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असम राइफल्स : सेना में सड़ांध

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देश के पूर्वोत्तर इलाके में स्थित सात राज्यों, अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा की बात की जाए तो वहां अशांति या कहें तो किसी छोटे-मोटे युद्ध जैसी परिस्थितियां हर वक्त बनी रहती हैं. यहां एक तरफ विद्रोही गुट हैं तो दूसरी तरफ सुरक्षा बल. इनके बीच सालों से चल रहे संघर्ष की आम नागरिकों ने बड़ी कीमत चुकाई हैै. इस मायने और कई सामाजिक आयामों में सुदूर उत्तर-पूर्व के ये राज्य शेष भारत से काफी अलग हैं. पर तहलका की हालिया तहकीकात बताती है कि कम से कम एक मामले यानी भारतीय संस्थानों की व्यवस्थागत बुराइयों में यहां तैनात संगठन भी शेष भारत से अलग नहीं हैं. हम भ्रष्टाचार की बात कर रहे हैैं. छिपे हुए कैमरों से जरिए की गई हमारी पड़ताल बताती है कि इस इलाके में अशांति दूर करने के लिए तैनात असम राइफल्स में भ्रष्टाचार नीचे से लेकर ऊपर तक, हर स्तर पर है.

अतीत में भी देश के इस सबसे पुराने अर्द्धसैन्य बल पर विवेकाधीन फंड के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं. तहलका ने अपने छिपे कैमरे के जरिए यह खुलासा किया है कि कैसे असम राइफल्स के कुछ अधिकारी निर्माण कार्यों के लिए जारी निविदाओं आदि को आसानी से पास करने के लिए ठेकेदारों से हिस्सा ले रहे हैं. असम राइफल्स में अनेक अधिकारी सेना से प्रतिनियुक्ति पर आते हैं. तहलका को अपनी पड़ताल में यह भी पता चला कि ये अधिकारी जब वापस अपने मूल संस्थान में लौटते हैं तो इनके पास अकूत अवैध संपत्ति जमा हो जाती है. चौंकाने वाली बात यह है कि सुरक्षाबल में यह काम संगठित तरीके से अंजाम दिया जा रहा है. इस रैकेट में क्लर्क और उच्चाधिकारी तक सभी समान रूप से शामिल हैं.

मुश्किल लड़ाई मोर्चों पर तैनात जवानों की जान हमेशा जोखिम में रहती है जबकि उनके अधिकारी पैसा बनाने में लगे रहते हैं. फोटोः एएफपी

imgयह कैसे होता है
हर वित्त वर्ष में केंद्र सरकार सुरक्षा बलों के लिए बजटीय आवंटन करती है. इस वर्ष (2014-15) के बजट में असम राइफल्स को 3,580 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है. इससे पहले के दो सालों में यह आवंटन क्रमश: 3,358 करोड़ और 2,966 करोड़ रुपये था.

सालाना बजट में जिन निर्माण परियोजनाओं का उल्लेख होता है उनका क्रियान्वयन निविदाओं के जरिए किया जाता है. हर स्तर पर अधिकारी यह सुनिश्चित करते हैं कि उन्हें हर प्रस्ताव (निर्माण ठेके के लिए) को एक जगह से दूसरी जगह भेजते समय उनके हिस्से का पैसा मिले. रिश्वत देने वाले ठेकेदार बताते हैं कि किसी भी परियोजना की लागत अधिकारियों की जेब भरने के क्रम में सीधे 30 फीसदी तक बढ़ जाती है. इसका असर निर्माणकार्य की गुणवत्ता पर पड़ता है. असम राइफल्स में हालात इतने खराब हो चुके हैं कि अधिकारी अपने कार्यालयों में खुले आम रिश्वत लेने से नहीं हिचकते.

इन भ्रष्ट सैन्कर्मियों के काम करने का तरीका एकदम साधारण है. जब भी कोई ठेकेदार असम राइफल्स के प्रशासन और उसकी निगरानी वाले इलाके में किसी निर्माण कार्य के लिए निविदा भरता है तो उससे उम्मीद की जाती है कि वह एक खास नेटवर्क से संपर्क करेगा. इसके जरिए ही हर स्तर पर धन पहुंचाया जाता है. लूट का माल छोटे क्लर्कों से लेकर महानिदेशक तक बंटता है. महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल के रैंक के अधिकारी हंै. बड़े अधिकारी सीधे नकदी नहीं लेते हैं बल्कि उनके लिए उनके अधीनस्थ अधिकारी धन लेते हैं.

एक पुराना ठेकेदार जो इस काम में पिछले सात सालों से है, उस दिन को याद करके अफसोस करता है जब उसने इस पेशे में आने की ठानी थी. यह अफसोस स्वाभाविक है. अगर कोई निविदा एक करोड़ रुपये की है तो करीब 30 फीसदी यानी 30 लाख रुपये यह सुनिश्चित करने में खर्च करने पड़ते हैं कि आगे कोई गतिरोध न आए और पूरा काम सहज ढंग से संपन्न हो. दूसरे शब्दों में कहें तो परियोजना की 30 फीसदी राशि काम शुरू होने के पहले ही खर्च हो जाती है. वह ठेकेदार कहता है, ‘प्रस्तावित निविदा का 30 फीसदी हिस्सा असम राइफल्स के विभिन्न अधिकारियों को देना पड़ता है. कई बार तो यह राशि 35 फीसदी तक हो जाती है. हमें बचे हुए पैसे से ही कच्चे माल, श्रमिकों और मुनाफे का जुगाड़ करना होता है.’ स्पष्ट है कि इसका असर काम की गुणवत्ता पर पड़ता है.

ठेकेदार आगे समझाता है, ‘पहले आप एक निविदा भरते हैं ताकि वह पास हो जाए. वह शिलॉन्ग जाती है. वहां आपको पांच से आठ फीसदी रिश्वत देनी होती है. अगर आप रिश्वत नहीं देंगे निविदा वहां से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ेगी. आपकी परियोजना शुरू होने के पहले ही समाप्त हो जाएगी. लब्बोलुआब यही कि किसी भी हालत में 30 फीसदी राशि देनी ही होगी. कुल खर्च 30 फीसदी है लेकिन रिश्वत की राशि एक बार में नहीं देनी होती. वह चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ती है. पहले निविदा के स्तर पर, फिर बिलिंग के स्तर पर और इसी तरह आगे. इसका एक बड़ा हिस्सा विशेष अधिकारी के पास जाता है, जहां से निविदा आरंभ होती है.’

ठेकेदार
असम राइफल्स के साथ कुल मिलाकर 543 ठेकेदार पंजीकृत हैं. मोटेतौर पर उनकी पांच श्रेणियां हैं. उनको स्पेशल, ए, बी,सी और डी श्रेणियों में बांटा गया है. यह वर्गीकरण पैसे के आधार पर किया जाता है. जो स्पेशल यानी खास श्रेणी में होते हैं, वे ऐसी परियोजनाओं में शामिल होते हैं जिसमें बेशुमार पैसा होता है. ए और बी श्रेणी में वे ठेकेदार होते हैं जो क्रमश: दो करोड़ और एक करोड़ रुपये तक की परियोजनाओं के लायक होते हैं. सी और डी श्रेणी में इससे कम पैसे वाले ठेकेदार होते हैं. नए ठेकेदार स्वत: डी श्रेणी में आते हैं. बाद में उनको उनके प्रदर्शन के मुताबिक आगे बढ़ाया जाता है.

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साड़ी, केक और स्कॉच

असम राइफल्स पर सरकारी फंड के हेरफेर के आरोप नए नहीं हैं. दस्तावेज बताते हैं कि सरकारी पैसे का सबसे ज्यादा दुरुपयोग गृह मंत्रालयों और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को तोहफे देने के लिए किया गया है. इनमें साड़ियों से लेकर केक, मिठाई और स्कॉच की बोतल तक शामिल हैं. इन सामानों के लिए खर्च किया गया पैसा असम राइफल्स के विवेकाधीन फंड से आता है. हालांकि विवेकाधीन फंड के तहत भी पैसे का इस्तेमाल अर्द्धसैन्यबल के कल्याण कार्याें और अन्य जरूरतों  के लिए ही खर्च किया जाना चाहिए. इस साल के बजटीय प्रावधानों में असम राइफल्स को 3,580 करोड़ रुपये  आवंटित किया गया है. खबरें हैं कि विवेकाधीन फंड जो अर्द्धसैन्यबल के महानिदेशक (डीजी) के जिम्मे होता है, से लगभग हर दिन पैसे का दुरुपयोग किया गया है. सूत्रों का कहना है कि इस फंड के तहत एक अधिकारी के निजी खर्च, विशेषतौर पर उनकी पत्नी के लिए 23 हजार रुपये  खर्च किए गए थे. सेना मुख्यालय द्वारा इस मामले की शुरुआती जांच के दौरान दस्तावेजों की सत्यता की पुष्टि हुई है.

[/box]कैसे होता है बंटवारा

अवैध रूप से हासिल की गई धनराशि को बांटने का तरीका एकदम व्यवस्थित है. पांच फीसदी पैसा उस क्षेत्र को जाता है जहां परियोजना होनी होती है. कुछ मामलों में तो यह राशि 10 फीसदी तक होती है. इसके अलावा पांच फीसदी धन राशि डीजीआर (पुनर्वास महानिदेशक या डायरेक्टर जनरल रीसेटलमेंट) को जाती है. इसके बाद उस यूनिट को पांच फीसदी जहां बिल जाता है. जब बिल संबंधित क्षेत्र में वापस आता है तो तीन फीसदी राशि अधिकारियों को दी जाती है और पांच फीसदी अन्य राशि डीजीआर को. आखिर में सात फीसदी मूल्यवर्धित कर (वैट) भी इस खर्च में जुड़ता है. इस तरह कुल मिलाकर 30 फीसदी राशि खर्च हो जाती है. इसके अलावा एक फीसदी राशि लेखा विभाग को भी देनी होती है क्योंकि पैसा वहीं से जारी होता है.

ऑपरेशन ‘हिलटॉप’
इसकी शुरुआत सी श्रेणी के एक ठेकेदार के साथ हुई जो असम राइफल्स के लिए काम करता था. केरल निवासी सीसी मैथ्यू नाम के इस शख्स ने तहलका से संपर्क किया. मैथ्यू एक भूतपूर्व जवान हैं और वे असम राइफल्स के भ्रष्टाचार को उजागर करना चाहते थे. तहलका से संपर्क करने से पहले वे विभिन्न मीडिया संस्थानों के पास मदद के लिए गए लेकिन उनको हर जगह से निराश होकर लौटना पड़ा. इसके बाद तहलका की विशेष खोजी टीम ने इस व्हिसलब्लोअर का साथ देने की ठानी.

बीते साल इस ठेकेदार ने मणिपुर के तमांगलॉन्ग जिला मुख्यालय में एक शेल्टर खड़ा किया था. 24 लाख रुपये के इस अनुबंध में वह निविदा लेने के लिए ही 16 फीसदी राशि रिश्वत के रूप में दे चुका था. अब वह 18 फीसदी और राशि रिश्वत के रूप में अधिकारियों को देने जा रहा था ताकि उसका बिल पास हो सके. इस बार तहलका का यह संवाददाता, मैथ्यू का रिश्तेदार बनकर उनके साथ गया और देश के इतिहास में पहली बार सैन्य वर्दियों में सजे अधिकारी कैमरे पर रंगे हाथ रिश्वत स्वीकार करते पकड़े गए! इसमें एक कर्नल और दो लेफ्टिनेंट कर्नल शमिल थे. स्तब्ध करने वाली बात यह है कि असम राइफल्स के प्रमुख ने भी अप्रत्यक्ष रूप से अपने अधीनस्थ के जरिये अपना हिस्सा लिया. जूनियर कमीशंड ऑफिसर एच देब ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के लिए धन लिया. इन अधिकारियों में डीजी, एडीजी और चीफ इंजीनियर शामिल थे.

देब: मुझे तीन (हजार) और दीजिए.
ठेकेदार: सर प्लीज, तीन रहने दीजिए.
देब: मुझे देना होगा, प्लीज समझिए.
ठेकेदार: (हंसता है)
देब: मुझे लिंबू (सूबेदार, इंजीनियर जेसीओ) और अन्य लोगों को देना होगा. इसमें वो लोग भी शामिल हैं जो पांच फीसदी लेते हैं.

peeहमारा स्टिंग ऑपरेशन क्लर्क कर्मचारियों के साथ शुरू हुआ और एकदम शीर्ष तक पहुंचा. सूबेदार गौतम चक्रवर्ती ने न केवल बिल पास करने के लिए अपना हिस्सा लेने पर जोर दिया बल्कि उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि ठेकेदार एक पुरानी परियोजना के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल कक्कड़ का बकाया पैसा भी दे जिनका अब दूसरी जगह स्थानांतरण हो चुका है. लेफ्टिनेंट कर्नल कक्कड़ की ओर से पैसा लेने के बाद चक्रवर्ती ने उनको फोन करके ‘अच्छी खबर’ भी दी.

चक्रवर्ती: आपको देना है तो दो नहीं तो भूल जाओ
चक्रवर्ती : (फोन पर) सर एक अच्छी खबर है. मैथ्यू ने आपके हिस्से के 20 हजार दे दिए. (उसके बाद वह फोन मैथ्यू को दे देता है)
ठेकेदार मैथ्यू (फोन पर): सर 30 लाख के बिल में जो भी बकाया था वह सब दे दिया.

एक अधिकारी जिसकी पहचान लेफ्टिनेंट कर्नल गोगोई के रूप में हुई वह मैथ्यू को निर्देश देता है कि वह पैसा उसके अधीनस्थ को सौंप दें.

लेफ्टिनेंट कर्नल गोगोई: यहां काम करना थोड़ा मुश्किल है. थोड़ी जुगत भिड़ानी पड़ती है… मेरा हिस्सा उन साहब को दे दो (एक व्यक्ति की ओर इशारा)

इस पर सूबेदार पी लिंबू अपने वरिष्ठ अधिकारी तथा अपने हिस्से का पैसा लेते हैं.

सूबेदार लिंबू: (पैसा लेते हुए) सर ने क्या कहा?
ठेकेदार: सर ने यह हिस्सा आपको देने को कहा.

बी के सरकार असम राइफल्स के महानिदेशालय के भुगतान और लेखा कार्यालय में वरिष्ठ लेखा अधिकारी हैं. यह लेखा विभाग का सबसे बड़ा पद है. जिस वक्त तहलका की टीम उनके केबिन में घुसी उन्होंने ठेकेदार मैथ्यू के सारे बिल निकाले और अपने हिस्से के पैसे का हिसाब लगाया और कहा कि पहले उनका बकाया निपटाया जाए.

तहलका की पड़ताल से यह भी पता चलता है कि बीते सालों के दौरान इनमें से कुछ अधिकारियों ने अवैध रूप से बहुत अधिक संपत्ति एकत्रित कर ली है. सूत्रों के मुताबिक असम राइफल्स के एक वरिष्ठ अधिकारी कथित तौर पर पूर्वोत्तर में इसी अवैध कमाई से एक पांचसितारा होटल बनवा रहे हैं.

तहलका को मिली जानकारी के मुताबिक इंफाल के करीब एक शिविर को जल्द ही खाली कराया जा रहा है ताकि एक नया शिविर बनाने के लिए परियोजना को मंजूरी दी जा सके. ऐसा करके और अधिक धन बनाया जा सकेगा. इसी तरह अनेक ऐसी परियोजनाएं हैं जो फिजूल में चल रही हैं.

एक और स्तब्ध करने वाली बात यह है कि एक ठेकेदार ने असम राइफल्स के शिविर के भीतर ही अपना गोदाम बना रखा है. उसका दावा है कि उसने डीआईजी की मंजूरी ली है. इसका इस्तेमाल निर्माणा सामग्री तथा अन्य उपकरण रखने के लिए किया जाता है. हालांकि नियमानुसार किसी शिविर का इस्तेमाल ऐसे काम में नहीं किया जा सकता. यह पूरी तरह अवैध है. एक ठेकेदार सुरेश ने तो कैमरे पर ही यह भी स्वीकार किया कि उसने इस संवेदनशील क्षेत्र में डीआईजी की इजाजत से यह निर्माण अपने निजी इस्तेमाल के लिए किया है.

ठेकेदार सुरेश: यह पूरा इलाका एकदम शुरुआत से ही हमने बनाया है. मैंने यह इलाका ले रखा है, मुझे इसके लिए डीआईजी की अनुमति हासिल है.

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उत्तर-पूर्व के रक्षक

अंग्रेजों ने 1835 में असम में एक अर्द्ध सैन्यबल की स्थापना की थी. इसका काम था कछारी जमीन को पहाडों पर वास करने वाली ‘जंगली जनजातियों’ से बचाना. इसे बीच में बल को कई नाम दिए गए जैसे असम फ्रंटियर पुलिस (1883), द असम मिलेटरी पुलिस (1891) और ईस्टर्न बंगाल एंड असम मिलेटरी पुलिस (1913). प्रथम विश्व युद्ध में इस बल के योगदान के बाद इसे 1917  में असम राइफल्स नाम दिया गया. क्षेत्र में असम राइफल्स से जुड़ाव के कारण इस बल को  ‘उत्तर-पूर्व के रखवाले’ और  ‘पहाड़ी लोगों के मित्र’ जैसे नामों से नवाजा जाता रहा है. आज असम राइफल्स में 46 बटालियन हैं और इन्हें आंतरिक सुरक्षा के साथ-साथ भारत-म्यांमार सीमा की रखवाली की जिम्मेदारी दी गई है.

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अतीत में भी असम राइफल्स के ताकतवर और रसूखदार लोगों पर वित्तीय अनियमितताओं के इल्जाम लगते रहे हैं लेकिन वे मामले किसी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच सके. इससे खुफिया विभाग और सतर्कता विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठते हैं. लेकिन एक सवाल जिससे हर किसी को चिंतित होना चाहिए वह यह कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर इन लालची अधिकारियों का भरोसा कैसे किया जाए? क्या देश बाहरी दुश्मनों के नापाक इरादों से सुरक्षित है?

इन अवैध गतिविधियों का असम राइफल्स जैसी संस्था पर असर पड़ना तय है. भ्रष्टाचार में जो लोग शामिल हैं वे मूलरूप से डेस्क पर यानी कार्यालय में काम करने वाले हैं. इनमें क्लर्क, जेसीओ, इंजीनियर और अन्य अधिकारी हैं. इनके विपरीत अशांत माहौल में अपनी जान जोखिम में डालकर विद्रोहियों से लोहा लेने वालों को इन कार्यालयीन कर्मियों की तुलना में कम वेतन मिलता है.

हो सकता है असम राइफल्स के जवानों के लिए विपरीत परिस्थितियों में विद्रोहियों से मुकाबला अब भी आसान हो. लेकिन उनका मनोबल बनाए रखने के लिए जरूरी है कि सरकार इस संस्थान में अमरबेल की तरह फैल चुके भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए जल्दी से सख्त कदम उठाए.

hindi@tehelka.com

अम्मा के जाने के बाद

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फोटोः एएफपी

2011 में भारी-भरकम बहुमत हासिल करके जयललिता ने जब चौथी बार तमिलनाडु की सत्ता संभाली तो कहा जाता है कि उनके जेहन में 2014 का लोकसभा चुनाव भी घूम रहा था. उस चुनाव को फतह करने के लिए तब उन्होंने बहुत सी ऐसी योजनाएं शुरू कीं, जिनके तार सीधे-सीधे लोगों की आम जरूरतों से जुड़े हुए थे. ‘अम्मा रसोई, ‘अम्मा नमक’ और ‘अम्मा मिनरल वाटर’ जैसी इन योजनाओं का उद्देश्य तमिलनाडु के लोगों को रियायती दरों पर खाना, पानी, कपड़े और अन्य जरूरी चीजें उपलब्ध कराना था. इन लोकलुभावन योजनाओं ने अपना पूरा असर दिखाया और उनकी पार्टी को आमचुनाव में राज्य की कुल 39 में से 37 सीटें मिल गईं.

अपने ‘अम्मा नामधारी योजना’ अभियान में इजाफा करते हुए जयललिता ने बीते 26 सितंबर को एक और योजना ‘अम्मा सीमेंट’ का श्रीगणेश किया. इसका मकसद गरीब लोगों को मकान बनाने के लिए बाजार मूल्य से कम कीमत पर सीमेंट उपलब्ध कराना था. तमिल राजनीति के जानकारों के मुताबिक अम्मा सीमेंट की मदद से वे 2016 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अपने राजनीतिक दुर्ग को और भी मजबूती देना चाहती थीं. लेकिन जयललिता का यह सपना परवान चढ़ने से पहले ही भरभरा गया. इस योजना की लॉन्चिंग के दो दिन बाद ही आय से अधिक संपत्ति रखने के एक मामले में बंगलुरू की विशेष अदालत ने उन्हें चार साल कैद की सजा सुना दी. पिछले साल आए सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के मुताबिक अब किसी भी कोर्ट से सजा होते ही जनप्रतिनिधियों की संसद या विधानसभा की सदस्यता खत्म हो जाएगी. अदालत से सजा मुकर्रर होने के बाद वे अब सलाखों के पीछे हैं और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की वजह से वे अब जनप्रतिनिधि भी नहीं रहीं. इस सजा ने उनका मुख्यमंत्री पद तो छीना ही, साथ ही उन्हें अगले दस सालों तक चुनावी अखाड़े में उतरने के लिए भी अयोग्य घोषित कर दिया है. ऐसे में जयललिता के राजनीतिक भविष्य के साथ ही उनकी खुद की पार्टी और उससे भी ज्यादा तमिलनाडु की सियासत को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हो गए हैं. सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि पूरे एक दशक तक सक्रिय राजनीति में न रह पाने के चलते जयललिता का राजनीतिक रसूख कितना बचा रह पाएगा? इन सवालों की पड़ताल करने से पहले एक सरसरी नजर उस घटनाक्रम पर डालते हैं जिसने जयललिता को मुख्यमंत्री की कुर्सी से सलाखों के पीछे पहुंचाया.

1991 में पहली बार मुख्यमंत्री बनी जयललिता ने तब अपनी कुल आमदनी तकरीबन तीन करोड़ रुपये बताई थी. इसके साथ ही उन्होंने ऐलान किया था कि मुख्यमंत्री रहते हुए वे सिर्फ एक रुपया मासिक वेतन ही लेंगी. लेकिन इस बीच उनकी संपत्ति में आश्चर्यजनक रूप से लगातार बढ़ोत्तरी होने की खबरें सामने आने लगीं. जयललिता की शाही जीवनशैली के चलते भी इन बातों को बल मिलने लगा कि उनके पास बेहिसाब पैसा हो सकता है. जून 1996 में तत्कालीन जनता दल नेता (अब भाजपाई) डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने जयललिता पर 1991 से 1996 के बीच अकूत संपत्ति बनाने तथा अपने करीबी लोगों को लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया और शिकायत कर दी. इसके बाद तमिलनाडु के सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक विभाग ने उनके खिलाफ मामला दायर कर इसकी जांच शुरू कर दी. 2003 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस मामले को चेन्नई से बंगलुरु स्थानांतरित किया गया. अट्ठारह साल के बाद आखिरकार अदालत ने जयललिता पर लगे आरोपों को सही पाया और बीती 28 सितंबर को फैसला देते हुए उन्हें चार साल की कैद के साथ 100 करोड़ रुपये के जुर्माने की सजा दे दी.

‘जयललिता भी एकला चलो की परिपाटी पर चलने वाली हैं. उनकी पार्टी में नंबर दो तो क्या तीसरे, चौथे और पांचवें नंबर पर भी कोई नेता नहीं है’

लगभग दो दशक तक चली इस अदालती प्रक्रिया के बाद वे बतौर मुख्यमंत्री सजा पाने वाली पहली नेता बन गई हैं. इसके साथ ही वे लालू प्रसाद यादव, ओेमप्रकाश चौटाला और मधु कोड़ा जैसे पूर्व मुख्यमंत्रियों की जमात में शामिल हो गई हैं जिन्हें भ्रष्टाचार करने के चलते जेल जाना पड़ा. अपने दम पर राजनीति के शिखर पर पहुंची जयललिता के लिए यह एक बड़ा झटका माना जा रहा है. जानकारों का एक बड़ा वर्ग इसे उनके राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिन्ह के रूप में देखने लगा है. इस वर्ग की मानें तो कानून के हथौडे़ ने जयललिता के राजनीतिक भविष्य पर इतनी बड़ी चोट कर दी है कि इससे उबरने में उन्हें और उनकी पार्टी को जबर्दस्त चुनौतियां झेलनी पड़ेंगी. यह चुनौती इसलिए भी बड़ी मानी जा रही है क्योंकि अब तक अपनी पार्टी की एकमात्र धुरी वे ही रही हैं. इस का प्रमाण यह भी है कि उनको सजा हो जाने के बाद पार्टी को नया मुख्यमंत्री तय करने में तीन दिन का समय लग गया. इसके बाद उन्हीं पन्नीरसेल्वम को मुख्यमंत्री बनाया गया है जो एक बार पहले भी वर्ष 2001 में तांसी मामले में जयललिता को सजा मिलने के बाद मुख्यमंत्री बनाए गए थे और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पर नहीं बैठा करते थे. ऐसे में सवाल उठता है कि इस तरह की स्थितियों में पार्टी का आगामी भविष्य क्या होगा.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के हावी होने के बावजूद जयललिता के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक ने तमिलनाडु में शानदार सफलता हासिल की थी. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य में उनका प्रभाव किस कदर है.’ वे आगे कहती हैं, ‘जयललिता को सजा मिल जाने से उनकी पार्टी में नेतृत्व को लेकर जो शून्य पैदा हो गया है उसकी भरपाई बहुत कठिन है. ऐसे में 2016 में जब तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होंगे तब पार्टी को उनके बिना भारी चुनौतियां सहनी पड़ सकती हैं.’ जयललिता की अनुपस्थिति में पैदा होने वाले जिस शून्य की ओर नीरजा और इशारा कर रही हैं, उसको देखते हुए यह जानना जरूरी हो जाता है कि जयललिता के नहीं होने के चलते पार्टी में नेतृत्व का सूखा पड़ने की आखिर कौन सी वजहें हैं. जयललिता के राजनीतिक अवतरण की कथा के आलोक में जाने पर इस सवाल का जवाब आसानी से ढूंढा जा सकता है.

मात्र पंद्रह साल की उम्र में बतौर अभिनेत्री अपना सिनेमाई कैरियर शुरू करने वाली जयललिता ने 1984 में सक्रिय रूप से राजनीति शुरू की. तब राज्य के मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन काफी बीमार थे और जयललिता पार्टी में अपना प्रभाव जमा रहीं थी. उस वक्त इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी और कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति का माहौल था. इसी का लाभ उठाते हुए एआईएडीएमके ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया और चुनाव में जीत हासिल कर ली. इस बीच मुख्यमंत्री रामचंद्रन को इलाज के लिए अमेरिका भेजा गया, जहां 1987 में उनका निधन हो गया. रामचंद्रन के निधन के बाद उनकी पत्नी जानकी राज्य की मुख्यमंत्री बनीं. लेकिन जयललिता ने इसका विरोध करते हुए खुद को रामचंद्रन का असली उत्तराधिकारी करार दिया और बगावत कर दी. इसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में उन्होंने शानदार प्रदर्शन करके इस बात को सच साबित कर दिखाया. विधानसभा चुनाव में उनके धड़े को 23 सीटें मिलीं, जबकि जानकी गुट एक सीट ही हासिल कर पाया. इसके बाद जयललिता ने दोनों गुटों को एकजुट करने का काम किया और निर्विवाद रूप से पार्टी की सर्वेसर्वा बन गईं. तबसे लेकर अब तक एआईडीमके पर उनका वर्चस्व कायम है. इसी का परिणाम है कि आज तक उनकी पार्टी में दूसरी पंक्ति के नेता के रूप में कोई नहीं उभर पाया.

कुछ साल पहले सीनियर पत्रकार करन थापर को दिए एक इंटरव्यू में जयललिता का कहना था कि जहां इंदिरा गांधी, बेनजीर भुट्टे, भंडारनायके और शेख हसीना जैसी एशियाई नेत्रियों को राजनीति विरासत में मिली थी वहीं उन्होंने अपने खुद के दम पर अपना वजूद स्थापित किया है. बहुत से जानकार इस बात को स्वीकार भी करते हैं. वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, ‘इस बात से कोई इंकार नहीं किया जा सकता कि जयललिता ने राजनीति में अपने बूते इतना बड़ा कद हासिल किया है. यही वजह है कि आज उनकी पार्टी में दूर-दूर तक कोई भी एेसा व्यक्ति नहीं दिखता जिसे उनके विकल्प के रूप में देखा जा सके’. एक वेबसाइट पर वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन लिखते हैं, ‘नरेंद्र मोदी, मायावती, ममता बनर्जी और अन्य प्रमुख व्यक्ति केंद्रित नेताओं की तरह जयललिता भी एकला चलो की परिपाटी पर चलने वाली हैं. उनकी पार्टी में नंबर दो तो क्या तीसरे, चौथे और पांचवें नंबर पर भी कोई नेता नहीं है.’

समर्थन जयललिता के जेल जाने की खबर से राज्यभर में उनके समर्थकों के बीच शोक का माहौल हो गया था. फोटोः एएफपी

यही तथ्य उनके और उनकी पार्टी के लिए मुश्किल पैदा करने वाला भी है. किदवई कहते हैं, ‘जयललिता, मायावती और ममता बनर्जी जैसी नेत्रियों की पार्टी में पहले तो दूसरे नंबर का कोई घोषित नेता नहीं है साथ ही एक और तथ्य यह भी है कि अविवाहित होने की स्थिति में इनके पास लालू, मुलायम और चौटाला जैसा वंशवादी राजनीतिक विकल्प भी नहीं है. ऐसे में इन पर संकट आने से पूरी पार्टी पर संकट आना स्वाभाविक है. नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘जयललिता को दोषी ठहराए जाने का यह अदालती फैसला यदि ऊपरी अदालतों में भी बरकरार रहता है तो ऐसे में मजबूत उत्तराधिकारी न होने के चलते दूसरे राजनीतिक दल राज्य में अपने लिए संभावनाएं तलाश सकते हैं. ऐसे में अब दूसरे दलों की गतिविधियों को देखा जाना भी महत्वपूर्ण होगा कि जयललिता की अनुपस्थिति को वे किस तरह अपने पक्ष में कर सकते हैं.’

तमिलनाडु की राजनीति में अन्नाद्रमुक के अलावा दूसरा सबसे प्रमुख दल डीएमके है. दूसरे शब्दों में कहें तो ये दोनों दल ही तमिल राजनीति की धुरी रहे हैं. 1967 में एम भक्तवत्सलम के नेतृत्व में आखिरी बार तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी की सरकार रही. तब से अब तक लगभग आधी सदी के दौरान तमिलनाडु की सत्ता इन्ही दो पार्टियों के बीच बंटती रही है. ऐसे में यह सवाल उठना वाजिब लगता है कि क्या जयललिता के जेल चले जाने के बाद विपक्षी दल डीएमके के पास कोई मौका हो सकता है?

कई राजनीतिक जानकार इसका जवाब ‘ना’ में देते हैं. उनका मानना है कि बेशक जयललिता को सजा हो जाने के बाद द्रमुक के नेतृत्व और उसके कैडर का उत्साह बढ़ेगा लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इससे उसकी स्थिति में सुधार होगा ही. 2014 के लोकसभा चुनावों में सूपड़ा साफ होने के साथ ही द्रमुक सुप्रीमो करुणानिधि के कुनबे में चल रही पारिवारिक कलह को इसकी बड़ी वजह के रूप में देखा जा रहा है. किदवई कहते हैं, ‘बेशक पिछले कई दशकों से तमिलनाडु की राजनीति अन्नाद्रमुक और द्रमुक के बीच ही घूमती रही है. लेकिन जयललिता के कमजोर पड़ जाने के बाद भी द्रमुक के लिए यह उतना अच्छा अवसर शायद ही साबित हो. क्योंकि करुणानिधि के परिवार में आपसी झगड़े और उसके नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनकी पार्टी को हाल के समय में काफी कमजोर कर दिया है.’ वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं, ‘वे कहते हैं, पिछले कुछ सालों से डीएमके की हालत राज्य में लगातार खस्ता हुई है. पहले विधानसभा चुनावों में उसे करारी हार मिली और फिर लोकसभा चुनाव में उसका सफाया हो गया. ऐसे में राज्य में उसका काडर पूरी तरह बिखरा हुआ है. इसके अलावा करुणानिधि की बढ़ती उम्र के साथ ही उनके बेटों स्टालिन और अलागिरी के बीच सत्ता संघर्ष ने भी पार्टी को काफी नुकसान पहुंचाया है. ऐसे में जलयलिता का जेल जाना शायद ही डीएमके के लिए फायदा पहुंचा सकेगा.’

डीएमके की खस्ता हालत को लेकर राजनीतिक पंडितों की इस राय को यदि सही मान लिया जाए तब भी यह सवाल तो उठता ही है कि तमिलनाडु की राजनीतिक तस्वीर में किस तरह के बदलाव आ सकते हैं. सवाल यह भी उठता है कि क्या इन स्थितियों में भाजपा तथा कांग्रेस के लिए राज्य में कोई संभावना पैदा हो सकती है?

जयललिता को सजा हो जाने के बाद द्रमुक के नेतृत्व और उसके कैडर का उत्साह बढ़ेगा लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि इससे उसकी स्थिति में सुधार हो ही जाए

कांग्रेस पार्टी की बात की जाए तो 2014 के लोकसभा चुनाव में उसकी दुर्गति किसी के छिपी नहीं है. लेकिन आंकड़े यह भी बताते हैं कि इस चुनाव से पहले उसे तमिलनाडु में नौ से 15 प्रतिशत के बीच वोट मिलते रहे हैं. ऐसे में बहुत संभव है कि कांग्रेस अपने इस वोट बेंक को फिर से हासिल करने की कोशिश करे. लेकिन क्या यह इतना आसान होगा? किदवई कहते हैं, ‘कांग्रेस पार्टी के लिए इस वक्त पूरे देश में जिस तरह का मोहभंग चल रहा है, उसे देखते हुए पार्टी की डगर यहां भी काफी मुश्किल नजर आती है. इसके अलावा उसकी मुश्किल यह भी है कि उसके पास प्रदेश स्तर पर कोई राजनीतिक चेहरा ऐसा नहीं है जो जयललिता की परछाईं भी साबित हो सके.’ कांग्रेस के बाद यदि भाजपा की बात करें तो तमिलनाडु के छोटे दलों के साथ गठजोड़ करके वह लोकसभा चुनाव में अपना खाता यहां से खोल चुकी है. इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रभाव के सहारे पार्टी देशभर के सभी राज्यों में अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश जारी रखे हुए हैं. ऐसे में तमिलनाडु की राजनीति में आए इस परिवर्तन को अपने पक्ष में भुनाने में शायद ही वह कोई कमी रखे. नीरजा चौधरी कहती हैं, ‘जिस तरह से भाजपा इन दिनों कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश में लगी है उसे देखते हुए इस बात की बहुत संभावना है कि 2016 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए वह यहां के राजनीतिक समीकरणों में खुद को शामिल करने की पूरी कोशिश करेगी. हालांकि महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों के नतीजों पर भी भाजपा की रणनीति काफी हद तक निर्भर करेगी.’ लेकिन अजय बोस नीरजा की बातों से असहमति जताते हुए कहते हैं, ‘बेशक भाजपा ने लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु में खाता खोल लिया हो लेकिन अंतत: यहां क्षेत्रीय राजनीति की चलेगी. ऐसे में हो सकता है कि कोई नया क्षेत्रीय दल राज्य में आकार लेने की कोशिश करे, लेकिन फिलहाल ऐसा होता नहीं दिखता.’

इन बातों के साथ ही अजय बोस तमिलनाडु की राजनीति में जया के प्रभाव को कम आंकने को जल्दबाजी भी करार देते है. वे कहते हैं, ‘बेशक अदालत ने जयललिता को सजा सुना दी है लेकिन इससे हाल-फिलहाल में उनकी पार्टी और उनके प्रभाव को कोई नुकसान नहीं दिख रहा है. इसकी प्रमुख वजह तमिलनाडु में कमजोर विपक्ष के साथ ही उनका खुद का मजबूत कद है.’ इसके अलावा जयललिता के पास अभी ऊपरी अदालत का विकल्प मौजूद है, और यदि उन्हें किसी तरह वहां से राहत मिल जाती है तो वे पहले के मुकाबले और भी मजबूत हो जाएंगी. राजनीतिक विश्लेषक अरविंद मोहन की मानें तो जयललिता के खिलाफ आए फैसले से तमिलनाडु की राजनीति में कुछ बदलाव देखने को भले ही मिल जाएं लेकिन जिस तरह से उन्होंने लगातार पिछले कुछ चुनाव शानदार ढंग से जीते हैं, उन्हें पूरी तरह से खारिज कर देना जल्दबाजी होगी. अपने एक लेख में अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ के मैनेजिंग एडिटर जयंत वासुदेवन लिखते हैं, ‘जयललिता के खिलाफ आए हालिया फैसले से तमिलनाडु में उनकी पार्टी की राजनीति पर फिलहाल बुरा असर पड़ने की कोई आशंका नहीं है. वैसे भी राज्य में विधानसभा चुनाव अभी दो साल दूर हैं. तब तक के लिए जयललिता ने सरकार पर पकड़ बरकरार रखने के लिए ‘रामचरितमानस’ के राम की तरह ‘भरत’ का चयन कर लिया है. हालांकि इस सबके बावजूद इस बात में बहुत दम है कि जयललिता की आगे की राजनीति काफी हद तक अदालत के आदेश से ही तय होगी.’

इन सब तर्कों के आधार पर देखा जाए तो एक बात साफ तौर पर नजर आती है कि तमिलनाडु की मौजूदा राजनीति में जयललिता का कद बाकी सबके मुकाबले कहीं ऊंचा है. उनकी सजा का ऐलान होते ही राज्यभर में लोगों ने जोर-शोर से विरोध प्रदर्शन आयोजित किए. उनके जेल जाने के बाद से कई लोग भारी सदमे में हैं. यहां तक कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों से दर्जनभर से ज्यादा आत्महत्याओं की खबरें अब तक सामने आ चुकी हैं. ऐसे में माना यही जा रहा है कि तमिलनाडु के लोग इस वक्त जयललिता के पक्ष में पूरी तरह लामबंद हैं और जल्द से जल्द उनकी रिहाई चाहते हैं.

लेकिन सच यही है कि यदि उन्हें अदालत से राहत नहीं मिली तो दस साल बाद जब वे फिर से चुनावी राजनीति में उतरेंगी तब तक बहुत कुछ बदल चुका होगा. उनकी खुद की ही बात करें तो हिंदू मान्यताओं के मुताबिक वे तब ‘वानप्रस्थ’ वाली अवस्था (76 साल) को प्राप्त कर चुकी होंगी. उस हालत में फिर से सारी ऊर्जा समेटकर राजनीति के क्षितिज पर पहले की तरह चमकना किसी के लिए आसान नहीं हो सकता. फिर चाहे वह जयललिता ही क्यों न हों.

हैदर: ये जिंदगी की समीक्षा है, देखनी ही होगी आपको

फिल्म : हैदर निर्देशक : विशाल भारद्वाज लेखक : बशारत पीर, विशाल भारद्वाज कलाकार : तब्बू, के के, शाहिद कपूर, नरेंद्र झा, इरफान खान, श्रद्धा कपूर
फिल्म : हैदर निर्देशक : विशाल भारद्वाज लेखक : बशारत पीर, विशाल भारद्वाज कलाकार : तब्बू, के के, शाहिद कपूर, नरेंद्र झा, इरफान खान, श्रद्धा कपूर
फिल्म : हैदर
निर्देशक : विशाल भारद्वाज
लेखक : बशारत पीर, विशाल भारद्वाज
कलाकार : तब्बू, के के, शाहिद कपूर, नरेंद्र झा, इरफान खान, श्रद्धा कपूर

हैदर’ गोल-गोल कंटीली बाड़ों से हर तरफ लिपटा हुआ एक इंद्रधनुष है. वो कंटीले तार जो उन शहरों में बिछते हैं जिन्हें आर्मी अपना घर बना लेती है. कश्मीर में. हर तरफ. फिल्म के पास हर वो रंग है जो जिंदगी के साथ आता है, लेकिन क्योंकि कश्मीर है, त्रासदी की कंटीली तारों से झांकने को हर वो रंग मजबूर है. वो फिर भी खूबसूरत है, रिसता है, बदले की बात करता है, खून के छींटे उछालता है, मगर खालिस सच दिखाता है.

फिल्म के पास क्या नहीं है. कब्रों को खोदते फावड़ों का शोर, कब्रों को दड़बे बनाने का हुनर, झेलम की रक्तरंजित गाथा, श्रापित इंसानियत, और सच दिखाने का साहस. हैदर का साहस देखिए, पागलपन को जो आवाजें राष्ट्रभक्ति कहती हैं उन्हीं की दुनिया में वो बन रही है, हमें उधेड़ रही है, कुरेद रही है. वो फिल्म के रूप में भी उत्कृष्ट है और जो बात कहना चाहती है उसमें भी गजब की ईमानदार. वो कभी जिंदगी की खाल खींचती है कभी खींची खाल वापस लगाकर सहलाती है. वापस खींचने के लिए उसे फिर तैयार करती है.

मगर आप हेमलेट से तुलनात्मक अध्ययन करके हैदर का मजा मत खराब करिएगा. विशाल पर विश्वास करिएगा. वे हैं तो शेक्सपियर को भी थोड़ा बदलेंगे ही, और नया कुछ कहेंगे ही. हैदर के लिए उनके पास हेमलेट भी था और बशारत पीर भी. और उनकी किताब ‘कर्फ्यूड नाइट’ भी. किताब के बशारत पीर के निजी अनुभवों को फिक्शन के साथ जोड़ने की विशाल की अद्भुत कला ने ही फिल्म को दुर्लभ दृश्य भी दिए हैं. आइडेंटिटी कार्ड लेकर परेड करने का दृश्य हो या एक स्कूल में बना इंटेरोगेशन सेंटर. एक बार जब विशाल कश्मीरी जिंदगियों की नब्ज पकड़ लेते हैं, तब हेमलेट को लाते हैं. शाहिद कपूर को लाते हैं. फिल्म के शुरूआत में शाहिद को किरदार हो जाने में जो कसमसाहट होती है, साफ दिखती है. मगर धीरे-धीरे जब वे रवां होते हैं, क्या खूब अभिनय करते हैं. लाल चौक पर वो अभिनय के सर्वोत्तम मुकाम को छूते हैं,‘टू बी और नाट टू बी’ को हिंदी आत्मा देते गुलजार के शब्दों का शरीर हो जाते हैं, और ‘बिसमिल’ में हमें बताते हैं कि अगर चाहो तो नृत्य भी अभिनय हो सकता है. लेकिन अभिनय जब साक्षात दर्शन देता है, समझ लें वो के के मेनन के रूप में आता है. उन्होंने अपनी नसों में भर के हैदर के चाचा का किरदार जिया है. और वे सर्वश्रेष्ठ होते अगर फिल्म में तब्बू नहीं होतीं.

फिल्म जहां-जहां धीमी होती है, हेमलेट से न्याय करने के चक्कर में, वहां भी उसके पास तब्बू हैं जिनका सिर्फ चेहरा ही अभिनय की पाठशाला है यहां. यही चेहरा कश्मीर की सारी बेवाओं, सारी ब्याहताओं के दर्द को सामने लाने का बीड़ा उठाता है. या शायद आधी बेवाओं और आधी ब्याहताओं का. हैदर और उसकी मां के रिश्ते को जिस साहस से विशाल परदा देते हैं, हमारे सिनेमा में ऐसी हिम्मत इससे पहले कभी नहीं रही. इसके अलावा इरफान खान हैं, जिनकी राकस्टार एंट्री दिलचस्पी बढ़ाती है. बेहद छोटे रोल में कुलभूषण खरबंदा हैं, एक जरूरी संवाद के साथ, जिसे सुना जाना चाहिए. और भुलाये जा चुके नरेंद्र झा हैं, हैदर के पिता, जिनके ईमानदार अभिनय को देखकर अच्छा लगता है. बहुत अच्छा.

कुछ चीजों की तलब जरूरी है. इसलिए हैदर देखिए. बशारत पीर की किताब पढ़िए. ठंड आने से पहले कुछ तो समझदार करिए.

‘ये सीट विकलांगों के लिए आरक्षित है’

मनीषा यादव
मनीषा यादव
मनीषा यादव

बीते अगस्त का एक दिन था. जैसा कि होता है, दिल्ली के व्यस्ततम मेट्रो स्टेशन राजीव चौक पर तिल रखने की जगह नहीं थी. किसी तरह कोच में घुसने में कामयाब हुआ तो कानों में लगे इयरफोन में बेगम अख्तर  बेसाख्ता बोल उठीं- ये न थी हमारी किस्मत… बेगम साहिबा के लफ्जों से राहत पाता मैं एक कोने में जा खड़ा हुआ. सफर थोड़ा लंबा था इसलिए मैं अपने बैग में रखी ऐन फ्रैंक की किताब ‘द डायरी ऑफ ए यंग गर्ल’ के कुछ बचे हुए पन्ने पढ़ने में मशगूल हो गया. साथ ही मेट्रो के शीशों से बाहर झांकते हुए दिल्ली को भीगते देखना भी अच्छा लग रहा था.

सफर के दौरान अक्सर मैं उस सीट पर बैठने से परहेज ही करता आया हूं जो कि महिलाओं के लिए आरक्षित हो. किसी तरह की ‘शर्म’ की वजह से नहीं बल्कि इस बात के चलते कि अक्सर उस सीट पर बैठे हुए लोगों को (खासकर पुरुषों को) अगले एक दो स्टेशन पर उठते हुए देखता हूं. लेकिन, कई मर्तबा इसके उलट, उस सीट पर मैंने कुछ पुरुषों को जोंक की तरह चिपकते और जानबूझकर सोने का बहाना करते हुए भी देखा है. न जाने उस सीट पर बैठते ही उन्हें नींद अपने आगोश में कैसे ले लेती है, जिससे कई बार मजबूरन कुछ न बोल पाने वाली महिलाओं को खड़े-खड़े ही सफर तय करना पड़ता है. और सीट पर बैठे व्यक्ति अपनी नींद पूरी करने का बहाना करते पाए जाते हैं. लेकिन आज तो तमाम आरक्षित सीटें भी ‘घेरी’ जा चुकी थीं.

तभी, अचानक कोच से आ रही कुछ एक आवाजों और ठहाकों ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा. ये मेरे साथ राजीव चौक से चढ़े कुछ दोस्तों का ‘झुंड’ था, जो अपने साथ की एक महिला साथी से ‘दोस्ती के नामपर’ चुहल करने में लगा हुआ था. कभी उसके ऑफिस के दूसरे साथियों के नाम पर तो कभी उसके पति के नाम पर. इस बीच मैंने शोर के चलते किताब वापस बैग में रख ली. पर ये बात उस लड़की के चेहरे पर उमड़ रहे हाव-भाव से साफ थी कि कहीं न कहीं वह उन बातों को इतनी भीड़ में सुनना पसंद नहीं कर रही थी. असहज होते हुए भी वह चुप थी और बीच-बीच में झूठी मुस्कुराहट बिखेरने को मजबूर थी.

‘असल में हास्य के नाम पर ये समूह उस समाज की नुमाइंदगी कर रहा था जो शारीररक अक्षमता को हीन भावना और मजाक समझता है’

इस दौरान स्टेशनों पर लोगों के चढ़ने-उतरने का सिलसिला जारी रहा. मेरा भी गंतव्य स्थान नजदीक आ रहा था. तभी, वृद्ध एवं विकलांगों के लिए आरक्षित सीट खाली होने पर वह महिला बिना कोई मौका गंवाये जाकर बैठ गई, जिस पर उसके बाकी (पुरुष) साथियों ने चेहरे पर एक शातिर मुस्कान बिखेरते हुए उसे ये कहकर तंज दिया कि ‘तुम सही जगह पर बैठी हो, ये सीट विकलांगों के लिए ही आरक्षित है’ और अपना सामान उसकी गोद में थमा दिया. बाकी दोस्तों के साथ-साथ खुद उस लड़की ने इस बात पर हंसना जरूरी समझा. लेकिन मेरे जेहन ने मजाक के नाम पर इस ओछी और असंवेदनशील बात को सहन करना सही नहीं जाना. समझाइश के तौर पर मैंने ‘संभ्रांत’ दिखने वाले उस समूह को इस उम्मीद के साथ कि वे मेरी बात समझ सकेंगे ये कहते हुए टोका कि आप मजाक के नाम पर समाज के एक वर्ग के प्रति असंवेदनशील बर्ताव कर रहे रहे हैं, जो की आप जैसे ‘पढ़े-लिखे’ नौकरीपेशा लोगों को शोभा नहीं देता.

‘ये मेरी दोस्त है और मैं अपने दोस्त से ये कह रहा हूं’ समूह का वह शख्स अब मेरी ओर मुखातिब था जिसने अभी-अभी उस महिला पर ये असंवेदनशील तंज कसा था. असल में हास्य के नाम पर यह उनकी सोच का नमूना था. यह समूह उस समाज की नुमाइंदगी कर रहा था जो शारीरिक ‘अक्षमता’ को हीन भावना और मजाक समझता है. बहरहाल, मेरी उन बातों से मेट्रो में सवार लोगों को कुछ फर्क पड़ा कि नहीं ये मैं नहीं जानता.

शायद कोच से उतरने पर उन्होंने मुझे भी दूसरों के मामले में टांग अड़ाने वाले की संज्ञा दी हो, इसका भी मुझे इल्म नहीं. मेरा स्टेशन आ चुका था. कोच से उतरने के बाद मेरे लिए एक बात और पक्की हो गई थी कि ऐसे ही सोच के चलते यह वर्ग समाज का हिस्सा होते हुए भी काफी कम सामने आ पाता है. उन्हें हर बार छोटी-छोटी चीजों से इस बात का एहसास दिलाता है कि वे हमारे जैसे नहीं हैं. यहां तक कि कई मर्तबा अपने हास्य का ‘सामान’ बनाने में भी पीछे नहीं रहता. और ऐसी किसी घटना काे अपने आसपास होता देख मुखर होकर कुछ कहने, विरोध करने के बदले चुप रहता है.

-लेखक रेडियो जॉकी हैं और दिल्ली में रहते हैं.

इत्ते! उत्ते! कित्ते! से जित्ते! तक

shub-vihah
मनीषा यादव

ये इत्ता दे रहें. वे उत्ता दे रहें. उधर से इत्ता-इत्ता मिल रहा. इधर से उत्ता-उत्ता मिल रहा. उठते-बैठते इत्ता-उत्ता. खाते-पीते इत्ता-उत्ता. ऑफिस में जब आते तो इनके कलीग कहते, देखो भाई ‘इत्ते-उत्ते जी’ चले आ रहे हैं . ‘लड़के के बाप’ का लड़का ऊंचे पद पर है. बाप का कद इसलिए ज्यादा ऊंचा है. लड़का मोटा है. बाप का सीना चौड़ा है. कई रिश्ते देखे, मगर कोई जमा नहीं. जमे कैसे! जमने के लिए लड़के का बाप लड़की के बाप से इत्ता-उत्ता जीमे, तब तो बात जमे.

हाल ही में एक रिश्ता देखा. लड़के ने लड़की को देखा. बाप ने भी लड़की को देखा. लड़के की मां ने भी लड़की को देखा. लड़के की मौसी ने भी लड़की को देखा. लड़के की बुआ ने भी लड़की को देखा. लड़की मिलनसार थी. लड़की खूबसूरत थी. लड़की ‘ये’ भी थी, लड़की ‘वो’ भी थी. कुल मिलाकर लड़के के बाप ने प्रथमद्रष्टा लड़की को पास कर दिया. बेटे ने बाप की आज्ञा को पास कर दिया. मां ने दोनों की पंसद को पास कर दिया. बुआ-मौसी ने भी हां में हां मिलाकर पास कर दिया. परंतु बात ‘वहीं’ पर आकर रुक गई, जहां पहले भी कई बार रुक चुकी थी.

लड़के का बाप बात को ऐसी ही जगह पर लाकर रोकता था. जहां बात-बात में उसके मन की कोई बात निकले. बहरहाल, बात बढ़ते-बढ़ते बात रुक गई. क्योंकि बढ़ते-बढ़ते लड़की के बाप की हिम्मत जवाब दे गई. जहां पर आकर बात रुकी थी, वहां पर लड़के का बाप बोला. ‘वो उत्ता दे रहें थे.’ ‘ये इत्ता दे रहे थे.’ लेकिन लड़की का बाप इत्ते-इत्ते की अपनी विवशता जताता रहा. आखिर बात नहीं बनी. एक बार फिर…

मगर इसी बीच एक अनहोनी बात हो गई. लड़के-लड़की की आपस में चोरी-छुपे बात होने लगी. जमकर होने लगी. अब लड़के का बाप क्या करता? चूंकि उसने दुनिया देखी-समझी थी, फौरन मौके की नजाकत को ताड़ गया. एक प्रयास और किया. होने वाले संबंधी को फोन लगाया. फोन पर बात हुई. लड़के के बाप ने फिर पूछा, ‘कित्ता?’ उधर से जवाब मिला, ‘इत्ता ही.’

इधर लड़का अपने बाप के इत्ते-उत्ते की आदत से अब उकता चुका था. उसका पहला प्रबल कारण यह था कि इत्ते-उत्ते के चक्कर में लड़के की जित्ती उम्र निकल चुकी थी, उत्ती उम्र में तो उसे खुद बाप बन जाना चाहिए था. लड़का सोचने लगा पिता जी के इत्ते-उत्ते के चक्कर में तो उसकी शादी की उम्र ही निकली जाएगी. और दूसरा कारण, जो पहले से अधिक प्रबल था, लड़का इश्क की गिरफ्त में था. बुरी तरह से. नहीं… नहीं अच्छी तरह से.

लड़के के बाप को समझते देर न लगी कि बाजी उसके हाथ से निकल चुकी है. लड़का बागी हो चला. थक-हार कर लड़के की शादी वहीं करनी पड़ रही, जहां से इत्ता-उत्ता नहीं मिला. लड़की के बाप ने जित्ता दिया, उत्ते पर ही शादी तय हुई. इधर बारात निकल रही है और उधर लड़के के बाप के अरमानों का जनाजा. उधर विदाई में लड़की वाले आंसू बहा रहे हैं और इधर लड़के का बाप खून के आंसू पी रहा है.

शादी के बाद क्या दिन फिरे! आजकल लड़के का बाप एक गाना ‘मोहब्बत है क्या चीज ये हमको बताओ, ये किसने शुरू की हमें भी बताओ’ खूब सुन रहा है, हां मगर नम आंखों से.लड़के के बाप की इत्ता-उत्ता की आदत भी बदल गई है. अब वो इत्ता-उत्ता कि जगह सबसे जित्ता-जित्ता कहता फिर रहा है. खुद को दहेज का विरोधी बता रहा. ‘दुलहन ही दहेज है’ टर्राता फिर रहा है. हां. मगर वह चाहता है कि सारे जवान लड़कों के बाप उसकी तरह लाचार हो जाए.

कमबख्त इश्क न जाने और कितने लड़कों के बाप के अरमानों के महल को ताश के पत्तों की तरह ढहाएगा. देखते जाइए

व्यंग्य-सी नुकीली कविताएं

bookaसम-सामयिक और किसी कालखंड के लिए सबसे प्रासंगिक मुद्दों पर प्रभावपूर्ण टिप्पणी के लिए व्यंग्य सर्वाधिक उपयुक्त विधा है. व्यंग्य गद्य रूप में अधिक लिखा-पढ़ा जाने लगा है किंतु कविता की संप्रेषणीयता को यदि व्यंग्य की धार मिल जाती है तो उसका पाठक पर गहरा प्रभाव होता है. पंकज प्रसून के व्यंग्य कविता संग्रह ‘जनहित में जारी’ की पहली कविता ‘एमजी मार्ग का टेंडर’ ही लेखक के व्यंग्य से जुड़े गंभीर सरोकार को प्रमाणित करती हैं. कविता में भ्रष्ट और अकर्मण्य व्यवस्था पर तीखा कटाक्ष है, ‘गांधी के पथ पर चलना आसान नहीं है, हम इसको और कठिन बनाते हैं.’

संग्रह की कविताओं में बार-बार संवेदनहीन और दोहरे चरित्र वाली राजनीतिक व्यवस्था एवं राजनेताओं पर सटीक निशाना साधा गया है. ‘दो जुंओं की कहानी’ में आम आदमी से नेताओं की दूरी पर व्यंग्य हो या ‘पत्थर भी रोता है’ की ‘कार्य प्रगति पर है फिर भी विकास अवरुद्ध है’ जैसी पंक्तियां, सभी में व्यवस्था के प्रति तीखा आक्रोश प्रकट होता है. संग्रह की शीर्षक कविता ‘जनहित में जारी’ राजनीति के जनहित से विमुख होने पर गहरी चोट करती है, ‘तुम मुझे सत्ता दो, मैं तुम्हें भत्ता दूंगा. तुम मुझे देश दो, मैं तुम्हें उपदेश दूंगा.’

इन तमाम पंक्तियों को मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में परखा जा सकता है. देश में एक पूर्ववर्ती सरकार ने जनता को मजबूत प्रगति का आधार देने के बजाय खैरात बांटने की नीति पर काम किया और नई सरकार सत्ता मिलने के पश्चात जनता को उपदेश देने में जुटी है. विचार, साहित्य, बाजार और राजनीति, तमाम क्षेत्रों में  मौलिकता या खरेपन का संकट है, सब कुछ मिलावटी हो चला है. ऐसे ही हालात पर पंकज लिखते हैं, ‘संकरण का संक्रमण इस कदर फैला है/ विष को छोड़ बाकी सब विषैला है.’

वास्तविक जीवन में संपर्कों-संबंधों से कटकर सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया में गुम हुई नौजवान पीढ़ी से लेकर साहित्य, समाज और मानवीय संबंधों को भी कवि ने अपनी कविता का विषय बनाया है. मंच का कवि होने के कारण अधिकांश कविताओं में राजनेताओं पर व्यंग्य के वार हुए हैं संभवतया इस कारण ज्यादातर कविताएं एक विशेष दायरे में कैद दिखाई पड़ती हैं. पुस्तक में कई स्थानों पर टाइपिंग की गलतियां संप्रेषणीयता को बाधित करती हैं जिनको अगले संस्करणों में सुधारा जा सकता है.

प्रथम विश्व युद्ध: छले गए जो वीर

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‘यह कोई लड़ाई नहीं है. यह तो दुनिया का अंत है. हमारे पूर्वजों के महाभारत जैसा महायुद्ध है,’ ब्रिटेन के एक अस्पताल में पड़े एक गुमनाम भारतीय सैनिक ने, 29 जनवरी 1915 के अपने एक पत्र में लिखा था. इंदर सिंह नाम के एक सिख सैनिक ने, जो फ्रांस के सॉम मोर्चे पर लड़ते हुए घायल हो गया था, सितंबर 1916 के अपने एक पत्र में लिखा, ‘इसे तो असंभव ही समझो कि मैं जीवित घर लौट सकूंगा. मेरी मौत पर दुखी मत होना, मैं अपनी बांह थामे एक योद्धा की पोशाक में मरूंगा.’

100 साल पहले 28 जुलाई 1914 से 11 नवंबर 1918 तक चले प्रथम विश्वयुद्ध में इस तरह के न जाने कितने पत्र लिखे गए होंगे. न तो सभी पत्र आज उपलब्ध हैं और न सभी भारतीय सैनिक इतने साक्षर थे कि पत्र लिख सकते. ब्रिटिश सरकार उनके पत्र सेंसर करती थी. इसलिए अंग्रेजों की ओर से एशिया, अफ्रीका और यूरोप में लड़ रहे भारतीय सैनिक अपने मन की व्यथा-कथा न खुद लिख सकते थे और न किसी और से लिखवा सकते थे. उनकी मर्मांतक पीड़ा न तो भारत ने कभी जानी-समझी और न अंग्रेजों ने उसे कभी जानना चाहा. भारतवासियों के लिए वे ‘फिरंगियों के भाड़े के सैनिक थे’ और फिरंगियों के लिए ऐसे भाड़े के टट्टू, जिन की पीठ केवल बोझ ढोने के लिए ही बनी थी.

युद्ध के लिए 15 लाख की भर्ती
भारत उन दिनों आज से कहीं बड़ा था. पाकिस्तान और बांग्लादेश ही नहीं, श्री लंका और म्यांमार (बर्मा) भी ब्रिटिश भारत का हिस्सा हुआ करते थे. तब भी, सेना में भर्ती के लिए अंग्रेजों की पसंद उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी भारत के सिख, मुसलमान और हिंदू क्षत्रिय ही होते थे. उनके बीच से सैनिक व असैनिक किस्म के कुल मिलाकर लगभग 15 लाख लोग भर्ती किए गए थे. अगस्त 1914 और दिसंबर 1919 के बीच उनमें से 6,21,224 लड़ने-भिड़ने के लिए और 4,74,789 दूसरे सहायक कामों के लिए अन्य देशों में भेजे गए. इस दौरान एशिया, अफ्रीका और यूरोप के विभिन्न मोर्चों पर कुल मिलाकर करीब आठ लाख भारतीय सैनिक जी-जान से लड़े. इनमें 74,187 मृत या लापता घोषित किए गए और 69, 214 घायल हुए.

एशिया, अफ्रीका और यूरोप के विभिन्न मोर्चों पर कुल मिलाकर करीब आठ लाख भारतीय सैनिक जी-जान से लड़े. इनमें 74,187 मृत या लापता घोषित किए गए 

इस लड़ाई में भारत का योगदान सैनिकों व असैनिक कर्मियों तक ही सीमित नहीं था. भारतीय जनता के पैसे से 1,70,000 पशु और 3,70,000 टन के बराबर रसद भी मोर्चों पर भेजी गई. लड़ाई का खर्च चलाने के लिए गुलाम भारत की अंग्रेज सरकार ने लंदन की सरकार को 10 करोड़ पाउन्ड अलग से दिए. भारत की गरीब जनता का यह पैसा कभी लौटाया नहीं गया. मिलने के नाम पर पैदल सैनिकों को केवल 11 रुपय मासिक वेतन मिलता था. 13, 000 भारतीय सैनिकों को बहादुरी के पदक मिले और 12 को ‘विक्टोरिया क्रॉस.’ किसी भारतीय को कोई ऊंचा अफसर नहीं बनाया गया. न कभी यह माना गया कि भारी संख्या में जानलेवा हथियारों वाली ‘औद्योगिक युद्ध पद्धति’ से और यूरोप की बर्फीली ठंड से अपरिचित भारतीय सैनिकों के खून-पसीने के बिना इतिहास के उस पहले विश्वयुद्ध में ब्रिटेन की हालत बड़ी खस्ता हो जाती.

पिस्तौल से निकली युद्ध की चिंगारी
इस विश्वयुद्ध की आग भड़काने वाली चिंगारी बनी थीं पिस्तौल से निकली तीन गोलियां. युद्ध छिड़ने से ठीक एक महीना पहले, 28 जून 1914 के दिन, तत्कालीन ऑस्ट्रियाई-हंगेरियाई साम्राज्य के युवराज फ्रांत्स फर्डिनांड अपनी पत्नी सोफी के साथ बोस्निया की राजधानी सरायेवो के दौरे पर आए थे. ऑस्ट्रिया और हंगरी के इस मिलेजुले साम्राज्य ने 1878 से ही आज के बोस्निया-हे्र्त्सेगोविना पर कब्जा कर रखा था और 1908 में इसका अपने भीतर विलय भी कर लिया था. इससे राजशाही सर्बिया और अपने आप को स्लाव जातियों का संरक्षक समझने वाला तत्कालीन जारशाही रूस बहुत नाराज था. दूसरी ओर, ऑस्ट्रिया भी बोस्निया में रहने वाले क्रोएटों और मुसलमानों को वहां रहने वाले सर्बों के विरुद्ध भड़काया करता था. युवराज की यात्रा से कुछ पहले सरायेवो में सर्बों के विरुद्ध दंगे भी हो चुके थे. इसी गहमागहमी में राष्ट्रवादी सर्बों के एक गिरोह ‘म्लादा बोस्ना’ के छह नौजवानों ने सरायेवो यात्रा के समय युवराज फर्डिनान्ड की हत्या का षड़यंत्र रचा.

28 जून 1914 के उस अभिशप्त दिन जब कई कारों वाला युवराज का काफिला एक सड़क से गुजर रहा था तो घात लगाकर बैठे षड़यंत्रकारियों ने उस पर एक हथगोला फेंका. इस घटना में कुछ लोग घायल हो गए, पर युवराज बच गए और काफिला आगे बढ़ गया. एक अस्पताल का दौरा कर युवराज जब कोई एक घंटे बाद वापस लौट रहे थे तो उनका काफिला एक गलत मोड़ लेते हुए एक ऐसी सड़क पर पहुंच गया, जहां षड़यंत्रकारियों में से एक, गवरीलो प्रिंत्सीप नाम का 19 वर्ष का एक छात्र खड़ा था. रविवार का दिन था. पौने ग्यारह बजे थे. उसने आव देखा न ताव, युवराज पर पिस्तौल से दनादन तीन गोलियां दाग दीं. युवराज के साथ-साथ उनकी गर्भवती पत्नी ने भी कुछ समय बाद दम तोड़ दिया.

स्वाभाविक ही था कि ऑस्ट्रिया का राजघराना इस घटना से आगबबूला हो गया. उसने इस हत्याकांड का अपने ढंग से बदला लेने की ठानी. उसका मानना था कि युवराज और उनकी पत्नी की हत्या सर्बिया ने ही करवाई है. लेकिन, सर्बिया को दंडित करने का मतलब यह भी था कि जारशाही रूस उस की मदद के लिए मैदान में कूद पड़ता. इसलिए रूस को दूर रखने या जरूरत पड़ने पर उससे भी दो-दो हाथ कर लेने के विचार से ऑस्ट्रिया ने तत्कालीन जर्मन सम्राट विलहेल्म द्वितीय को पटाया. उन्होंने ऑस्ट्रियाई-हंगेरियाई साम्राज्य का बिना शर्त साथ देने का आश्वासन दिया. लगभग इसी तरह का एक आश्वासन उन्हीं दिनों जारशाही रूस ने सर्बिया को भी दिया.

जिस तरह द्वितीय विश्वयुद्ध के समय पश्चिमी जगत दो गुटों में बंटा हुआ था, उसी तरह प्रथम विश्वयुद्ध के समय भी यूरोप के दो शक्तिशाली साम्राज्यवादी गुट आमने-सामने थे. एक तरफ था 31 अगस्त 1909 के एक गठबंधन-समझौते से बना, जारशाही रूस, फ्रांस और ब्रिटेन का फ्रांसीसी नाम ‘अंतांत’ (मैत्री) वाला ‘मित्र-राष्ट्र’ गुट जिसे ‘मित्र-राष्ट्र तिकड़ी’ (ट्रिपल अंतांत) भी कहा जाता था. दूसरी तरफ था जर्मन साम्राज्य, ऑस्ट्रियाई-हंगेरियाई साम्राज्य और राजशाही इटली का त्रिगुट जिसे मध्यवर्ती शक्तियां (सेंट्रल पॉवर्स) कहा जाता था. तुर्की के तत्कालीन उस्मानी साम्राज्य से भी उसकी नजदीकी थी. तब भी, मध्यवर्ती शक्तियों वाला गुट सैन्यशक्ति और आर्थिक दृष्टि से मित्रराष्ट्र-तिकड़ी के आगे पौना ही बैठता था. हालांकि उसे अपनी ताकत का नशा कुछ ज्यादा ही था.

युद्ध की विधिवत घोषणा
सरायेवो हत्याकांड के तीन ही सप्ताह बाद, 20 से 23 जुलाई तक, फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति रेमोंद प्वांकार और प्रधानमंत्री रेने विवियानी जारशाही रूस की राजधानी सेंट पीटर्सबर्ग में थे. दोनों देशों का मत था कि ऑस्ट्रियाई-हंगेरियाई युवराज की हत्या के लिए सर्बिया को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. इसलिए सर्बिया पर यदि हमला होता है और रूस को उसकी मदद करनी पड़ती है, तो फ्रांस रूस का साथ देगा. इसके बाद घटनाचक्र तेजी से चला. ऑस्ट्रियाई-हंगेरियाई साम्राज्य के सम्राट फ्रांत्स योजेफ ने, 28 जुलाई 1914 को, सर्बिया के विरुद्ध युद्ध की विधिवत घोषणा पर हस्ताक्षर कर दिए. कहा जाता है कि सम्राट युद्ध की घोषणा को 12 अगस्त तक टालना चाहते थे, लेकिन जर्मनी दबाव डाल रहा था कि वे जल्द ही ‘खुल कर बोलें.’ 28 अगस्त की मध्यरात्रि के कुछ समय बाद सर्बिया की राजधानी बेल्ग्रेड पर तोपों के गोले बरसने लगे.

इसके बाद तो सैनिक जमावों और युद्ध-घोषणाओं का तांता लग गया. जर्मनी ने पहली अगस्त को रूस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी. बेल्जियम और फ्रांस की ओर बढ़ते हुए जर्मन सैनिकों ने दो अगस्त को लक्सेम्बुर्ग पर अधिकार कर लिया. जर्मनी ने तीन अगस्त को फ्रांस के विरुद्ध और ब्रिटेन ने चार अगस्त को जर्मनी के विरुद्ध युद्ध घोषित कर दिया. उसी दिन भारत सहित ब्रिटेन के सभी वर्तमान और पुराने उपनिवेशों की सरकारों ने भी घोषणा कर दी कि वे जर्मनी तथा मध्यवर्ती शक्तियों के विरुद्ध युद्ध की स्थिति में हैं. 1914 का नवंबर महीना आते-आते दक्षिण-पूर्वी यूरोप, पश्चिमी एशिया और उत्तर अफ्रीका तक फैला हुआ तुर्की का तत्कालीन विशाल उस्मानी साम्राज्य भी विश्वयुद्ध की चपेट में आ गया. आज के इराक, सीरिया, लेबनान, जॉर्डन, फिलिस्तीन आदि देश 100 साल पहले तक तुर्की के उस्मानी साम्राज्य के झंडे तले ही होते थे.

भारतीय सैनिक जत्था सबसे बड़ा
ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस ने उस समय के अपने-अपने उपनिवेशों के जितने भी सैनिक प्रथम विश्वयुद्ध में झोंके, उनमें ब्रिटेन के भारतीय सैनिकों की संख्या सबसे अधिक थी. उन्हें अपनी पहली लड़ाई 1914 और 15 की कठोर सर्दियों में फ्रांस के इप्र मोर्चे पर लड़नी पड़ी. ‘मेरठ’ और ‘लाहौर’ नाम की पहले दो भारतीय डिवीजन, जिनमें कुल मिलाकर 24 हजार सैनिक थे, सितंबर 1914 के अंत और अक्टूबर के शुरू में फ्रांस के मार्से बंदरगाह पर पहुंचे थे. उन्हें तुरंत तथाकथित ‘पश्चिमी मोर्चे’ की उन खंदकों में उतार दिया गया जिन्हें भारी क्षति के कारण अंग्रेज सैनिकों को खाली करना पड़ा था. दिसंबर 1915 आते-आते उन्हें और उनके बाद आए सैनिकों को फ्रांस और बेल्जियम में स्थित जीवोंशी, नौएव शपेल, फेस्तुबेअर और लोस जैसे एक से एक भयंकर युद्ध-मैदानों पर भारी हथियारों से लैस जर्मन सैनिकों से लोहा लेना पड़ा.

भारतीय सैनिकों को आधुनिक हथियारों का सामना करने और बर्फीली ठंड में लड़ने की पर्याप्त ट्रेनिंग नहीं मिली थी इसलिए वे गाजर-मूली की तरह कटे

भारतीय सैनिकों को आधुनिक भारी हथियारों का सामना करने और बर्फीली ठंड में लड़ने की न तो पर्याप्त ट्रेनिंग मिली थी और न उस तरह के पहनावे और साज-सामान ही. इसलिए वे गाजर-मूली की तरह कटे. अंग्रेज खुद पीछे रहते और उन्हें मरने-कटने के लिए आगे कर देते. फ्रांस में लड़े गए एक-तिहाई मोर्चे भारतीयों ने ही संभाले. कुल 1,38,000 भारतीय सैनिक वहां लड़े. 7,700 ने वीरगति पाई और 16,400 घायल हुए. 10 से 12 मार्च 1915 तक चली नौएव शपेल की लड़ाई में आधे सैनिक भारतीय ही थे. इसी लड़ाई के लिए भारत के खुदादाद खान को पहला ‘विक्टोरिया क्रॉस’ मिला था.

यूरोप के बाद मध्यपूर्व में घमासान
1915 के आखिर तक फ्रांस और बेल्जियम वाले मोर्चों पर के लगभग सभी भारतीय पैदल सैनिक तुर्की के उस्मानी साम्राज्य वाले मध्यपूर्व में भेज दिये गए. केवल दो घुड़सवार डिविजन 1918 तक यूरोप में रहे. तुर्की भी नवंबर 1914 से मध्यवर्ती शक्तियों की ओर से युद्ध में कूद पड़ा था. भारतीय सैनिक यूरोप की कड़ाके की ठंड सह नहीं पाते थे. मध्यपूर्व के अरब देशों में यूरोप जैसी ठंड नहीं पड़ती. वे भारत से बहुत दूर भी नहीं हैं इसलिए भारत से वहां रसद पहुंचाना भी आसान था. यूरोप के बाद उस्मानी साम्राज्य ही मुख्य रणभूमि बन गया था. इसलिए कुल मिलाकर 5,88,717 भारतीय सैनिक और 2,93,152 असैनिक कर्मी वहां के विभिन्न मोर्चों पर भेजे गए.

ब्रिटेन, फ्रांस और रूस का मित्रराष्ट्र-गुट तुर्क साम्राज्य की राजधानी कोंस्तांतिनोपल पर, जिसे अब इस्तांबूल कहा जाता है, कब्जा करने की सोच रहा था. इस उद्देश्य से ब्रिटिश और फ्रांसीसी युद्धपोतों ने, 19 फरवरी 1915 को, तुर्की के गालीपोली प्रायद्वीप के तटवर्ती भाग पर- जिसे दर्रेदानियल (डार्डेनल्स) जलडमरूमध्य के नाम से भी जाना जाता है- गोले बरसाए. लेकिन न तो इस गोलाबारी से और न बाद की गोलीबारियों से इच्छित सफलता मिल पाई.

केमाल पाशा का कमाल
इसलिए तय हुआ कि गालीपोली में पैदल सैनिकों को उतारा जाए. 25 अप्रैल 1915 को भारी गोलाबारी के बाद वहां ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के सैनिक उतारे गए. पर वे भी तेजी से आगे नहीं बढ़ पा रहे थे. उनकी सहायता के लिए भेजे गए करीब 3000 भारतीय सैनिकों में से आधे से अधिक मारे गए. गालीपोली अभियान अंततः विफल हो गया. जिस तुर्क कमांडर की सूझबूझ के आगे मित्रराष्ट्रों की एक न चली, उस का नाम था गाजी मुस्तफा केमाल पाशा. युद्ध में पराजय के कारण उस्मानी साम्राज्य के विघटन के बाद वही वर्तमान तुर्की का राष्ट्रपिता और पहला राष्ट्रपति केमाल अतातुर्क कहलाया. 1919-20 में 27 देशों के पेरिस सम्मेलन द्वारा रची गई वर्साई संधि ने उस्मानी व ऑस्ट्रियाई-हंगेरियाई साम्राज्य का अंत कर दिया और यूरोप सहित मध्यपूर्व के नक्शे को भी एकदम से बदल दिया.

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मध्यपूर्व में भेजे गए भारतीय सैनिकों में से 60 प्रतिशत मेसोपोटैमिया (वर्तमान इराक) में और 10 प्रतिशत मिस्र तथा फिलिस्तीन में लड़े. इन देशों में वे लड़ाई से अधिक बीमारियों से मरे. उनके पत्रों के आधार पर इतिहासकार डेविड ओमिसी का कहना है, ‘सामान्य भारतीय सैनिक ब्रिटिश सम्राट के प्रति अपनी निष्ठा जताने और अपनी जाति की इज्जत बचाने की भावना से प्रेरित हो कर लडता था. एकमात्र अपवाद वे मुस्लिम-बहुल इकाइयां थीं, जिन्होंने तुर्की वाले उस्मानी साम्राज्य के अंत की आशंका से अवज्ञा अथवा बगावत का रास्ता अपनाया. उन्हें कठोर सजाएं भुगतनी पड़ीं.’

इस्लामी अतिवाद की जड़ प्रथम विश्वयुद्ध?
एक दूसरे इतिहासकार और अमेरिका में पेन्सिलवैनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर फिलिप जेंकिन्स इस बगावत का एक दूसरा पहलू भी देखते हैं. उनका मानना है कि वास्तव में प्रथम विश्वयुद्ध में उस्मानी साम्राज्य के विरुद्ध लड़ने से मुस्लिम सैनिकों का इनकार और युद्ध में पराजय के साथ उस्मानी साम्राज्य का छिन्न-भिन्न हो जाना ही वह पहला निर्णायक आघात है जिसने आज के इस्लामी जगत में अतिवाद और आतंकवाद जैसे आंदोलन पैदा किए. अपने एक लेख में वे लिखते हैं, ‘वही उस पृथकतावाद की ओर भी ले गया, जिसने अंततः इस्लामी पाकिस्तान को जन्म दिया और वे नयी धाराएं पैदा कीं जिनसे ईरानी शियापंथ बदल गया.’.

प्रो. जेंकिन्स का तर्क है कि ‘जब युद्ध छिड़ा था, तब उस्मानी साम्राज्य ही ऐसा एकमात्र शेष बचा मुस्लिम राष्ट्र था, जो अपने लिए महाशक्ति के दर्जे का दावा कर सकता था. उसके शासक जानते थे कि रूस व दूसरे यूरोपीय देश उसे जीत कर खंडित कर देंगे. जर्मनी के साथ गठजोड़ ही आशा की अंतिम किरण थी. 1918 में युद्ध हारने के साथ ही सारा साम्राज्य बिखर कर रह गया.’ प्रो. जेंकिन्स का मत है कि 1924 में नये तुर्की द्वरा ‘खलीफा’ के पद को त्याग देना 1,300 वर्षों से चली आ रही एक अखिल इस्लामी सत्ता का विसर्जन कर देने के समान था. इस कदम ने ‘एक ऐसा आघात पीछे छोड़ा है, जिससे इस्लामी दुनिया आज तक उबर नहीं सकी.’

‘खलीफत’ का अंत बना ‘खिलाफत’ का आरंभ
प्रो. जेंकिन्स के शब्दों में, ‘खलीफत के अंत की आहट भर से ‘ब्रिटिश भारत की तब तक शांत मुस्लिम जनता एकजुट होने लगी. उससे पहले भारत के मुसलमान महात्मा गांधी की हिंदू-बहुल कांग्रेस पार्टी के स्वतंत्रता की ओर बढ़ते झुकाव से संतुष्ट ही थे. लेकिन अब, खिलाफत आन्दोलन चला कर मुस्लिम अधिकारों और एक मुस्लिम राष्ट्र की मांग होने लगी. यही आन्दोलन 1947 में भारत के रक्तरंजित विभाजन और पाकिस्तान के जन्म का स्रोत बना.’

स्मरणीय यह भी है कि महात्मा गांधी प्रथम विश्वयुद्ध के समय पूर्ण स्वतंत्रता के लिए कोई आन्दोलन छेड़ कर ब्रिटिश सरकार की परेशानियां बढ़ाने के बदले उसे समर्थन देने के पक्षधर थे. ब्रिटिश अधिकारी भी यही संकेत दे रहे थे कि संकट के इस समय में भारतीय नेताओं का सहयोग भारत में स्वराज या स्वतंत्रता का इंतजार घटा सकता है. लेकिन, नवंबर 1918 में युद्ध का अंत होने के बाद सब कुछ पहले जैसा ही रहा. लंदन में ब्रिटिश मंत्रिमंडल की बैठकों में तो यहां तक कहा गया कि भारत को अपना शासन आप चलाने लायक बनने में अभी 500 साल लगेंगे.

बलिदान किसी का, वरदान किसी को
1939 में जब दूसरा विश्वयुद्ध छिड़ा और ब्रिटेन को एक बार फिर भारतीय सैनिकों और उनकी निष्ठा की जरूरत पड़ी, तब कांग्रेस पार्टी के नेता किसी झांसे में नहीं आए. 1942 में गांधी ने नारा दिया, ‘अंग्रेज़ों भारत छोड़ो’. लेकिन, मुहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग ने इस शर्त पर ब्रिटेन को समर्थन देना मान लिया कि बदले में उसे पाकिस्तान जरूर मिलेगा. 1947 में अंग्रेज जब भारत से गए तो पाकिस्तान बना कर ही गए. भारत दोनों बार ठगा गया. बलिदान उसने दिए, वरदान दूसरों को मिले.

प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ने की 100 वीं वर्षगांठ पर यूरोप के लगभग सभी देशों ने अपने सैनिकों की गौरव गाथाएं याद कीं. यदि किसी देश ने इसकी जरूरत नहीं समझी तो वह था भारत, जिसके लाखों सैनिक युद्ध में लड़े और हजारों वीरगति को प्राप्त हुए थे. जिनका अपना देश उन्हें भुला देता है, उन्हें पराए देश वाले भला क्यों याद करने लगें? वे अभागे सैनिक भी दोनों तरफ से ठगे गए.

‘बहुत बड़ा सिर दर्द है, यह सिरदर्द भी’

imgसिर दर्द बेहद आम तकलीफ है. डॉक्टरों के पास मरीज यह तकलीफ लेकर खूब आते भी हैं. एक जमाने में जब सीटी-स्कैन, एमआरआई जैसी महंगी जांचें उपलब्ध नहीं थीं, तब भी सिर दर्द का निदान करना डॉक्टर के लिए उतनी ही बड़ी चुनौती थी और इन जांचों के बाद आज भी यह उतनी ही बड़ी चुनौती है. आज भी दसों मरीज उन जांचों का बड़ा-सा पुलिंदा उसी सिर पर लादे इस डॉक्टर से उस डॉक्टर के बीच भटकते हैं जिसके दर्द का निदान ये जांच नहीं कर सकीं. दरअसल, सिर दर्द को समझने के लिए डॉक्टर द्वारा मरीज की सिर दर्द कथा का धैर्यपूर्वक श्रवण तथा मरीज का बढ़िया क्लीनिकल चेकअप अत्यंत आवश्यक है. सीटी स्कैन आदि से प्राय: कोई दिशा नहीं मिलती. (हां, अचानक तेज सिरदर्द हुआ हो तब कई बीमारियां इन्हीं से पता चल पाएंगी.)

सिर दर्द स्वयं में कोई बीमारी नहीं हो, ऐसा भी संभव है. सिर दर्द किसी और बीमारी का लक्षण भी हो सकता है. उदाहरण के लिए नजरों का हल्का-सा भी कमजोर होना, रोज सिर दर्द की वजह हो सकता है. ‘हमारा तो बस 0.25 नंबर था, सो हम तो कभी चश्मा लगाते हैं, कभी नहीं लगाते’, या ‘हम तो लगाते ही नहीं’- ऐसा कहने वाले सिरदर्द के मरीज एमआरआई में हजारों रुपये फूंककर भी नहीं जान पाते कि गड़बड़ उनके चश्मा न लगाने की जिद में हैं. उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि ‘तनिक’ से नंबर का चश्मा न लगाने से भी कितना सिरदर्द हो सकता है. फिर आंखों का ‘अंदरूनी-प्रेशर’ बढ़ने की बीमारी, जिसे हम ‘ग्लूकोमा’ कहते हैं, भी एक ऐसी बीमारी है जो आम डॉक्टर द्वारा भी नजरंआज हो सकती है. लोग सिर दर्द की दवा खाते रह जाते हैं और बढ़ा हुआ यह प्रेशर आंखों में अंधापन तक पैदा कर सकता है. यदि सिर दर्द बना रहता है, तो किसी नेत्र विशेषज्ञ से आंखों के प्रेशर की जांच भी करवाना अत्यंत आवश्यक मानिए.

फिर सिरदर्द, बुखार खासतौर पर डेंगू या किसी भी तेज बुखार का भी एक लक्षण हो सकता है. जुखाम, सायनोसाइटिस से लेकर दिमागी बुखार तक- सबमें सिर दर्द हो सकता है. दिमाग में ट्यूमर, मस्तिष्क में अचानक खून उतर आना आदि हैं तो बहुत विरले कारण, पर तेज सिर दर्द हो या कुछ दिनों से अचानक सिर दर्द होने लगा हो कारण ये भी हो सकते हैं. ये सब सेकंडरी सिरदर्द कहलाते हैं. मतलब यह कि सिरदर्द किसी और बीमारी के कारण हंै. इसे पकड़ने के लिए एक सतर्क डॉक्टर की आवश्यकता है जो जांच करवाने से ज्यादा मरीज की सुनने को तैयार हों. और मैंने यहां ब्लडप्रेशर का तो नाम ही नहीं लिया साहब?

जबकि हमें तो सिर दर्द हो तो हम सबसे पहले डॉक्टर से यही प्रार्थना करते हैं कि हमारा बीपी चेक कर दें सर आज सिर दर्द हो रहा है. याद रहे कि प्राय: जब तक ब्लडप्रेशर का कोई काम्प्लीकेशन न हो रहा हो, हाई बीपी के करण अकेला सिर दर्द मात्र बीस पच्चीस प्रतिशत बीपी के केसों में ही होता है. बीपी को हमने सिरदर्द और चक्कर से मन में कुछ ऐसा जोड़ लिया है कि इसको ही हाईबीपी का एकमात्र लक्षण मान बैठे हैं. ऐसा कतई नहीं है. जब तक बीपी बहुत ही ज्यादा न हो जाए, या बीपी के कारण दिमाग पर असर न आ रहा हो, सिरदर्द की समस्या बीपी के केसों में ऐसी नहीं होती.

अब आएं इस सिर दर्द पर जो बस, खुद होते हैं. ये कुछ सिर दर्द मात्र सिर दर्द ही होते हैं. वे स्वयं ही अपने आप में एक बीमारी हैं. ये प्रायमरी सिर दर्द कहाते हैं. ये सिरदर्द किसी और बीमारी के लक्षण नहीं. इनकी अपनी ही हस्ती है. माइग्रेन, टेंशन, हेडेक, क्लस्टर हेडेक आदि ऐसे ही सिरदर्द हैं.

यहां माइग्रेन का नाम पढ़कर अचानक ही आप चैतन्य हो उठे होंगे. क्यों न होंगे- दसों बार सुना बड़ा लोकप्रिय नाम है. हमारे यहां हर सिरदर्द को, जो ठीक न हो रहा हो, जिसका ठीक से पता न चल पाया हो, उसे मरीज भी और प्राय: डॉक्टर भी माइग्रेन के खाते में डाल देते हैं. (माइग्रेन के बारे में हम कभी अलग से ही बात करेंगे. तब आप जानेंगे कि हर सिरदर्द माइग्रेन नहीं होता) और इसी कारण, माइग्रेन की दवाइयां लेने से भी ठीक नहीं होता. माइग्रेन होगा, तभी माइग्रेन की दवा से ठीक होगा न? बहरहाल.

यहां आज हम सिर दर्द संबंधी एक महत्वपूर्ण तथा कभी-कभी जानलेवा स्थिति के बारे में बात करके इस बार की बात का समापन करेंगे. क्या है वह स्थिति? मान लें कि कभी, आपको सिरदर्द हो, तो क्या वे लक्षण होंगे जो इंगित करेंगे कि यह सिरदर्द किसी सीरियस स्थिति की तरफ इशारा कर रहा है. सिरदर्द को लेकर हमें कब सतर्क हो जाना चाहिए? कौन से ऐसे सिरदर्द हैं जो खतरनाक सिद्ध हो सकते हैं?

निम्नलिखित सारे सिरदर्द खतरनाक हो सकते हैं. कभी आपको ऐसा हो, तो तुरंत ही किसी ढंग के डॉक्टर को दिखाइए:

  • यदि सिरदर्द इतना तेज हो जैसा इससे पहले, जीवन में, आपको कभी भी हुआ ही नहीं.
  • पहली बार सिर दर्द हो रहा है पर बहुत ही तेज सिरदर्द है.
  • यदि सिरदर्द के पहले उल्टियां हुई हों, फिर सिरदर्द आया हो.
  • सिरदर्द के साथ बेहोशी-सी लगे, शरीर का संतुलन बिगड़ रहा हो, जीभ लटपटाए, आवाज लड़खड़ाए, एक के दो दिखें.
  • यदि सिर का दर्द झुकने, खांसने, वजन उठाने से बढ़ता हो.
  • यदि सिरदर्द ऐसा हो कि आपकी नींद में
  • व्यवधान डाले.
  • यदि रात भर ठीक से सोकर उठें और उठते ही तेज सिर दर्द होता हो.
  • यदि आपकी उम्र 55 वर्ष से ऊपर हो और यह सिर दर्द इस उम्र में आकर पहली बार हुआ हो.
  • यदि सिर दर्द के साथ कनपटी की नसों को छूने या दबाने पर उन नसों में और भी दर्द होता हो (वर्ना तो कनपटी दबाने पर सिरदर्द कम ही होता है.)
  • यदि सिर दर्द कुछ दिनों या सप्ताह से ही है और रोज-रोज बढ़ता ही जा रहा हो.

कभी उपरोक्त में से कुछ भी हो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं. मामला गड़बड़ भी हो सकता है.

फोटो जिन्हें सुहाते हैं

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sumitdayalसुमित दयाल
स्वतंत्र फोटो पत्रकार

साल 2011 की बात है. मैं वृंदावन में होली की तस्वीरें उतारने के लिए जा रहा था. तभी टाईम मैग्जीन के फोटो संपादक पैट्रीक विट्टी का फोन आया. विट्टी ने बताया कि टाईम ने नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू किया है. यह इंटरव्यू दो महीने पहले ही हो गया था. यह इंटरव्यू कवर स्टोरी के रूप में छपना था सो उन्हें इसके लिए अच्छी तस्वीरें चाहिए थीं. फोटो शूट के लिए टाइम ने समय ले लिया था. उन्होंने मुझसे कहा कि आप जहां कहीं भी हो वापिस आकर, गांधीनगर निकलने की तैयारी करो. मैंने ऐसा ही किया. वृंदावन जाने की बात पीछे छूट गई और मैं गांधीनगर जाने की तैयारी करने लगा.

नरेंद्र मोदी का फोटो शूट था इसलिए उसी हिसाब से मैंने अपना कैमरा बैग तैयार किया. मोदी जी के बारे में मैं पहले से जानता तो था लेकिन फिर भी मैंने उनके बारे में, उनकी आदतों के बारे में इंटरनेट पर थोड़ी रिसर्च की. मैंने मोदी जी की कुछ तस्वीरें भी देखीं. हर शूट से पहले मैं उस व्यक्ति के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटाना चाहता हूं जिसकी तस्वीरें मुझे उतारनी होती हैं.

इससे पहले मैंने सचिन तेंदुलकर को टाइम के लिए ही शूट किया था. उन्होंने मुश्किल से पांच मिनट का समय दिया था. लेकिन मैंने इसकी तैयारी दो हफ्ते तक की थी. शूट से पहले मैं खूब पढ़ता हूं. लेकिन मोदी जी वाले शूट के लिए ज्यादा समय नहीं था. जितना समय था उस हिसाब से मैंने जानकारी जुटाई.

अगले दिन मैं और मेरे साथी फोटोग्राफर दीप,  दिल्ली से गांधीनगर के लिए निकल गए. जहां तक मुझे याद है. होली से एक दिन पहले की बात है. छुट्टी का माहौल था. हम सुबह-सुबह करीब साढ़े नौ बजे मुख्यमंत्री आवास पर पहुंच गए. सुरक्षा जांच के बाद हमें अंदर बिठाया गया. मैं बैठे-बैठे सोच रहा था कि पता नहीं कितना समय मिलेगा. अगर कम समय मिला तो हम कैसे जल्दी-जल्दी में बेहतर शूट कर पाएंगे? मोदी जी कितना सहयोग करेंगे और कितनी रूचि लेंगे इसे लेकर भी मेरे मन में सवाल घूम रहे थे. तभी सामने से नरेंद्र मोदी आए, उन्हें देखकर ही मुझे एक मिनट में समझ आ गया कि वे फोटो शूट के लिए ही आए हैं. वे चमक रहे थे. पूरी तरह से तैयार थे.

आते ही उन्हाेंने मुझे मेरे नाम से संबोधित किया. पूछने लगे कि कैसे आए हो? कहां ठहरे हो? फोटोग्राफी कब से कर रहे हो? पूरी बातचीत के दौरान वे बेहद सहज थे जिसकी वजह से मैं भी अपने सब्जेक्ट के साथ पूरी तरह से सहज हो गया था. इसी बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि पहले हम नाश्ता करेंगे फिर आप लोग अपना काम शुरू कीजिएगा. नाश्ते की टेबल पर भी हमारे बीच काफी बातचीत हुई. टाईम मैग्जीन के बारे में. फोटोग्राफी के बारे में. लेकिन ज्यादातर बातें राजनीतिक नहीं थीं. मुझे भी राजनीतिक बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी. नाश्ता खत्म करते-करते उन्होंने मुझसे पूछा, ‘तो सुमित क्या-क्या प्लान है? मैंने उन्हें बताया कि हम कुछ पोट्रेट्स क्लिक करेंगे. फिर कुछ ऐसी तस्वीरें क्लिक करेंगे जो उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय कर सकें.’

इसी दौरान मैंने उनसे पूछा, ‘सर, आपके पास समय कितना होगा? इसके जवाब में वे हौले से मुस्कुराए और कहा- पूरा दिन है, आपलोगों के पास. जो-जो करना चाहो करो. जैसे-जैसे कहोगे मैं वैसे-वैसे करूंगा. इस जवाब की मुझे रत्ती भर भी उम्मीद नहीं थी. मुझे लगा था कि दस-बीस मिनट से ज्यादा तो मिलेगा ही नहीं. लेकिन यहां तो मोदी जी ने हमें अपना पूरा दिन दे दिया था.

बतौर फोटोग्राफर मेरी जिम्मेदारी बढ़ गई थी. मेरे ऊपर कुछ अच्छी तस्वीरें निकालने का दबाव आ गया था. जब आपको नरेंद्र मोदी जैसा व्यक्ति पूरा दिन दे देगा तो ऐसा दबाव तो बनेगा ही. खैर, थोड़ी-सी तैयारी के बाद हम मोदी जी के पोट्रेट्स क्लिक करने के लिए तैयार थे. वे हमारे सामने कुर्सी पर बैठे थे. अमूमन ऐसा होता है कि आपको सब्जेक्ट को हर शॉट के बाद बताना होता है – अब थोड़ा गंभीर पोज दीजिए. अब कुछ ऐसा पोज हो जाए जिसमें चेहरे पर मुस्कुराहट हो. खिलखिलाकर हंसते हुए भी कुछ तस्वीरें क्लिक हो जाएं. कहने का मतलब कि बतौर फोटोग्राफर को अपने सब्जेक्ट को समझाना पड़ता है. लेकिन यहां ऐसा कुछ भी नहीं करना पड़ा. मोदी कुर्सी पर बैठे. हमने उनसे कहा कि हम अभी पोट्रेट्स क्लिक करेंगे. बस. इसके अलावा मुझे उनसे कुछ कहना नहीं पड़ा. अगले पंद्रह मिनट वे हमारे सामने पोज देते रहे और मैं केवल शटर रिलीज करता रहा. यह मेरे लिए अनोखा अनुभव था. लगातार पंद्रह मिनट तक पोज करते रहना बड़ी बात होती है. मैंने अभी तक के करियर में किसी को भी इतनी सहजता से पोट्रेट्स करवाते नहीं देखा था.

इसके बाद हमने थोड़े समय के लिए ब्रेक लिया. मोदी जी अंदर कमरे में चले गए. मैं अब कुछ ‘एन्वायर्मेंटल पोट्रेट्स’ क्लिक करना चाह रहा था और इसके लिए सही जगह की तलाश में था. घर के बाहर बड़ा सा अहाता था. इसके बीच में एक छोटा-सा पेड़ था. मोर घूम रहे थे. मेरे दिमाग में आया कि मोदी जी को अहाते में एक जगह बिठा देंगे और उनके आसपास मोर घूमते रहेंगे. लेकिन हम ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि मोर को एक जगह रोकना बहुत मुश्किल था. जब हम मोर पकड़ने की कोशिश में लगे हुए थे तभी मोदी जी भी वहां आ गए. हमने उन्हें बताया कि हम क्या करनेवाले हैं. उन्होंने अपनी सहमति दे दी. हमने कोशिश की लेकिन असफल रहे. अहाते में सुंदर-सुंदर हंस भी थे. आखिर में हमने उस फ्रेम में हंसों को शामिल कर लिया.

इसके बाद हम उनके दफ्तर में आए. हमने उनसे पूछा कि आप खाली समय में क्या करते हैं तो उन्होंने कह कि वे किताबें बहुत पढ़ते हैं. हमने फटाफट कमरे की सारी लाईट्स बंद करवाईं. खिड़की से रौशनी आ रही थी. हमने मोदी जी को खिड़की के सामने ही खड़ा करावाया और उनसे कहा कि वे अपने हाथ में ली हुई किताब को पढ़ें. कुछेक शॉट्स क्लिक करने के बाद हम रुक गए. हमें लगा कि काम लायक तस्वीरें मिल गईं हैं. लेकिन तभी हमने देखा कि वे सूफियाना अंदाज में खिड़की पर लगे झिल्लीदार पर्दे को छेड़ रहे हैं. हमने फटाफट कुछ और फ्रेम्स क्लिक किए. बाद में यही फ्रेम्स टाईम मैग्जीन में छपे.

पूरा शूट खत्म करते-करते आधा दिन निकल गया था. आधे दिन तक मोदी जी भी हमारे साथ लगे रहे. एक बार भी उन्होंने ऐसा कोई सिगनल नहीं दिया जिससे यह समझा जाए कि वे थक या बोर हो गए हैं. नौ बजे सुबह से लेकर दिन के दो-ढ़ाई बजे तक हमने शूट किया. काम खत्म करने के बाद हम अपने सामान की पैकिंग कर निकलने की तैयारी कर रहे थे तभी मोदी जी दोबारा आए और कहने लगे कि हम खाना यहीं खाकर जाएं. हमारे मना करने के बाद उन्होंने हमसे कहा कि गुजरात आए हो तो गुजराती खाना खाए बिना जाना मत. उन्होंने अपने सचिव से एक होटल में फोन भी करवाया. काम खत्म होने के बाद भी वे हमसे जुड़े रहे. ऐसा व्यवहार और इतना समय कोई और नहीं देता. मेरे लिए यह शूट खास था.

हालांकि यह अलग बात है कि जब इस चुनाव प्रचार के दौरान मैंने नरेंद्र मोदी के साथ यात्रा करनी चाही तो उन्होंने उस बारे में कोई जवाब नहीं दिया. हालांकि उस एक ही फोटोशूट से मुझे उनके बारे में इतना समझ आ गया कि मोदी देश के उन विरले नेताओं में से हैं जो तस्वीरों की और तस्वीर उतारने वालों की अहमियत को बहुत अच्छे से समझते हैं.


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Ramesh-dadhadkeरमेश धड़के
फोटोग्राफर, राज्य सूचना विभाग, गुजरात

मैं गुजरात के सूचना विभाग में फोटोग्राफर हूं सो साहब के हर कार्यक्रम में रहा हूं. 2007 से उनके साथ हूं. यह तस्वीर 2012 या 2013 की है. साबरमती के सामने की तस्वीर है. नदी पर ‘रिवर फ्रंट’ का काम चल रहा था और साहब निर्माण कार्य का जायजा लेने आए थे. जब मैंने उन्हें इस लिबास में देखा तो देखता ही रह गया. मैंने बहुत-सी तस्वीरें निकालीं. उस दिन से पहले मैंने उन्हें कभी इस तरह के कपड़ों में नहीं देखा था. वैसे मोदी जी अपने पहनावे-ओढ़ावे को लेकर काफी जागरूक रहते हैं. लेकिन उस दिन वे पूरे के पूरे बदले हुए थे. एक फोटोग्राफर को इससे ज्यादा क्या चाहिए कि उसे जिस सब्जेक्ट की तस्वीर खींचनी है वह थोड़ा हटकर लग रहा है.


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Vivek-Desaiविवेक देसाई
स्वतंत्र फोटोग्राफर हैं. गुजरात में रहते हैं और अहमदाबाद में स्थित नवजीवन ट्रस्ट के कार्यकारी ट्रस्टी हैं.

गुजरात में हर साल रण उत्सव मनाते हैं. चांदनी रात में यह कार्यक्रम होता है. यह बॉर्डर वाला इलाका है. मैं 2007 से इस उत्सव का ऑफीशियल फोटोग्राफर हूं. यह फोटो साल 2011 के रण उत्सव के दौरान की है. कार्यक्रम चल रहा था तभी जिलाधिकारी ने मुझे बताया कि मोदी जी बुला रहे हैं. जब मैं उनके पास पहुंचा तो उन्होंने मुझे अपने पास बैठने का इशारा किया. थोड़ी देर में कार्यक्रम खत्म हुआ और सारे लोग अपने-अपने टेंट में चले गए. अब वहां केवल मोदी जी, मैं और उनके सुरक्षाकर्मी थे. रात के दस बज रहे थे. मोदी जी ने मुझे अपने साथ लिया और हम कार्यक्रम वाली जगह से करीब आधा किलोमीटर और अंदर आ गए. सुरक्षाकर्मियों ने आपत्ति दर्ज की लेकिन उन्होंने उसे नजरअंदाज कर दिया. सामने दूर तक फैले सफेद बालू के टीले थे जो चांदनी रात में चमक रहे थे. मोदी जी ने मुझसे कहा कि मैं यहां उनकी तस्वीर निकालूं. मुझे चिंता हुई कि कम रौशनी की वजह मुझे लॉंग एक्सपोजर चाहिए और इस दौरान मोदी जी को बिल्कुल स्थिर रहना पड़ेगा. मैं यह उन्हें बता पाता उससे पहले ही उन्होंने कहा- चिंता मत करो. मैं सांस रोके खड़ा रहूंगा.

मुझे इस बात का आश्चर्य हुआ कि फोटो उतरवाने की इच्छा के अलावा उन्हें फोटोग्राफी की बारीकियों की भी बहुत जानकारी है.


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sp-photoशैलेंद्र पाण्डेय
नेशनल फोटो एडिटर, राजस्थान पत्रिका

जब नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री पहली बार संसद पहुंचे तो उन्होंने संसद की चौखट को दंडवत प्रणाम करके पूरे देश को चौंका दिया. यह उसी क्षण की तस्वीर है. इसका परिणाम यह भी हुआ कि अगले दिन के सभी अखबारों में उनकी यह तस्वीर प्रमुखता से छपी.

मोदी जी के चेहरे पर हाव-भाव आसानी से दिख जाते हैं. जबकि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस मामले में थोड़े कंजूस थे.

प्रधानमंत्री के आसपास रहने वाले सुरक्षाकर्मी फोटोग्राफर्स के फ्रेम में नहीं आते. ऐसा लगता है कि उन्हें इसके लिए निर्देश दिया गया है. वहीं गांधी परिवार के नेताओं के आसपास रहने वाले सुरक्षाकर्मी फोटोग्राफर्स की मौजूदगी को लेकर लापरवाह रहते हैं.


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Ravi-S-sahaniरवि एस सहनी
स्वतंत्र फोटो पत्रकार

यह तस्वीर लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान की है. नरेंद्र मोदी भाषण देते वक्त बीच में कुछ क्षण के लिए मौन होकर अपने हाथ की उंगलियों को जिस प्रकार घुमाते हैं, अक्सर उनकी यह भाव- भंगिमा अटल बिहारी वाजपेयी की याद दिलाती है. ऐसा जान पड़ता है कि भाषण देते वक्त मोदी अपने आप को अटल विहारी वाजपेयी के आसपास देखते हैं. इस तस्वीर में मोदी बोल रहे हैं. पूरी रौ में बोल रहे हैं लेकिन उनकी आंखे बंद हैं. आंखें बंद होने की वजह से इस तस्वीर को एक ‘खराब फ्रेम’ भी माना जा सकता था. लेकिन मैं इस फोटो को कुछ ऐसे देखता हूं- पूरे चुनाव प्रचार के दौरान, प्रधानमंत्री तक की अपनी यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी ने अपनी आलोचनाओं की तरफ से आंखें बंद रखीं लेकिन इसी दौरान वे मीडिया और विपक्षी पार्टी पर एक के बाद एक कटाक्ष करते रहे. इस फोटो को गौर से देखने पर ऐसा भी लगता है कि मोदी, अटल बिहारी वाजपेयी के खास अंदाज में अपने विरोधियों से कह रहे हों- ये अच्छी बात नहीं है.


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vijay-pandeyविजय पांडे
फोटो संपादक, तहलका

पिछले साल 15 सितंबर को हरियाणा के रेवाड़ी में नरेंद्र मोदी की एक सभा हुई थी. यह उसी सभा की तस्वीर है. पूर्व सैनिकों के सम्मान में होनेवाली इस सभा को नरेंद्र मोदी की पहली चुनावी सभा भी कह सकते हैं. मैदान में बहुत भीड़ थी. जैसे ही मोदी मंच पर आए, लोग काबू से बाहर हो गए. हमारे पीछे से लोगों ने बैरिकेड तोड़ दिया. एक बार तो ऐसा लगा कि आज कुचले गए. लेकिन मंच से मोदी जी के बोलने के बाद स्थिति संभल गई. उनके लिए लोगों का पागलपन उस दिन जो देखा और भोगा वह आज भी महसूस होता है.

‘साइट’ भारत में टीवी प्रसारण

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भारत में टीवी प्रसारण की औपचारिक शुरुआत 1959 से मानी जाती है लेकिन इसे प्रायोगिक स्तर से निकलकर चलन में आने में छह साल का वक्त लगा. इसका पहला परीक्षण दिल्ली में किया गया और सामान्य प्रसारण भी सबसे पहले यहीं शुरू हुआ. फिर सात साल के बाद बंबई और अमृतसर में टीवी पहुंचा. सन 1975 तक देश के सात शहरों तक टीवी की पहुंच हो चुकी थी. इस नई नवेली टीवी क्रांति के बारे में सरकार का मानना था इससे देश की सामाजिक-आर्थिक की गति को नई दिशा और तेजी मिल सकती है. सरकार इस मायने में टीवी की ताकत को आंकना भी चाहती थी लेकिन तत्कालीन सुविधाओं में यह मुमकिन नहीं था. हमारी प्रसारण तकनीक टेरेस्ट्रियल नेटवर्क पर आधारित थी. इसमें ऊंचे-ऊंचे टावरों का निर्माण और उनके पास विशेष उपकरणों के माध्यम से 30-35 किमी तक के क्षेत्र तक प्रसारण के सिग्नल भेजे जाते थे. इस व्यवस्था में कुछ खामियां थीं. पहली तो यही कि इससे दुर्गम और ग्रामीण इलाकों में टीवी की पहुंच नहीं हो पा रही थी तो वहीं दूसरी तरफ इससे प्रसारण की गुणवत्ता भी कुछ कमतर रहती थी. उस समय देश की वैज्ञानिक बिरादरी भी इस कोशिश में लगी थी कि किसी तरह टीवी को देश के कोने-कोने तक पहुंचाया जाए. लेकिन दुर्गम क्षेत्रों तक निर्बाध प्रसारण के लिए जरूरी था कि भारत के पास अपना संचार उपग्रह हो. प्रसिद्ध अंतरिक्ष विज्ञानी डॉ विक्रम साराभाई अपने साथियों के साथ इस कोशिश में लगे थे कि किसी तरह स्वदेशी संचार उपग्रह तैयार किया जाए लेकिन अपर्याप्त मानव व तकनीकी संसाधनों की वजह से यह मुमकिन नहीं हो पा रहा था. बिना इसके टीवी के सकारात्मक प्रभावों का असर भी नहीं जांचा जा सकता था.

इसी समय अमेरिका की अंतरिक्ष अनुसंधान एजेंसी, नासा अपने एक संचार उपग्रह एटीएस-6 से प्रसारण का परीक्षण करने की तैयारी में थी. एजेंसी के विशेषज्ञों का मानना था कि यह परीक्षण भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अच्छे तरीके से हो सकता है. इधर भारत में विशेषज्ञों का एक समूह इस पूरे घटनाक्रम से वाकिफ था. उसने सरकार को सलाह दी कि नासा से भागीदारी  देश में टीवी क्रांति को एक नए दौर में पहुंचा सकती है. आखिरकार सरकार इसके लिए तैयार हुई और डॉ साराभाई के नेतृत्व में इस परीक्षण के लिए भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र व नासा के बीच एक करार हो गया. इसके तहत भारत में जो प्रायोगिक टीवी प्रसारण होना था उसे ही ‘साइट’ यानी सेटेलाइट इंस्ट्रक्शनल टेलीविजन एक्सपरिमेंट  नाम दिया गया. यह अपनी तरह का दुनिया का सबसे बड़ा प्रयोग होने जा रहा था.

‘साइट’ एक अगस्त, 1975 से 31 जुलाई, 1976 तक चला. इसके तहत छह राज्यों के तकरीबन 2,500 गांवों को चुना गया था. इनमें परीक्षण के पहले विशेष प्रकार की डिश एंटेना व टीवी सेट की व्यवस्था की गई थी. इस प्रयोग के लिए जमीनी स्तर पर सभी काम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) की देखरेख में किए गए. ‘साइट’ के बारे में कहा जाता है इसके माध्यम से उस समय लाखों लोगों ने पहली बार टीवी पर कार्यक्रम देखे थे. तब ये कार्यक्रम ऑल इंडिया रेडियो  के प्रोडक्शन विभाग ने तैयार किए थे. ‘साइट’ परियोजना समाप्त होने के बाद जब सरकार ने इसका आकलन करवाया तो पता चला इन क्षेत्रों में ग्रामीण आबादी पर कार्यक्रमों का व्यापक सकारात्मक असर पड़ा है.

दूसरा जो सबसे महत्वपूर्ण फायदा भारत को मिला वह यह था कि हमारे वैज्ञानिक व इंजीनियर संचार उपग्रह की कार्यप्रणाली से इस हद तक परिचित हो गए कि अब वे स्वदेशी उपग्रह बना सकते थे. अंतत: यह भारतीय वैज्ञानिकों ने 1982 में इनसेट-1ए अंतरिक्ष में पहुंचाकर यह कर के भी दिखाया.