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घाना

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विश्व रैंकिंग: 37
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन : क्वार्टर फाइनल (2010)

खास बात
मिखाइल एसिएन और सुले मंटारी तो घाना के लिए अहम थे ही, लेकिन मोहम्मद रब्यू के आने से टीम इस लिहाज से और भी मजबूत हो गई है क्योंकि अब मिडफील्ड में उसके लिए प्रयोग की गुंजाइश बढ़ गई है. रब्यू की तेजी और ड्रिबलिंग देखने लायक है

इंग्लैंड के लिए 1986 के विश्व कप में ‘हैंड ऑफ गॉड (अर्जेंटीना के मेराडोना का हाथ लगने से हुए गोल)’ उतना ही दुर्भाग्यशाली था जितना पिछले विश्व कप में घाना टीम के लिए ‘हैंड ऑफ डेविल.’ तब उरुग्वे के खिलाड़ी का हाथ लगने से घाना को एक गोल का नुकसान हुआ और वह मैच हार गई थी. ब्लैक स्टार्स कहलाने वाली इस टीम के लिए दक्षिण अफ्रीका में हुए विश्व कप में क्वार्टर तक पहुंचने की कहानी किसी परीकथा से कम नहीं है. घाना की टीम इस बार भी वही प्रदर्शन दोहराने की तैयारी के साथ ब्राजील आई है. जर्मनी, पुर्तगाल और अमेरिका के ग्रुप में कुछ लोग इसे घाना का अतिआत्मविश्वास कह सकते हैं. हालांकि क्वेसी अप्पियाह (कोच) की यह टीम पिछले विश्व कप की तरह उलटफेर करने में पूरी तरह सक्षम है. किसी समय चमत्कारिक खेल दिखाने वाले मिखाइल एसिएन और सुले मंटारी पर अब उम्र का असर हो रहा है, लेकिन मोहम्मद रब्यू भविष्य में इनमें से किसी एक की जगह लेने को तैयार हैं. 24 साल का यह खिलाड़ी जितना अच्छा धावक है उतने ही अच्छे से बॉल को संभालता भी है. केविन प्रिंस बोआटेंग तालमेल और स्टाइल के लिए जाने जाते हैं तो क्रिश्चियन आट्सू अपनी तेजी और तकनीक की वजह से इस विश्व कप के उन खिलाड़ियों में शुमार हैं जिनपर दर्शकों की नजर होगी. हालांकि अप्पियाह को रक्षात्मक पंक्ति के लिए खिलाड़ियों के चुनाव में कुछ दिक्कत हो सकती है.

फीफा का फाउल फुटबॉल

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2014 का विश्व कप उठाने के लिए बिगुल बज चुका है. फुटबॉल के दिग्गजों के बीच हर चार साल पर होने वाले इस शक्ति-परीक्षण में संसार के 32 देशों की टीमें, 12 जून से, ब्राजील में अपने दम-खम और खेल-कौशल का परिचय दे रही हैं. फुटबॉल के आख्यानिक बादशाह पेले के देशवासियों का इस खेल के प्रति अनुराग सारी दुनिया में बेजोड़ माना जाता है. तब भी, ब्राजील की जनता ने अपने देश में विश्व कप के आयोजन का हड़तालों-प्रदर्शनों द्वारा अंतिम क्षण तक जो प्रबल विरोध किया, वह भी विश्व कप के 84 वर्षों के इतिहास में बेजोड़ है. यह असाधारण जनाक्रोश देश में गरीबी दूर करने के बदले विश्व कप के लिए हो रहे निर्माणकार्यों पर पानी की तरह पैसा बहाने और इस पैसे की निर्लज्ज लूट-खसोट को लेकर था.

एक ऐसी ही निर्लज्ज लूट-खसोट फारस की खाड़ी पर बसे देश कतर में भी चल रही है. कतर में ही 2022 वाले विश्व कप का आयोजन होना है. वहां भारत और उसके पड़ोसी देशों के उन असहाय गरीब मजदूरों व घरेलू नौकरों को लूटा जा रहा है जिन्हें विश्व कप से जुड़े निर्माणकार्यों के लिए लाया गया है. हर महीने अकेले भारत से आए कोई 20 मजदूर भूख-प्यास और दुर्घटनाओं से दम तोड़ रहे हैं. विश्व फुटबॉल संघ फीफा ने दिसंबर 2010 में कतर को जब 2022 वाले विश्व कप की मेजबानी से सुशोभित किया था, तब यह नहीं सोचा था कि पेट्रो-डॉलरों का धनी यह बौना देश कितना बड़ा अशोभनीय कलंक साबित होगा. कतर इस बीच फीफा की जान का ऐसा जंजाल बन गया है, जो न निगलते बन रहा है और न उगलते. फीफा के अध्यक्ष योजेफ ब्लाटर भी, जो कतर का अब तक बचाव किया करते थे, अपना धैर्य खोने लगे हैं.

कतर का चुनाव ‘बेशक एक गलती थी’
स्विट्जरलैंडवासी 78 वर्षीय ब्लाटर ने, ब्राजील में विश्व कप शुरू होने के ठीक चार सप्ताह पूर्व, स्विस टेलीविजन चैनल ‘आरटीएस’ के साथ एक भेंटवार्ता में पहली बार स्वीकार किया कि कतर को 2022 वाले विश्व कप का आयोजन देना ‘बेशक एक गलती थी.’ उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि फीफा के एक विशेषज्ञ दल ने कतर का दौरा करने के बाद अपनी रिपोर्ट में आगाह किया था कि गर्मियों वाले जिन दिनों में विश्व कप होते हैं, उन दिनों में वहां ‘तापमान बहुत ही होगा. लेकिन, यह तथ्य फीफा की कार्यकारिणी को इस अमीरात (कतर) के पक्ष में भारी बहुमत से फैसला करने से रोक नहीं पाया.’ स्मरणीय है कि फीफा की कार्यकारिणी समिति ने दो दिसंबर 2010 को, स्विट्जरलैंड के ज्यूरिच स्थित फीफा के मुख्यालय में मतदान के समय अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे प्रबल दावेदारों की उपेक्षा करते हुए 14:8 के बहुमत से कतर के पक्ष में निर्णय सुनाया था.

उसी दिन 2018 वाले विश्व कप की मेजबानी रूस को देने का भी निर्णय हुआ था. तभी से यह आरोप लगते रहे हैं कि कार्यकारिणी के कुछ सदस्य कतर के हाथों बिके हुए थे तो कुछ दूसरे जर्मनी व फ्रांस की ओर से कतर के पक्ष में मतदान करने के दबाव में थे. टेलीविजन-भेंटवार्ता में फीफा अध्यक्ष योजेफ ब्लाटर ने कतर से किसी प्रकार की रिश्वत मिलने वाली बात तो टाल दी, पर घुमा-फिरा कर यह जरूर माना कि कार्यकारिणी समिति के मताधिकार-प्राप्त सदस्यों पर जर्मनी और फ्रांस की तरफ से ‘राजनीतिक दबाव’ था. उन्होंने कहा, ‘सभी भलीभांति जानते हैं कि फ्रांस और जर्मनी की बड़ी-बड़ी कंपनियां कतर में काम कर रही हैं और वे केवल विश्व कप के लिए ही काम नहीं कर रही हैं. कतर के लिए विश्व कप तो एक छोटा-सा मामला है.’

img12जर्मन-फ्रांसीसी कंपनियों के हित
उनके कहने का मतलब शायद यह था कि जर्मन और फ्रांसीसी कंपनियों के हित कतर में इतने दीर्घकालिक व व्यापक हैं कि इन दोनों देशों की सरकारें, निर्माणकार्यों के ठेके आदि पाने से इतर भी, अपनी कंपनियों के हितों की अनदेखी नहीं होने देना चाहती थीं. अपनी बात की पुष्टि के लिए ब्लाटर ने फीफा की कार्यकारिणी में हुए मतदान से कुछ दिन पहले फ्रांस के राष्ट्रपति-भवन में तत्कालीन राष्ट्रपति निकोला सार्कोजी, कतर के अमीर और यूरोपीय फुटबॉल संघ ‘यूएफा’ के अध्यक्ष मिशेल प्लातिनी के बीच हुई भेंट की ओर इशारा किया. प्लातिनी फ्रांस के नामी फुटबॉल खिलाड़ी रह चुके हैं. उन्हें फीफा के अध्यक्षपद के लिए अगले वर्ष होने वाले चुनाव में ब्लाटर का प्रतिद्वंद्वी भी माना जाता है. फ्रांसीसी सरकार ने ब्लाटर के इशारे का यह कहते हुए तुरंत खंडन किया कि वह ‘पूरी तरह निराधार है.’

फीफा ने कतर की अमीरी देखकर 2022 के विश्व कप का आयोजन उसे क्या दे दिया, अपने लिए मुसीबतों का पहाड़ मोल ले लिया. प्रश्न यही नहीं है कि केवल ढाई लाख मूलनिवासियों वाले एक ऐसे रेगिस्तानी देश को फुटबॉल के विश्व कप के आयोजन का सम्मान सौंपा ही क्यों गया जिसका फुटबॉल की दुनिया में न तो कोई नाम है और न जहां लोकतंत्र जैसी कोई शासन व्यस्था है, जिसमें श्रमिक या मानवाधिकारों के लिए कोई जगह हो. प्रश्न यह भी है कि फीफा स्वयं कितना साफ-सुथरा है? वैसे, ये सारे प्रश्न उठते ही नहीं यदि पानी की तरह पैसा बहाकर एक-से-एक आलीशान स्टेडियम, होटल, रेल और सड़क-मार्ग बना रहे कतर से यह खबरें नहीं आ रहीं होती कि भूख-प्यास और गर्मी से वहां बड़ी संख्या में मजदूरों की मौत हो रही है.

हर महीने 20 भारतीयों की मौत
मात्र ढाई लाख की जनसंख्या वाले कतर में इस समय 14 लाख विदेशी श्रमिक काम कर रहे हैं. उनमें से 38 प्रतिशत भारत और नेपाल से आए हैं. बाकी पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका, इंडोनेशिया और फिलीपींस के हैं. दोहा में भारतीय दूतावास भारतीय श्रमिकों की स्थिति के बारे में कुल मिलाकर चुप ही रहता है. तब भी, इस साल फरवरी में उसकी ओर से बताए गए आंकड़ों के अनुसार 2010 में वहां 233, 2011 में 239, 2012 में 237 और 2013 में  241 भारतीय श्रमिक मौत की गोद में समा गए. अकेले 2014 के जनवरी महीने में ही 24 भारतीयों की मृत्यु हो गई. इस तरह चार वर्षों के भीतर वहां लगभग एक हजार भारतीय श्रमिक अपने प्राण गंवा चुके हैं. 2013 में हर महीने औसतन 20 भारतीय श्रमिकों की मौत हो रही थी.

कतर में खून-पसीना बहा रहे भारतीय और नेपाली श्रमिकों की दारुण दशा की दुखद कथा सबसे पहले ब्रिटिश दैनिक गार्डियन ने पिछले वर्ष प्रकाशित की थी. उसके बाद यूरोपीय संघ की संसद, विश्व ट्रेड यूनियन महासंघ ‘आइटक’ और मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल का ध्यान भी इस ओर गया. लेकिन, कतर में मर रहे लोगों के देशों में – जिनमें भारत भी शामिल है – सब कुछ अनदेखा कर देने की ही प्रवृत्ति देखने में आ रही है.

‘कतर अंतरात्मा-विहीन देश है’
फरवरी 2014 में, यूरोपीय संसद में कतर के साथ-साथ फीफा को भी खरी-खोटी सुनाई गई. ‘आइटक’ ने अपने तथ्यान्वेषी कतर में भेजे. मार्च 2014 में प्रकाशित उन की रिपोर्ट का पहला ही वाक्य है, ‘कतर अंतरात्मा विहीन देश है.’ रिपोर्ट का कहना है कि ‘दीन-हीन प्रवासी मजदूर हों, उच्च वेतनभोगी कुशलकर्मी हों या वहां बस गए विदेशी, उनके लिए मौलिक मानवाधिकारों और स्वतंत्रताओं का कोई अस्तित्व ही नहीं है. विदेशी श्रमिक गुलामों जैसे हैं – ऐसे नियोक्ताओं की मिल्कियत हैं जो उन्हें भर्ती करते हैं. नियोक्ता के ही हाथ में वेतन-मजदूरी व काम की शर्तें तय करने, पहचानपत्र जारी करने, काम बदलने से मना करने या देश छोड़ने के लिए जरूरी निर्गमन-वीजा देने न देने का सारा अधिकार सीमित है. इसे कफाला प्रणाली कहा जाता है.’ यदि किसी के पास पहचानपत्र (आइडेंटिटी कार्ड) नहीं हुआ, तो उसे जेल भी जाना पड़ सकता है. ‘आइटक’ का कहना है कि 2022 में विश्व कप शुरू होने तक बंधुआ मजदूरों-जैसी मनमानी गधा-मजूरी करवाने वाली यह ‘कफाला’ प्रणाली चार हजार से अधिक प्रवासी मजदूरों का कफन बन चुकी होगी.

जर्मन ट्रेड यूनियन महासंघ ‘डीजीबी’ ने भी फरवरी 2014 में एक निरीक्षक दल कतर भेजा, जबकि वहां जर्मनी के कोई श्रमिक नहीं हैं. दल ने दोहा के पास के 10 श्रमिक शिविरों का अवलोकन किया. अपनी रिपोर्ट में उसने प्रवासी श्रमिकों की श्रम और रहन-सहन की परिस्थितियों को आड़े हाथों लेने के साथ-साथ यह भी आशंका व्यक्त की है कि कतर में संभवतः अभी ही 4000 विदेशी श्रमिकों की मृत्यु हो चुकी है. जर्मन ट्रेड यूनियन महासंघ के अध्यक्ष मिशाएल जोमर ने यह रिपोर्ट देखने के बाद कतर की न केवल जमकर निंदा की, बल्कि फीफा से यह मांग भी की कि कतर से 2022 वाले विश्व कप की मेजबानी छीन ली जाए. एक जर्मन पत्रिका के माध्यम से मार्च में उन्होंने कहा, ‘कतर की सरकार को लेकर हमारी आशंकाएं पूरी तरह सही साबित हुई हैं. कतर यदि अपनी कफाला प्रणाली पर अटल रहता है- जो दासप्रथा के समान है – और अंतरराष्ट्रीय श्रम-मानकों का पालन प्रमाणित नहीं कर पाता, तो उससे विश्व कप की मेजबानी छीन ली जानी चाहिए… कतर वालों ने अब तक बस यही किया है कि सब की आंखों में धूल झोंकते रहे हैं.’

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‘पशुओं जैसा बर्ताव’
मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी यही पाया है. उसके निरीक्षकों ने कतर में 210 विदेशी श्रमिकों, उनके नियोक्ताओं और सरकारी अधिकारियों से बातचीत की. अपनी रिपोर्ट, ‘द डार्क साइड ऑफ माइग्रेशन’ (उत्प्रवास का काला पक्ष) में एमनेस्टी ने लिखा कि श्रमिकों के शोषण के कुछ मामले वाकई ‘बंधुआ मजदूरी’ के समान हैं. श्रमिकों के साथ ‘पशुओं जैसा बर्ताव’ किया जाता है. उन्हें 12-12 घंटे खटना पड़ता है– सप्ताह के सातों दिन, भीषण गर्मी वाले दिनों में भी. अकेले 2012 में ऊपर से गिर जाने के कारण राजधानी दोहा  के मुख्य अस्पताल के अभिघात (ट्रॉमा) विभाग में एक हजार लोगों को भर्ती किया गया. उन में से 10 प्रतिशत विकलांग बन कर घर लौटे. उन लोगों की संख्या भी ‘कम नहीं थी”, जिनकी केवल लाश ही घर लौटी.

अंतरराष्ट्रीय पुटबॉल संघ फीफा को न केवल यही खरीखोटी सुननी पड़ रही है कि वह कतर के कान क्यों नहीं ऐंठता, उससे यह भी पूछा जा रहा है कि उसकी कार्यकारिणी के सदस्य स्वयं कितने दूध के धुले हैं? यूरोपीय देशों का मीडिया तो फीफा के पीछे पड़ा ही था, अब जापान की सोनी और जर्मनी की अदिदास कंपनियों जैसे प्रायोजक भी, जो फीफा के कार्यक्रमों में हाथ बंटाते हैं, उससे पूछने लगे हैं कि कतर वाले प्रकरण की ठीक से जांच क्यों नहीं हो रही है. दोनों की देखादेखी, हो सकता है, दूसरी कंपनियां भी यही मांग करने लगें. उनकी चिंता स्वाभाविक भी है. अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल फीफा ही नहीं, उनके लिए भी अरबों डॉलर की कमाई वाला धंधा है. अकेले 2013 में फीफा ने एक अरब 40 करोड़ डॉलर की कमाई की. 60 करोड़ डॉलर उसे फुटबॉल मैचों के प्रसारण अधिकारों की बिक्री से मिले और 40 करोड़ डॉलर सोनी, अदिदास, कोका-कोला, एमिरत एयरलाइंस, ह्यूंदेई और वीसा क्रेडिट-कार्ड जैसी प्रायोजक या साझेदार कंपनियों से. इन कंपनियों ने स्वयं जो लाभ कमाया, उसे वही जानती हैं. उन्हें चिंता हो रही है कि कतर-कांड उनके भावी लाभों के पर कतर देगा.

फीफा भ्रष्टाचार का घर
फीफा के भीतर भ्रष्टाचार के आरोप पहले भी लगते रहे हैं. कतरी नागरिक मोहम्मद बिन हम्माम फीफा की कार्यकारिणी समिति के लंबे समय तक सदस्य और उस के अध्यक्ष योजेफ ब्लाटर के सहयोगी रहे हैं. उनके बारे में कहा जाता रहा है कि 2022 वाले विश्व कप की मेजबानी कतर को दिलाने के लिए उन्होंने कार्यकारिणी के कुछ सदस्यों व दूसरे प्रभावशाली लोगों को भारी रिश्वतें दीं. फीफा की गतिविधियों से सुपरिचित एक जर्मन प्रेक्षक का मत है कि बिन हम्माम का ताना-बाना इतना व्यापक था कि यह हो नहीं सकता कि योजेफ ब्लाटर को उनके कारनामों की कोई भनक तक न रही हो.

इसी जून की शुरुआत से ब्रिटिश पत्र ‘द संडे टाइम्स’ कतर-कांड की आग में नया घी डाल रहा है. उसने दावा किया है कि उसके पास बिन हम्माम की कारस्तानियों की पोल खोलने वाले ‘दसियों लाख ईमेल और दूसरे दस्तावेज’ हैं. उनसे पता चलता है कि 2022 के विश्व कप की मेजबानी कतर को दिलाने का अपना अभियान उन्होंने 2009 में ही शुरू कर दिया था. इसके लिए उन्होंने फीफा के प्रमुख अधिकारियों की जेबें कुल मिलाकर 50 लाख डॉलर से और कुछ एशियाई प्रतिनिधियों की 17 लाख डॉलर से गरम कीं. फीफा कार्यकारिणी के ताहिती वासी सदस्य रीनल्ड तेमारी का वोट पाने के लिए उनके वकीलों का 3,05,000 डॉलर का बिल चुकाया. यह हो नहीं सकता कि इतना सारा धन बिन हम्माम ने अपनी जेब से बांटा हो. उनके पीछे जरूर कतर की सरकार रही होगी. सरकार नहीं रही होती तो वे कतर और थाईलैंड के बीच प्राकृतिक गैस का एक ऐसा सौदा भी नहीं पटा सके होते, जिसके बदले में फीफा की कार्यकारिणी के थाई सदस्य वोरावी माकूदी का वोट मिलना सुनिश्चित हो गया – माकूदी हालांकि इससे इन्कार करते हैं.

लाखों डॉलर रिश्वत में बांटे
‘संडे टाइम्स’ के अनुसार, मोहम्मद बिन हम्माम न केवल लाखों डॉलर की रिश्वतें बांट रहे थे, राजनीतिक लाभों के लिए अपने व्यापारिक संबंधों को भी इस्तेमाल कर रहे थे. अक्टूबर 2020 में वे ‘द्विपक्षीय खेल-संबंधों’ पर बातचीत करने के लिए रूसी नेता ब्लादिमीर पुतिन से भी मिले थे. गौरतलब है कि दिसंबर 2010 में हुए मतदान में फीफा की कार्यकारिणी समिति ने कतर को 2022 और रूस को 2018 के विश्व कप का मेजबान घोषित किया था. रूस के पक्ष में 13 मत पड़े थे, हालांकि रूस के चयन को लेकर अनियमितता के कोई आरोप अभी तक नहीं लगे हैं. मतदान से पांच माह पूर्व बिन हम्माम ने जर्मनी के पू्र्व फुटबॉल खिलाड़ी और उस समय फीफा कार्यकारिणी के सदस्य रहे फ्रांत्स बेकेनबाउएर को तेल और गैस परिवहन में लगी एक कंपनी के बोर्ड प्रमुख के साथ दोहा आमंत्रित किया था.

ब्रिटिश दैनिक ‘टेलीग्राफ’ ने भी जून के शुरू में दावा किया कि उसके पास भी अब तक अप्रकाशित गोपनीय सामग्रियां हैं. उनसे पता चलता है कि मोहम्मद बिन हम्माम व्यापारिक सौदे पटाने के बहाने से उन देशों के सरकारी अधिकारियों से मिलते-जुलते रहे हैं, जिनका फीफा की कार्यकारिणी समिति में अपना कोई सदस्य था. वे फीफा के सदस्यों को कारों की डीलरशिप या उनके परिजनों को नौकरी अथवा प्रशिक्षण सुविधा दिलाने की भी पेशकश किया करते थे. उन्हीं के प्रयासों से कतर की सरकारी संस्था ‘कतर स्पोर्ट्स इन्वेस्टमेंट्स’ ने फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोला सार्कोजी के प्रिय फुटबॉल क्लब ‘पारी सां-जेर्मां’ को खरीदकर उसका उद्धार किया. फीफा कार्यकारिणी के फ्रांसीसी सदस्य मिशेल प्लातिनी के पुत्र लौरों प्लातिनी को कतर की एक प्रमुख खेल सामग्री कंपनी ‘बर्रदा’ के यूरोपीय विभाग का प्रमुख बना दिया गया. फीफा के एक पूर्व उपाध्यक्ष ट्रिनीडाड के जैक वॉर्नर और उनके दो बेटों को कुल मिलाकर 20 लाख डॉलर कथित ‘विकास सहायता’ के तौर पर मिले. फीफा ने अमेरिकी वकील और इंटरपोल के एक पूर्व उपाध्यक्ष माइकल गार्सिया को 2010 वाले इस मतदान की पृष्ठभूमि की जांच करने का काम सौंपा है. तीन वर्षों से चल रही उनकी जांच की रिपोर्ट जुलाई में प्रकाशित होने वाली है.

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छिन सकती है कतर की मेजबानी
इस रिपोर्ट की उन सब लोगों, संस्थाओं और कंपनियों को अधीरता से प्रतीक्षा है, जिनकी मांग है कि भ्रष्टाचार के आरोप प्रमाणित हो जाने पर कतर से 2022 की विश्व कप मेजबानी छीन ली जानी और दोषियों को दंडित किया जाना चाहिए. जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और ब्रिटेन के फुटबॉल संघों के प्रमुख तो यह मांग कर ही रहे हैं, यूरोपीय फुटबॉल संघ ‘यूएफा’ के अध्यक्ष और स्वयं आरोपों से घिरे फ्रांस के मिशेल प्लातिनी ने भी पांच जून को एक फ्रांसीसी पत्रिका से कहा, ‘भ्रष्टाचार यदि प्रमाणित हो जाता है, तो हमें पुनः मतदान करना और दोषियों को दंडित करना होगा.” कतर की जगह लेने के लिए ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका अभी से तैयार होने लगे हैं. लेकिन दो दिसंबर 2010 को फीफा के मुख्यालय में हुए मतदान में भ्रष्टाचार यदि सचमुच प्रमाणित हो जाता है, तो न केवल कतर के चुनाव को ही, बल्कि रूस के चुनाव को भी रद्द घोषित करना पड़ेगा. दोनों का चुनाव एक ही दिन और कार्यकारिणी के उन्हीं सदस्यों ने किया था, जो हो सकता है भ्रष्टाचार के दोषी पाए जाएं. फीफा के वर्तमान अध्यक्ष योजेफ ब्लाटर के भविष्य पर भी काले बादल छा सकते हैं. वे 2015 में अध्यक्ष पद का चुनाव फिर से लड़ना चाहते हैं.

भ्रष्टाचार संबंधी दंडविधान के स्विस प्रोफेसर मार्क पीथ का मत है कि यदि यह दोटूक प्रमाणित नहीं हो पाता कि कतर ने विश्व-कप की मेजबानी ‘खरीदी’ थी, और तब भी उससे मेजबानी छीन ली जाती है, तो ‘कतर क्षतिपूर्ति का कानूनी दावा ठोक सकता है.’ कतर ने विश्व कप से जुड़े निर्माणकार्यों पर पिछले चार वर्षों में जो भी खर्च किया है उसकी भरपाई करना फीफा के लिए भारी पड़ सकता है.

कहां से मिले नए दस्तावेज?
एक दिलचस्प प्रश्न यह भी है कि ‘संडे टाइम्स’ और ‘टेलीग्राफ’ को लाखों ईमेल और दूसरे दस्तावेज ब्राजील में विश्व कप शुरू होने के ठीक पहले ही मिले कहां से?  दो अनुमान लगाए जा रहे हैं: एक यह कि हो सकता है कि इंटरनेट सहित हर तरह के वैश्विक दूरसंचार को सुन और पढ़ रही ब्रिटेन की ‘जीसीएचक्यू’ तथा अमेरिका की  ‘एनएसए’ गुप्तचर सेवा से वे मिले हों. दूसरा यह कि फीफा के अपने ही लोगों ने उन्हें कहीं से उड़ाया और आगे बढ़ाया है. इस दूसरे अनुमान के पक्षधरों का कहना है कि ‘प्राइस वॉटरहाउस कूपर्स’ कंपनी के जांचकर्ताओं ने 2012 में बिन हम्माम के गोरखधंधों की जांच की थी. उसी जांच के आधार पर बिन हम्माम को फीफा से दूसरी बार जीवन भर के लिए निलंबित कर दिया गया था. उस जांच संबंधी कागज-पत्र कहीं न कहीं तो रहे ही होंगे.

लगता है, भ्रष्टाचार का घुन विश्व फुटबॉल संघ को ही नहीं, उसके सदस्य देशों के फुटबॉल संघों को भी लग गया है. 2014 के विश्व कप के मेजबान ब्राजील के फुटबॉल संघ ‘सीबीएफ’ के अध्यक्ष रिकार्दो तेक्सेइरा, विश्व कप की तैयारियों के  ठीक बीच में दो साल पहले अमेरिका भाग खड़े हुए – आसन्न गिरफ्तारी से बचने के लिए. संघ में भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार फिर भी पूर्ववत है. संघ स्वयं और उस की विश्व कप आयोजन समिति, दोनों, कोई जनहितकारी संस्था नहीं, बाकायदा व्यावसायिक कंपनियां हैं. लाभ कमाना उनका काम है. देश-भर में फैले 700 व्यावसायिक फुटबॉल क्लब ‘सीबीएफ’ की शाखाएं हैं. शौकिया या युवा खिलाड़ियों से उसे या उसके क्लबों को कोई मतलब नहीं. 2013 में ‘सीबीएफ’ ने 20 करोड़ डॉलर के कारोबार में ढाई करोड़ डॉलर का लाभ कमाया. उच्च पदाधिकारी ‘सीबीएफ’ के अपने जेट विमानों में घूमते-फिरते हैं और प्रमुख पदों पर अपने ही नाते-रिश्तेदारों को बिठाते हैं.

कहने की आवश्यकता नहीं कि भ्रष्टाचार एक विश्वव्यापी बीमारी है. कोई भी और कुछ भी उससे अछूता नहीं है. बड़े-बड़े खेल आयोजन तो बिल्कुल नहीं.

‘हिंदी साहित्यिक समाज, भय और लालच से संचालित होता है’

imgक्या यह कहना सही नहीं होगा कि आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार तब मिला जब आपके लिए इसका कोई मतलब नहीं रह गया है?
यह काफी हद तक सही है. पर, मुझे खुशी इस बात की है कि यह पुरस्कार ‘मिलजुल मन’ को मिला. यह पारंपरिक ढंग का उपन्यास नहीं है. इसमें शिल्पगत और भाषागत प्रयोग बहुत हैं. उर्दू शब्दों का भी खूब इस्तेमाल किया गया है. इस उपन्यास का पुरस्कृत होना इस बात का संकेत है कि अकादेमी अपने खांचे से बाहर निकल रही है और लीक से हटकर लिखे गए उपन्यासों के लिए भी द्वार खुल रहे हैं. मैं सोचती हूं कि यह पुरस्कार मुझे बहुत पहले ‘अनित्य’ (1980)  पर मिल जाता तो क्या होता? क्या मैं ज्यादा लिखती या जो लिखा है उससे अलग लिखती? मेरा उत्तर है बिल्कुल नहीं. हां, इतना जरूर है कि मेरी रचनाओं का अन्य भाषाओं में अनुवाद बहुत पहले हो जाता जो आज हो रहा है. इतने साल जो मेरे साथ अन्याय हुआ वह नहीं होता. मेरा ठीक से मूल्यांकन नहीं हुआ, शायद वह हुआ होता.

आप  ‘चित्तकोबरा’  उपन्यास के कारण साहित्य जगत में चर्चित हुईं. इस उपन्यास पर अश्लीलता का आरोप लगा. उस समय सारिका के संपादक रहे कन्हैयालाल नंदन ने अपनी पत्रिका में आपके तथाकथित अश्लील लेखन के विरुद्ध अभियान चलाया. इन सब ने आपके लेखकीय व्यक्तित्व और साहित्य समाज में आपकी स्थिति को किस कदर प्रभावित किया?
यह बिल्कुल गलत धारणा है कि मैं चित्तकोबरा के कारण चर्चित हुई. मेरे पहले उपन्यास ‘उसके हिस्से की धूप’ की खूब चर्चा हुई. इस उपन्यास से मैं पूरी तरह चर्चित हो गई थी. चित्तकोबरा से पहले ‘डेफोडिल्स जल रहे हैं’ जैसी मेरी कहानियां धूम मचा चुकीं थीं. मैं उस समय की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में बड़े-बड़े रचनाकारों के साथ छप चुकी थी. ‘चित्तकोबरा’ पर हुए विवाद ने मेरे लेखकीय व्यक्तित्व को एकदम नहीं प्रभावित किया. बल्कि मैं और ज्यादा निडर हो गई कि ‘भाड़ में जाएं सब.’ मैंने महसूस किया कि विरोध करने वालों में कोई अकल नहीं है. इसके बाद मेरे मन में इनके लिए कोई इज्जत नहीं रही. इनके विरोध को दरकिनार करके मैंने अपना लेखन जारी रखा. हां, यह जरूर है कि इससे मेरी साहित्यिक स्थिति पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा. इन्हें एक डंडा मिल गया मुझे पीटने के लिए. अनेक लोगों ने सुनी-सुनाई बातों पर बिना पढ़े मेरा विरोध शुरू कर दिया. एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपन्यास होने के बावजूद लोगों ने ‘अनित्य’ का जिक्र करना छोड़ दिया.

आपका विरोध स्त्री रचनाकारों ने भी कम नहीं किया है. आपकी पीढ़ी की ही अन्य स्त्री रचनाकार आपके लेखन से असहमत रही हैं. समकालीनों द्वारा अपने विरोध का आप क्या कारण मानती हैं?
जिस ईर्ष्या के तहत पुरुषों ने मेरा विरोध किया उसी ईर्ष्या के कारण महिलाओं ने भी मेरा विरोध किया. स्त्री रचनाकारों की ईर्ष्या का पता इसी से चलता है कि मेरे साहित्य अकादमी पुरस्कार समारोह में कोई नहीं आई. यहां तक कि मुझे बधाई देने या मेरे घर चाय पीने तक नहीं आईं. ये लोग चित्तकोबरा का विरोध करती हैं, पर इन्हें आजतक समझ में नहीं आया कि वह किस तरह का उपन्यास है. मैं तो कहती हूं कि ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, राजी सेठ इनमें से कोई ‘चित्तकोबरा’ जैसा उपन्यास तो छोड़िए उस मिजाज की कोई कहानी भी लिख दें तो मैं अपना साहित्य अकादेमी अवार्ड लौटा दूंगी.

 ‘चित्तकोबरा’  के जिस अंश पर अश्लीलता का आरोप है, उसमें आपने यौन क्रिया का बहुत ही स्थूल वर्णन किया है. सवाल यह है कि वर्णन की इस भाषा और पोर्नोग्राफी में क्या अंतर है?
पोर्नोग्राफी रोमांचित करता है जबकि वह प्रकरण स्त्री की यंत्रणा को अभिव्यक्त करता है. अगर मुझे सनसनी के लिए लिखना होता तो मैं उस स्थिति में स्त्री को प्रेमी के साथ नहीं दिखाती? मैंने तो उसे पति के साथ दिखाया है. उस वर्णन में न तो रोमांच है न रस है बल्कि यह यांत्रिक और उबाऊ है. वह ‘सेंसुअल’ तो है लेकिन ‘सेक्सुअल’ नहीं है. वह यौन इच्छा को मारता है उसे उत्तेजित नहीं करता. क्या ऐसा पोर्नोग्राफी में होता है? उस वर्णन में पति-पत्नी के बीच सेक्स की यांत्रिकता को दिखाया गया है जो अधिकांश घरों में घटित होता है. वह उस यंत्रणा का वर्णन है जिसमें स्त्री अपने मस्तिष्क से शरीर को अलग कर लेती है.

यह आम धारणा रही है कि पुरुष की यौन संतुष्टि के लिए उसके शरीर और मन का एक होना आवश्यक नहीं है, जबकि स्त्री के लिए ऐसा जरूरी माना जाता है. आप इस बात की जोरदार वकालत करती रही हैं कि स्त्री के लिए भी यह आवश्यक नहीं है. आपका स्त्री के संदर्भ में मन और शरीर के द्वैत पर बल देने का आधार क्या है?
स्त्रियों के लिए मन और शरीर का द्वैत ही परिवार के भीतर यांत्रिक सेक्स की समस्या से निपटने का उपाय  है. इस विचार के साथ पासा पलट जाता है. अब तक पुरुष, स्त्री को देह मानता आया है. स्त्री जब मस्तिष्क को शरीर से अलग करती है तो पुरुष उसके लिए सिर्फ देह हो जाता है. कहने का तात्पर्य यह है कि स्त्री भी पुरुष को देह मानकर चल सकती है. अधिकांश घरों में स्त्रियां यही करती हैं. हिंदुस्तान में तो अधिकांश शादियां  ‘अरेंज’ होती हैं, यहां तो प्रेम होता ही नहीं है. इसलिए मैं कहना चाहती हूं कि शारीरिक सुख के लिए प्रेम की अनिवार्यता नहीं है बशर्ते कि हिंसा और नफरत न हो. इसका कोई प्रमाण नहीं है कि स्त्री को यौन संतुष्टि के लिए शरीर और मन का मिलना अनिवार्य है. दरअसल पुरुष की यौन संतुष्टि दिखती है. वह इसके बारे में झूठ नहीं बोल सकता. स्त्रियों का दिखता नहीं है.

आपके उपन्यास  ‘कठगुलाब’  में जितने भी प्रमुख पुरुष पात्र हैं, सभी स्त्रियों के प्रति लोलुप और यौन हिंसा करने वाले  हैं. क्या सभी पुरुष ऐसे ही होते हैं? कोई अच्छा नहीं होता?
सभी नहीं पर अधिकांश पुरुष ऐसे ही होते हैं. किंतु आप देखिए कि उस उपन्यास में बिपिन नाम का पुरुष पात्र भी है. बिपिन एक तरह से सभी बुरे पुरुष पात्रों का  जवाब है. उसमें अर्द्ध  नारीश्वर का तत्व है. उसमें पुरुष और स्त्री दोनों की संवेदनाओं का मिश्रण है. अगर पुरुष बिपिन की तरह होने की कोशिश करें तो स्त्रियों को कोई समस्या नहीं होगी. मारियन का पिता भी एक उदात्त चरित्र है.

‘मेरे साहित्य अकादमी पुरस्कार समारोह में कोई स्त्री रचनाकार नहीं आईं. यहां तक कि मुझे बधाई देने या मेरे घर चाय पीने तक भी कोई नहीं आया’

 इस उपन्यास में असीमा सर्वाधिक विरोधी पात्र है. शुरू में अन्य स्त्री पात्रों की तुलना में उसकी स्थिति ठीक है. किंतु अंत में वह एक असफल पात्र में तब्दील हो जाती है. क्या आपकी नजर में पितृसत्ता से समझौता किए बिना स्त्री का कोई भविष्य नहीं है?
देखिए, असीमा ने कुछ भी बदलने की कोशिश नहीं की बल्कि अपने अंदर की संवेदनाओं को मारने का प्रयास किया. जो भी प्रकृति के विरुद्ध चलेगा वह हारेगा ही. इसमें अस्वाभाविक कुछ नहीं है. रास्ता किसी तरह के अतिवाद में नहीं है बल्कि वह नकार और स्वीकार के बीच से है. पुरुष के नकार से कोई समाधान नहीं निकलेगा. कहीं न कहीं सामंजस्य तो आवश्यक है. यह समझौता नहीं है बल्कि जीवन के लिए अनिवार्यता है. जिसे आप समझौता कहते हैं उसे मैं जीवन कहती हूं. समाधान स्त्री-पुरुष मिलकर ही कर सकते हैं, विरोध या मुकाबले से नहीं.

आप स्त्री मन और पुरुष मन जैसी किसी चीज को नहीं मानती हैं. इसी कारण लेखन के क्षेत्र में स्त्री-पुरुष विभाजन को भी अस्वीकार करती हैं?
मैं स्त्री का अनुभव, स्त्री दृष्टि आदि जैसी किसी चीज को नहीं मानती हूं. इसके बरक्स मैं लेखकीय अनुभव और लेखकीय दृष्टि को महत्व देती हूं. मेरा स्पष्ट मानना है कि स्त्री-पुरुष का विभाजन सिर्फ जैविक विभाजन है और स्त्री-पुरुष के बीच अंतर भी सिर्फ जैविक है, बाकी जो अंतर दिखता है वह संस्कारगत है जिसे खत्म किया जा सकता है. इसलिए मैं कहती हूं कि रचनाकार सिर्फ रचनाकार होता है उसे स्त्री और पुरुष में विभाजित करना ठीक नहीं है. रही बात अनुभव की तो प्रत्येक के अनुभव की एक सीमा होती है. बहुतों को बहुत सारे अनुभव नहीं होते. कोई भी लेखक हर विषय पर नहीं लिख सकता. दूसरी बात यह है कि केवल अनुभव होने मात्र से न तो कोई लेखक बन सकता और न ही कोई रचना लिखी जा सकती है. एक और बात समझने की है कि रचनाकार के लिए परकाया प्रवेश अति आवश्यक है. वही रचनाकार महान होता है जो अपनी संवेदना का अधिक से अधिक विस्तार कर पाता है. मेरा मानना है कि असल सवाल जेंडर का नहीं, संवेदनशीलता का है, परकाया प्रवेश का है, रचनात्मकता का है और अहं के विसर्जन का है.

आपका कहना है कि आत्मकथा लिखने की जरूरत उनको पड़ती है जो रचना में अपने आत्म को खुलकर अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं. इसी कारण आपने स्वयं आत्मकथा लिखने से इंकार किया है. तो क्या आपके लेखन को विशुद्ध आत्मकथात्मक माना जाए?
मैंने लेखन में अपने आत्म को खुलकार अभिव्यक्त किया है. उसमें मेरी आकांक्षाओं और सपनों की अभिव्यक्ति है. उसमें मेरी जीवन की घटनाएं नहीं हैं. दरअसल, मैंने अनेक रचनाकारों की आत्मकथाएं पढ़ी हैं. वे मुझे निहायत उबाऊ लगीं. मुझे एक लेखक के लिए आत्मकथा लिखने का कोई तर्क समझ में नहीं आता है. लेखक का जो अनुभूत होता है, उसे वह रचनात्मक रूप देता है. जिन्हें लगता है कि उन्होंने नहीं दिया है, उन्हें लिखना चाहिए. इसी संदर्भ में मैं कहना चाहूंगी कि दलित आत्मकथाओं की बात दूसरी है. अधिकांश दलित रचनाकारों ने पहले-पहल आत्मकथा ही लिखी है. वह उनके लिए एक तरह से उपन्यास कहानी लिखने की पूर्व तैयारी की तरह है. पर, बीस-तीस साल लिख चुकने के बाद कोई आत्मकथा लिखता है तो समझ से परे है.

आपको हमेशा शिकायत रही कि आपका मूल्यांकन ठीक से नहीं हुआ. क्या कारण मानती हैं आप?
मनोहर श्याम जोशी ने मुझसे कहा था कि तुम्हारा कभी ठीक से मूल्यांकन नहीं हो सकता, क्योंकि तुम न तो किसी का कुछ बुरा कर सकती हो और न भला. मुझे यह बात सौ फीसदी सच लगती है. हिंदी का साहित्यिक समाज भय और लालच, मुख्यतः दो ही चीजों से संचालित होता है.

अर्जेंटीना

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विश्व रैंकिंग: 5
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनविजेता (1978, 86)

खास बात
एडिन जेको के रूप में भले ही बोस्निया- हर्जेगोविना के पास एक शानदार स्ट्राइकर हो, लेकिन उनकी सुरक्षा पंक्ति में वह मजबूती नहीं है. यही वजह है कि अपनी रणनीति बनाते हुए कोच साफेत सूसिक को मिडफील्ड की तरफ ज्यादा ध्यान देना होगा. इस लिहाज से सईद कोलासिनेक एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी साबित हो सकते हैं

लियोनल मेसी को बहुत से लोग विश्व का सबसे बेहतरीन खिलाड़ी मानते हैं. 2010 विश्व कप से पहले तक वे अर्जेंटीना की टीम के पर्याय माने जाते थे. मेसी के अतिरिक्त किसी और खिलाड़ी की कोई चर्चा तक नहीं होती थी. इस साल भी लोग मेसी से पूरे मैदान पर छा जाने की उम्मीद लगाए बैठे हैं. लोगों को भरोसा है कि जिस तरह से मेसी बार्सिलोना के लिए कमाल दिखाते आए हैं उसी तरह वे इस बार राष्ट्रीय टीम के लिए गोलों की बारिश करने में सफल होंगे. ठीक वैसे ही जैसे डिएगो मैराडोना करते थे. हालांकि मेसी और मैराडोना के तौर-तरीकों में अंतर है. मेसी मैराडोना की तरह भावनात्मक उग्रता का प्रदर्शन नहीं करते बल्कि मैदान में भी वे बेहद लो प्रोफाइल रहते हैं. हालांकि अब अर्जेंटीना की टीम एक व्यक्ति केंद्रित नहीं है. टीम में और कई सितारे हैं. 4-3-3 के आधार पर टीम गठन के हिसाब से अर्जेंटीना के पास  एंजेल डि मारिया (रियल मैड्रिड), सर्जियो अगुएरो  (मैनचेस्टर सिटी) और गोंजालो हिगुएन (नेपोली) जैसे तीन फारवर्ड हैं जो मेसी का साथ देंगे. विश्व कप क्वालीफाइंग मुकाबले में जहां मेसी ने 10 गोल दागे वहीं हिगुएन भी अपने 9 गोलों के साथ मेसी से बराबरी करते दिखाई दिए. रियल मैड्रिड के लिए मारिया ने यूईएफए चैंपियनशीप लीग फाइनल में बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया. वहीं अगुएरो ने सिटी की खिताबी जीत में एक शानदार भूमिका निभाई. टीम की रक्षा पंक्ति में जेकील गारे, हुजो कैंपेग्नारो, पाब्लो जबालेटा जैसे बड़े खिलाड़ी शामिल हैं. हालांकि मार्टिन डेमिशेलिस की मौजूदगी टीम के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है.

फ्रांस

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विश्व रैंकिंग: 17
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन : विजेता (1998)

खास बात

फ्रेंक रिबेरी और समीर नासरी की अनुपस्थिति में मैथ्यू वाल्बुएना की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है. सामान्य तौर पर दाएं क्षेत्र में तैनात किए जाने वाले प्रतिभाशाली मैथ्यू से शायद ही कभी गेंद छूटती है. इसके साथ ही रक्षा पंक्ति को भेदने वाले मौकों पर उनकी खास नजर रहती है

स्टार खिलाड़ी फ्रेंक रिबेरी का चोटिल होने के कारण फुटबॉल विश्व कप से बाहर होना फ्रांस की टीम के लिए बड़ा झटका है. बायर्न म्यूनिख के इस 31 वर्षीय फॉरवर्ड से पूरी टीम ये उम्मीद लगाए बैठी थी कि वह जरूर इस बार उसके नेतृत्व में विश्व कप ले आएगी. ब्राजील में पूरी टीम रिबेरी की कमी महसूस कर रही है. एक तरफ रिबेरी टीम से बाहर हैं, वहीं कोच डिडियर डैशचैम्प्स के उस निर्णय ने भी टीम के कप जीतने की उम्मीदों पर सवालिया निशान लगा दिया है जिसके तहत उन्होंने मैनचेस्टर सिटी के मिडफील्डर समीर नासरी को टीम में शामिल नहीं किया. डैशचैम्प्स का कहना था कि 41 मैच खेल चुके नासरी विश्व कप की उनकी योजनाओं में फिट नहीं बैठते क्योंकि विश्व कप के लिए चुनी गई टीम में शामिल खिलाड़ियों की तुलना में उनका प्रदर्शन कमजोर रहा है.टीम में प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की भरमार होने के बावजूद फ्रांस 2008 के यूरो कप और 2010 के विश्व कप में एक भी मैच नहीं जीत पाया. हालांकि ग्रुप ई में स्विट्जरलैंड, होंडुरास, इक्वेडोर के साथ शामिल फ्रांसीसी टीम के इस बार कुछ बेहतर करने की उम्मीद जताई जा रही है. रियल मैड्रिड के रफेल वराने के रूप में फ्रांसीसी टीम के पास एक बेहतरीन डिफेंडर है. फ्रैंक रिबेरी टूर्नामेंट से बाहर हैं, लेकिन फिर भी टीम की रक्षापंक्ति बेहद मजबूत है. फ्रांस के शानदार गोलकीपर ह्यूगो लौरिस के अलावा अनुभवी डिफेंडर पैट्रिस एव्रा, लॉरेन्ट कोसाइनली और रफाएल वरान टीम की ताकत हैं. इसके अलावा मिडफील्डर पॉल पोग्बा अपने फॉरवर्ड खिलाड़ी करीम बेंजेमा और ऑलिवर जिरू के लिए मैजिक पास देकर गोल के मौके बना सकते हैं. हाल ही में हुई चैंपियंस लीग में करीम रियल मैड्रिड की जीत के सबसे बड़े सितारे रहे. रिबेरी के अनुपस्थिति में ऑलिवर एक बड़ी भूमिका में रहेंगे. और न्यूकैसल के लॉइक रेमी एक सूपरसब (विकल्प) के तौर पर मददगार साबित हो सकते हैं.

होंडुरास

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विश्व रैंकिंग: 33
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन : ग्रुप स्टेज (2010)

खास बात
होंडुरास कभी भी फुटबॉल खेलने की अपनी प्रतिभा के कारण चर्चित नहीं रहा. अपनी इस कमी को वह शारीरिक दमखम से भरता दिखता है. टीम के हर खिलाड़ी की बनावट एक टैंक सरीखी है जिससे वह अपने प्रतिद्वंदियों पर ताकत के लिहाज से बीस पड़ता है. ऐसे में प्रतिद्वंदी के हाथ पांवों के अलावा उसके अहम को भी चोट लगने की संभावना है

होंडुरास के खिलाड़ी दुनिया की नजरों में उस समय आए जब उन्होंने धमाकेदार तरीके से 2012 लंदन ओलंपिक के क्वार्टर फाइनल में अपनी जगह बनाई. अंतिम आठ में टीम ब्राजील से भले हार गई, लेकिन उस खेल के दौरान टीम ने जो सीखा, जो अनुभव किया वो उसे लंबी रेस के लिए तैयार करने वाला था. ‘हम कर सकते हैं’ जैसे आत्मविश्वास के भाव से टीम को भरने और उसे विश्व फुटबॉल के नक्शे पर लाने का श्रेय टीम के साल 2011 से कोच कोलंबियाई मूल के लुइस सुआरेज़ को जाता है.टीम की रक्षा पंक्ति का इतिहास बहुत शानदार रहा है, जहां कीपर नोएल वलाडेर्स ने 100 से अधिक मैचों में टीम का प्रतिनिधित्व किया है. दिग्गज खिलाड़ी विक्टर बर्नार्डेज और मेनोर फिगरो मिडफिल्ड में बेहतरीन साझेदारी के लिए जाने जाते हैं. वहीं सेल्टिक और रेंजर्स के लिए खेलने वाले एमिलियो इजागुरे और अर्नोल्ड पेराल्टा की साझेदारी से तैयार रक्षा पंक्ति का तोड़ निकालना विपक्षी टीम के लिए हमेशा बेहद मुश्किल भरा रहा है. एमिलियो इजागुरे ने 2010-11 में इतने बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया कि उन्हें उस साल के स्कॉटिश प्रिमियर लीग के खिलाड़ी का खिताब मिला. विल्सन पैलेसियस जहां मैदान के मिडफिल्ड में मोर्चा संभालेंगे वहीं एंडी नाजर और ऑस्कर गार्सिया अग्रिम पंक्ति का नेतृत्व करेंगे. कार्लो कॉस्टली और जेरी  बेंगस्टन के पूरे फॉर्म में फील्ड पर दिखने की उम्मीद है. कार्लो ने मैदान पर अगर कोई गलती की तो वो अपने नाम(कॉस्टली) के कारण मजाक का विषय जरूर बन सकते हैं. वहीं टीम के उभरते खिलाड़ी जेरी बेंगट्सन की प्रतिभा पर फिलहाल कोई उंगली उठाता नहीं दिखता.

बोस्निया-हर्जेगोविना

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विश्व रैंकिंग: 21
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनविश्वकप में पहली बार

खास बात
एडिन जेको के रूप में भले ही बोस्निया- हर्जेगोविना के पास एक शानदार स्ट्राइकर हो, लेकिन उनकी सुरक्षा पंक्ति में वह मजबूती नहीं है. यही वजह है कि अपनी रणनीति बनाते हुए कोच साफेत सूसिक को मिडफील्ड की तरफ ज्यादा ध्यान देना होगा. इस लिहाज से सईद कोलासिनेक एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी साबित हो सकते हैं

बोस्नियाई टीम के खेल में एक अलग रचनात्मकता है जो उसके कोच साफेत सूसिक की देन है. साफेत ने अपनी देखरेख में खेल के इस पक्ष पर खूब ध्यान केंद्रित किया. कहा जाता है कि बोस्नियाई टीम की यही रचनात्मकता उसकी सबसे बड़ी ताकत है जिसके दम पर टीम अपने उन विरोधियों पर भारी पड़ती है जो परंपरागत तरीके से खेलते हैं. हालांकि टीम की इस ताकत को उन टीमों से चुनौती मिलती है जो बेहद आक्रामकता के साथ अपना खेल खेलती हैं. टीम स्वाभाविक रूप से मैनचेस्टर सिटी के स्टार स्ट्राइकर एडिन जेको पर निर्भर है. ब्राजील में हो रहे इस फुटबॉल महाकुंभ में जेको का साथ रोमा के स्टार खिलाड़ी मिरालेम जानिक देंगे जो हाल में कई मौकों पर बेहतरीन खेल का प्रदर्शन कर चुके हैं.मैदान पर टीम का पूरा प्रदर्शन इन दोनों खिलाड़ियों के बीच के तालमेल पर ही निर्भर करेगा. इन्हीं दोनों के कंधों पर टीम को विजय दिलाने का पूरा दारोमदार रहेगा. वैसे जरूरत से ज्यादा रचनात्मकता भी कभी-कभी भारी पड़ जाती है. हाल के मैच इसकी पुष्टि करते हैं, जिनमें टीम की फॉरवर्ड पंक्ति उस समय थोड़ी भ्रमित दिखाई दी जब उसके खेलने के नियमित तौर-तरीकों में बदलाव हुआ. यही नहीं मिडफील्ड से पर्याप्त सहयोग नहीं मिलने के कारण टीम की समस्या और बढ़ती दिखाई दी. हालांकि टीम के पास इस चुनौती से निपटने के लिए 20 वर्षीय सईद कोलासिनेक जैसा खिलाड़ी भी है. सईद बतौर रक्षात्मक मिडफील्डर के रूप में अचानक होने वाले किसी जवाबी हमले से निपट सकते हैं. टीम के सामने दूसरी चुनौती अतिरिक्त खिलाड़ियों की कमी की भी है. किसी खिलाड़ी के चोटिल होने या थकने पर कोच साफेत सूसिक के पास विकल्प के रूप में जो खिलाड़ी हैं उनके खेल की गुणवत्ता उतनी नहीं है.

इटली

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विश्व रैंकिंग: 9
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनविजेता (1934, 38, 82, 2006)

खास बात
जब मारियो बालोटेली मैदान पर हों तो कब क्या होगा कोई नहीं कह सकता. एसी मिलान की ओर से खेलने वाले इस खिलाड़ी ने इस सीजन में जहां 18 गोल मारे वहीं उसे 15 कार्ड भी मिले (इनमें से 14 यलो और एक रेड कार्ड था). एक बात तो तय है, वे गोलकीपरों और रेफरी दोनों को काफी व्यस्त रखने वाले हैं
नीदरलैंड के साथ-साथ इटली को भी एक ऐसी टीम माना जाता है जो सदाबहार है, यानी जिसकी जीत की संभावनाएं हमेशा रहती हैं. लेकिन हाल के वर्षों में इटली की टीम में सितारों की कमी रही है. हां, वर्ष 2006 में जर्मनी में विश्व कप विजेता बनने वाली टीम के दो खिलाड़ी आंद्रिया पिर्लो और जनलुइजी बफॉन जरूर इस बार भी विश्व कप टीम का हिस्सा हैं. लेकिन इस टीम में ऐसी अनेक खूबियां भी हैं जो आमतौर पर सामने नहीं नजर आतीं. कोच सीजर प्रानडेली की इस टीम के लिए एक शृंखला बनाकर खेलना बीते दिनों की बात हो चुका है. यह वही कोच हंै जिनकी आक्रामक टीम ने वर्ष 2012 के यूरो कप के फाइनल में प्रवेश किया था. हालांकि वहां इनको स्पेन से 4-0 की शिकस्त खानी पड़ी थी. टीम के पास बफॉन के रूप में एक जबरदस्त गोलकीपर है और जॉर्जियो चेलिनी तथा जुवेंटस (फुटबॉल क्लब) के उनके साथी खिलाड़ी मिलकर टीम को एक दमदार बैकलाइन प्रदान करते हैं और टीम की रक्षा पंक्ति को मजबूत बनाते हैं. निस्संदेह पिर्लो इस टीम के सबसे जादुई खिलाड़ी हैं और वह मिडफील्ड में अपना करिश्मा दिखाना जारी रखेंगे. डेनियल डे रोसी और मार्को वेराट्टी के रूप में उनके पास दो बेहतरीन पासर्स भी हैं. फॉरवर्ड लाइन की बात करें तो मारियो बालोटेली आक्रमण की अगुआई करेंगे. हालांकि कई दफा वह अचानक लड़खड़ा जाते हैं लेकिन गोल की उनकी भूख का कोई जवाब नहीं. अगर वे विफल होते हैं तो टीम के पास सीरो इम्मोबाइल के रूप में ऐसा स्ट्राइकर भी है जो बेहद गतिशील है.

उरुग्वे

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विश्व रैंकिंग: 7
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनविजेता (1930, 50)

खास बात
इसमें दो राय नहीं कि उरुग्वे के पास दुनिया की बेहतरीन स्ट्राइकर जोड़ी है. लुइस सुआरेज और एडिनसन कवानी दोनों बहुत नैसर्गिक प्रतिभा के धनी हैं और एक-दूसरे की कमी को पूरा करते हैं. यह भी मानने की बात नहीं है कि कभी ऐसा होगा कि एक साथ एक ही दिन दोनों की चमक फीकी पड़ जाएगी

यह कोई ऐसी टीम नहीं है जो एक खिलाड़ी पर निर्भर हो लेकिन इस वक्त पूरा देश एक खिलाड़ी की फिटनेस को लेकर चिंतित है. टूर्नामेंट में सुआरेज की कमी का खमियाजा उरुग्वे को पहले ही मैच में उठाना पड़ा और वह कोस्टारिका से 3-1 से शिकस्त खा गया. इसमें कोई शक नहीं है कि सुआरेज दुनिया के सबसे खतरनाक स्ट्राइकर्स में से एक हैं और उनकी मौजूदगी या गैरमौजूदगी टीम के प्रदर्शन पर बहुत असर डाल सकती है. मई के अंत में हुए घुटने के ऑपरेशन ने उनकी विश्व कप संभावनाओं को दुविधा में डाल दिया है. सुआरेज ने इस सत्र में इंग्लिश प्रीमियर लीग में लिवरपूल के लिए खेलते हुए 33 मैचों में 31 गोल दागे हैं. उनकी गैर मौजूदगी में अन्य फॉरवर्ड खिलाड़ियों, एडिनसन कवानी और दिएगो फॉर्लोन पर दबाव बहुत बढ़ जाएगा. ऐसे में डिफेंस में दिएगो एमिगोस और दिएगो लुगानो तथा दिएगो गोदिन की मौजूदगी थोड़ा आश्वस्त करती है. मिडफील्ड थोड़ी चिंता का विषय है. 34 साल के दिएगो पेरेज पर उम्र का असर दिखने लगा है. उनके साथी एगिडियो अरेवालो रियोस भी उतने तेज नहीं रह गए हैं.

शपथ और कपट

sushma-swarajनरेंद्र मोदी की नई सरकार के तीन केंद्रीय मंत्रियों सुषमा स्वराज, उमा भारती और डॉ हर्षवर्द्धन ने जब संस्कृत में शपथ ली तो वे क्या साबित करना चाहते थे? शायद यह कि उनकी शाखाएं-प्रशाखाएं चाहे जितनी भी फैल रही हों, उनकी जड़ें अपनी उसी संस्कृति से प्राणवायु और नैतिक बल ग्रहण करती हैं जिसमें संस्कृत की केंद्रीय उपस्थिति है. लेकिन क्या इस प्रतीकात्मकता का हमारे समय में कोई मोल बचा हुआ है? क्या भाषा का मामला इतना सहज है कि हम उसे प्रतीक की तरह इस्तेमाल करके अपनी एक खास पहचान सुनिश्चित करना चाहें और आगे बढ़ जाएं? भाषा में हमारी स्मृति बसी होती है, हमारे स्पंदन बोलते हैं, भाषाएं हमें बनाती और बसाती हैं. यह भी संभव है कि हम एक नहीं कई भाषाओं में बनते और बसते हों जो हमें हमारे छत और आंगन की तरह आसरा देती हों और घर-बाहर एक पहचान देती हों.

दुर्भाग्य से कम से कम पिछले दो दशकों में भारत में भाषा या भाषाओं के ये घर बिल्कुल उजाड़ दिए गए हैं- हम अंग्रेजी के लगातार अपरिहार्य होते बाजार में खड़े हैं और इस व्यावहारिकता को पूरे जीवन की ताबीज बना बैठे हैं कि अंग्रेजी सीखेंगे तो नई दुनिया के साथ चल सकेंगे, नए भारत में अपनी एक विशिष्ट हैसियत बना सकेंगे. चूंकि विकास के नाम पर एक तरह की उपभोक्ता आर्थिक समृद्धि ही जीवन का इकलौता लक्ष्य बना दी गई है और रोटी-रोजगार के सारे अवसर, ज्ञान-विज्ञान के सारे संसाधन अंग्रेजी के लिए समर्पित कर दिए गए हैं, इसलिए यह तर्क बड़ी आसानी से स्वीकार भी कर लिया जा रहा है. जो इसका विरोध कर रहे हैं वे उपहास की निगाह से देखे जा रहे हैं क्योंकि वे ऐतिहासिक तौर पर पिछड़े हुए लोग माने जा रहे हैं.

ऐसे में देश में एक ऐसी सरकार आई है जिसका प्रधानमंत्री हिंदी बोलता है और जिसके कुछ मंत्री संस्कृत तक में शपथ लेने को तैयार दिखते हैं तो इससे वह उपेक्षित और चोट खाई भाषिक अस्मिता अचानक अपने-आप को कुछ उपकृत महसूस करती है जो अन्यथा हर अवसर से वंचित रखी जा रही है. उसे लगता है कि हिंदी या भारतीय भाषाओं के दिन फिरने वाले हैं और सामाजिक-सार्वजनिक जीवन में उसकी पूछ बढ़ने वाली है. उसके इस कातर विश्वास को इस खयाल से भी बल मिलता है कि मनोरंजन की दुनिया में- टीवी और बॉलीवुड में हिंदी की हैसियत बची हुई है, उसमें क्रिकेट की कमेंटरी भी हो रही है, हॉलीवुड की फिल्में डब भी हो रही हैं और दुनिया के कई देशों में हिंदी पढ़ाई भी जा रही है. नेट पर भी हिंदी का विस्तार हो रहा है.

लेकिन जो लोग इस बाजार को करीब से जानते हैं, उन्हें मालूम है कि यहां भी हिंदी की हैसियत महज एक बोली की है. इस बाजार में फैसला करने वाले लोग अंग्रेजी के हैं और वे हिंदी को उसकी जातीय खुशबू से काट कर उसे ज्यादा से ज्यादा अंग्रेजी काट वाली भाषा बना कर पेश करने के हामी हैं. यही लोग अमिताभ बच्चन की करोड़पति वाली नकली किस्म की हिंदी पर वाह-वाह करते हैं और अपने टीवी-अखबारों में अंग्रेजी शब्दों ही नहीं, रोमन लिपि तक के इस्तेमाल को इसी तर्क के साथ लागू कराते हैं कि यही चल रहा है.

क्या यह जो चल रहा है, मोदी सरकार उसे बदलने का कोई इरादा रखती है? क्या वह संस्कृत या दूसरी भारतीय भाषाओं को अंग्रेजी के मुकाबले खड़ा करके एक तरह की देशज प्रतिभा को उचित पोषण देने की सोच रही है? दुर्भाग्य से ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है. संस्कृत या भारतीय भाषाएं उसके लिए एक जज्बाती मुद्दा भर हैं जिनमें शपथ लेकर वह खुद को जड़ों के करीब महसूस करती है. लेकिन सच्चाई यह है कि इन जड़ों पर लगातार मट्ठा डालने की जो प्रक्रिया चल रही है, उसे वह जान-बूझ कर अनदेखा करती है. कभी हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान को अपना नारा बनाने वाले जनसंघ की कोख से निकली भाजपा को यह सीखने में समय लगा कि मामला सिर्फ हिंदी का नहीं, भारतीय भाषाओं का भी है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा तेजी से उसने यह सीख लिया कि इन्हें भुलाकर अंग्रेजी को बढ़ावा देकर ही वह नई दुनिया से अपने लिए मुहर हासिल कर सकती है. सच तो यह है कि भारत का पूरा प्रशासनिक तंत्र जैसे अंग्रेजी के बिना एक कदम बढ़ने को तैयार नहीं है. वह अपने प्रधानमंत्री या दूसरे मंत्रियों के लिए दुभाषिए का इंतजाम कर लेगा, उनके लिए फाइलों के हिंदी में संक्षिप्त नोट तैयार करवा लेगा, लेकिन पूरे राजकाज की भाषा बदलने को तैयार नहीं होगा.

क्योंकि ऐसा होगा तो सिर्फ भाषा नहीं बदलेगी, सारा राजकाज ही बदल जाएगा. अचानक वह विशेषाधिकार टूट जाएगा जो अंग्रेजी की आड़ में एक बहुत छोटे से तबके ने हासिल कर रखा है और जिसके बूते वह देश के सबसे ज्यादा संसाधनों पर काबिज है. सच तो यह है कि अंग्रेजी की इस भाषिक हैसियत ने भारत को एक नए उपनिवेश में बदल डाला है जिसकी प्रच्छन्न गुलामियां दिखाई नहीं पड़तीं. यह भाषिक गुलामी हमें आजादी का भ्रम देती है, लेकिन हमारे संसाधन हमसे छीन ले रही है. इन संसाधनों में हिस्सेदारी की प्राथमिक शर्त यही है कि हम अपनी भाषा की पगडंडियां छोड़ अंग्रेजी के राजपथ पर उतर आएं. यह भाषा नहीं, मनुष्य को और उसकी संस्कृति को बदलने की प्रक्रिया भी है।

इस पूरी प्रक्रिया की अनदेखी कर जो लोग सिर्फ संस्कृत में शपथ लेकर या कहीं हिंदी में भाषण देकर संतोष हासिल करते हैं या वाहवाही लूटते हैं वे दरअसल गहरे सांस्कृतिक अर्थों में बेहद नादान और उथले राजनीतिक अर्थों में बहुत सयाने लोग हैं- वे भाषाओं को मां बताते हैं और फिर मां की अनदेखी करते हैं- कहीं इस विश्वास और अभ्यास से भरे कि मां के साथ हर तरह की छूट ली जा सकती है, उसकी उपेक्षा भी की जा सकती है.