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मोदी के बहाने भारत पर निशाने

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भारत के ‘कथित लोकतंत्र’ और उसकी ‘धर्मनिरपेक्षता’ की बखिया उधेड़ना यूरोप के मीडिया का आज से नहीं, हमेशा से ही शौक व परमधर्म, दोनों रहा है. लोकसभा के चुनाव-परिणाम और ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ नरेंद्र मोदी की ‘भूस्खलन’ विजय पर वह धर्मपालन से भला कैसे चूक सकता था. चाहे ब्रिटेन हो या जर्मनी, स्पेन हो या इटली, हर जगह अखबारों में जो कुछ लिखा या टेलीविजन पर दिखाया गया, वह काफी हद तक ‘हिंदू राष्ट्रवादी’, ‘मुस्लिम विरोधी’ और  दोनों के मेल से  भारत को ‘शक्तिशाली’ बनाने जैसे घिसे-पिटे पूर्वाग्रहों से ही भरपूर रहा.

निष्पक्ष पत्रकारिता का स्वघोषित दिनकर यूरोपीय मीडिया पहले तो 16 मई आने तक सोता रहा. तब तक चुनावों की कोई चर्चा ही नहीं थी. लेकिन मतगणना के आंकड़ों ने उसे चौंका दिया. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भले ही कह दिया कि मोदी अमेरिका आएं, हम उनका स्वागत करेंगे, लेकिन यूरोपीय मीडिया अपनी प्रसिद्धि को सार्थक सिद्ध करते हुए मोदी को ‘हिंदू राष्ट्रवादी’, ‘चाय पिलाने वाला’ और ‘कसाई’ करार देने में एकजुट हो गया.

बात भारत पर राज कर चुके ब्रिटेन से शुरू करते हैं. अपेक्षाकृत उदारवादी ‘गार्डियन’ ने ‘नरेंद्र मोदीः बदलते भारत का विवादास्पद मूर्तरूप’ शीर्षक के साथ लिखा, ‘सरल शुरुआत, तापसिक शैली और हिंदू राष्ट्रवाद के प्रति निष्ठा ने भाजपा के इस मुख्य प्रत्याशी को विजयी बना दिया.’ इसी अखबार के ऑनलाइन (इंटरनेट) संस्करण में कहा गया, ‘इतनी बड़ी जीत से कुछ तो अंतरराष्ट्रीय चिंता होगी ही. मोदी ध्रुवीकरण करने वाले एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन पर आलोचक सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों और अधिनायकवादी रुझानों के आरोप लगाते हैं. जनादेश इतना प्रबल है कि वे बिना सहयोगियों के अपनी कार्यसूची खुद ही तय कर सकते हैं.’ उधर, ब्रिटेन में दक्षिणपंथी झुकाव वाले ‘डेली मेल’ की उपहास-भरी टिप्पणी थी, ‘दुनिया के सबसे बड़े चुनाव के बाद, कभी चाय पिलाने वाला एक लड़का, गांधी-वंश के दशकों लंबे राज का अंत कर भारत  के प्रधानमंत्री-पद की सत्ता समेटने जा रहा है.’ स्मरणीय है कि भारत में चल रहे चुनावों की उपेक्षा कर रहे पश्चिमी मीडिया की चुप्पी पर ब्रिटिश कॉमेडियन और और व्यंग्यकार जॉन ऑलिवर ने अपने एक टेलीविजन कार्यक्रम में कहा था, ‘पिछली बार जब आपने चाय पिलाने वाले एक भारतीय लड़के की रंक से राजा बन जाने की कहानी सुनी थी (फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर), तब आपने उसे कमबख्त ऑस्कर (पुरस्कार) तक दे दिया था.’ नरेंद्र मोदी का जीवन-परिचय देते हुए उन्होंने कहा कि वे भी कभी सड़क पर चाय पिलाया करते थे, आज भारत का प्रधानमंत्री बनने की राह पर हैं. ऑलिवर का कहना था, ‘यह बहुत बड़ी बात है कि भारत में यह संभव है, पर (पश्चिम के मीडिया के लिए) इतनी बड़ी फिर भी नहीं कि उसकी यहां कोई चर्चा होती.’

ब्रिटेन के ही ‘द टेलीग्राफ’ का मोदी  के बारे में कहना था, ‘भारतीय संदर्भ में भूस्खलन जैसी उनकी विजय और कांग्रेस पार्टी का सफाया इंदिरा गांधी के बाद उन्हें देश का सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री बना देते हैं. वे सबसे विवादास्पद भी रहेंगे. हालांकि श्रीमती गांधी ही एकमात्र ऐसी नेता रही हैं जिन्होंने 1975 में आपात-स्थिति लगा कर भारत में लोकतंत्र को खतरे में डाला था.’ टेलीग्राफ का मानना है कि मोदी अपनी विदेशनीति में ‘हिंदुत्व’ और ‘स्वदेशी’ के सिद्धांत को अपनाते हुए विदेशी निवेश के प्रति अनुदार रुख अपना सकते हैं. लेकिन, भ्रष्टाचार से लड़ने के प्रश्न पर सहयोगी पार्टियों को साथ लेकर चलने की मनमोहन सिंह जैसी विवशता उनके सामने नहीं होगी. हां, उन्हें इस बात से कुढ़न जरूर हो सकती है कि ‘प्रधानमंत्री के तौर पर उन्हें दूसरों से कहने का अधिकार तो होगा, पर गुजरात के मुख्यमंत्री की तरह किसी को जमीन या कारोबार का लाइसेंस देने का अधिकार नहीं होगा.’

टेलीग्राफ का मानना है कि मोदी अपनी विदेशनीति में ‘हिंदुत्व’ और ‘स्वदेशी’ का सिद्धांत अपनाते हुए विदेशी निवेश के प्रति अनुदार रुख अपना सकते हैं 

‘टेलीग्राफ’ के ही ऑनलाइन संस्करण में 16 मई को प्रकाशित अपने एक लेख में, जाने-माने पत्रकार और अब भाजपा के प्रवक्ता एमजे अकबर ने कुछ ऐसी बातें कहीं जिन्हें पश्चिम ही नहीं, भारत का मीडिया भी देखना-सुनना नहीं चाहताः ‘मोदी की चुनावी विजय कोई लहर नहीं, क्रांति है. उसने भारत को  पिछली सदी की राजनीति से ऊपर उठा दिया है और गांधी-वंश के सामंती राज से मुक्ति दिला दी है.’ अकबर का कहना है कि चुनाव को दलगत या संप्रदायगत भावनाओं से प्रेरित बताना ‘बकवास’ है. वह ‘एक नए भारत के लिए सभी भारतीयों की जीत है.’ वह अल्पसंख्यकों को बहलाने-फुसलाने का, सत्ता और भ्रष्टाचार के बीच ‘साझेदारी’ का भी अंत है. मतदान के विश्लेषण दिखाते हैं कि ‘राजस्थान के 30 प्रतिशत मुसलमानों ने नरेंद्र मोदी के समर्थन में मतदान किया. भारी मात्रा में मुस्लिम वोटों के बिना उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में विपक्ष का इस तरह सफाया नहीं हो सकता था.’ मुसलमानों को सिर्फ इसलिए नौकरी-धंधा नहीं मिल सकता कि वे मुसलमान हैं, बल्कि इसीलिए मिल पाएगा कि वे भी इस देश के ‘बराबरी के नागरिक हैं.’

अब बात जर्मनी की. भारत में ब्रिटेन को यूरोप का चाहे जितना पर्याय माना जाए, यूरोप में तूती तो जर्मनी की ही बोलती है. जनबल और धनबल से वही यूरोप का सबसे बड़ा देश है. जर्मनी का मीडिया भारत के प्रति कटुता में उससे भी निष्ठुर कसाई है, जितना वह नरेंद्र मोदी को बताता है. जर्मनी के सबसे बड़े सार्वजनिक रेडियो और टीवी प्रसारण नेटवर्क ‘एआरडी’ के टेलीविजन समाचारों में, 16 मई को नई दिल्ली संवाददाता की जो वीडियो-रिपोर्ट प्रसारित की गई, उसका मुख्य संदेश था, ‘मोदी हिंदू राष्ट्रवादी हैं. इस्लाम के प्रति अपनी नापसंदगी को उन्होंने कभी छिपाया भी नहीं. देश के 15 प्रतिशत मुसलमान थर-थर कांप रहे हैं. इसाई और सभी दूसरे अल्पसंख्यक भी सहमे हुए हैं.’

जर्मनी के सबसे प्रसिद्ध दैनिक ‘फ्रांकफुर्टर अल्गेमाइने त्साइटुंग’ के सिंगापुर संवाददाता ने नई दिल्ली से अपनी रिपोर्ट को शीर्षक दिया, ‘मोदी और हिंदुओं के प्रतिशोधी.’ मुसलमानों के डर को 1933 के जर्मनी में हिटलर द्वारा सत्ता हथियाने के साथ जोड़ते हुए – यानी मोदी को एक तरह से भारत का भावी हिटलर बताते हुए – संवाददाता ने लिखा, ‘भय के तीन अक्षर हैं आर एस एस…. टाइम्स ऑफ इंडिया ने देश के भावी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नरम फासिस्ट बताया और एक ऐसा कार्टून छापा है, जिसमें भाजपा-अध्यक्ष उन्हें आरएसएस के सचेतक दिखा रहे हैं. हिंदू राष्ट्रवादी भाजपा की यह जीत गांवों के उन धूलभरे मैदानों पर लड़ी गई है जहां आरएसएस अपने समर्थकों से पौ फटते ही कवायद करवाता है. उग्रवादी हिंदू धर्म के हिंदुत्व-लड़ाकों के बिना मोदी की कभी जीत नहीं हो पाती.’

जर्मनी के चौथे सबसे बड़े शहर कोलोन से प्रकाशित होने वाले प्रतिष्ठित दैनिक ‘क्यौल्नर श्टाट अनत्साइगर’ ने भी टाइम्स ऑफ इंडिया वाले उद्धरण की ही आड़ लेकर यही व्यंग्य कसा कि ‘विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र ने चुनावों में ‘नरम फासिज्म’ को चुना है. अनेक विविधताओं वाले इस भीमकाय राष्ट्र ने… सहिष्णुता की अपनी परंपरा को उठाकर फेंक दिया है. उसने धार्मिक-राष्ट्रवादी विचारधारा वाले एक ऐसे आदमी को सत्ता के शिखर पर चढ़ा दिया है, जो मुसलमानों और इसाइयों सहित सभी अल्पसंख्यकों पर हिंदूवाद की मुहर लगा देना चाहता है… मोदी लोकतंत्रवादी कतई नहीं हैं.’ भारत में कहावत है, ‘कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली.’ इस रिपोर्ट का शीर्षक था, ‘चाय पिलाने वाला बना भारत का शक्ति-पुरुष.’ यानी, लेखक यही कहना चाहता है कि भारत में जब गंगू तेली भी राजा भोज बनने लगेंगे, तो उनकी रीति-नीति भी तुच्छ व संकीर्ण नहीं तो और क्या होगी!

म्युनिख से प्रकाशित होने वाले राष्ट्रीय महत्व के जर्मन दैनिक ‘ज्युुइडडोएचे त्साइटुंग’ की समझ से मोदी की जीत का प्रमुख कारण यह था कि ‘लोग मोदी को गुजरात का जादूगर मान बैठे हैं… कुछ लोग उनके नाम से सहम जाते हैं, उनकी तानाशाही शैली से आतंकित हो जाते हैं. लेकिन बहुत से भारतीय देश के ठहराव को दूर करने के लिए ठीक ऐसे ही कठोर कर्मठ हाथ की उत्कट कामना करते हैं.

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विश्वमंच पर नया हैवीवेट बॉक्सर
इसी जीत को एक दूसरे दृष्टिकोण से देखते हुए बर्लिन के दैनिक ‘देयर टागेसश्पीगल’ का मत था, ‘मोदी के रूप में… एक नया हैवीवेट (बॉक्सर) विश्वमंच पर अवतरित हो रहा है. अभी कुछ ही समय पहले तक वे अछूत थे, तिरस्कृत थे. अमेरिका सहित पश्चिमी देश उन्हें अपने यहां आने तक नहीं दे रहे थे… लेकिन लोगों ने उन्हें इसलिए नहीं चुना कि लोग भारत में हिंदू-तानाशाही चाहते हैं, बल्कि इसलिए कि मोदी अर्थव्यवस्था में तेजी लाएं. दस साल पहले तक भारत और चीन का नाम एक ही सांस में लिया जाता था… लेकिन, कांग्रेस सरकार ने मौका गंवा दिया… (सोनिया) गांधी की पार्टी को अब उसी का बिल मिला है.’

ऐसा लगता है कि सोनिया गांधी की जन्मभूमि इटली के मीडिया ने भारत में सत्तापलट को विशेष गंभीरता से नहीं लिया. अधिकतर ने समाचार एजेंसियों से मिली खबरों से ही काम चला लिया. प्रमुख दैनिक ‘ला रेपुब्लीका’ ने 17 मई को नई दिल्ली स्थित संवाददाता की रिपोर्ट छापी. इसमें उसने अपने आप को जनता के मूड, नई दिल्ली पहुंचने पर नरेंद्र मोदी के जोशीले स्वागत और भारत के प्रमुख अंग्रेजी दैनिकों के शीर्षकों तक ही सीमित रखा. सोनिया गांधी का नाम केवल एक बार इन शब्दों के साथ आता है कि चुनाव-परिणाम के ‘दूसरे दिन भारतीय प्रेस मोदी की शानदार विजय के लिए विशेषणों की झड़ी लगाने और सोनिया गांधी की कांग्रेस पार्टी की पराजय रेखांकित करने में कोई कंजूसी नहीं दिखा रही है.’

टेलीग्राफ का मानना है कि मोदी अपनी विदेशनीति में ‘हिंदुत्व’ और ‘स्वदेशी’ का सिद्धांत अपनाते हुए विदेशी निवेश के प्रति अनुदार रुख अपना सकते हैं 

‘यह एक ऐतिहासिक क्षण है’
फ्रांस में व्यापक बिक्री वाले ‘ले फिगारो’ ने 16 मई के अपने ऑनलाइन संस्करण में चुनाव-परिणाम का सकारात्मक विश्लेषण किया. शीर्षक था ‘भारत ने राष्ट्रवादी हिंदू को चुना.’ फिगारो के मत में ‘यह एक ऐतिहासिक क्षण है. भारत प्रबुद्ध है कि वह अपने इतिहास का एक नया पृष्ठ लिख रहा है. 30 सालों में पहली बार मतदाताओं ने किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत दिया है. राष्ट्रवादी दक्षिणपंथ इससे पहले कभी इस ऊंचाई तक पहुंच नहीं पाया था… सुधारों को पंगु बनाने वाले कोई ढुलमुल गठबंधन अब नहीं बनेंगे.’ फिगारो  इस बदलाव की जड़ दस करोड़ नए युवा मतदाताओं, जाति-धर्म को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने की उनकी उत्कंठाओं और गुजरात की सड़कों पर कभी चाय पिला चुके नरेंद्र मोदी के दृढ़संकल्पी व्यक्तित्व में देखता है. फिगारो का कहना था ‘इस देश (भारत) में जहां कांग्रेस हमेशा धर्मनिरपेक्षता की माला जपती रही है, पर धार्मिक अल्पसंख्यकों का समर्थन पाने के लिए उन्हें ललचाती-फुसलाती रही है, यह एक क्रांति है.’

स्पेन के प्रमुख दैनिक ‘एल पाइस’ ने भी चुनवा-परिणाम का विश्लेषण करते हुए लिखा कि हिंदू राष्ट्रवादी नरेंद्र मोदी की ऐतिहासिक विजय  ‘कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार की ऐतिहासिक हार भी है.’ लेकिन, यदि व्यक्तिगत हार-जीत से हट कर देखा जाए तो ‘यह उन पार्टियों की तुलना में आशा और विकास की जीत है, जो हौवा खड़ा करने में लगी थीं कि मोदी आए तो धार्मिक टकराव और बढ़ेंगे.’

‘भारत में विपक्ष को मिला पूर्ण बहुमत’ शीर्षक से नीदरलैंड के प्रमुख दैनिक ‘अल्खमेन दागब्लाद’ ने अपने आप को चुनाव परिणाम के मुख्य आंकड़े देने और यह कहने तक ही सीमित रखा कि भारत में भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी और व्यापक हैं कि मोदी तो क्या, कोई भी नेता भ्रष्टाचार का उन्मूलन नहीं कर सकता.

यह ‘हिंदू धर्म’ कहां से टपक पड़ा?
यूरोपीय ऑनलाइन फोरमों और अखबारों के नाम पाठकों के पत्रों में लोकसभा चुनाव की जो चर्चा रही, उसमें ऐसी प्रतिक्रियाएं कम नहीं थीं जिनमें शिकायत की गई थी कि छह सप्ताहों से इतने बड़े चुनाव चल रहे थे, और हमें अब बताया जा रहा है ! यह भी कहा गया कि पश्चिमी मीडिया चीन या अमेरिका की हर बुराई में भी अच्छाई देखता है, जबकि भारत की हर अच्छाई में भी बुराई ही ढूंढता है. एक पाठक की टिप्पणी थी, ‘हमारा मीडिया तो हमेशा यही कहता रहा है कि इस दुनिया में केवल तीन ही ‘विश्व धर्म’ हैं- ईसाइयत, इस्लाम और यहूदी. यह ‘हिंदू धर्म’ कब और कहां से टपक पड़ा? कहीं मोदी के पार्टी वाले हिंदू ही पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया और अब नाइजीरिया में भी मार-काट तो नहीं कर रहे?’

एक दूसरे पाठक ने लिखा, ‘हमारे यहां भी कुछ लाख मुसलमान हैं. हमारी सरकारें भी उन्हें वास्तविक या संभावित आतंकवादी मानकर उन पर कड़ी नजर रखती हैं. धर-पकड़ करती व रोक-टोक लगाती हैं. हमारे सैनिक उन्हें मारने अफगानिस्तान या अफ्रीका तक जाते हैं. फिर, भारत को लेकर इतना शोर क्यों? जर्मनी में भी तो अपने नाम में क्रिश्चन (इसाई) शब्द जोड़ने और इसाई धार्मिक झुकाव रखने वाली दो दक्षिणपंथी पार्टियां लगभग हमेशा से शासन में रही हैं, आज भी हैं. लेकिन उन्हें तो कोई ‘इसाई राष्ट्रवादी’ नहीं कहता! मीडिया भारत पर जो आरोप लगाता है- जातीय या धार्मिक भेदभाव, गरीबी- अमीरी, अर्थिक ठहराव या भ्रष्टाचार के- वे सब हमारे यहां भी तो मौजूद हैं. नहीं है, तो चाय बेचने वाला कोई लड़का, जो किसी यूरोपीय देश का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बन पाया हो. पश्चिम के सीने पर सांप लोटने का कहीं यही तो कारण नहीं है?’

विडंबना तो यह है कि भारत के संसदीय चुनावों में भाजपा की विजय से विचलित यूरोप के जिन देशों में भारत के कथित हिंदू राष्ट्रवादी झुकाव की सबसे मुखर निंदा-आलोचना हो रही है, 25 मई को समाप्त हुए यूरोपीय संसद के चुनावों में उन्हीं देशों में घोर दक्षिणपंथी राष्ट्रवादियों को ही भारी सफलता भी मिली है.  फ्रांस की नस्लवादी और इस्लाम-विरोधी ‘फ्रों नश्योनाल’ (राष्ट्रीय मोर्चा) तो देश की सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है, जबकि पेरिस में समाजवादियों की सरकार है. ब्रिटेन, इटली, स्पेन, डेनमार्क, जर्मनी इत्यादि में भी विदेशी अप्रवासियों और इस्लाम-विरोधी पार्टियों को मिले समर्थन में उल्लेखनीय से लेकर भारी बढ़ोतरी हुई है. तब भी, इन देशों का मीडिया यही कहता फिरेगा कि यह सब हमारे इसाई धर्म से प्रेरित कोई राष्ट्रवादी उभार नहीं, राष्ट्रीय या संघीय स्तर की आर्थिक-सामाजिक कठिनाइयों को अभिव्यक्त करता एक क्षणिक उबाल भर है, जो कल नहीं रहेगा, क्योंकि सच्चा लोकतंत्र तो हम ही हैं.’

‘इन नतीजों का अर्थ यह नहीं कि हम असफल हुए’

विजय पांडे
विजय पांडे
विजय पांडे

क्या दिल्ली में मिली जीत के बाद ‘आप’ अति आत्मविश्वास से भर गई थी जिसके चलते पार्टी ने लोकसभा चुनाव में 434 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया? क्या आज आपको लगता है कि यदि पार्टी ने कुछ चुनिंदा सीटों पर चुनाव लड़कर उन्हीं पर ध्यान दिया होता तो प्रदर्शन और बेहतर हो सकता था?
‘आप’ को उसके पहले आम चुनाव में प्रदर्शन के आधार पर असफल करार दिए जाने की बात पर सवाल खड़े किए जाने चाहिए. यदि आप भारत के चुनावी इतिहास पर नजर डालें तो पता चलेगा कि तमाम पार्टियों की शुरुआत ठीक ऐसे ही हुई है. भाजपा को 1984 के अपने पहले चुनाव में दो से ज्यादा सीटें नहीं मिली थीं. जब बसपा ने अपना पहला चुनाव लड़ा तब उन्हें दो प्रतिशत वोटों के साथ तीन सीटें मिली थीं. चुनावों में किसी पार्टी की सफल शुरुआत ऐसे ही होती है. आप की उपस्थिति पूरे देश में होती है, आपको ठीक-ठाक वोट मिलते हैं, पार्टी को स्थानीय नेता मिलते हैं और पूरे देश में आपकी पार्टी के कार्यकर्ता होते हैं. इस चुनाव में हमें ये सब मिला. इस लिहाज से मुझे नहीं लगता कि हमारी बुरी शुरुआत थी.

हालांकि सबकुछ बढ़िया हो ऐसा नहीं कहा जा सकता. जैसे दिल्ली में हमें पिछले चुनाव की तुलना में ज्यादा वोट तो मिले लेकिन भाजपा और हमारे बीच वोटों का अंतर अब बढ़ गया है. बनारस से चुनाव हारना भी एक झटका रहा. हरियाणा में सीट मिलने की उम्मीद थी लेकिन हम कोई सीट नहीं जीत पाए. फिर भी पंजाब में चार लोकसभा सीटों पर मिली सफलता हमारे लिए खासी महत्वपूर्ण रही क्योंकि किसी नई पार्टी के लिए दो प्रदेशों में संभावित विकल्प के रूप में उभरना छोटी शुरुआत नहीं है.

लोकसभा चुनाव के नतीजों से आपकी पार्टी को क्या सकारात्मक संदेश मिले और आप उनके आधार पर आगे की तैयारी कैसे कर रहे हैं?
पार्टी को अब देश के कोने-कोने में पहचाना जाने लगा है. 100 सीटों पर हमने कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था लेकिन शुरुआत करने के लिए 434 का आंकड़ा भी बुरा नहीं है. अब हमारी पार्टी को ज्यादा लोग जानने लगे हैं, अरविंद केजरीवाल और ‘आप’ का चुनाव चिह्न दूर-दूर तक पहुंच चुका है. ज्यादातर पार्टियों के लिए ये उपलब्धियां हासिल करने में भी एक दशक लग जाता है. आज देश में कितनी पार्टियां होंगी जो हमारे बराबर कार्यकर्ता होने का दावा कर सकें. हमने चुनाव में वे सवाल उठाए जिनपर पहले कभी बात नहीं होती थी.  ‘आप’ ने पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर भाई-भतीजावाद, स्वराज और राजनीतिक विकेंद्रीकरण को एक मुद्दा बना दिया. हमने पार्टी डोनेशन के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था विकसित की. हालांकि पार्टी को पर्याप्त फंड नहीं मिला लेकिन हमने जो राजनीति की उसमें कालेधन की कोई भूमिका नहीं रही. वोट बैंक की अपेक्षा हमने अपने समर्थकों की संख्या बढ़ाई है. हर एक वोट जो हमें मिला उसके पीछे चार लोग ऐसे भी  थे जिन्होंने हमें वोट देने के बारे में सोचा, कहा कि हम अच्छे लोग हैं. हो सकता है अगली बार वे हमें वोट दें. इसके साथ ही हम एक अन्य राज्य, पंजाब में एक विकल्प की तरह उभरे. ये कुछ बातें हमारे लिए चुनाव के सकारात्मक संदेश हैं. इनके आधार पर ही पार्टी को आगे बढ़ना है.

अब हमें धैर्य रखने की जरूरत है. हमारा संगठन अब एक स्तर तक पहुंच चुका है. इसे बनाए रखने और इससे आगे बढ़ने की जरूरत है. हमें छोटे-छोटे कदमों से आगे बढ़ना है.

पिछले काफी समय से ‘आप’ लगातार चुनाव में व्यस्त रही. फिलहाल कुछ खाली समय आपके पास है तो क्या आपकी योजना इसका उपयोग पार्टी संगठन को मजबूत करने या कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देने के लिए करने की है?
अब हमारी यही चुनौती है. अभी कुछ और राज्य हैं जहां आने वाले दिनों में चुनाव होंगे. हमें वहां ध्यान देना होगा. लेकिन देश में बाकी जगहों पर हम संगठन मजबूत करने के लिए ध्यान दे सकते हैं जिससे कि नीतिगत विषयों पर हमारी और स्पष्ट समझ बन सके. कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण और  स्थानीय स्तर से लेकर ऊपर तक संगठन को मजबूत करने के लिए काम करना होगा. आप कह सकते हैं कि यह समय हमारे लिए चुनौती भी है और और एक अवसर भी.

‘आप’ के चुनाव अभियान का मॉडल बहुत नया और दिलचस्प था. फिर गड़बड़ियां आखिर कहां हुईं? उम्मीदवारों के चयन में या प्रचार की रणनीति में.
मैच हारने के बाद सबसे बुरी बात यह होती है कि आप अपने सभी कामों को गलत मान लें. कहें कि बॉलिंग, बैटिंग, फील्डिंग सब बेकार था और कैप्टन भी सही नहीं था. यह किसी मैच का सबसे खराब विश्लेषण है. विश्लेषण बहुत सावधानीपूर्वक होना चाहिए.

सबसे महत्वपूर्ण बात जो इस चुनाव में हमारे खिलाफ गई कि इससे पहले हमने लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा था; हमारे पास बाकियों की तरह संसाधन नहीं थे, संगठन उतना मजबूत नहीं था. दूसरी बात यह भी रही कि पूरे देश में भाजपा और नरेंद्र मोदी के पक्ष में एक लहर थी. इन बातों के अलावा मुझे नहीं लगता किसी और बात से हमारा प्रदर्शन प्रभावित हुआ हो.

‘ आप ‘ ने फंडिग के लिए पारदर्शी तंत्र बनाया है, जहां आप चंदा देने वालों की पहचान और चंदे की रकम दोनों उजागर करते हैं. लेकिन इस समय पार्टी में ऐसे लोगों की कमी नहीं हैं जो भविष्य में फंडिंग के लिए चिंतित हैं? इसपर आप क्या सोचते हैं?
मैं भी कुछ हद तक चिंतित हूं. दरअसल हमने इसके लिए एक खुला तंत्र बनाया है. इसका एक नुकसान यह है कि जो लोग आपको चंदा दे रहे हैं उनकी पहचानकर उन्हें आसानी से निशाना बनाया जा सकता है. इसका हमें लोकसभा चुनाव में तो नुकसान हुआ ही, आगे भी हो सकता है हमें उतना फंड न मिल पाए. यह एक मुश्किल स्थिति है जिससे हमें निपटना है. फिर भी मैं यह कहना चाहता हूं कि हमने वैध पैसे से पार्टी चलाने का मॉडल विकसित किया है. इसे बदलने का हमारा कोई इरादा नहीं है क्योंकि तब बाकी पार्टियों और ‘आप’ में कोई अंतर नहीं रह जाएगा.

जहां तक कार्यकर्ताओं की बात है तो जो लोग अभी पार्टी से जुड़े हैं, वे कुछ अलग प्रवृत्ति के लोग हैं; उन्होंने कुर्बानियां दी हैं, जब तक उन्हें लगेगा कि पार्टी सही दिशा में काम कर रही वे हमसे जुड़े रहेंगे और उनकी संख्या भी बढ़ेगी.

क्या आपको लगता है कि दिल्ली विधानसभा और हालिया लोकसभा चुनाव में ‘आप’ की उपस्थिति ने कई चीजें बदल दी हैं. दूसरी पार्टियों को अपनी चुनाव रणनीति बदलनी पड़ी खासकर उम्मीदवारों के चयन पर उन्हें ज्याद मेहनत करनी पड़ी.
हम राजनीति में सीटें जीतने या सरकार बनाने के लिए नहीं आए हैं. हम प्रधानमंत्री बनने-बनवाने के खेल में भी शामिल नहीं हैं. आम आदमी पार्टी राजनीति के परंपरागत ढर्रे को बदलने के लिए है. मैं यह दावा नहीं करता कि हम ऐसा करने में पूरी तरह सक्षम रहे हैं लेकिन छोटी ही सही कई मोर्चों पर इसकी शुरुआत हो गई है. हमने पार्टियों को मजबूर कर दिया कि वे भ्रष्टाचार पर बात करें और दागी उम्मीदवारों को टिकट देना उनके लिए मुश्किल हो जाए. मुझे किसी ने बताया है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अपने घोषणापत्र में भ्रष्टाचार मुक्त महाराष्ट्र का वादा करने जा रही है. इसे भी मैं ‘आप’ की एक सफलता मानता हूं. हमने एक शुरुआत की है, रास्ता बनाया है लेकिन अभी हमें लंबा सफर तय करना है.

कई लोग दिल्ली में आपकी सरकार द्वारा इस्तीफा दिए जाने से नाराज और निराश हुए थे. इसके बारे में आपको क्या कहना है?
राजनीति में हमें जनता से अपने कामों पर प्रतिक्रियाएं मिलती हैं और आम लोगों का मानना है कि दिल्ली में हमारी सरकार का इस्तीफा एक गलती थी. हम उस समय ऐसा नहीं सोच रहे थे. मुझे लगता है शायद जिस तरह से हमने फैसला लिया वह गलती थी. मुख्यमंत्री को इस्तीफा देने से पहले लोगों की राय जाननी थी और लोगों की राय उस समय यह थी कि सरकार को काम करते रहना चाहिए. राजनीति में आपको लोगों की राय का सम्मान करना ही चाहिए. मैं कहूंगा कि हमें बहुत ही कड़ी प्रतिक्रिया लोगों से मिली और अब हम वापस उनके पास जाएंगे.

दो देश, एक सच, दो पहलू

एक तसवीर, दो चेहरेभारत में पढ़ाई जाने वाली इततहास की तकताबों में गांधी नायक हैं और तजन्ना खलनायक जबतक पातकस्तान में उल्टा है
एक तसवीर, दो चेहरे भारत में पढ़ाई जाने वाली इततहास की तकताबों में गांधी नायक हैं और तजन्ना खलनायक जबतक पातकस्तान में उल्टा है

दागिस्तान के मशहूर कवि अबू तालिब की एक बेहद प्रसिद्ध उक्ति है, ‘अगर तुम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलाओगे तो भविष्य तुमपर तोप से गोले दागेगा.’ इसमें कोई शक नहीं कि इतिहास केवल विजेताओं का होता है. यानी इतिहास में, हारने वाले का स्थान विजेता की मर्जी से तय होता है, लेकिन अबू तालिब की बात हमें इतिहास के साथ छेड़छाड़ के खतरों से आगाह करती है.

इस तरह देखें तो भारत और पाकिस्तान के युवाओं का एक समूह दोनों देशों के इतिहास की लिखाई में नजर आने वाले विरोधाभासों को उजागर करते हुए इस उपमहाद्वीप का भविष्य सुरक्षित करने की कोशिश में लगा है. द हिस्ट्री प्रोजेक्ट के नाम से की जा रही इस कवायद का मकसद इसके सहसंस्थापक कासिम असलम के मुताबिक यह है कि दोनों देशों की मौजूदा पीढ़ी जाने कि साझा इतिहास की अहम घटनाओं को दूसरा मुल्क किस तरह देखता है. वह इतिहास को खुली नजर के साथ देखे, उस पर बहस करे. यह किताबों की एक सीरीज को बच्चों तक पहुंचाकर किया जा रहा है. एक समाचार वेबसाइट में बात करते हुए असलम कहते हैं, ‘हम भावनाएं नहीं भड़काना चाहते. हम चाहते हैं कि बच्चे जिसे सच मानते हैं उसे लेकर उनके मन में सवाल उठें.’  द हिस्ट्री प्रोजेक्ट के नाम के साथ ही आ रही इन किताबों का लक्ष्य 12-15 साल के बच्चे हैं और भारत और पाकिस्तान के कई स्कूलों में इसकी पहली कड़ी पहुंच भी चुकी है.

भारत और पाकिस्तान का विभाजन विश्व इतिहास में मानवीय विस्थापन की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक है. एक ऐसी घटना जहां अंतत: दोनों ही पक्षों के हाथ पराजय लगी. दोनों देशों के पास एक साझा अतीत, साझी विरासत थी, लेकिन आम लोगों के स्तर पर संपर्क कम होते जाने और राजनयिक रिश्तों में आई कटुता ने उनके आपसी रिश्ते को तो प्रभावित किया ही, उनके बीच की खाई इतिहास लेखन में भी नजर आने लगी. ऐसे में दोनों देशों के कुछ युवाओं ने जबरन किसी निष्कर्ष पर पहुंचे बिना इस इतिहास के दो संस्करणों के विरोधाभास नई पीढ़ी तक लाने का बीड़ा उठाया है.

इतने वर्षों बाद इतिहास की इन घटनाओं को इस तरह सामने लाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इसलिए क्योंकि साझा इतिहास की एक ही घटना को दोनों देशों के इतिहासकारों ने अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाते हुए लिखा है. इस इतिहास लेखन में निजी सोच कुछ इस कदर हावी हो गई है कि कई बार घटनाओं का ब्योरा ही पूरी तरह बदल गया है. उदाहरण के लिए कश्मीर के मसले पर एक देश की इतिहास की किताबें कहती हैं कि 1947 में कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराज हरि सिंह ने भारत और पाकिस्तान में विलय न करने की मंशा जताई. पाकिस्तान के सशस्त्र घुसपैठियों ने कश्मीर पर हमला किया और तब हरि सिंह ने भारत में शामिल होने संबंधी संधि पर हस्ताक्षर किए जिसके बदले भारतीय सेना को कश्मीर की रक्षा के लिए रवाना किया गया. वहीं दूसरे देश की किताबों के मुताबिक हरि सिंह ने कश्मीर में मुस्लिमों का नरसंहार शुरू कर दिया. तकरीबन 200, 000 लोगों ने पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत के लड़ाकों की मदद से कश्मीर के बड़े हिस्से को आजाद कराने में कामयाबी हासिल की. इसके बाद हरि सिंह ने मजबूरी में भारत का रुख किया.

पुनललेखन द तहस्ट्री प्रोजेक्ट की टीम के सदस्यों की इच्छा है तक इततहास से पक्पाती ब्योरे दूर तकए जा सकें
पुनललेखन द तहस्ट्री प्रोजेक्ट की टीम के सदस्यों की इच्छा है तक इततहास से पक्पाती ब्योरे दूर तकए जा सकें

साफ है कि पहला उदाहरण जहां एक भारतीय किताब से लिया गया है वहीं दूसरा उदाहरण पाकिस्तानी किताब का है. क्या वाकई कश्मीर के इतिहास का यह अंतिम सच है या फिर हमारी आने वाली नस्लें ऐसे ही टुकड़ा-टुकड़ा अधूरे सच को हकीकत मान कर जीने के लिए अभिशप्त हैं?

दोनों देशों की साझी विरासत में बिखरे पड़े इतिहास के ऐसे कई उदाहरणों को एक साथ रखने वाले इस प्रोजेक्ट पर दोनों देशों के कई युवा छात्र स्वयंसेवक और संपादक की भूमिका निभा रहे हैं. उन्होंने अपनी किताब में इतिहास की घटनाओं के बारे मंे दोनों देशों के संस्करणों को जस का तस अगल-बगल रख दिया है ताकि पाठकों को इनके विरोधाभास का आभास हो सके. इस परियोजना की शुरुआत तीन पाकिस्तानी छात्रों- कासिम असलम, अयाज अहमद और जोया सिद्दीकी ने की थी और उनकी पहली किताब अप्रैल 2013 में प्रकाशित हुई. दूसरी किताब का जिम्मा इस टीम के तीन भारतीय सदस्यों अनिल, बरकत और लावण्या ने उठाया है. हिस्ट्री प्रोजेक्ट-2 नामक इस किताब में समकालीन इतिहास के छह प्रमुख व्यक्तित्वों, गांधी, जवाहरलाल नेहरू, लोकमान्य तिलक, मुहम्मद अली जिन्ना, सर सैयद अहमद खान तथा मोहम्मद इकबाल के व्यक्तिव का दोनों पक्षों द्वारा किया गया आकलन पेश किया जाएगा.

इतिहास के इस साझा लेखन के बीज कुछ समय पहले अमेरिका के सीड्स ऑफ पीस अंतरराष्ट्रीय शिविर में बोए गए . इस शिविर में उन देशों के किशोरों को एक-दूसरे से रूबरू कराया जाता है जिनके आपसी संबंध ठीक नहीं होते. इस शिविर में अन्य देशों के युवा जहां खेलकूद, एक-दूसरे की संस्कृति और परंपराओं को समझने में लगे रहते थे वहीं भारत और पाकिस्तान के इन बच्चों का ध्यान अपने साझा अतीत पर अटक गया. आपसी बातचीत से उन्हें पता चला कि इतिहास की एक ही घटना के कितने अलग-अलग रूप उनको पढ़ाए गए हैं. जाहिर है दोनों सच नहीं हो सकते. बस यहीं से शुरुआत हुई द हिस्ट्री प्रोजेक्ट की.

लेकिन इस शुरुआत से एक महत्वपूर्ण सवाल जुड़ा हुआ है. क्या यह परियोजना दोनों देशों में इतिहास लेखन और साझा इतिहास से जुड़े तथ्यों के प्रस्तुतिकरण को लेकर किसी नई बहस को जन्म दे पाएगी? दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इस परियोजना का हासिल क्या होगा? प्रोजेक्ट की भारतीय टीम के सदस्यों में से एक अनिल जॉर्ज कहते हैं, ‘हमारा मानना है कि युवाओं को अधिकार है कि वे तस्वीर का दूसरा पहलू देख सकें. खासतौर पर तब यह और आवश्यक हो जाता है जब मसला उनके अतीत से जुड़ा हो.’ वे कहते हैं कि वे सीमा के आर-पार तथ्यों में व्याप्त बदलाव को देखकर दंग रह गए. इतिहास लेखन हमारे और आपके जैसे लोगों ने ही किया है ऐसे में उनके लेखन में निजी नजरिया दाखिल हो गया हो, इसकी पूरी आशंका है.

भारत और पाकिस्तान की साझी विरासत में बिखरे पड़े इतिहास को उनके व्यापक संदर्भों के साथ पेश करने का बीड़ा उठाया है ‘द हिस्ट्री प्रोजेक्ट’ ने

बीते साल प्रकाशित इस परियोजना की पहली पुस्तक में पाकिस्तान तथा भारत में हाईस्कूल स्तर पर पढ़ाई जाने  वाली इतिहास की किताबों से सन 1857 से 1947 तक की 16 बड़ी घटनाओं के ब्योरे लिए गए. इसमें प्रथम स्वतंत्रता संघर्ष और भारत और पाकिस्तान का बंटवारा शामिल थे. इस किताब को तैयार करने के लिए नौ पाकिस्तानी तथा तीन भारतीय किताबों से तथ्य जुटाए गए. जब दोनों देशों की ओर से वर्णित तथ्यों को आमने-सामने रखकर देखा गया तो उनमें इतना अधिक अंतर था कि पढ़ने वाले दंग रह गए.  एक घटना के दो विरोधाभासी संस्करण तो थे ही, कई घटनाएं ऐसी भी थीं जिनका जिक्र एक देश के इतिहास में है जबकि दूसरे में वे पूरी तरह गायब हैं. जैसे 1930 में शुरू किया गया महात्मा गांधी का सविनय अवज्ञा आंदोलन पाकिस्तान में पढ़ाई जा रही किताबों में सिरे से नदारद है.

परियोजना के संपादक अपने शोध कार्य के लिए भारत में सीबीएसई और आईसीएसई तथा पाकिस्तान में कैंब्रिज प्रकाशन तथा पंजाब बोर्ड द्वारा कक्षा सात से 10 तक पढ़ाई जाने वाली इतिहास की किताबों की मदद ले रहे हैं. ये किताबें इस लिहाज से महत्वपूर्ण हैं कि छोटी उम्र में हासिल किया गया ज्ञान ही भविष्य में किसी व्यक्ति के सोचने समझने की क्षमताओं को आकार देता है. ऐसे में अगर द हिस्ट्री प्रोजेक्ट की किताबों को पढ़कर कोई बच्चा अपने ही इतिहास ज्ञान को नए सिरे से खंगालता है तो यही इस परियोजना की सबसे बड़ी सफलता होगी.

इसमें कोई शक नहीं कि बच्चों को पढ़ाए जाने वाले इतिहास की किताबों में राष्ट्रवाद की भावना प्रबल होती है. यहां तक कि कई दफा तो वे स्थापित तथ्यों के साथ छेड़छाड़ करने से भी नहीं चूकते. मिसाल के तौर पर भारतीय इतिहास की किताबों में मुहम्मद अली जिन्ना के शुरुआत में मुसलिमों-हिंदुओं के बीच एकता का समर्थक होने का जिक्र है लेकिन उनमें इस बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिलती है कि आखिर क्यों उन्होंने अपना रुख बदल दिया और मुसलमानों के लिए अलग मुल्क की मांग पर अड़ गए. पाकिस्तानी किताबें यह बताती हैं कि कांग्रेस में हिंदुओं के वर्चस्व और मुसलिम अल्पसंख्यकों के लिए पैदा हो रही चुनौती इसकी वजह थी.

टीम के सदस्यों का कहना है कि यह कतई महत्वपूर्ण नहीं है कि बच्चे इन किताबों को पढ़कर भारत अथवा पाकिस्तान के इतिहास के बारे में कोई राय कायम करें. सबसे जरूरी यह है कि इसे पढ़कर उनके भीतर विचार की एक प्रक्रिया की शुरुआत हो और वे कथित रूप से स्थापित किए गए उन तथ्यों पर संदेह करना शुरू करें जो उन्हें भ्रामक लगते हैं. अपने भीतर पैदा किया गया यह खलल, उन्हें अधिक सजग और जानकार नागरिक के रूप में विकसित करेगा, जो राष्ट्र के विकास में दूसरों के मुकाबले अधिक बेहतर हस्तक्षेप कर सकेंगे.

केजरीवाल बनाम चैनल

मनीषा यादव
मनीषा यादव
मनीषा यादव

आप पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल और न्यूज चैनलों/मीडिया के बीच जंग दिन पर दिन तीखी और तेज होती जा रही है. कभी खुली और कभी छिपी इस जंग के ताजा राउंड का गोला केजरीवाल ने दागा है. नागपुर में धन संग्रह के लिए आयोजित एक डिनर कार्यक्रम के दौरान केजरीवाल ने मीडिया पर बिका होने (पेड मीडिया) और मोदी का भोंपू बनने का आरोप लगाते हुए जांच कराने और दोषियों को जेल भेजने की बात क्या कही, ऐसा लगा जैसे किसी मधुमक्खी का छत्ता छेड़ दिया हो. आरोपों से बौखलाए चैनल केजरीवाल पर टूट पड़े.

न्यूज मीडिया खासकर चैनलों की आक्रामकता देखने लायक थी. चैनलों में एक सुर से केजरीवाल को तानाशाह, उनके बयान को अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला और लोकतंत्र विरोधी साबित करने से लेकर सुर्खियों में बने रहने के लिए सस्ते स्टंट करनेवाला और प्रचार का भूखा नेता साबित करने की होड़ सी लग गई. चैनलों ने केजरीवाल के आरोपों को खारिज करते हुए जिस तरह से उनकी चौतरफा पिटाई शुरू कर दी, उससे ऐसा लग रहा था जैसे न्यूज मीडिया में कुछ भी गड़बड़ नहीं है और सब कुछ अच्छा चल रहा है.

नतीजा, ‘सूप तो सूप, चलनी भी बोले जिसमें बहत्तर छेद’ की तर्ज वे चैनल कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो गए जिनपर पेड न्यूज और पूर्वाग्रहपूर्ण रिपोर्टिंग करने के आरोप लगते रहे हैं. कोयला घोटाले में फंसे एक बड़े औद्योगिक समूह से ‘खबर’ फिक्स करने के बदले में पैसे मांगने के आरोपी एक संपादक और उनके चैनल ने केजरीवाल की ‘पोल खोल’ अभियान को दुगुने जोश के साथ दिखाना शुरू कर दिया. यहां तक कि एक टैब्लायड चैनल के मालिक-संपादक बुखार और खराब गले के बावजूद ‘पत्रकारिता के महान धर्म’ का पालन करने के ‘पवित्र उद्देश्य’ के साथ केजरीवाल के ‘झूठ और धोखे’ का पर्दाफाश करने के लिए मैदान में कूद पड़े.  यही नहीं, एडिटर्स गिल्ड ने केजरीवाल के बयान की भर्त्सना की और न्यूज चैनलों के संगठन- न्यूज ब्राडकास्टर्स एसोशियेशन (एनबीए) ने तो धमकी देते हुए कहा कि अगर केजरीवाल ने न्यूज मीडिया खासकर चैनलों पर अनर्गल आरोप लगाने बंद नहीं किये तो उनकी कवरेज बंद कर दी जाएगी.

इसमें शक नहीं कि मीडिया के बारे में केजरीवाल के बयान के लहजे, भाषा और भाव में बहुत कुछ आपत्तिजनक था. यह भी सच है कि केजरीवाल में अपनी आलोचना सुनने को लेकर अत्यधिक असहिष्णुता है और उसपर उनकी प्रतिक्रिया अक्सर असंयत और तिरस्कार से भरी होती है.

लेकिन क्या केजरीवाल के बयान पर चैनलों की प्रतिक्रिया भी अतिरेकपूर्ण, असंतुलित और जरूरत से ज्यादा आक्रामक नहीं थी? दूसरे, क्या केजरीवाल के आरोपों में कोई तथ्य नहीं है? यह किसी से छुपा नहीं है कि यह न्यूज मीडिया का पेड न्यूज और नीरा राडिया काल है. यह भी कि न्यूज मीडिया में बड़ी कारपोरेट पूंजी की घुसपैठ एक तथ्य है और उसका एक एजेंडा भी है. लेकिन इस हंगामे में इसे ‘पोल खोलने’ और उसपर चर्चा-बहस करने लायक नहीं समझा गया बल्कि अगर किसी ने उसे उठाने की कोशिश की तो उसे चुप करा दिया गया.

इसलिए सवाल उठ रहे हैं कि केजरीवाल के बयान पर चैनलों की अतिरेक भरी और आक्रामक प्रतिक्रिया कहीं न्यूज मीडिया के अपने अंडरवर्ल्ड पर पर्दा डालने की कोशिश तो नहीं थी? न्यूज मीडिया इन सवालों से जितना मुंह चुराने और परोक्ष रूप से अपनी काली बिल्लियों को बचाने की कोशिश करेगा, उतनी ही शिद्दत के साथ वे उसका पीछा करेंगे. केजरीवाल को न्यूज मीडिया की यह कमजोर नस मालूम है और उसे भुनाने के लिए वे गाहे-बगाहे मीडिया पर हमले करते रहेंगे. आखिर केजरीवाल का मकसद भी न्यूज मीडिया की गड़बड़ियों को दूर करना नहीं बल्कि उससे अधिक से अधिक प्रचार हासिल करना और सुर्खियों में बने रहना भर है.

जांच की आंच

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सहित कई छोटे-बड़े नेता इस नक्सल हमले में मारे गए थे.
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सहित कई छोटे-बड़े नेता इस नक्सल हमले में मारे गए थे. फोटो: विनय शर्मा

केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के बनने के साथ ही मीडिया और राजनीतिक हलकों में नई सरकार व उसके एजेंडे की बातें जोरशोर से चल रही हैं लेकिन छत्तीसगढ़ में एक अलग ही मामला सबका ध्यान खींच रहा है. पिछले दिनों स्थानीय मीडिया में खबर आई कि मई, 2013 में झीरम घाटी में कांग्रेस काफिले पर नक्सल हमले की जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने अपनी जांच खत्म कर ली है. यह भी कहा गया कि एजेंसी ने हमले के पीछे राजनीतिक साजिश को एक सिरे से खारिज कर दिया है. हालांकि एनआईए ने तुरंत ही इन सारी खबरों का खंडन कर दिया. एजेंसी ने यह भी स्पष्ट किया कि अभी तक की जांच में किसी भी साजिश की संभावना को खारिज नहीं किया गया है. इसके बाद से छत्तीसगढ़ के राजनीतिक हलकों में खलबली मची हुई है और इनके केंद्र में एक बार फिर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजीत जोगी आ गए हैं.

अब तक झीरम घाटी हमले को मात्र सुरक्षा में चूक मानते रहे मुख्यमंत्री रमन सिंह भी चाहते हैं कि 25 मई, 2013 को झीरम घाटी में हुए कांग्रेस नेताओं के हत्याकांड की सूक्ष्मता से जांच की जाए. वे कहते हैं, ‘शुरू से ही इस मामले में कई आरोप-प्रत्यारोप लगते रहे हैं. यदि ऐसा है तो सच निकलकर सामने आना चाहिए. छत्तीसगढ़ के लोगों के मन में यह बात है कि कहीं यह हमला साजिश तो नहीं था.’ चूंकि इस मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी पर शुरू से उंगलियां उठी हैं इसलिए रमन सिंह के बयानों को जोगी पर निशाना साधने की कोशिश समझा जा रहा है. हालांकि भाजपा से ज्यादा खुद कांग्रेस के नेताओं ने पूर्व मुख्यमंत्री की भूमिका पर सवाल उठाए थे. ऐसे में माना जा रहा है एनआईए आने वाले दिनों में इस हमले को लेकर जोगी की भूमिका की जांच करेगी. आखिर ऐसा क्यों है कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर नक्सल हमले के मामले में शुरू से कांग्रेस के एक नेता पर ही उंगलियां उठ रही हैं? यह जानने के लिए उस नक्सल हमले की घटना पर एक नजर डालना जरूरी है.

25 मई, 2013 को दरभा ब्लॉक की झीरम घाटी में नक्सलियों ने परिवर्तन यात्रा के तहत वहां से गुजर रहे कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हमला कर 30 कांग्रेस नेताओं को मौत की नींद सुला दिया था. इसमें तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल से लेकर सलवा जुडूम शुरू करवाने में केंद्रीय भूमिका निभाने वाले महेंद्र कर्मा, पूर्व केंद्रीय मंत्री वीसी शुक्ल और कई छोटे-बड़े कांग्रेसी नेता शामिल थे. यहां याद रखने वाली बात यह भी है कि जिस वक्त प्रदेश में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा निकल रही थी उसी वक्त मुख्यमंत्री रमन सिंह अपनी विकास यात्रा पर थे. विकास यात्रा भी धुर नक्सल इलाकों से गुजरी लेकिन मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता होने के कारण कोई अप्रिय घटना नहीं घट पाई. वहीं कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि परिवर्तन यात्रा को कोई सुरक्षा मुहैया नहीं कराई गई थी. जिसका फायदा उठाते हुए नक्सलियों ने इस जघन्य हत्याकांड को अंजाम दिया था. हालांकि भाजपा सरकार पर यह आरोप जल्दी ही ठंडा पड़ गया और कांग्रेस के ही एक बड़े नेता यानी अजीत जोगी पर साजिश का आरोप लगाया जाने लगा था.

जोगी खुद सुकमा में हुई उस अंतिम सभा में मौजूद थे जो हत्याकांड के पहले हुई थी. लेकिन वे उस सभा में हैलीकॉप्टर से पहुंचे और उसी से वापस रायपुर आ गए. जबकि शेष नेता सड़क मार्ग से दरभा की अगली सभा के लिए जाते वक्त नक्सल हमले का शिकार हो गए. तभी से जोगी शक के दायरे में आए. इसकी एक बड़ी वजह पुलिस के इंटेलिजेंस विभाग के दस्तावेज हैं. इनमें बार-बार पुलिस को यह सूचना दी जा रही थी कि जगदलपुर के दरभा, सुकमा के थाना दोरनापाल, तोंगपाल, दंतेवाड़ा में नक्सलियों का जमावड़ा बड़ी संख्या में हो रहा है. कहने का आशय यह है कि सरकार के साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते जोगी को भी अपने स्तर इस इन बातों की सूचना होगी.

19 मार्च, 2013 को पुलिस मुख्यालय से जारी एक पत्र में साफ उल्लेख किया गया था कि जगदलपुर के दरभा इलाके में 100 से 150 नक्सली मौजूद हैं. 10 अप्रैल, 2013 को पुलिस मुख्यालय को इटेंलिजेंस की सूचना मिली थी कि कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा, पूर्व सलवा जुडूम नेता विक्रम मंडावी और अजय सिंह को मारने के लिए नक्सलियों ने तीन एक्शन टीम का गठन किया था. उनके सुरक्षा कर्मियों को भी विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए थे. 17 अप्रैल को एक बार फिर पुलिस के गोपनीय पत्र में चेताया गया था कि माओवादियों ने कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा और राजकुमार तामो को मारने के लिए स्मॉल एक्शन टीम बनाई है. जिसका दायित्व माओवादी मिलिट्री कंपनी नंबर 02 के पार्टी प्लाटून सदस्य राकेश को सौंपा गया है. इस तरह की कई सूचनाएं पुलिस को मिल रही थी. लेकिन इतनी सूचनाओं के बाद भी बस्तर यात्रा पर निकले कांग्रेस नेता मारे गए केवल अजीत जोगी हत्याकांड के पहले रायपुर सुरक्षित पहुंच गए.

इस मामले में जोगी समर्थक कोंटा विधायक कवासी लखमा पर भी कई आरोप लगे थे. झीरम घाटी हमले में लखमा पार्टी के एकमात्र ऐसे चर्चित नेता रहे जिन्हें नक्सलियों ने बगैर कोई नुकसान पहुंचाए छोड़ दिया था. जबकि उनके साथ मौजूद नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश, महेंद्र कर्मा, वीसी शुक्ल समेत कई नेता नक्सलवादियों की गोलियों का शिकार बने थे. इसके बाद कवासी लखमा को लेकर एक नहीं कई विवाद खड़े हो गए.

कई कांग्रेस नेताओं का आरोप था कि कांग्रेस नेता अपना रास्ता बदलना चाहते थे लेकिन कवासी इसी रास्ते से आगे बढ़ने को लेकर अड़ गए थे. परिवर्तन यात्रा के तयशुदा कार्यक्रम में आखिरी समय में जो बदलाव किया गया था वह भी कई सवाल खड़े कर रहा है. निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कांग्रेस विधायक कवासी लखमा के विधानसभा क्षेत्र कोंटा के तहत आने वाले सुकमा में 22 मई को सभा रखी गई थी. इस दिन केवल यही एक कार्यक्रम तय था. लेकिन बाद में मूल कार्यक्रम में दो बड़े बदलाव किए गए. पहला यह कि सुकमा की 22 मई को होने वाली सभा 25 मई को कर दी गई. दूसरा सुकमा के साथ ही एक और सभा दरभा में भी रख दी गई. उसी दिन नेताओं को सुकमा से दरभा जाते वक्त नक्सलियों ने अपना शिकार बनाया. इन्हीं कारणों से इस हत्याकांड को राजनीतिक षडयंत्र से जोड़कर देखा जाने लगा. चूंकि कवासी लखमा कांग्रेस में जोगी गुट के समर्थक हैं इसलिए हत्याकांड के तार जोगी से जोड़े जाने लगे. घटना के दो दिन बाद ही यानी 27 मई, 2013 को इसकी जांच एनआईए को सौंप दी गई थी. इन सभी आरोपों और जांच पर अजीत जोगी का कहना है, ‘जो असत्य को हथियार बनाता है, वह कभी सफल नहीं होता. इतना जरूर है कि पूरे मामले की सूक्ष्म जांच होनी चाहिए. फिलहाल एनआईए नक्सलियों की भूमिका की जांच कर रही है. उन्हें गिरफ्तार भी किया जा रहा है’.

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सवालों के घेरे में अजीत जोगी (ऊपर ) और उनके करीबी माने जाने वाले नेता कवासी लखमा (नीचे ) पर घटना के बाद से ही आरोप लग रहे हैं.

झीरम घाटी हत्याकांड की पड़ताल कर रही एनआईए ने अभी किसी राजनेता को क्लीन चिट नहीं दी है. आठ माओवादियों को गिरफ्तार करने और 27 के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने के साथ एजेंसी की जांच अभी जारी है.

एनआईए ने पिछले एक साल में अब तक की अपनी इंवेस्टिगेशन के दौरान पाया है कि झीरम घाटी हत्याकांड में 100 माओवादी शामिल थे. इनमें नक्सलियों के शीर्षस्थ नेताओं के नाम भी शामिल हैं.  एजेंसी ने हमले में शामिल नक्सलियों को पकड़ने का काम पुलिस अधीक्षकों को दिया है. इन्हें नक्सलियों के नाम, पते, पोजीशन समेत कई महत्वपूर्ण जानकारियां दी गई हैं. लेकिन बावजूद इसके एजेंसी अभी इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंची है कि इस हृदयविदारक हत्याकांड में राजनीतिक संलिप्तता थी या नहीं. एनआईए के आईजी संजीव सिंह तहलका को जानकारी देते हैं, ‘जिस दिन जांच समाप्त हो जाएगी हम कोर्ट में चार्जशीट फाइल कर देंगे. स्थानीय मीडिया में एनआईए द्वारा गृहमंत्रालय को रिपोर्ट सौंपने वाली जो भी बातें चल रही हैं वे सब गलत हैं. न हमने कोई रिपोर्ट सौंपी है न ही भविष्य में हमें कोई रिपोर्ट किसी को देनी है. हम सीधे चार्जशीट फाइल करेंगे.’ मीडिया में आई इन खबरों कि जांच में राजनीतिक साजिश की संभावना को एनआईए ने खारिज कर दिया है, पर बात बढ़ाते हुए संजीव कहते हैं, ‘फिलहाल हमने किसी स्थिति से इंकार नहीं किया है. कई बिंदुओं पर जांच होना अभी बाकी है.’

आने वाले दिनों में इस घटना के चश्मदीद रहे कुछ कांग्रेसी नेताओं के बयान एनआईए के सामने होने हैं. वीसी शुक्ल के प्रवक्ता रहे दौलत रोहड़ा भी इन गवाहों में शामिल हैं. वे बताते हैं, ‘ मुझे 26 जून, 2013 को एनआईए की तरफ से फोन आया था कि मेरी गवाही ली जानी है, लेकिन उसके बाद बयान के लिए कोई बुलावा नहीं आया.’

इस घटना को राजनीतिक साजिश बताने वालों में सबसे मुखर स्वर महेंद्र कर्मा के पुत्र दीपक कर्मा और नंदकुमार पटेल के बेटे उमेश पटेल के रहे हैं. दीपक कहते हैं कि उन्होंने इस संबंध में एनआईए को कुछ दस्तावेज भी सौंपे हैं. कर्मा घटना की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं. इसके लिए उन्होंने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से फोन पर बात कर मदद करने का आग्रह किया है.

इस पूरे मामले पर गौर करने लायक एक बात यह भी है कि राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी ने यूपीए सरकार के कार्यकाल के आखिर तक चुप्पी साधे रखी थी. अब केंद्र में भाजपा सरकार आते ही

एजेंसी का जिन्न बोतल से बाहर निकलकर राज्य की राजनीति में हलचल मचाने लगा है. ऐसे में एनआईए की आगे की जांच में कुछ बड़े नेताओं के नाम आते हैं तो कमोबेश शांत रहने वाली छत्तीसगढ़ की राजनीति में भूचाल जैसे हालात बन जाएंगे.

गुरबत में गूजर

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सभी तस्वीरें: प्रदीप सती

ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ 1857 में हुए पहले घोषित विद्रोह के तीन दशक से भी पहले वह लगभग 1820 के आसपास का दौर था. सहारनपुर और देहरादून के बीच स्थित घने जंगलों में कलवा नाम का एक खूंखार गूजर रहता था. उसका भय इतना ज्यादा था कि उस पूरे इलाके में तैनात अंग्रेज टुकड़ियां भी उससे बहुत खौफ खाती थीं. अंग्रेजों को अपना पक्का दुश्मन मानने वाला कलवा गूजर उन्हें अपनी जमीन से खदेड़ने का ऐलान भी कर चुका था. अन्य गूजरों को संगठित करके उसने कई बार अंग्रेज सिपाहियों पर धावा भी बोला. लेकिन अंग्रेजों की अपार ताकत अंतत: उस पर भारी पड़ी. अपने लगभग 200 साथियों के साथ वह मारा गया. उसके मारे जाने से अंग्रेज इतने खुश थे कि तब उन्होंने कलवा का सिर काट कर देहरादून की जेल के बाहर टांग दिया था.

लगभग 200 साल पहले का यह घटनाक्रम अंग्रेज लेखक जीआरसी विलियम्स की किताब मेम्वार ऑफ देहरादून में कुछ इसी तरह से दर्ज है. इस किताब के अंश बताते हैं कि अंग्रेजों से अपनी जमीन को बचाने के लिए कलवा और उसके साथियों ने कैसे अपनी जान की बाजी तक लगा दी थी. लेकिन तब शायद ही कलवा या उसके साथियों को इसका भान रहा होगा कि अंग्रेजी राज के खत्म हो जाने के बाद जो नया निजाम आएगा वह भी उनके समुदाय के प्रति उपेक्षा का ही भाव रखेगा. आज भी जंगलों में रह रहे वन गूजरों के साथ भले ही ‘सिर काट कर टांग देने’ जैसा बर्ताव न किया जा रहा हो, लेकिन इतने लंबे कालखंड के बाद भी उनके सिर पर एक अदद छत का मयस्सर न हो पाना उनके लिए किसी त्रासदी से कम नहीं है. उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे राजाजी राष्ट्रीय उद्यान में आने वाले जंगलों में रह रहे ये वन गूजर आज भी उसी आदिम दौर में रहने को अभिशप्त हैं जब इंसान के पास जंगल में रहने के सिवा कोई दूसरा चारा ही नहीं होता था. शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों से कोसों दूर ये गूजर हर उस सुविधा से वंचित हैं जिसे बेहतर जीवन स्तर की न्यूनतम शर्त कहा जा सकता है. इनकी जीवनचर्या आज भी घास पत्ती लाने और जानवरों को पालने तक ही सिमटी हुई है. घासफूस से बनी झोपड़ियों में रहते हुए इन पर एक तरफ जंगली जानवरों का खतरा हमेशा बना रहता है तो दूसरी तरफ कड़े वन कानूनों के चलते अक्सर वन विभाग का निशाना भी इन्हीं वन गूजरों की तरफ रहता है. दो साल पहले राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सामने अपना दुखड़ा सुनाते हुए वन गूजरों ने अपनी दारुण दशा का जो वर्णन किया था उसको सुनकर आयोग के अध्यक्ष वजाहत हबीबुल्लाह की टिप्पणी थी कि, ‘आजादी के इतने सालों बाद भी इतने बड़े समुदाय को समाज की मुख्यधारा से विमुख करने का काम किसी भी सरकार के लिए लानत का विषय है.’

इन गूजरों की मांग है कि सरकार जल्द से जल्द इन्हें भी उसी तरह कहीं स्थायी रूप से बसाए जैसे कि उसने राजाजी उद्यान के अंदर रहने वाले दूसरे गूजर परिवारों को बसाया है. इसके अलावा ये गूजर खुद के लिए अनुसूचित जाति का दर्जा भी चाहते हैं जैसा उनके समुदाय के लोगों को पड़ोसी राज्य हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में मिला है. दरअसल इस उद्यान के अंदर रहने वाले 1300 से अधिक परिवारों को सरकार ने 1998 तक पुनर्वासित कर दिया था. लेकिन बाकी रह गए परिवारों के पुनर्वास की योजना को वह ‘कोल्ड स्टोर’ से बाहर ही नहीं निकाल पाई. इस बारे में सरकार का ताजा रवैया इतना गैरजिम्मेदाराना है कि उसे यह तक नहीं मालूम कि फिलवक्त इस पार्क के अंदर रह रहे वन गूजरों के परिवारों की ठीक-ठीक संख्या कितनी है. इस बारे में पूछे जाने पर उत्तराखंड के प्रमुख वन संरक्षक एसएस शर्मा का यही कहना था कि इन गूजरों के पुनर्वास को लेकर नए सिरे से योजना बनाई जा रही है. अलग-अलग अनुमानों के मुताबिक उत्तराखंड के अलग-अलग वनप्रभागों में इस समय 9000 के करीब गूजर रह रहे हैं.

शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों से कोसों दूर ये गूजर हर उस सुविधा से वंचित हैं जिसे बेहतर जीवन स्तर की न्यूनतम शर्त कहा जा सकता है

इस सबके बीच 1998 तक पुनर्वासित हो चुके वनगूजर जहां धीरे-धीरे ही सही मुख्यधारा की ओर कुछ कदम बढ़ा चुके हैं, वहीं जंगलों में रहने को मजबूर इन गूजरों के हिस्से में अभी भी लंबा इंतजार ही है. वन गूजरों के हितों को लेकर काम करने वाली गैर सरकारी संस्था रूरल लिटिगेशन एंड एनटाइटलमेंट केंद्र (रूलक) के अध्यक्ष अवधेश कौशल कहते हैं, ‘इसे विसंगति ही कहा जाना चाहिए कि समाज की मुख्यधारा से बहुत पहले से ही कटे हुए ये गूजर परिवार अब अपनी ही बिरादरी वाले पुनर्वासित गूजरों से भी कई मायनों में पिछड़ चुके हैं. ऐसे में इनके पुनर्वास को लेकर की जा रही देरी इन्हें और भी पीछे धकेल देगी’ पुनर्वासित गूजरों की बस्तियों और जंगल में रहने वाले गूजरों के डेरों (झोपड़ी) का सूरतेहाल देखने पर साफ पता चलता है कि पुनर्वास हो जाने और पुनर्वास न हो पाने के चलते एक ही समुदाय के इन लोगों के जीवनस्तर के बीच एक ऐसी लकीर खिंच चुकी है जो लगातार लंबी होती जा रही है.

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से तकरीबन 25 किलोमीटर दूर मोहंड नामक एक जगह है. चारों तरफ से वनों से घिरा यह इलाका जिस राजाजी राष्ट्रीय उद्यान से सटा हुआ है उसी के भीतर वन गूजरों के परिवार कई पीढि़यों से रहते आए हैं. जंगल की तरफ आगे बढ़ने पर उनकी घासफूस की खूबसूरत झोपड़ियां एक-एक करके दिखने लगती हैं. लेकिन इन झोपड़ियों के पास पहुंचने के बाद जो दिखता है उससे इस खूबसूरती का सारा भ्रम एक ही झटके में बिखर जाता है. ऐसी ही एक झोपड़ी में टूटे-फूटे बर्तनों और इधर-उधर बिखरे सामानों के बीच बची-खुची रह गई थोड़ी सी जगह में कई सारे लोगों के रहने का इंतजाम किसी शरणार्थी शिविर सा लगता है. झोपड़ी के पिछली तरफ कुछ बच्चे खेल रहे हैं. तीन से लेकर लगभग 12 साल तक की उम्र वाले इन बच्चों के चेहरों पर पसरी हुई बेफिक्री कहीं से भी यह आभास नहीं करा रही कि अपने भविष्य को लेकर इनके मन में किसी तरह की कोई चिंता होगी.

लेकिन इस चिंता का आभास तब होता है जब 70 साल के अली खान चारपाई से उठ कर हमसे बातचीत करने लगते हैं. इन बच्चों की तरफ इशारा करके वे कहते हैं, ‘अपने बचपन के दिनों में मैं भी इसी तरह बेफिक्री से खेला कूदा करता था. तब मुझे भी नहीं मालूम था कि आने वाला कल कैसा होगा. लेकिन गुमनामी में पूरी जिंदगी जी लेने के बाद आज जब इन बच्चों का भविष्य सोचता हूं तो डर जाता हूं.’ बात आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं, ‘जागरूकता के अभाव मंे हम तो पढ़ाई लिखाई से वंचित रहे ही, और अब हमारी यह नई पीढ़ी भी शिक्षा के हक से पूरी तरह महरूम है. ऐसे में यह सोचकर ही दिमाग सुन्न हो जाता है कि इनका भविष्य क्या होगा.’ इन बच्चों के स्कूल नहीं जाने का कारण पूछे जाने पर उनका जवाब आता है, ‘स्कूल तो तब जाएंगे जब स्कूल नाम की कोई चीज होगी.’

दरअसल राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के अंदर रहने वाले जितने भी गूजर परिवार हैं, उनके बच्चों के लिए एक भी सरकारी स्कूल इस इलाके में नहीं है. हालांकि स्वयंसेवी संस्था रूलक द्वारा मोहंड में जरूर एक जूनियर हाई स्कूल खोला गया है, लेकिन सभी गूजर परिवारों के लिए वहां तक पहुंच पाना संभव नहीं है. यही वजह है कि गूजरों की यह सबसे नई पीढ़ी भी अभी तक अनपढ़ ही है. इस स्कूल के प्रधानाचार्य नौशाद मोहम्मद कहते हैं, ‘वन गूजरों के जो परिवार राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के बहुत अंदर स्थित डेरों में रहते हैं उनके बच्चों का स्कूल में पहुंच पाना तब तक असंभव है जब तक कि इन परिवारों को पार्क से बाहर नहीं बसाया जाता.’ इस इलाके के वन गूजरों के एक नेता इरशान कहते हैं, ‘अगर वक्त पर हमारा भी पुनर्वास कर दिया जाता तो हमारी यह नई पीढ़ी कुछ पढ़ लिख लेती, लेकिन मालिक जाने ऐसा कब हो सकेगा.’

हरिद्वार शहर से तकरीबन 15 किलोमीटर दूर पथरी नाम की एक जगह है. वन गूजरों के 512 परिवारों को पुनर्वास योजना के तहत यहीं बसाया गया है. इस इलाके में जाते ही वन गूजरों के रहन-सहन की एक दूसरी ही तस्वीर नजर आती है. जंगलों में बने वन गूजरों के घरों के मुकाबले अच्छी तरह व्यवस्थित और ठीक-ठाक सफाई वाले यहां के घरों में अलग-अलग कामकाज में व्यस्त पुरुष और महिलाओं को देख कर ऊर्जा से लबाबल एक हलचल इस पूरी बस्ती में साफ नजर आती है. गूजर बस्ती के शुरू होते ही प्राइमरी स्कूल और जूनियर हाईस्कूल की इमारतें दिखती हैं जिन पर ‘शिक्षार्थ आइए’ और ‘विद्या धनं सर्वधनम् प्रधानम्’ के नारे लिखे हुए हैं. यहां के प्रधान गुलाम मुस्तफा बताते हैं कि उनकी बस्ती के दो बच्चे इन स्कूलों से निकल कर इंजीनियरिंग का कोर्स कर रहे हैं. खुद मुस्तफा की दो बेटियां इन स्कूलों से पढ़ कर इसी बस्ती के स्कूलों में अध्यापक बन चुकी हैं. वे कहते हैं, ‘वन गूजरों को अब समझ में आने लगा है कि बेहतर जीवनस्तर के लिए शिक्षा की अहमियत कितनी है.’ इस बस्ती में वन गूजरों को बसाने के वक्त गूजरों के प्रत्येक परिवार को खेती के लिए अलग से दो-दो हेक्टेयर जमीन भी दी गई थी. इस जमीन में गन्ना और मक्का जैसी नकदी फसलें उगाकर ये गूजर अपनी आमदनी के स्रोतों में भी इजाफा कर चुके हैं. चिलचिलाती धूप के बावजूद अपने खेत में हल चला रहे 55 साल के गूजर इमरान कहते हैं, जंगलों में रहते तो सिर्फ दूध ही बेच रहे होते, लेकिन अब हमारे पास रोजगार के कई और विकल्प भी हैं.

जिनका पुनर्वास हुआ है उनकी जिंदगी थोड़ी बेहतर हुई है. खेती के लिए मिली जमीन और स्कूल जैसी सुविधाओं ने कुछ हद तक उनका जीवन बदला है

हालांकि गूजरों को बसाने का यह काम भी कई अनियमितताओं से भरा रहा है. पथरी में उनके लिए बनाये गए मकानों, शौचालयों और कैटल शैडों के निर्माण तक में भारी गड़बड़ियां उजागर हो चुकी हैं. पथरी में उन्हें बसाये जाने की बाबत गूजरों से किसी भी तरह की सहमति नहीं ली गई थी. इसके अलावा सुरक्षा की दृष्टि से कई बातों को नजरंदाज किए जाने की बातें भी सामने आई थीं. अवधेश कौशल कहते हैं, ‘तब इस जमीन के दलदली होने की बात भी हुई थी, लेकिन सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया.’ इसी जमीन पर 2006 में गूजरों के साथ ही उनके पशुओं के लिए अस्पताल बनाया गया था. बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका यह अस्पताल इस जमीन के दलदली होने की पुष्टि कर चुका है. गुलाम मुस्तफा बताते हैं, ‘इस बिल्डिंग में बैठने के लिए कोई भी डॉक्टर तैयार नहीं हुआ क्योंकि सभी जानते थे कि यह कभी भी धंस सकती है.’ इसके अलावा पुनर्वास योजना के तहत गूजरों के लिए बनाए जाने वाले शौचालयों, तथा कैटल शैडों का भी अभी शत-प्रतिशत आवंटन होना बाकी है. इस सबसे बड़ी बात यह है कि इन गूजरों को पुनर्वासित किए जाने के इतने सालों के बाद भी जमीन पर इन्हें मालिकाना हक अभी तक नहीं दिया गया है. गुलाम मुस्तफा कहते हैं, ‘हमें आवंटित की गई जमीनों के पट्टे जब तक हमारे नाम नहीं किए जाते तब तक हमारे मन में कई तरह की शंकाएं बनी रहेंगी.’

लेकिन राजाजी उद्यान के जंगलों में रहने वाले गूजरों के मुकाबले देखा जाए तो इतनी सारी दिक्कतों के बाद भी यह बस्ती हर नजरिए से उनसे बीस है. इस बात को स्वीकार करते हुए यहां के कई लोग मानते हैं कि जंगल से बाहर आकर यहां बसना उनके जीवन की दशा और दिशा को बदलने वाला कदम रहा है.

गूजरों के जीवन स्तर की इन दो तस्वीरों का सूरतेहाल समझने के बाद इस बात की पड़ताल जरूरी हो जाती है कि आखिर ऐसी कौन-सी वजहें हैं कि पुनर्वास का लाभ सभी गूजरों के हिस्से में नहीं आ पाया. इस सवाल का जवाब समझने के लिए गूजरों के वनों में रहने से लेकर उन्हें वनों से बाहर बसाने तक के घटनाक्रम पर एक सरसरी नजर डालना जरूरी है.

अपने घुमंतू स्वभाव के लिए जाने जाने वाले वन गूजर कई पीढ़ियों से जंगलों में ही रहते आए हैं. जानवरों को पालना और दूध बेचकर अपनी जरूरत की बाकी चीजों का इंतजाम करना लंबे समय से इनकी जीवनचर्या रही है. कहा जाता है कि चारागाहों की तलाश में यहां से वहां भटकते कई गूजर परिवार सहारनपुर से लेकर देहरादून और रामनगर तक फैले जंगलों में भी पहुंच गए. अब यह इलाका जिम कार्बेट और राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के नाम से जाना जाता है. गर्मियों के मौसम में पानी और चारे की किल्लत को देखते हुए ये वन गूजर उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) तथा हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों की तरफ चले जाते थे. कुछ वक्त वहां बिताने के बाद फिर से वापस इन्हीं जंगलों में रह कर ये अपना जीवन यापन करते थे. अंग्रेजी राज से आजादी के बाद तक भी कई सालों तक यह क्रम ऐसे ही चलता रहा. इस बीच देश और दुनिया में तरक्की की नई-नई इबारतें लिखी जा रही थीं. लेकिन इस सबसे बेपरवाह वन गूजर अपनी ही दुनिया में मस्त थे. तब तक न तो सरकारों ने कभी इनको मुख्यधारा में लाने के लिए कोई प्रयास किया और न ही खुद गूजरों ने ही इस दिशा में कोई दिलचस्पी दिखाई. 73 साल के वन गूजर मोहम्मद यूसुफ कहते हैं, ‘हमें तब जंगलों में ही सारा जहान नजर आता था. इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि एक तो हम अनपढ़ थे और दूसरा कोई भी यह बताने वाला नहीं था जंगलों से बाहर की दुनिया इससे बेहतर है.’

गूजरों के पुनर्वास का काम भी कई अनियमितताओं से भरा रहा है. मकानों,और कैटल शैडों के निर्माण में भारी गड़बड़ियां उजागर हो चुकी हैं

इस बीच पर्यावरण संरक्षण को लेकर दुनियाभर में जागरूकता जोर पकड़ रही थी. भारत सरकार भी वनों को संरक्षित करने के कार्यक्रम बनाने लगी. तब यह विचार प्रमुखता से सामने आया कि वनों की सुरक्षा के लिए आबादी को जंगलों से बाहर किया जाना सबसे जरूरी है. यह 70 के दशक के शुरुआती दौर की बात है. तब पहली बार विस्थापन के नजरिए से सरकार का ध्यान वन गूजरों की तरफ गया. उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गूजरों के विस्थापन के लिए बनाई गई कार्य योजना में इस सबका जिक्र किया गया है. इस दस्तावेज के मुताबिक वन गूजरों को सुनियोजित तरीके से बसाने का पहला प्रयास 1975 में किया गया था. इसके लिए गूजरों को जंगलों के बीच ही इस तरह से जमीन आवंटित किए जाने का विचार रखा गया, जिससे कि जंगल भी संरक्षित रह सकें और गूजरों को भी ज्यादा परेशानी न उठानी पड़े. लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हो सका. इसके बाद 1979 में गूजरों को जंगल से बाहर बसाने की पहल की गई. इस बार प्रत्येक गूजर परिवार को मकान बनाने के लिए 500 वर्ग मीटर तथा खेती के लिए एक हैक्टेयर जमीन देने का प्रावधान रखा गया. लेकिन इस पर गूजर सहमत नहीं हुए. उनका कहना था कि इतनी कम जमीन में न तो उनके जानवरों के लिए चारा होगा और न ही वे अपना पुश्तैनी काम छोड़ कर कोई दूसरा काम कर सकते हैं. पथरी रेंज में पुनर्वासित किए गए गूजरों में से एक शमशेर कहते हैं, ‘इतनी कम जमीन से अपना और अपने जानवरों का गुजारा कैसे किया जा सकता था? इसके अलावा गूजरों को कोई दूसरा काम भी नहीं आता था. इसलिए हमारे बड़े बुजुर्गों ने एक स्वर में इस प्रस्ताव का विरोध कर दिया.’ इसके दो साल बाद 1981 में गढ़वाल मंडल के गूजर परिवारों को जंगल से दूर बसाने की योजना बनाई गई. इसके लिए 50 हेक्टेयर जमीन की जरूरत थी. लेकिन तब सरकार इतनी जमीन नहीं ढूंढ़ पाई और यह मामला भी ठंडे बस्ते में चला गया.

इस बीच राजाजी राष्ट्रीय उद्यान की घोषणा हो जाने से देहरादून तथा सहारनपुर के बीच स्थित जंगल का बड़ा हिस्सा इसमें शामिल हो चुका था, लिहाजा इस परिधि में आने वाले गूजरों को उद्यान से बाहर करना अपरिहार्य हो गया. इसके लिए 1885 में प्रमुख वन सचिव उत्तरप्रदेश की अध्यक्षता में एक बैठक हुई, जिसमें निर्णय किया गया कि इन गूजरों के पुनर्वास के लिए योजना बनाई जाए. इसके बाद सरकार ने हरिद्वार जिले की पथरी रेंज में 512 गूजर परिवारों को बसाने का फैसला किया. इस योजना के तहत प्रत्येक परिवार के लिए दो कमरे, रसोई, नहाने का कमरा, शौचालय, स्टोर रूम तथा जानवरों को बांधने के लिए कैटल शेड बनाने का प्रावधान रखा गया. इस बीच शुरुआती आनाकानी के बाद कुछ गूजर परिवारों ने जंगल छोड़ कर पथरी में पुनर्वासित होने की दिलचस्पी दिखा दी. पिछले दो बार से इस बस्ती के प्रधान चुने जा रहे गुलाम मुस्तफा का परिवार भी इनमें से एक था. वे कहते हैं, ‘जिंदगी भर जंगलों में रहने के बाद हमें इतना समझ में आ चुका था कि अब भी अगर जंगल से बाहर नहीं आ पाए तो आने वाली पीढियों की बर्बादी तय है.’ वे बताते हैं कि देखा-देखी में दूसरे गूजर परिवार भी धीरे-धीरे जंगल छोड़ने लगे. इस बीच धीरे-धीरे गूजर परिवारों की संख्या 512 से कहीं ज्यादा हो गई. 1998 में की गई गणना के बाद केवल राजाजी उद्यान की परिधि में आने वाले गूजर परिवारों की संख्या ही 1390 तक पहुंच गई. लिहाजा इन परिवारों को भी बसाये जाने का काम शुरू हो गया. इन परिवारों को बसाये जाने के लिए पथरी में और जमीन नहीं थी इसलिए 613 परिवारों को पथरी की तर्ज पर ही हरिद्वार जिले में स्थित एक दूसरे स्थान गेंडीखत्ता में बसा दिया गया. इस तरह गूजरों के 1125 परिवारों का पुनर्वास इन दो जगहों पर कर दिया गया.

लेकिन 1998 के बाद गूजरों के पुनर्वास कार्यक्रम पर मानो ब्रेक-सा लग गया जबकि इस बीच राजाजी राष्ट्रीय उद्यान में रहने वाले वन गूजरों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हो चुकी थी. पथरी और गैंडीखत्ता में बसाये गए वन गूजरों के बाद भी गूजरों का एक बड़ा तबका विस्थापन की परिधि से बाहर रह गया. इसकी एक बड़ी वजह यही थी कि इन दो जगहों पर उन्हीं वन गूजरों का विस्थापन किया गया, जिनकी गणना 1998 में की गई थी. जबकि सरकार की तरफ से अंतिम गणना 2009 में की गई. इस गणना के बाद अकेले हरिद्वार के चीला वन प्रभाग में ही 228 गूजर परिवार ऐसे थे जिनका विस्थापन नहीं हो सका था. इसके अलावा दूसरे वनप्रभागों में भी गूजर परिवारों की अच्छी खासी संख्या मौजूद थी. लेकिन 1998 में हुए पुनर्वास कार्यक्रम के बाद सरकार ने अपना यह अभियान रोक दिया और जंगलों में रहने वाले गूजरों के परिवार लगातार उपेक्षित होने लगे.

‘ हमें आवंटित की गई जमीनों के पट्टे जब तक हमारे नाम नहीं किए जाते तब तक हमारे मन में कई तरह की शंकाएं बनी रहेंगी ‘ 

इस बीच कड़े वन कानून जंगल में रहने वाले वन गूजरों को मुश्किलों को लगातार बढ़ाते जा रहे थे. साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी चिंताएं भी गूजरों के लिए मुश्किलों का पहाड़ बनाने में लगी हुई थीं. इस सबके बीच रूलक संस्था ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष वजाहत हबीबुल्लाह को पत्र लिख कर उन्हें गूजरों की समस्या बताई. इसके बाद 16 मार्च, 2012 को देहरादून में आयोजित एक सम्मेलन में शिरकत करते हुए राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष हबीबुल्लाह वन गूजरों से रूबरू हुए. उन्होंने गूजरों से उद्यान में ही रहने या फिर पुनर्वास किए जाने की स्थिति में उनकी राय मांगी, जिस पर सभी वन गूजरों ने एक स्वर में जंगलों से बाहर आने की इच्छा जताते हुए अपने लिए उचित पुनर्वास की मांग की.

अवधेश कौशल कहते हैं, ‘जिन गूजरों का पुनर्वास हो चुका है उनके जीवन स्तर में आए परिवर्तन से सीख लेते हुए इन गूजरों को भी समझ में आने लगा था कि जंगलों से बाहर आकर ही उनकी भावी पीढि़यां समाज की मुख्यधारा में शामिल हो सकती हैं.’ गूजरों की राय जान लेने के बाद हबीबुल्लाह ने तीन अप्रैल 2012 को उत्तराखंड सरकार को एक पत्र लिखा. पत्र में उन्होंने सरकार से इन गूजरों का फौरन पुनर्वास करने और इनको अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने पर विचार करने की बात लिखी. इस पत्र की एक प्रतिलिपि भारत सरकार के जनजातीय कार्य एवं पंचायती राज मंत्रालय को भी भेजी गई थी जिसके बाद इस मंत्रालय ने भी उत्तराखंड सरकार से उचित कदम उठाने को कहा. इस पत्र के मिलने के लगभग एक साल बाद मई, 2013 में उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री विजयय बहुगुणा ने वनगूजरों के पुनर्वास के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाने की बात कही. मुख्य सचिव की अध्यक्षता में बनने वाली इस कमेटी को दो महीने में एक रिपोर्ट बनाने को कहा गया. इस रिपोर्ट में गूजरों के पुनर्वास समेत उन्हें विकास की मुख्यधारा में लाए जाने समेत कई जरूरी पहलुओं को शामिल किया जाना था. इससे अलावा वन गूजरों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने पर उचित फैसला लेने की बात भी मुख्यमंत्री ने कही. लेकिन इसके बाद एक लंबा दौर यूं ही बीत गया. सरकार के बयानों और आश्वासनों से थक चुके गूजरों ने इसके बाद भी सरकार पर दबाव बनाना जारी रखा. इस बारे में चीला रेंज के गूजर नेता इरशाद बताते हैं, ‘विभिन्न संगठनों एवं मंचों के जरिए हम लगातार सरकार पर दबाव बनाते रहे और अपनी मांग को लेकर अडिग बने रहे.’

इस बीच अल्पसंख्यक आयोग तथा केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भी गूजरों के विस्थापन को लेकर चल रही हीलाहवाली पर चिंता जता चुका था. इसके बाद सरकार ने नवंबर, 2013 में राजाजी राष्ट्रीय उद्यान में रह रहे वन गूजरों के 228 परिवारों के पुनर्वास को मंजूरी देते हुए एक शासनादेश जारी कर दिया. इस शासनादेश में इन परिवारों को हरिद्वार वन प्रभाग स्थित खानपुर रेंज के शाहमंसूर आरक्षित वन में बसाए जाने की बात कही गई. उस वक्त के अपर सचिव वन एवं पर्यावरण मनोज चंद्रन का कहना था कि इन गूजरों को एक माह में प्लॉट आवंटित कर फोटोयुक्त लैमिनेटड पहचान पत्र व कब्जा प्रमाण पत्र मुहैया करा दिया जाएगा. इस शासनादेश के बाद वनगूजरों के साथ ही पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम कर रहे लोगों की उम्मीदों को एक बार फिर से पंख लग गए.

उत्तराखंड में वन गूजरों की एक बड़ी आबादी आज भी जंगलों में रहती है और दुग्ध बेचकर अपना गुजारा करती है.

लेकिन इस सबके बाद भी गूजरों के पुनर्वास का मुद्दा वहीं रह गया. इस दिशा में चल रही कार्रवाई का सबसे ताजा सूरते हाल तो सरकार की मंशा पर कई तरह के सवाल खड़ा करता नजर आता है. बात इसी साल 22 मार्च की है. मुख्य सचिव की अध्यक्षता में वन विभाग के अधिकारियों की एक प्रमुख बैठक हुई. इस बैठक का एकमात्र उद्देश्य राजाजी राष्ट्रीय उद्यान में बचे रह गए वन गूजरों के परिवारों के पुनर्वास को लेकर निर्णय करना था. लेकिन इस बैठक से निकले नतीजे की जानकारी तो दूर की बात है, यह तक पता नहीं लग सका कि बैठक में किन बातों पर चर्चा की गई.

2013 में उत्तराखंड सरकार ने राजाजी नेशनल पार्क में रह रहे वन गूजरों के 228 परिवारों के पुनर्वास के लिए शासनादेश भी जारी किया, लेकिन गाड़ी फिर अटक गई

इस बारे में सूचना के अधिकार के तहत किए गए एक आवेदन के जवाब में वन विभाग ने जो बताया वह तो हैरान करने वाला है. पीपल फॉर एनिमल संस्था की कार्यकर्ता गौरी मौलेखी द्वारा मांगी गई इस सूचना पर वन एवं पर्यावरण अनुभाग के साथ ही वन विभाग ने अपने जवाब में कहा कि वन गूजरों को लेकर हुई बैठक का कार्यवृत्त मुख्य सचिव कार्यालय तथा वन विभाग के स्तर से तैयार किया जाना था, लेकिन दोनों ही स्तर पर इस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं की गई. इस जवाब का सीधा मतलब यह था कि विभाग ने वन गूजरों के पुनर्वास को लेकर उस बैठक में कुछ भी नहीं किया. वन विभाग के इस जवाब से प्रदेश के राज्य सूचना आयोग ने भी खासी नाराजगी जताई थी. गौरी मौलेखी द्वारा आयोग का दरवाजा खटखटाए जाने के बाद इस मामले की सुनवाई कर रहे सूचना आयुक्त प्रभात डबराल ने कड़ी टिप्पणी करते हुए इसे ‘स्वस्थ प्रशासन के लिहाज से बेहद निराशजनक’ माना.

बहरहाल राजाजी राष्ट्रीय पार्क में रह रहे वन गूजरों के पुनर्वास का मामला पूरी तरह से सरकारी उदासीनता की भेंट चढा हुआ है. यह भी तय है कि अगले कुछ दिनों में भी सरकार का जोर पंचायत चुनावों और विधानसभा के उपचुनावों की तरफ ही लगा रहेगा. इस बीच तहलका द्वारा पूछे जाने पर वन विभाग के उच्च अधिकारी फिर से एक नई योजना बनाने की बात कर चुके हैं. वन विभाग के इस जवाब का आशय यही है कि फिलहाल इन वन गूजरों को जंगलों में ही रहना होगा. बेशक कई लोग इसे वन गूजरों की नियति कह सकते हैं लेकिन मोहंड के पास स्थित जंगल में रहने वाले 78 साल के बुजुर्ग वन गूजर मोहम्मद आलम के शब्दों में कहें तो यह मसला नियति का नहीं बल्कि नीयत का है.

गति की अति!

दिल्ली के खिड़की एक्टेंशन मामले में आरोपित पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर धरने पर बैठे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल. फोटो: विकास कुमार

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महीना एक, विवाद अनेक. कुछ इसी तर्ज पर आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार ने बीती 28 जनवरी को दिल्ली में एक महीने का कार्यकाल पूरा कर लिया. पिछले एक महीने में अरविंद केजरीवाल आंदोलनकारी से ‘नायक’ मुख्यमंत्री बनते हुए अराजक, तानाशाह और न जाने क्या-क्या बन गए. पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक लक्ष्मीनगर से पार्टी विधायक विनोद कुमार बिन्नी जो पार्टी के दिल्ली में सत्ता में आने से पहले उसके एक मात्र जनप्रतिनिधि हुआ करते थे, जिनकी तारीफ करते हुए केजरीवाल और पार्टी के अन्य नेता अघाते नहीं थे, जिनके क्षेत्र में गठित की गई मोहल्ला सभा को पार्टी चुनाव से पहले आदर्श मॉडल के तौर पर प्रचारित करती रही और सत्ता में आने पर इसे पूरी दिल्ली में लागू करने का वायदा भी करती रही वे बिन्नी अब पार्टी से बाहर निकाले जा चुके हैं.

पार्टी के बीते 30 दिनों के लेखे-जोखे और उसकी बनती बिगड़ती तस्वीर को क्रमबद्ध तरीके से देखने- समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा. इसकी शुरुआत आठ दिसंबर के चुनाव परिणाम आने के साथ हुई थी. भाजपा 32 सीटों (अकाली दल की एक सीट शामिल है) के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी. इसके बावजूद उसने दिल्ली में सरकार बनाने से इंकार कर दिया. पार्टी का आकलन था कि चूंकि बहुमत उसे मिला नहीं है, ऐसे में जोड़-तोड़ करने के बाद ही उसकी सरकार प्रदेश में बन सकेगी. यूपी से लेकर झारखंड आदि में सत्तासीन होने के लिए तमाम नैतिक-अनैतिक तरीके अपना चुकी भाजपा ने अचानक से ही हज पर जाने का मूड बना लिया था. वह अब नौ सौ चूहों की मौत को भूलना चाहती थी. भाजपा ने तय किया कि चूंकि जनता से उसे पूर्ण बहुमत नहीं दिया है सो वह सरकार नहीं बनाएगी. यह सबको पता चल गया कि इस कुर्बानी की स्क्रिप्ट नरेंद्र मोदी ने आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर लिखी है.

भाजपा का ऐसा आकलन था कि यहां नैतिक दिखने, विधायकों की खरीद-फरोख्त से बचने का फायदा पार्टी को आगामी लोकसभा के चुनाव में मिलेगा. हालांकि यह उसी आप का नतीजा था जिसकी कॉपी भाजपा कर रही थी. बड़े फायदे को ध्यान में रखकर पार्टी ने नैतिकता का चोला ओढ़ लिया. भाजपा के इंकार करने बाद दिल्ली के उप राज्यपाल ने दूसरी सबसे बड़ी पार्टी आप को बुलाया. आप ने भी सरकार बनाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया. उनका भी तर्क यही था कि जोड़तोड़ कर वे कोई सरकार नहीं बनाएंगे. इसी बीच बड़ी खबर यह आई कि कांग्रेस अपने आठ विधायकों का समर्थन आप को देने को तैयार है.

आप के प्रस्ताव ठुकराने के बाद से ही चारों तरफ एक माहौल आप के पक्ष में बनने लगा. लोगों की धारणा थी कि आप को मौका नहीं चूकना चाहिए और सरकार बनाने का प्रयास करना चाहिए. हर तबके से ऐसे विचार आने लगे. लोग उस नई पार्टी की नई राजनीति को अपना समर्थन दे चुके थे. वे आप को वह सब कुछ करते हुए देखना चाहते थे जिसका उसने वादा किया था. दैनिक अखबार जनसत्ता के संपादक ओम थानवी की उस समय टिप्पणी थी, ‘केजरीवाल को निर्णय करना होगा. गेंद उनके पाले में है. पता नहीं क्यों अब मुझे लगता है कांग्रेस के दिलासे में छुपा जोखिम उन्हें उठाना चाहिए. जितना कर सकते हो, कर दिखाओ. कहीं नए तेवर की राजनीति और कुछ अलग काम देखने की लोगों की हसरत ही न बुझ जाए.’ थानवी जैसी भावना रखने वाले लोग उस समय दिल्ली और देश में बहुत थे.

उस समय ऐसे लोगों की भी एक बड़ी तादाद थी जो मानते थे कि अरविंद और उनकी टीम चूंकि सरकार चलाने के योग्य नहीं है, उन्हें विश्वास नहीं है कि वे सरकार चला पाएंगे, इस कारण वे सरकार बनाने से पीछे हट रहे हैं. ऐसा मानने वालों में भाजपा और कांग्रेस वालों की बहुतायत थी. कांग्रेस का अपना एक अनुमान यह भी था कि आप ने चुनावी घोषणापत्र में जो वादे कर रखे हैं, उन्हें पूरा कर पाना असंभव है इसलिए उसे आप को जनता के सामने एक्सपोज करने का यही सही मौका लगा. उम्मीदों का बढ़ता दबाव देखकर आप ने जनता की राय लेने की घोषणा की. अरविंद केजरीवाल ने जनता से सरकार बनाने को लेकर राय मांगी. जनता की राय आप की सरकार बनाने के पक्ष में आई. कांग्रेस अपने आठ विधायकों का समर्थन संबंधी पत्र पहले ही उपराज्यपाल के पास पहुंचा चुकी थी सो आप के सरकार बनाने का रास्ता साफ हो गया. दो दिनों बाद राज्यपपाल ने केजरीवाल को बतौर मुख्यमंत्री उनके छह कैबिनेट मंत्रियों के साथ रामलीला मैदान में शपथ दिलाई. अब विधानसभा में पार्टी को विश्वासमत हासिल करना था. जैसा कि सबको उम्मीद थी विधानसभा में भी पार्टी ने विश्वासमत हासिल कर लिया.

यहां से आम आदमी पार्टी की आलोचना का दूसरा और बेहद कड़ा दौर शुरू होता है. पहली आलोचना ही यह रही कि जिस कांग्रेस से न समर्थन लेने और न समर्थन देने की बात केजरीवाल कहते आए थे, आखिरकार उसी कांग्रेस के समर्थन से उन्होंने सरकार बना ली. इस मुद्दे को लेकर भाजपा सबसे ज्यादा हमलावर थी. पार्टी का कहना था कि वह शुरू से ही कहती आई थी कि केजरीवाल और उनकी टीम कांग्रेस की ‘बी’ टीम है और उनका एक मात्र उद्देश्य भाजपा को रोकना है. कांग्रेस से समर्थन लेने की बात पर कभी समाप्त न होने वाले विवाद की शुरुआत हो चुकी थी.

सरकार बनाने के साथ ही केजरीवाल सरकार पर चुनावी घोषणापत्र में किए गए वादों को लागू करने का भारी दबाव था. आप ने सत्ता में आते ही वीआईपी कल्चर को खत्म करने के अपने चुनावी वायदे पर तत्काल प्रभाव से अमल किया. मुख्यमंत्री और कैबिनेट ने न सिर्फ लाल बत्ती और सुरक्षा आदि लेने से इंकार कर दिया बल्कि सारे अधिकारियों के लिए लाल बत्ती लगाना मना कर दिया गया. सचिवालय की गाड़ियों से एक झटके में सारी लाल, नीली बत्तियां और सायरन गायब हो गए. अखबारों में ऐसी खबरें आईं जहां आप सरकार के मंत्रियों ने अपने दफ्तर, जिसमें अब तक पूर्व की कांग्रेस सरकार के मंत्री बैठते थे, को जरूरत से अधिक सुविधासंपन्न और विलासिता वाला बताते हुए उसे सामान्य बनाने का काम शुरू किया. इसी संदर्भ में अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया में एक तस्वीर छपी जिसमें सरकार के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया के कमरे से एक कुर्सी को बाहर ले जाया जा रहा था और दूसरी कुर्सी उनके बैठने के लिए लाई जा रही थी. तस्वीर के नीचे लिखा था, ‘मैं आरामदायक कुर्सी पर नहीं बैठना चाहता. इसीलिए सामान्य कुर्सी मंगाई गई है.’ प्रतीकों की राजनीति का यह चरम था.

सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में भी केजरीवाल और उनके साथी मेट्रो से शपथ लेने रामलीला मैदान पहुंचे थे. देश में यह पहली बार था जब मुख्यमंत्री और सरकार के मंत्री सार्वजनिक यातायात के साधनों का इस्तेमाल करते हुए शपथ लेने पहुंचे थे. सरकार जनता के बीच यह संदेश देने में सफल रही कि वह कहने के लिए नहीं वरन पूरी तरह से आम आदमी की सरकार है.

लेकिन उसी सरकार के आम से दिखने वाले चेहरे पर पहला प्रश्न उस समय खड़ा हुआ जब यह खबर आई कि सरकार के मंत्रियों को इनोवा गाड़ी दी गई है तथा मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जो कौशांबी स्थिति अपने घर से दिल्ली आना जाना करते थे उनके रहने और ऑफिस के लिए भगवान दास रोड पर एक-दूसरे से सटे डीडीए के 5-5 कमरे वाले दो ड्यूप्लेक्स घर को चुना गया है. खबर आई कि अरविंद ने भी इसमें शिफ्ट होने पर सहमति जता दी है.  विपक्ष के हाथ में यह खबर हथियार बन गई. पार्टी, सरकार और खासकर केजरीवाल की आलोचना शुरू हो गई. गाड़ी वाले मसले पर आलोचकों का कहना था कि जो लोग मंत्री बनने के लिए मेट्रो से पहुंचे थे और जिन्होंने कहा था कि वे आम लोगों की तरह ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफर करेंगे उन्हें एकाएक इनोवा की जरूरत क्यों पड़ गई. क्या मेट्रो से शपथ लेने जाना और आम आदमी की तरह सार्वजनिक परिवहन से सफर करना एक नाटक था? लोगों ने यह तर्क भी दिया कि पार्टी सत्ता में आने से पहले से कहती रही थी कि उसके नेता सरकारी गाड़ी और घर नहीं लेंगे. मनीष सिसोदिया इसके बचाव में सामने आए. उनका कहना था, ‘आप वीआईपी संस्कृति के खिलाफ है लेकिन सरकारी कारें लेने में कुछ भी गलत नहीं है.’ खैर, मनीष सिसोदिया और आप की सफाई के बाद भी मामला तूल पकड़ता गया. खासकर उस सोशल मीडिया पर जहां से पार्टी को जीवनदायी ऑक्सीजन मिलती थी.’

मीडिया और सोशल मीडिया में केजरीवाल निशाने पर आ गए. पहले उन्होंने सरकारी घर लेने से इंकार कर दिया था, लेकिन बाद में उन्होंने 5-5 कमरे वाले दो फ्लैट के लिए हामी भर दी. मीडिया में उन घरों के रंग-रोगन की तस्वीरें भी आईं. अगले तीन दिनों तक यह मामला राजनीतिक चर्चा का केंद्रीय विषय बना रहा. अखबारों से लेकर टीवी और सोशल मीडिया में ऐसी खबरें आने लगीं जिनमें बताया जाने लगा कि अरविंद को मिलने वाले दोनों डुप्लेक्सों को मिला दें तो उसका क्षेत्रफल दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बंगले के बराबर निकल आएगा.

चौतरफा दबाव में केजरीवाल ने वह घर लेने से इनकार कर दिया. उनका कहना था, ‘मुझे जनता से काफी संदेश मिले हैं और कुछ करीबियों के फोन भी आए हैं कि मुझे और छोटा घर चाहिए. पार्टी समर्थकों को मेरे लिए दिल्ली सरकार द्वारा तय किए गए आवास से चोट पहुंची है. जब तक मेरे लिए छोटा घर उपलब्ध नहीं हो जाता है, मैं कौशांबी स्थित आवास से ही कामकाज करता रहूंगा.’

जनभावनाओं और लोकप्रियता की राजनीति करने वाली नई-नवेली सरकार के लिए यह पहला झटका था. इस घटना ने एक और सच सामने रखा. सच यह कि आप के छोटे से छोटे कदम की भी बहुत निर्मम समीक्षा होगी, विपक्ष द्वारा भी और मीडिया द्वारा भी. हालांकि एक वर्ग का यह भी मानना था कि अरविंद को घर के मामले में पीछे नहीं हटना चाहिए था. उनके इस कदम से यह बात स्थापित हो गई कि केजरीवाल पॉपुलर मूड के खिलाफ नहीं जा सकते. जबकि सरकार में कई बार आपको ऐसे कदम उठाने पड़ते हैं जो लोकप्रिय राजनीति का हिस्सा नहीं होते लेकिन व्यवस्था और दीर्घकालिक हितों के लिए जरूरी होते हैं. केजरीवाल का सामना उस सच से भी हुआ कि जनभावनाओं की सवारी शेर की सवारी की तरह होती है. इसमें सफलता की जितनी गुंजाइश होती है, पलट कर चोट खाने का खतरा भी उतना ही ज्यादा होता है.

जैसे-तैसे घर और कार का मामला शांत पड़ा तो सरकार की महिला और बाल विकास मंत्री राखी बिडलान विवाद में घिर गईं. उनकी कार पर अज्ञात लोगों द्वारा हमले की खबर आई. पार्टी के लोगों का कहना था कि हमले में राखी को चोट तो नहीं नहीं आई मगर उनकी कार का शीशा टूट गया. एक बार फिर से मुख्यधारा और सोशल मीडिया में चर्चा होने लगी कि कैसे आप के नेताओं पर हमला करने की शुरुआत हो चुकी है. पार्टी के लोग कहते पाए गए कि जनता के बीच रहने और सुरक्षा लेकर न चलने के कारण राखी पर हमला हुआ है. चर्चा शुरू हो गई कि आप के मंत्रियों को न्यूनतम सुरक्षा लेने के बारे में सोचना चाहिए. जो लोग सुरक्षा संबंधी तामझाम के खिलाफ थे वे भी इस बात के पक्षधर होते दिखे.

लेकिन अगले ही दिन संवेदना की यह लहर उलटी दिशा में बहने लगी. पता चला कि राखी पर किसी ने हमला नहीं किया था बल्कि क्रिकेट खेल रहे बच्चों की गेंद उनकी गाड़ी के शीशे से टकरायी थी. इस घटना के तुरंत बाद बच्चे और उसकी मां ने सबके सामने राखी से माफी भी मांग ली थी. लेकिन इसके बावजूद राखी नहीं मानी, वे मंगोलपुरी थाने में शिकायत दर्ज करवाने पहुंच गईं. राखी के पिता पर भी बच्चे के परिवार को अपशब्द कहने के आरोप लगे. बाद में यह खबर भी आई कि बच्चे समेत उसके माता-पिता मंत्री से डरकर अपना घर छोड़कर चले गए हैं. इस खबर ने राखी बिडलान और आप को चौतरफा आलोचना के केंद्र में ला दिया. आरोप लगाए गए कि आप भी राजनीति के उसी घटिया संस्करण को कॉपी कर रही है जिससे लड़ने की वह बात करती रही है. उसके मंत्री सुरक्षा लेने के लिए खुद पर फर्जी हमले की कहानी बना रहे हैं.

आप की नई सरकार का हनीमून पीरियड अभी और कड़वा होना था. राखी बिडलान प्रकरण से पार्टी और सरकार जूझ ही रही थी कि पार्टी के वरिष्ठ नेता कुमार विश्वास के पुराने कवि सम्मेलनों में की गई टिप्पणियां पार्टी के गले की फांस बनने लगीं. दिल्ली विधानसभा में आप की ऐतिहासिक जीत के कुछ समय बाद ही कुमार विश्वास ने इच्छा जाहिर की कि वे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी से चुनाव लड़ना चाहते हैं. इसके बाद अचानक से सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर विश्वास के कवि सम्मेलनों की ऐसी क्लिपिंग्स आनी शुरू हो गईं जो पार्टी के लिए फजीहत का कारण बनने लगीं. 2008 के उनके कवि सम्मेलन का एक वीडियो सामने आया जिसमें विश्वास सिखों और मुसलमानों पर चुटकले कहते दिखाई दिए. क्लिप सामने आने के बाद दिल्ली में आप सरकार को समर्थन दे रहे जदयू के विधायक शोएब इकबाल ने इसकी तीखी आलोचना की और कुमार विश्वास से माफी मांगने और ऐसा ना होने की सूरत में सरकार से समर्थन वापस लेने की बात की. खैर आनन फानन में विश्वास ने ‘आहत’ हुए सभी लोगों से माफी मांग ली. पर यह अंत नहीं था. एक और क्लिप सामने आ गई जिसमें वे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते दिखे. फिर बवाल मचा, इस पर विश्वास ने सफाई देते हुए कहा कि चूंकि मोदी उस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे इसलिए उन्होंने उस कार्यक्रम में मोदी की तारीफ की थी. यह 2009 का वीडियो था. इसके चंद रोज बाद ही केरल की नर्सों को काली-पीली कहकर उनका अपमान करने वाली विश्वास की एक नई क्लिप सामने आई. वीडियो के सामने आने के बाद विरोध भी शुरू हो गया. एक ओर जहां कांग्रेस के सदस्यों ने आप के केरल ऑफिस पर पथराव और तोड़फोड़ किया, वहीं केरल के मुख्यमंत्री ऊमन चांडी ने भी कुमार विश्वास से माफी की मांग की. इसको लेकर केरल के कई शहरों में विश्वास और पार्टी के खिलाफ प्रदर्शन हुए.

हर दो चार दिन में उनके खिलाफ आ रहे आपत्तिजनक वीडियो के बारे में कुमार विश्वास का कहना है कि यह सबकुछ तभी से शुरू हुआ है जब से उन्होंने अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ने की घोषणा की है. आप के अन्य नेता भी विश्वास से इत्तफाक रखते हैं. मीडिया से बातचीत में विश्वास कहते हैं, ‘ये सारे क्लिप 2008-09 के हैं जिन्हें जानबूझकर और काट-छांट कर दिखाया जा रहा है. अगर ये सब गलत था तो लोग क्यों पिछले चार सालों से उन वीडियो को सामने नहीं ला रहे थे. 19 देशों में मैंने एक लाख घंटे की कविताएं पढ़ी है. विरोधियों को तय करना होगा कि वे मेरे कविता सम्मेलन पर चुनाव लड़ना चाहते हैं या फिर मुद्दों पर.’ अपने बचाव में विश्वास का कहना था कि कवि सम्मेलन में काफी कुछ स्क्रिप्टेड होता है. वहां कही गई बातें उनके अपने विचार नहीं हैं. विश्वास पर हो रहे हमले के दौरान उनकी पार्टी उनके साथ खड़ी रही लेकिन हाल ही में आप से जुड़ी मशहूर नृत्यांगना मल्लिका साराभाई ने उनकी जमकर आलोचना भी की.

मल्लिका ने कुमार विश्वास को एक अपरिपक्व नेता बताते हुए राहुल गांधी पर विश्वास के हमले की भी क्लास ली. साराबाई ने अमेठी में खुद को वहां का नौकर बताने वाले विश्वास के बयान की आलोचना करते हुए कहा, ‘विश्वास खुद फाइव स्टार होटल की सुविधा मांगते हैं. वे बिजनेस क्लास में चलते हैं. अमेठी में उनके साथ 300 कारों का काफिला गया. ऐसे में तो अमेठी की जनता को यह नौकर काफी महंगा पड़ेगा.’  इधर जब पत्रकारों ने विश्वास से मल्लिका के बयान पर प्रतिक्रिया मांगी तो उनका कहना था, ‘मैं जानता नहीं वे कौन हैं और मैं ये भी नहीं जानता कि ये पार्टी में कब आईं. पार्टी में एक करोड़ लोगों को लेना है. जिनको कॉल आई होगी, उनमें से ही एक होंगी. उनका स्वागत है. सब अपनी-अपनी बातें करेंगे मैं किस-किस का जवाब दूंगा.’

यहां से पार्टी और सरकार पर बाहर से हो रहे हमलों के अलावा पार्टी के भीतर ही नेताओं के बीच भी खींचतान शुरू हो गई.

पार्टी इस मामले में डैमेज कंट्रोल का प्रयास कर ही रही थी कि पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने अपने बयानों से एक नए विवाद का सूत्रपात कर दिया. भूषण का यह बयान कश्मीर को लेकर था. उनका कहना था, ‘यह अत्यंत जरूरी है कि हम लोगों के दिलों और मन को जीतें और अलगाव की भावना को उभरने से रोकें. इसके लिए सबसे पहले आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (आफ्स्पा) को हटाने की जरूरत है जो सेना को मानवाधिकार के उल्लंघन के मामलों में छूट प्रदान करता है. आंतरिक सुरक्षा के मामलों में सेना की तैनाती लोगों की मंजूरी के बाद ही होनी चाहिए.’ कश्मीर में सेना की उपस्थिति पर भूषण जनमतसंग्रह कराने की बात कर रहे थे. फिर क्या था. उनका यह बयान जंगल में आग की तरह फैल गया.

भूषण के इस बयान की भाजपा समेत तमाम पार्टियों और समूहों ने पुरजोर निंदा की. पुतले फूंके गए. आप पर देश विरोधी और सेना विरोधी होने के आरोप लगने लगे. पार्टी को समर्थन देने वाले युवाओं का एक बड़ा वर्ग सोशल मीडिया पर कश्मीर पर प्रशांत के बयान के बाद उसकी आलोचना करने लगा. चारों तरफ से दबाव बढ़ता देख पार्टी ने खुद को भूषण के बयान से अलग कर लिया. पार्टी का कहना था कि ये उनका निजी बयान है और पार्टी इससे इत्तेफाक नहीं रखती. लेकिन इस सफाई से भी बात न बनती देख पार्टी ने प्रशांत भूषण को अपना बयान वापस लेने के लिए किसी तरह मनाया. जिसके बाद उनका ये बयान आया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और इस तथ्य को चुनौती नहीं दी जा सकती है.

खैर, कश्मीर मामले पर प्रशांत भूषण और पार्टी की सफाई के बाद भी बात नहीं बनी. एक अनजान से संगठन ‘हिंदू रक्षा दल’ के लोगों ने पार्टी के कौशांबी स्थित दफ्तर पर हमला कर दिया. इस हमले शामिल लोगों की तस्वीरें प्रवीण तोगड़िया, अशोक सिंघल से लेकर अरुण जेटली तक के साथ सोशल मीडिया पर मौजूद हैं. अभी कश्मीर पर बयान को लेकर उठा बवंडर थमा भी नहीं था कि प्रशांत भूषण ने एक नए विवाद को जन्म दे दिया. इस बार उन्होंने नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षाबलों की तैनाती को लेकर जनमत संग्रह कराने की वकालत की. फिर से भूषण और आप विरोधियों के निशाने पर आ गए. इस बार भी पार्टी ने खुद को भूषण से अलग कर लिया.

खैर, जिस तरह से एक समस्या के खत्म होने से पहले ही दूसरी समस्या के जन्म देने की परिपाटी आप ने बनाई उसमें पार्टी का हर सदस्य दिलोजान से अपना योगदान देने के लिए आतुर था. केजरीवाल के कानून मंत्री सोमनाथ भारती भी विवादों की इस प्रतियोगिता में पूरे दमखम के साथ कूद पड़े. भारती से जुड़ा पहला विवाद तब सामने आया जब उन्होंने सचिवालय में दिल्ली कोर्ट के सभी जजों की बैठक बुलाने का आदेश अपने सचिव एएस यादव को दिया. सचिव ने ऐसा कर पाने में अपनी असमर्थता जताई. सोमनाथ पर यादव को भला बुरा कहने का आरोप लगा. कानून सचिव एएस यादव ने कानून मंत्री सोमनाथ भारती को कहा था कि न्यायपालिका दिल्ली सरकार के अधीन काम नहीं करती है और हाईकोर्ट ही दिल्ली के कोर्ट के जजों की बैठक बुला सकता है.

कानून के जानकारों ने कानून सचिव के समर्थन और सोमनाथ की अज्ञानता पर जमकर भड़ास निकाली. जैसे-तैसे यह मामला निपटा. लेकिन इसके निपटते ही भारती के पिटारे से एक नया विवाद निकल पड़ा. साल 2013 के अगस्त महीने में सीबीआई के स्पेशल जज ने एक मामले में सुनवाई के दौरान सबूतों से छेड़छाड़ करने को लेकर भारती को फटकार लगाई थी. जैसे ही यह मामला मीडिया की नजरों में आया भाजपा समेत तमाम विरोधियों ने इसे हाथों हाथ लपक लिया. उनकी पार्टी इस विवाद को सुलझाने की कोशिशों में लगी हुई थी. ऐसे कठिन समय में भारती ने विवादों की हैट्रिक लगाते हुए मामले को एक तरह से क्लाइमैक्स पर पहुंचा दिया. घटना सोमनाथ के विधानसभा क्षेत्र में आने वाले खिड़की एक्सटेंशन से जुड़ी थी.

इस विवाद को लेकर सोमनाथ का कहना यह था कि पिछले कई महीनों से खिड़की एक्सेंटशन के लोग वहां रह रहे अफ्रीकी नागरिकों की हरकतों से परेशान थे. क्षेत्रवासियों का कहना था कि इन विदेशी नागरिकों में से कई ऐसे हैं जो यहां ड्रग्स और सेक्स रैकेट चलाते हैं. इसकी शिकायत उन्होंने कई बार स्थानीय पुलिस थाने से लेकर पुलिस कमिश्नर तक से की थी, लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. 15 जनवरी की रात को खिड़की निवासियों ने भारती से एक शिकायत की कि एक घर में ड्रग्स और जिस्मफरोशी से जुडे लोग मौजूद हैं. उन्हें पुलिस के हाथों गिरफ्तार कराया जाना चाहिए. भारती के मुताबिक वे मुहल्लेवालों और अपने समर्थकों के साथ चिन्हित घर की तरफ चल पड़े. रास्ते में उन्होंने पुलिस को फोन किया तथा वहां रास्ते में मौजूद एक पीसीआर वैन को भी अपने साथ ले गए. उस घर के सामने पहुंचकर पुलिस के सामने ही भारती के समर्थकों ने एक व्यक्ति को फर्जी कस्टमर बनाकर उस घर में भेजा जहां जिस्मफरोशी करने वालों के होने की बात कही गई थी. वापस आकर उसने बताया कि हां, भीतर सेक्स रैकेट से जुड़े लोग हैं जो उससे पैसे की मांग कर रहे हैं. भारती का कहना है कि यह पूरी बात पुलिस को बताई गई और उनसे उस घर पर छापा मारकर उन लोगों को गिरफ्तार करने को कहा गया. लेकिन पुलिस ने किसी भी तरह की कार्रवाई करने से इंकार कर दिया. पुलिस का कहना था कि वह बिना वारंट के न तो उस घर को घेर सकती है और न ही किसी को गिरफ्तार कर सकती है. सोमनाथ के मुताबिक पुलिस के सामने ही ड्रग्स और देह व्यापार का प्रमाण मौजूद था लेकिन पुलिसवाले जानबूझकर कोई कार्रवाई नहीं कर रहे थे. थोड़ी देर बाद पुलिस वहां से निकल गई. इस घटना से जुड़ा एक वीडियो भी लोगों ने देखा जिसमें भारती पुलिस के एक अधिकारी को कार्रवाई करने के लिए कह रहे थे लेकिन वह उन्हें उनकी सीमा में रहने की नसीहत देता रहा.

भारती पर ये आरोप लगा कि सोमनाथ और उनके समर्थकों ने महिलाओं के साथ आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया. यह भी कि उन्होंने एक महिला को शौचालय तक नहीं जाने दिया और उसे सबके सामने पेशाब करने पर मजबूर किया. महिलाओं ने आरोप लगाया है कि मंत्री और उनके साथ मौजूद लोगों ने न केवल उनके साथियों के साथ मारपीट की बल्कि उन्हें घंटों गाड़ी में बंधक बनाए रखा. युगांडा की दो लड़कियों ने उनका जबरन मेडिकल करवाने और उन्हें प्रताड़ित करने की लिखित में शिकायत की. इस घटना ने दिल्ली पुलिस और पखवाड़े भर पहले ही सत्ता में आई आम आदमी पार्टी के बीच एक बड़ी लड़ाई का रास्ता तैयार कर दिया.

कुछ इसी तरह का मामला दिल्ली के सागरपुर इलाके में भी सामने आया. महिला एवं बाल विकास मंत्री राखी बिडलान का आरोप था कि एक दहेज पीड़िता को ससुराल वालों ने जलाकर मार डाला लेकिन पुलिस आरोपियों को गिरफ्तार करने की बजाय उन्हें बचाने का काम कर रही है. राखी का आरोप था कि वे उस महिला जिसे ससुराल वाले दहेज को लेकर बहुत पहले से प्रताड़ित कर रहे थे, की फरियाद लेकर कई बार पुलिस अधिकारियों से मिल चुकी थीं. लेकिन पुलिस ने ससुराल वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की और अंततः ससुराल वालों ने पीड़िता को जलाकर मार डाला.

पार्टी अपनी लगातार हो रही छीछालेदर से न सिर्फ त्रस्त थी बल्कि उसे इस बात का भी अहसास हो रहा था कि अगर ऐसे ही पुलिस वाले उनके मंत्रियों को अपमानित करेंगे तो वे किस मुंह और मनोबल के साथ काम करेंगे. जाहिर सी बात है पार्टी के भीतर इस पर राय बनने लगी कि कुछ करना जरूरी है. इसी बीच एक विदेशी महिला के साथ बलात्कार का मामला भी सामने आया. उसके साथ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास दिनदहाड़े सामूहिक बलात्कार हुआ.

आप ने तीनों विवादों को एक साथ जोड़ते हुए हमलावर मुद्रा अख्तियार कर ली. पार्टी की तरफ से कहा जाने लगा कि जब दिल्ली पुलिस का एसएचओ मंत्री की बात नहीं सुनता तो वह आम आदमी के साथ कैसा बर्ताव करता होगा. आप ने दिल्ली पुलिस के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. पार्टी को वह सूत्र मिल गया था जिसके जरिए वह अब तक लगातार हो रही फजीहत से बचने और हमलावर होने का खतरा उठा सकती थी. आप ने तीनों मामलों से जुड़े कुल पांच पुलिस अधिकारियों को सस्पेंड करने या ट्रांसफर करने की मांग रखी. दिल्ली पुलिस को राज्य सरकार के अधीन लाने की बात पार्टी पहले ही पार्टी अपने चुनावी घोषणापत्र में कर चुकी थी. पार्टी को यह मुद्दा तो उठाना ही था लेकिन यह मौका इतना जल्दी आ जाएगा इसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी. पार्टी ने अपने अपमान को दिल्ली की आम जनता के अपमान से  जोड़ दिया.

पांच पुलिस वालों को सस्पेंड कराने का महाअभियान शुरु हो गया. पहले पार्टी नेता इसे लेकर दिल्ली के पुलिस कमिश्नर के पास गए. कमिश्नर ने जिम्मेदार पुलिस वालों पर जांच रिपोर्ट आने से पहले कार्रवाई करने से इंकार कर दिया. पार्टी नेता उसके बाद गृहमंत्री से जाकर मिले. वहां भी उन्हें निराशा हाथ लगी. दोनों जगहों से ना में जवाब मिलने के बाद अरविंद केजरीवाल भड़क गए. अब वे खुद को पहले से ज्यादा अपमानित महसूस कर रहे थे. मामला अब न्याय-अन्याय से ज्यादा आत्मसम्मान और अहं का बन गया था. ऐसी हालत में पार्टी ने अपने सबसे आजमाए हुए नुस्खे पर अमल किया.

आप के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘पुलिस व्यव्स्था को दुरुस्त करने से ज्यादा मामला आत्मसम्मान का था. लोग हमें देख रहे थे. कार्यकर्ता हमें देख रहे थे. वे देख रहे थे कि हम पुलिस के सामने कितने निरीह और लाचार हैं. कोई हमारी नहीं सुन रहा और एक सामान्य सा पुलिसकर्मी हमारे मंत्री को धमका रहा था. अगर मुख्यमंत्री तीन एचएचओ का ट्रांसफर नहीं करा सकता तो फिर ऐसे मुख्यमंत्री की हैसियत क्या रहेगी. आप बताइए ऐसी सरकार को कौन गंभीरता से लेगा?  आप ने इस सोच की रोशनी में अनशन को आखिरी विकल्प माना.’

हालांकि रेल भवन के सामने अरविंद और उनकी सरकार के धरने को लेकर एक वर्ग  मानता है कि अरविंद को अपने पद और प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए औपचारिक तरीके से अपनी बात रखनी चाहिए थी. पार्टी के कई नेता भी इस राय से सहमत थे लेकिन वे साथ में परिस्थिति का हवाला भी देते हैं. उनका मानना है कि अगर सामान्य परिस्थिति होती तो शायद उन्हीं औपचारिक तरीकों का प्रयोग किया जाता जिनकी बात आलोचक कर रहे हैं. लेकिन चूंकि मामला सरकार के अपमान और उसके इकबाल से जुड़ा था इसलिए मजबूरन पार्टी को आक्रामक होना पड़ा. राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेश पंत भी इस विचार से समहत दिखते हैं. वे कहते हैं, ‘यह बेहद शर्मनाक है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री को एक एसएचओ अपमानित करे. मुझे यह बात बहुत अजीब लगती है जब लोग कहते हैं कि सरकार चलाने का यह कोई तरीका नहीं है. क्या सरकार चलाने का तरीका वो है जैसे लालू ने बिहार में सरकार चलाई या अब मुलायम यूपी और ममता बंगाल में चला रही हैं?’

पार्टी में मतभेद
सरकार बनने के बाद से ही एक तरफ जहां पार्टी और सरकार अलग-अलग विवादों, समस्याओं और चुनौतियों से जूझ रहे हैं वहीं पार्टी नेताओं में आपसी विवाद और मतभिन्नता भी एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है. कुमार विश्वास और मल्लिका साराभाई के बीच का विवाद हो या फिर पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे विनोद कुमार बिन्नी के पार्टी नेतृत्व पर उठाए गए सवाल,  जबसे पार्टी सत्ता में आई है तबसे इसकी अनुशासन की डोर लगातार कमजोर होती दिखाई दे रही है. जानकार लोग इसे सत्ता में आने का स्वाभाविक दोष मान रहे हैं. ऐसे में स्वाभाविक है कि कुछ लोग नेतृत्व से नाराज होते भी दिखाई दें.

दिल्ली में ऐतिहासिक प्रदर्शन के बाद से ही पार्टी से जुड़ने को बेताब लोगों की लाइन लगी हुई है. एक तरफ जेएनयू में प्रोफेसर और पिछले 40 सालों से वामपंथी संगठन सीपीआई के सदस्य रहे कमल मित्र चिनॉय आप ज्वाइन कर रहे हैं तो वहीं खुले मार्केट के पैरोकार और देश में सस्ती विमान सेवा मुहैया कराने वाले एयर डक्कन के संस्थापक कैप्टन गोपीनाथ भी पार्टी की नाव पर सवार हो गए हैं. इनके साथ ही देश की बड़ी आईटी कंपनी इंफोफिस के बोर्ड मेंबर रहे बालाकृष्णन, बैंकर और रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड (आरबीएस) की पूर्व सीईओ और अध्यक्ष मीरा सान्याल, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पोते आदर्श शास्त्री और लेखिका एवं आंदोलन के समय से ही टीम केजरीवाल की आलोचक रही अरुंधति रॉय की मां ने भी आप का दामन थाम लिया है.

यानी हर तरह के लोग पिछले एक महीने में पार्टी से जुड़े हैं. कई जानकारों की मानें तो यह स्वाभाविक है कि जितनी विविधता वाले लोग पार्टी में शामिल होंगे उतनी ही मतभिन्नता भी दिखाई देगी. इसका नमूना तब दिखा जब  केजरीवाल ने खुदरा बाजार में एफडीआई का विरोध किया तो कैप्टन गोपीनाथ ने इसे गलत बताया. ऐसे में यह संभावना प्रबल है कि आने वाले समय में पार्टी के भीतर खींचतान और बढ़ेगी. एक साक्षात्कार में इस सवाल का जवाब देते हुए केजरीवाल कहते हैं, ‘बिलकुल बढ़ेगी. जब समाज में विविधता है तो पार्टी में भी होगी. यह पार्टी शिवजी की बारात की तरह है. इसमें आपको हर तरह के लोग दिखाई देंगे.’

बड़ी संख्या में पार्टी से जुड़ रहे लोगों के कारण जहां एक तरफ पार्टी का विस्तार हो रहा है तो वहीं कुछ नई चिंताएं भी देखने को मिल रही हैं. तहलका ने इस दौरान पार्टी के कई पुराने  कार्यकर्ताओं से बात की. आंदोलन के शुरुआती दौर से ही साथ रहे कुछ कार्यकर्ताओं में अपनी पार्टी के प्रति कुछ नाराजगी दिखाई देती है.

सूरजभान आरके पुरम में पार्टी के एक कार्यकर्ता हैं. पार्टी बनने के बाद से ही वे अपनी विधानसभा में सक्रिय थे, लेकिन अब वे कुछ मायूस हैं. कहते हैं, ‘अब शायद पार्टी को हमारी जरूरत नहीं रही. दिल्ली का चुनाव जीतने के बाद बड़ी संख्या में नए लोग पार्टी से जुड़े हैं. वरिष्ठ नेता नए लोगों को ही ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं. हम तो नींव के पत्थरों जैसे चुपचाप पार्टी को मजबूत करने के लिए जमीन में धंस गए.’ आरके पुरम से चुनाव लड़ी शाजिया इल्मी पर आरोप लगाते हुए वे कहते हैं, ‘मैडम को जिताने के लिए हम लोगों ने दिन-रात एक कर दिया. दुर्भाग्य से वे 326 वोटों से हार गई. बस फिर क्या था. वे अपनी हार का ठीकरा हमारे ही सर फोड़ रही हैं. हम लोगों को पार्टी की हर गतिविधि से दूर रखने की कोशिश की जा रही है. मेरे जैसे सैकड़ों लोग इस विधानसभा में हैं.’ कुछ कार्यकर्ता ऐसे भी हैं जो आरोप लगाते हैं कि पूरी पार्टी चार दोस्तों अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और कुमार विश्वास के हाथों में सिमट गई है. यही चारों सबकुछ तय कर रहे हैं.

लोकसभा चुनाव और हड़बड़ी
दिल्ली विधानसभा के उत्साहजनक नतीजों के बाद से ही आप राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए बेताब है. पार्टी के नेताओं ने कई बार ऐलान किया कि पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव पूरे देश में  लड़ेगी. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक उनकी मंशा लगभग 300 सीटों पर किस्मत आजमाने की है. पार्टी के इस कदम को सराहने वाले और इसे जरुरी बताने वाले लोगों की कमी नहीं है. ऐसे लोग आम आदमी पार्टी को बदलाव का विकल्प मानते हैं. दिल्ली की जनता ने यह साबित करके दिखाया है. पार्टी नेता योगेंद्र यादव भी कहते हैं, ‘पूरा देश बदलाव चाहता है. ऐसे में हम पीछे नहीं हट सकते.’

लेकिन पार्टी की इस मंशा के आलोचक भी कम नहीं हैं. आलोचकों की नजर में आप बहुत हड़बड़ी में है. ऐसे लोग आप को ‘आधी छोड़ पूरी को धावे, आधी मिले न पूरी पावे’ वाली कहावत के चश्मे से देख रहे हैं जो कि कुछ हद तक सही भी है. पार्टी को पहले दिल्ली में खुद को साबित करने पर ध्यान लगाना चाहिए था क्योंकि उन्होंने पहाड़ सरीखे जो वायदे किए हैं उन्हें पूरा करना असंभव तो नहीं लेकिन ऐसा करने के लिए कड़ी मेहनत और समय दोनों की दरकार होगी. दिल्ली में बेहतर काम करके पार्टी एक उदाहरण प्रस्तुत कर सकती थी. लेकिन ऐसा न करके पार्टी जो अभी देश के ज्यादातर हिस्सों में ठीक से अपने पैरों पर खड़ी भी नहीं हो सकी है, पूरे देश में सत्तासीन होने का सपना देख रही है. सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी के आदित्य निगम कहते हैं, ‘पार्टी क्षमता से ज्यादा तेज गति से दौड़ रही है. उसने खुद के लिए असंभव लक्ष्य और समयसीमा तय कर रखी है.’

फिलहाल आम आदमी पार्टी लोकसभा चुनावों में चमत्कार करने को लेकर उत्साहित है. देश भर से लोगों को जोड़ने के लिए वह मुफ्त सदस्यता का एक बड़ा अभियान ‘मैं भी आम आदमी’ चला रही है. इसके तहत उसने 26 जनवरी तक एक करोड़ लोगों को पार्टी से जोड़ने का लक्ष्य तय किया था. पार्टी नेता गोपाल राय के मुताबिक पार्टी अपने इस लक्ष्य में सफल हुई है और अब तक उससे कुल एक करोड़ पांच लाख लोग जुड़ चुके हैं. हालांकि पार्टी की इस मेंबरशिप ड्राइव की प्रामाणिकता पर कुछ सवाल भी खड़े हुए हैं. पार्टी से जुड़ने वाले नामों में बराक ओबामा, जवाहर लाल नेहरु, मार्क जुकरबर्ग, अटल बिहारी बाजपेयी, इंदिरा गांधी, नरेंद्र मोदी से लेकर राहुल गांधी तक के नाम शामिल हैं. इस हिसाब से अगर देखें तो यह पूरा अभियान ही संदेह के घेरे में आता है.

ये सारी घटनाएं सिर्फ पिछले एक महीने के दौरान घटी हैं. आप के एक महीने के कार्यकाल का हर दिन किसी न किसी विवाद के नाम रहा है. इसने पार्टी की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया है. पार्टी के कुछ नेता भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि पिछले एक महीने में पार्टी नेताओं और सरकार से उपजे विवादों ने लोगों के बीच में पार्टी की मजबूत स्थिति को चोट पहुंचाई है. हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि जनता का विश्वास पूरी तरह से टूट चुका है. पार्टी को लेकर लोगों के मन में उठ रहे सवालों का प्रत्यक्ष उदाहरण पार्टी को मिल रहे ऑनलाइन चंदे में तेजी से आई गिरावट भी है. मसलन दो जनवरी को जहां पार्टी को 50 लाख रु का चंदा मिला था वहीं 16 जनवरी तक आते-आते यह रकम गिरकर एक लाख 60 हजार पर सिमट गई. पार्टी के नेता भी डोनेशन में आई गिरावट को इस दौरान पैदा हुए विवादों से जोड़कर देखते हैं.

जो काम किया
विवादों से भरे-पूरे पिछले एक महीने के कार्यकाल में आप के नाम कई उपलब्धियां भी दर्ज हैं. इस दौरान सरकार ने वीआईपी कल्चर खत्म करने, बिजली के रेट कम करने, 700 लीटर प्रतिदिन मुफ्त पानी देने, बिजली कंपनियों का कैग ऑडिट करने, रैन बसेरों का विस्तार करने जैसे कई जनहित के निर्णय लिए हैं.  कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने वाले केजरीवाल लगातार यह आलोचना झेल रहे हैं कि वे जानबूझकर कांग्रेस शासन के दौरान हुई गड़बड़ियों की जांच नहीं करा रहे हैं. हालांकि केजरीवाल ने खुद ही कॉमनवेल्थ गेम्स तथा दिल्ली जल बोर्ड से जुड़े मामलों पर कार्रवाई करने का इशारा किया. एक साक्षात्कार में अरविंद कहते हैं, ‘मैं दोनों मामलों की फाइल खुद ही देख रहा हूं. जल्द ही कांग्रेस को इस बात का अफसोस होगा कि उसने क्यों हमारा समर्थन किया. इन मामलों में नेता से लेकर अधिकारी किसी को नहीं छोड़ा जाएगा.’ आदित्य निगम कहते हैं, ‘यह पहली बार हो रहा है कि किसी पार्टी ने आकर यथास्थिति को तोड़ने की कोशिश की है.’

यह भी एक तथ्य है कि पार्टी और सरकार से जुड़े विवादों के शोर में सरकार की उपलब्धियां कहीं खो सी गई लगती हैं. मीडिया से बातचीत में केजरीवाल अपनी पीड़ा जाहिर करते हैं, ‘पिछले 20 दिनों में हमने जितना काम किया है वह ऐतिहासिक है. लेकिन फिर भी हमारी आलोचना हो रही है. दिल्ली के साथ ही बाकी चार राज्यों में बनी सरकारों से कोई नहीं पूछता कि उन्होंने पिछले 20 दिनों क्या किया है.’ अरविंद कहते हैं कि ऐसा पहली बार हो रहा है जब देश के लोगों ने चुनावी घोषणापत्र को गंभीरता से लिया है. यह हमारी कामयाबी है.

आलोचनाओं के साथ आप का चोली दामन का साथ रहा है. आंदोलन के समय में उनकी इस बात के लिए आलोचना होती थी कि वे सड़क पर कानून बनाना चाहते हैं. तब दूसरी राजनीतिक पार्टियों का कहना था कि कानून बनाना है तो वे राजनीति में क्यों नहीं आते. केजरीवाला राजनीति में आए तो नेताओं का एक वर्ग उनका यह कहकर आलोचना करने लगा कि ये लोग सत्ता के भूखे है, इनकी राजनीतिक महात्वाकांक्षाएं हैं. चुनाव में उन्होंने प्रत्याशी चयन के लिए नया तरीका निकाला तो पार्टियों ने मजाक उड़ाया कि ऐसे चुनाव नहीं लड़े जाते. चुनाव परिणाम आए तो वह भाजपा जिसके पास सबसे अधिक सीटें आई थीं वह सरकार बनाने से पीछे हट गई और भाजपा के नेता उल्टे आप पर आरोप लगाने लगे कि वह सरकार बनाने से भाग रही है. जैसे ही आप ने सरकार बनाई तो वही भाजपा के लोग इस बात की आलोचना करने लगे कि कांग्रेस से समर्थन क्यों लिया. प्रदेश में बलात्कार होने पर लोग सरकार को घेर रहे हैं लेकिन वहीं सरकार जब सुरक्षा के लिए जिम्मेदार पुलिस को जवाबदेह बनाने के लिए घेर रही है तो उसकी आलोचना हो रही है. पार्टी से नए-नए जुड़े कमल मित्र चिनॉय तहलका से बातचीत में बताते हैं कि पार्टी के लोगों और विधायकों को विधिवत प्रशिक्षण की जरूरत है. वे कहते हैं, ‘यही 1922 में चौरी चौरा में हुआ था जिसके कारण महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था. हमें इससे सीख लेनी होगी.’

पार्टी के चाणक्य कहे जाने वाले योगेंद्र यादव को पार्टी और सरकार के सामने मौजूद चुनौतियों का भान है. वे कहते हैं, ‘हर सुबह उठने के बाद यह एहसास और गहरा होता है कि जूता कितना बड़ा है और हमारा पांव कितना छोटा.’

भले ही अभी जूते और पांव का मेल ठीक से नहीं बैठ रहा हो, लेकिन आम आदमी पार्टी के सामने इस अधूरे संयोजन के साथ ही ठीक से कदम बढ़ाने की चुनौती है.

‘महिलाओं पर अंगुली उठाना हमेशा से आसान रहा है’

Patralekhaa
पत्रलेखा, मॉडल अभिनेत्री (24 वर्ष)

क्या अभिनय का ख्वाब बचपन से ही था?
मैं शिलॉन्ग में पली लेकिन मेरी स्कूली शिक्षा बेंगलुरु के बिशप कॉटन कान्वेंट स्कूल में हुई. बोर्डिंग के दिनों में हम पढ़ाई के अलावा तमाम गतिविधियों में हिस्सा लेते थे और मेरा उनकी ओर तगड़ा झुकाव हो गया. इसमें खेल और ड्रामा शामिल थे. लेकिन कभी भी मैंने यह नहीं सोचा कि मैं मॉडल या अभिनेत्री बनूंगी.

तो बॉलीवुड में कैसे आना हुआ?
मेरे परिवार का झुकाव शिक्षा की ओर था. मैं ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए मुंबई चली गई और चार्टड अकाउंटेंट बनने की योजना बनाने लगी. उसी दौरान मैंने विज्ञापनों में काम शुरू किया. जल्दी ही मुझे कास्टिंग डायरेक्टर्स के फोन आने लगे कि मैं ऑडीशन दूं. लेकिन मैं फिल्मों में पूरी तैयारी से आना चाहती थी. मैंने दो साल का ब्रेक लिया और कॉलेज की शिक्षा पूरी की. इस बीच मैंने  तमाम अप्रेंटिश और वर्कशॉप आदि किए. जब मुझमें आत्मविश्वास आ गया तो मैंने फिल्मों के लिए ऑडीशन देना शुरू किया. इस तरह मुझे सिटीलाइट्स में काम मिला.

सिटीलाइट्स में आपकी भूमिका काफी सघन है. इसके लिए क्या तैयारी करनी पड़ी?
मैंने राखी की भूमिका निभाई है जो राजस्थान के एक गांव की रहने वाली है. यह भूमिका मेरे निजी जीवन से एकदम उलट थी. उसकी मनःस्थिति को समझने के लिए हंसल सर ने हमें तीन सप्ताह के लिए राजस्थान के पाली गांव में भेजा. हमने वहां स्थानीय लोगों के साथ वक्त बिताया और उनके रहन सहन तथा बोली-भाषा पर ध्यान दिया.

कहा गया कि आपको यह भूमिका राजकुमार राव से रिश्ते के कारण मिली है. आप इसे लैंगिक भेदभाव मानती हैं?
बिल्कुल. महिलाओं पर अंगुली उठाना हमेशा से आसान रहा है. आपने कितनी बार ऐसा देखा है कि किसी अभिनेता को वरिष्ठ अभिनेत्री के साथ करियर शुरू करने पर कठघरे में खड़ा किया गया हो? लेकिन मैं इसके लिए मानसिक रूप से तैयार थी और मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. लोगों ने यह तक ध्यान नहीं दिया कि इस भूमिका के लिए मैंने छह बार ऑडीशन दिया लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि मैंने अच्छा काम किया है. हंसल मेहता और मुकेश भट्ट जैसे फिल्मकार किसी को इसलिए काम नहीं देते कि वह फिल्म के नायक की गर्लफ्रैंड है.

क्या आप फिल्म की रिलीज से पहले घबराई हुई हैं?
नहीं मैं आत्मविश्वास से भरी हुई हूं. व्यक्तिगत तौर पर कहूं तो मुझे घर पर खाली बैठने से डर लगता है. मैं अपने संघर्ष भरे दो सालों की बहुत कद्र करती हूं. मैं उन्हें दोबारा नहीं जीना चाहती

‘नॉस्टेल्जिया और स्मृति में फर्क है’

 

himanshu

आपकी कहानियों की तरह इस उपन्यास में भी त्रासद विडम्बनाओं, विद्रूपताओं पर हंसने की प्रवृत्ति स्पष्ट तौर पर दिखती है. बार-बार ये प्रवृत्ति कहां से आती है?  क्या आप इसे सायास अपनी शैली के बतौर लाते हैं?
मैं और बहुत से लोग इस तरह सोचते हैं कि बहुत गंभीर बात को अगर आप बिल्कुल गंभीर मुद्रा में कहेंगे तो शायद वो अपना असर कम कर देती है. मैं कोशिश करता हूं कि बहुत गंभीर मुद्दों को भी जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों से हल्के-फुल्के ढंग से पेश किया जाए लेकिन इसमें खतरा भी है कि कहीं आप प्रवाह में न बह जाएं. इसमें संतुलन रखना पड़ता है कि कहीं ऐसा न हो कि आपका हलका-फुलका लहजा आपकी गंभीरता पर भारी पड़ जाए या आपकी गंभीरता जीवन के रस पर भारी पड़ जाए. किसी भी दुख को अगर आप एकदम दुखी मुद्रा में, दुखी स्वर से चुनौती देंगे तो शायद आप उससे जीत नहीं पाएंगे. उसको पराजित करने का तरीका यह भी होता है कि आप उसकी औकात कम कर दें.

असल जिंदगी में आप बेहद कम बोलने वाले, चुनिंदा दोस्त बनाने वाले, देर में खुलने वाले आदमी के बतौर जाने जाते हैं. जबकि आपके पात्र बेहद शरारती, हंसोड़ और बतरस से भरे हुए दिखाई देते हैं तो इस विरोधाभास की तह में क्या है?
मैं सोचता हूं कि किसी भी आदमी के अंदर सिर्फ एक मिजाज का आदमी नहीं होता है. हो सकता है कि सरसरी तौर पर देखने पर वो एक ही रंगवाला लगे लेकिन उसके अंदर विभिन्न रंग, विभिन्न धाराएं और विभिन्न छवियां होती हैं. अब ये अलग बात है कि हम अपने सामाजिक जीवन में अपने लिए एक तरह की मुद्रा तय कर लेते हैं. लेकिन असल में जैसे जिंदगी, यथार्थ और इंसान तरह-तरह के रंगों से निर्मित होता है वैसे ही पात्र भी होते हैं. इसलिए आप देखेंगे कि मेरी रचनाओं में पात्र में जहां हास्य ज्यादा बढ़ने लगता है, खिलंदड़पन बढ़ता जा रहा होता है ठीक उसी वक्त आपको मिलेगा कि वह सीधे कविता के धरातल पर चला जाता है या विडम्बना के तनाव को दर्ज करने लगता है. और अपनी बात करूं तो ऐसा कतई नहीं है कि मैं हंसोड़ नहीं हूं बस इतना जरूर है कि मैं अपने करतब और अपने बारे में खुद बहुत ज्यादा बोलना पसंद नहीं करता.

इस उपन्यास में जगह-जगह पात्र खुद आकर अपना पक्ष रखते हैं. इस युक्ति के प्रयोग के पीछे क्या वजह थी?
इसकी जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि मुझे लगता है और आज ये मान्य धारणा है कि किसी भी चीज का सिर्फ एक ही पाठ नहीं होता. आप उसको एक नजरिए से देख रहे हैं कोई दूसरा दूसरे नजरिए से देख सकता है और ये यथार्थ को गड़बड़ नहीं करते हैं बल्कि किसी चीज के एक से ज्यादा पाठ यथार्थ को स्पष्ट करने में मदद ही पहुंचाते हैं, और उसे विस्तार भी देते हैं. इसके अलावा उपन्यास को स्फीति- शब्दों की फिजूलखर्ची से बचाने के लिए भी मुझे ऐसा करना पड़ा. जैसे अगर मैं ऐसा न करता तो किसी एक चीज के अलग-अलग डायमेंशन्स को दिखाने के लिए अलग अध्याय रचने पड़ते.

bookइस उपन्यास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पात्र है चाचा जिसका इस तथाकथित विकास से मोहभंग हो चुका है और वो आत्मनिर्वासन चुनता है, क्या आप मानते हैं कि जिस व्यवस्था में हम जी रहे हैं वहां हर संवेदनशील या रियलाइजेशन रखने वाले व्यक्ति की नियति चाचा बन जाना ही है?
चाचा बनना हर व्यक्ति की नियति नहीं है. उत्तर पूंजीवाद की दौड़ में सब दौड़ रहे हैं, सबको इसका फायदा लेना है. इस अंधी दौड़ का नकार चाचा का अपना चयन है. उसके मुताबिक वह इसे बदल नहीं सकता लेकिन वह ये अहसास कराना चाहता है कि इस धरती पर कोई एक ऐसा भी है जो इसके अधिपत्य को स्वीकार नहीं करता. ये व्यवस्था से मुक्ति का रास्ता नहीं है. इस चरित्र के जरिए प्रतिरोध की चेतना दिखलाना मेरा उतना मकसद नहीं था जितना उस पीड़ा को दिखाना था जो आधुनिकता, विकास द्वारा किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को अकेला, निहत्था कर दिए जाने से पैदा होती है. अकेले किया गया कोई प्रतिरोध बड़ा सामाजिक परिवर्तन नहीं कर सकता. चूंकि इस व्यवस्था और आधुनिकता-पूंजीवाद का प्रतिरोध करने के लिए हमारे समाज में व्यापक रूप से कोई एकजुटता नहीं दिखाई पड़ रही है ऐसे में जो इसे नकारता है उसकी नियति हो सकती है कि वो चाचा जैसा हो जाए.

आधुनिकता और विकास को लेकर जो सवाल उपन्यास में उठाए गए हैं, गांधी ने भी उन सवालों को अपने ढंग से उठाया था तो क्या उपन्यास को रचते समय गांधी कहीं जेहन में थे?
निश्चित रूप से गांधी मेरे दिमाग में थे और इसीलिए एक अध्याय का शीर्षक बतर्ज हिन्द स्वराज है. वो पुस्तक भी एक तरह से इसी आधुनिकता की आलोचना थी. इसीलिए उस अध्याय का फॉर्मेट भी हिन्द स्वराज की तरह ही रखा गया है. इस अध्याय में विचार के स्तर पर, दर्शन के स्तर पर और सौन्दर्य चेतना के स्तर पर आधुनिकता को समस्याग्रस्त करने की कोशिश मैंने की है.

आप हमेशा कहते रहे हैं कि आप अपनी राजनीतिक चेतना या अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए रचना नहीं करता. फिर इस अध्याय में जब पात्रों के बीच आधुनिकता, विकास और समाज जैसे मुद्दों को लेकर गंभीर बहस हो रही है क्या तब भी आपकी अपनी सोच रचना में नहीं आई?
मैं अपने विचार चरित्रों पर नहीं लादता. ऐसा भी नहीं है कि लेखक के विचार रचना में आते नहीं हैं. लेकिन उन विचारों को चरित्र और यथार्थ नियंत्रित करते हैं. बुरा तब होता है जब चरित्र और यथार्थ को विचार अपने हिसाब से नियंत्रित करने लगे. ऐसा नहीं है कि विचार कोई रचना विरोधी चीज होती है लेकिन अगर विचार यथार्थ से बाहर तैरता दिखाई देगा या उसकी संवेदना को डैमेज करेगा तो मैं उसे एक रचना विरोधी कार्रवाई मानता हूं.

उपन्यास में एक जगह बिना नाम लिए पासिंग रेफरेंस के तौर पर नरेन्द्र मोदी का जिक्र आया है जबकि कई प्रसंगों में बहुत से नेताओं का बकायदा नाम आया है तो मोदी से गुरेज की क्या वजह थी?
मैं मोदी पर लिखने के लिए रचना नहीं कर रहा था. मुझे पुनरुत्थानवाद, आधुनिकता और विकास का जो स्वीकृत मॉडल है उसकी गहराई में जाकर उसे देखने और प्रकट करने का प्रयास करना था. दूसरे जो नाम यहां आए हैं वो लेखक की तरफ से एक वर्णन की शक्ल में आते हैं, जबकि मोदी वाली बात एक पात्र के कथन में आई है और वहां वही वाक्य रचना मेरे हिसाब से ठीक है. अगर मुझे मोदी को लेकर संकोच होता तो मैं वो बात ही न कहता. दरअसल मैं लाउड मुहावरे में बात नहीं करना चाहता.

इस उपन्यास में बीसवी सदी की कई ऐतिहासिक घटनाओं का जिक्र है, कुछ आंकड़े भी हैं. इन सब पर लिखने के लिए कैसी तैयारी करनी पड़ी?
इस उपन्यास के लिए मैंने थोड़ा बहुत शोध किया है. अध्ययन भी. इसके अलावा सुल्तानपुर जनपद के गजेटियर के पन्ने भी पलटे हैं.

निर्वासन में आपने जाति, एवं स्त्री संबंधी प्रश्नों को भी सूक्ष्मता से उठाया है, अगर हिंदी के समकालीन परिदृश्य की बात करें तो इसमें अस्मिता के विमर्शों का हासिल क्या रहा?
हासिल क्या रहा इस पर कुछ कहने के बजाए ये कहना चाहूंगा कि मेरे विचार से मुक्ति की कोई लड़ाई अकेले नहीं हो सकती. दलित या स्त्री की मुक्ति के स्वप्न के पीछे अगर पूरे समाज की मुक्ति का स्वप्न नहीं होगा, तो आपकी मुक्ति की लड़ाई इकहरी होगी और देर-सबेर उसे असफल हो जाना है. साहित्य में जब विमर्श आते हैं तो चुनौती ये होती है कि विचार आपकी संवेदना, अनुभव और यथार्थ का हिस्सा बनकर सामने आएं. अस्मितावादी विमर्श के मामले में भी यही चीज महत्वपूर्ण है. जहां विचार आपमें इनबिल्ट होता है और आपकी संवेदना तथा भावबोध के साथ घुला हुआ आता है वहां तो अच्छी रचना होती है, लेकिन अगर आपकी प्रतिज्ञा रचनात्मकता और संवेदना न होकर अपने अस्मितावाद की नारेबाजी है तो रचना बेहतर नहीं होगी.

निर्वासन में बेशुमार किस्से आते हैं, इमरजेंसी के किस्से, गोसाईगंज के बसने के किस्से, चाचा भतीजे के किस्से… ये आपने खुद गढ़े हैं या लोक से उधार लिए हैं या हकीकत हैं और इन्हें कहानी में ढालना कितना मुश्किल होता है? 
ऐसा नहीं है कि किस्से और कहानी का निर्धारण दो स्वतंत्र चीजे हैं. कई बार कहानी के निर्धारण की प्रक्रिया में किस्से उपजते हैं. जिन किस्सों का आप जिक्र कर रहे हैं उनमें प्राय: मेरी गढ़ंत है, लेकिन यह इसीलिए संभव हो सके हैं क्योंकि लोक में ऐसे किस्सों की समृद्ध परंपरा है. किस्सों के मामले में मैंने यह एहतियात जरूर बरती है कि वे हकीकत लगें. दरअसल आप कह सकते हैं कि इन किस्सों में आधी हकीकत आधा फसाना है.

निर्वासन के साथ-साथ एक और चीज जिससे इस उपन्यास के पात्र जूझते नजर आते हैं वो है नॉस्टेल्जिया. आप इसकी उपस्थिति उपन्यास में किस तरह देखते हैं?
नॉस्टेल्जिया और स्मृति में फर्क है. ये उपन्यास नॉस्टेल्जिया में फंसता नहीं है बल्कि उसका विखण्डन करता है. स्मृति यथार्थ की नाभि होती है और वह वर्तमान की व्याख्या में मददगार होती है. जबकि नॉस्टेल्जिया में अतीत का मोह होता है. आप देखेंगे कि उपन्यास के दो प्रमुख पात्र सूर्यकांत और गौरी अपने अतीत को लेकर ‘क्रिटिकल’ हैं साथ ही उसको लेकर विक्षोभ से भरे हुए हैं. सूर्यकांत जब न सिर्फ घर के लोगों द्वारा दिए गए सामानों का थैला ट्रेन से बाहर फेंक देता है तो वह एक तरह से नॉस्टेल्जिया से मोहभंग और उससे उबरने का प्रयास है.

अकलियत का अकाल

Muslim
ग्राफिक: हिमांशु भट्ट

सोलहवें लोकसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं. अब नतीजों की चीरफाड़ का समय है. ज्यादातर चुनावों की तरह इस बार भी कई रिकॉर्ड बने हैं, कई चमत्कार हुए हैं. तीस साल बाद किसी दल को पूरी तरह से बहुमत मिला है. आजादी के बाद पहली बार किसी गैर कांग्रेसी दल को पूर्ण बहुमत मिला है. पहली बार देश का चुनाव कमोबेश अमेरिका की तर्ज पर व्यक्ति-केंद्रित होकर लड़ा गया है.

इन तमाम विशेषताओं के बीच एक अनियमितता भी देखने को मिल रही है. मुसलिम आबादी की तुलना में लोकसभा में उसका प्रतिनिधित्व सबसे निचले पायदान पर पहुंच गया है. मात्र 22 मुसलिम सांसद इस बार चुनकर लोकसभा पहुंच सके हैं. और 24 राज्यों से एक भी मुसलमान सांसद नहीं चुना गया है. इनमें उत्तर प्रदेश जैसा बड़ा सूबा भी शामिल है जहां मुसलिम आबादी 19 प्रतिशत के आस-पास है.

सीएसडीएस के एक सर्वे के मुताबिक देश में 87 सीटें ऐसी हैं जिन पर मुसलिम आबादी निर्णायक संख्या में है. इन सीटों पर मुसलिम आबादी का प्रतिशत 25 से 50 तक है. इस बार इनमें से 45 सीटें भाजपा के खाते में आईं हैं. निर्णायक मुसलिम मतों वाली इन सीटों पर यह भाजपा का अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है. 2009 में भाजपा ने इन 87 में से सिर्फ 24 सीटें जीती थीं.

मुसलिम प्रभाव वाली 87 सीटों का एक बड़ा हिस्सा – 27 सीटें – उत्तर प्रदेश से आता है. भाजपा ने इन सारी सीटों पर जीत हासिल की है. ऐसा कैसे हो सकता है कि जिस उत्तर प्रदेश ने 2012 के विधानसभा चुनाव में अब तक की सबसे बड़ी संख्या में मुसलमान विधायक – 42 -भेजे थे वह दो साल के भीतर ही एक भी मुसलमान सांसद को संसद में नहीं भेजना चाहता. इनमें रामपुर और संभल की लोकसभा सीटें भी है जहां मुसलिम आबादी 50 प्रतिशत के आस-पास है.

इसी तरह से असम की चौदह में से सात सीटें मुसलिम प्रभुत्व वाली हैं. इनमें तीन सीटें भाजपा ने जीती हैं. आंध्र प्रदेश में भी भाजपा और सहयोगी टीडीपी ने झंडा गाड़ा है. सिर्फ हैदराबाद में एमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी अपना किला बचा पाए हैं. महाराष्ट्र में भी यही हालत है.

सिर्फ बंगाल ऐसा राज्य है जहां भाजपा अपना कोई प्रभाव छोड़ने में नाकाम रही है. यहां की 42 में से 19 सीटों पर काफी मुसलिम आबादी है और यहां से कुल आठ मुसलिम सांसद लोकसभा पहुंचे हैं. दूसरा नंबर बिहार का है, यहां से चार मुसलिम सांसद लोकसभा में पहुंचे हैं.

2009 की लोकसभा की बात करें तो इसमें कुल 30 मुसलमान सांसद थे. मुसलिम प्रतिनिधित्व के लिहाज से सबसे बढ़िया आंकड़ा 1980 में था तब लोकसभा में कुल 49 मुसलमान सांसद  थे. आम तौर पर लोकसभा में मुसलिम प्रतिनिधित्व का आंकड़ा 25 से 30 के बीच ही रहता आया है जो कि देश की 14 फीसदी मुसलिम आबादी के लिहाज से संतोषजनक नहीं है. लेकिन इस बार यह आंकड़ा अपनी निचली सीमा से भी तीन सीट नीचे पहुंच गया. इस बार के आंकड़ों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि देश में पहली बार किसी दक्षिणपंथी रुझान वाली पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला है. मुंबई स्थित रोजनामा राष्ट्रीय सहारा के वरिष्ठ पत्रकार और महाराष्ट्र मुसलिम ओबीसी मूवमेंट के संस्थापक हसन कमाल कहते हैं, ‘कांग्रेस और दूसरी गैर भाजपा पार्टियों के वे तमाम उम्मीदवार भी इस चुनाव में हारे हैं जो मुसलमान नहीं हैं. भाजपा का तो यह पहले से ही स्टैंड रहा है कि वे मुसलमानों को टिकट नहीं देते लिहाजा उन्हें दोष नहीं दिया जाना चाहिए. यह सेक्युलर पार्टियों की अपनी नाकामी है.’

नतीजों का विश्लेषण करने पर मोटा-मोटी दो-तीन बातें उभरती हैं. पहली, यह बहुसंख्यकवाद का वोट है. दूसरी, हो सकता है कि मुसलमान अब केवल उस सेक्युलर बोगी का हिस्सा नहीं रहना चाहता जो उसे सिर्फ भाजपा से डरा कर अपने पाले में खीचती रही है. तीसरी, जरूरत से ज्यादा ‘सेक्युलर’ विकल्पों ने मुसलिम मतदाता को भ्रम में डाल दिया और वोटों का बंटवारा हो गया. मुसलिम समुदाय के पढ़े-लिखे और जानकार लोगों से बातचीत में ये सारी ही वजहें कहीं न कहीं खराब प्रदर्शन की वजह बताई जा रही हैं.

बहुसंख्यकवाद का वोट
ऊपरी तौर पर यह वजह महत्वपूर्ण दिखती है. वरिष्ठ अधिवक्ता और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के सदस्य जफरयाब जिलानी कहते हैं, ‘अपने तौर पर मुसलमान यहां कभी भी चुनाव नहीं जीत सकता. मुसलमान यहां इसलिए जीतता रहा है क्योंकि बड़ी संख्या में उसे हिंदुओं के सेक्युलर तबके का वोट मिलता रहा है. उस सेक्युलर हिंदू वोट का शिफ्ट बड़ी संख्या में इस बार मोदी की ओर हुआ है. इसकी वजह यह रही कि कांग्रेस या सपा जैसी पार्टियों को अपनी जमीनी हकीकत का अंदाजा ही नहीं था.’

नतीजे साफ बयान करते हैं कि भाजपा को इस बार अपने परंपरागत वोटों के अलावा उन हिंदुओं का वोट भी मिला है जो अब तक किसी न किसी जातिगत या क्षेत्रीय पहचान से बंधे हुए थे. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और मायावती का सफाया इसका सबसे बड़ा प्रमाण है. यही बात बिहार में भी दिखी जहां लालू प्रसाद यादव और नितीश कुमार जैसे ओबीसी-मुसलिम राजनीति करने वाले नेताओं की लुटिया डूब गई. नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी सफलता यही रही कि उन्होंने परंपरागत दलित-पिछड़ा वोटों को भी उनकी पुरानी पहचान से बाहर निकालते हुए सबको उनकी एक दूसरी व्यापक पहचान (हिंदू) से जोड़ दिया.

वरिष्ठ साहित्यकार असगर वजाहत इस तरह के तबकों के मोदी और भाजपा से जुड़ाव पर कहते हैं, ‘अगर मोदी ने बहुसंख्यक तबके को गोलबंद किया है तो यह मुद्दों और नीतियों के आधार पर किया है. उन्होंने मंदिर या धर्म के नाम पर वोट नहीं मांगा था. उन्होंने विकास के नाम पर वोट मांगा था. अब समय बदल चुका है. भारतीय राजनीति को अब हिंदू-मुसलमान की बजाय नीतियों के आधार पर बांटना चाहिए. देखना होगा कि यह सरकार अल्पसंख्यकों के प्रति किस तरह की नीतियां अख्तियार करती है. जो पार्टियां मुसलमानों की रहनुमा रही हैं उन्होंने मुसलमानों का कौन सा भला कर दिया है.’

अगर हम चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगियों की गतिविधियों पर नजर डालें तो उनमें एक जबर्दस्त रणनीतिक चतुराई दिखाई देती है. उनकी पूरी रणनीति ही बहुसंख्यक वोटों को अपने पाले में खींच लाने की रही. असम में नरेंद्र मोदी का बंगाली घुसपैठियों पर दिया गया बयान हो या फिर मुजफ्फरनगर में अमित शाह का बदले वाला बयान हो, मंशा बहुसंख्यक वोटों को गोलबंद करने की ही थी. नरेंद्र मोदी ने ज्यादातर समय खुद को विकास पुरुष के दावे तक सीमित रखा लेकिन उनके सहयोगी अमित शाह, गिरिराज सिंह और प्रवीण तोगड़िया जैसे नेता यदाकदा हिंदूवादी लाइन पर विचार रखते रहे. महत्वपूर्ण बात यह रही कि नरेंद्र मोदी ने न तो खुद को इन बयानों से अलग करने की कोशिश की और न ही इन बयानों की निंदा की. मशहूर उर्दू शायर मुनव्वर राणा कहते हैं, ‘नरेंद्र मोदी के लीडर बनने का छुपा हुआ संदेश था हिंदुत्व.’ राणा इसके साथ ही इस चुनाव में नाममात्र के मुसलिम प्रतिनिधित्व की एक और वजह बताते हैं, ‘मुसलमानों का सबसे ज्यादा नुकसान उनके उल्मा और आलिम कर रहे हैं. उन्होंने अपने फायदे के लिए पूरी कौम में बिखराव पैदा कर दिया है. आप देखिए कि वे कहते है कि जो भाजपा को हरा रहा हो उसे वोट दें. अब किसे पता कि कौन हार रहा है और कौन जीत रहा है. इससे मुसलमान बुरी तरह भ्रमित हुआ है. इन उल्माओं को अपनी गिरेबान में झांकना चाहिए और राजनीति से दूर रहना चाहिए. मस्जिदों के बाहर राजनीति में इनका क्या काम है. मुसलमान राजनीतिक रूप से काफी समझदार हंै.’

बहुसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण के पीछे एक और बड़ी वजह जो उभर कर सामने आ रही है वह है कथित सेक्युलर पार्टियों में मुसलिम वोटों के लिए मची होड़. इस होड़ ने बहुसंख्यक तबके में यह संदेश दिया कि सारी पार्टियां सिर्फ मुसलमानों के लिए काम कर रही हैं. यह धारणा कांग्रेस, जेडीयू और सपा जैसी पार्टियों के चुनाव अभियानों से भी मजबूत हुई. चुपचाप रहते हुए भाजपा ने इस सोच का जमकर दोहन किया. खुद नरेंद्र मोदी बार-बार एक बात कहकर लोगों को संदेश देते रहे कि ‘जस्टिस फॉर ऑल अपीजमेंट फॉर नन’ यानी सबको न्याय पर तुष्टिकरण किसी का नहीं. हसन कमाल के शब्दों में, ‘यह संदेश बार-बार जा रहा है कि गैर भाजपा पार्टियां मुसलमानों की मिजाजपुर्सी कर रही हैं लेकिन असलियत यह है कि मुसलमानों की दशा उनके समय में लगातार खराब हुई है. मुसलमानों को इस कुचक्र से बाहर निकलना होगा.’

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फोटो: विकास कुमार

मुसलमान कथित सेक्युलर पार्टियों से ऊब गया?
अच्छी खासी मुसलिम आबादी के बावजूद मुसलिम प्रतिनिधियों के लोकसभा में न पहुंच पाने के पीछे एक दूसरा कयास भी लग रहा है. कयास यह कि मुसलमान मतदाता इतना परिपक्व हो चुका है कि उसे अब केवल जुबानी जमाखर्च करने वाले गैर भाजपा दलों पर भरोसा नहीं रहा है. देश के बाकी मतदाताओं की तरह ही वह भी जवाबदेही और बदलाव चाहता है. हालांकि इस मसले पर ज्यादातर मुसलिम बुद्धिजीवियों और विचारकों में दोफाड़ है. असगर वजाहत कहते हैं, ‘मुसलमानों में भी युवा मतदाताओं की संख्या बढ़ी है. ये युवक परंपरागत धार्मिक राजनीति से आजाद हो गए हैं. उनमें यह भावना आ गई है कि धार्मिक उल्मा अजीब-अजीब पार्टियों के पक्ष में अपीलें करके अपना उल्लू सीधा करते हैं. उन्हें लगने लगा है कि यह धार्मिक नेतृत्व आज के माहौल में उन्हें आगे नहीं ले जा सकता. देने के नाम पर ये पार्टियां हमेशा मुसलमानों को उर्दू-फारसी युनिवर्सिटी जैसे झुनझुने थमाती हैं. आज का मुसलमान फारसी पढ़कर क्या करेगा.’

इतनी ही मजबूत राय इसके विरोध में भी है. मुनव्वर राणा कहते हैं, ‘हो सकता है मुसलमानों का एकाध फीसदी वोट भाजपा को मिला हो पर यह ज्यादा नहीं हो सकता. यह बात सही है कि मुसलमानों में अपने उल्माओं को लेकर एक किस्म की नाराजगी है. आप देखिए कि उनकी लाख अपीलों के बावजूद वे सारी पार्टियां हारी हैं जिनके पक्ष में इन्होंने अपीलें की थी. हुआ यह है कि मुसलमानों का वोट बुरी तरह से बंट गया है इस बार.’

भाजपा को मुसलिम वोट न मिलने का समर्थन जफरयाब जिलानी भी करते हैं. उनके मुताबिक कुछेक सीटों पर जरूर ऐसा हो सकता है. जैसे लखनऊ की सीट है, वहां जितने बड़े अंतर से राजनाथ सिंह जीते हैं उसे देखते हुए यह विश्वास करना लाजिमी है कि कुछ मुसलमानों ने उन्हें वोट दिया है. पर लखनऊ में ऐसा लंबे समय से होता आया है. यहां के मुसलमान अटल बिहारी वाजपेयी को वोट देते रहे हैं. ये ज्यादातर शिया वोटर हैं जो भाजपा को वोट देते हैं. सुन्नी समुदाय आज भी भाजपा से उतना ही दूर है जितना पहले हुआ करता था.

मुसलमानों को लेकर अब तक एक धारणा रही है कि मुसलमान टैक्टिकल वोटिंग करता है. यानी जो उम्मीदवार भाजपा को हराने की कूवत रखता है उसे वह एकमुश्त वोट देता है. यह धारणा भी बुरी तरह से छिन्न-भिन्न हुई है. इसका एक सबूत उन सीटों से भी मिलता है जहां सपा, बसपा या कांग्रेस को मिले वोट से कहीं ज्यादा मुसलिम मतदाता हैं. इनमें ज्यादातर सीटें उत्तर प्रदेश की हैं. पीलीभीत, आजमगढ़, बिजनौर, कैराना, अमरोहा, बलरामपुर, बहराइच, बाराबंकी, लखनऊ और घोसी जैसी सीटों को इस श्रेणी में रखा जा सकता है.

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  • 2014 में मुसलिम सांसद – 22 (सबसे कम)
  • 2009 में मुसलिम सासंद- 30
  • 1980 में मुसलिम सांसद – 49 (सर्वाधिक)
  • 2014 में 24 राज्यों से एक भी मुसलिम नुमाइंदा नहीं है
  • 22 सांसद 6 राज्यों से चुनकर आए हैं
  • पहली बार एक भी मुसलमान उत्तर प्रदेश से संसद में नहीं पहुंचा जहां मुसलिम आबादी 19 फीसदी है
  • 2014 में पश्चिम बंगाल से चुने गए मुसलिम सांसद – 8
  • बिहार से से चुने गए मुसलिम सांसद – 4
  • देश में मुसलिम प्रभाव वाली सीटें – 87
  • 87 में से भाजपा द्वारा जीती गईं सीटें – 45
  • इन 87 में से 27 सीटें उत्तर प्रदेश में हैं और सारी सीटें भाजपा के खाते में गई हैं

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एक सांप्रदायिक बनाम अनेक धर्म निरपेक्ष
मुसलिम वोटों के जिस बंटवारे की बात मुनव्वर राणा इस कथा में कर चुके हैं वह उत्तर प्रदेश की कई सीटों के नतीजों में झलकती है. मसलन संभल और रामपुर ऐसी सीटें है जहां मुसलिम वोटरों की संख्या लगभग 50 फीसदी है लेकिन इन सीटों पर भी भाजपा जीत गई है. यहां एक साथ सपा, भाजपा और कांग्रेस ने मुसलिम उम्मीदवार मैदान में उतार दिये जिसका नतीजा हम आज लोकसभा में सबसे कम मुसलिम नुमाइंदगी के रूप मे देख रहे हैं.़

पूरे चुनावों के दौरान गैर भाजपा दलों में मुसलिम वोटों की जमकर मारामारी देखने को मिली. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने चुनाव के पहले चरण से ठीक पहले गुपचुप तरीके से जामा मसजिद के शाही इमाम से मुलाकात की और उनसे कांग्रेस के पक्ष  में फतवा जारी करवा लिया. हालांकि यह बात जगजाहिर है कि इन फतवों का मुसलिम बिरादरी पर कोई असर नहीं पड़ता. इसके बावजूद राजनीतिक पार्टियां सांकेतिक महत्व के इन हथकंडों को इस्तेमाल करने से नहीं चूकीं. कांग्रेस पार्टी दिखावे के सारे काम तो करती रही पर वास्तव में उसे जमीनी हालात का अंदाजा ही नहीं था. दिल्ली स्थित जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. मुशीरुल हसन कहते हैं, ‘कांग्रेस की अपनी नाकामी बहुत बड़ी रही. उनके ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, उनके पास जनता के सामने रखने को एक कायदे का नेता तक नहीं था, मनमोहन सिंह की छवि एक कमजोर नेता की रही. कांग्रेस में लीडरशिप की पोजीशन बिल्कुल खाली थी. ऐसे में लोगों को लगा कि शायद मोदी ही सबसे बढ़िया नेता है.’

जो काम सोनिया गांधी राष्ट्रीय स्तर पर कर रही थीं क्षेत्रीय पार्टियां अपने प्रदेशों में वही फार्मूला अख्तियार कर रहीं थी. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह ने भी स्थानीय उल्माओं की पूरी फौज सपा के पक्ष में अपील करने के लिए लगा रखी थी. सूबे की एक और अहम सियासी पार्टी बसपा ने भी भरसक मुसलमानों को लुभाने की कोशिशें की थी. बरेली के प्रमुख मुसलिम धर्मगुरु मौलाना तसलीम रजा खान ने बसपा के पक्ष में फतवा जारी कर मुसलमानों से वोट मांगा था. इसकी प्रतिक्रिया में एक अन्य मौलाना मन्नन रजा खान ने मुसलमानों से कांग्रेस के पक्ष में वोटिंग की अपील जारी कर दी थी. इन कारनामों से मुसलमानों में कोई राजनीतिक चेतना आई हो या नहीं पर दुविधा का माहौल जरूर बन गया जिसका नतीजा दूसरे रूप में सामने आया. बहुसंख्यक हिंदू वर्ग जो आमतौर पर जातिगत पहचान को चुनावों में प्राथमिकता देता आया है वह खुद को हिंदू के रूप में देखने लगा. इस भावना को उभारने में नरेंद्र मोदी की लहर ने भी अपना योगदान दिया. पत्रकार और समाजसेवी शीबा असलम फहमी कहती हैं, ‘यह ठीक ही हुआ कि ज्यादातर मुसलिम उम्मीदवार हार गए. आजम खान से लेकर सलमान खुर्शीद तक सिर्फ लाल बत्ती और टोकनिज्म की राजनीति करते आ रहे थे. मुसलमानों का तो इनसे कभी कोई भला हुआ नहीं आज तक. भाजपा से जब हमें कोई उम्मीद नहीं है तब हो सकता है खुद को साबित करने के लिए वो हमारे हित में कहीं बेहतर फैसले कर सकें.’

सपा, बसपा और कांग्रेस के अलावा इस चुनाव में एक नया फैक्टर आम आदमी पार्टी के रूप में भी उभर कर सामने आया. इसने मुसलमानों की दुविधा का दायरा और फैलाने का काम किया है. सीट दर सीट वोटिंग पैटर्न पर एक नजर डालने पर हम पाते हैं कि कुछ हिस्सों में आम आदमी पार्टी को मुसलमानों का जबर्दस्त समर्थन प्राप्त हुआ है. बनारस की सीट इसका एक उदाहरण है. यहां से अरविंद केजरीवाल, नरेंद्र मोदी की आंधी में भी दो लाख से ऊपर वोट पाने में कामयाब रहे. इसी तरह से दिल्ली की सातों सीटों का ट्रेंड बताता है कि मुसलमानों का अच्छा खासा वोट आप के हिस्से में आया है. यहां की सातों सीटों पर आप दूसरे स्थान पर रही है.

यथार्थ के धरातल से जितना कटी राजनीतिक पार्टियां थीं उतनी ही दूर मुसलिम सामाजिक संस्थाएं भी थीं. जमाते-इस्लामी का किस्सा बेहद दिलचस्प है. इसने चुनाव से पहले बाकायदा घोषणा की थी कि इनके वालंटियर देश की एक-एक सीट पर सर्वे का काम कर रहे हैं और इन्हें हर सीट से उस उम्मीदवार की जानकारी है जो भाजपा को हराने में सक्षम है. आखिरी समय में जमात ने मुसलमानों को इन उम्मीदवारों के नाम बताने की बात कही थी ताकि वे एकमुश्त वोटिंग करके नरेंद्र मोदी को हरा सकें. नतीजे आने के बाद साफ हुआ कि सूबा दर सूबा मुसलिम प्रतिनिधित्व से साफ हो गया. न जाने कौन-सी जमीन पर जमात के लोग सर्वेक्षण कर रहे थे. ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा मुसलिमों के बरेलवी संप्रदाय का है. चुनाव से पहले बरेलवी धारा के प्रमुख ने अपने हजारों समर्थकों के साथ दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में एक जलसा आयोजित किया था. इस जलसे में उन्होंने मुसलमानों से नोटा पर वोट देने की अपील जारी की थी. उनका दावा था कि अब मुसलमान सिस्टम के साथ अपनी नाराजगी को जाहिर करने के लिए नोटा को एक बड़ा हथियार बनाएगा. नतीजे आने के बाद जो तस्वीर उभरी है उसमें मुसलिम इलाकों में सबसे कम नोटा दबाने के आंकड़े सामने आ रहे हैं.

मुसलमानों के लिए इन नतीजों के संदेश क्या हैं? असगर वजाहत कहते हैं, ‘मुसलमान ही मुसलमान का भला कर सकता है यह बात बिल्कुल गलत है. बिल्कुल उसी तरह जैसे जरूरी नहीं कि हिंदू ही हिंदू का भला करे.’ जफरयाब जिलानी इस बात को थोड़ा और आगे ले जाते हैं, ‘संसद में कोई मुसलिम नेता मुसलिमों के हित की आवाज नहीं उठाता. हमारी आवाज तो सेक्युलर हिंदू नेता ही उठाते आए हैं. एक ओवैसी को छोड़कर दूसरा कोई भी मुसलमान नेता संसद में बोलता ही नहीं. मुसलमान की बात तो लालू, मुलायम, लेफ्ट और कांग्रेस के नेता ही करते हैं. इसलिए इस नतीजे से मुसलमानों को कोई चिंता नहीं करनी चाहिए.’

यह बात सच है कि बिना किसी का कामकाज देखे उसके बारे में राय नहीं बनानी चाहिए, इस लिहाज से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी आकलन छह माह से साल भर के उनके कामकाज के बाद ही हो सकता है. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इस नतीजे के संभावित खतरे भी हैं. पहला खतरा तो यही है कि अगर किसी को यह अहसास हो जाए कि बहुसंख्यक उसके साथ है तो उसके भीतर अल्पसंख्यकों को नजरअंदाज करने की भावना भी आ सकती है.

इसके साथ-साथ खतरा भाजपा के उग्र समर्थकों से भी है. इस जीत की खुशी में कहीं समर्थक बेकाबू न हो जाएं. कर्नाटक के बीजापुर में भाजपा की जीत की खुशी मना रहे कार्यकर्ताओं के मुसलिम समुदाय के साथ टकराव की खबर आ चुकी है. इन घटनाओं पर शुरुआत में ही लगाम लगाने की चुनौती रहेगी. प्रो. मुशीरुल हसन बताते हैं, ‘सबसे बड़ा खतरा यह है कि पहली बार देश में एक बहुसंख्यक वोटबैंक खड़ा होने की आहट है. अगर ऐसा हुआ तो हिंदुस्तान के लिए बहुत शर्म की बात होगी. यह बहुलतावाद का मजाक होगा. अल्पसंख्यक इसके नतीजे में पूरी तरह से अलग-थलग हो जाएगा. हमें उग्र बहुसंख्यकवाद का सामना करना पड़ सकता है.’

इस नतीजे का एक और दुष्प्रभाव मुसलिम समुदाय के ऊपर पड़ सकता है. एक बार फिर से मुसलिमों में फैली हताशा का फायदा समुदाय के बीच मौजूद कट्टरपंथी-रूढ़िवादी तत्व उठा सकते हैं. उल्मा और मौलवी बड़ी आसानी से अपनी स्थिति को मजबूत कर सकते हैं. रूढ़िवादी वर्ग मुसलमानों के उस उदारवादी धड़े को हाशिए पर पहुंचा सकता है जो खुद को भारत के उस विचार से जोड़ता है जो पंथनिरपेक्ष और सबको बराबरी का हक देता है. आज भी मुसलमानों की एक बड़ी आबादी इन्हीं उल्माओं और मौलवियों के असर में है. ये वे लोग हैं जो हिंदुओं का डर दिखाकर मुसलमानों को बरगला सकते हैं. मुनव्वर राणा एक गहरी बात से इस कयास को विराम देते हैं, ‘हम इसलिए यहां सुरक्षित नहीं है कि यहां हमारी सरकारें हैं. हम यहां इसलिए सुरक्षित हैं क्योंकि हम 80 करोड़ हिंदुओं की निगरानी में रहते हैं. हम इसलिए सुरक्षित हैं क्योंकि यहां का 80 करोड़ हिंदू सेक्युलर और सहिष्णु है.’

उम्मीद है यह बात सेक्युलर बनाम कम्युनल राजनीति करने वाली सियासी तंजीमों को भी समझ आएगी.