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शंकर गुहा नियोगी: मजदूर आंदोलन

शंकर गुहा नियोगी की हत्या के मामले पर सुप्रीम कोटट का फैसला 2005 में आया था
शंकर गुहा नियोगी की हत्या के मामले पर सुप्रीम कोटट का फैसला 2005 में आया था.
शंकर गुहा नियोगी की हत्या के मामले पर सुप्रीम कोटट का फैसला 2005 में आया था.

भारत में यूं तो कई मजदूर नेता हुए हैं लेकिन इनमें से एक ही दौर के दो लोग सबसे ज्यादा चर्चित रहे. इनमें पहला नाम है दत्ता सामंत का. उन्होंने बंबई के कपड़ा मिल मजदूरों की मांगों को लेकर 1982 में हड़ताल की थी. इसे एशिया में अब तक की सबसे बड़ी हड़ताल कहा जाता है. हालांकि इसके चलते कई मिलें हमेशा के लिए बंद हो गईं और तकरीबन अस्सी हजार मजदूरों को बेरोजगार होना पड़ा. इसी दौर के जो दूसरे सबसे चर्चित नेता रहे वे थे शंकर गुहा नियोगी. उन्होंने 1977 में असंठित क्षेत्र के मजदूरों का सबसे बड़ा आंदोलन खड़ा किया था. छत्तीसगढ़ के इस मजदूर नेता का आंदोलन सिर्फ हड़ताल तक सीमित नहीं था. अपने सामाजिक कार्यों की वजह से इसे आज भी दूसरे आंदोलनों के लिए अनुकरणीय माना जाता है.

मूल रूप से पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी के रहनेवाले नियोगी का असली नाम धीरेश था. 1970 के दशक की शुरुआत में वे छत्तीसगढ आए और यहां भिलाई स्टील संयंत्र (बीएसपी) में बतौर कुशल श्रमिक काम करने लगे. अपने छात्र जीवन से मजदूरों के समर्थन में काम करने वाले धीरेश जल्दी ही बीएसपी में एक मजदूर नेता के तौर पर पहचाने जाने लगे. उस समय तक इस संयंत्र में कभी मजदूरों की हड़ताल नहीं हुई थी या कहें कि उन्हें कभी अपनी मांगों के लिए एकजुट नहीं होने दिया गया था. लेकिन धीरेश के आने से यहां स्थितियां बदल गईं. पहली बार मजदूरों ने अपनी काम करने की दशाओं में सुधार के लिए हड़ताल की और उनकी मांगों के आगे प्रबंधन को झुकना पड़ा. हालांकि इसके बाद प्रबंधन ने धीरेश को नौकरी से बर्खास्त कर दिया. यह घटना 1967 की है. इसके बाद लंबे अरसे तक तक वे छत्तीसगढ़ में घूम-घूमकर मजदूरों को अपने अधिकारों के लिए जागरूक करते रहे. 1970-71 में वे दोबारा भिलाई आ गए और अपना नाम बदलकर शंकर कर लिया. अब वे भिलाई के दानी टोला की चूना पत्थर खदानों में मजदूर की हैसियत से काम करने लगे. अपने पहले के काम की वजह से धीरेश यानी शंकर यहां भी मजदूरों के बीच लोकप्रिय हो गए. उस समय बीएसपी की दल्ली और राजहरा स्थित लौह अयस्क खदानों में ठेके पर काम करने वाले मजदूरों की बहुत बुरी दशा थी. 14-16  घंटे काम करने के बदले उन्हेें महज दो रुपये मजदूरी मिलती थी. उनकी कोई ट्रेड यूनियन भी नहीं थी. शंकर ने इन मजदूरों को साथ लेकर 1977 में छत्तीसगढ़ माइन्स श्रमिक संघ (सीएमएसएस) का गठन किया और इसके बैनर तले मजदूरों के कल्याण के लिए कई गतिविधियां शुरू कीं. यूनियन के गठन के दो महीने के भीतर ही इससे तकरीबन 10-12 हजार मजदूर जुड़ गए थे. यह शंकर गुहा नियोगी और उनके कुछ साथियों का नेतृत्व ही था कि इस यूनियन ने अपने कामों में शिक्षा व स्वास्थ्य और शराबबंदी जैसे कार्यक्रमों को पूरी प्रतिबद्धता से शामिल किया. यह संगठन सितंबर, 1977 में उस समय देशभर में चर्चा में आया जब दल्ली-राजहरा की खदानों में काम करने वाले हजारों मजदूरों ने नियोगी के नेतृत्व में अनिश्चितकालीन हड़ताल कर दी. यह ठेके पर काम करने वाले मजदूरों की देश में सबसे बड़ी हड़ताल थी. इसका असर इतना व्यापक था कि संयंत्र प्रबंधन को मजदूरों की तमाम मांगें माननी पड़ीं.

इस एक हड़ताल ने छत्तीसगढ़ में नियोगी को सबसे प्रभावशाली मजदूर नेता बना दिया. उनकी यूनियन का साल दर साल विस्तार होने लगा. भिलाई की कई निजी कंपनियों के मजदूर भी उसके सदस्य बनने लगे. कहा जाता है कि सन 1990 के आसपास उद्योगपतियों की ताकतवर लॉबी इस संगठन से आशंकित रहने लगी. नियोगी को जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं और आखिरकार सितंबर, 1991 में पल्टन मल्लाह नाम के व्यक्ति ने उनकी हत्या कर दी. यह घटना छत्तीसगढ़ के मजदूर आंदोलन के लिए बहुत बड़ा आघात थी. नियोगी हत्याकांड में मल्लाह के साथ ही कुछ उद्योगपतियों को आरोपी बनाया गया था लेकिन इस मामले में मुख्य अभियुक्त के अलावा किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सका.

यूपीएससी-सीसैट विवाद: प्रश्नपत्र पर सवाल

उग्र यूपीएससी केखिलाफ खिल्ली में प्रिशर्न करते और खिरफ्तारी िेते छात्र
यूपीएससी के खिलाफ दिल्ली में प्रदर्शन  करते और खिरफ्तारी देते छात्र. फोटो: राहुल गुप्ता.
यूपीएससी के खिलाफ दिल्ली में प्रदर्शन करते और गिरफ्तारी देते छात्र. फोटो: राहुल गुप्ता.

‘सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए कम से कम दिन में सात से आठ घंटे की पढ़ाई करनी होती है. इतने घंटे हम अपने कमरे में ही कैद रहते थे, लेकिन पिछले दस दिनों से हम पढ़ ही नहीं पा रहे. दिन रात सड़क पर रह रहे हैं. नोट्स के बदले बैनर-पोस्टर बना रहे हैं. ट्यूशन जाने की जगह प्रदर्शन और अनशन में जा रहे हैं. लेकिन करें तो क्या करें? यूपीएसी ने ऐसी ही हालत बना दी है कि हिंदी और दूसरे भाषाओं में परीक्षा देने वाले छात्रों को पहले लड़ना होगा, जीतना होगा और तब पढ़ना होगा. केवल पढ़ाई करने से कुछ नहीं होने वाला.’

मायूसी और जोश के मिले-जुले भाव के साथ यह बात कहते विवेक कुमार उत्तर प्रदेश के जौनपुर के रहने वाले हैं. पांच साल पहले सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने के लिए वे दिल्ली आए और अपने जैसे उन हजारों छात्रों की तरह शहर के मुखर्जी नगर इलाके में समा गए जो चुपचाप इस परीक्षा की तैयारी करते रहते हैं. लेकिन पिछले एक पखवाड़े से इन छात्रों का एक बड़ा वर्ग आंदोलित है. मुखर्जीनगर में अनशन और प्रदर्शन चल रहा है. हिंदी सहित अन्य दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में तैयारी करने वाले छात्रों का आरोप है कि सिविल सेवा करवाने वाला यूपीएसी 2011 से उनके साथ भेदभाव कर रहा है. इस साल यूपीएससी ने सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा में एक बदलाव किया था. इसे अब सी-सैट (सिविल सर्विसेस एप्टिट्यूड टेस्ट) के नाम से जाना जाता है. यूपीएससी ने यह बदलाव प्रोफेसर एसके खन्ना की अध्यक्षता वाली कमेटी की सिफारिशों के आधार पर किया था. लेकिन छात्रों के एक बड़े वर्ग को यह बदलाव मंजूर नहीं है और वह इसमें सुधार चाहता है.

2010 तक सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा 450 अंकों की हुआ करती थी. इसमें दो पर्चे होते थे. इतिहास, राजनीतिशास्त्र, भौतिकी जैसे 20 वैकल्पिक विषयों में से एक का प्रश्नपत्र जो 300 अंकों का होता था और 150 अंकों वाला सामान्य ज्ञान का प्रश्नपत्र. 2011 में लागू सीसैट में 450 अंकों की बजाय दो-दो सौ अंकों के दो प्रश्नपत्र हैं. पहला सामान्य ज्ञान का है और दूसरे में मानसिक क्षमता, तर्कशक्ति और आंकड़ों के विश्लेषण, अंग्रेजी भाषा के ज्ञान से जुड़े प्रश्न हैं.

हालिया विवाद इसी दूसरे प्रश्न पत्र को लेकर है. विरोध कर रहे छात्रों का कहना है कि जब मुख्य परीक्षा में अंग्रेजी की परीक्षा होती ही है तो फिर प्रारंभिक परीक्षा में भी इसकी क्या जरूरत है. छात्रों की शिकायत है कि इस प्रणाली के तहत मैनेजमेंट और इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले छात्रों को फायदा पहुंचता है. छात्र यह भी कहते हैं कि यह प्रणाली गांव-देहात के स्कूलों से पढ़कर आए हुए छात्रों के सामने बाधा पैदा करती है जबकि अंग्रेजी माध्यम और शहरों में पढ़े हुए बच्चों के लिए रास्ता और आसान करती है.

पूर्व प्रशासनिक अधिकारी डॉक्टर विकास दिव्यकीर्ति कहते हैं, ‘देखिए, कुछ लोग जबरन इसे हिंदी बनाम अंग्रेजी की लड़ाई बता रहे हैं. ऐसे लोग यह तस्वीर बनाना चाहते हैं मानो हिंदी माध्यम के बच्चे अंग्रेजी नहीं जानते और इसी वजह से वे इसका विरोध कर रहे हैं जबकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. अंग्रेजी से किसी को भी दिक्कत नहीं है. अंग्रेजी का एक पेपर तो मुख्य परीक्षा में वर्षों से होता आ रहा है. आजतक किसी ने उसका विरोध नहीं किया. असल दिक्कत यूपीएससी के उस नए परीक्षा पैटर्न से है जो हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के बच्चों को तो नुकसान पहुंचाता है, लेकिन अंग्रेजी और विज्ञान पृष्ठभूमि के बच्चों को फायदा पहुंचाता है.

डॉक्टर दिव्यकीर्ति आगे बताते हैं, ‘समझने की कोशिश कीजिए. सी-सैट में कुल 80 सवाल होते हैं. इन 80 सवालों में से 40 सवाल ऐसे हैं जो सीधे-सीधे अंग्रेजी माध्यम के बच्चों को फायदा पहुंचाते हैं. इन 40 सवालों में से सात या आठ अंग्रेजी भाषा के होते हैं तो जाहिर तौर पर इन सवालों को वे बच्चे जल्दी हल कर लेंगे जिन्होंने अंग्रेजी भाषा पढ़ी होगी. 32 सवाल मानसिक क्षमता परखने के लिए होते हैं. मूल रूप से ये सवाल अंग्रेजी में बनते हैं और बाद में इनका हिंदी अनुवाद किया जाता है. अब इन अनुवादों को देखिए तो समझ में आएगा कि हिंदी माध्यम के बच्चे इन सवालों को कैसे हल कर पाएंगे. हिंदी में ऊल-जुलूल अनुवाद के चलते इन सवालों को समझने के लिए अंग्रेजी में छपे प्रश्न ही पढ़ने होंगे. जब तक हिंदी का बच्चा सवाल समझता है तब तक अंग्रेजी वाला कई सवाल हल कर चुका होता है.’ वे आगे कहते हैं, ‘यह कोई सामान्य परीक्षा नहीं बल्कि प्रतियोगी परीक्षा है जिसमें एक-एक मिनट बहुत कीमती होता है. क्या यह भेदभाव नहीं है? क्या इसका विरोध नहीं होना चाहिए?  क्या यह केवल हिंदी बनाम अंग्रेजी का मामला है?’

ऐसे कई सवाल हैं जिनका यूपीएसी के पास कोई जवाब नहीं है. हां कुछ पूर्व अधिकारी हैं जो केवल इतना भर कहते हैं कि यूपीएससी एक संवैधानिक संस्था है और इस पर भेदभाव का आरोप नहीं लगाना चाहिए. लेकिन उनके पास भी इस बात का जवाब नहीं है कि जो संस्था पूरे देश में इतनी महत्वपूर्ण परीक्षा लेती है वह सवाल के हिंदी अनुवाद में ’स्टील प्लांट’ को स्टील का पौधा’ , ‘टैबलेट कंप्यूटर’ को ‘गोली कंप्यूटर’ और ज्वाईंट वेंचर रूट’ को ‘संयुक्त संधिमार्ग’ कैसे लिख देती है?

इस अनुवाद को देखकर हिंदी के जाने माने साहित्यकार और सिविल सेवा में रह चुके अशोक वाजपेयी भी चकरा गए. उनका कहना था, ‘मैं इतने साल से हिंदी में कहानी-कविताएं लिख रहा हूं. यह कहने में भी संकोच नहीं है कि हिंदी की अच्छी जानकारी है मुझे. फिर भी जब मैंने इन सवालों के हिंदी अनुवाद देखे तो माथा चकरा गया. बहुत से सवाल तो मैं समझ ही नहीं पाया.’ दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर अपूर्वानंद ने इस अनुवाद को वाहियात बताकर खारिज कर दिया. जाने माने पत्रकार और टीवी एंकर रवीश कुमार ने अपने टीवी शो के दौरान यहां तक कहा कि जिन लोगों पर अनुवाद की जिम्मेदारी है उन पर तो कानून के तहत मामला दर्ज किया जाना चाहिए.

विरोध कर रहे छात्रों के मुताबिक अनुवाद की समस्या तो केवल बानगी भर है. इससे यह दिखता है कि यूपीएससी एक भाषा के प्रति किस कदर लापरवाह है. छात्रों की मांग में सी-सैट में बदलाव के अलावा यह भी शामिल है कि अगस्त में होने वाली यूपीएससी परीक्षा को एक महीने टाला जाए. इस मांग के पीछे छात्रों का तर्क है कि यूपीएससी के भेदभावपूर्ण रवैय्येे का विरोध करने की वजह से छात्र अपनी तैयारी नहीं कर पाए हैं.

गौर करनेवाली बात यह भी है कि यूपीएससी द्वारा यूजीसी के भूतपूर्व अध्यक्ष अरुण निगवेकर की अध्यक्षता में गठित समिति ने अपनी रिपोर्ट में सी-सैट को भेदभावपूर्ण बताया था. समिति ने अगस्त 2012 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि सी-सैट शहरी क्षेत्रों के अंग्रेजी माध्यम के प्रतियोगियों को फायदा पहुंचाता है तथा ग्रामीण क्षेत्र के प्रतियोगियों के लिए कठिनाई पैदा करता है. समिति के मुताबिक पहले वर्ग के प्रतियोगी सामान्य अध्ययन पर पकड़ न रखने के बावजूद सी-सैट पर अच्छी पकड़ होने के चलते सफल हो रहे हैं जबकि दूसरे वर्ग के प्रतियोगियों के लिए सामान्य अध्ययन के विषय में अच्छी पकड़ होने पर भी प्रारंभिक परीक्षा पास कर पाना मुश्किल होता है. इसी समिति ने अंग्रेजी से होनेवाले अनुवाद को ‘मशीनी किस्म’ का भी बताया था.

इस समिति ने जो बात कही है वह खुद यूपीएससी के आंकड़ों से साबित होती है. उदाहरण के लिए 2003 से 2010 के बीच प्रारंभिक परीक्षा पास करके मुख्य परीक्षा में बैठने वाले उम्मीदवारों में से हिंदी माध्यम के उम्मीदवारों की संख्या 35 प्रतिशत से 45 प्रतिशत के  बीच थी, लेकिन 2011 में सीसैट के आते ही यह आंकड़ा 15 फीसदी तक लुढ़क गया है.

इतनी अहम परीक्षा लेने वाली संस्था सवाल के हिंदी अनुवाद में ’स्टील प्लांट’ को स्टील का पौधा’ या ‘टैबलेट कंप्यूटर’ को ‘गोली कंप्यूटर’ कैसे लिख देती है?

सफल होनेवाले छात्रों की घटती संख्या ने छात्रों में असंतोष की लहर पैदा कर दी है. इस सबके बीच 16 जुलाई को कार्मिक मामलों के राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने संसद में बोलते हुए विरोध कर रहे छात्रों को यह भरोसा दिलाया था कि सरकार छात्रों के पक्ष में है. उन्होंने यह भी कहा कि पिछली सरकार के कार्यकाल में गठित अरविंद वर्मा समिति ही सिविल सेवा परीक्षा में बदलावों पर विचार करेगी. समिति को एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट देने को कहा गया. तब इसी भरोसे पर छात्रॊं ने अपना अनशन तोड़ा था. लेकिन जब छात्रों को यह जानकारी मिली कि यूपीएससी ने अपनी वेबसाइट पर सूचना दी है कि प्रारंभिक परीक्षा पहले से तय तारीख यानी 24 अगस्त से ही होगी और परीक्षा के लिए जरूरी एडमिड कार्ड भी जारी कर दिया गया है तो शांति से प्रदर्शन कर रहे छात्रों का एक गुट उग्र हो गया. छात्रों ने मुखर्जी नगर से बाहर निकलकर इंडिया गेट और यूपीएससी दफ्तर के बाहर प्रदर्शन किया. पुलिस ने उन पर लाठियां भांजते हुए कई छात्रों को गिरफ्तार किया. फिलहाल छात्र शांत हैं और वर्मा समिति की रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं. सरकार ने भी छात्रों से यह अनुरोध किया गया है कि वे तब तक संयम रखें जब तक समिति की रिपोर्ट नहीं आ जाती.

छात्र एक ऐसा फैसला चाहते हैं जिससे हिंदी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में परीक्षा देनेवालों के हित सुरक्षित हों और उनसे हो रहा भेदभाव बंद हो. विवेक कुमार कहते हैं, ‘यूपीएससी से तो हमें कोई उम्मीद ही नहीं है. अगर इन्हें कुछ करना होता तो 2012 में ही कुछ कर लेते जब इनके द्वारा गठित समिति ने ही इस प्रणाली पर कई सवाल खड़े किए थे. हमें तो उम्मीद है सरकार से. अगर सरकार चाहे तो वह हम छात्रों को बचा सकती है.’

हम उनसे पूछते हैं कि क्या वे सी-सैट को खत्म करके पुराने तरीके से परीक्षा करवाने के हिमायती हैं. वे कहते हैं, ‘पीछे लौटना कोई समझदारी नहीं है, लेकिन केवल अंग्रेजी में प्रश्न पूछा जाना भी भेदभाव है. क्यों न 10 प्रश्न ऐसे भी हों जो सिर्फ भारतीय भाषाओं में पूछे जाएं और उनका अंग्रेजी अनुवाद न दिया जाए? अगर यह अस्वीकार्य है तो केवल अंग्रेजी के प्रश्नों को भी हटाया जाए. मानसिक क्षमता के प्रश्न मूल हिंदी में पूछे जाने चाहिए, अनुवाद वाली हिंदी में नहीं क्योंकि अनुवाद जितना भी अच्छा हो, मूल पाठ की बराबरी नहीं कर सकता.’ वे आगे कहते हैं, ‘अगर यह संभव नहीं है तो क्यों न हिंदी पाठ को मूल माना जाए और अंग्रेजी में अनुवाद करके प्रश्न पूछे जाएं? अगर इस विकल्प पर भी आपत्ति है तो क्यों न ऐसे प्रश्न हटा ही दिए जाएं? आखिर मुख्य परीक्षा में तो मानसिक क्षमता की जांच होती ही है. गणित और तर्क शक्ति के प्रश्नों से कोई दिक्कत नहीं है, पर उनका अनुपात ऐसा नहीं होना चाहिए कि किसी एक पृष्ठभूमि के छात्रों  को ज्यादा फायदा मिले.’

ये तो विरोध कर रहे छात्रों के तर्क हैं जिनसे सरकार या यूपीएससी का सहमत होना या न होना कतई जरूरी नहीं है. लेकिन यूपीएससी और सरकार को इन छात्रों के हितों का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा.

एलबमः दावत-ए-इश्क

एलबमः दावत-ए-इश्क गीतकार » कौसर मुनीर संगीतकार » साजिद-वाजिद
एलबमः दावत-ए-इश्क गीतकार  » कौसर मुनीर    संगीतकार  » साजिद-वाजिद
एलबमः दावत-ए-इश्क
गीतकार » कौसर मुनीर
संगीतकार » साजिद-वाजिद

दावत-ए-इश्क में एक चांद-सा खूबसूरत गीत है. शलमली खोलगड़े का ‘शायराना’. दिल इस गीत को सुनकर वैसे ही खुश होता है जैसा गुलाबों से घिरे रहने के बावजूद वो खुश रातरानी की खुशबू से होता है. ‘अर्थात’ यह मत निकालिएगा कि बाकी के गीत गुलाब हैं. नहीं हैं. लेकिन अगर साजिद-वाजिद ‘शायराना’ जैसा गीत बना सकते हैं, यकीन मानिए, हिंदी फिल्मों के संगीत का मर्सिया पढ़ने का वक्त अभी नहीं आया है, किताब अंदर रख लीजिए.

शायराना की शलमली ‘परेशां’ से अलग हैं, झीनी आवाज पर नशा चढ़ाकर वे सॉफ्ट-रॉक गीत को अलग जगह का गीत बना देती हैं, ऐसी जगह का गीत जहां अभी तक साजिद-वाजिद गए नहीं थे. लेकिन बाकी के गीतों के पास न शलमली हैं, न साजिद-वाजिद का वक्त और न ही अच्छी किस्मत. वे किस्मत-विहीन गीत हैं. पुराने वाले साजिद-वाजिद के बासी गीत. हालांकि एक गीत इस बासीपने से बच निकलने की कोशिश करता है. ‘दावत-ए-इश्क’ नाम की कव्वाली. हारमोनियम व तबले की जुगलबंदी और उनके साथ खड़े जावेद अली इस गीत को बुरा होने से बचाकर ले ही जा रहे थे कि अंत आते-आते गीत अंतहीन बातें करने लगता है, पुरानी वाली ही, और फिर कुछ-एक बार सुनने के बाद इसे दुबारा कभी नहीं सुनने का मन बन जाता है.

बचे हुए गीतों में ‘मन्नत’ सोनू निगम की वजह से दो बार कानों में जाता है. लेकिन वे कुछ अलग करते नहीं, अपने पुराने दिनों को ही जीते हैं, जिसमें साजिद-वाजिद उनका भरपूर साथ भरे-पूरे दिल के साथ देते हैं, और हम गीत से उम्मीद छोड़ देते हैं. जिनका जिक्र नहीं किया, वे गीत नीचे जाती ढलान पर पड़े पत्थर हैं, कभी भी लुढ़क कर अपना अस्तित्व खो सकते हैं. मत सुनिएगा.

इस टूथपेस्ट में नमक नहीं…सलमान खान हैं

kick
िफल्म » किक
निर्देशक» साजिद नाडियाडवाला
लेखक » रजत अरोड़ा, साजिद, चेतन भगत
कलाकार » सलमान खान, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, जैकलीन फर्नांडिस, रणदीप हुड्डा

बात पहले टूथपेस्ट की. फिर सलमान की.

टूथपेस्ट के इतिहास में दिलचस्पी रखने वाले दैदीप्यमान ज्ञानियों के अनुसार टूथपेस्ट के तकरीबन सात हजार साल पुराना होने के प्रमाण उनके पास हैं. इतना पुराना पेस्ट नहीं है, पर उसका वेस्ट और टेस्ट कहीं न कहीं है. निकट के वर्षों में जबसे बाजार ने ‘एक जार में एक आम’ बेचने का चलन विदेशों में शुरू किया था, टूथपेस्ट ने अनेकों रूपों में प्रकट होना शुरू कर दिया. उसे जगत में बिकना सिर्फ एक वजह से था –साफ करने वाला दातून जो कड़वा नहीं है- लेकिन इत्ते से काम के लिए टूथपेस्ट के सैकड़ों नाम, सैकड़ों रंग, सैकड़ों स्वाद, मुंह के अलग-अलग हिस्सों में प्रहार करने की अलग-अलग दैवीय क्षमताओं के साथ बाजार में चले आए. इनका लंगोटिया यार बना दांतों के साथ चमत्कार करनेवाला विज्ञापन अभियान, जिसे नफासत से दशकों से चलाते रहने के लिए इसे बनाने और बेचनेवाले एडवरटाइजिंग के नटवरलालों को  मानवता का नमन.

सलमान खान की फिल्में यही टूथपेस्ट हैं. दशकों से उनके सैकड़ों नाम, रंग, स्वाद हैं और उतने ही दावे-वादे भी. लेकिन अंत में वे बेचती सिर्फ एक चीज हैं. सलमान खान. और चूंकि टूथपेस्ट की समीक्षाएं हमारे समाज में होती नहीं हैं, जोमेटो पर भी नहीं, सलमान खान की फिल्मों की भी समीक्षाएं नहीं होनी चाहिए.

लेकिन…

जब आपने पुरानी कमीज पर नयी चमकदार इस्त्री कर उसे नया-महंगा बता दर्शकों को पहनने के लिए दे ही दिया है, ऐसी कमीज को उतारने का काम तो करना पडेगा ही.

जब कुछ लोग पीछे की खाली पड़ी सीटों पर जाकर बैठने के लिए इंटरवल होने का इंतजार कर रहे थे, ‘किक’ इंटरवल से पहले वाले हिस्से में बादवाले हिस्से की भूमिका बनाने में अपनी जगह खर्च कर रही थी. वही दूसरा हिस्सा, जिसके प्रोमो से लोगों को प्रेम हुआ था क्योंकि उसमें सलमान मास्क लगाकर आनेवाले थे और मानवता के हर दुख को हरने वाले थे. इसलिए पहले भाग के दौरान लोगों ने कंधे ढीले छोड़ दिए और वे सलमान, मिथुन, संजय मिश्रा के जेल वाले दृश्य पर और नृत्य पर खूब हंसे, जैकलीन के पूरी फिल्म में एक ही एक्सप्रेशन कैरी करने को नजरअंदाज कर गए, रणदीप हुड्डा के साधारणतम होने पर उन्हें कोसना भूल गए, सलमान के आईआईटी-आईआईएम टाइप बुद्धि होने के साथ सड़कछाप आशिकी का शौकीन होने पर सीटी मारते रहे, और बेवजह आने वाले गानों पर गपागप नाचोज खाते रहे.

लेकिन दूसरे हिस्से में जब किक-मैन सलमान मास्क लगा पोलैंड में ‘जुम्मे की रात’ गाते हुए एक्शन का बंदोबस्त करने निकलते हैं, फिल्म जय हो के नेकदिल नायक की तरफ लौट जाती है, और उसमें बीइंग ह्यूमन को मिला देती है. इस घालमेल से तालमेल मिलाने की कोशिश कर रहे सलमान दर्शकों को बेतुकी कहानी में बेवजह की हीरोगीरी-सुपरहीरोगीरी दिखा तिलमिला देते हैं, और दर्शक पछताता है कि क्या हो सकती थी फिल्म और क्या हो गई फिल्म. ऐसे में नवाजुद्दीन आनंद देते हैं. हालांकि उनके पास दृश्य बेहद कम हैं लेकिन जोकर प्रभावित उनका किरदार जब देसी-जोकरी करता है, फिल्म का नायक वही बनता है.

किक की यही खासियत है. वह टूथपेस्ट के साथ एक छोटा टूथब्रश फ्री देती है, जो मुख्यधारा के सिनेमा की सफाई अच्छी करता है. यानी नवाज. सलमान की फिल्म में नवाज कहर ढा रहे हैं, इसी में किक है, सिनेमा की उम्मीद है.

जो राज्य को ब्रांड समझते हैं

सानिया निजा्एक साक्ात्कार के दौरान भावुक हो गईं
सानिया निजा्एक साक्ात्कार के दौरान भावुक हो गईं
सानिया मिर्जा एक साक्षात्कार के दौरान भावुक हो गईं.
सानिया मिर्जा एक साक्षात्कार के दौरान भावुक हो गईं.

तेलंगाना या किसी भी राज्य या सेवा को कोई ब्रांड अंबैसडर क्यों चाहिए? देश या राज्य बाजार का उत्पाद या ब्रांड नहीं होते जिन्हें बेचने के लिए उनका प्रचार-प्रसार किया जाए. बेशक कुछ खास तरह की सेवाओं और योजनाओं को जनता तक पहुंचाने के लिए- मसलन पोलियो नियंत्रण या फिर पर्यटन के विकास के लिए- अगर राज्य किसी भी जानी-मानी हस्ती की मदद लेते हैं तो इसमें एतराज लायक कुछ भी नहीं है, लेकिन किसी को अपना ब्रांड अंबैसडर नियुक्त करने की प्रवृत्ति बताती है कि हम बाजार के तौर-तरीकों से इस हद तक जकड़ गए हैं कि राज्य और ब्रांड में- सरोकार और सौदे में- फर्क नहीं करते. दुर्भाग्य से यह प्रवृत्ति अगर सबसे पहले कहीं नजर आई तो वह भाजपा शासित गुजरात में, जिसने अमिताभ बच्चन को अपना ब्रांड अंबैसडर घोषित किया.

राज्य की ब्रांडिंग का यह गुजरात मॉडल अब टीआरएस को इतना पसंद आया कि उसने सानिया मिर्जा को तेलंगाना का ब्रांड अंबैसडर बना डाला. निस्संदेह, सानिया तेलंगाना की सबसे मशहूर शख्सियतों में से एक हैं और उनके राज्य को उन पर स्वाभाविक तौर पर गर्व करना चाहिए, लेकिन उन्हें ब्रांड अंबैसडर बनाकर टीआरएस सरकार ने अचानक न सिर्फ तेलंगाना के संघर्ष को कुछ छोटा और धूमिल कर डाला, बल्कि सानिया को अनजाने में उस राजनीतिक दायरे में खींच लिया, जहां उन पर हमले शुरू हो गए.

लेकिन क्या यह सानिया का कसूर है कि एक दृष्टिहीन राजनीति उनसे ब्रांड अंबैसडर होने की उम्मीद लगा बैठी? क्या यह उचित होता कि ऐसे प्रस्ताव से वे इनकार कर देतीं? अगर ऐसा करतीं तो शायद भाजपा के जिस विधायक के लक्ष्मण ने उनकी हैदराबादी और हिंदुस्तानी पहचान पर सवाल खड़ा करते हुए उन्हें पाकिस्तान की बहू बताया, वही इसे वाकई इस बात के सबूत की तरह पेश करते कि सानिया को तेलंगाना से और भारत से प्रेम नहीं है.

हम बाजार के तौर-तरीकों से इस हद तक जकड़ गए हैं कि राज्य और ब्रांड में- सरोकार और सौदे में- फर्क नहीं करते

अच्छी बात यह रही कि लक्ष्मण को अपनी पार्टी से भी समर्थन नहीं मिला. प्रकाश जावड़ेकर और रविशंकर प्रसाद जैसे बड़े भाजपा नेताओं ने कहा कि सानिया मिर्जा देश का गौरव हैं. मगर सवाल यह है कि क्या देश के इस गौरव से उसकी पहचान पूछने की हिमाकत करने वाले अपने विधायक के खिलाफ उन्होंने कोई कार्रवाई की? उसे क्या कम से कम सानिया से माफी मांगने को भी कहा? जिस दिन सानिया को बाहरी और पाकिस्तान की बहू बताया गया, उसके अगले दिन वे टीवी चैनलों पर सुबकती नजर आईं- पूछती हुई कि आखिर कितनी बार उन्हें अपनी भारतीयता साबित करनी होगी? जिस जांबाज खिलाड़ी ने मार्टिना हिंगिस, विक्टोरिया अजारेन्का और सफीना जैसे दिग्गजों को हराया हो, जो दुनियाभर के मैदानों में जाकर भारतीय उपलब्धि के झंडे गाड़ती रही हो, जिसे इस देश की लाखों लड़कियां अपने मॉडल की तरह देखती हों, उसे इस तरह रोने-सुबकने की नौबत क्यों आई? क्या इसलिए नहीं कि वह मुसलमान है और उससे भी आगे, उसने पाकिस्तान के एक खिलाड़ी शोएब मलिक से शादी की है?

भाजपा इस सवाल का जवाब नहीं देगी. वह कह देगी कि सानिया किसी भी मजहब की हो, वह हिंदुस्तान की है और उसने हिंदुस्तान के लिए पदक जीते हैं- एक तरह से यह बात वह कह चुकी है. लेकिन दरअसल यहां सानिया की शोहरत है जो भाजपा को अपने जाने-पहचाने ‘स्टैंड’ से पीछे हटने पर मजबूर करती है. इसी हैदराबाद में बम धमाकों के नाम पर पकड़े गए बेगुनाह मुसलमानों की एक पूरी सूची है जिनकी हिंदुस्तानियत ही नहीं, इंसानियत पर भी सवाल खड़े कर दिए गए. मुश्किल यह है कि सानिया के सामने राष्ट्रवाद की उसकी अपनी बनाई हुई जो अवधारणा ध्वस्त हो जाती है, उस पर पुनर्विचार करने या उसे संशोधित करने की कोशिश की जगह, भाजपा इस सवाल से कतराकर निकल जाती है.

दरअसल इस बिंदु पर वह अंतर्विरोध दिखने लगता है जो भाजपा ही नहीं, हमारे पूरे मध्यवर्ग की राष्ट्रवाद संबंधी धारणा में अंतर्निहित है. हम देश या राष्ट्र से प्रेम की बात तो करते हंै, लेकिन इस राष्ट्र या देश को ठीक से समझने के लिए तैयार नहीं होते. हम भारत में पैदा भी न हुई सुनीता विलियम्स को भारतीय मान लेते हैं, हम बरसों से स्पेन में रह रहे विश्वनाथन आनंद को भी अपना मानते हैं,  लेकिन जो सानिया जीवन भर भारत में रहीं, भारत की तरफ से खेलती रहीं और भारत के लिए जीतती रहीं, उन पर पराया होने की तोहमत लगा देते हैं. साफ है कि राष्ट्र और धर्म के बीच एक दीवार कहीं हमने अपने जेहन में बना रखी है. दरअसल राष्ट्र या उसकी दूसरी इकाइयों- मसलन भारतीय संदर्भों में राज्य- को लेकर हमारी इस कमअक्ली या तंगजेहनी का भी नतीजा है कि हम राज्य के लिए कोई ब्रांड अंबैसडर ढूंढ़ते हैं. बाजार की विज्ञापनबाज दुनिया के इस शब्द का हम ठीक से अनुवाद भी नहीं कर पाते, क्योंकि यह किसी अवधारणात्मक स्तर पर हमें छूता नहीं. ऐसे में किसी एक खिलाड़ी या सितारे को ब्रांड अंबैसडर बनाकर हम बस उसकी शोहरत का राजनीतिक इस्तेमाल भर करना चाहते हैं.

विडंबना यह है कि इससे देश या राज्य का भला होता हो या न हो, ऐसी लोकप्रिय हस्तियों का भला नहीं होता. बहुत सारे तनावों के बीच बने तेलंगाना की ब्रांड अंबैसडर बनकर अचानक सानिया उन सीमांध्र वालों के लिए कुछ परायी हो जाती हैं जिनके भीतर अपने राज्य के टूटने की कसक और इससे पैदा हुए अनिश्चय और अंदेशे हैं. इसी तरह अमिताभ बच्चन जब गुजरात के ब्रांड अंबैसडर होते हैं तो उनके उस अखिल भारतीय महानायकत्व को कुछ खरोंच लगती है जो उन्होंने अपने अभिनय के बूते हासिल किया है. राजकीय और राष्ट्रीय पहचानों का मामला बहुत संवेदनशील होता है, उसे लोकप्रियतावादी राजनीति के हवाले कर हम अपना भी नुकसान करते हैं और अपने नायकों का भी.

जजों की नियुक्तिः बदलाव जरूरी हैं

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इलस्ट्रेशनः ऋषभ अरोड़ा

सर्वोच्च न्यायालय का कोई जज कैसे नियुक्त होगा इसके बारे में संविधान के अनुच्छेद 124 में लिखा है. इस अनुच्छेद के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति, जितने उन्हें जरूरी लगें उतने, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों से सलाह के बाद करेंगे और मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के अलावा बाकी सभी जजों की नियुक्ति के लिए मुख्य न्यायाधीश से सलाह करना अनिवार्य होगा. मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए राष्ट्रपति को जितने जरूरी हों उतने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों से सलाह करनी होगी.

सन 1993 से पहले तक जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका प्रधान थी. वह जिसे चाहती थी नियुक्त कर देती थी. तब की कुछ सरकारों ने संविधान के लिखे को कुछ इस तरह से लिया था कि जजों की नियुक्ति के लिए मुख्य न्यायाधीश से विचार-विमर्श करना भले आवश्यक हो, लेकिन उसकी सलाह से पूरी तरह सहमत होना सरकार के लिए अनिवार्य नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार की इस सोच का समर्थन 1982 में ‘फर्स्ट जजेज़’ वाले मामले में कर दिया था.

मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के संदर्भ में आज की तरह पहले भी थोड़ी निश्चितता थी. उस समय भी परंपरा यह थी कि सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश को ही देश का मुख्य न्यायाधीश बनाया जाता था. हालांकि कांग्रेस की इंदिरा सरकार ने इस परिपाटी को भी अपनी मनमर्जी से खूब तोड़ा-मरोड़ा. 1973 में उसने तीन जजों – जेएम शेलत, केएस हेगड़े और एएन ग्रोवर – की वरिष्ठता को लांघकर जस्टिस एएन रे को मुख्य न्यायाधीश बना दिया. इन जजों ने केशवानंद भारती के मामले में सरकार के खिलाफ जाने वाला फैसला दिया था. जस्टिस रे की नियुक्ति के बाद तीनों जजों ने सर्वोच्च न्यायालय से अपना इस्तीफा दे दिया था.

1977 में एक बार फिर से वरिष्ठता के आधार पर जस्टिस एचआर खन्ना को नियुक्त करने के बजाय इंदिरा सरकार ने एमएच बेग को मुख्य न्यायाधीश बना दिया. जस्टिस खन्ना ने भी आपातकाल के दौरान एक ऐसा फैसला दिया था जो सरकार को पसंद नहीं आया था. जस्टिस खन्ना ने भी इसके बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.

1993 और 1998 में ‘सेकंड’ और ‘थर्ड जजेज़’ वाले मामलों में आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों ने जजों की नियुक्ति वाली वर्तमान व्यवस्था को जन्म दिया. इसके मुताबिक यह अनिवार्य हो गया कि सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश केवल वरिष्ठता के आधार पर ही बनाया जाएगा और बाकी न्यायाधीशों की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश सहित सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों का एक कॉलेजियम करेगा. इस कॉलेजियम की सिफारिशों को मानना सरकार के लिए अनिवार्य होगा.

इस कॉलेजियम के व्यवहार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने काफी विस्तृत व्यवस्था दी थी और यह तमाम जानकारों के मुताबिक पिछली ‘अव्यवस्था’ से बेहतर थी. लेकिन यह भी सच है कि यह संविधान में जजों की नियुक्ति से जुड़े प्रावधानों से ठीक से मेल नहीं खाती. संविधान ने जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माना था जबकि कॉलेजियम की वर्तमान व्यवस्था में सरकार की भूमिका उतनी ही है जितनी अपने नाम पर लिए गए केंद्र सरकार के निर्णयों में राष्ट्रपति की होती है. संविधान के मुताबिक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में भी सरकार की एक मुख्य भूमिका होनी थी, लेकिन नेहरू जी के समय में ही कार्यपालिका ने अपनी इस भूमिका को एक स्वस्थ परंपरा – वरिष्ठता के आधार पर चयन – के हवाले कर दिया था (यह भी अजीब ही है कि बाद में जिसने इस परिपाटी को तोड़ा वह उनकी बेटी ही थी). कॉलेजियम तंत्र देश चलाने की लोकतांत्रिक व्यवस्था के तकाजों पर भी पूरी तरह खरा नहीं उतरते दिखता और इसमें पारदर्शिता का भी पूरी तरह अभाव है.

इस व्यवस्था को तब भी सही कहा जा सकता था जब यह अपने आप में आदर्श न सही, लेकिन बेहद उत्कृष्ट तरीके से काम करती. लेकिन जस्टिस काटजू के हालिया बयानों ने और पिछले कुछ समय के हमारे अनुभवों ने हमें इसके बारे में अलग ही सोच बनाने पर मजबूर कर दिया है.

हो सकता है यह व्यवस्था पिछले चलन से बेहतर हो, लेकिन 20 साल बाद इस व्यवस्था से बेहतर बनाने की सोचने और फिर उसे बनाने में बुराई क्या है?

लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि इसमें न्यायपालिका के सदस्यों की प्रमुख भूमिका हो और सरकार की भूमिका तो हो लेकिन ऐसी नहीं कि वह इस व्यवस्था को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कैसे भी प्रभावित करने की स्थिति में आ जाए.

चूंकि कोई भी तंत्र आदर्श तो हो नहीं सकता इसलिए इसके बाद भी गलतियां होने की गुंजाइश तो बनी ही रहेगी. ऐसी हालत में हमें गलतियों में सुधारवाली व्यवस्था का निर्माण भी करना होगा. यानी जजों के खिलाफ शिकायतों की जांच और उन पर उचित कार्रवाई की व्यवस्था बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना नियुक्तियों के लिए अभी से बेहतर तंत्र बनाना. वर्ना अभी की हमारी व्यवस्था ऐसी है जिसमें जजों की जांच और उन पर कार्रवाई की डगर सात समुंदर पार जाने से थोड़ी ही कम मुश्किल होगी. या शायद उतनी ही.

शोभन सरकार

shobanserkar

अक्टूबर 2013 की बात है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (जो उस वक्त भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे) ने चेन्नई में एक चुनावी सभा में उन्नाव जिले के डौंडिया खेड़ा में की जा रही खुदाई का मजाक उड़ाते हुए कहा था ‘किसी ने सपना देखा और सरकार ने वहां सोने की तलाश में खुदाई शुरू करवा दी. चोरों और लुटेरों ने देश का जितना धन विदेशों में छिपा रखा है वह 1,000 टन सोने से ज्यादा कीमती है. अगर सरकार उसे वापस ले आए तो सोने के लिए खुदाई करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. सारी दुनिया हम पर हंस रही है.’ इस बयान के बाद संत शोभन सरकार तथा उनके शिष्यों ने मोदी को आड़े हाथों लिया. शोभन सरकार के प्रवक्ता ओम बाबा ने तो यहां तक कह दिया कि जब राजग की सरकार थी तो विदेशी बैंकों से धन वापस क्यों नहीं लाया गया? उन्होंने यह भी कहा कि जब आप सत्ता से बाहर हों तो दूसरों को भाषण देना आसान हो जाता है.

बहरहाल बाद में शोभन सरकार तथा उनके भक्तों की नाराजगी के बाद मोदी ने उनसे क्षमा याचना भी कर डाली. मोदी ने एक ट्वीट कर कहा, ‘संत शोभन सरकार के प्रति अनेक वर्षों से लाखों लोगों की श्रद्धा जुड़ी हुई है. मैं उनकी तपस्या और त्याग को प्रणाम करता हूं.’

हालांकि सरकार ने कभी यह नहीं माना कि वह खुदाई शोभन सरकार के सपने के आधार पर की जा रही है लेकिन वहां कोई सोना भी नहीं निकला. लेकिन शोभन सरकार के करीबी सूत्रों की मानें तो शोभन सरकार ने डौंडिया खेड़ा में सोना निकलने की उम्मीद अभी छोड़ी नहीं है. अब उनकी उम्मीदें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार पर टिक गई हैं.

शोभन सरकार के एक अत्यंत करीबी और विश्वस्त सहयोगी नाम न बताने की शर्त पर तहलका को बताते हैं, ‘बाबा लगातार मोदी सरकार के मंत्रियों के साथ संपर्क में हैं ताकि मोदी सरकार डोंडिया खेड़ा में नए सिरे से खुदाई करवाए. यह मामला केवल बाबा के स्वप्न पर आधारित नहीं है बल्कि उनके पास कुछ नक्शे भी हैं जो उनकी बात को प्रमाणित करते हैं. पिछली सरकार ने उस स्तर तक खुदाई नहीं करवाई जितनी सोना निकालने के लिए जरूरी थी. बाबा खुदाई के तौर तरीकों से भी संतुष्ट नहीं हैं.’

खबरों के मुताबिक डौंडिया खेड़ा के राजा  राव राम बख्श सिंह ने खुद बाबा के सपने में आकर स्थान विशेष पर 1000 टन सोना गड़ा होने की बात उन्हें बताई थी. राव राम बख्श सिंह को सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने और ब्रिटिश सैनिकों को मारने के इल्जाम में अंग्रेजों ने फांसी पर लटका दिया था.

शोभन सरकार के करीबी ओम बाबा का भी एक आश्रम है जानकारी के मुताबिक वहां भी एक बार खजाने की तलाश में निजी स्तर पर खुदाई की जा चुकी है

सूत्रों के मुताबिक इस बार शोभन सरकार डौंडिया खेड़ा के साथ-साथ कानपुर के परेड व चौबेपुर गांव तथा फतेहपुर के आदमपुर गांव में भी खजाने की तलाश में खुदाई करवाना चाहते हैं. बाबा का कहना है कि परेड और चौबेपुर में जहां अरबों रुपये का खजाना गड़ा है वहीं आदमपुर में कम से कम 2,500 टन सोना निकलेगा. बाबा ने डौंडिया खेड़ा में 1,000 टन सोना निकलने का सपना देखा था.

इस वक्त शोभन सरकार कानपुर देहात के शिवली स्थित शोभन आश्रम से करीब 6-7 किलोमीटर दूर जादेपुर में देवी के एक मंदिर के जीर्णोद्धार के काम में लगे हुए हैं. उनकी सुबहें इस समय वहीं बीतती हैं जबकि शाम का समय वह अपने आश्रम में बिताते हैं. लोगों से मिलने-जुलने का उनका क्रम पूर्ववत जारी है. बाबा अपने करीबी लोगों के अलावा हर गुरुवार को आम लोगों से भी मुलाकात करते हैं. इस दौरान शक्ति (तकरीबन 27 वर्ष) नामक उनका निकटस्थ सहयोगी साये की तरह बाबा के साथ रहता है. उसे शोभन सरकार का सुरक्षा प्रभारी भी कहा जा सकता है क्योंकि उनसे मिलने वाले हर व्यक्ति को सुरक्षा जांच से गुजरना होता है जिसकी जिम्मेदारी शक्ति के पास ही है.

बाबा के सलाहकारों में सबसे बड़ा ओहदा ओम बाबा का है. डोंडिया खेड़ा खुदाई प्रकरण के दौरान बाबा के तमाम बयान खुद ओम बाबा जारी करते थे. ओम बाबा का पूरा नाम ओम अवस्थी है. युवावस्था में वह जिला स्तर पर कांग्रेस के नेता रह चुके हैं. आपातकाल के बाद कांग्रेस की पराजय के बाद ओम बाबा ने शपथ ली थी कि वह कांग्रेस की जीत होने तक आधे वस्त्र ही धारण करेंगे. उसके बाद से कांग्रेस तो कई बार हारी और जीती लेकिन ओम बाबा ने अपने आधे वस्त्र धारण करना जारी रखा. ओम बाबा की कई बड़े कांग्रेस नेताओं से नजदीकी है. चित्रकूट में ओम बाबा का एक आश्रम भी है जो 70 बीघे में फैला हुआ है. जानकारी के मुताबिक वहां भी एक बार खजाने की तलाश में निजी स्तर पर खुदाई की जा चुकी है हालांकि वहां भी कोई खजाना नहीं निकला. ओम बाबा उस खुदाई से इनकार करते हुए कहते हैं कि वहां ऊबड़-खाबड़ जमीन को समतल किया गया था.

बाबा लगातार मोदी सरकार के मंत्रियों के साथ संपर्क में हैं ताकि मोदी सरकार डोंडिया खेड़ा में नए सिरे से खुदाई करवाए

शोभन सरकार के इर्दगिर्द रहस्य का गहरा आवरण है. उनसे मिलने जुलने वालों का दायरा बहुत सीमित है तथा उनकी तस्वीर उतारने की भी इजाजत नहीं है. उनके परिचय के बारे में उनके करीबी लोग यही कहकर बच निकलते हैं कि संतों का कोई नाम या घर नहीं होता. बाबा के सर्वाधिक करीबी लोगों की बात करें तो उनमें उनके सुरक्षा प्रभारी शक्ति और प्रवक्ता ओम बाबा के अलावा मोनू शुक्ला, रामू, श्री चरण शुक्ला आदि शामिल हैं.

शोभन आश्रम की बात करें तो कानपुर देहात में शिवली के निकट स्थित यह भव्य आश्रम करीब 90 वर्ष पुराना है. उस वक्त यहां जंगल हुआ करता था. स्वामी रघुनंदन दास महाराज ने शिवली के निकट शोभन आश्रम की नींव रखी थी. शोभन गांव में जन्मे रघुनंदन दास ने 15 वर्ष की आयु में वैराग्य ले लिया था. करीब 40 साल पहले स्वामी रघुनदंन दास का देहांत हो गया. उसके बाद पास में स्थित शुक्लनपुरवा में पं. कैलाश नाथ तिवारी के घर जन्मे परमहंस स्वामी विरक्तानंद जी महाराज (वर्तमान शोभन सरकार) मंधना स्थित ब्रह्मावर्त कॉलेज से इंटरमीडिएट तक शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात वैराग्य लेकर यहां आ गए थे. अब यही इस आश्रम के महंत हैं. शोभन सरकार ने आश्रम के पास करीब 100 बीघे भूमि पर एक झील और पांडु नदी से पंप से सिंचाई की व्यवस्था भी कराई है जिससे आसपास के गांवों के किसानों के खेतों की सिंचाई की जाती है. शोभन सरकार शिवली क्षेत्र के जुगराजपुर, गौरी तथा निगोहा गांव के पास पांडु नदी में पुल बनवाकर सरकार को सौंप चुके हैं.

डीके पांडा

DK-panda

सन् 2005 की बात है. लखनऊ के पुलिस मुख्यालय में प्रदेश के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की बैठक होने वाली थी. लगभग सारे अधिकारी पहुंच चुके थे. तभी मेन गेट से अंदर एक महिला दाखिल हुई. उसने बहुत भड़काउ मेकअप कर रखा था. मांग में इतना सिंदूर लगा था मानों सिंदूर की होली खेलकर आ रही हो. सिलवट पड़े माथे पर बड़ी-सी बिंदी थी तो मेहंदी लगे हाथों में कोहिनी तक रंग बिरंगी चूड़ियां सज रही थीं. पैरों में घुंघरु बंधे थे. कान में बाली और नाक में नथुनी उसे एक अजीब-सा डरावना और वीभत्स रूप दे रहे थे. पीले सलवार कुर्ते में वह महिला पुलिस मुख्यालय के गेट के अंदर जैसे ही दाखिल हुई वहां तैनात गार्ड ने उसे रोका. उसके रोकने पर महिला ने उसे देखते हुए कुछ शब्द बुदबुदाए. गार्ड रास्ते से हट गया. सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हुए वह महिला उस मीटिंग रूम में दाखिल हुई जहां प्रदेश के कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बैठे थे. उस औरत को कमरे में दाखिल होते देख सारे अधिकारी हतप्रभ रह गए. जैसे ही वे उसे बाहर खदेड़ने के लिए कि उसकी तरफ बढ़े, उस महिला ने हाथ से रुकने का इशारे करते हुए रौबदार आवाज में कहा, ‘परेशान मत होइए. अपनी जगह पर बैठे रहिए. हम आईजी पांडा हैं.’ इतना कहकर उसने जोर का ठहाका लगाया.

उस मीटिंग में मौजूद रहे उत्तर प्रदेश पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘ हम लोगों को आईजी पांडा के बारे में यह तो पता था कि उनके साथ कुछ ऊपर-नीचे चल रहा है लेकिन वे मीटिंग में उस वीभत्स गेटअप में आ जाएंगे इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी. लोग उनकी इस हरकत से इतना डिस्टर्ब हो गए थे कि मीटिंग कैंसिल कर दी गई.’

मूलतः उड़ीसा के रहने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस अधिकारी देबेंद्र किशोर पांडा उर्फ डीके पांडा की 2005 की यह हरकत कोई अपवाद नहीं थी. उस साल खुद को दूसरी राधा और कृष्ण की प्रेमिका घोषित करते हुए पांडा ने अपने महिला होने की घोषणा कर दी थी. पांडा का कहना था कि वे तो 1991 में उसी दिन राधा बन गए थे जब एक बार उनके सपने में भगवान श्रीकृष्ण ने आकर कहा कि वे पांडा नहीं बल्कि उनकी राधा हैं, उनकी प्रेमिका. 1991 से 2005 तक पांडा का राधा रूप दबे छुपे चलता रहा लेकिन 2005 में आकर पांडा ने अपने हावभाव और परिधान से उसे सार्वजनिक कर दिया.

जैसे-जैसे आईजी पांडा का कृष्ण के प्रति प्रेम परवान चढ़ता गया उसी अनुपात में तत्कालीन प्रदेश सरकार की फजीहत बढ़ती चली गई. ड्यूटी में आईजी पांडा कहीं जाते तो पुलिस की वर्दी पहनने के साथ ही सोलह श्रंगार करना नहीं भूलते. प्रदेश के तमाम कनिष्ठ-वरिष्ठ पुलिसकर्मियों की तरफ से अपने से वरिष्ठ अधिकारियों और शासन के पास शिकायतें आने लगीं कि कैसे लोग पांडा की वजह से पूरे पुलिस प्रशासन का मजाक उड़ाने लगे हैं. पुलिस की टीम कहीं जाती तो लोग मजाक उड़ाते हुए कहते राधाएं आ रही हैं. लखनऊ के गोमती नगर स्थित विभूति खंड के अपने सरकारी आवास के बाहर पांडा ने अपने नाम की जगह ‘दूसरी राधा’ की नेमप्लेट लगा रखी थी जो पुलिस के लिए अलग से शर्मिंदगी का कारण बना हुआ था. आखिरकार उत्तर प्रदेश सरकार और पांडा के बीच चली एक लंबी खींचतान के बाद इस पुलिस अधिकारी ने अपना इस्तीफा दे दिया.

परिवार के स्तर पर पांडा की पत्नी और दो बेटों ने उन्हें खूब समझाया, उनके सामने मिन्नतें कीं लेकिन पांडा ने राधा का भाव और भेष छोड़ने के बजाय परिवार को ही छोड़ दिया. कुछ समय बाद ही उनकी पत्नी ने पति धर्म का निर्वाह नहीं करने का आरोप लगाते हुए पांडा से तलाक ले लिया. पत्नी का आरोप था कि देबेंद्र ने अपने परिवार पर ध्यान देना बंद कर दिया है और उनका समय घर के आंगन में लगे पीपल के पेड़ की पूजा और कृष्ण का गुणगान करने में बीतता है. दोनों बेटों ने भी पांडा से संबंध समाप्त कर लिए. पांडा से अलग होने के बाद उनकी पत्नी ने उनसे गुजारे भत्ते की मांग की जिसे देने से इस पूर्व पुलिस अधिकारी ने साफ इंकार कर दिया. पत्नी इलाहाबाद हाईकोर्ट गईं. पांडा ने कोर्ट में कहा ‘मैं कैसे पैसे दे दूं. मेरे पास कहां पैसा है.’ कोर्ट ने कहा जो पेंशन है वह क्या है ? इस पर कथित ‘दूसरी राधा’ का जवाब था, ‘सारी संपत्ति के स्वामी कृष्ण हैं, मैं नहीं. यह तो कृष्ण पर ही निर्भर करता है कि वे किसे कितना देते हैं. मेरा उस पर कोई अधिकार नहीं.’ कानूनन ये बातें बेमानी थीं. कोर्ट ने पांडा को अपनी पत्नी को सात हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दे दिया.

सार्वजनिक रूप से कथिततौर पर दूसरी राधा बनकर टीवी चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज के माध्यम से घरों और चौराहों पर चर्चित हुए पूर्व आईजी पांडा को आज लगभग 10 साल का वक्त बीत चुका है. बीते इस एक दशक में पांडा कई अन्य कारणों से भी चर्चा में रहे हैं. ऐसी ही एक घटना 2009 की है. पांडा को वैलेंटाइन दिवस के अवसर पर मुंबई स्थित एक पत्रकार मुकेश कुमार मासूम ने अपनी पुस्तक के लोकार्पण के लिए बतौर मुख्य अतिथि बुलाया था. पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में गए पांडा अपना उद्बोधन देने के लिए खड़े हुए. वे अपनी बातों में ऐसे डूबे की उन्हें समय का ख्याल ही नहीं रहा. तब तक पुस्तक का विमोचन भी नहीं हुआ था. जब पांडा को बोलते हुए डेढ़ घंटा बीत गया तो पुस्तक के लेखक मासूम, उनके पास गए और कंधे पर हाथ रखकर कहा ‘ सर, बहुत समय हो गया, प्रैस कॉन्फ्रेंस खत्म करनी है.’ पांडा साहब ने आव देखा न ताव मासूम साहब को एक थप्पड़ रसीद कर दिया. इस हिदायत के साथ कि अगली बार छूए तो पीटकर लाल कर देंगे. गाली देते हुए कहा कि मुझे छूने का अधिकार सिर्फ मेरे स्वामी कृष्ण को है.

पांडा यह भी दावा करते हैं कि ‘राधा’ बनने के बाद से उनके अंदर की कठोरता खत्म हो गई और उनके शरीर में स्त्रियोचित परिवर्तन आने लगे हैं

बीते इन सालों में पांडा यह कहते भी पाए गए कि राधा बनने के बाद से उनके अंदर की कठोरता खत्म हो गई और अब तो उनके शरीर में भी स्त्रियोचित परिवर्तन आने लगा है. पांडा का कहना था, ‘मेरे शरीर में पुरुष बताने वाली चीजें लुप्त हो गई. सब पिघल गया है’ इस दौर में किसी ने भी अगर पांडा को पुरुष के रूप में संबोधित किया तो उसे पांडा का कोप झेलना पड़ा. इलाहाबाद में उनके एक पड़ोसी राधेश्याम पाठक कहते हैं, ‘एक दिन वे घर से बाहर निकले तो उनके घर के सामने खड़े लोगों ने पांडा जी नमस्ते कह दिया. बस इतना सुनते ही उन्होंने लोगों पर मां-बहन की गालियों की बौछार कर दी. बोले कि, साला जब बोल चुके हैं कि हम राधा है तो क्यों परेशान कर रहे हो.’

साल 2010 में पांडा ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि उन्हें पता चल गया है कि उनकी मौत कब होगी. पांडा का कहना था, ‘ कान्हा मुझे अपने पास बुला रहे हैं. मैं दुनिया छोड़कर जाने के लिए तैयार हूं. मुझे मालूम है कि मेरी मृत्यु कब, कहां और कैसे होगी? मेरे मोक्ष का समय आ गया है और यह काम खुद कान्हा ने किया है.’ खैर इस भविष्यवाणी को चार  साल से अधिक समय बीत गया. पांडा स्वस्थ और जीवित हैं. पिछले सालों में पांडा फिल्म संगीत का विषय भी रहे. साल 2008 में नदीम श्रवण की जोड़ी वाले श्रवण राठौड़ ने अपनी पहली निर्देशित फिल्म ‘काश मेरे होते’ में डीके पांडा से प्रभावित एक किरदार को अपनी फिल्म में शामिल किया. जिसमें जॉनी लीवर ने आईजी डांडा नामक एक ऐसे पात्र की भूमिका अदा की थी जिसके शरीर में ऐश्वर्या राय की आत्मा प्रवेश कर जाती है. फिल्म में जॉनी लीवर को मॉरीशस का आईजी बताया गया था.

साल 2011 में डीके पांडा से प्रभावित होकर एक म्यूजिक कंपनी ने ‘आज की राधा’ नाम से एक भोजपुरी एलबम का निर्माण भी किया. राधा बनने के बाद अगले दो-तीन साल तक पांडा पूरे देश भर में दौरा करके कृष्ण की भक्ति के लिए लोगों को प्रेरित करते रहे. विभिन्न जगहों से कृष्ण से जुड़े कार्यक्रमों का उद्घघाटन करने और उसमें भाग लेने के लिए उनके पास आमंत्रण पत्रों का ढेर लग गया. भक्ति में लीन ‘दूसरी राधा’ पर उसी दौर में उत्तर प्रदेश के नोएडा समेत देश के कई अन्य शहरों में अपनी जमीन और मकान को बेचने के नाम पर धोखाधड़ी करने का आरोप भी लगा. लोगों में आईजी पांडा की पहचान दूसरी राधा के रूप में धीरे-धीरे मजबूत हो रही थी कि एक दिन उन्होंने यह कहते हुए सनसनी फैला दी कि अब वे राधा से कृष्ण बन गए हैं. पांडा कहने लगे, ‘ मैं भगवान कृष्ण का अवतार मोहन हो गया हूं. क्योंकि भगवान ने मुझे ऐसा बनने को कहा है.’

आज पांडा इलाहाबाद के प्रीतमनगर स्थित अपने घर में अकेले रहते हैं. राधेश्याम पाठक बताते हैं, ‘ उनके घर के सामने पहले मीडिया की काफी भीड़ रहती थी. अब मीडिया वाले नहीं आते.’ अपने घर में पांडा अकले रहते हैं.  वे किसी से मिलते नहीं. न कोई उनसे मिलने उनके घर आता है. पांडा के करीबी लोग बताते हैं कि वे अब अपने परिवार के लोगों से मुलाकात नहीं करते. घर में अकेले रहते हैं और सामान्यतः उनका मोबाइल बंद ही रहता है. घर के कामकाज के लिए भी उन्होंने महिलाओं को ही रखा है. हालांकि पांडा के घर के बाहर कौतुहल या भक्तिभाव वश दर्जन भर लोग हमेशा खड़े देखे जा सकते हैं.

पांडा ने यू ट्यूब पर कई वीडियो अपलोड किए हैं जिनमें वे सनी लिओनी से लेकर गांधी, अंबेडकर, धर्म, सेक्स जैसे विषयों पर प्रवचन देते हुए देखे जा सकते हैं

भले ही भौतिक रूप से पांडा ने खुद को लोगों से काट लिया हो लेकिन वे सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं. खासकर यू ट्यूब पर. प्रतिदिन विभिन्न विषयों प्रवचन देते हुए अपने वीडियो वहां अपलोड करते हैं. जिसकी समय सीमा कभी-कभी घंटे भर के पार चली जाती है. ऐसे कई दर्जन भर वीडियो पांडा ने अपने यू ट्यूब एकाउंट से डाले हैं. इनमें वे सनी लिओनी के काम और उसके चरित्र पर टिप्पणी करने से लेकर गांधी और सेक्स मैनेजमेंट, अंबेडकर, जाति व्यवस्था, धर्म, सेक्स, केजरीवाल, मोदी, रामदेव, वेद, बुद्ध, आध्यात्म, मनुस्मृति, सखी अपनी इज्जत अपने हाथ नामक कैप्शन के साथ कई वीडियो अपलोड किए हैं. इनमें से कई वीडियो की भाषा और उसमें व्यक्त पांडा के विचार इतने अश्लील हैं कि कोई भक्तिभाव वाला व्यक्ति वैसा सोच भी नहीं सकता.

शेर सिंह राणा

sharsinghशेर सिंह राणा का जिक्र आते ही एक के बाद एक, तीन ऐसी घटनाएं जेहन में आती हैं जब देश भर के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कैमरे अचानक इस शख्स की तरफ ऐसे मुड़ गए थे जैसे देश-दुनिया में कुछ और चल ही न रहा हो. अखबारों, पत्रिकाओं और समाचार चैनलों में तब दूसरी खबरों के लिए बहुत ही कम स्पेस रह गया था और हर जगह इन्हीं घटनाओं की चर्चा थी. ऐसा होना इस लिए भी लाजमी था क्योंकि एक तो इन घटनाओं के सिरे एक दूसरे से बहुत गहरे जुड़े थे और दूसरा यह कि इन घटनाओं के केंद्र में एक ही शख्स था. ये तीन घटनाएं थीं, चंबल के बीहड़ से निकल कर संसद तक पहुंचने वाली दस्यु सुंदरी फूलन देवी की हत्या, उनकी हत्या के आरोप में गिरफ्तार शेरसिंह राणा का तिहाड़ जेल से फरार होना और दो साल बाद दोबारा पकड़े जाने पर यह दावा करना कि वह अफगानिस्तान स्थित पृथ्वीराज चौहान की समाधि से उनकी अस्थियां लेकर आया है. इन तीनों ही घटनाओं ने तब समाचार चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज बनकर भयंकर सनसनी मचा दी थी.

मीडिया द्वारा बंपर तरीके से कवर की गई घटनाओं का सिलसिलेवार जिक्र करने के क्रम में सबसे पहले 25 जुलाई, 2001 की घटना का जिक्र आता है. उस दिन सुबह के वक्त खबर आई कि फूलन देवी के नई दिल्ली स्थित सरकारी बंगले के बाहर कुछ नकाबपोश बदामाशों ने उनकी गोली मार कर हत्या कर दी है. देश की राजधानी के सबसे महफूज इलाकों में से एक में हुई इस हत्या ने सभी को सन्न कर दिया. फूलन देवी के हत्यारों और हत्या के कारणों को लेकर देश भर की मीडिया तरह-तरह की बातें कह ही रही थी कि इस बीच शेर सिंह राणा नाम के एक युवक का नाम इस हत्याकांड में सामने आ गया. दिल्ली पुलिस के मुताबिक फूलन देवी को गोली मारने वाले नकाबपोश बदमाशों में से एक उत्तराखंड के रुड़की शहर का रहने वाला युवक शेर सिंह राणा था. इस वारदात के दो दिन बाद शेर सिंह ने देहरादून पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया और फूलन देवी की हत्या में शामिल होने की बात स्वीकार कर ली. इस हत्या को अंजाम देने का जो कारण तब सामने आया उसने देश के अंदर सदियों से मौजूद जातीय अस्मिता और उसको लेकर होने वाले खूनखराबे की असलियत सामने लाकर रख दी. पुलिस को दिए अपने बयान के मुताबिक शेर सिंह ने फूलन देवी की हत्या इसलिए की क्योंकि डकैत रहते हुए फूलन देवी ने जितनी भी हत्याएं की उनमें अधिकतर ठाकुर समुदाय के थे. बेहमई  हत्याकांड तो खास चर्चित है. तब फूलन देवी ने बेहमई नाम के गांव में ठाकुर समुदाय के 20 लोगों को गोलियों से भून दिया था. पुलिस का कहना था कि इन्हीं ठाकुरों की हत्या का बदला लेने के लिए शेर सिंह राणा ने फूलन देवी की हत्या की. हालांकि बाद में वह इससे मुकर गया था. अपनी किताब ‘जेल डायरी’ में उसने पुलिस पर ऐसा बयान देने के लिए मजबूर करने का आरोप लगाया है. साल 2012 में शेर सिंह के छोटे भाई विजय राणा ने उसे पूरी तरह निर्दोष बताया था. लगभग 12 साल बाद जमानत पर जेल से छूटे विजय राणा ने कहा कि पुलिस ने उसे फर्जी तरीके से इस मामले में फंसाया और पूरी उम्मीद है कि वह बेगुनाह साबित होगा.

फूलन देवी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार होने के बाद शेर सिंह राणा को तिहाड़ जेल में डाला गया और उस पर मुकदमा भी शुरू हो गया था. लेकिन समाचार चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज वाली पट्टियों पर एक बार फिर से उसका नाम आना अभी बाकी था. तीन साल के अंतराल के बाद 17 फरवरी, 2004 को उसके तिहाड़ जेल सेे फरार हो जाने के साथ ही यह भी हो गया. उस दिन शेर सिंह राणा तिहाड़ की चाकचौबंद व्यवस्थाओं को धता बताते एकदम फिल्मी अंदाज में तिहाड़ जेल से फरार हो गया. तिहाड़ जैसी मजबूत जेल से किसी कैदी का पुलिस को चकमा देकर भाग जाना अपने आप में बहुत बड़ी बात थी, लिहाजा मीडिया ने भी इस मामले को हाथों हाथ लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

कुछ समय बाद यह मामला कुछ ठंडा सा पड़ गया और मीडिया के कैमरे दूसरी खबरों की तरफ मुड़ गए. लेकिन इस बीच शेर सिंह की तलाश के लिए गठित स्पेशल पुलिस की टीम को बड़ी कामयाबी मिल गई.17 मई, 2006 की रात उसने शेर सिंह को कोलकाता से धर दबोचा और इसके साथ ही टीवी स्क्रीन पर एक बार फिर से उसका चेहरा दिखने लगा.

शेर सिंह की पुलिस गिरफ्तारी से बड़ी खबर यह थी की वह कथित तौर पर अफगानिस्तान से पृथ्वीराज चौहान की अस्थियां वापस लाया है

शेर सिंह को गिरफ्तार करने का पुलिस का यह कारनामा काफी सराहनीय था, लेकिन जब तक मीडिया शेर सिंह राणा को गिरफ्तार करने वाली पुलिसिया कामयाबी का जिक्र करता तब तक शेर सिंह राणा ने एक ऐसा दावा कर दिया जिसने समाचार चैनलों को सबसे बड़ी टीआरपी बटोरने का सुनहरा मौका दे दिया. दरअसल कोलकाता से गिरफ्तार होने के साथ ही उसने दावा किया कि जेल से फरारी के बाद वह बांग्लादेश होते हुए अफगानिस्तान पहुंचा था. उसने यह भी कहा कि वह वहां स्थित पृथ्वीराज चौहान की समाधि से उनकी अस्थियां भारत लेकर आया है. अपने इस कारनामे को हिंदू अस्मिता से जोड़ते हुए उसने खुद को सच्चा देशभक्त बताने का दावा किया. इस घटना की सत्यता साबित करने के लिए तब शेर सिंह ने एक वीडियो रिकॉर्डिंग भी पेश की जिसने टीवी चैनलों के लिए लंबे समय तक खाद पानी का काम किया.

2006 में हुए इस वाकये के बाद शेर सिंह राणा का नाम फिलहाल समाचार चैनलों के लिए अप्रासंगिक हो चुका है. शेर सिंह ने उसके बाद क्या किया, फूलन देवी हत्यांकाड के तहत उसके खिलाफ चल रहे मुकदमे की सुनवाई कहां तक पहुंची जैसी जानकारियों को लेकर मीडिया ने उतनी कवरेज फिर कभी नहीं की. कई लोगों के मुताबिक इन वर्षों में देश और दुनिया में बहुत सी दूसरी घटनाएं ऐसी रहीं जो टीवी चैनलों के मिजाज के अनुरूप ब्रेकिंग न्यूज के लिए ज्यादा मुफीद रही. बावजूद इसके इस जिज्ञासा से इनकार नहीं किया जा सकता कि शेर सिंह राणा का हालिया स्टेटस क्या है.

पिछले साल आठ सितंबर को शेर सिंह राणा को अंतिम बार सार्वजनिक रूप से देहरादून की जिला अदालत परिसर में देखा गया. दिल्ली पुलिस की टीम उसे वहां डेढ़ दशक पुराने कार लूट के एक मामले में पेशी के लिए लाई थी. उस दिन देहरादून पुलिस ने शेर सिंह के खिलाफ उस मामले में आरोप पत्र दाखिल किया था. इस मामले की सुनवाई देहरादून की अदालत में चल रही है. शेर सिंह पर आरोप है कि उसने 1997 में देहरादून के रहने वाले एक व्यक्ति कपिल शर्मा के साथ मारपीट करके उसकी कार लूट ली थी. कपिल शर्मा ने राणा को तब पहचाना था जब फूलन देवी की हत्या में उसका नाम आने पर टीवी चैलनों में उसकी तस्वीर दिखी थी. इसके अलावा शेर सिंह राणा ने 2012 में हुए यूपी विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने की इच्छा भी जताई थी.

फूलन देवी हत्या कांड के मुकदमे में फैसला आते ही शेर सिंह राणा का एक बार फिर चर्चा में आना तय है, चाहे वह दोषी साबित हो या नहीं

अब बात फूलन देवी हत्याकांड के मुकदमे की करें तो दिल्ली स्थित पटियाला हाउस कोर्ट में चल रहा यह मुकदमा अपने अंतिम चरण में है. इस मामले में ट्रायल लगभग पूरा हो चुका है. इस मामले में शेर सिंह राणा सहित 12 लोगों को आरोपी बनाया गया है. एक आरोपी की मौत होने के कारण उसके खिलाफ मामला बंद हो चुका है. उम्मीद जताई जा रही है कि इस साल के अंत तक इस मामले में फैसला आ जाएगा. शेर सिंह राणा के भाई राजू राणा कहते हैं, ‘बहुत जल्द मेरा भाई बाइज्जत बरी होकर सलाखों के बाहर होगा.’ राजू राणा शेर सिंह राणा को तिहाड़ से भगाने की साजिश रचने के जुर्म में आरोपित है और तकरीबन साढे़ ग्यारह हालों तक जेल में रहने के बाद पिछले साल ही जमानत पर बाहर आया है.

बहरहाल भले ही शेर सिंह राणा समाचार चैनलों से गायब है, लेकिन इतना तय है कि फूलन देवी हत्या कांड के मुकदमे में फैसला आते ही समाचार चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज वाली पट्टियां एक बार फिर उसके नाम को लेकर सरपट दौड़ती हुई दिखेंगी. चाहे वह दोषी साबित हो या बेगुनाह.