राजेंद्र यादव को समवप्त हंस का विशेषांक. सभी फोटोः पूजा सिंह
गत वर्ष अक्टूबर में हंस के पुनर्संस्थापक संपादक राजेंद्र यादव के निधन के बाद यह सवाल तमाम पाठकों-साहित्यकारों के मन में उठा था कि हंस का अब क्या होगा? क्या हंस चलती रहेगी और अगर चलती रहेगी तो उसके तेवर और कलेवर कहीं बदल तो नहीं जाएंगे? उनके निधन के तकरीबन आठ महीने बाद हमने हंस से जुड़े लोगों, साहित्यकारों तथा पाठकों से बात कर इन सवालों के जवाब तलाश करने की कोशिश की.
बात शुरू करते हैं एक उदाहरण से. वर्ष 1997-98 की बात है हिंदी साहित्य की दुनिया से परिचित हो रहा एक युवा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अपने एक मित्र के घर से हंस के 10-12 अंकों का एक बंडल पढ़ने के लिए ले जाता है. उसे यह देखकर आश्चर्य होता है कि हंस के सभी अंकों के संपादकीय फटे हुए हैं. कुछ अंकों से तो अन्य आलेख भी नदारद थे. यह हंस की वैचारिक हस्तक्षेप की ताकत का प्रतीक है. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा तक उसके संपादकीय एवं अन्य विचारोत्तेजक लेख तथा अन्य सामग्री काट कर संदर्भ के लिए रख लिया करते थे.
उस घटना को लंबा समय बीत चुका है. हंस के अंक ले जाने वाला वह किशोर अब हिंदी साहित्य जगत में कवि-कथाकार शशिभूषण के नाम से पहचाना जाता हैै. अपने जिस मित्र शैलेश के यहां से वे हंस के अंक ले गए थे वह अब प्रशासनिक अधिकारी हैं और मध्य प्रदेश में पदस्थ हैं. जब हमने शैलेश से हंस को लेकर उनके लगाव के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि राजेंद्र यादव के निधन के बाद वह हंस पढ़ना छोड़ चुके हैं. उनका मानना है कि पत्रिका ने अपनी वह धार खो दी है जो राजेंद्र जी के रहते पत्रिका में नजर आती थी.
शुक्रवार 11 जुलाई, 2014 की शाम तकरीबन 5 बजे जब हम पुरानी दिल्ली की पेचीदा गलियों से गुजरते हुए हंस कार्यालय की ओर जा रहे थे तो मन में तमाम सवाल थे. दरअसल हंस के पुर्नसंस्थापक राजेंद्र यादव के निधन के बाद यह पहला मौका था जब हम पत्रिका कार्यालय जा रहे थे. ऐसे में मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक ही था कि कार्यालय के भीतर क्या वही बेलौस कहकहेबाजी और बेफिक्र अड्डेबाजी देखने को मिलेगी या फिर राजेंद्र जी के साथ ही वह माहौल भी चला गया होगा.
अंदर जाने के पहले ही कहकहों की आश्वस्त करती आवाज सुनाई दे गई. बाहरी कमरे में हंस की व्यवस्थापक वीना उनियाल जहां हंस के 31 जुलाई को होने वाले सालाना जलसे और कथा कार्यशाला की तैयारी में व्यस्त थीं तो भीतर हंस की प्रबंध निदेशक (स्व. राजेंद्र यादव की बेटी) रचना यादव, संपादक संजय सहाय, कार्यकारी संपादक संगम पांडेय और लेखक अजय नावरिया इसी सिलसिले में चर्चा में लगे हुए थे.
हंस के वर्तमान संपादक संजय सहाय हैं जो महीने में 20 दिन गया में रहते हैं और बाकी 10 दिन दिल्ली में रहकर पत्रिका के लिए काम करते हैं. उनकी अनुपस्थिति में पत्रिका के संपादकीय दायित्वों का निर्वहन कार्यकारी संपादक संगम पांडेय निभाते हैं. संजय सहाय राजेंद्र जी के बिना निकल रहे हंस पर बहुत बेबाकी से कहते हैं कि हंस का तेवर और उसका कलेवर बरकरार रखने की पूरी कोशिश की जा रही है लेकिन राजेंद्र जी के लेखन की कमी को कोई दूसरा पूरा नहीं कर सकता. वह मुहावरेदार भाषा का इस्तेमाल करते हुए कहते हैं, ‘ हंस पत्रिका में राजेंद्र जी की जिम्मेदारी संभालना दरअसल उनके जूतों में घुसने के समान है जो कतई आसान काम नहीं.’ सहाय स्वीकार करते हैं कि राजेंद्र जी के निधन के बाद पत्रिका में उनकी संपादकीय कमी खलने की शिकायत तमाम पाठकों ने की लेकिन सौभाग्यवश पत्रिका की बिक्री पर इसका कोई बुरा असर नहीं पड़ा है.
संपादक संजय सहाय हंस में प्रकाशित होने वाली कहानियों के स्तर में गिरावट की बात तो स्वीकार करते हैं लेकिन वे यह कहना नहीं भूलते कि यह गिरावट समूचे कहानी क्षेत्र में है. जब अच्छी कहानियां लिखी ही नहीं जा रही हैं तो फिर हंस में ही क्या वे किसी भी अन्य पत्रिका में नहीं नजर आएंगी.
युवा साहित्यकार शशिभूषण का साफतौर पर यह मानना है कि राजेंद्र यादव के निधन के बाद हंस के पाठकों को न केवल उनके धारदार संपादकीय की कमी खलती है बल्कि उनको अब आलेखों तथा स्तंभों में भी उतनी विचारोत्तेजक सामग्री पढ़ने को नहीं मिलती. जितनी उनके जीवनकाल में मिलती थी. वे अफसोस जताते हुए कहते हैं कि पिछले आठ महीनों में उन्होंने हंस का हर अंक लिया है लेकिन उनको कोई उल्लेखनीय सामग्री याद नहीं आती है.
राजेंद्र यादव हंस के संचालन की मौजूदा रूपरेखा को बहुत पहले तय कर चुके थे. हंस का संचालन उनके जीवन की सबसे बड़ी चिंता थी. उनके निधन के तकरीबन एक साल पहले से ही संजय सहाय और रचना यादव का नाम पत्रिका के संयुक्त संपादक के रूप में जाने लगा था. तमाम उम्र विवादों का रिश्ता रखने वाले राजेंद्र यादव का विवादों से नाता उनकी मृत्यु के बाद भी नहीं टूटा. उनपर यह आरोप लगाया गया कि तमाम उम्र पितृसत्ता का विरोध करने वाले राजेंद्र यादव ने अंतत: हंस पत्रिका में अपनी पुत्री को बड़ा और जिम्मेदारी भरा पद सौंपकर परिवारवाद को ही बढ़ावा दिया.
हंस के बारे में आगे बात करने के पहले हमें इसके अतीत से भी थोड़ा परिचित होना होगा. हंस की स्थापना मुंशी प्रेमचंद ने सन 1930 में की थी. यह अपने समय की अत्यंत महत्वपूर्ण पत्रिका थी जिसके संपादक मंडल में एक वक्त महात्मा गांधी भी शामिल थे. प्रेमचंद की मौत के बाद उनके बेटे अमृतराय ने कुछ वर्ष तक पत्रिका निकाली और फिर यह बंद हो गई.
31 जुलाई, 1986 को मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन के दिन राजेंद्र यादव ने हंस का पुन: प्रकाशन आरंभ किया. अपने निधन तक वे इस पत्रिका का लगातार 325 अंकों का संपादन संभाल चुके थे. उस दौर में हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं को लेकर माहौल यह बनाया जा रहा था कि हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का भविष्य ठीक नहीं है. इसके लिए सारिका और धर्मयुग जैसी पत्रिकाओं के अंत को उदाहरण के रूप में पेश किया जा रहा था. लेकिन हंस चल निकली बल्कि यह कहना उचित होगा कि हंस ने उड़ान भरी. हिंदी की साहित्यिक पत्रिका के लिए 10,000 की प्रसार संख्या सम्मानजनक मानी जा सकती है. पिछली पीढ़ी के हिंदी कथाकारों की बात करें तो हंस ने ही उनकी प्रतिभा को पहचाना और दुनिया के सामने रखा. इनमें उदय प्रकाश, शिवमूर्ति और अखिलेश समेत तमाम कथाकार शामिल हैं.
राजेंद्र यादव के संपादक बनने के बाद हंस का पहला अंक
इतना ही नहीं हंस ने हिंदी साहित्य में धारदार विमर्श की परंपरा शुरू की. इनमें दलित और स्त्री विमर्श प्रमुख हैं. हालांकि इन विमर्शों ने हंस और राजेंद्र यादव को लगातार विवादों के घेरे में बनाए रखा. कई लोग तो इसे चर्चा में बने रहने का हथकंडा तक कहने से नहीं चूकते.
कथाकार सत्यनारायण पटेल से जब राजेंद्र यादव के पहले और उनके बाद के हंस के विषय में उनकी राय पूछी तो उनका कहना था, ‘ हंस हमेशा से गंभीर और चेतना परक सामग्री के बजाय उथली और अश्लील सामग्री पाठकों के सामने परोसती रही है. वह एक संपादक के रूप में भी राजेंद्र यादव पर कुछ गंभीर इल्जाम लगाते हैं. पटेल कहते हैं, ‘ राजेंद्र यादव लेखन में अपने समकालीन शैलेश मटियानी, मोहन राकेश या कमलेश्वर के समक्ष कहीं नहीं थे. वे मन्नू जी के लेखन के सामने भी बौने थे. वे अपने लेखन की सीमाएं जानते थे और यही वजह थी कि उन्होंने बतौर संपादक हंस का दामन थाम लिया. अगर वे हंस के संपादक न होते तो बतौर लेखक लोग उनको उनके जीवनकाल में ही भुला चुके होते. हंस में छपने वालों में वही स्त्रियां शामिल थीं जो किसी न किसी रूप में पत्रिका को आर्थिक मदद कर सकती थीं या फिर ऐसे लेखक जो निजी तौर पर उनकी चाटुकारिता किया करते थे. हालांकि लाख कमियों के बावजूद वह हंस में अच्छी और बुरी सामग्री प्रकाशित कर एक संतुलन कायम रखते थे लेकिन उनके निधन के बाद वाले अंक मुझे बहुत खराब लगे.’
राजेंद्र यादव के साथ 10 साल तक हंस के संपादन में सहयोग करने वाले बया के संपादक एवं अंतिका प्रकाशन के प्रबंधक गौरीनाथ हंस के तेवर में आए बदलाव को स्वीकार करते हैं लेकिन वह साथ ही यह भी जोड़ते हैं कि हर पत्रिका के संपादक का अपना नजरिया, अपनी पसंद होती है. वह उसी के अनुरूप सामग्री का संकलन करता है. ऐसे में निजी तौर पर सामग्री किसी व्यक्ति को पसंद या नापसंद हो सकती है लेकिन यह सोचना ठीक नहीं है कि पत्रिका में ठीक वैसी ही सामग्री प्रकाशित होती रहेगी जैसी राजेंद्र यादव के दौर में छपती थी.
गौरीनाथ यह भी कहते हैं कि राजेंद्र यादव के निधन के तत्काल बाद उन पर आधारित जो अंक पत्रिका ने निकाला था वह निराश करने वाला था. राजेंद्र यादव पर इससे कहीं बेहतर सामग्री प्रकाशित की जा सकती थी.
हंस का विस्तार करना प्राथमिकता
हंस की प्रबंध निदेशक रचना यादव से बातचीत .
हंस से अपने जुड़ाव के बारे में कुछ बताइए?
हंस से जुड़ने का फैसला पूरी तरह भावनात्मक था. पापा के जाने के काफी पहले से उन्होंने मुझे यह कहना शुरू कर दिया था कि मैं हंस के प्रबंधन का काम देखना शुरू कर दूं. वह मुझे कार्यालय आने को कहते थे लेकिन मैं उनसे कहती कि मेरी लाइन अलग है. मेरा अपना करियर है. उन्होंने कभी जोर जबरदस्ती नहीं की लेकिन वह यह जरूर कहते थे कि जब मैं नहीं रहूंगा तो तुम खुद देखोगी कि क्या करना है.
उनके निधन के बाद यह ख्याल आया कि हंस शायद बंद हो जाए?
कभी नहीं. देखिए आप कह रही हैं तो मुझे लग रहा है कि पाठकों के मन में यह सवाल भी आया होगा. लेकिन हमारे मन में ऐसा कोई सवाल नहीं आया. पापा का निधन पिछले साल 28 अक्टूबर को हुआ और एक नवंबर को हम सब लोग यहां हंस कार्यालय में आगे की योजना बना रहे थे.
फिलहाल पत्रिका में आपकी क्या भूमिका है?
मैं अब यहां प्रबंध निदेशक की जिम्मेदारी संभाल रही हूं. मेरी भूमिका अब पत्रिका के लिए विज्ञापन तथा अन्य वित्तीय संसाधन जुटाना तथा इसके विस्तार की कोशिश करना है. मेरा काम यह सुनिश्चित करना है हंस पहले की तरह निकलती रहे. उसमें कोई अड़चन न आए.
पत्रिका के विस्तार की क्या योजना है?
फिलहाल पत्रिका का सर्कुलेशन करीब 10,000 है. पापा के देहांत के बाद आशंका थी कि इसमें कुछ कमी आ सकती है लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. बल्कि सर्कुलेशन में दो चार सौ का इजाफा ही हुआ है. पश्चिमी भारत में हम इसका विस्तार करना चाहते हैं. नए एजेंट बनाने की कोशिश कर रहे हैं. पापा, बहुत इधर-उधर जा नहीं पाते थे. लेकिन मैं इसका विस्तार करना चाहती हूं. इस साल हम जो दो दिवसीय कथा कार्यशाला कर रहे हैं उसे भविष्य में हम तीन चार दिनों के लिटरेरी फेस्टिवल में तब्दील करना चाहते हैं. हमारी यह भी कोशिश है कि आगे चलकर अपने लेखकों को समुचित पारिश्रमिक दे सकें.
हंस से जुड़ने के बाद किसी तरह का दबाव महसूस करती हैं?
हां, समय का दबाव महसूस करती हूं. मुझे अपनी दोनों जिंदगियों में तालमेल बैठाने में बहुत मशक्कत करनी पड़ रही है. मैं पेशे से कथक नृत्यांगना हूं. गुड़गांव में मेरा प्रशिक्षण संस्थान है जहां 50 बच्चे प्रशिक्षण लेते हैं. मेरा अपना रियाज है. अब मैं उसी वक्त में कटौती करके हर सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को हंस कार्यालय आती हूं.
पत्रिका में प्रकाशित होने वाली सामग्री में आपका कितना दखल है?
न के बराबर. वह सारा काम संगम पांडेय जी और संजय सहाय जी के जिम्मे है. किसी सामग्री को लेकर बहुत संदेह होने पर ही संगम जी उसे मुझे पढ़ने के लिए देते हैं. हां, एकदूसरे को सुझाव देने का काम बराबर चलता रहता है.
साल 2007 में एमटीवी रोडीज के पांचवें सीजन में सहारनपुर, उत्तर प्रदेश के आशुतोष कौशिक ने अपनी बेबाकी और देसी ठसक से सबका दिल जीत लिया था. उन्होंने पांचवां सीजन जीतकर न सिर्फ तारीफें बटोरीं बल्कि लगे हाथ 2008 में आए बिग बॉस के दूसरे सीजन में भी जगह बना ली थी.
कह सकते हैं कि आशुतोष का वक्त अच्छा चल रहा था इसलिए उनके घर में बिग बॉस की ट्रॉफी भी सज गई. इतने नाम और शोहरत के बाद उनके फिल्मों में आने की खबरें भी आने लग गईं. बिग बॉस जीतने के कुछ महीनों बाद तक उन्हें किसी स्टार से कम नहीं समझा जाता रहा. कुछ लोगों ने इस उभरते हुए नाम से उम्मीदें बांध ली थीं तो कुछ की जबान पर यह जुमला था कि सब टाइम की बात है.
खैर शायद वक्त-वक्त की ही बात होती है. इसलिए महज सात साल पहले जिस शख्स ने तूफानी एंट्री ली थी वह अब सुर्खियों और मीडिया से आंधी की तरह गायब भी हो गया. दूध के उस उफान की तरह जिसके उठने और बैठने में एक जैसा वक्त लगता है.
कभी एक ढाबा चलाने वाले (वैसे ढाबा आज भी चालू है) और ब्याज पर पैसा चलाने वाले सहारनपुर से आए, एकदम देसी अंदाज वाले आशुतोष ने शायद ही सोचा था कि वह इतने कम समय में इस कदर ऊंचाई पर पहुंच पाएंगे और एक के बाद एक शोहरत की सीढ़ियां चढ़ते जाएंगे. लेकिन किस्मत ने उनका ऐसा साथ दिया कि वे अपने सुनहरे भविष्य के ख्वाब बुनने से खुद को रोक नहीं पाए . उनकी फिल्मों में एंट्री की बातें भी जोर पकड़ने लगी. कुल मिलाकर आशुतोष ने मीडिया मंडी से और मीडिया मंडी ने आशुतोष से सपनों का साझा कर लिया था. लेकिन अफसोस कि आशुतोष जितनी तेजी से अर्श पर पहुंचे उससे दोगुनी गति से उनकी यादें लोगों के जेहन से और खबरों की दुनिया से धुंधली होती गई. कल तक जिसमें एक भविष्य का स्टार देखा जा रहा था आज उसका नाम लेने पर लोगों के जेहन में उसकी तस्वीर बना पाना भी मुश्किल हो गया है.
यू ट्यूब पर रोडीज या बिग बॉस के पुराने सीजन खंगालने के दौरान आशुतोष के दिखाई देते ही यकायक मन में सवाल आता है – यह चेहरा अचानक कहां गायब हो गया?
एक वक्त आशुतोष को अपना आदर्श मानने वाले युवाओं में से पता नहीं कितने जानते हैं कि हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने ही शहर सहारनपुर से जय महाभारत नाम की पार्टी के लिए चुनाव भी लड़ा लेकिन वहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा. जिस स्टारडम की बदौलत वे छाए रहते थे वह जादू भी कुछ कमाल नहीं कर सका. अक्सर कहा जाता है कि सफलता मिलने के बाद दिमाग सातवें आसमान पर पहुंच जाता है. जो सफलता पचा नहीं पाते हैं, उनका यही हश्र होता है लेकिन आशुतोष का मामला इससे बिलकुल अलग था. उनके लिए तो बस यही कहा जा सकता है कि उन्होंने अभी सफलता के पकवान को अपनी किस्मत की थाली में परोसा हुआ ही देखा था और अभी उसकी खुशबू ही ले रहे थे कि उन्हें खुद भी नहीं मालूम चल सका कि कब और कैसे उन्हें लगातार मिलने वाले ऑफर, उनके बारे में की जाने वाली चर्चा यकायक खत्म हो गई.
रोडीज के बाद भी वह अच्छा जा रहा था. लेकिन बिग बॉस जीतने के बाद राह भटक गया. शायद उसे जमाने की हवा लग गई
हालांकि इस बीच आशुतोष ने कुछ फिल्मों में अपनी किस्मत भी आजमाई. साल 2013 में संजय दत्त अभिनीत फिल्म ‘जिला गाजियाबाद’ के अलावा ‘भड़ास’ और ‘रघु रोमियो’ में आशुतोष नजर आए थे लेकिन इन फिल्मों में उनकी उपस्थिति की चर्चा न के बराबर ही रही. छोटे पर्दे पर आशुतोष, कॉमेडी सर्कस में जोर आजमाइश करते दिखाई दिए लेकिन दर्शकों के दिल को बहुत ज्यादा नहीं छू पाए.
वैसे एक बार जिसे सुर्खियों में बने रहने का चस्का लग जाता है, वह खबरों में बने रहने का इंतजाम भी कर ही लेता है. आशुतोष के बारे में भी गाहे-बगाहे मीडिया में कुछ ना कुछ पढ़ने और सुनने को मिल जाता है. हालांकि अब उनका जिक्र गलत वजहों से ज्यादा होता है. 2013 में कथित तौर पर मुंबई के एक रेस्त्रां के बाहर आशुतोष ने नशे की हालत में कुछ लोगों से झगड़ा मोल लिया था. आशुतोष का कहना था कि उन पर कुछ लोगों ने हमला किया था जिसके बाद यह हंगामा शुरू हुआ. इसके अलावा पिछले साल ही उन पर नशे की हालत में दिल्ली एयरपोर्ट पर शोर शराबा करने का आरोप भी लगा था.
एमटीवी रोडीज 5 के ऑडिशन के दौरान चैनल के वाइस प्रेजिडेंट (क्रिएटिव एंड कंटेंट) वैभव विशाल थे जिनकी नजर सबसे पहले आशुतोष पर पड़ी थी. तहलका से हुई बातचीत में वैभव बताते हैं, ‘आशुतोष को ऑडिशन में तीन जगह से रिजेक्ट कर दिया गया था लेकिन फिर ग्रुप डिस्कशन के दौरान मुझे आशु में कुछ बात नजर आई. रोडीज के बाद भी वह अच्छा जा रहा था. लेकिन बिग बॉस जीतने के बाद राह भटक गया. शायद उसे जमाने की हवा लग गई.’
टीवी इंडस्ट्री को बहुत करीब से जानने वाले वैभव मानते हैं कि रिएलटी शो में काम करने के बाद आशुतोष जैसी हालत कई प्रतिभागियों की हो जाती है. हालात ये हो जाते हैं कि शो खत्म होने के बाद ये प्रतियोगी अपनी जिंदगी को रिएलटी शो का ही एक ऐपिसोड समझने लगते हैं और इन्हें लगने लगता है कि अभी-भी चौबीस घंटे इनके ऊपर कैमरे लगे हुए हैं जो इनकी किसी न किसी हरकत को सुर्खियों में लाने का काम कर ही देंगे.
‘शो के बाहर निकलते ही जो समझ गया कि यह सब मिथ्या है वह तो टिक जाता है लेकिन जो बाहर की दुनिया के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाता, वह पगलाने लग जाता है’
यही नहीं, रिएलटी शो में भाग लेने वाले इन ज्यादातर लोगों के पास टैलेंट के नाम पर कुछ नहीं होता. इन्हें तो बस अपना ही किरदार निभाना होता है और इनकी खूबियां, इनकी खामियां, इनका अनोखापन ही होता है जिसे टीवी शो पर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है. इसे दर्शक पसंद भी करते हैं और रिएलटी टीवी स्टार्स को नाम और शोहरत भी हासिल होती है लेकिन असली खेल, शो खत्म होने के बाद शुरू होता है.
वैभव मानते हैं, ‘शो के बाहर निकलते ही जो समझ गया कि ये सब मिथ्या है वह तो टिक जाता है लेकिन जो बाहर की दुनिया के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाता, वह पगलाने लग जाता है. लगातार खबरों में बने रहने की चाहत में आशुतोष जैसे कई रिएलटी स्टार्स से मेहनत कम और गलतियां ज्यादा हो जाती हैं.’
खैर, इसे कहानी का अंत कहना सही नहीं होगा. दूसरी पारी नाम की भी चीज होती है. देखते हैं कि आशुतोष जितनी आसानी से ब्रेकिंग न्यूज का
हिस्सा बन गये थे, क्या वे उतनी ही सहजता से अपने करियर के ब्रेक को हटा पाएंगे ?
बात 1967 की है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एक छात्र एलएलबी के अंतिम वर्ष की परीक्षा दे रहा था. इस छात्र का परिवार शहर के सबसे प्रभावशाली घरानों में से था. दादा श्री कैलाश नाथ काटजू मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और दो विभिन्न राज्यों के राज्यपाल रह चुके थे. केंद्र सरकार में भी वे पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में कानून मंत्री का पद संभालने के साथ-साथ केंद्रीय गृहमंत्री एवं रक्षामंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएं दे चुके थे. इस छात्र के पिता उस वक्त इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायाधीश थे. अब इस छात्र को अपने परिवार में तीसरी पीढ़ी का वकील बनना था. अंतिम वर्ष की परीक्षाओं में इस छात्र ने पूरे विश्वविद्यालय में सर्वोच्च अंक हासिल करके वकालत की डिग्री हासिल की. अपनी पारिवारिक विरासत संभालने की योग्यता अब यह युवा हासिल कर चुका था. लेकिन इसकी इच्छा वकालत करने की नहीं बल्कि समाज के लिए कुछ सार्थक करने की थी. अपनी इसी इच्छा के चलते इस युवक ने एक शिक्षक बनने की सोची और मामूली-से वेतन पर एक गांव में जाकर बच्चों को पढ़ाने लगा. एक इतने प्रभावशाली परिवार के इस युवा ने जब अपनी विरासत को छोड़ कर शिक्षक बनने का फैसला लिया होगा तो शायद खुद उसने भी नहीं सोचा होगा कि भविष्य में उसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश और भारतीय प्रेस परिषद का अध्यक्ष बनना है.
जस्टिस मार्कंडेय काटजू के जीवन का यह पहलू शायद आपके लिए नया हो लेकिन उनका नाम तो आप निश्चित ही कई बार और शायद रोज ही सुनते होंगे. आज यदि टीवी, अखबार, रेडियो, इंटरनेट या किसी भी अन्य माध्यम से सूचनाएं आप तक पहुंच रही हैं तो जस्टिस काटजू भी जरूर आप तक लगातार पहुंच रहे होंगे. वैसे तो सर्वोच्च न्यायालय से अब तक सैकड़ों न्यायाधीश रिटायर हो चुके हैं और उनमें से कुछ भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष भी रह चुके हैं लेकिन आपने शायद उनका नाम भी न सुना हो. लेकिन देश में रहते हुए भी यदि आपने जस्टिस काटजू का नाम नहीं सुना तो यकीन मानिए आप सूचनाओं के इस दौर में कहीं बहुत पीछे छूट चुके हैं.
जस्टिस काटजू आज एक ऐसा नाम बन चुके हैं जिनके पास हर मुद्दे पर बोलने को बहुत कुछ है. कभी आप उनके बयानों से सहमत हो सकते हैं तो कभी वे आपको नाराज भी कर सकते हैं. लेकिन किसी भी मुद्दे पर उनके बयानों से आप अछूते नहीं रह सकते. उनके बारे में अलग-अलग लोगों की राय भी अलग-अलग ही है. काफी हद तक यह भी संभव है कि आप उनके बारे में एक राय कभी बना भी न पाएं क्योंकि जब तक आप उनके एक बयान का विश्लेषण करके उसको समझने की कोशिश करें, उनका कोई और बयान आपकी अब तक की समझ को बिल्कुल पलट कर रख सकता है. वैसे जस्टिस काटजू खुद भी इस बात को जानते हैं कि लोग उनको समझ नहीं पा रहे हैं और उनके बारे में अलग-अलग राय रखते हैं. इसलिए गुजरे साल के अंत में उन्होंने खुद ही अपने बारे में समझाते हुए अपने ब्लॉग पर लिखा, ‘मुझे कई तरीकों से वर्णित किया गया है जैसे कि एक सनकी, पागल, आवारा, जंगली, प्रचार का भूखा और यहां तक कि एक कुत्ता (एक मुख्यमंत्री द्वारा) जो दुनिया के हर मुद्दे पर टिप्पणी करता है. लेकिन मैं सच में कौन हूं? मैं किसके लिए बोलता हूं? चूंकि नया साल आ रहा है इसलिए मुझे लगता है कि मेरे विचारों के स्पष्टीकरण का भी यह सही समय है… मैं बताना चाहता हूं कि मेरे विचार तर्कसंगत, स्पष्ट और एकमात्र उद्देश्य के प्रति केंद्रित हैं और वह उद्देश्य है मेरे देश की समृद्धि और उसके नागरिकों को एक सभ्य जीवन देने में मदद करना.’
ऐसा नहीं है कि प्रेस परिषद का अध्यक्ष बनने के बाद ही जस्टिस काटजू ने अपनी बेबाक राय देना शुरू किया हो. एक न्यायाधीश रहते हुए भी वे कई ऐसे ऐतिहासिक फैसले दे चुके हैं जो सारे देश में चर्चा का विषय बने. जैसा कि जस्टिस काटजू ने अपने ब्लॉग में लिखा है, ‘कई लोग कहते हैं कि जस्टिस काटजू को चर्चाओं में बने रहना आता है और वे कई सालों से ऐसा करते आ रहे हैं. लेकिन उनको नजदीक से जानने वाले सभी लोग यह मानते हैं कि वे चर्चा में रहने के लिए कुछ भी नहीं करते बल्कि उनमें कई ऐसी बातें हैं जो उन्हें बाकी सबसे अलग करती हैं., जस्टिस काटजू के साथ वकालत की पढ़ाई करने वाले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता टीपी सिंह बताते हैं, ‘जस्टिस काटजू छात्र जीवन से ही सामाजिक मुद्दों को लेकर बेहद संवेदनशील थे. वकालत करने के बाद, इतने संपन्न परिवार से होने के बावजूद वे गांव में बच्चों को पढ़ाते थे. वे एक छोटे-से कमरे में अकेले रहते थे और अपना खाना खुद ही बनाते थे. यह बात अधिकतर लोगों को मालूम भी नहीं है. तो ऐसा नहीं है कि वे चर्चा में रहने के लिए ही सबकुछ करते हों.’ जस्टिस काटजू के साथ वकालत कर चुके एक अन्य अधिवक्ता बताते हैं कि वे हमेशा ही समाज के लिए कुछ करना चाहते थे और इसका रास्ता भी वे खुद ही तैयार करना चाहते थे. इलाहाबाद उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष वीएस सिंह बताते हैं, ‘उनका मानना था कि मुझे अपने पिता जी के रास्ते पर नहीं चलना बल्कि एक शिक्षक के तौर पर सामाजिक हितों के लिए काम करना है. कुछ समय बाद उन्होंने महसूस किया कि वकालत के माध्यम से समाज की ज्यादा बेहतर सेवा की जा सकती है तो उन्होंने वकालत शुरू कर दी. वकील रहते हुए भी वे अक्सर कहते थे कि मुझे जब भी मौका मिलेगा मैं अपने स्तर से लोगों के लिए काम करूंगा. जज बनने के बाद उन्होंने कई ऐतिहासिक फैसले देकर अपनी बात को साबित भी किया.’
‘वे अक्सर सड़क किनारे आम लोगों के साथ आग तापने बैठ जाया करते थे और लोगों को पता भी नहीं चलता था कि ये आदमी हाई कोर्ट के जज हैं’
जस्टिस काटजू के बारे में एक सवाल जो शायद सभी के मन में आता होगा वह है कि आखिर वे चाहते क्या हैं. काटजू 40 साल से ज्यादा लबें समय से कानून के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं और यदि उनके न्यायिक कार्यकाल में दिए गए फैसलों और बयानों के आधार पर आप उनको समझना चाहें तो उनके कई रूप आपके सामने आएंगे. कभी वे आपको प्रगतिशील लग सकते हैं, तो कभी रूढ़िवादी, कभी शांत और सौम्य तो कभी जोशीले और मुंहफट. वरिष्ठ अधिवक्ता वीएस सिंह जस्टिस काटजू द्वारा दिए गए एक फैसले के बारे में बताते हैं, ‘आज से लगभग 20-22 साल पहले मेरा एक मुकदमा जस्टिस काटजू की कोर्ट में लगा था. मामला प्रेम विवाह का था. एक लड़का और लड़की घर से भाग गए थे और शादी करना चाहते थे. उस दौरान घर से भागकर शादी करना बहुत ही असामान्य बात थी. हमारा समाज बिल्कुल भी इस बात की इजाजत नहीं देता था. लड़के वाले भी दहेज के लालच में ऐसा नहीं होने देते थे. लेकिन जस्टिस काटजू ने मेरे मुवक्किलों को पूरा संरक्षण देते हुए कहा कि यदि दोनों बालिग हैं तो कोई उन्हें शादी करने से नहीं रोक सकता.’ अधिवक्ता सिंह आगे बताते हैं, ‘महिला अधिकारों और मानवाधिकारों पर आज तो कई कार्यक्रम हो रहे हैं लेकिन जस्टिस काटजू इन बातों को कई साल पहले से करते आ रहे हैं. वे हमेशा से ही दूरदर्शी रहे हैं और उन्होंने समय से आगे की बात कही है.’ इन बातों से आप जस्टिस काटजू में प्रगतिशील व्यक्ति की छवि देख सकते हैं.
एक जज रहते हुए उनके व्यवहार से भी यदि आप उनको समझना चाहें तो उनके साथी टीपी सिंह की बातें आपके लिए काफी दिलचस्प साबित हो सकती हैं. वे बताते हैं, ‘जस्टिस काटजू हमेशा से ही आम आदमी के जज रहे हैं. जज रहते हुए वे जब सुबह टहलने निकलते थे तो सड़क पर बैठे लोगों की बात सुनते थे. कभी सड़क किनारे आग ताप रहे लोगों के साथ ही बैठ जाया करते थे. लोगों को पता भी नहीं होता था कि वे एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हैं. इस तरह से वे अपने देश के हालात एक आम आदमी की नजरों से देखने को हमेशा तैयार रहते थे.’
जस्टिस काटजू को यदि आप उनके हाल के दिनों में दिए गए साक्षात्कारों से समझने की कोशिश करें तो आपको लगेगा कि वे अक्सर सामने वाले को डांट दिया करते हैं. पिछले दिनों जाने-माने टीवी पत्रकार दीपक चौरसिया पर जिस तरह से वे बिफरे और साक्षात्कार बीच में रोककर जिस तरह उन्होंने चौरसिया को गेट आउट तक कह डाला, यह देखकर किसी को भी लग सकता है कि गुस्सा शायद हर वक्त जस्टिस काटजू की नाक पर सवार रहता है. वैसे उनकी यह आदत काफी पुरानी है और शायद आज भी वे अपने न्यायाधीश वाले रोब से बाहर नहीं आ पा रहे हैं. उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के उपाध्यक्ष इंद्र कुमार चतुर्वेदी बताते हैं, ‘सुनवाई के दौरान वे कई बार वकीलों को यह तक कह डालते थे कि वकालत नहीं होती तो जाकर पकोड़ियां बेचो. लेकिन उनका गुस्सा बेवजह नहीं होता था. वे पूरी तैयारी से अपनी अदालत में आते थे. कानून पर उनकी समझ और ज्ञान का भी कोई मुकाबला नहीं है. ऐसे में अगर कोई वकील बिना तैयारी के उनके सामने पहुंच जाए और उनके सवालों का सही जवाब न दे पाए तभी वे गुस्सा करते थे.’ चतुर्वेदी जी आगे बताते हैं, ‘लेकिन वे दिल के बहुत ही भले हैं. कोर्ट के बाद वकीलों को अपने पास बुलाकर माफी भी मांग लिया करते थे. इलाहाबाद के वकील तो उनकी इस आदत से परिचित थे, इसलिए उनके डांटने का कोई बुरा भी नहीं मानता था. सभी वकील उनका बहुत सम्मान करते हैं.’
‘अक्सर पत्रकार काटजू की अदालत में आकर बैठ जाते थे कि न जाने कब वे कुछ बोल जाएं और उन्हें अगले दिन की हेडलाइन मिल जाए’
वैसे जस्टिस काटजू के जीवन की कई बातें आपको यह भी आभास कराती हैं कि वे जनता के प्रति बहुत ही नम्र हैं. 2005 में मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रहते हुए जब उन्होंने न्यायालय की अवमानना से संबंधित एक बयान दिया तो सारे देश में उनकी खूब वाहवाही हुई. उन्होंने एक आयोजन में कहा, ‘गणतंत्र की मूल भावना है कि यहां जनता सर्वोपरि होती है. जज, नेता, मंत्री, अफसर सभी जनता के सेवक हैं. हमें जनता का सेवक होने पर गर्व होना चाहिए. चूंकि जनता हमारी मालिक है, इसलिए उन्हें यह भी अधिकार है कि अगर हम अच्छा काम नहीं करें तो वह हमारी निंदा कर सकती है. हमें ऐसी निंदा से नाराज नहीं होना चाहिए. हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारी शक्तियां जनता के विश्वास पर ही टिकी हैं, न्यायालय की अवमानना के दोष में सजा देने के अधिकार पर नहीं.’ जस्टिस काटजू के इस बयान की जमकर प्रशंसा हुई. मशहूर कानूनविद फाली एस नरीमन ने उनके इस बयान के बाद एक लेख लिखा. अपने लेख में उन्होंने लिखा कि जस्टिस काटजू एक ऐसे न्यायाधीश हैं जो अवमानना के दायरों से कहीं ऊपर हैं. उन्होंने यह भी लिखा कि आज यदि शेक्सपियर जिंदा होते तो कहते, ‘एक सच्चा न्यायकर्ता अब न्याय करने आया है. हां, एक सच्चा न्यायकर्ता. ओ ज्ञानी न्यायाधीश, मैं किस तरह से तुम्हारा सत्कार करूं.’
जस्टिस काटजू के बारे में यह जानकर यदि आप उनकी छवि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में बना रहे हैं जो जनता के प्रति बहुत ही विनम्र हैं और जिसमें अपने पद को लेकर जरा भी अहंकार नहीं तो आपको उनका दूसरा पक्ष भी जानना जरूरी है. यह बात 2011 की है. जस्टिस काटजू अब सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश थे. किसी व्यक्ति ने सूचना के अधिकार के तहत सर्वोच्च न्यायालय से कुछ सूचना मांगी. सूचना का संबंध जस्टिस काटजू से भी था इसलिए सूचना अधिकारी ने उन्हें इस संबंध में एक पत्र लिखा. जस्टिस काटजू इस पत्र से इतना नाराज हुए कि उन्होंने सूचना के अधिकार पर ही लगाम लगाने की बात कह डाली. इस बारे में जस्टिस काटजू ने कहा, ‘सूचना अधिकारी मुझे पत्र लिखकर कहते हैं कि 24 घंटे के अंदर सूचना दें. मैं सूचना देने से इनकार नहीं कर रहा लेकिन यह कोई तरीका है? यह तो बेहूदापन है. मैं सुप्रीम कोर्ट का एक जज हूं. मुझसे कुछ पूछना है तो मेरे सेक्रेटरी से समय लो और जब मैं फुर्सत में रहूं तो आकर बात करो. मैं कोई चपरासी हूं क्या, जो मुझसे ऐसे पूछा जाए. इस सूचना के अधिकार ने सरकारी कर्मचारियों की नाक में दम कर दिया है. इस अधिकार को संशोधित करके इसे सीमित करने की जरूरत है.’ जो जस्टिस काटजू खुद को जनता का सेवक मानते हैं और इस बात पर गर्व भी करते हैं, वही सिर्फ एक सूचना मांगने पर आपको यह भी याद दिला देते हैं कि वे कोई चपरासी नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश हैं.
‘जस्टिस काटजू ने जो लिखा वह तथ्यों के आधार पर ही लिखा. और भारत का नागरिक होने के नाते यह उनका अधिकार है’
जस्टिस काटजू के व्यवहार में ऐसे विरोधाभास आपको कई बार नजर आते हैं. भ्रष्टाचार के विरोध में जब सारा देश अन्ना हजारे के नेतृत्व में सड़कों पर उतर आया था तो जस्टिस काटजू ने इसे सिरे से निरर्थक घोषित कर दिया. उनका मानना था कि अन्ना-अरविंद जैसे लोग सिर्फ मीडिया द्वारा बनाए गए हैं और इनकी कोई वैज्ञानिक सोच नहीं है. जस्टिस काटजू का कहना था, ‘आप सड़कों पर भारत माता की जय और वंदे मातरम जैसे नारों का शोर मचा लीजिए लेकिन इससे भ्रष्टाचार खत्म होने वाला नहीं है. मैंने जन लोकपाल कानून पढ़ा है. यह कानून भ्रष्टाचार को खत्म करने की जगह एक पल में ही दोगुना कर देगा.’ अपने इन बयानों के समर्थन में उन्होंने एक लेख भी लिखा और जन लोकपाल की अपने तरीकों से व्याख्या की. अन्ना आंदोलन की शेक्सपियर के शब्दों में व्याख्या करते हुए उन्होंने लिखा, ‘अ टेल टोल्ड बाई एन ईडियट, फुल ऑफ साउंड ऐंड फ्यूरी, सिग्नीफाइ नथिंग (एक बेवकूफ द्वारा कही गई ऐसी कहानी जिसमें सिर्फ शोर-शराबे के सिवा कुछ नहीं है).’ जो लोग यह मान रहे थे कि अन्ना आंदोलन में शामिल होने वाले लोग सिर्फ क्षणिक आवेश में आकर ऐसा कर रहे हैं, उन्होंने जस्टिस काटजू के इस बयान का समर्थन भी किया. उनके इस बयान से आप भी कुछ देर को यह मान सकते हैं कि जस्टिस काटजू अच्छे से सोच-समझकर चीजों का आकलन करने के बाद ही अपनी राय देते हैं. लेकिन आपकी इस सोच को भी जस्टिस काटजू ज्यादा देर टिकने नहीं देते. कोर्ट में निर्णय देते हुए वे कई बार ऐसे ही क्षणिक आवेश में बहुत कुछ बोल चुके हैं. विशेष तौर पर जब उन्होंने 2007 में एक मामले की सुनवाई के दौरान भ्रष्टाचारियों को सार्वजनिक रूप से फांसी देने को कहा था तो पूरे देश में यह चर्चा का विषय बन गया था. उन्होंने कहा था, ‘हर कोई इस देश को लूटना चाहता है. ऐसे भ्रष्ट लोगों को सार्वजनिक तौर पर बिजली के खंभों पर लटका कर फांसी दी जानी चाहिए. कानून हमें ऐसा करने की अनुमति नहीं देता वरना हम यही पसंद करते कि भ्रष्ट लोगों को फांसी दे दी जाए.’ ऐसे ही उदहारण उनके जीवन से तब भी मिलते हैं जब वे सर्वोच्च न्यायालय में रहते हुए सभी जिला एवं उच्च न्यायालयों को ऑनर किलिंग के मामलों में फांसी देने के निर्देश दे डालते हैं, या जब फर्जी एनकाउंटर में आरोपित पुलिस वालों को फांसी देने की बात करते हैं. जस्टिस काटजू का जोश में आकर ऐसे बयान देना इतना चर्चित हो चुका था कि सर्वोच्च न्यायालय के एक अधिवक्ता बताते हैं, ‘अक्सर पत्रकार उनकी अदालत में आकर बैठ जाते थे कि न जाने कब वे कुछ बोल जाएं और उन्हें अगले दिन की हेडलाइन मिल जाए. इसीलिए वे जज रहते हुए भी इतने चर्चित रहे हैं.’ ऐसे ही जोश में बोलने पर जस्टिस काटजू तब भी विवाद खड़ा कर चुके हैं जब सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहते हुए वे कोर्ट में बोल पड़े थे, ‘बीवी की हर बात सुना करो. यह समझने की कोशिश मत करो कि वह बात सही है या नहीं. बस उसे चुपचाप सुन लिया करो. हम सब भोगी हैं.’ लेकिन आपको यह भी बता दें कि उनके ऐसे बयानों के बीच भी उनकी बौद्धिकता की तारीफ हमेशा हुई है. इसीलिए उनके कोर्ट के किस्से अगर मनोरंजक हैं तो उनके फैसलों में बौद्धिकता की छौंक भी खूब देखने को मिलती है. भारत के अटॉर्नी जनरल जीई वाहनवती का उनके कोर्ट के बारे में कहना था, ‘जस्टिस काटजू के कोर्ट में एक पल भी सुस्ती भरा या मंद नहीं होता था.’
जस्टिस काटजू के बारे में कोई राय बनाना इसलिए भी मुश्किल हो जाता है कि विरोधाभास उनके जीवन के हर पहलू में आपको नजर आते हैं. जब वे उड़ीसा सरकार को फटकारते हुए कहते हैं, ‘यदि तुम अल्पसंख्यकों को संरक्षण नहीं दे सकते तो त्यागपत्र दे दो’, तो आपको यह महसूस होता है कि वे अल्पसंख्यकों के अधिकारों और उनके संरक्षण के प्रति बहुत ही समर्पित हैं. यही एहसास वे आपको तब भी करवाते हैं जब हज यात्रा के लिए दी जाने वाली सब्सिडी को असंवैधानिक घोषित करने की याचिका को वे ठुकरा देते हैं और फैसले में स्पष्ट करते हैं कि कैसे एक विशेष समूह को दी जाने वाली यह रियायत बिल्कुल संवैधानिक है. लेकिन धार्मिक अल्पसंख्यकों को संरक्षण देने वाले उनके व्यवहार पर तब आपको कुछ संदेह जरूर होता है जब वे मध्य प्रदेश के छात्र मोहम्मद सलीम की याचिका को खारिज कर देते हैं. मोहम्मद सलीम मध्य प्रदेश के निर्मला कॉन्वेंट हाई स्कूल का एक छात्र था. इस छात्र को स्कूल से इसलिए निकाल दिया गया था कि उसने अपनी दाढ़ी कटवाने से इनकार कर दिया था. स्कूल के इस फैसले के खिलाफ सलीम जस्टिस काटजू की अदालत में पहुंचा. जस्टिस काटजू ने उसकी याचिका को ठुकराते हुए कहा, ‘मुस्लिम छात्रों को दाढ़ी बढ़ाने की अनुमति हम नहीं दे सकते. ऐसा करने से देश का तालिबानीकरण होगा.’ इस बयान पर देश भर में विवाद हुआ. बाद में जस्टिस काटजू ने अपना यह फैसला वापस लेते हुए कहा कि हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का नहीं था.
विरोधाभासों का यह सिलसिला जस्टिस काटजू के वर्तमान कार्यकाल में दिए हाल के बयानों में भी दिखता है. एक तरफ वे सचिन तेंदुलकर के सौवें शतक और देव आनंद की मौत को टीवी पर ज्यादा समय दिए जाने का पुरजोर विरोध करते हैं तो दूसरी तरफ सन्नी लिओन के समर्थन में उतरते हुए भी नजर आते हैं. इन तमाम बातों के बाद भी आप एक बात तो उनके बारे में मान ही सकते हैं कि जस्टिस काटजू एक ऐसी लहर है जो हमेशा मुख्यधारा के विपरीत ही बहती है. जब सारा देश अन्ना हजारे के पीछे होता है तो वे इसके विपरीत बात करते हैं. जब दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार पर देश के युवा सड़कों पर लाठियां खाते हैं तो वे कहते हैं कि इनके लिए बलात्कार ही देश की सबसे बड़ी समस्या बन गई है, जबकि हकीकत कुछ और है. वे लगभग देश में चल रही हर बहस में शामिल हैं और कई बहस तो स्वयं उनसे ही शुरू होती हैं. उनके बयान अक्सर कोई न कोई विवाद खड़ा कर ही देते हैं. इस संदर्भ में वे अपनी सफाई देते हुए लिखते हैं, ‘मैं विवादों से दूर रहना चाहता हूं. लेकिन मेरी एक कमजोरी है कि मैं देश को गिरते हुए देखकर भी शांत नहीं रह सकता. भले ही बाकी लोग गूंगे और बहरे हों लेकिन मैं नहीं हूं. इसलिए मैं तो बोलूंगा. जैसा कि फैज़ साहब ने कहा है कि बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे, बोल कि जुबां अब तक तेरी है.’ हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है, सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यं अप्रियं. इसका मतलब है कि सत्य बोलो, प्रिय बोलो लेकिन अप्रिय सत्य मत बोलो. मैं इसमें कुछ बदलाव करना चाहता हूं. आज देश के हालात ऐसे हैं कि हमें कहना चाहिए ब्रूयात सत्यं अप्रियं मतलब अप्रिय सत्य भी बोलो.’ और यह व्याख्या करते हुए उन्होंने एक ऐसा ही ‘अप्रिय सत्य’ बोल डाला कि 90 प्रतिशत भारतीय मूर्ख हैं. इस बयान के साथ ही जस्टिस काटजू एक बार फिर से देश भर में चर्चा का विषय बन गए. बल्कि इस बार तो लखनऊ के दो छात्रों ने उन्हें इस बयान के लिए कानूनी नोटिस भी भेज दिया. जस्टिस काटजू ने फिर सफाई देते हुए बताया कि किस आधार पर वे 90 प्रतिशत भारतीयों को मूर्ख बता रहे हैं .
‘अध्यक्ष बनने के बाद जस्टिस काटजू ने प्रेस परिषद को एक जुबान दे दी. आज से पहले कितने लोग होंगे जो प्रेस परिषद के बारे में जानते थे’
जस्टिस काटजू के बयानों से आप चाहें तो लखनऊ के छात्रों की तरह नाराज हो सकते हैं या फिर आप भी उन 90 प्रतिशत भारतीयों में शामिल हो सकते हैं जिन्होंने खुद को जस्टिस काटजू के 10 प्रतिशत समझदार लोगों में मानते हुए विवाद को शांत होने दिया. जस्टिस काटजू के ऐसे बयानों के बारे में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रवीण पारिख बताते हैं, ‘जस्टिस काटजू बहुत ज्यादा बोलते हैं. अब जो व्यक्ति इतना ज्यादा बोलेगा वह विवाद तो पैदा करेगा ही. वैसे वे बहुत ही ज्ञानी व्यक्ति हैं और कई मुद्दों पर उनकी जो समझ है उसका कोई मुकाबला नहीं. जस्टिस काटजू दिल के साफ हैं लेकिन बोलते बहुत ज्यादा हैं.’
बीते कुछ दिनों से जस्टिस काटजू के बारे में यह भी कहा जाने लगा है कि वे कांग्रेस के पक्षधर हैं और सिर्फ गैरकांग्रेसी सरकारों पर ही टिप्पणी करते हैं. गुजरात में हो रहे विकास को दिखावा बताते हुए उन्होंने मोदी सरकार की जमकर निंदा की है. नरेंद्र मोदी पर सवाल उठाता उनका एक लेख सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पकिस्तान के अखबार में भी छपा. इस पर भाजपा ने उन पर आरोप लगाया कि काटजू पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं. इसके साथ ही बिहार के बारे में टिप्पणी करते हुए काटजू ने लिखा कि वहां प्रेस को कुछ भी लिखने की अनुमति नहीं है और बिहार सरकार विज्ञापनों का लालच देकर वहां की प्रेस को नियंत्रित कर रही है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को तो उन्होंने यह तक कह डाला कि वे नंद वंश के आखिरी शासक घनानंद की तरह काम कर रहे हैं और यदि समय रहते वे नहीं सुधरे तो उनकी भी हालत घनानंद जैसी ही होना तय है. ऐसे बयानों पर भाजपा ने उन पर आरोप लगाए कि वे इसलिए गैरकांग्रेसी सरकारों पर हमला कर रहे हैं क्योंकि वे कांग्रेस सरकार का एहसान उतार रहे हैं. अरुण जेतली उनके बारे में कहते हैं कि कांग्रेस सरकार ने उन्हें रिटायर होने के बाद प्रेस परिषद का अध्यक्ष बनाकर उपकृत किया है और वे इसी के एवज में भाजपा पर हमला कर रहे हैं. इस बारे में वरिष्ठ अधिवक्ता वीएस सिंह बताते हैं, ‘काटजू कांग्रेस सरकार की भी उतनी ही निंदा करते हैं जितनी कि गैर-कांग्रेसी सरकारों की. लेकिन जब उन पर ये आरोप लगे कि वे कांग्रेस के खिलाफ नहीं बोलते और कांग्रेस के नेताओं ने जस्टिस काटजू का बचाव किया तो यह बात और ज्यादा उनके खिलाफ चली गई. लोगों को लगा कि कांग्रेस के लोग यदि काटजू का बचाव कर रहे हैं तो जरूर उनका कोई आपसी संबंध होगा.’ वैसे आप उनके कुछ बयानों में कांग्रेसी पक्षधरता देख सकते हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि उन्होंने महाराष्ट्र, दिल्ली और केंद्र की कांग्रेसी सरकार पर भी जमकर प्रहार किए हैं. बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद जब महाराष्ट्र की दो लड़कियों को सिर्फ फेसबुक पर कुछ टिप्पणी करने पर गिरफ्तार कर लिया गया था तो जस्टिस काटजू ने ही सबसे पहले इसका मुखर विरोध किया था. अन्ना हजारे के आंदोलन के समर्थन में कार्टून बनाने वाले असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी हो या अफज़ल गुरु की फांसी पर इफ्तिखार गिलानी की गिरफ्तारी, मानवाधिकार उल्लंघन के ऐसे मामलों पर सबसे पहले बोलने वालों में से काटजू भी एक बड़ा नाम रहे हैं.
जस्टिस काटजू को समझने में आप इसलिए भी भूल कर सकते हैं कि उनसे जुड़ी कई बातें शायद आप तक पहुंची ही न हों. मसलन ज्यादातर लोगों को यह तो पता है कि जून, 2011 में सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा था. इस पत्र में उन्होंने प्रधानमंत्री से अपील की थी कि पाकिस्तानी कैदी खलील चिश्ती को रिहा कर दिया जाए. उनका कहना था कि चिश्ती की उम्र बहुत ज्यादा है और मद्रास उच्च न्यायालय से उनका फैसला होने से पहले उनकी मृत्यु भी हो सकती है. खलील चिश्ती हत्या के आरोपित थे और कई साल से भारत में कैद थे. यह पत्र उन्होंने व्यक्तिगत हैसियत से प्रधानमंत्री को लिखा था. भाजपा ने इस बात की निंदा की. रविशंकर प्रसाद ने इस पत्र के संबंध में कहा, ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सर्वोच्च न्यायालय का एक न्यायाधीश प्रधान मंत्री से एक पाकिस्तानी कैदी की रिहाई की मांग कर रहा है. भले ही वे व्यक्तिगत हैसियत से यह पत्र भेज रहे हों लेकिन एक हत्या के आरोपी की ऐसी सिफारिश करना गलत है.’ मीडिया में भी इस पत्र की काफी चर्चा हुई. लेकिन जब इसी तरह का एक पत्र उन्होंने पाकिस्तान सरकार को एक भारतीय कैदी की रिहाई के लिए लिखा तो उसकी चर्चा न के बराबर ही हुई. 2010 में जस्टिस काटजू ने पाकिस्तान सरकार को एक पत्र लिखा था. यह पत्र गोपाल दास की रिहाई से संबंधित था जो पिछले 27 साल से पाकिस्तान में जासूसी के आरोप में कैद थे. जस्टिस काटजू ने इस संबंध में कहा कि पाकिस्तान सरकार को निर्देश देना तो हमारे क्षेत्राधिकार में नहीं है लेकिन हम उनसे अपील जरूर कर सकते हैं. अपनी अपील में उन्होंने मानवता के आधार पर गोपाल दास को रिहा करने की बात कही. साथ ही उन्होंने अपने पत्र में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पंक्तियों का जिक्र करते हुए लिखा, ‘कफ़स उदास है, यारो सबा से कुछ तो कहो. कहीं तो बहर-ए-खुदा आज जिक्र-ए-यार चले.’ पाकिस्तान सरकार ने इस पत्र का संज्ञान लिया और राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने गोपाल दास की सजा माफ़ करते हुए उन्हें रिहा कर दिया.
जब से काटजू भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष बने हैं तब से शायद ही कोई ऐसा महीना बीता हो जब उनका नाम सुर्खियों में न रहा हो. प्रेस परिषद के सदस्य राजीव रंजन नाग इसको सकारात्मक पहलू से देखते हुए बताते हैं, ‘जस्टिस काटजू ने इतना तो जरूर कर दिया है कि प्रेस परिषद को एक जुबान दे दी है. आज से पहले लोग प्रेस परिषद् के बारे में कितना सुनते थे? आज आलम यह है कि हर किसी की जुबान पर जस्टिस काटजू और प्रेस परिषद का नाम है.’ राजीव जी की इन बातों से आप जस्टिस काटजू की सकारात्मक छवि देख सकते हैं या फिर प्रेस परिषद के ही एक अन्य सदस्य प्रकाश जावडेकर की बातों से आप काटजू का दूसरा पक्ष भी देखने की कोशिश कर सकते हैं. प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं, ‘प्रेस परिषद के अध्यक्ष के पद पर रहते हुए उनके द्वारा ऐसे राजनीतिक बयान देना उचित नहीं हैं. उन्हें यदि राजनीति करनी है तो हमें कोई परेशानी नहीं लेकिन एक अर्धन्यायिक पद पर रहते हुए उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए. मुद्दा यह नहीं है कि ऐसे बयान देने पर या लेख लिखने पर कानूनन उनको रोका जा सकता है या नहीं. लेकिन क्या आपने कभी किसी न्यायाधीश को इस तरह के राजनीतिक बयान देते देखा है? वे ऐसे दोहरे मापदंड नहीं अपना सकते कि कभी कहें मैं भारतीय नागरिक होने की हैसियत से लिख रहा हूं और कभी कहें कि मैं तो भारतीय प्रेस परिषद का अध्यक्ष हूं.’
जस्टिस काटजू ने पिछले कुछ समय में लगभग हर मुद्दे पर अपनी राय रखी है. कभी उन्होंने 90 प्रतिशत भारतीयों को मूर्ख बताया तो कभी ममता बनर्जी को तानाशाह कहा. कभी नीतीश कुमार को घनानंद घोषित किया तो कभी कहा कि राजेश खन्ना जिंदा हैं या नहीं इससे क्या फर्क पड़ता है. कश्मीर समस्या का समाधान भी वे अलग ही तरीकों से देखते हैं. वे कहते हैं ‘इस समस्या का समाधान सिर्फ भारत-पकिस्तान विलय में है और मैं टू नेशन थ्योरी में बिल्कुल भी विश्वास नहीं करता.’ उनके ऐसे बयानों से आप यह भी मान सकते हैं कि वे सिर्फ प्रचार के लिए ही ऐसे बयान देते हैं. या फिर उनके बयानों की गहराई में जाते हुए आप उनमें तर्क भी ढूंढ़ सकते हैं. जस्टिस काटजू को जानने वाले लोग बताते हैं कि वे बहुत ज्यादा पढ़ते हैं. सिर्फ कानून और न्यायशास्त्र की ही नहीं बल्कि उन्हें संस्कृत, उर्दू, इतिहास, विज्ञान, दर्शनशास्त्र और समाजशास्त्र की भी गहरी जानकारी है. राजीव रंजन कहते हैं, ‘मैं जस्टिस काटजू का कोई भक्त नहीं हूं लेकिन उनकी कई विषयों पर जो जानकारी है उसका कोई मुकाबला नहीं. अन्य न्यायाधीशों को आम तौर पर कानून की ही जानकारी होती है लेकिन जस्टिस काटजू और भी कई विषयों को गहराई से समझते हैं. यही कारण है कि वे हर मुद्दे पर अपनी राय रखते हैं. उनके हर बयान और टिप्पणी के पीछे मजबूत तर्क होते हैं जिन्हें आप नकार नहीं सकते. उन्होंने जब यह भी कहा कि 90 प्रतिशत भारतीय मूर्ख हैं तो उसमें भी उनके तर्क समझने लायक थे. उन्होंने बताया कि सिर्फ जाति के आधार पर फूलन देवी जैसे लोग संसद तक पहुंच जाते हैं तो उनको वोट देने वाले मूर्ख नहीं तो क्या हैं. जब ऐसे लोग ही संसद में आएंगे तो कानून भी वैसा ही बनाएंगे जैसे वे स्वयं हैं.’
इन सब जानकारियों के आधार पर आप जस्टिस काटजू को ज्ञानी, बेबाक, दूरदर्शी, बातूनी, प्रचार का भूखा या संयमहीन कुछ भी मान सकते हैं. लेकिन अब भी आप यदि उनको ठीक से नहीं समझ पाए हैं तो आपको उनका एक और सबसे नया किस्सा भी बता दें. तहलका ने जब उनके जीवन पर आधारित स्टोरी करने का विचार किया तो उनसे साक्षात्कार के लिए समय लेना चाहा. उनके सचिव एसपी शर्मा ने इस संवाददाता से कहा, ‘जस्टिस काटजू सिर्फ तरुण तेजपाल या फिर शोमा चौधरी(तहलका की अंग्रेजी पत्रिका की प्रबंध संपादक) से ही बात करेंगे. इसलिए उन दोनों में से कोई भी उनसे आकर मिल सकता है.’ ऐसा जवाब मिलने पर हमने जस्टिस काटजू को एक ईमेल के जरिए संदेश पहंुचाया, ‘हमने सुना था कि आप जज रहते हुए भी नए वकीलों को पूरा मौका देते थे और उन्हें अपने सामने बहस करने के लिए प्रोत्साहित करते थे. फिर आप अपने साक्षात्कार के लिए सिर्फ तरुण तेजपाल या शोमा चौधरी से ही क्यों मिलना चाह रहे हैं?’ हमने उनसे एक बार फिर से आग्रह किया कि वे कुछ समय निकाल कर हमसे बात करें. इसके जवाब में उन्होंने अपना निजी नंबर देते हुए कहा कि मुझसे इस नंबर पर संपर्क कर सकते हो. संपर्क करने पर उनका कहना था, ‘मैं अपने जीवन से संबंधित विषय पर साक्षात्कार नहीं देना चाहता. वैसे ही लोग मुझ पर यह आरोप लगाते हैं कि मैं सिर्फ चर्चाओं में रहने के लिए ही बयान देता हूं. इसलिए मुझे इस विषय पर बात नहीं करनी.’ हमारे इस आग्रह पर कि वे हमसे कुछ मिनट मिल ही लें, उनका कहना था, ‘अगर मिलना है तो तहलका से तरुण तेजपाल या शोमा चौधरी मुझसे मिलें. मैं और किसी से बात नहीं करुंगा.’ हमने उन्हें बताया कि हम लोग हिंदी पत्रिका के लिए यह आवरण कथा कर रहे हैं और इस संबंध में उनसे कौन मिलेगा इसका फैसला तो संपादक का होगा तो उनका जवाब था, ‘मुझ पर लेख करना है तो इंग्लिश और हिंदी दोनों के लिए साथ में करो. इसके लिए उन दोनों में से कोई भी मुझसे आकर मिल सकता है.’
जस्टिस काटजू के साथ तहलका के इस अनुभव से शायद आपको उन्हें समझने में कुछ सहायता हो जाए. वैसे यदि अब भी आप उन्हें नहीं समझ पाए हैं तो जस्टिस काटजू, जिन्हें कई लोग दूरदर्शी भी मानते हैं, पहले ही यह बोल चुके हैं कि 90 प्रतिशत भारतीय मूर्ख हैं.
हाल ही में गिरफ्तार हुए सीनियर माओवादी नेता सब्यसाची पांडा की पत्नी शुभश्री पांडा. फोटो: विजय पांडेय
सीनियर माओवादी नेता सब्यसाची पांडा की गिरफ्तारी पर प्रश्न उठने लगे हैं. उड़ीसा पुलिस के डीआईजी अमिताभ ठाकुर ने शुक्रवार को ब्रह्मपुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके सब्यसाची पांडा की गिरफ्तारी की घोषणा की थी. लेकिन अब इस गिरफ्तारी पर सब्यसाची की पत्नी शुभश्री पांडा ने कुछ सवाल खड़े कर दिए हैं. तहलका से बातचीत में उन्होंने बताया, ‘मैं, मेरी बेटी, सब्यसाची के बड़े भाई, सारे लोग भुवनेश्वर से ब्रह्मपुर उनसे मिलने गए थे, लेकिन पुलिस ने हमें वापस भेज दिया. आप ही बताइए परिवार के सदस्यों की शिनाख्त के बिना कैसे मान सकते हैं कि पुलिस ने किसे गिरफ्तार कर रखा है. पुलिस कह रही है कि हम लोग पुलिस रिमांड खत्म होने के बाद ही उनसे मिल सकते हैं.’तहलका ने उनसे जब यह पूछा कि उन्हें ऐसा क्यों लगता है कि पुलिस ने सब्यसाची को गिरफ्तार नहीं किया है तब उनका जवाब था, ‘कल से यहां मीडिया में और टीवी पर पुलिस के हवाले से जो खबरें और फोटो दिखाई जा रही है वे सब्यसाची की नहीं हैं. इसलिए हमें लगता है कि पुलिस गलत बोल रही है.’
शुभश्री के इस बयान के बाद पुलिस के दावे पर कुछ संदेह अवश्य खड़े हो जाते हैं साथ ही उड़ीसा पुलिस के ऊपर इस बात का दबाव भी बन गया है कि वह सब्यसाची पांडा की गिरफ्तारी की तथ्यात्मक तरीके से पुष्टि करे. तहलका से बातचीत में शुभश्री कहती हैं, ‘अगर वास्तव में पुलिस ने सब्यसाची को गिरफ्तार किया है तो वह उन्हें हमारे सामने लाए. हम जो भी इस देश की कानूनी प्रक्रिया है उसके मुताबिक काम करेंगे. मैं खुद लंबे समय से उन्हें मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रही थी लेकिन कुछ लोगों के राजनीतक स्वार्थ के कारण हम सफल नहीं हो सके.’
पचास वर्षीय सब्यसाची पांडा माओवादी नेताओं में काफी वरिष्ठ है. उसके पिता रमेश पांडा स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी थे. 1991 में नक्सली आंदोलन के साथ जुड़ने के बाद उसने कुइ लेवांग संघ बनाया जो आगे चलकर पीपुल्स वार ग्रुप का मुख्य चेहरा बना. 2001 में पीडब्ल्यूजी ने आंध्र-उड़ीसा बॉर्डर स्पेशल जोन कमेटी बनाकर सब्यसाची को उड़ीसा का प्रमुख बना दिया. इस पद पर रहते हुए सब्यसाची ने दक्षिण उड़ीसा के कंधमाल, गजपति और गंजाम जिलों में नक्सली आंदोलन को आगे बढ़ाया. उसके जीवन में अहम मोड़ आया 2008 में जब उसकी अगुवाई में माओवादियों ने कंधमाल में विश्व हिंदू परिषद के नेता लक्ष्मणानंद सरस्वती और उनके पांच समर्थकों की हत्या कर दी. इसके बाद सीपीआई (माओवादी) ने सब्यसाची को पदावनत कर दिया. उस वक्त वह सीपीआई माओवादी का सचिव था. 2012 में उसे पार्टी से ही निष्कषित कर दिया गया. तब से उसके आत्मसमर्पण की खबरें आ रही थी.
बीते शुक्रवार को उड़ीसा पुलिस द्वारा सब्यसाची पांडा की गिरफ्तारी की घोषणा को पुलिस बलों और खुफिया विभाग की बड़ी कामयाबी के रूप में देखा जा रहा था लेकिन सब्यसाची की पत्नी शुभश्री ने इस पर सवाल उठाकर पुलिस की विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा कर दिया है.
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक संस्था बेहद तेजी से चर्चा में आई है. नाम है विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (वीआईएफ). दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके में स्थित यह थिंक टैंक (विचार समूह) वैसे तो 2009 से ही सक्रिय था लेकिन इसके बारे में कहीं कोई खास चर्चा सुनाई नहीं देती थी. आज यह संस्थान राजनीतिक-प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है. इस चर्चा के जन्म का कारण हैं तीन नियुक्तियां. वे तीन लोग जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए चुना है.
इनमें से एक हैं आईबी के पूर्व प्रमुख अजित डोवाल जिन्हें मोदी ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) बनाया है. डोवाल अनौपचारिक रूप से सरकार बनने के पहले ही सक्रिय हो गए थे. कहा जाता है कि सार्क प्रमुखों को मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में बुलाने का आईडिया उनका ही था. दूसरी नियुक्ति है ट्राई के पूर्व चेयरमैन नृपेंद्र मिश्रा की जिन्हें मोदी ने अपना प्रमुख सचिव बनाया है. नृपेंद्र मिश्रा की नियुक्ति में कानून आड़े आ रहा था जिसके मुताबिक ट्राई का चेयरमैन रह चुका व्यक्ति किसी सरकारी पद पर नहीं बैठ सकता. आड़े आ रहे कानून को मोदी ने पहले अध्यादेश लाकर और फिर कानून में ही बदलाव करके सीधा कर दिया. तीसरा नाम है पूर्व केंद्रीय कृषि सचिव पीके मिश्रा का जिन्हें मोदी ने एडिशनल प्रिंसिपल सेक्रेटरी बनाया है. इन तीनों लोगों में एक खास समानता है. ये तीनों विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (वीआईएफ) से जुड़े रहे हैं. एनएसए बनने से पूर्व अजित डोवाल जहां वीआईएफ के निदेशक थे वहीं नृपेंद्र मिश्रा संस्था की कार्यकारिणी परिषद के सदस्य थे. पीके मिश्रा भी संस्था से बतौर सीनियर फैलो जुड़े हुए थे.
डोवाल के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनने के बाद पूर्व सेना प्रमुख जनरल एनसी विज को संस्था का निदेशक बनाया गया है. सूत्र बताते हैं कि विवेकानंद फाउंडेशन से और भी कई लोग सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर जानेवाले हैं. खबर है कि डीआरडीओ के पूर्व महानिदेशक वीके सारस्वत जो वीआईएफ में सेंटर फॉर साइंटिफिक एंड टेक्नोलॉजिकल स्टडीज के डीन हैं, मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार आर चिदंबरम की जगह ले सकते हैं. इसके अलावा रॉ के पूर्व प्रमुख सीडी सहाय, पूर्व शहरी विकास सचिव अनिल बैजल, रूस में भारत के राजदूत रह चुके प्रभात शुक्ला, पूर्व वायु सेना प्रमुख एसजी इनामदार और बीएसएफ के पूर्व प्रमुख प्रकाश सिंह भी उस सूची में शामिल हैं जो वीआईएफ से मोदी सरकार का सफर तय कर सकते हैं. प्रधानमंत्री बनने के बाद जिस पहली किताब ‘गेटिंग इंडिया बैक ऑन ट्रैक’ का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विमोचन किया उसके संपादकों में से एक बिबेक देबोरॉय वीआईएफ स्थित सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज के डीन हैं.
दिल्ली के सत्ता गलियारों में यह कहा जाने लगा है कि सरकार के लिए वीआईएफ एक ऐसा नियुक्ति केंद्र बन गया है जहां मोदी के मनमाफिक लोगों की एक पूरी फौज है. सरकार की हर जरूरत का आइडिया और इंसान वीआईएफ में मौजूद है. ऐसे में मोदी सरकार में वीआईएफ से कैंपस प्लेसमेंट जारी रहने वाला है.
यहीं से यह प्रश्न खड़ा होता है कि ऐसा क्या है वीआईएफ में जिसने इसे मोदी का चहेता बना दिया है? क्या काम करती है यह संस्था? कौन लोग इससे जुड़े हैं?
वीआईएफ अजित डोवाल के दिमाग की उपज है. 2005 में आईबी प्रमुख के पद से रिटायर होने के बाद 2009 में डोवाल ने इसकी स्थापना की थी. इसका उद्घाटन उस साल दिसंबर माह में माता अमृतानंदमयी और न्यायमूर्ति एमएन वेंकटचलैया ने किया था. वीआईएफ कन्याकुमारी स्थित उस विवेकानंद केंद्र से संबद्ध है जिसकी स्थापना 1970 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाहक एकनाथ रानाडे ने की थी. दिल्ली के चाणक्यपुरी इलाके में 1993 में तत्कालीन नरसिम्हा रॉव सरकार ने दिल्ली में भी इस संस्थान को जमीन आवंटित की थी. बाद में यहीं वीआईएफ की स्थापना हुई.
वीआईएफ की वेबसाइट पर फाउंडेशन का परिचय देते हुए लिखा है, ‘नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन (वीआईएफ) विवेकानंद केंद्र के तत्वावधान में भारत के अग्रणी सुरक्षा विशेषज्ञों, राजनयिकों, उद्योगपतियों और परोपकारियों के सामूहिक प्रयास से स्थापित किया गया है. वीआईएफ का उद्देश्य एक ऐसा उत्कृष्ट केंद्र बनना है जहां से नवीन विचारों और एक नई सोच के साथ एक मजबूत, सुरक्षित और समृद्ध भारत अपनी अंतरराष्ट्रीय भूमिका का सही से निर्वहन कर सके.’
संस्था अपने विजन और मिशन के बारे में बताते हुए लिखती हैं, ‘वीआईएफ एक स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्थान है जो गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान और गहन अध्ययन को बढ़ावा देता है. इसका प्रयास है कि भारत के सभी प्रतिभाशाली लोगों को प्रमुख राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विषयों पर गहनता से चर्चा करने के लिए एक मंच पर लाया जाए. इसका प्रयास ऐसी पहलों को बढ़ावा देना है जो शांति और वैश्विक सद्भाव को मजबूत करती हैं. संस्था का काम उन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों पर नजर बनाए रखना है जो भारत की एकता और अखंडता पर असर डाल सकती है…’
वीआईएफ के सलाहकार परिषद और कार्यपरिषद में शिक्षाविदों के साथ ही सेना के पूर्व प्रमुख, पूर्व राजदूत, विदेश सचिव, रॉ और आईबी से जुड़े सेवानिवृत अधिकारी, नौकरशाह एवं तमाम अन्य विभागों में बड़े पदों पर रह चुके पूर्व अधिकारियों की भरमार है.
संस्था के सलाहकार बोर्ड में पूर्व सेना प्रमुख वीएन शर्मा, रॉ के भूतपूर्व मुखिया एके वर्मा, बीएसएफ के पूर्व प्रमुख प्रकाश सिंह, पूर्व एयरचीफ मार्शल एस कृष्णास्वामी, पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल, एस गुरुमूर्ति, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बेंगलोर के प्रोफेसर आर वैद्यनाथन, पूर्व सेना प्रमुख शंकर रॉय चौधरी, पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान, पूर्व कैबिनेट सचिव प्रभात कुमार एवं जम्मू-कश्मीर के पूर्व गवर्नर एसके सिन्हा शामिल हैं.
कार्यकारिणी परिषद में पूर्व एयर मार्शल एसजी ईनामदार, अजित डोवाल, फ्रांस और जर्मनी में भारत सरकार के दूत रहे टीसीए रंगचारी, पूर्व गृह सचिव अनिल बैजल, पूर्व रॉ प्रमुख सीडी सहाय, पूर्व केंद्रीय सचिव धनेंद्र कुमार, पूर्व सेना प्रमुख एनसी विज, ट्राई के पूर्व चेयरमैन नृपेंद्र मिश्रा, विदेश मंत्रालय के पूर्व सचिव राजीव सीकरी जैसे नाम शामिल हैं.
संस्थान से जुड़े लोग बताते हैं कि फाउंडेशन प्रमुख रूप से आठ क्षेत्रों में काम करता है. इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक अध्ययन, अंतरराष्ट्रीय संबंध/कूटनीति, तकनीकी और वैज्ञानिक अध्ययन, पड़ोस अध्ययन, गवर्नेंस और राजनीतिक अध्ययन, आर्थिक अध्ययन, ऐतिहासिक और सभ्यता अध्ययन तथा मीडिया स्टडीज जैसे क्षेत्र शामिल हैं.
जानकारों के मुताबिक वीआईएफ देश और विदेशों से तमाम स्कॉलर्स और विषय विशेषज्ञों को अपने यहां कॉंफ्रेंस और लेक्चर्स के लिए आमंत्रित करता है, दिल्ली स्थित राजनयिक समुदाय के सामने भारत का दृष्टिकोण रखता है और उनकी सोच को जानने का प्रयास करता है जिससे भारत के राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हितों को मजबूत किया जा सके. संस्थान सामयिक महत्व के मुद्दों पर नीति निर्माताओं के साथ संवाद करता है. वह नीति संबंधी सुझावों को सरकार के नुमाइंदों, सांसदों, न्यायपालिका के सदस्यों तथा शीर्ष संवैधानिक और सिविल सोसायटी के सदस्यों को भेजता है. संस्थान देश-विदेश के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों, रिसर्च सेंटरों, भारतीय और विदेशी थिंक टैंकों समेत तमाम शैक्षणिक और अकादमिक इदारों से विचारों के आदान-प्रदान हेतु संबंध स्थापित करता है.
सलाहकार बोर्ड के सदस्य और खुफिया संस्था रॉ के पूर्व प्रमुख आनंद वर्मा कहते हैं, ‘इस संस्था ने पिछले पांच-छह सालों में शानदार काम किया है. यहां विभिन्न क्षेत्रों में बहुत उच्च स्तर की रिसर्च हुई हैं. अनगिनत राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्व के सेमिनार यहां आयोजित हुए हैं. और इसने विश्व भर के विभिन्न थिंक टैंक्स के साथ संवाद किया है. दुनिया के तमाम देशों के उच्च अधिकारी यहां बातचीत के उद्देश्य से आते रहते हैं. इनमें गैर-सरकारी लोगों के साथ ही विभिन्न देशों की सरकारों में महत्वपूर्ण पदों पर मौजूद लोग भी शामिल हैं. चूंकि थिक टैंक के अपने कुछ नियम होते हैं इस कारण बहुत सी चर्चाओं को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता.’
आरएसएस समर्थक माने जाने वाले इस फाउंडेशन से नरेंद्र मोदी का संबंध काफी पुराना है. सूत्र बताते हैं कि बतौर मुख्यमंत्री, मोदी इस संस्था से आर्थिक एवं अन्य मसलों पर लगातार सलाह करते रहते थे. यही नहीं उन्होंने दिल्ली कूच करने की जब सोची तो उसकी विस्तृत रूपरेखा इसी संस्था में बनाई गई. वीआईएफ से जुड़े एक सदस्य कहते हैं, ‘मोदी जी का प्रधानमंत्री बनना तय था. इसलिए हम लोग बहुत पहले से ही विदेश नीति, रक्षा नीति से लेकर आर्थिक नीति समेत तमाम विषयों पर काम शुरू कर चुके थे. चुनाव प्रचार के दौरान भी मोदी जी को संस्था की तरफ से विभिन्न मसलों पर तमाम इनपुट्स मुहैया कराए गए थे. यही नहीं असम, अरूणाचल, जम्मू आदि में चुनाव प्रचार से लेकर चुनाव के समय बौद्धिक मैनेजमेंट का एक बड़ा हिस्सा संस्था की तरफ से ही किया गया था.’
संस्थान से जुड़े लोग बताते हैं कि नरेंद्र मोदी संस्था के काम से बहुत पहले से ही प्रभावित हैं. मोदी ही नहीं बल्कि भाजपा और संघ के तमाम नेता समय-समय पर विभिन्न विषयों पर संस्था से सलाह मशविरा करते रहे हैं.
नरेंद्र मोदी और वीआईएफ के बीच किस तरह का संबंध है उसका पता इस बात से भी चलता है कि जब कांग्रेस पार्टी के नेतृत्ववाली पिछली सरकार ने इशरत जहां मुठभेड़ मामले में नरेंद्र मोदी को घेरना शुरू किया उस वक्त मोदी के बचाव में बेहद मजबूती से फाउंडेशन के निदेशक अजित डोवाल आए थे. डोवाल ने मोदी का बचाव करते हुए कहा कि इशरत लश्कर-ए-तैय्यबा की सदस्य थी और सरकार बेवजह इस मामले का राजनीतिकरण कर रही है.
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जो सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर जा सकते हैं
पूर्व डीजी (डीआरडीओ) वीके सारस्वत बतौर मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार आर चिदंबरम की जगह ले सकते हैं. रॉ के पूर्व प्रमुख सीडी सहाय, पूर्व शहरी विकास सचिव अनिल बैजल, रूस में भारत के राजदूत रहे प्रभात शुक्ला, पूर्व वायु सेना प्रमुख एसजी ईनामदार और बीएसएफ के पूर्व प्रमुख प्रकाश सिंह भी जल्द महत्वपूर्ण पदों पर जा सकते हैं.
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लोकसभा चुनावों के पहले अरविंद केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए उन्हें भ्रष्ट ठहराया और कहा कि गुजरात में कोई विकास ही नहीं हुआ है, वहां सिर्फ उद्योगपतियों ने अपनी जेबें भरी हैं. इसके बाद ‘कंसर्नड सिटिजन्स’ नामक एक ग्रुप अपनी अपील के साथ सामने आया. उनकी अपील को भाजपा नेता विनय सहस्रबुद्धे ने भाजपा कार्यालय से जारी किया. अपील में कहा गया था कि मोदी पर नए राजनीतिक दल का आरोप पूरी तरह निराधार है. यह दल और उसके नेता लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से काम कर रहा है. ‘कंसर्नड सिटिजन्स’ नामक ग्रुप में जो बारह लोग शामिल थे उनमें अजित डोवाल के अलावा लेखक और टिप्पणीकार एमवी कामथ, एमजे अकबर, जम्मू-कश्मीर के पूर्व गवर्नर एसके सिन्हा, पूर्व नौकरशाह एमएन बुच तथा अर्थशास्त्री बिबेक देबोरॉय शामिल थे. जाहिर सी बात है कि मोदी के बचाव के लिए यह काम वीआईएफ की कोशिशों का ही नतीजा था.
ये तो मोदी के व्यक्तिगत स्तर पर समर्थन और बचाव करने के उदाहरण हैं. वीआईएफ ने पिछले सालों में सबसे बड़ा काम यूपीए (कांग्रेस पढ़ें) सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का किया है. यूपीए-2 के कार्यकाल में कांग्रेस पार्टी और सरकार के खिलाफ जो आक्रामक माहौल बना उसे तैयार करने में फाउंडेशन की भी एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
फाउंडेशन से जुड़े लोग बताते हैं कि 2011 में पूरे देश में भ्रष्ट्राचार विरोधी माहौल बनाने में वीआईएफ की एक महत्वपूर्ण भूमिका थी. संस्था के एक सदस्य कहते हैं, ‘अप्रैल 2011 में यहीं पर बाबा रामदेव के नेतृत्व में एक भ्रष्टाचार विरोधी मंच बनाने का निर्णय लिया गया था. इसकी प्लानिंग साल भर पहले से चल रही थी. फाउंडेशन ने केएन गोविंदाचार्य के राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के साथ मिलकर काला धन और भ्रष्टाचार पर एक अप्रैल से एक दो दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया था. उस कार्यक्रम में रामदेव के साथ अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी भी शामिल हुए थे. सेमिनार के अंत में एक भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चे का गठन किया गया. बाबा रामदेव उसके संरक्षक बने और गोविंदाचार्य संयोजक. मोर्चे के सदस्यों में अजित डोवाल, एनडीए सरकार में अमेरिका में भारत के ‘एम्बेस्डर-एट-लार्ज’ रहे भीष्म अग्निहोत्री, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बेंगलोर के प्रोफेसर आर वैद्यनाथन, पत्रकार और रामदेव के करीबी वेद प्रताप वैदिक तथा एस गुरुमूर्ति शामिल थे.’
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विवेकानंद फाउंडेशन के सदस्य
सलाहकार बोर्ड पूर्व सेना प्रमुख वीएन शर्मा, रॉ के भूतपूर्व मुखिया एके वर्मा, बीएसएफ के पूर्व प्रमुख प्रकाश सिंह, पूर्व एयरचीफ मार्शल एस कृष्णास्वामी, पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल, एस गुरुमूर्ति, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बेंगलोर के प्रोफेसर आर वैद्यनाथन, पूर्व सेना प्रमुख शंकर रॉय चौधरी, पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान, पूर्व कैबिनेट सचिव प्रभात कुमार एवं जम्मू-कश्मीर के पूर्व गवर्नर एसके सिन्हा आदि
कार्यकारिणी परिषद पूर्व एयर मार्शल एसजी ईनामदार, पूर्व आईबी प्रमुख अजित डोवाल, फ्रांस और जर्मनी में भारत सरकार के दूत रहे टीसीए रंगचारी, पूर्व गृह सचिव अनिल बैजल, पूर्व रॉ प्रमुख सीडी सहाय, पूर्व केंद्रीय सचिव धनेंद्र कुमार, लेखक एवं समकालीन अध्ययन के स्कॉलर डॉ. ए सूर्यप्रकाश, पूर्व सेना प्रमुख एनसी विज, पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल गौतम बैनर्जी, पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल आरके साहनी, ट्राई के पूर्व चेयरमैन नृपेंद्र मिश्रा, रूस में भारत के पूर्व राजदूत प्रभात शुक्ला, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व कार्यकारी उप कुलपति प्रोफेसर कपिल कपूर, विदेश मंत्रालय में पूर्व सचिव राजीव सीकरी आदि
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सेमिनार के अंत में जारी किये गए पत्र में बताया गया कि रामदेव ने ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ चौतरफा युद्ध करने की घोषणा की है. और तत्काल ही यह मोर्चा लोगों के बीच जाएगा. और अन्य भ्रष्टाचार विरोधी संगठनों और व्यक्तियों तक पहुंचेगा.’ इसी दौरान गोविंदाचार्य ने रामदेव और अन्ना के बीच मीटिंग कराई. वीआईएफ का प्रयास था कि दोनों एक साथ मिलकर भ्रष्टाचार की लड़ाई को आगे बढ़ाएं. वीआईएफ में संपन्न हुए सेमिनार के तीन दिनों के बाद ही पांच अप्रैल से जंतर-मंतर पर अन्ना हजारे की पहली भूख हड़ताल शुरु हुई. अप्रैल के अंत में रामदेव ने भी चार जून से रामलीला मैदान में सरकार विरोधी आंदोलन की घोषणा कर दी.
सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस सरकार को घेरने की यह रणनीति भाजपा और संघ के इशारे पर वीआईएफ ने ही तैयार की थी. इसके तहत सामाजिक क्षेत्र में एक तरफ अन्ना हजारे और रामदेव ने सरकार पर हमला बोला तो दूसरी तरफ राजनीतिक स्तर पर भाजपा ने भ्रष्टाचार विरोधी आग में राजनीतिक घी डालने का काम किया. यही कारण है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को बार-बार संघ का एजेंडा बता रहे थे. दिग्विजय सिंह का कहना था कि कांग्रेस सरकार को टीम अन्ना और रामदेव द्वारा संघ और भाजपा के इशारे पर घेरा जा रहा है और इसकी रणनीति विवेकानंद फाउंडेशन में बनाई गई है. लेकिन भ्रष्टाचार आंदोलन के चरम पर, सरकार की उससे निपटने की अजीबो-गरीब कोशिशों और तरह-तरह की सीएजी रिपोर्टों के बीच दिग्विजय सिंह की बात किसी ने नहीं सुनी.
फाउंडेशन के ऊपर संघ का समर्थक होने और उसके लिए काम करने के आरोप और भी लोगों ने लगाए हैं. इसके एक नहीं अनेक कारण है. वीआईएफ में आरएसएस से जुड़े तमाम पदाधिकारियों का आना लगा रहता है. संघ प्रमुख मोहन भागवत, गोविंदाचार्य, गुरुमूर्ति, लालकृष्ण आडवाणी से लेकर संघ व भाजपा से जुड़े तमाम नेता फाउंडेशन की गतिविधियों में शामिल रहते हैं. हाल ही में पूर्व राजनयिक ओपी गुप्ता की किताब ‘डिफाइनिंग हिंदुत्व’ का विमोचन यहां आकर खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने किया.
संस्था को संघी प्रतिष्ठान ठहराने वालों का तर्क है कि चूंकि फाउंडेशन विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी का हिस्सा है, जिसकी स्थापना एकनाथ रानाडे ने की थी, ऐसे में इसे संघ से अलग समझना नादानी होगी. संस्था के एक आलोचक कहते हैं, ‘वीआईएफ आरएसएस का प्रोजेक्ट है. वहां घुसते ही आपको एकनाथ रानाडे की तस्वीर दिखाई देगी. सारे दक्षिणपंथी रुझानवाले अधिकारी वहां भरे पड़े हैं. चूंकि ये लोग बौद्धिक जगत में हाशिए पर थे इसलिए इन्होंने अपना खुद का थिंक टैंक खोल लिया है. यह बौद्धिक जगत में अपनी स्वीकार्यता बनाने की छटपटाहट है. अगर ऐसा नहीं है तो फिर संघ प्रमुख का एक थिंक टैंक में क्या काम जो वो वहां हमेशा आते-जाते रहते हैं.’
वे कुछ लेखों का हवाला देते हैं ‘संस्थान से जुड़े सीनियर फेलो माखन लाल ने अपने एक लेख में वेंडी डोनिगर की किताब ‘द हिंदूज : एन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री’ पर उठे विवाद पर लिखा कि इस घटना से सूडो सेक्यूलरों और हिंदू विरोधियों को अपना पुराना खेल फिर से खेलने का मौका मिल गया है. जिसमें वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हिंदुओं की कटु आलोचना करते है. संस्था के ज्वाइंट डायरेक्टर प्रभात पी शुक्ला ने हाल ही में अपने एक लेख में लोकसभा चुनाव के परिणामों का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि ये चुनावी प्रतिक्रिया पिछले कई दशकों से हिंदुओं के साथ हो रहे दुर्व्यवहार का नतीजा है. संस्था से ही जुड़े अनिर्बन गांगुली अपने रिसर्च पेपर ‘मैन एंड एनवायर्नमेंट इन इंडिया- पास्ट ट्रेडिशंस एंड प्रेजेंट चैलेंजेस’ में लिखा है कि कैसे हिंदू धर्म की ये आंतरिक विशेषता है कि वो पर्यावरण को लेकर सजग रहता है. इस परंपरा की चर्चा वेद और अर्थशास्त्र तक में मिलती है. ये दक्षिणपंथ का उदाहरण नहीं तो क्या है.’
संघ समर्थित होने के आरोप पर फाउंडेशन की पत्रिका विवेक के संपादक केजी सुरेश कहते हैं, ‘मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि क्यों इतनी निगेटिव रिपोर्टिंग हो रही है. लोगों ने ऐसा माहौल बनाया है मानो फाउंडेशन के अंदर सारे अधिकारी खाकी निकर पहन के बैठे रहते हैं. आरएसएस से फाउंडेशन को जोड़ना गलत है. हम पूरी तरह से अराजनीतिक हैं. न हमने बीजेपी से फंड लिया न आरएसएस से.’ संघ के करीब होने के सवाल पर आनंद वर्मा कहते हैं, ये थिंक टैंक पूरी तरह से गैर-राजनीतिक है. पूरी तरह सेक्यूलर है. आरएसएस से इसका कोई मतलब नहीं है. इसका अपना कोई एजेंडा नहीं है. इसका एकमात्र उद्देश्य है कैसे देश के सामने उपस्थित चुनौतियों का हल निकाला जाए.’
टाइम्स नाउ से जुड़े रक्षा विशेषक्ष मारूफ रजा जो संस्था के कई कार्यक्रमों में भाग लेते रहे हैं, मीडिया से बातचीत में कहते हैं, ‘ वैसे तो संघ के साथ वीआईएफ के संबंध की बातें दबी जुबान में होती रहती हैं लेकिन खुले तौर पर किसी तरह का दक्षिणपंथी रूझान सामने नहीं दिखता है. संस्था का काम बहुत बढ़िया है.’
संघ और फाउंडेशन में कोई संबंध न होने की चर्चा करते हुए वर्मा संघ की चर्चा शुरू कर देते हैं. वे कहते हैं, ‘देखिए मैं आरएसएस को उस दृष्टि से नहीं देखता जिस दृष्टि से कांग्रेस उसे देखती है. आरएसएस क्या गलत कर रहा है. वो तो हिंदू समाज को उसके गरिमापूर्ण स्थान पर वापस स्थापित करने का काम कर रहा है. जो इसे नहीं समझते संघ को गालियां देते हैं. वो पुराने सांस्कृतिक मूल्यों को दोबारा स्थापित कर रहा है. अच्छा काम कर रहा है. ’
वर्मा संघ को फाउंडेशन से जोड़ने की चर्चाओं को एक षड़यंत्र के रूप में देखते हैं. वो कहते हैं, ‘विवेकानंद ने जब शिकागो में अपना भाषण दिया तो उसकी पूरी दुनिया में चर्चा हुई. उस भाषण के बाद कुछ लोग उन पर ये आरोप लगाते हुए उनकी आलोचना करने लगे कि उन्होंने न्यू हिंदुइज्म की शुरूआत की है. उनके लिए विवेकानंद भी सेक्यूलर नहीं थे तो फिर दूसरा कौन होगा.’
कैसे वीआईएफ संघ-भाजपा समर्थित नहीं है, सही अर्थों में एक थिंक टैंक है इसकी चर्चा करते हुए सुरेश बताते हैं, ‘हम न भाजपा समर्थक हैं न कांग्रेस विरोधी. हम सही निर्णय का समर्थन करते हैं. यूपीए सरकार के दौरान देवयानी खोबरागड़े मामले पर हमने यूपीए सरकार का समर्थन किया था. ऐसे ही जब बांग्लादेश के साथ जमीन का मामला सामने आया तो हमने यूपीए सरकार को सपोर्ट किया. जबकि उस समय सदन में विपक्ष ने इसका विरोध किया था. ऐसे में हमें कांग्रेस विरोधी ठहराना गलत है. ये सही है कि उच्च स्तर पर बीजेपी और आरएसएस के लोग हमसे विभिन्न विषयों पर इनपुट लेते हैं. लेकिन ये भी उतना ही सही है कि कांग्रेस के नेता भी हमारे सेमिनारों में भाग लेते हैं.’
फाउंडेशन के लोग बताते हैं कि कैसे भाजपा और संघ के अलावा अन्य पार्टियों और विचारधारा से जुड़े लोग भी संस्था के साथ जुड़े रहे हैं. वर्मा कहते हैं, ‘कुछ समय पहले ही कश्मीर के विषय पर हमने कॉंफ्रेंस का आयोजन किया था. पीडीपी के लोग उसमें आए थे. कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के लोग भी थे. उन सभी ने बहस में हिस्सा लिया. कुछ समय पहले ही मौलाना महमूद मदनी भी वीआईएफ आए थे. पाकिस्तान में जमीयत उलमा-ए-इस्लाम के मुखिया मौलाना फजलुर रहमान यहां आ चुके हैं. दलाई लामा यहां कार्यक्रमों में भाग ले चुके हैं.’ फाउंडेशन से जुड़े एक सदस्य कहते हैं,, ‘यूपीए के कार्यकाल में भी पीएमओ से कई अधिकारी वीआईएफ द्वारा आयोजित विभिन्न सेमिनारों में आया करते थे. यहां तक कि पूर्व संस्कृति मंत्री कुमारी सैलजा खुद एक पुस्तक का विमोचन करने यहां आईं थीं.’
संस्था के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए वर्मा कहते हैं, ‘बहुत सारे कामों के साथ ही जो एक बड़ा काम फाउंडेशन कर रहा है वो है हिंदुस्तान की सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्म को सही रूप में सामने रखना. जिन किताबों से हमने पढ़ाई की है उन्होंने हमारे इतिहास को गलत तरीके से रखा है. हम आज ब्रिटिश और मैकाले द्वारा तैयार कराया गया इतिहास पढ़ते हैं. इनका उद्देश्य हम लोगों में हीन भावना पैदा करना और हमारे हिंदुस्तानी मूल्यों को नेस्तनाबूद करना था. हमें अपना सही इतिहास जानना है. इस दिशा में फाउंडेशन काम कर रहा है. 10-11 वाल्यूम में नए सिरे से भारत का इतिहास लिखा जा रहा है. जिसमें 5-6 वॉल्यूम तैयार हो चुके हैं.’
केजी सुरेश मीडिया से बातचीत में कहते हैं, ‘हमने पांच वाल्यूम में प्रचीन भारत का इतिहास पब्लिश किया है. इतिहास का राष्ट्रीयकरण करना ही होगा. वामपंथ राजनीतिक रूप से हाशिए पर चला गया है. अब वही उसके साथ बौद्धिक क्षेत्र में भी होने वाला है. अभी तक हम हाशिए पर थे, अब उनकी बारी है.’
फाउंडेशन के महत्व पर चर्चा करते हुए वर्मा कहते हैं, ‘इस संस्था का जन्म जरूरी था. स्थिति ये थी कि कोई भी जब हिंदुस्तानी संस्कृति की बात करता था तो अपने यहां वामपंथियों से भरा बुद्धिजीवी तबका उसे दक्षिणपंथी ठहराकर खारिज करने लगता था. उन्हें लगता था सामने वाला हिंदू धर्म का प्रचार कर रहा है. संस्कृति से जुड़ी हर चीज में वामपंथी इतिहासकारों को आरएसएस की साजिश नजर आती है.’
विभिन्न विभागों के अध्यक्षकंवल सिब्बल (पूर्व विदेश सचिव) डीन,
अंतरराष्ट्रीय संबंध और कूटनीति केन्द्र सतीश चंद (पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार) डीन, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक अध्ययन केंद्र डॉ. बिबेक देबरॉय (अर्थशास्त्री और लेखक) – डीन, आर्थिक अध्ययन केंद्र डॉ. दिलीप चक्रवर्ती (पूर्व प्रोफेसर, पुरातत्व विभाग, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय) डीन, ऐतिहासिक और सभ्यता अध्ययन केंद्र डॉ. एम.एन. बुच (भारत सरकार के पूर्व सचिव) डीन, गवर्नेंस एवं राजनीतिक अध्ययन केंद्र डॉ. वीके सारस्वत (डीआरडीओ के पूर्व डीजी) डीन, तकनीकी एवं वैज्ञानिक अध्ययन केंद्र
संस्था से जुड़े एक अन्य सदस्य कहते हैं, ‘देश में अधिकांश थिंक टैंक और अकादमिक संस्थानों पर वामपंथी सोच वालों का कब्जा हैं. ऐसे में वीआईएफ उन गैर-वामपंथी और राष्ट्रवादी सोच वाले लोगों के लिए एक प्लेटफॉर्म है जो बौद्धिक जगत में अभी तक अछूत समझे जाते थे.’
अजित डोवाल और नृपेंद्र मिश्रा के सरकार में जाने के बाद ऐसे लोगों कि तादाद कम नहीं है जो कहते हैं कि इन लोगों को मोदी सरकार में मिली बेहद महत्वपूर्ण भूमिका के पीछे संघ का ही हाथ है. वर्मा ऐसे किसी आरोप को कूड़ेदान में फेंकने की बात करते हुए कहते हैं, ‘मैं नौकरशाही को ऊपर से नीचे तक जानता हूं. मैं पूरी दृढ़ता के साथ ये कह सकता हूं कि इनकी टक्कर का आदमी पूरी सिविल सेवा में नहीं है.’ अजित डोवाल की चर्चा करते हुए वे कहते हैं, ‘जैसे कुछ लोग ये मानते हैं कि मोदी जैसा दूसरा कोई नहीं है वैसे मैं मानता हूं कि अजित जैसा कोई दूसरा नहीं हो सकता.’ लेकिन क्या संघ से उनकी नजदीकी नहीं है? इस सवाल के जवाब में वर्मा कहते हैं, ‘ वो पूरी तरह से गैर-राजनीतिक व्यक्ति हैं. हां, व्यक्तिगत जीवन में उनकी सांस्कृतिक प्राथमिकता हो सकती है लेकिन सार्वजनिक जीवन में वो बेहद प्रोफेशनल व्यक्ति हैं.’
डोवाल, नृपेंद्र मिश्रा और पीके मिश्रा के मोदी सरकार में शामिल होने के बाद वीआईएफ राजनीतिक-राजनयिक-प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है. संस्था की तरफ रुख करनेवालों की कतार लंबी होती जा रही है. संस्था से जुड़े लोग बताते हैं कि पिछले एक महीने में विदेश से चर्चा के लिए वीआईएफ आने वाले राजनयिकों एवं सरकारी और गैरसरकारी विशेषज्ञों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है. डोवाल का एनएसए के लिए नाम फाइनल होने के तीन दिन बाद ही दो चीनी प्रतिनिधिमंडल – जिनमें चीन के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ शामिल थे – वीआईएफ आए थे. उसी दिन ब्रिटेन का 17 लोगों का एक प्रतिनिधिमंडल वीआईएफ आया जिसमें वहां के रॉयल कॉलेज ऑफ डिफेंस स्टडीज के कमांडेंट तथा पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल डेविड बिल भी थे. यूएस आर्मी वॉर कॉलेज का एक प्रतिनिधिमंडल भी यहां हाल ही में आया था जिसने नाभकीय हथियारों के विषय में यहां के रक्षा विशेषज्ञों से चर्चा की. कुछ समय पहले ही फ्रेंच एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के विशेषज्ञ एवं फ्रांस के राजदूत ने भी यहां आकर सुरक्षा समेत विभिन्न मुद्दों पर बात की.
जहां तक संस्थान की फंडिग का सवाल है तो उसका बड़ा हिस्सा डोनेशन से आता है. वर्मा कहते हैं, ‘देश-विदेश से लोग इस संस्थान को अनुदान देते हैं. ये किसी सरकारी संस्था से अनुदान नहीं लेता है. हम और आप जैसे लोग इसे अनुदान देते हैं.’ साल 2013 में फाउंडेशन को एक करोड़ 49 लाख 56 हजार रुपये डोनेशन के तौर पर मिला.
जिस तरह से मोदी सरकार में वीआईएफ से जुड़े लोग महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हो रहे हैं, चर्चाओं का बाजार गर्म है कि देश की विदेश, आर्थिक और सुरक्षा नीति समेत तमाम नीतियों को तय करने में फाउंडेशन की प्रमुख भूमिका रहनेवाली है.
अगर कोई आंदोलन यानी धरना-प्रदर्शन-भूख हड़ताल दिल्ली में हो, उसमें हजारों युवा शामिल हों, उसमें शामिल होने के लिए सांसद-विधायक-नेता-लेखक-बुद्धिजीवी पहुंच रहे हों और आंदोलन के मुद्दे से देशभर में लाखों युवा प्रभावित हों तो पूरी सम्भावना है कि वह आंदोलन अखबारों/न्यूज चैनलों की सुर्खी बने. यही नहीं, यह भी संभव है कि अखबार/चैनल खुलकर उस आंदोलन के समर्थन में खड़े हो जाएं. लेकिन दिल्ली में संघ लोकसेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षाओं में अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व और हिंदी समेत सभी भारतीय भाषाओं की उपेक्षा और बेदखली के खिलाफ चल रहा आंदोलन शायद इतना भाग्यशाली या कहिए कि टीआरपी बटोरू नहीं है कि वह अखबारों/चैनलों की सुर्खी बन सके.
नतीजा, यह आंदोलन न्यूज चैनलों की सुर्खियों और प्राइम टाइम चर्चाओं/बहसों में नहीं है. यहां तक कि उनकी 24 घंटे-चौबीस रिपोर्टर या न्यूज बुलेट/न्यूज हंड्रेड में भी जिनमें जाने कैसी-कैसी ‘खबरें’ चलती रहती हैं, इस खबर को कुछेक चैनलों में एकाध बार जगह मिल पाई है. यह समझा जा सकता है कि यूपीएससी में अंग्रेजी के बढ़ते दबदबे के खिलाफ चल रहे इस आंदोलन को अंग्रेजी न्यूज चैनलों/अखबारों में जगह न मिले या उसकी अनदेखी हो लेकिन हिंदी के अखबारों और न्यूज चैनलों में भी इस खबर की उपेक्षा को समझना थोड़ा मुश्किल है. हिंदी के अखबारों/चैनलों के लिए यह एक बड़ी ‘खबर’ क्यों नहीं है? ज्यादा समय नहीं गुजरा जब यही चैनल/अखबार नए प्रधानमंत्री और एनडीए सरकार के हिंदी प्रेम की बलैय्यां ले रहे थे. लेकिन यूपीएससी में हिंदी के परीक्षार्थियों के साथ अन्याय और उनकी बेदखली के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन के प्रति हिंदी के अखबार/चैनल इतनी बेरुखी क्यों दिखा रहे हैं?
कहीं यह हिंदी अखबारों/चैनलों की उस ‘हीनता ग्रंथि’ के कारण तो नहीं है जिसमें वे खुद को अंग्रेजी के ‘अपमार्केट’ के सामने गंवार ‘हिंदीवाला’ नहीं दिखाना चाहते हैं? सच यह है कि हिंदी के अधिकांश अखबार/चैनल आज ‘अंग्रेजी लाओ’ आंदोलन चला रहे हैं. पिछले एक-डेढ़ दशक में हिंदी के ज्यादातर अखबारों/चैनलों में खुद को ‘अपमार्केट’ दिखने के लिए अंग्रेजी के ज्यादा करीब जाने और उसके ही सरोकारों, मुहावरों और प्रस्तुति पर जोर बढ़ा है. आश्चर्य नहीं कि आज कई हिंदी अखबारों/चैनलों की भाषा हिंदी नहीं बल्कि हिंगलिश है. अखबारों के संपादकीय पृष्ठों पर अंग्रेजी के बड़े बुद्धिजीवियों की छोडि़ए, औसत दर्जे के पत्रकारों/स्तंभकारों को अनुवाद करके छापने और चैनलों की बहसों/चर्चाओं में अंग्रेजी के पत्रकारों/बुद्धिजीवियों/सेलिब्रिटी को बुलाने की कोशिश की जाती है.
यहां तक कि हिंदी के एक बड़े अखबार ने काफी पहले न सिर्फ धड़ल्ले से अंग्रेजी के शब्दों को इस्तेमाल करना शुरू किया बल्कि शीर्षकों में रोमन लिपि का प्रयोग करने से भी नहीं हिचकिचाया. एक और बड़े अखबार ने अपने पाठकों को अंग्रेजी पढ़ाने का अभियान चलाया. हिंदी के ज्यादातर चैनलों के एंकरों/रिपोर्टरों की हिंदी के बारे में जितनी कम बात की जाए, उतना अच्छा है. जाहिर है कि हिंदी के जिन चैनलों/अखबारों के न्यूजरूम पर मानसिक/व्यावसायिक रूप से अंग्रेजी और अंग्रेजी मानसिकता हावी है और हिंदी मजबूरी जैसी है, वहां उनकी दिलचस्पी एक ऐसे आंदोलन में कैसे हो सकती है जो अंग्रेजी के वर्चस्व के खिलाफ भारतीय भाषाओं के हक में आवाज उठा रहा हो?
लेकिन कल्पना कीजिए कि अगर यही अखबार/चैनल देश की आजादी के आंदोलन के समय रहे होते तो उनका रवैया क्या आज से कुछ अलग होता?
बात करीब डेढ़ साल पहले की है. पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में राष्ट्रीय जनता दल का एक आयोजन था. इसमें अध्यक्ष और दूसरे पदाधिकारी चुनने की परंपरा निभाई जानी थी. कार्यकर्ताओं और नेताओं से खचाखच भरे हॉल में पार्टी के कर्ता-धर्ता लालू प्रसाद यादव ने अपने लोगों को कुछ नसीहतें दीं. उन्होंने एक बात पर बार-बार जोर दिया कि सामंती शब्द का इस्तेमाल नहीं करना है. वे यह भी साफ-साफ समझा रहे थे कि सवर्णों को भी साथ लेकर चलना है, सब अपने हैं. लालू राजपूतों पर विशेष बल दे रहे थे और कह रहे थे कि ये तो बिल्कुल अपने हैं. लालू यहीं नहीं रुके. सवर्णों को अपनी तरफ करने की कवायद में वे यह भी कह गए कि अगर कभी कोई गलती हुई होगी तो माफी चाहते हैं. उस सम्मेलन के बाद लालू प्रसाद यादव ने तहलका से एक विशेष बातचीत की थी. इसमें भी उन्होंने कुछ यही बातें दोहराई थीं. उनका कहना था कि भूराबाल यानी भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला को साफ करनेवाला नारा जो उनके नाम से जोड़ा गया है, वह एक साजिश है. इसके बाद कई खबरें आती रहीं जिनसे यह साफ होता रहा कि नीतीश से नाराज चल रहे सवर्णों को अपने पाले में करने के लिए लालू प्रसाद दिन-रात एक कर रहे हैं.
लेकिन यह सब पुरानी बातें हुई. वहीं लालू अब एक पुराने रंग के साथ नये अवतार में आने की कोशिश में हैं. लोकसभा चुनाव में हार के बाद पिछले दिनों वैशाली में अपनी पार्टी के प्रशिक्षण शिविर में उन्होंने 180 डिग्री की पलटी मारते हुए ऐलान किया कि मंडलवादी राजनीति को उभारना ही उनका लक्ष्य होगा. लगे हाथ उन्होंने यह भी मांग कर दी कि सरकारी ठेके में 60 प्रतिशत आरक्षण पिछड़ों के लिए होना चाहिए. अपनी पार्टी के उन्हीं कार्यकर्ताओं को उन्होंने एक हिसाब भी समझाया. बताया कि बीते लोकसभा चुनाव में जदयू, राजद और कांग्रेस को मिलाकर 45 प्रतिशत मत मिले हैं. लालू का कहना था, ‘अगर हम साथ होते, पिछड़े मतों का बिखराव नहीं होता तो भाजपा कहीं की नहीं होती.’
ठेके में आरक्षण वाला लालू का बयान सुर्खियां तो बना, लेकिन पटना के कुछ गलियारों और राजनीति में भी कुछ गिने-चुने लोगों को छोड़कर किसी ने इस पर ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया. भाजपा का तुंरत बयान आया कि वह तो पिछड़ों की राजनीति की हमेशा हिमायती रही है. अतिपिछड़े कोटे से मंत्री बने सत्ताधारी जदयू के भीम सिंह जैसे लोगों ने फॉर्मूला बनाया कि कैसे ठेके में आरक्षण सुनिश्चित किया जा सकता है. पटना में कुछ चुनिंदा जगहों पर ठेके में 60 प्रतिशत आरक्षण की बात को अच्छे दिन आने के संकेत के तौर पर देखा गया और उसके सच होने की परिकल्पना के साथ ही भविष्य के ताने-बाने तक बुन लिये गए. लेकिन इसके अलावा लालू प्रसाद के मंडल बम की कोई खास गूंज नहीं सुनाई दी. राजनीति के पटल पर थक-हार जाने और चारों तरफ से परास्त हो जाने के बाद लालू ने यह बम इस उम्मीद से फोड़ने की कोशिश की थी कि इसकी धमक से पूरे बिहार का राजनीतिक गलियारा हिलने-डोलने लगेगा.
‘एक अलग पहचान गढ़ चुके नीतीश तथाकथित सामाजिक न्याय के नाम पर एक बार फिर विशुद्ध जाति की राजनीति के दायरे में नहीं लौट सकते’
अब सवाल कई हैं. पहला तो यह कि 1990 में जिस मंडल की राजनीति पर सवार होकर लालू प्रसाद देश के बड़े नेता बनने और 15 साल तक बिहार पर राज करने में सफल रहे थे, 2014 में अचानक वे फिर वही पुराना राग छेड़ने को क्यों मजबूर हुए. दूसरा सवाल यह है कि क्यों पूरी ऊर्जा लगाकर भी यह राग छेड़ने के बाद वह हलचल पैदा नहीं हो सकी जिसकी उम्मीद लालू या उनके पार्टी के नेताओं ने की थी. और इन दोनों सवालों के बीच बड़ा सवाल यह भी कि जिन नीतीश कुमार और उनकी पार्टी को लेकर लालू प्रसाद 45 प्रतिशत वोट की बात बार-बार कह रहे हैं, उन नीतीश कुमार या उनकी पार्टी की ओर से इस कवायद पर कोई गर्मजोशी वाले बयान क्यों नहीं आए. आखिर इस मंडल बम पर नीतीश ने क्यों पूरी तरह मौन साध लिया?
इन सवालों का जवाब अलग-अलग लोग, अलग-अलग तरीके से देते हैं. राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी कहते हैं, ‘चीजें समय के साथ आगे बढ़ती हैं. लालू प्रसाद अपने फायदे के लिए चीजों को पीछे ले जाना चाहते हैं. वे अगर मंडलवादी राजनीति की ही बात करते और ठोस आंकड़ों के साथ कहते कि पिछड़ों की शिक्षा की स्थिति में सुधार होना चाहिए, भूमि सुधार को पिछड़ों के हित के लिए लागू किया जाना चाहिए या फिर पिछड़ों के कौशल आदि का विकास होना चाहिए तो लगता कि वे सच में पिछड़ों या अतिपिछड़ों की हिमायत करते हुए राजनीति करने का मन बना रहे हैं. लेकिन उन्होंने तो सिर्फ मंडलवादी राजनीति का नाम लिया और ठेके में आरक्षण की बात कह दी.’ चौधरी आगे कहते हैं, ‘ पिछड़ों को यह समझ में आ रहा है कि ठेके में इस आरक्षण से किसे फायदा होनेवाला है. लालू प्रसाद ने अपने कार्यकाल में ठेके-पट्टे के जरिये ही एक नया सामंत और प्रभु वर्ग खड़ा किया था. एक बार फिर वे वैसा ही करना चाहते हैं जिससे मुट्ठी भर लोगों को फायदा हो. बिहार की तो छोड़िए, इससे खुद लालू प्रसाद की पार्टी का भी भला नहीं होगा. नीतीश कुमार के साथ गठजोड़ की जो उम्मीदें बंध रही हैं, दो और दो मिलाकर चार का जो ख्वाब लालू प्रसाद दिन-रात देख रहे हैं, वह भी अधूरा रह जाएगा. ऐसा इसलिए होगा कि नीतीश कुमार ने पिछले नौ सालों में बिहार की राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बनायी है और राजनीति को सामाजिक न्याय, विकास और पूंजीवाद की ओर ले जाने की कोशिश की है. तथाकथित सामाजिक न्याय के नाम पर नीतीश एक बार फिर विशुद्ध जाति की राजनीति के दायरे में नहीं लौट सकते.’
प्रो चौधरी जो कहते हैं वह सिर्फ एक आलोचक का विरोधी बयान भर नहीं माना जा सकता. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि लालू के इस बयान के बाद नीतीश कुमार के लिए जवाब देना इसलिए भी आसान नहीं होगा क्योंकि इससे लालू ने कमंडल को मंडल के जरिये खत्म करने की चाल चलने के साथ ही नीतीश की राजनीति पर भी कब्जा जमाने का एक दांव खेला है. नीतीश अगर कहते हैं कि हां, ऐसा होना चाहिए तो पूछा जाएगा कि इतने सालों तक सत्ता में रहते हुए ऐसा करने से उन्हें किसने रोका था. अगर न कहते हैं तो लालू यह प्रचार करेंगे कि हमने तो पिछड़ों की भले की बात कही, नीतीश ने ही साथ नहीं दिया. नीतीश के लिए मुश्किलें इतनी भर नहीं हैं. अपने पहले कार्यकाल में सवर्ण आयोग का गठन कर और इस बार लोकसभा चुनाव के घोषणा पत्र में सवर्णों को विशेष तरजीह दिए जाने की बात कहकर वे पिछड़ों की पहचान वाली राजनीति से बहुत आगे निकल चुके हैं. इसलिए तुरंत उसी खोल में लौटना अब उनके लिए उतना आसान नहीं रह गया है.
लालू प्रसाद अपने कहे को लगातार हवा पानी दे रहे हैं. वे बयान पर बयान दिये जा रहे हैं. लेकिन नीतीश लगातार इस पर मौन साधे हुए हैं. लालू के इस नये शिगूफे पर उनकी पार्टी के भीतर भी बहस हो रही है. पार्टी से जुड़े वरिष्ठ नेता व राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार मणी कहते हैं, ‘लालू प्रसाद ने 21वीं सदी के दूसरे दशक में यह बात कही है जब मंडल के प्रतीकों की राजनीति का समय बीत गया है. अगर उन्हें ठेके में आरक्षण की बात ही करनी थी तो यह लड़ाई तो बहुत पहले से ही लड़ी जा रही है.’ मणी के मुताबिक 2003 में वे खुद इस मसले पर धरने पर बैठे थे. वे यह भी बताते हैं कि मध्यप्रदेश में जब दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने कहा था कि सरकारी खरीद में से अधिकांश हिस्सा पिछड़ों और दलितों के दुकान-प्रतिष्ठान से खरीदा जाए. मणी कहते हैं, ‘तब लालू प्रसाद कहां थे. तब उन्होंने क्यों एक बार भी साथ नहीं दिया था. अब थक-हारकर अपनी राय मिला रहे हैं. लेकिन मार्क्स ने कहा था कि इतिहास कभी दुहराता नहीं है अपने को और दुहराता है तो कभी प्रहसन के रूप में तो कभी ट्रेजडी के रूप में. लालू प्रसाद अगर उम्मीद करते हैं कि एक बार फिर इतिहास दुहरा लेंगे तो इतिहास प्रहसन के रूप में ही दुहरायेगा.’
जानकारों के मुताबिक इस मुद्दे पर लालू और नीतीश का मेल कोई खास फलदायी नहीं होने वाला क्योंकि मंडलवादी राजनीति का नया चेहरा अब भाजपा है
मणी सहित कई जानकारों से लंबी बातचीत होती है. उनके मुताबिक मान भी लिया जाए कि लालू प्रसाद या फिर नीतीश कुमार मंडल की राजनीति का दौर बिहार में वापस लाना चाहते हैं. लेकिन सिर्फ जुबानी जमा खर्च करने से तो होगा नहीं. सवाल पूछा जाएगा कि पिछले करीब 25 साल से सामाजिक न्याय के नाम पर ही लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की सत्ता बिहार में रही है. किसने रोका था उन्हें ठेके में आरक्षण लागू करने से और अब जब मुश्किल दौर में पहुंच गए हैं तो यह सब क्यों याद आ रहा है.
राजनीतिक जानकार बताते हैं कि घोर मंडलवादी राजनीति की सिफारिश करके भी लालू प्रसाद अपनों से ही घिरते जा रहे हैं. दूसरी ओर मौन साधकर नीतीश कुमार भी उसी चक्र में फंसते जा रहे हैं. लालू के इस नये पैंतरे से दोनों के बीच संबंध बनने के जो आसार बने हैं, उसमें भी अगर-मगर लगने की संभावनाएं बढ़ गई हैं. राजनीतिक जानकार बताते हैं कि जाति की राजनीति करने के बावजूद नीतीश कुमार खुलकर अब इस तरह जाति की राजनीति करने सामने नहीं आएंगे. तब सवाल यह उठता है कि आखिर दोनों करेंगे क्या. नीतीश कुमार क्या करेंगे ? क्या लालू प्रसाद की इस कवायद का खंडन करेंगे या मौन साधकर साथ हो जाएंगे. मणी कहते हैं, ‘दोनों के पास कोई विकल्प नहीं है. मजबूरी में साथ हो रहे हैं. लेकिन बहुत संभावनाएं अब नहीं दिखती क्योंकि मंडलवादी राजनीति का नया चेहरा अब भाजपा है जिसका नेता, जो अब पीएम बन चुका है, पिछड़े समूह का है. वह आर्थिक रूप से भी पिछड़ी श्रेणी का है. चाय बेचनेवाला है और भाजपा की ओर से पीएम बन चुका है.’
बातचीत के आखिर में मणी एक और सवाल उठाते हैं. कहते हैं, ‘बिहार में मगध विश्वविद्यालय सबसे बड़े दायरेवाला विश्वविद्यालय है. उसका नाम कुशवाहा जाति से आनेवाले और बिहार आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले दिग्गज नेता जगदेव प्रसाद के नाम पर करने की मांग वर्षों से होती रही. लेकिन अभी कुछ दिनों पहले उस विश्वविद्यालय का नामकरण बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा के नाम पर करने की घोषणा कर दी गई. मगध में या पिछड़ों की राजनीति में या फिर शिक्षा के क्षेत्र में क्या सत्येंद्र नारायण सिन्हा की भूमिका जगदेव प्रसाद से ज्यादा थी? फिर क्यों लालू प्रसाद या नीतीश कुमार ने नहीं कहा कि जगदेव प्रसाद के नाम पर ही विश्वविद्यालय का नाम होगा. वीपी सिंह के नाम पर ही रखा जाता तो भी एक बात होती. वीपी सिंह का इतना हक तो बिहार पर बनता ही है और मंडल की राजनीति को आगे बढ़ानेवालों से इतनी उम्मीद भी की ही जाती है. वे पहचान के तौर पर ही सही, वीपी सिंह का सम्मान करें. मणी कहते हैं, ‘मंडल या आरक्षण अब बूढ़ी गाय हो चुकी है, इसका दोहन अब बात बनाकर उस तरह से नहीं किया जा सकता.’
लालू प्रसाद के संगी-साथी या राजनीतिक विश्लेषक जो सवाल उठा रहे हैं, वह हवाबाजी जैसी बात भी नहीं. लालू के एक सहयोगी कहते हैं, ‘उन्होंने इस चुनाव में देख लिया कि उनके तीन दिग्गज राजपूत नेता जगदानंद सिंह, रघुवंश प्रसाद सिंह और प्रभुनाथ सिंह हार गए. सवर्णों की एक ही जाति पर लालू प्रसाद को ज्यादा भरोसा था. वे मानकर चल रहे थे कि राजपूत पहले की तरह उनका साथ देंगे. लेकिन इस बार उलटा हुआ. जहां-जहां राजपूत उम्मीदवार थे वहां यादवों ने तो राजद के नाम पर राजपूत उम्मीदवारों का साथ दिया, लेकिन राजपूतों ने राजद के नाम पर गैर राजपूत राजद उम्मीदवारों का साथ नहीं दिया.’ जानकारों की मानें तो लालू प्रसाद को लग रहा है कि अब सवर्णों के किसी खेमे से मोह रखने से कुछ हासिल नहीं होनेवाला इसलिए एक बार पिछड़ी राजनीति पर बाजी लगाई जाए. शायद कुछ हासिल किया जा सके. इसीलिए लालू प्रसाद ककहरा रट रहे हैं और कह रहे हैं कि राजद, जदयू और कांग्रेस को मिलाकर 45 प्रतिशत मत मिले हैं, तीनों साथ होते या आगे होंगे तो भाजपा की हवा निकल जाती या निकल जाएगी.
साफ है कि लालू दो और दो चार का हिसाब लगा रहे हैं. उनके और नीतीश, दोनों के ही साथ रहे शिवानंद तिवारी कहते हैं, ‘राजनीति में दो और दो चार कभी-कभी सिर्फ संयोग से ही होता है. लालू प्रसाद अब यदि सिर्फ जाति की राजनीति और मंडल के जरिये नैया पार लगाना चाहते हैं और नीतीश उस पर सवार होना चाहते हैं तो सिवाय घाटे के कुछ नहीं होनेवाला.’ तिवारी आगे कहते हैं, ‘लोकसभा चुनाव में तमाम कोशिशों के बाद यादवों तक का वोट लालू प्रसाद अपने पक्ष में नहीं रख सके तो दूसरों को क्या समेट पाएंगे? पिछड़ी-अतिपिछड़ी जातियों का वोट भाजपा के साथ गया है. उससे लड़ने के लिए 1990 का फॉर्मूला नहीं आजमाया जा सकता. वह एक समय की बात थी. अब बहुत पानी बह चुका है. मंडल का राग गाकर या ठेके में आरक्षण की बात भर करने से पिछड़ी जाति के युवा आकर्षित नहीं होनेवाले. उन्हें रोजगार चाहिए, अच्छी पढ़ाई चाहिए, सारी सुविधाएं चाहिए. ठेका सार्वजनिक तौर पर आर्थिक सशक्तिकरण नहीं करता. इसका दायरा सीमित होता है.’ तिवारी जो कहते हैं उसका विस्तार प्रेम कुमार मणी भी करते हैं. वे कहते हैं, ‘लालू प्रसाद को कुछ भी कहने से पहले आंकड़ों को विस्तार से देखना चाहिए. बीते लोकसभा चुनाव में अतिपिछड़ों के मतों में भाजपा ने जबर्दस्त सेंधमारी की है. अतिपिछड़ों का 42 प्रतिशत वोट भाजपा को गया है, 26 प्रतिशत जदयू को और महज नौ प्रतिशत राजद को. ऐसा क्यों हुआ, इस पर सोचना चाहिए.’
मंडलवादी राजनीति का दौर लौटाने की लालू की इस बात पर जितने लोगों से बात होती है, उनमें ज्यादातर यही कहते हैं कि सबकुछ आजमा कर थक चुके लालू प्रसाद एक बार चित या पट की राजनीति करना चाहते हैं. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘वक्त बहुत आगे निकल चुका है. इसे न तो लालू समझ रहे हैं, न नीतीश. लालू प्रसाद की तरह नीतीश कुमार भी आजकल सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता को ही मूल मसला बनाने की राह पर दिखते हैं, लेकिन अब इतने से युवा पीढ़ी साथ नहीं आनेवाली. विकास एक अहम एजेंडा होगा. इसके इर्द-गिर्द ही सबको रखना होगा.’ अर्थशास्त्री टीएन झा कहते हैं, ‘बिहार में मंडलवादी ताकतों के एकजुट होने, सामाजिक न्याय की धारा को और गति देने की जरूरत है. लेकिन इसके रास्ते क्या होंगे इस पर सोचना होगा. मंडल की राजनीति से एक और सामंती वर्ग का उदय भर न हो, इसका ध्यान रखना होगा. ‘
सवाल सबके सही होते हैं, विश्लेषण भी सबके सही लगते हैं. लेकिन अहम सवाल यह है कि लालू तो अपनी चाल चल चुके हैं. इस चाल से उन्हें क्या फायदा होगा, क्या नुकसान, यह खुद लालू या उनके दल के नेता भी नहीं जानते. हां, इतना तय है कि यह बयान देकर वे भाजपा को मुख्य पार्टी के तौर पर मजबूत करने की एक कोशिश कर रहे हैं. एक ओर भाजपा, दूसरी तरफ लालू या नीतीश या फिर दोनों. माना जा रहा है कि अगली लड़ाई का स्वरूप ऐसा ही होगा. जिस तरह से लोकसभा चुनाव में मुकाबला भाजपा बनाम लालू के बीच रहा, उसी तरह लालू प्रसाद यादव विधानसभा चुनाव में भी भाजपा बनाम लालू के बीच ही मुकाबला रखना चाहते हैं. नीतीश या तो लालू प्रसाद के साथ आएं या फिर अन्य की श्रेणी में रहें.
कांग्रेस पार्टी और नेशनल हेरल्ड की स्थितियों में एक अदभुत समानता है. दोनों ही संस्थाएं आज पूरी तरह से नेहरू-गांधी परिवार के उत्तराधिकारियों की संपत्ति में बदल चुकी हैं. दोनों का ही आरंभिक स्वरूप ऐसा नहीं था. 1885 में देश को आजादी दिलाने के मकसद से बनी कांग्रेस 1947 में आजादी मिलने के बाद एक राजनीतिक-आंदोलनकारी संगठन से पूर्णकालिक राजनीतिक दल में बदल गई. 1947 के बाद से कांग्रेस ने जो रास्ता अख्तियार किया उसके सारे रास्ते नेहरू-गांधी परिवार के इर्द गिर्द आकर समाप्त हो जाते हैं. आज इस परिवार के इतर कांग्रेस का कोई वजूद नहीं है. यही दशा आज नेशनल हेरल्ड की है. आजादी के आंदोलन के दौरान ही भारतीय पक्ष को तत्कालीन राजसत्ता और दुनिया के सामने मजबूती से रखने के मकसद से पंडित जवाहरलाल नेहरू ने नेशनल हेरल्ड नामक अखबार की नींव रखी थी. जिस अखबार की नींव नेहरूजी ने डाली थी उसे आजादी के आंदोलन को समर्थन दे रहे लगभग पांच हजार अन्य भारतीयों का भी समर्थन प्राप्त था. ये लोग नेशनल हेरल्ड को संचालित करने वाली संस्था एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (एजेएल) के शेयरधारक थे. नेशनल हेरल्ड नेहरू का विचार था लेकिन कभी भी यह उनकी निजी संपत्ति नहीं रहा. लेकिन आज नेशनल हेरल्ड और उसकी संपत्तियां तकनीकी तौर पर नेहरू-गांधी परिवार की संपत्ति में तब्दील हो चुकी हैं.
भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में एक याचिका दायर करके इस मामले में कार्रवाई की मांग की है. फिलहाल नेशनल हेरल्ड की सारी संपत्तियां यंग इंडियन नाम की कंपनी के स्वामित्व में हैं. रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी के मुताबिक यह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी की अपनी कंपनी है. लेन देन की इस प्रक्रिया में जिस तरह की चीजें हुई हैं वह पहली नजर में कई सवाल खड़े करती हैं और एक सुनियोजित भ्रष्टाचार का इशारा देती हैं. ऐसे कई मुश्किल सवाल हैं जिनके जवाब आनेवाले समय में कांग्रेस पार्टी और उसके प्रथम परिवार को देने हैं. जवाबदेही की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. इस संबंध में सोनिया गांधी और राहुल गांधी को अदालती नोटिस मिल चुका है. साथ ही कांग्रेस पार्टी को आयकर विभाग ने भी एक नोटिस जारी किया है. पहले नोटिस के मुताबिक सोनिया गांधी और राहुल गांधी को आगामी सात अगस्त को अदालत में हाजिर होना है. हालांकि कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी जो कि इस मामले में गांधी परिवार और कांग्रेस पार्टी की पैरवी कर रहे हैं, का कहना है, ‘हमारे पास अपना पक्ष साबित करने के पर्याप्त आधार हैं, लेकिन मैं कोर्ट में ही इस संबंध में सारी बातें रख पाऊंगा. फिलहाल मैं इस मामले की बारीकियों को उजागर नहीं कर सकता.’
एजेएल के स्वामित्व में बदलाव की कवायद साल 2011 में शुरू हुई थी. इसे जानने से पहले हम नेशनल हेरल्ड के अतीत पर एक नजर डाल लेते हैं. इससे चीजों को समझने में आसानी होगी. नौ सितंबर 1938 को पं. जवाहरलाल नेहरू ने एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड की स्थापना की थी. इस कंपनी का काम था नेशनल हेरल्ड अखबार का प्रकाशन. बाद में इसमें कौमी आवाज, नवजीवन और हेरल्ड साप्ताहिक का प्रकाशन भी जुड़ गया. तब कंपनी की कैपिटल वैल्यू पांच लाख रु थी. इसमें 100 रुपये की कीमत वाले 2000 प्रिफरेंशियल शेयर थे और 10 रुपये कीमत वाले 30,000 सामान्य शेयर थे. उस वक्त करीब पांच हजार शेयरधारकों ने इसमें निवेश किया था. ये वे लोग थे जो आजादी के आंदोलन को समर्थन दे रहे थे और शिद्दत से यह महसूस कर रहे थे कि भारतीय पक्ष को मजबूती से सामने रखने के लिए एक संपूर्ण भारतीय स्वामित्व वाले मीडिया संस्थान का होना आवश्यक है. कंपनी का तत्कालीन मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन कहता है, ‘इसका उद्देश्य संयुक्त प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) समेत देश के दूसरे हिस्सों में समाचार एजेंसी, अखबार और पत्रिका के प्रकाशन, प्रिंटिंग प्रेस और इससे संबंधित समस्त दूसरे व्यवसायों को स्थापित करना और कंपनी के हित में उन्हें संचालित करना है.’
सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका इस पर सवाल उठाती है. इसके शब्दों में, ‘जिस यंग इंडियन नाम की कंपनी ने नेशनल हेरल्ड का अधिग्रहण किया है उसके लक्ष्य में दूर-दूर तक किसी अखबार, पत्रिका या प्रिंटिंग प्रेस को स्थापित करना नहीं है. तो फिर किस नीयत से यह लेनदेन हुआ है.’ कंपनी के मेमोरेंडम पर जवाहरलाल नेहरू के अलावा पुरुषोत्तमदास टंडन, जे नरेंद्र देव, कैलाश नाथ काटजू, रफी अहमद किदवई, कृष्ण दत्त पालीवाल और गोविंद बल्लभ पंत जैसी हस्तियों के हस्ताक्षर हैं. जाहिर है न तो यह व्यक्ति विशेष की कंपनी थी, न ही इसका उद्देश्य समाचारों के अलावा किसी और व्यवसाय से जुड़ना था.
आजादी के बाद भी यह अखबार कांग्रेस की बैसाखी पर चलता रहा. 2008 तक आते-आते स्थितियां ऐसी हो गईंं कि नेशनल हेरल्ड का प्रकाशन संभव नहीं रहा. लिहाजा एजेएल ने इसे बंद करने की घोषणा कर दी. तीन वर्षों तक नेशनल हेरल्ड लोगों की स्मृतियों से ओझल रहा.
इसी बीच पर्दे के पीछे कुछ ऐसे काम हुए जिसने कांग्रेस पार्टी की अपनी साख और उसके प्रथम परिवार की साख पर संदेह खड़ा कर दिया है. साल 2011 की शुरुआत में यंग इंडियन नाम की एक कंपनी का गठन हुआ. इस कंपनी की 76 प्रतिशत हिस्सेदारी सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास है. तकनीकी तौर पर किसी कंपनी मे 74 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी जिस व्यक्ति की होती है वह उस कंपनी का मालिक होता है. उसके पास कंपनी के सारे फैसले करने और किसी भी निर्णय को रद्द करने का अधिकार होता है. बाकी 24 फीसदी में कंपनी के चार दूसरे हिस्सेदार सुमन दुबे, सैम पित्रोदा, मोतीलाल बोरा और ऑस्कर फर्नांडिज हैं. इस कंपनी का गठन कंपनी एक्ट 1956 के सेक्शन 25 के तहत हुआ है. ऐसी कंपनी नॉन प्रॉफिट संस्था होती है यानी यह कंपनी किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधि में हिस्सा नहीं ले सकती. साथ ही वह तमाम स्रोतों से होने वाली आय का इस्तेमाल सिर्फ कंपनी के मूल उद्देश्यों के प्रचार-प्रसार में कर सकती है.
26 फरवरी 2011 को एजेएल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक में एक प्रस्ताव पारित हुआ. यह प्रस्ताव कई सवाल खड़े करता है. इसका मजमून कुछ इस तरह है–एजेएल ने कांग्रेस पार्टी से 90,21,68,980 रुपये का ब्याजमुक्त कर्ज लिया था. इस लेनदारी को कांग्रेस पार्टी ने यंग इंडियन नाम की कंपनी को स्थानांतरित कर दिया लिहाजा अब उसे यह लोन यंग इंडियन को देना था. एजेएल ने इस लोन को खत्म करने के एवज में यंग इंडियन को एजेएल की 10 रुपये कीमत वाले 90,216,898 शेयर जारी कर दिए. इस प्रकार एजेएल का पूरा मालिकाना हक यंग इंडियन के पास चला गया. कांग्रेस पार्टी ने अपने 90,21,68,980 रुपये की जो लेनदारी यंग इंडियन को सौंपी थी उसका निपटारा यंग इंडियन ने उसे 50 लाख रुपये देकर कर दिया. इस पूरे लेनदेन का विवरण 26 फरवरी 2011 को एजेएल द्वारा पास प्रस्ताव में मौजूद है. इस पर एजेएल के तत्कालीन चेयरमैन मोतीलाल बोरा के हस्ताक्षर हैं.
इस पूरे खेल में दिलचस्प तालमेल और हितों का टकराव नजर आता है. यंग इंडियन के एक निदेशक मोती लाल वोरा एजेएल के चेयरमैन मोतीलाल वोरा के सामने एक प्रस्ताव रखते हैं कि वे कांग्रेस पार्टी के कोषाध्यक्ष मोतालाल वोरा से कहकर 90,21,68,980 रुपये के ब्याजरहित लोन की लेनदारी अपने ऊपर यानी यंग इंडियन के ऊपर करवा देंगे. इस सहमति के बाद उन्हीं मोतीलाल वोरा ने 26 फरवरी 2011 को एजेएल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर की एक असाधारण बैठक में यह प्रस्ताव पास करके सारे शेयर यंग इंडियन प्रा. लिमिटेड को दे दिए. इन तीन संस्थाओं में से कांग्रेस पार्टी और यंग इंडियन ऐसी हैं जहां मोतीलाल बोरा सीधे सोनिया गांधी, राहुल गांधी के मातहत की तरह काम करते हैं और इन्हीं दोनों लोगों को इस इस लेन देन में सबसे ज्यादा लाभ होता दिख रहा है.
स्वामी की याचिका यहां पर कुछ सवाल खड़े करती है जिनके जवाब कांग्रेस और उसके शीर्ष नेतृत्व को देने हैं. मसलन एक राजनीतिक दल जो चंदे के रूप में पैसा लेता है वह अपने कोष का इस्तेमाल किसी व्यावसायिक गतिविधि में नहीं कर सकता क्योंकि इस चंदे पर कोई कर नहीं दिया जाता है. आयकर अधिनियम के सेक्शन 13ए और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के सेक्शन 29 ए और सी में विस्तार से विवरण है कि राजनीतिक दल किसी व्यावसायिक गतिविधि में न तो शामिल हो सकते हैं, न ही वे ऐसे किसी उपक्रम में अपने कोष का इस्तेमाल कर सकते हैं. तो फिर कांग्रेस ने कैसे एक निजी कंपनी को 90,21,68,980 रुपये का ब्याजमुक्त कर्ज दे दिया? किस आधार पर कांग्रेस पार्टी ने एक अन्य निजी कंपनी के पास 90,21,68,980 रुपये की लेनदारी ट्रांसफर कर दी और फिर 90 करोड़ की उधारी का निपटारा कैसे सिर्फ 50 लाख रुपये में कर दिया. स्वामी इस प्रक्रिया में कर कानूनों के अलावा चुनाव आयोग के नियमों की भी धज्जियां उड़ाए जाने का आरोप लगाते हैं. उनकी मांग है कि चुनाव आयोग को कांग्रेस पार्टी की मान्यता समाप्त कर देनी चाहिए.
एक नवंबर 2012 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस लेन-देन को उजागर करते हुए स्वामी यह मामला अदालत में ले गए थे. दिलचस्प तथ्य यह है कि स्वामी के आरोप का जवाब देते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी ने तब कहा था, ‘हां, हमने एजेएल को 90 करोड़ रुपये का लोन दिया है. हम नेहरू जी के सपने को फिर से जिंदा करना चाहते हैं. कांग्रेस का हेरल्ड से भावनात्मक रिश्ता है.’ यह बात किसी के गले नहीं उतरी क्योंकि इस घटना के महज 20 दिन पहले ही नौ अक्टूबर 2012 को राहुल गांधी ने पीटीआई से बातचीत में कहा था कि नेशनल हेरल्ड को दोबारा शुरू करने की उनकी कोई योजना नहीं हैं. जाहिर है जनार्दन द्विवेदी ऐसी चादर से अपना और पार्टी का चेहरा छिपाने की कोशिश कर रहे थे जो पूरी तरह से पारदर्शी थी.
सवाल उठता है कि जब हेरल्ड को दोबारा से शुरू करने की कोई योजना नहीं थी तब किस मकसद से एजेएल का मालिकाना हक यंग इंडियन को स्थानांतरित करने की कवायद हुई. स्वामी के मुताबिक यह सारी कवायद हेरल्ड की संपत्तियों पर अधिकार करने के लिए हुई. एजेएल के पास दिल्ली, लखनऊ, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में अचल संपत्तियां हैं. दिल्ली के फिरोजशाह रोड, जहां ज्यादातर प्रमुख अखबारों के दफ्तर मौजूद हैं, पर स्थित सात मंजिला हेरल्ड हाउस की मौजूदा कीमत बाजार भाव के हिसाब से 1600 करोड़ रु के आस पास बतायी जाती है. याचिका के मुताबिक देश भर में फैली हेरल्ड की संपत्तियों की कीमत करीब 5000 करोड़ रुपये है. दिल्ली स्थित हेरल्ड हाउस में फिलहाल कई कंपनियों के दफ्तर काम कर रहे हैं. इसके भूतल और पहली मंजिल पर विदेश मंत्रालय द्वारा पासपोर्ट सेवा केंद्र चल रहा है. इसका उद्घाटन यूपीए-2 की सरकार में विदेशमंत्री रहे एसएम कृष्णा ने किया था. विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक विदेश मंत्रालय किराए के रूप में 60 लाख रुपये प्रति माह की मोटी रकम अदा करता है. इसके अलावा तीसरी और चौथी मंजिल पर टाटा कंपनी की शाखा टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ (टीएसीएस) का दफ्तर है. सूत्रों के मुताबिक टीसीएस प्रति माह 27 लाख रुपये किराया अदा कर रही है. हेरल्ड हाउस की पांचवी मंजिल पर उस यंग इंडियन कंपनी का दफ्तर भी है जिसके पास फिलहाल इसका मालिकाना हक है.
यहां प्रश्न खड़ा होता है कि इन सभी स्रोतों से हो रही लाखों की आय जा कहां रही है. एक टीवी चैनल से बात करते हुए हाल ही में कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला का कहना था, ‘नेशनल हेरल्ड को पुनर्जीवित करने के लिए किराया वसूला जा रहा है.’ सवाल वही है कि जब खुद राहुल गांधी कह चुके हैं कि हेरल्ड को शुरू करने की उनकी कोई योजना नहीं है तब सुरजेवाला किस आधार पर यह दावा कर रहे हैं.
एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड द्वारा 2008 में रजिस्ट्रार ऑफ कंपनी को दी गई शेयरधारकों की सूची इसकी दुर्दशा और गैर पेशेवर कामकाज पर कुछ हद तक रोशनी डालती है. कंपनी के शेयरधारकों में जवाहरलाल नेहरू (मृत्यु 1964), फिरोज गांधी (मृत्यु 1960), इंदिरा गांधी (मृत्यु 1984), घनश्यामदास बिड़ला (मृत्यु 1983), सुचेता कृपलानी (मृत्यु 1974), विजय लक्ष्मी पंडित (मृत्यु 1990) जैसे तमाम नाम शामिल हैं. ये पांच हजार शेयरधारकों में शामिल कुछेक महत्वपूर्ण नाम हैं. तथ्य यह है कि इस सूची में शामिल लगभग 80 प्रतिशत लोग आज इस दुनिया में नही हैं. लेकिन एजेएल ने उन शेयरों को कभी भी उनके वारिसों के नाम स्थांतरित करने की कोई कार्रवाई नहीं की जबकि यह कानूनन जरूरी था. एक तरफ तमाम शेयर धारकों की मृत्यु के बाद भी उनके उत्तराधिकारियों को उनके हिस्से का शेयर कभी जारी नहीं किया गया दूसरी तरफ समय-समय पर गांधी परिवार के उत्तराधिकारी शेयरधारकों की सूची में शामिल किए जाते रहे. इनमें इंदिरा गांधी, फिरोज गांधी से लेकर राहुल गांधी तक शामिल हैं. इस मामले के याचिकाकर्ता स्वामी के मुताबिक राहुल गांधी को एजेएल के शेयरधारकों की सूची में 2008 में शामिल किया गया. एजेएल की सूची के 14वें पन्ने पर राहुल गांधी बतौर शेयरधारक उपस्थित हैं. उनके पास एजेएल के 2,62,411 शेयर थे. लेकिन अपने 2009 के लोकसभा चुनाव के संपत्ति विवरण में राहुल गांधी ने किसी भी तरह के शेयर न होने की घोषणा की थी. बाद में जब 2012में सुब्रमण्यम स्वामी ने यह मामला चुनाव आयोग के सामने रखा तब राहुल गांधी ने ये सारे शेयर अपनी बहन प्रियंका गांधी को स्थांतरित कर दिए. स्वामी का आरोप है कि मामला सामने आने के बाद दबाव में राहुल गांधी ने यह काम बैक डेट में अंजाम दिया.
यहां कुछ और जरूरी सवाल हैं. एजेएल को नेशनल हेरल्ड के प्रकाशन के लिए जो संपत्तियां कौड़ी के भाव लीज पर दी गईं थी, और प्रत्यक्षत: उन्हीं पर अधिकार के लिए यह सारी कवायद चल रही थी, वे कुछ अखबारों के प्रकाशन के लिए थीं. यह बात सर्वविदित है कि 2008 से नेशनल हेरल्ड ठप पड़ा था तब इसकी संपत्तियों को कानूनन जब्त करने की कार्रवाई होनी चाहिए थी. बजाय इसके इनमें तमाम तरह के दूसरी व्यावसायिक गतिविधियां शुरू कर दी गईं.जबकि इसका आवंटन अखबार के प्रकाशन के लिए हुआ था. सुरजेवाला कहते हैं, ‘इस इलाके में स्थित तमाम मीडिया हाउस अपने भवनों को किराए पर देते हैं. इसमें नया क्या है.’ महत्वपूर्ण सवाल यही है कि अव्वल तो एजेएल के शेयर ऐसी किसी कंपनी के पास जाने ही नहीं चाहिए थे जो इस अखबार को निकालना ही नहीं चाहती थी. दूसरा एजेएल के शेयरधारकों को विश्वास में लिए बिना और उन्हें जानकारी दिए बिना ही कंपनी को एक व्यक्तिगत कंपनी के हाथ में कैसे स्थांतरित कर दिया गया.
कानूनी जवाबदेहियों और तकनीकी बारीकियों से अलग इस पूरे मामले में देश के उस प्रथम परिवार की अपनी नीयत और विश्वसनीयता गहरे संकट में है जिसने इस देश को तीन प्रधानमंत्री दिए हैं. सोनिया और राहुल गांधी के सामने कौन सी परिस्थितियां थीं जो उन्हें एजेएल का स्वामित्व अपनी निजी स्वामित्व वाली कंपनी में ट्रांसफर करना पड़ा. कांग्रेस पार्टी पर गांधी-नेहरू परिवार की निजी संपत्ति हो जाने के जो आरोप लगते रहे हैं उन पर इस मामले ने मुहर लगाने का काम किया है. वरना 90 करोड़ रुपये कांग्रेस पार्टी ने जिस तरह से एजेएल को सोनिया गांधी और राहुल गांधी की संपत्ति बनाने के लिए न्यौछावर कर दिए उसे और किस तरह से पार्टी न्यायोचित ठहराएगी. कानूनी पेचीदगियां तो हैं ही, जिन सोनिया और राहुल गांधी को उनकी पार्टी त्याग की प्रतिमूर्ति और देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश कर रही है उन्हें इस पूरे विवाद का उत्तर नैतिकता के पैमाने पर भी देना होगा .
29 जुलाई 1993 की रात कई पुलिसवाले किसी चोरी के संदिग्ध को खोजते हुए पुड्डुचेरी के अतियुर में रहने वाली विजया के घर घुस आए. तब वह सिर्फ 17 साल की थी. उसे परिवार सहित उठा लिया गया. पुड्डुचेरी के एक थाने में छह पुलिसवालों ने उसके साथ बलात्कार किया. बाद में यह मामला अखबारों में भी आया और अदालतों में भी. विजया को अदालत से बाहर मामला खत्म करने की पेशकश भी मिली, जिसे उसने ठुकरा दिया. बाद में निचली अदालत से अभियुक्तों को सजा भी हुई. लेकिन अभियुक्तों की अपील पर 2008 में हाई कोर्ट ने सबको बरी कर दिया क्योंकि तब विजया समय पर अदालत में अपना पक्ष नहीं रख पाई. इंसाफ के लिए विजया तब लड़ती जब जीवन के लिए लड़ने से फुरसत मिलती. अपने आखिरी वर्षों में वह नरेगा के तहत रोजगार की गारंटी खोज रही थी. बीमार-परेशान वह, इस गुरुवार को जीवन से अपनी लड़ाई हार बैठी. यह एक लंबी एकाकी लड़ाई का दारुण अंत रहा.
12 जुलाई के ‘द हिंदू’ में एक छोटी सी खबर छपी तो विजया के जीवन की इस त्रासदी, उसकी यातना, लड़ाई और मौत से मेरा परिचय हुआ. उसकी कोई खबर 20 बरस पहले कहीं पढ़ी भी होगी तो याद नहीं. हममें से बहुतों ने पहले उसका नाम भी नहीं सुना होगा. यह खबर बस याद दिलाती है कि हमारे चारों तरफ कई विजयाएं हैं- बहुत सारी लड़कियां- जो तरह-तरह के शोषण और उत्पीड़न झेल रही हैं और इसके विरुद्ध अपनी एकाकी लड़ाई एक दिन हार जा रही हैं.
विजया आदिवासी थी, सुदूर दक्षिण के एक गांव की थी, उसके साथ जो कुछ हुआ, वह 21 बरस पहले हुआ था, लेकिन आज भी हालात बहुत अलग नहीं दिखते. उल्टे यह दिखता है कि जैसे-जैसे लड़कियां चुनौती भरे क्षेत्रों में आ रही हैं, अपने बारे में चली आ रही मान्यताओं की धज्जियां उड़ा रही हैं, परंपरा को अंगूठा दिखा रही हैं और आधुनिकता को मुंह चिढ़ा रही हैं, वैसे-वैसे उनके इम्तिहान बढ़ते जा रहे हैं. पिछले दो दशकों में मीडिया में बहुत सारी लड़कियां आई हैं. वे अपने छोटे-छोटे शहरों से, भाइयों को मनाती, पिताओं को समझाती, मां की चिंताओं और सबके उलाहनों को पीछे छोड़ दिल्ली में तमाम छोटे-बड़े मीडिया संस्थान संभाल रही हैं, अपनी नई पहचान बना रही हैं, अपनी नई जिंदगी जी रही हैं. लेकिन लड़कियों के साथ जितना पुरुषों को बदलना चाहिए, वे बदलते नहीं दिख रहे. रोज एक के बाद एक ऐसी कहानियां सुनाई पड़ती हैं जहां लगता है कि मीडिया में लड़कियों को आने की सजा दी जा रही है. पिछले दिनों इंडिया टीवी की एक ऐंकर तनु शर्मा ने आत्महत्या करने की कोशिश की. जाहिर है, वह इस क्षेत्र में आत्महत्या करने नहीं आई थी. लेकिन यह पूरा माहौल उसे शायद इतना शत्रुतापूर्ण और हताश करने वाला लगा होगा कि उसने यह विकल्प आजमाने की कोशिश की. हाल की ही एक खबर यह है कि कुछ समय पहले खड़ा हुआ एक अन्य छोटा सा चैनल अपनी एक पत्रकार पर अनर्गल किस्म का आरोप लगा रहा है क्योंकि उसने चैनल के भीतर चल रही गड़बड़ियों का विरोध किया था.
जैसे-जैसे लड़कियां चुनौती भरे क्षेत्रों में आ रही हैं, अपने बारे में चली आ रही मान्यताओं की धज्जियां उड़ा रही हैं, उनके इम्तिहान भी बढ़ते जा रहे हैं
सवाल है, ये लड़कियां क्या करें. वे दफ्तर में शिकायत कर सकती हैं या फिर अदालत की शरण ले सकती हैं. लेकिन वे इस महानगर में केस-मुकदमे के लिए नहीं आई हैं और न ही अपने साथ इतना पैसा लाई हैं कि बिना नौकरी किए यह सब कर सकें. फिर वे अपने समूह के भीतर ही शिकायत करें तो उनके खिलाफ अचानक एक शत्रुतापूर्ण माहौल बन जाता है. और बहुत सारे उत्पीड़न ऐसे सूक्ष्म और बारीक होते हैं कि उन्हें सिर्फ महसूस किया जा सकता है. इसके अलावा एक बार यह बात खुली कि उन्होंने किसी की शिकायत की है या किसी के खिलाफ महिला आयोग या अदालत में गई है तो उनके लिए कहीं और नौकरी मुश्किल है.
तो सामूहिक बलात्कार का मामला हो या एकल उत्पीड़न का- लड़कियां अक्सर अपनी लड़ाई अकेले लड़ने को मजबूर होती हैं. शुरू में वे पूरे हौसले से लड़ती हैं, लेकिन अंततः थक कर तरह-तरह के विकल्प चुनती हैं- खुदकुशी तक के. जाहिर है, ये लड़ाइयां अकेले नहीं लड़ी जा सकतीं. इन्हें एक सांगठनिक शक्ल देने की जरूरत है. क्या ही अच्छा हो कि दिल्ली में अब सैकड़ों की संख्या में हो चुकी महिला पत्रकार एक ऐसा संगठन बनाएं जो तमाम संस्थानों में यौन उत्पीड़न की घटनाओं और शिकायतों पर नजर रखे और जरूरत पड़ने पर उसके खिलाफ लड़ाई भी लड़े. ऐसे संगठन में एक हिस्सा पत्रकारिता की पढ़ाई कर रही छात्राओं का भी हो, जिन्हें अपने लिए एक सुरक्षित भविष्य चाहिए.
फिलहाल कई महिला संगठन हैं, महिला प्रेस क्लब भी है, लेकिन एक ऐसा संगठन जरूरी है जो सिर्फ मीडिया में लड़कियों के साथ हो रहे यौन-उत्पीड़न को रोकने का काम करे. इसके दायरे में मीडिया संस्थानों के भीतर लैंगिक संवेदनशीलता पैदा करने का काम भी शामिल हो. क्योंकि लड़कियां जो कुछ झेलती हैं, उनमें कई बार सीधा उत्पीड़न भले न हो, लेकिन अश्लीलता को छूती फब्तियां, छुपे हुए आमंत्रण और कई बार किसी के भीतर समर्पण की संभावना टटोलने के बारीक प्रयास तक शामिल होते हैं. एक संगठन होगा तो पुरुष सहकर्मियों की यह आदत भी छूटेगी और धीरे-धीरे उनमें साथ काम करने का एक संस्कार भी पैदा होगा. बेशक, यह लड़ाई मीडिया तक सीमित नहीं है, दूसरे क्षेत्रों और संस्थानों में भी शायद यह सब होता हो- लेकिन अगर कहीं से शुरुआत करने की बात हो तो वह मीडिया से ही क्यों न हो.
बेशक, यह लिखने का आशय यह नहीं है कि मीडिया लड़कियों के लिए असुरक्षित जगह है. बल्कि यहीं से वे वह मोर्चा खोल सकती हैं जो जीवन के हर क्षेत्र में उनके लिए सहज सम्मान और बराबरी का भाव सुनिश्चित करे.
बजट बनाते वक्त केंद्र सरकार के सामने देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ी मुख्यतः चार समस्याएं रही होंगीः कभी नौ प्रतिशत तक पहुंचने के बाद पांच फीसदी पर लुढ़क चुकी विकास दर, आम आदमी की जेब से बाहर जाती महंगाई (जो कि मानसून की गड़बड़ी की अवस्था में और ज्यादा गंभीर हो सकती है), बढ़ा हुआ वित्तीय घाटा (जिसे पिछली सरकार ने कुछ कम तो किया, लेकिन तरीका विकास की दर को पीछे धकेलने वाला रहा) और पिछली सरकार के निर्णयों और अनिर्णयों के चलते पाताल के स्तर पर पहुंच चुका देशी और बाहरी निवेशकों का विश्वास.
जब सरकार ने 10 जुलाई को केंद्रीय बजट देश के सामने रखा तो उसे जैसा कि इतने बड़े और विविधताओं वाले देश में होना ही था – दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं मिलीं. इनमें से ज्यादातर नकारात्मक प्रतिक्रियाओं का ऊपर लिखी समस्याओं से दूर का भी संबंध नहीं था. इनमें से भी मोटे तौर पर चार-पांच कुछ इस तरह थीं: पूरे बजट में धमाकेदार कुछ नहीं है, बजट पुरानी सरकार का ही लग रहा है, बजट में सौ-करोड़ी योजनाओं की भरमार है जिनमें से ज्यादातर का 100 करोड़ में कुछ हो ही नहीं सकता, बजट में कई महत्वपूर्ण योजनाओं से ज्यादा धन सरदार पटेल की मूर्ति की स्थापना के लिए दिया गया है और वित्तमंत्री ने पिछली सरकार द्वारा जबरिया लागू किए गए ‘पिछली तारीख से लागू होनेवाले कर कानून’ को समाप्त नहीं किया.
इन प्रतिक्रियाओं पर वित्तमंत्री स्पष्टीकरण दे चुके हैं, लेकिन कुछ पर और बात करना चाहें तो इस सरकार ने 26 मई को शपथ ली थी. स्वाभाविक है कि बधाइयों-सम्मान आदि के चलते सही तरह से कार्यभार संभालने में केंद्रीय मंत्रियों को दो-चार दिन लग ही गए होंगे. तो कहा जा सकता है कि काम के दिन उसे 35-40 ही मिले होंगे. ऐसे में कितना बड़ा धमाका और वह भी अलग तरह का किया जा सकता था? जल्दी का काम शैतान का होता है इस कहावत को यहां क्यों लागू नहीं होना चाहिए? सरकार से बाहर या चुनाव प्रचार के दौरान सरकारी नीतियों का विरोध करना अलग बात है, लेकिन सरकार होकर बड़े और सही तरह के बदलाव 40 दिन में तो नहीं ही लाए जा सकते है.
इसीलिए कई लोगों को बजट में यूपीए सरकार की झलक भी मिल रही है. हालांकि परेशानी तो तब होनी चाहिए थी जब ऐसा नहीं होता. यदि वर्तमान सरकार ने बिना सोचे-समझे सिर्फ दिखाने के लिए पुरानी सरकार से ज्यादा अलग जाने की कोशिश नहीं की तो इसे राजनीति के सकारात्मक पक्ष की तरह भी देखा जा सकता है. चाहें तो अपनी इस सोच पर हम अपने ऊपर ही हंस सकते हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान कही बातों को अक्षरशः लेकर हम रातों-रात बदलाव की नौसिखिया उम्मीद लगाए बैठे थे. अगर हमने एक दिन में चांद पर पहुंचाने वाले चुनावी वादों पर आंख-मूंदकर भरोसा किया तो यह हमारी भी गलती थी. आज अगर हम उन्हीं नारों के गलत आधार पर किसी तर्कसंगत चीज को गलत ठहराते हैं तो यह हमारी एक और गलती होगी. पांच साल चलने की सोच रखने वाली सरकारों के काम करने का तरीका दूसरा होना चाहिए, वैसा नहीं जैसा दिल्ली पर सिर्फ 50 दिन राज करने वाली केजरीवाल सरकार का था.
अगर मानें तो इस बजट को भी अंतरिम माना जा सकता है. सरकार को मिले कम समय की वजह से भी और बजट को मिलने वाले कम समय (आठ महीने) के लिए भी. फिलहाल तो इसमें अगर कुछ बड़ा कहने लायक नहीं है तो कुछ बुरा कहने लायक भी नहीं है. बल्कि कई चीजें ऐसी हैं जो सकारात्मक हैं या ऐसी उम्मीद जगाती हैं. मसलन सरकार ने टैक्स में छूट आदि देकर आम आदमी की बढ़ी हुई क्रय-शक्ति के जरिये अर्थव्यवस्था की उत्पादकता बढ़ाने की कोशिश की है. और पिछली सरकार की मनरेगा सरीखी योजनाओं को न केवल चालू रखने बल्कि सही मायनों में लोगों और अर्थव्यवस्था के लिए उपयोगी बनाने की बात भी कही है.
आने वाले समय में, सरकार ने, जो बजट में किया है, करने को कहा है और जो वह बिना कहे करेगी, उस सबके सम्मिलित आधार पर उसके बारे में कोई निष्कर्ष निकालना ज्यादा उचित होगा. केवल इस बजट में लिखे हुए को पढ़ने से निकलने वाले निष्कर्षों की प्रवृत्ति भी बजट की तरह ही अंतरिम से ज्यादा शायद ही कुछ और होगी.