोदी जी के लिए वोट मांगा है. संघ जितना सक्रिय इस चुनाव में था उतना कभी नहीं रहा. इस बात को मोदी जी अच्छी तरह से जानते हैं.’
तो क्या ऐसे में संभव है कि मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद संघ की अनदेखी करेंगे? वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अजय बोस कहते हैं, ‘ये चुनाव भाजपा ने नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत की पार्टनरशिप में जीता है. ऐसे में भाजपा संघ से कैसे स्वतंत्र हो पाएगी. जिस तरह संघ के स्वंयसेवकों ने दिन-रात मेहनत करके मोदी को पीएम की कुर्सी तक पहुंचाया है, ऐसे में ये संभव नहीं है कि मोदी संघ की अनदेखी कर सके.’

जानकार आगे जाकर संघ और मोदी के बीच रस्साकसी की स्थिति उत्पन्न होने की संभावना जताते हैं. उनके अनुसार संघ पर उसके समर्थक और स्वयंसेवक, अभी नहीं हुआ तो फिर कभी नहीं के तहत अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने का दबाव डालेंगे. संघ की तरफ से भी भाजपा पर अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने का दबाव होगा. भाजपा खुद कह रही है कि यह वोट उसे विकास के नाम पर मिला है. मोदी को बहुत बड़ी तादाद में उन युवाओं ने वोट दिया है जिनका संघ की राजनीति से कोई मतलब नहीं है. यह नए भारत का सपना देखने वाले युवाओं का वोट है. मोदी ने भी अपने पूरे चुनाव प्रचार में कोई ऐसी भाषा भी नहीं प्रयोग की जो केशव कुंज से निकली हो. जहां मोदी अमेरिका और जापान जैसा विकास करने की बात करेंगे और संघ कहेगा कि हमें तो ‘राम राज्य’ चाहिए. ऐसे में संघ के साथ मोदी कैसे सामंजस्य बैठा पाएंगे यह देखने वाली बात होगी.

बोस कहते हैं, ‘अटल जी से संघ के नेता जब भी आरएसएस के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए कहते थे. वे तपाक से बोल देते थे कि भई बहुमत नहीं है. गठबंधन में आपका एजेंडा लागू नहीं हो सकता. लेकिन मोदी तो गठबंधन का रोना नहीं रो पाएंगे. हालांकि संघ पर ‘ब्रदरहुड ऑफ सैफरन’ नामक किताब लिखने वाले वाल्टर एंडरसन मीडिया से बातचीत में कहते हैं, ‘मोदी अगर पीएम बने तो आरएसएस का अपना अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा.’

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साभार: आउटलुक

जानकारों का एक समूह मानता है कि चूंकि मोदी विकास के नारे के साथ चुनाव जीतकर आए हैं, ऐसे में विचारधारा के स्तर पर वे खुद को एक्सट्रीम राइट में ले जाने की बजाय ‘राइट ऑफ द सेंटर’ जैसी विचारधारा के साथ चलने की कोशिश करेंगे. लेकिन इसमें भी कई पेंच है. पहला यह कि क्या संघ हिंदुत्व से भाजपा को कहीं और खिसकने देगा वह भी उस स्थिति में जब पार्टी अपने दम पर बहुमत में आई है. संघ के एक नेता कहते हैं, ‘हिंदुत्व के कारण ही भाजपा को इतना वोट मिला है. वरना विकास के नारे पर इतना वोट मिलता. दोनों के मेल से ये सुनामी आई है.’

भाजपा और मोदी को एक परेशानी भाजपा के अपने उन मुद्दों से भी होने वाली है जो भाजपा की पहचान रहे हैं और जिस पहचान को व्यक्त करने में उसने हमेशा गर्व महसूस किया है. क्या होगा धारा 370, समान नागरिक संहिता और राम मंदिर जैसे भाजपा की पहचान से जुड़े मुद्दों का. पूर्व में इन मुद्दों पर भाजपा से जब भी पूछा जाता था वह कहती थी कि गठबंधन के लोग उसे ऐसा करने नहीं देंगे इसलिए वह इन तीनों मुद्दों पर चुप है. लेकिन अब पार्टी को मिले प्रचंड बहुमत के बाद वह क्या कहेगी. जानकार मानते हैं कि ये प्रश्न इसलिए भी जरूरी हैं क्योंकि भाजपा को मिलने वाले इस बार के बड़े समर्थन में उन लोगों का भी योगदान है जो मोदी को एक हिंदुत्ववादी नेता के तौर पर देखते हैं और जिन्हें उम्मीद है मोदी हिंदू राष्ट्र के सपने को पंख देने की जरूर कोशिश करेंगे.

राजनीतिक टिप्पणीकार रशीद किदवई कहते हैं, ‘भविष्य की भाजपा का स्वरूप कैसा होगा इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. मोदी पीएम बनने के बाद कैसे व्यवहार करते हैं ये देखना बाकी है. पद बदलने का असर व्यक्तित्व पर भी तो पड़ता है.’ हालाकि रशीद एक संभावना जताते हुए कहते हैं, ‘मोदी विकास और संघ के एजेंडे, दोनों के बीच एक तालमेल बिठाने की कोशिश करेंगे. ये कुछ-कुछ मध्य प्रदेश सरकार की तरह का होगा जहां सरकार विकास के साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर थोड़ा बहुत संघ का एजेंडा भी चलाती रहती है. जैसे सूर्य नमस्कार आदि. ऐसे में मोदी भी कुछ इसी तर्ज पर करेंगे.’

कुछ लोग इस दिशा में भी इशारा करते हैं कि मोदी संघ और उसके एजेंडे से दूर रहने की भरपूर कोशिश करेंगे. बोस कहते हैं, पूरे पश्चिमी मीडिया में मोदी के पीएम बनने की बडी होस्टाइल कवरेज हुई है. दूसरी बात देश का एक बड़ा वर्ग भी बहुत करीब से मोदी की हर हरकत को देखेगा .ऐसे में वो ऐसा कुछ भी करने से बचेंगे जो 24 घंटे के न्यूज चैनल और सोशल मीडिया के जमाने में नकारात्मक बहस का कारण बने. राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने कुछ भी गड़बड़ की तो उनके पॉलिटिकल करियर के लिए ये घातक होगा. वो आरएसएस का साथ उतना ही देंगे जिससे जनता के बीच कोई नकारात्मक मैसेज न जाए.’

धर्म, वर्ग के पार

भाजपा चुनाव परिणामों में 300 का आंकड़ा पार करने पर खुशी से झूम रही है. उसकी खुशी का जितना बड़ा कारण उसको मिलने वाला बहुमत है उतना ही बड़ा कारण उसके प्रसन्न होने का यह भी है कि उसने सारे सामाजिक समीकरणों को सिर के बल खड़ा कर दिया है. कई टिप्पणीकारों ने भी इस ओर इशारा किया है कि कैसे इस चुनाव में मंडल, कमंडल को जनता ने नकार दिया. जाति, धर्म , वर्ग का गणित फेल हो गया.

ऐसा सोचने के पीछे मजबूत आधार है. भाजपा की सूनामी में दलित राजनीति की चैंपियन बसपा शून्य पर पहुंच गई वहीं यूपी के माध्यम से लाल किले पर झंडा फहराने को बेताब मुलायम सिंह यादव की सपा के हिस्से में न मुस्लिम आए न यादव. उनके हिस्से में सिर्फ परिवार आया. भाजपा ने सारे अनुमानों को ध्वस्त करते हुए उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 71 पर अपना झंडा फहराया. यही हाल बाकी राज्यों में भी रहा. पार्टी कहती है कि लोगों ने पहचानों को किनारे रखकर नरेंद्र मोदी को वोट दिया. न प्रत्याशी देखा और न जाति.

देश के वोटरों में 17 फीसदी यानी 13.8 करोड़ दलित मतदाता हैं. दलितों के लिए आरक्षित 84 सीटों में से इस बार भाजपा को 40 सीटें मिलीं. इनमें से पिछली बार उसे सिर्फ 12 सीटें मिली थीं. वहीं देश में आदिवासी वोटरों की संख्या करीब 10 करोड़ है जिनके लिए 47 सीटें आरक्षित हैं. 2009 में भाजपा ने जहां इन सीटों में से 14 पर जीत दर्ज की थी वहीं इस बार आंकड़ा 29 पर पहुंच गया. आदिवासी सीटों पर जीतने वाली भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन गई. पिछड़ा वर्ग की स्थिति भी लगभग ऐसी ही है. पिछड़ी राजनीति भी इस बार भाजपा के साथ आकर खड़ी हो गई. यूपी की 30 और बिहार की 9 सीटों पर ओबीसी वोटर निर्णायक की भूमिका में हैं. इन में से भाजपा ने क्रमशः 25 और 4 सीटें जीत लीं. उत्तर प्रदेश और बिहार में इस बार मिलीं कुल 29 सीटों की तुलना में पिछली बार भाजपा को मात्र छह सीटें हासिल हुईं थी.

फोटोः विकास कुमार
फोटोः विकास कुमार

ऐसा भी कहा गया कि मोदी की इस शानदार जीत में उन मुसलमानों का भी योगदान है जिनको भाजपा का डर दिखाकर सारे दल अपने पाले में करने के लिए सारे करतब करते दिखाई दिए. परिणाम के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि मुस्लिम प्रभाव वाली 92 सीटों में से भाजपा को 41( शिवसेना-3) सीटें हासिल हुईं. पिछली बार से यह संख्या 28 अधिक है.

जो पार्टी सवर्ण हिंदुओं, ब्राह्मणों और बनियों की मानी जाती थी उस पार्टी का जमीन पर सारे सामाजिक समीकरणों को ध्वस्त करना सभी को हैरान कर गया.

ऐसे में इस बात को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है कि क्या भविष्य में स्थायी तौर पर भाजपा एक ऐसी पार्टी का रूप ले सकती है जिसपर मुस्लिम सहित समाज के सभी वर्ग अपना भरोसा जता सकें?

अजय बोस कहते हैं, ‘भाजपा की ऐसी इच्छा जरूर रहेगी लेकिन ऐसा संभव होता नहीं दिखता. ये तात्कालिक था. ये चुनावी मोबिलाइजेशन था. इस प्रक्रिया में पार्टी खड़ी नहीं हुई है.’ रशीद भी बोस जैसी ही सोच रखते हैं. वे कहते हैं, ‘ये बिलकुल सही है कि मोदी ने इस बार न सिर्फ जातिगत समीकरणों को तोड़ा है बल्कि उसे मुस्लिम मत भी ठीकठाक मिले हैं. लेकिन अभी कोई फैसला देना जल्दबाजी होगी.’

हालांकि रशीद मोदी को लेकर मुस्लिम समुदाय में परिवर्तन की संभावना से इनकार भी नहीं करते हैं. वे कहते हैं, ‘हमें ये सोचना होगा कि केवल वाल्मीकि का ही हृदय परिवर्तन का अधिकार थोड़े ही है. मोदी को लेकर मुसलमानों का नजरिया बदलने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए. ये ध्यान रखना जरूरी है कि अब तक जिस नेहरूवियन मॉडल को मुस्लिम अपना समर्थन देते आए हैं. उसमें ये संभव है कि वो अब किसी और मॉडल को परखने की सोच रहे हैं.

खैर विभिन्न वर्गों के लोगों के मन में चाहे जो भी हो यह तय है कि भाजपा जरूर खुद को समाज के सभी वर्गों की पार्टी बनाने की कोशिश करेगी. जिससे आने वाले समय में वर्तमान लोकसभा की सफलता को फिर से दोहराया जा सके.

पूरा देश

भाजपा को हमेशा से इस बात का कष्ट था कि वह भले ही कांग्रेस के समान एक राष्ट्रीय पार्टी है लेकिन देश के हर कोने में उसकी उपस्थिति नहीं है. पूर्वोत्तर और दक्षिण में पार्टी की अनुपस्थिति उसे हमेशा सालती रहती थी. लेकिन इस बार के चुनाव परिणाम ने पार्टी को सही अर्थों में राष्ट्रीय बना दिया. 13 से बढ़ते हुए भाजपा इस बार 21 राज्यों में फैल गई. 2009 में पार्टी का जो वोट शेयर 18.8 फीसदी था वह बढ़कर 33.7 फीसदी पर पहुंच गया. अपनी स्थापना के 34 साल बाद आज भाजपा पूरे भारत में दिखाई दे रही है.

उत्तर और पश्चिमी भारत में जहां पहले से उसका अपना एक आधार था वहां सूनामी सरीखी सफलता पा चुकी भाजपा इस बार पूर्वोत्तर और दक्षिण के राज्यों में भी- जहां नॉन प्लेयर मानी जाती थी – हलचल पैदा करने में सफल रही.

पूर्वोत्तर की बात करें तो भाजपा ने असम में अपनी परफॉर्मेंस से सभी को चौंका दिया. सत्ताधारी कांग्रेस की भाजपा ने वहां वह फजीहत की कि मुख्यमंत्री इस्तीफा देने की पेशकश करते दिखाई दिए. पूरे देश में बताई जा रही मोदी लहर नॉर्थ इस्ट में सबसे ज्यादा असम में ही दिखी. भाजपा ने इस बार असम से सात सीटें जीतीं और 36 फीसदी वोट शेयर उसके नाम रहा.

इस बार अरूणाचल में भी भाजपा को एक सीट हासिल हुई. पूर्वोत्तर के आठ राज्यों (सिक्किम,अरूणाचल,असम, मिजोरम,मेघालय,मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैंड की 25 सीटों में से भाजपा को आठ सीटें मिलीं हैं जो पिछली बार की तुलना में चार अधिक हैं.

वहीं दक्षिण की बात करें तो आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल को मिलाकर कुल 129 सीटों में से भाजपा को 21 सीटें हासिल हुईं. पार्टी ने आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में फिर से खाता खोलने में सफलता पाई. मोदी लहर पर सवार होकर भाजपा 10 साल बाद कन्याकुमारी सीट जीतने में सफल रही. तो उसकी सहयोगी पीएमके को एक सीट मिली.

फोटोः विकास कुमार
फोटोः विकास कुमार

आंध्र में भाजपा से जुड़ने का टीडीपी को भी फायदा मिला. कहा जा रहा है कि शहरी इलाकों में यह मोदी के असर का ही कमाल था कि वायएसआर कांग्रेस नेता जगन रेड्डी की मां विजयम्मा भाजपा से हार गईं. कर्नाटक में पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा तीसरे नंबर पर चली गई थी लेकिन इस चुनाव में उसे मात्र दो सीटों का घाटा हुआ और उसने 17 सीटें जीतीं. राज्य में अभी भी वह लोकसभा में सबसे बडी पार्टी के रुप में है. हालांकि केरल में अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा अपना खाता नहीं खोल पाई. तिरुवनंतपुरम में भाजपा के राजगोपाल ने शुरुआत में शशि थरूर पर बढ़त बनाई थी. लेकिन अंत में मात्र 15 हजार वोटों से हार गए. लेकिन राज्य में भाजपा का मत प्रतिशत जरूर दोगुना होकर 10 फीसदी पहुंच गया. उड़ीसा में एक तो आंध्र प्रदेश में उसे तीन सीटें मिली.

यही स्थिति पश्चिम बंगाल में भी रही जहां भाजपा अपनी सीट एक से दो करने में सफल रही. हालांकि उसके वोट प्रतिशत में काफी इजाफा हुआ और वह 18 फीसदी वोटों के साथ टीएमसी और लेफ्ट के बीच अपना स्थान बनाने में सफल रही. गुजरात, राजस्थान, दिल्ली उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और गोवा की सभी सीटें जीतने वाली भाजपा ने जीत को छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, यूपी और बिहार में लगभग एकतरफा बना दिया और महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में कांग्रेस को हाशिए पर ठकेल दिया. हरियाणा जहां भाजपा की लोकसभा में बहुत अच्छी स्थिति नहीं रही है, वहां वह 7 सीटें और 33 फीसदी मत जीतने में सफल रही.

तो इन परिणामों के आधार पर क्या हम कह सकते हैं कि भाजपा अब एक ऐसी पार्टी के रूप में विकसित हो गई है जो आने वाले समय में दक्षिण से लेकर पूर्व तक की राजनीति में एक महत्वपूर्ण रोल अदा करेगी.

जानकार मानते हैं कि ऐसा सोचना जल्दबाजी होगी. बोस कहते हैं, ‘ये सही है कि इस बार भाजपा को पूर्वोत्तर और दक्षिण तक प्रेरित करने वाले मत मिले हैं लेकिन ये लोकसभा चुनाव तक ही सीमित रहेंगे ऐसी संभावना है.’ बोस के मुताबिक, इन राज्यों में भाजपा का अपना कोई संगठन नहीं है ऐसे में वहां स्थानीय स्तर पर विधानसभा से लेकर जो भी चुनाव होंगे, पार्टी उसमें हाशिए पर ही रहेगी. अब यहां  मोदी जी सीएम के उम्मीदवार तो होंगे नहीं. इस बार का चुनाव राष्ट्रपति पद्धति वाले चुनाव सरीखा था सो वहां पार्टी को कुछ सपोर्ट मिला है.’

भले ही भाजपा की इन राज्यों में जीत छोटी हो लेकिन उसने पार्टी को इतना हौसला जरूर दिया है कि वह कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक अपना झंडा फहराने का सपना देख सके. रशीद कहते हैं, इसमें कोई शक नहीं है कि भाजपा की 100 फीसदी राष्ट्रीय छवि बन गई है. अब वह लगभग हर क्षेत्र में पहुंच चुकी है. ये बडी बात है. मोदी को जरूर इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने वो काम कर दिखाया है जो अटल जी नहीं कर पाए.’

जानकार यह भी कहते हैं कि अब इस मामले में सबकुछ इस पर निर्भर करेगा कि अगले पांच सालों में मोदी कैसी सरकार चलाते हैं. उसमें ही ऊपर के सभी सवालों के जवाब छिपे हैं. क्योंकि पांच साल बाद वोट मांगते वक्त वे इस बार की तरह गुजरात मॉडल का उदाहरण नहीं दे पाएंगे.

नेहरू, इंदिरा और मोदी

फोटोः विकास कुमार
फोटोः विकास कुमार

आजादी के बाद पहले चुनाव सन् 1951 में हुए थे. नेहरू जी के नेतृत्व में. तब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 364 सीटें मिली थीं. 489 सीटों में से. करीब तीन चौथाई बहुमत था. जब तक नेहरू जी जीवित रहे तकरीबन ऐसा ही बहुमत उन्हें मिलता रहा.

इसके बाद उनकी बेटी इंदिरा को भी अपने दम पर बहुमत मिला. 1967 में न भी मानें तो 1971 में उन्हें कमोबेश अपने पिता सरीखा ही बहुमत मिला. 518 में से 352 सीटें. यह बांग्लादेश बनने के बाद का चुनाव था जब इंदिरा और इंडिया में कोई भेद नहीं रह गया था.

इसके बाद 80 में इंदिरा एक बार फिर जनता पार्टी के बिखराव के बाद उतने ही प्रचंड बहुमत से चुनाव में विजयी होकर आईं. 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उनके पुत्र राजीव को आजादी के बाद का, और अब तक का भी, सबसे बड़ा बहुमत मिला. 1984 के चुनाव में उन्हें 514 में से 404 सीटें मिली थीं. अगर इसके तुरंत बाद 1985 में हुए असम और पंजाब के लोकसभा चुनावों को भी मिला दें तो उन्हें मिली कुल सीटों की संख्य 414 थी. यह अभूतपूर्व था. लेकिन इसमें राजीव गांधी का योगदान था ही कितना!

उस वक्त तक न तो यह देश ही राजीव को राजनेता के तौर पर पहचानता था और न ही राजीव गांधी ही राजनीति को ठीक से पहचानते थे. उनकी पहचान इंडियन एयरलाइंस के एक पूर्व हवाई जहाज पायलट और संजय गांधी के कामचलाऊ विकल्प की थी. जाहिर सी बात है कि जीत का श्रेय राजीव को नहीं बल्कि दिवंगत इंदिरा गांधी को ही जाना चाहिए. हालांकि जीवित रहते हुए उनके लिए भी इतना प्रचंड बहुमत पाना असंभव ही था.

इसके बाद वर्ष 2009 तक सात बार आम चुनाव हुए लेकिन कांग्रेस और भाजपा सहित किसी को भी पूरा बहुमत नहीं मिला.

इसका मतलब नरेंद्र मोदी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद अकेले ऐसे नेता हैं जिनके नेतृत्व की वजह से उनकी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला है.

और नेहरू-इंदिरा की कभी पार्टी रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का क्या?

उसका हाल वाकई बुरा है. इतना बुरा कि उसकी हालत सदन में विपक्षी दल बनने लायक भी नहीं. भारतीय लोकतंत्र के किसी भी सदन में विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए 10 फीसदी सीटों की आवश्यकता होती है. कांग्रेस को सिर्फ 44 ही मिली हैं. जरूरी से 11 कम. अब मुख्य विपक्षी दल बनने के लिए उसको भाजपा की सद्भावना का ही सहारा है. वैसी ही सद्भावना जैसी राष्ट्रीय जनता दल के प्रति पिछला चुनाव जीतने के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दिखाई थी.

अगर एक दूसरे नजरिये से देखें तो कांग्रेस ने अपने पिछला सबसे बुरा प्रदर्शन 1999 में किया था. तब कांग्रेस को कुल सीटों में से 114 ही मिली थीं. देश को आजादी दिलाने वाली पार्टी के लिए यह अपने आप में ही बहुत बुरा प्रदर्शन था. लेकिन इस बार तो वह इसके भी आधे से भी बहुत कम पर सिमट गई है. कांग्रेस को 10 राज्यों में एक भी सीट हासिल नहीं हुई है. पिछली बार साढ़े तीन लाख मतों से जीतने वाले पार्टी के सबसे ताकतवर नेता राहुल गांधी इस बार अपने गढ़ अमेठी में सारा जोर लगाकर भी सिर्फ एक लाख वोटों से ही चुनाव जीत सके हैं. एक आंकड़ा यह भी है कि भाजपा ने कांग्रेस के मुकाबले करीब साढ़े छह गुना सीटें जीती हैं.

तो क्या कांग्रेस को चुका हुआ मान लिया जाए जैसा कि कुछ लोग आशंका जता रहे हैं. उनकी आशंका गलत हैं और सही भी. गलत इसलिए कि जब पार्टियां जमीन से शुरू होकर आसमान पर पहुंच सकती हैं तो एक सवा सौ साल पुरानी पार्टी राजनीति में वापसी क्यों नहीं कर सकती? फिर भारतीय राजनीति तो इस बात की गवाह है कि कई बार यहां वापसी के लिए अपनी मेहनत से भी कम या बराबर दूसरों की गलतियां काम आती रही हैं.

अगर आने वाली मोदी सरकार जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरती या कांग्रेस नेतृत्व आमजन से जुड़कर उससे भी अच्छा करने की आशा जगा सके तो कांग्रेस का दुबारा अच्छी हालत में आना असंभव क्यों होना चाहिए. राख में से उठकर खड़े होने का उदाहरण खुद भाजपा का ही है जिसने 1984 में सिर्फ दो सीटें जीती थीं और आज देश की सबसे बड़ी और लगभग हर हिस्से में पहुंच वाली पार्टी बन गई है.

गांधी जी का कहना था कि छटांक भर किया गया कार्य भी मनों की गई बातों से ज्यादा असर डालने वाला होता है. अपने उपनाम वाले, अपनी पार्टी और विश्व के सबसे विलक्षण रहे उस महान व्यक्ति की इस बात को कांग्रेस नेतृत्व को मंत्र की तरह भजना होगा. उसे केंद्र में विपक्ष की सकारात्मक-सशक्त भूमिका के जरिये और जिन भी राज्यों में उसकी सरकारें हैं उनके सुशासन के जरिये खुद को देश की सत्ता का जायज अधिकारी साबित करना होगा. राहुल गांधी अगर चाहते हैं कि वे अपनी पार्टी और देश की राजनीति में आगे भी प्रासंगिक बने रहें तो उन्हें जनता को समझ में आ सकने वाली जिम्मेदारियां हाथ में लेकर देश की सत्ता पर अपना दावा पक्का करना होगा. नहीं तो फिर ऐसा कर सकने की क्षमता और इच्छा रखने वाले के लिए अपना स्थान छोड़ना होगा. कांग्रेस नेतृत्व को समझना होगा कि कंप्यूटरों पर तैयार की गई योजनाओं को हवाई जहाज में घूमकर कार्यान्वित करना बुरी बात नहीं है. अंग्रेजी में हिंदी बोलने वालों को अपने सलाहकारों में रखना भी कोई बुरी बात नहीं है. लेकिन केवल ऐसा करना और ऐसों की ही मानना जरूर ठीक नहीं है. केवल जी-हुजूरी, जोर-जुगाड़ और विरासत के दम पर पार्टी और सत्ता में जगह बनाने की संस्कृति सही नहीं है और जब तक उसे नहीं बदला जाएगा तब तक पार्टी का कायाकल्प होना तो दूर उसके अस्तित्व पर ही संकट बना रहेगा. जानकारों को संदेह है कि कांग्रेस ऐसा कर सकती है और इसी से कांग्रेस को चुका हुआ मान लेने वालों की आशंकाओं को थोड़ा बल मिलता है.

चुनौती मोदी के सामने भी छोटी नहीं है. उनके पास इतना और ऐसा बहुमत है जो उन्हें कुछ भी जरूरी न कर सकने और गैर-जरूरी करने की हालत में बचाव के बहाने नहीं देता. वे नहीं कह सकते कि वे, अलाना गठबंधन की मजबूरी के चलते और फलाना, अपनी पार्टी की अंदरूनी समस्याओं के चलते नहीं कर पाए. उनकी पार्टी, मैनिफेस्टो में होने के बावजूद, राम मंदिर, धारा 370 और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर कुछ भी करने से, यह कहकर अपनी पिछली सरकारों में बचती रही है कि ऐसा करना गठबंधन सरकार में संभव नहीं. अब मोदी पर यदि संघ आदि का दबाव पड़ा तो वे इन विवादित मुद्दों पर क्या करेंगे, देखना दिलचस्प होगा.

अगर मोदी संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर सिर्फ सामान्य तरीके से भी प्रधानमंत्री पद के उत्तरदायित्व को निभा पाए तो वे भारतीय राजनीति के न जाने कितने स्थापित दुर्गुणों को मटियामेट कर सकते हैं. इनमें सांप्रदायिकता को रोकने के नाम पर केवल सत्ता पाने के लिए होने वाले बेमेल गठबंधन और भाजपा का डर दिखाकर अल्पसंख्यकों को अपना जरखरीद मानने वाली निकृष्ट सोच भी शामिल है.

अगर मोदी ‘खंड-खंड’ और ‘अखंड’ भारत वाली सोच से ऊपर उठकर ऐसा कर पाए तो वे देश के इससे भी बड़े नायक बन सकते हैं. नहीं तो वे अपनी पार्टी के महानायक तो बन ही चुके हैं.

प्रवीर चंद्र भंजदेव : अा‌‌दिवासी आंदोलन

preveerआदिवासियों की दशा समझने और सुधारने के लिए आजादी के बाद कई समितियां बनी हैं इनमें पहली मानवशास्त्री वेरियर एल्विन की अध्क्षता में बनी थी. और पहला आयोग कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष यूएन धेबर की अध्यक्षता में 1960 में बना. लेकिन शुरुआत में ही ये प्रयास खोखले साबित होने लगे. इसका नतीजा यह रहा कि 1960-70 के दशक के दौरान बस्तर में आदिवासी आंदोलन में भारी उभार देखा गया. इसका नेतृत्व बस्तर के पूर्व राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव के हाथों में था. आदिवासियों के लिए वे भगवान सरीखे थे.

प्रवीर चंद्र ने ही भारत में बस्तर रियासत के विलयपत्र पर दस्तखत किए थे और बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गए. कांग्रेस का सदस्य रहते हुए 1957 में प्रवीर चंद्र विधायक बने लेकिन आदिवासियों के प्रति सरकार के रवैए से निराश होकर 1959 में विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. सरकारी नीतियों के खिलाफ जब पूर्व राजा की सक्रियता बढ़ गई तब 1961 में उन्हें कुछ दिनों के लिए हिरासत में भी लिया गया. केंद्र सरकार ने कार्रवाई आगे बढ़ाते हुए एक आदेश के जरिए राजा के रूप में मिली उनकी सुविधाएं भी समाप्त कर दीं. बस्तर के आदिवासी सरकार के इस कदम से हैरान थे.

सरकार के इस फैसले के खिलाफ छत्तीसगढ़ के सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक आदिवासियों की सभाएं होने लगीं. इसी समय एक गांव लोहड़ीगुड़ा में पुलिस ने प्रदर्शनकारी आदिवासियों पर गोलियां चलाईं जिसमें सरकारी आंकड़े के मुताबिक तकरीबन दर्जन भर आदिवासी मारे गए थे.

आजाद भारत में पुलिस की फायरिंग से आदिवासियों के मारे जाने की यह पहली घटना है.

इन घटनाओं ने प्रवीर चंद्र को बस्तर में और मजबूत कर दिया. 1962 के विधानसभा चुनाव में बस्तर की दस में से आठ सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार प्रवीर चंद्र के चुने हुए उम्मीदवारों के सामने बुरी तरह हार गए. एक तरह से यह सरकार की पराजय थी. इसके बाद से प्रवीर चंद्र दिल्ली से लेकर भोपाल तक आदिवासियों के पक्ष में बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शन करने लगे. पुलिस और पूर्व राजा के नेतृत्व में आदिवासियों के बीच पहली झड़प की कथित घटना इसी समय की है. मार्च, 1966 में आदिवासी राजमहल में एक त्योहार के सिलसिले में जुटे हुए थे. आदिवासी अपनी परंपरागत वेशभूषा के साथ तीर-कमानों से लैस थे. कहा जाता है कि इसी दिन किसी दूसरे क्षेत्र में पुलिस की आदिवासियों से एक झड़प हुई और संदिग्धों की तलाश में पुलिस ने राजमहल को घेर लिया. अचानक यहां पुलिस और आदिवासियों के बीच संघर्ष शुरू हो गया. पुलिस ने आदिवासियों पर फायरिंग शुरू कर दी और दर्जनों आदिवासियों के साथ प्रवीर चंद्र की भी इस इसमें मौत हो गई. इसी के साथ उस दौर में आदिवासियों का सबसे बड़ा नेतृत्व खत्म हो गया.

कहा जाता है सरकार ने जानबूझकर बस्तर के पूर्व राजा की हत्या करवाई थी क्योंकि वे सरकार के लिए चुनौती बन गए थे. हालांकि पुलिस का दावा था कि आदिवासी प्रवीर चंद्र के नेतृत्व में उनके ऊपर तीरों से हमला कर रहे थे और इसकी प्रतिक्रिया में पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी.

‘दुर्घटना हुई तो हमें कोई मुआवजा नहीं मिलेगा’

फोटोः वैभव शमा्
फोटोः वैभव शमा्
फोटोः वैभव शमा्

कौन

ठेका श्रमिक

कब

25 अप्रैल, 2014 से

कहां

भारत एल्युमिनियम कंपनी (कोरबा- छत्तीसगढ़)

क्यों

भारत सरकार ने कारखाना अधिनियम 1970 में संशोधन कर श्रमिकों के हितों के लिए विशेष प्रावधान किए हैं. इनके मुताबिक किसी भी कंपनी को ठेका श्रमिकों का रिकॉर्ड रखना अनिवार्य होता है. जिस प्रारूप में श्रमिकों का रिकॉर्ड रखा जाता है उस प्रारूप को फॉर्म-14 कहा जाता है. देश के सबसे बड़े एल्युमिनियम प्लांट कहे जाने वाले कोरबा स्थित भारत एल्युमिनियम कंपनी (बाल्को) में कारखाना अधिनियम के इसी प्रावधान का उल्लंघन हो रहा है. बालको के श्रमिकों का आरोप है कि उनका फॉर्म- 14 नहीं भरा जा रहा है. जबकि नियमानुसार बगैर इस फॉर्म को भरे कंपनी प्रबंधन श्रमिकों को परिसर में प्रवेश नहीं दे सकती. श्रमिकों का यह भी कहना है ऐसा करके उन्हें उनके हक से वंचित किया जा रहा है. छत्तीसगढ़ संविदा एवं ग्रामीण मजदूर संघ (इंटक) के महासचिव संतोष सिंह का आरोप है, ‘ हमारी मांग केवल इतनी है कि हमें हमारा फॉर्म-14 दिखाया जाए. लेकिन जब प्रबंधन ने उसे भरा ही नहीं तो हमें दिखाएगा कहां से. ऐसे में कोई दुर्घटना होती है तो हमें इसका मुआवजा नहीं मिल सकेगा.’

अपने अधिकारों को लेकर संगठन ने 19 अप्रैल को प्रबंधन को पत्र लिखा था और चेतावनी दी थी कि यदि सात दिनों के अंदर उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं तो श्रमिक हड़ताल पर चले जाएंगे. इसके बाद भी कंपनी प्रबंधन के कान पर जूं तक नहीं रेंगी. इसके बाद श्रमिक 25 तारीख से हड़ताल पर चले गए. बाल्को में प्रतिदिन पहली पाली में लगभग पांच हजार श्रमिक कार्य पर पहुंचते थे, लेकिन उन्होंने इस तारीख के बाद काम पर आना बंद कर दिया. इसके साथ ही अन्य पालियों के श्रमिक भी काम पर नहीं आ रहे हैं.

वैसे कंपनी द्वारा फॉर्म-14 न भरे जाने से जुड़ी श्रमिकों की आशंकाएं अकारण नहीं हैं. दरअसल आज से ठीक साढ़े चार साल पहले सितंबर, 2009 बाल्को परिसर में एक निर्माणाधीन चिमनी भरभरा कर गिर गई थी. 240 मीटर ऊंची इस चिमनी के गिरने से 40 श्रमिकों की मौत हुई थी. उस समय बाल्को प्रबंधन पर आरोप लगा था कि हादसे में कहीं ज्यादा श्रमिकों की मौत हुई है लेकिन कंपनी में इन ठेका मजदूरों की कोई वैध पंजीयन की व्यवस्था न होने की वजह से बाकी लोगों को मुआवजा नहीं मिल पाया.

तहलका ने ताजा हड़ताल के बारे में बाल्को के सीईओ रमेश नायर से बात करने की कोशिश की तो उनका कहना था कि उन्हें इस बारे में कुछ जानकारी नहीं है. वहीं कंपनी के जनसंपर्क अधिकारी विनोद श्रीवास्तव को फॉर्म-14  न भरवाने के प्रबंधन के फैसले में कुछ भी गड़बड़ी नहीं दिखती. वे कहते हैं, ‘ छत्तीसगढ़ के किसी भी संस्थान में फॉर्म-14 नहीं भरवाया जाता इसलिए हम भी यह नहीं भरवाते. ‘ बालको कारखाना अधिनियम के इस नियम का उल्लंघन कर न सिर्फ श्रमिकों के साथ अन्याय कर रही है बल्कि वह कानून की नजर में अवैध गतिविधियों में भी शामिल है. कोरबा के सहायक श्रम आयुक्त सत्यप्रकाश वर्मा कहते हैं, ‘ कोई भी कंपनी ऐसा करती है तो यह कारखाना अधिनियम की धारा 92 के तहत दंडनीय अपराध है.

खुला खेल

साथ-साथ कुछ समय पहले एक आयोजन में संघ के मुरिया मोहन भागवत और भाजपा नेता सुशील मोदी
साथ-साथ कुछ समय पहले एक आयोजन में संघ के मुरिया मोहन भागवत और भाजपा नेता सुशील मोदी

बिहार के कटिहार में संघ के एक पुराने और समर्पित कार्यकर्ता रहते हैं. विश्व हिंदू परिषद के लिए नित्य और निरंतर काम करते हैं. हमारी उनसे बात होती है. हम पूछते हैं कि इस बार चुनाव में तो वे खुल्लमखुल्ला राजनीति के खेल में लगे रहे. वे पक्के संघी होते हुए भी चतुर-चालाक नहीं हो सके हैं, सो सहज और सरल तरीके से बताते हैं. कहते हैं कि इस बार या तो नरेंद्र मोदी चुनाव लड़ रहे हैं या संघ परिवार लड़ रहा है. भाजपा चुनाव लड़ती तो यह माहौल नहीं बनता. वे कहते हैं, ‘जानते हैं, इतने दिनों से हम लोग चुनाव लड़वा रहे हैं, लेकिन इस बार पहली बार भाजपा ने संघ के स्वयंसेवकों व कार्यकर्ताओं के लिए भी चारचकिया वाहन का इंतजाम करवाया और हमलोग उसी गाड़ी से प्रचार काम करते रहे. नहीं तो पहले तो हम लोगों को वह महत्व ही नहीं मिलता था. एक गाड़ी पर सवार हमलोग का मतलब हुआ- संघ का एक स्वयंसेवक, विश्व हिंदू परिषद और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का एक-एक कार्यकर्ता और कहीं-कहीं एक भाजपाई भी.’

कटिहार वाले संघ के ये कार्यकर्ता जब पहली बार चुनाव में खुद को और खुद के साथियों को विशेष महत्व देने की बात बताते हैं तो ऐसी ही बातें कई जगहों से और भी बतायी जाती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में एक स्वयंसेवक बताते हैं, ‘अब तक तो चुनावी मौसम में हमलोगों को प्रातः शाखा के बाद घर-घर जाकर मतदाताओं को जागरूक करने का दायित्व दिया जाता था और उसमें परोक्ष तौर पर ही भाजपा की चर्चा करने की बात कही जाती थी. लेकिन इस बार पहली बार संघ ने भाजपा का झंडा थमाकर शाखा आने वाले स्वयंसेवकों को घर-घर भेजा और भाजपा के पक्ष में मतदान करवाने की अपील करवाई.’ रांची वाले संघ के स्वयंसेवक कहते हैं, ‘बहुत कुछ पहली बार हुआ इस बार, कितनी छोटी-छोटी बातें बताएं.’ धनबाद में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘इस बार हमलोगों ने पूरी ऊर्जा ही लगा दी है. छुपछुपाकर खेल खेलने वाला झंझट इस बार नहीं था, इसलिए टेंशन फ्री होकर भाजपा के पक्ष में काम करने का मजा आया.’

फारबिसगंज से लेकर धनबाद तक संघ व उसकी आनुषंगिक इकाइयों के सामान्य कार्यकर्ताओं से बात होती है तो वे खुलकर बताते हैं कि इस बार के चुनाव में उन्होंने खुल्लमखुल्ला मेहनत की और इसके लिए उन्हें विशेष दिशा-निर्देश भी मिलते रहे. लेकिन इसी बात की पुष्टि जब हम संघ और उसके इन संगठनों के पदाधिकारियों से करना चाहते हैं तो वे बस एक लाइन का जवाब देते हैं कि हम तो हर चुनाव में इस मतदाता जागरूकता का काम करते रहे हैं, इस बार भी किया, इसमें खास और नया क्या है? अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, बिहार के संगठन मंत्री निखिल कुमार कहते हैं, ‘संघ का अपना सामाजिक दायित्व है, उसके 55 आनुषंगिक संगठन हैं, वे समाज सेवा का अपना काम अपने तरीके से सालों भर करते हैं. राजनीति में सिर्फ मतदाता जागरूकता अभियान तक हमारा फर्ज होता है, जो देश हित में होता है.’

निखिल कुमार का जवाब वैसा ही होता है, जैसा संघ के किसी पदाधिकारी का होता है लेकिन सच यह नहीं है. सच यह है कि इस बार के चुनाव में संघ के साथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विश्व हिंदू परिषद, भारत विकास परिषद, सहकार भारती, वनवासी कल्याण केंद्र, संस्कार भारती, सेवा भारती, राष्ट्रवादी शैक्षिक संघ, प्रज्ञा प्रवाह, संस्कृत भारती, सीमा जागरण मंच,  क्रीड़ा भारती जैसे उसके करीब 55 आनुषंगिक संगठन इस बार बिहार-झारखंड में सक्रिय रहे. संघ के पदाधिकारी भले ही यह कहें कि हम चुनाव में सिर्फ लोक जागरण मंच के जरिये मतदाता जागरण का काम करते हैं, लेकिन जानने वाले जानते हैं कि इस बार लोक जागरण मंच से ज्यादा हिंदू जागरण मंच जैसी संस्था सक्रिय रही.

संघ की भूमिका में बदलाव भी देखने को मिले. बिहार-झारखंड के बंटवारे के पहले संघ परिवार का सबसे ज्यादा ध्यान दक्षिण बिहार यानी वर्तमान झारखंड वाले इलाके में हुआ करता था. उसी इलाके में संघ के विभिन्न संगठनों के बड़े आयोजन भी हुआ करते थे. लेकिन हालिया वर्षों में संघ परिवार की ऊर्जा झारखंड की बजाय बिहार के इलाके में ज्यादा लगी हुई दिखी. विश्व हिंदू परिषद के एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं, ‘हमलोगों को बहुत पहले से ही पता था कि नीतीश भाजपा के साथ लंबे समय तक नहीं चलने वाले हैं, इसलिए बिहार जैसे प्रदेश में हमलोगों ने पहले से ही पूरी तैयारी शुरू कर दी थी और उसी हिसाब से तैयारी भी कर रहे थे.’

संघ के कुछ लोग बताते हैं कि इस बार बिहार-झारखंड जैसे राज्य में चुनाव के वक्त राजनीतिक दर्शन का मार्गदर्शन करने के लिए खुद संघ के तीसरे नंबर के पदाधिकारी कमान संभाले हुए थे. हालांकि आधिकारिक तौर पर इस बात की पुष्टि कोई नहीं करता. बताया जाता है कि उनके ही हस्तक्षेप से सुपौल से राम जन्मभूमि के शिलान्यासकर्ता कामेश्वर चौपाल जैसे संघी स्वयंसेवक को इस बार टिकट आसानी से मिल सका और कई जगहों पर टिकट बंटवारे में गहरा असंतोष होने के बावजूद कहीं विरोध के कोई स्वर नहीं उभरे.

इस बार बिहार में लोकसभा चुनाव में जिस तरह संघ परिवार की सक्रियता दिखी, उससे यह साफ हुआ कि भाजपा की तैयारी भले ही नीतीश कुमार से आधिकारिक तौर पर अलगाव के बाद शुरू हुई हो, लेकिन संघ की तैयारी पुरानी थी, जिसका फलाफल लेने की कोशिश में भाजपा लगी हुई है.

29 और 30 नवंबर 2012 राजधानी पटना के एक प्रतिष्ठित सरकारी अध्ययन व अनुसंधान संस्थान का वह आयोजन संघ परिवार की तैयारियों की ओर संकेत देता है जब संस्कृति के नाम पर हुए एक आयोजन में विश्व हिंदू परिषद के मुखिया अशोक सिंघल, सुब्रहमण्यम स्वामी, उमा भारती समेत कई नेताओं ने पटना पहुंचकर हिंदुत्व के उभार के लिए आग उगली थी और एक तरह से भाजपा के पक्ष में एक माहौल बनाने की कोशिश की थी. यह वह समय था, जब बिहार में मजे से भाजपा और जदूय साथ मिलकर सरकार चला रहे थे और दोनों के बीच अलगाव की कहीं कोई आहट तक नहीं थी. पटना में वह दो दिनी आयोजन संस्कृति को ढाल बनाकर हुआ था. तभी साफ संकेत मिल गए थे कि दक्षिण बिहार में सक्रिय रहने वाली संस्थाएं अब बिहार में सक्रिय हैं और बिहार को हिंदुत्व का नई प्रयोगशाला बनाने की राह पर हैं. संकेत पहले भी मिले थे लेकिन स्पष्टता और अस्पष्टता के बीच के. बेगुसराय के सिमरिया में अर्द्धकुंभ हुआ तो उसे धार्मिक आयोजन की परिधि में बांधा गया था. उस धार्मिक आयोजन में भी प्रवीण तोगडि़या धार्मिक गर्जना की बजाय कुछ और ही बोलकर निकले थे. राष्ट्रीय जनता दल के अब्दुल बारी सिद्दिकी कहते हैं,  ‘अचरज जैसी कोई बात नहीं. बिहार में जब से एनडी सरकार बनी थी, तोगडि़या, सिंघल आदि आते रहते थे, अपनी बात बोलते रहते थे. राजगीर में ही संघ ने अपना राष्ट्रीय सम्मेलन भी किया था. अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने अपना राष्ट्रीय अधिवेशन भी बिहार में किया था और सूर्य नमस्कार को लेकर विवाद पैदा होने के बावजूद बिहार में डंके की चोट पर बड़े आयोजन हुए थे और नीतीश कुमार कुछ नहीं कर सके थे.’

विश्व हिंदू परिषद के एक वरिष्ठ पदाधिकारी इन सभी सवालों को सामने रखने पर कहते हैं, ‘आप हमारे गणित को इतनी आसानी से नहीं समझ पाएंगे. फोरम फॉर इंटिग्रेटेड नेशनल सिक्यूरिटी या सीमा जागरण मंच जैसे संस्थाओं के बारे में कितना जानते हैं? ये संस्थाएं संघ की छतरी तले चलने वाले संगठन ही हैं और सालों भर सीमा की रक्षा-सुरक्षा के नाम पर अपना काम करते हैं. आप किस-किस के काम को समझिएगा. पांच दर्जन संस्थाएं एक साथ अलग-अलग दिशा में काम करती हैं और सबका मकसद एक होता है. इस बार सभी संस्थाएं अपने-अपने हिसाब से सक्रिय रहीं.’

देसी विदेशी

imgउपनिवेशवाद का प्रतिवादी

जाने माने मानवशास्त्री और चार्ल्स डार्विन के परपोते फेलिक्स पैडल को वर्तमान संदर्भों में उपनिवेशवाद का अध्ययन करना था. लेकिन जब उन्होंने ओडिसा के एक गांव को अपना घर बनाया तो उनकी शिक्षा दीक्षा इस इलाके में उपनिवेशवाद के प्रतिरोध की आवाज बन गई

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Maxine-Berntsen_1मराठी मानुस!

मेक्सिन बर्नसन के लिए मराठी सिर्फ एक भाषा न होकर सामाजिक ऊंच-नीच मिटाने का जरिया है और इस रास्ते पर आगे बढ़ते हुए वे महाराष्ट्र के एक गांव को अपना घर बना चुकी हैं

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jastitanनर्तक शिक्षक

दिल्ली में रहने वाले जस्टिन मेकार्थी पिछले तीन दशकों से भरतनाट्यम सीख और सिखा रहे हैं. उन्हें पूरी उम्मीद है कि एक दिन यह नृत्य विधा शाष्त्रीय नृत्य के विशिष्ट दर्शकों से निकलकर आम लोगों के बीच भी लोकप्रिय होगी

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rumu-by-wfnजंगल जिसका जीवन है…

चेन्नई के निवासी रोमूलस वीटेकर का सांपों और घड़ियालों के बचाव का अभियान सरकारों को भी इस दिशा में काम करने के लिए प्रेरित कर रहा है

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_-----------जमीनी अर्थशास्त्री

नई दिल्ली के झुग्गी झोपड़ी वाले इलाके में रहने वाले ज्यां द्रेज के लिए अर्थशास्त्र सिर्फ अकादमिक विषय नहीं है. उन्होंने इसके कल्याणकारी पक्ष को न सिर्फ जमीन पर उतारा बल्कि इसके लिए वे लोगों को लामबंद करने में भी जुटे हैं

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जमीनी अर्थशास्त्री

ज्यां द्रेज मूल देश बेल्जियम फोटोः शैलेंद्र पाण्डेय
ज्यां द्रेज मूल देश बेल्जियम. फोटोः शैलेंद्र पाण्डेय

विगत साल ज्यां द्रेज का एक इंटरव्यू करना था. मनरेगा के मसले पर. उन्हें फोन किया. उनका जवाब था- सवाल मेल के जरिए भेज दो. सवाल भेजे.  ज्यां ने एक-एक कर सबके जवाब दिए. तसल्ली से.  विस्तार से. साथ ही ज्यां ने यह भी कहा कि किसी भी तरह की दुविधा हो तो कभी-भी पूछ लेना. इस शृंखला के लिए एक बार फिर उनके इंटरव्यू का आग्रह किया. उन्हें फोन मिलाया. पहली बार की तरह ही उन्होंने फिर से सवालों को मेल से भेजने को कहा. दर्जन भर के करीब सवाल भेजे. लेकिन सवाल भेजे जाने के करीब 14 घंटे बाद ज्यां की ओर से जो मेल आया, उसमें किसी भी सवाल का जवाब नहीं था. बस! तीन-चार लाइन में कुछ बातें थीं. उन वाक्यों का सार कुछ इस तरह है- मैं तुम्हें निराश कर रहा हूं, इसके लिए दुखी हूं. फिलहाल फील्ड वर्क के साथ बहुत व्यस्त हूं और तुम्हारे जो सवाल हैं, उनका जवाब इतनी आसानी से और इतनी जल्दबाजी में नहीं दिया जा सकता. और सच कहूं तो मुझे अपने व्यक्तित्व-कृतित्व के बारे में बात करने से ही एलर्जी है. बहुत सारे जरूरी सवाल हैं, मसले हैं, उन पर बात करो, जरूर करूंगा. इस बार माफ करना…!

ज्यां द्रेज की ओर से इस बार कुछ ऐसा ही जवाब आएगा, बहुत हद तक पहले से ही इसका अनुमान था. उन्हें बहुत करीब से जानने वाले उनके परिचितों-मित्रों में से कइयों ने कहा था कि मुश्किल ही है कि ज्यां अपने व्यक्तित्व-कृतित्व के बारे में बातचीत करने को तैयार हों.  फिर भी सवाल मांगे हैं तो भेजो, शायद तैयार हो जाएं…!

ऐसा कतई नहीं कि ज्यां द्रेज ने खुद को आत्मप्रचार से दूर रखने का दिखावा करने के लिए यह लिख दिया कि उन्हें अपने बारे में बात करने से एलर्जी है और महत्वपूर्ण मसले पर बात करने को वे हमेशा तैयार हैं.  बल्कि यह स्वभावतः उनके व्यवहार का अहम हिस्सा है. पिछले करीब तीन दशक से द्रेज भारत के अलग-अलग हिस्से में, अलग-अलग सवालों को उठाने और फिर उसका जवाब ढूंढने का ही काम कर रहे हैं. ज्यां द्रेज भले अपने व्यक्तित्व-कृतित्व की दुनिया पर बात करने से परहेज करते हैं लेकिन जिन्होंने भी उन्हें एक बार करीब से देखा है, वे उनके बारे में बहुत कुछ जानते हैं, महसूस करते हैं.

ज्यां ऐसे शख्स हैं जो देश और दुनिया का एक बड़ा नाम बन जाने के बाद भी दिल्ली के एक झुग्गी झोपड़ी वाले इलाके में रहते हैं. वहां से साइकिल चलाते हुए उन्हें दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाने के लिए पहुंचने में कोई संकोच नहीं होता. ऐसे ही झारखंड के पलामू स्थित सुदूरवर्ती गांवों में रहने में भी उन्हें कोई परेशानी नहीं होती. रांची या पटना जैसे शहर में पहुंचने पर वे ठहरने के लिए किसी होटल की तलाश नहीं करते बल्कि किसी साधारण हैसियत वाले मित्र के यहां ही रुकना ज्यादा पसंद करते हैं. रेलवे में रिजर्वेशन नहीं मिलने का ज्यादा टेंशन नहीं पालते, सामान्य श्रेणी के डब्बे में बैठकर भी वे आसानी से लंबी यात्राएं करते रहते हैं. और किसी सभा-समारोह में उन्हें मंच या सभागार में बैठने को कुर्सी नहीं मिलती तो वे आम दर्शकों-श्रोताओं के बीच घंटों खड़े होकर सहभागी बने रहने में जरा भी नहीं हिचकते.

ज्यां के व्यक्तित्व के ऐसे कई पहलू रांची, पटना से लेकर पलामू तक के लोग सुनाते हैं. पटना में रहने वाले महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘ ज्यां अपनी पार्टनर बेला भाटिया के साथ पटना में मेरे घर पर भी रुक चुके हैं और दिल्ली के स्लम वाले उनके घर में मैं गया भी हूं. वे कभी दिखावटी दुनिया में नहीं जीते, बल्कि भारत के हाशिये की जीवन पद्धति को उन्होंने अपनी मूल जीवनशैली बना लिया है. वे एक्टिविस्ट एकेडेमिशियन हैं. कर्मयोगी साधक हैं.’  रांची में रहने वाले उनके एक संगी बलराम कहते हैं, ‘ ज्यां द्रेज जैसा सहज-सरल और प्रपंचों-दिखावों से दूर रहने वाला आदमी दुर्लभतम है.’

ज्यां के बारे में ऐसी कई बातें, कई लोग बताते हैं. यह सब उस ज्यां द्रेज के व्यक्तित्व का हिस्सा है जो बेल्जियम के मशहूर अर्थशास्त्री जैक्वेस एच द्रेज के बेटे हैं. जैक्वेस द्रेज को इकोनॉमिक थ्योरी, इकोनोमेट्रिक्स तथा इकोनॉमिक पॉलिसी में उनकी अहम भूमिका के लिए सिर्फ बेल्जियम ही नहीं, दुनिया भर में जाना जाता है. वे यूरोपियन इकोनॉमिक एसोसिएशन और इकोनॉमिक सोसाइटी जैसी संस्थाओं के अध्यक्ष रह चुके हैं और अर्थशास्त्र पर उनकी कई किताबें दुनिया भर में मशहूर हंै. ऐसे मशहूर और मेधावी पिता की पांच संतानों में से एक हैं ज्यां द्रेज. पिता का प्रोफाइल देखने पर साफ लगता है कि ज्यां का अर्थशात्री बनने में पिता का गहरा प्रभाव और असर रहा होगा लेकिन ज्यां ने अर्थशास्त्री होने के साथ-साथ पहचान की अपनी दूसरी रेखा भी कायम की. इसी वजह से वे आज भारत जैसे विशाल मुल्क में बौद्धिक होने के बावजूद आम जनों के बीच चेहरे से भी पहचाने जाते हैं.

ज्यां द्रेज के बारे में संक्षिप्त जानकारी यह है कि उनका जन्म 1959 में हुआ. 1980 में उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ एसेक्स से मैथेमैटिकल इकोनॉमिक्स की पढ़ाई की. उसके बाद दिल्ली के इंडियन स्टेटिस्टिकल इंस्टिट्यूट से पीएचडी पूरी की. हालांकि 2002 में उन्हें भारतीय नागरिकता मिली लेकिन वे जब से भारत आए तब से ही पूरी तरह भारत की मिट्टी में रमते रहे और भारत के प्रति ओहदेदारों भारतीयों से कोई कम चिंतित नहीं रहे. कई मायनों में तो ज्यादा. फिलवक्त ज्यां इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग के प्लानिंग एंड डेवलपमेंट यूनिट के ऑनररी चेयर प्रोफेसर हैं. वे दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भी ऑनररी विजिटिंग प्रोफेसर हैं. लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भी अध्यापन का कार्य करते रहे हैं. नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन और कई महत्वपूर्ण अर्थशास्त्रियों और लेखकों के साथ मिलकर उन्होंने कई किताबों की रचना की है और संपादन कार्य भी किया है. हंगर एंड पब्लिक एक्शन, नंबर-1 क्लैफम रोडः द डायरी ऑफ स्क्वाट, द पॉलिटिकल इकोनॉमी ऑफ हंगर, सोशल सिक्यूरिटिज इन डेवलपिंग कंट्रीज, इंडियाः इकोनॉमिक डेवलपमेंट एंड सोशल ऑपोर्च्यूनिटी, इंडियन डेवलपमेंटः सेलेक्टेड रिजनल पर्सपेक्टिव्स, द डैम एंड द नेशनः डिस्प्लेसमेंट एंड रिसेटलमेंट इन द नर्मदा वैली, पब्लिक रिपोर्ट ऑन बेसिक एजूकेशन इन इंडिया, द इकोनॉमिक्स ऑफ फेमिन, वार एंड पीस इन द गल्फः टेस्टिमोनिज ऑफ द गल्फ पीस टीम, इंडियाः डेवलपमेंट एंड पार्टिसिपेशन आदि कुछ प्रमुख कृतियां हैं. द्रेज यूपीए सरकार की नेशनल एडवाजरी काउंसिल के सदस्य भी रहे हैं. भारत में नरेगा के सूत्रधारों में से एक रहे हैं और उसका पहला ड्राफ्ट तैयार करने वाले सदस्य भी. यह भी खास रहा कि जिस नरेगा योजना के वे सूत्रधार रहे, उसी नरेगा योजना की जांच करने के लिए वे देश के गांवों में घूमने भी लगे कि यह सफल है तो कितना, विफल है तो क्यों. इसके बारे में ज्यां का विचार है, ‘मनरेगा कुछ राज्यों में भले ही विफल योजना जैसी लगी हो लेकिन इस वजह से इस पूरी योजना के मकसद का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता. लाखों लोगों को अति गरीबी से बचाने के साथ-साथ यह खेतिहर मजदूरी बढ़ाने, पलायन कम करने, कार्यक्षेत्रों की स्थिति सुधारने, महिलाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करने, ग्राम सभा को पुनर्जीवित करने आदि में भी सहायक रहा है. यहां तक कि कई राज्यों में भ्रष्टाचार को कम करने में भी इसकी भूमिका रही है.’

ज्यां की उपलब्धियों का संसार और कृतित्व की दुनिया काफी बड़ी है और सबमें उनकी पहचान की स्वतंत्र रेखाएं भी हैं. अकादमिक दुनिया में वे इतनी बड़ी हस्ती हैं कि अगर वे तय करें तो उन्हें लेक्चर आदि देने से ही फुर्सत न मिले. पटना के महेंद्र सुमन कहते हैं,  ‘ज्यां आज जिस हैसियत में हैं वे दुनिया के किसी भी बड़े विश्वविद्यालय या अकादमिक संस्थान से जुड़कर सुविधापूर्ण जीवन गुजार सकते हैं, साथ ही सिद्धांतकार बने रह सकते हैं, जैसा कि भारतीय बौद्धिक लोग करते हैं लेकिन ज्यां और उनकी पार्टनर बेला भाटिया को, जो फिलहाल टाटा इंस्टीट्टयूट ऑफ सोशल साइंस, मुंबई से संबद्ध हैं, यह सब पसंद नहीं.’

ज्यां बौद्धिक दुनिया के जीवट नायकों में से एक हैं. वे अपराधियों-दलालों आदि का विरोध झेलकर झारखंड के पलामू के गांवों में हफ्तों रहना पसंद करते हैं. वे उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के पालनपुर गांव में कई माह तक ग्रामीणों की तरह खेतिहर-पशुपालक बनकर गांवों में हो रहे बदलाव का अध्ययन करने वाले अध्येता बनना पसंद करते हैं. वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्राध्यापक बन जाते हैं तो वहां बेघरों के साथ आंदोलन करना पसंद करते हैं,  1990-91 में जब इराक में युद्ध शुरू होता है तो शांति के प्रयासों के साथ वे कुवैत की सीमा पर कैंप कर अपनी भूमिका निभाना पसंद करते हैं और भारत जैसे मुल्क में राइट टू इनफॉर्मेशन, राइट टू फूड आदि के लिए चलने वाले आंदोलन में जनता की ओर से अपनी भूमिका निभाना पसंद करते हैं. वे कितनी भी भीड़ में जनता के साथ समाहित हो जाना चाहते हैं, वे साधारण आदमी बने रहना चाहते हैं लेकिन भारत जैसे मुल्क में वे असाधारण भारतीय हैं. रांची विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग के प्रमुख प्रो. रमेश शरण कहते हैं, ‘भारत में बहुतेरे अर्थशास्त्री हैं लेकिन ज्यां जैसा शायद कोई नहीं. वे जमीनी अर्थशास्त्री हैं, दुर्लभ एकेडेमिक हस्ती.’

जंगल जिसका जीवन है…

रोमूलस वीटेकर मूल देश अमेरिका
रोमूलस वीटेकर मूल देश अमेरिका
रोमूलस वीटेकर: मूल देश अमेरिका. फोटो साभार: व्हाइटले फंड फॉर नेचर

चार साल की उम्र में अपना पहला सांप पकड़ने वाले वन्य जीव संरक्षणकर्ता और सरीसृप विज्ञानी रोमूलस वीटेकर, भारत के रेप्टाइल मैन के नाम से मशहूर हैं. रोमूलस भारत में मगरमच्छ, घड़ियाल, सांप और कछुओं के संरक्षण के क्षेत्र में एक जाना-पहचाना नाम है. पहला सांप पकड़ने वाली बात 1940 के दशक में न्यूयार्क की है जहां रोमूलस, जो रोम के नाम से जाने जाते हैं, अपनी मां और बहन के साथ रहते थे. मां ने रोम को सांप पकड़ने के लिए प्रोत्साहित किया और देखते ही देखते रोम ने विभिन्न प्रजातियों के सांपों को घर में पालना शुरू कर दिया. इसके बाद रोम के जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उनकी मां ने भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले राम चट्टोपाध्याय से शादी की और पूरा परिवार मुंबई आ गया. इसके बाद उन्होंने अगले 10 साल दक्षिण के पहाड़ों में ऊटी और कोडैकनाल के बोर्डिंग स्कूलों में बिताए जो भारत के मशहूर जैव विविधता हॉटस्पॉट, पश्चिमी घाट के ठीक मध्य में स्थित थे. रोम के सप्ताहांत आसपास के जंगलों में सांपों की तलाश और स्थानीय शिकारियों से जंगलों के बारे में दिलचस्प किस्से सुनने में गुजरते थे और सप्ताह के बाकी दिन आठ फुट लंबे अजगर की तलाश में जो ज्यादातर मौकों पर उन्हें हॉस्टल में अपने पलंग के नीचे छिपा मिलता था.

18 साल की उम्र में रोम अपनी आगे की पढ़ाई के लिए वापस अमेरिका आ गए. मगर पढ़ाई में मन नहीं रमा और एक साल बाद ही कॉलेज छोड़ भविष्य की तलाश में अपनी मंजिल मियामी की तरफ निकल पड़े जहां पहुंचकर उन्होंने दिग्गज स्नेक मैन विलियम हास्ट द्वारा चलाए जा रहे मियामी स्नेक पार्क में काम करना शुरू किया. अगले कुछ साल रोम के लिए बहुत सुखद रहे. इस दौरान वे अपना काफी समय विभिन्न प्रजातियों के सांपों के बीच रहते हुए बिता रहे थे. उन्होंने अपने गुरु विलियम से कई गुर सीखे, दूसरे स्नेक हंटरों के साथ घूमे-फिरे, आसपास के जंगलों की खाक छानी और स्थानीय कॉफी शाप में बाब डेलान के गानों पर खूब झूमे.

मगर अच्छा वक्त जल्दी चला जाता है. वियतनाम युद्ध शुरू हो चुका था और अमेरिकी आदेश था कि या तो दो साल आर्मी में बिताओ या तीन साल जेल में. रोम आर्मी में चले गए. मगर वहां अधिकारियों को संगठित हिंसा के प्रति रोम की स्वाभाविक नफरत को समझते देर न लगी और उन्हें टेक्सस और जापान में ब्लड बैंक संभालने की जिम्मेदारी दे दी गई. अपने अनिवार्य दो साल खत्म होते ही रोम एक यूनानी मालवाहक जहाज में बैठ सीधे हिंदुस्तान लौट आए.

1967 में मुंबई वापस आने के कुछ वक्त बाद ही रोम ने सांपों का विष निकालने वाले उपक्रम की शुरुआत की. ‘वापस लौटने के बाद मेरा एकमात्र मकसद भारत में उसी तरह के स्नेक पार्क की स्थापना करना था जैसा मियामी में मेरे गुरु विलियम हास्ट चलाते थे. इसी दौरान मुझे सांप पकड़ने वाली इरुला नाम की एक असाधारण जनजाति के बारे में पता चला जो सांपों की खाल के लिए उनका शिकार करती थी. जब मद्रास जाकर मैंने उनका कला-कौशल देखा तो मैं दंग रह गया. मैंने फैसला किया कि अब चाहे जो भी हो मैं इन लोगों के साथ काम करूंगा, इनसे सीखूंगा और इनको अपने सपने में भागीदार बनाऊंगा. इसीलिए मैंने अपना पूरा काम मद्रास शिफ्ट कर लिया और इस तरह भारत के पहले स्नेक पार्क की शुरुआत हुई.’ मद्रास स्नेक पार्क रातों-रात मशहूर हो गया और रोम रुढ़िवादी शहर मद्रास में एक जाना-पहचाना नाम बन गए. बिखरे सफेद बालों में रोम जब तीन फुट लंबे सैंड बोआ नाम के अजगर को लपेट भड़कीले हिप्पी कपड़ों में अपनी मोटरसाइकिल पर निकलते तो लोग उनको ताज्जुब से घूरते रहते. लोगों को और ज्यादा आश्चर्य होता जब वे रोम को स्थानीय भाषा तमिल में गालियां देते सुनते. स्थानीय संस्कृति और लोगों के बीच में खुद को स्थापित करने के लिए यह काफी था.

इसके बाद रोम ने मद्रास क्रोकोडाइल बैंक की स्थापना की. इसी दौरान उन्हें अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह के बारे में भी पता चला. लेकिन यहां किसी भी विदेशी को काम करने की इजाजत नहीं थी. लेकिन रोम वहीं काम करना चाहते थे और उस काम की कीमत थी अमेरिकी नागरिकता छोड़ भारतीय नागरिक बनना. रोम के लिए यह एक तीर से दो निशाने वाली बात थी. वे भारत का नागरिक तो बन ही रहे थे साथ में उन्हें ऐसी जगह काम करने का मौका मिल रहा था जो बकौल रोम, ‘मूंगा चट्टानों, जंगलों से ढके हुए सैंकड़ों द्वीपों, ऐसे कबीले जिनका बाहरी दुनिया से अभी तक कोई संपर्क नहीं था और जानवरों की कई दुर्लभ प्रजातियों से पटी पड़ी हुई थी. एक प्रकृतिवादी के लिए इससे ज्यादा दिलचस्प और रहस्यमय आखिर और क्या हो सकता है?’

रोम ने अपने सारे अनुभवों और जानकारी के आधार पर तकरीबन आठ किताबें, 150 से अधिक लेख लिखे और साथ ही महत्वपूर्ण मंचों से लोगों को संबोधित भी किया. लेकिन जब इसके बाद भी लोगों को जागरूक होते नहीं देखा तब उन्होंने फिल्मों का रुख किया. उन्होंने ‘बाय एंड द क्रोकोडाइल’ नामक तमिल फिल्म बनाई जिसे 1989 में यूनिसेफ का सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का पुरस्कार मिला और फिर ‘किंग कोबरा’ जिसे ऐमी अवार्ड मिला. इस फिल्म में किंग कोबरा के कई ऐसे दृश्य थे जो इससे पहले कभी फिल्माए नहीं गए थे. कुछ हद तक रोम के काम करने का तरीका आस्ट्रेलिया के मशहूर दिवंगत क्रोकोडाइल हंटर स्टीव इरविन जैसा ही है. खुद खतरे से भरे जंगलों में जाना, खतरनाक जानवरों का सामना करना, उन्हें नियंत्रण में रखना, खुद को खतरे में डालना और यह सब सिर्फ इसलिए कि आप और हम अपने टीवी सेटों के सामने बैठ प्रकृति को बेहद नजदीक से देख-जान सकें. लेकिन रोम इरविन की तरह अपने तरीकों और तकनीकों में आक्रामक नहीं हैं. वे मनोरंजन के साथ शिक्षा देने की भी कोशिश करते हैं. रोम अपने आपको एक ऐसा संरक्षणकर्ता मानते हैं जो शिक्षाविद ज्यादा है.

अब तक तकरीबन 23 चर्चित डाक्यूमेंटरी फिल्में बना चुके रोम ने हाल के वर्षों में बीबीसी, एनीमल प्लेनेट और नेशनल जियोग्राफिक के लिए कई फिल्मों का निर्माण भी किया है जिसमें ‘क्रोकोडाइल ब्लूज’ उल्लेखनीय है. ‘क्रोकोडाइल ब्लूज’ विलुप्ति की कगार पर खड़े भारत के घड़ियालों की दुर्दशा के बारे में है. इसके लिए 2010 में जयराम रमेश ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से गुजरने वाली चंबल नदी के मुहाने पर स्थित राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण्य में घड़ियाल संरक्षण के लिए एक राष्ट्रीय कमेटी के गठन की घोषणा की थी. रोम काफी समय से इस परियोजना की वकालत कर रहे थे ताकि भारत में 200 से भी कम बचे वयस्क घड़ियालों की संख्या को बढ़ाने और इन्हें विलुप्त होने से बचाने के लिए सरकार कुछ ठोस कदम उठाए.

रोम ने कर्नाटक में अगुंबे रेनफॉरेस्ट रिसर्च स्टेशन की स्थापना भी की है जिसका उद्देश्य भारत के मशहूर जैव विविधता हॉटस्पॉट पश्चिमी घाट के बारे में अनुसंधान, संरक्षण और पर्यावरण संबंधी शिक्षा देना और किंग कोबरा के व्यवहार और उसके पर्यावरण पर होने वाले प्रभावों का अध्ययन करना है. वे बताते हैं, ‘किंग कोबरा ओडिशा, पश्चिमी बंगाल, पूर्वी हिमालय में भी पाए जाते हैं लेकिन मेरी जानकारी वेस्टर्न घाट के बारे में ज्यादा थी क्योंकि मेरा बचपन यहीं ऊटी और कोडैकनाल में बीता था. जब पहली बार मैं अगुंबे गया तो मैंने दो वयस्क 12 फीट लंबे किंग कोबराओं को अकेले पकड़ा. उस घटना ने मेरे उस विश्वास को और मजबूत किया कि पूरे भारत में सबसे ज्यादा किंग कोबरा अगुंबे में ही पाए जाते हैं और मुझे यहां कुछ न कुछ जरूर करना चाहिए.’

प्रकृति और वन्य जीव-जंतुओं के बीच हंसी-खुशी से जीवन बिताने वाले रोम कहते हैं, ‘मैंने अपनी पूरी जिंदगी में कभी नौ से पांच वाली नौकरी नहीं की और अगर आपको जंगल बेहद पसंद है तो आप ऐसा कुछ कर भी नहीं सकते हैं. मेरे लिए जिंदगी एक नदी की तरह है जो आपको अपने साथ बहा ले जाती है और इसीलिए मैं वही काम करता हूं जो मेरी तरफ आते जाते हैं.’ आप इसी तरह संरक्षणकर्ता, सरीसृप विज्ञानी, वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट और फिल्मकार रोम के लंबे, दिलचस्प अनुभवों और घटनाओं से भरे पड़े जीवन को परिभाषित कर सकते हैं. भारत से प्रकृति और वन्य जीव-जंतुओं जितना ही प्यार करने वाले रोम हमारे लिए चलते-चलते अपने घर को परिभाषित भी करते हैं, ‘भारत मेरा घर है. जब मैं यहां आया था तब आठ साल का था और आज मैं किसी और देश को इतना बेहतर नहीं जानता-समझता. यह स्वाभाविक भी है कि जहां आप पले-बढ़े होते हैं उस जगह से आप सबसे ज्यादा प्यार करते हैं.’

नर्तक शिक्षक

जस्टिन मेकार्थी  मूल देश अमेरिका
जस्टिन मेकार्थी
मूल देश अमेरिका. फोटोः तरुण सहराित

कुछ लोग आदतन अलग होते है. उनका घर छोड़ना, नया घर बसाने के लिए होता है. दिल्ली स्थित श्रीराम भारतीय कला केंद्र में युवा नर्तकों को भरतनाट्यम सिखाते जस्टिन मैकार्थी को देख कर कुछ ऐसा ही महसूस होता है. 21 साल की उम्र में जस्टिन ने अमेरिका छोड़कर भरतनाट्यम सीखने के लिए भारत का रुख किया और पिछले 32 सालों से उनका घर भारत ही है. जस्टिन हमेशा से डांसर बनना चाहते थे. मगर बचपन में घरवालों ने पियानो सीखने भेज दिया. पांच साल की उम्र से पियानो सीख रहे जस्टिन का वैसे तो पियानो आज भी साथी है लेकिन नृत्य सीखने की ललक नहीं गई. संगीत (पियानो) की शिक्षा लेते रहे और अलग-अलग डांस-फार्म की तरफ आते-जाते रहे. 19 साल की उम्र में टैप-डांस से लेकर बैले और एक्रोबैटिक तक में हाथ आजमा लिया. मगर किसी में मन नहीं रमा. आखिर में गोल्डन पार्क, कैलिफोर्निया में पहली बार भरतनाट्यम मंच पर देखा और उनके शब्दों में, ‘देखने के बाद ही दिल-दिमाग में कुछ हो गया.’

जिंदगी के अंतिम फैसले दिल-दिमाग में एक साथ ही होते हैं. भरतनाट्यम को देखते हुए जस्टिन को उसी क्षण यह बात समझ आ गई. उन्होंने ही कुछ ही दिनों बाद भरतनाट्यम नृत्यांगना बाला सरस्वती के दो अमेरिकी शिष्यों से इस नृत्य विधा की शिक्षा लेनी शुरू कर दी. एक साल तक अमेरिका में भरतनाट्यम सीखने के बाद जब लगा कि इस नृत्य साधना में गहरे उतरना है तो जस्टिन ने भारत आने का फैसला किया. वे सन् 1979 में मद्रास पहुंचे और एक साल तक सुब्बारया पिल्लई से भरतनाट्यम सीखा. लेकिन जब मद्रास की गर्मी और खाना बर्दाश्त नहीं हुआ तो एक डांसर दोस्त, नवतेज जौहर, की सलाह पर दिल्ली आ गए. उसके बाद दस साल तक श्रीराम भारतीय कला केंद्र में मशहूर नृत्यांगना लीला सैमसन से भरतनाट्यम विस्तार में सीखा. उधर अमेरिका में जस्टिन की मां को लग रहा था कि उनका बेटा हाथी पर बैठकर क्लास जा रहा है, सफेद चादर लपेट कर सड़कों पर घूम रहा है. उस दौर में विदेशी आंखों को हिंदुस्तान कुछ ऐसा ही नजर आता था. मगर जस्टिन आने से पहले हिंदुस्तान के बारे में काफी कुछ पढ़ चुके थे और नई चीजों को जानने के इच्छुक थे. मां-बाप को समझाकर और उन्हें भारत के बारे में सही जानकारी दे जस्टिन अपनी साधना में लगे रहे. साथ ही स्थानीय लोगों से बातचीत करने और भरतनाट्यम नृत्य और कर्नाटक संगीत को बेहतर समझने के लिए उन्होंने तमिल और संस्कृत सीखी. हिंदी और तमिल भाषा किताबों और लोगों से बातचीत करते-करते सीखी. दिल्ली में एक गुरू के साथ रहकर आठ साल तक संस्कृत का अध्ययन किया. संस्कृत सीखने की वजह बताते हुए जस्टिन कहते हैं, ’जयदेव का गीतगोविंदम् संस्कृत में पढ़ने की बड़ी इच्छा थी, इसलिए संस्कृत सीखी. बाद में पता चला कि संस्कृत में इसके अलावा भी बहुत कुछ पढ़ने के लिए है.

संस्कृत ऐसी भाषा है जो सारी जिंदगी पढ़ने के बाद भी आपको पूरी तरह से नहीं आ सकती.’ शायद इसलिए स्कूलों में जिस तरह ‘तोतागीरी’ करके गलत तरीके से संस्कृत सिखाई जाती है उससे भी जस्टिन बेहद नाराज हैं और इसी को संस्कृत के आज के लोगों के बीच पैठ न बना पाने की मुख्य वजह मानते हैं. जस्टिन हिंदी भी इतने प्रवाह से बोलते हैं कि आप भी हैरान और आप का शब्दकोश भी.

जस्टिन पिछले 15 साल से सरकारी रूप से भारतीय नागरिक हैं. भारतीय नागरिकता के लिए जस्टिन ने 1994 में अर्जी डाली थी और ढाई साल अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर लगाने के बाद आखिरकार 1997 में वे इस देश के नागरिक बन पाए. आखिर में जब वे दिल्ली की तीस हजारी अदालत शपथ लेने गए तो वहां एक चपरासी ने इशारे से रिश्वत की मांग कर दी. जस्टिन सीधे मजिस्ट्रेट के दफ्तर में घुस गए और शपथ लेकर लौटे, साथ ही चपरासी को डांट भी लगवाई. जस्टिन की नजर में भारत की नागरिकता लेना भावनात्मक से ज्यादा व्यावहारिक था, ’मुझे यहां रहते 16-17 साल हो चुके थे और मेरा काम यहीं पर था. और अब जब में आधिकारिक रूप से भारत का नागरिक बन चुका हूं तो मुझे इस बात की काफी खुशी होती है.’ मगर जस्टिन के लिए अमेरिकी नागरिकता छोड़ना और भारतीय नागरिकता लेना कोई ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’ नहीं था. वे स्वंय को वैश्विक नागरिक मानते हैं, ‘मैं अपने आपको इस तरह नहीं देखता कि मैं भारतीय हूं या अमेरिकी. मैं अपने को ग्लोबल सिटीजन मानता हूं और यह सीख मैंने बचपन में अपने प्यानो टीचर से ली थी जो कहा करते थे कि कलाकार किसी एक देश का नहीं होता.’ जस्टिन नागरिकता मिलने के बाद से ही लगातार भारत में वोट करते आ रहे हैं. शुरू में पोल बूथ पर देख कर लोग आश्चर्य तो करते थे मगर साल-दर-साल साथ-साथ वोट करने से जस्टिन को जानने लगे. वे हिंदुस्तानी राजनीति को भी अच्छे से जानते हैं और लोकपाल बिल पर चल रही नौटंकी पर साफ दिल से कहते हैं, ‘कानून से तो नहीं जाएगा भ्रष्टाचार. वह तो समाज में पहले से ही रचा-बसा हुआ है जो सिर्फ पढ़ाई और सतर्कता से ही आहिस्ता-आहिस्ता जाएगा.’

जस्टिन को पहली बार स्टेज पर देखने वाले शायद हैरान हो सकते हैं कि विदेशी होने के बाद भी कोई इतना अच्छा भरतनाट्यम नृत्य कैसे कर सकता है लेकिन जस्टिन को एक बार करीब से जानने के बाद आप खुद जान जाऐंगे कि वे कितने भारतीय हैं और भरतनाट्यम के लिए कितने जरूरी भी. भरतनाट्यम के अलावा जस्टिन को छऊ, मणिपुर की रासलीला, केरल का कुड्डियाटम जैसे दूसरे भारतीय नृत्य भी बेहद पसंद हंै, ‘कुड्डियाटम बड़ा ही अद्भुत नृत्य है. इसके बारे में विशेषज्ञ कहते हैं कि कालिदास के समय में कुछ इसी तरह का नृत्य होता था. साथ ही मुझे ओडिसी भी बेहद पसंद है. ओडिसी शुरू में तीन साल सीखा भी. लेकिन जब मुझे लगा कि मैं दो शैलियां एक साथ ठीक से नहीं कर पा रहा हूं तो मैंने फिर भरतनाट्यम को ही अपना पूरा समय दिया.’ भरटनाट्यम नृत्य के वक्त धोती की तरह बांधी जाने वाली कांचीवरम साड़ियों का जस्टिन के पास काफी बड़ा कलेक्शन है. धोती से अपने विशेष लगाव को उत्साह के साथ बयान भी करते है, ‘मुझे धोती बहुत पंसद है, मेरा बस चले तो मैं हर रोज धोती बांधू. लेकिन अगर धोती पहनकर घूमने जाऊंगा तो लोगों को अजीब लगेगा इसलिए सिर्फ नृत्य के समय ही पहनता हूं.’

जस्टिन को हिंदुस्तानी खाना भी हिंदुस्तान की ही तरह पसंद है. अमेरिकी लाइफस्टाइल की कमी महसूस नहीं करने वाले शाकाहारी जस्टिन के अनुसार, ‘मुझे बंगाली, मराठी, गुजराती, उत्तर भारतीय खाना बहुत ही पसंद है. मीठे में मुझे गुलाबजामुन पसंद है और खासतौर पर सर्दियों में गरम चावल घी और शक्कर के साथ मेरा पसंदीदा है.’ वे हिंदी फिल्मों की बात भी इसी उत्साह से करते हैं, ‘पुरानी फिल्मों में मुझे पड़ोसन, साहब बीवी और गुलाम बेहद पसंद है. एक जमाने में हिंदी सीखने के लिए अमिताभ बच्चन, रेखा, हेमा मालिनी और जितेंद्र की ढेर सारी हिंदी फिल्में देखा करता था.’

श्रीराम कला केंद्र के साथ जस्टिन का जुड़ाव भी कम रोचक नहीं है. उन्हीं के शब्दों में, ’यहां पर 10 साल तक भरतनाट्यम सीखने के बाद मैं पिछले 21 साल से यहां भरतनाट्यम सिखा रहा हूं. पहले मैं असिस्टेंट टीचर बना और फिर पूर्णकालिक. अर्थात पिछले 31 साल से मैं इस केंद्र से जुड़ा हुआ हूं और एक चपरासी के बाद सबसे पुराना आदमी भी हूं यहां पर.’ जस्टिन ने दिल्ली के मशहूर मंडी हाउस को भी काफी बदलते देखा है, ‘पहले मंडी हाउस कला, संस्कृति और नृत्य की फलती-फूलती, जानदार और धूम-धड़ाके वाली जगह हुआ करती था. यह वो जमाना था जब नसीरुद्दीन शाह, नीना गुप्ता जैसे कलाकार एनएसडी में थे और जींस, खादी कुर्ता और झोला टांगे लड़के-लड़कियां मंडी हाउस के बंगाली मार्केट में पाए जाते थे. अलग ही तरह का माहौल हुआ करता था तब. आज के मंडी हाउस में वह बात नहीं रही. काफी बदल गया है.’

जस्टिन मैकार्थी  ने कभी सोचा नहीं था कि वह भरतनाट्यम में इस मुकाम पर पहुंचेंगे. आखिर तक हिंदुस्तान में रहने की चाहत रखने वाला यह भरतनाट्यम गुरू आज की पीढ़ी के लिए आदर्श है. भले ही भरतनाट्यम के प्रति युवाओं, खासकर लड़कों, के घटते रुझान पर जस्टिन मैकार्थी चिंतित हंै लेकिन उनकी यह उम्मीद खत्म नहीं हुई है कि युवा इस शास्त्रीय नृत्य शैली की तरफ जरूर मुड़ेंगे और भरतनाट्यम कुछ-एक शास्त्रीय समारोहों से निकल कर पूरे देश में वह सम्मान जरूर पाएगा जिसका वह हकदार है.

मराठी मानुस!

मेलससन बनर्सन मूल देश अमेलरका
मेलससन बनर्सन मूल देश अमेलरका
मेलससन बनर्सन मूल देश अमेलरका

‘कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी’ वाले हमारे देश में सुदूर देश/गांव की भाषा समझना आम लोगों के लिए भी व्यवहारिक दिक्कतें खड़ी कर देता है. और अगर समझने के बाद उसका ज्ञाता होना और उसमें शिक्षक की तरह निपुण होकर छोटे बच्चों को पढ़ाया जाना भी शामिल हो तो भाषा की यह मुश्किल हद दर्जे की दुरूह हो जाती है. जैसा की मशहूर भाषाविद नोम चोमस्की कहा करते हैं, ‘बच्चों में कई भाषाओं को एक साथ सीखने-समझने की क्षमता वयस्कों से ज्यादा होती है.’ लेकिन अमेरिका की मेक्सिन बर्नसन कुछ अलग ही तरह की वयस्क और भाषाविद हैं. उन्होंने भारत की एक क्षेत्रीय भाषा मराठी वयस्क होने पर ही सीखी. और इस गहराई के साथ आत्मसात कर ली कि अब वे कई सालों से महाराष्ट्र के सतारा जिले के फाल्टन कस्बे में गरीब बच्चों को मराठी सिखाती हैं. लेकिन 76 वर्षीय मेक्सिन की उपलब्धि यहीं खत्म नहीं होती.

मेक्सिन को फाल्टन में भूले-बिसरे तबकों के गरीब दलित बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए प्रगत शिक्षण संस्था जैसी एक सार्थक पहल करने के लिए भी जाना जाता है. इस संस्थान में दलित वर्ग से आए बच्चे सामान्य श्रेणी के बच्चों के साथ इस तरह घुल-मिलकर पढ़ते हैं सामाजिक ऊंच-नीच यहां सूक्ष्मदर्शी की जांच में भी पकड़ में न आए. हमारे देश के कई सरकारी और गैर-सरकारी स्कूल इस असमानता से पटे पड़े हैं और महंगे प्राइवेट स्कूलों के इस दौर ने इस खाई को और गहरा कर दिया है. ऐसे समय में एक छोटे कस्बे में यह सफल प्रयोग करने का श्रेय मेक्सिन को जाता है जिनका मानना है, ‘भाषाई अनुसंधान से यह साबित होता है कि अगर सभी तबकों के बच्चे साथ मिलकर पढ़ते हैं तो बर्ताव और बात करने के तरीके से यह पता करना बेहद मुश्किल होता है कि वह कथित निचले तबके से आता है.’ यही फलसफा इस संस्था को और साथ ही मेक्सिन को अलहदा रूप देता है. यही इस संस्था की सच्ची शिक्षा भी है.

मिशीगन, अमेरिका के एक छोटे-से कस्बे एस्कनाबा में जन्मी मेक्सिन के पिता नार्वे से विस्थापित हो अमेरिका आए थे और मां का परिवार फिनलैंड से. भारत से पहला परिचय ग्यारहवीं क्लास में हुआ जब एक पत्रकार ने 1950 के अपने भारत भ्रमण का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे आजादी के बाद भारत सिर्फ तीन साल में ही लोकतांत्रिक तरीके से बेहतर ढंग से आगे बढ़ रहा है. वे बताती हैं, ‘वह बात बड़ी रोचक और साथ ही विस्मित करने वाली थी क्योंकि भारत के पड़ोसी चीन ने ठीक विपरीत साम्यवादी रास्ता अपनाया हुआ था. तभी मैंने फैसला कर लिया था कि मैं एक दिन खुद भारत जाकर यह लोकतांत्रिक प्रयोग जरूर देखूंगी.’ शुरू से ही मिली-जुली संस्कृति में पढ़ने वाली मेक्सिन ने कोलंबिया विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एमए करने के बाद भारत आकर हैदराबाद के विवेकवर्धनी कालेज में अंग्रेजी लेक्चरर के तौर पर पढ़ाना शुरू किया. इसी समय मेक्सिन ने पहली बार मराठी सीखी और मराठी का क्रेश कोर्स करने पुणे भी गई. दो साल यहां काम करने के बाद मेक्सिन अपनी पीएचडी के लिए वापस अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिलवेनिया लौट गईं. यहां उनका विषय था भाषाविज्ञान और भारतीय भाषाएं. वहीं उनकी मुलाकात इरावती पर्वे नाम की एक शिक्षिका से हुई. चूंकि मेक्सिन के शोध का विषय मराठी की विभिन्न बोलियों पर था और इरावती ने फाल्टन कस्बे का सोशल सर्वे किया हुआ था, इसलिए इरावती ने शोध के लिए मेक्सिन को फाल्टन जाने की सलाह दी. इस तरह वे 1966 में अपनी पीएचडी के लिए फाल्टन आई और फिर यहीं की होकर रह गयी. ‘मैं 1966 में भारत आई और 1972 तक आते-आते मुझे लगने लगा कि अंदर ही अंदर मैं भारत में ही रहने का फैसला कर चुकी हूं.’ इसके बाद भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन देने की वजह बताते हुए मैक्सिन कहती हैं, ‘मैं यहां तभी रुकना चाहती थी जब मैं भारतीय समाज को अपना पूरा योगदान दे सकूं और वह देश की नागरिकता हासिल करने के बाद ही संभव था.’

इसी दौरान मेक्सिन ने कुछ और शिक्षकों के साथ मिलकर स्कूल नहीं जाने वाले दलित बच्चों के लिए ‘आपली शाला’ की नींव रखी. वे बताती हैं, ‘शुरू में हमने इसे शिक्षा के वैकल्पिक प्रोग्राम की तरह लिया ताकि जो गरीब दलित बच्चे स्कूल नहीं जा सकते थे उन्हें लिखना-बोलना-पढ़ना सिखाया जा सके. लेकिन हमें जल्द ही यह बात समझ आ गई कि हमारा मुख्य काम उन बच्चों को मुख्यधारा के स्कूलों में दाखिला दिलवाना, उन्हें पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करना और कक्षा में सफल बनाना है.’ 1978 से 1985 तक वे आपली शाला संभालती रहीं और अपना भाषा संबंधी शोध भी करती रहीं. साथ ही अपनी जीविका के लिए हर साल कुछ वक्त के लिए अमेरिका जाकर कालेज के छात्रों को मराठी भी पढ़ाती रहीं. मेक्सिन आगे कहती हैं, ‘इस दौरान काफी लोगों ने कहा कि मुझे एक पूर्णकालिक स्कूल खोलना चाहिए. लेकिन मैंने हर बार इस विचार का विरोध किया क्योंकि मैं सरकारी स्कूलों की शिक्षा प्रणाली पर ज्यादा विश्वास करती थी न कि प्राइवेट स्कूलों की. इसलिए जो भी मुझसे स्कूल खोलने के लिए कहता तो मेरा सीधा जवाब होता कि मैं अपना वक्त दलितों के बच्चों को पढ़ाने के लिए लगाना चाहती हूं न कि एलीट क्लास के बच्चों को.’ मगर धीरे-धीरे उन्हें यह समझ आने लगा कि अच्छी शिक्षा की जरूरत दलितों के अलावा दूसरे बच्चों को भी है. इस बात को समझते हुए उन्होंने 1984 में प्रगत शिक्षण संस्था को पंजीकृत कराया. इसके अंतर्गत कमला निंबकर बालभवन की शुरुआत हुई. बालवाड़ी से शुरू हुए इस स्कूल में हर साल एक नई कक्षा जुड़ती गई और अब यहां दसवीं तक की कक्षाएं लगती है. 1997 में निकले दसवीं के पहले बैच के सभी 14 बच्चे पास हुए और तब से अब तक दसवीं का रिजल्ट 100 फीसदी रहा है.

कमला निंबकर बालभवन में दाखिल होते ही आप समझ जाएंगे कि यह स्कूल बाकी स्कूलों से कितना अलग है. हो सकता है आपको किसी कक्षा में छात्र छोटे-छोटे समूहों में सब्जियां और फल काटते हुए मिलें जिनको मिलाकर कुछ देर में सलाद बनाया जाएगा. साथ ही एक शिक्षक भी मिले जो बता और पूछ रहा हो कि किस सब्जी या फल में कौन-सा विटामिन है. यह भी हो सकता है कि अगली कक्षा में किसी पाठ का नाट्य रूपांतर चल रहा हो जिसमें छात्रों के अलावा शिक्षक भी कोई पात्र अभिनीत कर रहा हो. इस स्कूल की नींव रखते वक्त ही कुछ नियम बना दिए गए थे जिन्हें आज भी कोई नहीं तोड़ता. स्कूल में सभी धर्म-संप्रदाय-जाति के बच्चों को दाखिला मिलेगा और पिछड़ी जाति के बच्चों के दाखिले के लिए सम्मिलित रूप से विशेष प्रयास किए जाएंगे. स्कूल का वातावरण बोझिल न होकर हंसी-खुशी और आजाद ख्यालों का होगा. पढ़ाई का माध्यम मराठी होगा लेकिन अंग्रेजी भी पहली कक्षा से ही पढ़ाई जाएगी और उसपर जरूरी ध्यान दिया जाएगा. यहां कक्षाएं बड़ी और हवादार हैं, लाइब्रेरी में अनेकों विषयों की किताबों की भरमार है, लड़के-लड़कियां साथ पढ़ते-खेलते हैं और शिक्षकों को बाहर ट्यूश्न देने की मनाही है. कमला निंबकर बालभवन के छात्रों की प्यारी मेक्सिन मौसी के अनुसार, ‘मैंने शुरू में ही फैसला कर लिया था कि यह स्कूल शिक्षा के मरुस्थल में सिर्फ एक खूबसूरत उद्यान की तरह नहीं होगा बल्कि एक ऐसा केंद्र होगा जहां पर दूसरे स्कूलों को भी बेहतर बनाने के लिए काम किया जाएगा, खासतौर पर सरकारी स्कूलों को.’ इसीलिए यहां एक प्रोग्राम चलाया जाता है जिसमें संस्थान के शिक्षक दूसरे सरकारी स्कूलों में नियमित तौर पर जाकर वहां के छात्रों को कुछ नया सिखाने का प्रयास करते हैं.

1986 में मेक्सिन ने इस अवधारणा के साथ इस स्कूल की नींव रखी थी कि यहां बच्चे जाति आधारित असमानता को नजरअंदाज करते हुए हंसते-खेलते शिक्षा प्राप्त कर सकें और जहां सिर्फ इम्तिहानों में अच्छे नंबर लाना ही आखिरी मंजिल न हो. आज, यहां की शिक्षा कार्यप्रणाली,  ‘ हमारी हिंदुस्तानी शिक्षा प्रणाली की कमजोर जड़ों को कैसे मजबूत किया जाए?’  वाले सवाल का एक बेहतर जवाब बन चुकी है.