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अग्निवेश से हो सकती है पूछताछ

Swami Agnivesh
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स्वामी अग्निवेश
स्वामी अग्निवेश

माओवादियों से कथित सांठगांठ रखने के मामले में स्वामी अग्निवेश की मुसीबतें बढ़ सकती हैं. अग्निवेश और माओवादी नेताओं के कुछ वीडियो पुलिस के हाथ लगे हैं. इसी को आधार बनाकर छत्तीसगढ़ पुलिस जल्द ही स्वामी अग्निवेश से माओवादियों से मेलजोल रखने के मुद्दे पर पूछताछ कर सकती है.

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में नारायणपुर पुलिस ने नौ अगस्त को नक्सलियों के शहरी नेटवर्क को संचालित करने वाली महिला नक्सली सोनी उर्फ श्यामवती और उसकी सहयोगी जलदोई को गिरफ्तार किया है. सोनी ने पुलिस और स्टेट इंटेलीजेंस ब्यूरो (एसआईबी) की पूछताछ में कई अहम खुलासे किए हैं. श्यामवती से मिली जानकारी के आधार पर एसआईबी की टीम राजधानी के औद्योगिक क्षेत्र उरला, सिलतरा और भनपुरी की कई कंपनियों की जांच की तैयारी में है. पुलिस मुख्यालय (पीएचक्यू) के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, कांकेर, कोंडागांव, सुकमा, दंतेवाड़ा के कई नक्सली कमांडर नाम और पहचान बदलकर औद्योगिक क्षेत्रों में शरण लिए हुए हैं.

पीएचक्यू सूत्रों के मुताबिक श्यामवती की गिरफ्तारी के वक्त एसआईबी के हाथ कई वीडियो भी लगे हैं. जिनमें स्वामी अग्निवेश महिला नक्सली श्यामवती के साथ नजर आ रहे हैं. अब इसे आधार बनाकर पुलिस आगे की कार्रवाई करने की तैयारी में है. खबर है कि सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश से पूछताछ की तैयारी चल रही है.

इस बारे में स्वामी अग्निवेश तहलका से बात करते हुए कहते हैं, ‘ मुझे अब तक छत्तीसगढ़ सरकार या पुलिस की तरफ से कोई पत्र नहीं मिला है. इसलिए इस विषय पर अनावश्यक बोलने की जरूरत मैं नहीं समझता.’

चेतना नाट्य मंडली की अध्यक्ष श्यामवती के खिलाफ नारायणपुर थाना छोटेडोंगर में चार मामले दर्ज हैं. नारायणपुर एसपी अमित तुकाराम कांबले का कहना है कि उसके खिलाफ एक स्थाई वारंट भी लबित है और श्यामवती पर राज्य सरकार ने एक लाख रुपए व कोंडागांव पुलिस ने दस हजार का इनाम भी घोषित कर रखा था.

बताया जाता है कि आठवीं तक पढ़ी महिला नक्सली सोनी उर्फ श्यामवती स्कूल की पढ़ाई छोड़कर माओवादियों के साथ जुड़ गई थी. सन् 2000 में डौला दलम के महिला नक्सली कमांडर फूलवती ने उसे अपने संगठन में शामिल किया. 2000-04 तक वह डौला लोकल ऑपरेटिंग स्क्वैड (एलओएस) की सदस्य रही और 2004-09 तक कुदूर एलओएस की साथ.

पुलिस के मुताबिक नक्सली नेता श्यामवती ने जानकारी दी है कि वह लगातार और सीधे तौर पर सेंट्रल कमेटी के सचिव गणपति, भूपति, कोसा, राजू उर्फ गुडसे उसेंडी के संपर्क में रहती थी और उनके निर्देशों पर काम करती थी.

एडीजी नक्सल ऑपरेशन आरके विज जानकारी देते हैं, ‘गिरफ्तार दोनों महिला नक्सलियों पर सीआरपीएफ कैंप पर हमला, झाराघाटी पहाड़ी के पास सीआरपीएफ पार्टी पर हमला, नारायणपुर में पुलिस पार्टी पर हमला, विधानसभा चुनाव के दौरान हर्राकोडेर में पुलिस पार्टी पर हमला और मतदान पेटी लूटने के लिए फायरिंग करने के संगीन आरोप हैं. इन लोगों ने टेटम में सीआरपीएफ पार्टी पर भी हमला किया था.’

‘50 रुपये में जीवन-भर का सबक मिला’

मनीषा यादव

अतीत के पन्नों में कई किस्से ऐसे दर्ज होते हैं जिन्हें हम ताउम्र नहीं भूल पाते हैं. ये किस्से जिंदगी के वे आईने होते हैं जो इंसान को उसकी असलियत से रूबरू कराते हैं और अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने का रास्ता दिखाते हैं. ऐसा ही एक किस्सा मेरे जेहन में आता है जिसने मुझे एक बेहतर इंसान बनने का रास्ता दिखाया. साल 2001 की बात है. जिंदगी कुछ बेतरतीब-सी चल रही थी. मैंने बारहवीं कक्षा की परीक्षा दी थी. पर्चे बहुत अच्छे नहीं हुए थे. जिंदगी मानों ठहर गई थी. मन बहुत उदास था और उस उदासी की लकीरें चेहरे पर भी नजर आने लगीं थीं. पिताजी ने मेरी हालत देखी तो कहा कि कहीं घूम-फिर आओ, मन बदल जाएगा. अगले ही दिन उन्होंने मेरा देहरादून जाने का रिजर्वेशन करा दिया. मेरे पास भी करने को कुछ और नहीं था तो मैंने भी बैग उठाया और निकल पड़ा सफर पर. जीवन में पहली बार ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों और वादियों को देखकर यह एहसास हुआ की खूबसूरती आकार की मोहताज नहीं होती. यही बात शायद जिंदगी पर भी लागू होती है.

देहारादून, हरिद्वार और ऋषिकेश घूमने के बाद मेरा आखिरी पड़ाव था मसूरी. मैंने देहरादून से मसूरी जाने के लिए बस पकड़ी. सफर शुरू हुआ. मेरे बगल की सीट पर मुझसे उम्र में थोड़ा ही बड़ा एक लड़का बैठा हुआ था. शायद वह वहीं आस-पास का रहनेवाला था. उसके पहनावे को देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि वह किसी साधारण परिवार से था. वह हमारे देश की उस भीड़ का हिस्सा था जिसकी ओर किसी का भी ध्यान नहीं जाता है. मुझे भी वह शायद याद नहीं रहता यदि यह घटना न घटी होती. बस मानो तेजी से आकाश की ओर बढ़ती जा रही थी और बाहर के नजारे और मनमोहक होते जा रहे थे. मैं भी उन्हीं में खो गया. जब बस मसूरी पहुंची तो मेरा बस से उतारने का मन नहीं हो रहा था. ऐसा लग रहा था कि यह खूबसूरत सफर कभी खत्म ही न हो. सभी यात्री बस से उतर चुके थे. परिचालक ने आखिरी आवाज लगाई तो मेरी तंद्रा भंग हुई. मैं उतरने के लिए जैसे ही अपनी सीट से उठा तो मेरी नजर नीचे पड़े पचास रुपये के एक नोट पर पड़ी. वह नोट मेरा नहीं था. क्योंकि मेरे अगल-बगल की सीट पर उस लड़के के अलावा और कोई नहीं था, यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि वह नोट उसी साधारण से दिखनेवाले लड़के का था. मैं चाहता तो दौड़कर वह नोट उस लड़के को दे सकता था. पर ऐसा न करते हुए मैंने वह नोट उठाकर अपनी जेब में रख लिया. मैंने उन रुपयों से खूब मौज की. फिर मैं इस बात को भूल गया. सफर बढ़िया रहा था. मन प्रफुल्लित था. अब बस घर पहुंचने की जल्दी थी.

‘मैं चाहता तो जा कर वह नोट उस लड़के को दे सकता था. पर ऐसा न करते हुए मैंने वह नोट उठाकर अपनी जेब में रख लिया’

ट्रेन में आरक्षण था अत: कोई फिक्र नहीं थी. पर जब स्टेशन पहुंचा तो देखा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक बड़े किसान नेता की रैली थी और भीड़ इतनी अधिक थी कि आरक्षण होने के बावजूद भी हमें करीब आधा सफर गलियारे में खड़े होकर काटना पड़ा. मुरादाबाद पर भीड़ कुछ कम हुई तो एक भले आदमी ने उतरते वक्त अपनी सीट दे दी. गाड़ी जब हरदोई पहुंची तो मैं ट्रेन के गेट के पास खड़ा हो गया. रिजर्वेशन का टिकट मेरी ऊपर जेब में था. अचानक मैं कुछ देखने के लिए झुका और टिकट मेरी जेब से उड़ गया. चूंकि लखनऊ करीब था सो मैं ज्यादा परेशान नहीं हुआ. ट्रेन जब लखनऊ पहुंची तो मैं चुपचाप उतरकर पीछे के रास्ते से निकलने लगा. तभी एक टीटी ने मुझे रोककर टिकट मांगा. मैंने उसे सारी घटना बताई पर उसने मेरी बात नहीं मानी और मुझे पेनाल्टी भरने को कहा. मेरे पास कुल साठ रुपये थे. उसने वह सारे रुपये ले लिए और मुझे जाने को कहा. मैं भारी मन से बाहर निकलने लगा क्योंकि मेरा घर स्टेशन से लगभग 15 किलोमीटर दूर था, मेरी जेब में एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी और रात-भर की थकान के बाद पैदल चलने की हिम्मत भी नहीं थी. मैं अभी चंद कदम ही चला था तो उसी टीटी ने पीछे से मुझे आवाज दी और पूछा कि मुझे कहां जाना है. जब मैंने उसे बताया तो उसने उन 60 रुपयों में से जो उसने मुझसे लिए थे 10 रुपए मुझे वापस कर दिये किराए के लिए. इस घटना ने मुझे दो बातें सिखाईं. एक तो यह कि किसी भी गलत काम का फल इंसान को तुरंत ही मिलता है और दूसरी यह कि हर बार आपको सजा गलती के बराबर ही मिलती है. न कम न ज्यादा. यह दोनों बातें मैंने गांठ बांध ली हैं. मैं ईश्वर का आभारी हूं कि उन्होंने मुझे सही रास्ता दिखाया और मुझे एक बेहतर इंसान बनने की राह पर प्रशस्त किया.

आइसिस से मेल चाहे अलकायदा

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उत्तरी सीरिया और इराक के कई इलाकों को अपने कब्जे में ले रहा आतंकी संगठन (इस्लामिक स्टेट ऑफ सीरिया एंड इराक) आइसिस और अलकायदा अब एक होने की राह पर हैं. अलग-अलग रिपोर्टों के मुताबिक अलकायदा ने अब आइसिस का साथ देने का फैसला किया है. बताया जा रहा है कि कई छोटे-छोटे आतंकी गुट भी लगातार आइसिस में शामिल हो रहे हैं. पिछले महीने ही पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन तहरीक-ए-खिलाफत ने अलकायदा से अपना नाता तोड़कर आइसिस के साथ जुड़ने का ऐलान किया. उधर, अमेरिका इराक में आइसिस के ठिकानों को निशाना बना रहा है. गौरतलब है कि आइसिस ने अपने कब्जे वाले राज्य को इस्लामी राज्य और अपने नेता अबु बकर अल बगदादी को मुसलमानों का खलीफा घोषित कर दिया है.

खलीफा एक मध्ययुगीन खिताब है. दरअसल इस्लामी इतिहास में पैगंबरों का सिलसिला खत्म होने के बाद उनके उत्तराधिकारी खलीफा कहलाए जो धार्मिक और राजनीतिक प्रमुख हुआ करते थे. खलीफाओं का सिलसिला पिछली सदी तक चला. आइसिस का लक्ष्य विश्व के अधिकांश मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों को सीधे अपने राजनीतिक नियंत्रण में लेना है. इसके लिये उसने सबसे पहले लेवेन्त कहे जाने वाले इलाके को अपने कब्जे में लेने का अभियान चलाया है जिसके तहत जॉर्डन, इजरायल, फिलिस्तीन, लेबनान, कुवैत, साइप्रस तथा दक्षिणी तुर्की के कुछ हिस्से आते हैं.

मार्कण्डेय काटजू: ब्लॉग पर बवाल

New Imageप्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू के आरोपों के बीच वर्तमान मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा ने कहा है कि न्यायपालिका की छवि बिगाड़ने की मुहिम चलाई जा रही है. एक याचिका की सुनवाई के दौरान जस्टिस लोढ़ा ने कहा कि इससे न्यायपालिका के प्रति असम्मान बढ़ रहा है और उसकी छवि को भारी नुकसान हो रहा है. जजों के चुनाव के लिए कोलेजियम की व्यवस्था को सही ठहराते हुए उन्होंने कहा कि वे खुद कोलेजियम के जरिए आए हैं और अगर यह व्यवस्था सही नहीं है तो वे भी सही नहीं हैं.

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश काटजू अपने ब्लॉग के जरिये लगातार न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से जुड़े मामले उठा रहे हैं. अपने हालिया ब्लॉग में उनका कहना है कि जब वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में थे तो उन्होंने वहां काम कर रहे कई भ्रष्ट जजों के बारे में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाड़िया को बताया था, लेकिन कपाड़िया ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की. काटजू के लगाए आरोपों का जवाब देते हुए पूर्व मुख्य न्यायाधीश एचएस कपाड़िया का कहना है कि उन्होंने भ्रष्टाचारी जजों के खिलाफ सबसे ज्यादा कदम उठाए हैं. एक अखबार से बातचीत में उनका कहना है कि जब भी काटजू किसी जज की शिकायत लेकर उनके पास आए उन्होंने संबंधित जज का तबादला कर दिया. उधर, काटजू के मुताबिक इस मामले में होना यह चाहिए था कि मुख्य न्यायाधीश को आरोपी जज से इस्तीफ़ा मांगना चाहिए था और इस्तीफ़ा नहीं देने पर महाभियोग के लिए उनके नाम को राष्ट्रपति के पास भेजना चाहिए था.


जस्टिस काटजू अपने ब्लॉग सत्यम ब्रूयात् पर लिखी कुछ विवादास्पद टिप्पणियों के लिए चर्चा में हैं. वे अपने इस ब्लॉग पर लगातार और जीभर कर लिखते हैं. उनके ब्लॉग पर लिखी कुछ टिप्पणियां विवादास्पद हैं तो कुछ शिक्षाप्रद और कुछ बेहद रोचक भी. उनकी कुछ टिप्पणियों के हिंदी अनुवाद इस और आगे के कुछ पन्नों पर हैं 

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

क्रिकेट मैचों की हेराफेरी

जब मैं इलाहाबाद में था तो वहां इलाहाबाद हाई कोर्ट के जजों और वकीलों के बीच हर 26 जनवरी को एक क्रिकेट मैच हुआ करता था. जब तक मैं वहां एक वकील था वकीलों की टीम की कप्तानी किया करता था.

मैच शुरू होने से पहले मैं अपनी टीम के सदस्यों को बुलाता और उनसे कहता, ‘देखो आप लोगों को पता है कि आपकी रोजी-रोटी कहां से आती है तो भगवान के लिए कोई मैच जीतने की बेवकूफी मत करना नहीं तो कल से आपके सारे मामले बर्खास्त हो जाएंगे. ये जज लोग अपनी बीवियों के सताए हुए, दुखी प्राणी हैं. इसलिए इन्हें मैच जीतकर थोड़ा खुश हो जाने दो फिर देखना कि कल से आपको कई सारे स्टे ऑर्डर और जमानतें मिलने लगेंगी.’

इसके बाद मैं उन्हें अपनी रणनीति बताता – जब भी जज बैटिंग कर रहे हों तो कैच छोड़ दो, उन्हें रन-आउट करने की कोशिश मत करो, अंपायरों को समझा दो ताकि वह एलबीडब्ल्यू न दे दें आदि. जब वकील बैटिंग कर रहे हों तो उन्हें आसान से कैच देने चाहिए, अंधाधुंध बल्ला घुमाना चाहिए जिससे कि बॉल बैट पर नहीं लगे और बल्लेबाज आउट हो जाए.

इस तरह से जजों की टीम हमेशा मैच जीत जाती थी.

जब मैं जज बना तब भी मैं दिल से वकीलों के साथ ही था. इसलिए मैं वकीलों की टीम के कप्तान को बुलाता और उससे कहता कि वह अपने साथियों को ऊपर लिखी रणनीति अपनाने के लिए समझाए. फिर से जजों की टीम जीत जाती.

इस तरह से जजों की टीम हमेशा जीतती थी और जज खुश हो जाते थे. जजों के बारे में मशहूर है कि वे बीवी के गुलाम होते हैं तो उन्हें यह अच्छा लगता था जब अदालत में वकील केस के बारे में बातें करने के बजाय उनके क्रिकेट के मैदान के पिछले दिन के प्रदर्शन की तारीफ करते. इससे वकीलों को अपने पक्ष में अंतरिम आदेश लेने में आसानी हो जाती थी.


बुधवार, 16 जुलाई 2014

मेरी अदालत की दो कहानियां

मैं आपको सुप्रीम कोर्ट में मेरे कोर्टरूम में क्या हुआ इस बारे में दो कहानियां सुनाता हूं.

पहली कहानी पूर्व अटॉर्नी जनरल श्री सोली सोराबजी के बारे में है. एक दिन वे एक केस के सिलसिले में अदालत में मेरे सामने पेश हुए. इससे पहले कि वे अपनी जिरह की शुरुआत करते मैंने कहा, ‘मिस्टर सोराबजी क्या आपको पता है कि आप किस बात के लिए मशहूर हैं?’

पहले वे थोड़ा हैरान हुए फिर उन्होंने पूछा, ‘वह क्या है माई लॉर्ड?’

मैंने कहा ‘आपके बारे में मशहूर है कि आप एक “लेडीज मैन” (महिलाओं में बेहद दिलचस्पी लेने वाला व्यक्ति) हैं.’

इसपर वे झेंप गए और फिर केस से जुड़ा काम करने लगे.

शाम को उन्होंने मुझे फोन किया और कहा ‘आपने मुझे आज बहुत शर्मिंदा किया. जब आपने मुझपर वह टिप्पणी की तो अदालत में मौजूद कई बुरी-सी दिखने वाली महिलाओं ने मुझे घूरना शुरू कर दिया जिससे मुझे बड़ा अजीब सा लगने लगा.’

दूसरी कहानी श्री रामजेठमलानी के बारे में है (एक और लेडीज मैन).

एक दिन वे मेरी अदालत में एक कोने में बैठे हुए अपने केस की बारी आने का इंतजार कर रहे थे. एक दूसरा वकील एक मामले में जिरह कर रहा था जिसमें उसके मुवक्किल पर बलात्कार करने का आरोप था.

जिरह करते हुए वकील का कहना था कि उसका मुवक्किल 65 साल का है इसलिए वह बलात्कार कैसे कर सकता है?

मैंने जवाब दिया कि जब मैं इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक नया-नया वकील था तो मैंने एक बेहद वरिष्ठ क्रिमिनल लॉयर, श्री पीसी चतुर्वेदी, से पूछा कि किस उम्र में सेक्स करने की इच्छा खत्म हो जाती है? उनका कहना था ’30 और 80 के बीच किसी भी समय.’

इतना कहने के बाद मैंने कहा ‘ यहां राम जेठमलानी जी भी बैठे हुए हैं जिनको इन मामलों में बड़ा अनुभव है.’ (जेठमलानी जी तब 85 वर्ष के करीब रहे होंगे और अभी वे 90 से ऊपर हैं.)

मेरे इतना कहते ही जेठमलानी जी उठ खड़े हुए और थोड़ा शरारती स्वर में बोले ‘मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूं, माई लॉर्ड.’


शनिवार, 12 जुलाई 2014

अदालत की अवमानना

मुझे यह किस्सा मेरे चाचा ब्रह्मनाथ काटजू, जो बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस बने, ने सुनाया था. किस्सा 1950-60 के दशक का है. उस समय उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकालत की प्रैक्टिस बस शुरू ही की थी. जूनियर वकीलों के पास अमूमन कोई काम नहीं रहता तो ऐसे में मेरे चाचा अक्सर अदालत में बैठकर सीनियर वकीलों की बहसें सुना करते थे.

उन्हीं दिन कोर्ट में चीफ जस्टिस, जस्टिस मूथम, जो अंग्रेज थे (मैं  इंग्लैंड में उनके घर पर उनसे 1994 में मिल चुका हूं तब वे तकरीबन 90 साल के थे), और जस्टिस पीएन सप्रू की बेंच के सामने एक मामला आया. उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से महाअधिवक्ता पंडित कन्हैया लाल मिश्रा पैरवी कर रहे थे. मेरे चाचा भी अदालत में थे और एक तरह से जो भी घटनाएं उस समय हुईं उनके चश्मदीद गवाह थे.

मामला यूं था कि मेरठ जिले के 75 साल के एक ग्रामीण व्यक्ति ने मेरठ जिला न्यायालय के जज को एक पोस्टकार्ड भेजा था. अपने पत्र में उस व्यक्ति ने लिखा था कि भारतीय न्यायप्रणाली आज भी ब्रिटिश उपनिवेशवादी अदालती तंत्र की तर्ज पर व्यवहार कर रही है जबकि भारत 1947 में ही  आजाद हो चुका है. जिला जज ने यह पोस्टकार्ड हाई कोर्ट में भेज दिया और हाई कोर्ट ने उस गांव वाले के नाम से सम्मन जारी कर दिया. पहले जमानती वारंट भेजा गया लेकिन वह अदालत में हाजिर नहीं हुआ. इसके बाद उसके नाम से गैरजमानती वारंट जारी हुआ और पुलिस उसके गांव जाकर उसे गिरफ्तार करके इलाहाबाद ले आई.

चीफ जस्टिस के हिसाब से यह मामला बहुत छोटा था और इसे तूल देने की जरूरत नहीं थी. उस ग्रामीण ने अपनी बात सिर्फ पोस्टकार्ड में कही थी और वह किसी अखबार में प्रकाशित नहीं हुई थी. अदालत की अवमानना का विषय जज के विवेकाधीन होता है इसलिए भले ही अदालत की अवमानना हुई हो लेकिन ऐसे सभी मामलों में हाई कोर्ट  कार्रवाई करे यह जरूरी नहीं है.

हालांकि जस्टिस सप्रू इस मामले को इतने हल्के में नहीं लेना चाहते थे. आखिरकार उन्होंने उस ग्रामीण से पूछा कि जब सम्मन या जमानती वारंट उसे मिला तो वह कोर्ट में हाजिर क्यों नहीं हुआ. ग्रामीण का जवाब था कि वह बहुत गरीब आदमी है और यदि गैर जमानती वारंट जारी होता है तो पुलिस खुद उसे लेने आएगी और वह सरकारी खर्चे पर मेरठ से इलाहाबाद तक पहुंच जाएगा. इसके बाद दोनों जज मुस्काराए और उन्होंने कहा कि वह अपने घर जा सकता है. इस पर उस गांव वाले का कहना था कि वह घर कैसे जाए? उसके पास तो ट्रेन की टिकट खरीदने का पैसा भी नहीं है.

इसके बाद जजों ने अपने बटुए खोले और 15-15 रुपये उस ग्रामीण को दिए. पंडित कन्हैया लाल मिश्रा ने भी 15 रुपये दिए ताकि वह आदमी वापस मेरठ जा पाए.

यह किस्सा उन सभी जजों के लिए है जो अदालत की अवमानना के नोटिस जारी करने के लिए बहुत उत्साहित रहते हैं. लेकिन यह ध्यान रखा जाए कि ऐसे में लेने के देने पड़ सकते हैं!


इस आलेख के बाद जस्टिस काटजू के ब्लॉग पर उनके लिए अपमानजनक टिप्पणियों की भरमार हो गई थी. इसमें उन्होंने एकतरफा धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़े किए थे

रविवार, 19 जुलाई 2014

कश्मीरी पंडित

मैंने तमाम ऐसे लोगों को ब्लॉक कर दिया है जिन्होंने मेरे पिछले ब्लॉग पर अपमानजनक और अभद्र टिप्पणियां की थीं. मैं काफी हद तक लोकतंत्रिक व्यक्ति हूं और मुझे ऐसे लोगों से कोई परेशानी नहीं होती जो मेरी राय से इत्तेफाक नहीं रखते, लेकिन मैं अभद्रता और अपमान कतई स्वीकार नहीं कर सकता. मैं क्यों करूं?

मैंने सिर्फ इतना ही कहा था कि अत्याचार या दमन किसी का नहीं होना चाहिए चाहे वह हिंदू हो, मुसलिम हो, ईसाई हो या किसी अन्य समुदाय का. जब भी मुसलमानों के साथ किसी तरह की ज्यादती हुई है मैं देश का पहला आदमी था जिसने इसका विरोध किया, आप मेरा पिछला इतिहास खंगाल सकते हैं. लेकिन मैंने देखा है कि जब भी हिंदुओं, ईसाइयों, अहमदिया या शियाओं के ऊपर पाकिस्तान, कश्मीर या बांग्लादेश में किसी तरह की जोर-जबर्दस्ती होती है तब इक्का-दुक्का मुसलिम ही इसके खिलाफ आवाज उठाते हैं. मैंने इसका कड़ा विरोध किया था.

मुझे आज भी याद है, एक बार अपने एक मुसलिम दोस्त से मैंने कहा कि जब भी कभी मुसलिमों के साथ कोई ज्यादती होती है मैं उनके पक्ष में खड़ा रहता हूं लेकिन जब कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के साथ जुल्म हो रहा है तब कोई मुसलमान इसका विरोध क्यों नहीं कर रहा? उसने मुझसे पूछा कि मैं क्या कर सकता हूं? मैंने उसे जवाब दिया कि तुम स्थानीय अखबार में इसके विरोध में पत्र लिख सकते हो, मैं उसे छपवाने में तुम्हारी मदद करूंगा. लेकिन उसने कुछ नहीं किया.

मुझे कश्मीरी पंडितों की यातना का अंदाजा है क्योंकि मैं खुद एक कश्मीरी पंडित हूं. मेरी पत्नी और तमाम रिश्तेदार कश्मीरी हैं. सैंकड़ों कश्मीरी पंडितों को चुन-चुनकर मार दिया गया. कश्मीरी पंडित पूरे राज्य की आबादी का सिर्फ तीन फीसदी थे और वे किसी के लिए किसी तरह का खतरा नहीं थे. लेकिन अक्सर देखा गया कि कश्मीर के गांवों में जहां एक हजार की आबादी थी और सिर्फ बीस कश्मीरी पंडित थे वहां हथियारबंद लोग पहुंचते थे और चुनकर उन बीस पंडितों की हत्या कर देते थे. इस तरह की तमाम घटनाएं हैं. मेरे एक रिश्तेदार जो आजकल दिल्ली में डॉक्टर हैं, ने मुझे बताया कि जब वे कश्मीर के एक मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे थे उस समय कुछ लोग उनके घर में घुस आए. उन्होंने चिल्ला-चिल्लाकर कहा कि घर के सारे पुरुष कश्मीर छोड़कर चले जाएं, महिलाओं को यहीं छोड़कर. कश्मीरी पंड़ितों के साथ दुर्व्यवहार की ऐसी अनगिनत कहानियां हैं. इस खौफ में वे अपना घर-बार त्यागकर जल्दबाजी में कश्मीर से चले गए. ऐसे तमाम परिवार आज भी जम्मू और दिल्ली स्थित राहत शिविरों में अमानवीय स्थितियों मे रह रहे हैं. इन अत्याचारों की निंदा करने की बजाय तमाम कश्मीरी मुसलमानों ने पंडितों के पलायन के लिए जगमोहन को जिम्मेदार ठहराया. यह सरासर झूठ था. वास्तव में छोटे से कश्मीरी पंडित समुदाय की सुरक्षा न कर पाने की जिम्मेदारी उन्हें अपने ऊपर लेनी चाहिए.

कोई भी व्यक्ति जिस स्थान पर पीढ़ियों से रहता आ रहा हो वह उसे छोड़ना नहीं चाहता. यह अपने आप में कश्मीरी पंडितों के साथ हुई भयावह ज्यादती का प्रमाण है. चूंकि यह छोटा सा समुदाय है, जिसका कोई वोटबैंक नहीं है, इसलिए किसी को इनकी परवाह नहीं है. बमुश्किल ही किसी मुसलमान ने इन अत्याचारों या फिर पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों के साथ हुए दमन के खिलाफ कोई आवाज उठाई है. हिंदू लड़कियों को जबरन उठाकर उनका धर्म परिवर्तन कर दिया जाता है, हिंदुओं का अपहरण करके उनसे फिरौती वसूली जाती है. ईशनिंदा कानून का इस्तेमाल ईसाइयों के खिलाफ किया जा रहा है, अक्सर उनकी हत्या कर दी जाती है और किसी वकील में हिम्मत नहीं होती उनका केस लड़ने की. जिन लोगों ने हिम्मत दिखाई उन्हें भी मार दिया गया. भारत में शायद ही किसी मुसलमान ने इन अत्याचारों के खिलाफ कोई आवाज उठाई हो, लेकिन जब गाजा पर कोई हमला होता है तब वे आसमान सिर पर उठा लेते हैं.

मैं यह नहीं कह रहा कि गाजा के लोगों के साथ हो रहे भेद-भाव के खिलाफ आवाज नहीं उठानी चाहिए. मेरा कहना सिर्फ इतना भर है कि कश्मीर और पाकिस्तान भारत के कहीं ज्यादा करीब हैं. भारत के मुसलमानों को पाकिस्तान के अहमदी और कश्मीर के गैर मुसलिमों के खिलाफ हो रही ज्यादती के खिलाफ भी आवाज उठानी चाहिए. मैंने देश के तमाम शहरों में मुसलिमों द्वारा गाजा के लोगों के समर्थन में निकाले जा रहे जलूसों की तस्वीरें अखबारों में देखी हैं. लेकिन मुसलमानों द्वारा अहमदी और कश्मीरी पंडितों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ कोई प्रदर्शन नहीं देखा.

मेरा मानना है कि धर्मनिरपेक्षता की धारा एकतरफा नहीं बह सकती. हर तरह के अत्याचार का प्रतिरोध होना चाहिए. इसके बावजूद मैं उन सभी लोगों को, जिन्हें मैंने ब्लॉक कर दिया है, एक बार फिर से अनब्लॉक करने के लिए तैयार हूं अगर वे बिना शर्त माफी मांग लें. वे मेरे फेसबुक पन्ने पर संदेश भेज सकते हैं या कोई और तरीका भी चुन सकते हैं.  मैं स्वभाव से ही उदार और क्षमाशील हूं.


 

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जसवंत सिंह की हालत नाजुक

jaswant singh 1 - PTI_0_0_0पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह की हालत गंभीर बनी हुई है. उनका दिल्ली स्थित सैन्य अस्पताल में ऑपरेशन किया गया था जिसके बाद वे आईसीयू में हैं. वे गुरुवार को घर में फिसल गए थे और उनके सिर में चोट आई थी.अस्पताल ने शुक्रवार दोपहर जारी मेडिकल बुलेटिन में कहा कि सिंह की हालत नाजुक बनी हुई है.

इससे पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी अस्पताल पहुंचे और उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी डॉक्टरों और परिजनों से उनका हालचाल पूछा. 75 साल के जसवंत सिंह ने हालिया लोकसभा चुनावों में टिकट न मिलने पर पार्टी से बगावत की थी और राजस्थान के बाड़मेर से भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ा था. इसके बाद उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया था. बाद में उनके पुत्र विधायक मानवेंद्र सिंह को भी पार्टी से निलंबित कर दिया गया था. हालांकि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने जसवंत सिंह को पत्र लिखकर उनके प्रति सम्मान जताया था और उनके अनुभव से लाभ मिलने की उम्मीद की थी. वे केंद्र में विदेश, रक्षा और वित्त सहित कई मंत्रालय संभाल चुके हैं. वे योजना आयोग के भी उपाध्यक्ष भी रहे. 2004 में जब भाजपा के सत्ता से बाहर होने के बाद सिंह राज्यसभा में विपक्ष के नेता बने थे. 2009 में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना पर लिखी उनकी किताब पर बहुत बवाल हुआ था. रिपोर्टों के मुताबिक इसमें मोहम्मद अली जिन्ना की प्रशंसा और नेहरू-पटेल की आलोचना की गई थी जिसके चलते 19 अगस्त, 2009 को उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था. हालांकि बाद में उनकी वापसी भी हो गई थी.

सचिन और रेखा, कम ही देखा

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दो साल पहले जब क्रिकेट के दिग्गज सचिन तेंदुलकर राज्यसभा के लिए नामित हुए तो एक अखबार की टिप्पणी थी कि भगवान को नया घर मिल गया है. यह अलग बात है कि इस घर में उनकी मौजूदगी अब तक न के बराबर रही है. संसद की कार्रवाई पर नजर रखने वाली संस्था पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के मुताबिक इस साल संसद के किसी भी सत्र में तेंदुलकर ने एक दिन भी हिस्सा नहीं लिया. अब तक संसद में उनकी मौजूदगी का कुल आंकड़ा देखें तो यह सिर्फ तीन फीसदी रही है. अपने मनोनयन के मौके पर उन्होंने कहा था कि वे संसद में खेल से जुड़े मुद्दे उठाना चाहेंगे. लेकिन बात बात ही रह गई.

सचिन इस जमात में अकेले नहीं हैं. राज्यसभा सांसद और फिल्म अभिनेत्री रेखा का मामला भी कुछ ऐसा ही है. रेखा भी 2012 में राज्यसभा सदस्य बनी थीं. तब से अब तक सदन में उनकी हाजिरी महज पांच फीसदी है. वे सिर्फ सात मौकों पर संसद में दिखी हैं.

तेंदुलकर या रेखा जैसे सदस्यों को अपने-अपने क्षेत्रों में विशेष योगदान के चलते सांसद बनाया जाता है. खेल, साहित्य, कला, विज्ञान या समाज सेवा जैसी पृष्ठभूमियों से ताल्लुक रखने वाली इन हस्तियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने ज्ञान और अनुभव के चलते इन क्षेत्रों की बेहतरी के लिए कोई दिशा तय करने में अपना योगदान देंगे. अलग-अलग स्रोतों के मुताबिक 1952 से अब तक क़रीब 200 ऐसे लोग नामांकित किए जा चुके हैं. इनमें विख्यात लेखक, पत्रकार, कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं. लेकिन ऐसे सांसदों का प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा है. इसलिए स्वाभाविक ही है कि एक वर्ग की तरफ से यह मांग उठ रही है कि राज्यसभा में ऐसे सदस्यों को नामांकित किया जाए जो संसद में आएं, सत्र के दौरान कुछ बोलें और गंभीरता से वह जिम्मेदारी निभाएं जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है. जाने-माने इतिहासकार रामचंद्र गुहा का मानना है कि सचिन को राज्यसभा जाने का प्रस्ताव मानना ही नहीं चाहिए था क्योंकि यह फैसला कांग्रेस ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के चलते लिया था. राज्यसभा सांसद और चर्चित शायर-गीतकार जावेद अख्तर कहते हैं कि संसद की सदस्यता कोई ट्रॉफी नहीं है कि आए और लेकर चले गए.

तेंदुलकर सूचना-तकनीकी पर बनी संसदीय समिति के सदस्य भी हैं. रेखा भी खाद्य और नागरिक आपूर्ति मामलों पर बनी एक संसदीय समिति में हैं. संसद में इन दोनों दिग्गजों की गैरमौजूदगी उन्हें महत्वपूर्ण समितियों में रखने के ऐसे फैसलों को भी हास्यास्पद बना देती है.

हालांकि धूप में इक्का-दुक्का छांव के कतरों की तरह इस मामले में भी कुछ अपवाद रहे हैं. 1953 में नर्तक रुक्मिणी देवी अरुंदाले की मदद से पशुओं के खिलाफ क्रूरता रोकने के लिए एक विधेयक पेश किया गया. मशूहर लेखक आरके नारायण ने संसद में अपने पहले भाषण में भारी-भरकम स्कूल बैग को हटाने की मांग की थी. उनका कहना था कि इससे बच्चे झुककर चलते हैं और चलते वक्त चिंपाजी की तरह उनके हाथ आगे की तरफ लटके रहते हैं जिससे उन्हें रीढ़ संबंधी चोटों का खतरा रहता है.

बेनीवाल पर बहुत से सवाल

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डॉ. कमला बेनीवाल को मिजोरम के राज्यपाल पद से बर्खास्त किए जाने का मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है. कांग्रेस का इल्जाम है कि बेनीवाल को गुजरात के राज्यपाल पद पर रहने के दौरान राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री (और अब प्रधानमंत्री) नरेंद्र मोदी से उलझने की कीमत अपना पद गंवा कर चुकानी पड़ी है. उधर, भाजपा का कहना है कि इस बर्खास्तगी की वजह उनके द्वारा की गई अनियमितताएं हैं. खबरों के मुताबिक बेनीवाल को हटाने का फैसला तब लिया गया जब यह उजागर हुआ कि उन्होंने जनता के पैसे का उपयोग कई हवाई यात्राओं में किया. इनमें उनके गृहराज्य राजस्थान के लिए की गई यात्राएं शामिल थीं. बताया जा रहा है कि बेनीवाल ने वर्ष 2011 से 2014 के दौरान 63 बार राज्य सरकार के विमान का इस्तेमाल किया. इनमें से 53 यात्राएं जयपुर की थीं.

बेनीवाल की बर्खास्तगी की एक और वजह भी बताई जा रही है. कहा जा रहा है कि गुजरात के राज्यपाल पद पर रहते हुए उन्होंने एक महत्वपूर्ण विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं किए जिसकी वजह से राज्य को 1,200 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ. इतना ही नहीं, उनके एक जमीन घोटाले में शामिल होने और विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति के मामलों में रुचि लेने की बात भी कही जा रही है.

इससे पहले कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने बेनीवाल की बर्खास्तगी पर सवाल उठाते हुए कहा था कि अगर उन्हें हटाना ही था तो मिजोरम क्यों भेजा गया. पार्टी के दूसरे नेता राजीव शुक्ला ने इसे भाजपा का राजनीतिक बदला करार दिया था. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने भी इस फैसले का विरोध किया था. उधर, कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद का कहना था कि यह फैसला संविधान के नियमों के अनुरूप हुआ है और महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने इसकी अनुमति दी है. पुडुचेरी के उपराज्यपाल वीरेन्द्र कटारिया को हटाए जाने के बाद बेनीवाल बर्खास्त की जाने वाली दूसरी राज्यपाल हैं.

गौरतलब है कि गुजरात में लोकायुक्त और कुछ अन्य मुद्दों पर राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी तत्कालीन राज्यपाल बेनीवाल के बीच लंबा टकराव चला था. बेनीवाल ने गुजरात सरकार से सलाह लिए बगैर जस्टिस आरए मेहता को गुजरात का लोकयुक्त नियुक्त कर दिया था. मोदी सरकार ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए राज्यपाल के फैसले को अदालत में चुनौती दी थी. अदालत ने मेहता की नियुक्ति को सही ठहराया था, लेकिन बाद में जस्टिस मेहता ने लोकायुक्त बनने से ही इंकार कर दिया था. इसके अलावा बेनीवाल ने राज्य विधानसभा में पारित विभिन्न विधेयकों को भी रोक दिया था.
स्थाई व्यवस्था होने तक मणिपुर के राज्यपाल वीके दुग्गल को मिजोरम के राज्यपाल का प्रभार सौंपा गया है.

इबोला का तांडव

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पश्चिमी अफ्रीकी देशों में इबोला वायरस के भयंकर संक्रमण के चलते विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने वैश्विक आपात स्थिति का ऐलान कर दिया है. इस मुद्दे पर डब्ल्यूएचओ की आपात समिति की बैठक के बाद जारी बयान में कहा गया है कि इबोला को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फैलने से रोकने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयास किए जाने की आवश्यकता है. गौरतलब है कि गिनी, लाइबेरिया, नाइजीरिया और सिएरा लियोन में इस वायरस के संक्रमण से 932 लोगों की मौत हो गई है.लाइबेरिया में तो इसके चलते आपातकाल का ऐलान भी हो चुका है. वहां से लोगों द्वारा इबोला से ग्रस्त अपने परिजनों को सड़कों पर छोड़ देने की खबरें भी आ रही हैं. उधर, सऊदी अरब ने घोषणा की है कि वह पश्चिम अफ़्रीका के तीन देशों- लाइबेरिया, गिनी और सिएरा लियोन के लोगों को हज के लिए वीज़ा नहीं देगा जहां इबोला की समस्या बहुत गंभीर है.

क्या है इबोला
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक इबोला एक तरह की वायरल बीमारी है. इसके मरीजों में अचानक बुख़ार, कमजोरी, मांसपेशियों में दर्द और गले में ख़राश जैसे लक्षण होते हैं. हालांकि ये बीमारी की शुरुआत भर होते हैं. बीमारी के अगले चरण में मरीज को उल्टी, डायरिया और कुछ मामलों में अंदरूनी और बाहरी रक्तस्राव होता है. इंसानों में यह वायरस संक्रमित जानवरों जैसे चिंपैंजी, चमगादड़ और हिरण आदि के साथ संपर्क के जरिये आता है. इंसानों में इसका संक्रमण संक्रमित खून या किसी द्रव या फिर अंगों के माध्यम से होता है. इबोला के शिकार व्यक्ति का अंतिम संस्कार भी खतरे से खाली नहीं होता और संक्रमित व्यक्ति का शव छूने वाला भी इसकी चपेट में आ सकता है. पर्याप्त सतर्कता न बरतने पर डॉक्टरों के भी इससे संक्रमित होने का भारी ख़तरा रहता है. संक्रमण के अपने चरम पर पहुंचने में दो दिन से लेकर तीन सप्ताह तक का वक़्त लग सकता है. इबोला संक्रमण की पहचान और इलाज, दोनों अभी तक मुश्किल बने हुए हैं.

डब्ल्यूएचओ द्वारा जारी दिशा निर्देशों के मुताबिक इससे पीड़ित रोगियों के साथ सीधे संपर्क से बचना चाहिए. इसका इलाज करने वालों को दस्ताने और मास्क पहनने चाहिए और समय-समय पर हाथ धोते रहना चाहिए.

बिन इंटरनेट फेसबुक

facebookअब मोबाइल पर इंटरनेट भले ही न हो, फेसबुक या गूगल सर्च हो सकता है. फेसबुक की अगुवाई में बनाई गई इंटरनेटडॉटओआरजी नाम की एक संस्था ने एक ऐसा ऐप लांच किया है जो मोबाइलधारकों को इंटरनेट कनेक्शन के बगैर ही फेसबुक, गूगल सर्च और विकीपीडिया सहित कुछ दूसरी सेवाएं मुहैय्या कराएगा.

जांबिया में इस सेवा को लांच करते हुए फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने कहा कि उनकी इस पहल का लक्ष्य उन लोगों तक इंटरनेट पहुंचाना है जो अभी इसका खर्च नहीं उठा सकते.

इंटरनेटडॉटआर्ग के प्रोडक्ट मैनेजमेंट डायरेक्टर गे रोजेन के मुताबिक यह ऐप एंड्रायड के अलावा साधारण फीचर वाले मोबाइल फोनों पर भी काम करेगा. गौरतलब है कि इंटरनेटडॉटओआरजी को फेसबुक ने नोकिया, सैमसंग, क्वालकॉम जैसी कंपनियों के साथ मिलकर बनाया है. इसका लक्ष्य है दुनिया की उस दो तिहाई आबादी को जागरूक करना जिसके पास अभी इंटरनेट की सुविधा नहीं है. अभी जांबिया में एयरटेल के ग्राहकों तक ही इस सेवा की पहुंच है, लेकिन इसे जल्द से जल्द पूरी दुनिया में सभी तक पहुंचाने की योजना है.