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ऊन का गोला, धीरे-धीरे खोला होता

िफल्म » एक विलेन  निर्देशक»  मोहित सूरी   लेखक » तुषार हीरानंदानी, मिलाप झावेरी                          कलाकार » सिद्धार्थ मल्होत्रा, श्रद्धा कपूर, रितेश देशमुख, आमना शरीफ
िफल्म » एक विलेन
निर्देशक» मोहित सूरी
लेखक » तुषार हीरानंदानी, मिलाप झावेरी
कलाकार » सिद्धार्थ मल्होत्रा, श्रद्धा कपूर, रितेश देशमुख, आमना शरीफ

मोहित सूरी हमेशा से ही कोरियन फिल्मों के मुरीद रहे हैं. हम भी. लेकिन करण जौहर या यश चोपड़ा के प्रेम को समर्पित तीव्र संगीतमय चलचित्रों पर हिंसा पर इतराते कोरियाई सिनेमा के पैरहन को चढ़ा दो तो ऊब ही होगी. या कहें कोरियन ‘आई सॉ द डेविल’ (जिस पर ‘एक विलेन’ आधारित है, बिना आभार-साभार) में अगर आशिकी 2 जैसी कोई प्रेम कहानी मिला दें, उसी तरह के ट्रीटमेंट और गीतों के साथ, तो फिर हम आखिर तक तने तो रहेंगे, जागरुक सिनेमा प्रेमी की तरह, लेकिन अंतहीन ऊब की छाया छटेगी नहीं. वो आशिकी 3 नाम के डर से हमें बारम्बार रूबरू कराएगी, अपने कुछ हिस्सों में यह कोरियाई फिल्म जैसा साहस जरूर दिखाएगी लेकिन फिर शार्ट-कट मार वापस अनेकों बार हमें हमारी भारतीय नाटकीयता के दर्शन ही कराएगी और धमकाएगी, थोड़ा और करीब जाकर दर्शन करा दूं, पूछ कर.

अति नाटकीयता, अति मानवीयता, गीतों की अति, प्रेम की अति, गति की अति और कुछ ऐसी अतियां जिनके शब्द अभी बने नहीं, मिलकर ‘एक विलेन’ को अच्छी बन सकने वाली फिल्म से साधारण फिल्म बना देते हैं. पागलखाने में ‘शहंशाह’ दिखाए जाते वक्त सिद्धार्थ की एंट्री का दृश्य हो या ‘जरूरत’ गीत पर बढ़िया दो मिनिट के सिंगल शाट में सिद्धार्थ का फाइटिंग सीक्वेंस, सूरी को फिल्म बनाने के क्राफ्ट की बेहद अच्छी जानकारी है. उन्हें गानों को दृश्यों के साथ चलाना सलीके से आता है, हीरो-हीरोइन से अच्छा काम करवाना भी, अपने विलेन से भी, लेकिन उनकी ‘एक विलेन’ का विलेन उसकी कहानी है जो भारतीय होने के गुरूर में हमारा सर झुका देती है. हीरो को विलेन को पकड़ने का ‘क्लू’ जिस चीज से मिलता है वो इतना हास्यास्पद है कि हास्यास्पद शब्द का इतनी कम तीव्रता का होना अखरता है. एक कमतर विलेन श्रद्धा कपूर भी हैं, जिनको लंबी भूमिका देने की मजबूरी ने कहानी को और ज्यादा कमजोर किया है. वे उन दृश्यों में रोशनी फैलाने आती हैं, जिनकी फिल्म को जरूरत नहीं है.

फिल्म के पास कुछ अच्छे हिस्से हैं, और इनमें रितेश देशमुख को देखकर सुख मिलता है. जानते तो हम ‘नाच’ और ‘ब्लफ मास्टर’ के वक्त से थे, लेकिन खराब फिल्मों में वे ऐसे सने कि उनके अच्छा अभिनेता होने के निशान कम ही मिले. यहां वे बर्फ चेहरे पर कभी क्रूरता और कभी बेचारगी के भाव देते वक्त उन्मुक्त हैं, लेकिन हावी नहीं, और ऐसा अच्छा अभिनय आखिर तक उनके लिए हमारी उत्सुकता बनाए रखता है. सिद्धार्थ मल्होत्रा के किरदार की तीव्रता भी आकर्षक है और उनका अभिनय भी, लेकिन निर्देशक उनकी उस रेंज को ज्यादा दूर नहीं ले जाते, गर ले जाते तो वे उस कोरियाई फिल्म के नायक की तरह का काम कर सकते थे. श्रद्धा कपूर खूबसूरत लगी हैं, उतनी ही जितना फिल्म उनसे चाहती है, लेकिन अभिनय अभी भी वे अच्छा नहीं करतीं, कत्थई आंखों वाली खूबसूरत काठ की गुड़िया से अधिक कुछ नहीं हो पातीं.

एक विलेन के नायक और खलनायक की पकड़म-पकड़ाई में उस तरह का थ्रिल नहीं है जिस तरह के रोमांच का वादा फिल्म करती है. ‘एक विलेन’ खुद को ऊन का वह गोला बना लेती है, जिसे बेहद जल्दी में आधे से ज्यादा खोल दिया जाता है, और फिर जब फिल्म बेतरतीब उलझती है तो सुलझाते वक्त हैरत में पड़ती है क्योंकि जिसे वे सुलझा रही है उसे वह और उलझा रही है, व्यर्थ में, और शायद इसलिए वापस लपेटते वक्त ऊन के गोले को गोल नहीं बना पा रही है.

‘मैंने आखिरी बार चे ग्वेरा को सिसकते हुए बरतन मांजते देखा’

imgवह अन्ना आंदोलन का दौर था. ‘मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना’ का बोलबाला था. दिल्ली पूरी तरह अन्नामय हो चुकी थी. जंतर मंतर देश का सबसे नया पिकनिक स्पॉट था जहां वीकेंड पर मध्यवर्गी युवा सपरिवार क्रांति करने जाते थे और पिकनिक के साथ अपने व्यक्तिवादी जीवन के तमाम अपराधबोध भी कम कर आते थे. यह कुछ-कुछ वैसा ही था जैसे हमारे गांव का साहूकार हर साल बिना नागा गंगा नहाने जाता है और इस तरह साल-भर डंडी मारने के पाप का भी प्रायश्चित कर आता है.

मैं भी उन दिनों क्रांति मोड में था और तमाम दोस्तों को अन्ना आंदोलन के संचालकों की ओर से मिलने वाले एसएमएस फॉरवर्ड करता रहता था जिनमें लिखा होता था कि एक बूढ़ा आदमी चिलचिलाती धूप में देश के लिए लड़ रहा है और आप अपने घर में आराम से बैठे हैं, आप अब नहीं तो कब निकलेंगे, आदि-आदि. उस दिन मैं आंदोलन स्थल पर पहुंचा तो धूप बहुत तेज थी और मुझे थोड़ी भूख भी लगी थी. मैं थोड़ा टहलता हुआ आगे डोसे की एक दुकान तक पहुंचा. वहां 15 साल का चे ग्वेरा (एक बच्चा जिसने चे ग्वेरा की तस्वीर छपी टी-शर्ट पहन रखी थी) अपने मालिक की मार खा रहा था. पता चला कि मेज साफ करते समय उसका पोंछा झक्क सफेद कपड़े वाले कुछ क्रांतिकारियों से जा टकराया था.

फिर भी, मैंने उसके मालिक से पूछा, ‘क्यों मार रहे हो इसे’

‘**मी है जी साला! एक नंबर का कामचोर.’ वह बोला.

‘पता है न बाल श्रम कानूनन अपराध है. नाप दिए जाओगे.’ मुझे थोड़ा गुस्सा आया.

‘नहीं जी लेबर कहां है. ये तो घर का लड़का है. भतीजा है मेरा.’ दुकान वाला सकपकाया.

‘कहां घर है बेटा?’ मैंने उस लड़के को पुचकार पूछा

‘कठपुतली कॉलोनी.’ वह बोला.

दुकानवाला अब नजरें चुराने लगा था.

लेकिन इस बीच वहां डोसा खाने आए युवा क्रांतिकारियों की सहनशक्ति समाप्त हो चली थी. वे दुकानवाले पर चिल्ला रहे थे. दुकानवाला लड़के का हाथ पकड़कर दुकान के अंदर चला गया था.

अब मैं युवाओं के उस समूह की ओर मुखातिब हुआ. शायद मेरे हावभाव देखकर उनको लगा होगा कि अब मैं कुछ ज्ञान बांटने की कोशिश करूंगा. मुझे दिखाते हुए उनमें से एक-दो जानबूझकर उबासियां लेने लगे. तीसरे ने अपना मोबाइल निकालकर इयर फोन कान में लगा लिया. चौथी जो एक लड़की थी वह अपने बाजू वाले को बताने लगी कि स्नैपडील पर जींस और कुरतों में भारी डिस्काउंट है.

उनके लिए मैं वहां अनुपस्थित था. मेरी भूख मर चुकी थी और मैं तेजी से अप्रासांगिक महसूस कर रहा था, लेकिन मुझे बार-बार उस बच्चे का निरीह चेहरा याद आ रहा था. मुझे लगा कि मुझे पुलिस को फोन करके बता देना चाहिए कि जंतर मंतर पर यानी देश के प्रमुख आंदोलन स्थल पर प्रशासन की नाक के नीचे बाल श्रम और मारपीट के रूप में दो-दो अपराध हो रहे हैं. लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सका.

मुझे अचानक याद आया कि मुझे तो अभी आधे घंटे में ऑफिस के लिए निकलना है वरना लेट हो जाऊंगा. मुझे यह भी लगा कि पुलिस कंप्लेंट के बाद अगर किसी तरह का मुकदमा दर्ज हो गया तो मुझे शायद मुफ्त में अदालती चक्कर भी लगाने होंगे. मैं आंदोलन स्थल की ओर जा रहा था और लगातार यह सोच रहा था कि यह एक फोन कॉल मेरी व्यवस्थित

‘मेरी भूख मर चुकी थी और मैं तेजी से अप्रासांगिक महसूस कर रहा था, लेकिन मुझे बार-बार उस बच्चे का निरीह चेहरा याद आ रहा था’

जिंदगी में कितनी अव्यवस्था पैदा कर सकती थी? मैंने राहत की सांस ली और वहां से चल दिया.

उस दिन वहां से निकलते-निकलते मैंने यह भी सोचा कि अब ऐसी जगहों पर बगैर ऑफिशियल असाइनमेंट के नहीं जाऊंगा. रही बात ‘क्रांति’ में योगदान की तो मैं अपने एसएमएस पैक का पूरा लाभ उठाऊंगा. मैंने आखिरी बार चे ग्वेरा को उस दुकान के पीछे सिसकते हुए बरतन मांजते देखा था. बैकग्राउंड में पुरानी वाली शहीद फिल्म का गाना बज रहा था, ‘वतन की राह पर वतन के नौजवां शहीद हों’.

इस सूरत-ए-मौसम में हमारी सूरत

imgभकभकाती भूमिका –

आ गई! चली गई! की आवाज गली-गली में रह-रह कर सुनाई दे रही है. गोकि मां भगवती का जयकारा हो रहा हो. ‘कटौती’ सबसे ज्यादा घृणित शब्द है इन दिनों. चिलचिलाती गर्मी में हम ऐसे उबल रहे हैं कि जैसे बंदे न हो के हम अंडे हों! बेड पर नहीं छत पर पड़े हैं. आधे जागे, आधे सो रहे हैं. ऐसा नहीं कि हमही गर्मी-बिजली का रोना रो रहे हैं. रो तो चोर भी रहे हैं. वे भी लाइट और गर्मी के मारे हैं. रतजगे हों तो कैसे फिर सेंध लगे! डॉक्टर कह रहे हैं कि तेज धूप से इलेक्ट्रोलाइट इम्बैलेंस हो रहा है. बीमारी में भी ‘लाइट’. तपती गर्मी में तप रहे हैं. ऋषि मुनि तप करने हिमालय निकल लेते और ठंडे-ठंडे में मजे से तप करते थे और हम यहीं शहर में ही पड़े-पड़े तप रहे हैं. न पानी है, न लाइट है. बेबसी के घंूट पी रहे हैं. पानी तो तब आए, जब लाइट आए. लाइट तो तब आए, जब नदियों में पानी हो. इसलिए हमारे पूर्वजों ने सह-अस्तित्व पर इतना जोर दिया. इंजीनियर बताते है कि बांध सूख रहे हैं. मगर यहां हम बिजली के मारों के सब्र के बांध टूट रहे हैं. उसका क्या! रात की गई अभी तक नहीं आई! उमस में कसमसा रहे हैं. आजकल हर आदमी बर का छत्ता है. छेड़ो तो डंक मार देगा. दिमाग का फ्यूज उड़ा हुआ है. किसी से पता पूछने में भी डर लगता है. क्या पता! पता पूछने पर ही भड़क जाए और बात फौैजदारी तक बढ़ जाए. जिन पोलों से बिजती आती है, वे निष्प्राण खडे़ मौजूदा हालातों के पोल खोल रहे हैं. जिन तारों से करंट दौड़ने की व्यवस्था की गई थी, वह व्यवस्था तार-तार है, फिलहाल. बिजली आ नहीं रही, मगर बिजलियां दिल पर गिरा रही है. अजब मंजर है! इतनी गर्मी की दूध टिकता नहीं और आइसक्रीम जमती नहीं. पंखा झल्ल रहे हैं और झल्ला रहे हैं. हर कोई एक दूसरे को बता रहा ‘बहुत गर्मी है!’ हर कोई एक दूसरे से पूछ रहा है ‘लाइट आ रही है!’. टपकते हुए पसीने को देखकर एकबारगी लगता है कि बंदा लीक कर रहा है. इस सूखे गर्म मौसम में ऐसा नहीं है कि सब सूखा है. इसमें भी रस है. बेल, गन्ने, मौसमी वगैरह के रस की बात नहीं कर रहा. मैं शास्त्रों में वर्णित रस की बात कर रहा हूं. इस मौसम में करुण रस यहां-वहां देखने को मिल रहा है. करंट तारों में उतरता नहीं, तो लोग सड़क पर उतरते हैं. लाइट के लिए फाइट करनी पड़ रही है. बिलबिलाए लोग बिजली के उपकेंद्रों का घेराव करते हैं और पुलिस लाठियां बरसाती है. अजब मंजर है! मोबाइल, लेपटाप चार्ज नहीं हो रहे, मगर लाठी चार्ज हो रहा है. जिम्मेदार जवाब देने से हिचक रहे हैं और हमारा सब्र जवाब दे रहा है. पावर कट का उनके लिए क्या मानी जो पावर में हैं. अभी विद्युत विभाग को कोसने का समय है, बरसात में इसका स्थान नगर निगम ले लेगा. यहां बारहों महीनों किसी न किसी विभाग को कोसने का सर्वोत्तम समय बना ही रहता है. इस मौसम की सूरत ने बड़े-बडे़ सूरमाओं की सूरत बिगाड़ दी है. शस्स… सुना है कि बिजली विभाग में सब छुट्टी ले कर कहीं भागने की सोच रहे हैं! जले-भुनो का कोपभाजन कौन बने! ‘इंसान का क्या भरोसा’ के जुमले को आजकल ‘बिजली का क्या भरोसा’ ने ओवरटेक कर लिया है.

आलोचक का हस्तक्षेप – इतनी लंबी भूमिका की क्या आवश्यकता है लेखक की दुम. इन दिनों की व्याप्त स्थितियों का एक पंक्ति में वर्णन करो। संक्षेपण करो! संक्षेपण करो!

लो सुन सखा आचोलक!

संक्षेपण- कहीं दीप जले कहीं दिल.

‘पेसमेकर का लगना, और उसके बाद’’

imgअब तनिक पेसमेकर को और गहराई से समझ लें. वैसे, यह भी जान लें कि पेस मेकर का ज्ञान इतना ज्यादा गहरा है कि थोड़ी बहुत, आपके काम के लायक बातें ही मैं यहां बताऊंगा वे गहरे पानी पैठ ‘की जगह’ रहा किनारे बैठ जैसी ही हैं. पर वही काफी हैं.

‘पेस मेकर’ मशीन के दो हिस्से होते हैं.

एक तो बैटरी वाला, दो रुपये के सिक्के के बराबर का ‘बॉक्स’, जहां से करंट बनकर निकलेगा, वह हिस्सा. दूसरा वह तार या लीड जो इस करंट को दिल तक पहुंचाएगा. लीड में सेंसर लगे हैं. दिल के करंट की गड़बड़ी को ये सेंस कर लेते हैं. इसकी सूचना बॉक्स को दे देते हैं. लीड का एक सिरा बॉक्स से जुड़ा है. बॉक्स दिल से बाहर छाती में फिक्स किया जाता है. लीड का दूसरा सिरा बॉक्स से निकलकर, दिल में जा रहा है. दिल के करंट को सेंस करके जो बात पता चली उसी आधार पर बॉक्स का छोटा सा कंप्यूटरनुमा हिस्सा या तो अपना करंट दिल में भेज देगा, या आवश्यकता न महसूस हो , तो उसे रोक लेगा. सेंस करने पर करंट रोकना है, या इसकी परवाह किए बिना केवल भेजते ही रहना है, या रोकना-भेजना भी खुद पेसमेकर को तय करना है- यह चीज पेसमेकर की प्रोग्रामिंग कहलाती है. हम शरीर में डालते समय ही पेसमेकर को प्रोग्राम करके डालते हैं. उसकी करंट की गति (प्रति मिनट कितनी?) आदि चीजें तय कर देते हैं. लग जाने के सालों बाद भी, प्रोग्रामर नामक मशीन को स्टेथोस्कोप की भांति, छाती पर रखकर पेसमेकर की प्रोग्रामिंग को बाद में बदल भी सकते हैं. आजकल सारे पेसमेकर प्रोग्रामेबल ही होते हैं.

अब मन मे प्रश्न यह उठता है कि डॉक्टर लोग जब मुझे पेसमेकर लगाएंगे, तो यह कैसे, क्या लगाया जाएगा?

कुछ आपात स्थितियों के अलावा पेसमेकर प्लान करके ही लगाया जाता है. यह एक छोटा-मोटा ऑपरेशन सा जरूर है परंतु  कैथ-लेब में जब इसकी लीड दिल में  सही जगह डालने का प्रयास चल रहा होता है तो यह कॉर्डियोलोजिस्ट के ज्ञान, स्किल तथा धैर्य की परीक्षा जैसा होता है. इस ऑपरेशन में आपको बेहोशी या नींद की कोई दवा नहीं दी जाएगी. आप पूरे होश में होंगे. डॉक्टर से बातें कर सकेंगे. तब तो दर्द भी बहुत होगा? नहीं, दर्द एकदम नहीं होगा. चमड़ी का वह हिस्सा लोकल एनीस्थीसिया के जरिए ऐसा सुन्न कर दिया जाएगा कि आपको फिर कुछ भी पता ही नहीं चलेगा कि वहां क्या काट-पीट मच रही है. वैसे भी कोई बड़ा आपरेशन तो है नहीं, बस छाती में, कॉलर बोन (हंसुली) के नीचे चमड़ी में एक छोटा सा चीरा ही तो लग रहा है. इस चीरे के द्वारा चमड़ी और चर्बी के ठीक नीचे वह सिक्के बराबर पेसमेकर बॉक्स रखकर टांकों द्वारा उसे छाती पर फिक्स करना है. प्राय: पांच दस मिनट का काम.

‘पेसमेकर की लाइफ टाइम वारंटी से किसी भ्रम में न पड़ें. यह जीवन भर नहीं चलता. दसेक साल में इसकी बैटरी खत्म हो जाती है’

असली काम है तार या लीड को दिल में पहुंचाना तथा उसे ऐसी सही जगह फिक्स करना कि फिर वह तार हिलकर अपनी जगह से कभी खिसक न जाए. लीड को, कॉलर बोन के नीचे से जा रही खून की एक नस (सबक्लेवियन वेन) में पंक्चर करके, उसके जरिए दिल में डाला जाता है. यह नस सीधे दिल तक जा रही है. लीड एक बार दिल में पहुंची तो फिर इसे दिल में एक सही जगह पर लगाने का प्रश्न आता है. इसमें आधे घंटे से लेकर कितना भी समय लग सकता है. कार्डियोलोजिस्ट तब तक लीड घुमाता रहेगा जब तक वह ऐसा सही स्थान न पा ले जहां करंट को कोई रुकावट या बाधा न मिल रही हो. अब बाहर रखी मशीन द्वारा इसका टेस्ट होता है. एक बार लीड सही जगह फिक्स हो गई तो उसे फिर बॉक्स में स्क्रू करके, लीड का शेष बचा गुच्छा और बॉक्स को चमड़ी के नीचे सिल दिया जाता है. बस, लग गया पेसमेकर. इस दौरान मरीज को न तो कोई दर्द होगा, न उसे बेहोश किया जाएगा. मरीज से बस यही उम्मीद की जाएगी कि वह शांति से एक-डेढ़ घंटे सीधा लेटा रहे.

क्या इस ऑपरेशन में कोई खतरा भी हो सकता है?

बिल्कुल हो सकता है साहब. दिल के मामले तो ऐसे ही होते हैं. वैसे, प्राय: तो कोई खतरा नहीं. यदा-कदा कभी चमड़ी के नीचे खून रिसकर इकट्ठा हो जाए, या उस जगह चमड़ी में इंफेक्शन हो जाए. यदि डॉक्टर पूरी सावधानियां बरते तो यह सब कभी नहीं होगा. खून की नस पंक्चर करते समय दूसरी नस को गलती से पंक्चर कर दिया जाए, या ठीक नीचे फेफड़ों को पंक्चर कर दिया जाए तब बड़ा खतरा पैदा हो जाता है. डॉक्टर उससे भी निबट ही लेते हैं. सक्षम कार्डियोलोजिस्ट के हाथों यह बहुत सुरक्षित ऑपरेशन है.

पेसमेकर लगने के बाद क्या सावधानियां बरतनी होंगी?

लगने के बाद चार-पांच दिन में छुट्टी हो जाएगी. महीने भर बाद वे आपको एक बार बुलाकर फिर पेसमेकर की प्रोग्रामिंग करेंगे. फिर छह माह बाद या एक साल के अंतराल पर. कुछ बातें याद रखें.

– तकलीफ न भी हो, पर साल में एक बार पेसमेकर की जांच अवश्य करा लें.

– कभी कोई और डॉक्टर किसी और बीमारी के कारण यदि आपकी एमआरआई जांच लिखे तो भी न कराएं. एमआरआई में ताकतवर चुंबकीय क्षेत्र बनता है जो पेसमेकर को अचानक बंद कर सकता है. हर डॉक्टर को पहले ही बता दें कि आपको पेसमेकर लगा है.

– एयरपोर्ट आदि पर सुरक्षा जांच के गेट में घुसने से पूर्व उन्हें बता दें कि आपको पेसमेकर लगा है. पेसमेकर से सुरक्षा अलार्म बज सकते हैं.

– पेसमेकर की लाइफ टाइम वारंटी से किसी भ्रम में न पड़ें. यह जीवन भर नहीं चलता. दसेक साल में इसकी बैटरी खत्म हो जाएगी. नियमित प्रोग्रामिंग करवाते रहने से छह सात माह पूर्व ही आपको पता चल जाएगा कि बैटरी बदलवानी है. वर्ना किसी दिन पेसमेकर बंद होकर जानलेवा भी हो सकता है.

कभी आपको या परिवार में किसी को, कोई डॉक्टर पेसमेकर लगवाने की सलाह दे तब ये दोनों लेख वापस फिर से पढ़िएगा. तब मेरी कही एक-एक चीज आपको समझ में भी आएगी और बड़ी महत्वपूर्ण भी लगेगी. ये दोनों लेख उसी दिन के लिए लिखे गए हैं, मान लें.

ज्यों नावक के तीर

bookदूर तक चुप्पी मदन कश्यप का नया कविता संग्रह है. इससे पहले उनके तीन कविता संग्रह- लेकिन उदास है पृथ्वी, नीम रोशनी में और कुरुज प्रकाशित हो चुके हैं. बिहारी के लिखे छोटे लेकिन प्रभावशाली दोहों के बारे में कहा जाता था- सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर, देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर. मदन कश्यप की छोटी लेकिन बेहद असरदार कविताओं पर यह उक्ति लागू होती है.

संग्रह की कविताओं के एक हिस्से में ढेर सारी यादें हैं. त्रिलोचन की याद, महल फिल्म की याद, गुवाहाटी कांड (जहां एक 17 साल की युवती के साथ उन्मादी भीड़ ने बेहद बर्बर व्यवहार किया था), बोकारा में हुए गोलीकांड की याद और ऐसी तमाम अन्य घटनाओं की स्मृतियां दर्ज हैं. संग्रह में तमाम ऐसी कविताएं हैं जो एक किस्म की बेचैनी को जन्म देती हैं. ‘प्रतिकूल’ शीर्षक से लिखी यह कविता उसकी बानगी है, ‘अचानक पोखर में कूद पड़ी वह स्त्री/ उसी समय पता चला कि उसे तैरना आता है/ चेहरे को सुविधा थी/ वह ऊपर उठ भी सकता था/ और पानी की सतह में छुप भी सकता था/ लगातार पांव चलाने में/ साड़ी सिमट कर घुटनों तक आ गई थी/  तभी लगा कि तैरने के लिए/  यह वस्त्र कितना प्रतिकूल है.’

एक अन्य कविता में वह कहते हैं- गम खाना भले ही माना जाता है अच्छा/ लेकिन अच्छा होता नहीं है/ जब आप गम खाते हैं/ तो असल में/ गम आपको खा रहा होता है.

इन कविताओं का रचनाकाल सन 1973 से 2012 तक यानी तकरीबन चार दशकों में फैला हुआ है. युवा पीढ़ी के लिए यह दुर्लभ अवसर है कि वह मदन कश्यप जैसे हस्तक्षेप करने वाले कवि के साथ इन चार दशकों में विचरण कर सकता है. पाठकों के समक्ष अवसर है कि वे एक ही संग्रह में एक ही कवि की उदारीकरण के पहले और उसके बाद रची गई रचनाओं का पाठ कर सकता है, उनके आस्वाद, उनकी प्रकृति में अंतर को रेखांकित कर सकता है.

संग्रह की एक और विशेषता यह है कि लेखक ने सभी  कविताओं को विषम पंक्तियों पर समाप्त किया है. इससे कविताओं में किसी तरह की लयकारी ढूंढ़े नहीं मिलती. ऐसा क्यों है यह तो लेखक ही बताएगा लेकिन जब परिस्थितियां इतनी विषम हैं तो कविता सम पर क्यों

समाप्त हो?

इतने भी मासूम न बनो कि भोंदू लगो

fugly
िफल्म » फगली
निर्देशक» कबीर सदानंदे
लेखक » राहुल हांडा
कलाकार » जिमी शेरगिल, विजेंदर, कियारा आडवाणी, मोहित मारवाह, अरफी लांबा

कहानी फगली को समर्पित एक अप्रकाशित उपन्यास. (अंश नहीं, पूरा का पूरा उपन्यास.)

प्रथम अध्याय.
क्या यह एक फिल्म है. नहीं. अधूरी फिल्म. नहीं. इस सृष्टि की अदृश्य रचना. नहीं. आषाढ़ का एक दिन. नहीं. सूरज का जनरेटर. नहीं. जीवन. नहीं.  मौत. नहीं. कष्ट. पीड़ा. जहर का कटोरा. नहीं. नहीं. नहीं. तो आखिर ये फगली फगली क्या है, ये फगली फगली. कैसे समझाऊं मैं ये आपको, उसके लिए आपको फगली के तल में रहना होगा, पेट में पानी भरना होगा, दो घंटे बाद जब उबरेंगे तब भी समझेंगे, कह नहीं सकता. तब तक ये दुनिया फगली के आगे के रिक्त स्थान को कैसे भरेगी मान्यवर. फगली का चरित्र अमीबा जैसा है, उसका आकार निरंतर बदलता रहता है, उसे परिभाषित करना इतना आसान नहीं है, कुछ वर्षों का समय दीजिए और सब्र रखिए.

प्रथम और अंतिम के बीच के अध्याय.
फिल्म को शुरू होकर खत्म होने का ही चस्का है, उसका रस्ता सस्ता है, हाथों में उसके एक किताब का बस्ता है, जिसके सारे पन्ने खाली हैं, फिर भी पहले पन्ने पर स्क्रिप्ट लिख रखा है.

अंतिम अध्याय.
यहां हम एक फिल्म के मकरासन करने की क्रिया पर विस्तार से लिखेंगे. एक रोज जिंदगी से ऊब कर फगली मकरासन करने निकली. वो पेट के बल लेटी और उसने अपनी कहानी को दो भागों में बांटकर (दो हाथ बनाकर) जांघों के बगल में रख दिया. धीरे से उसने अपने सभी पात्रों के पैरों के पंजे बाहर की ओर फैलाए और एड़ियां अंदर की ओर कर लीं. एड़ियों (यानी सांकेतिक रूप से किरदारों की समझ) को दुनिया से छुपाकर अंदर की तरफ रखना जरूरी था, क्योंकि अगर लोगों को पता चलता कि उसके पास एड़ियां हैं (समझ/अक्ल), तो फिर ये देश उसे बहिष्कृत कर देता. इसके बाद योगा इंस्ट्रक्टर के कहे अनुसार फगली कहानी के दोनों भागों को सिर के नजदीक ले आती है. अब धीरे से बायीं कहानी अपनी कोहनी मोड़ते हुए दाहिनी कहानी के बगल के नीचे से निकालकर अपनी हथेली दाएं कंधे पर लगा देती है, और दाहिनी कहानी अपनी कोहनी को मोड़कर बाएं कंधे के ऊपर ले आती है. दोनों कहानियों के बने त्रिकोण के बीच फिर फगली अपना सिर टिकाती है. और फिर सो जाती है. फिल्म को सोता हुआ देख इस क्रिया को करा रहे योगा इंस्ट्रक्टर अक्षय कुमार (फिल्म के निर्माता) जूनियर इंस्ट्रक्टर (निर्देशक) कबीर सदानंद के साथ भागते हुए उसके नजदीक आते हैं और जोर से डांटते हुए उसे यो यो हनी सिंह के दो-चार गाने सुनते हुए आसन करने का आदेश देते हैं. आदेश मानकर फगली मस्त हो जाती है और फिर एक सौ पैंतीस मिनिट तक मकरासन करती है, हमें सन्न करती है.

चेतावनी : इस आसन को अच्छी-समझदार फिल्में न करें.

उपसंहार.
फगली मकरासन करने क्यों निकली? वाहियात फिल्में जिनके रक्त का संचार रुक-सा गया है, उन्हें इसे दिन में चार-बीस बार कर ही लेना चाहिए. इसलिए.

(नियमविरुद्ध) दूसरा उपसंहार.
कोई नहीं जानता ऐसा कैसे संभव हुआ. दस साल पहले बनाई अपनी एक फिल्म में ही निर्देशक कबीर सदानंद ने 2014 की फगली को सफलतापूर्वक देखने की कुंजी छोड़ी हुई थी. 2004 की उस फिल्म के नाम में ही. ‘पापकार्न खाओ! मस्त हो जाओ’.

एलबमः एक विलेन

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एलबमः एक विलेन
गीतकार » मनोज मुंतशिर, मिथुन, सोच
संगीतकार » अंकित तिवारी, मिथुन, सोच

भट्ट कैंप की छाप वाली आजू-बाजू खड़ी दो फिल्मों के संगीत में कितना अंतर है. ‘सिटीलाइट्स’ और ‘एक विलेन’. दोनों ही फिल्मों ने अपने-अपने हिस्से के दर्द को अलग-अलग जिंदगियों से चुना है. सिटीलाइट्स का दर्द सच्चा-अपना है तो एक विलेन के ज्यादातर गीत मैन्यूफैक्चर्ड दर्द पर आत्ममुग्ध हैं. एक विलेन अपने संगीत के लिए उस सिलबट्टे को चुनती है जिसपर पीसकर दर्द ज्यादा गाढ़ा निकलता है, और नैराश्य इतना महीन कि उसे दर्द का मांझा बना रूह के जिस हिस्से को आप चाहो, काट सको. इस प्रक्रिया में कई गीत गहरे उतर कर भी रूखे और सूखे रह जाते हैं.

फिल्म का सबसे अच्छा गाना, जाहिर है, ‘गलियां’ ही है. इतनी बार सुन चुके हैं कि अच्छा लगने लगा है कहना यहां सही नहीं है, वो दलील हिमेश के गानों के लिए ही अच्छी रहती है.‘गलियां’ में अंकित तिवारी अपने सितार, बांसुरी, गायकी और संगीत को इतनी नफासत से उनकी तयशुदा जगहों पर रखते हैं कि गाना सुनने में मजा आता है. दर्द इसका भी मशीन-निर्मित है, लेकिन बर्दाश्त की हद में रहता है, बुरा नहीं लगता. एक अच्छा गीत. इसका अनप्लग्ड वर्जन खासतौर पर श्रद्धा कपूर गाती हैं, और उनकी आवाज गाना नहीं सीख पाई एक छोटी बच्ची के रुंधे गले की आवाज है. नहीं गाना था. दूसरा अच्छा गीत अरिजीत का है, ‘हमदर्द’, धुनें पुरानी हैं लेकिन अरिजित अपनी आवाज में जाने कौन-सी चाशनी लपेटते हैं कि गाना मीठा भी लगता है और दर्द भी होता है. इसके अलावा दो और गाने हैं जिन्हें लिख मिथुन ने संगीत दिया है, दोनों ही झूठे दर्द से लबालब भरे हुए. गायक मुस्तफा जाहिद और मोहम्मद इरफान को अरिजित से सीखना चाहिए, दर्द को अपना बनाना. आखिरी गीत सोच बैंड का ‘आवारी’ है, कैलाश खेर की याद ज्यादा दिलाता है, एलबम का दुखद अंत करता है.

मैक्सिको

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विश्व रैंकिंग: 20
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनअंतिम आठ (1970, 86)

खास बात
मैक्सिको लगभग हमेशा ही ग्रुप स्टेज (प्रथम चरण) को पार करने में सफल रहा है लेकिन नॉकआउट दौर (सोलह टीमों वाला दूसरा चरण) में पहुंचकर यह टीम हमेशा लडखड़ा जाती है. कोच हेक्टर हरेरा ने इस बार ओरिब पेराल्टा को लेकर बेहद आक्रामक रणनीति तैयार की है. संभव है कि इस बार मैक्सिको नॉकआउट का दुष्चक्र तोड़ दे

मैक्सिको का दुर्भाग्य है कि ऐन विश्व कप से पहले उसके चोटिल खिलाड़ियों की लिस्ट लंबी होती जा रही है. इस सूची में सबसे प्रमुख नाम हैं मिडफील्डर जुआन कार्लोस मेडिना और लुइस मोंटेस. बावजूद इसके मैक्सिको के पास अग्रिम पंक्ति और रक्षा पंक्ति (डिफेंडर) दोनों में कुछ बेहद अच्छे खिलाड़ी मौजूद हैं. डिफेंडरों की बात करें तो हेक्टर मोरेनो और रफेल मार्केज के नाम लिए जा सकते हैं. इसी प्रकार ओरिब पेराल्टा के रूप में मैक्सिको के पास दुनिया के कुछेक बेहतरीन फॉरवर्ड में से एक मौजूद है. ग्रुप मैचों में मैक्सिको की सबसे बड़ी चुनौती होगी ब्राजील के साथ टक्कर. मिडफील्ड की कमजोरी और ब्राजीली समर्थकों के कानफोड़ू समर्थन के बीच मैक्सिको को चमत्कार की पूरी उम्मीद है. मौजूदा टीम के ज्यादातर खिलाड़ी वही हैं जिन्होंने 2012 के ओलंपिक फुटबॉल के फाइनल में ब्राजील को मात दी थी. ओलंपिक विजय में टीम के गोलकीपर जीसस करोना की भूमिका अहम थी. टीम के कोच मिगुएल हरेरा की सारी रणनीतियां गोलकीपर करोना के इर्द-गिर्द ही बुनी गई हैं. टीम के दूसरे महत्वपूर्ण खिलाड़ी स्ट्राइकर जेवियर हर्नांडिज हैं. हर्नांडिज इंगलिश प्रीमियर लीग में प्रतिष्ठित क्लब मैनचेस्टर युनाइटेड के लिए खेलते हैं.

चिली

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विश्व रैंकिंग: 42
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन : तीसरे स्थान पर  (1962)

खास बात
कोच साम्पाउली की योजना किसी परंपरागत स्ट्राइकर की बजाय दो चपल खिलाड़ियों के इस्तेमाल की है. अगर यह रणनीति कारगर होती है तो विपक्षी खेमे में इन खिलाड़ियों को रोकने को लेकर दुविधा और भ्रम पैदा हो जाएगा

जब तक यह टीम मैदान में होती है तब तक कुछ न कुछ घटित होता रहता है. 2010 के विश्व कप में इस टीम ने दुनिया-भर का ध्यान अपनी तरफ खींचा था. हालांकि टीम तब भी वांछित नतीजा नहीं पा सकी थी. दूसरे राउंड में ब्राजील के हाथों उसे 3-0 की हार का सामना करना पड़ा था. उस टूर्नामेंट में एलेक्सिस सांचेज बड़े खिलाड़ी बनकर उभरे थे. इसका ईनाम उन्हें बार्सिलोना के साथ जुड़कर मिला. वे अपनी टीम की तरफ से अहम खिलाड़ी बने रहे. क्वालीफायर राउंड में चिली ने 29 गोल दागे थे. 2014 की दौड़ में शामिल टीमों में यह दूसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था. लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है. टीम ने इस दौरान खुद भी 25 गोल खाए. चिलियन टीम का सबसे बड़ा सिरदर्द है उनका डिफेंस. इस कमी को कोच जॉर्ज साम्पाउली खुलकर स्वीकारते हैं. इस बीच आर्टुरो वीडल ने टीम को काफी राहत पहुंचाई है. यह खिलाड़ी किसी भी पोजीशन पर खेलने में सक्षम है. वीडल के आने से मिडफील्ड में नई जान आ गई है. हालांकि उनकी फिटनेस को लेकर संदेह बना हुआ है.

ऑस्ट्रेलिया

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विश्व रैंकिंग: 62
सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन : दूसरे चरण में (1998)

खास बात

ऑस्ट्रेलियन टीम से ब्राजील में कोई बड़ी उम्मीद लगाना जायज नहीं है. अनुभव हासिल करने के लिहाज से टीम के लिए यह बड़ा मौका है. किसी तरह के भय से रहित और उम्मीदों के बोझ से मुक्त यह टीम अपने ग्रुप में दूसरों का खेल खराब करने का काम कर सकती है

ऑस्ट्रेलिया की गिनती इस बार सबसे कमजोर टीम के रूप में हो रही है. यह ऑस्ट्रेलिया की सबसे युवा टीम है और यह विश्व कप उनके लिए एक जरूरी अनुभव प्राप्त करने का जरिया-भर है. ब्राजील का टिकट पाने वाली 32 टीमों में यह टीम सबसे कम उम्र की टीम है. टीम को रास्ता दिखाने की जिम्मेदारी घरेलू कोच आंगे पोस्टकोग्लू और कप्तान टिम काहिल के हाथों में है. पोस्टकोग्लू की मजबूरी यह है कि उन्होंने पिछले अक्टूबर महीने में ही टीम की जिम्मेदारी संभाली है और इस दौरान टीम ने सिर्फ तीन बड़े मैच खेले हैं. टीम में किसी बड़े स्ट्राइकर (आक्रमण की कमान संभालने वाला खिलाड़ी) के अभाव को देखते हुए मिडफील्डर काहिल के कंधों पर अटैक की सारी जिम्मेदारी रहेगी. उनका साथ देने के लिए इवान फ्रैंजिक और जेसन डेविडसन मौजूद रहेंगे. समस्या ये है कि दोनों ही अग्रिम पंक्ति के खिलाड़ी हैं जबकि डिफेंस का इलाका पूरी तरह से खाली है. बड़े स्ट्राइकरों के सामने यह स्थिति आत्महत्या करने जैसी होगी. माइल जेडिनक के कंधों पर अकेले मिडफील्ड की जिम्मेदारी होगी. तमाम बातों और हालात के मद्देनजर जानकारों की राय है कि ऑस्ट्रेलियाई टीम विश्व कप से वापसी का जहाज पकड़ने वाली पहली टीम हो सकती है.