लोकसभा चुनाव के नतीजों का सबसे चौंकाने वाला पक्ष उत्तर प्रदेश और बिहार के नतीजे हैं. उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 71 भाजपा ने जीती हैं. सहयोगियों की दो सीटें भी इसमें जोड़ दी जाएं तो आंकड़ा 73 तक पहुंच जाता है. 91.25 फीसदी सफलता की यह कहानी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अनदेखी और अनसुनी है जिसने सूबे के सारे सियासी समीकरण हिला दिए हैं. दरअसल प्रदेश का हालिया राजनीतिक इतिहास एक बड़ी हद तक बिखरे हुए जनादेश, अवसरवादी राजनीति और राजनीति के अपराधीकरण का रहा है. इस दौर में दो राजनीतिक दल प्रदेश की राजनीति का चेहरा बने हुए थे-मायावती की बहुजन समाज पार्टी और मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी. दोनों ही पार्टियां करीब ढाई दशक पहले के मंडल और कमंडल के दौर की उपज हैं. सामाजिक न्याय के रथ पर सवार होकर ये दोनों दल तेजी से उत्तर प्रदेश के राजनीतिक क्षितिज पर छा गए थे. इसका नतीजा यह हुआ कि राष्ट्रीय पार्टियों का कद यहां लगातार बौना होता गया. कांग्रेस तो खैर यहां दो दशक पहले ही हाशिए पर चली गई थी, लेकिन कमंडल की ऑक्सीजन से चल रही भारतीय जनता पार्टी भी यहां पिछले एक दशक से तीसरे नंबर की पार्टी बनी हुई थी. पहले दो स्थान सपा या बसपा ने कब्जा लिए थे. लेकिन अब अचानक से सबकुछ बदल गया है. इसका एक संकेत तो इसी बात से मिल जाता है कि जिस भाजपा ने पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश की विधानसभा के सामने कुल दर्जनभर विरोध प्रदर्शन भी नहीं किए होंगे, उसने केंद्र में अपनी सरकार बनने के बाद पिछले एक महीने के दौरान प्रदेश की विधानसभा को घेरने और पुतला जलाने के दर्जनों उपक्रम कर डाले हैं. एक दशक के दौरान यह उत्तर प्रदेश की राजनीति में आया 360 डिग्री का परिवर्तन है. बदले दौर का जोश प्रदेश भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी की बातों में झलकता है, ‘हम एक-एक बूथ तक जाएंगे, हम पूरी तरह विनम्र बने रहेंगे पर अगर कोई हमें चुनौती देगा तो हम चुप नहीं बैठेंगे. मोदीजी के नेतृत्व में जो लहर पैदा हुई है वह उत्तर प्रदेश से जात-पांत को खत्म करने का काम करेगी.’
केंद्र की राजनीति के लिए सबसे ज्यादा अपरिहार्य कहा जाने वाला उत्तर प्रदेश पिछले कुछ समय से हर तरह की राजनीति की प्रयोगशाला रहा है. धर्म, जाति, क्षेत्र और अवसरवाद जैसे तमाम समीकरणों के सहारे यहां राजनीति होती रही है. कभी प्रदेश ने सपा-बसपा की सरकार देखी, कभी भाजपा-बसपा की. दूसरे दलों को तोड़कर अपनी सरकारें बनाने का उपक्रम भी यहां खूब हुआ. ऐसा भी हुआ कि सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करने में नाकाम रहीं और सूबा बार-बार चुनाव के चंगुल में फंसता रहा. 2007 तक यही स्थिति बनी रही. फिर उस साल जो हुआ उससे संकेत मिला कि प्रदेश की जनता लगभग डेढ़ दशक तक चली अवसरवादी राजनीति के दुष्परिणामों को समझ भी गई है और उससे उकता भी गई है. 2007 में प्रदेश में बसपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी थी. 2012 के जनादेश ने लोगों को एक बार फिर से चौंकाया. इस बार यहां सपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी. अब महज दो साल बाद उसी जनता ने भाजपा को लोकसभा में प्रचंड जनादेश दिया है. जाहिर है प्रदेश के लोग मौजूदा राजनीतिक विकल्पों से बुरी तरह नाराज हैं और बेसब्री से एक कारगर विकल्प की तलाश में हैं. सपा-बसपा की दुर्गति का एक संदेश भाजपा के लिए भी है कि उसके लिए यह सुकून का पल नहीं है. जिस तरह से सपा-बसपा ने खुद को मिले जनादेश को समझने की बजाय अपनी घिसी-पिटी अवसरवादी और जातिवादी राजनीति की राह पर चलना जारी रखा, भाजपा को वैसा कुछ करने से बचना होगा. एक चीज इस चुनाव में जरूर हुई है. भले ही यह परिघटना अल्पकालिक हो, लेकिन जाति का बांध मोदी लहर में टूट गया है. Read More>>
बिहार की राजधानी पटना में मशहूर डाकबंगला चौराहे के पास ही है होटल गली. गली में आड़े-तिरछे, ऊपर-नीचे, दायें-बायें बिखरे बहुतेरे होटल हैं. सस्ते भी और इस वजह से लंबे समय तक टिकने लायक भी. इन होटलों में सबसे ज्यादा बसेरा राजनीतिक कार्यकर्ताओं और जिलास्तरीय नेताओं का होता है. इलाके में सुबह से शाम तक राजनीति की अखाड़ेबाजी होती है.
इसी होटल गली में चाय की एक दुकान के पास मजमा लगा है. सभी दलों के नेता गप्प में मशगूल हैं. बातचीत चलती है तो कोई जदयू के एक नेताजी से कहता है कि उनकी पार्टी का राजद, सीपीआई और कांग्रेस के साथ 100-100-39-04 वाला फॉर्मूला तय हो गया है, ऐसी बात हवा में उड़ रही है. यानी अगले विधानसभा चुनाव में 100 सीटों पर जदयू, 100 पर राजद, 39 पर कांग्रेस और चार सीटों पर सीपीआई. नेताजी गुस्से में आ जाते हैं. कहते हैं, ‘हवा की बात पर फालतू की हवाबाजी न कीजिए! जिस जदयू के पास अभी ही 117 सीटें हैं वह भला 100 पर क्यों लड़ने को तैयार होगी?’
एक दूसरे नेता बात काटते हैं. कहते हैं, ‘अरे महाराज, यही तो मूल बात है कि 117 विधायक मिल के 10 सीट भी नहीं दिलवा सके लोकसभा में. एक-एक दर्जन विधायक भी ऊर्जा लगाते एक सीट पर तो 10 का हिसाब-किताब तो होना ही चाहिए था.’ बात जारी रहती है. एक और नेता हंसते हुए कहते हैं, ‘खाली गाल बजाइएगा कि 117 विधायक हैं इसलिए ज्यादा सीट चाहिए तो लालू जी भी तो कहेंगे कि अभी जो लोकसभा चुनाव निपटा है उसमें अधिकांश सीटों पर उनकी पार्टी भाजपा के मुकाबले में थी इसलिए उन्हें ज्यादा सीट चाहिए.’ तीसरे नेताजी का हस्तक्षेप होता है, ‘बेकार बात कर रहे हैं आप लोग. लालू जी से अगर नीतीश कुमार मिले और दो दशक में बनाई हुई पार्टी को मटियामेट करने के रास्ते पर चले तो सबसे पहले आदमी हम होंगे जो 2010 के चुनाव से लेकर पिछले लोकसभा चुनाव तक सारे बयान और इंटरव्यू मिलाकर पोस्टर- किताब तैयार करेंगे और पूरे बिहार में बंटवाएंगे.’ Read More>>
आज हम ऐसी सरल-सी लगने वाली बेहद कठिन बीमारी की बात करेंगे जिसे डॉक्टर ‘हाईपोनेट्रीनिया’ (खून में नमक तत्व या सोडियम की कमी) कहते हैं. सुनने में सरल-सा लगता है.
रक्त में सोडियम कम हो गया है तो नमक खिलाकर या ‘सेलाइन’ की बोतल चढ़ाकर इसे ठीक भी कर लिया जा सकता है. पर बात ऐसी तथा इतनी सरल नहीं. बीमारी इतनी छोटी भी नहीं. जानलेवा तक हो सकती है. इसकी डायग्नोसिस करना, फिर कारणों की तह तक जाकर सही निदान खोजना, फिर इलाज तय करना-यह सब बेहद जटिल काम है. जब तक शरीर की बायोकेमिस्ट्री तथा गुर्दों, हार्मोंस, रक्त प्रवाह आदि की गहन जानकारी न हो, तब तक ‘हाइपोनेट्रीमिया’ को समझना किसी डॉक्टर के लिए भी एक चुनौती ही है. यह डॉक्टरों के लिए भी कठिन विषय है. इससे जुड़े प्रश्न प्राय: इसीलिए पूछे जाते हैं ताकि परीक्षा में चिकित्सा क्षेत्र को फेल किया जा सके- कम से कम हम लोग तो अपने छात्र जीवन में ऐसा ही मानते थे. अब इसी कठिन बात को मैं अपने सामान्य पाठकों को आज किस तरह समझा पाता हूं, यह भी देखने वाली बात होगी.
कहते हैं कि पंचतत्व मिल बना शरीरा! पांच तत्वों में से एक महत्वपूर्ण तत्व जल है. हमारे शरीर का 50 से 60 प्रतिशत वजन पानी ही है. महात्मा यो-यो हनी सिंह जी यूं ही नहीं गा रहे कि ‘पानी, पानी, पानी, पानी’ – वास्तव में हम आप बस पानी ही से बने हैं. यह पानी शरीर में सब तरफ है. शरीर की हर कोशिका (सेल) में पानी भरा है. कोशिकाओं के बीच भी पानी ही है. और रक्त के साथ हमारी रक्त नलिकाओं में भी पानी ही बह रहा है. कोशिकाओं के अंदर जो पानी है, उसमें पोटेशियम तत्व घुला है. कोशिकाओं के बाहर (रक्त नलिकाओं में, और कोशिकाओं के बीच) जो पानी भरा है, उसमें मुख्यत: सोडियम घुला है. सोडियम और पोटेशियम शरीर के हर काम के लिए अत्यंत आवश्यक हैं. यहां हम बस सोडियम की ही चर्चा करेंगे वर्ना बात इतनी जटिल हो जाएगी कि आपके अलावा मुझे भी अपनी नानी याद आ जाएंगी.
रक्त में प्रवाहित हो रहा सोडियम एक निश्चित मात्रा से कम हो या बढ़ जाए तो यह स्थिति गंभीर बीमारी पैदा कर सकती है. रक्त में सोडियम 135 के स्तर से नीचे गया तो यह हाइपोनेट्रीनिया कहलाता है. पर यह कम क्यों होगा? कई बीमारियां, दवाइयां तथा स्थितियां ‘हाइपोनेट्रीमिया’ पैदा कर सकती हैं. मूल बातें दो रहेंगी. एक कि यदि किसी कारण शरीर में पानी की मात्रा तो बढ़ जाए पर नमक की मात्रा वही रहे तो पानी में नमक का घोल डाइल्यूट या पतला हो जाएगा. दूसरी बात यह हो सकती है कि शरीर से नमक निकल जाए और शरीर को नमक न मिले, बस प्यासा होने पर आदमी पानी पीता जाए- सो पानी ही मिलता रहे- तो भी रक्त में बह रहा घोल कम नमक वाला (कम सोडियम वाला) हो जाएगा. ऐसा कई बीमारियों मेंं हो सकता है खासकर बुढ़ापे में. मानसिक रोगियों में. गुर्दे की बीमारी में. कई ब्लडप्रेशर आदि की दवाइयों में भी. एक सामान्य सा उदाहरण देता हूं. मान लें कि आपको खूब दस्त हो रहे हों. उल्टी दस्त में आपके शरीर से पानी तथा साल्ट दोनों निकलते जाएंगे. इससे आपको बहुत प्यास लगेगी. या धूप में घूम-घूम कर बहुत पसीना निकल गया. प्यास है. पर इन स्थितियों में यदि केवल खूब पानी ही पीते गए साथ में यदि नमक नहीं लिया तो शरीर में बह रहे रक्त के पानी में नमक की कमी हो जाएगी. कभी डॉक्टर ने दस्त के मरीज को मात्र ग्लूकोज ही चढ़ा दिया, सेलाइन नहीं- तब भी यह स्थिति आ सकती है.
मान लें कि ‘हाइपोनेट्रीमिया’ हो ही गया तो मरीज को क्या-क्या होगा? हाइपोनेट्रीमिया के कारण मुख्यत: मस्तिष्क की कोशिकाओं में सूजन आने लगती है. इसीलिए ऐसे मरीज को मुख्यत: न्यूरोजिकल लक्षण प्रकट होते हैं. सिर दर्द, जी मितलाने और थकान से बात शुरू होगी. यदि डॉक्टर ने सही कारण नहीं पकड़ा तो धीरे-धीरे मरीज होश खोने लगेगा. उनींदा रहेगा. फिर पूरा बेहोश भी हो सकता है. उसे मिर्गी जैसे दौरे तक आ सकते हैं जो दिमागी सूजन बेहद बढ़ जाने के द्योतक हैं. यदि इस स्टेज पर भी डॉक्टर को बात नहीं समझ आई और वह बेहोशी को स्ट्रोक, लकवा आदि मानकर चलता चला गया तो मरीज की मृत्यु तक हो सकती है. देखने में छोटी सी सोडियम की इत्ती-सी कमी जान ले सकती है.
हां, यदि समय पर सही डायग्नोसिस बन गई तो पूरा इलाज संभव है. पर मुसीबत यह है कि यह बीमारी प्राय: बड़े ही धीमे धीमे, बिना अन्य किसी चेतावनी के आती है. एक बूढ़ा आदमी कुछ समय से थका थका, सोया सा रहता है- और हम मानते है कि यह सब तो बुढ़ापे में होता ही रहता है. डॉक्टर भी यह मान लेते हैं. (हाइपोथायरायड) के मरीज, डिप्रेशन आदि मानसिक बीमारी के रोगी- यूं ही थके, सोये रहते हैं. वे कब हाइपोनेट्रीमिया में चले गए, पता ही नहीं चलता.
ब्लडप्रेशर में दी जाने वाली कुछ बेहद पापुलर दवाइयां भी धीरे-धीरे हाइपोनेट्रीमिया पैदा कर सकती हैं. डॉक्टर यदि अलर्ट नहीं है तो वह ये दवाइयां जारी रखेगा तथा हाइपोनेट्रीमिया जानलेवा हद तक बढ़ जाएगा. हाइपोनेट्रीमिया का खतरा दुतरफा है, बल्कि तितरफा- एक तो यह कि प्राय: आमजन को इसकी बिल्कुल खबर नहीं है, फिर रक्त में सोडियम लेवल की सटीक तथा विश्वसनीय जांच की व्यवस्था वाली पैथलेब केवल बड़े शहरों में हैं, और तीसरी सबसे खतरनाक बात यह कि प्राय: डॉक्टरों को भी इसकी डायग्नोसिस तथा सही-सही इलाज का सही-सही पता नहीं है. यह मात्र खाने में नमक बढ़ाने से, सेलाइन चढ़ाने से या कोई फैंसी दवा देने से ठीक नहीं हो जाएगी.
फिर क्या करें?
बस, याद रखें कि यदि मरीज बिना किसी जायज कारण के बेहोश-सा, या बेहोश ही हो रहा है, तो यह भी एक कारण हो सकता है. डॉक्टर यदि हाइपोनेट्रीमिया की डायग्नोसिस बोले तो उसकी गंभीरता को समझें. डॉक्टर को ही शेष सब समझने दें. अच्छा डॉक्टर चुनकर सब उस पर छोड़ दें.
भगवान भला करेगा. भगवान के पास और कोई चारा नहीं. न ही आपके पास.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गंगा नदी से शुरू हुआ विजय अभियान अब नर्मदा तक आ चुका है. अब वे देश की पांचवीं सबसे बड़ी नदी नर्मदा के सहारे अपने ही गढ़ गुजरात के नायक तो बन ही रहे हैं साथ महाराष्ट्र और राजस्थान को भी साधने की कोशिश रहे हैं. इस बात की पूरी संभावना है कि प्रधानमंत्री की यह कोशिश उनके लिए ‘अच्छे दिनों’ की बुनियाद बन जाए. लेकिन इसी के साथ यह तय है कि इन अच्छे दिनों की कीमत मध्य प्रदेश को अपनी 20,882, हेक्टेयर उपजाऊ जमीन और तकरीबन 45,000 हजार परिवारों के विस्थापन के साथ चुकानी होगी. पर्यावरण को जो अपूरणीय क्षति होगी सो अलग.
हाल ही में 12 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण (एनसीए) की एक बैठक हुई थी. इसी में गुजरात के केवड़िया स्थित सरदार सरोवर बांध पर 17 मीटर ऊंचे गेट लगाकर बांध की ऊंचाई 121.92 से 138.38 मीटर करने को मंजूरी दी गई है. इससे पहले यह मामला पिछले कई वर्षों से लंबित था. अब 2017 तक करीब 270 करोड़ रुपये की लागत से बांध पर 30 गेट लगेंगे. इसके बाद बांध की संग्रहण क्षमता 90 लाख घन फुट बढ़ जाएगी.
सरकार के इस फैसले पर कई बुनियादी सवाल उठाए जा रहे हैं. मसलन क्या वाकई सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाए जाने की जरूरत है? इससे किन लोगों को फायदा पहुंचेगा? सरदार सरोवर बांध किस राज्य के सौभाग्य के दरवाजे खोलेगा और किस के लिए बदहाली लाएगा? इन सब सवालों के जवाब जानने के लिए पहले सरदार सरोवर परियोजना, नर्मदा घाटी, राज्य सरकारों की मंशा और इससे जुड़े राजनीतिक नफा-नुकसान को समझना जरूरी है.
सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड की वेबसाइट के मुताबिक यह बांध अमेरिका के ग्रांड काउली के बाद दूसरा सबसे बड़ा कांक्रीट ग्रेविटी डैम (कांक्रीट से बना ऐसा बांध जो बहुत तेज बहाव आैैर अधिक मात्रा में पानी रोक सकता हैै) है. वहीं यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा निर्वहन क्षमता (संग्रहण क्षमता) वाला बांध है. इसकी जलसंग्रहण क्षमता 5860 एमसीएम (मिलियन घन मीटर; एक मिलियन = दस लाख) है, जो 4.75 लाख एकड़ फुट (एक एकड़ के क्षेत्र में एक फुट ऊंचाई तक पानी = एक एकड़ फुट ) के बराबर है.
बांध की ऊंचाई बढ़ाए जाने की अनुमति मिलते ही गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने ट्वीट कर कहा था, ‘अच्छे दिन आ गए.’ लेकिन हकीकत इससे कुछ अलग है. दरअसल यह केवल गुजरात के अच्छे दिनों की शुरुआत है. मध्य प्रदेश के करीब ढाई लाख विस्थापितों, सैंकड़ाें स्कूलों, मंदिरों-मस्जिदों, हजारों एकड़ उपजाऊ जमीन की कीमत पर गुजरात के अच्छे दिन लाए जा रहे हैं. इन बातों के विश्लेषण से पहले यह समझना महत्वपूर्ण है इस फैसले से गुजरात को क्या फायदा पहुंचेगा. असल में नर्मदा के दायरे में आने वाले गुजरात का 75 फीसदी इलाका संभावित सूखा प्रभावित क्षेत्र माना जाता है. बांध की ऊंचाई बढ़ने से गुजरात में नर्मदा के जल की उपलब्धता बढ़ेगी, इससे ये इलाके संभावित सूखा प्रभावित की श्रेणी से बाहर निकल आएंगे. सिंचाई के मामले में भी सबसे ज्यादा फायदा गुजरात को ही होना है. नर्मदा बांध के जरिए गुजरात की 18.45 लाख हैक्टेयर भूमि को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हो सकेगा. इससे प्रदेश के 15 जिलों की 73 तहसीलों के 3112 गांवों को सिंचाई के लिए पानी मिलेगा. यह बांध भरूच के 210 गांवों को बाढ़ के खतरे से मुक्ति दिलाएगा. वहीं इसका पानी सौराष्ट्र की तस्वीर बदल देगा. सरदार सरोवर बांध का पानी सौराष्ट्र के 115 छोटे बांधों और जलाशयों में पहुंचेगा. औसत से भी कम वर्षा वाले सौराष्ट्र में साल भर बनी रहने वाली पानी की समस्या खत्म हो जाएगी. गुजरात के 151 शहरी और 9,633 गांवों (जो कि गुजरात के कुल 18,144 गांवों का 53 प्रतिशत है) को पीने का पानी उपलब्ध होगा. बांध से पैदा होने वाली 1,450 मेगावॉट बिजली में से 16 फीसदी बिजली भी गुजरात को मिलेगी. यानी गुजरात की चांदी ही चांदी. इसके ठीक उलट मध्य प्रदेश को सिवाय 877 मेगावॉट बिजली के कुछ नहीं मिलेगा. यह सही है कि मध्य प्रदेश बिजली संकट से जूझ रहा है. उसे अतिरिक्त बिजली की जरूरत है. लेकिन प्रदेश में सूखाग्रस्त इलाकों, सिंचाई के पानी की कमी, पेयजल समस्या भी विद्यमान है. इस परियोजना में मध्य प्रदेश के सूखाग्रस्त इलाकों की पूरी तरह अनदेखी की गई है. सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड की वेबसाइट में कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं है कि मध्य प्रदेश को सिंचाई के लिए कितना पानी मिलेगा. जबकि पूरी परियोजना ही प्रदेश के विस्थापितों की कीमत पर खड़ी हो रही है.
अब जानते हैं कि सरदार सरोवर बांध परियोजना से मध्य प्रदेश को क्या नुकसान है. मध्य प्रदेश के एक कस्बे धरमपुरी (जिला धार) समेत 193 गांव जलमग्न होने की कगार पर हैं. सूबे की करीब 20,882 हेक्टेयर जमीन डूब क्षेत्र में आ रही है. 2001 की जनगणना के मुताबिक तीनों राज्यों के 51,000 परिवारों को प्रभावित माना गया था, जिनकी संख्या 2011 की जनगणना में बढ़कर 63,000 हजार हो गई है. इनमें अकेले मध्यप्रदेश से 45,000 हजार परिवार हैं. इन परिवारों में अधिकांश आदिवासी, छोटे-मझोले किसान, दुकानदार, मछुआरे, कुम्हार हैं, जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते हैं.
वैसे बांध ऊंचाई बढ़ाने पर एक तकनीकी पेंच भी है. बांध की ऊंचाई बढ़ाने से जुड़े एक मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साल 2000 में कहा था कि निर्माण के पहले सभी विस्थापितों का उचित पुनर्वास होना चाहिए. लेकिन यह अभी तक संभव नहीं हो पाया हैै. मध्य प्रदेश के लिए चिंता की एक बात यह भी है कि नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण के दिसंबर 1979 के पारित निर्णय के मुताबिक वर्ष 2024 तक प्रदेश को 29 बड़े, 135 मध्यम और तीन हजार छोटी सिंचाई परियोजनाएं पूरी करनी हैं. यदि प्रदेश निर्धारित अवधि में अपने हिस्से के नर्मदा जल का उपयोग नहीं कर पाया तो उसे जल उपयोग के इस अधिकार से वंचित कर दिया जाएगा. मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अरुणा यादव बताते हैं, ‘ मध्यप्रदेश सरकार नर्मदा सिंचाई परियोजनाओं को लेकर बिलकुल गंभीर नहीं है. अभी तक केवल 10 बड़ी परियोजनाएं पूरी हुई हैं. दो पर काम चल रहा है, जबकि 17 पर काम शुरू ही नहीं हो पाया है.’
जिस गुजरात को परियोजना से सबसे ज्यादा फायदा मिलने वाला है, उसके केवल 19 गांव डूब क्षेत्र में आ रहे हैं. कुल 9,000 हेक्टेयर जमीन प्रभावित हो रही है. जबकि महाराष्ट्र के 22 गांव और करीब 9,500 हेक्टेयर वन भूमि परियोजना से प्रभावित हो रही है. परियोजना का लंबे समय से विरोध कर रही नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं का आरोप है कि केवल 30 परिवारों को पुर्नवास के लिए जमीन मिल पाई है जबकि करीब 3,000 परिवारों को जमीन देने की प्रक्रिया भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई. इन परिवारों को हक से वंचित करने के लिए फर्जी रजिस्ट्रियों का सहारा लिया गया. नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ताओं का यह भी आरोप है कि सरकारी अफसरों ने दलालों के साथ मिलकर हजारों फर्जी रजिस्ट्रियां कर डालीं. इन आरोपों की जांच के लिए 2008 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जस्टिस एसएस झा आयोग का गठन किया. आयोग की जांच अभी जारी है. आयोग जिन बिंदुओं पर जांच कर रहा है उनमें फर्जी रजिस्ट्रियों की जांच की जा रही है. जिन परिवारों को अभी तक जमीन नहीं मिली है आयोग उस पर भी तथ्य इकट्ठे कर रहा है. साथ ही आजीविका शुरू करने के लिए दी गई राशि में भी हुए भ्रष्टाचार और पुनर्वास क्षेत्रों के स्तरहीन निर्माण कार्यों और अधिक खर्च कर दी गई राशि जैसे बिंदु भी जांच में शामिल हैं. आयोग की रिपोर्ट अक्टूबर, 2014 तक आने की संभावना है.
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ऊंचाई 260 से 455 फीट तक पहुंचने का सफर
फरवरी 1999 में सुप्रीम कोर्ट ने बांध की ऊंचाई 80 मीटर (260 फीट) से 88 मीटर (289 फीट) करने की अनुमति दी
अक्टूबर 2000 में फिर से सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को ऊंचाई 90 मीटर (300) करने की अनुमति
मई 2002 में नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण ने बांध की ऊंचाई 95 मीटर (312 फीट) करने के प्रस्ताव को अनुमोदित किया.
मार्च 2004 में प्राधिकरण ने ऊंचाई110 मीटर (360 फीट) करने की अनुमति दी
मार्च 2006 में प्राधिकरण ने बांध की ऊंचाई 110.64 मीटर (363 फीट) से 121.92 (400 फीट) करने की अनुमति दी. प्राधिकरण द्वारा ये अनुमति वर्ष 2003 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बांध की ऊंचाई और बढ़ाने की अनुमति देने से इंकार करने के बाद दी गई थी.
जून 2014 में प्राधिकरण ने ऊंचाई 455 फीट (138 मीटर) करने की अनुमति दी [/box]
मध्य प्रदेश के पूर्व सिंचाई मंत्री डॉ रामचंद्र सिंहदेव कहते हैं कि सरदार सरोवर बांध समेत नर्मदा घाटी में जितनी भी परियोजनाओं पर काम हो रहा है, ये सभी गलत आंकड़ों पर आधारित हंै. वे बताते हैं, ‘जिस वक्त नर्मदा घाटी में नई परियोजनाओं की शुरुआत की गई, उस वक्त लिए गए आंकड़े अंग्रेजों द्वारा पुरानी पद्धति से संग्रहित किए गए थे. ब्रिटिश हुकुमत बारिश के पानी (रेन वॉटर गेज) के आधार पर नदियों में उपलब्ध जल के आंकड़े इकट्ठे करती थी. उनके मुताबिक नर्मदा में 27 एमएएफ (मिलियन एकड़ फुट) पानी था. जबकि बाद में नई पद्धति (रिवर गेजिंग स्टेशन) से आए आंकड़े बताते हैं कि नर्मदा में केवल 23.7 एमएएफ पानी है यानी जो भी परियोजनाएं बनाई गई, उनका आधार ही गलत था. मध्य प्रदेश सरकार ने कई बार नर्मदा के पानी की उपलब्धता को लेकर सवाल उठाए, लेकिन हमारी कभी नहीं सुनी गई. दूसरी महत्वपूर्ण बात ये है कि पूरी नर्मदा घाटी भूंकप प्रभावित है. बड़े बांध बनने से यह खतरा कई गुना बढ़ गया है.’
नया नहीं है विवाद
नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध परियोजना की अधिकारिक घोषणा 1960 में हुई थी और 1961 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसकी आधारशिला रखी. तभी से यह परियोजना विवादों में फंसी हुई है. शुरुआती कई सालों तक तो परियोजना से जुड़े हुए तीनों राज्यों (मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र) में जल बंटवारे को लेकर आपसी सहमति नहीं बन पाने से परियोजना अटकी रही. 1979 में यह मामला नर्मदा जल विवाद प्राधिकरण में पहुंचा जहां तीनों राज्यों में सहमति बनी और1990 के दशक में विश्व बैंक ने परियोजना के लिए ऋण देने का फैसला लिया. लेकिन डूब प्रभावित लोगों ने नर्मदा बचाओ आंदोलन के तहत परियोजना का विरोध करना शुरू कर दिया. 1991-1994 में पहली बार विश्व बैंक ने किसी परियोजना की समीक्षा करने के लिए अपनी एक उच्च स्तरीय समिति बनाई. जिसने अपनी पड़ताल में यह पाया कि परियोजना से होने वाली पर्यावरणीय क्षति की पूर्ति नहीं की जा सकती इसलिए उसने परियोजना को वित्त उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया. इधर नर्मदा बचाओ आंदोलन के समर्थकों ने सुप्रीम कोर्ट में निर्माण रोकने के लिए जनहित याचिका लगा दी. वर्ष 2000 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर फैसला देते हुए कहा कि बांध उतना ही बनाया जाना चाहिए, जहां तक लोगों का पुर्नस्थापन और पुनर्वास हो चुका है. परियोजना का विरोध कर रहा नर्मदा बचाओ आंदोलन शुरू से ही आरोप लगा रहा है कि ना तो परियोजना में पर्यावरणीय क्षति का ध्यान रखा गया ना ही विस्थापितों को उचित पुनर्वास मिल पा रहा है. अब फिर बांध की ऊंचाई बढ़ाई जा रही है, और एक बार फिर परियोजना विवादों में आ गई है. मध्य प्रदेश के धार, बडवानी, निमाड़ के कई इलाके और झाबुआ के पहाड़ी क्षेत्रों में स्थानीय रहवासी सड़कों पर उतरकर बांध की ऊंचाई बढ़ाने का विरोध कर रहे हैं.
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सरदार पटेल की प्रतिमा से शुरु हो चुकी थी भूमिका
लोकसभा चुनाव के ठीक पहले सरदार वल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा की स्थापना को लेकर पूरे देश मे रन फॉर यूनिटी जैसे कार्यक्रम आयोजित किए गए थे. इसकी स्थापना उसी केवड़िया में होनी है जहां सरदार सरोवर बांध बना है. राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि प्रतिमा का एक उद्देश्य सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने की अपनी पुरानी मांग को मजबूत करना भी था. सरदार सरोवर बांध को बल्लभ भाई पटेल का सपना बताकर पूरे देश में एक माहौल बनाया जा रहा था. गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में गठित सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट ने परियोजना के बारे में अपनी वेबसाइट पर जो अधिकारिक जानकारी मुहैया कराई है, उसके मुताबिक यह प्रतिमा तकनीकी तौर पर एक 182 मीटर (597 फुट) ऊंची इमारत होगी. इसे स्थापित करने में 2500 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत आएगी. जिसके अंदर से सरदार सरोवर का विस्तृत नजारा देखा जा सकेगा. अमेरिका की टर्नर कंस्ट्रक्शन कंपनी इसका निर्माण कर रही है. वहीं मीन हार्ट्ज और माइकल ग्रेव्ज एंड एसोसिएट्स डिजाइन व आर्किटेक्ट फर्म है. इस प्रतिमा को ‘एकता की प्रतिमा’ कहा गया है. नरेंद्र मोदी स्टेच्यू ऑफ यूनिटी की स्थापना के साथ ही सरदार सरोवर बांध से भरूच के समुद्री तट तक नर्मदा के दोनों किनारों पर कैनाल टूरिज्म के तौर पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पर्यटन स्थल विकसित करना चाहते हैं.
मध्यप्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया कहते हैं, ‘असल में नरेंद्र मोदी सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने के लिए सरदार पटेल के व्यक्तित्व का दोहन कर रहे थे. उन्होंने एक तीर से दो निशाने साधे हैं, पहला तो गुजरात की मांग पूरी करने का, दूसरा वे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के राजनीतिक कद की भी छटांई करना चाहते हैं, ताकि वे अपने ही प्रदेश में कमजोर साबित हो जाएं.’
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राजनीति का बांध
सरदार सरोवर बांध से कई राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी जुड़ी हुई हैं. बांध की ऊंचाई बढ़ने से जहां नरेंद्र मोदी और उनके गुजरात को कई लाभ हैं. वहीं मध्य प्रदेश की राजनीति के तीन सितारों (शिवराज सिंह, उमा भारती और थावरचंद गहलोत) को इस बांध की ऊंचाई में डूबने का खतरा पैदा हो गया है. सबसे पहले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की बात करें तो वे इस मुद्दे पर बोलने से बचते रहे हैं. जिस वक्त बांध की ऊंचाई बढ़ाने का फैसला हुआ, वे दक्षिण अफ्रीका में मध्य प्रदेश में उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए नए निवेशक तलाश कर रहे थे. शिवराज ने विदेश यात्रा के दौरान ही ट्वीट कर मोदी के फैसले का स्वागत किया. उन्होंने यह भी ट्वीट किया, ‘हमें शून्य लागत पर बिजली मिलेगी.’ लेकिन वे जैसे ही भोपाल पहुंचे तो मीडिया के सामने नए तेवर में नजर आए. पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि विस्थापितों के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का ध्यान रखा जाएगा. यह बयान देते वक्त वे भूल गए कि पहले ही ट्विटर पर कह चुके हैं, ‘2008 में ही विस्थापितों को मुआवजा बांट दिया गया. अब तत्काल कोई क्षेत्र डूब से प्रभावित नहीं होने वाला.’ सरदार सरोवर बांध पर विरोधाभासी बयान देने वाले शिवराज सिंह चौहान भूल गए कि आने वाले दिनों में यही मुद्दा उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं में सबसे बड़ा रोड़ा बनेगा. दूसरे स्थान पर केंद्रीय जलसंसाधन मंत्री उमा भारती का नाम आता है. मूलतः मध्य प्रदेश की रहने वाली उमा भारती अच्छी तरह जानती होंगी कि सूबे में पुर्नवास की स्थिति क्या है. इसके बावजूद भी उन्होंने अपने बयान में कहा, ‘विस्थापितों को ध्यान में रख कर दिए गए सुझावों के बाद सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने की मंजूरी दी गई है. सामाजिक न्याय मंत्रालय विस्थापितों के लिए उठाए गए कदमों से संतुष्ट है.’ केंद्रीय जल संसाधन मंत्री रहते हुए उमा का बांध की ऊंचाई बढ़ाने का समर्थन करना उनकी स्थिति को आने वाले दिनों में कमजोर करेगा. जिस परियोजना से मध्य प्रदेश को सिवाय नुकसान के कुछ नहीं मिल रहा है, उसका समर्थन कर उमा ने अपने विरोधियों को एक नया मुद्दा दे दिया है. चूंकि सरदार सरोवर बांध की पूरी कहानी सामाजिक न्याय मंत्रालय का हवाला देकर लिखी जा रही है, ऐसे में प्रदेश की राजनीति से राज्यसभा सांसद के रूप में केंद्र में पहुंचे केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री थावरचंद गहलोत के लिए भी यह अच्छे दिनों की शुरुआत तो कतई नहीं मानी जा सकती. गहलोत भी मध्यप्रदेश से हैं. वे 1990-92 में प्रदेश के सिंचाई, नर्मदा घाटी विकास विभाग के मंत्री रह चुके हैं यानी यह माना जा सकता है विस्थापितों के दर्द को उन्होंने करीब से देखा और समझा होगा. लेकिन उनके ही मंत्रालय को ढाल बनाकर सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाई जा रही है. ऐसे में मध्य प्रदेश में विस्थापन के लिए वे भी उतने ही दोषी माने जाएंगे जितने कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उमा भारती. आने वाले समय में मध्य प्रदेश में तीनों को ही बांध की ऊंचाई का समर्थन करना राजनीतिक रूप से बहुत मंहगा पड़ सकता है.
मध्य प्रदेश की राजनीति के तीन सितारों (शिवराज सिंह, उमा भारती और थावरचंद गहलोत) को इस बांध की राजनीति से ज्यादा नुकसान हो सकता है
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‘बांध की ऊंचाई बढ़ाया जाना सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है’
सरदार सरोवर परियोजना में विस्थापितों की पूरी तरह अनदेखी की गई है. गुजरात सरकार ने अभी तक नहरों का काम ही पूरा नहीं किया है, फिर उसे और केंद्र सरकार को सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने की जल्दी क्यों है. यह समझ नहीं आता. पिछले 30 सालों में नहरों का काम 30 फीसदी भी पूरा नहीं हो पाया है. बांध की ऊंचाई बढ़ने से गुजरात के कच्छ और सौराष्ट्र को इसका तत्काल कोई लाभ नहीं मिलेगा. इन इलाकों में सिंचाई के लिए पानी तब ही मिल पाएगा, जब नहरों का काम पूरा होगा. सबसे गौर करने वाली बात यह भी है कि किसान गुजरात सरकार को अपनी जमीन तक नहीं देना चाहते, तो फिर नहरें बनेंगी कहां पर. सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि जहां तक पुर्नवास हुआ हो, वहीं तक काम को आगे बढ़ाया जाना है, लेकिन किसी भी प्रभावित प्रदेश में पुनर्वास हुआ ही नहीं है तो फिर बांध की ऊंचाई बढ़ाए जाना न्यायालय की अवमानना के तहत आता है. आप सोचिए कि योजना आयोग ने 2012 में परियोजना की अनुमानित लागत 70 हजार करोड़ रुपये बताई थी. इसपर अब तक 63 हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं और यह खर्च 90 हजार करोड़ रुपये तक जाने की उम्मीद है. हमने परियोजना से जुड़े तथ्यों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र भी लिखा है. यह लाखों लोगों के जीवन का प्रश्न है. इस पर सरकार को जवाब देना ही होगा. जैसे ही गेट लगाने की कार्रवाई शुरु होगी, वैसे वैसे बैक वॉटर के कारण पानी का स्तर बढ़ेगा. इसके परिणामस्वरूप अभी तक जो बस्तियां डूब क्षेत्र में चिन्हित हुई हैं. वहां पानी भर जाएगा. बारिश में यह स्थिति और भी ज्यादा चिंताजनक होगी.
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मोदी को फायदा ही फायदा
बांध की ऊंचाई बढ़ने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीतिक फायदा तीन गुना हो जाएगा. पहला तो यह कि गुजरात में उन्होंने साबित कर दिया कि वे अपने प्रदेश के कितने बड़े हितैषी हैं. खुद नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए लंबे समय से बांध की ऊंचाई बढ़ाने की मांग कर रहे थे. 2006 में उन्होंने 51 घंटे का उपवास भी रखा था. प्रधानमंत्री बनते ही सबसे पहले उन्होंने गुजरात के हित में फैसला लेते हुए सरदार सरोवर बांध में 17 मीटर ऊंचे दरवाजे लगाने की अनुमति दे दी. इससे गुजरात में उनका कद और बढ़ गया. गुजरात में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही खुलकर उनके निर्णय का स्वागत कर रही हैं. सरदार सरोवर बांध के द्वारा उन्होंने महाराष्ट्र और राजस्थान को साधने की भी कोशिश की है. महाराष्ट्र में कुछ समय बाद विधानसभा चुनाव होने हैं. सरदार सरोवर परियोजना से महाराष्ट्र को भी फायदा होना है. यहां पैदा होने वाली 1,450 मेगावॉट बिजली में से 27 फीसदी बिजली महाराष्ट्र को मिलेगी. महाराष्ट्र के पहाड़ी इलाकों की 37 हजार पांच सौ हैक्टेयर भूमि को सिंचाई के लिए जल उपलब्ध हो जाएगा.
बांध की ऊंचाई बढ़ने से राजस्थान को अच्छे दबाव से पानी मिल सकेगा, इससे वहां के रेगिस्तानी जिले बाड़मेर और जालौर की दो लाख 46 हजार हैक्टेयर भूमि की सिंचाई हो सकेगी. इसके अलावा राजस्थान के तीन शहरों और 1336 गांवों के चार करोड़ लोगों को पेयजल भी उपलब्ध हो सकेगा. अपने इस फैसले मोदी गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र में हीरो के रूप में उभरेंगे.
नर्मदा घाटी से जुड़े कुछ तथ्य
जुलाई 1993 टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस ने सात वर्षों के अध्ययन के बाद नर्मदा घाटी में बनने वाले सबसे बड़े सरदार सरोवर बांध के विस्थापितों के बारे में अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया. इसमें कहा गया कि पुनर्वास एक गंभीर समस्या रही है. इस रिपोर्ट में ये सुझाव भी दिया गया कि बांध निर्माण का काम रोक दिया जाए और इस पर नए सिरे से विचार किया जाए
अगस्त 1993 परियोजना के आकलन के लिए भारत सरकार ने योजना आयोग के सिंचाई मामलों के सलाहकार के नेतृत्व में एक पांच सदस्यीय समिति का गठन किया.
दिसंबर 1993 केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय ने कहा कि सरदार सरोवर परियोजना ने पर्यावरण संबंधी नियमों का पालन नहीं किया है.
जनवरी 1994 भारी विरोध को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने परियोजना का काम रोकने की घोषणा की.
मार्च 1994 मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इस पत्र में कहा कि राज्य सरकार के पास इतनी बड़ी संख्या में लोगों के पुनर्वास के साधन नहीं हैं.
अप्रैल 1994 विश्व बैंक ने अपनी परियोजनाओं की वार्षिक रिपोर्ट में कहा कि परियोजना में पुनर्वास का काम ठीक से नहीं हो रहा है.
जुलाई 1994 केंद्र सरकार की पांच सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी लेकिन अदालत के आदेश के कारण इसे जारी नहीं किया गया. इसी महीने में कई पुनर्वास केंद्रों में प्रदूषित पानी पीने से दस लोगों की मौत हुई.
नवंबर-दिसंबर 1994 बांध बनाने के काम दोबारा शुरू करने के विरोध में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने भोपाल में धरना देना शुरू किया.
दिसंबर 1994 मध्य प्रदेश सरकार ने विधानसभा के सदस्यों की एक समिति बनाई जिसने पुनर्वास के काम का जायज़ा लेने के बाद कहा कि भारी गड़बड़ियां हुई हैं.
जनवरी 1995 सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि पांच सदस्यों वाली सरकारी समिति की रिपोर्ट को जारी किया जाए. साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने बांध की उपयुक्त ऊंचाई तय करने के लिए अध्ययन के आदेश दिए.
मार्च 1995 विश्व बैंक ने अपनी एक रिपोर्ट में स्वीकार किया कि सरदार सरोवर परियोजना गंभीर समस्याओं में घिरी है.
जून 1995 गुजरात सरकार ने एक नर्मदा नदी पर एक नई विशाल परियोजना-कल्पसर शुरू करने की घोषणा की.
नवंबर 1995 सुप्रीम कोर्ट ने सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने की अनुमति दी.
1996 उचित पुनर्वास और ज़मीन देने की मांग को लेकर मेधा पाटकर के नेतृत्व में अलग-अलग बांध स्थलों पर धरना और प्रदर्शन जारी रहा.
अप्रैल 1997 महेश्वर परियोजना के विस्थापितों ने मंडलेश्वर में एक जुलूस निकाला जिसमें ढाई हज़ार लोग शामिल हुए. इन लोगों ने सरकार और बांध बनाने वाली कंपनी एस कुमार्स की पुनर्वास योजनाओं पर सवाल उठाए.
अक्तूबर 1997 बांध बनाने वालों ने अपना काम तेज़ किया जबकि विरोध जारी रहा.
जनवरी 1998 सरकार ने महेश्वर और उससे जुड़ी परियोजनाओं की समीक्षा की घोषणा की और काम रोका गया.
अप्रैल 1998 दोबारा बांध का काम शुरू हुआ, स्थानीय लोगों ने निषेधाज्ञा को तोड़कर बांधस्थल पर प्रदर्शन किया, पुलिस ने लाठियां चलाईं और आंसू गैस के गोले छोड़े.
मई-जुलाई 1998 लोगों ने जगह-जगह पर नाकाबंदी करके निर्माण सामग्री को बांधस्थल तक पहुंचने से रोका.
नवंबर 1998 बाबा आमटे के नेतृत्व में एक विशाल जनसभा हुई और अप्रैल 1999 तक ये सिलसिला जारी रहा.
दिसंबर 1999 दिल्ली में एक विशाल सभा हुई जिसमें नर्मदा घाटी के हज़ारों विस्थापितों ने हिस्सा लिया.
जून 2014 बांध की आखिरी ऊंचाई बढ़ाने की घोषणा होते ही मध्यप्रदेश के बडवानी, अंजड, कुक्षी, मनावर, धरमपुरी रैलियां निकालकर विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है.
वर्ष 1943-44 में बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था. इस अकाल में करीब 40 लाख लोगों की मौत हो गई थी.
20वीं सदी के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में घटी सबसे भयानक त्रासदी क्या थी, इस सवाल के जवाब में ज्यादातर यही कहेंगे कि भारत का विभाजन जिसने करीब 10 लाख लोगों की बलि ले ली. लेकिन इससे चार साल पहले घटी एक त्रासदी कहीं बड़ी और भयानक थी. 1943-44 में बंगाल में जो भीषण अकाल पड़ा वह करीब 40 लाख लोगों की जिंदगी लील गया था. मौतों का यह आंकड़ा विभाजन की तुलना में चार गुना बड़ा है. यह प्राकृतिक आपदा नहीं थी बल्कि ब्रिटिश सरकार द्वारा पैदा किया गया एक कृत्रिम अकाल था. इतनी बड़ी आपदा होने के बावजूद भारत के इतिहास और वर्तमान ने इस बड़ी हद तक भुला ही दिया है.
इस अकाल की सबसे असाधारण बात है इसकी अवधि. वह समय दूसरे विश्व युद्ध का भी था जो अपने चरम पर था. जर्मन सेना पूरे यूरोप को रौंद रही थी. यहूदियों, स्लाव और रोमा लोगों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा था. इस दौरान एडोल्फ हिटलर और उसके साथी नाजियों ने 60 लाख यहूदियों की हत्या की. इस नरसंहार को सारी दुनिया आज होलोकास्ट के नाम से जानती है. 60 लाख लोगों की हत्या करने में हिटलर को 12 साल लगे थे, लेकिन अंग्रेजों ने एक साल से महज कुछ अधिक समय में 40 लाख भारतीयों को मार डाला.
इस विषय पर लिखते रहे आस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. गिडोन पोल्या का मानना है कि बंगाल का अकाल ‘मानवनिर्मित होलोकास्ट’ है क्योंकि इसके लिए सीधे तौर पर तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की नीतियां जिम्मेदार थीं. 1942 में बंगाल में अनाज की पैदावार बहुत अच्छी हुई थी, लेकिन अंग्रेजों ने व्यावसायिक मुनाफे के लिए भारी मात्रा में अनाज भारत से ब्रिटेन भेजना शुरू कर दिया. इसकी वजह से उन इलाकों में अन्न की भारी कमी पैदा हो गई जो आज के पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार और बांग्लादेश में आते हैं.
लेखिका मधुश्री मुखर्जी ने उस अकाल से बच निकले कुछ लोगों को खोजने में कामयाबी हासिल की. अपनी किताब चर्चिल्स सीक्रेट वार (चर्चिल का गुप्त युद्ध) शीर्षक में वह लिखती हैं, ‘मां-बाप ने अपने भूखे बच्चों को नदियों और कुंओं में फेंक दिया. कई लोगों ने ट्रेन के सामने कूदकर जान दे दी. भूखे लोग चावल के मांड़ के लिए गिड़गिड़ाते. बच्चे पत्तियां और घास खाते. लोग इतने कमजोर हो चुके थे कि उनमें अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार करने तक की ताकत नहीं बची थी.’
इस अकाल को देख चुके एक बुजुर्ग ने मुखर्जी को बताया, ‘बंगाल के गांवों में लाशों के ढेर लगे रहते थे जिन्हें कुत्तों और सियारों के झुंड नोचते.’ इस अकाल से वही आदमी बचे जो रोजगार की तलाश में कलकत्ता चले आए थे या वे महिलाएं जिन्होंने परिवार को पालने के लिए मजबूरी में वेश्यावृत्ति करनी शुरू कर दी. मुखर्जी लिखती हैं, ‘महिलाएं हत्यारी बन गईं और गांव की लड़कियां वेश्याएं. उनके पिता अपनी ही बेटियों के दलाल बन गए.’
मणि भौमिक मशहूर संस्थान आईआईटी से पीएचडी करने वाले पहले शख्स हैं और उन्हें इसलिए भी जाना जाता है कि उनकी खोज ने लेसिक आई सर्जरी की राह आसान की. उनकी यादों में यह अकाल दर्ज है. भौमिक की दादी की भूख से मौत हो गई थी क्योंकि उनके हिस्से जो थोड़ा बहुत खाना आता था, उसका भी एक हिस्सा वे अपने पोते को देती थीं.
सन 1943 तक भूख के शिकार लोगों की बाढ़ कलकत्ता पहुंचने लगी थी. शहर की सड़कों पर उनकी मौत हो रही थी. पंडित जवाहरलाल नेहरू का कहना था, ‘इस विनाशकारी परिदृश्य में भरे-पूरे गोरे-चिट्टे ब्रिटिश सैनिकों की मौजूदगी ने भारत में अंग्रेजी राज के खात्मे की दिशा में आखिरी धक्का मारने का काम किया.’
चर्चिल इस अकाल को बहुत आसानी से टाल सकते थे. महज कुछ जहाजों में अनाज भेजकर भारतीयों की बहुत बड़ी मदद की जा सकती थी, लेकिन ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने किसी की नहीं सुनी. न अपने दो वॉयसरायों की और न ही अपने भारत सचिव की. यहां तक कि चर्चिल ने अमेरिकी राष्ट्रपति तक की अपील को ठुकरा दिया. जापानी सेना के साथ मिलकर मित्र राष्ट्रों के खिलाफ लड़ रहे सुभाषचंद्र बोस ने म्यांमार से चावल भेजने की पेशकश की थी लेकिन ब्रिटिश शासन ने यह खबर तक दबा दी. चर्चिल ने बेहद क्रूर तरीके से अनाज को ब्रिटिश सैनिकों और ग्रीस के नागरिकों के इस्तेमाल के लिए भिजवा दिया. उनका कहना था कि बंगालियों को तो पहले से ही खाना पूरा नहीं पड़ रहा, इसलिए उनकी भुखमरी ज्यादा गंभीर विषय नहीं है.
भारत और बर्मा (तत्कालीन म्यामार) के सचिव लियोपोल्ड अमेरी ने घोर उपनिवेशवादी होने के बावजूद चर्चिल के ‘हिटलर जैसे रवैये’ की आलोचना की. अमेरी और वॉयसराय आर्किबाल्ड वॉवेल ने चर्चिल से अनुरोध किया कि भारत के लिए तत्काल अनाज भेजा जाए. इस पर चर्चिल ने एक टेलीग्राम भेजकर पूछा जिसका भाव यह था कि इतनी भुखमरी है तो गांधी अब तक क्यों नहीं मरे?
वॉवेल ने लंदन को सूचना भेजी थी, ‘यह अकाल ब्रिटिश शासन के अधीन आन पड़ी सबसे बड़ी आपदाओं में से एक है.’ उन्होंने लिखा, ‘जब भी हॉलैंड (अब नीदरलैंड्स) को अनाज की जरूरत होती है तो जहाज हमेशा उपलब्ध होते हैं लेकिन जब हम अनाज भारत लाने के लिए जहाज की मांग करते हैं तो हमें एकदम अलग उत्तर मिलता है.’ उधर, चर्चिल की सफाई यह थी कि आपातकालीन आपूर्ति के लिए ब्रिटेन के पास जहाज नहीं थे. आज भी उनका परिवार और उनके समर्थक यही दलील देते हैं. लेकिन मुखर्जी ने ऐसे दस्तावेज उजागर किए हैं जो चर्चिल के दावे को चुनौती देते हैं. उनके द्वारा खोजे गए आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया से अनाज लेकर जा रहे जहाज भारत के पास से ही होकर गुजरे थे.
भारत के प्रति चर्चिल की दुश्मनी कोई नई बात नहीं थी. वॉर कैबिनेट की एक बैठक में उन्होंने अकाल के लिए भारतीयों को ही दोषी ठहराते हुए कहा था, ‘वे खरगोशों की तरह बच्चे पैदा करते हैं.’ भारतीयों के प्रति उनके रवैये को इस वाक्य से समझा जा सकता है जो उन्होंने अमेरी से कहा था, ‘मुझे भारतीयों से नफरत है. वे पाशविक धर्म वाले पाशविक लोग हैं.’ एक अन्य मौके पर उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय जर्मनों के बाद दुनिया के सबसे पाशविक लोग हैं.
मुखर्जी के मुताबिक, ‘भारत के प्रति चर्चिल का रवैया बहुत अतिवादी था और वे भारतीयों से नफरत करते थे. इसकी मुख्य वजह यह थी कि उनको पता लग चुका था कि भारत को लंबे समय तक गुलाम बनाकर नहीं रखा जा सकता.’ ऑनलाइन समाचार ब्लॉग हफिंगटन पोस्ट में प्रकाशित अपने एक लेख में वे लिखती हैं, ‘चर्चिल ने गेहूं के बारे में कहा कि वह इतनी कीमती चीज है कि उसे गैर श्वेत लोगों पर खर्च नहीं किया जा सकता, उन लोगों की बात तो छोड़ ही दी जाए जो ब्रिटिश साम्राज्य से आजादी की मांग कर रहे हैं.’
अक्टूबर 1943 में जब अकाल अपने चरम पर था, चर्चिल ने वॉवेल की नियुक्ति के अवसर पर आयोजित एक भव्य समारोह में कहा, ‘जब हम बीते सालों की ओर नजर डालते हैं, तो हमारी दृष्टि दुनिया के उस इलाके की ओर जाती है जहां पिछली तीन पीढ़ियों से कोई जंग नहीं हुई. वहां अकाल बीती बात हो गया….समय बीतने के साथ यह कालखंड भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाएगा. ब्रिटिशों ने उन्हें शांति और व्यवस्था मुहैया कराई, गरीबों को न्याय मिला और वहां के लोगों को बाहरी खतरों से सुरक्षित किया गया.’ साफ है कि चर्चिल केवल नस्लवादी ही नहीं बल्कि झूठे भी थे.
होलोकास्ट का इतिहास
अकाल पीड़ित बंगाल के प्रति चर्चिल की नीति, भारत के प्रति ब्रिटेन के पुराने आचरण से कतई अलग नहीं थी. माइक डेविस अपनी किताब लेट विक्टोरियन होलोकास्ट में बताते हैं कि ब्रिटिश शासन के 120 सालों में यहां 31 गंभीर अकाल पड़े जबकि ब्रिटिश शासन के पहले 2000 सालों में इनकी संख्या बमुश्किल 17 थी.
अपनी इस किताब में डेविस उन अकालों की दास्तान पेश करते हैं जिनमें करीब 2.9 करोड़ भारतीयों को अपनी जान गंवानी पड़ी. उनका मानना है कि ब्रिटिश नीति ने उन लोगों की हत्या की. 1896 में जब सूखे ने दक्षिण के पठार के किसानों की कमर तोड़ी तो देश में चावल और गेहूं का भंडार पर्याप्त से भी ज्यादा था. लेकिन तत्कालीन वॉयसराय रॉबर्ट बुलेवर लिटन ने जोर देकर कहा कि इंग्लैंड को होने वाले निर्यात में कोई कमी नहीं की जाएगी.
सन 1877 और 1898 में जब अकाल अपने चरम पर था तो अनाज कारोबारियों ने रिकॉर्ड मात्रा में अनाज का निर्यात किया. जब लोग भूख से मरने लगे तो सरकारी अधिकारियों को आदेश दिया गया कि राहत कार्यों को हर संभव तरीके से हतोत्साहित किया जाए. अधिकांश जिलों में जिस राहत कार्य को मंजूरी दी गई वह था कठिन शारीरिक श्रम और उसके बदले अनाज. भुखमरी से जूझ रहे लोगों के लिए यह काम करना संभव ही नहीं था. इन श्रमिक शिविरों में रहने वाले लोगों को उससे भी कम भोजन मिलता था जितना कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी यातना शिविर में रहने वाले यहूदियों को मिलता था.
लाखों लोगों की मौत के बावजूद लिटन ने मद्रास इलाके में किसानों की दिक्कतों को दूर करने की हर कोशिश की भरपूर अनदेखी की. वह भारत की महारानी के रूप में रानी विक्टोरिया की ताजपोशी की तैयारियों में लगा रहा. इस उत्सव में 68,000 माननीय अतिथियों के लिए सप्ताह भर लंबे भोज का आयोजन किया गया जहां महारानी ने देश के लिए ‘खुशहाली, समृद्धि और कल्याण का वादा किया.’ सन 1901 में द लैंसेट पत्रिका ने अनुमान लगाया था कि 1890 के दशक में पश्चिमी भारत में अकाल की वजह से तकरीबन 1.9 करोड़ भारतीयों की मौत हुई थी. मौत का आंकड़ा इतना ज्यादा इसलिए था क्योंकि ब्रिटिश शासन ने राहत का कोई इंतजाम नहीं किया.
ऐसे में आश्चर्य नहीं कि हिटलर की पसंदीदा फिल्म ‘द लाइव्स ऑफ ए बंगाल लांसर’ थी. इस फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे मुठ्ठीभर ब्रिटिश पूरे उपमहाद्वीप को अपने अधीन कर लेते हैं. हिटलर ने तत्कालीन ब्रिटिश विदेश सचिव एडवर्ड वुड से कहा था कि वह उसकी पसंदीदा फिल्मों में से एक है क्योंकि ‘वह दिखाती है कि एक श्रेष्ठ नस्ल को किस तरह व्यवहार करना चाहिए.’ नाजी सेनाओं के लिए भी इस फिल्म को देखना अनिवार्य किया गया था.
अपराध और उसके परिणाम
हालांकि ब्रिटेन कई देशों से माफी मांग चुका है. उदाहरण के लिए उसने केन्या से माऊ माऊ नरसंहार के लिए माफी मांगी, लेकिन भारत के इस नरसंहार की बात न वह करता है और न ही भारत खुद. इजरायल कभी भी होलोकास्ट को भूल नहीं सकता, न ही वह दूसरों को इसे भूलने देगा. कम से कम जर्मनी को तो कतई नहीं. जर्मनी निरंतर लाखों डॉलर की मदद और हथियारों के रूप में इजरायल को सहायता देता रहता है. अार्मीनिया भी प्रथम विश्व युद्ध के दौरान तुर्की द्वारा अपने 18 लाख नागरिकों की हत्या को नहीं भुला सकता. पोलैंड के लोग भी जोसेफ स्टालिन द्वारा किए गए कैटीन हत्याकांड को भूल नहीं सकते. चीन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नानकिंग में जापानियों द्वारा 40,000 लोगों की हत्या और बलात्कार के मामले में स्पष्ट क्षमा याचना और मुआवजा चाहता है. यूक्रेन का उदाहरण भी है जो स्टालिन की आर्थिक नीतियों के कारण बनी अकाल की स्थिति को नरसंहार की संज्ञा देता है जबकि ऐसा था नहीं. उन्होंने इसे होलोडोमोर का नाम दिया है.
लेकिन भारत प्रायश्चित तो छोड़िए माफी की मांग करने तक को तैयार नहीं. क्या हमें लगता है कि साम्राज्यवाद के खात्मे के कारण पहले से ही अवसादग्रस्त इंग्लैंड को और परेशान क्या करना? या फिर भारत का अंग्रेजी बोलने वाला बुर्जुआ वर्ग खुद को अभी भी अंग्रेजों का आभारी मानता है? या फिर हम अपनी ऐतिहासिक गलतियां दोहराने को अभिशप्त देश हैं? शायद हममें क्षमाभाव बहुत ज्यादा है. लेकिन क्षमा करने और भूल जाने में अंतर होता है और भारतीय भूल जाने के दोषी हैं. यह उन लाखों भारतीयों की स्मृतियों का अपमान है जिन्होंने कृत्रिम अकाल के चलते अपनी जान गंवा दी.
भारतीयों के प्रति ब्रिटेन का रवैय्या तब और हैरान करता है जब हम मित्र देशों के युद्ध अभियान में भारत का योगदान देखते हैं. 1943 तक 25 लाख से अधिक भारतीय सैनिक यूरोप, अफ्रीका और दक्षिणपूर्वी एशिया में मित्र देशों की सेना के साथ मिलकर लड़ रहे थे. देश भर से इकट्ठा किए गए संसाधन जैसे हथियार और कई तरह का कच्चा माल भारत से यूरोप ले जाया जाता था जिसमें ब्रिटेन के पल्ले से कुछ नहीं जाता था.
दरअसल देखा जाए तो ब्रिटेन पर भारत का इतना कर्ज है कि उसकी अनदेखी दोनों में से कोई देश नहीं कर सकता. कैंब्रिज विश्वविद्यालय के इतिहासकार टिम हार्पर और क्रिस्टोफर बेली कहते हैं, ‘सन 1945 की जीत को भारतीय सैनिकों, श्रमिकों और कारोबारियों ने संभव बनाया. इसकी कीमत उन्हें भारत की जल्द आजादी के रूप में मिली.’
करीब 250 साल के उपनिवेशकाल में भारत को जिस कदर लूटा गया, उसकी भरपाई करने लायक धन पूरे यूरोप के पास आज भी नहीं है. और पैसे की बात तो छोड़ ही दीजिए, आचरण की गरिमा भी एक चीज होती है. क्या ब्रिटेन बंगाल में हुई उन करोड़ों मौतों के लिए माफी मांगेगा? या फिर चर्चिल की तरह वह भी इसी धोखे में रहना चाहता है कि अंग्रेजों का शासन भारत का ‘स्वर्ण काल’ था.
आप आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल. फोटो: विकास कुमार
दो तस्वीरें. चंद महीनों के फासले की. जिन्हें देखकर पता चलता है कि काफी कुछ बदल गया है. एक तस्वीर 28 दिसंबर की है जब दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली ऐतिहासिक सफलता के बाद अरविंद केजरीवाल रामलीला मैदान में शपथ लेने जा रहे थे. खुद को आम दिखाने और आम से अपने संबंधों को खास करने के लिए अरविंद ने मेट्रो की सवारी को चुना था. कौशांबी से लेकर सेंट्रल सेक्रिटेरियट के मेट्रो स्टेशनों तक लोगों का समंदर उमड़ पड़ा था. लोग उस व्यक्ति की एक झलक पाने के लिए बेताब थे जो आंदोलन के रास्ते सत्ता की कुर्सी तक पहुंचा था. इनमें वे लोग तो थे ही जिनके सिर पर ‘मैं हूं आम आदमी’ वाली टोपी थी, उनसे कई गुना अधिक उन लोगों की संख्या थी जो आम आदमी ही थे.
दूसरी तस्वीर 21 मई की है. जब केजरीवाल ने 10 हजार रुपये का जमानती मुचलका भरने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने अरविंद को 15 दिन के लिए जेल भेजा. वे तिहाड़ जेल ले जाए गए. केजरीवाल की इस गिरफ्तारी के खिलाफ कहीं कोई बड़ा प्रदर्शन नहीं हुआ. जेल के गेट के बाहर आप के मुट्ठीभर कार्यकर्ता जरूर पहुंचे थे. जिनके साथ योगेंद्र यादव और पार्टी के अन्य नेता भी थे. पार्टी कार्यकर्ताओं के अलावा शायद ही कोई आम आदमी वहां पहुंचा था.
ये तस्वीरें आम जनमानस के बीच आप की लोकप्रियता के अर्श से फर्श पर आने की कहानी कहती हैं. ये बताती हैं कि आम आदमी पार्टी और अरविंद अपने छोटे से राजनीतिक करियर के सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं.
बीते लोकसभा चुनाव में आप के 96 फीसदी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई. जिन दो सीटों – अमेठी और बनारस – को पार्टी ने अपनी नाक का सवाल बना लिया था, जिन पर आप का झंडा बुलंद कर अरविंद आगामी लोकसभा का राजनीतिक भविष्य लिखना चाहते थे, उन दोनों ही पर पार्टी की करारी हार हुई. पार्टी के पूरे संसाधनों को दूसरे संसदीय क्षेत्रों की कीमत पर बनारस में खर्च करने के बावजूद अरविंद वहां से हार गए. जिस दिल्ली के विधानसभा चुनाव में जनता ने आप पर ऐसा विश्वास जताया था कि पार्टी पूरे देश में फैल जाने को बेताब हो गई वहां पार्टी के सारे प्रत्याशी चुनाव हार गए. पार्टी ने कुल जमा चार सीटें जीतीं भी तो उन जगहों से जहां से शायद उसे खुद जीतने की उम्मीद नहीं थी. पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच पिछले कुछ समय में उपजे विवाद और बाता-बाती ने भी पार्टी की स्थिति को बहुत कमजोर किया है. वर्तमान में पार्टी दिशाभ्रम की स्थिति में दिखाई देती है. लेकिन ये सब भी पार्टी के भविष्य के लिए उतने खतरनाक नहीं हैं जितना पार्टी की नींव की उन ईंटों का खिसकना है जिन पर पूरी पार्टी टिकी हुई है.
ये ईंट हैं पार्टी के वे वॉलंटियर/कार्यकर्ता जिन्होंने आंदोलन के समय से ही पार्टी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने का काम किया. पार्टी की जान यही वालंटियर थे जिनके दम पर पार्टी खड़ी हुई और चलना सीखा. लेकिन आज ये ही कार्यकर्ता हताश-निराश हैं. उनकी अरविंद और पार्टी से तमाम शिकायते हैं. जिन कार्यकर्ताओं से पार्टी और अरविंद की तारीफ के सिवा कुछ सुनाई नहीं देता था उनके मन में आज गुस्सा और पीड़ा है.
निराशा और नाउम्मीदी का आलम यह है कि पार्टी के भीतर के लोग ही बताते हैं कि लोकसभा चुनाव के बाद लगभग 30 से 40 फीसदी के करीब कार्यकर्ता पार्टी छोड़ कर जा चुके हैं. कुछ मीडिया रिपोर्ट्स यह भी कहती हैं कि पार्टी में 3.50 लाख वॉलंटियर्स की तुलना में अब केवल 50 हजार ही बचे हैं. दिल्ली में ही 15 हजार शुरुआती कार्यकर्ताओं में से आधे से अधिक पार्टी छोड़कर जा चुके हैं. जो अभी पार्टी से जुड़े हुए हैं उनमें से लगभग 80 फीसदी से अधिक ने पूरा समय पार्टी के लिए देना बंद कर दिया है. इनमें से भी अधिकतर इस बात को दोहराते हैं कि कैसे पार्टी के लिए काम करने का उनका उत्साह अपने सबसे निचले स्तर पर जा पहुंचा है.
आप में ऐसे लोग एक बड़ी संख्या में थे जो अपनी नौकरी या पढ़ाई छोड़कर पार्टी के लिए काम करने आए थे. ये लोग शुरुआत में अन्ना आंदोलन से जुड़े थे. बाद में जब पार्टी बनी तो ये उसके लिए काम करने लगे. ये लोग देश के लिए कुछ करना चाहते थे. इन्हें लगता था कि आप वह मंच है जिसके माध्यम से देश बदलने, व्यवस्था बदलने, क्रांति करने का उनका सपना सच हो जाएगा. आईआईटी दिल्ली में पढ़ रहे पार्टी कार्यकर्ता प्रिंस कहते हैं, ‘पहले लगता था कि हर दिन कोई न कोई परिवर्तन हो रहा है. मंजिल बहुत पास दिख रही थी. लेकिन लोकसभा में भयानक हार के बाद बहुसंख्यक कार्यकर्ताओं के मन में ये बात घर कर गई की आगे लड़ाई बहुत लंबी होने वाली है. एक तरह से पार्टी को शून्य से शुरूआत करनी है. सफलता कब तक मिलेगी पता नहीं. इसमें 2, 5, 10 साल लगेंगे या उससे भी अधिक पता नहीं. ऐसे में कई कार्यकर्ता जो अपनी नौकरी और पढ़ाई आदि छोड़कर आए थे वो फिर वापस चले गए हैं.’
‘परिणाम आने के बाद से ही कार्यालय बंद है. किसी को यह तक नहीं पता कि आम आदमी पार्टी तक उसे अपनी बात पहुंचानी है तो वह किससे संपर्क करे’
सॉफ्टवेयर इंजीनियर की अपनी नौकरी छोड़कर पार्टी के साथ जुड़ने वाले और हाल ही में पार्टी छोड़ कर जाने वाले संजीव वर्मा कहते हैं, ‘मैं अपना करियर छोड़कर पार्टी के साथ आया था लेकिन अब मुझे कोई उम्मीद नहीं दिखती. चीजें बहुत खराब हो चुकी हैं. मैंने पार्टी छोड़ दी. अब नौकरी करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है मेरे पास.’ यही कहानी देवेंद्र राजावत की भी है. मुंबई स्थित एक प्राईवट बैंक में काम कर रहे देवेंद्र नौकरी छोड़कर पार्टी से जुड़े थे. लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी. अब फिर से नए सिरे से नौकरी की तलाश कर रहे हैं. वे कहते हैं, ‘हां, मैंने पार्टी छोड़ दी है. मुझे ऐसा लगा कि इस पार्टी को जितना करना था वो कर चुकी है. अब वो भी भाजपा कांग्रेस के रास्तों पर जा चुकी है. कार्यकर्ताओं की अब यहां कोई सुनता नहीं है.’
यह तस्वीर 28 दिसंबर की है जब दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली ऐतिहासिक सफलता के बाद अरविंद केजरीवाल रामलीला मैदान में शपथ लेने जा रहे थे. फोटो: विजय पांडे
दिल्ली के वसंत विहार में पार्टी के लिए पिछले डेढ़ साल से वॉलिटियर का काम कर रहे अनुराग राय कहते हैं, ‘मैंने अपनी बीटेक फर्स्ट ईयर की पढ़ाई छोड़कर पार्टी के लिए काम करना शुरू किया था. घरवाले पहले पार्टी से जुड़ने पर नाराज हुए. मेरे नहीं मानने पर बोले बीटेक पूरा कर लो फिर पार्टी के लिए काम कर लेना. मैं नहीं माना. पिछले एक साल तक पार्टी के लिए बिना कुछ सोचे काम करता रहा लेकिन लोकसभा में जिस तरह से पार्टी ने गलत लोगों को टिकट दिया. कार्यकर्ताओं की सुनवाई खत्म हो गई. आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शिता का जिस तरह से मजाक बनाया गया उससे मैं बहुत दुखी हुआ. मैंने पार्टी छोड़ दी. अब फिर से अपनी बीटेक की पढ़ाई शुरू करने की तैयारी कर रहा हूं. इस बीच घरवाले उस खबर की कतरनें सैकड़ों बार दिखा चुके हैं जिनमें लिखा है कि अरविंद केजरीवाल की बेटी का आईआईटी में सलेक्शन हो गया है. घरवाले ये कहते हुए कोसते हैं कि देखो तुम बीटेक की पढ़ाई छोड़कर क्रांति कर रहे थे वहीं तुम्हारे नेता जी की बेटी आईआईटी में दाखिले की तैयारी कर रही थी.’
पार्टी कार्यकर्ता चंद्रभान कहते हैं, ‘ऐसे कार्यकर्ताओं की अब बड़ी तादाद है जो नौकरी के साथ पार्टी के लिए जितना बन पड़ता है उतना कर रहे हैं. पार्टी के लिए फुलटाइम काम करने वाले पार्टी में तेजी से कम हुए हैं.’
ऐसा नहीं है कि पार्टी से दूर जाने की यह प्रक्रिया सिर्फ दिल्ली तक सीमित है. राज्यों में तो स्थिति इससे भी बुरी है. ऐसा कोई राज्य नहीं है जहां पार्टी कार्यकर्ताओं का पार्टी से मोहभंग न हुआ हो. और जगहों को छोड़कर सिर्फ बनारस की ही बात करें तो आज यहां के दोनों कार्यालयों पर ताला लगा हुआ है. बनारस में पार्टी कार्यकर्ता रहे देवेश यादव कहते हैं, ‘रिज्लट आने के बाद से ही कार्यालय बंद है. किसी को यह तक नहीं पता कि आम आदमी पार्टी तक उसे अपनी बात पहुंचानी है तो वह किससे संपर्क करे. जो नंबर था वो भी बंद हो गया है. सारे लोग वापस चले गए हैं. न यहां संगठन है और न लोग. जिन लोगों ने चुनाव में हमें समर्थन किया था वो अब ये तंज कस रहे हैं कि अरविंद ने जाने से पहले एक बार भी हम लोगों से नहीं पूछा कि जाएं या यहीं रहें.’
पार्टी के कार्यकर्ताओं से बात करने पर पता चलता है कि पार्टी को लेकर उनके मोहभंग की शुरुआत बहुत पहले ही हो चुकी थी. पार्टी नेतृत्व के कार्य-व्यवहार को लेकर उनकी नाराजगी लंबे समय से पल रही थी जो समय के साथ और बढ़ती गई.
कार्यकर्ता बताते हैं कि मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद से कार्यकर्ताओं से किसी तरह का संवाद करना या उनकी राय लेना पार्टी ने बंद कर दिया
नाराजगी की शुरुआत होती है दिल्ली विधानसभा के बाद बनी पार्टी की सरकार से. पार्टी कार्यकर्ता दिनेश शर्मा कहते हैं, ‘सरकार बनने के बाद हम सभी लोग बहुत खुश थे. लेकिन कुछ समय बाद ही चीजें बदलनी शुरू हो गईं.’ दिनेश बताते हैं कि कैसे सरकार बनने से पहले पार्टी द्वारा लिए गए हर निर्णय से पहले वालंटियरों की राय ली जाती थी. उनसे पूछा जाता था कि वे क्या चाहते हैं? लेकिन सरकार बनने के बाद सब कुछ बदल गया. दिन गुजरने के साथ स्थिति ऐसी बनती गई कि कार्यकर्ताओं की सुनवाई बंद हो गई. पार्टी को जो भी निर्णय लेना होता था वह सेंट्रल ऑफिस में बैठे लोग तय कर लेते थे. पार्टी के अन्य कार्यकर्ता भी बताते हैं कि पहले जहां एक निश्चित अंतराल के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक बुलाई जाती थी वहीं सरकार बनने के बाद यह सिलसिला बंद हो गया. चंद्रभान कहते हैं, ‘सरकार बनने के बाद लोगों में ईगो आ गया. जब तक सरकार नहीं बनी थी तब तक लोगों से उनकी राय ली जाती थी, उन्हें मैसेज जाता था या फोन करके बुलाया जाता था. अरविंद से मीटिंग होती थी. बाद में कार्यकर्ताओं को इग्नोर किया जाने लगा.’
यह तस्वीर 21 मई की है. जब केजरीवाल ने 10 हजार रुपये का जमानती मुचलका भरने से इनकार कर दिया. जेल के गेट के बाहर आप के मुट्ठीभर कार्यकर्ता जरूर पहुंचे थे.
पार्टी के कई कार्यकर्ता कहते हैं कि उनके लिए सबसे बड़ा चौंकाने वाला समय तब आया जब उन्हें खुद टीवी के माध्यम से पता चला कि अरविंद दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी से इस्तीफा देने वाले हैं. ‘एक दिन पहले तक हम लोगों को भी पक्की खबर नहीं थी कि अरविंद इस्तीफा देने वाले हैं. हालांकि टीवी वाले ये चलाना शुरू कर चुके थे.’ पार्टी के एक वॉलंटियर राजीव कुमार कहते हैं, ‘मैंने ऑफिस में बात की तो पता चला कि ऐसी चर्चा चल रही है. मैंने सेंट्रल ऑफिस के एक कोऑर्डिनेटर से कहा कि आप लोगों को हमें भी सूचित करना चाहिए था. लेकिन सामने वाले ने ये कहते हुए फोन काट दिया कि वालंटियर फैसला नहीं करेंगे कि उन्हें क्या बताया जाए क्या नहीं. आप अपना काम कीजिए.’
ऐसे तमाम कार्यकर्ता हैं जिनसे बात करने पर पता चलता है कि वे अरविंद के सीएम पद छोड़ने से आहत थे. इसलिए नहीं कि अरविंद ने मुख्यमंत्री पद छोड़ा था बल्कि इसलिए कि किसी ने न तो उन्हें बताया कि वे पद छोड़ने वाले हैं और न उनकी राय पूछी गई. राजीव कहते हैं, ‘जब आप एसएमएस के माध्यम से लाखों लोगों को इकट्ठा कर सकते हैं. जब आप वॉलंटियर से इस बारे में राय ले सकते हैं कि हम सरकार बनाएं या नहीं तो फिर आप ये क्यों नहीं पूछ पाए कि मैं सरकार छोड़ूं या नहीं.’
पार्टी कार्यकर्ता बताते हैं कि अरविंद के मुख्यमंत्री पद छोड़ने का सबसे अधिक खामियाजा कार्यकर्ताओं को ही भुगतना पड़ा. चांदनी चौक में पार्टी के लिए काम कर चुके अनुपम कहते हैं, ‘कार्यकर्ता ही जमीन पर लोगों के बीच में था. सो जो लोग अरविंद के इस निर्णय से खफा थे उन्होंने कार्यकर्ताओं पर ही गुस्सा निकालना शरू कर दिया. इस कारण से भी कई कार्यकर्ता पार्टी छोड़कर चले गए. कौन रोज सुबह-शाम लोगों की गालियां सुनता. जिस निर्णय में आपका रोल नहीं है उसके लिए आपको कोई कोसे तो चिढ़ मचना स्वाभाविक है.’ मालवीय नगर में पार्टी का काम देखने वाले एक कार्यकर्ता कहते हैं, ‘अरविंद जी को चंद रैलियों और कार्यक्रर्मों में इस सवाल का जबाव देना पड़ा तो वो ये कहते नजर आए कि उनसे गलती हो गई. आगे से वो ऐसा नहीं करेंगे. ऐसे में ये कल्पना कीजिए कि जो कार्यकर्ता जनता के बीच 24 घंटे रहता है उसकी क्या फजीहत हुई होगी.’
कार्यकर्ता बताते हैं कि मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद से कार्यकर्ताओं से किसी तरह का संवाद करना या उनकी राय लेना पार्टी ने बंद कर दिया. इसके बाद कोई भी एक फैसला ऐसा नहीं हुआ जिसमें अरविंद ने या पार्टी ने कार्यकर्ताओं को विश्वास में लिया गया हो. सबकुछ पार्टी की राजनीतिक समिति या अरविंद और उनके करीबी चंद लोगों ने मिलकर तय कर लिया. प्रिंस कहते हैं, ‘सीएम का पद छोड़ने के बाद से ही गलतियां होनी शुरू हुईं. वहीं से हड़बड़ी में काम होना शुरू हुआ. कार्यकर्ता बेवजह खुद को पिसा महसूस करता था. पार्टी ने उससे उसका मन नहीं पूछा. उससे अगर पूछा गया होता तो उन्हें भी लगता कि मैं भी इस निर्णय में जिम्मेदार हूं.’ कार्यकर्ता बताते हैं कि इस कारण से कई जगहों पर जब अरविंद के पद छोड़ने के संबंध में उनसे पूछा गया तो उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया कि आप जाकर अरविंद से ही पूछ लें.
पार्टी कार्यकर्ता पार्टी के उस निर्णय की भी आलोचना करते हैं जिसके तहत पार्टी ने लोकसभा की 430 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे. दक्षिणी दिल्ली से पार्टी कार्यकर्ता चंद्रप्रसाद कहते हैं, ‘अगर पार्टी ने कार्यकर्ताओं से पूछा होता तो शायद कोई भी कार्यकर्ता इससे सहमति व्यक्त नहीं करता. लेकिन पार्टी कितने सीटों पर लड़ेगी, कहां से लड़ेगी, इस बारे में कार्यकर्ताओं की राय नहीं ली गई.’ ‘पूरे देश में लोकसभा चुनाव लड़ने का जो निर्णय पार्टी ने लिया उसमें संगठन की सलाह नहीं ली गई. भ्रष्ट लोगों को भी पार्टी ने टिकट दिया. यही कारण है कि स्थानीय स्तर संगठन लगभग खत्म हो चुका है.’ हिमाचल प्रदेश में पार्टी का काम देख रहे देशराज कहते हैं, ‘पार्टी ने प्रत्याशियों के चयन के लिए कुछ नियम तय किए थे लेकिन उन सभी को दरकिनार कर दिया गया.’
देशराज जैसे ही पार्टी के अन्य कई कार्यकर्ता इस बात से बेहद आहत नजर आते हैं कि कैसे पार्टी में चंद रोज पहले ही आए लोगों को टिकट दे दिया गया. लखनऊ में पार्टी के कार्यकर्ता विनय तिवारी कहते हैं, ‘जिन लोगों को टिकट दिया गया उनके इतिहास को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया. कई जगहों पर पार्टी ने भाजपा और कांग्रेस में रहे ऐसे लोगों को भी टिकट दे दिया जिनके ऊपर गंभीर आरोप थे.’ पार्टी के वरिष्ठ नेता योगेश दहिया भी विनय की बात से सहमति जताते हैं, ‘ये सही है कि चुनाव के समय दूसरी पार्टियों के बहुत से नाकारा लोग हमारी पार्टी में घुस गए. अब जिनको टिकट नहीं मिला वो पार्टी में ही रहकर उसकी जड़ में मट्ठा डालने लगे,’ चंडीगढ़ में पार्टी का काम देख रहे विजयपाल सिंह से यह पूछने पर कि क्या जब गुल पनाग को चंडीगढ़ का उम्मीदवार बनाया गया तो वहां के कार्यकर्ताओं की राय ली गई वे कहते हैं, ‘नहीं, अधिकांश जगहों के साथ ही चंडीगड़ में भी प्रत्याशी की पैराशुट लैंडिंग ही हुई. कार्यकर्ता से कुछ नहीं पूछा गया. हम खुद ही द्वंद में फंसे हैं कि मैडम चंडीगढ़ में रहेंगी या नहीं रहेंगी. आगे क्या होगा पता नहीं.’
कौशांबी में आम आदमी पार्टी का जो कार्यालय कभी कार्यकर्ताओं से गुलजार रहता था आज वहां सन्नाटा पसरा रहता है. गिने-चुने कार्यकर्ता ही दिखाई देते है
पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं में से लंबे समय तक आरकेपुरम विधानसभा का काम देखते रहे लोकेश पार्टी के अपने आदर्शों से भटकने की बात करते हैं. वे कहते हैं, ‘पार्टी ने खुद नियम बनाया था कि सही और सच्चे लोगों को हम लोकतांत्रिक प्रक्रिया अर्थात स्थानीय जनता और कार्यकर्ताओं के फीडबैक के आधार पर टिकट देंगे. प्रत्याशियों के चयन की एक पूरी प्रक्रिया बनाई गई थी. लेकिन लोकसभा चुनाव में पार्टी ने खुद अपने आदर्शों की हत्या कर दी. पैसे और रसूख वालों के हाथों में टिकट दिया गया. सही लोग यहां भी हाशिए पर थे.’ एक अन्य कार्यकर्ता कहते हैं, ‘पहले यह तय किया गया था कि चार महीने पहले पार्टी से जुड़ा होना एक पहली शर्त थी किसी के प्रत्याशी बनने की. लेकिन यहां तो स्थिति ऐसी थी कि लोग टिकट लेने के बाद पार्टी में आए. यही कारण है कि चांदनी चौक से पार्टी प्रत्याशी आशुतोष समेत कई लोकसभा प्रत्याशियों के खिलाफ पार्टी कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया. लेकिन पार्टी नेतृत्व के कान पर जू तक नहीं रेंगी.’
कई ऐसे पार्टी कार्यकर्ता हैं जो बनारस से मोदी के खिलाफ लड़ने के अरविंद केजरीवाल के फैसले पर भी सवाल उठाते हैं. पार्टी के एक कार्यकर्ता कहते हैं, ‘अरविंद दिल्ली में कितने लोकप्रिय हैं ये किसी को बताने की जरूरत नहीं है. दिल्ली में हमारा संगठन भी बेहद मजबूत था. लोगों ने चंद महीने पहले ही हमें विधानसभा में ऐतिहासिक समर्थन दिया था. ऐसे में अगर अरविंद को लड़ना था तो वो दिल्ली से लड़े होते. अपनी सीट वो यहां से जीतते ही बाकि प्रत्याशियों का भी भला हो जाता. लेकिन पता नहीं उन्होंने बनारस क्यों चुना. अगर वो मोदी को हरा भी देते तो क्या आज मोदी प्रधानमंत्री नहीं बनते. दूसरे को हराने के चक्कर में हम खुद ही हार गए.’ लोकेश कहते हैं, ‘बनारस जाकर हमें अपनी ऐसी-तैसी कराने की जरूरत नहीं थी. गुस्सा लोगों का कांग्रेस के खिलाफ था और हम मोदी को हराने के लिए बनारस पहुंच गए.’
गांधीनगर क्षेत्र में पार्टी के लिए काम कर रहे कार्यकर्ता नरेंद्र पुराने अनुभवों का हवाला देते हुए सवाल खड़े करते हैं. वो कहते हैं, ‘शीला दीक्षित के खिलाफ लड़ने के बारे में जब अरविंद ने सोचा तो उन्होंने इसमें वॉलंटियर्स की राय भी ली. लेकिन बनारस जाने के बारे में उन्होंने कार्यकर्ताओं से कुछ नहीं पूछा.’ पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव हार चुके एक प्रत्याशी कहते हैं, ‘पार्टी के पास जो भी सीमित संसाधन थे उसने एक सीट पर ही सब झोंक दिया. इस तरह से बाकी सीटें अनाथ जैसी थीं. अरविंद ने खुद कहा था कि उन्हें सिर्फ अमेठी और बनारस से मतलब है. अगर ऐसा था तो फिर पार्टी ने बाकी 400 सीटों पर क्यों प्रत्याशी उतारकर उनकी फजीहत कराई?’
लोकसभा चुनाव के दौरान वाराणसी में स्थित पार्टी कार्यालय जिसमे चुनाव के बाद से ताला बंद है. फोटो: विकास कुमार
कार्यकर्ताओं में से कई ऐसे भी हैं जो अरविंद को पार्टी की बुरी गत के लिए कम और योगेंद्र यादव की सदस्यता वाली पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी को ज्यादा जिम्मेंदार मानते हैं. पार्टी के एक नेता अरविंद का बचाव करते हुए कहते हैं, ‘अरविंद खुद दिल्ली पर फोकस चाहते थे लेकिन बाकी मैंबर्स पूरे देश में जाने को आतुर थे. पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी ने अरविंद को ऐसा करने पर मजबूर किया था.’ लोकेश कहते हैं, ‘हम लोग योगेंद्र जी को पार्टी का चाणक्य समझते थे. वो एक पुराने राजनीतिक जानकार हैं. ऐसे में हुआ ये कि वो पार्टी में आए तो उन्हीं पुराने तरीकों को आजमाना शरू किया जो भाजपा और कांग्रेस वाले करते आए हैं. ये संभव है कि एक खास तरह की राजनीति को देखने की वजह से राजनीति को लेकर उनकी एक खास समझ बनी हो. वो आंदोलन से उभरी इस पार्टी की अलग राजनीतिक जरूरत को समझ नहीं पाए और वही राजनीतिक तौर तरीके यहां भी अपनाए जाने लगे जो इन पार्टियों में अपनाए जाते हैं.’
हालांकि ऐसे कार्यकर्ताओं की संख्या भी कम नहीं है जो सारी गड़बड़ियों के लिए सीधे अरविंद को दोषी मानते हैं. वे तर्क देते हैं कि कौन है पार्टी में जो कोई ऐसा निर्णय ले जिसके पक्ष में अरविंद न हों. ऐसे में अगर सफलता का सेहरा हाईकमान के माथे बांधा जाएगा तो फिर गड़बड़ी की जिम्मेंदारी भी उन्हें ही लेनी होगी.
एक समय पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता रहे लोकेश अब अपनी रोजी-रोटी की दुनिया में वापस लौट आए हैं. वो कहते हैं, ‘पहले लगता था कि मैं जो कुछ कर रहा हूं वो देश के लिए कर रहा हूं. हर आदमी इसी सोच के साथ जुड़ा था. बाद में जब पार्टी बनी तब भी हम उसे आंदोलन ही मानते थे. लेकिन दिल्ली का चुनाव जब आया तो पार्टी का आंदोलकारी चेहरा बदल चुका था. वो अब एक सामान्य राजनीतिक दल का रूप ले चुकी थी. आप भी भाजपा-कांग्रेस जैसी एक अन्य पार्टी बन गई.’ लोकेश अपनी बात को विस्तार देते हुए कहते हैं, ‘पार्टी में ऐसे तमाम लोग घुस गए जिनका विचारधारा से कोई मतलब नहीं था. वो शाजिया इल्मी का उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘शाजिया को न तो आंदोलन से मतलब था न वो आंदोलन की विचारधारा वाली शख्स थीं. कांग्रेस और भाजपा के नेता जिस हल्की और फालतू भाषा में बात करते हैं वो भी इसी भाषा में बात करती थीं. ‘
पार्टी कार्यकर्ता बताते हैं कि कैसे दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद जिस बड़ी तादाद में लोग पार्टी में आए उससे भी पार्टी को बहुत नुकसान पहुंचा. वालंटियर बताते हैं कि इससे आंदोलन की विचारधारा वाले लोग साइड होते गए. बकौल लोकेश उन्होंने खुद अरविंद से कहा कि ‘हमें कोई न कोई क्राइटिरिया बनाना चाहिए. तो वो बोले बाद में छंटनी कर लेंगे. समय के साथ मैं पार्टी से निराश होता चला गया. फिर मैंने सोचा कि अगर मुझे समाज सेवा करनी है तो वो तो में पार्टी के बाहर किसी और माध्यम से भी कर लूंगा. इसके लिए आप में रहने की क्या जरूरत है.’
जो लोग अरविंद के निर्णय से खफा थे उन्होंने कार्यकर्ताओं पर ही गुस्सा निकालना शुरु कर दिया. इस कारण से भी कई कार्यकर्ता पार्टी छोड़कर चले गए
दिल्ली विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत के बाद उससे जुड़ने के लिए आई लोगों की बाढ़ ने आंदोलन के समय से काम रहे पार्टी कार्यकर्ताओं को हाशिए पर धकेल दिया. प्रिंस कहते हैं, ‘दिल्ली विधानसभा के बाद और लोकसभा चुनाव के समय बहुत बड़ी तादाद में लोग पार्टी से जुड़े. लाखों लोग उसके कार्यकर्ता बने. एकाएक नए नेताओं की पार्टी में बाढ़ आ गई. ऐसे में धीरे-धीरे पुराने कार्यकर्ताओं की पूछ कम होती गई और नए लोग तवज्जो पाते गए. चंद्रभान एक उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘दिल्ली विधानसभा चुनाव के कुछ समय पहले शाजिया इल्मी रेवाड़ी से अपनी दोस्त अंजना मेहता को ले आईं. उनके साथ उनके अपने लोग आए थे. अंजना ने यहां आकर आरके पुरम के कार्यकर्ताओं को परेशान करना शुरू कर दिया. यहां की पूरी टीम को वो तोड़ के चली गईं.’ पार्टी की तरफ से दिल्ली विधानसभा में प्रत्याशी रहे राजन प्रकाश कहते हैं, पार्टी में पुराने कार्यकर्ताओं को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा. पुराने कार्यकर्ताओं की दयनीय स्थिति हो गई थी. वहीं जो लोग बाहर से आए और जो बड़े नेताओं की परिक्रमा करने लगे उनका आज पार्टी में बोलबाला हो गया है.
पार्टी के कई कार्यकर्ता उसके भीतर खत्म हो रहे लोकतांत्रिक स्पेस का प्रश्न भी उठाते हैं. पार्टी के एक कार्यकर्ता रमेश परासर कहते हैं, ‘जो अरविंद स्वराज की बात करते हैं उन्होंने खुद पार्टी में इसका पालन नहीं किया. दुनियाभर से आप पारदर्शिता की उम्मीद करते हैं लेकिन खुद आप में इसका अभाव है. स्थिति ये है कि अगर कोई किसी गलत चीज का विरोध करता है या प्रश्न करता है तो अरविंद कहने लगते अरे वो लालची है, उसे टिकट चाहिए था. नहीं मिला तो विरोध करने लगा. पार्टी में लोकतंत्र का भयानक अभाव है. जिस तरह आप मायावती पर प्रश्न उठाकर बसपा में नहीं रह सकते. वैसे ही आप अरविंद पर प्रश्न उठाकर आप में नहीं रह सकते. जिन लोगों ने भी अरविंद की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठाया है उन्हें गद्दार, कांग्रेस, भाजपा का एजेंट, टिकट का लालची और न जाने क्या क्या कहा गया है. कोई ऐसा स्पेस नहीं है जहां आप जाकर अपनी असहमति व्यक्त कर सकें. योगेंद्र यादव का उदाहरण देते हुए वे कहते हैं, ‘अरविंद की सुप्रीमो वाली कार्यशैली पर उन्होंने प्रश्न क्या उठाया आपने देखा होगा कैसे मनीष सिसोदिया ने उन्हें हड़काने वाला पत्र भेज दिया. ये तो योगेंद्र यादव थे जो बच गए कोई और होता तो पार्टी उसे गद्दार ठहराकर कभी का बाहर कर चुकी होती.’
पार्टी के भीतर सिकुड़ते लोकतंत्र की चर्चा करते हुए एक कार्यकर्ता बताते हैं कि कुछ दिन पहले ही लोकसभा चुनाव में हार के बाद भविष्य की रणनीति तैयार करने को लेकर दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में पार्टी की बैठक हुई थी. वहां जैसे ही कार्यकर्ताओं ने अपनी बात रखनी शुरू की वैसे ही नेताओं ने कार्यकर्ताओं को बोलने से रोक दिया. कहा, आप लोग अपनी बात लिख कर के दीजिए. वे कहते हैं, ‘पार्टी नेता कार्यकर्ताओं के प्रश्नों से जूझना नहीं चाहते थे. वो चाहते थे कि आप अपनी बात लिखकर के दीजिए ताकि नेता उसे कूड़े के ढ़ेर में फेंक सकें. ये लोग हर तरह के सवालों से बचना चाहते हैं.’ पार्टी के एक पूर्व कार्यकर्ता कहते हैं, पार्टी जानती है कार्यकर्ताओं में कितना रोष है. यही कारण है कि पार्टी नेशनल काउंसिल की मीटिंग नहीं बुलाती. पार्टी के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है कि वो मीडिया को देखकर अपनी रणनीति बनाती है.’
पार्टी से कार्यकर्ताओं की नाराजगी का प्रमाण पार्टी के कार्यालयों पर भी देखने को मिलता है. कौशांबी में आम आदमी पार्टी का जो कार्यालय कभी कार्यकर्ताओं से गुलजार रहता था आज वहां सन्नाटा पसरा रहता है. गिने-चुने कार्यकर्ता ही दिखाई देते हैं. कनॉट प्लेस के पार्टी कार्यालय का भी वही हाल है. कुछ समय पहले तक यह जगह पार्टी कार्यकर्ताओं और पार्टी से जुड़ने को आतुर या समर्थकों से भरी रहती थी. राजन कहते हैं, ‘मुझे ऑफिस गए दो महीने से ज्यादा समय हो गया. अब वहां जाने का भी मन नहीं करता. ‘ चंद्रभान पिछले पांच महीने से पार्टी ऑफिस नहीं गए हैं.
पार्टी सूत्र बताते हैं कि लोकसभा चुनाव के परिणाम आने बाद नए लोगों का पार्टी से जुड़ना लगभग बंद हो गया है. कोई भी नया कार्यकर्ता पिछले कुछ समय में पार्टी से नहीं जुड़ा है. पार्टी के लोग ये बताते हैं कि पहले जहां पार्टी की हेल्पलाइन की घंटियां लगातार बजती रहती थीं वहां अब सन्नाटा छाया हुआ है. असर चंदे पर भी पड़ा है. सामान्य परिस्थितियों में प्रतिदिन 30 लाख के करीब चंदा आता था जो अब हजारों में सिमट आया है. साल भर पहले से दिल्ली के विभिन्न इलाकों के लिए पार्टी के संपर्क नंबर या तो बंद पडे हैं या फोन की घंटी बजती रहती है कोई उठाता नहीं है. नरेंद्र कहते हैं, ‘सरकार छोड़ने के बाद लोगों के फोन आने बंद हो गए. अब शायद ही कोई सहायता के लिए फोन करता हो. ‘
चंद्रभान कहते हैं, ‘आरके पुरम विधानसभा के लिए जो पार्टी का मोबाइल नंबर था. उसका पार्टी ने चार महीने तक बिल भरने के बाद छोड़ दिया. नंबर बंद हो गया. ये वो नंबर था जिस पर यहां कि जनता हमसे संपर्क करती थी. मैंने उसका कुछ समय तक बिल भरकर चलाया. अधिकांश नंबरों का यही हाल है. उनका बिल नहीं भरा गया इसीलिए वो बंद पडे हैं. जो कार्यकर्ता अपने पैसे से बिल भर रहा है वो फोन चल रहे हैं.’ पिछले कुछ समय में आए अन्य बदलावों की चर्चा करते हुए चंद्रभान कहते हैं, ‘पहले अगर किसी कार्यकर्ता को कोई दिक्कत होती थी. उसका एक मैसेज आ जाता था तो पूरी पार्टी वहां पहुंच जाती थी. कोई आम आदमी भी अगर हेल्पलाइन पर फोन करके शिकायत करता था तो सारे लोग थाने पहुंच जाते थे. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब न कोई फोन करता है और न कोई सहायता के लिए कहीं जाता है. लोग भी अब सपोर्ट नहीं करते. जिसने आपको वोट नहीं दिया है वो मजे तो ले ही रहा है और जिन्होंने वोट दिया है वो अलग कोस रहे हैं. इस तरह से सभी का मनोबल टूट रहा है.
पार्टी छोड़कर जा रहे कई कार्यकर्ताओं के पीछे मोदी फैक्टर भी है. प्रिंस कहते हैं, ‘कई साथी मोदी से काफी प्रभावित हैं. उनका मानना है कि मोदी जी को एक मौका देना चाहिए. ये तबका सरकार बनने से पहले मोदी का समर्थक तो था लेकिन पार्टी में बना हुआ था. अब लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत और आप की हार के बाद ये लोग पार्टी छोड़कर चले गए.’
हालांकि अब कार्यकर्ताओं का कहना है कि पार्टी अब फिर से वॉलंटियर्स को लेकर संवेदनशील दिखाई दे रही है. हाल ही में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए अरविंद ने उनसे माफी मांगते हुए कहा कि हो सकता है पार्टी ने पिछले कुछ निर्णयों में कार्यकर्ताओं की राय नहीं ली. इससे उनमें नाराजगी है. लेकिन अब ऐसा नहीं होगा. प्रिंस कहते हैं, ‘अरविंद ने कहा कि हमने जल्दी-जल्दी कई निर्णय लिए इस वजह से वॉलेंटियर्स की राय नहीं ली जा सकी.’
चंद्रभान कहते हैं, ‘अब फिर से पार्टी ने शुन्य से शुरूआत की है. फिर से कार्यक्रताओं को जिम्मेदारी दी जा रही है, उन्हें मनाया जा रहा है.’ पार्टी की जुझारू कार्यकर्ता रही दिवंगत संतोष कोली के भाई और सीमापुरी से विधायक धर्मेंद्र कोली कहते हैं, ‘आज ये नहीं कहा जा सकता कि कौन वॉलिंटियर पार्टी के साथ है, कौन नहीं. पहले कार्यकर्ताओं को लोगों के बीच जाने पर सच में दिक्कत होती थी लेकिन अरविंद के माफी मांगने के बाद बहुत फर्क पड़ा है.’
लेकिन क्या इस दौर में अरविंद में भी कोई बड़ा बदलाव कार्यकर्ताओं ने महसूस किया है? इस सवाल के जवाब में प्रिंस कहते हैं, ‘कुछ खास नहीं लेकिन हां अब वो पहले से ज्यादा व्यस्त हो गए हैं और अब वो लोकपाल, भ्रष्टाचार और अन्य मुद्दों पर बात करने की जगह पार्टी और संगठन की चर्चा करते हैं.’
स्कूलों में यौन शिक्षा को लेकर एतराज जताने वाले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्द्धन अकेले नहीं हैं. हमारे यहां बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो इसे ‘गंदी बात’ जैसा कुछ मानते हैं और बच्चों को इससे बाहर रखना चाहते हैं. वे जैसे मान कर चलते हैं कि जैसे परंपरा से अब तक पीढ़ियां यह सब सीखती आई हैं, उसी तरह अब भी सीख लेंगी. लेकिन क्या वह परंपरा बहुत स्वस्थ परंपरा रही है? अक्सर अपने समवयस्कों या अपने से कुछ बड़े भैयानुमा मित्रों की फुसफुसाती बातों और कोकशास्त्र की ढकी-छुपी प्रतियों के मार्फत मिलने वाला यह ज्ञान, ज्ञान से ज्यादा अज्ञान होता है जो अपने साथ बच्चों में एक अवांछित अपराध बोध भी लाता है कि वे अपने बड़ों से छुपा कर कुछ कर रहे हैं. इससे ज्यादा खतरनाक बात यह होती है कि ये लड़के अपने आसपास की लड़कियों को लेकर एक अजब से कुंठित दृष्टिकोण के बीच बड़े होते हैं जिससे मुक्त होने में वक्त लगता है. कुछ तो जीवन भर मुक्त नहीं हो पाते.
फिर इन दिनों लैपटॉप से लेकर मोबाइल तक इंटरनेट की जो बजबजाती-बेकाबू दुनिया है, उसके पोर्न साइट इन बच्चों के गुरु और मार्गदर्शक बनते हैं जिनकी मार्फत मिलने वाली फिसलन भरी गलियां और ज्यादा खतरनाक होती हैं. यह आधुनिकता और उसके पहले वाली परंपरा दोनों अपने स्वभाव में ऐसे स्त्री विरोधी हैं कि वे स्त्री को ज्यादा से ज्यादा सामान में बदल रहे हैं. मनोरंजन उद्योग से लेकर पर्यटन उद्योग तक का पूरा कारोबार जैसे स्त्री देह पर टिका हुआ है. ऐसी भीषण दुनिया का सामना करने के लिए क्या हमारे बच्चे-बच्चियां तैयार हैं? अगर नहीं तो सभ्यता और संस्कृति पर इस हमले का हम कैसे सामना कर सकते हैं?
डॉ हर्षवर्द्धन इसका जवाब योग और सेहत संबंधी शिक्षाओं में खोजते हैं. इससे भी शायद किसी को एतराज न हो. मुश्किल यह है कि योग, सेहत या संयम की इन कक्षाओं से उस जटिल यथार्थ का सामना नहीं किया जा सकता जिन्हें इन स्थितियों ने बनाया है. दरअसल यह उस यौन-विस्फोट से एक तरह से आंख चुराना है जो नई पीढ़ी के सामने है. इससे जब आंख मिलाएंगे तभी इसको लेकर एक स्वस्थ नजरिया विकसित कर पाएंगे, जिसमें शायद यह समझ भी शामिल होगी कि स्त्री पुरुष के बीच बराबरी और न्याय का रिश्ता आपसी सम्मान से भी विकसित होगा.
यौन शिक्षा इस दिशा में पहला कदम है, आखिरी नहीं. यह कम से कम नई उम्र के बच्चों को सबसे पहली समझ यह दे सकती है कि जीवन में यह ऐसा वर्जित विषय नहीं, जिस पर मां-पिता या शिक्षक से बात न की जा सके. छोटे बच्चों के साथ होने वाला बहुत सारा दुर्व्यवहार बस इसी समझ से रुक सकता है. क्योंकि यह अनुभव आम है कि ऐसे यौन हमलों का पहला झटका किशोर दिमाग चुपचाप, डरे हुए ढंग से बर्दाश्त करते हैं और धीरे-धीरे उसकी आदत डालते हैं. लेकिन इसके प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर कितनी तरह से पड़ते हैं, यह हम ठीक से समझ तक नहीं पाते. अरुंधती रॉय के उपन्यास ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ का किशोर एस्थर एक सिनेमा हॉल में ऐसे हमले का अबोध-स्तब्ध शिकार होता है और उम्र भर उसका चिपचिपापन अपने मस्तिष्क पर ढोता रहता है. अगर उसके बचपन में कहीं यौन शिक्षा की जगह रही होती और उसे इन विषयों पर बड़ों से बात करने का अभ्यास होता तो शायद वह इस हमले को चुपचाप पीते और जीते रहने की त्रासदी से बच जाता.
दूसरी बात यह कि जब यह यौन शिक्षा बच्चों को अच्छे-बुरे स्पर्श का फर्क समझाएगी, उनके प्रति संवेदनशील बनाएगी तो इससे वह संस्कार भी पैदा होगा जो डॉ हर्षवर्द्धन योग या संयम के जरिए पैदा करने की असंभव-सी कल्पना करते हैं. तब वे एक दूसरे के शरीरों का ज्यादा सम्मान करेंगे और एक-दूसरे की आत्माओं तक ज्यादा बेहतर ढंग से पहुंचेंगे. यह शिक्षा इस लिहाज से लड़कों के लिए जितनी जरूरी है, लड़कियों के लिए भी उतनी ही अपरिहार्य.
यौन शिक्षा बच्चों को सबसे पहली समझ यह दे सकती है कि यह ऐसा वर्जित विषय नहीं, जिस पर मां-पिता या शिक्षक से बात न की जा सके
मुश्किल यह है कि हमारे यहां बहुत सारे लोग यौन शिक्षा को यौन खुलेपन की दिशा में खुलने वाला पहला दरवाजा मान लेते हैं. जबकि इस यौन शिक्षा के न होने का एक नतीजा यह रहा है कि यौन खुलेपन को लेकर भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से में कई अजीब-सी और बेतुकी धारणाएं हैं. मसलन, यह कि पश्चिम की सभ्यता व्याभिचार में डूबी हुई सभ्यता है जहां औरत और मर्द बिना किसी रोकटोक के, एक-दूसरे से संबंध बना लेते हैं. कहने की जरूरत नहीं कि अपने सारे खुलेपन के बावजूद दुनिया की कोई भी सभ्यता ऐसे बेरोकटोक संबंधों को स्वीकार नहीं करती- भले वह उनको लेकर ऐसी बीमार हायतौबा न मचाती हो जैसी हमारे यहां मचती है.
बहरहाल, जहां तक यौन शिक्षा का सवाल है, उसका भी वास्ता सिर्फ शारीरिक मानसिक सूक्ष्मताओं के ज्ञान से नहीं होना चाहिए, उसका एक सामाजिक आयाम होना चाहिए जिसमें यह समझ शामिल हो कि संबंधों का भी अपना एक व्याकरण होता है और बहुत दूर तक उनका निर्वाह किया जाना चाहिए. फिलहाल जो हालत है, उसमें बच्चों के पास कोई शिक्षा नहीं है जो आज के माहौल में उन्हें एक तरह की बर्बरता में धकेलती है. अचानक हम पाते हैं कि बहुत सारे नाबालिग बच्चे बलात्कार के अपराध में शामिल हैं और फिर इस पर बहस करने लगते हैं कि किशोर माने जाने की उम्र क्या हो और उन्हें भी इतने संगीन अपराध की कड़ी सजा क्यों न हो. लेकिन हम यह महसूस नहीं करते कि इन नाबालिग बच्चों से हमें जितना खतरा है, उससे कहीं ज्यादा हमसे इन नाबालिग बच्चों को है. यह खतरा तब खत्म होगा जब हम खुद यौन शिक्षा को लेकर एक सहज-सजग और स्वस्थ रवैया विकसित करेंगे, अपने स्वास्थ्य मंत्री की तरह इससे किनारा करने की कोशिश नहीं करेंगे.
एलबमः हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया गीतकार » कुमार, बादशाह, इरशाद कामिल संगीतकार » शारिब-तोशी, सचिन-जिगर
हंप्टी शर्मा की दुल्हनिया ‘गर्मी की छुट्टियों’ का एलबम है. एलबम के सभी गाने, उनको लिखनेवाले, गानेवाले, संगीत देनेवाले, गानों का इंपोर्ट-एक्सपोर्ट करनेवाले, सब, गर्मी की छुट्टियों में हरहरे-छरहरे होने गए हैं, जिनके जीवन में गर्मियों की छुट्टियां इतनी लंबी नहीं हैं, उनकी गर्मियां बासी बोरियत की नक्काशी से सजे इन गीतों संग छोड़कर.
एलबम में शादी वाले गीत हैं, पार्टी वाले गीत, पब वाले गीत और कुछ उधार के गीत, अर्थात गुनगुनाए जा सकने वाले गीतों की फरमाइश करने वालों को घुड़की देकर भगाने वाले गीत. चौपाई-दोहे की जगह ले चुके हमारे आज के सुसंस्कारवान ‘रैप’ से सजे-संवरे इन गीतों में से तीन शारिब-तोशी के हैं जिनमें से दो वे उधार लाए हैं. महंगी मधुशालाओं में दो साल से बजने वाले ‘सेटरडे सेटरडे’ में वैसे का वैसा ही पुराना संगीत दुबारा ‘क्रिएट’ करने का श्रेय उन्होंने खुद को इसका संगीतकार कह कर दिया है, लेकिन गीत आज भी पहले-सा ही बेहूदा और शोर-प्रिय है. अगली उधारी में भी खुद को श्रेय देते शारिब-तोशी इस बार कुफ्र नहीं करते, अरिजित सिंह करते हैं, जब वे राहत फतेह अली खान का गाया ‘मैं तैनू समझावा’ चार साल बाद दुबारा खुद गाते हैं और काफी अरसे बाद हद साधारण लगते हैं. श्रेया घोषाल भी.
अपने हिस्से के तीन गीतों में से सचिन-जिगर दो में अपने पुराने-बुरे गीतों की याद दिलाते हैं, जिसमें से ‘डी से डांस’ बलम पिचकारी की तरह शुरू होकर उन सैकड़ों गीतों-सा हो जाता है जो साल गुजरने पर राख होते हैं. आखिरी गीत, शादी वाला ‘डेंगड़ डेंगड़’, लोक गीत के टच-अप के साथ, सुनने लायक है, सिर्फ इसलिए क्योंकि और कुछ भी इस एलबम में सुनने लायक नहीं है और इसलिए भी क्योंकि लंबे वक्त बाद थोड़े-से उदित नारायण को सुनकर अच्छा लगता है.
‘कोस-कोस पे पानी, सवा कोस पे बानी’ बदलने वाली कहावत में बहुत आसानी-से अगला हिस्सा जोड़ा जा सकता है -‘दस कोस पे ध्यानी’. ध्यानी यानी भक्त. हमारे देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज के आराध्य उतनी ही तेजी के साथ अपना चोला बदलते चलते हैं जितनी तेजी से यहां के लोगों की बोली. हर गांव-शहर-मुहल्ले के अपने आस्था के प्रतीकों का होना इस देश में उतना ही सहज है जितना जीने के लिए हवा-पानी. लमही के बेलवांबाबा, सरायमीर के अलीअश्कां बाबा, नरसिंहपुर के दुल्हादेव, लखनऊ के बाबा खम्मन पीर, रामदेवरा के रामदेव बाबा, मोकामा के चूहड़मल, छपरा की अंबा देवी से लेकर सुदूर दक्षिण भारत के अय्यप्पन तक स्थानीय देवी-देवताओं और श्रद्धा-उपासना के बिंबों की एक ऐसी अनवरत श्रृंखला है जिसका संबंध भारतीय पौराणिक संदर्भों से उतना गहरा जुड़ा न भी हो तो भी सब के सब उसी परंपरा से प्रेरित-आस्वादित हैं जिसमें पहले से ही तैंतीस करोड़ देवी-देवता विद्यमान हैं. मौजूदा दौर में आस्था के जो चार प्रतीक हमारे इन पारंपरिक आराध्यों से काफी आगे निकल गए दिखते हैं, उनमें – शिरडीवाले साई बाबा, शिंगणा के शनिदेव, भैरवनाथ और विभिन्न पीरों-औलियाओं की मजारें आती हैं.
अगर बारीकी से नजर दौड़ाएं तो हिंदू समुदाय की आस्था के प्रतीक कोस बदलने पर ही नहीं, बल्कि दिन-हफ्ते-साल और संगत बदलने पर भी बदलते हैं. फलां देवता मनोकामनाएं पूरी नहीं कर पाए तो कुछ हफ्ते बाद हमारी आस्था नई शरण ढूंढ़ लेती है. हाल के दौर में इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहे हैं निर्मल बाबा. किसी जानने वाले की मनोकामना पूरी हो गई तो हमारी श्रद्धा उस दिशा का रुख कर लेती है. ‘परिवर्तन संसार का अकाट्य सिद्धांत है’ वाली परिपाटी को हम भारतीयों ने अपनी आस्था के संदर्भ में भी उतना ही बड़ा सत्य मान लिया है.
धर्मभीरुता भारतीय समाज के मूल में है इसके बावजूद धर्म और आस्था के मामलों में छोटी-मोटी छूट लेने और नए-नए प्रयोगों से हमें कोई परहेज नहीं. ये छूट और प्रयोग धीरे-धीरे कब एक नए चलन का सूत्रपात कर देते हैं पता ही नहीं चलता. देखते ही देखते ये चलन किसी अलग ही मत, संप्रदाय या हमारी श्रद्धा के किसी जबर्दस्त प्रतीक का स्वरूप धारण कर लेते हंै. इसीलिए अब तक गुमनाम रहे कुछ आराध्य पिछले कुछ वर्षों में अचानक इतने लोकप्रिय हो गए हैं कि टीवी चैनलों से लेकर सड़कों पर दौड़ती बेशुमार कारों के शीशों तक पर दिख जाते हैं. रातों-रात धरती का सीना फाड़कर प्रकट हो जाने वाले मंदिर-मस्जिद-मजारों और उनके ऊपर दो-चार दिन के भीतर ही ‘अतीव शक्तिसंपन्न, प्राचीन सिद्धपीठ’ का बोर्ड लटक जाने की परंपरा का एक अक्खड़ बनारसी नमूना वरिष्ठ साहित्यकार डॉ काशीनाथ सिंह ने अपने मशहूर उपन्यास ‘काशी का अस्सी’ में कुछ यूं पेश किया है- ‘कंपटीशन शुरू हो गया है जीटी रोड के किनारे मंदिर, मस्जिद, मजार बनाकर जमीन हड़पने का. वे भी हड़प रहे हैं, लेकिन तुम्हारे मुकाबले वे कहीं नहीं हैं. मस्जिद खड़ी करने में तो समय लगता है, यहां तो एक ईंट या पत्थर फेंका, गेरू या सेनुर पोता, फूल-पत्ती चढ़ाया और माथा टेक दिया- जै बजरंग बली. और दो आदमी ढोलक-झाल लेकर बैठ गए- अखंड हरिकीर्तन! भगवान धरती फोड़कर प्रकट भए हैं…’
आस्था की इसी चादर तले तमाम अनर्गल चीजें अनजाने में ही समाज का हिस्सा बनती जाती हैं जिनका उस समय हमें एहसास नहीं होता जिसमें हम उन्हें स्वीकार रहे होते हैं, क्योंकि यह बदलाव बहुत दबे पांव हमारे बीच पैठ बनाता है. मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश इस प्रवृत्ति को हमारी पलायनवादी सोच का प्रतीक मानते हैं. उनके शब्दों में, ‘धर्म अपने साथ जिम्मेदारियां लेकर आता है. इसका मकसद होता है न्याय, सच्चाई और मानवता. लेकिन धर्म में जब विवेकशून्यता की स्थिति पैदा होती है तब यह पाखंड की ओर चल पड़ता है, तर्क-वितर्क, वाद-विवाद को प्रतिबंधित कर दिया जाता है तथा धर्म और आस्था की आड़ में किसी भी सवाल-जवाब को अवैध घोषित कर दिया जाता है.’ स्वामी अग्निवेश के विचारों को थोड़ा आगे ले जाएं तो इस स्थिति के बाद धर्म अपनी मार्गदर्शक वाली मूल भूमिका से भटक कर कट्टरवाद की ओर बढ़ जाता है.
भक्तों की धर्मभीरुता, पुजारियों के अलौकिक महिमामंडन और साथ में मीडिया महाराज की कृपा से आराध्यों का एक नया समूह पिछले कुछ सालों में जबर्दस्त तरीके से उभरा
परंपरागत हिंदू देवी-देवताओं में भगवान विष्णु और उनके अवतारों की आराधना सबसे ज्यादा होती रही है. इसके अतिरिक्त शिवजी, गणेश, लक्ष्मी, दुर्गा आदि ऐसे देवी-देवता रहे हैं जिन्हें थोड़ी आसान भाषा में मुख्यधारा के भगवान कहा जा सकता है. तमाम स्थानीय देवी-देवताओं के साथ-साथ इनकी आराधना का ग्राफ कमोबेश पूरे देश में एक-सा बना रहता है. किंतु विगत एक दशक के दौरान श्रद्धालुओं की पूजा-पाठ की शैलियों और व्यवस्थाओं में काफी बदलाव देखने को मिले हैं. कई अध्ययनों में भी इस तरह की चौंकाने वाली प्रवृत्तियां उजागर हुई हैं. साथ ही ये तथ्य कुछ और नई और रोचक परिपाटियों के गठन की ओर भी इशारा कर रहे हैं.
शनिदेव की लोकप्रियता का आंकड़ा पिछले चार-पांच सालों के दौरान गगनगामी हुआ है. इस तथ्य के साथ एक और सच्चाई यह भी जुड़ी है कि लगभग इसी समयांतराल के बीच हमारे देश में टेलीविजन मीडिया का विस्तार भी बहुत तेजी से हुआ है भक्तों की धर्मभीरुता, पीर-पुजारियों के अलौकिक महिमामंडन और इन सबसे ऊपर मीडिया महाराज की कृपा से आराध्यों का एक नया समूह पिछले कुछ सालों में जबर्दस्त तरीके से उभरा है. परंपरागत देवी-देवता, भक्तों की संख्या और आराधना के मामले मे पीछे छूटते जा रहे हैं और मुख्य रूप से आस्था के जो चार प्रतीक हमारे इन पारंपरिक आराध्यों से काफी आगे निकल गए दिखते हैं, वे हैं – शनिदेव, शिरडीवाले साई बाबा, भैरवनाथ और जगह-जगह दिखने वालीं विभिन्न पीरों-औलियाओं की मजारें. यहां पहले तीन तो आस्था के एक प्रकार से निश्चित रंग-रूप, हानि-लाभ और पूजा-पद्धतियों वाले प्रतीक हैं लेकिन मजारों के मामले में ऐसा नहीं है. घड़ी वाले, सिगरेट वाले से लेकर मटके वाले पीर तक की मजारें इस देश के अमूमन हर हिस्से में फैली हुई हैं. ये अलग-अलग लोगों की मजारें है, जिनके संदेश-उपदेश, और जियारत के तौर-तरीके एक-दूसरे के जैसे होते हुए भी अलग हो सकते हैं. मसलन हर जगह मजारों पर चादर तो चढ़ाई जाती है, लेकिन इसके साथ कहीं पर घड़ी और कहीं मटका चढ़ाने का चलन भी है.
इस श्रेणी के धार्मिक प्रतीकों को अगर एक दर्जे में रखकर देखें तो इनकी शरण में आने वालों की संख्या बड़े-बड़े देवी-देवताओं के भक्तों को मात दे सकती है. अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग दरगाहों-मजारों की प्रतिष्ठा और हिंदू धर्म के नये-नये देवताओं के अचानक ही चलन में आने की क्या वजह हो सकती है? इस सवाल पर स्वामी अग्निवेश की राय है, ‘वक्त-वक्त पर लोग नए-नए प्रतीक गढ़ते हैं, फिर उनका भय दिखाकर लोगों का भयादोहन किया जाता है. धीरे-धीरे जब उनका असर कम होता है, तब यह तबका किसी नए प्रतीक को गढ़ने के लिए आगे बढ़ जाता है.’
महज कुछ साल पहले तक शनिदेव की छवि एक ऐसे देवता की थी जिनके न तो क्रोध की कोई सीमा थी और न ही कृपा का कोई पारावार. आमतौर पर भक्त उनके कोप से बचने की कोशिश में ही रहते थे. लेकिन हाल के कुछ वर्षो में टीवी और नए-नए बाबाओं के प्रचार-प्रसार ने इनकी लोकप्रियता को एकदम से आसमान पर पहुंचा दिया. महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगणापुर में शनिदेव का सबसे विशाल मंदिर है. एक आंकड़े के मुताबिक बीते पांच सालों के दौरान शिंगणापुर में शनिदर्शन के लिए आने वाले भक्तों की संख्या और चढ़ावे ने यहां से थोड़ी ही दूर पर स्थित शिरडी के सांईबाबा की महिमा को भी फीका कर डाला है. एसी नील्सन के एक सर्वे के मुताबिक शनिदेव ने देवताओं की लोकप्रियता सूची के सभी पुराने समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है. वे बाकी तमाम देवी-देवताओं को काफी पीछे छोड़ चुके हैं. जहां परंपरागत देवी देवताओं की भक्ति के पीछे भक्तों की श्रद्धा काम कर रही होती है वहीं शनिभक्ति की लहर आने की मुख्य वजह है उनके प्रकोप से खुद को बचाने की मुराद और साथ ही उनकी कृपा से खुद को धनधान्य से भरपूर बनाने की लालसा. वरिष्ठ समाजशास्त्री डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, ‘शनि मूलत: संकट के प्रतीक रहे हैं और इस संकट का निवारण भी उन्हीं की शरण में होने का प्रावधान है. और बीते दो दशकों के दौरान हमारे सामाजिक जीवन में जिस तरह से भौतिक आसक्ति बढ़ी है उससे लोगों की इच्छाएं भी बहुत बढ़ गईं. इस बढ़ी हुई लालसा से पैदा हुए संकट को दूर करने के लिए लोग शनि, साई आदि की शरण लेना कहीं ज्यादा मुफीद समझते हैं.’ लोग शनिदेव के दर्शन तो करने जाते हैं पर उनसे नजरें चुराते हुए. शनिभक्ति की लहर शिंगणापुर से निकलकर भोपाल-दिल्ली के गलीकूचों तक फैल गई है. समय ने शनिदेव के पक्ष में पलटी खाई है और पिछले चार-पांच सालों के दौरान भोपाल में कदम-कदम पर शिंगणापुर वाले शनिदेव प्रकट हो गए हैं. हर नुक्कड़-बस्ती में उनके मंदिर दिख जाते हैं और शनिदेव की आस्था की लहर में हजारों एकड़ जमीन तमाम नियम कानूनों को धता बताकर शनिदेव को समर्पित हो गई है.
तमाम महानगरों की लालबत्तियों पर इस तरह के शनिदेव के सेवक नजर आ जाते हैं. फोटो: तरूण सहरावत
आजादी के तकरीबन 30 साल बाद तक सामान्य तीर्थस्थल रही वैष्णो देवी की गुफा रातोंरात सर्वदुखहर्ता तीर्थ के रूप में विख्यात हो गई. देखते ही देखते यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या एक साल में 10-10 लाख तक का आंकड़ा छूने लगी. अगर इस तथ्य पर सावधानी से निगाह डालें तो हम पाएंगे कि शनिदेव की लोकप्रियता का आंकड़ा पिछले चार-पांच सालों के दौरान गगनगामी हुआ है. इस तथ्य के साथ एक और सच्चाई यह भी जुड़ी है कि लगभग इसी समयांतराल के बीच हमारे देश में टेलीविजन मीडिया का विस्तार भी बहुत तेजी से हुआ है. टीवी के इस विस्तार के साथ दाती मदन महाराज और स्वामी रामदेव जैसे धर्म गुरुओं और संतों की पहुंच भी घर-घर में बढ़ी है. शनिदेव की बढ़ती लोकप्रियता में सबसे बड़ा योगदान हिंदी के एक बड़े ‘समाचार’ चैनल इंडिया टीवी और शनिदेव के परमभक्त दाती मदन महाराज का है. दाती महाराज शनिदेव की लोकप्रियता को अलग कोण से देखते हैं, ‘शनि शत्रु है, अमंगलकारी है, दुखदायी है, ये सब भ्रांतियां थीं. अब समाज से भ्रम और भ्रांति का पर्दा उठा है तो लोगों को सच्चाई का अहसास हो गया है. मैं तो साधनमात्र था. टेलीविजन ने मुझे आपसे जुड़ने का सुअवसर मुहैया कराया तो चुनौती थोड़ी आसान हो गई.’
चैनलों और नए-नए बाबाओं के गठजोड़ ने अंध श्रद्धा को बढ़ाया है और लोगों को धर्म के मूल उद्देश्य से भटका दिया है. साईं और शनि के बहाव में इसकी अहम भूमिका है
डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल इसे टीवी इवेंजलिस्म की संज्ञा देते हैं जिसकी शुरुआत अमेरिका में हुई थी. उनका मत है, ‘जिस भी समाज में टीवी का विस्तार हुआ वहां धार्मिकता का प्रसार बहुत तेजी से हुआ है. अमेरिका में अकेले ईसाइयत के अलग-अलग पंथों के कम से कम पचास धार्मिक चैनल हैं. भारत में भी टीवी के विस्तार ने इस दुर्गुण को अपना लिया है. चैनलों और नए-नए बाबाओं के गठजोड़ ने धार्मिकता को बढ़ाया है और लोगों को उसके मूल उद्देश्य से भटका दिया है. साई और शनि के बहाव में इसकी अहम भूमिका है.’
कुछ साल पहले तक साईबाबा का जिक्र आते ही लोग सीधे शिरडी का ध्यान करते थे. शिरडी में स्थित साईमंदिर की महिमा के तमाम किस्से सुनने-सुनाने को मिल जाते हैं. साईबाबा काफी कुछ भारत में सदियों से चली आ रही रमता जोगी और बहता पानी वाली पंरपरा की ही एक कड़ी थे. फक्कड़पना उनके स्वभाव में था, संतई और ईमानदारी उनके चरित्र के गुण थे और लोगों को सत्संगत की सीख देना उनकी विशेषता थी. इस परंपरा से जुड़ी तमाम दूसरी दास्तानंे भी देश के अन्य हिस्सों में देखने-सुनने को मिल जाती हैं मसलन कबीर या फिर देशभर में जगह-जगह फैली पीरों की दरगाह और मजारें. समय बीतने के साथ किस तरह से इनके दामन से चमत्कारवाद जुड़ जाता है, यह बात किसी पीएचडी छात्र के लिए शोध का बढ़िया विषय हो सकती है. पहले इस परंपरा के साथ एक सुंदर प्रवृत्ति का घालमेल भी देखने को मिलता था जिसे सही मायनों में गंगा जमुनी तहजीब कहा जा सकता था – इनके भक्तों में हिंदू-मुस्लिम और सिख सभी शामिल होते थे – पर हाल के दशकों में इस प्रवृत्ति का लोप हुआ है. पिछले एक दशक के भीतर देश भर में अस्सी हजार के करीब साई मंदिर अस्तित्व में आ गए हैं जहां करोड़ों रुपए चढ़ावा आता है. दिल्ली स्थित मशहूर इस्कॉन मंदिर के ठीक सामने साई बाबा का नया मंदिर बना है. सुबह-शाम आरती होती है और महीने में दो दिन साई बाबा की गाजे-बाजे के साथ शोभायात्रा निकाली जाती है. देश के दूसरे हिस्सों में फैलाव के साथ-साथ इसकी पूजा पद्धतियों में भी धीरे-धीरे भटकाव आता गया है जिसके साथ ही शिरडी और देश के दूसरे हिस्सों में बने साई मंदिरो में मुसलमानों की भागीदारी भी धीरे-धीरे खत्म हो गई है. उनकी पूजा-अर्चना का पूरी तरह से हिंदूकरण हो गया है, पौराणिक हिंदू देवी देवताओं की भांति ही फूल-माला, धूप-बत्ती से सराबोर साई मंदिर अपने मूल स्वरूप से ही भटक गए से लगते हैं. शिरडी साई संस्थानम ट्रस्ट के चेयरमैन जयंत ससाने मुसलमानों की साई से दूरी की बात स्वीकार करते हैं लेकिन उनके पास इसकी वजह भी बताने को है- ‘मुसलमान साई से इसलिए दूर हुए हैं क्योंकि उन्हें साई की मूर्ति से परेशानी होती है. यह इस्लाम की मूल धारणा के खिलाफ है. इसके चलते साई भक्तों में मुस्लिमों की संख्या घटी है.’ साई संस्थान ट्रस्ट ने इस संकट को देखते हुए अपनी वेबसाइट पर देश के दूसरे हिस्सों में स्थित साई मंदिरों के पुजारियों के लिए एक 15 दिन के ट्रेनिंग कार्यक्रम की व्यवस्था की है. शिरडी स्थित साई धाम में इन लोगों के प्रशिक्षण का इंतजाम किया गया है ताकि पूजा-पद्धति में आते जा रहे भटकाव को रोका जा सके. जिस पथ के पुजारी साई बाबा थे उसी की अगली कड़ी के तौर पर हम देशभर में प्रचलित दरगाहों-मजारों को रख सकते हैं. देश का कोई भी ऐसा इलाका नहीं होगा जहां दरगाहों मजारों पर शीश नवाने वाले हिंदू श्रद्धालु न हों.
समय-समय पर देश के लोकप्रिय माध्यमों ने भी देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा के संतुलन को निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाई है. मसलन 70 के दशक में आई बहुचर्चित और सिनेमा की कमाई के आंकड़े की नई इबारत लिखने वाली फिल्म जय संतोषी मां ने घर-घर में उनकी प्राण प्रतिष्ठा की थी. हर शुक्रवार को संतोषी माता की व्रत कथा की लहर पूरे देश में उमड़ पड़ी थी. संतोषीमाता का अभ्युदय एक निम्न मध्यवर्गीय परिघटना थी. गणेश की पुत्री मानी जाने वाली संतोषी माता धन और सुख-समृद्धि की देवी के रूप में प्रतिष्ठित हो गई थी. जाहिर-सी बात है जिस तबके को इन साधनों की सबसे अधिक इच्छा थी उन्हीं के बीच संतोषी माता की भक्ति का सागर उमड़ रहा था. कुछ ऐसी ही स्थितियां 80 के दशक में आई राजेश खन्ना की फिल्म अवतार और गुलशन कुमार के मातारानी के भजनों ने माता वैष्णो देवी के लिए पैदा की थीं. आजादी के तकरीबन 30 साल बाद तक सामान्य तीर्थस्थल रही वैष्णो देवी की गुफा रातोंरात सर्वदुखहर्ता तीर्थ के रूप में विख्यात हो गई. देखते ही देखते यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या एक साल में 10-10 लाख तक पहुंचने लगी.
आस्था का यह ज्वार अभी थमा नहीं है, हां कालांतर में इसमें एक और आयाम जुड़ गया – भैरवनाथ. फिर कथा चली कि भैरवनाथ का दर्शन किए बिना वैष्णो देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है. भैरवनाथ का प्रसिद्ध मंदिर भी वैष्णो देवी की गुफा से कुछ दूरी पर ही स्थित है.
फिलहाल यही भैरवनाथ शीर्ष गति से बढ़ रहे चार देवताओं में शामिल हो गए हैं. पौराणिक कथाओं के मुताबिक भैरवनाथ एक तांत्रिक थे जिन्होंने वैष्णो देवी का पीछा करते हुए उस मार्ग की खोज की थी जिसके जरिए आज 13 किलोमीटर लंबी वैष्णो देवी की यात्रा संचालित होती है. कथा यह थी कि वैष्णो देवी ने भैरवनाथ का वध करने के साथ ही उन्हें माफ कर दिया था और उन्हें विद्वान की संज्ञा देते हुए अपने जितना ही पूजनीय होने का आशीर्वाद दिया था. शिव के परम भक्त भैरवनाथ का प्रभाव दो दशक पहले तक देश के विस्तृत मैदानी इलाकों की बजाय हिमालय की पहाड़ियों तक ज्यादा था. अल्मोड़ा में काल भैरव, बटुक भैरव, भाल भैरव, शैव भैरव, आनंद भैरव, गौर भैरव और खटकूनियां नाम के आठ प्राचीन भैरव मंदिरों का अस्तित्व रहा है और लोगों के पास इनकी महिमा की अनगिनत दंतकथाएं भी बताने को हैं. लेकिन वैष्णो देवी के प्रसार के साथ ही भैरवनाथ का दायरा भी दुर्गम पहाड़ियों से निकल कर समतल मैदानों में फैल गया. दिल्ली में पुराने किले के पास स्थित मशहूर भैरव मंदिर है जहां चढ़ावे के रूप में शराब चढ़ाने की परंपरा है. इतना ही प्रसिद्ध और भीड़भाड़ से भरा और खुद को पांडव कालीन बताने वाला भैरव मंदिर दिल्ली के वीआईपी इलाके चाणक्यपुरी में भी स्थित है. यह अलग बात है कि भक्तों को इसका ज्ञान महज दशक भर पहले हुआ है. इस मंदिर से जुड़ी एक दिलचस्प दास्तान वहां पिछले दस सालों से बिना नागा दर्शन करने आने वाली एक भक्त सरोज शर्मा सुनाती हैं, ‘दस साल पहले तक यहां इक्का दुक्का ही कभी कोई दर्शन के लिए आता था. हम यहां आते थे और घंटों तक शांति से बैठ कर ध्यान-मग्न रहते थे. मंदिर के पुजारी अक्सर बातचीत के दौरान निराश होकर कहा करते थे, ‘बहनजी क्या कभी हमारे मंदिर में भी पुराने किले वाले भैरव बाबा के जैसी रौनक होगी?’ आखिर भैरव बाबा ने उनकी सुनी और आजकल चाणक्यपुरी का भैरव मंदिर हर रविवार वैसे ही गुलजार रहता है जैसे पुराने किले के पीछे वाले किलकारी भैरव महाराज. लखनऊ के अमीनाबाद में स्थित बटुक भैरव मंदिर भी खुद के प्राचीन होने का दावा करता है. मगर यहां के महंत श्याम किशोर गिरि नितांत व्यावहारिक नजरिया रखते हैं, ‘मंदिर तो करीब सात सदी पुराना है लेकिन यहां लोगों की विशाल भीड़ पिछले सात-आठ सालों से आनी शुरू हुई है. यहां पंद्रह आने दुखी लोग आते हैं और सिर्फ एक आना भक्त आते हैं.’
भक्त जब मंदिर-मस्जिद में जाता है तब उसके मन में श्रद्धा का भाव होता है. वही भक्त जब साई, शनि या किसी मजार के पास जाता है तब उसके मन में सिर्फ मुराद होती है
सत्यनारायण भगवान की कथा की तरह ही मजारों की प्रतिष्ठा में भी भक्त के कायाकल्प का गुणगान तो पन्ना दर पन्ना होता है पर मूलकथा आज तक किसी को पता नहीं चल सकी है
भैरवनाथ की श्रद्धा के पीछे भी वही मानसिकता देखने को मिलती है जो कि शनिदेव के भक्तों की है. दंतकथा के मुताबिक अपने जीवन काल में भैरवनाथ एक अड़ियल गुस्सैल सिद्ध तांत्रिक थे. उन्होंने वैष्णो देवी को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी. लेकिन लगे हाथ भैरवनाथ उतने ही पहुंचे हुए ज्ञानी भी थे. तमाम काली सिद्धियों पर उनका एकाधिकार था और उनके अनुयायियों पर कोई कुदृष्टि कभी हावी नहीं होने पाती थी. भैरवनाथ की आस्था और प्रभाव का एक जीता-जागता नमूना हाल ही में कश्मीर घाटी में देखने को मिला जहां सालों पहले पलायन कर गए हिंदुओं के बंद पड़े भैरव मंदिर को वहां के मुसलमानों ने दोबारा से खुलवाकर उन्हें कश्मीरी पंडितों के हवाले कर दिया.
नई दिल्ली स्थित पुराने किले के पीछे स्थित भौरव मंदिर में बंटता शराब का प्रसाद. फोटो: शैलेन्द्र पाण्डेय
अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, नई दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन ऑलिया और फतेहपुर सीकरी की शेख सलीम चिश्ती की दरगाह जैसी मिसालों को छोड़ दिया जाए तो काफी दरगाहों और मजारों पर शीश नवाने वाले जियारतमंदों को उनके अतीत के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं होता है. सत्यनारायण भगवान की कथा की तरह ही मजारों की प्रतिष्ठा भी कायम है जिसमें भक्त के कायाकल्प का गुणगान तो पन्ना दर पन्ना होता है पर मूलकथा किसी को पता नहीं होती. लखनऊ के खम्मन पीर दरगाह में मन्नत मांगने आए मोहित मिश्रा से जब तहलका ने दरगाह की महिमा और खम्मन पीर की श्रद्धा के बारे में जानने की कोशिश की तो एक रोचक कारण सामने आया. मोहित ने बताया, ‘जब आपके काम नहीं बन रहे होते हैं तब आप मजहब की सीमाओं को पार कर जाते हैं.’
काफी हद तक वाचिक परंपरा या किस्सागोई की आदत की तरह महिमा की कहानियां पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती हैं. स्वाभाविक है व्यक्ति दर व्यक्ति कहानियां परिष्कृत होती जाती हैं और समयातंर में एक बिल्कुल नई कहानी सामने आती है जिसमें चमत्कार, भय, आस्था, अपूर्ण इच्छा जैसे नवरसों का मिश्रण होता है. किस तरह से कोई मजार समय के साथ सर्वशक्तिसंपन्न और हर ख्वाहिश को पूरी करने वाली पीठ बन जाती है इसकी एक दिलचस्प बानगी चर्चित साहित्यकार भगवानदास मोरवाल के उपन्यास रेत में है. एक वेश्या रतना जो कि उपन्यास की नायिका भी है, को एक बच्चे की लंबे समय से चाह है. एक दिन पुलिस से भागा हुआ भूरा उसके पास आता है जिसके संसर्ग में आने से रतना की यह मुराद पूरी हो जाती है. शराबी भूरा के देहांत के बाद रतना उसकी पक्की कब्र बनवा देती हैै. दो साल बाद कोई शरारतन कब्र के ऊपर ‘भूरा पीर की मजार’ लिख देता है और कुछ ही दिनों में वहां संतान की इच्छा रखने वाले जोड़े मन्नतें मांगने के लिए आने लग जाते हैं. इस कब्र पर जो बोर्ड लगा होता है उपन्यास में उसका जिक्र भी बड़ा दिलचस्प है.
दरगाह-ए -बाबा भूरा पीर. सालाना उर्स- रबीउल अव्वल (जून की 25 तारीख) भंडारा- हर महीने के अंतिम दिन खादिम – मोहम्मद अमीन ‘यहां मर्द और औरत दोनों का शर्तिया इलाज होता है’
खुद मोरवाल के शब्दों में, ‘उपन्यास का यह दृष्टांत मेरे निजी अनुभव पर आधारित है. जब मैं लिखने के सिलसिले में उस इलाके में शोध कर रहा था तब मुझे इस घटना के बारे में पता चला. मैंने जाकर देखा तो वहां उस मजार पर अगरबत्तियां जल रही थीं.’
स्वामी अग्निवेश धर्म के इस विकृत स्वरूप के विस्तार के लिए समाज में आते जा रहे दुर्गुणों की बात करते हैं. उनके शब्दों में, ‘धर्म के प्रति अंध रुझान की जड़ें वर्तमान समाज में बढ़ते जा रहे भ्रष्टाचार, गंदगी और अनैतिक क्रिया-कलापों से जुड़ी हुई हैं. जब समाज गलत चीजों में लगा होगा तो स्वाभाविक है कि उसके अंदर एक तरह का भय, असुरक्षा और ग्लानिबोध रहता है. इस ग्लानिबोध से मुक्ति पाने के लिए व्यक्ति धर्म के चमत्कारिक पहलू की ओर झुकता चला जाता है.’
देखते ही देखते अनजानी मजारों और दरगाहों के साथ लोग दैवीय शक्तियों से परिपूर्ण, हर कामना की पूर्ति करने वाली, संतानहीनों को संतान और बेटी वालों को बेटे देने वाली जैसे विशेषण जोड़ते चले जाते हैं. एटा में सय्यद वाली गली के पीर से लेकर लखनऊ में ऐन चारबाग रेलवे स्टेशन पर खम्मन पीर बाबा की मजार, दिल्ली में पुराने किले के पास दरगाह-ए-अबू बकर तूसी उर्फ मटके वाले पीर की दरगाह और हरियाणा के मलेरकोटला वाले पीर के आश्रम तक पूरे देश में दरगाहों की ऐसी ही एक अनवरत श्रृंखला देखी जा सकती है.
आस्था समाज के आत्मविश्वास से जुड़ी होती है. जब उसमें आत्मविश्वास की कमी आती है तब वह आस्था से विमुख होकर कट्टरता, चमत्कार, अवतारवाद की तरफ चला जाता है
नई दिल्ली के प्रगति मैदान के पास स्थित मटके वाले पीर की दरगाह पर सालों से मटका चढ़ाने के लिए चांदनी चौक से यहां आने वाले साड़ियों के व्यापारी ईश्वरचंद गुप्ता को पीर के इतिहास के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता है. पूछने पर वे बस इतना ही बता पाते हैं कि किसी ने उनसे यहां मन्नत मानने के लिए कहा था. संयोग से उनकी मन्नत पूरी हो गई और गुप्ता जी की श्रद्धा भी अटल हो गई. वे कहते हैं, ‘अपने तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की पूजा तो हम बचपन से ही करते चले आ रहे थे. इसके बाद भी हमारी मुश्किलें जब दूर नहीं हो रही थीं तो फिर पीर की मजार को आजमाने में क्या बुराई थी. मेरे तमाम परिचितों को यहां मुंहमांगी मुराद मिल चुकी है.’
साधकों की इस प्रकार की निष्ठा के पीछे विशिष्ट भूमिका होती है अंधश्रद्धा और तर्क-वितर्क की क्षमता के अभाव की. पर इसकी अच्छाई की बात करें तो इन दरगाहों-मजारों पर शीश नवाने वालों में हिंदू-मुसलमान समान संख्या में होते हैं जो मौजूदा संवेदनशील, अस्थिर भारतीय समाज के नजरिए से एक बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है. यह अलग बात है कि एक बृहस्पतिवार को दरगाहों पर एक साथ सिर झुकाने वाले अगले शुक्रवार और मंगलवार को ही किसी मौलाना की तकरीर और पंडित के प्रवचन को गांठ बांधकर एक दूसरे को ललकारने से नहीं हिचकते.
अवध और लखनऊ के इतिहास की गहरी समझ रखने वाले डॉ. योगेश प्रवीण इस चलन को दो स्पष्ट हिस्सों में बांटकर देखते हैं. वे कहते हैं, ‘भक्त जब मंदिर-मस्जिद में जाता है तब उसके मन में श्रद्धा का भाव होता है जबकि वही भक्त जब किसी मजार पर जाता है तो उसके मन में कोई न कोई मुराद होती है.’ इन मजारों में भी मस्ती, सूफियाना फक्कड़पन जैसी शानदार हिंदुस्तानी परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है. लोग धर्म के कट्टरवादी स्वरूप की तरफ जाने-अनजाने बढ़े जा रहे हैं.
डॉ. पुरुषोत्तम अग्रवाल इसे धार्मिक समूहों की मन:स्थिति में व्याप्त आत्मविश्वास की कमी से जोड़कर देखते हुए कहते हैं, ‘मस्ती और फक्कड़पना जो कबीर की विशेषता थी, असल में समाज के आत्मविश्वास से जुड़ी हुई चीज है. जब समाज में आत्मविश्वास की कमी होती है, असुरक्षा की भावना बढ़ती है तब वह इन चीजों से विमुख होकर कट्टरता, चमत्कार, अवतारवाद जैसी चीजों की तरफ चला जाता है. यह बात आज समाज के हर पहलू से जुड़ गई है चाहे वह पढ़ाई-लिखाई हो, रोजी-रोटी हो नौकरी हो या फिर कुछ और.’
अच्छाइयों और बुराइयों की तुलना से इतर एक जरूरी प्रश्न यह उठता है कि यदि वास्तव में धर्म का स्वरूप समय सापेक्ष और परिवर्तनीय ही है तो आने वाले समय में भारत में इसका नया स्वरूप क्या उभरेगा. यह कबीर, कंबन, तुलसी, अकबर, विवेकानंद और गांधी के विचारों का सुंदर मिश्रण बनकर उभरेगा या तालिबानी तर्ज का कट्टरवादी प्रतीक या फिर आधुनिकता से ओत-प्रोत पूरी तरह अमेरिकी-यूरोपीय समाज की शक्ल ले लेगा?
वैसे तो संसार का कोई भी समाज या धर्म कभी भी इतना स्वाभाविक और व्यावहारिक नहीं रहा कि किसी समय में उसके नियम और परंपराएं हर किसी को स्वीकार्य रहे हों. हर समय के बीत जाने के बाद ही उसकी ठीक से समीक्षा की जा सकती है. बस देखना यह है कि भविष्य में हम आध्यात्मिक शांति के लिए ईश्वर की शरण में जाएंगे या बस मुरादें मांगने. इस बीच आधुनिक और परंपरागत आराध्यों के अनुयायियों के बीच पैदा हुई खटास किस करवट बैठेगी, यह देखना बहुत महत्वपूर्ण होगा. वास्तव में आधुनिक आराध्य परंपरागत देवी-देवताओं के लिए चुनौती बन गए हैं या फिर यह उनके भक्तों में पैदा हुई असुरक्षा का नतीजा है? समय की किताब में जुड़ने वाले पन्ने ही इसका जवाब दे सकते हैं.
साई बाबा की आराधना के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है. अतुल चौरसिया के साथ बातचीत में उनके शिष्य और भावी शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने गुरू के इस विरोध की वजहें बता रहे हैं. Read More>>
स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती. फोटो:विकास कुमार
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का साई बाबा की आराधना से विरोध क्यों है? धर्म नियम और परंपराओं से संचालित होता है. हर धर्म में कुछ परंपराएं होती हैं, कुछ वर्जनाएं होती हैं, कुछ प्रतिबंध होते हैं और कुछ चीजों को करने की इजाजत होती है. बीते कुछ समय के दौरान हमने देखा है कि साई को हमारे मंदिरों में हर मान्यता को झुठला कर स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है. साई हमारे देवताओं के समकक्ष नहीं रखे जा सकते. हमारे आराध्यों को नीचा दिखाने की कोशिश चल रही है. वैदिक मंत्रों को प्रदूषित किया जा रहा है. यह भ्रम पैदा किया जा रहा है कि साईं भी हमारे अवतार हैं. हमारा विरोध इसी झूठ से है.
जब लोग स्वयं साई की पूजा कर रहे हैं तो आप उन्हें रोक कैसे सकते हैं? हमारे देश का संविधान सबको अपनी श्रद्धा के मुताबिक पूजा-पाठ की छूट देता है.
जो धर्म की रक्षा करता है उसके प्रति श्रद्धा होती है. ऐसे व्यक्ति की पूजा करना भी न्यायोचित है. लेकिन साई ने कभी भी धर्म की रक्षा नहीं की है. आपत्ति यह है कि हमारे मंदिरों में साई की प्रतिमा लगाकर उन्हें ओम साईराम कहा जा रहा है. ऐसे-ऐसे चित्र प्रसारित किए जा रहे हैं जिनमें साई को विराट स्वरूप धारण किए हुए दिखाया गया है.
विराट स्वरूप सिर्फ भगवान श्रीकृष्ण ने धारण किया था. इसी तरह क्षीर सागर में भगवान विष्णु की माता लक्ष्मी के साथ विराजमान होने की तस्वीरें हैं. हमने देखा कि भगवान विष्णु की जगह साई को क्षीर सागर में लेटे हुए दिखाया जा रहा है. यह हमें स्वीकार्य नहीं है. जो लोग साई की पूजा करना चाहते हैं वे शौक से करें. पर हमारी पद्धतियों से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए.
कहा जा रहा है कि साई की बढ़ती लोकप्रियता से घबरा कर शंकराचार्य साई का विरोध कर रहे हैं.
जो लोग ऐसी बातें कर रहे हैं उन्हें गुरुदेव की बात ठीक से समझ नहीं आई है. हमारे भीतर किसी तरह की कोई असुरक्षा नहीं है. अगर साई की पूजा लोग स्वेच्छा से करेंगे तो हम उन्हें रोकने नहीं जाएंगे. लेकिन हमारी वैदिक पद्धितियों की आड़ लेकर उन्हें स्थापित करने की कोशिश होगी तो हम जरूर विरोध करेंगे.
धर्म इतनी हल्की-फुल्की चीज तो होता नहीं कि किसी एक व्यक्ति से उसे खतरा पैदा हो जाए. सनातन धर्म का इतिहास इतना पुराना है, पांच हजार साल का इसका लिखित दस्तावेज मौजूद है. इसे एक साई की पूजा से परहेज क्यों होनी चाहिए?
यह बात सत्य है कि हमारा धर्म बहुत गहरा और मजबूत है, लेकिन आप इसे इस तरह से समझिए कि गामा पहलवान की नाक पर भी यदि मक्खी बैठेगी तो वह उसे हटाएगा जरूर. यह मानकर कि यह तो एक छोटी सी मक्खी है, वह उसे अपनी नाक पर बैठने की छूट नहीं देगा. हमारे यहां भगवान उसे माना जाता है जो आसुरी शक्तियों का विनाश करता है. आप बताइए कि साई ने किस आसुरी शक्ति का विनाश किया है. इसलिए उन्हें भगवान नहीं माना जा सकता. एक शब्द है मंदिर. मंदिर का एक विधान होता है. यहां एक मूर्ति लगाई जाती है. इसके पश्चात उसमें वैदिक मंत्रोच्चार के जरिए प्राण प्रतिष्ठा की जाती है. ध्यान रखिए कि शव के ऊपर कोई प्राण प्रतिष्ठा नहीं हो सकती है. यह हमारी मान्य पद्धति के बिल्कुल खिलाफ है. शिरडी में साई की मजार के ऊपर उनके लोगों ने मंदिर बना रखा है. एक मजार के ऊपर प्रतिदिन वैदिक मंत्रोच्चार करके हमारी मान्य परंपराओं का अपमान हो रहा है.
अब तो आप लोगों के बीच में ही दो फाड़ होता दिख रहा है. एक मशहूर साध्वी उमा भारती का कहना है कि वे भी साई की भक्त हैं.
हमें भी इस बात का आश्चर्य है. हम लोग उमा भारती को राम मंदिर आंदोलन के बाद से जानते हैं. वे और साध्वी ऋतंभरा राम मंदिर आंदोलन का चेहरा थीं. ये जरूरी नहीं है कि सिर्फ राम मंदिर आंदोलन से जुड़कर कोई हमारी परंपरा का हिस्सा हो जाए. जब वे कहती हंै कि वे साई की भक्त हैं तो वे स्वयं ही हमारी परंपरा से अलग हो जाती हैं. उमा भारती के कहने से क्या फर्क पड़ता है? उन्होंने संन्यास की दीक्षा जिन गुरु से ली है वे स्वयं हमारे साथ खड़े हैं. उमा भारती के गुरु ने स्वयं स्वामी जी को फोन करके इस बात के लिए धन्यवाद दिया है कि उन्होंने एक सही मुद्दा उठाया है. वे खुद भी साई की पूजा से परेशानी महसूस कर रहे थे.
आप कह रहे हैं कि पूजा पद्धति में साई प्रदूषण फैला रहे हैं इसलिए यह विरोध है. यहां पर सिर्फ चार शंकराचार्यों का प्रावधान था, आज गली-गली में शंकराचार्य पैदा हो गए हैं आप लोगों ने वहां फैले प्रदूषण को दूर करने का आजतक कोई प्रयास नहीं किया.
हमारे गुरुदेव ने हमेशा यही कहा कि है कि यह सुनियोजित षडयंत्र है सनातन धर्म को अपमानित करने का और उसे नीचा दिखाने का. यह षडयंत्र कई मोर्चों पर चल रहा है. आज जो तमाम शंकराचार्य खड़े हो गए हैं वे उसी षडयंत्र का हिस्सा हैं जिसके तहत साई जैसों को अवतार बनाने की कोशिशें हो रही हैं. साई को भगवान बनाकर राम-कृष्ण की महिमा घटाई जा रही है इसी तरह अनेकों शंकराचार्य खड़ा करके गुरुओं की प्रतिष्ठा और महत्ता गिराने का षड्यंत्र हो रहा है.
द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का एक बयान इन दिनों विवाद का विषय बना हुआ है. यह बयान उन्नीसवीं सदी में हुए संत साई बाबा की बढ़ती लोकप्रियता के खिलाफ आया है. इन दिनों साई आराधना की जबर्दस्त लहर है. आलम यह है कि हिंदू धर्म के दूसरे परंपरागत देवी-देवता लोकप्रियता के पायदान पर साई से पीछे छूटते दिख रहे हैं. अपने परंपरागत आराध्यों के प्रति घटती श्रद्धा से पैदा हुआ भय भी स्वरूपानंद सरस्वती के बयान के पीछे की एक वजह हो सकता है. साई की भक्ति का एक पहलू यह भी है कि भक्त उनके पास श्रद्धा के वशीभूत होकर कम और कुछ पाने की उम्मीद लिए ज्यादा जा रहे हैं. साई की तर्ज पर ही आराध्यों की एक नई कतार खड़ी हो चुकी है. इनमें शनिदेव और भैरवनाथ के नाम प्रमुख हैं. इन सबकी आराधना का एक मिला-जुला पक्ष है. ये ऐसे आराध्य हैं जो या तो हमारे दिलों में घुसकर हमें डराते हैं या इनसे हमें अपनी हर मनोकामना पूरी होने की उम्मीद रहती है. ऐसे ही आराध्यों पर कुछ समय पूर्व की गई तहलका की यह कथा अपने संशोधित और संवर्धित स्वरूप में आगे के पन्नों में है. Read More>>
छात्र संगठनों द्वारा किए गए भारी विरोध के बाद विश्चविघालय ने चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम को वापिस ले लिया. फोटो:विकास कुमार
बात 14वीं सदी की है. दिल्ली सल्तनत में तब मुहम्मद बिन तुगलक का शासन हुआ करता था. एक दिन तुगलक को सूझा कि राज्य की राजधानी को दिल्ली में नहीं बल्कि दौलताबाद में होना चाहिए. उसने राजधानी दौलताबाद ले जाने का फैसला किया. आनन-फानन में जनता को भी दौलताबाद में बसने का फरमान सुना दिया गया. सैकड़ों मील के इस सफर में कई लोगों की लूटपाट और बीमारी के कारण मौत हो गई. कुछ समय बाद तुगलक को अहसास हुआ कि राजधानी को दौलताबाद लाने का फैसला सही नहीं था. तब उसने जनता को दिल्ली वापस लौटने के आदेश दिए. वापसी में और भी ज्यादा लोग मारे गए. राजधानी को तो वापस दिल्ली में बसा लिया गया लेकिन तुगलक के इस फैसले की भारी कीमत दिल्ली की जनता को चुकानी पड़ी.
इस घटना के लगभग सात सौ साल बाद आज दिल्ली के छात्रों की स्थिति भी लगभग वैसी ही हो गई है जैसी तब दिल्ली की जनता की हुई थी. दिल्ली विश्वविद्यालय ने पिछले साल अपने स्नातक स्तर के तीन वर्षीय पाठ्यक्रम को समाप्त करते हुए चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम (एफवाईयूपी) लागू किया था. इस नए पाठ्यक्रम में लगभग 54 हजार छात्रों को दाखिला दिया गया. इसके एक साल बाद ही एफवाईयूपी को समाप्त कर दोबारा से वही तीन वर्षीय पाठ्यक्रम लागू किया जा रहा है. एफवाईयूपी के तहत अपना पहला साल पूरा कर चुके इन 54 हजार छात्रों को भी अब उसी पुराने पाठ्यक्रम में लौटाया जा रहा है. ये छात्र अब न तो पूरी तरह से एफवाईयूपी के तहत ही पढ़ सकेंगे और न ही पूरी तरह से पुराने पाठ्यक्रम के तहत. इनके लिए अभी विश्वविद्यालय के पास कोई ठोस योजना भी नहीं है. इन छात्रों की इस स्थिति के लिए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दिनेश सिंह को दोषी माना जा रहा है. उन पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने ही पिछले साल एफवाईयूपी को तुगलकी तरीके से लागू करवा दिया था. इसी कारण आज अधिकतर छात्र, शिक्षक, अभिभावक और सभी राजनीतिक दल प्रो. सिंह के खिलाफ नजर आ रहे हैं. उनके इस्तीफे की मांग हो रही है. कई लोग तो उन पर आपराधिक मुकदमा चलाने की भी बात कर रहे हैं.
एफवाईयूपी का मुद्दा सिर्फ उन 54 हजार छात्रों तक ही सीमित नहीं है जिनका भविष्य अब इसके निरस्त होने के कारण अधर में लटका हुआ है. यह मुद्दा देश के सबसे बेहतरीन विश्वविद्यालय से निकलने वाली एक पूरी पीढ़ी का है. दिल्ली विश्वविद्यालय में होने वाले बदलाव पूरे देश की उच्च शिक्षा के लिए मिसाल बनते हैं. इस कारण यह मुद्दा सारे देश की उच्च शिक्षा से संबंधित एक गंभीर मुद्दा भी है. इस मुद्दे ने शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता, शिक्षा में राजनीतिक हस्तक्षेप और छात्रों के भविष्य की कीमत पर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को साधने जैसे कई सवालों को भी जन्म दे दिया है. इन सभी मुद्दों पर चर्चा करने से पहले जानते हैं कि एफवाईयूपी है क्या.
आम तौर पर देश भर के सभी विश्वविद्यालयों में स्नातक की डिग्री तीन साल में दी जाती है. पिछले साल दिल्ली विश्वविद्यालय ने इस व्यवस्था में परिवर्तन कर एक नई व्यवस्था लागू की. इसे संक्षेप में एफवाईयूपी (फोर इयर अंडरग्रेज्युएट प्रोग्राम) कहा गया. एफवाईयूपी के लागू होने से किसी भी विषय में ऑनर्स की वह डिग्री चार साल की हो गई जो पहले तीन साल में हासिल की जा सकती थी. हालांकि तीन साल में स्नातक की डिग्री हासिल करने का विकल्प भी एफवाईयूपी में खुला रखा गया था लेकिन ऑनर्स के लिए चार साल अनिवार्य कर दिए गए थे. इसके साथ ही एफवाईयूपी के अंतर्गत दो साल में पढ़ाई छोड़ देने वाले छात्रों को डिप्लोमा देने की व्यवस्था भी की गई थी. स्नातक की डिग्री को चार साल के खांचे में ढालने के साथ ही एफवाईयूपी के तहत पाठ्यक्रम भी बहुत हद तक बदल दिया गया था. इस नई व्यवस्था में 11 आवश्यक फाउंडेशन कोर्स भी शामिल किए गए. इनमें हिंदी, अंग्रेजी, गणित, आईटी, भूगोल, व्यापार प्रबंधन आदि विषय शामिल थे. पहले साल के पाठ्यक्रम में 67 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं विषयों का था जबकि सिर्फ 33 प्रतिशत हिस्सा ही मुख्य विषय को दिया गया था.
इस मुद्दे ने शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता और छात्रों के भविष्य की कीमत पर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को साधने जैसे कई सवालों को भी जन्म दे दिया है
एफवाईयूपी को लागू करने से पहले कुलपति ने इसके पक्ष में कई तर्क दिए थे. एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि ‘दिल्ली विश्वविद्यालय में बहुत ही सीमित छात्रों को ऑनर्स की डिग्री हासिल हो पाती है. जिन बच्चों के 12वीं में अच्छे नंबर नहीं होते उन्हें ऑनर्स की डिग्री नहीं मिल पाती. लेकिन एफवाईयूपी सभी छात्रों को ऑनर्स की डिग्री हासिल करने के समान अवसर देता है. कोई भी छात्र चार साल में ऑनर्स कर सकता है.’ साथ ही कुलपति का यह भी कहना था कि ‘एफवाईयूपी के अंतर्गत पढ़ाए जाने वाले फाउंडेशन कोर्स छात्रों के लिए बहुत सार्थक साबित होंगे. इनसे उन छात्रों को तो मदद मिलेगी ही जो अपनी आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाना चाहते हैं, साथ ही छात्रों को नौकरी हासिल करने में भी ये बहुत उपयोगी साबित होंगे.’ कुलपति प्रो. दिनेश सिंह का मानना था कि यदि एफवाईयूपी से छात्रों की जिंदगी बेहतर होती है तो उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि इसके लिए छात्रों को एक अतिरिक्त वर्ष पढ़ाई में लगाना पड़ेगा.
प्रो. दिनेश सिंह के इन तमाम तर्कों के बावजूद भी एफवाईयूपी का जमकर विरोध हुआ था. कई छात्रों और शिक्षकों ने मिलकर एफवाईयूपी को रोकने के लिए ‘सेव दिल्ली यूनिवर्सिटी कैम्पेन’ भी शुरू किया था. इस कैम्पेन में सैकड़ों लोगों ने एफवाईयूपी को लागू न करने के लिए एक पत्र पर हस्ताक्षर कर उसे प्रधानमंत्री को भी भेजा था. इस मुहिम से जुड़े रहे डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट के सचिव और दयाल सिंह कॉलेज के प्रोफेसर राजीव कुंवर बताते हैं, ‘पिछले साल भी हम लोगों ने इस व्यवस्था का जमकर विरोध किया था. लगभग सभी वामपंथी संगठन इसमें हमारे साथ थे. यह व्यवस्था निजी और विदेशी कॉलजों को बढ़ावा देने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा थी. इस साजिश के तहत सबसे पहले सेमेस्टर व्यवस्था को लागू किया गया. उसे हम रोक पाने में कामयाब नहीं हो पाए. सेमेस्टर के बाद एफवाईयूपी को लाया गया और विरोध के बावजूद भी जबरन लागू करवा दिया गया.’ इन तमाम विरोधों के साथ ही पिछले साल एफवाईयूपी पर रोक लगाने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका भी दाखिल की गई थी. लेकिन इस याचिका के दौरान केन्द्रीय अनुदान आयोग और मानव संसाधन मंत्रालय ने एफवाईयूपी का कोई विरोध नहीं किया और इसे लागू करने के लिए अपनी सहमति दे दी. इसके बाद दिल्ली विशविद्यालय के सभी कॉलजों में तीन साल का पाठ्यक्रम रद्द करके एफवाईयूपी को लागू कर दिया गया था.
इस साल एफवाईयूपी पर मुख्य विवाद तब शुरू हुआ जब कुछ दिन पहले ही केन्द्रीय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने दिल्ली विश्वविद्यालय को इस पर रोक लगाने के निर्देश देते हुए पुराने तीन-साला पाठ्यक्रम को लागू करने को कहा. 24 जुलाई से दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश शुरू होने थे. देश भर के लगभग पौने तीन लाख छात्रों ने इसके लिए आवेदन किया था. कॉलेज प्रवेश प्रक्रिया शुरू करते इससे पहले ही यूजीसी ने सभी कॉलेजों को भी चेतावनी देते हुए एफवाईयूपी पर रोक लगाने के निर्देश दे दिए. यूजीसी के इस कदम से दिल्ली के सभी कॉलेजों ने प्रवेश प्रक्रिया पर रोक लगा दी. प्रवेश प्रक्रिया पर रोक लगने के साथ ही कई छात्र और शिक्षक संगठनों ने प्रदर्शन शुरू कर दिए. इनमें से अधिकतर प्रदर्शन एफवाईयूपी के विरोध में थे तो कुछ गिने-चुने एफवाईयूपी के समर्थन में भी हुए. इस दौरान कुलपति की ओर से कोई भी निर्देश जारी नहीं किए गए. असमंजस की यह स्थिति कई दिनों तक बनी रही जिसमें कभी कुलपति के इस्तीफे की खबरें आईं तो कभी इस्तीफा वापस लेने की.
इस दौरान डीयू के कुलपति प्रो. दिनेश कुमार सिंह का जमकर विरोध हुआ. प्रो. दिनेश एफवाईयूपी के पक्ष में थ. फोटो: विकास कुमार
दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने आए देशभर के लाखों छात्र इस दौरान प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने के इंतजार में थे. इनमें से कुछ तो एफवाईयूपी के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों में भी शामिल हुए. बिहार से आए अनिरुद्ध ने भी आइसा के कार्यकर्ताओं के साथ एफवाईयूपी के खिलाफ जमकर प्रदर्शन किए. वे बताते हैं, ‘मुझे दिल्ली आए चार दिन हो चुके थे. मैं जनरल डिब्बे में सवारी करके दिल्ली पहुंचा था ताकि समय से प्रवेश के लिए पहुंच सकूं. लेकिन यहां प्रवेश प्रक्रिया पर ही रोक लगी हुई थी.’ अनिरुद्ध आगे कहते हैं, ‘दिल्ली विश्वविद्यालय देश में सबसे बेहतर है. लेकिन यदि एफवाईयूपी समाप्त नहीं होता तो मैं कहीं और से अपनी पढ़ाई करता. मैं एक अतिरिक्त साल खर्च नहीं कर सकता था. बात सिर्फ फीस की नहीं है. दिल्ली में एक साल रहने का खर्च ही बहुत महंगा है. इसलिए मैं चाहता था कि एफवाईयूपी समाप्त हो.’
‘इस पाठ्यक्रम को समाप्त करने के लिए जिस तरह से यूजीसी ने छात्रों और कॉलेजों से संपर्क किया वह एक खतरनाक शुरुआत है’
एक तरफ अनिरुद्ध की तरह ही देश के लाखों छात्रों के लिए एफवाईयूपी उनके भविष्य का सवाल था तो दूसरी तरफ इसने राजनीतिक रूप भी ले लिए था. भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव से पहले एफवाईयूपी को समाप्त करने का वादा किया था. ऐसे में जब यूजीसी ने प्रवेश प्रक्रिया से ठीक पहले दिल्ली विश्वविद्यालय और सभी कॉलेजों को एफवाईयूपी को समाप्त करने के निर्देश दिए तो इसे एक राजनीतिक दबाव के तौर पर ही देखा गया. ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि पिछले साल जब एफवाईयूपी को लागू किया गया था तो यूजीसी ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी. ऐसे में यूजीसी के इस हस्तक्षेप को विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर हमला माना गया और इस पूरे विवाद में ‘स्वायत्तता’ ही मुख्य मुद्दा बन गई. विश्वविद्यालय की एक्जिक्यूटिव कमेटी के सदस्य प्रोफेसर आदित्य नारायण मिश्रा उन चुनिंदा लोगों में से हैं जो एफवाईयूपी को बनाए रखने के पक्ष में हैं. मिश्रा बताते हैं ‘आज यूजीसी इस तर्क के साथ एफवाईयूपी को समाप्त करने के निर्देश दे रही है कि यह राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 के प्राविधानों के खिलाफ है. जबकि 1 मई 2013 को यूजीसी ने अपने पत्र में कहा है कि पाठ्यक्रम की समय-सीमा तय करना विश्वविद्यालय पर निर्भर करता है.’ मिश्रा आगे बताते हैं, ‘बैंगलोर विश्वविद्यालय में भी बिलकुल ऐसी ही व्यवस्था है जैसी एफवाईयूपी के तहत दिल्ली में थी. जब यह व्यवस्था बैंगलोर विश्वविद्यालय के लिए कानूनन गलत नहीं है तो फिर दिल्ली के लिए कैसे गलत हो सकती है. दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब उसकी स्वायत्तता को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है.’
यूजीसी द्वारा एफवाईयूपी को समाप्त करने के निर्देशों को प्रोफेसर मिश्रा ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती भी दी थी लेकिन न्यायालय ने इस मामले को उच्च न्यायालय में पेश करने को कहा. प्रोफेसर मिश्रा की ही तरह दिल्ली के एक कॉलेज के कुछ छात्र भी एफवाईयूपी को बनाए रखने के लिए न्यायालय पहुंचे थे. दिल्ली उच्च न्यायालय ने इन छात्रों की याचिका पर सुनवाई यह कहते हुए कुछ समय के लिए टाल दी कि ऐसे गंभीर मुद्दे को किसी जल्दबाजी में नहीं सुना जा सकता. इन छात्रों के वकील मीत मल्होत्रा बताते हैं, ‘एफवाईयूपी को पिछले साल न्यायालय में चुनौती दी गई थी. उस वक्त यूजीसी और मानव संसाधन मंत्रालय दोनों ने ही एफवाईयूपी का समर्थन किया था. आज यूजीसी के पास इसे समाप्त करवाने का एक भी कारण नहीं है. न्यायालय में यदि सुनवाई होती तो एफवाईयूपी को कभी भी नहीं हटाया जाता. इसलिए सुनवाई होने से पहले ही विश्वविद्यालय पर दबाव बनाकर इसे समाप्त कर दिया गया.’ मीत आगे बताते हैं, ‘मैंने भी काफी साल पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में एक शिक्षक के तौर पर काम किया है. मैं जानता हूं कि एफवाईयूपी का पाठ्यक्रम स्तरीय नहीं था. लेकिन इसे जिस तरह से हटाया गया है वह और भी ज्यादा गलत है. एक छोटी गलती को बड़ी गलती से सुधारने की कोशिश की गई है.’
अधिवक्ता मीत मल्होत्रा की तरह ही दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद भी मानते हैं कि एफवाईयूपी को समाप्त करने का जो तरीका यूजीसी ने अपनाया है वह सही नहीं है. एक साक्षात्कार में वे कहते हैं, ‘इस पाठ्यक्रम को समाप्त करने के लिए जिस तरह से यूजीसी ने छात्रों और कॉलेजों से संपर्क किया वह एक खतरनाक शुरुआत है. लेकिन एफवाईयूपी का बने रहना भी बेहद दुर्भाग्यपूर्ण था. इसे किसी न किसी बिंदु पर तो समाप्त होना ही था.’ एफवाईयूपी का विरोध कर रहे कुछ शिक्षक ऐसे भी हैं जो यूजीसी के इस कदम को विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर हमला नहीं मानते. प्रोफेसर राजीव कुंवर बताते हैं, ‘लोकमत से तो संविधान भी बदल जाता है तो फिर एफवाईयूपी क्या चीज है. इस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए यदि राजनीतिक हस्तक्षेप भी हुआ है तो उसमें कोई बुराई नहीं है. राजनीति कोई बुरी चीज नहीं है. जब राजनीति जनता के खिलाफ हो तब वह बुरी है. एफवाईयूपी को लागू करवाने के लिए राजनीति का नकारात्मक उपयोग हुआ था. विश्वविद्यालय की स्वायत्तता पर तब भी हमला हुआ था जब एफवाईयूपी को जबरन लागू करवाया गया था. विश्वविद्यालय में कुलपति ने यह काम करवाया. इसी तरह यूजीसी भी संयुक्त रूप से दोषी नहीं है बल्कि सिर्फ यूजीसी के अध्यक्ष दोषी हैं जिन्होंने कुलपति के साथ मिलकर इसे लागू करवाया.’
एफवाईयूपी के पक्ष में खड़े लोगों का सबसे बड़ा तर्क है कि यदि यह व्यवस्था इतनी ही बुरी थी तो इसे सभी विभागों और मंत्रालय से हरी झंडी कैसे मिल गई?
जिस दौरान एफवाईयूपी को यूजीसी में अनुमति के लिए भेजा गया था उस वक्त आम आदमी पार्टी के नेता योगेन्द्र यादव भी यूजीसी के सदस्य थे. उन्होंने एफवाईयूपी पर चर्चा के दौरान यह बात कही थी कि यह व्यवस्था राष्ट्रीय शिक्षा नीति के खिलाफ है. योगेन्द्र यादव ने यह भी सुझाव दिया था कि यूजीसी को फिलहाल एफवाईयूपी लागू करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए. लेकिन इसके बाद भी यूजीसी ने एफवाईयूपी को लागू करने की अनुमति दे दी. यूजीसी अध्यक्ष वेद प्रकाश के भी इस फैसले में जिम्मेदार होने की बात को चार महीने पहले की घटना कुछ और बल देती है. जो यूजीसी आज दिल्ली विश्वविद्यालय और उसके कुलपति की सबसे बड़ी दुश्मन बनकर खड़ी है उसी यूजीसी के अध्यक्ष ने फरवरी 2014 में कुलपति दिनेश सिंह द्वारा किए गए सुधारों की जमकर तारीफ की थी. दिल्ली विश्वविद्यालय के वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रम में वेद प्रकाश ने कुलपति द्वारा शुरू किए गए एफवाईयूपी को भी बहुत सराहा था. उन्होंने कहा था कि ‘जिस समर्पण से दिनेश सिंह इस विश्वविद्यालय को अपनी सेवाएं दे रहे हैं और इसे वैश्विक पटल पर पहचान दिला रहे हैं उसके लिए मैं उनकी जितनी तारीफ करुं कम है.’ इसी कार्यक्रम में कुलपति ने भी वेद प्रकाश का विश्वविद्यालय में हुए ‘सुधारों’ को लागू करवाने के लिए आभार व्यक्त किया था.
एफवाईयूपी के पक्ष में खड़े लोगों का सबसे बड़ा तर्क है कि यदि यह व्यवस्था इतनी ही बुरी थी तो इसे सभी समितियों, विभागों और मंत्रालय से हरी झंडी कैसे मिल गई? विश्वविद्यालय की अकादेमिक काउंसिल और एक्जिक्यूटिव काउंसिल ने इसे पास किया था और यूजीसी से भी इसकी अनुमति ली गई थी. एकेडेमिक काउंसिल के सदस्य प्रोफेसर संजय कुमार के अनुसार, ‘जब 2012 में एकेडेमिक काउंसिल की मीटिंग में एफवाईयूपी को पास किया गया था तो सभी डीन और वरिष्ठ सदस्य वहां मौजूद थे. भाजपा के भी चार सदस्य वहां थे जिन्होंने इसके पक्ष में वोट किया था.’ ऐसे में सवाल उठता है कि जब एफवाईयूपी को बहुमत से पास कर दिया गया था तो आज इसका लगभग हर तबके में इतना विरोध क्यों हो रहा है? इस सवाल का जवाब दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (डूटा) के उपाध्यक्ष प्रोफेसर संदीप की बातों से साफ हो जाता है. वे बताते हैं, ‘एकेडेमिक काउंसिल में सौ से ज्यादा सदस्य होते हैं. इनमें से सिर्फ 26 ही निर्वाचित सदस्य होते हैं. इनके अलावा सभी सदस्य मनोनीत होते हैं जो कुलपति की इच्छा से वहां पहुंचते हैं. एक्जिक्यूटिव काउंसिल में सिर्फ दो ही निर्वाचित सदस्य होते हैं. ऐसे में जो भी कुलपति कहता है वो फैसला इन दोनों ही कौन्सिल्स में पास हो जाता है. एफवाईयूपी को लागू करवाने के लिए तो एकेडेमिक और एक्सिक्यूटिव काउंसिल की आपात बैठक बुलाई गई थी.’
केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी
एफवाईयूपी की इस बहस में विश्वविद्यालय की स्वायत्तता, राजनीति और नियमों की अनदेखी से इतर सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे लाखों छात्रों का भविष्य भी प्रभावित होता है. ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी है कि ‘शिक्षा में सुधारों’ के नाम पर लागू की गई यह व्यवस्था छात्रों के लिए लाभकारी है या नहीं. कुलपति दिनेश सिंह ने इस व्यवस्था को लागू करते हुए कई आंकड़े प्रस्तुत किए थे. उन्होंने बताया था कि ‘विश्वविद्यालय से हर साल लगभग 25 हजार छात्र अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर चले जाते हैं. दो साल पढ़ने के बाद भी उनके पास दिखाने को कोई प्रमाण पत्र नहीं होता. ऐसे में एफवाईयूपी के अंतर्गत दूसरे साल के बाद पढ़ाई छोड़ने वाले छात्रों को डिप्लोमा दिया जाना बहुत सार्थक होगा.’ कुलपति के इस तर्क को खारिज करते हुए प्रोफेसर राजीव कुंवर बताते हैं, ‘पढ़ाई छोड़ने वाले सबसे ज्यादा बच्चे प्रथम वर्ष के होते हैं. वे भी इसलिए छोड़कर जाते हैं क्योंकि उनका किसी प्रोफेशनल कोर्स में दाखिला हो जाता है. इन छात्रों को किसी डिप्लोमा की आवश्यकता नहीं है.’ हिंदू कॉलेज के प्रोफेसर ईश मिश्र भी कुलपति के तर्क को नकारते हुए बताते हैं, ‘अन्य संस्थानों में डिप्लोमा उन छात्रों को दिया जाता है जिन्हें किसी विधा में पारंगत किया जाए. एफवाईयूपी के अंतर्गत दो साल में कौन-सी विधा में पारंगत किया जा रहा है?’
कुलपति दिनेश सिंह ने एफवाईयूपी के लागू होने के समय एक साक्षात्कार में बताया था, ‘मैंने कुछ समय पहले देश की कुछ सबसे बड़ी कंपनियों को अपने विश्वविद्यालय में बुलवाया था. उन्हें कुछ लोगों की जरूरत थी जिन्हें वे नौकरी देना चाहते थे. कुल 1100 छात्रों का इन कंपनियों में साक्षात्कार तय करवाया गया. लेकिन उन कंपनियों ने इनमें से सिर्फ तीन लोगों को चुना. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अब आगे से हम दिल्ली विश्वविद्यालय नहीं आएंगे क्योंकि इसमें सिर्फ वक्त की बर्बादी है. इसी कारण से एफवाईयूपी में ऐसे विषय शामिल किए गए हैं जिनसे छात्रों को सभी महत्वपूर्ण विषयों की मूलभूत जानकारी मिले. इससे उन्हें नौकरी हासिल करने में बहुत मदद मिलेगी.’
जिन महत्वपूर्ण विषयों का जिक्र प्रोफेसर सिंह कर रहे हैं उनके बारे में एफवाईयूपी के अंतर्गत पढ़ रहे सत्यवती कॉलेज के छात्र शरद बताते हैं, ‘फाउंडेशन के नाम पर हमें गणित पढ़ाई जाती है और उसमें सम-विषम संख्या पढ़ा रहे हैं. यह कक्षा पांच में पढ़ाई जाने वाली चीज है. ऐसे ही व्यापार के नाम पर हमसे परीक्षा में सवाल पूछा जाता है कि ‘एक आलू-टिक्की का ठेला लगाने वाले को अपना व्यापार बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए?’ मैं हिस्ट्री (ऑनर्स) का छात्र हूँ. मुझे मेरा विषय छोड़कर बाकी ये सब पढ़ाया जा रहा है.’ एफवाईयूपी के तहत अपना पहला साल पूरा कर चुके अधिकतर छात्रों के अनुभव शरद से मिलते-जुलते ही हैं. जाकिर हुसैन कॉलेज में इंग्लिश (ऑनर्स) की छात्रा अंशु पंडित बताती हैं, ‘फाउंडेशन कोर्स में कुछ चीजें तो ठीक हैं. जैसे मुझे आईटी से काफी सीखने को मिला. लेकिन मुझे मैथ्स भी पढ़नी पढ़ रही है और वो भी प्राइमरी स्कूल के स्तर की. इसका कोई मतलब नहीं है. फाउंडेशन कोर्स भी मुख्य विषय की कीमत पर तो बिलकुल नहीं होने चाहिए. इनके लिए कभी अलग से एक-दो क्लास हों तो भी काफी हैं.’
कई का यह भी मानना है कि एफवाईयूपी को सभी संबंधित पक्षों की सलाह से लागू किया जाता तो यह उच्च शिक्षा में सुधारों का एक बड़ा कदम हो सकता था
प्रोफेसर अपूर्वानंद के अनुसार, ‘एफवाईयूपी एक बेहद ही घटिया और अतार्किक पाठ्यक्रम है. यह एक ऐसी अकादेमिक धोखाधड़ी है जो इस देश के 60 हजार छात्रों के साथ हर साल की जाने वाली थी. ये जो एफवाईयूपी के तहत दी जाने वाली डिग्री है ये दरअसल यूरोप में स्कूलों में दी जाती है.’ प्रोफेसर अपूर्वानंद एक साक्षात्कार में बताते हैं, ‘डीयू ने जब पहली बार यूजीसी को यह पाठ्यक्रम अनुमति के लिए भेजा था तो दो साल में ‘एसोसिएट बैकालॉरिएट’, तीन साल में ‘बैकालॉरिएट’ और चार साल में ‘बैकालॉरिएट ऑनर्स’ की बात कही थी. यूजीसी के कहने पर इनके नाम बदलकर ‘डिप्लोमा’, ‘बैचलर्स’ और ‘बैचलर ऑनर्स’ कर दिये गए.’ एफवाईयूपी को पूरी तरह से नकारते हुए प्रोफेसर राजीव कुंवर कहते हैं, ‘एफवाईयूपी के तहत छात्रों को अपनी पढ़ाई छोड़ कर जाने के तीन मौके दिए जा रहे हैं. इनके जरिए तीन अलग-अलग उद्देश्यों को साधने की बात हो रही है. एक ही पाठ्यक्रम से इन तीन उद्देश्यों को पूरा करना असंभव है.’ वे आगे बताते हैं, ‘यह पाठ्यक्रम छात्रों को ग्राहक बनाने का प्रयास है. तीन साल के पाठ्यक्रम को चार साल में बदलना और विषय-वस्तु को कमजोर कर देना, यह सिर्फ शिक्षा के व्यापारीकरण के लिए किया जा रहा है.’
कई छात्रों और शिक्षकों ने मिलकर ’सेव दिल्ली यूनिवर्सिटी कैम्पेन’ भी शुरू किया था. फोटो: विकास कुमार
एफवाईयूपी का समर्थन कर रहे लोगों द्वारा अंबेडकर विश्वविद्यालय का जिक्र कई बार किया जाता है. वे लोग सवाल करते हैं कि दिल्ली में ही स्थित अंबेडकर विश्वविद्यालय भी चार साल में ही स्नातक की डिग्री दे रहा है तो ऐसे में सिर्फ डीयू को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है. इसके जवाब में प्रोफेसर राजीव बताते हैं, ‘एफवाईयूपी और अंबेडकर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में जमीन-आसमान का अंतर है. वहां एफवाईयूपी की तरह कभी भी पढ़ाई छोड़ने का प्रावधान नहीं है. साथ ही अंबेडकर विश्वविद्यालय तीन साल में ही ऑनर्स की डिग्री देता है. चार साल में तो वहां छात्रों को दो विषयों में ऑनर्स की डिग्री मिल रही है. इसमें कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन एफवाईयूपी में ऐसा कुछ भी नहीं है. उल्टा यहां सिर्फ ज्यादा नंबर बांटकर बेहतर परिणाम दर्शाने का प्रयास किया जाता है.’
एफवाईयूपी में छात्रों का मूल्यांकन भी एक समस्या बन रहा था. छात्रा अंशु पंडित बताती हैं, ‘कई लोग तो सिर्फ इस वजह से ही एफवाईयूपी से खुश थे क्योंकि उन्हें अच्छे अंक मिल जाते थे. इस व्यवस्था में छात्रों के प्रदर्शन पर नहीं बल्कि शिक्षकों से उनके ताल-मेल के अनुसार अंक मिलते थे.’ सत्यवती कॉलेज के छात्र अनिमेश के अनुभव भी कुछ ऐसे ही हैं. वे बताते हैं, ‘क्वालिटी एजूकेशन एफवाईयूपी में पूरी तरह से गायब है. यहां सिर्फ नंबरों की बंदरबांट होती है. शिक्षक भी पढ़ाने से ज्यादा फाइलें बनाने और रिकॉर्ड रखने के काम में व्यस्त रहते हैं.’
एफवाईयूपी में शिक्षकों को कई तरह के गैर-शैक्षणिक कार्य भी करने पड़ रहे हैं. ऐसे में जिन शिक्षकों को पढ़ाने से ज्यादा अन्य काम करना पसंद है वे एफवाईयूपी का समर्थन कर रहे हैं. डीयू के एक शिक्षक इस संदर्भ में बताते हैं, ‘तीन ही तरह के लोग एफवाईयूपी के पक्ष में हैं. पहले वो जो कुलपति के नजदीकी या जी-हुजूरी वाले हैं. दूसरे वो जिन्हें पढ़ाने की बजाय क्लर्क वाले काम ज्यादा भाते हैं. इस तरह के काम में दैनिक भत्ते इत्यादि से भी कुछ पैसे बन जाते हैं. तीसरे वे जिनको एफवाईयूपी के कारण ही नौकरी मिली है. बहुत से कॉलेजों में फाउंडेशन कोर्स पढ़ाने के लिए शिक्षक नियुक्त किए गए हैं. एफवाईयूपी के साथ ही इनकी नौकरी भी समाप्त होनी है इसलिए वे इसके समर्थन में हैं.’
एफवाईयूपी में प्रथम वर्ष के छात्रों को लैपटॉप देने की भी व्यवस्था की गई थी. इसी के चलते डीयू ने पिछले साल 172 करोड़ रुपये के लैपटॉप खरीदे थे. यह राशि मूलतः उस बजट का हिस्सा थी जिससे डीयू में नए भवन, हॉस्टल और लैब बनाए जाने थे. एफवाईयूपी को लागू करने के लिए हड़बड़ी में इसी बजट को लैपटॉप खरीदने के लिए इस्तेमाल कर लिया गया. इस तरह की हड़बड़ी कदम-कदम पर एफवाईयूपी के साथ देखने को मिली है. इस व्यवस्था को लागू करने के लिए भी ऐसी ही हड़बड़ी की गई थी जिसके चलते कुलपति को तुगलक की उपाधि तक मिल गई. कई लोगों का यह भी मानना है कि एफवाईयूपी को यदि ज्यादा ध्यान देकर बनाया जाता और फिर सभी संबंधित पक्षों की सलाह से लागू किया जाता तो शायद यह सच में उच्च शिक्षा में सुधारों का एक बड़ा कदम हो सकता था.
लेकिन तुगलकी तरीके से लागू किए गए एफवाईयूपी के खिलाफ जनता ने दिल्ली के तुगलक मार्ग पर ही इतने प्रदर्शन किए कि आखिरकार इसका अंत भी तुगलक के अधिकतर फैसलों की ही तरह हुआ.