हिंसा से जूझते लीबिया में फंसी 44 भारतीय नर्सें भारत लौट आई हैं. वहां के अलग-अलग अस्पतालों में काम कर रहीं इन नर्सों को पहले ट्यूनीशिया से बस के रास्ते दुबई लाया गया और फिर वहां से हवाई जहाज द्वारा कोच्चि. केरल सरकार कोच्चि से आगे की यात्रा के लिए हर नर्स को दो हज़ार रुपए देगी. कुल 58 भारतीय नर्सें त्रिपोली से ट्यूनीशिया पहुँची थीं जिनमें से 44 नर्सों का पहला दल स्वदेश पहुंच गया. इस बीच 43 नर्सों का एक और दल सोमवार को ट्यूनीशिया की सीमा पर पहुंच गया है. केरल के मुख्यमंत्री ओमेन चांडी ने एक अगस्त को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को पत्र लिखा था. इसमें उन्होंने लीबिया में फंसी भारतीय नर्सों की स्वदेश वापसी का इंतजाम करने का अनुरोध किया था. 2011 में कर्नल मोअम्मर गद्दाफ़ी को सत्ता से बेदखल किए जाने के बाद से लीबिया में हिंसा और अस्थिरता का दौर जारी है. अलग-अलग इलाकों में स्थानीय लड़ाकों ने सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल रखा है. त्रिपोली में भी सरकारी सुरक्षा बलों और लड़ाकों में लड़ाई जारी है. वहां फंसे भारतीयों को निकालने के लिए 2011 में भी भारत सरकार ने एक विशेष अभियान चलाया था.
नर्सों की स्वदेश वापसी
ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं
सरकार और मौसम विभाग के हालिया दावे भले ही यह जता रहे हों कि आधे मौसम तक कमजोर रहा मॉनसून अब तेजी से भरपाई कर रहा है, लेकिन रिजर्व बैंक (आरबीआई) के हिसाब से कम बारिश का जो नतीजा होना था वह हो चुका. बैंक की ताजा मौद्रिक समीक्षा नीति से यही संकेत मिल रहे हैं. आज घोषित हुई इस नीति में बैंक ने सभी प्रमुख ब्याज दरों को अपने पहले के स्तर पर रखा है. हालांकि सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर) में 0.5 प्रतिशत की कटौती करके बैंक ने यह जरूर सुनिश्चित कर दिया कि बाजार में 40 हजार करोड़ रुपये पहुंच जाएं.
यह लगातार तीसरी बार है जब बैंक ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है. आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन के मुताबिक कमजोर मॉनसून, उसके चलते खाद्यान्न की कीमतों पर प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल कीमतों में अस्थिरता की वजह से महंगाई बढ़ने की आशंका है. रिजर्व बैंक की द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा जारी करते हुए उनका कहना था, ‘ यह सही होगा कि जून के महीने की तरह हम उसी मौद्रिक नीति पर सतर्कता से आगे बढ़ते रहें.’
नई समीक्षा नीति में रेपो रेट को आठ प्रतिशत, रिर्वर्स रेपो रेट को सात और नकद अनुपात को चार प्रतिशत के स्तर पर रखा गया है. वहीं बैंक दर नौ प्रतिशत रहेगी.
बाजार में तरलता बढ़ाने या कहें कि पैसा उपलब्ध करवाने के लिए राजन ने बैकों के सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर) में 0.50 प्रतिशत की कटौती कर के इसे 22 प्रतिशत कर दिया है. यह नौ अगस्त से लागू होगा. जून की समीक्षा नीति के जरिए भी 40 हजार करोड़ रुपये बाजार को उपलब्ध करवाए गए थे.
विकास के अनुमानों पर राजन का कहना है कि साल 2014-15 के लिए सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) 5.5 प्रतिशत रह सकता है. उनके शब्दों में, ‘ देश में घरेलू आर्थिक गतिविधियां दोबारा बढ़ रही हैं.’
उपभोक्ता कीमत सूचकांक के आधार पर मुद्रास्फीति जून में 43 महीने के न्यूनतम स्तर 7.31 पर आ चुकी है जबकि मई में फैक्टरी उत्पादन 4.70 प्रतिशत रहा. नौ महीने का यह उच्चतम स्तर है.
आरबीआई की मौद्रिक नीति की अगली समीक्षा 30 सितंबर को होगी.
उत्तराखंड राजनीति: कठिन डगर, मुश्किल सफर

उत्तराखंड विधानसभा की तीन सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे सत्तारूढ़ कांग्रेस और मुख्यमंत्री हरीश रावत के लिए संजीवनी लेकर आए हैं. विजय बहुगुणा की जगह मुख्यमंत्री बने हरीश रावत को विमान हादसे में लगी गर्दन की चोट ने सताया तो लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी की कमर ही टूट गई. लगभग डेढ़ महीने से ज्यादा समय तक दिल्ली में इलाज कराने के बाद कुछ ही दिन पहले देहरादून लौटे रावत मन ही मन इन चुनाव के नतीजों को लेकर काफी चिंतित थे. उन्हें छह माह पहले इसी शर्त पर विजय बहुगुणा की जगह मुख्यमंत्री बनाया गया था कि वे लोकसभा चुनाव के समय राज्य में कांग्रेस की लुटिया डूबने से बचा लेंगे. लेकिन जी तोड़ प्रयासों के बावजूद वे कुछ न कर पाए और कांग्रेस को लोकसभा की सभी पांच सीटें गंवानी पड़ीं. बिगड़ी बनाने के प्रयास के रूप में गैरसैण में विधानसभा का सत्र आयोजित कर विधानसभा उपचुनावों की तैयारी के लिए दिल्ली जाते हुए विमान के झंझावात में फंस जाने की वजह से उन्हें गर्दन और कमर में गहरी चोट आई और लंबे समय के लिए उन्हें अस्पताल की शरण लेनी पड़ी. इसके फलस्वरूप वे न तो अपना नामांकन भरने अपने निर्वाचन क्षेत्र धारचूला जा पाए थे और न कहीं चुनाव प्रचार में. शारीरिक मजबूरी के कारण उनके पास देहरादून के अपने तीन कमरों के फ्लैट में बारी-बारी से बेचैन होकर घूमते रहने के सिवा कोई चारा न था.
लेकिन 25 जुलाई को आए नतीजों में तीनों सीटों पर मिली जीत ने उनके लिए औषधि का काम किया. वैसे, हरीश रावत के निर्वाचन क्षेत्र धारचूला को एक चमत्कारिक प्राकृतिक औषधि यारसा गुम्बा के लिए भी जाना जाता है, जिसके बारे में यह विश्वास है कि वह मनुष्य में नए पौरुष, उत्साह और ऊर्जा का संचार कर देती है. सचमुच धारचूला और दो अन्य विधानसभा क्षेत्रों की जनता ने उन्हें अच्छी खासी बढ़त वाली जीत दिलाकर यारसा गुम्बा की एक भरपूर खुराक पेश की है. राष्ट्रीय स्तर पर भी मोदी के असर से जूझ रही कांग्रेस के लिए यह पहली बड़ी राहत है, जिसे वह चाहे तो मोदी ज्वर के उतरने का प्रतीक मानकर आईसीयू से बाहर निकल सकती है. हरीश रावत के लिए भी इन चुनावों के परिणाम उनके अब तक के राजनीतिक जीवन में संभवत: सर्वाधिक अहम थे. उनके पूर्ववर्ती विजय बहुगुणा के कार्यकाल में उभरे असंतोष और निराशा के चलते आला कमान ने रावत का अनुभव देखते हुए उनको बड़ी अपेक्षा से लोकसभा चुनाव के पहले राज्य में भेजा था. वह अपेक्षा यह थी कि वे कांग्रेस की ढहती दीवारों को थाम लेंगे. लेकिन मोदी के राष्ट्रव्यापी अंधड़ में उनकी एक न चली और पार्टी को हर सीट पर पराजय का मुंह देखना पड़ा. लेकिन इस अप्रत्याशित सफलता ने हरीश रावत की चुनौतियां भी बढ़ा दी हैं.
पार्टी के भीतर उनका आंतरिक ‘विपक्ष’ भले ही ताजा चुनाव परिणामों से फिलहाल चुप्पी साधने को मजबूर हुआ है, लेकिन हरीश रावत को लेकर विरोधी खेमे की असहजता और खुंदक कम नहीं हुई है. उनकी अनुपस्थिति में मुख्यमंत्री का कामकाज देखने के लिए अधिकृत की गईं वरिष्ठ मंत्रिमंडलीय सहयोगी इंदिरा हृदयेश के मन में अनायास ही सत्ता शीर्ष की कोंपलें फूट पड़ीं. अपने मनोभावों को उन्होंने उस दौरान यह कहकर उजागर भी कर दिया था कि ‘मुझे मुख्यमंत्री का काम संभालने के लिए आलाकमान ने अधिकृत किया है.’ इंदिरा हृदयेश उन दिनों अपना दफ्तर छोड़कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठकर नियमित रूप से अफसरों की हाजिरी लेती थीं. नव नियुक्त कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय के खिलाफ लामबंद होने के बाद आंतरिक विपक्ष ने सीधे हरीश रावत के विरुद्ध मोर्चा खोला. कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत की अगुवाई में कांग्रेस विधायकों के एक छोटे दल ने दिल्ली जाकर राज्य में खनन और शराब कारोबार को लेकर अपनी ही सरकार को कटघरे में ला खड़ा करने का प्रयास किया. माना जा रहा है कि इन्हीं परिस्थितियों के कारण हरीश रावत को दिल्ली के आयुर्विज्ञान संस्थान से अपना इलाज अधूरा छोड़ कर देहरादून लौटने को मजबूर होना पड़ा.
अब नौकरशाही को काबू करना उनकी पहली चुनौती है. अपने नवनिर्मित निजी भवन के लिए पेड़ कटवाने के गंभीर आरोप में घिरे पुलिस महानिदेशक अभी तक यथावत हैं, तो पिछली सरकार के समय कोकाकोला जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भूमि आवंटन में व्यक्तिगत रुचि लेने के चौतरफा आरोप झेल चुके एक आला नौकरशाह का रुतबा अभी भी एकदम पहले जैसा है. रावत ने भारी राजनीतिक जोखिम उठाकर राज्य की जनता के सर्वाधिक वांछित स्थल गैरसंैण को राजधानी बनाने की दिशा में पहल कर मानो बोतल में बंद जिन्न को खोल दिया है. अब उन्हें यह सिद्ध करना है कि गैरसैण में विधानसभा सत्र आयोजित करने की पहल उन्होंने शगूफे के तौर पर नहीं, बल्कि गंभीर प्रतिबद्धता के तौर पर की थी. मुख्यमंत्री बनने पर उन्हें तत्कालीन दबावों के चलते पुराने मंत्रिमंडल को यथावत गोद लेना पड़ा था. यह ठीक ऐसी स्थिति थी जैसे पुनर्विवाह करने पर किसी व्यक्ति को अपनी पत्नी के पहले विवाह से उत्पन्न उद्दंड और नाकारा पुत्रों को भी अपनाना पड़ जाए. अब उनके पास किसी दबाव का कोई बहाना नहीं है. मंत्रिमंडल नितांत असंतुलित है. कुमाऊं मंडल का प्रतिनिधित्व लगभग नगण्य होने के चलते सभी निर्दलियों को उसमें शामिल कर लिया गया था. यूं भी राज्य गठन से हर मोर्चे पर छली जा रही जनता को हरीश रावत से कुछ ज्यादा ही अपेक्षाएं है. इन अपेक्षाओं पर खरा न उतर पाना उन्हें भीषण राजनीतिक गर्त में भी धकेल सकता है.
बड़ी उम्मीदों से खाद पानी देकर सींचे गए पौधे का फल तीखा निकलने पर कई बार उसे काट भी दिया जाता है.
गूगल: सबका मालिक एक
दिल्ली के मयूर विहार में रहने वाले राजेश कुमार के दिन की शुरुआत अपने स्मार्टफोन पर ताजा खबरें और ईमेल चेक करने के साथ होती है. करीब आधा घंटे यह काम करने और फिर सुबह की दूसरी कवायदों से फारिग होने के बाद वे दफ्तर रवाना होते हैं. इसके बाद सर्च इंजन, सोशल मीडिया, चैट या मेल जैसी सेवाओं के साथ पेशे से केबल ऑपरेटर कुमार के दिन का एक बड़ा हिस्सा लैपटॉप और स्मार्टफोन पर ही गुजरता है.
कुमार जैसे दो अरब से भी ज्यादा लोग हैं जिनकी जिंदगी इंटरनेट के बिना अधूरी है. वैज्ञानिक से लेकर रेहड़ी वाले तक हर तरह के लोगों से मिलकर बना यह आंकड़ा दुनिया की कुल आबादी का करीब एक तिहाई है. यह एक नया समाज है जिसकी बसाहट सूचना-तकनीक की जमीन पर हो रही है. मानव सभ्यता का इतिहास बताता है कि अलग-अलग दौर में हर समाज ने कुछ शक्तियों को अपना आधार मानते हुए उनकी आराधना की है. दुनिया की सबसे पुरानी कही जाने वाली वैदिक सभ्यता इंद्र, सूर्य या रुद्र नाम की शक्तियों को पूजती थी. पांच हजार साल पुराना वह समाज मानता था कि बारिश, धूप और आंधी-तूफान के इन देवताओं की कृपा के बिना उसकी खेतिहर व्यवस्था की गाड़ी नहीं चल सकती. आज इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले दसियों करोड़ लोगों के समाज के लिए भी एक शक्ति कुछ ऐसा ही दर्जा रखती है. उसका नाम है गूगल.
गूगल को ईश्वर का रूप कहना कइयों को अतिश्योक्ति लग सकता है, लेकिन ईश्वर की परिभाषा पर गौर करें तो उसके और गूगल के गुणधर्म काफी कुछ मिलते दिखते हैं. दरअसल मानव समाज में समय और जरूरतों के साथ ईश्वर के स्वरूप भले ही बदलते रहे हों, लेकिन उसकी परिभाषा कमोबेश एक ही रही है. उसे सबमें रहने, सबको देखने और सबको चलाने वाली शक्ति के रूप में देखा गया है. दूसरे शब्दों में कहें तो एक ऐसी शक्ति के रूप में जिससे उस समाज में रहने वाले अपना हित और अहित जोड़कर देखते हैं. अपनी लगातार बढ़ती विराटता के साथ गूगल भी दो अरब से ज्यादा लोगों के लिए सुखकर्ता, दुखहर्ता और जगपालनकर्ता हो गया है. किसी भी तरह की राह तलाशते लोगों के लिए वह ईश्वर की तरह ज्ञान का सागर है जो उनके कंप्यूटर या स्मार्टफोन रूपी गागर में भरा हुआ है. उसके भक्तों ने तो उसकी एक ऑनलाइन इबादतगाह भी बना ली है जिसका नाम है दचर्चऑफगूगलडॉटओआरजी. इन भक्तों का मानना है कि गूगल को ईश्वर का दर्जा दे दिया जाना चाहिए क्योंकि एक तो उसमें वे बहुत-सी खूबियां हैं जिन्हें परंपरागत रूप से ईश्वर के साथ जोड़कर देखा जाता रहा है और दूसरी बात यह है कि उसके वजूद को वैज्ञानिक रूप से साबित भी किया जा सकता है.
वैसे 1998 में जब गूगल ने जन्म लिया था तो शायद ही किसी ने सोचा हो कि अगले 16 साल में ही वह इस दर्जे तक पहुंच जाएगा. उन दिनों नए-नए सुर्खियों में आए इंटरनेट जगत में याहूडॉटकॉम का बोलबाला था. याहू या अमेरिका ऑनलाइन जैसी चर्चित वेबसाइटें मुख्य तौर पर कांटेंट यानी खबरों और जानकारियों पर केंद्रित थीं. गूगल ने दूसरा तरीका अपनाया. वह इन जानकारियों तक जाने का जरिया बन गया. अब इंटरनेट पर किसी व्यक्ति का पहला कदम वह था. किसी को भी ढेरों बुकमार्क जमा करने या बार-बार अलग-अलग साइटों का नाम टाइप करने की जरूरत नहीं थी. सब कुछ एक ही जगह मौजूद था जिस तक पहुंचना बस एक क्लिक का खेल था. इंटरनेट के अपार विस्तार के साथ गूगल की ताकत भी असाधारण रूप से बढ़ती चली गई.
[box]
राज के रास्ते
सूचना
अपनी शुरुआत से ही गूगल सर्च यानी जानकारियों की खोज का बादशाह रहा है. पर्सनल कंप्यूटर से मोबाइल डिवाइसेज की तरफ झुकती दुनिया ने उसकी ताकत और भी बढ़ाई है क्योंकि एंड्रॉयड के रूप में उसके पास इस बाजार के 80 फीसदी हिस्से पर काबिज सिपहसलार है. इसका सीधा मतलब यह है कि दुनिया में जानकारियों के बहाव पर गूगल का कब्जा है. किसी जानकारी की तलाश में जब आप सर्च, मैप्स, या यू ट्यूब जैसी सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे होते हैं तो एक हद तक गूगल को अपनी जिंदगी का नियंत्रण भी सौंप रहे होते हैं
[/box]
आज करीब 400 अरब डॉलर (लगभग 24 लाख करोड़ रुपये) का महाआकार ले चुका गूगल सर्वव्यापी है. डेस्कटॉप से लेकर लैपटॉप, फोन, फ्रिज या वाशिंग मशीन तक उसकी मौजूदगी हर जगह दिखती है. आंकड़े बताते हैं कि मोबाइल ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर बाजार में उसका एंड्रॉयड सबसे बड़ा खिलाड़ी है. इंटरनेशनल डेटा कॉरपोरेशन (आईडीसी) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक एंड्रॉयड का इस बाजार के लगभग 80 फीसदी हिस्से पर कब्जा हो गया है. इसी तरह गूगल मैप्स, जीमेल, क्रोम, यूट्यूब जैसी उसकी दूसरी कई सेवाओं का भी अपनी-अपनी जगह मजबूत दबदबा है. खोज यानी सर्च का तो गूगल पर्याय बन चुका है. आज गूगल पर हर दिन 3.5 अरब यानी हर सेकेंड करीब 40 हजार सर्च होती हैं. इसीलिए गूगल करना हमारी शब्दावली का हिस्सा हो गया है. कुल मिलाकर कहें तो स्मार्टफोन और कंप्यूटर की मदद से दौड़ती जिंदगी एक बड़ी हद तक गूगल भगवान के भरोसे ही चल रही है. सर्च, जीमेल, यूट्यूब, गूगल मैप्स, एंड्रॉयड, क्रोम, हैंगआउट्स और दूसरी दर्जनों सेवाओं से मिलकर बनी उसकी दुनिया से दसियों करोड़ लोगों का रोज कई घंटे वास्ता पड़ता है. वह इस दुनिया का ईश्वर है.
‘हम जानते हैं कि आप कौन हैं, क्या करते हैं, आपके शौक क्या हैं, आप इस समय कहां हैं, हम यह भी अंदाजा लगा सकते हैं कि आप इस समय क्या सोच रहे हैं. हमारे पास आपके हर सवाल का जवाब है’, कई मौकों पर गूगल के कार्यकारी चेयरमैन एरिक श्मिट जब यह कहते हैं तो उनकी बात गलत नहीं होती. दरअसल हमारा गूगल से जुड़ाव और गूगल का हमारी जिंदगी में दखल इस हद तक हो चुका है कि वह न सिर्फ हमें अच्छी तरह जानने-पहचानने लगा है बल्कि हमारी जिंदगी को निर्देशित भी करने लगा है. आप जीपीएस के सहारे कोई सफर तय कर रहे हों या सर्च पर जानकारियों का पहाड़ खंगालने के बाद कोई चीज खरीद रहे हों, आप इस देवता की उंगली पकड़कर ही चल रहे हैं. इसलिए कहने वाले यहां तक कह देते हैं कि गूगल आपके बारे में आपकी मां या पत्नी से भी ज्यादा जानता है. श्मिट के मुताबिक गूगल का लक्ष्य है कि कुछ साल बाद वह आपको यह बताने की स्थिति में हो कि आपको फलां छुट्टी के दिन क्या करना चाहिए या कौन सी नौकरी आपके लिए सबसे मुफीद रहेगी.
यानी अभी तो सिर्फ झलक है. एक हालिया साक्षात्कार में गूगल के इंजीनियरिंग डायरेक्टर स्कॉट हफमैन कहते हैं कि भविष्य में तकनीक के साथ हमारा संवाद उतना ही सहज होगा जितनी हमारी आपसी बातचीत. उनके मुताबिक कुछ ही साल बाद सर्च बॉक्स में की वर्ड टाइप करना बहुत पुरानी बात हो जाएगी. यानी किसी जवाब के लिए स्क्रीन और कीबोर्ड की जरूरत खत्म हो चुकी होगी. हफमैन कहते हैं, ‘हमारे घर की छत या दीवारों में माइक्रोफोन और स्पीकर लगे होंगे. हम सवाल पूछेंगे और मशीन हमें जवाब देगी.’ हमारे और दुनिया के बारे में सारी जानकारियों से लैस मशीनों का एक नेटवर्क – जो गूगल की ही एंड्रॉयड या किसी और तकनीक की मदद से आपस में जुड़ा होगा- हमारे शरीर और दिमाग की कवायद काफी कम कर देगा.

आंकड़े बताते हैं कि पिछले 13 साल में गूगल ने कुल मिलाकर 161 कंपनियों का अधिग्रहण किया है. इनमें ई कॉमर्स, स्वास्थ्य या रोबोटिक्स जैसे बिल्कुल अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही कंपनियां शामिल हैं. इस असाधारण आंकड़े का औसत निकालें तो पता चलता है कि गूगल हर महीने एक कंपनी खरीद रहा है. बीते दो साल के दौरान तो उसने अधिग्रहण की इस कवायद पर 17 अरब डॉलर से भी ज्यादा की रकम खर्च की. 2013 के आखिर में गूगल ने रोबोटिक्स के क्षेत्र में सक्रिय दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से आठ खरीद लीं. इनमें बोस्टन डायनेमिक्स भी शामिल है जिसने चीता, एटलस और बिग डॉग नाम के चर्चित रोबोट बनाए हैं. यह कंपनी अमेरिकी सेना से लेकर सोनी कॉरपोरेशन तक कई बड़ी संस्थाओं के लिए काम कर रही है. इसके तुरंत बाद गूगल ने 40 करोड़ डॉलर में डीपमाइंड टेक्नॉलॉजीज नाम की एक ब्रिटिश कंपनी का अधिग्रहण किया जो कृत्रिम बुद्धि यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के क्षेत्र में सक्रिय है. 2014 की ही शुरुआत में उसने 3.2 अरब डॉलर देकर होम ऑटोमेशन के क्षेत्र में सक्रिय नेस्ट लैब्स को भी खरीदा. इसी साल जुलाई तक गूगल 20 कंपनियों का अधिग्रहण कर चुका है.
[box]
स्रोत
सर्च इंजन अगर रास्ता है तो साफ्टवेयर और हार्डवेयर गाड़ी. यानी जानकारियों तक पहुंच के लिए माध्यम भी चाहिए. एंड्रॉयड और गूगल ग्लास ने गूगल को सूचना के इन्हीं स्रोतों पर भी नियंत्रण दिया है. स्मार्टफोनों की बहुतायत के चलते किसी भी कंप्यूटिंग प्लेटफॉर्म पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला ऑपरेटिंग सिस्टम अब विंडोज नहीं बल्कि एंड्रॉयड है. उधर, गूगल ग्लास का मतलब यह है कि कंप्यूटर अब आपने अपनी आंखों पर ही पहना हुआ है. जाहिर-सी बात है कि जल्द ही दुनिया गूगल की आंखों से दुनिया देखेगी.
[/box]
पहली नजर में यह सोचकर हैरानी हो सकती है कि आखिर गूगल अपने परंपरागत काम यानी इंटरनेट की बजाय स्वास्थ्य विज्ञान, रोबोटिक्स या अपने आप चलने वाली कार जैसी परियोजनाओं पर क्यों दांव लगा रहा है. जानकारों के मुताबिक इसके कई कारण हैं. पहला तो यही कि वह अपनी सेवाओं को सर्च के इतर भी फैलाना चाहता है. गौरतलब है कि अभी गूगल के कारोबार (2013 में यह करीब 58 अरब डॉलर था) का 90 फीसदी से भी ज्यादा हिस्सा गूगल सर्च से आता है. कारोबार के नियम कहते हैं कि एक प्रोडक्ट पर इतनी ज्यादा निर्भरता ठीक नहीं होती. इसलिए गूगल ऑफलाइन कारोबार के जरिये कमाई के नये रास्ते निकालना चाहता है. दांव पर लगाने के लिए उसके पास अकूत रकम भी है. रिपोर्टों के मुताबिक गूगल के पास करीब 60 अरब डॉलर(तीन लाख साठ हजार करोड़ रुपये) का रिजर्व कैश है. इसलिए वह जिस कंपनी में भविष्य की संभावना देख रहा है, उसे कोई भी कीमत चुकाकर खरीद ले रहा है.
एक हालिया लेख में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया के प्रोफेसर और अधिग्रहण जैसी कारोबारी कवायदों के विशेषज्ञ जॉर्ज गाइस कहते हैं, ‘गूगल की यह दौड़ सिर्फ ब्रांडों का पोर्टफोलियो बढ़ाने के लिए नहीं है. वह चाहता है कि उसके पास डेवलपरों, डिजाइनरों, वैज्ञानिकों या ऐसी ही दूसरी प्रतिभाओं का विशाल भंडार हो.’ उदाहरण के लिए नेस्ट लैब्स स्मार्टफोन से भी चलने वाले थर्मोस्टेट और स्मोक अलार्म डिटेक्टर बनाती है. इसके अधिग्रहण के साथ गूगल की झोली में इन दोनों उत्पादों के अलावा टोनी फेडल जैसी प्रतिभा भी आई. नेस्ट के सहसंस्थापक फेडल को एप्पल के मशहूर आइपॉड और आइफोन के पीछे का दिमाग माना जाता है. वे उस टीम के मुखिया रहे हैं जिसने आइपॉड के 18 और आइफोन के तीन संस्करण जमीन पर उतारे. अपने-अपने क्षेत्रों में फेडल जैसी ही विशेषज्ञता रखने वाली कई प्रतिभाओं को गूगल ने यह जिम्मा सौंपा है कि वे आपका शारीरिक और मानसिक बोझ कम से कम कर दें.
इस जानकारी के बाद गूगल की अटपटी अधिग्रहण कवायद का मतलब समझ में आने लगता है. होम ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की तीनों कड़ियां जुड़ने पर एक दिलचस्प तस्वीर उभरती है. कल्पना करें कि आप अपनी बैठक में टीवी देख रहे हैं. शाम का उजाला धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है और आपको लगता है कि बरामदे की लाइट जला लेनी चाहिए. अब न तो आपको उठ कर स्विच तक जाने की जरूरत है और न ही किसी और को हांक लगाने की. आप कहेंगे कि बरामदे की लाइट जला दो, और लाइट जल जाएगी. पंखे की रफ्तार कम करने के लिए आपको रेगुलेटर तक जाने की जरूरत नहीं है. बोलकर ही काम हो जाएगा. आप कहेंगे कि मैं कौन बनेगा करोड़पति सीजन-2 का आठवां एपीसोड देखना चाहता हूं और टीवी आपके हुक्म की तामील कर देगा. आप कहेंगे कि सबसे अच्छा डोसा कहां मिलता है, वहां चलते हैं और जब तक आप तैयार होकर गूगलकार में बैठेंगे आपका जीपीएस उस रेस्टोरेंट का रास्ता पता लगाकर कार को उस पर चलाने के लिए तैयार हो चुका होगा. आप सुबह उठेंगे और आपकी जरूरतों के लिए डिजाइन किया गया रोबोट जिसे गूगलबोट भी कहा जाएगा, आपके लिए चाय लेकर हाजिर होगा. किसी नई जगह पर आप अकेला महसूस कर रहे हैं तो गूगल ग्लास पहन लीजिए. इसमें लगी स्क्रीन एक ही नजर में सामने बैठे किसी व्यक्ति को स्कैन करके यह बता देगी कि उसका नाम क्या है और उसके शौक आपसे मिलते हैं या नहीं.
और यह सब किसी सुदूर भविष्य की बात नहीं है. हफमैन कहते हैं कि तकनीक की लगातार घटती लागत के चलते जल्द ही माइक्रोचिप और सेंसर सर्वसुलभ और सर्वव्यापी होंगे. इसके बाद आपकी आवाज को पहचानने वाली मशीनों का एक पूरा नेटवर्क आपके पर्सनल असिस्टेंट की तरह काम करेगा. कल अगर आपकी कोई फ्लाइट है और आपको उसके समय को लेकर दुविधा हो रही है तो जेब से फोन निकालने की भी जरूरत नहीं. आपको बस इतना कहना है कि मेरी फ्लाइट कब है और आपको जवाब मिल जाएगा. एक साक्षात्कार में हफमैन कहते हैं, ‘फ्लाइट आज ही हो और आप किसी काम में तल्लीन हों तो किसी निजी सहायक की तरह हमारा सिस्टम आपको बार-बार याद दिलाएगा कि आपको अब बगैर देर किए एयरपोर्ट के लिए निकल लेना चाहिए.’ हफमैन की ही अगुवाई में गूगल पूरे जोर-शोर से इस पेचीदा काम में लगा है कि ये मशीनें हमारी रोजमर्रा की भाषा को समझने के काबिल हो जाएं.
[box]
आवागमन
सिर्फ अमेरिका में ही सालाना करीब 5.5 अरब घंटे अलग-अलग वजहों से पैदा होने वाले ट्रैफिक जाम की भेंट चढ़ जाते हैं. प्रति व्यक्ति के हिसाब से यह बर्बादी हर साल 18 घंटे की होती है. इसके अलावा अमेरिका में हर व्यक्ति सालाना 100 से भी ज्यादा घंटे कार से इधर-उधर जाने में खर्च करता है. गूगल चाहता है कि लोग इस समय को उसकी सेवाओं पर खर्च करें. इसके अलावा अपने आप चलने वाली गूगल की कारें समय और ईंधन तो बचाएंगी ही, उनके चलते दुर्घटनाएं घटने से जान-माल के नुकसान में भी कमी आएगी.
[/box]
इसका मतलब यह है कि अभी हमारी दुनिया पर गूगल का जो असर है वह सिर्फ एक झलक है. आज इंटरनेट कंप्यूटरों का नेटवर्क है, लेकिन भविष्य में यह टीवी, फ्रिज, कार, रोबोट और ऐसी तमाम दूसरी मशीनों से मिलकर बना नेटवर्क होगा जिसकी विराटता और ताकत आज से कहीं ज्यादा होगी. एंड्रॉयड टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन या वैक्यूम क्लीनर अभी आम भले ही न हों, लेकिन आ चुके हैं. आप कहीं भी हों, इन्हें अपनी मर्जी से नियंत्रित कर सकते हैं.
जानकार मानते हैं कि इस सुविधा का फायदा हमसे कहीं ज्यादा गूगल को होगा और यह दोहरा होगा. एक तरफ उसके पास कंप्यूटर या फोन से इतर दूसरे स्रोतों से भी सूचनाएं आएंगी. दूसरी तरफ इन सूचनाओं से कमाई करने के लिए उसके पास मोबाइल और लैपटॉप के अलावा आपके टीवी, फ्रिज और दूसरे कई ऐसे ही माध्यम और होंगे. आज गूगल के कारोबार का ज्यादातर हिस्सा इंटरनेट पर सर्च के बूते आता है. लेकिन भविष्य में आपका एंड्रॉयड फ्रिज उसे यह बताएगा कि आप किस ब्रांड का जूस पसंद करते हैं. एंड्रॉयड टीवी के जरिये उसे यह पता लग जाएगा कि आप किस समय अपने टीवी पर क्या देखते हैं. इसके बाद वह अलग-अलग कारोबारियों को आपके खाने-पीने और मनोरंजन की आदतों के बारे में बताएगा. वह यह भी बताएगा कि आपको किस वक्त किस चीज की जरूरत है और आप तक किस चैनल के माध्यम से कब और कौन से विज्ञापन पहुंचाए जाने चाहिए. इसी तरह ड्राइवर विहीन कार बनाने में उसकी दिलचस्पी इसलिए भी है कि कार अपने आप चलती रहे, आप गूगल की सर्च या किसी और सेवा के साथ व्यस्त रहें और गूगल को आपकी पल-पल की खबर मिलती रहे.
इस तरह से देखें तो आखिर में गूगल की हर नई कवायद का मकसद वही है जो उसका पिछले 16 साल के दौरान रहा है–हमारे बारे में ज्यादा से ज्यादा सूचनाएं जुटाना और उनके बल पर अपना बल बढ़ाना.

जिस रफ्तार से गूगल बढ़ा है उसे कायम रखने के लिए यह भी जरूरी है कि वह दुनिया की बाकी दो तिहाई आबादी तक भी तेजी से पहुंचे. इसके लिए सबसे पहले तो उसे उस आबादी तक इंटरनेट पहुंचाने की जरूरत होगी. इसका इंतजाम भी वह कर रहा है. गूगल लून प्रोजेक्ट के तहत उसकी ऐसे गुब्बारे छोड़ने की योजना है जो दुर्गम से दुर्गम इलाकों में भी इंटरनेट उपलब्ध कराएंगे. धरती से 20 किलोमीटर ऊपर रहने वाले इन गुब्बारों में लगे उपकरण करीब 1250 वर्ग किलोमीटर इलाके में इंटरनेट की सुविधा पहुंचाएंगे. इसके सफल प्रयोग के तौर पर बीते साल न्यूजीलैंड में हीलियम भरे गुब्बारों की मदद से 50 घरों को इंटरनेट से जोड़ा भी जा चुका है. करीब 50 मीटर व्यास के इन गुब्बारों में सोलर पैनल लगा होता है जिससे मिलने वाली ऊर्जा से इनके उपकरण चलते हैं. यानी आज भले ही इंटरनेट विशेषाधिकार लगता हो, लेकिन भविष्य में यह बुनियादी सुविधा हो जाएगी. दूसरे शब्दों में कहें तो हमारी जिंदगी आज की तुलना में कहीं ज्यादा गूगल पर निर्भर हो जाएगी.
[box]
सेवा
अब गूगल की हो चुकी बोस्टन डायनेमिक्स को रोबोटिक्स के क्षेत्र में अपने असाधारण काम के लिए जाना जाता है. इस कंपनी ने अमेरिकी सेना के लिए बिग डॉग जैसा रोबोट बनाया है जो 150 किलो तक वजन लादकर किसी खच्चर की तरह उन रास्तों पर भी चल सकता है जिन पर पहियों वाला कोई वाहन नहीं चल सकता. इसी तरह एटलस जैसे उसके रोबोटों के बारे में माना जा रहा है कि भविष्य में वे खाना बनाने या घर की सफाई करने जैसे तमाम काम करेंगे. यानी ऑनलाइन और ऑफलाइन, दोनों ठिकानों पर गूगल का पूरा राज होगा.
[/box]
लेकिन हर देवता की तरह गूगल की कहानी में भी एक तरफ स्तुतियां हैं तो दूसरी तरफ आलोचनाएं भी हैं. एक बड़े वर्ग की शिकायत है कि गूगल हमारी याद्दाश्त खा रहा है. कई अध्ययन भी बता रहे हैं कि लोग गूगल को अपने मेमोरी बैंक की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. उनके लिए पहले से कुछ जानना जरूरी नहीं है. उन्हें पता है कि की बोर्ड पर टाइप करना है और सारी जानकारी हाजिर हो जाएगी. और यह सिर्फ स्मृति की बात नहीं है. ज्ञान की यह सर्वसुलभता एक सीमा के बाद ज्ञान के लिए ही घातक हुई जा रही है. जैसा कि अपने एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन कहते हैं, ‘चूंकि पहले से कुछ भी जानना जरूरी नहीं रह गया है, इसलिए सोचना और विचार करना, उद्वेलित होना और प्रश्न खड़े करना भी छूट गया है. अब बने-बनाए प्रश्न हैं जिनके बने-बनाए उत्तर हैं.’
हवाई जहाज और कार जैसे आविष्कार जब हुए थे तो कहा गया था कि इनके इस्तेमाल से बचने वाला समय मनुष्य अपने आप को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध करने में लगाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इन साधनों का उपयोग करने वाले वर्ग के पास समय की और भी कमी रहने लगी. ज्ञानरूपी महासागर की सर्वसुलभता को लेकर भी इस तरह की आशंका जताई जा रही है.
हालांकि दूसरा वर्ग ऐसी आशंकाओं को खारिज करता है. उसका मानना है कि तकनीक पर निर्भरता से पनप रहे इस तरह के डर निर्मूल हैं. इस वर्ग के लोग मानते हैं कि ऐसा ही डर तब भी जताया गया होगा जब भाषा लिखी जाने लगी. उससे पहले तक ज्ञान का विस्तार मौखिक रूप से ही हो रहा था तो कहा गया होगा कि लिखकर सुरक्षित कर लेने से याद रखने की जरूरत खत्म हो जाएगी और इस तरह सोचना और विचारना भी कम हो जाएगा. प्रिटिंग प्रेस के अविष्कार के बाद तो यह तर्क और भी बढ़ाचढाकर दिया गया होगा. लेकिन इसके बाद भी ज्ञान की नई-नई शाखाएं सिरजती प्रतिभाएं दुनिया का नक्शा बदलती रहीं.
गूगल का हमारे दिमाग पर क्या असर हो रहा है, इसे लेकर कोलंबिया विश्वविद्यालय ने कुछ समय पहले एक अध्ययन किया था. यह दूसरे वर्ग की बात का समर्थन करता दिखता है. इस अध्ययन का निष्कर्ष यह निकला कि दिमाग जरूरत के हिसाब से अनुकूलन कर लेता है. यानी गूगल इस्तेमाल करने वालों का दिमाग जानकारी की बजाय यह याद रखने लगता है कि उस जानकारी तक पहुंचना कैसे है औ उसे इस्तेमाल कैसे करना है. अध्ययनकर्ताओं को यह भी पता चला कि जो जानकारी गूगल पर उपलब्ध नहीं है, दिमाग द्वारा उसे याद रखने की संभावना भी ज्यादा है.
लेकिन सूचना की इस सुलभता से पैदा होने वाले सवाल यहीं खत्म नहीं होते. कहा जा रहा है कि गूगल-इफेक्ट की जद में आए लोगों में आपसी संवाद और भरोसा कम हो रहा है. वे अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और यहां तक कि डॉक्टर से भी ज्यादा भरोसा गूगल से मिलने वाली जानकारियों पर कर रहे हैं. जैसा कि कुछ समय पहले अखबार द हिंदू में प्रकाशित अपने एक लेख में डॉ टी रामाप्रसाद बताते हैं. तमिलनाडु के इरोड जिले में प्रैक्टिस करने वाले डॉ रामाप्रसाद के पास एक मरीज आया. उसे कुछ समय से बुखार और खांसी की शिकायत थी. चेकअप और कुछ परीक्षणों के बाद डॉक्टर ने उसे बताया कि उसे फेफड़ों की टीबी है. इसके बाद उन्होंने उसे कुछ दवाइयां दे दीं. लेकिन उस मरीज ने दवाइयां नहीं लीं. एक हफ्ते बाद वह डॉक्टर के पास वापस आया. इस दौरान उसने गूगल की मदद से फेफड़ों की टीबी पर काफी रिसर्च कर ली थी. उसने डॉक्टर से कहा कि उन्हें टीबी की पुष्टि के लिए और भी टेस्ट करने चाहिए. डॉक्टर रामाप्रसाद के मुताबिक उन्होंने मरीज को काफी समझाया कि उनका अनुभव उन्हें बता रहा है कि उसे टीबी ही है और जिन परीक्षणों की वह बात कर रहा है उन्हें हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गैरजरूरी बताया है. लेकिन वह मानने को तैयार नहीं था. इस चक्कर में कई दिन और निकल गए. इस दौरान उसकी हालत बिगड़ती चली गई और आखिर में उसे आईसीयू में भर्ती होना पड़ा.
गूगल की इस विराटता को लेकर और भी कई विवाद हैं. गूगल ग्लास को ही लें. चश्मे की तरह पहनी जाने वाली इस डिवाइस का प्रायोगिक इस्तेमाल शुरू हो गया है. स्मार्टफोन अगर कंप्यूटर को आपकी जेब में ले आया था तो गूगल ग्लास उसे आपके चश्मे में ले आया है. इसकी स्क्रीन आपको दायीं आंख के सामने दिखती रहेगी. आपके हुक्म की तामील यह आपकी आवाज सुनकर यानी वॉयस कंट्रोल के जरिये करेगी. अब आप सर्च करें, फोटो खींचें, वीडियो बनाएं या फिर उन्हें पोस्ट करें, बस बोलने की देर है. यानी दुनिया हर दम आपकी नजर में है.
[box]
स्वास्थ्य
2013 में गूगल ने कैलिको नाम की कंपनी खोलने की घोषणा की. गूगल के सहसंस्थापक लैरी पेज ने कहा कि इसका मकसद यह पता लगाना है कि बुढ़ापे को जितना हो सके टालकर व्यक्ति को दीर्घायु कैसे बनाया जा सकता है. गूगल के लिए यह कवायद कितनी अहमियत रखती है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कैलिको का मुखिया एप्पल के चेयरमैन ऑर्थर लेविंसन को बनाया गया. ज्ञान, आवागमन, सेवा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में गूगल की तैयारी बता देती है कि दुनिया पर उसका कब्जा लगातार बढ़ने वाला है.
[/box]
दिक्कत यही है. जानकारों के मुताबिक हर समय इंटरनेट की सुलभता ने पहले ही अटेंशन डेफिसिट सिंड्रोम यानी एकाग्रता की कमी जैसी समस्या पैदा कर दी है. गूगल ग्लास इसमें बढ़ोतरी ही करेगा. आप गूगल ग्लास पहने किसी व्यक्ति से बात कर रहे हों तो आपके लिए अंदाजा लगाना मुश्किल होगा कि उसका ध्यान पूरी तरह से आपकी बात पर है भी या नहीं. हो सकता है कि वह आपकी बात पर सिर हिला रहा हो और ध्यान फेसबुक पर लगाए हुए हो.
मुश्किल यही नहीं है. एक वर्ग है जिसका मानना है कि गूगल ग्लास के बाद निजता यानी प्राइवेसी में दखल की समस्या कई गुना बढ़ जाएगी क्योंकि आपको पता ही नहीं चलेगा कि आपकी फोटो ली जा रही है या आपका वीडियो रिकॉर्ड हो रहा है. हालांकि कई लोगों का मानना है कि गूगल ग्लास के आम होने के बाद कई जगहों पर इसे प्रतिबंधित भी किया जा सकता है, जैसे मोबाइल और कैमरे के मामले में होता है. लेकिन तब क्या होगा जब यह नजर के चश्मे का भी काम कर रहा हो?
सवाल डेटा के इस्तेमाल का भी है. माना जाता है कि सर्च, क्रोम, जीमेल, यूट्यूब, पिकासा और ऐसी तमाम सेवाओं के चलते गूगल के पास व्यक्तिगत जानकारियों का सबसे बड़ा भंडार है जिसका इस्तेमाल वह अपने कारोबार में करता है. लेकिन ऐसा वह कैसे करता है यह साफ नहीं है. यह डेटा गलत हाथ में न जाए, इसे लेकर उसकी नीति भी ठीक से स्पष्ट नहीं है.
ऐसे लोगों को गूगल का जवाब होता है कि वह यूजर की इजाजत के बिना न तो उससे जुड़ी व्यक्तिगत जानकारी इकट्ठा करता है और न ही उसे बेचता है. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि गूगल की अलग-अलग सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले लोग इस्तेमाल के वक्त नियम-कायदों के एक बड़े पहाड़ के आखिर में आने वाले ‘आई एग्री’ नाम के ऑइकन को बिना ज्यादा दिमाग लगाए क्लिक कर देते हैं. वैसे भी व्यक्तिगत जानकारी एक ऐसी चीज है जिसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा अभी तक नहीं बन पाई है.
तो ऐसे कई सवाल हैं जिनका ठीक-ठीक जवाब भविष्य ही दे सकता है. संभावित जवाब जानना चाहें तो आप बेशक गूगल सर्च कर सकते हैं.
कॉलेजियम असल में काम कैसे करता है
जब मैं सुप्रीम कोर्ट में जज था तब एक दिन लंच के समय जस्टिस कपाड़िया के चैंबर में गया. उस समय कपाड़िया (जिनका में उनकी ईमानदारी के लिए बेहद सम्मान करता था) सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के सदस्य थे और जस्टिस बालाकृष्णन सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस थे.
मैंने जस्टिस कपाड़िया से कहा कि हाई कोर्ट के एक चीफ जस्टिस जो इससे पहले मद्रास हाई कोर्ट में जज थे, अपनी ईमानदारी को लेकर काफी बदनाम थे. मुझे उनके बारे में इसलिए पता था क्योंकि मैं मद्रास हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस रह चुका था और चीफ जस्टिस को कई स्रोतों से सूचनाएं मिलती रहती हैं. इसके बाद मैंने उस जज के बारे में जस्टिस कपाड़िया को और भी जानकारियां दीं.
मैंने जस्टिस कपाड़िया से कहा कि मैंने सुना है कि इस जज को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त करने के बारे में विचार किया जा रहा है इसलिए मैंने सोचा कि यह मेरा फर्ज है कि उन्हें इस जज के बारे में बताऊं. अब यह उनके ऊपर है कि वे क्या करना चाहते हैं.
तब के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बालाकृष्णन को यह सूचना देने का कोई मतलब नहीं था क्योंकि जहां तक मेरी जानकारी थी वे खुद इस जज को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त करवाने के प्रयास कर रहे थे.
जस्टिस कपाड़िया ने इस सूचना के लिए मेरा आभार जताया और मुझसे अनुरोध किया कि मैं उन्हें इस तरह की जानकारियां देता रहा करूं.
जस्टिस कपाड़िया को मेरे द्वारा दी गई जानकारी के बाद भी कॉलेजियम ने इस जज की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति की सिफारिश कर दी. वे सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त हो भी जाते यदि तमिलनाडु के वकील उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन न करते. इन वकीलों ने उस जज के भ्रष्टाचार के सबूत भी उजागर किए थे जैसे कि बड़ी संख्या में जमीनों पर कब्जा करना. इसके बाद उन्हें सिक्किम स्थानांतरित कर दिया गया. बाद में संसद में उनके खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव भी लाया गया लेकिन इससे पहले कि वह संसद में पारित हो पाता उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.
इस घटना के लगभग एक साल बाद एक पार्टी में मेरी जस्टिस कपाड़िया से भेंट हुई. मैंने उनसे कहा कि एक साल पहले मैंने एक जज के बारे में उन्हें चेतावनी दी थी लेकिन उसपर कोई ध्यान ही नहीं दिया गया. मैंने उनसे कहा कि इसके चलते सुप्रीम कोर्ट को जबर्दस्त शर्मिंदगी झेलनी पड़ी.
जस्टिस कपाड़िया ने बताया कि उन्हें मेरी एक साल पहले कही गई बात याद है लेकिन सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस बालाकृष्णन उस भ्रष्ट जज को पदोन्नति देने पर अड़े हुए थे. उनका तर्क था कि वे पहले मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं और जानते हैं कि संबंधित जज पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप सही नहीं हैं.
इन्हें भी पढ़ें
जजों की नियुक्तिः बदलाव जरूरी हैं
कुछ जवाब जस्टिस काटजू को भी देने हैं.
हरेक बात पे कहते हो तुम कि…
चाट मसाला
पुराने जख्मों पर मारिए न किक भाई
सलमान किक से धूम मचा रहे हैं, निखिल आडवाणी से अपने बैनर की हीरो के कई दृश्य रीशूट करा रहे हैं, सानिया मिर्जा की ट्विटर पर तारीफ कर रहे हैं, परिवार संग ईद मना रहे हैं, लेकिन कैटरीना कैफ को नहीं भूल पा रहे हैं. और कैट से ज्यादा याद उन्हें उनकी कैट के ताजातरीन प्यार रणबीर कपूर आ रहे हैं. सुस्त नहीं चुस्त खबर है कि किक के आइटम सांग की शूटिंग के दौरान फ्री टाइम में भाई ने नरगिस फाखरी के राॅकस्टार हीरो रणबीर का जिक्र बार-बार छेड़ा और रणबीर की खूब बुराई की. उन्होंने नरगिस को भी चाभी मारी ताकि वे रणबीर के बारे में कुछ नया-बुरा बोलें, लेकिन नरगिस मासूम बनी रहीं, और लांछन के इस खेल के लालच में नहीं आईं. नरगिस का असहयोगात्मक रवैया देख सलमान ने उन्हें आगे से किसी फिल्म में न लेने का मन जरूर बना लिया होगा, लेकिन कैट की काटती यादों से भाई को लगती किक का इलाज कैसे होगा? शायद कैट की लुक-अलाइक से.
कंचों से मारेंगे करण, गर लिया पंगा
सितारे जब कबड्डी का लुत्फ ले रहे थे, करण जौहर कबड्डी खेलकर जीत रहे थे. खबर है कि पहले रोहित शेट्टी करण के लिए एक फिल्म बनाने वाले थे लेकिन शाहरुख से उनकी बढ़ती नजदीकियों से मुंह फुलाए बैठे करण ने उस डील पर कील मार दी. ऐसा ही हुआ रणवीर सिंह के साथ जिनके लिए अब धर्मा प्रोडक्शन्स के दरवाजे बंद हैं. रणवीर ने जिस दिन शुद्धि छोड़ भंसाली की बाजीराव मस्तानी साइन की थी, उसी दिन से करण उनके जानी दुश्मन बन गए, और जेब में कंचे लेकर चलने लगे. काश कि रणवीर इमरान खान का हश्र देख लेते. सालों से करण के पसंदीदा इमरान की तीन लगातार फ्लाप फिल्मों के बाद न सिर्फ करण ने उन्हें अपनी अगली फिल्म से बाहर किया, अपने दोस्त-यारों की फैंटम प्रोडक्शन्स की भावेश जोशी से भी किक आउट करा अपने करंट फेवरेट सिद्धार्थ मल्होत्रा को उसमें फिट करा दिया. कहीं कबड्डी टीम की तरह करण के सताए रणवीर-इमरान को कंचा खेलने वालों की टीम न खरीदने पड़ जाए, घर-परिवार का खर्चा निकालने के लिए.
न करते शोर-शराबा तो हनी सिंह क्या करते?
हनी सिंह के पास अभिनय की ऐसी परिभाषा है कि आप अमिताभ की फिल्में देखना छोड़ देंगे. कहते हैं कि अभिनय सामने खड़े अभिनेता की आंखों में आंखें डाल झूठ बोलने की कला है. और चूंकि वे लेखक-संगीतकार हैं इसलिए झूठ नहीं बोल सकते. इस ज्ञान की टंकी का टैप हनी ने इसलिए खोला ताकि ‘एक्सपोज’ में किया गया उनका गंदा अभिनय बहकर कहीं दूर निकल जाए, और वह ग्रैमी अवार्ड्स पर ज्ञान दे सकें. ‘सब कह रहे हैं मैं छा रहा हूं. क्या छा रहा हूं. ग्रैमी तो ला नहीं पा रहा हूं.’ आगे का ज्ञान और भी मजेदार है. ‘मार्टिन लूथर ने सपना देखा था तभी आज ओबामा प्रेसीडेंट हैं. मैंने भी सपना देखा है, अगर मैं नहीं ला पाया तो मेरे जैसा कोई और लाएगा ग्रैमी.’ प्रिय हनी, बस एक सवाल का जवाब दें. बप्पी लहरी ने नकल कर ढेर सारे ग्रैमी-छाप गाने बनाए थे, तो क्या अब बप्पा लहरी को ग्रैमी मिलने की संभावना प्रबल है? अगर हां, तो एक दिन आप की जगह शहद सिंह को ग्रैमी अवश्य मिलेगा. तथास्तु.
आरटीआई:सूचना! पूछ ना

आज से तकरीबन 130 साल पहले हिंदी के नामी साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ‘अंधेर नगरी’ नाम का एक नाटक लिखा था. व्यंगात्मक और रोचक प्रहसनों की भरमार वाले इस नाटक में एक आदमी अपनी बकरी के मरने की फरियाद लेकर राजदरबार में पहुंचता है और राजा से न्याय की गुहार लगाता है. उस व्यक्ति को मुआवजा दिलाने के बजाय राजा, बकरी की मौत के जिम्मेदार अपराधी का पता लगाने के लिए हास्यापद खोज का ऐसा सिलसिला शुरू करता है जो कल्लू बनिया नाम के दुकानदार से लेकर एक कारीगर, चूनेवाले, और गड़रिये से होते-होते अंतत: नगर के कोतवाल पर आकर थमता है. राजा कोतवाल को फांसी की सजा सुना देता है. पर इस बीच घटनाक्रम कुछ ऐसा घूमता है कि आखिर में राजा खुद ही फांसी पर चढ़ जाता है. इसके साथ ही नाटक समाप्त हो जाता है और बकरी की मौत पर न्याय मांगने आया फरियादी खाली हाथ रह जाता है.
उस दौर की अव्यवस्थित और अराजक प्रशासनिक व्यवस्था पर चोट करने वाले इस नाटक को लिखे आज एक सदी से भी ज्यादा का वक्त बीत चुका है. इस नाटक की भाषा में ही कहा जाए तो तब ‘एक टके’ में गली-नुक्कड़ों में आसानी से मिल जानेवाला सामान आज डॉलर और पाउंड की कीमत पर बड़े-बड़े शॉपिंग कांप्लेक्सों में मिलता है. लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था के मोर्चे पर तुलना की जाए तो ‘अंधेर नगरी’ वाला वह ‘चौपट राज’ आज भी उसी तरह कायम है. प्रशासन की तमाम इकाइयों में तब से ही घुस चुके अव्यवस्था के ये विषबीज अब सूचना का अधिकार (आरटीआई) नाम के उस कानून की अवधारणा पर चोट कर रहे हैं जिसे प्रशासन में पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय करने के उद्देश्य से साल 2005 में बड़े जोर-शोर से लागू किया गया था. देश-भर के अलग-अलग हिस्सों में इस कानून के तहत सूचना मांगने के ऐसे बहुत से मामले हैं जो भारतेंदु के उस नाटक को अक्षरश: चरितार्थ करते नजर आते हैं. यानी, सूचना चाहनेवाला फरियादी संबंधित विभाग में आवेदन लगाता है. इस पर सूचना देने के बजाय उस विभाग का सूचना अधिकारी आवेदन को एक विभाग से दूसरे, तीसरे और चौथे विभाग को सौंप देता है. तय सीमा से कहीं ज्यादा समय तक चलनेवाली इस आंखमिचौली के बाद भी जब सूचना नहीं मिलती है तो सूचना आयोग ‘राजा की फांसी’ की तरह सूचना अधिकारी पर जुर्माना ठोक देता है. इस तरह यह असली नाटक भी खत्म हो जाता है और यहां भी आवेदन करनेवाला फरियादी हाथ मलता रह जाता है.
‘सूचना अधिकार अधिनियम 2005’ के लागू होने से अब तक लगभग नौ साल की इस समयावधि में इसके प्रावधानों के तहत सूचना मांगे जाने पर सूचना न देने, आनाकानी करने, बहाना बनाने और आवेदनों को खारिज कर देने के ऐसे बहुत से मामले देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आ चुके हैं. ये मामले साफ तौर पर बताते हैं कि आरटीआई के तहत आवेदन करने पर पहली बार में ही सूचना हासिल करना किसी महाभारत लड़ने से कम नहीं है. इसके अलावा इन मामलों से यह भी पता चलता है कि किसी आवेदन को अलग-अलग विभागों की सैर पर भेज देने में खर्च होने वाले अतिरिक्त पैसे और समय की बर्बादी के चलते कई बार हासिल होने वाली सूचना सही होने के बावजूद भी रद्दी के अलावा किसी काम की नहीं रह जाती.
बात पिछले साल जून के महीने की है. उत्तराखंड के केदारनाथ समेत कई अन्य हिस्सों में आपदा ने भयंकर विनाशलीला मचाई थी. आपदा से हुए जानमाल के भारी भरकम नुकसान के लिए तब प्रदेश की सरकार को बहुत हद तक जिम्मेदार बताया जा रहा था. सरकार पर आरोप था कि आपदा से निपटने को लेकर उसकी तैयारियां पर्याप्त नहीं थीं. इन आरोपों की पड़ताल करने के लिए तहलका ने आठ जुलाई, 2013 को उत्तराखंड सरकार के मुख्यमंत्री कार्यालय में एक आरटीआई आवेदन लगाया. इसमें चार धाम यात्रा की तैयारियों को लेकर प्रदेश सरकार द्वारा पिछले तीन सालों में की गई बैठकों का ब्यौरा मांगा गया. आमतौर पर मुख्यमंत्री द्वारा की जाने वाली बैठकों का कार्यवृत्त तैयार किए जाने की जिम्मेदारी सीधे-सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय की होती है. इस लिहाज से देखा जाय तो उत्तराखंड के मुख्यमंत्री कार्यालय को अपने स्तर से यह सूचना प्रदान करनी थी. लेकिन मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस आवेदन पर सूचना देने के बजाय इसे प्रदेश के आपदा प्रबंधन विभाग तथा पर्यटन विभाग को सौंप दिया. इन दोनों विभागों ने कुछ जानकारियां देने के साथ अन्य जानकारियों के लिए आवेदन को आपदा एवं न्यूनीकरण अनुभाग, धर्मस्व एवं संस्कृति विभाग, चार धाम विकास प्राधिकरण तथा कुछ अन्य विभागों की तरफ सरका दिया. तकरीबन तीन महीने के बाद अलग-अलग विभागों से तहलका को जो जानकारी मिल पाई उसके मुताबिक चारधाम यात्रा की तैयारियों को लेकर सरकार का रवैया बेहद रस्मी था. आलम यह था कि 2011 में हुई बैठक के दौरान लिए गए बहुत से निर्णय दो साल बाद भी धरातल पर नहीं उतर सके थे. आपदा को लेकर सरकार के राहत कार्यक्रमों की पोल खोलने के लिहाज यह एक बेहद महत्वपूर्ण जानकारी थी. लेकिन सूचना मिलने में हुई देरी के कारण इसका औचित्य लगभग समाप्त हो चुका था.
इसी तरह का एक और मामला मध्यप्रदेश सरकार के मुख्य सचिव कार्यालय का भी है. तहलका ने पांच जुलाई, 2013 को मध्यप्रदेश के मुख्य सचिव कार्यालय से राज्य के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों तथा अन्य जनप्रतिनिधियों के खिलाफ हुई भ्रष्टाचार की शिकायतों की संख्या तथा उनको लेकर लोकायुक्त द्वारा की गई कार्रवाई पर सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी. कायदे के मुताबिक मुख्य सचिव कार्यालय को इस आवेदन के जवाब में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी अपने स्तर से देनी चाहिए थी. लेकिन मुख्य सचिव कार्यालय ने यह आवेदन मध्यप्रदेश के लोकायुक्त कार्यालय को सौंप दिया.
इसके बाद इस आवेदन के साथ जो कुछ हुआ वह भी बेहद हैरान करनेवाला है. लोकायुक्त कार्यालय ने इस पर कोई सूचना देने के बजाय इस आवेदन को यह कहकर अमान्य करार दिया कि इसमें क्यों, कैसे, और कितने जैसे प्रश्नावाचक शब्दों का प्रयोग किया गया है. कार्यालय का साफ कहना था कि प्रश्नवाचक भाव वाले आवेदनों का जवाब आरटीआई के तहत नहीं दिया जा सकता.
कई बार अधिकारी आवेदन को सिर्फ इसलिए अन्य विभागों को भेज देते हैं ताकि सूचना छिपाई जा सके. वे सूचना न देने के जुर्म से भी बच जाते हैं और आवेदक को सही सूचना भी नहीं मिलती
जिस ‘कितने’ शब्द पर आयोग के लोक सूचना अधिकारी को आपत्ति थी जरा उस पर भी नजर डाल लेते हैं. तहलका ने अपने सवाल में पूछा था कि, ‘जनवरी 2010 से अब तक लोकायुक्त के पास दर्ज हुई शिकायतों में जांच के बाद लोकायुक्त ने ‘कितने’ मामलों में आरोपितों को दोषी माना? तथा इन मामलों में से जन प्रतिनिधियों (राज्य के मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, राज्य मंत्रियों एवं विधायकों आदि) की संख्या ‘कितनी’ है?
दिल्ली विधानसभा चुनावः आप की चुस्ती, भाजपा की सुस्ती

पिछले कुछ दिनों से आम आदमी पार्टी के बार-बार बयान आ रहे हैं कि दिल्ली की विधानसभा भंग होनी चाहिए और तुरंत चुनाव कराए जाने चाहिए. अपनी मांग को लेकर वे हाल ही में दिल्ली के उपराज्यपाल से भी मिले. इस पर पार्टी ने अदालत में एक याचिका भी दायर की है और तीन अगस्त को जंतर-मंतर पर एक रैली भी आयोजित की गई. उसके नेताओं के व्यवहार से भी लग रहा है कि वे बड़ी जल्दी में हैं.
लेकिन वे इतनी जल्दी में क्यों हैं?
ऊपर से देखने में तो लगता है कि यदि आप को चुनावों के लिए थोड़ा समय मिल जाता है तो यह उसके लिए अच्छा ही होगा क्योंकि लोकसभा चुनाव के बाद उसकी हालत थोड़ी खराब है, उसके पास संसाधनों की कमी है, कार्यकर्ताओं का मनोबल काफी नीचे है और लगातार संघर्षों से वे कुछ थक भी चुके हैं.
लेकिन सतह को जरा खुरचें तो कई ऐसी कई वजहें हैं जो आम आदमी पार्टी को ऐसा करने के लिए मजबूर कर रही होंगी. पहली तो यही कि आप के शीर्ष नेतृत्व को लगता है कि यदि चुनाव जल्दी न हुए तो कहीं उनके विधायकों में से कुछ को भाजपा अपने पाले में न कर ले. ऐसा होने की आशंका लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद बहुत ज्यादा थी. उस वक्त पार्टी में पूरी तरह से निराशा का माहौल था और विधायक दुबारा चुनाव में जाने को लेकर हर तरह की आशंकाओं से घिरे हुए थे. अब इस तरह की आशंकाएं उस परिमाण में न भी हों तो भी इतनी तो हैं ही कि हर दो-चार दिन में नेतृत्व की नींद उड़ाती रहें.
दूसरी चिंता आप को कांग्रेस के विधायकों के भाजपा में मिल जाने को लेकर भी है. उन्हें लगता है कि इस समय उससे कहीं ज्यादा निराशा का माहौल कांग्रेस में है और उसके कुछ विधायक भाजपा में शामिल हो ही जाते अगर आप इसे लेकर हाल ही में जबर्दस्त हो-हल्ला न मचाती. आगे ऐसा नहीं होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है.
आप के नेताओं को लगता है कि अभी भाजपा उनकी पार्टी या फिर कांग्रेस में तोड़-फोड़ इसलिए नहीं कर रही है क्योंकि दो राज्यों –हरियाणा और महाराष्ट्र – में इसी साल चुनाव होने हैं और इसका असर उन पर पड़ सकता है. चूंकि ये चुनाव लोकसभा चुनावों और अमित शाह के अध्यक्ष बनने के बाद होने वाले पहले चुनाव हैं इसलिए भाजपा इनसे पहले अपनी छवि खराब करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती. एक बार चुनाव हो गए तो हो सकता है कि वह अपनी हिचक को उठाकर खूंटी पर टांग दे. उस हालत में अगर भाजपा ने किसी तरह की तोड़-फोड़ करके सरकार बना ली तो फिर केंद्र में भी उसकी मजबूत सरकार होने की स्थिति में उसका समय से पहले गिरना बड़ा मुश्किल होगा. तब दिल्ली में चार साल का इंतजार आम आदमी पार्टी के लिए बड़ा संकट पैदा कर सकता है. दिल्ली के अलावा पंजाब में भी आप के लिए थोड़ी संभावनाओं का जन्म हुआ है लेकिन वहां पर भी चुनाव होने में अभी तीन साल का समय है.
क्या आप की आशंका सही है कि भाजपा चुनाव जीतकर दिल्ली में सरकार बनाने के बजाय जोड़तोड़ की सरकार बनाने में ज्यादा इच्छुक है? अगर ऐसा है तो भाजपा के ऐसा चाहने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?
आप के सामने एक और समस्या यह भी हो सकती है कि तहलका की ही एक रिपोर्ट के मुताबिक उसके कार्यकर्ताओं ने पिछले दिनों बड़ी संख्या में उसका साथ छोड़ा है. ऐसे में सालों तक संघर्ष के लिए हजारों कार्यकर्ताओं को जोड़े रखना उसके लिए आसान नहीं होगा.
लेकिन अगर पूरी तरह तैयार न होते हुए भी आप तुरंत चुनाव करवाना चाह रही है तो भाजपा इसका फायदा उठाने को तैयार क्यों नहीं है? क्या आप की आशंका सही है कि भाजपा चुनाव जीतकर दिल्ली में सरकार बनाने की बजाय जोड़ तोड़ की सरकार बनाने में ज्यादा इच्छुक है? अगर ऐसा है तो भाजपा के ऐसा चाहने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?
दरअसल आनेवाले समय में जिन भी राज्यों में चुनाव होनेवाले हैं या हो सकते हैं उनमें दिल्ली ही ऐसा है जहां आप के रूप में एक मजबूत विपक्ष भाजपा के सामने है. हाल ही में उत्तराखंड में हुए उपचुनाव भी बताते हैं कि जरूरी नहीं है कि क्षेत्रीय चुनावों में भी मोदी का जादू उतना ही चले जितना लोकसभा चुनावों में चला था. ऊपर से दिल्ली में पार्टी के सामने नेतृत्व की समस्या भी है. पिछले एक साल से भी कम समय में इस प्रदेश ने तीन-तीन पार्टी अध्यक्षों को देखा है. दिल्ली प्रदेश भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष सतीश उपाध्याय का नाम अध्यक्ष बनने से पहले ज्यादातर लोगों ने नहीं सुना था. दिल्ली में पार्टी का सबसे विश्वसनीय चेहरा रहे डॉक्टर हर्षवर्धन एक ऐसी सरकार के कैबिनेट मंत्री हैं जिसमें एक-एक मंत्री कई-कई महत्वपूर्ण विभागों का काम संभाल रहे हैं. इन वजहों से दिल्ली में पार्टी संगठन की हालत फिलहाल जैसी है उसके चलते भाजपा के विधायक भी जल्द चुनाव में नहीं जाना चाहते.
जिन राज्यों में इसी साल चुनाव होने हैं उनमें महाराष्ट्र और हरियाणा तो हैं ही बिहार और उत्तर प्रदेश में होनेवाले उपचुनाव भी हैं. कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा की सरकार अगर केंद्र में इतने जबर्दस्त बहुमत के साथ है तो उत्तर प्रदेश, बिहार इसकी सबसे बड़ी वजहों में से हैं. यहां की करीब 10-10 सीटों पर उपचुनाव होने हैं. वैसे तो उपचुनाव ज्यादातर सत्तासीन दल के पक्ष में जाते देखे गए हैं लेकिन जिस तरह की स्थितियां इन दो राज्यों में भाजपा के लिए बन गईं हैं उनके चलते इनका भी जबर्दस्त प्रतीकात्मक महत्व उसके लिए हो गया है.
जैसाकि आप को भी लगता है कि भाजपा अभी दिल्ली में ऐसा कुछ नहीं करना चाहती जिसका जरा भी बुरा असर चुनावों में जानेवाले राज्यों पर पड़े. लेकिन जरूरी हुआ तो इन राज्यों के चुनावों के बाद वह जोड़-जुगत से भी सरकार बनाने की सोच सकती है.
इसके अलावा भाजपा नेतृत्व और सरकार में एक सोच यह भी बन रही है कि कुछ समय में कई मोर्चों पर सरकार जो काम कर रही है उसके परिणाम आने शुरू हो जाएंगे जिससे उसके पक्ष में सकारात्मक माहौल बन सकता है. अभी महंगाई की दर काफी ऊपर है जो आने वाले समय में अपने आप और थोड़ा उसके प्रयासों से नीचे आ सकती है. भाजपा की केंद्र सरकार को लगता है कि भले ही वह केंद्रीय बजट के जरिये जनता में पिछली सरकार से खुद के अलग होने का संदेश मजबूती से नहीं दे पाई हो लेकिन आनेवाले समय में वह नए कानून बनाकर, अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए जरूरी नये कदम उठाकर और निर्णय लेनेवाली सरकार बन-दिखकर सकारात्मक संदेश देने में सफल रहेगी.
भाजपा के अंदर एक सोच यह भी है कि अगर उसे आम आदमी पार्टी के भूत से हमेशा के लिए निजात पाना है तो ऐसा उसे दिल्ली में पटखनी देकर ही किया जा सकता है. नहीं तो वह बिलकुल केंद्र सरकार की नाक के नीचे एक ऐसा तिनका साबित हो सकती है जो वक्त-बेवक्त उसे असहज और उसके व्यवहार को असंतुलित बनाता रहे. भले ही दिल्ली एक पूरा राज्य न हो लेकिन यहां सत्तासीन होने का एक अपना सांकेतिक महत्व भी है. इन्हीं सब वजहों से यहां पार्टी एक नहीं बल्कि 10 बार फूंककर कदम रखते दिख रही है.
(इस लेख के कुछ हिस्से ‘केजरीवाल इतनी जल्दी में क्यों हैं’ शीर्षक से वेबसाइट पर प्रकाशित हो चुके हैं.)
यह भी पढ़ें
‘लोग संगठन बनाकर चुनाव लड़ते हैं हमने चुनाव के जरिए संगठन बनाया है’ :- आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया से बातचीत
गाजा संकट से उपजे सवाल

गाजा पट्टी में एक बार फिर निर्दोष नागरिकों का खून बह रहा है. हर दिन मरनेवालों की तादाद बढ़ती ही जा रही है. जुलाई के दूसरे सप्ताह से फलीस्तीनी इलाकों पर जारी अंधाधुंध इजरायली हवाई हमलों में अब तक एक हजार से ज्यादा फलीस्तीनी मारे जा चुके हैं और छह हजार से ज्यादा घायल हैं. संयुक्त राष्ट्र की मानवीय मामलों की समन्वय समिति (यूएनओसीएचए) के मुताबिक, मारे गए लोगों में 760 से अधिक निर्दोष नागरिक हैं जिनमें से 362 महिलाएं या बच्चे हैं. समिति के अनुसार, ‘गाजा पट्टी में नागरिकों के लिए कोई भी जगह सुरक्षित नहीं है.’
यानी गाजा पट्टी और फलीस्तीनी नागरिक पिछले कुछ वर्षों की सबसे गंभीर मानवीय त्रासदी से गुजर रहे हैं. दूसरी ओर, दुनिया के अनेकों देशों में इजराइली हमलों के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शन हुए और हो रहे हैं. जाहिर है कि यह खबर दुनिया-भर के न्यूज मीडिया- चैनलों और अखबारों में छाई हुई है. यूक्रेन में मलेशियाई यात्री विमान के मार गिराए जाने और ईराक में इस्लामी विद्रोहियों की सैन्य बढ़त जैसी बड़ी खबरों के बावजूद गाजा में इजरायली हमले की खबर दुनिया-भर में सुर्खियों में बनी हुई है. खासकर विकसित पश्चिमी देशों के बड़े समाचार समूहों के अलावा कई-कई रिपोर्टर और टीमें गाजा और इजरायल से इसकी चौबीसों घंटे रिपोर्टिंग कर रही हैं. चैनलों पर लगातार चर्चाएं और बहसें हो रही हैं. अखबारों में मत और टिप्पणियां छप रही हैं. पश्चिमी देशों के अलावा अरब देशों के अल जजीरा जैसे चैनलों के अलावा चीन सहित कई विकासशील देशों के चैनल और अखबार भी अपने संवाददाताओं के जरिये गाजा संकट की लगातार रिपोर्टिंग कर रहे हैं. अब सवाल यह है कि दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और खुद के लिए सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता की मांग कर रहे भारत के अखबार और चैनल गाजा संकट को कैसे कवर कर रहे हैं?
हालांकि भारतीय अखबारों और चैनलों में भी यह खबर लगातार चल और छप रही है लेकिन उस तरह कवर नहीं हो रही जैसे पश्चिमी देशों या अल जजीरा जैसे चैनल और चीन जैसे देशों का न्यूज मीडिया इसे कवर कर रहा है. इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि किसी भी चैनल या अखबार ने गाजा में अपने रिपोर्टर या कैमरा टीमें नहीं भेजीं. आखिर क्यों? यही नहीं, दो सप्ताह से जारी संघर्ष और हमलों की रिपोर्टें ज्यादातर मौकों पर चैनलों की फटाफट या न्यूज हंड्रेड में ‘रूटीन खबर’ की तरह शामिल की गईं. अखबारों में उन्हें अंदर के पन्नों में जगह मिली.
बिना अपवाद सभी अखबार और चैनल पश्चिमी एजेंसियों और अखबारों की रिपोर्टों को छापते/दिखाते रहे. इन रिपोर्टों और विश्लेषणों में दबे-छिपे और कई बार खुलकर इजरायल के पक्ष में झुका पश्चिमी नजरिया और झुकाव साफ देखा जा सकता है. हालांकि भारतीय जनमत का एक बड़ा हिस्सा ऐतिहासिक रूप से फलीस्तीन के साथ रहा है और इजरायल के रवैय्ये की आलोचना करता रहा है. अफसोस कि भारतीय संसद में गाजा मुद्दे पर चर्चा कराने को लेकर विपक्ष और सरकार के बीच हुई तकरार के बाद कई चैनलों पर हुई बड़ी बहसों/चर्चाओं में भाजपा/शिव सेना के प्रतिनिधियों की मौजूदगी के कारण जाने-अनजाने एक सांप्रदायिक अंडरटोन भी दिखाई पड़ा.
कहने की जरूरत नहीं है कि एक बार फिर भारतीय न्यूज मीडिया गाजा जैसी बड़ी वैश्विक त्रासदी की खबर को स्वतंत्र और सुसंगत तरीके से कवर करने में नाकाम रहा. और गाजा ही क्यों, ईराक में कट्टर इस्लामी संगठन- आईएसआईएस की बढ़त और यूक्रेन संकट जैसे वैश्विक महत्व की खबरों की स्वतंत्र, गहरी, ऑन-स्पॉट और व्यापक कवरेज के मामले में भारतीय न्यूज मीडिया का बौनापन साफ दिख जाता है. भारत को वैश्विक महाशक्ति का दर्जा देने का राग अलापनेवाला भारतीय न्यूज मीडिया अपने दर्शकों/पाठकों को वैश्विक महत्व के बड़े मसलों की स्वतंत्र, गहरी, ऑन-स्पॉट रिपोर्टिंग और विश्लेषण पेश करने का साहस और तैयारी कब दिखाएगा?
‘लोग संगठन बनाकर चुनाव लड़ते हैं हमने चुनाव के जरिए संगठन बनाया है’

दिल्ली के चुनाव को लेकर आपकी पार्टी इतनी जल्दबाजी में क्यों हैं ?
जल्दबाजी चुनाव को लेकर नहीं है. दिल्ली में हो क्या रहा है कि एक अभिभावक को अपने बच्चों के स्कूल में एडमिशन के लिए एमएलए का चक्कर लगाना पड़ रहा है. ब्यूरोक्रेसी अपने हिसाब से चल रही है. दिल्ली को एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार की तुरंत जरूरत है. सब एक-दूसरे पर टाल रहे हैं. बिजली-पानी की स्थिति खराब हो गई है. राजनीतिक नेतृत्व का आना जरूरी है. नेतृत्व का खालीपन हो गया है. कितनी देर तक यह राजनीतिक खालीपन को बनाए रखेंगे. दिल्ली को एक चुनी हुई सरकार की जरूरत है.
कुछ लोगों का कहना है कि अगर आप चुनाव थोड़ा और टाले तो उसे ही फायदा होगा. कुछ दूसरे लोगों का मानना है कि आपके कार्यकर्ता हड़बड़ी में हैं, कुछ छोड़कर जा रहे है वे परेशान हैं. अगर यह ज्यादा समय तक टलेगा तो आपके लिए उन्हें बनाए रखना बड़ा मुश्किल होगा.
कार्यकर्ता देश बदलने के लिए आए हैं. वे तो चुनाव से पहले आए थे. चुनाव के बाद वे दूसरी तरह से काम करेंगे.
उनमें से कई लोग बहुत निराश हैं. एक तो जिस तरह से दिल्ली की सरकार से आप हटे और बाद में जिस तरह से आप कार्यकर्ताओं को पहले निर्णय की प्रक्रिया में शामिल करते थे अब वैसा नहीं रहा. इसको लेकर कार्यकर्ताओं में काफी नाराजगी है.
हो सकता है कि कुछ लोगों मे ऐसा हो. जैसे-जैसे लोगों की संख्या बढ़ेगी इस तरह की कुछ बातें होंगी. आज जो कार्यकर्ता हमारे साथ खड़ा है वह दूसरी भूमिका में है. कल अगर सरकार बनती है तो वह दूसरी भूमिका में हमारे साथ खड़ा होगा. काम तो कार्यकर्ता ही करेगा. पर हमारे दिमाग में वह बात नहीं है. हमारे सामने स्थिति साफ होनी चाहिए. अगर उपराज्यपाल का ही शासन रहना है तो वही साफ कर दिया जाय.
राजनीतिक लाभ की निगाह से देखें तो आपको नहीं लगता कि थोड़ा और समय लिया जाय तो आप लोगों को और अच्छी तरह से समझा पाएंगे.
मुझे लगता है कि इसकी कोई लिमिट नहीं है. यह तो परीक्षा देनेवाले बच्चे जैसी स्थिति है. वह चाहता है कि दो दिन और मिल जाते तो थोड़ा और तैयारी हो जाती पर यह तो कोई समाधान नहीं है.
कार्यकर्ताओं का जो मामला है वह बड़ी समस्या है. लोकसभा चुनावों में हार के बाद कंस्टीट्यूशन क्लब में हुई बैठक में आप लोगों ने एक रिड्रेशल कमेटी बनाई थी. उसका क्या हुआ. उन्होंने क्या सुझाव दिए?
वह सुझाव देने के लिए नहीं थी. वे सारी चीजें मिशन विस्तार के तहत जोड़ दी गई हैं. मिशन विस्तार के तहत पूरे देश में जो लोग जुड़ते हैं उन्हें जिम्मेदारियां दी जाती हैं.
पर जो खबरें आ रही हैं वह चिंताजनक हैं. जिस करन को आप लोगों ने वालंटियर रिड्रेसल कमेटी की जिम्मेदारी सौंपी थी अब उसे ही बाहर का रास्ता दिखा दिया है. उसके सुझाव को आपने खारिज कर दिया.
करन का काम सुझाव देना नहीं था. करन का काम ये था कि ऑफिस में जो कार्यकर्ता आते हैं उन्हें शीर्ष नेताओं के साथ जोड़ना था. लोगों के बीच में कम्युनिकेट करना था. करन ने थोड़ी-सी गलतियां की. उसे लगा कि उसका काम जगह-जगह जाकर सिर्फ वालंटियर को जोड़ना रह गया है. उसने कई विधानसभाओं में जाकर मीटिंग करनी शुरू कर दी, फिर कुछ और ऐसी एक्टिविटी की जो पार्टी के लिए ठीक नहीं थी तो इस वजह से उसे निकालने का फैसला करना पड़ा. कंस्टीट्यूशन क्लब में जो फैसला हुआ था उसका मकसद यह था कि सेंट्रल ऑफिस में एक टीम होगी जो देश-भर से जुड़ रहे नए लोगों को अलग-अलग कमेटियों और विभागों से जोड़ने और उन्हें डायवर्ट करने का काम करेगी. ताकि कोई अनअटेंडेड न रहे. किसी को यह अहसास न हो कि वह हमसे जुड़ना चाहता था लेकिन किसी ने उसे एंटरटेन ही नहीं किया गया.
अब लोगों के जुड़ने का सिलसिला कैसा चल रहा है. विधानसभा चुनाव के बाद तो हर व्यक्ति आप से जुड़ना चाहता था.
दो तरह के लोग हमेशा जुड़ते हैं. एक तो पार्टी जब चुनाव जीत रही होती है तब ऐसे लोग जुड़ना चाहते हैं जिन्हें लगता है कि कुछ अच्छा काम करना है और यह पार्टी उनका मकसद पूरा कर सकती है. दूसरे वे लोग होते हैं जो राजनीति में करियर बनाना चाहते हैं, टिकट पाना चाहते हैं. जो लोग करियर की इच्छा लेकर आते हैं वे तो बाद में निकल लेते हैं. जो लोग देश बदलने की इच्छा लेकर आते हैं उन्हें पता है कि यह रास्ता इतना आसान नहीं है.
तो आपको लगता है कि अब भले ही कम लोग जुड़ रहे हैं लेकिन जो लोग जुड़ रहे हैं वे ठोस और अच्छी नीयत से जुड़ने वाले लोग हैं.
कम या ज्यादा का सवाल नहीं है. इस समय हमारी कोई एनरोलमेंट की ड्राइव नहीं चल रही है. आज भी लोग हर दिन आते हैं मेरे दफ्तर में जो हमसे जुड़ना चाहते हैं.
पर अब वैसी बड़ी खबरे नहीं आ रही हैं कि कैप्टन गोपीनाथ जुड़ रहे हैं, बालाकृष्णन जुड़ रहे हैं. अब इसके उलट खबरें आ रही हैं कि शाजिया इल्मी जा रही हैं, योगेंद्र यादव जा रहे हैं. ये नकारात्मक खबरें ज्यादा आ रही हैं.
देखिए जब पार्टी ऊपर जा रही होती है तब लोग आते हैं. जब पार्टी नीचे जाती है तब लोग जाने लगते हैं. यह तो प्रकृति का नियम है.
कार्यकर्ताओ का तो हम नहीं आंक सकते लेकिन वेबसाइट के माध्यम से डोनेशन मिलने की जो रफ्तार है उसका अंदाजा तो मिल ही जाता है.
नहीं उसमे भी लोगों को एक गलतफहमी है. आम आदमी पार्टी ने हमेशा ड्राइव चलाया है. हमने हमेशा लोगों को कॉल दी है कि हम चुनाव लड़ना चाहते हैं या हम फलाना काम करना चाहते हैं हमे पैसे की जरूरत है. उसमें भी हम एक कैंप लगाकर चलते हैं कि इस सीमा से ऊपर हमें डोनेशन नहीं चाहिए. आपको याद होगा हमने दिल्ली के चुनाव में 20 करोड़ रुपये पर कैप लगा दी थी. अब हमने कोई काल ही नहीं कर रखी है. अब आगे अगर कोई चुनाव होगा तब हम लोगो को कॉल करेंगे कि हमें पैसे की जरूरत है.
हालांकि आपने लोकसभा में कोई कैप नहीं लगाई थी पर शायद वह ड्राइव इतनी सफल नहीं रही.
हां लोकसभा में हमने नहीं लगाया था.
अच्छा हम पार्टी के अंदरूनी लोकतंत्र पर लौटते हैं. यह बात बार-बार आ रही है कि पार्टी के भीतर लोकतंत्र का अभाव है. यही बात शाजिया के मामले में आई, योगेंद्र यादव यही बात कह रहे थे. योगेंद्र यादव ने जो मुद्दे उठाए उस पर आपका लिखा जवाब सामने आया था. उस पत्र में योगेंद्र यादव के उठाए मुद्दों का जवाब नहीं था बल्कि कहीं न कहीं ऐसा लग रहा था कि आप थोड़ा पर्सनल हो गए थे.
देखिए हमारी पार्टी अभी शुरुआती अवस्था में है. इस दशा में कुछ गलतियां होंगी, कुछ बदलाव होंगे. कुछ अच्छे काम भी होंगे. शाजिया ने जो मुद्दे उठाए मैं बहुत सारे मुद्दों से सहमत हूं. आप इसे इवॉल्यूशन से जोड़कर देखिए कि पहले कुल पंद्रह-बीस लोग थे दिल्ली में वही लोग हर कमेटी में काम कर रहे थे. वही मेनिफेस्टो कमेटी में थे, वही लोग सिलेक्शन कमेटी में होते थे, वही लोग अलग-अलग कमेटियों में होते थे. आज पार्टी बहुत बड़ी हो गई है. इसके पास 27 एमएलए, चार एमपी, तीन सौ उम्मीदवार हैं जिनमें से कई बहुत हाई प्रोफाइल लोग हैं. अब हम उस स्थिति में है कि जिम्मेदारियों को बांटकर जो तथाकथित कोटरियां है उन्हें तोड़ सकें. आज कर्नाटक मे रहने वाले पृथ्वी रेड्डी संगठन के सबसे प्रमुख व्यक्ति बन गए हैं. आज से डेढ़ साल पहले कहते तो शायद ही बन पाते.
आपने कहा कि शाजिया के कुछ मुद्दों से आप सहमत हैं. योगेंद्र यादव ने भी लगभग उसी तरह के मामले उठाए थे. पर आपने उनका जवाब काफी व्यक्तिगत स्तर पर जाकर दिया.
देखिए योगेंद्र भाई के पत्र का मैंने जवाब नहीं दिया था. वो आप लोगों का इंटरप्रेटेशन है. वह असल में 35 लोगों के बीच चल रही चर्चा थी. उसमें योगेंद्र भाई ने कुछ कहा, मैंने कुछ कहा दस और लोगों ने कुछ कहा होगा. उसका लीक होना दुर्भाग्यपूर्ण है. उसमें जो कुछ कहा गया मेरा मानना है कि वह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए बहुत जरूरी है. जब हम 35 लोग ग्रुप में बैठते हैं तो हम 35 तरह की बातें भी कर सकते हैं और एक तरह की भी. अब बाद में कोई सिर्फ दो लोगों की बात को उठाकर इस तरह से उसकी व्याख्या करे तो यह ठीक नहीं है. योगेंद्र भाई और मेरे बीच जो चर्चा हुई वह असल में 35 लोगों के बीच चल रहा एक जीमेल डिस्कशन था. हमारे बीच में कोई गलतफहमी नहीं है.
लेकिन योगेंद्र यादव ने जो सवाल उठाए थे वे हम आपके सामने रख रहे हैं क्योंकि वह सवाल फिर भी महत्वपूर्ण हैं. उनका कहना था कि लोकसभा चुनाव के बाद सिर्फ लोकल यूनिटों को भंग कर देना ठीक नहीं है, जवाबदेही ऊपर तक तय होनी चाहिए. वरना पार्टी में हाई कमान कल्चर की नींव पड़ जाएगी. यह तो कांग्रेसी संस्कृति हो गई कि आप कोई चुनाव जीत गए तो गांधी परिवार की वजह से और हार गए तो लोकल लीडरशिप और कार्यकर्ता जिम्मेदार हैं. जिम्मेदारी मनीष सिसोदिया से लेकर अरविंद केजरीवाल तक सबकी होनी चाहिए थी या नहीं.
पहली बात वह लेटर नहीं है वह हमारे बीच की बातचीत है. अरविंद ने कुछ कहा, मैंने कुछ कहा योगेंद्र भाई ने कुछ कहा. वो सब चीजें जब पार्टी के भीतर 35 लोग तय कर लेते हैं तब वह पार्टी का निर्णय बनता है. वह एक बहुत प्रीमेच्योर बातचीत को सिलेक्टिवली उठा लिया गया है. मान लीजिए आपकी किसी मुद्दे पर एक सोच थी. आप आए, मुझसे बातचीत की और आपकी सोच बदल गई कि हां भाई यह बात ज्यादा सही है. अरविंद ने या किसी और वरिष्ठ नेता ने अपना एक नजरिया रखा था वह यूनिटों को भंग करने का फैसला नहीं था. अब उस पर योगेंद्र भाई ने अपना विचार रखा. अब सिर्फ योगेंद्र भाई के किसी विचार को लीडरशिप के ऊपर हमले जैसा परसेप्शन बनाएंगे तो यह ठीक बात नहीं है.


