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सुशील कुमार

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बीते एक साल में सुशील से दो मुलाकातें हुईं.दो अलग-अलग आयोजनों में. दोनों बार उनके अपने शहर मोतिहारी में ही. स्वभाव से संकोची, अंतर्मुखी और सरल सुशील से दोनों बार बातचीत का एक ही अनुभव रहा- वे अंदर ही अंदर परेशान से रहते हैं. बेचैन भी. यह परेशानी और बेचैनी किसी दूसरी वजह से कम और ‘क्या करें, क्या ना करें’ वाले सवाल को लेकर ज्यादा है. लेकिन वे अपनी कमजोरियों को छिपाते नहीं. बड़ी-बड़ी डींगें नहीं हांकते और न ही खयाली दुनिया का बाशिंदा बनने की कोशिश करते हैं. ईमानदारी से कहते हैं, ‘ हम बहुत कुछ सोचकर देख लिए, कुछ के बारे में करने की कोशिश कर भी देख लिए. हमने खुद का मूल्यांकन कर लिया है. एक नौकरी करने के ही योग्य हैं हम. चाहे वह क्लर्क की ही नौकरी क्यों न हो.’

सुशील से हम पूछते हैं कि 25 अक्तूबर, 2011 को अचानक आप सुर्खियों के बादशाह बने थे, कौन बनेगा करोड़पति में पांच करोड़ की रकम जीतनेवाले पहले करोड़पति बने थे, अचानक इतना पैसा आया था, अंदर से बदलाव का भाव नहीं आया..! बीच में ही बात रोकते हुए सुशील कहते हैं, ‘ हम जमीन के आदमी थे. उस दिन को भी देखे हैं जब हमारे यहां दो वक्त भोजन तक नहीं बन पाता था, मैं तो खुद पढ़ाई करते ही पांच सौ रुपये की नौकरी करने लगा था और उसके बाद जब केबीसी जीता तो आठ हजार रुपये की नौकरी अपने शहर मोतिहारी से दूर बेतिया के चनपटिया में कर रहा था. तो हमारे जीवन में संघर्ष इतना था कि हम बड़े और बेमतलबी ख्वाबों की दुनिया में कभी विचरण ही नहीं किए. हां, अचानक रातों-रात पैसा आया, शोहरत आई तो कुछ देर के लिए आंतरिक बदलाव तो हुए लेकिन हमने खुद से ही जूझना शुरू किया, खुद से ही लड़ता रहा और फिर आत्मनियंत्रण भी कर लिया.’

ग्लैमर का भूत सवार हुआ तो मुंबई चला गया. सोचा कि वहां फिल्मों के लिए लिखूंगा, लेकिन वहां कोई काम नहीं मिला

सुशील ऐसी ही कई बातें बताते हैं. वे खुद भी और उनके करीबी भी. वे जब अमिताभ बच्चन के सामने हॉट शीट पर बैठकर केबीसी का खेल खेल रहे थे और आगे बढ़ रहे थे, तभी पूरे बिहार के हीरो बन गए थे लेकिन जिस रोज वे विजेता बने, उस दिन तो वे पूरे बिहार नहीं,  देश भर में सुर्खियों में आ गये. सुशील कहते हैं, ‘अचानक ही तमाम मीडिया में इंटरव्यू आने लगे. मेरे बारे में छपने लगा. हर वक्त मीडियावालों का फोन, जबकि उसके पहले मेरा नाम अखबार में एक बार ही छपा था, जिसे मैं कटिंग कर अपने पास सुरक्षित रख लिया था. अखबार में वह नाम भी इस रूप में छपा था कि जब मैं चनपटिया में मनरेगा ऑफिस में काम किया करता था तो ब्लॉक ऑफिस में एक मीटिंग हुई थी. उसी से संबंधित खबर छपी थी, छोटी सी, जिसमें मीटिंग में उपस्थित दर्जन भर लोगों के नाम थे तो मेरा भी एक नाम था. मैंने सोचा कि अब अखबार में नाम कभी आनेवाला तो है नहीं, इसलिए उसे ही काटकर, सहेजकर रख लिया था.’

प्रसिद्धि आैैर पैसे से सुशील के लिए एक स्वभाविक परेशानियां भी शुरू हो गईं. घर पर तरह-तरह के लोगों का जमावड़ा लगने लगा. मदद- मनुहार के साथ रोजाना जगह-जगह से लोग आने लगे. सुशील भी उनकी मदद करने लगे. वे कहते हैं, ‘तुरंत ही मुझे यह पता भी चलने लगा कि इनमें अधिकांश अर्जी-फर्जी लोग हैं. मदद करने की कोई सीमा तो है नहीं और सबकी बातों पर भरोसा कर, सबको मदद करना मेरे बस की बात भी नहीं सो मैंने तय किया कि सबसे पहले जो घर-परिवार के लोग हैं, मित्र-रिश्तेदार हैं और जरूरतमंद हैं, उनकी मदद करूंगा और वैसा ही करना शुरू भी किया.’ सुशील अपनी बात आगे बढ़ाते हैं, ‘मुश्किलें इतनी ही नहीं थी कि मदद मांगनेवालों का तांता लगना शुरू हुआ बल्कि जो उनके शहर के बड़े लोग थे, उनमें से कुछ की अलग परेशानी थी. वे मौके-बेमौके आकर सुनाया करते कि पांच करोड़ की क्या औकात है. पांच करोड़ तो हम चुटकी बजाकर उड़ा देते हैं. हमारी इतनी समझदारी तो थी ही. हम समझ रहे थे कि मुझे आकर ऐसा सुनानेवाले आत्ममुग्धता की बजाय जलनराग में ऐसी बातें ज्यादा बोल रहे हैं, लेकिन मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया वैसी बातों पर और सबको सम्मान देते हुए, सबकी हां में हां मिलाता रहा.’

केबीसी में पहली बार पांच करोड़ जीतने वाले सुशील के बारे में उनके साथी बताते हैं कि जब वे विजेता बने थे, तब उनके घर आनेजानेवालों का तांता लगा रहता था लेकिन जल्द ही वह सिलसिला थम गया. सुशील अपने दायरे में रहने लगे. अपने घर-परिवार और खास मित्रों के दायरे में. कुछ खास मित्रों के साथ बैठना, उनसे बातचीत करना और सप्ताह में एक-दो दिन बाजार में निकलकर पत्र-पत्रिकाओं के स्टॉल से कुछ पत्रिकाओं को खरीदकर घर लौट आना यही उनकी दिनचर्या है. सुशील कहते हैं, ‘सब पत्रिकाएं पढ़ नहीं पाता, किताबें पलटकर देख नहीं पाता लेकिन यही एक हॉबी है. पत्र-पत्रिकाओं और किताबों को खरीदना. यह केबीसी जीतने के बाद की हॉबी नहीं, पहले की हॉबी है. इसमें मेेरा मन लगता है.’ हम सुशील से पूछते हैं कि केबीसी विजेता बनने पर तो अपार खुशियां मिली होंगी और घरवालों की भी अपेक्षाएं बढ़ गई होंगी लेकिन आपने तो उस तरह से दिखावे का कुछ किया नहीं. आपकी पत्नी, जिनसे आपकी शादी केबीसी के छह माह पहले ही हुई थी, उनकी खास फरमाइश रही होगी, वह पूरी की कि नहीं!  सुशील जवाब देते हैं, ‘हम संयुक्त परिवार में रहते हैं. पत्नी का फरमाइश होना, उनके मन में आकांक्षाओं का जगना स्वाभाविक था लेकिन वे हमें जानती हैं. हम सिर्फ उनकी फरमाइश कैसे पूरा नहीं कर सकते थे!’

‘मुझे लगा कि मेरी जरूरत स्कूटी से पूरी हो जाएगी तो दो साल पहले हमने स्कूटी ली है. शहर भी घूम लेता हूं और पास में ही ससुराल है तो वहां भी चला जाता हूं’

इतनी बड़ी रकम आई , एक अच्छी गाड़ी खरीदने का मन तो किया होगा, देश घूम आने का मन तो किया होगा…? वह कहते हैं, ‘नहीं, मुझे लगा कि मेरी जरूरत स्कूटी से पूरी हो जाएगी तो दो साल पहले हमने स्कूटी ली है. शहर भी घूम लेता हूं और पास में ही ससुराल है तो वहां भी चला जाता हूं. रही बात जमीन खरीदने की तो कुछ खेतिहर जमीन गांव में लिया है. और देश घूमने की जहां तक बात है तो धार्मिक स्थलों पर जाते रहता हूं, वह मुझे पसंद रहा है.’

सुशील से और उनके दोस्तों से लंबी बातचीत करने पर साफ हो जाता है कि वे बेहद गंभीर किस्म के इंसान हैं. उफनानेवाला स्वभाव नहीं है उनका. हमेशा हंसकर बात करना, बहुत ही मासूमियत और ईमानदारी से बात करना उनके स्वभाव का हिस्सा है. हम उनसे पूछते हैं कि अब तो वह शोहरत भी मिट गई, शहर भर में बनी पहचान के साथ ही इसी तरह केबीसी से मिले पैसे के सहारे जिंदगी गुजार देने का इरादा है या कुछ और सोचते हैं? वे कहते हैं, ‘सोचा था न. एक बार झलक दिखला जा… के सेट पर बुलाया गया. ग्लैमर की दुनिया को करीब से देखा. लौटकर आया तो वही ग्लैमर की दुनिया का भूत सवार रहा. फिर मुंबई चला गया कि फिल्म के लिए लिखूंगा. वहां गया एक माह रहा. कहीं कोई मौका नहीं मिला. परिचितों ने कहा –  मामूली रोल-वोल कर लो, लिखना तेरे वश की बात नहीं. मैं लौट आया. एक बार फिर उसी सपने के साथ मुंबई गया लेकिन अबकि हफ्ते-दस दिन में ही लौट गया. इस संकल्प के साथ कि उधर नहीं जाना है. और आने के बाद अपने एमए के विषय मनोविज्ञान को लेकर नेट परीक्षा की तैयारी में लग गया. पढ़ाई में मन लगाने की कोशिश करता हूं. हर बार सोचता हूं कि छह माह जमकर पढ़ूंगा तो निकाल लूंगा परीक्षा लेकिन छह माह पढ़ नहीं पाता.’

केबीसी के बाद झलक दिखला जा… एक बड़ा मौका रहा जब सुशील टीवी पर फिर से कुछ दिनों के लिए चर्चा में रहे. सेलिब्रिटियों से मिलने का एक और मौका उन्हें आईबीएन-7 ने द्वारा आयोजित इंडियन ऑफ द ईयर का अवार्ड के आयोजन पर मिला. यहां उनकी अमिताभ बच्चन से दोबारा मुलाकात हुई. सुशील बताते हैैं, ‘अमिताभ बच्चन जी से दो बार मुलाकात हुई और दोनों बार वे बेहद आत्मीयता से पेश आए और हालचाल पूछा उन्होंने. रही बात शहर में सेलिब्रिटी बनकर जाने की तो मैं खुद बचता हूं उससे, मुझे ज्यादा रुचि ही नहीं ऐसी चीजों में.’

तो क्या अब सुशील के लिए केबीसी में विजयी होने की यादें ही ऊर्जा से लबरेज रहने और खुश होने का मंत्र हैं. इसके आगे वे कुछ नहीं सोच रहे?  सुशील जवाब देते हैं, ‘ऐसा नहीं है. केबीसी में विजयी होना जिंदगी की कई खुशियों में एक अहम खुशी के क्षण की तरह आया  लेकिन उसके पहले और उसके बाद भी खुशी के ऐसे क्षण आये, जिन्हंे मैं याद करता हूं तो रोमांचित हो जाता हूं अब भी.जब मैं चौथी क्लास में था तो एक प्रतियोगिता हुई थी. मैं टॉपर तो नहीं बन सका था लेकिन हेडमास्टर साहब ने मंच से बार-बार मेरा नाम लेकर कहा था कि यह टॉपर नहीं बना तो क्या हुआ, यह बहुत ही तेज है और फिर विशेष ईनाम दिया गया था मुझे. उसके बाद जब केबीसी जीत गया तो एक रोज एक पत्र भी अमेरिका से आया था मेरे पते पर. बिहार के ही एक एनआरई भेजे थे. उस पत्र के लिफाफे पर मेरे पते के रूप में सिर्फ इतना ही लिखा हुआ था- सुशील कुमार, केबीसी विनर, बिहार, भारत…! वह पत्र मुझ तक पहुंचा. बता नहीं सकता कि उस दिन कितना खुश था!’

सुशील के बारे में हम मोतिहारी में ही रहनेवाले शैलेंद्र से पूछते हैं. वह कहते हैं, ‘मेरी व्यक्तिगत जान-पहचान नहीं है उनसे लेकिन मैं कभी-कभार शहर में आते जाते उन्हें देखता हूं. कोई परिचित मिलता है तो मुस्कुराते हैं और फिर लौट जाते हैं..! 31 साल के सुशील की इस गंभीर मुद्रा के कायल कई लोग मिलते हैं मोतिहारी में. कुछ शिकायतों का पिटारा लिए भी मिलते हैं कि इतना पैसा मिला, कुछ तो करते शहर के लिए.

सुशील को मोतिहारी शहर में हर कोई जानता है. नाम से, चेहरे से भी. वे किसी के रोल मॉडल भी बन सके हैं या नहीं, यह तो पता नहीं चलता. लेकिन जरूर महसूस होता है कि अचानक ही मोतिहारी, चंपारण और बिहार की परिधि लांघ देश-दुनिया में सुर्खियां बटोरनेवाले सुशील मोतिहारी के दायरे के एक सामान्य वासी हो गए हैं. मोतिहारी के भी नहीं बल्कि अपने मोहल्ले हनुमानगढ़ी के. इंटरनेट, मेल, फेसबुक, ट्विटर… आभासी दुनिया मंे विचरण करने के इन तमाम विकल्पों से भी कोसों दूर.

मटुकनाथ-जूली

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फोटो: विकास कुमार

सुर्खियों में बने रहने का चस्का जिसे लग जाए और फिर सुर्खियों में बनाए रखनेवाले एक-एक कर भाव देना छोड़ दें तो उस दौर की पीड़ा किस कदर सालती है, यह मटुकनाथ से बातचीत कर महसूस किया जा सकता है. 2006 में अचानक एक रोज अपनी शिष्या-प्रेमिका के साथ प्रेम प्रसंग का खुलासा होने और उसके एवज में सार्वजनिक तौर पर पहली और आधिकारिक पत्नी आभा चौधरी द्वारा मुंह में कालिख पोतकर पिटाई किए जाने के बाद सुर्खियों में आए प्रोफेसर मटुकनाथ-जूली की जोड़ी उसी पीड़ा के दौर में है. मटुकनाथ-जूली की दिनचर्या तक में दिलचस्पी रखनेवाला मीडिया अब इस मशहूर जोड़ी को साल में एक बार फरवरी में याद करने की कोशिश करता है, जब वेलेंटाइन डे करीब आता है. उसके बाद पूरे साल मटुकनाथ- जूली को खुद कोशिश कर अपने को मीडिया मंे बनाए रखना पड़ता है. लेकिन सुर्खियां बटोरते-बटोरते मटुकनाथ भी इस विधा में इतने उस्ताद हो चुके हैं कि मीडिया के न चाहते हुए भी अपने पीछे बावला होने को विवश कर ही देते हैं. कभी अपने निलंबन और बर्खास्तगी की वापसी के लिए धरने पर जाने के पहले रिक्शे पर जूली को बैठाकर खुद रिक्शा चलाते हुए निकलकर, कभी अपनी डायरीनुमा किताब ‘ मटुक जूली की डायरी’ की ब्रांडिंग कर, कभी भागलपुर के पास अपने गांव में प्रेम पाठशाला की नींव डालकर, उस स्कूल में जूली को केंद्रीय भूमिका में रखकर, स्कूल खुलने से पहले ही जूली को स्कूल की माता की उपाधि देकर, कभी पिंजर प्रेम प्रकासिया नाम से ब्लाॅग की शुरुआत कर, कभी जूली को कार गिफ्ट कर, कभी 2009 में चुनाव लड़ने के लिए नामांकन कर तो पिछले दिनों लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी से जुड़कर. और ऐसा कुछ भी करने के पहले मटुक प्रेस के कुछ लोगों को एसएमएस करना नहीं भूलते. खासकर छायाकारों को.

हम चाहते हैं कि हमसे कभी समाज, राजनीति, संस्कृति के विविध विषयों पर विचार लिए जाएं, लेकिन हमें उस योग्य नहीं समझा जाता

फिलहाल मटुकनाथ पटना में अपने नए घर में शिफ्ट होने के बाद उसे व्यवस्थित करने और सजाने-संवारने में व्यस्त हैं. इसी व्यस्तता में हम उनसे बातचीत करते हैं. बातचीत करने से पहले वे बातचीत के संदर्भों पर खूब बात कर लेते हैं. कहते हैं, ‘बुरा नहीं मानिएगा, ऐसा मैं जानबूझकर कर रहा हूं, नहीं तो पिछले कुछ सालों से देश के अलग-अलग हिस्से से सिर्फ मजावादी सवालों के साथ ही हमारे पास फोन आते रहे हैं. हम प्रेम की काउंसलिंग करना चाहते थे, लेकिन लोगों ने तो इसको मजाक में ही ले लिया और जब जी में आए, उलूल-जुलूल सवालों के साथ फोन कर परेशान करने लगे.’ मटुकनाथ से हम पूछते हैं कि काउंसलिंग वाली बात तो समझ में आ गई कि वह फेल-सी हो गई, उस प्रेम पाठशाला का क्या हुआ जिसकी नींव आपने अपने पैतृक गांव जयरामपुर में जूली के साथ मिलकर रखी थी और जिसमें दस लाख रुपये के करीब खर्च भी कर दिए थे. मटुक कहते हैं, ‘गांववालों का सहयोग मिला है, हम उसे करेंगे, लेकिन अभी उसे भी स्थगित कर दिए हैं. रिटायरमेंट के बाद करेंगे.’ रिटायर कब हो रहे हैं, हमारा सवाल होता है. जवाब होता है, ‘अगले चार साल में. उसके पहले अपने काॅलेज में हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष बनेंगे, जल्द ही.’  ‘आप रिटायर होंगे तो जूली की पीएचडी पूरी हो गई? वेे बताते हैं, ‘सब हो ही गया है. हम ही तो गाइड हैं. बस, अगले माह तक किसी दिन साइन कर देंगे, जूली पीएचडी वाली हो जाएंगी. फिलहाल जूनियर रिसर्च फेलो तो हैं ही.’ जूली की बात चलते ही मटुकनाथ जूली के रिसर्च पेपर को विस्तार से समझाने लगते हैं. कहते हैं, ‘मीरा की अध्ययन परंपरा में ओशो का योगदान. इसी विषय पर जूली पीएचडी कर रही हैं. अद्भुत विषय है यह और शानदार थीसिस भी.’ मटुकनाथ विस्तार से यह बातें बता रहे होते हैं बिना इस बात की परवाह किए कि फिर वे एक नये किस्म की सुर्खियां ही बटोरनेवाले हैं. जब वे खुद रिटायर होने के करीब होंगे तब संभवतः जूली नौकरी करेंगी. तब स्थिति बड़ी विचित्र होगी. क्योंकि अभी तक तो यही देखा गया है और माना जाता रहा है कि सुर्खियों में आने के बाद से मटुकनाथ जूली को कहीं किसी सार्वजनिक जगहों पर अकेले जाने नहीं देते. लोग कहते हैं कि फोन पर भी किसी से बातचीत नहीं करने देते. सारा मोर्चा खुद ही संभालते हैं. लेकिन मटुक जब खुद रिटायर होकर घर बैठ जाएंगे और जूली नौकरी करने के लिए तैयार होंगी तब भी क्या मटुकनाथ रोजाना जूली को लेकर काॅलेज में जाएंगे और वहीं परछाईं की तरह मौजूद रहेंगे? या फिर नौकरी करने से ही मना करेंगे? इस सवाल का जवाब भी हम तुरंत दूसरे तरीके से मटुक से मांगते हैं. पूछते हैं कि पीएचडी के बाद जूली प्रोफेसर ही बनेंगी न? वे कहते हैं, ‘हां कहती तो हैं कि अध्यापन के पेशे में ही जाना है…!

निकट भविष्य में अपने विभाग में अध्यक्ष बनने की उम्मीदों से भरे और उस सपने के संग रह रहे मटुकनाथ के पास फिलहाल खुशी और मुश्किल, दोनों की वजहें मौजूद हैं. जूली के संग प्रेम प्रसंग की वजह से 15 जुलाई, 2006 को उन्हें निलंबन का सामना करना पड़ा था. 20 जुलाई, 2009 को बर्खास्तगी झेलनी पड़ी थी. अब इन सबसे उन्हें मुक्ति मिल गई है. वे फिर से नौकरी में लौट आए हैं. बकाया पैसे का भुगतान भी विश्वविद्यालय से हो गया है जिससे एक कार जूली के लिए खरीद चुके हैं. यही वजह है कि वे खुश हैं. लेकिन दूसरे किस्म की मुश्किलें भी सामने हैं. उनकी पहली पत्नी आभा चौधरी, जो अब वकालत भी करती हैं और अपने बेटे अनुराग के नाम पर अनुराग फाउंडेशन भी चलाती हैं, लगातार उनसे अदालती लड़ाई लड़ रही हैं. कोर्ट ने मटुकनाथ को आदेश दिया है कि आभा को वे हर माह 15 हजार रुपये दें. मटुकनाथ कहते हैं, ‘मामला अदालत में है. हमने तो आभा को पटना में बना-बनाया घर ही छोड़ दिया है, जिससे 40 हजार के करीब किराया आता है. उनके पास गाड़ी है, बंगला है, एसी है, घर में सारे आधुनिक उपकरण हैं, बेटा स्वीडन में नौकरी कर ही रहा है तो फिर हम अब क्यों पैसे देंगे?’ मटुकनाथ साथ में यह भी बताते हैं कि 2006 की घटना के बाद से उनका अपने बेटे से कभी किसी किस्म का कोई संपर्क या संवाद नहीं हुआ.

निकट भविष्य में अपने विभाग में अध्यक्ष बनने की उम्मीदों से भरे और उस सपने के संग रह रहे मटुकनाथ के पास फिलहाल खुशी और मुश्किल, दोनों की वजहें मौजूद हैं

मटुकनाथ की मुश्किलें इतनी भर नहीं हैं. सरकार ने तो फिर भी उन्हें वापस नौकरी में रख लिया है और वरिष्ठता के आधार पर वे विभागाध्यक्ष भी बन सकते हैं, लेकिन काॅलेज में प्राध्यापक और प्राध्यापकों के इशारे पर बच्चे अब भी मजावादी रवैया बनाए रखते हैं. मटुकनाथ कहते हैं ‘जो बच्चे पढ़ने आते हैं, मेरे प्रति उनका नजरिया या रवैया तभी तक उस तरह का रहता है, जब तक वे हमसे मिलते नहीं. जैसे ही मिलते हैं एक बार, हमारे मुरीद हो जाते हैं. और रही बात अध्यापकों-प्राध्यापकों की तो उनकी बात ही नहीं करना चाहता. 80 प्रतिशत प्राध्यापक कोई चिंतक-विचारक तो होते नहीं. बस दिन काटते हैं. हवा कर रुख देखकर अपनी चाल बदलते रहते हैं.’ मटुकनाथ साथी प्रोफेसरों को निशाने पर लेते हैं. साथी प्रोफेसर मटुकनाथ को. साथी प्रोफेसरों का बस यही कहना है कि मटुकनाथ को गंभीरता से कैसे लिया जा सकता है?

मटुकनाथ के संदर्भ में ऐसे सवाल ही उनकी पीड़ा को अथाह विस्तार देते हैं. वे पटना की सड़कों पर गुजरते हैं तो उन्हें अब भी लोग आकर्षण के भाव से देखते हैं. एक ऐसा भाव जो मजे से ही ज्यादा भरा होता है. हुल्ले-ले-ले टाइप अंदाज में. दूसरी ओर जूली क्या चाहती हैं, यह संभवतः मटुक के सिवाय कोई ज्यादा नहीं जानता. मटुक चाहते हैं कि उन्हें सिर्फ मजावादी तत्व न मानकर गंभीरता से लिया जाए. कहते हैं, ‘मैंने 2009 में चुनाव के लिए नामांकन भरा. नामांकन रद्द हो गया, लेकिन कभी किसी ने मेरी राजनीतिक रुचि को गंभीरता से नहीं लिया. इस बार भी एक संभावना देखकर गोपाल राय और प्रोफेसर आनंद कुमार से बातचीत कर आम आदमी पार्टी की सदस्यता ली, लेकिन इस बार भी मेरी राजनीतिक रुचि को गंभीरता से नहीं लिया गया. हम चाहते हैं कि हमसे कभी समाज, राजनीति, संस्कृति के विविध विषयों पर विचार लिए जाएं, लेकिन हमें उस योग्य नहीं समझा जाता. सिर्फ सनसनी भरी बातों के लिए हमसे बातचीतकी जाती है. और अब तो सिर्फ वेलेंटाइन डे आने पर हमको याद किया जाता है.’

जिस मीडिया ने मटुकनाथ-जूली को रातोरात सुर्खियों में लाकर चर्चित चेहरे में शामिल कर दिया था, उसी मीडिया से आज मटुकनाथ को दर्जन भर शिकायतें हैं. मटुक से हम पूछते हैं, ‘मीडिया तो ऐसे ही होता है. आप चिंतक-विचारक टाइप अपनी बातों को रखने के लिए क्या दूसरे माध्यमों का सहारा लेंगे? वे बताते हैं, ‘जब तक बर्खास्त था, तब तक तो ब्लाॅग पर भी लिखा करता था. अब तो वहां भी समय नहीं देता. दस मिनट एफबी पर जाता हूं. अब तो सारा ध्यान विभागाध्यक्ष बनने के बाद एक माॅडल के तौर पर हिंदी विभाग को स्थापित करने को लेकर है.’

मटुक  अपनी बातों में यह दावा करना नहीं भूलते, ‘हम विभागाध्यक्ष बनेंगे तो आकर देखिएगा विभाग. सुबह से शाम तक गहमागहमी रहेगी. रोज कक्षाएं चलेंगी. स्मार्ट क्लास चलेगा. लाइब्रेरी दुरुस्त करेंगे.’ और प्रेम की कुछ छाप दिखाई देगी विभाग में? इसपर उनका जवाब होता है, ‘प्रेम तो जीवन का मूल है ही. उससे ही तो समाज का निर्माण होता है. एक विध्वंसात्मक प्रेम होता है, दूसरा रचनात्मक. हम रचनात्मक पाठ पढ़ाएंगे…’

कलावती बांदुरकर

कलावती बांदुरकर
कलावती बांदुरकर
कलावती बांदुरकर

वैसे तो कलावती बांदुरकर और उसके परिवार की कहानी वर्ष 2005 से शुरू होनी चाहिए. तब जब उनके पति ने आत्महत्या कर ली थी. उस समय वे विदर्भ के किसानों और उनके परिवारों की व्यथा-कथाओं का हिस्सा बनती जिन्होंने बैंक का लोन न चुका पाने की वजह से आत्महत्या की थी. उस दौर में आए दिन इस इलाके से किसानों के आत्म हत्या की खबरें आती रहती थीं. अखबारों के पन्ने पर दर्ज होती थीं और गायब हो जाती थीं. कलावती के पति की मौत वाली खबर के साथ भी बिल्कुल ऐसा ही हुआ था.

अपने जैसी बाकी महिलाओं से अलग कलावती दोबारा अखबारों और जल्दी ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर तब आती हैं जब वर्ष 2008 में राहुल गांधी उनके घर पहुंचते हैं. वहां खाना खाते हैं और वर्ष 2009 में संसद में बोलते हुए कलावती का जिक्र करते हैं. इन दो घटनाओं के बाद विदर्भ इलाके के छोटे से गांव जलका की सड़कों और गलियों में तथा गांव के छोटे से हिस्से में रहने वाली कलावती की जिंदगी में हलचल शुरू होती है. राहुल आकर चले जाते हैं लेकिन गांववाले और कलावती उनकी तस्वीर संभाले रखते हैं. काफी दिनों बाद तक गांव के हर मोड़ पर उनके बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे रहे. जाहिर है कि इन्हें स्थानीय कांग्रेसी नेताओं ने लगवाया था लेकिन इनकी रखवाली गांववाले किया करते थे. इस उम्मीद में कि कि देश के नेता आए हैं तो गांव के किसानों के दिन बहुरेंगे. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. जो थोड़ी बहुत सरकारी सुविधाएं गांव तक आईं वे सीधे कलावती के घर पहुंच गईं.  स्थानीय कार्यकर्ता नितिन खडगे इस बारे में कहते हैं, ‘गांव या इलाके के किसानों को उम्मीद थी कि राहुल गांधी के आने से कोई फर्क पड़ेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं. किसानों के कर्ज जस के तस बने रहे. किसी को कोई राहत नहीं मिली. सब जस का तस ही है. गांव के स्तर पर कोई ऐसा बदलाव नहीं हुआ जिसे बताया जा सके.’

नितिन, कलावती के गांव जलका के ही रहने वाले हैं और दिल्ली स्थित गैरसरकारी संस्था सुलभ इंटरनेशल से जुड़े हुए हैं. हम नितिन से यह जानने की कोशिश करते हैं कि राहुल गांधी के आने के बाद कलावती की जिंदगी में कितना बदलाव हुआ तो वे जानकारी देते हैं, ‘ बोले तो उसकी तो जिंदगी ही बदल गई. उसके पास 2008 से पहले कुछ नहीं था. राहुल आए तो पूरे देश का ध्यान उसकी तरफ गया. आज की तारीख में कलावती को हर उस सरकारी योजना का लाभ मिल रहा है जो उसे मिलना चाहिए. जिले के अधिकारी उसे देखते ही पहचान जाते हैं. राहुल गांधी के आने से उसे तो सबकुछ मिल गया, उसे तो.’

इसी बातचीत में वे यह भी जानकारी देते हैं कि वर्ष 2009 में सुलभ इंटरनेशनल की तरफ से कलावती के नाम पर  36 लाख रुपये बैंक में जमा करवाए गए थे. हर महीने जो ब्याज मिलता है उसी से कलावती का परिवार चलता है. कलावती की  सात बेटियां और दो बेटे हैं. बेटे सबसे छोटे हैं और अभी पढ़ाई कर रहे हैं. सभी बेटियों की शादी हो चुकी है. लेकिन ऐसा नहीं है कि पैसे मिल जाने और कच्चा घर के पक्का बन जाने के बाद कलावती के परिवार में सब ठीक है. जिस पैसे ने उन्हें सहूलियत दी वही उनके लिए एक आपदा लेकर भी आया. अक्टूबर 2011 में कलावती की  बेटी, सविता दिवाकर खामणर ने आत्महत्या कर ली. कहा जाता है कि सविता के पति ने बैंक से कर्ज लेकर ऑटो खरीदा था. ऑटो से इतनी कमाई नहीं हो रही थी कि वह कर्ज चुका पाता. ऐसे में उसने अपनी पत्नी सविता पर दबाव बनाना शुरू किया कि वह अपनी मां से पैसा मांगे. इसी पारिवारिक कलह की वजह से सविता ने आत्महत्या कर ली. सविता के आत्म हत्या करने के साल भर पहले ही कलावती की एक और बेटी पपिता के पति संजय खलासकर ने भी आत्महत्या कर ली थी.

अब कलावती की उम्र साठ के करीब हो चुकी है. चश्मे के बिना कुछ देख नहीं सकतीं. सुनाई भी बहुत कम देता है. अब बातें करने में उनकी पहले जैसी दिलचस्पी नहीं है. हालांकि उनकी सबसे स्वर्णिम स्मृति आज भी उनके साथ है. कलावती के घर में आज भी राहुल गांधी की एक बड़ी तस्वीर लगी है. अब भी जब कोई कलावती से राहुल गांधी के बारे में जिक्र करता है, वे अपने दोनों हाथ उठाकर उसे आशीर्वाद देने से खुद का रोक नहीं पातीं.

बंटी

बंटी

तिरुवनंतपुरम सेंट्रल जेल में अपना वक्त गुजार रहे देवेंद्र सिंह उर्फ ‘बंटी चोर’ के नामों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि वह शायद खुद भी भूल चुका है. यही वजह है कि अदालत में जमा किए गए शपथपत्र के हर परिच्छेद में उसका एक नया नाम लिखा हुआ है.

खैर, उसके असली नाम की गुत्थी सुलझाने में तो वक्त लग सकता है लेकिन दुनिया के लिए तो वह ‘बंटी चोर’ ही है. वह शख्स जो चोरी के अपने अलहदा अंदाज और हर बार पुलिस को चकमा देने के लिए कुख्यात है.

बंटी को चोरी करने और पुलिस को छकाने की बुरी लत है. इसी लत के चलते वह सुर्खियों को सुर्ख करता रहा. यह कहना मुश्किल है कि बंटी को खबर में बने रहने की आदत है या मीडिया उसे खबर बनाए बगैर नहीं रह पाता. सबसे पहले 2004 में बंटी को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था. उसकी कुख्याति ने उसे 2010 में बिग बॉस के चौथे सीजन में जगह दिलवाई. लेकिन यह शायद उसकी एक जगह न टिकने की आदत ही थी कि वह उस घर में भी एक दिन से ज्यादा नहीं टिक पाया. हिंसा और बदसलूकी की वजह से बंटी को दूसरे ही दिन घर से निकाल दिया गया.

इसके बाद साल 2012 में बंटी का नाम हरियाणा के पलवल में हुई एक चोरी से जुड़ा जिसके चलते उसे भोपाल पुलिस ने धर दबोचा. बाद में उसे दिल्ली पुलिस के हवाले कर दिया गया. पुलिस ने बंटी से पुराने समय के कुछ कीमती गहने और चांदी का सामान बरामद किया था. इन्हें बेचने के लिए वह एक सुनार की दुकान पर गया था, लेकिन अफसोस कि दुकानदार ने बंटी को पहचान लिया और पुलिस को खबर कर दी.

पिछले साल यानी 2013 में एक बार फिर बंटी को अखबारों में जगह मिली जब वह एक बार फिर पुलिस के हत्थे लगा. इस बार उसको पकड़ने का सेहरा केरल पुलिस के सर पर बांधा गया. बताया गया कि तिरुवनंतपुरम में एक एनआरआई के घर में हाथ साफ करने के बाद बंटी ने पुणे में अपना डेरा जमाया था जहां एक लॉज में पुलिस ने उसे धर दबोचा और केरल पुलिस के हवाले कर दिया.

खबरों के मुताबिक पुलिस जब बंटी के कमरे में दाखिल हुई तब वह न्यूज चैनल पर केरल में किए गए अपने कारनामे के बारे में ही देख रहा था. सुनने में यह भी आया कि पहली बार में तो बंटी ने केरल पुलिस को भी चकमा दे दिया था, लेकिन इस बात में कितनी सच्चाई है, इसका खुलासा आज तक नहीं हो पाया है. वैसे भी बंटी के कारनामों में दिलचस्पी लेने वाले लोग कई बार अतिउत्साह में आकर कुछ ऐसी बातें भी कह जाते हैं जिनका सच्चाई से कोई लेनादेना नहीं होता. शायद बंटी को दिया गया ‘सुपर चोर’ का खिताब उसके ऐसे ही ‘प्रशंसकों’ की देन है.

केरल पुलिस के हिरासत में लिए जाने के बाद बंटी अचानक सुर्खियों से गायब हो गया. मीडिया को भी एक्शन की ही तलाश होती है और फिलहाल बंटी ऐसा कुछ मसालेदार नहीं परोस पा रहा है क्योंकि वह तिरुवनंतपुरम सेंट्रल जेल में बेहद ही कड़ी सुरक्षा के बीच समय काट रहा है. न्यायालय के अगले आदेश तक बंटी को चाक-चौबंद सुरक्षा के बीच इस जेल में रखा गया है.

तहलका से बातचीत में तिरुवनंतपुरम सेंट्रल जेल के वेलफेयर अधिकारी जॉय एस बताते हैं, ‘अभी बंटी का बर्ताव ठीक है. वह समय पर खाता है, ठीक से बात करता है, पुलिस अधिकारियों का सहयोग करता है, लेकिन बीच-बीच में वह यह जाहिर करने से नहीं चूकता कि वह भगवान कृष्ण का अवतार है. अपनी गिरफ्तारी के बाद बंटी ने मीडिया से बातचीत में भी कहा था कि उसे भगवान कृष्ण द्वारा धरती पर भेजा गया है और वह उनका पांचवां अवतार है.

जाहिर है कि ऐसी दिलचस्प बातें बताते हुए वेलफेयर अधिकारी जॉय भी हंसे बिना नहीं रह पाते. ऐसी अजीबोगरीब बातें करके बंटी, न्यायालय और पुलिस को उलझाने की कोशिश करता है. वैसे अपने इस रवैये की वजह से बंटी को जेल से बाहर निकालकर कुछ दिन मानसिक चिकित्सालय में भी बिताने पड़े थे, लेकिन कुछ दिनों बाद उसे वहां से छुट्टी मिल गई. फिलहाल वह जेल में ही अपनी निराली बातों से सबके आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.

बंटी का जेल में बर्ताव ठीक है, लेकिन वह बार-बार खुद को भगवान कृष्ण का अवतार कहता रहता है

बंटी पर देशभर में चोरी के 500 से भी ज्यादा आरोप दर्ज हैं. केरल पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद कई वकीलों ने उसके केस में दिलचस्पी दिखाई थी, लेकिन जॉय एस की मानें तो बंटी के अजीब रवैये और हर बार अलग जानकारी देने की वजह से उनमें से कई वकील अब पीछे हट गए हैं. वैसे जहां तक जेल में बंटी के व्यवहार की बात है तो वह काफी अच्छा है. जेल अधिकारी के मुताबिक बंटी पूरी कार्रवाई में काफी सहयोग कर रहा है लेकिन भाषा की वजह से उसकी बात समझने और समझाने में थोड़ी दिक्कत जरूर आती है. कभी-कभी तो एक बात को समझाने में आधा घंटा लग जाता है.

बदनामी में भी नाम है – इस बात को काफी हद तक सच साबित करने वाले बंटी के कारनामों को देखते हुए मलयालम फिल्म उद्योग भी उसके नाम को भुनाने में लगा हुआ है. केरल में की गई चोरी के बाद बंटी को लेकर दक्षिण भारत में भी लोगों की रुचि बढ़ने लगी और ऐसी खबरें आईं थीं कि 2013 में बंटी के ऊपर दो मलयालम फिल्में बनाई जा रही हैं. गौरतलब है कि बॉलीवुड में तो 2008 में ही बंटी पर आधारित ‘ओए लकी, लकी ओए’ फिल्म बन गई थी जिसे काफी सराहा गया था. फिल्म का निर्देशन दिबाकर बनर्जी ने किया था और मुख्य भूमिका में अभय देओल थे.

ब्रेकिंग न्यूज ने कइयों को पहचान दिलाने का काम किया है लेकिन बंटी ने जिस पेशे का चुनाव किया उसके साथ अपनी पहचान जाहिर न होने की अनिवार्य शर्त जुड़ी हुई थी. अफसोस कि  खबरों में रहने और नाम हासिल करने के बाद अब यही पहचान बंटी के पेशे में रुकावट का सामान बनती जा रही है.

साध्वी ऋतंभरा

साध्वी ऋतंभिा
साध्वी ऋतंभिा
साध्वी ऋतंभिा. फोटोः तरुण सहरावत

‘क्या कभी राजनीति में आएंगी?’ तकरीबन तीन साल पहले मिली थीं, तो पूछा था. जवाब था, ‘नहीं कभी नहीं. मगर हम राजनीति को प्रभावित करते रहेंगे.’ उन्होंने और उनकी विचारधारा वाले उनके अनेक साथियों ने इन चुनावों में कितना राजनीति को प्रभावित किया है, उस पर राजनीतिक विश्लेषक अब तक लेख लिख रहे हैं.  तीन साल बाद जब इस साल 26 मई की गर्म दोपहर को साध्वी ऋतंभरा को प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण समारोह में देखा था, तो इस बार भी सवाल वही पूछना था, बस कुछ अलग-से शब्दों का चयन कर रखा था ताकि जवाब देने में ऋतंभरा को भी उकताहट न हो, ‘क्या आप अब भी उमा भारती द्वितीय नहीं बनेंगी?’

लुधियाना के एक हलवाई परिवार से ताल्लुक रखनेवाली निशा को ऋतंभरा, साध्वी ऋतंभरा और दीदी मां ऋतंभरा बनने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जिस तेजी से उमा भारती और ग्वालियर की राजमाता सिंधिया राष्ट्रीय फलक पर चमकी थीं, उतनी ही तेजी से ऋतंभरा भी लोगों की निगाहों में आईं. भड़काऊ भाषण हो या केसरिया वस्त्र या फिर विश्व हिंदू परिषद और दुर्गा वाहिनी से जुड़ाव, उन दिनों उनकी तेजतर्रार छवि उमा भारती की छवि से कंधा सटाए खड़ी रहती थी. विदेशी पत्रकार उन दिनों जब उमा भारती के प्रेम संबंध और बार्बी डाल के प्रति उनके प्रेम पर खूब लिख रहे थे और हमें यह भी बता रहे थे कि उमा भारती लास एंजिल्स से बार्बी डाल खरीदती हैं, तब भी ऋतंभरा तब भी कुछ खास मुद्दों पर ही बात करती थीं. हिंदुत्व के जागरण और राष्ट्रीयता पर, राम लला पर और हिंदू धर्म पर. कम इंटरव्यू देती थीं और खुद के बारे में कम ही बोलती थीं. लेकिन दुनिया उन्हें जानने के लिए उत्सुक थी, इसलिए उन पर खूब लिखा, बोला और दिखाया गया. बावजूद इस प्रसिद्धि के, उस तरह की प्रसिद्धि जिसे उसी वक्त भुनाया जाना नियम है जिस वक्त वह मिली हो, ऋतंभरा कुछ समय बाद ही राष्ट्रीय परिदृश्य से अदृश्य हो गईं. वहीं उमा भारती नियम का पालन करती रहीं और उस प्रसिद्धि के तयशुदा रास्तों पर चलती गईं. कुछ वक्त के लिए पड़ावों ने उन्हें रोका जरूर, पर वे आगे

बढ़ती रहीं, राजनीति करती रहीं, मंत्री बनती रहीं, गंगा साफ करने के लिए तैयार होती रहीं.

‘यह तो कोई बात नहीं हुई कि वे साध्वी हैं, मैं साध्वी हूं और अगर वे राजनीति में गईं, तो मैं भी राजनीति में जाऊं. उमा जी की अपनी राह थी, मेरी अपनी. राजनीति कोई लक्ष्य नहीं था मेरा.’ ऋतंभरा दार्शनिक हो जाती हैं. ‘राम जन्मभूमि आंदोलन में लक्ष्य भारतीय स्वाभिमान और अपनी पहचान की रक्षा का था. वह मेरी भूमिका थी. अभी जो मैं कर रही हूं वह मेरा स्वभाव है. आप स्वभाव में तो लंबे समय तक रह सकते हो, भूमिका तभी निभाते हो जब परिस्थिति ऐसी आए या देश को आपकी जरूरत हो. तो मेरा जो स्वभाव था मैंने वही रास्ता चुना.’ ऋतंभरा के ज्यादातर जवाब (जो संस्कृतनिष्ठ हिंदी में होते हैं, हालांकि उनके कहे एक शेर में उर्दू भी थी) सवाल की गोलाकार परिधि से बहुत ज्यादा बाहर जाकर आपको कुछ और ही जवाब देने की कोशिश करते हैं. कई बार. जैसे आप उनसे पूछें कि क्या आप दुर्गा वाहिनी से जुड़ी हैं, तो वे कहती हैं, ‘हम अठ्ठारह-बीस साल पहले सिर्फ दो वर्ष संयोजिका रहे हैं उसके’. तो आप जाहिर है पूछेंगे, ‘तो दुर्गा वाहिनी से अभी आपका कोई जुड़ाव नहीं है’. जवाब, ‘जुड़ाव नहीं, मेरे ऊपर कोई दायित्व नहीं है’. जाहिर है शब्दों से खेलने की जादूगरी की शौकीन ऋतंभरा इस तरह के जवाब, जाहिर है, कई अप्रिय सवालों के देती हैं, और लिखने वाले की भी गलती है कि वह एक सवाल पूछना भूल जाता है कि क्या दुर्गा वाहिनी और मिस इंडिया पर बनी डाक्यूमेंट्री ‘द वर्ल्ड बिफोर हर’ देखी है आपने. खैर, फिर कभी.

वह रास्ता जो ऋतंभरा ने प्रसिद्धि को छोड़कर चुना, उनका स्वाभाव, वह वात्सल्य ग्राम है. राम मंदिर आंदोलन के बाद ज्यादातर जब वे खबरों से गायब थीं, उनके अनुसार, अपने इसी सपने को पूरा करने में व्यस्त थीं. बीच-बीच में जब वे खबरों में आतीं, तो एक-दो दिन की खबर बनती और फिर गायब हो जाती. 1995 में ईसाइयों और मदर टेरेसा को लेकर भड़काऊ भाषण देने पर इंदौर में हुई गिरफ्तारी हो या 2011 में रामलीला मैदान पर रामदेव के कथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में उनके साथ मंच साझा करने पर हुआ विवाद. या फिर 2013 में अहमदाबाद में 50 एकड़ में खुल रहे गुजरात के पहले वात्सल्य ग्राम के भूमि पूजन के दौरान नरेंद्र मोदी द्वारा उनकी और उनके वात्सल्य ग्राम की प्रशंसा हो, ऋतंभरा का खबरों में आना-जाना कम ही रहा. वे उस तरह का आकर्षण नहीं पैदा कर पाईं जैसा अयोध्या प्रकरण के बाद करने में सफल रही थीं.

‘यह तो कोई बात नहीं हुई कि वे साध्वी हैं, मैं साध्वी हूं और अगर वे राजनीति में गईं, तो मैं भी राजनीति में जाऊं. उमा जी की अपनी राह थी, मेरी अपनी’

‘देखिए, मुझे मंच का, भीड़ का, राजनीति का कोई मोह नहीं है. साध्वी ऋतंभरा ने डेढ़-डेढ़ लाख लोगों की संख्या को संबोधित किया है. आज लोगों को ढूंढ़नी पड़ती है भीड़, हम जहां खड़े हो जाते थे वहां लोग हमें सुनने के लिए उमड़ पड़ते थे. इसलिए मुझे न मंच का, न नेतृत्व का, न जनता का, न बड़े हारों का और न मीडिया में प्रचार का मोह है. बहुत जिया है मैंने इन सब को. अब वात्सल्य ग्राम ही मानस सृष्टि है मेरी.’ देश और खासकर विदेशों में भागवत का पाठ करने और सास-बहू के सीरियलों में आस्था न रखनेवाले टीवी चैनलों पर प्रवचन प्रसारित करने के अलावा ऋतंभरा सालों से वात्सल्य ग्राम को ही अपनी नई पहचान बनाना चाहती हैं. लेकिन

यह वात्सल्य ग्राम है कैसा जो बकौल खुद ऋतंभरा अब उनके जीवन की धुरी है?

देश के कई प्रदेशों में स्थित (ज्यादातर भाजपा शासित प्रदेशों में) वात्सल्य ग्राम का मुख्यालय वृंदावन स्थित वात्सल्य ग्राम है. एक विशाल लोहे के गेट, जिस पर सिपाही खड़े रहते हैं, के पार 50 एकड़ में फैला हुआ. हरियाली से भरपूर. मथुरा के पेड़े खाने की चाह में कभी अगर आप मथुरा-वृंदावन रोड पहुंचंे, तो बाहर से ही इसकी भव्यता देख चौंक जाएंगे. ऋतंभरा इसे वृद्धाश्रम, महिलाश्रम और बालाश्रम का विकल्प बताती हैं. यहां बनाए गए बंगलेनुमा और मल्टीस्टोरी घरों में विधवा महिलाएं, बूढ़ी औरतें और अनाथ-अकेले बच्चे एक परिवार बनकर रहते हैं. हर घर में एक अलग परिवार रहता है जिसमें एक वृद्धा नानी की भूमिका में होती हैं, एक युवा महिला मां और एक मौसी की. और ये सभी मिलकर कई बेटे-बेटियों का पालन-पोषण करते हैं. बेटियों की संख्या यहां ज्यादा है, तकरीबन 90 फीसदी. हर घर में ऋतंभरा और उनके गुरुदेव की ढेर सारी तस्वीरें हैं, मंदिर हैं, कई बड़े हवादार कमरे हैं और महीने की शुरूआत में हर घर को चलाने के लिए 20 से 25 हजार रुपये दिए जाने का रिवाज है, ऐसा ऋतंभरा बताती हैं. इन घरों के अलावा वात्सल्य ग्राम में एलोपैथी और नेचुरोपैथी अस्पताल, भोजनालय, गौशाला और सीबीएसई बोर्ड का इंग्लिश मीडियम हायर सेकेंडरी स्कूल है. एक थीम पार्क है जिसमें बच्चों को सिखाने के लिए रामायण के पात्रों के प्रतिरूपों के साथ विशाल जानवरों के प्रतिरूप भी हैं. यहां सभी का उपनाम परमानंद है जो साध्वी के गरू का नाम है. वात्सल्य ग्राम के मुख्य दरवाजे के पास ही एक छोटा दरवाजा है जहां कोई सिक्योरिटी गार्ड नहीं होता. यहां एक पालना रखा है और कोई सीसीटीवी कैमरा नहीं है. जब भी कोई किसी नवजात शिशु को, जिसे छह महीने इंतजार करने के बाद आश्रम अपना बना लेता है, यहां छोड़कर जाता है तो ऊपर लगा सेंसर इसकी इत्तिला अंदर दे देता है. वात्सल्य ग्राम को बिलकुल किसी ‘आदर्श टाउनशिप’ की तरह ही विकसित किया गया है. ताकि आप आएं और समझ पाएं कि इन दिनों साध्वी ऋतंभरा क्या कर रही हैं. प्रयास सराहनीय हो सकता है, लेकिन वात्सल्य ग्राम पांच सितारा सुविधाओं से लैस वृंदावन का नीमराना लगता है. बस शुरू से आखिर तक धार्मिक है और होटल नहीं है.

राजनीति में आने के सवाल का जवाब वे अब भी न में ही देती हैं. लेकिन हम जानते हैं कि जितना सच यह है कि राजनीति में कोई रिटायर नहीं होता उतना ही सच यह भी कि सार्वजनिक जीवन जीनेेवाले लोग राजनीति का मोह छोड़ नहीं पाते. धर्म ही जिसकी नीति और राजनीति हो, उसका आचरण आगे क्या होगा, कह नहीं सकते. लेकिन ऋतंभरा उमा भारती वाली राह पकड़ेंगी या साध्वी रहकर राम मंदिर आंदोलन के लिए ही जानी जाती रहेंगी, इसका जवाब हम नहीं दे सकते. उन्हें ही देना होगा. भविष्य में.

हर्षवर्धन नवाथे

हषर्वधर्न नवाथे: केबीसी में सबसे पहले करोड़पति बने थे
हषर्वधर्न नवाथे: केबीसी में सबसे पहले करोड़पति बने थे
हषर्वधर्न नवाथे: केबीसी में सबसे पहले करोड़पति बने थे

हर्षवर्धन नवाथे वह शख्स हैं जिनकी ‘जीवनी’ हमारे भौतिकवादी युवा और उनके माता-पिता इतिहास की सरकारी किताबों में अवश्य पढ़ना चाहेंगे. एक करोड़ तक पहुंचने की यात्रा की कहानी. लेकिन उस जीवनी को वहां पर खत्म होना जरूरी है जहां चौदह साल पहले एक करोड़ जीतने पर नवाथे अपने दोनों हाथ खुशी में ऊपर उठाते हैं. कैमरा लौंग शॉट लेकर वापस उन पर जमता है. चैक का आदान-प्रदान होता है. हर्ष के साथ एंकर खड़े हैं, ‘हर्षवर्धन नवाथे आपने इतिहास बना लिया है.’ वे उद्घोषणा करते हैं और सफलता के इस उत्सव के खत्म होने पर अमिताभ बच्चन 27 साल के नवाथे को एक कोने में ले जाकर कहते हैं, ‘तुम्हारी जिंदगी बदलने वाली है.’

करोड़पति बनने के बाद की हर्षवर्धन नवाथे की जिंदगी, अपने कुछ हिस्सों को छोड़कर, सफलता में सनी खुशनुमा जीवनी के तयशुदा नियमों से इतर है. वह बदलती है, लेकिन खुशनुमा जीवनी का विलोम है, कच्ची उम्र में मिली शोहरत का गर्म शरबत  है. वह हमारी-आपकी जिंदगी जैसी ही है,  जिसका संघर्ष एक महानायक द्वारा प्रस्तुत प्रतियोगिता कम नहीं कर पाती.

कौन बनेगा करोड़पति और उसकी टीम बड़ी मेहनत से छवि गढ़ती है, पिछले कुछ सालों से यह छवि सुशील कुमार हैं. लेकिन उनके उदय से पहले सालों तक हर्षवर्धन नवाथे उस करोड़पति छवि के इकलौते चेहरे थे. उनके बाद भले ही कुछ और लोगों ने एक करोड़ जीते, लेकिन वे शो के पहले करोड़पति थे, और कुछ उनके पूरे नाम का अलग होना वजह थी, कुछ बच्चन साहब का उस नाम को बोलने का अंदाज, कि आज भी हमें हर्षवर्धन नवाथे सबसे ज्यादा याद रहते हैं. वह दौर भी अलग था, जब एक करोड़ मिलना और सीबीएसई बोर्ड में 80 प्रतिशत आना भारतीय मध्यम वर्ग के अमीर बनने के सपने के करीब पहुंचने का आश्वासन था. अब तो, सीबीएसई में 99.6 प्रतिशत आने पर भी मुखमंडल आश्चर्य से सुरसा जितना बड़ा नहीं खुलता, और व्यंग्य इस बात पर ट्विटर-चौक पर होता है कि जो शून्य दशमलव चार प्रतिशत बच गए वे क्यों नहीं आ पाए. अंकों का चार्म चरमरा चुका है अब. ‘आजकल तो एक करोड़ सैलरी मिलना कॉमन है. तब एक करोड़ की बात अलग थी’ नवाथे कहते हैं.

2000 में, विजेता बनने के बाद, लेकिन घोषित होने से पहले, हर्षवर्धन को दुनिया की नजरों से बचाने के लिए एक होटल में रखा गया, नाम बदल कर. दस दिनों तक. ‘मुझे बिलकुल रॉकस्टार जैसा ट्रीटमेंट मिला, चौबीस घंटे सिक्योरिटी. लेकिन बहुत बोरिंग था वह वक्त. मैं बाहर निकलकर लोगों के साथ सेलिब्रेट करना चाहता था, मगर ढेर सारे नए कपड़ों के बीच उस होटल में बंद था.’ उन दस दिनों के लिए उनका नाम था तरुण प्रभाकर, जो केबीसी के सिद्धार्थ बसु के सहयोगी का नाम था. अगले एक साल तक हर्षवर्धन जिस दोहरी जिंदगी को जीते रहे, उसकी सांकेतिक शुरूआत उसी होटल से हुई थी.

जीते हुए एक करोड़ में से तकरीबन 34 लाख इनकम टैक्स वाले ले गए. बाकी बचे लाखों में से नवाथे ने अपनी पहली कार खरीदी, सिल्वर ग्रे मारुति एस्टीम वीएक्स, काफी सारा निवेश किया और अपनी आगे की पढ़ाई का खर्च निकाला.

आगे की पढ़ाई यानी भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी जिसको केबीसी में भी खूब प्रचारित किया गया था और जो हर्षवर्धन का सपना भी था, अधूरी रह गई. हर्षवर्धन के पिता एक ईमानदार सीबीआई अफसर थे और हर्षवर्धन की प्रेरणा भी. वे उन्हीं की तरह पुलिस या आर्मी में जाना चाहते थे और बचपन में अपना नाम पुलिस कमिश्नर हर्षवर्धन नवाथे लिखा करते थे. आईएएस बनने के अपने उसी सपने को पूरा करने के लिए हर्षवर्धन राजनीति से लेकर इतिहास तक वह सबकुछ पढ़ते थे जो उस सपने को यथार्थ बनाने में कारगर हो सके. इसी ज्ञान ने उन्हें केबीसी का पहला करोड़पति बनाया. और केबीसी ने उनके इसी सपने को उनसे हमेशा के लिए दूर कर दिया.

मुझे शुरू से पता था कि यह शोहरत हमेशा के लिए नहीं है. आश्चर्य है कि लोग मुझे आज भी पहचानते हैं. केबीसी के 23 मिनटों ने मेरा जीवन बदल दिया

केबीसी से मिली शोहरत के बाद वे अगले एक साल तक किताबों से दूर रहे. वे मुंबई की पार्टियों का नया हैपनिंग चेहरा थे. हर कोई उन्हें अपनी पार्टी में बुलाना चाहता था. वे पार्टियों में जाते रहे और जॉन अब्राहम से लेकर क्रिकेटर सलिल अंकोला जैसे सितारों के दोस्त बनते गए. ‘जान से काफी याराना था उन दिनों. हमनें एक-दो शो भी साथ में किए. फोन पर काफी बातें करते थे.’ विज्ञापनों और शोज के आफर की आ रही बाढ़ के बीच अपना काम संभालने के लिए उन्होंने फोटोग्राफर अतुल कस्बेकर की पीआर एजेंसी भी हायर कर ली थी, जिसमें अभी सलमान खान का काम देख रहीं रेश्मा शेट्टी कस्बेकर की सहयोगी थीं. उन दिनों वे रोज कस्बेकर से मिलते थे. अब ये सभी लोग नवाथे के लिए अंजान हंै. ‘इन सभी से दोस्ती एक साल के अंदर-अंदर खत्म हो गई. अब मैं किसी से टच में नहीं हूं. वैसे भी मैं अलग दुनिया से था, उन लोगों का जिंदगी जीने का तरीका अलग था.’ उस एक साल में नवाथे ने अनगिनत जगहों पर शिरकत की, रिबन काटे, राजनीतिक रैलियों में शामिल हुए, पेस्ट्री शॉप का उद्घाटन किया. ‘फीते काफी काटे हैं मैंने. एजूकेशनल इंस्टीट्यूट्स में तो मैं इतना गया हूं कि गिनती भूल गया हूं. गणपति उत्सव के दौरान भी मुझे ढेर सारे पंडालों में बुलाया जाता था, जो कुछ नए दोस्त बने थे उस दौरान, वे कहते थे चलने को और मैं चुपचाप चला जाता था. नारियल और प्रसाद मिलता था वहां. पांच-छह साल गुजर जाने के बाद मुझे पता चला कि वे नए दोस्त मुझे उन पंडालों में ले जाने के लिए पंद्रह-बीस हजार ले लेते थे आयोजकों से. उनमें से कई दोस्त, जिन्हें अब मैं नहीं जानता, (हंसते हुए) इसी तरह लखपति बन गए होंगे.’

ग्लैमर के इस उत्सव की भागदौड़ ने उन्हें जल्द ही 28 का कर दिया. उस दौर में आईएएस परीक्षा में शामिल होने की अपर एज लिमिट का. इस तरह हर्षवर्धन नवाथे उस परीक्षा में सफल नहीं हो पाए जिसकी तैयारियों ने उन्हें करोड़पति बनाया था. उनका सबसे पुराना सपना टूट चुका था. ‘साल भर मैंने कुछ नहीं किया. हर रोज पार्टियों में जाना, स्टार टीवी के कमिटमेंट पूरे करना, सब कुछ इतना तेजी से होता था कि रुक कर सोचने का मौका ही नहीं मिला. यूपीएससी के लिए जिस तरह की साधना चाहिए, उस तरह का वक्त मैं उसे दे ही नहीं पाया. आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो बुरा लगता है. काफी कुछ अच्छा कर सकता था मैं उस वक्त, नहीं कर पाया.’

उस एक साल में नवाथे ने अनगिनत जगहों पर शिरकत की, रिबन काटे, राजनीतिक रैलियों में शामिल हुए, पेस्ट्री शॉप का उद्घाटन किया

एक बीएससी ग्रेजुएट जो सिविल सर्विसिज नहीं निकाल पाया फिर एमबीए की तरफ रुख करता है. नवाथे ने केबीसी जीतने के एक साल बाद मुंबई छोड़ दी और सिंबायसिस पुणे एमबीए करने चले गए. लेकिन शोहरत वहां भी साथ रही और लोग कालेज कैंपस में अपनी दुकानों के उद्घाटन की दरख्वास्त लेकर आने लगे. ‘प्रेस के काफी लोग आते थे. फीता कटवाने के लिए आते थे, राजनैतिक पहुंच साथ लेकर लोग आते थे. इन सब से क्लास डिस्टर्ब होती थी, प्रोफेसर बहुत नाराज होते थे. मैं मैनेज नहीं कर पा रहा था. परेशान हो जाता था.’ परेशान नवाथे एमबीए बीच में ही छोड़ कर वापस मुंबई आ गए. वह दौर निराशा वाला था, लेकिन एमबीए करना भी जरूरी था. इसलिए थोड़ा संभलने के बाद नवाथे यूके पहुंचे नेपियर यूनिवर्सिटी से एमबीए करने. वह वक्त शांति से गुजरा और काफी वक्त बाद नवाथे को सामान्य रहने का मौका मिला. इसी वक्त ने उनको संभाला और कुछ साल बाद जब नवाथे ने मुंबई वापस लौटने का फैसला किया तो पहले अपना घर बदला, कुछ पुराने लोग छोड़े और सामान्य जीवन जीने की कोशिश करने लगे. 2007 में उनकी शादी सारिका नीलत्कर से हुई जो मराठी नाटकों, टीवी और फिल्मों में अभिनय करती थीं और तभी से उनकी जिंदगी में स्थायित्व आना शुरू हुआ. ‘आप अगला सवाल करें उससे पहले ही बता दूं कि यह एक अरेंज्ड मैरिज थी, हम किसी फिल्मी पार्टी में नहीं मिले थे. मेरी वाइफ को फिल्मी पार्टियों में जाने का शौक नहीं है इसलिए ग्लैमर की दुनिया से मेरा नाता अब न के बराबर है.’ नवाथे आजकल महिंद्रा एंड महिंद्रा में डेप्यूटी जनरल मैनेजर हैं और नई जिंदगी में पूरी तरह मशगूल भी. लेकिन लोग उनकी करोड़पति छवि को अब भी नहीं भूलते. ‘आज भी जब सैलरी डिस्कशन होता है तो लोग कहते हैं यार तुम्हें पैसे की क्या जरूरत, क्या करोगे इंक्रीमेंट लेकर. मेरी पत्नी से उनके प्रोड्यूसर कहते रहते हैं कि तुम्हें पैसे की क्या जरूरत, तुम्हारा पति तो करोड़पति है.’

हर्षवर्धन नवाथे की जीवनी को थोड़ा और नाटकीय बनाना है तो सायन, मुंबई स्थित उनके दो बेडरूम हाल के फ्लैट के लिविंग रूम में टंगी सबसे बड़ी तस्वीर की तफ्सील लिखना जीवनी का एक बढ़िया अंत रहेगा. सफेद कुर्ता पहने अमिताभ बच्चन के साथ मुस्कुराते 27 साल के नवाथे की तस्वीर, जो एक करोड़ जीतने के कुछ दिन बाद खींची गई थी. लेकिन वह जीवनी नकली होगी. असली वह है जिसमें नवाथे का कहा यह हिस्सा आएगा.’ मुझे शुरू से पता था कि यह शोहरत हमेशा के लिए नहीं है. क्षणिक है. इसलिए मुझे खुद आश्चर्य है कि लोग मुझे आज भी पहचानते हैं. केबीसी के वे 23 मिनट थे जिसने मेरा जीवन बदला था. लेकिन उन 23 मिनट से आप मेरी पूरी जिंदगी को नहीं देख सकते. केबीसी नहीं भी जीतता, पैसे नहीं भी मिलते तब भी कुछ न कुछ हो ही जाता.’ सबसे अच्छी बात है कि हर्षवर्धन जिंदादिल बने हुए हैं. वे खुश हैं. वैसे खुश जैसे हम लोग रहते हैं.  वैसे नहीं जैसा केबीसी अपने विजेताओं को हमें दिखाता है. छूट गई चीजों ने उनकी बातों में कड़वाहट नहीं भरी. वे पुरानी गलतियों को भी मस्ती में मुस्कुराते हुए सुनाते हैं. अभी भी बहुत कुछ करना चाहते हैं. राजनीति में जाना चाहते हैं लेकिन अपनी पुरानी शोहरत की वजह से नहीं. ‘मैं प्रेस वालों से अक्सर कहता हूं कि मैं राजनीति में एक

दिन जरूर जाऊंगा, लेकिन वे लोग मेरी यह बात छापते ही नहीं. आप छापिएगा.’ जरूर.

प्रिंस

पिंस अपने पपता के साथ. फोटोः पितेंद्र पसंह चुघ
प्रिंस अपने पिता के साथ. फोटोः जितेंद्र सिंह चुघ
प्रिंस अपने पिता के साथ. फोटोः जितेंद्र सिंह चुघ

2006 में जिस प्रिंस के बारे में पूरा देश जान गया था. आज वह बिल्कुल वैसा ही है जैसे गांव के दूसरे लड़के. हां बस एक अंतर यह है कि इन दूसरे लड़कों में से कोई कभी बोरवेल में नहीं गिरा.

21 जुलाई 2006. हरियाणा में कुरुक्षेत्र जिले के एक छोटे-से गांव हल्देहड़ी में रहने वाला पांच साल का प्रिंस खेतों में घूमते-घूमते 55 फीट गहरे बोरवेल में गिर गया. राहत के लिए स्थानीय स्तर पर हुई शुरुआती नाकाम कोशिशों के बाद सेना को बुलाया गया. पूरे दो दिन के ‘राहत-बचाव कार्य’ के बाद इस बच्चे को बोरवेल से सुरक्षित निकाल लिया गया. यही वे 50 घंटे थे जिनके दौरान प्रिंस नाम के इस बच्चे के बारे में पूरा भारत जान गया. सेना की इस पूरी कार्रवाई की मीडिया में भारी कवरेज का असर ऐसा था कि हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रिंस के गांव पहुंच गए थे और तब तक वहीं रहे थे जब तक उसे गड्ढे से निकाल नहीं लिया गया. इस दौरान उन्होंने घोषणा की थी कि प्रिंस के पिता रामचंद्र को सरकारी नौकरी दी जाएगी. तब प्रिंस के परिवार को तकरीबन आठ लाख रुपये मिले थे. इनमें से दो लाख राज्य सरकार ने दिए थे और पांच लाख मुंबई स्थित एक समाचार चैनल नेे. तकरीबन एक लाख रुपये दूसरे कई लोगों की तरफ से मिले थे.

प्रिंस को बचाए जाने के कई महीनों बाद तक आसपास के गांव से लोग केवल उसे देखने के लिए उसके घर आते रहे. उसे पूजा,जागरण और दूसरे धार्मिक आयोजनों में खास मेहमान के तौर पर बुलाया जाने लगा. हर तरफ प्रिंस की चर्चा थी. लेकिन धीरे-धीरे यह सब थम गया. लोगों का आना-जाना कम हुआ. प्रिंस की पूछ भी कम हो गई. तब और अब के बीच आठ साल का समय निकल चुका है. वह पांच साल का बच्चा अब 12 साल का किशोर हो चुका है. जुलाई वाली घटना और उसके तुरंत बाद की जिंदगी के बारे में प्रिंस कहता है, ‘मुझे ज्यादा कुछ याद नहीं है. हल्का-हल्का याद है.’

हल्देहड़ी के ही रहने वाले जसमिंदर सिंह प्रिंस के बारे में कहते हैं, ‘बचपन में तो बड़ा जिंदादिल था तभी तो गड्ढे में फंसा रहने बाद भी वह डरा नहीं, कोई मानसिक झटका नहीं लगा. हालांकि अब वह थोड़ा शर्मीला हो गया है. ज्यादा बातें नहीं करता. दूसरे लड़कों के साथ ज्यादा खेलता-कूदता भी नहीं है. खेलकूद के समय दूसरे लड़कों को खेलते हुए देखना उसे पसंद है.’

जब प्रिंस को बचाया गया था तब डीएवी स्कूल ने घोषणा की थी कि उसकी आगे की पढ़ाई की जिम्मेदारी संस्थान की रहेगी. शाहाबाद के डीएवी स्कूल में उसका नाम भी लिखाया गया, लेकिन कुछ ही महीनों के बाद उसने यह स्कूल छोड़ दिया. क्यों, पूछने पर उसके पिता रामचंद्र बताते हैं कि वह उस स्कूल के दूसरे बच्चों के साथ और वहां के परिवेश के साथ तालमेल नहीं बिठा पाया. स्कूल के टीचर उसपर दूसरे बच्चों से ज्यादा ध्यान देते थे इसलिए कुछ समय बाद ही उसने जिद पकड़ ली कि वह स्कूल नहीं जाना चाहता. फिलहाल प्रिंस गांव के दूसरे लड़कों की तरह ही पास के समलखा गांव के सीनियर सेकेंडरी स्कूल में पढ़ रहा है. पढ़ने-लिखने में औसत है.

रामचंद्र अपने बेटे के चर्चा में आने से पहले बटाई पर खेती करते थे. आज भी वे वही कर रहे हैं. हालांकि उन्हें उम्मीद थी कि राज्य सरकार ने नौकरी देने की जो बात कही थी उसे अमल में भी लाया जाएगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. वे बताते हैं, ‘सरकार के इस वादे पर बहुत उम्मीद टिकी थी. नौकरी के लिए मैंने कोशिश भी की. कई महीनों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाए. वहां के बाबुओं को याद भी कराया कि मुख्यमंत्री ने खुद नौकरी देने की बात कही थी. लेकिन इस सब से कोई फायदा नहीं हुआ.’ सरकारी महकमे से परेशान रामचंद्र वापस अपने गांव के खेतों पर लौट आए.

प्रिंस के परिवारवालों को अब बस सेना से उम्मीद है जिसने वादा किया था कि 18 साल का होने पर उसे सेना में ले लिया जाएगा

इसी बीच प्रिंस की मां कर्मजीत और पिता रामचंद्र अलग हो गए. रामचंद्र ने दूसरी शादी भी कर ली. अपनी पहली पत्नी से अलग होने की वजह के बारे में रामचंद्र बात नहीं करना चाहते. वे केवल इतना कहते हैं, ‘प्रिंस की मां ममता (उनकी दूसरी पत्नी) ही है. कर्मजीत को गए हुए तीन साल से ज्यादा हो चुका है और उसने आजतक कभी फोन करके भी बच्चे का हालचाल नहीं जानना चाहा.’ रामचंद्र अपने लड़के के भविष्य को लेकर थोड़े परेशान भी रहते हैं. वे कहते हैं, ‘परिवार की माली हालत भी बहुत अच्छी नहीं है. हम तो चाहते हैं कि प्रिंस किसी तरह पढ़ाई चालू रखे और जब 18 साल का हो जाए तो सेना में भर्ती हो जाए.’

पिता की बातचीत से यह अंदाजा हो जाता है कि पूरा परिवार अब सेना से मिले उस भरोसे के सहारे ही है जिसमें कहा गया था कि जब प्रिंस 18 साल का हो जाएगा और सेना के मापदंडों पर खरा उतरेगा तो उसे भारतीय सेना में नौकरी दे दी जाएगी.

इसी बातचीत में प्रिंस के पिता उस आठ लाख रुपये के बारे में भी बताते हैं. वे कहते हैं,  ‘पैसे तो बहुत पहले ही खर्च हो गए. उस पैसे से ही हमने चार कमरों का पक्का मकान बनाया और एक मोटरसाइकिल खरीद ली.’  घर के दो कमरों में प्रिंस का परिवार रहता है और बाकी के दो कमरे स्टोर रूम की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं. जिस मोटरसाइकिल के बारे में प्रिंस के पिता बता रहे थे उसकी नंबर प्लेट पर लाल रंग से ‘प्रिंस’ लिखा हुआ है.

शबनम मौसी

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‘देश की पहली किन्नर विधायक’. यही शबनम मौसी का एक वाक्य में जीवन-परिचय है. किन्नरों को वोट डालने का अधिकार मिलने के केवल पांच वर्ष बाद ही 1999 में एक निर्दलीय के रूप में भारी मतों से चुनाव जीत कर शबनम मौसी रातों रात राष्ट्रीय फलक पर स्थापित हो गई थीं. मध्य प्रदेश के शहडोल जिले की सोहागपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनकर आई इस विधायक का विधानसभा में एक अलग ही अंदाज होता था. भाषण जोरदार देती थीं और बातें दिलचस्प करती थीं. उस वक्त के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के हाथों में राखी बांध चुकी थीं और यही सब उनसे अखबारों को चाहिए भी था. कहते हैं अपने विधानसभा क्षेत्र में उन्होंने काम भी काफी करवाया. अफसरों, नेताओं से लड़-झगड़कर, दबंगई कर वे अपने इलाके के लिए सुविधाएं ले आती थीं. दिग्विजय सिंह उनकी तारीफ करते थे और चाहते थे कि वे विरोध में न रहकर उनकी तरफ रहें, लेकिन शबनम बेखौफ रहकर लोगों की चहेती बन रहीं थीं, शानदार राजनीतिक भविष्य की तरफ बढ़ रही थीं.

‘उन दिनों मध्यप्रदेश की राजनीति बुरे दौर से गुजर रही थी. मंत्रियों ने जनता के लिए काम करना बंद कर दिया था. शायद इसलिए लोगों ने सोचा कि नर को देख लिया, नारी को देख लिया, अब किन्नर को देखते हैं.’  शबनम मौसी बताती हैं और हंसती हैं. उन दिनों के राजनीतिक चिंतकों को लगने लगा था कि किन्नरों को समाज और राजनीति में सम्मानजनक स्थान दिलाने में मध्य प्रदेश अग्रणी होने वाला है. इसकी वजह भी थी. शबनम मौसी के जीतने के कुछ वक्त बाद ही चार और किन्नर मध्य प्रदेश की अलग-अलग नगर पालिकाओं  में चुने गए. कमला जान कटनी की महापौर बनीं, मीनाबाई सीहोरा नगरपालिका की अध्यक्ष, हीरा बाई जबलपुर और गुलशन बीना की कॉर्पोरेटर. लोग इन्हें पांच पांडव बुलाने लगे. राजनीति में ऐसे जोरदार प्रवेश के बाद प्रदेश के किन्नरों का आत्मविश्वास बढ़ने लगा और वे नई-नई चीजों में हाथ आजमाने लगे. 2001 में भोपाल में हुई किन्नरों की मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता उसी आत्मविश्वास का उदाहरण थी. उसी दौरान शबनम मौसी राष्ट्रीय स्तर पर समाज सेवा भी करने लगीं और जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपने एड्स विरोधी अभियान के विज्ञापन के लिए उन्हें अकेले भारतीय चेहरे के रूप में चुना तो अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी वे पहचानी जाने लगीं.

लेकिन यह शबनम मौसी के विधायक बनने के शुरुआती दिनों की मनोहर कहानी है. कुछ वक्त गुजरने के बाद ही मध्य प्रदेश विधानसभा में उनका मजाक बनाया जाने लगा, जिसमें कांग्रेसी नेता सबसे आगे थे. वे शबनम पर फब्तियां कसते, उनके उठाए सवालों पर हंसते थे और उनके किन्नर होने को बार-बार मुद्दा बनाते थे. शबनम मौसी पर खुद असभ्य व्यवहार के आरोप भी लगने लगे. कहते हैं उन पर कांग्रेस विधायक बिसाहूलाल सिंह की कृपा थी, लेकिन एक बार विधानसभा की लॉबी में दोनों में इस कदर झगड़ा हुआ कि आवाजें सदन तक पहुंचीं. और झगड़ा भी. विवाद इतना बढ़ा कि शबनम मौसी कांग्रेस विधायक के पीछे जूता लेकर दौड़ गईं. इससे एक दिन पहले ही वे प्रदेश सचिवालय पहुंच कर जोरदार हंगामा खड़ा कर चुकी थीं. इस तरह की कुछ और अप्रिय घटनाओं ने उन्हें प्रदेश की विधानसभा में बहिष्कृत-सा कर दिया. उन पर अपहरण गिरोह चलाने का भी आरोप लगा. इन आरोपों और घटनाओं ने शबनम मौसी की लोकप्रियता का क्षेत्रफल और उसका घनत्व काफी कम कर दिया. यह समझ कर वे बीजेपी और कांग्रेस दोनों के करीब जाने की कोशिश करने लगीं लेकिन किसी ने उन्हें हाथ नहीं लगाया. ‘मैं सोनिया गांधी से भी मिली. उन्होंने सहानभूति भी दिखाई लेकिन उस समय के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राधा किशन मालवीय और उन जैसे दूसरे कांग्रेसी नेताओं की वजह से मुझे पार्टी में शामिल नहीं किया गया’. आखिरकार, 2003 के विधानसभा चुनावों में वे बुरी तरह हारीं. इन चुनावों में प्रदेश के किन्नरों द्वारा मिलकर बनाई गई पार्टी ‘जीती जिताई पार्टी’ ने मध्य प्रदेश में सौ से ज्यादा किन्नरों को चुनाव में उतारा, और शबनम मौसी सहित सभी हारे. राजनीतिक चिंतक सही सिद्ध नहीं हो सके.

यहीं से शबनम मौसी के राजनीतिक जीवन के पटाक्षेप की शुरुआत हुई. उनके साथ उस तरह के लोग भी नहीं थे जो दम लगा के कह सकें, ‘अभी न परदा गिराओ कि ठहरो, दास्तान अभी और भी है’. 2005 में हालांकि उन पर बनी आशुतोष राणा अभिनीत फिल्म ‘शबनम मौसी’ आई, लेकिन कुछ वक्त की त्वरित प्रसिद्धि के अलावा वह मौसी को कुछ नहीं दे पाई. राजनीति में हाशिए पर पहुंच चुकी शबनम मौसी ने फिर हर मौजूदा राजनीतिक पार्टी के दरवाजे की सांकल बजाना शुरू किया. 2008 में दरवाजा खोला लालू प्रसाद यादव की आरजेडी ने जिसकी तरफ से शबनम 2008 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में खड़ी हुई और एक बार फिर बुरी तरह हारीं. ‘लालू चीटर है, हमको चीट किया. चुनाव में कैंपेन करने तक नहीं आया’, हारने के बाद ऐसा कहकर शबनम मौसी ने लालू की पार्टी छोड़ दी. चार साल बाद 2012 में उन्होंने मध्य प्रदेश भी छोड़ा और उत्तर प्रदेश के कानपुर कैंट क्षेत्र से ‘राष्ट्रीय विकलांग पार्टी’ की तरफ से चुनाव लड़ा. इससे पहले कि इसे आप उनकी राजनीतिक जीवटता समझें, आगे पढ़िए. 1999 की वह स्टार विधायक जो सोहागपुर सीट 18 हजार मतों से जीती थी, उतने मत जितने उस वक्त के कांग्रेस और बीजेपी उम्मीदवारों के मिलाकर भी नहीं थे, उसको 2012 में सिर्फ 118 वोट मिले. पूछने पर कहती हैं, ‘अब मुझे यह तो पता नहीं है कि मुझे कानपुर में कितने वोट मिले, लेकिन मौका मिला तो मैं अगला चुनाव भी जरूर लडूंगी’. अगला विधानसभा चुनाव वे कहां से लड़ेंगी और किस पार्टी की तरफ से, उन्हें अभी इसकी अनुभूति नहीं हुई है.

‘मैं सोनिया गांधी से भी मिली. उन्होंने सहानभूति भी दिखाई लेकिन प्रदेश कांग्रेस नेताओं की वजह से मुझे पार्टी में शामिल नहीं किया गया’

1955 की मुंबई में एक पुलिस अफसर के यहां जन्मी शबनम मौसी का जन्म का नाम चंद्र प्रकाश था लेकिन परिवार ने नकारा, तो पालन-पोषण आदिवासी परिवार में हुआ. आठवीं तक पढ़ी शबनम मौसी जीविका की तलाश में बंबईया फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा भी बनीं. उन्होंने अमिताभ बच्चन के साथ भी फिल्म की और राजेश खन्ना के साथ भी. अमर अकबर एंथोनी, जनता का हवलदार, कुंवारा बाप. बाद में वे मध्य प्रदेश आ गईं और समाज सेवा करने लगीं. यहीं से राजनीति में आईं. कहते हैं उन्हें 14 भाषाओं का ज्ञान है. अंग्रेजी का तो जरूर है, यह पता चलता है क्योंकि बातचीत में वे ‘आई एम बिजी राइट नाऊ’ बार-बार कहने में काफी रुचि लेती हैं. वैसे आजकल उनकी व्यस्तता मध्य प्रदेश स्थित अनूपपुर के मंदिरों में शाम को प्रभु की आरती करना, भजन गाना, समाज सेवा करना (उनके अनुसार), और जब कभी किन्नरों को लेकर कोई राष्ट्रीय खबर बने, तो अपने फोन बजने का इंतजार करना है. हमारे टीवी न्यूज चैनल उन्हें इसी सिलसिले में फोन करते हैं, कभी थर्ड जेंडर की मान्यता पर तो कभी मध्य प्रदेश सरकार के किन्नरों को नौकरी देने के लिए डेटाबेस बनाने और एक बोर्ड का गठन करने पर बाइट लेने के लिए, फोनो लेने के लिए.

कुछ समाज जिम्मेदार है और कुछ वे खुद कि आज हिंदुस्तान की पहली किन्नर विधायक शबनम मौसी हाशिए पर बैठी हैं, समाज में अपनी जगह तलाश रहीं हैं, पुराने दिनों की यादों में अपना आज गुजार रही हैं.

असीम त्रिवेदी

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फोटोः विकास कुमार

‘मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना.’ साल 2011 में यह नारा लगभग सारे देश में गूंज उठा था. अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ देश के लाखों लोग ‘अन्ना’ हो गए थे. जनलोकपाल कानून की मांग का यह आंदोलन 2012 तक देश के कोने-कोने में फैल गया था. रैलियों, भूख हड़तालों और प्रदर्शनों के साथ ही पोस्टर, बैनर, लेख, कविताएं, कार्टून और कई अन्य माध्यमों से भी लोग भ्रष्टाचार का विरोध करने लगे थे. इसी बीच मुंबई में इस आंदोलन से जुड़े एक युवक को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. आरोप उन कार्टूनों का नतीजा था तो इस युवक ने बनाए थे. इस गिरफ्तारी की खबर फैलते ही देश भर में इसका विरोध होने लगा. नौ सितंबर, 2012 को मुंबई पुलिस को इस युवक को बांद्रा कोर्ट में पेश करना था. स्थानीय आंदोलनकारियों के साथ ही इस घटना के सीधे प्रसारण के लिए कई समाचार चैनल कोर्ट के बाहर मौजूद थे. इसी बीच मुंबई पुलिस इस युवक को लेकर वहां पहुंची. काला कुर्ता पहने लंबे बाल और बढ़ी हुई दाढ़ी वाला यह 24 साल का युवा पुलिस के घेरे के बीच ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगाता हुआ कोर्ट में पेश हुआ. इसी क्रांतिकारी अंदाज में देश की जनता ने पहली बार असीम त्रिवेदी नाम के इस युवा को देखा. असीम देशभर की सुर्खियों में आने के साथ ही आंदोलन के मुख्य चेहरों में से एक बन गया.

कार्टून बनाने के लिए हुई असीम की गिरफ्तारी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला माना गया. सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश और प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने असीम पर लगे देशद्रोह के आरोपों की खुलकर निंदा की. इस बीच असीम ने भी जमानत लेने से इंकार कर दिया. इसके बाद दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र तक असीम के समर्थन में लोग प्रदर्शन करने लगे. महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से असीम को दो दिन बाद जेल से रिहा किया गया. उन पर लगे देशद्रोह के आरोप भी सरकार को वापस लेने पड़े. अब तक असीम एक चर्चित चेहरा बन चुके थे. लेकिन उन्हें समाचार चैनलों के दर्शकों से इतर भी पहचान मिलना अभी बाकी था. यह पहचान उनको मिली मशहूर टीवी शो ‘बिग बॉस’ से. रिहाई के कुछ समय बाद ही असीम ‘बिग बॉस-6’ में शामिल हुए और इस शो के माध्यम से घर-घर तक पहुंच गए.

2012 में बिग बॉस से निकलने के बाद से असीम सुर्खियों से गायब हैं. उनको पहचान तब मिली थी जब वे मुंबई से देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार हुए थे. लेकिन असलियत में असीम अपने काम से अपनी पहचान पहले ही बना चुके थे. 2004 में स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद असीम आईआईटी की तैयारी कर रहे थे. वे बताते हैं, ‘मैं तैयारी कर तो रहा था लेकिन मन इंजीनियर बनने का नहीं था. मैं पत्रिका निकालना चाहता था. इसके लिए मैंने कई तरह की पत्रिकाओं को देखना-पढ़ना शुरू किया. तभी मुझे बीवी सत्यमूर्ति की एक किताब मिली. यह कार्टूनों पर थी. यहीं से मेरा शौक जागा और मैंने कार्टून बनाना शुरू किया. मैं पत्रिका तो नहीं निकाल सका लेकिन मैंने बतौर कार्टूनिस्ट काम शुरू कर दिया.’

कुछ समय तक अखबारों और स्वतंत्र रूप से काम करने के बाद असीम ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर एक ऑनलाइन पोर्टल शुरू कर दिया. ‘दखलंदाजी’ नाम से शुरू हुए इस पोर्टल में जल्द ही देश के कई हिस्सों के लोग जुड़ गए और इसमें नियमितरूप से लिखने लगे. यहां से असीम की एक टीम तैयार हो गई. 2011 में जब अन्ना आंदोलन शुरू हुआ तो असीम अपनी इसी टीम के साथ दिल्ली पहुंच गए. ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ के बैनर तले चल रहे अन्ना आंदोलन को मजबूती देने के लिए असीम ने अपने साथियों के साथ मिलकर ‘कार्टून अगेंस्ट करप्शन’ शुरू किया. यह एक ऐसा मंच था जिसमें देश भर के लोग कार्टूनों के माध्यम से भ्रष्टाचार का विरोध करते थे. ‘कार्टून अगेंस्ट करप्शन’ की एक वेबसाइट भी असीम ने बनाई और भ्रष्टाचार विरोधी कई कार्टून इस वेबसाइट में दर्शाए. इनमें से कुछ कार्टून ऐसे थे जिन्हें कुछ लोगों ने इसलिए आपत्तिजनक माना कि उनमें राष्ट्रीय प्रतीकों का इस्तेमाल हुआ था. मुंबई में एक अधिवक्ता ने इस संबंध में शिकायत दर्ज की जिसके बाद ‘कार्टून अगेंस्ट करप्शन’ को मुंबई क्राइम ब्रांच ने प्रतिबंधित कर दिया. इसी शिकायत पर आगे चलकर असीम की गिरफ्तारी भी हुई थी.

असीम को गिरफ्तारी से पहले ही ‘करेज इन एडिटोरियल कार्टूनिंग अवॉर्ड’ के लिए भी चुन लिया गया था. यह अवॉर्ड उनको सीरिया के उस मशहूर कार्टूनिस्ट अली फर्जत के साथ दिया गया जिन्हें टाइम पत्रिका ने दुनिया के सौ सबसे प्रभावशाली लोगों की सूची में भी शामिल किया था. 2012 की शुरुआत में जब ‘कार्टून अगेंस्ट करप्शन’ पर प्रतिबंध लगा तो असीम ने इसके खिलाफ ‘सेव योर वॉइस’ नाम से एक अभियान शुरू किया. इस अभियान में असीम के बचपन के दोस्त आलोक दीक्षित भी उनके साथ थे. आलोक आज एसिड अटैक से प्रभावित लोगों के लिए चलाए जा रहे अभियान ‘स्टॉप एसिड अटैक’ की शुरुआत करने के लिए भी जाने जाते हैं.  असीम बताते हैं, ‘मेरी गिरफ्तारी के बाद बहुत-सी चीजें बदल गईं. मुझे भले ही बड़े स्तर पर पहचान मिली लेकिन हमारा अभियान कमजोर हो गया. अब शायद उस तरह से अभियान चलाना संभव नहीं है जैसे हमने शुरुआती दौर में चलाया था.’ अपनी आगे की योजनाओं के बारे में वे कहते हैं, ‘हम लोग एक साप्ताहिक पत्रिका निकालने पर विचार कर रहे हैं. यह पूरी तरह से कार्टूनों को ही समर्पित होगी. हम एक ऐसा मंच तैयार करना चाहते हैं जो कार्टूनिस्ट को खुलकर मौका दे.’

कार्टून पत्रिका की तैयारियों के अलावा असीम दिल्ली के कटवारिया सराय में एक कैफे भी चला रहे हैं. ‘द न्यूज कैफे’ नाम के इस कैफे की टैगलाइन है ‘चाय,कॉफी और खबरें.’ इस कैफे को किसी समाचार चैनल के न्यूजरूम की शक्ल देने की कोशिश की गई है. कैफे की दीवारों पर हिंदी, अंग्रेजी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारों के साथ ही देश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाएं लगाई गई हैं. इनके अलावा चैनलों की ‘ओबी वैन’ और आईडी वाले माइकों के कई कृत्रिम मॉडल यहां बनाए गए हैं. कैफे में आने वाले लोगों के लिए यहां कई उपन्यास भी रखे गए हैं. इस कैफे के अलावा असीम कटवारिया सराय में ही ‘नवरस’ नाम का एक रेस्टोरेंट भी चला रहे हैं. इन दिनों अपना अधिकतर समय कैफे में लगाने वाले असीम आगे के बारे में बताते हैं ‘मैं जिंदगी को एक यात्रा की तरह देखता हूं जिसमें कई पड़ाव आते हैं. कार्टून अगेंस्ट करप्शन, बिग बॉस, सेव योर वॉइस ये सभी एक पड़ाव थे. ऐसे ही और भी कई पड़ाव आगे आएंगे जिनका मुझे इन्तजार भी है. एक्टिविज्म भी जारी रहेगा लेकिन अब तरीके शायद पहले से अलग होंगे.’

बुधिया सिंह

अपनी कोच ुपधविता पांडा के साथ बुधिया धसंह

 

अपनी कोच रुपन्विता पांडा के साथ बुधिया सिंह.
अपनी कोच रुपन्विता पांडा के साथ बुधिया सिंह.

यदि किसी की उम्र महज आठ साल हो और उसके इतने सालों को ही एक फिल्म बनाने लायक समझा जाए तो कहा जा सकता है कि उस बच्चे ने दूध के दांत टूटने के पहले ही बड़े-बड़े उतार-चढ़ाव देख लिए हैं. फिल्म भी कोई ऐसी-वैसी नहीं बल्कि जिसे अपनी श्रेणी में दुनिया की दस सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंटरी फिल्मों में शुमार किया गया हो. ब्रिटेन की निर्देशक गेम्मा अटवाल की ‘मैराथन बॉय’ को 2011 में धावकों पर बनी दुनिया की दस सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में शामिल किया गया था. इस फिल्म के साथ एक रिकॉर्ड यह भी था कि इसे दुनिया के सबसे नन्हे धावक बुधिया सिंह की जिंदगी पर बनाया गया.

‘मैराथन बॉय’ जब 2010 में रिलीज होकर सुर्खियां बटोर रही थी तो उस समय तक भुवनेश्वर की सलिया साही झुग्गी झोपड़ी से निकलकर पूरे भारत में नाम कमानेवाला बुधिया गुमनामी में खो चुका था. अटवाल अपनी फिल्म के बारे में कहती हैं, ‘ बुधिया के जीवन की उतार चढ़ाव भरी कहानी उम्मीदों व अवसरों की टेक पर आगे बढ़ती है और लालच, भ्रष्टाचार और बिखरते सपनों पर खत्म होती है.’

अटवाल की बात कुछ हद तक बिल्कुल सही है. चार साल के बुधिया के बारे में 2005 में जब पहली बार यह पता चला कि वह लगातार कई किलोमीटर तक दौड़ सकता है तो मीडिया के लिए यह खबर आठवें आश्चर्य के स्तर की थी. उसे वैसे चलाया भी गया. खबर यह भी आई कि वह एक बार लगातार सात घंटे तक दौड़ता रहा और उसने एक दिन तकरीबन 48 किलोमीटर की दूरी तय कर ली. मतलब चार साल का एक लड़का मैराथन (42 किमी) से ज्यादा दूरी दौड़ रहा था! सिलसिला यहां आकर रुका नहीं. यह भी कहा जा रहा था कि वह इतनी कम उम्र में 40 से ज्यादा बार मैराथन दौड़ के बराबर दूरी तय कर चुका है. ऐसा राज्य जो राष्ट्रीय स्तर पर कम ही चर्चा में रहता हो, के लिए यह बच्चा उड़िया अस्मिता का प्रतीक बन गया. बुधिया सिंह सार्वजनिक कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बनकर जाने लगा. वह कुछ गाने के वीडियों में भी आया और ये उडि़याभाषी वीडियो रिकॉर्ड तोड़ बिके. इस पूरे घटनाचक्र की एक और खासबात थी. यहां बुधिया अकेले नहीं था. उसके साथ नायक का दर्जा बिरंची दास को भी मिला जो इस नन्हे धावक के स्वघोषित कोच थे.

स्थानीय जूडो कोच बिरंची को बुधिया मिलने की कहानी भी कम रोचक नहीं है. कहा जाता है कि बुधिया के पिता का देहांत होने के बाद उसकी मां सुकांति सिंह के लिए अपने इस सबसे छोटे बेटे और तीन बेटियों का पालन पोषण बहुत मुश्किल हो गया. ऐसे में उन्होंने कुछ रुपयों के बदले एक व्यक्ति को बुधिया सौंप दिया. बाद में बिरंची ने इस व्यक्ति से बुधिया को अपने संरक्षण में ले लिया. हालांकि बहुत सारे स्थानीय पत्रकार इस कहानी को झूठा बताते हैं. उनके मुताबिक सुकांति सिंह ने ही बिरंची को बुधिया दिया था. 2005 के बाद से इस गुरु-शिष्य की जोड़ी लगातार चर्चा में आती रही.

इन्हीं दिनों भारत की उड़नपरी पीटी ऊषा भी भुवनेश्वर पहुंची. उनसे जब यहां किसी ने बुधिया के बारे में सवाल पूछा तो उनका कहना था कि वे इस बच्चे की सेहत को लेकर चिंतित हैं क्योंकि उसे बार-बार लंबी दूरी तक दौड़ाया जा रहा है और इससे उसकी सेहत पर गंभीर स्थायी प्रभाव पड़ेगा. इस बयान ने उन बाल अधिकार संगठनों को प्राणवायु दे दी जो शुरू से बुधिया की मैराथन दौड़ का विरोध कर रहे थे. इन संगठनों का मानना था कि पैसे और ख्याति के लिए इस बच्चे का शोषण किया जा रहा है. लेकिन उस समय बुधिया के पक्ष में जिस तरह का माहौल था, उड़ीसा सरकार भी इस मसले पर कुछ कहने से कतरा रही थी. इसी समय बिरंची दास ने घोषणा कर दी कि बुधिया पुरी से लेकर भुवनेश्वर तक 65 किमी की दूरी तय करेगा. मई में आयोजन की तारीख भी तय हो गई. लेकिन इस बार यह इतना आसान नहीं था. बाल अधिकार संगठनों की मांग का समर्थन करते हुए उड़ीसा सरकार की खेल मंत्री प्रमिला मलिक ने कहा कि सरकार इस आयोजन के पक्ष में नहीं है. मलिक का कहना था, ‘ यदि बुधिया को कुछ हो जाता है तो उसकी जवाबदेही आखिरकार सरकार की होगी.’

राज्य सरकार के महिला और बाल विकास विभाग ने आयोजन के पहले पांच डॉक्टरों की टीम गठित कर दी थी. इसकी जिम्मेदारी थी कि वह जांच कर बताए कि बुधिया के शरीर पर इतनी लंबी दौड़ का क्या असर पड़ा.  मई, 2006 में दौड़ के आयोजन वाले दिन भुवनेश्वर से लेकर पुरी तक मीडियाकर्मियों का बड़ा हुजूम था. उस दिन नियत समय पर चिलचिलाती धूप में बुधिया ने पुरी से दौड़ना शुरू किया और मीडिया के ही मुताबिक वह बिना रुके लगातार सात घंटे तक दौड़ता रहा. हालांकि इस कारनामे पर भी कई लोग सवाल उठाते हैं. जगतसिंहपुर जिले के निवासी और वर्तमान में इग्नू के दिल्ली केंद्र में पढ़ाई कर रहे ज्ञानी डोम बताते हैं, ‘ मैं और मेरे कई परिचित उस समय वहीं थे. मीडिया ने इस बात को कभी नहीं दिखाया कि बुधिया उस पूरी दौड़ में कई बार बीच में रुका और एकाध बार तो बेहोशी की हालत में आ गया था. हालांकि उस कड़ी धूप में साढ़े चार साल की उम्र का बच्चा इतना भी कर ले तो उसकी चर्चा होनी चाहिए. पर वह रिकॉर्ड वाली बात सही नहीं है.’

बुधिया बीती फरवरी में 12 साल का हो गया है और नियमों के मुताबिक वह इस साल से आधिकारिक प्रतियोगिताओं हिस्सा ले पाएगा

बुधिया के भुवनेश्वर पहुंचने पर डॉक्टरों की टीम ने उसका चिकित्सकीय परीक्षण किया था. इस समिति के नतीजे ही वे आधार बने जिनके बाद राज्य सरकार ने बुधिया के लंबी दूरी वाली दौड़ पर प्रतिबंध लगा दिया. डॉक्टरों का कहना था कि इस दौड़ से बुधिया का शरीर अति थकावट वाली स्थिति में आ गया है और उसके हृदय पर अत्यधिक दबाव पड़ा है. उन्होंने चेतावनी भी दी कि यदि वह इतनी लंबी दूरी की दौड़ जारी रखता है तो उसकी जिंदगी खतरे में पड़ सकती है. बिरंची दास के लिए सरकार के इस फैसले का कोई मायने नहीं था. अभी-भी वे बुधिया को प्रशिक्षण दे रहे थे और उन्हें उम्मीद थी कि उनके शिष्य का जादू अभी और चलेगा. साल 2007 बिरंची और बुधिया दोनों के लिए अति नाटकीय ढंग से निर्णायक साबित हुआ. बिरंची दास ने इस साल फिर एक घोषणा की. उन्होंने कहा कि अब बुधिया लगातार पैदल चलकर 300 किमी की दूरी तय करेगा. भुवनेश्वर की जिस सड़क पर यह आयोजन होना था उस दिन वहां पुलिस के दर्जनों जवान बैरीकेड लगाकर तैनात थे. बुधिया जैसे ही कुछ कदम चला उन्होंने इस नन्हे खिलाड़ी,  उसके कोच और कुछ लोगों की भीड़ को रोक लिया. समाचार चैनलों के लिए यह दृश्य उस दिन का सबसे बड़ा दृश्य बन गया जिसमें पुलिस बुधिया को उस भीड़ से लगभग छीनते हुए अपने साथ ले जा रही थी. बुधिया के जीवन का यह आखिरी सार्वजनिक आयोजन था और संयोग से उसके कोच बिरंची दास का भी.

2007 में ही एकबार फिर मीडिया में ये गुरु शिष्य दिखाई दिए लेकिन एक साथ नहीं. बुधिया की मां ने बिरंची पर आरोप लगाए कि वे उनके बेटे को प्रताड़ना देते थे. अपनी मां की बात सही साबित करते हुए बुधिया ने भी अपने शरीर पर मारपीट और जलाने के कई निशान दिखाए. बिरंची दास उस एक ही दिन में सबसे बड़े खलनायक बन गए और आखिरकार पुलिस ने उनपर केस दर्जकर उन्हें हिरासत में ले लिया. बिरंची दास की इस घटना के ठीक एक साल बाद ही हत्या हो गई हो गई थी. हालांकि इसका बुधिया सिंह से कोई लेना देना नहीं था. इधर बुधिया को राज्य सरकार ने भुवनेश्वर स्थित कलिंग स्टेडियम स्पोर्टस हॉस्टल में भर्ती कर दिया. वह आज भी  यहीं है और डीएवी स्कूल में सातवीं का छात्र है. आज आठ साल पहले के एक नन्हे धावक और सरकारी हॉस्टल के किशोरवय में पहुंच रहे लड़के के जीवन में कई बदलाव आ चुके हैं. सबसे बड़ा तो यही कि अब वह लंबी दूरी की दौड़ में हिस्सा नहीं लेता. बुधिया की कोच रूपन्विता पांडा बताती हैं, ‘ भारतीय एथलेटिक्स संघ के नियमों के मुताबिक कम से कम 14 साल का बच्चा ही लंबी दौड़, जो 600 मीटर की होती है, में भाग ले सकता है. जबकि बुधिया तो 12 साल का ही है.’  बुधिया की मां सुकांति सिंह जो कुछ साल पहले तक दो वक्त के खाने के लिए मोहताज थीं आज कलिंग इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नालॉजी में सफाई कर्मचारी हैं. सुकांति को अपने बेटे के हॉस्टल से बस एक दिक्कत है कि वहां उनके बेटे को ठीक खाना नहीं मिलता. रूपन्विता इसपर कहती हैं, ‘ हम यहां वैज्ञानिक तरीके से बच्चों को प्रशिक्षण देते हैं. बच्चों की डाइट भी उसी का हिस्सा है लेकिन आम लोग इसको नहीं समझते.’

आज बुधिया हॉस्टल में कबड्डी से लेकर बास्केटबॉल तक सभी खेल खेलता है. हालांकि जिस खेल उसे भविष्य का सबसे बड़ा सितारा समझा जा रहा था उसमें वह पीछे है

आज बुधिया हॉस्टल में कबड्डी से लेकर बास्केटबॉल तक सभी खेल खेलता है. हालांकि जिस खेल में उसे भविष्य का सबसे बड़ा सितारा समझा जा रहा था उसमें वह पीछे है. हॉस्टल के एक कर्मचारी नाम न बताने की शर्त पर जानकारी देते हैं, ‘ बुधिया अपने ही साथ के लड़कों से दौड़ में हार जाता है. स्पीड नहीं है उसमें.’  हालांकि रूपन्विता इससे चिंतित नहीं हैं. वे कहती हैं, ‘ बुधिया की सबसे खास बात है कि वह बिना थके बहुत देर तक दौड़ सकता है. हम उस पर बहुत अधिक दबाव डाले बिना उसकी शारीरिक क्षमता बढ़ा रहे हैं. लंबी दूरी की दौड़ में वह अच्छा प्रदर्शन कर सकता है.’

बुधिया इस साल फरवरी में 12 साल का हो गया है. अब वह आधिकारिक रूप से अंतरस्कूल स्पर्धाओं में भाग ले सकता है. इस साल के अंत तक उसका नाम ऐसी प्रतियोगिताओं के लिए भेजा जाएगा. गेम्मा अटवाल की ‘बिखरते सपनों’ वाली बात के विपरीत रूपन्विता को अपने इस छात्र से बहुत उम्मीदें हैं और हमें भी.