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बड़ा इम्तिहान

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हिंदी फिल्म का मशहूर गीत, ‘जिंदगी इम्तहान  लेती है’ इन दिनों उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत पर मौजूं है. सूबे की बागडोर थामने के रोज से ही वे परीक्षाओं से गुजर रहे हैं, लेकिन अब जो परीक्षा उनके सामने है, वह अब तक की तमाम परीक्षाओं से कठिन और निर्णायक मानी जा रही है. इसका नतीजा उनके राजनीतिक  भविष्य की इबारत लिखेगा. यह परीक्षा है सूबे में तीन विधान सभा सीटों पर पर तय हो चुके उपचुनाव की. 21 जुलाई को होने जा रहे इस चुनाव के जरिए रावत को मुख्यमंत्री बने रहने के लिए अपनी सीट तो जीतनी ही है,  सत्ता पर मजबूत पकड़ बनाने के लिए बाकी सीटें भी हासिल करनी हैं.

मगर यह इतना आसान नहीं है. दरअसल गैरसैंण में विधानसभा सत्र निपटाने तक हालात मुख्यमंत्री के अनुकूल माने जा रहे थे. देहरादून लौटने तक प्रदेश कांग्रेस की कमान उनके सिपहसालार किशोर उपाध्याय के हाथों मेंं आ चुकी थी. लोकसभा चुनाव की हार के बाद जहां समूची कांग्रेस सदमे में थी, रावत सियासी चौसर पर मोहरें बिछा रहे थे. उनकी हर चाल मनमाफिक पड़ रही थी. यह उनकी सियासी चाल का ही नतीजा था कि उनके वफादार विधायक हरीश धामी ने धारचूला से उनके लिए सीट खाली कर दी, जबकि पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता डॉ रमेश पोखरियाल निशंक के सांसद चुने जाने के बाद डोईवाला सीट खाली थी. लेकिन रावत एक तीर से दो निशाने साधने की फिराक में थे. सियासी हवाओं में चर्चा तैर रही थी कि वे डोईवाला और धारचूला से चुनाव लड़ेंगे. इसके लिए डोईवाला में हरीश समर्थकों की टीम उतार दी गई थी.लेकिन तभी हेलीकॉप्टर में हुए एक हादसे ने उनकी रफ्तार पर मानों ब्रेक लगा दिए. गर्दन में लगे झटके के चलते हुई तकलीफ ने उन्हें दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) पहुंचा दिया. तकरीबन दो हफ्ते से रावत सूबे की सियासत को एम्स से ही कंट्रोल करने की कोशिश कर रहे हैं. नियति ने ऐसी पलटी मारी है कि जिन मंत्रियों को उन्होंने एक महीने तक विभागों के लिए तरसाए रखा, उन्हीं मंत्रियों को अब उन्हें शासन के कामकाज का जिम्मा बांटना पड़ रहा है. वरिष्ठ काबीना मंत्री डॉ इंदिरा हृदयेश उनकी अनुपस्थिति में महत्वपूर्ण मामलों को देख रही हैं. इंदिरा कहती हैं, ‘मुख्यमंत्री को आराम की सलाह दी गई है. इसमें एक महीना भी लग सकता है. ऐसे में मुझे शासन के मसलों को देखने के लिए कहा गया है.’

बहरहाल, इंदिरा सचिवालय के चौथे तल पर बैठ कर रोजाना आला अधिकारियों की बैठक ले रही हैं. लेकिन इसके बावजूद संवैधानिक तौर पर वे शासकीय कार्यों में निर्णय लेने के लिए अधिकृत नहीं हैं. पूर्व आईएएस अफसर एसएस पांगती कहते हैं, ‘संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि मुख्यमंत्री की जगह किसी मंत्री को जिम्मा सौंप दिया जाए. ऐसे हालात में वरिष्ठ सदस्य को मुख्यमंत्री पद की बाकायदा शपथ दिलाकर जिम्मेदारी तय की जाती है.’

मगर उत्तराखंड में यह मुमकिन नहीं. मुख्यमंत्री की कुर्सी हरीश रावत ने बड़ी मुश्किल से हासिल की है. इसके लिए उन्हें लंबा इंतजार करना पड़ा है. सत्तारूढ़ कांग्रेस के जो हालात हैं उनमें ‘विश्वास’ के लिए कोई जगह नहीं दिखती. मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाए जाने के बाद विजय बहुगुणा समर्थक भी रावत की घेराबंदी में जुटे हैं. वे रावत को उन्हीं की चाल से जवाब देना चाहते हैं. यह खेमा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद पर उपाध्याय की ताजपोशी से नाराज हैं. कैबिनेट के दबंग मंत्री डॉ हरक सिंह रावत के इस बयान कि उपाध्याय को अध्यक्ष बनाए जाने से पार्टी के एक बड़े तबके में नाराजगी है, ने साफ कर दिया है कि कांग्रेस के भीतर सबकुछ ठीक नहीं है. हरक ने मुख्यमंत्री के डोईवाला और धारचूला से चुनाव लड़ने की संभावनाओं पर भी सवाल उठाए. उनके इस बयान के तीन दिन बाद ही कांग्रेस आलाकमान से तीन सीटों के लिए उम्मीदवारों की सूची जारी हुई. इस सूची के मुताबिक हरीश रावत  को धारचूला से उम्मीदवार बनाया गया है. डोईवाला से पार्टी ने तिवारी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे हीरा सिंह बिष्ट को उतारा है. बिष्ट डोईवाला से 2012 में बेहद कम अंतर से चुनाव हार गए थे. कांग्रेस संगठन से जुड़े सूत्रों की मानें तो सीएम बेशक एम्स में  भर्ती हैं लेकिन प्रदेश के सियासी हालात पर पैनी नजर रखे हुए हैं. सूत्रों का कहना है कि अस्पताल में भर्ती होने  तक सीएम का डोईवाला से चुनाव लड़ने का पक्का मन था. लेकिन विरोधी खेमे के मंसूबों को भांप कर रणनीति बदल दी गई. डोईवाला की जगह अब सोमेश्वर सीट पर फोकस किया गया है. वहां भाजपा छोड़कर कांग्रेस में लौटी रेखा आर्य पर दांव खेला जा रहा है. टिकट फाइनल होने से एक दिन पहले ही आर्य को पार्टी में लाया गया. उनकी एंट्री एम्स में मुख्यमंत्री की मौजूदगी में हुई. लोकसभा का टिकट काटे जाने से आर्य भाजपा से नाराज थीं. कांग्रेस ने इसका फायदा उठाया.

हरीश रावत को धारचूला से  चुनाव लड़ना है. कांग्रेस उनकी जीत को लेकर आश्वस्त है. लेकिन सीएम की निगाहें डोईवाला और सोमेश्वर पर ही लगी हैं. दोनों सीटों पर जीत उनकी स्थिति मजबूत करेगी. अभी कांग्रेस पार्टी के 32 विधायक हैं. सरकार बसपा के तीन, यूकेडी के एक और तीन निर्दलीय विधायकों के समर्थन से चल रही है. उपचुनाव में तीनों सीटें मिलने से कांग्रेस बहुमत से सिर्फ एक सीट दूर रह जाएगी. बेशक तब भी सरकार गठबंधन के सहयोग से चले, लेकिन उस सूरत में रावत के पास खुलकर निर्णय लेने की आजादी रहेगी.

ये उपचुनाव नये नवेले प्रदेश अध्यक्ष बने किशोर उपाध्याय के रणनीतिक कौशल की भी परीक्षा माने जा रहे हैं. यही वजह है कि विरोधियों की तगड़ी घेराबंदी के बावजूद वे अपना पूरा फोकस उपचुनाव पर केंद्रित किए हुए हैं. वे जानते हैं कि चुनाव में पार्टी को कामयाबी मिलने की स्थिति में उन्हें इसका दोहरा लाभ मिलेगा. इसीलिए वे किसी तरह की अनावश्यक बयानबाजी से भी परहेज कर रहे हैं. एकजुटता उनका सूत्रवाक्य बन चुका है. वे जहां जा रहे हैं, एकजुटता की ही बातें कर रहे हैं. वे कहते हैं, ‘पार्टी में उत्साह लौट रहा है. त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में भाजपा मोदी के ‘हैंगओवर’ से बाहर आ गई है और उसके अधिकांश प्रत्याशी चुनाव हार गए हैं. साफ है कि उपचुनाव में भाजपा की डगर आसान नहीं होगी. पार्टी की स्थिति इस कदर खराब है कि कई-कई दावेदारों के चलते वह अभी तक प्रत्याशी ही तय नहीं कर पाई है. कांग्रेस तीनों सीटों पर जीत दर्ज करेगी.’

लेकिन प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत, उपाध्याय की बातों से इत्तेफाक नहीं रखते. टिकटों के ऐलान में हो रही देरी को वे सांगठनिक प्रक्रिया का हिस्सा बताते हैं. इसके अलावा एक ही सीट पर कई-कई दावेदारों के नाम सामने आने को भी वे पार्टी के पक्ष में बताते हैं. उनका कहना है कि जीत की संभावनाओं को देखते हुए ही पार्टी में चुनाव लड़ने के लिए ज्यादा नाम सामने आ रहे हैं.

कुल मिलाकर सूबे का सियासी परिदृश्य लोक सभा चुनाव के ठीक उल्टा है. तब भाजपा ने अपने प्रत्याशी पहले ही उतार दिए थे, लेकिन इस बार वह इस मामले में कांग्रेस से पिछड़ गई है. हालांकि असली हार-जीत तो उपचुनाव के नतीजों से ही तय होनी है.

चैनलों का ‘ओमेर्ता कोड’

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मनीषा यादव

वैसे तो न्यूज चैनल हर छोटी-बड़ी घटना और मुद्दे को रिपोर्ट करने, उसे ‘खींचने और तानने’ और उसपर ‘बड़ी/महाबहस’ करने को तैयार रहते हैं लेकिन उनके लिए एक विषय/मुद्दा अभी भी ‘टैबू’ बना हुआ है जिसपर रिपोर्ट करने और चर्चा करने पर चैनलों में अघोषित पाबंदी-सी लगी हुई है. वह विषय है: चैनलों में काम करनेवाले पत्रकारों खासकर महिला पत्रकारों और उनकी कामकाज की परिस्थितियां, सेवाशर्तें और न्यूजरूम का माहौल. इससे संबंधित किसी घटना/मुद्दे पर चैनलों की चुप्पी और आपसी एकता हैरान करनेवाली होती है.

ताजा उदाहरण है- ‘इंडिया टीवी’ की एंकर तनु शर्मा की आत्महत्या की कोशिश का मामला. एंकर तनु शर्मा ने बाकायदा फेसबुक पर स्टेट्स अपडेट करके चैनल के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों पर परेशान और उत्पीड़ित करने का आरोप लगाते हुए चैनल के दफ्तर में जहर खाकर आत्महत्या की कोशिश की. शुक्र है कि वे बच गईं और पुलिस चैनल के कुछ अधिकारियों पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज करके छानबीन कर रही है. चैनल का सफाई में कहना है कि तनु शर्मा ने खुद को परेशान करने की कभी कोई शिकायत किसी वरिष्ठ अधिकारी या चैनल की यौन उत्पीड़न समिति को नहीं कराई और उनके आरोप झूठे और मनगढंत हैं.

इस प्रकरण में सच क्या है, यह पता करना मुश्किल है. इसकी वजह यह है कि इस मामले की पड़ताल और उसे फालो-अप करना तो दूर, किसी न्यूज चैनल ने इसे रिपोर्ट करने लायक तक नहीं माना. चैनलों के लिए यह टिकर पर चलने लायक खबर भी नहीं बन पाई. सवाल यह है कि बिना स्वतंत्र रिपोर्टिंग, छानबीन और फालो-अप के इस मामले का सच कैसे सामने आएगा. हालांकि अगले दिन कुछ अखबारों ने इस घटना की संक्षिप्त रिपोर्ट छापी, लेकिन चैनलों की चुप्पी चुभनेवाली थी. आखिर उन्हीं दिनों न्यूज चैनलों पर प्रीति जिंटा-नेस वाडिया मामले की 24×7 रिपोर्टिंग हो रही थी और ऐसे सभी मामलों की रिपोर्टिंग में चैनलों की सक्रियता और उत्साह देखते ही बनती है.

यही नहीं, चैनलों का दावा रहा है कि महिलाओं के उत्पीड़न और परेशान करने के कई मामलों में उनकी सक्रियता के कारण ही पीड़ितों को न्याय मिल पाया. फिर चैनलों ने तनु शर्मा की आत्महत्या की कोशिश के मामले को रिपोर्ट करने लायक क्यों नहीं माना?  कहीं यह चैनलों के प्रबंधन के एक सामूहिक अपराध में शामिल होने के कारण बने ‘ओमेर्ता कोड’ का नतीजा तो नहीं है जिसमें अघोषित सहमति के आधार पर कोई चैनल, दूसरे चैनल के अंदरूनी हालात/घटनाओं की रिपोर्ट नहीं करता है? कहीं इसके पीछे यह डर तो नहीं है कि आज अगर इस मामले को रिपोर्ट किया तो कल उनके यहां भी ऐसे ही मामलों की रिपोर्ट होने लगेगी और चैनलों के सुनहरे पर्दों के पीछे छिपे दमघोंटू माहौल और पत्रकारों खासकर महिला पत्रकारों के कामकाज की बदतर परिस्थितियों और सेवाशर्तों की सच्चाई सामने आ जाएगी? आखिर इसके अलावा तनु शर्मा-इंडिया टीवी मामले की रिपोर्ट न करने का और क्या कारण हो सकता है? यह कोई पहला मामला नहीं है जब चैनलों ने अपने अंदर की ‘खबरों’ को अनदेखा किया है. कुछ महीनों पहले चैनलों ने नेटवर्क-18 /टीवी-18 से 350 से ज्यादा पत्रकारों/कार्मिकों की छंटनी पर चुप्पी साध ली थी.

इसी तरह अखबारों में कार्यरत पत्रकारों को मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक वेतन न देने के बारे में अनगिनत शिकायतों की रिपोर्ट आपको किसी अखबार/चैनल में नहीं दिखाई देगी. शायद कॉरपोरेट न्यूज मीडिया के अंदर लागू इस ‘ओमेर्ता कोड’ से बने दमघोंटू माहौल, कामकाज की बदतर परिस्थितियों और कहीं कोई सुनवाई नहीं होने के कारण हताशा में तनु शर्मा को आत्महत्या की कोशिश जैसा चरम कदम उठाना पड़ा. लेकिन अफसोस! यह भी चैनलों के ‘ओमेर्ता कोड’ को तोड़ने में नाकाम रहा. लगता है कि चैनल किसी मौत का इंतजार कर रहे हैं.

‘गंदे कंबल में इंसानियत की गर्माहट मिली’

मनीषा यादव

यह बात वर्ष 2002 की है. मैंने नवोदय विद्यालय से 12वीं की परीक्षा दी थी और परिणाम की प्रतीक्षा कर रहा था. वह दौर कुछ ऐसा था कि मेरी उम्र का हर बच्चा या तो डॉक्टर या फिर इंजीनियर बनना चाहता था. मेरे जो गिनेचुने शौक थे उनमें घुमक्कड़ी भी शाामिल थी. यही वजह है कि जब मुझे मेडिकल की अखिल भारतीय परीक्षा में आवेदन करने का मौका मिला तो मैंने चुपके से परीक्षा केंद्र का विकल्प देहरादून भर दिया. प्रवेश पत्र आया तो घर पर सब लोग चौंक गए लेकिन किया ही क्या जा सकता था. पिताजी ने मुझसे कहा कि मुझे परीक्षा देने अकेले ही जाना होगा. मुझे तो मुंहमांगी मुराद मिल गई.

निर्धारित दिन मैं लखनऊ से ट्रेन पकड़कर देहरादून पहुंचा और होटल में ठहर गया. रातभर आराम करने के बाद सुबह परीक्षा देने निकला तो मेरी दो और लोगों से दोस्ती हो गई. परीक्षा खत्म होने के बाद हम आपस में मिले तो घूमने की योजना बनी. वापसी की ट्रेन का आरक्षण दूसरे दिन का था. उस समय तक मैं मसूरी नहीं गया था. मैंने उनके सामने मसूरी घूमने का प्रस्ताव रखा लेकिन दोनों साथियों ने पैसों की कमी की बात कहकर मना कर दिया. उनका प्रस्ताव देहरादून के आस-पास घूमने का ही था. पैसे मेरे पास भी कम ही थे पर मसूरी घूमने की हसरत तो थी ही.

आखिर में मैंने अकेले जाने का निश्चय किया. सोचा की शाम तक लौट आऊंगा. सिर्फ आने-जाने का खर्च लगेगा. फिर मैंने तुरंत बस पकड़ ली और मसूरी पहुंच गया. मसूरी पहुंचकर मैं वहां की सुंदरता और मनोरम दृश्य देखने में व्यस्त हो गया. माल रोड घूमने में काफी समय निकल गया. वहां घूमते हुए मैंने समय पर ध्यान ही न दिया. जब हल्का सा अंधेरा हुआ तो मैंने वापस लौटने का निश्चय किया. मैं बस स्टॉप पर पहुंचा तो पता चला कि अंतिम बस आधे घंटे पहले ही जा चुकी. मौसम खराब होने के चलते कोई टैक्सी भी नहीं मिल रही थी. काफी पूछ-ताछ के बाद भी कोई जुगाड़ न हो सका. आखिरकार मैंने रात मसूरी में ही बिताने का निश्चय किया. रात में वहां रुकने के लिए होटल लेना जरूरी था. मैंने अपने जेब के पैसों का हिसाब लगाया तो लगा कि कोई सस्ता होटल लिया जा सकता है सुबह वापस देहरादून लौट चलेंगे. मैं माल रोड पर होटल खोजने निकल पड़ा. काफी खोजने के बाद भी किसी होटल में जगह न मिली. सभी सस्ते होटल फुल थे. जिनमंे कमरे खाली थे वहां रुकने का खर्च काफी महंगा था. काफी मशक्कत के बाद मैंने रात ऐसे ही सड़क पर घूमटहल कर बिताने का इरादा बनाया. मुझे मसूरी की रात की जीवनशैली का अंदाजा न था. मैं माल रोड पर इधर से उधर चक्कर लगाने लगा. लेकिन थोड़ी देर में मौसम और बिगड़ने लगा. बूंदा-बांदी और तेज हवाएं चलने लगीं. थोड़ी देर में ही सड़कों पर सन्नाटा हो गया. मैंने भीगने से बचने के लिए नजर दौड़ाई तो रोप-वे सेंटर के बगल में थोड़ी सी जगह दिखी जो बारिश और हवा से बचा सकती थी. मैं भाग कर वहां पहुंचा तो देखा कि एक शख्स पहले से ही वहां पर था. उसके कपड़े काफी गंदे थे और उसने खुद को ठंड से बचाने के लिए एक गंदा सा कंबल ओढ़ रखा था. मैं वहां पहुंच कर खड़ा हो गया. पर बार-बार मेरी नजर उधर जाती और उसका मैला-कुचैला रूप देख मैं असहज हो जाता. आखिर मैंने वहां से कुछ दूर एक दूसरी दुकान के नीचे रुकने का निश्चय किया. मैं भाग कर वहां पहुंच तो गया पर फिर समझ में आया कि वहां बारिश से तो बचा जा सकता था लेकिन तेज हवाएं वहां सीधे लग रही थीं. एक बार फिर मैंने वापस उसी स्थान पर जाने की सोची पर फिर उसकी गंदगी का ख्याल करके वहीं बेंच पर लेट गया. अब तक ठंड काफी बढ़ चुकी थी. वह व्यक्ति मुझे चुपचाप देख रहा था. मैंने बैग से चादर निकाली, और उसी में खुद को लपेट लिया. पर उस ठंड में यह नाकाफी था. मैं अपनी आंखें बंद कर लेट गया. मुझे कब नींद आई पता नहीं.

‘मैं वहां पहुंचा, देखा कि एक बंदा पहले से ही वहां पर था. उसके कपड़े गंदे थे और उसने ठंड से बचने के लिए एक गंदा सा कंबल ओढ़ा था’

सुबह नींद खुली तो देखता हूं, वही गंदा कंबल मेरे ऊपर पड़ा था और बेंच से कुछ दूरी पर कुछ लकड़ियां जली थीं. कंबल हटाते ही सर्द हवा के झोंके से पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई. मैंने सामने रोप-वे की तरफ नजर डाली तो वहां उस व्यक्ति का कोई पता नहीं था. कुछ दूर एक दुकानदार से पूछने पर पता चला कि मैं रात में ठंड से कांप रहा था. यह देखकर उस व्यक्ति ने अपना कंबल मुझपर डाल दिया और आस-पास से लकड़ियां इकट्ठी करके जला दीं. सुबह की ठंड से अंदाजा लगाया जा सकता था की रात में क्या हालत रही होगी. आस-पास उस व्यक्ति का कोई पता नहीं था. मुझे देहरादून लौटना था. दोपहर बाद ट्रेन थी. मैंने कंबल वहीं रख दिया जहां पहली बार उसे देखा था और खुद बस में बैठ गया. बस में मेरे दिमाग में यही चल रहा था कि अगर उसने मुझे ठंड से बचाने का इंतजाम न किया होता तो मेरी क्या हालत होती?

इतने सालों बाद भी जब कभी सर्दियों में देर रात ऑफिस से निकलता हूं तो सड़क किनारे ठंड से कंपकंपाते लोगों को देखकर उस अनजान मददगार के प्रति मन आभार से भर जाता है.

(कौशलेंद्र विक्रम लेखक पत्रकार हैं और लखनऊ में रहते हैं)

बड़े भाई का ‘बिगब्रदर-पन’

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जबकि पूण् एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमेरिकी िा£‍परत बिाक ओबामा औि जमि्न चांसलि अंगेला मेकि्ल
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अमेरिकी स्वाधीनता दिवस हर वर्ष चार जुलाई को बर्लिन में भी प्रमुखता के साथ मनाया जाता है. इस बार भी मनाया गया. लेकिन, जर्मनी में अमेरिकी राजदूत जॉन इमर्सन इस बार जब स्वाधीनता दिवस के समारोह में पहुंचे तो कुछ घबराए हुए-से थे. अपने भाषण में इस बार वे जर्मन-अमेरिकी संबंधों की मधुरता में कुछ ज्यादा ही चाशनी घोलते लगे. हुआ यह था कि कुछ ही घंटे पहले उन्हें जर्मन विदेश मंत्रालय में बुलाया गया था. मंत्रालय के राज्यसचिव स्तेफान श्टाइनलाइन ने उन्हें सूचित किया कि जर्मनी की वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘बीएनडी’ के एक ऐसे कर्मचारी को गिरफ्तार किया गया है, जिस पर अमेरिका के लिए जासूसी करने का शक है. उसके साथ संपर्क अमेरिकी दूतावास के माध्यम से किया गया था. मित्र देशों के बीच यह अच्छी बात नहीं है. जर्मन सरकार चाहती है कि मामले की त्वरित जांच में अमेरिकी दूतावास पूरा सहयोग प्रदान करे.

मार्कुस आर नाम के ‘बीएनडी’ के इस 31 वर्षीय गिरफ्तार कर्मचारी पर शक है कि उसने अमेरिकी जासूसों को कम से कम 218  गोपनीय दस्तावेज दिए हैं. कुछ दस्तावेज तो उस संसदीय जांच-समिति के लिए थे जो दुनियाभर के इलेक्ट्रॉनिक दूरसंचार (इंटरनेट, ईमेल, फैक्स और टेलीफोन) की आहट ले रही अमेरिकी गुप्तचर सेवा ‘राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी’  (नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी एनएसए) की जर्मनी में चल रही गतिविधियों का आयाम जानने के लिए गठित की गई हंै.

एडवर्ड स्नोडन की भूमिका
इन गतिविधियों का पता पिछले वर्ष तब चला था, जब ‘एनएसए’ का ही एक भेदिया एडवर्ड स्नोडन ढेर सारे गोपनीय दस्तावेजों की नकल (कॉपी) उतार गायब हो गया था और हंगकांग के रास्ते से मॉस्को पहुंचा था. वहां एक साल की अस्थाई शरण मिलते ही ये दस्तावेज प्रकाशन के लिए उसने अमेरिका और यूरोप के कुछ चुने हुए अखबारों एवं पत्रिकाओं को दिए थे. संसदीय जांच समिति और जर्मनी की विपक्षी पार्टियां विस्तृत पूछताछ के लिए स्नोडन को जर्मनी बुलाना चाहती हैं, लेकिन अमेरिका के तुष्टीकरण के लिए प्रयत्नशील जर्मन सरकार इसकी अनुमति नहीं दे रही.

बड़े भाई अमेरिका के किसी राजदूत को विदेश मंत्रालय में बुलाकर राजनयिक विरोध-प्रदर्शन जर्मनी के लिए बहुत ही अनहोनी बात है. जर्मनी तो वह देश है जहां के नेता अनन्य कृतज्ञताभाव से कहते नहीं थकते कि उनका देश अमेरिका का सदा ऋणी रहेगा. अमेरिकी हथियारों और सैनिकों के बिना द्वितीय विश्वयुद्ध के मित्र-राष्ट्रों की विजय और जर्मनी में हिटलर की फासिस्ट तानाशाही का अंत संभव ही नहीं हो सका होता. अमेरिकी सहायता व संरक्षण के बिना विभाजित जर्मनी के पश्चिमी भाग में लोकतंत्र की स्थापना, युद्ध से खंडहर बन गए देश का पुनर्निर्माण,  1960-70 वाले दशक में ‘आर्थिक चत्मकार’ और बर्लिन-दीवार गिरने के बाद 1990 में पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का शांतिपूर्ण एकीकरण भी संभव नहीं हो पाया होता. यही नेता आज कहने पर विवश हैं कि ‘बस, अब बहुत हो गया!’

जर्मन वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘बीएनडी’ के अध्यक्ष गेरहार्ड शिंडलर ने अमेरिकी गुप्तचरी संबंधी  संसदीय जांच समिति को बताया कि मार्कुस आर संभवतः दो वर्षों से अपने विभाग के गोपनीय दस्तावेज चोरी-छिपे घर ले जाकर उन्हें स्कैन करता और एक अमेरिकी गुप्तचर एजेंट को देता रहा है. क्योंकि ऐसे और भी विश्वासघाती हो सकते हैं, इसलिए उनका पता लगाने के लिए ‘बीएनडी’ के लगभग सभी छह हजार कर्मचारियों के कार्यकलापों की अब जांच की जा रही है. जर्मन गुप्तचर सेवाएं अब तक यही मान कर चल रही थीं कि केवल रूसी या चीनी जासूस ही इस तरह के दस्तावेज पाने को लालायित रहते हैं, अमेरिकी नहीं.

ऐसा भी नहीं है कि जर्मन वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘बीएनडी’ अमेरिका की ‘एनएसए’, ‘सीआईए’ या किसी अन्य गुप्तचर एजेंसी की प्रतिस्पर्धी या प्रतिद्वंद्वी है. सच तो यह है कि इन सभी सेवाओं की आपस में मिलीभगत भी है. तब भी, ‘बीएनडी’ में सेंध लगाने की इस घटना से उड़ी धूल बैठी भी नहीं थी कि सप्ताह भर के भीतर ही एक और समाचार आया–जर्मन रक्षा मंत्रालय का एक असैनिक कर्मचारी भी अमेरिका की वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘सीआईए’ को गोपनीय जानकारियां देता रहा है.

अमेरिका जासूसी की हर विधा को एक ऐसा सधा हुआ अस्त्र मानता है, जिसके इस्तेमाल में उसे अपनों-परायों या शत्रु-मित्र के बीच कोई भेद स्वीकार्य नहीं

एक ही सप्ताह के भीतर जर्मन भूमि पर अमेरिकी जासूसी के दो-दो सनसनीखेज़ समाचारों से खलबली मच गई. जनता व नेताओं को लगने लगा, मानो देश के कोने-कोने में अमेरिकी जासूस बैठे हुए हैं. यह दूसरा समाचार जर्मन रक्षा मंत्रालय के एक ऐसे कर्मचारी से संबंधित था जो पहले सर्बिया का एक प्रदेश रहे और अब स्वतंत्र देश बन गए कोसोवो में तैनात ‘केफोर’ शांतिसेना का राजनीतिक परामर्शदाता रह चुका है. वहां उसे अपने ही समवर्ती एक ऐसे अमेरिकी परामर्शदाता से अक्सर मिलना-जुलना होता था जो कोसोवो में गुप्तचर सेवा सहित एक नया प्रशासनिक ढांचा खड़ा करने में हाथ बंटा रहा था. 2010 से दोनों कई बार तुर्की व अन्य देशों में भी मिलते-जुलते रहे हैं. उनके बीच संपर्क बने रहने का सुराग ‘बीएनडी’ के मार्कुस आर की गिरफ्तारी से ही मिला बताया जाता है.

जर्मनी के दो सार्वजनिक रेडियो-टीवी केंद्रों ‘एनडीआर’ और ‘डब्ल्यूडीआर’ तथा म्युनिक से प्रकाशित होने वाले दैनिक ‘ज्युइडडोएचे त्साइटुंग’ की एक मिली-जुली खोज से पता चला कि ‘बीएनडी’ और रक्षा मंत्रालय वाले दोनों मामलों के बीच आपसी संबंध है. जर्मनी की आंतरिक गुप्तचर सेवा ‘संघीय संविधानरक्षा कार्यालय’ (बीएफवी) को काफी समय से संदेह था कि रक्षा मंत्रालय में कहीं कोई रूसी भेदिया बैठा हुआ है. इस आशय का एक गुमनाम पत्र उसके हाथ लगा था, पर कोई ठोस सुराग मिल नहीं रहा था.’बीएफवी’ ने अंततः देश की वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘बीएनडी’ से पूछा कि कहीं उस के पास तो कोई जानकारी नहीं है. इस अनुरोध वाला पत्र उसी मार्कुस आर की मेज पर पहुंचा, जिसे चार जुलाई को गिरफ्तार कर लिया गया है. उसने यह पत्र चोरी-छिपे म्युनिक स्थित रूसी वाणिज्य दूतावास के पास पहुंचा दिया था. वह शायद सोच रहा था कि पत्र पाते ही रूसी अनुमान लगा लेंगे कि वह कितने काम का आदमी है. हो सकता है कि वे भी उसे अपना भेदिया बना लें! रूसियों के साथ संवाद की सुविधा के लिए मार्कुस आर ने एक अलग ईमेल-पता भी बना लिया था. महीनों लंबी छानबीन के बाद यही ईमेल पता मार्कुस आर की गिरफ्तारी का सुराग बना.

गिरफ्तारी के बाद मार्कुस आर ने जर्मनी के संघीय अभियोजकों को उस समय आश्चर्य में डाल दिया, जब उसने बताया कि वह रूस के लिए नहीं, बल्कि 2012 से अमेरिका के लिए जासूसी कर रहा था. अमेरिकी दूतावास से भी उसने अपनी ही पहल पर ईमेल द्वारा ही संपर्क साधा था. उस समय ‘क्रेग’ नाम के जिस व्यक्ति ने उससे बात की, उसका कहना था कि अमेरिका के काम की हर तरह की सूचना में उसे दिलचस्पी है. पहली दो मुलाकातों में ‘क्रेग’ ने दस-दस हजार यूरो (लगभग आठ लाख रुपये) और तीसरी मुलाकात में केवल पांच हजार यूरो (चार लाख रुपये) दिये थे. मार्कुस ‘बीएनडी’ से मिलने वाले अपने वेतन से खुश नहीं था. रूसियों से भी उसे अच्छी कमाई की आशा थी. लेकिन, तब वह सन्न रह गया, जब एक दिन किसी रूसी के बदले उसने जर्मन ‘संविधानरक्षा कार्यालय’ से आए व्यक्तियों को अपने सामने खड़ा पाया.

मार्कुस की गिरफ्तारी के पांच ही दिन बाद, नौ जुलाई को जर्मनी के संघीय अभियोजन कार्यालय ने बताया कि रक्षा मंत्रालय के एक कर्मचारी की भी अमेरिका के लिए जासूसी के संदेह में जांच चल रही है. इस जांच के आधार पर देश की गुप्तचर संस्थाओं पर नजर रखने वाली संसदीय निगरानी समिति के अध्यक्ष क्लेमेंस बिनिंगर का कहना था कि इस कर्मचारी के बारे में प्रथम संकेत अगस्त 2010 में मिले थे, पर ठोस प्रमाण अभी तक नहीं मिल पाए हैं, इसलिए वह हिरासत में नहीं है.

रक्षा मंत्रालय में भी अमेरिकी भेदिया छिपा होने की बात इतनी गंभीर समझी गई कि चांसलर अंगेला मेर्कल की अनुपस्थिति में–वे चीन की औपचारिक यात्रा पर थीं– जर्मनी के गृह एवं रक्षा मंत्रियों तथा चांसलर कार्यलय के प्रमुख ने मिल कर निर्णय लिया कि बर्लिन के अमेरिकी दूतावास में ‘सीआईए’ प्रमुख जॉन ब्रेनन को निष्कासित कर दिया जाना चाहिए. ब्रेनन को ‘चीफ ऑफ स्टेशन’ के तौर पर राजनयिक निरापदता (इम्यूनिटी) मिली हुई है. इस कारण न तो उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता था, न ही उन्हें ‘अवांछित व्यक्ति’ घोषित कर अमेरिका से पंगा मोल लिया जा सकता था.

राजनयिक भूकंप
यही सब सोच कर जल्द ही एक कदम पीछे हटाते हुए कहा गया कि जर्मनी चाहता है कि ब्रेनन स्वयं स्वदेश लौट जाएं. तब भी, यह निर्णय एक राजनयिक भूकंप के समान था. अमेरिका ने भी अपनी नाराजगी जताते हुए उसे इसी अर्थ में लिया. राष्ट्रपति भवन के प्रवक्ता ने कहा कि जर्मनी को चाहिए था कि वह बात सार्वजनिक करने के बदले ”कूटनीतिक चैनलों” का उपयोग करता.

जर्मन रक्षा मंत्रालय वाले संदिग्ध व्यक्ति के विषय में कहा जा रहा है कि अगस्त 2010 में उसके बारे में गुमनाम संकेत मिलने के बाद से जर्मनी की सैनिक गुप्तचर सेवा ‘एमआरडी’  उस पर नजर रखे हुए थी. वह 15-16 बार तुर्की की संक्षिप्त यात्राएं कर चुका है. समझा जाता है कि वहां वह अमरीकी एजेंटों से मिलता रहा है. इससे पहले अनुमान लगाया जा रहा था कि वह तुर्की में शायद रूसी एजेंटों से मिलता है. उसके कंप्यूटर इत्यादि जब्त कर लिए गए हैं, पर उसे तुरंत गिरफ्तार नहीं किया गया.

एक दर्जन से अधिक भेदिये
मानो चांसलर सहित पूरे देश की वर्षों से चल रही इलेक्ट्रॉनिक जासूसी और एक ही सप्ताह में दो जीते-जागते जासूसों की धर-पकड़ पर्याप्त न हो, जर्मनी के सर्वाधिक बिक्री वाले सनसनी-पसंद अखबार ‘बिल्ड’ ने 13 जुलाई को लिखा कि जर्मनी के कम से कम चार मंत्रालयों के एक दर्जन से अधिक कर्मचारी अमेरिका की वैदेशिक गुप्तचर सेवा ‘सीआईए’ के लिए काम कर रहे हैं. रक्षा, वित्त, गृह और विकास-सहायता मंत्रालयों में बैठे ये घर के भेदी वर्षों से ‘सीआईए’ की सेवा कर रहे बताए गए हैं. ‘बिल्ड’ के अनुसार, जर्मन  अधिकारियों को जब से पता चला है कि अमेरिका बड़े पैमाने पर जर्मन भूमि पर भी जासूसी कर रहा है, तबसे इन भेदियों को निर्देश देने वाले अमरिकी एजेंट उनसे जर्मनी के बाहर वियेना, वार्सा या प्राग में मिलते हैं.

जर्मन सरकार का माथा तो पिछले साल एडवर्ड स्नोडन द्वारा उड़ाए गए दस्तावेजों के प्रकाशन के समय से ही ठनक रहा था. लेकिन, कुछ तो अमेरिका के प्रति इतिहासजन्य कृतज्ञता के बोध से और कुछ उसकी सत्ता और महत्ता के भय से– सरकार अमेरिका की ठकुरसुहाती करने और जनभावना को बरगलाने में ही लगी रही. अमेरिका से यही कहती रही कि हम तो तुम्हारे अपने ही हैं, कम से कम हमारे साथ तो वही व्यवहार मत करो, जो ईरान, सूडान या उत्तर कोरिया के साथ होता है. उसने बहुत अनुनय-विनय की कि अमेरिका उसके साथ भी वैसा ही एक ‘जासूसी-नहीं’ (नो स्पायिंग) समझौता कर ले, जैसा उसने आंग्लवंशी व अंग्रेजी-मातृभाषी कैनडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से कर रखा है. लेकिन, अमेरिका टस से मस नहीं हुआ. केवल इतना ही आश्वासन दिया कि चांसलर मेर्कल का मोबाइल अब नहीं सुना जाएगा.

अमेरिका को समझाना टेढ़ी खीर
चांसलर मेर्कल ने चीन से लौटने के बाद और फुटबॉल विश्वकप के फाइनल में जर्मन टीम का साथ देने के लिए ब्राजील जाने से ठीक पहले प्रमुख जर्मन टेलीविजन चैनल ‘जेडडीएफ’ के साथ एक भेंटवार्ता में कहा कि अमेरिका वालों को यह समझाना टेढ़ी खीर है कि ‘वे अपनी गुप्तचर सेवाओं के काम का ढर्रा बदलें…तब भी हम कहते रहेंगे कि कहां हम उन से मतभेद रखते हैं.’ मेर्कल ने कहा कि सब कुछ होने के बावजूद ”हम (अमेरिका के साथ) साझेदारीपूर्ण सहयोग करते रहेंगे.”  चीन में उन के मुंह से निकल गया था कि ‘बस, अब बहुत हो गया!’ उल्लेखनीय है कि यूक्रेन-संकट पर तो चांसलर मेर्कल और राष्ट्रपति ओबामा अक्सर एक-दूसरे को फोन कर लिया करते थे. पर, जर्मनी को परेशान कर रहे जासूसी कांड पर, जुलाई के मध्य तक, दोनों के बीच कोई फोन वार्ता नहीं हुई. रविवार, 13 जुलाई को, ऑस्ट्रिया की राजधानी वियेना में अमेरिका और जर्मनी के विदेशमंत्रियों के बीच इस विषय पर पहली बार उच्चस्तरीय संवाद जरूर हुआ. परिणाम ढाक के तीन पात जैसा ही रहा.

दरअसल अमेरिका आतंकवाद से अपनी लड़ाई में जासूसी की हर विधा को एक ऐसा सधा हुआ अस्त्र मानता है, जिसके इस्तेमाल में उसे अपनों-परायों या शत्रु-मित्र के बीच कोई भेद स्वीकार्य नहीं है. पश्चिमी जगत का यह मुखिया इस बीच 100 साल पहले की रूसी समाजवादी क्रांति के प्रणेता लेनिन के इस सिद्धांत का कायल बन गया लगता है कि ‘भरोसा करना ठीक है, लेकिन निगरानी रखना उससे बेहतर है.’ उसे अब याद नहीं कि कभी वही लेनिन के इस सिद्धांत की खिल्ली उड़ाया करता था. वह भूल रहा है कि जासूसी के औचित्य के पक्ष में गढ़ा गया, अविश्वास को विश्वास पर वरीयता देने वाला यह लेनिनवादी सिद्धांत ही ढाई दशक पूर्व सोवियत संघ और उस के समूचे पूर्वी गुट को ले डूबा. सोवियत संघ भी एक महाशक्ति हुआ करता था. अमेरिका भी एक महाशक्ति है. कौन जाने, उस का भी कभी यही हाल हो!!

वीथिका

kapilsharma

कपूर साहब का लौंडा या अपना होंड़ा?
कॉमेडी नाइट्स से पॉपुलर हुए कपिल शर्मा ने विज्ञापन की दुनिया में होंडा जैसे एक ऐसे भारी-भरकम ब्रांड से कदम रखा है जिसमें उन्हें अलग से कुछ भी करने की जरूरत नहीं पड़ी. वह अपने शो में द्विअर्थी संवादों के जरिए ह्यूमर पैदा करने की कोशिश करते हैं और अगर गौर किया जाए तो लगभग हरेक एपीसोड में महिला आयोग के दरवाजे खटखटाने की जरूरत है. इस विज्ञापन में इस असर को थोड़ा फीका कर दिया गया है. ऐसा होने से होंडा की ब्रांड इमेज और पोजिशनिंग जरूर बदल जाती है.

होंडा की नई गाड़ी मोबिलियो की अपील फैमिली गाड़ी है. विज्ञापन बताता है कि ये सेवन सीटर है लेकिन पूरे विज्ञापन में संभावित फैमिली है और बड़े आराम से एडजेस्ट होने की बातें शामिल है. यह अब तक के फैमिली बेस्ड प्रॉडक्ट और विज्ञापन का विलोम है. लेकिन विज्ञापन की पूरी भाषा और अंदाज जिस तरह का है, विडंबना देखिए कि फैमिली को इसी पर आपत्ति हो सकती है. क्या चीज है यार… से शुरू हुआ ये विज्ञापन आखिर में आकर कपूर साहब का लौंडा या अपना होंडा पर खत्म होता है, उसके बीच वही द्विअर्थी संवाद हैं जो इन दिनों व्हॉट्स एप पर लोग शेयर करते हैं. विज्ञापन ने इसमें कपिल शर्मा को शामिल करके चुटकुले को विजुअलाइज कर दिया है. इस विज्ञापन में होंडा ने अपने को बदला है और कपिल शर्मा के अंदाज के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की है. ये जरूरी भी है कि उन्हें शामिल करने का आधार उनका यही अंदाज और उससे बनी लोकप्रियता रही है. लेकिन होंडा जैसे लग्जरी ब्रांड के विज्ञापन अब तक जितने सांकेतिक और ग्रेसफुल रहे हैं, उनके मुकाबले ये विज्ञापन फूहड़ नजर आता है. ऐसा होने से जो कपिल शर्मा के शो के मुरीद हैं, उन पर साकारात्मक असर होगा लेकिन जो इस शो को लंपटता पैदा करने तक मानते हैं और जिनकी ऐसी गाड़ी खरीदने की क्रय-शक्ति है, वे बिदक भी सकते हैं.

इंडियाज बेस्ट सिनेस्टार की खोज
14 साल बाद जीटीवी का पुराना शो ‘सिनेस्टार की खोज’ फिर से दर्शकों के बीच है. ये शो बिना किसी कैच, खानदानी रसूख और पीआर के सिर्फ प्रतिभा के दम पर बॉलीवुड में दाखिल होने का दावा करता है. पिछले दिनों एनडीटीवी प्रॉफिट से एनडीटीवी प्राइम हुआ चैनल अपने शो ‘टिकट टू बॉलीवुड’ में भी यही दावे करता नजर आया. अगर ये दोनों शो दर्शकों के बीच पकड़ बना पाते हैं और इनकी टीआरपी ठीक रहती है तो यकीन मानिए बिना कपूर, खान, चोपड़ा के परिवार से आए बॉलीबुड में पैर जमाने का दावा करने वाले शो की बाढ़ आने जा रही है. खैर,

शो का बड़ा हिस्सा किसी भी डांस आधारित रियलिटी शो की तरह है लेकिन संवाद और भाव-भंगिमा के जरिए जो एक्टिंग के सेग्मेंट शामिल किए गए हैं, उससे दर्शकों के बीच ये स्थापित करने की कोशिश है कि डायलॉग अभी भी सिनेमा का प्राण-तत्व है. इधर रंगमंच का जो हुनर जो सिर्फ गली-मोहल्ले में खप रहा था, टुकड़ों-टुकड़ों में यहां वो भी काम आ जा रहा है.

हुसैन अब टाइप्ड हो गए हैं और वह ये समझने में नाकाम हैं कि शो का मिजाज भी ये तय करता है कि क्या, कैसे और कितना बोलना है जबकि टीवी शो के लिए परिणिति चोपड़ा अपेक्षाकृत नई हैं तो उनकी मौजूदगी में फ्रेशनेस है. जज के रूप में सोनाली बेन्द्रे और आयुष्मान खुराना अपने को लॉफ्टर शो के जज के ज्यादा करीब रखते हैं लेकिन विजय कृष्ण आचार्य का व्यक्तित्व और अंदाज शो को गंभीर और अदाकारी के प्रति जिम्मेदार बनाता है. इस शो को इस रुझान के साथ देखा जाए कि एपीसोड-दर-एपीसोड कैसे प्रतिभागी निखरते जाते हैं तो ये रिअलिटी शो से कहीं ज्यादा लर्निंग शो जैसा असर पैदा करेगा.

अब तिरानवे दशमलव पांच
रेड एफएम 93.5 एफएम ने सालों से चले आ रहे जिंगल का हुलिया पूरी तरह बदलकर नए अंदाज और स्वर में पेश किया है. सचिन-जिगर द्वारा कंपोज किए गए इस जिंगल से गुजरने के बाद इतना जरूर आभास होता है कि ‘नए जमाने का रेडियो स्टेशन’ बनाए रखने की दिशा में ये दुरुस्त जिंगल है जिसकी तासीर किसी भी डीजे-सॉन्ग जैसी ही है. लेकिन एफएम चैनलों पर गानों, प्रोमोशनल प्रोग्राम और विज्ञापनों की पहले से ही इतनी भीड़ होती है कि उसी मिजाज के चैनल के जिंगल भी प्रसारित किए जाएं तो वो खोया-खोया चांद-सा हो जाता है. रेड एफएम के नए जिंगल के साथ भी यही हुआ है.

सबसे खास बात यह है कि चैनल अपनी फ्रीक्वेंसी को जिंगल में एक बार ही सही हिंदी में प्रयोग करता है- तिरानवे दशमलव पांच. हमारी रोजमर्रा की बातचीत से भी दशमलव शब्द लगभग गायब हो गए हैं तो इसका प्रयोग बेहद यूनीक और याद रह जाने लायक है. दूसरा, इसे बेहद ही दिलकश अंदाज में कहा गया है. आपको अकेले ‘तिरानवे दशमलव पांच’ सुनने के लिए बार-बार इससे गुजरने का मन करेगा. चैनल का दावा है कि हम इस जिंगल के जरिए आपको एक स्टेप आगे ले जाना चाहते हैं, आगे-पीछे का तो पता नहीं लेकिन हिंदी का ये प्रयोग इसे असरदार जरूर बनाता है.

कुछ जवाब जस्टिस काटजू को भी देने हैं.

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जस्टिस मार्कंडेय काटजू

जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने अपने ताजा ब्लॉग में लिखा है कि वे जब मद्रास हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे तब वर्ष 2004 में वहां के एक अतिरिक्त न्यायाधीश की कई शिकायतें मिलने के बाद उन्होंने देश के मुख्य न्यायाधीश से कहकर इसकी आईबी जांच कराई थी. आईबी की रिपोर्ट ने अतिरिक्त जज को भ्रष्टाचार में लिप्त पाया था, लेकिन इसके बाद भी उन्हें कार्यकाल विस्तार दे दिया गया. जस्टिस काटजू के मुताबिक तब के चीफ जस्टिस आरके लाहोटी ने ऐसा यूपीए की केंद्र सरकार के दबाव में किया था जो खुद डीएमके के दबाव में थी. इस मामले को जस्टिस काटजू जिस समय, जिस तरह से दुनिया के सामने लाए हैं और इसके बाद वे जैसा व्यवहार कर रहे हैं उसके चलते कुछ सवाल उनसे भी पूछे जा सकते हैं.

1- जस्टिस काटजू ने तीन पूर्व मुख्य न्यायाधीशों के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अप्रत्यक्ष लेकिन स्पष्ट तौर पर डीएमके के ऊपर भी आरोप लगाए हैं. एनडीटीवी को दिए साक्षात्कार में उन्होंने तमिलनाडु की ‘वर्तमान’ मुख्यमंत्री जयललिता की तारीफ भी की है कि उन्होंने कभी किसी नियुक्ति आदि के लिए उन पर दबाव नहीं डाला जबकि डीएमके ने उनसे कई बार गलत काम करवाने की कोशिश की. थोड़ा सा अजीब है कि जब कांग्रेस और डीएमके केंद्र और राज्य की सत्ता में थीं तब उन्होंने इस मामले पर कुछ नहीं बोला. अब वे न केवल इन दोनों पार्टियों पर भी बड़े आरोप लगा रहे हैं बल्कि कम से कम एक सत्ताधारी पार्टी और उसकी मुखिया – एआईडीएम और जयललिता – की भूरि-भूरि प्रशंसा भी कर रहे हैं.

2-जस्टिस काटजू के मुताबिक उन्हें बाद में पता लगा कि मनमोहन सिंह जब संयुक्त राष्ट्र की बैठक में हिस्सा लेने के लिए न्यूयॉर्क जा रहे थे और हवाईअड्डे पर थे तब वहां डीएमके के एक मंत्री भी थे. इन मंत्री जी ने प्रधानमंत्री से कहा कि जब तक वे न्यूयॉर्क से लौटकर आएंगे तब तक उन जज साहब को हटाने की वजह से उनकी सरकार गिर चुकी होगी. यह सुनकर मनमोहन सिंह घबरा गए. तब एक कांग्रेसी मंत्री ने उन्हें ढाढस बंधाया कि वे आराम से जाएं और इस मामले को वे सुलटा लेंगे. इसके बाद वे मंत्री महोदय मुख्य न्यायाधीश जस्टिस लाहोटी के पास गए. उनसे कहा कि अगर मद्रास हाईकोर्ट के आरोपित जज को कार्यकाल विस्तार नहीं दिया गया तो सरकार संकट में आ जाएगी. इस पर जस्टिस लाहोटी ने सरकार को आरोपित जज साहब का कार्यकाल बढ़ाने वाला पत्र भेज दिया.

जस्टिस काटजू ने इस बारे में अपने ब्लॉग और साक्षात्कार में जिस तरह से लिखा-कहा है वह बड़ा अजीब है. यह ऐसा है कि मानो किसी फिल्म का फ्लैशबैक हो जिसमें कोई पात्र उन चीजों के बारे में भी विस्तार से बता रहा होता है जिनकी जानकारी या तो उसे हो ही नहीं सकती या उतनी और वैसे नहीं हो सकती. जितने विस्तार से जिस तरह से उन्होंने अतिरिक्त जज महोदय को विस्तार दिए जाने का वर्णन किया है वह कोई एक-दो नहीं बल्कि इससे कहीं बहुत ज्यादा और मुख्य पात्रों के बहुत करीबी लोगों के जरिये ही किसी को पता चल सकता था.

3-बजाय सिर्फ यह कहने के कि डीएमके के दबाव में आई केंद्र सरकार के दबाव में मुख्य न्यायाधीश ने आरोपित जज को गलत कार्यकाल विस्तार दिया जस्टिस काटजू अपने ब्लॉग में इसका आंखों-देखा हाल सुनाते हैं. लेकिन जब उनसे यह पूछा जाता है कि वे इस मामले को 10 साल तक दुनिया के सामने क्यों नहीं लाए या अब इसके बारे में क्यों बता रहे हैं तो वे सामने वाले को झिड़कने की हद तक नाराज हो जाते हैं. क्या वे नहीं जानते कि एक गलत तरीके से बनाया गया भ्रष्टाचारी जज देश का कितना नुकसान कर सकता है? क्या वे नहीं जानते कि वह जज अगर आगे जाकर हाईकोर्ट का जज बना तो सुप्रीम कोर्ट का भी बन सकता था और इसके और भी गंभीर परिणाम हो सकते थे? आज केवल इस मामले पर अकादमिक बहसें और विवाद आदि ही हो सकते हैं, लेकिन क्या वे तब कुछ नहीं कर सकते थे जब उस कथित भ्रष्टाचारी जज को देश और समाज का नुकसान करने से रोका जा सकता था? क्यों उन्होंने सिर्फ एक बार मुख्य न्यायाधीश से शिकायत करने के बाद इस मामले पर 10 साल का मौन व्रत रख लिया?

4- माना कि जस्टिस काटजू का उठाया मुद्दा पहले जितना न सही लेकिन आज भी बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या जस्टिस काटजू उसके महत्व को खुद ही कम नहीं कर रहे हैं? गैर-जरूरी तफसील में जाकर, उनसे पूछे जाने वाले सवालों पर भड़ककर क्या वे मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाने का काम नहीं कर रहे हैं? अच्छा होता कि वे अपने आपको थोड़ा संयमित रखके केवल एक जज और जजों की नियुक्ति प्रक्रिया पर ही बात करते और जरूरी होने पर ही राजनीति और उसे साधने वालों को भी बीच में लाते. ऐसे नहीं कि सारा मुद्दा उनके बीच ही फुटबॉल बन जाए.


PCI

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करीना कपूर को अटरम-शटरम फिल्में करने में बड़ा मजा आ रहा है. जैसे सिंघम रिटर्न्स. जबकि प्रोमो बता रहे हैं कि वे भी सिंघम की काजल अग्रवाल की तरह वाले साधारण रोल में ही हैं. पता नहीं चमेली, देव, जब वी मेट वाली करीना कसमसाती क्यूं नहीं. वैसे करीना कई दफे कह चुकी हैं कि अब उनके लिए प्रूव करने के लिए कुछ बचा नहीं है. अगर नहीं भी बचा तब भी गोलमाल, बॉडीगार्ड, रा.वन, सत्याग्रह जैसी फिल्में करने की वजह, सिद्ध करने के लिए कुछ नहीं बचना, तो नहीं होनी चाहिए. अच्छी फिल्में ठुकरा रहीं करीना ने बिजाय नाम्बियार की अमिताभ-फरहान अख्तर वाली फिल्म ठुकराई, सुजाय घोष की दुर्गा रानी सिंह को न कहा, और बदले में अक्षय कुमार की सिंग इज ब्लिंग की हीरोइन बनने की कोशिश की और सलमान के साथ बजरंगी भाईजान साइन की. ऐसी अच्छी अभिनय प्रतिभा का क्या मोल जो घर में करीने से सजाकर रखी हो करीना. कृपया उसे बाहर निकालिए.

narishनरगिसी कोफ्ता खाइये कोफ्त भगाइये
नरगिस फाखरी का कहना है कि वे हॉलीवुड की जगह बॉलीवुड में ज्यादा कंफर्टेबल फील करती हैं. शायद वैसे ही, जैसे तुषार कपूर चुनौतीपूर्ण रोल करने से ज्यादा आरामतलब जिंदगी जीने में कंफर्टेबल रहते हैं. मत कहिए फाखरी, हमें पता है आपके लिए बॉलीवुड और साउथ का सिनेमा आसान काम है, हॉलीवुड में आपकी खराब एक्टिंग के चर्चे आम हैं. हालांकि नरगिस के लिए हमारी इतनी कठोरता ठीक नहीं क्योंकि नरगिस के सेंटी ट्वीट से पता चला है कि उदयगिरी से लौटने के बाद नरगिस-उदय का रिश्ता खत्म होने को तैयार है, वजह उदय चोपड़ा हैं जो सीरियस नहीं हैं. उदय के अलावा नरगिस सलमान से भी परेशान हैं. उन्हें लगा था कि किक में सलमान के साथ आयटम नंबर कर वे मीडिया में छा जाएंगी, लेकिन फोटोग्राफरों ने सलमान के बुरे बर्ताव के बाद उनकी फोटो लेना बंद कर रखा है और तस्वीरों में सलमान संग लगातार छपने का नरगिसी सपना टूट चुका है. बेनूरी हटाइए नरगिस, नरगिसी कोफ्ता खाइए, कोफ्त दूर भगाइए.

shajidएक सजिल्द एक बिना जिल्द साजिद
एक थे साजिद खान. एक हैं साजिद नाडियाडवाला. दोनों जवानी के लंगोटिया यार. एक फिल्म बनाता, दूसरा बनवाता. फिल्म पैसा कमाती, यारी बढ़ती जाती. यारी का रिश्ता दूसरी हाउसफुल तक चला. फिर साजिद ने निर्माता साजिद को हड़काया कि फिल्म बना पैसा मैं तुझे कमा के देता हूं, तू मुझे मुनाफे में हिस्सा दे. व्यापारी निर्माता साजिद समझाते रहे कि निर्देशन के पैसे बढ़ा देता हूं. लेकिन मगरूर साजिद को मालिकाना हक चाहिए था. निर्माता साजिद ने नहीं दिया, निर्देशक साजिद ने निर्माता बदल लिया, यार बदल लिया, और पहले हिम्मतवाला फिर हमशकल्स बनाई. अब वक्त ऐसा है कि निर्देशक साजिद को कोई निर्माता नहीं मिल रहा, वहीं निर्माता साजिद निर्देशक बन ‘किक’ में एक्स-दोस्त साजिद की एक्स-गर्लफ्रेंड जैकलीन फर्नांडिस को भाई की हीरोइन बना लाए हैं. खबर है, वजह सिर्फ साजिद खान को चिढ़ाना है. जिंदगी ऐसी ही है हिम्मतवाले साजिद. कब किस को महंगी हार्डबाउंड किताब बना दे और किस को सस्ता पेपरबैक संस्करण, कह नहीं सकते.

अवैध भरती की धरती!

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राजनीति में आरोप लगना कोई अनोखी बात नहीं है. लेकिन बीते नौ साल में यह शायद पहली बार होगा कि खुदपर आरोप लगने के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को सारे पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम रद्द करके पार्टी नेतृत्व और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामने हाजिरी देने दिल्ली जाना पड़ा हो. बीते 24  जून को ऐसा ही हुआ. राज्य में हुए व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) घोटाले की आग फैलते-फैलते उनकी देहरी तक भी आ पहुंची है. चौहान की सफाई सुनने वाला संघ खुद भी इस घोटाले की चपेट में आता दिख रहा है.

हालत यह है कि करीब 2000  करोड़ रुपये के बताए जा रहे इस घोटाले की जांच को एक साल होने को आया, कई मछलियां जांच के इस जाल में फंस चुकी हैं, लेकिन अब भी कहना मुश्किल है कि भ्रष्टाचार के इस नेटवर्क का ओर-छोर कहां तक है. इस मामले में पुलिस, मुख्यमंत्री के बेहद करीबी कहे जाने वाले उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा को गिरफ्तार कर चुकी है. उनकी गिरफ्तारी के बाद खबर लिखे जाने तक पुलिस सूबे के अलग-अलग इलाकों में छापे मारकर  100  विद्यार्थियों को भी हिरासत में ले चुकी थी. इसके अलावा पिछले एक साल में करीब 500  अन्य लोगों को पुलिस हिरासत में लिया जा चुका है. इनमें से कुछ को पूछताछ करके छोड़ दिया गया, जबकि कुछ जेल की सलाखों के पीछे हैं. इस घोटाले में मुख्यमंत्री की पत्नी के अलावा और भी जितने और जैसे लोग शक और आरोपों के घेरे में हैं उससे प्रदेश की राजनीति तो क्या सारी व्यवस्था के ही बुरी तरह हिल जाने का खतरा आ खड़ा हुआ है. घोटाले के तार राज्य से बाहर भी जाते दिख रहे हैं. हाल ही में दिल्ली पुलिस की एक भर्ती परीक्षा का पेपर लीक करवाने वाले गिरोह से पूछताछ में पता चला है कि इसने मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की कई परीक्षाओं के पेपर भी बेचे थे. इस गिरोह का सरगना दिनेश कपिल रेलवे का एक बड़ा अधिकारी रह चुका है. पुलिस अब उससे भी पूछताछ करने की तैयारी में है.

व्यापम मध्य प्रदेश में इंजीनियरिंग-मेडिकल के कोर्सों और अलग-अलग सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए परीक्षाओं का आयोजन करने वाली संस्था है. आरोप हैं कि इसके द्वारा पिछले नौ सालों में आयोजित 150 से अधिक परीक्षाओं के जरिये बहुत बड़ी संख्या में अयोग्य लोगों को नौकरियां या डिग्रियां दिलवाई गईं. 2004 से चल रहे इस गोरखधंधे के तहत फर्जी नियुक्तियां करवाने के लिए कई सरकारी नियमों को ढीला किया गया, कई नियम बदले गए तो कइयों को हटा ही दिया गया. इस पूरे मुद्दे को जोर-शोर से उठाने वाले भोपाल के एडवोकेट आनंद कहते हैं, ‘प्रदेश में अकेले संविदा शिक्षकों की ही 80 हजार भर्तियां हुई हैं. यहां 53 विभाग हैं, सबकी भर्ती परीक्षाएं व्यापम ही कराता है. अब तक उसने 81 परीक्षाएं आयोजित की हैं. इनमें एक करोड़ चार लाख विद्यार्थियों ने भाग लिया और कुल चार लाख भर्ती हुईं.’ आनंद आरोप लगाते हैं कि इनमें से 80 फीसदी भर्तियां फर्जी हैं, ‘अब तो खुद मुख्यमंत्री विधानसभा में मान चुके हैं कि एक हजार भर्तियां फर्जी हैं. भले ही वे आंकड़ा कम बता रहे हैं, लेकिन यह तो मान रहे हैं कि फर्जी भर्तियां हुई हैं. सच्चाई से पर्दा उठाने के लिए इतना ही काफी है.’

आर्थिक पहलू के अलावा इस घोटाले के इससे भी अहम कई पहलू और भी हैं: इसके चलते कई योग्य युवा मौकों से वंचित रह गए. यह घोटाला कई सालों से चल रहा था. इस दौरान पैसे और सिफारिश के जरिये चुने गए उम्मीदवारों ने अपनी जिम्मेदारियों का किस तरह निर्वाह किया होगा, इस व्यवस्था को कैसे घुन की तरह खोखला किया होगा, यह भी गंभीर सवाल हैं. डॉक्टरी जैसे पेशे में तो यह लाखों लोगों की जानों से खेलने वाला खतरनाक खेल भी बन जाता है. इन सड़ी मछलियों की वजह से प्रतियोगी परीक्षाओं में अपने बूते सफल रहीं वास्तविक प्रतिभाओं पर भी शक का दाग लग गया है. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के सदस्य डॉक्टर सीसी चौबल कहते भी हैं कि एमपी के पीएमटी घोटाले की वजह से उन डॉक्टरों को भी संदेह की नजर से देखा जाने लगा है जिन्होंने अपनी प्रतिभा और मेहनत से एमबीबीएस की डिग्री ली होगी. इसके अलावा व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण कवायद तो बेकार हुई ही, वह समय भी व्यर्थ हुआ जिसकी भरपाई किसी भी तरह से नहीं हो सकती.

इस घोटाले का भंडाफोड़ पिछले साल 2013 में तब हुआ जब पुलिस पीएमटी में गलत तरीके से विद्यार्थियों को पास करवाने वाले एक रैकेट तक पहुंची. जुलाई, 2013 में इंदौर में कुछ छात्र फर्जी नाम पर पीएमटी की प्रवेश परीक्षा देते पकड़े गए थे. इनसे पूछताछ में पता चला कि यह नेटवर्क शहर का कोई डॉ जगदीश सागर चला रहा है. उसके घर पर छापेमारी में भारी मात्रा में नकदी, सोना और अवैध संपत्ति का खुलासा हुआ. सागर इस मामले की अहम कड़ी साबित हुआ. पूछताछ में उसने बताया कि फर्जीवाड़े का यह गोरखधंधा मेडिकल की परीक्षा में ही नहीं बल्कि सरकारी नौकरियों की भर्ती में भी चल रहा है. यहीं से व्यापम के तहत हुई तमाम परीक्षाओं में हो रहे फर्जीवाड़े की पोल खुलती चली गई. पीएमटी फर्जीवाड़े से शुरू हुई भ्रष्टाचार की यह कहानी पटवारी भर्ती परीक्षा, संविदा शिक्षक भर्ती परीक्षा, पुलिस आरक्षी भर्ती परीक्षा, बीडीएस भर्ती परीक्षा, वन रक्षक भर्ती परीक्षा और संस्कृत बोर्ड भर्ती परीक्षा तक पहुंच गई. इसके बाद तो मध्य प्रदेश के नेता, मंत्री, संतरी, आईएएस, आईपीएस अफसर, रिटायर्ड जज, डॉक्टर्स, मीडियाकर्मी जैसे कई लोग इसकी जद में आ गए. घोटाले के तार राजभवन तक चले गए. बात बढ़ती देख राज्य सरकार ने भर्ती परीक्षाओं में हुए भ्रष्टाचार की जांच स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) को सौंप दी जो अब हाई कोर्ट की निगरानी में जांच कर रहा है. लेकिन अब प्रदेश में लगातार मामले की सीबीआई जांच की मांग उठ रही है.

भर्ती परीक्षाओं के फर्जीवाड़े में पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, उनके ओएसडी ओपी शुक्ला, राज्यपाल रामनरेश यादव के ओएसडी धनराज यादव, व्यापम के पूर्व परीक्षा नियंत्रक पंकज त्रिवेदी और भाजपा नेता सुधीर शर्मा सहित करीब 150 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा चुकी है. इसके अलावा सीएम हाउस, प्रदेश का राजभवन, कुछ शीर्ष आईएएस अफसर और अपर मुख्य सचिव अजिता बाजपेई पांडे के पति अमित पांडे समेत कुछ मीडिया संस्थान भी शक के दायरे में हैं. फर्जीवाड़े के छींटे केंद्रीय जलसंसाधन मंत्री उमा भारती पर भी पड़ रहे हैं. उन पर भी आरोप है कि उन्होंने संविदा शिक्षकों के पदों पर कई अयोग्य लोगों की भर्तियां करवाई हैं. इस मामले में संघ भी कटघरे में है. पूर्व सरसंघचालक केएस सुदर्शन (अब दिवंगत) और संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी सुरेश सोनी का नाम भी घोटाले से जुड़ रहा है.

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शिवराज की पत्नी साधना सिंह पर कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री निवास से किसी महिला ने व्यापम कंट्रोलर पंकज त्रिवेदी और सिस्टम एनालिस्ट नितिन महिंद्रा को 139 बार फोन किया. पार्टी का कहना था कि व्यापम के तहत हुई परिवहन निरीक्षक भर्ती में 19 नियुक्तियां शिवराज सिंह चौहान की पत्नी साधना सिंह के पीहर गोदिंया (महाराष्ट्र) से हुई हैं. उधर, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ट्वीट करके कहा कि कॉल डीटेल रिपोर्ट में ये आरोप कहीं नहीं ठहरते. उन्होंने यह भी कहा कि परिवहन आरक्षक भर्ती में चयनित हुए सभी उम्मीदवारों के नाम विभाग की वेबसाइट पर मौजूद हैं जिससे यह आरोप झूठा साबित होता है. कांग्रेस प्रवक्ता केके मिश्रा ने शिवराज सिंह के कथित मामा फूल सिंह पर भी आरोप लगाए हैं. मिश्रा के अनुसार पंकज त्रिवेदी के जेल जाने के बाद भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मामा फूल सिंह चौहान उनके संपर्क में थे. उधर, मध्यप्रदेश सरकार की तरफ से मिश्रा के खिलाफ दायर मानहानि के मामले में स्पष्ट किया गया है कि शिवराज सिंह के किसी मामा का नाम फूल सिंह नहीं है. मुख्यमंत्री के एक ही मामा थे, जिनका निधन हो चुका है.

व्यापम के पूर्व परीक्षा नियंत्रक पंकज त्रिवेदी ने एसटीएफ को बयान दिया है कि पूर्व तकनीकी परीक्षा और उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने फूड इंस्पेक्टर के पद के लिए मिहिर कुमार (रोल नंबर 702735) की सिफारिश की थी. त्रिवेदी के मुताबिक शर्मा ने उन्हें बताया कि मिहिर, सुदर्शन और सोनी के आदमी हैं. त्रिवेदी के इस बयान के आधार पर एसटीएफ ने मिहिर कुमार को भी हिरासत में ले लिया है. मिहिर ने भी यह बात मान ली है. उसका कहना है कि वह केएस सुदर्शन का सहायक हुआ करता था. 2012 में उसने फूड इंस्पेक्टर एग्जामिनेशन के अपने आवेदन फॉर्म की फोटोकॉपी सुदर्शन को दी और उनसे नौकरी के लिए गुजारिश की. सुदर्शन ने लक्ष्मीकांत शर्मा को फोन किया. शर्मा ने उसे नौकरी लगाने का भरोसा दिया और बाद में मदद भी की.

यह घोटाला बहुत ही व्यवस्थित तरीके से चल रहा था. आरोपों के मुताबिक व्यापम के अफसरों और दलालों ने हर परीक्षा के लिए अलग-अलग रेट लिस्ट तैयार कर रखी थी. चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के लिए 50 हजार रुपए, तृतीय श्रेणी के लिए सवा लाख रुपए, द्वितीय श्रेणी अफसरों के लिए चार से 10 लाख रुपए, वेटनरी के लिए तीन लाख और पीएमटी परीक्षा पास करने के लिए 10 से 15 लाख रुपए लिए जाते थे. एसटीएफ को पंकज त्रिवेदी के कम्प्यूटर से ऐसे दस्तावेज मिले हैं जिनसे इन आरोपों की पुष्टि होती है . त्रिवेदी के कम्प्यूटर से बरामद छात्रों की एक सूची में सबसे अंतिम रिमार्क वाला कॉलम भी है. इस कॉलम में छह छात्रों के नाम के सामने मिनिस्टर, कुछ के सामने भाजपा की कद्दावर नेत्री उमा भारती और कुछ के सामने राजभवन लिखा पाया गया है  (दस्तावेजों की प्रति का एक अंश दायें पृष्ठ पर).

एसटीएफ ने पंकज त्रिवेदी के कंप्यूटर से छात्रों के नामों की कुछ सूचियां भी बरामद की हैं. इनमें छात्रों के नाम के आगे बने कॉलम में पास होने के लिए कितने अनिवार्य अंकों की जरूरत होगी, यह लिखा हुआ है. इन सूचियों में एक  ‘टू डू’ कॉलम है. इसमें पास होने के लिए जरूरी अंक लिखे गए हैं. एसटीएफ के अफसरों के मुताबिक परीक्षा देने के बाद व्यापम के अफसर छात्रों की ओएमआर शीट निकाल लेते थे और पास होने के लिए जरूरी संख्या में सवाल हल कर उन्हें जमा कर देते थे. यह नकल या पर्चा लीक करने से भी आसान तरीका था जिससे छात्रों को पास किया जा सकता था. मिहिर के बयान से भी इसकी पुष्टि होती है. उसने अपने बयान में कहा है, ‘सुदर्शन ने मुझसे कहा कि मैं एग्जाम में जितना जानता हूं, उतने सवालों के जवाब दूं और बाकी ओएमआर शीट खाली छोड़ दूं. मैंने हिंदी, इंग्लिश, रीजनिंग, मैथ्य, फिज़िक्स और जनरल नॉलेज के करीब 50 फीसदी सवालों के जवाब दिए और बाकी ओएमआर शीट खाली छोड़ दी. 18 अक्टूबर, 2012 को जब रिजल्ट आया तो मेरिट लिस्ट में मेरा नाम 7 वें नंबर पर था. इस परीक्षा को व्यापम ने सात अक्टूबर, 2012 को करवाया था.’

आरोपों की सूची यहीं खत्म नहीं होती. कांग्रेस का आरोप है कि दोषियों को सख्त कार्रवाई से बचाने की कोशिश हो रही है. उसके मुताबिक प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट 1998 के बजाय एसटीएफ ने आईपीसी की धारा 420 और 409 के तहत केस दर्ज कर दिए हैं. पार्टी का कहना है कि यदि एंटी करप्शन एक्ट की धारा 13 (आई) (डी) के तहत मामला दर्ज होता तो यह स्पेशल कोर्ट में चला जाता और इसमें आरोपियों को जमानत भी नहीं मिलती. पार्टी का यह भी आरोप है कि व्यापम के पास वर्ष 2008 तक का कोई रिकार्ड ही मौजूद नहीं है जबकि लोक सेवा आयोग में 10 वर्ष तक उत्तर पुस्तिकाएं और 20 वर्ष तक रिजल्ट सुरक्षित रखने का नियम है. सवाल उठ रहा है कि व्यापम पर भी यही नियम लागू होता है, तो इसका पालन क्यों नहीं किया गया. कांग्रेस का यह भी आरोप है कि पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा की गिरफ्तारी एफआईआर दर्ज करने के 189 दिनों बाद इसलिए की गई क्योंकि जांच की आंच में मुख्यमंत्री निवास भी आने लगा था. सूत्रों के मुताबिक गिरफ्तारी के बाद शर्मा का कहना था कि वे बड़े लोगों के लिए कुर्बानी दे रहे हैं.

चर्चा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने मध्य प्रदेश कैडर के अफसर एस रामानुजम को खास तौर पर इस मामले की प्रगति पर निगाह रखने की जिम्मेदारी सौंपी है

उच्च शिक्षा मंत्री के तौर पर लक्ष्मीकांत शर्मा व्यापम के भी मुखिया थे और आरोप है कि कई साल से फर्जी भर्तियों का यह धंधा उनके ही आशीर्वाद से चल रहा था. शर्मा को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का बेहद करीबी माना जाता है. इनके खिलाफ एफआईआर छह महीने पहले ही दर्ज हो चुकी थी, लेकिन गिरफ्तारी अब जाकर हुई है. कभी सरस्वती शिशु मंदिर में आचार्य रहे लक्ष्मीकांत शर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जरिए भाजपा की राजनीति में आए थे. संघ के कोटे से ही उन्हें 1993 में पहली बार विधानसभा का टिकट दिया गया था. उमा भारती सरकार में उन्हें स्वतंत्र प्रभार देकर खनिज साधन सहित अन्य कई विभागों का मंत्री बनाया गया. उसके बाद से वे 2013 तक लगातार मंत्री पद पर रहे.

कुछ और बड़े भी दलदल में
सुधीर शर्मा :
 उच्च पदस्थ पुलिस सूत्रों की मानें तो मध्य प्रदेश में खनन माफिया के नाम से मशहूर भाजपा नेता सुधीर शर्मा ने पूरे मामले में बिचौलिए का काम किया है. शर्मा को पूर्व जनसंपर्क और उच्चशिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा का खास आदमी माना जाता है. शर्मा के अन्य मंत्रियों से भी व्यवसायिक और पारिवारिक संबंध रहे हैं. शर्मा खुद भाजपा संगठन से जुड़े रहे हैं. वे भाजपा की एजुकेशन सेल के प्रमुख भी हुआ करते थे. व्यापम घोटाले में नाम आने के बाद शर्मा ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में आरोप निरस्त करने के लिए याचिका भी दायर की है. इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा चुकी है. खबर लिखे जाने तक वे फरार चल रहे थे.

डीआईजी आरके शिवहरे : एसटीएफ ने उपनिरीक्षक भर्ती घोटाले में आरके शिवहरे के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है. इन पर दो आरोप हैं. पहला यह कि इन्होंने अपनी बेटी और दामाद को पीएमटी परीक्षा के परीणामों में टॉपर बनवाया और दूसरा यह कि इन्होंने उपनिरीक्षक भर्ती में 15 लाख प्रति विद्यार्थी की दर से तीन विद्यार्थियों के लिए 45 लाख रुपये नितिन महिंद्रा को दिए. नितिन महिंद्रा व्यापम के चीफ सिस्टम एनालिस्ट थे. पीएमटी परीक्षा की परीणाम सूची में शिवहरे के दामाद आशीष आनंद गुप्ता का पांचवां और बेटी नेहा का नाम सातवें स्थान पर है.

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जस्टिस एसएल कोचर : हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज एसएल कोचर का नाम भी पूरे मामले में सामने आया है. आरोप हैं कि उन्होंने मेडिकल कॉलेज में अपनी बेटी शिल्पी का एडमिशन विकलांग कोटे से करवाया. जबकि शिल्पी शारीरिक रूप से पूरी तरह स्वस्थ पाई गई है.

डॉ विनोद भंडारी :  प्री मेडिकल टेस्ट घोटाले के मुख्य अभियुक्त. इन्हें मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और सुरेश पचौरी का नजदीकी माना जाता है. भंडारी इंदौर के अरविंदो मेडिकल कॉलेज के संचालक भी हैं.

डॉ संजीव सक्सेना :  कांग्रेस नेता सक्सेना मूलतः भिंड के हैं. इनका एक भाई अभिषेक पार्षद है. सक्सेना पूर्व गृह मंत्री उमाशंकर गुप्ता के खिलाफ चुनाव भी लड़ चुके हैं. सक्सेना पर 2005 में प्रीपीजी का पर्चा लीक करने का आरोप भी लग चुका है.

डॉ दीपक यादव :  इन्हें पूर्व चिकित्सा शिक्षा मंत्री अनूप मिश्रा का खास माना जाता है. यादव के परिवार में ही 15 डॉक्टर हैं. इनका सगा भाई राहुल और चचेरा भाई विकास भी डाक्टर है. जिनकी डिग्री पर सवालिया निशान लग गए हैं. यादव पर आरोप है कि  वे एमएस और एमडी की प्रीपीजी परीक्षा पास करवाने के लिए सेटिंग करते थे.

सीएसपी रक्षपाल सिंह यादव : ग्वालियर के सीएसपी रक्षपाल सिंह यादव के खिलाफ भी शिकायत दर्ज की जा चुकी है. इनके परिवार के तीन लोगों को गलत तरीके से पीएमटी परीक्षा में पास किए जाने का आरोप है.

प्रेम चंद्र प्रसाद :  एसटीएफ ने 2012 में हुए पीएमटी भर्ती घोटाले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के निजी सचिव प्रेम चंद्र प्रसाद के खिलाफ सबूत मिलने पर उन्हें सरकारी गवाह बना लिया है. प्रसाद ने एसटीएफ को दिए बयान में माना है कि उनकी बेटी को भी गलत तरीके से एडमिशन दिया गया था. कांग्रेस नेता केके मिश्रा का कहना है कि ऐसा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के दबाव में हुआ है, ताकि प्रसाद के खिलाफ कोई कार्रवाई न हो पाए. वे कहते हैं, ‘प्रसाद से पूछताछ होती तो उससे और राज खुलने की संभावना थी इसलिए उसे सरकारी गवाह बनाकर एसटीएफ ने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली. हालांकि पुलिस ने प्रसाद को इसी महीने के आखिर में बयान दर्ज करने के लिए बुलाया है.’

परीक्षा देने के बाद व्यापम के अफसर छात्रों की ओएमआर शीट निकाल लेते थे और पास होने के लिए जरूरी संख्या में सवाल हल कर उन्हें जमा कर देते थे

अपने पदाधिकारियों पर आरोप लगने के बाद संघ ने इस मुद्दे पर एक लाइन की प्रतिक्रिया दी है. रिपोर्टों के मुताबिक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने कहा कि कानून अपना काम करेगा और संगठन को चिंता करने की जरूरत नहीं है. उनसे पहले शिवराज सिंह चौहान भी यही बात कह चुके हैं.

वैसे मध्य प्रदेश में मुन्नाभाइयों (परीक्षार्थी के स्थान पर परीक्षा देने वाले) की मदद से भी बहुत से छात्रों की नैया पार लगाई गई है. इसमें भी एसटीएफ को व्यापम की संलिप्तता मिली है. इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2000 से 2013 के बीच में पुलिस ने अकेले पीएमटी की परीक्षा के दौरान 150 से भी ज्यादा मुन्नाभाइयों को पकड़ा है. मध्य प्रदेश में पीएमटी परीक्षा में पास करवाने का रैकेट चला रहे जगदीश सागर (इंदौर), तरंग शर्मा (भोपाल)और सुधीर राय (जबलपुर), व्यापम के चीफ सिस्टम एनालिस्ट नितिन महिंद्रा के साथ मिलकर छात्रों और मुन्नाभाईयों की जोड़ी बनाते थे जो असल परीक्षार्तियों की जगह खुद जाकर परीक्षा देते थे. लेकिन इसमें जोखिम देखते हुए सीधे ओएमआर शीट पर ही गड़बड़ी करने के नए तरीकों को ईजाद कर लिया गया.

कई इस मामले में एक राजनीतिक कोण भी देख रहे हैं. जानकारों का एक वर्ग मान रहा है कि लोकसभा चुनावों के दौरान लाल कृष्ण आडवाणी के समर्थन के चलते शिवराज सिंह चौहान अब दबाव में हैं. चर्चा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने मध्य प्रदेश कैडर के अफसर एस रामानुजम को खास तौर पर इस मामले की प्रगति पर निगाह रखने की जिम्मेदारी सौंपी हैं. चौहान शीर्ष नेतृत्व के सामने अपना पक्ष रखने के लिए दिल्ली आए थे तो उन्हें समय देने के बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें नितिन गडकरी से मिलने के लिए कहा.

हक की जंग

फोटोः विकास कुमार
फोटोः विकास कुमार
वजीरपुर में गरम रोला मजदूरों की एक सभा. फोटोः विकास कुमार

11 जुलाई, आम बजट पेश होने के एक दिन बाद देशभर के समाचार चैनलों पर नई नवेली एनडीए सरकार के पहले बजट का पोस्टमार्टम चल रहा था. आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक मामलों के तमाम विशेषज्ञ बहस में मशगूल थे. अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के लिहाज से इन बहसों को महत्वपूर्ण मानते हुए देशभर के अधिकांश लोग भी टीवी पर आंख-कान लगाए हुए थे. उसी देश की राजधानी दिल्ली के वजीरपुर स्थित औद्योगिक इलाके में एक और बहस चल रही थी. यह बहस इलाके के हॉट रोलिंग यानी गरम रोला कारखानों में काम करने वाले मजदूरों और कारखानों के मालिकों के बीच थी. इन कारखानों में अब तक रोजाना 12 घंटे काम करने वाले मजदूरों की मांग थी कि उनके काम की अवधि 12 के बजाय नौ घंटे होनी चाहिए. फैक्ट्री मालिक इस कटौती के खिलाफ थे. मजदूरों के इरादे देखते हुए कुछ मालिक उनकी बात मानने को तैयार हो गए, लेकिन बाकी कंपनियां अब भी 12 घंटे की ड्यूटी को ही नौकरी की शर्त बता रही थीं. इनमें से कुछ कंपनियों ने नौ घंटे ड्यूटी की मांग पर अड़े मजदूरों से अपना हिसाब-किताब करने की बात कही और फैक्ट्रियां बंद करने का ऐलान कर दिया. इस ऐलान के बाद कुछ कंपनियों ने मजदूरों को पिछला भुगतान करने का सिलसिला शुरू कर दिया. मजदूरों के मुताबिक अलग-अलग कंपनियों में काम कर रहे ऐसे कामगारों की संख्या अब तक 100 के पार पहुंच चुकी है. बताया जा रहा है कि कुछ दिनों में यह आंकड़ा दो से तीन सौ की संख्या को पार कर जाएगा.

दरअसल वजीरपुर में पिछले एक महीने से चल रही मजदूरों की हड़ताल आज ऐसी जगह पर पहुंच चुकी है जहां से उसकी हार-जीत को लेकर अलग-अलग परिभाषा गढ़ी जा सकती है. इसे विस्तार से समझने के लिए पिछले एक महीने के दौरान इस मजदूर आंदोलन पर एक सरसरी निगाह डालना जरूरी है.

वजीरपुर स्थित औद्योगिक इलाके को एशिया की सबसे बड़ी स्टील इंडस्ट्री के रूप में जाना जाता है. इस पूरे इलाके में स्टील उद्योग से जुड़ी तकरीबन 200 छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां हैं. इन फैक्ट्रियों में स्टील को काटने, पिघलाने, पालिश करने और फिर उससे अलग-अलग सामान बनाने का काम किया जाता है. इन सभी कामों के लिए देश भर के अलग-अलग हिस्सों से आए तकरीबन पांच हजार मजदूर यहां काम करते हैं. वजीरपुर में हॉट रोलिंग के 23 कारखाने हैं जिनमंे लगभग आठ सौ मजदूर काम करते हैं. इन कारखानों में लोहे की मोटी-मोटी प्लेटों को पहले पिघलाया जाता है और फिर अलग-अलग सांचों में ढाल कर स्टील का सामान बनाया जाता है. इस काम को करने के लिए मजदूरों को भट्टियों के बेहद करीब खड़े रहकर काम करना होता है. भयंकर आग उगलने वाली इन भट्टियों के सामने खड़े होकर लगातार घंटों तक काम करने की परिस्थितियां जोखिम भरी और खतरनाक होती हैं. मजदूरों का आरोप है कि उनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं होते. इसके अलावा उनसे आठ के बजाय 12 घंटे काम करवाया जाता है और अतिरिक्त मजदूरी के रूप में कुछ भी नहीं दिया जाता.

श्रम कानून के मुताबिक किसी भी औद्योगिक इकाई में नियत समय से अधिक वक्त तक काम करने के एवज में कामगारों को ओवरटाइम मनी के रूप में अतिरिक्त मेहनताना दिया जाना चाहिए, लेकिन मजदूरों के मुताबिक वजीरपुर स्थित इन 23 कारखानों में इस नियम का रत्तीभर भी पालन नहीं किया जाता. यहां तक कि मजदूरों को दिल्ली सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दी जाती. राज्य सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के मुताबिक औद्योगिक इकाइयों में आठ घंटे काम करने के एवज में हेल्परों को 8554, अर्ध कुशल कामगारों को 9,480 तथा पूर्ण रूप से कुशल कामगारों को 10,374 रुपए मासिक मेहनताना दिया जाना चाहिए. लेकिन इन मजदूरों को रोजाना 12 घंटे काम के बावजूद क्रमश: 8,000, 9,000 तथा 10,000 रुपये ही दिये जा रहे हैं. हैरत की बात यह भी है कि अधिकांश मजदूरों के पास न तो कंपनी का परिचय पत्र होता है और न ही उन्हें वेतन की पर्ची ही दी जाती है. तहलका ने इन कारखानों में काम करने वाले जितने भी मजदूरों से बात की उन सभी का कहना था कि उन्हें न्यूनतम मजदूरी, बोनस, पीएफ तथा सरकारी छुट्टी जैसी सुविधाएं अभी तक नहीं मिल सकी हैं.

ये मजदूर लंबे समय से इन्हीं सब मांगों को लेकर कारखाना मालिकों की दरियादिली की बाट जोह रहे थे. लेकिन मालिकों ने इस पर कोई संजीदगी नहीं दिखाई. नाराज मजदूरों ने पिछले महीने छह जून से बेमियादी हड़ताल शुरू कर दी. ‘गरम रोला मजदूर एकता समिति’ की अगुवाई में शुरू हुई इस हड़ताल को धीरे-धीरे अन्य मजदूर संगठनों का भी समर्थन मिलने लगा. दिल्ली मजदूर यूनियन, करावल नगर मजदूर यूनियन, गुड़गांव मजदूर संघर्ष समिति तथा पीयूडीआर के कार्यकर्ता कई दिनों तक वजीरपुर में ही डटे रहे. इसके अलावा वजीरपुर की कई अन्य फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर भी इस हड़ताल में अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो गए. हॉट रोलिंग कारखानों की ज्यादतियों के खिलाफ चल रहे इस आंदोलन की गूंज 26 जून को पहली बार वजीरपुर से बाहर सुनाई दी. इस दिन तकरीबन 500 मजदूरों ने जंतर-मंतर पर रैली निकाली और प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ ही केंद्रीय श्रम मंत्रालय को एक ज्ञापन सौंपा. इसमें मजदूरों ने केंद्र सरकार से इस मामले में दखल की अपील की.

जंतर-मंतर पर हुए इस प्रदर्शन के बाद वजीरपुर स्थित हॉट रोलिंग की सभी 23 फैक्ट्रियों के मालिक सकते में आ गए. उन्होंने अगले ही दिन 27 जून को हड़ताली मजदूरों के सामने समझौता करने का प्रस्ताव रख दिया. यह हड़ताल के 22 दिन बाद की बात है. उस दिन श्रम विभाग के अधिकारियों की मध्यस्थता में मजदूरों और कंपनी मालिकों के बीच एक समझौता हुआ. इसके तहत हॉट रोलिंग वाली सभी कंपनियां 12 के बजाय नौ घंटे काम करवाने पर राजी हो गईं. इसके अलावा इन कंपनियों ने मजदूरों को बोनस, छुट्टी और अन्य सुविधाएं देने की बात भी मान ली. इस समझौते की एक प्रति तहलका के पास भी मौजूद है.

लेकिन अगले ही दिन अधिकांश कंपनियां अपने वादे से मुकर गईं. उस दिन कुछ कारखानों के मालिकों ने सुबह की शिफ्ट में काम करने आ रहे मजदूरों को गेट  पर ही रोक दिया. इन मालिकों ने मजदूरों के सामने शर्त रखी कि 12 घंटे काम करने की सूरत में ही उन्हें काम पर रखा जाएगा. यानी समझौते के 24 घंटे के अंदर ही ये कंपनियां अपने वादे से मुकर चुकी थीं. मालिकों के इस रवैये के बाद मजदूर बुरी तरह भड़क गए. उन्होंने फैक्ट्रियों के गेट पर तालाबंदी करते हुए श्रम विभाग से इन कंपनियों की शिकायत कर दी. ‘गरम रोला मजदूर एकता समिति’ के सदस्य रघुराज बताते हैं, ‘शिकायत के बाद श्रम विभाग के अधिकारियों ने कंपनी मालिकों को तलब किया. विभाग ने समझौते का उल्लंघन करने पर उनके खिलाफ कार्रवाई की बात कही. इसके बाद कंपनी मालिक एक बार फिर समझौता लागू करने को राजी हो गए.’

लेकिन इस समझौते के अगले दिन भी वही हुआ. फैक्ट्री मालिक 12 घंटे काम करने की सूरत में ही पैसा देने की बात करने लगे. इस बात का पता तब लगा जब कुछ कारखानों के मजदूर नौ घंटे बीत जाने के बाद भी बाहर नहीं आए. इसकी वजह यह थी कि इन कंपनियों ने फैक्ट्रियों के अंदर काम पर गए मजदूरों को 12 घंटे से पहले छुट्टी देने से मना कर दिया था. ऐसी ही एक फैक्ट्री में काम करने वाले बिहार के बेगूसराय जिले के राम कुमार कहते हैं, ‘मालिकों ने हमसे सुबह ही कह दिया था कि कल का समझौता अब लागू नहीं होगा. हमें 12 घंटे ही काम करना होगा.’ एक और मजदूर वीरेंद्र बताते हैं, ‘हमारी फैक्ट्री में तो ठेकेदार ने साफ कह दिया था कि जो 12 घंटे काम नहीं कर सकता उसे कल से काम पर आने की जरूरत नहीं है.’

इस आंदोलन को समर्थन दे रहे मजदूर बिगुल नामक संगठन के कार्यकर्ता अनंत कहते हैं, ‘श्रम विभाग के अधिकारियों के सामने एक बात कहना और फैक्ट्रियों के अंदर मजदूरों से दूसरी बात कहना अधिकांश कंपनियों की सबसे कुख्यात नीति रही है. बाहर अधिकारियों के सामने हर शर्त मान कर वे अपने खिलाफ होने वाली कार्रवाइयों से बच जाते हैं और कारखानों के अंदर मजदूरों को धमका कर अपना पूरा काम भी निकाल लेते हैं.’

कई लोगों के मुताबिक कंपनियों द्वारा समझौते से पीछे हटने की वजह कुछ और ही थी. मजदूर बिगुल संगठन के ही एक और कार्यकर्ता अभिनव के मुताबिक कारखाना मालिकों तक कुछ शरारती तत्वों ने मजदूर आंदोलन के कमजोर पड़ने की अफवाह पहुंचा दी. वे कहते हैं, ‘23 मालिकों को बताया गया कि हड़ताल से थक चुके मजदूर आंदोलन से पीछे हटने को तैयार हो गए हैं और अगर कंपनियां थोड़ी सख्ती दिखाएं तो इस आंदोलन को कुचला जा सकता है. यही वजह रही कि मालिकों ने समझौता लागू करने से इंकार कर दिया.’ लेकिन इस बात का खुलासा होने के बाद मजदूर और भी उग्र हो गए और उन्होंने आर-पार की लड़ाई लड़ने का ऐलान कर दिया. इस लड़ाई के पहले चरण में मजदूरों ने तीन जुलाई को कारखाना मालिकों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग को लेकर उप श्रमायुक्त कार्यालय का घेराव कर दिया. इसके साथ ही लगभग आधा दर्जन फैक्ट्रियों में तालाबंदी करते हुए मजदूरों ने पांच जुलाई से वजीरपुर स्थित राजा पार्क में अनशन शुरू कर दिया. यह अनशन तीन दिनों तक चला. इस बीच श्रम विभाग गरम रोला कारखानों के मालिकों को श्रम कानूनों का उल्लंघन करने के आरोप में नोटिस भेज चुका था. इन मालिकों को अपना पक्ष रखने के लिए सात जुलाई तक का समय दिया गया. नोटिस का असर यह हुआ कि इन कारखानों के मालिक बिना शर्त मजदूरों की सभी मांगें मानने को तैयार हो गए. आठ जुलाई को हुए तीसरे और अंतिम समझौते में उन्होंने वे सभी बातें एक बार फिर से दोहराईं जो इससे पहले के दो समझौतों में शामिल थीं.

इस समझौते के बारे में बताते हुए ,गरम रोला मजदूर एकता समिति की कानूनी सलाहकार शिवानी बताती हैं, ‘श्रम विभाग के अधिकारियों ने इस मौके पर कंपनी मालिकों को श्रम कानूनों का पालन करने की हिदायत देने के साथ ही दो और महत्वपूर्ण बातें कहीं. पहली यह कि विभाग के सीनियर अधिकारी खुद समय-समय पर सभी कारखानों का औचक दौरा करेंगे और दूसरी यह कि सभी फैक्ट्रियों में नौ घंटे की समय सीमा के साथ ही अन्य जरूरी श्रम कानूनों का पालन करवाने के लिए अगले एक हफ्ते तक श्रम विभाग के अधिकारी सुबह और शाम फैक्टरियों के सामने मौजूद रहेंगे. मजदूरों के मुताबिक उनके लिए यह अब तक का सबसे अच्छा फैसला था.’ यह बात तब सच लगती दिखी जब समझौते के अगले दिन श्रम विभाग के अधिकारी इन कंपनियों के सामने नियत समय पर पहुंच गए.

वजीरपुर इलाके में स्थित एक गरम रोला फैक्ट्री. फोटो: विकास कुमार
वजीरपुर इलाके में स्थित एक गरम रोला फैक्ट्री. फोटो: विकास कुमार

लेकिन इस समझौते को लेकर जब तक मजदूर अपनी जीत का जश्न मनाते तब तक कुछ कंपनी मालिकों ने फिर से पलटी मार ली और 12 घंटे काम करने की पुरानी बात पर अड़ गए. हालांकि इस बीच कुछ कंपनियां ऐसी भी थीं जिन्होंने समझौते के तहत नौ घंटे का नियम लागू कर लिया था.

इस तरह देखा जाए तो अब गरम रोला की 23 फैक्ट्रियों में तीन अलग-अलग स्थितियां बन गई थीं. पहली यह कि 23 में से आठ कंपनियां न्यूनतम मजदूरी तथा नौ घंटे काम करने की मांग पर राजी हो गईं. ऐसी ही एक कंपनी A-72 के मालिक जेके बंसल का कहना था कि उनकी फैक्ट्री में मजदूरों से 12 के बजाय नौ घंटे ही काम लिया जाएगा. इसके अलावा उन्होंने समझौते में रखी गई सभी शर्तों का पालन करने की बात कही. दूसरी स्थिति बिल्कुल इसके उलट थी. इस समझौते के बाद भी 10 कंपनियां ऐसी थीं जो किसी भी कीमत पर 12 घंटे से कम काम करने को तैयार नहीं हुई. इसके अलावा तीसरी और सबसे विचित्र स्थिति तब सामने आई जब पांच फैक्ट्रियों ने अपने यहां काम कर रहे सभी मजदूरों का हिसाब चुकता करने के साथ ही कंपनियों को बंद करने का फैसला कर लिया.

इन मजदूरों से न सिर्फ नियम से ज्यादा समय तक काम कराया जाता है बल्कि उन्हें दिल्ली सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दी जाती

फिलहाल इन तीनों स्थितियों का लब्बोलुबाब यही है कि एक नियत उद्देश्य को लक्ष्य बना कर एक महीने से चल रहा यह आंदोलन अब एक तिराहे पर पहुंच गया है. यानी कुछ मजदूरों को जहां 12 घंटे काम करने से आजादी मिल गई है वहीं अब भी कुछ मजदूर 12 घंटे काम करने को मजबूर हैं इसके अलावा जिन कंपनियों ने मजदूरों का हिसाब किताब करके अपने कारखाने बंद कर दिए हैं, उन मजदूरों के पास अभी कोई काम नहीं है.

अब सवाल उठता है कि डेढ़ महीने की इस कठिन परीक्षा के बाद मजदूरों के हिस्सों में अलग-अलग परिणाम क्यों आए जबकि उन सभी ने इस परीक्षा में एक समान प्रदर्शन किया था. सवाल यह भी है कि एक तरफ कुछ मालिक, मजदूरों की सभी मांगें मानने के लिए तैयार हो चुके हैं तो फिर बाकी मालिकों ने इन मांगों को मानने से इंकार क्यों कर दिया.

पहले सवाल का जवाब तलाशने के क्रम में जो बात सबसे प्रमुख तौर पर उभरती है वह मजदूरों की गरीब पृष्ठभूमि और काम की मजबूरी से जुड़ी है. दरअसल वजीरपुर में काम करने वाले मजदूर बेहद गरीब पष्ठभूमि के हैं. इन मजदूरों के पूरे परिवार की जिंदगी इनकी कमाई पर निर्भर करती है. ऐसे में कई मजदूरों ने हड़ताल के बाद भी 12 घंटे काम करना इस लिए स्वीकार किया क्योंकि ऐसा न करने पर रोजी-रोटी का संकट खड़ा होने का खतरा पैदा हो रहा था. उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रहने वाले बाबू लाल ऐसे ही एक मजदूर हैं, जिनके पूरे परिवार की जिम्मेदारी उनके खुद के जिम्मे ही है. ढाई साल से वजीरपुर में रह रहे बाबू लाल अब तक तीन अलग-अलग फैक्ट्रियों में काम कर चुके हैं. वे कहते हैं, ‘आटा, चावल से लेकर लत्ते-कपड़े और मकान का किराया जिस रफ्तार से बढ़ रहा है उसका मुकाबला करने में हमारी तनख्वाह पूरी तरह फेल है. हालत इतनी खराब है कि दिनरात एक करने के बाद महीने के आखिर में मिलने वाले पैसों से न तो खुद की जरूरतें पूरी हो पाती हैं और न ही मैं इतना पैसा गांव भेज पाता हूं जिससे परिवार की दाल-रोटी ठीक से चल सके. ऐसे में अगर 12 घंटे काम नहीं करूंगा तो यह नौकरी भी हाथ से निकल जाएगी.’ ऐसे मजदूरों की पूरे वजीरपुर में भरमार है.

इसके अलावा कई लोगों के मुताबिक श्रम कानूनों को लेकर जागरूकता का अभाव होना भी इन मजदूरों के लिए बड़ी समस्या बन कर उभरा है. करावल नगर मजदूर यूनियन से जुड़े योगेश कहते हैं,  ‘मालिक मजदूरों को तमाम तरह से धमका कर रखते हैं जिसके चलते मजदूर कई बार उनकी हर ज्यादती चुपचाप सह लेते हैं.’ मजदूर बिगुल के अभिनव कहते हैं, ‘इतना बड़ा आंदोलन होने के बाद भी जो मजदूर 12 घंटे काम करने को तैयार हैं, उनके साथ यही सारी समस्याएं हैं.’ हालांकि वे यह भी कहते हैं कि धीरे-धीरे ही सही इन मजदूरों को समझाने में उन्हें कामयाबी जरूर मिलेगी.

अब दूसरे सवाल पर आते हैं कि कुछ मालिकों द्वारा मजदूरों की सभी मांगें मानने के बाद भी बाकी कंपनियां 12 घंटे काम करवाने के फैसले पर क्यों अड़ी हुई हैं ?

दरअसल नौ घंटे काम करवाने की शर्त को मानने से इंकार करने वाले इन अधिकांश कारखानों का तर्क है कि ऐसा करने से उनकी कंपनियां घाटे में चली जाएंगी. नाम न बताने की शर्त पर एक फैक्ट्री के प्रतिनिधि कहते हैं, ‘सिर्फ नौ घंटे काम करवाने से बेहतर तो यही है कि हम अपनी फैक्ट्री ही बंद कर दें. काम में तीन घंटे की कटौती हमारे लिए हर तरह से घाटे का सौदा है.’ लेकिन वजीरपुर के अधिकतर मजदूर इस तर्क से सहमत नहीं दिखते. रघुराज कहते हैं, ‘गरम रोला की प्रत्येक फैक्ट्री हर महीने 10 से लेकर 20 लाख तक की कमाई करती है. अगर ये फैक्ट्रियां मजदूरों से नौ घंटे काम करवाने और उन्हें न्यूनतम मेहनताना देने पर राजी हो जाएं तो भी इन कंपनियों को हर महीने पहले के मुकाबले एक से डेढ़ लाख रुपये ही अतिरिक्त खर्च करने पड़ेंगे. और इसके बाद भी इनका मुनाफा आठ से लेकर 18 लाख तक रहेगा. ऐसे में आप ही बताइए कि फैक्ट्रियों को नुकसान कहां से हो रहा है ?’ वे आगे कहते हैं, ‘पिछले साल भी मजदूरों ने इन मांगों को लेकर हड़ताल की थी, लेकिन तब भी मालिक वेतन बढ़ाने और बोनस देने जैसे वादों से मुकर गए थे. क्योंकि उस वक्त हमारा आंदोलन थोड़ा कमजोर पड़ गया था इसलिए मालिकों को लग रहा है कि इस बार भी वे वादों से मुकरकर अपने बढ़े हुए मुनाफे को बरकरार रख सकते हैं.’

बहरहाल इस आंदोलन की दिशा को लेकर असमंजस की इन स्थितियों के बाद भी वजीरपुर के मजदूर अपनी जीत को लेकर आशावान नजर आ रहे हैं. गरम रोला मजदूर एकता समिति की कानूनी सलाहकार और इस आंदोलन में मजदूरों की प्रतिनिधि शिवानी कहती हैं, ‘जिन कंपनियों में अब भी 12 घंटे काम चल रहा है वहां के मजदूरों को दुबारा संगठित करने के प्रयास किए जा रहे हैं. साथ ही हमने उन कंपनियों के खिलाफ लेबर कोर्ट जाने की तैयारी कर ली है जिन्होंने नौ घंटे काम करने से इंकार करते हुए अपनी फैक्ट्रियां बंद कर दी हैं. इन कंपनियों में काम करने वाले मजदूरों को पिछले छह महीने का बोनस तथा एरियर दिलाने के लिए हमारा संगठन हर तरह की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार है.’

मजदूरों और कंपनी मालिकों के बीच महीनेभर से चल रही इस लड़ाई में श्रम विभाग की भूमिका का जिक्र किए बगैर यह पूरी कथा अधूरी है. वजीरपुर के अधिकतर मजदूरों को इस पूरे आंदोलन के दौरान विभाग की भूमिका भी संदेहास्पद नजर आती है. मजदूर नेता नवीन कहते हैं, ‘सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि श्रम विभाग की मध्यस्थता में तीन-तीन बार समझौता हो गया फिर भी यह समझौता लागू क्यों नहीं हो सका?’ हालांकि दिल्ली के उप श्रम आयुक्त राजेश धर इस पूरे प्रकरण में विभाग की कार्रवाई को बेहद सराहनीय बताते हैं, वे कहते हैं, ‘एक महीने की इस हड़ताल के बाद मालिकों ने मजदूरों के हितों को लेकर प्रतिबद्धता दिखाई है जिसका प्रमाण यह है कि कुछ फैक्ट्रियों में नौ घंटे काम करने का नियम लागू हो चुका है. बाकी कारखानों में भी जल्द ही यह सब शुरू हो जाएगा. वरना इनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई तय है.’

लेकिन मजदूरों की नजर में ये बातें आश्वासन से अधिक कुछ नहीं. हड़ताली मजदूरों के एक नेता सनी कहते हैं, ‘मजदूरों का शोषण कोई आज की बात नहीं है. वजीरपुर की बात करें तो श्रम विभाग का उदासीन रवैया ही यहां के कारखानों मंे हो रहे श्रम कानूनों के खुलेआम उल्लंघन के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है. हम पिछले कई सालों से विभाग के अधिकारियों को कंपनियों के काले कारनामों से अवगत कराते रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद श्रम विभाग की कार्रवाई नोटिस देने तक ही सीमित रही है.’ वे आगे कहते हैं, ‘वजीरपुर के इस औद्योगिक इलाके के पास ही निमड़ी कालोनी नाम की एक कालोनी है, जहां पर श्रम न्यायालय है. अगर वाकई में श्रम कानूनों को लागू करवाने को लेकर श्रम विभाग गंभीर होता तो क्या वजीरपुर के पास ही स्थित इस न्यायालय का खौफ कंपनी मालिकों के मन में नहीं होता ?’

बहरहाल, महीने भर से जारी इस लड़ाई में अब तक निकले अलग-अलग परिणामों वाले ताजा सूरते हाल को देखते हुए साफ तौर पर कहना मुश्किल है कि इसमें मजदूरों को आधी जीत मिली या आधी हार?

पतंग, लड़की और डोर…

मनीषा यादि
मनीषा यादव
मनीषा यादव

रंग-बिरंगी पतंगें. हवा में अठखेलियां करतीं. आकाश को नया रूपरंग, नए आयाम देतीं. परंतु दृश्य अभी अधूरा है. दृश्य को पूर्ण बनाती पतंग देखती वह लड़की. पतंग की हर अदा पर घूमती उसकी आंखों की पुतलियां. पतंग गोता लगाती तो वह उछल जाती. पतंग लहराती तो लहर जाती वह. गोया लड़की नहीं खुद पंतग हो.

गाहे-बगाहे आ जाती है छत पर. घंटों खड़े होकर पतंग निहारती. पतंग के उतरने से उतर जाता है उसका चेहरा. वह चाहती है, पतंग सुबह-दोपहर ही नहीं, शाम और आधी रात को भी उड़े. कई बार तो पतंग देखने में इतनी मशगूल हो जाती कि मां की हांक भी उसे सुनाई नहीं देती. इस कारण कई बार पिटाई की नौबत आई. कई बार तो पिटाई हो भी गई. सच्ची. हल्की-फुल्की ही सही. मां की सख्त हिदायत देने के बाद भी, उसने न छत पर आना छोड़ा. न पंतग देखना. यह कैसा आकर्षण है?

जब कभी वह सड़क पर होती, तो उसकी नजरों में सड़क नहीं आकाश होता. क्योंकि आकाश में होती है पतंग. मगर सड़क पर छोटा भाई भी अकसर उसके साथ ही होता. छोटा भाई जो छोटा है कद में, अक्ल में, उम्र में यूं कहें तो हर मामले में उस लड़की से. न अपना ध्यान रख सकता है, न अपनी बड़ी बहन का. मगर डोर की तरह बहन के पीछे लगा रहता है, जब बहन को घर से कहीं बाहर जाना होता है. वह बहन के साथ शायद (!) न जाए, मगर लड़की की मां नसीहतों की पोटली के साथ खुद ही बांध देती है उसके साथ. चलती है जब लड़की, डोलता है उसके आगे-पीछे मां का बेटा. आकाश में उड़ रही हैं पतंग, सड़क पर चलते-चलते उसे उड़ते हुए देख रही है लड़की. अचानक छोटे भाई ने टोका, ‘घूर-घूर कर क्या देख रही हो!’ उसके लहजे में तेज मांझे जैसी धार थी. अब लड़की की गुस्से से भरी नजर सड़क पर और चौकसी से भरी भाई की नजर है उस पर. और आकाश में उड़ती पतंग.

पतंग को देखते-देखते वर्षों बीत गए. उसे पता ही नहीं चला कि कब वह जवान हो गई. उसे बस यह पता था कि अभी उसे अपने पैरों पर खड़ा होना है. मां-बाप का नाम रोशन करना है. और भी बहुत कुछ… कल न उसने आकाश देखा, न छत और न ही पंतग. ऐसा क्योंकर हुआ? जबकि कल उसकी तबीयत भी ठीक थी. अलबत्ता उसका मूड पूरे दिन जरूर खराब रहा. कल उसे देखने लड़के वाले आए थे. पतंग को उड़ते देख अकसर खुश होने वाली लड़की,उन्हें उड़ता देख अचानक से उदास हो गई है. तभी मां की आवाज ऊपर आई. आश्चर्य! मां की आवाज में तल्खी नहीं उल्लास है. घोर आश्चर्य! आज एक ही बार में उसने सुन लिया मां की आवाज को! अब वह नीचे उतर रही है. वह समझ गई है कि उसका रिश्ता पक्का हो गया है. कमाल है, उसने पलट कर उड़ती पतंग को नहीं देखा. ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ था!

आज घर में खुशी का माहौल है. सब खुश है. वह सबके खुश होने की वजह से खुश है या वाकई वह भी अंदर से खुश है. वह तय नहीं कर पा रही है. थोड़ी देर पहले उसने अपने पापा से एक सवाल किया था. सवाल सुन पापा बोले थे कि ये कैसा ऊटपटांग सवाल है. अभी-अभी मम्मी से उसने वही सवाल किया. मम्मी हंसकर बोल रही है कि बांस जैसी हो गई पर अकल रत्ती भर नहीं आई. उसने सोचा क्यों न यही सवाल छोटे भाई से पूछे. मगर उसने नहीं पूछा. इस डर से कि वह मुंहफट उसे पगली न कह दे.

अब वह खुद से सवाल पूछ रही है, पतंग क्या वाकई उड़ती है या सिर्फ उड़ती हुई दिखती है?