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स्विट्जरलैंड

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विश्व रैंकिंग: 6
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन : अंतिम आठ (1934, 38, 54)

खास बात
स्विस डिफेंस यानी रक्षा पंक्ति की जान यानी गोखान इनलर और वालोन बेहरामी इटली के क्लब नापोली के लिए खेलते हैं. इस तरह कहा जा सकता है कि टीम की रक्षापंक्ति इटली में तैयार हुई. अपने देश के लिए भी वे उसी भूमिका में रहेंगे जिस भूमिका में नापोली के लिए खेलते हैं. इनलर जहां बेहद रचनात्मक हैं वहीं बेहराम किसी भी कमी को कड़ी मेहनत से दूर करने की क्षमता रखते हैं

स्विट्जरलैंड की टीम को फीफा वर्ल्ड रैंकिंग में स्पेन, जर्मनी, ब्राजील, पुर्तगाल और अर्जेंटीना के बाद छठी रैंकिंग मिली है लेकिन विश्व कप में टीम का ग्रुप इतना आसान है कि उसके अगले दौर में जाने की काफी संभावना है. टीम के कोच ओटमार हिट्जफील्ड को बहुत कुशल रणनीतिकार माना जाता है. वर्ष 2008 में टीम का कोच बनाए जाने के बाद उन्होंने टीम की रचनात्मकता में बहुत अधिक इजाफा किया है. रक्षा पंक्ति टीम की कमजोरी बनी रही है और फैबिन शार तथा स्टीव वॉन बर्गन प्रशंसकों तथा जानकारों के मन में बहुत अधिक भरोसा नहीं पैदा कर पाए हैं. लेकिन मिडफील्ड में गोखान इनलेर और वालोन बेहरामी उनकी मदद के लिए हैं. जेरदान शाकिरी के रूप में टीम के पास एक जबरदस्त विंगर मौजूद है जो वैलेंटिन स्टॉकर और ग्रैनिट झाका के साथ मिलकर टीम की रक्षा पंक्ति को जबरदस्त मजबूती प्रदान कर सकता है. आक्रमण की बात करें तो जोसिप ड्रमिक उसके केंद्र में रहेंगे..

आइवरी कोस्ट

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विश्व रैंकिंग: 23
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन : प्रथम चरण (2006, 2010)खास बात
ड्रोग्बा और याया की जोड़ी के अलावा आइवरी कोस्ट अपने लिए सर्गे औरियर से चमत्कारिक प्रदर्शन की उम्मीद कर सकता है. उन्हें रक्षात्मक पंक्ति का काफी मजबूत खिलाड़ी माना जाता है लेकिन उनके खेल की विविधता उन्हें ऐसा बनाती है कि वे विरोधी खेमे के गोल पर हमेशा नजर रखते हैं
व्यक्तिगत प्रतिभा से भरपूर आइवरी कोस्ट कभी भी विश्व कप के पहले चरण से आगे नहीं बढ़ पाई. दो बार विश्व कप में शामिल हो चुकी यह टीम हर बार चार टीमों के अपने ग्रुप में तीसरे स्थान पर रही. लेकिन इसके साथ यह बात भी सही है कि आइवरी कोस्ट दोनों बार अपेक्षाकृत मुश्किल ग्रुप में रही है. सन 2006 में अपने पहले विश्व कप में वह अर्जेंटीना, सर्बिया मोंटेनेग्रो और नीदरलैंड के साथ थी तो 2010 में दक्षिण अफ्रीका में उसे ब्राजील, पुर्तगाल और कोरिया के मैच खेलने पड़े. हालांकि इस बार आइवरी कोस्ट को आसान ग्रुप में प्रवेश मिला है. ग्रीस, जापान व कोलंबिया के खिलाफ यह उम्मीद की जा सकती है कि ड्रोग्बा और याया अपनी टीम को आखिरी 16 टीमों तक ले जा सकेंगेे. लेकिन ड्रोग्बा की बढ़ती उम्र इसमें बाधा बन सकती है.

जापान

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विश्व रैंकिंग: 46
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन : अंतिम 16 टीमों में (2002, 2010)

खास बात
इस टीम के कोच काफी आक्रामक रणनीति के लिए जाने जाते हैं. यदि जापान अपने कमजोर डिफेंस से पार पा लेता है और मिडफील्डर लगातार विरोधी टीम के फॉरवर्ड को आगे बढ़ने से रोक पाते हैं तो एशिया की यह टीम 2002 के अपने प्रदर्शन से आगे जा सकती है

इस बार ईरान और दक्षिण कोरिया के साथ जापान ने भी एशिया से विश्व कप में क्वालीफाई किया है. यह टीम पिछले पांच फुटबॉल विश्व कप खेल चुकी है. 2002 और 2010 के विश्व कप में यह दूसरे चरण तक तक पहुंची थी. 2002 का विश्व कप संयुक्त रूप से जापान में ही हुआ था. तब अपनी सरजमीं खेलते हुए जापान ने घरेलू दर्शकों का दिल जीत लिया था. यहां दूसरे चरण में तुर्की से 0-1 से हारने के बाद यह टीम विश्व कप से बाहर हो गई थी. इसके बाद जर्मनी में हुए 2006 के विश्व कप में जापान पहले ही राऊंड में बाहर हो गया. 2010 के विश्व कप में इस टीम ने एकबार फिर जोर दिखाया. दक्षिण अफ्रीका में जापानी टीम नौंवे स्थान पर रही थी. कुल मिलाकर कभी बहुत अच्छा तो कभी औसत खेल इस टीम की पहचान  है. जापान के प्रदर्शन की अनियमितता ही उसकी सबसे बड़ी दिक्कत रही है. वैसे कोच अल्बर्टो जाकरोनी के मार्गदर्शन में जापान क्वालीफाइंग मुकाबलों में जॉर्डन को 6-0 और ओमान को 3-0 के बड़े अंतर से हारकर आगे पहुंची है.  इस प्रदर्शन में उसके प्रतिभावान मिडफील्डर केसुके होंडा के अलावा माया योशिदा, हिरोशी कियोतके, गोतोकु सकाल और उचिदा जैसे खिलाड़ियों के तालमेल ने कमाल दिखाया था. इन प्रतिभावान खिलाड़ियों की मौजूदगी और इनके बढ़िया तालमेल से विश्व कप में भी इस टीम से आक्रामक खेल की उम्मीद बंधती है.

कोस्टारिका

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विश्व रैंकिंग: 28
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन : आखिरी 16 टीमों में प्रवेश (1990)

खास बात
टीम के गोलकीपर केलर नवास को इस टूर्नामेंट में उनकी प्रतिभा के मुकाबले काफी कम करके आंका जा रहा है. यूरोप में खेलते हुए उन्होंने कई दिग्गजों को अपने नेट के सामने से निराश लौटाया है

इंग्लैंड, इटली और उरुग्वे के साथ एक ही ग्रुप में मौजूद जॉर्ज पिंटो (कोच) की कोस्टारिका इन सबसे कमतर जरूर दिखती है लेकिन छुपी रुस्तम जैसी टीमें इन्हें ही कहा जाता है. मैचों के पहले उन्हें कम करके आंका जा रहा है जो उनके लिए फायदेमंद है. कोस्टारिका  की सबसे बड़ी खूबी उसका डिफेंस है. पांच बैकलाइन खिलाड़ी और तीन सेंटर डिफेंडर उसकी बड़ी ताकत हैं. इसके बाद कैलर नवास के रूप में इस टीम के पास एक बेहतरीन गोल कीपर भी है. अपने दस क्वालीफाइंग मुकाबलों में कोस्टारिका के विरुद्ध टीमें कुल सात गोल ही कर पाई थीं. हालांकि पिंटों को अब एहसास है कि विश्व कप में आगे बढ़ना है तो उन्हें फॉरवर्ड या आक्रमण को धार देनी होगी. इसके लिए उनके पास ब्रायन रुइज हैं और उनकी मदद के लिए क्रिस्चियन बोलानोज और स्ट्राइकर जोइल कैंपबेल भी हैं.

इंग्लैंड

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विश्व रैंकिंग: 10
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन: विजेता (1966)

खास बात
सालों तक इंग्लैंड का आक्रमण मजाक का विषय रहा है. लेकिन डेनियल स्टरीज, जिन्होंने पिछले सत्र में लिवरपूल की तरफ से खेलते हुए 31 गोल किए थे, के आने से इस मोर्चे पर टीम काफी मजबूत दिखने लगी है. अब स्टार खिलाड़ी वायने रूनी पर से भी कुछ दबाव कम होगा

इंग्लैंड बॉबी चार्लटन की कप्तानी में सन 1966  में विश्व चैम्पियन बना था. फुटबाल के इस वर्ल्ड कप का मेजबान इंग्लैंड ही था. घर में हुए इस कप को जीतने के बाद उसका अपने सबसे पारंपरिक खेल क्रिकेट में धीरे-धीरे रुझान काम होने लगा और शायद इसी वजह से इंग्लैंड दुनिया की सबसे महंगी क्लब फुटबाल प्रतियोगिता का आयोजक बना. आज हम इसे इंग्लिश प्रीमियर लीग या ईपीएल के नाम से जानते हैं. आज भले यह दुनिया की सबसे चर्चित फुटबाल लीग है. लेकिन यह माना जाता है कि लीग के कारण ही इंग्लैंड के घरेलू खिलाड़ी उभर कर नहीं आ पाते.पूरी लीग पिछले एक दशक से विदेशी खिलाड़ियों के कारनामों की गवाह रही है. वहीं इंग्लैंड के लिए यह सूची डेविड बेकहम और वायने रूनी से आगे नहीं जा पाती.  इस विश्व कप में खेल रहे 119 खिलाड़ियों का ईपीएल से सीधा संबंध है.  इस बार इंग्लैंड के कोच हडसन ने पुराने खिलाड़ी छोड़कर नौजवानों पर भरोसा जताया है. वरिष्ठों में वेन रूनी और स्टीवन जेरार्ड भी हैं. इस बार डेनियल स्ट्रीज, रहीम स्टर्लिंग, अलेक्स ओक्स्लेड चेम्बर्लेन और ऐडम ललाना के इंग्लैंड की अग्रणी पंक्ति में होने से फारवर्ड के असरदार रहने की उम्मीद है.

नीदरलैंड्स

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विश्व रैंकिंग: 15
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन : 1974,1978 और 2010 में उपविजेता

खास बात
डच कोच लुइस गाल ने क्वालीफाइंग दौर में 4-3-3 (पिछली पंक्ति 4 खिलाड़ी, मध्य में 3 और अग्रिम पंक्ति में भी 3 खिलाड़ी) वाली रणनीति को बखूबी इस्तेमाल किया था. लेकिन मिडफील्डर केविन स्ट्रूटमैन के चोटिल होने ने उनकी इस रणनीति को अनुपयोगी बना दिया है. अब उनके द्वारा 5-3-2 की रणनीति अपनाने से रोबिन पर्सी और अर्जेन रॉब्बेन को बेहतर प्रदर्शन करने का मौका मिलेगा

दक्षिण अफ्रीका में हुए पिछले विश्व कप फाइनल में नीदरलैंड्स ने स्पेन को अंतिम समय तक कड़ी चुनौती दी थी. लेकिन अतिरिक्त समय में आंद्रेस इनिएस्ता द्वारा किए गए गोल के कारण नीदरलैंड्स 1-0 से हार गया. इस साल नीदरलैंड्स के लिए मुश्किलें अधिक हैं. विद्रोहों और असंतोष के बावजूद भी पूर्व की डच टीमें हमेशा साहसी प्रतिभाओं से भरी रही हैं. आखिरकार उन्होंने ही ‘टोटल फुटबॉल’ का आविष्कार किया था. लेकिन वर्तमान टीम बहुत ही कमजोर नजर आ रही है. चोटिल होने के कारण न तो मिडफील्ड पर केविन स्ट्रूटमैन का जोश पहले जैसा है और न ही राफेल वेन डर वार्ट की आक्रामक गति पहले की तरह है. कागजों पर रोबिन वैन पर्सी, वीजले स्निजडर और  अर्जेन रॉब्बेन की आक्रामक तिकड़ी जरूर घातक नजर आती है. लेकिन 2010 में प्रसिद्ध रहे स्निजडर अब अपनी राह से भटक गए हैं. वैन पर्सी भी बीते समय में मेनचेस्टर यूनाइटेड में चोटिल हुए. ऐसे में बेयर्न म्यूनिख क्लब के खिलाड़ी रॉब्बेन की कारगर फुर्ती ही टीम की सबसे बड़ी ताकत है. लेकिन क्या सिर्फ इसके भरोसे ही नीदरलैंड्स उस ग्रुप में टिक सकता है जहां स्पेन जैसे काबिल दुश्मन और चिली जैसे प्रतिभावान टीमें भी मौजूद हों? इन परिस्थितियों में नीदरलैंड्स पर दांव लगाना घातक हो सकता है.

स्पेन

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विश्व रैंकिंग: 1
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन : 2010 (विजेता)

खास बात
डिएगो कोस्टा जैसा बेहतरीन स्ट्राइकर स्पेन की इस टीम में दूसरा नहीं है. जहां फर्नान्डो टोरेस और डेविड विला अपनी पुरानी शैली में लौटने के लिए संघर्ष कर रहे हैं वहीं कोस्टा उस टीम को बहुत मजबूती देंगे जो प्रतिभाशाली मिल्फील्डरों से भरी हुई है

‘टिकी-टाका अब अप्रासंगिक हो चुकी है.’ यह घोषणा कुछ फुटबॉल पंडितों ने तब की थी जब 2013 में हुए कन्फेडरेशन कप के फाइनल में ब्राजील ने स्पेन को 3-0 से हराया था. ‘टिकी-टाका’ वह विधा है जिसमें खिलाड़ी फुटबॉल को छोटी-छोटी दूरी पर पास करते हुए उस पर कब्जा बनाए रखते हैं. ‘टिकी-टाका’ के अप्रासंगिक होने की बातों को तब और बल मिला जब बार्सिलोना क्लब की देश-विदेश में हार हुई. बार्सिलोना क्लब स्पेन की राष्ट्रीय टीम से सबसे ज्यादा मेल खाता है और टीम की सबसे बेहतरीन प्रतिभा भी इसी क्लब से आती है. लचर रणनीति से इतर स्पेन को कई अन्य कारणों से भी कमजोर माना जा रहा है. एक समय में विश्व के सबसे बेहतरीन पासर समझे जाने वाले जवी हर्नान्देज अब अपनी ही एक कमजोर परछाईं जैसे दिखते हैं. फर्नान्डो टोरेस और डेविड विला दोनों ही अब अपनी ‘एक्सपाइरी डेट’ पार कर चुके हैं. तो क्या वर्तमान विश्व-विजेताओं को अब विश्व कप को अलविदा कह देना चाहिए? नहीं. गोल कीपर के रूप में इकर क्यासिलास और सेंटर-बैक में सर्गियो रामोस और गेरार्ड पिक के होने से बचाव हमेशा की तरह ही मजबूत नजर आता है. जबी अलोंसो और सर्गियो बस्क्वेट्स आज भी बैक-फोर को रक्षण देने में सबसे ज्यादा माहिर हैं. इनके अलावा आंद्रेस इनिएस्ता जैसा नौजवान भी है जो बातों से नहीं बल्कि अपने पैरों से जवाब देने में विश्वास रखता है. स्पेन के मिडफील्ड से ब्राजील में हर टीम के कोच को ईर्ष्या जरूर होगी. यदि ‘टिकी-टाका’ असफल भी होती है तो कोच विसेंट डेल बॉस्क के पास चक्रव्यूह तोड़ने के लिए डिएगो कोस्टा को उतारने का सौभाग्य भी है.

कैमरून

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विश्व रैंकिंग: 56
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन : अंतिम आठ (1990)

खास बात
बार्सिलोना के लिए खेलते समय टीम के मिडफील्डर एलेक्स सान्ग की छवि एक रक्षात्मक मिडफील्डर की थी लेकिन अब उनसे उम्मीद की जा रही है कि अपने देश के लिए वे बड़ी भूमिका निभाएंगे. कोच वॉकर फिंक को उनके ऊपर जबर्दस्त भरोसा है

कैमरून का विश्व कप से पत्ता लगभग कट चुका था. बोनस को लेकर कैमरून के खिलाड़ियों और फुटबॉल अधिकारियों के बीच पैदा हुआ विवाद इतना बढ़ गया कि हालात बेकाबू हो गए. खिलाड़ियों ने धमकी दे डाली थी कि अगर उनकी मांगे नहीं मानी गईं तो वे विश्व कप से वाकआउट करेंगे. खैर समय रहते अधिकारियों ने खिलाड़ियों की मांगें मान लीं. कैमरून अफ्रीका की अकेली टीम है जिसने सात बार विश्व कप के लिए क्वालीफाई किया है. कैमरून के विश्व कप अभियान का शिखर 1990 में आया था जब टीम क्वार्टरफाइनल में जगह बनाने में सफल रही थी. लेकिन इंग्लैंड के हाथों क्वार्टरफाइनल में उसे मात खानी पड़ी और उसका अभियान खत्म हो गया था. इस विश्व कप में कैमरून की उम्मीदें स्ट्राइकर सैमुएल इटो के ऊपर टिकी हुई हैं जिन्हें दुनिया के प्रतिष्ठित रियल मैड्रिड, बार्सिलोना और चेल्सी जैसे क्लबों में खेलने का अनुभव है. मध्य और पिछली पंक्ति में खेलने के लिए कैमरून के पास जोएल मातिप और निकोलस एनकूलू की जोड़ी है. इसके अलावा भी कैमरून के पास मिडफील्ड में खेलने वाले कुछ शानदार खिलाड़ियों का समूह है जो किसी भी विपक्ष को परेशानी में डालने में सक्षम है. टीम के कोच वॉकर फिंक परंपरागत 4-3-3 संरचना में खेलने के हिमायती हैं क्योंकि इस संरचना में उनके मुख्य स्ट्राइकर इटो और सहयोगी स्ट्राइकर विंसेंट अबूबकर सबसे ज्यादा प्रभावी सिद्ध होते हैं. इसके अलावा टीम के पास फॉरवर्ड लाइन या अग्रिम पंक्ति में खेलने के लिए फैब्रिस ओलिंगा का विकल्प भी मौजूद है जिन्हें ला लीगा में खेलने का अनुभव है.

कोलंबिया

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विश्व रैंकिंग: 8
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन : 1990 (राउंड ऑफ 16)

खास बात
अर्जेंटीना और जर्मनी का प्रबंधन देख चुके जोस पेकेरमैन पिछले तीन दशकों में पहले गैर-कोलंबियाई कोच हैं. यदि वे अपने मिडफील्ड और डिफेन्स में सही तालमेल बना सके तो कोलंबिया क्वार्टर फाइनल में जगह बना सकता है. यह भी मुमकिन है कि विश्व कप घरेलू महाद्वीप में ही होने के कारण कोलंबिया और भी आगे पहुंच जाए

कोलंबिया की समस्या यह है कि तमान बड़े सितारों के बावजूद भी यह टीम कभी अपनी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई. इटली में हुआ 1990 का विश्व कप जरूर कोलंबिया के लिए एक अपवाद रहा है. तब यह टीम दूसरे राउंड तक पहुंची थी. लेकिन उस वक्त भी कोलंबिया को लगभग अपने जितनी ही प्रसिद्ध कैमरून की टीम से हार मिली थी. इस अविस्मरणीय मैच में रॉजर मिला ने गोलकीपर रेने हिगुइटा के पैरों के नीचे से गेंद को चुराते हुए गोल दाग दिया था. इसके अलावा कोलंबिया की टीम तब भी चर्चा में आई थी जब टीम के डिफेंडर आंद्रेस एस्कोबार की गोली मार कर इसीलिए हत्या कर दी गई थी क्योंकि उन्होंने 1994 में अमरीका में अपनी ही टीम पर गोल कर दिया था. बाद में फॉस्टिनो एस्प्रिला जैसे बड़े नाम भी इस टीम से जुड़े लेकिन तब भी टीम को निराशा ही हाथ लगी. इस बार कोच जोस पेकेरमैन अनुभवी और युवा खिलाडियों की मिली-जुली टीम के साथ आए हैं. मिडफील्डर जेम्स रोड्रिग्स और जुआन काउड्राडो टीम के स्ट्राइकरों के लिए सही मौके पैदा कर सकते हैं. पेकेरमैन ‘4-2-2’ की रणनीति के तहत अपने दो मिडफील्डरों को विस्तृत दूरी पर खिलाने की योजना बना रहे हैं. हालांकि इस रणनीति से यह खतरा है कि इससे मध्य क्षेत्र खाली हो जाता है और सामने वाली टीम आसानी से पलटवार कर सकती है. लेकिन कोलंबिया के पास सबसे अच्छा मौका रक्षण में नहीं बल्कि आक्रमण में ही है. और पेकेरमैन यह अच्छे से जानते हैं.

ब्राजील

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विश्व रैंकिंग : 3
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन : विजेता (1958, 62, 70, 94, 2002)

खास बात
ऐसा देखा गया है कि फुटबॉल विश्व कप में घरेलू टीमें हमेशा से बढ़िया प्रदर्शन करती आई हैं. ब्राजील जैसी प्रतिभाओं से भरी टीम के लिए यह सोने पे सुहागा वाली स्थिति है. इस अनुकूल माहौल में अपने हजारों प्रशंसकों से घिरी ब्राजील की टीम फाइनल जीतने की बड़ी दावेदार है

ब्राजील 64 साल से इस मौके के इंतजार में था, 16 जुलाई 1950 को रियो डी जेनेरो के माराकाना स्टेडियम में उरुग्वे के हाथों फाइनल हारने के बाद से ही. उस हार का सदमा ब्राजील के जेहन में आज तक कायम है. इस दौरान विदेशी जमीन पर मिली पांच खिताबी जीत भी उस घाव को भर नहीं पाईं. ब्राजील जब क्रोएशिया के खिलाफ अपने खिताबी अभियान की शुरुआत कर रहा था तब वह सदमा सबके अवचेतन में कहीं न कहीं मौजूद था. लेकिन कोच लुई फेलिप स्कोलारी ने एक ऐसी टीम गढ़ी है जो उस सदमे से उबर कर अपना मनोबल कायम रख पाने में सक्षम है. स्कोलारी पहले भी विश्व कप विजेता टीम का हिस्सा रह चुके हैं. उन्हीं की निगरानी में रोनाल्डो, रोनाल्डीन्हो से सजी ब्राजीली टीम ने 2002 का खिताब अपने नाम किया था. मौजूदा टीम में जबर्दस्त प्रतिभा है. समस्या सिर्फ एक स्तर पर है टीम के बीच आपसी तालमेल थोड़ा कमजोर है. डिफेंड करने के लिए ब्राजील के पास दुनिया के सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों का पूल है. थियागो सिल्वा और ताजादम डेविड लुइज का नाम दुनिया के सर्वश्रेष्ठ डिफेंडरों में आता है. ब्राजील की पहचान रही है उसका अभेद्य डिफेंस. इस श्रेणी में दानी एल्विस और मार्सेलो का नाम भी लिया जा सकता है. यही बात पॉलिन्हो और लुइज गुस्लाव के बारे में भी कही जा सकती है. इसके अलावा ऑस्कर भी हैं जिन पर कोच स्कोलारी को पूरा भरोसा है. लेकिन टीम का सबसे उदीयमान सितारा है नेमार. हालांकि यह खिलाड़ी अब तक लॉयोनेल मेसी या रोनाल्डो जितनी बड़ी शख्सियत तो नहीं बन सका है लेकिन उम्मीद है कि यह विश्व कप उन्हें उस कतार में शामिल करवा देगा. क्रोएशिया के खिलाफ दो गोल करके उन्होंने इस दिशा में कदम भी बढ़ा दिया है.