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मेरा जुर्म क्या है?

imgआइए, इंस्पेक्टर साहब. मुझे शुबहा था कि आप लोग मेरे घर भी जरूर आएंगे. इलाके में जितने मुसलमान हैं, उनमें से ज्यादातर के दरवाजों पर आप पहले ही दस्तक दे चुके हैं. खैर, यह तो बता दीजिए कि मेरा जुर्म क्या है?

क्या कहा? आपको मुझ पर भी शक है? तो आइए और मेरे घर की तलाशी भी ले लीजिए, हालांकि मैं पहले ही बता दूं कि मैं एक गरीब दर्जी हूं. शहर में हुए बम-धमाकों से मेरा कोई लेना-देना नहीं.

जनाब, उधर तसबीह लिए बैठे सहमे बुजुर्गवार मेरे वालिद हैं. नहीं-नहीं, उनका भी शहर में हुए बम-धमाकों से कुछ भी वास्ता नहीं. पुलिसवालों को अपने घर में घुस आया देखकर जैसे कोई भी आम इंसान सहम जाता है वैसे ही वो भी सहम गए हैं.

जी, जनाब! ये दोनों बच्चे मेरे ही हैं. मदरसे में पढ़ते हैं. आप लोगों को देखकर डर गए हैं. उस कोने में मेरी बच्ची है जो बुर्के में खड़ी अपनी मां की टांगों से चिपकी हुई है. घर में किसी को समझ नहीं लग रही है कि हमारे यहां पुलिस क्यों घुस आई है. पर आप अपना काम कीजिए, जहां चाहे तलाशी लीजिए.

क्या कहा, जनाब? आप अलमारी खोलकर देखना चाहते हैं? शौक से देखिए. हर घर में जो आम चीजें होती हैं, बस वैसी ही कुछ चीजें अलमारी में रखी हैं. वह हमारी ऐल्बम है, साहब. आप जानना चाहते हैं कि उसमें यह फोटो किसकी है? यह मेरा छोटा भाई है, हुजूर, जो हाल ही में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों में मारा गया था. नहीं-नहीं, आप गलत समझ रहे हैं. वह दंगाई नहीं था. वह पुलिस-फायरिंग में नहीं मारा गया था. वह बेचारा तो शहर के कॉलेज में पढ़ता था. दंगाइयों ने उसे फसाद के समय छुरा मार दिया था. मेरे वालिद इस सदमे से अपनी आवाज खो बैठे. वो आपके सवालों के जवाब नहीं दे पाएंगे. आप अपने सारे सवाल मुझसे पूछिए.

अच्छा, आप जानना चाहते हैं कि कोने में पड़े ट्रंक में क्या है? जनाब, एक गरीब दर्जी के यहां आपको क्या मिलेगा? कुछ पुराने कपड़े-लत्ते हैं एक-दो पुरानी दरियां हैं. एक-दो फटे हुए कम्बल हैं, जो सर्दियों में काम आते हैं.

आइए, आइए, आप खुद ही तलाशी ले लीजिए. हुजूर, वह कुरान शरीफ है और अब जो किताबें आपने उठा रखी हैं वो मेरे बच्चों की किताबें हैं. आप किताबें खोलकर देख रहे हैं. देखिए, देखिए. किताबों में और कुछ नहीं है.

ये किताबें उर्दू में क्यों हैं? साहब, हमारे यहां तो उर्दू में लिखी किताबें ही मिलेंगी. ये किताबें आपने जब्त कर ली हैं? क्यों, हुजूर? क्या उर्दू किताबें घर में रखना जुर्म है? क्या कहा? आपको उर्दू नहीं आती और आप किसी उर्दू के जानकार से ये किताबें पढ़वाएंगे. कहीं इनमें मुल्क के खिलाफ कुछ न लिखा हो, इसलिए? आप ख्वामखाह शक कर रहे हैं. लाइए, मैं ही पढ़ देता हूं. ये ऊपर वाली तो अलिफ, बे वाली किताब है. नीचे वाली किताब में कुछ नज्में हैं. क्या कहा? आपको मेरी बात पर यकीन नहीं. जैसी आपकी मर्जी, साहब. अब मैं आपको कैसे यकीन दिलाऊं?

नहीं, नहीं, जनाब! मैंने कहा न, वो मेरी बीवी है. बुर्के में क्यों है? जनाब, हमारे यहां घर की औरतें गैर-मर्दों के सामने बुर्के में ही रहती हैं. ये हमारा रिवाज है. नहीं, आप उसका चेहरा नहीं देख सकते. माफ कीजिएगा, मैं इस बात की इजाजत आपको नहीं दूंगा. क्या कहा? आपको मेरी बीवी पर शक है? आप उसकी तलाशी लेना चाहते हैं. इसके लिए आप जनाना-कांस्टेबल लेकर आइए.

अरे, आप तो नाराज हो गए. मेरी बात का बुरा मत मानिए, इंस्पेक्टर साहब. मोहल्ले वाले पहले ही गली में खड़े हैं. इलाके में आपकी तलाशी की वजह से लोगों में पहले ही जबर्दस्त गुस्सा भरा है. अगर मोहल्ले के लोगों को पता चला कि घर की औरत की बेइज्जती हुई है तो इसी बात पर यहां दंगा हो जाएगा, जो मैं नहीं चाहता.

नहीं-नहीं, हुजूर, मैं आपको डरा नहीं रहा, सिर्फ हालात से वाकिफ करवा रहा हूं. क्या कहा? आप लेडी-पुलिस बुला रहे हैं? जरूर बुलाइए, साहब. इसमें मुझे क्या एतराज हो सकता है.

illहां, इंस्पेक्टर साहब, यह हिंदोस्तान का झंडा है. क्या कहा, जनाब? हमने अपने घर में मुल्क का परचम क्यों रखा है? साहब, क्या अपने मुल्क का परचम अपने घर में रखना जुर्म है? यह झंडा मेरा भाई ले कर आया था. उसे क्रिकेट का बहुत शौक था. जब भी हिंदोस्तान की टीम का कोई मैच शहर में होता था, वह मुल्क का परचम ले कर मैच देखने जरूर जाता था. जब हमारी टीम जीत रही होती थी, तब मेरा भाई शान अपने मुल्क का झंडा लहराता था. जब से भाई दंगे में मारा गया है, यह परचम घर में यूं ही पड़ा हुआ है. क्या करूं, जनाब? भाई की याद आती है तो रोना आ जाता है.

क्या कहा, साहब? झंडे को इस तरह से मोड़कर कोने में रखना झंडे की बेइज्जती है? उसका अपमान है? इस बात के लिए आप हमारे खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं? इंस्पेक्टर साहब, मैं तो एक गरीब दर्जी हूं. मुझे मुल्क के कायदे-कानून की बारीकियां नहीं पता. पर हमारे यहां सभी अपने मुल्क के परचम की इज्जत करते हैं. देश के झंडे की बेइज्जती की बात हम सोच भी नहीं सकते. जनाब, एक बात पूछूं? आपकी वर्दी कैसे फट गई है? इस पर कालिख और दाग-धब्बे कैसे लग गए हैं? आपको नई वर्दी की सख्त जरूरत है. आप जब वर्दी सिलवाएं तो मेरे पास आइएगा. मैं आपके लिए एक उम्दा वर्दी सिल दूंगा.

नहीं, नहीं, साहब, आप गलत समझ रहे हैं. मैं आपको रिश्वत नहीं दे रहा. अल्लाहतआला ने हाथ में कुछ हुनर दिया है. किसी के काम आ सकूं तो अच्छा लगता है.

क्या कहा, जनाब? मैं बहुत बोलता हूं? नहीं हुजूर, बोलते तो हमारे मुल्क के लीडर हैं. बहुत बोलते हैं, बस करते कुछ नहीं हैं.

आप भीतर के कमरे की तलाशी लेना चाहते हैं? शौक से लीजिए. हम आपसे क्या छिपाएंगे? हमारे पास है ही क्या छिपाने के लिए.

एक बात पूछूं, इंस्पेक्टर साहब? जब भी कभी शहर में दहशतगर्द कोई बम-धमाका कर देते हैं, तब आप और आपकी पुलिस हम लोगों के इलाकों में तलाशी की मुहिम शुरू कर देती है. हर याकूब, नफीस और अशफाक जैसों के घरों की तलाशी ली जाती है. पर इंस्पेक्टर साहब, धमाकों के बाद आप ओंकारनाथ, हरिनारायण और श्यामसुंदर जैसों के घरों की तलाशी लेने कभी नहीं जाते. ऐसा क्यों है साहब? क्या अपने मजहब की वजह से आपकी निगाह में हम सभी  दहशतगर्द हो गए हैं? किसी और के जुर्म की सजा आप मुझे क्यों देना चाहते हैं?

नहीं, नहीं, इंस्पेक्टर साहब! नाराज मत होइए. अगर मेरी बातें आपको बुरी लगी हों तो माफी चाहता हूं. मेरी बीवी भी कहती है कि मैं खरी बात मुंह पर कह देता हूं. यह भी नहीं देखता कि किससे बात कर रहा हूं. वह देखिए, मेरी बीवी उधर कोने में से मुझे इशारा कर रही है कि मैं चुप हो जाऊं.

ठीक है, जनाब! आपने मेरे घर में उथल-पुथल मचा दी है, पर मैं चुप रहूंगा. आपके सिपाहियों के बूटों और डंडों की आवाज से सहमकर मेरे दोनों बेटे थर-थर कांप रहे हैं, पर मैं चुप रहूंगा. सिपाहियों को देख कर मेरी छोटी बच्ची का डर के मारे फ्राक में ही पेशाब निकल गया है, पर मैं चुप रहूंगा.

आप पुलिसवालों को घर में घुस आया देखकर मेरे बूढ़े वालिद सहम गए हैं और उनकी आंखों में भरा धुंधलका कुछ और बढ़ गया है. डर के मारे उन्हें दिल का दौरा पड़ सकता है, पर मैं चुप रहूंगा. अपने घर में आपको तलाशी लेता देखकर मेरा बीपी भी बढ़ गया है. मुझे सांस लेने में तकलीफ हो रही है, पर मैं चुप रहूंगा. आपकी तलाशी की मुहिम से मेरी बीवी घबराई हुई और सकते में है. वह बेचारी समझ नहीं पा रही कि हमने कौन-सा जुर्म किया है जिसकी वजह से पुलिस हमारे घर में घुस आई है. बुर्के के भीतर से झांकती उसकी सहमी आंखों में डर भरा है, पर मैं चुप रहूंगा. कुछ नहीं कहूंगा, क्योंकि आपके सामने मेरी औकात ही क्या है? आप मुझे पकड़कर न जाने कौन-कौन से जुर्म में कौन-कौन सी दफाओं के तहत जेल में बंद कर सकते हैं. आप हवालात में मेरी पिटाई करके मुझसे कुछ भी कबूल करवा सकते हैं. मैं गरीब आदमी हूं. मामूली दर्जी हूं. किसी को नहीं जानता. मेरी तो कोई जमानत भी नहीं कराएगा. इन्हीं सब वजहों से मैं चुप रहूंगा. आप मेरे घर में भूचाल ला दीजिए. आप मेरी छोटी-सी दुनिया में अफरा-तफरी मचा दीजिए. तो भी मैं चुप रहूंगा. तुम ठीक कहती हो बच्चों की अम्मा. अब मैं चुप रहूंगा. कोई शिकायत नहीं करूंगा. आम आदमी चुपचाप सहते रहने के सिवा कर ही क्या सकता है?

क्या हुआ, इंस्पेक्टर साहब? हमारे घर की तलाशी में आपको कुछ नहीं मिला? यकीन मानिए, आप हमारे मन की तलाशी लेंगे तो भी खाली हाथ ही लौटेंगे. हमारे मन में अब कोई उम्मीद नहीं बची. हमारी आंखों में अब कोई सपने नहीं बचे हैं.

क्या कहा, जनाब? मुझ जैसों को ‘टाडा’ या ‘पोटा’ में बंद कर देना चाहिए.

आप साहब हैं. पुलिस अफसर हैं. आप कुछ भी कह सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं. पर आपकी ऐसी बातें मुझे चुप भी तो नहीं रहने देतीं. कुछ लोग औरंगजेब के कामों की सजा अब हमें देना चाहते हैं. आप ‘लश्कर -ए-तयबा’ या ‘हूजी’ के दहशतगर्दों की तलाश में हम जैसे बेकसूर आम लोगों के घर पर छापे मारते हैं. अंधाधुंध गिरफ्तारियां करने लगते हैं. हम पर क्या बीतती है, कभी आपने सोचा है?

इंस्पेक्टर साहब, आप मुझ पर बिना सबूत के शक क्यों कर रहे हैं? मेरा जुर्म क्या है? क्या यह कि मैं इस मुल्क में एक गरीब, कम पढ़ा-लिखा मुसलमान हूं? या यह कि मेरा नाम अब्दुल्ला है, रामनारायण नहीं?

hindi@tehelka.com 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हार के सवा सौ दिन

Congress
खाली हाथ! कांग्रेस कार्यालय परिसर में अब कोई गहमागहमी नहीं दिखती. फोटो: विकास कुमार

कुछ समय पहले लोकसभा सत्र के दौरान एक वीडियो के सामने आने पर काफी हो हल्ला मचा था. वीडियो में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी सदन में चल रही महंगाई पर चर्चा के दौरान सोते हुए दिखाई दिए. मीडिया और कांग्रेस के आलोचकों ने मामले पर चुटकी लेते हुए कहना शुरू किया कि देखिए कैसे सदन में इतनी महत्वपूर्ण चर्चा चल रही है और कांग्रेस के ‘पीएम इन वेटिंग’ खर्राटे भर रहे हैं. कांग्रेस जैसा कि अपेक्षित था राहुल की बंद आंखों के पीछे का अध्यात्म समझाती नजर आई. कोई राहुल द्वारा आंखें बंद करने को उनके गहन चिंतन में लीन होना बता रहा था तो कोई यह कहते हुए मानव शरीर का विज्ञान समझा रहा था कि नींद तो प्राकृतिक जरूरत है, आंख तो किसी की भी लग सकती है. कुछ कांग्रेसी वीर आगे बढ़कर वे तमाम तस्वीरें और वीडियो ले आए जिनमें अलग-अलग समय पर भाजपा समेत अन्य दलों के नेता आंख बंद कर नींद का आनंद ले रहे थे. इन सबके बीच कांग्रेसियों का एक धड़ा ऐसा भी था जो राहुल के सोने को पार्टी की सोई हुई किस्मत से जोड़ रहा था. इस तबके का कहना था कि जिसके हाथ में पार्टी की कमान है अगर वही सो रहा है तो पार्टी की स्थिति क्या होगी.

राहुल सो रहे थे या चिंतन में लीन थे यह तो वही बता सकते हैं लेकिन लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद से आज के दिन तक के कांग्रेस के सफर पर नज़र डालने से पता चलता है कि 16 मई को आए परिणामों में पार्टी की जो दुर्गति हुई उसे बीते करीब सौ दिनों में और गति मिली है.

हार के बाद के कांग्रेस के प्रदर्शन को मुख्य रूप से दो आधारों पर देखा जा सकता है. पहला हिस्सा पार्टी और उसकी आंतरिक स्थिति से जुड़ा है. दूसरा सदन और सड़क पर विपक्ष के नाते उसके प्रदर्शन से संबंधित है.

भीतर केे हाल
पार्टी के रूप में कांग्रेस के 16 मई के बाद से आज तक के सफर पर नज़र डालें तो पता चलता है कि कैसे लोकसभा चुनावों में उसकी हार ने उसके भीतर पहले से पल रहे गुस्से को जुबान दे दी. कैसे चुनाव में पार्टी की हुई बुरी हार से उसके नेताओं को पार्टी लाइन के इतर कुछ और कहने की हिम्मत मिल गई. सबसे पहले पार्टी के पूर्व सांसद मिलिंद देवड़ा ने पार्टी की हार के लिए दबी जुबान में राहुल को जिम्मेवार ठहराया. देवड़ा ने यह कहते हुए राहुल पर हमला बोला कि सलाहकारों से गलत सलाह लेने वाला व्यक्ति भी उतना ही जिम्मेवार है जितना गलत सलाह देकर चुनाव हरवाने वाले सलाहकार.

जैसे-जैसे समय गुजरता गया पार्टी नेताओं का नेतृत्व पर हमला भी बढ़ता गया. हार से पचासवें दिन के आसपास पंजाब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जगमीत बरार का बयान आया कि राहुल गांधी और सोनिया को अगले दो सालों तक पार्टी की कमान छोड़कर देश भ्रमण पर निकल जाना चाहिए. उन्हें पार्टी की कमान किसी और के हाथों में सौंप देनी चाहिए. मीडिया में आए बरार के बयान में उन्हें यह कहते बताया गया कि सोनिया और राहुल कुछ समय तक पार्टी को बख्श दें तो उसकी स्थिति जरूर बेहतर हो जाएगी. अपनी इन बातों के साथ ही बरार ने अध्यक्ष के लिए 10 साल से अधिक का कार्यकाल नहीं होने की भी मांग की. बरार ने सार्वजनिक तौर पर यह आरोप भी लगाया कि कांग्रेस के बड़े नेता आम कार्यकर्ताओं के साथ आवारा कुत्तों से भी बदतर व्यवहार करते हैं.

केरल में कांग्रेस के कई नेता सार्वजिनक तौर पर मोदी सरकार की तारीफ करते दिखे. स्थिति यह थी कि इसको लेकर कांग्रेस में ही वहां लडाई हो गई. केरल कांग्रेस मोदी प्रशंसकों और मोदी विरोधियों में बंट गई

इधर बरार हाईकमान को कमान छोड़ने की सलाह दे रहे थे तो दूसरी तरफ केरल में पार्टी नेता टीएच मुस्तफा राहुल गांधी को जोकर बताते नजर आए. यही नहीं पिछले चार महीनों में केरल कांग्रेस ने कई मौकों पर मोदी सरकार की तारीफ की है. हाल ही में ईराक से नर्सों को सुरक्षित भारत लाने पर केरल में कांग्रेस के कई नेता सार्वजिनक तौर पर मोदी सरकार की तारीफ करते दिखे. स्थिति यह थी कि इसको लेकर कांग्रेस में ही वहां लड़ाई हो गई. केरल कांग्रेस मोदी प्रशंसकों और मोदी विरोधियों में बंट गई.

हंगामा उस समय भी मचा जब कुछ समय पहले ही पार्टी के महासचिव और कभी राहुल गांधी के गुरु बताए जाने वाले दिग्विजय सिंह ने उनपर यह कहते हुए सवाल खड़ा कर दिया कि कैसे राहुल की शासक वाली तबीयत नहीं है और कैसे राहुल में मुखरता की कमी के कारण पार्टी लोगों की नजरों में कमजोर दिखी. इस वजह से चुनाव में युवा राहुल जैसे 44 साल के युवा की तरफ आकर्षित होने की बजाय 64 साल के मोदी की तरफ चले गए.

बीते 120 दिनों में राहुल की क्षमताओं को लेकर सार्वजिनक रूप से लगातार प्रश्न उठते रहे. उन पर सवाल उस समय भी उठा जब पार्टी ने लोकसभा में अपने नेता के रूप में दक्षिण से आने वाले मल्लिकार्जुन खड़गे का चुनाव किया. पार्टी का एक बड़ा वर्ग इससे सहमत नहीं था. इसका कहना था कि चूंकि चुनाव में पार्टी का चेहरा राहुल थे और उसकी जीत की स्थिति में वे ही प्रधानमंत्री बनते तो नेता विपक्ष की जिम्मेवारी भी उन्हीं को लेनी चाहिए. दिग्विजय सिंह ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि अगर राहुल को पार्टी का नेतृत्व करना है तो उन्हें सामने आकर करना चाहिए.

बीते सौ-सवा सौ दिनों में पूरे नेतृत्व को लेकर प्रश्न तो उठे ही, राहुल गांधी को लेकर पार्टी के भीतर हताशा, संदेह और नाराजगी वाले सवालों की सूची और बढ़ती गई. लेकिन राहुल इस दौरान एकाध अपवादों को छोड़ दें तो पार्टी के एक कार्यकर्ता के मुताबिक ‘माटी के माधव’ ही बने रहे. ऐसा नहीं था कि राहुल को लेकर पार्टी नेताओं की हताशा बीते 100 दिनों की ही उपज है. संदेह और ‘राहुल से न होगा’ जैसी भावना पार्टी के कई नेताओं में बहुत पहले से थी लेकिन लोकसभा के परिणामों ने उसे और मजबूती दे दी. बाकी की कसर खुद राहुल ने हार के बाद अपनी निष्क्रियता से पूरी कर दी है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘पहले से ही कार्यकर्ताओं में राहुल को लेकर कोई जोश नहीं था. लेकिन सब हां में हां मिलाते रहे. लेकिन जब आप चुनाव हार गए और आप प्रधानमंत्री नहीं बन सकते लेकिन आगे वही बनने का आपका ख्वाब है तो फिर संसद में पार्टी को लीड करो ना भाई. वहां क्यों पीछे भाग रहे हो. उनके इस कदम से कार्यकर्ताओं में रहा सहा भ्रम भी दूर हो गया है. नेता में संघर्ष करने और जिम्मेदारी उठाने का दम होना चाहिए जो उनमें नहीं है.’

राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई इसे राहुल के पार ले जाने की बात करते हैं. वे कहते हें, राहुल ही नहीं लोकसभा चुनावों में हार ने सबसे बडा प्रश्न पूरे गांधी परिवार पर लगाया है. पूरी फैमली फ्लॉप साबित हुई है.’

हालाकि रशीद के विपरीत ऐसी सोच वालों की कमी नहीं है जिन्हें प्रियंका गांधी उम्मीद के तौर पर दिखाई दे रही हैं. 16 मई के बाद के दिनों में ‘प्रियंका लाओ, पार्टी बचाओ’ का नारा पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं की तरफ से और भी बुलंद हुआ है. तमाम शहरों में इस आशय के पोस्टर बैनर दिखाई दे रहे हैं. पार्टी कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग मुखर होकर यह कहने लगा है कि अब राहुल से नहीं होगा और प्रियंका ही पार्टी का बेड़ा पार लगा सकती हैं. ऐसा नहीं है कि प्रियंका में प्रताप बस कार्यकर्ताओं को ही दिख रहा है. कुछ समय पहले ही पार्टी के वरिष्ठ नेता और महासचिव जनार्दन दिवदी ने प्रियंका पर बयान देते हुए कहा था कि प्रियंका गांधी की बचपन से ही राजनीति में रुचि है. द्विवेदी का कहना था, ‘जहां तक मुझे जानकारी है, राजनीति में प्रियंका की रुचि बहुत कम उम्र से ही थी. वे राजनीतिक घटनाओं की गहराई को शुरू से ही समझना चाहती थीं. प्रियंका की राजनीतिक समझ के बारे में 1990 में ही राजीव जी ने मुझे बता दिया था.’

जनार्दन दिवदी के इस बयान के कुछ समय बाद ही पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ नेता ऑस्कर फर्नाडिस ने प्रियंका को और सक्रिय भूमिका दिए जाने की वकालत की. उनका कहना था कि प्रियंका को पार्टी में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जानी चाहिए. उनमें बहुत क्षमता है. ऑस्कर के बाद पूर्व मंत्री जयराम रमेश भी प्रियंका को राहुल से अधिक करिश्माई बताते हुए प्रियंका लाओ मुहिम में शामिल होते दिखे.

‘प्रियंका लाओ, पार्टी बचाओ’ वाली इस मुहिम में सबसे आगे इलाहाबाद के कुछ कांग्रेसी कार्यकर्ता हैं. ‘कांग्रेस का मून, प्रियंका कमिंग सून’ सरीखे पोस्टर वहां पिछले 100 दिनों में कई दफा दिखाई दिए. इलाहाबाद के कांग्रेस कार्यकर्ता अजय तिवारी कहते हैं, ‘ देखिए राहुल भैया का टेस्ट दूसरा है. वो अलग टाइप के इंसान हैं. सीधे आदमी हैं. अभी की जो राजनीति हो रही है उसको प्रियंका दीदी सही से हैंडिल कर सकती है.’

खैर, इस तरह से पूरी पार्टी में एक धड़ा मजबूती से प्रियंका को पार्टी का चेहरा बनाने की मांग कर रहा है. चुनाव हारने के बाद पिछले 100 दिनों में यह मांग और मुखर हुई है. लेकिन इसका सबसे मजेदार पहलू यह है कि जैसे ही यह चर्चा गर्म होती है प्रियंका खुद इस पर पानी डाल देती हैं. प्रियंका के ऐसा करने को पार्टी के एक नेता उनकी मजबूरी बताते हैं.

कांग्रेस के शैडो ट्विटर अकाउंट्स को जनता ने कितनी गंभीरता से लिया ये उन अकाउंट्स के फॉलोवर्स की संख्या देखकर पता चलता है. किसी के 22 फॉलोवर हैं तो किसी के 24 या 64

‘प्रियंका भी जानती हैं कि पार्टी कार्यकर्ता क्या चाहते हैं. लेकिन जब सोनिया जी ही कह देती हैं कि प्रियंका अमेठी और रायबरेली तक सीमित रहेंगी तो फिर प्रियंका के पास विकल्प क्या बचता है. सोनिया जी ने अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी चुन लिया है. वो राहुल हैं. अगर जनार्दन दिवेदी को पता है कि प्रियंका काबिल हैं तो क्या प्रियंका की मां को नहीं पता कि उनके बेटे और बेटी में से काबिल कौन हैं. लेकिन उन्होंने राहुल जी को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया. अब या तो प्रियंका पावर के लिए अपनी मां और भाई से युद्ध करें जोकि वो कर नहीं सकतीं.’ गांधी परिवार के करीबी एक कांग्रेसी नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘अपनी तरफ से घरवाले जो दे दें लेकिन भारतीय समाज में लड़कियां घरवालों से अपना हिस्सा नहीं मांगती क्योंकि उन्हें डर होता कि ऐसा करने के बाद जब वो अगली बार मायके आएंगी तो कोई उन्हें पानी के लिए भी नहीं पूछेगा. इसी मनःस्थिति से प्रियंका भी जूझ रही हैं.’

प्रियंका के पक्ष में हो रही बयानबाजी और लोकसभा चुनाव हारने के बाद राहुल पर लगातार हो रहे हमलों के कारण पार्टी के भीतर अलग युद्ध चल रहा है. राहुल की लगातार हो रही आलोचना और प्रियंका से उनकी तुलना के कारण कांग्रेस के भीतर राहुल कांग्रेस का भी तेजी से उदय हुआ है. आज से लगभग 30 दिन पहले पार्टी के तकरीबन 16 पार्टी सचिवों ने कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी से मुलाकात की. इन सचिवों की मांग थी कि राहुल के खिलाफ जो भी पार्टी के बड़े नेता बयानबाजी कर रहे हैं उनको तत्काल ऐसा करने से रोका जाए. सारे महासचिवों और वरिष्ठ नेताओं को उनकी तरफ से एक चिट्ठी भेजी जाए कि किसी रूप में सार्वजनिक तौर पर राहुल गांधी की आलोचना बर्दाश्त नहीं की जाएगी. अगर बयानबाजी बंद नहीं हुई तो इन नेताओं से भी उनके राजनीतिक जीवन का हिसाब-किताब लिया जाएगा. और यह सब सार्वजनिक होगा. द्विवेदी सचिवों के इस आक्रामक रवैये से हतप्रभ थे. उन्होंने इस मांग स्वीकारते हुए सारे महासचिवों और कई वरिष्ठ नेताओं को इस बाबत चिट्ठी भेज दी.

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राहुल के बचाव में उतरी सचिवों की टीम को पुराने और नए कांग्रेसियों के बीच बढ़ती तकरार से जोड़ कर भी देखा जा सकता है. राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं, ‘पार्टी अब दो खेमों में बंट गई हैं. एक तरफ सोनिया कांग्रेस है तो दूसरी तरफ राहुल कांग्रेस. दोनों समूहों में तनातनी जारी है.’

जानकार बताते हैं कि इस तनातनी की शुरूआत उसी समय हो गई थी जब राहुल ने पार्टी में आमूलचूल परिवर्तन की बात शुरु की. पार्टी के एक सचिव कहते हैं, ‘ पार्टी के वरिष्ठ नेता राहुल के प्रयोगों से हमेशा नाखुश रहे. राहुल ने पार्टी को लोकतांत्रिक बनाने की जो पहल शुरू की उससे ये लोग हमेशा नाराज रहे. क्योंकि पहले ये अपने पिट्ठुओं को एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस में भरते थे. आम कांग्रेसी को कभी उसमें जगह नहीं मिलती थी. अगर सही मायने में कांग्रेस संगठन का लोकतांत्रीकरण हो गया जो कि राहुल चाहते हैं और संगठन के चुनाव होने लगे तो इन लोगों की दुकानें बंद हो जाएंगी.’

लोकसभा चुनाव हारने के बाद पार्टी के भीतर संगठन के चुनाव कराने की चर्चा एक बार फिर गर्म हुई थी. पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद कमलनाथ का कहना था कि कांग्रेस की स्थिति सुधारने के लिए सबसे पहले जरूरत है कि वर्किंग कमिटी का चुनाव किया जाए. पहले एक निर्वाचित वर्किंग कमिटी बनाई जानी चाहिए. बकौल कमलनाथ, ‘हमें पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र को और मजबूत करने की जरूरत है. लेकिन पार्टी में कई ऐसे नेता है जो इसका विरोध करते हैं. एक बार चुनाव हो जाएं तो फिर ऐसे लोगों को संरक्षण मिलना बंद हो जाएगा.’

कमलनाथ और पार्टी के कई अन्य नेताओं के संगठन के चुनाव कराने संबंधी बयान आने के बाद राहुल ने उससे सहमति जताई थी. उनका कहना था कि उनका प्रयास है कि पार्टी में ब्लॉक स्तर से लेकर अध्यक्ष पद तक के लिए चुनाव होना चाहिए. पार्टी के एक युवा नेता कहते हैं, ‘राहुल की इसी सोच के कारण ये नेता लोकसभा हारने के बाद उनके पीछे पड़े हुए हैं. ये लोग हर सार्वजनिक मंच पर राहुल को नाकाबिल ठहराने में लगे हैं. ये कांग्रेसी राहुल की राजनीतिक हत्या करना चाहते हैं. ये लोग प्रियंका जी के कंधे पर बंदूक रखकर चलाना चाहते हैं. राहुल विरोधी इन कांग्रेसियों ने ही हाल में मीडिया में यह खबर प्लांट कराई कि राहुल अपनी बहन प्रियंका के बड़े बेटे को गोद लेने वाले हैं. और अब वही उनका राजनीतिक उत्तराधिकारी होगा.’

चुनाव हारने के बाद पार्टी के सामने एक बड़ी चुनौती इस रूप में भी आई कि उसके कई नेता उसका दामन छोड़कर या तो बाहर जा चुके हैं, या ऐसा करने की तैयारी कर रहे हैं. एक महीने पहले ही 45 साल से पार्टी का झंडा-डंडा उठाकर घूमने वाले हरियाणा के खांटी कांग्रेसी नेता चौधरी बीरेंद्र सिंह ने पार्टी को अलविदा कह दिया. बीरेंद्र, सोनिया के समर्थन में कांग्रेस छोड़कर तिवारी कांग्रेस में शामिल हो गए थे. महाराष्ट्र में कुछ समय पहले शिवसेना से पार्टी में आए नारायण राणे आर या पार की मुद्रा में आ गए थे. खुद को मुख्यमंत्री बनाने की उनकी मांग से निपटने के लिए पार्टी को बहुत पापड़ बेलने पड़े. असम में पार्टी की करारी हार के बाद तरुण गोगोई ने सोनिया गांधी को इस्तीफा सौंपा जिसे सोनिया ने खारिज कर दिया. सोनिया के इस्तीफा खारिज करने संबंधी निर्णय का असम में पार्टी के कई विधायकों ने सरेआम विरोध किया. वहां स्वास्थ्य मंत्री हिमांता बिस्व सर्मा समेत कई कांग्रेसी इस्तीफा देकर बाहर जा चुके हैं.

पिछले कुछ समय में हुए उपचुनाव पार्टी के लिए थोड़ी राहत जरूर लेकर आए. उसे उत्तराखंड, बिहार, कर्नाटक, राजस्थान में हुए उपचुनावों में सफलता मिली. पार्टी की वरिष्ठ नेता और यूपी की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी कहती हैं, ‘देखिए तेजी से लोगों का मोदी सरकार से मोहभंग हो रहा है.

इसी का नतीजा आपको उपचुनावों में दिखाई दिया है. हमारा कार्यकर्ता फिर से खड़ा हो रहा है.’

जोशी को भले लगता है कि उनका कार्यकर्ता खड़ा हो रहा है लेकिन हकीकत यह है कि अभी भी स्थानीय स्तर पर अधिकांश राज्यों में पार्टी हताशा का माहौल है. आनेवाले दिनों में हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव होने वाले हैं. पार्टी इन दोनों जगहों पर लंबे समय से सत्ता में है. पार्टी हारती है या जीतती है यह तो चुनाव परिणामों के बाद ही पता चलेगा लेकिन इन राज्यों में उसकी गतिविधियों को देखें तो लगता है कि वह मनोवैज्ञानिक तौर पर पहले ही हार चुकी है. हरियाणा में एक पार्टी कार्यकर्ता केवल श्रीवास्तव कहते हैं, ‘पार्टी ने लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी कोई सबक नहीं लिया. आप देख ही रहे हैं पिछले तीन महीने से क्या चल रहा है. बडे नेता तो अपनी-अपनी नौकरियों पर वापस चले गए. किसी ने वकालत शुरु कर दी तो किसी ने कुछ और. गरीब कार्यकर्ता के पास क्या विकल्प बचा है. लोकसभा चुनाव में जो हुआ वो तो हुआ ही उसके बाद तो हालत और खराब होती जा रही है.’ केवल जैसे कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है जो पार्टी की दिन-प्रतिदिन हो रही फजीहत को देखने के लिए अभिशप्त हैं.

पिछले चार महीने में पार्टी नेताओं की गतिविधियों को देखें तो उससे नेतृत्व के अभाव के साथ ही पार्टी नेताओं की आपसी खींचतान का भी प्रमाण मिलता है. उदाहरण के तौर पर मोदी सरकार ने जैसे ही पी सदाशिवम का नाम केरल के राज्यपाल के लिए फाइनल किया, कांग्रेस की तरफ से इस पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं. पार्टी नेता आनंद शर्मा ने जहां इसकी जमकर आलोचना करते हुए इसे गलत ठहराया वहीं पूर्व मंत्री मनीष तिवारी भाजपा के इस फैसले में कोई भी कानूनी गड़बड़ी नहीं है जैसा स्टैंड लेते नजर आए.

पार्टी में अव्यवस्था का क्या आलम है यह साक्षी महाराज के बयान से उपजे विवाद के समय भी पता चला. भाजपा नेता साक्षी महाराज द्वारा मदरसों पर दिए विवादित बयान के बाद पार्टी का एक धड़ा कुछ भी बोलने से बचता रहा. उसे लगता था कि इससे वे भाजपा के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने वाले जाल में फंस सकते हैं. वहीं मनीष तिवारी और राशिद अल्वी जैसे नेता भी थे जो साक्षी महाराज की उच्चतम स्वर में आलोचना करते दिखाई-सुनाई दिए. इस घटना के बाद ही पार्टी के संचार सेल प्रमुख अजय माकन ने ट्विट कर कहा कि पार्टी के प्रवक्ताओं को ही केवल पार्टी का दृष्टिकोण रखने का अधिकार है. माकन ने लगे हाथ पार्टी के प्रवक्ताओं की सूची भी जारी कर दी.

‘अगर जनार्दन दिवेदी को पता है कि प्रियंका काबिल हैं तो क्या प्रियंका की मां को नहीं पता कि उनके बेटे और बेटी में से काबिल कौन हैं. लेकिन उन्होंने राहुल जी को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया’

माकन के इस कदम को पार्टी के एक धड़े ने मुंह बंद रखने की धमकी के तौर पर देखा. लेकिन जिन मनीष तिवारी और राशीद अल्वी के कारण यह किया गया था वे चुप होने वालों में नहीं थे. कुछ समय बाद ही तिवारी का बयान आ गया कि वे पार्टी के बहुत पुराने कार्यकर्ता हैं और उन्हें अपनी बात रखने से कोई नहीं रोक सकता.

बयानों के कारण पार्टी की फजीहत उस समय भी हुई जब जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि 60-70 साल के कांग्रेसी नेताओं को सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए. द्विवेदी के बयान को आनन फानन में पार्टी ने उनका निजी बयान बताकर राहत की सांस ली.

ऐसे उदाहरण पार्टी की उस दशा की तरफ ही इशारा करते हैं जहां नेतृत्व या तो नहीं है या फिर उसमें पहले वाली ताकत नहीं. एक भ्रम की स्थिति है. शीर्ष के कमजोर होने के कारण चीजें अधिक लोकतांत्रिक तो हो जाती हैं लेकिन उनके अराजक होने का खतरा बना रहता है.

संसद में और सड़क पर
संसद में और सड़क पर विपक्ष के रूप में कांग्रेस ने अभी तक अपनी भूमिका कुछ उसी तरह निभाई है जैसी हमारे अधिकांश बॉलीवुड कलाकार हॉलीवुड की फिल्मों में निभाते दिखते हैं. यानी उनका वहां होना न होना एक बराबर ही है.

चुनाव परिणामों ने जब पार्टी की झोली में कुल जमा 44 सीटें सौंपी उसी दिन से उसमें चर्चा शुरू हो गई कि सरकार तो गई ही नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी के भी लाले पड़ गए हैं. नेता प्रतिपक्ष के लिए 55 सीटों का होना जरूरी है. खैर पार्टी को जब पता चला कि अधिकार के तौर पर तो उसे नेता प्रतिपक्ष का पद मिलने से रहा सो उसने नैतिकता की दुहाई देनी शुरू कर दी. लेकिन भाजपा कांग्रेस के इस चक्कर में नहीं फंसी. पार्टी ने शुरू में ही अनौपचारिक तौर पर यह मैसेज दे दिया कि वह उस कांग्रेसी परंपरा को बनाए रखना चाहती हैं जिसमें संख्या कम होने पर विपक्ष को स्थान देने की गुंजाइश नहीं हुआ करती है.

कांग्रेस के पिछले चार महीने से अधिक के कार्यकाल का 95 फीसदी हिस्सा रागदरबारी के लंगड़ की तरह धर्म की उस लड़ाई में चला गया जिसमें पार्टी नैतिकता के आधार पर सत्ता पक्ष से नेता प्रतिपक्ष का पद देने की मांग करती रही. ऐसे में भाजपा सरकार बिना किसी खास विपक्षी ब्रेकर के टॉप गियर में ही चलती रही. कांग्रेस के साथ यहां दोहरा संकट था. पहला यह कि उसे नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए गिड़गिड़ाना पड़ रहा था. दूसरा भाजपा उसे विपक्ष के रूप में भी स्वीकार नहीं कर रही थी. वह विपक्षी दलों में एआईएडीएमके, बीजू जनता दल और तृणमुल कांग्रेस जैसे दल यहां तक कि सपा तक को संबोधित करती नजर आती थी, लेकिन कांग्रेस कांग्रेस की अनदेखी कर रही थी.

कांग्रेस के लिए इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह थी कि उसके जैसे ही विपक्ष में बैठी हुई पार्टियां भी उससे दूर भाग रही थीं. टीएमसी और एआईएडीएमके जैसी पार्टियों ने स्पीकर से विनती की कि सदन में सीटों का निर्धारण होते समय उन्हें कांग्रेस के साथ बैठने के लिए सीटें नहीं दी जाएं. ये पार्टियां कांग्रेस के साथ कहीं से जुड़ती हुई नहीं दिखना चाहती थीं. यहां तक कि लोकसभा की जिस उपसभापति की कुर्सी पर बैठने के अरमान कांग्रेस संजो रही थी उस पर पानी फेरते हुए भाजपा ने वह भी जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके को दे दी.

इस तरह से भाजपा ने तो सदन में कांग्रेस को हाशिए पर फेंका ही अन्य विपक्षी दलों ने भी उसे अछूत मानकर उससे दूरी बनाए रखने में ही भलाई समझी. इसका उदाहरण उस समय भी दिखा जब मोदी के प्रिंसिपल सेक्रेट्री नृपेंद्र मिश्रा की अध्यादेश के माध्यम से हुई नियुक्ति पर संसदीय मोहर लगाने का समय आया. कांग्रेस सभी विपक्षी दलों से इसकी खिलाफत करने की साझा रणनीति बनाती रही. लेकिन तृणमूल और सपा-बसपा जैसी पार्टियों ने – जिन्होंने लोकसभा में इसका विरोध किया था – यूटर्न मारते हुए राज्यसभा में अध्यादेश समर्थन कर दिया.

जिन एक-दो मौकों पर कांग्रेस लोकसभा में थोड़ा सक्रिय दिखी उनमें से एक था मल्लिकार्जुन खड़गे का वह संबोधन जिसमें उन्होंने कांग्रेस को सौ कौरवों के सामने पांच पांडवों के समान बताया था. इसके अलावा राहुल भी जब सांप्रदायिक हिंसा पर चर्चा की मांग को लेकर लोकसभा के वेल में उतरे तो सदन के बाहर चर्चा का माहौल गर्म हो गया. लेकिन जब इसपर सदन में चर्चा हुई तो उन्होंने उस चर्चा में हिस्सा नहीं लिया. इन गिने-चुने अवसरों के अलावा कांग्रेस सदन में वही कर रही थी, जो करते हुए कैमरे ने राहुल गांधी को पकड़ा था. यानी वह सो रही थी.

पार्टी का बचाव करते हुए रीता कहती हैं, ‘देखिए विरोध के लिए अभी बहुत जल्दी है. हम सरकार के कामों पर नजर बनाए हुए हैं. जहां जरूरी होगा वहां जरूर हम विरोध करेंगे. हम पूरी तरह सक्रिय हैं.’

रीता भले सक्रियता की बात करें लेकिन सदन के बाहर सड़क पर भी कांग्रेस मोदी सरकार को किसी मुद्दे पर न तो सही से घेरते हुई दिखी और न ही दिल्ली दरबार पहली बार परिचित हो रहे नरेंद्र मोदी को अपने 10 साल के प्रशासनिक अनुभव के आधार पर कोई सलाह ही दे पाई. जो थोड़ा-बहुत उसने कुछ किया भी तो ऐसा था मानों किसी ने कनपटी पर बंदूक रखवाकर कराया हो. उल्टा, वह अपनी हरकतों से हास्य का संचार जरूर करती नजर आई.

उदाहरण के लिए. प्रधानमंत्री मोदी जब जापान यात्रा पर गए थे उसी समय राहुल गांधी अमेठी गए हुए थे. वहां लंबे समय से जनता बिजली कटौती से त्रस्त थी. सो सांसद महोदय को देखा तो अपना रोष व्यक्त करने लगी. जनता का गुस्सा देख राहुल ने मामला मोदी के सिर मढ़ने की ठानी. मीडिया से कहा कि आप देख रहे हैं देश की जनता कैसे बिजली कटौती से जूझ रही है लेकिन मोदी जी जापान में जाकर ड्रम बजा रहे हैं. जनता ने राहुल के बयान पर क्या सोचा यह तो पता नहीं लेकिन सोशल मीडिया पर लोग उनके इस बयान पर मनोरंजन करते जरूर दिखे.

जो राहुल गांधी पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का चेहरा थे और जिनके ऊपर भाजपा को घेरने की प्राथमिक जिम्मेवारी थी, वे पिछले सवा-सौ दिन ईद का चांद बने रहे. राहुल से 20 साल ज्यादा उम्र वाले मोदी ने जहां चुनावों में उनसे ज्यादा रैलियां की, ज्यादा दूरी कवर की और प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे छुट्टी पर जाते नहीं दिखे वहीं राहुल पिछले चार महीने में अधिकांश समय छुट्टी पर ही रहे. औपचारिक रुप से उनके बारे में मीडिया क्या बताएगा जब उनकी पार्टी के नेताओं को ही पता नहीं रहता कि वे देश में हैं भी कि नहीं. पूरी पार्टी को शर्मिंदा करने वाला वह वाकया लोगों के जहन में ताजा होगा जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विदाई भोज से राहुल गायब थे. पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘ शर्मनाक उनका गायब रहना नहीं था बल्कि ये था कि पार्टी के लोगों को पता ही नहीं था कि वे कहां हैं.’

पिछले चार महीनों में न तो राहुल ने कोई प्रेस कॉंफ्रेंस की और न ही सरकार के किसी कदम की मजबूत आलोचना. यहां भी मोर्चा संभालने का काम सोनिया गांधी ने ही किया. वे ही भाजपा की सांप्रदायिकता से जनता को आगाह करती नजर आईं. स्थिति को ऐसे समझा जा सकता है कि मोदी सरकार द्वारा श्रम कानूनों में बदलाव की खबरों पर सबसे अधिक मुखर विरोध संघ के संगठन भारतीय मजदूर संघ की ओर से सामने आया. कांग्रेस यहां भी मुंह में ही बोलती दिखाई दी.

मोदी सरकार के सौ दिन पूरे होने पर कांग्रेस ने एक रचनात्मक कदम उठाते हुए दर्जन भर सरकारी मंत्रालयों के शैडो ट्विटर अकाउंट जरूर बनाए. यहां विशेषज्ञों की सेवा लेते हुए वह इन मंत्रालयों की कथित नाकामियां सामने लाती दिखी. लेकिन कांग्रेस के इस प्रयास को जनता ने कितनी गंभीरता से लिया ये उन ट्विटर अकाउंटों के फॉलोवरों की संख्या देखकर पता चलता है. किसी के 22 फॉलोवर हैं तो किसी के 24 या 64.

राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं, ‘पिछले चार महीनों में कांग्रेस हर मोर्चे पर फेल ही दिखाई दी है. पूरी पार्टी में हताशा का भाव है. न उसमें कहीं कोई जिम्मेदारी उठाता दिख रहा है और न ही जल्द इसमें बदलाव की ही सूरत दिख रही है.’

मोदी सरकार द्वारा श्रम कानूनों में बदलाव की खबरों पर सबसे अधिक मुखर विरोध संघ के संगठन भारतीय मजदूर संघ की ओर से सामने आया. कांग्रेस यहां भी मुंह में ही बोलती दिखाई दी

एक तरफ जहां मोदी सरकार की रचनात्मक आलोचना से पार्टी चूकती दिखाई दी वहीं उसके नेता समय-समय पर मोदी सरकार की प्रशंसा करके पार्टी की फजीहत भी कराते रहे.  मोदी सरकार के शपथ लेने के एक महीने के भीतर ही तिरुअनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने मोदी की तारीफ करके पूरी पार्टी को सकते में डाल दिया. थरूर ने अपने एक लेख में लिखा ‘ बहुमत मिलने के बाद मोदी और बीजेपी के जिस रवैये का विरोधी दलों को अंदेशा था वह गलत साबित हुआ है. बीजेपी ने पुराने तरीकों को त्याग कर सभी को चौंका दिया है. मोदी के सकारात्मक रवैये के साथ सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश की हम प्रशंसा करते हैं और इस बदलाव की अनदेखी करना गलत होगा.’ थरूर के इस लेख के सामने आते ही कांग्रेस में हड़कंप मच गया. किसी को उम्मीद नहीं थी कि उनकी अपनी पार्टी का नेता एक महीने में ही मोदी सरकार को इस तरह का प्रशंसा पत्र भेंट करेगा. कांग्रेस थरूर की प्रशंसा से कितना बौखलाई थी यह मणिशंकर अय्यर के बयान से साबित हो जाता है. अय्यर ने थरूर की आलोचना करते हुए कहा कि उनके इस बयान के बाद लोकसभा में पार्टी की संख्या 44 से 43 हो गई है.

कुछ दिनों बाद ही थरूर ने एक बार फिर हंगामा तब मचाया जब मोदी सरकार में मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी से मुलाकात के बाद उन्होंने ट्वीट किया. थरूर ने लिखा कि भारत की शैक्षणिक चुनौतियों पर ईरानी के साथ अच्छी चर्चा हुई. मैं समर्पित और मिलनसार मंत्री की सराहना करता हूं. मानव संसाधान विकास मंत्रालय के लिए शुभकामनाएं.’ थरूर के इस ट्वीट के बाद फिर से कांग्रेस के कई नेता सफाई देते और मांगते दिखाई दिए.

अभी कुछ समय पहले ही कांग्रेस तब अवाक रह गई जब दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का ठीक उस समय एक बयान आया जब बीजेपी जोड़-तोड़ करके दिल्ली में अपनी सरकार बनाना चाहती थी, शीला का कहना था, ‘लोकतंत्र में चुनी हुई सरकारें हमेशा अच्छी होती हैं क्योंकि वे लोगों का प्रतिनिधित्व करती हैं. और अगर बीजेपी सरकार बना सकती है तो यह दिल्ली के लिए अच्छा है.’ शीला के इस बयान से पहले तो पूरी पार्टी सकते में आ गई. फिर अपनी चिढ़ को छुपाते हुए पार्टी नेताओं ने कहा कि ये शीला जी के अपने विचार हैं. शीला द्वारा कांग्रेस को दिए इस जख्म पर भाजपा ने यह कहकर नमक रगड़ा कि शीला जी वरिष्ठ राजनेता हैं अगर कुछ कह रही हैं तो इसका मतलब है.

कांग्रेस को शीला दीक्षित से मिले जख्म अभी हरे ही थे कि दिग्विजय सिंह ने उस पर एक और हमला कर दिया. हाल ही में कश्मीर में आई बाढ़ और उससे मची त्रासदी को लेकर कांग्रेस मोदी सरकार पर हमलावर थी. तर्क वही पारंपरिक थे कि सरकार सो रही थी. लोगों को राहत नहीं मिल रही है. सरकार त्रासदी को लेकर गंभीर नहीं है आदि आदि. लेकिन कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह पार्टी लाइन को छोड़कर किसी और पटरी पर ही दौड़ने लगे. दिग्विजय ने कश्मीर बाढ़ में मोदी सरकार के कार्यों की न सिर्फ प्रशंसा की बल्कि मोदी के पीओके में राहत पहुंचाने की पेशकश की भी खूब तारीफ की. इसके अलावा जिस जन-धन योजना को कांग्रेस अपनी पिछली सरकार का आइडिया बता रही थी उसके लिए दिग्विजय सिंह ने मोदी सरकार की सार्वजनिक रूप से प्रशंसा की.

फजीहत कराने के इस क्रम में कमलनाथ भी पीछे नहीं रहे. विनोद राय के इंटरव्यू से 2जी मामले में एक बार फिर शुरू हुई चर्चा के बीच कमलनाथ का बयान आया कि कैसे उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को चिट्ठी लिखकर 2जी आवंटन के बारे में चेताया था. कमलनाथ ने कहा, ‘मैंने उस वक्त प्रधानमंत्री को लेटर लिखकर 2जी आवंटन को लेकर आगाह किया था. यह लेटर सरकारी फाइलों में है’. अपने ही पूर्व प्रधानमंत्री के बारे में पार्टी के ही वरिष्ठ नेता की टिप्प्णी से कांग्रेस एक बार और शर्मसार हुई.

करीब 125 दिनों के इसी कालखंड में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री जयराम रमेश मोदी को भारत का रिचर्ड निक्सन बताते नजर आए. एक साक्षात्कार में जयराम ने मोदी की तारीफ करते हुए कहा, ‘ मोदी में भारत के रिचर्ड निक्सन के तौर पर उभरने की पूरी क्षमता है. जिस तरह से निक्सन ने चीन को अमेरिका के लिए खोला, उसी तरह से मोदी में क्षमता है और वह चीन और पाकिस्तान से डील करते समय निक्सन जैसा बन सकते हैं. इन देशों से डील करने में जो आज़ादी मोदी के पास है वह मनमोहन सिंह के पास नहीं थी.’

हाल ही में मोदी के अमेरिका यात्रा पर उनके दिए भाषणों पर भी कांग्रेसी नेता विभाजित दिखे. एक धड़ा जहां मोदी के भाषणों की सार्वजनिक तौर पर तारीफ करता दिखा वहीं पार्टी का दूसरा वर्ग आलोचना कर रहा था. इस तरह से एक तरफ जहां कांग्रेस का एक धड़ा मोदी और उनकी सरकार की समय समय पर पिछले 125 दिनों में प्रशंसा करता दिखा वहीं पार्टी के दूसरे नेता दूसरे सुर में बात करते दिखाई दिए. इसे कांग्रेस समर्थक परिवक्वता और पार्टी में लोकतंत्र का उदाहरण बता सकते हैं. लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसा मानने का कोई कारण नहीं दिखता.

आने वाले समय में कांग्रेस किस दिशा में आगे बढ़ेगी या उसने पिछली हार से कितना सीखा है इसका पता उस एंटनी कमेटी रिपोर्ट से भी चलता है जिसको लोकसभा चुनाव में हार के कारणों को पता लगाने की जिम्मेदारी दी गई थी. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि चुनाव में हार के लिए पार्टी का नेतृत्व अर्थात राहुल गांधी और सोनिया गांधी किसी तरह से जिम्मेदार नहीं हैं. नेतृत्व से कोई गलती नहीं हुई. अपनी रिपोर्ट में एंटनी ने नेतृत्व के अलावा पूरी कायनात को कांग्रेस की हार का जिम्मेवार ठहरा दिया. ऐसे आत्मनिरीक्षण के दम पर पार्टी का कल आज से कितना बेहतर होगा आने वाला समय ही बताएगा.

brijesh.singh@tehelka.com

अमेरिका में मोदी, आसमान में मीडिया

modi-obamaप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे पर प्रचार की इतनी धूल-धुंध छाई हुई है कि उसका ठीक-ठीक और तटस्थ मूल्यांकन मुश्किल हो गया है. बेशक, ऐसी यात्राओं का प्रतीकात्मक मूल्य अक्सर उनके वास्तविक मूल्य से बड़ा होता है और वह बाद में इस वास्तविक मूल्य को निर्धारित करने में भी मदद करता है, लेकिन प्रतीकात्मक ढंग से भी इस पूरी यात्रा पर जिस तरह का मोदीमेनिया हावी रहा, उससे यह समझना आसान नहीं रह गया है कि हम इस पूरे दौरे को किस निगाह से देखें.

इसमें शक नहीं कि आज की दुनिया में भारत की मजबूत होती हैसियत की वजह से नरेंद्र मोदी के इस दौरे की अपनी एक अहमियत रही. इसमें भी शक नहीं कि भारत में उन्हें जो विराट बहुमत मिला है, वह कहीं न कहीं उस भरोसे से प्रेरित रहा है जो नरेंद्र मोदी लोगों के भीतर जगाने में कामयाब रहे- लेकिन यह भरोसा जितना देसी धरती पर जनमा है, उससे ज्यादा उस विदेशी धरती पर, जहां अनिवासी भारतीयों का एक बहुत बड़ा समुदाय नरेंद्र मोदी से बिल्कुल किसी जादू की उम्मीद लगा बैठा है. यही वजह है कि नरेंद्र मोदी का अमेरिका दौरा जितना अमेरिकियों या बराक ओबामा के लिए महत्वपूर्ण था, उससे कई गुना ज्यादा महत्वपूर्ण इस अनिवासी समुदाय के लिए था- खासकर इसलिए भी कि कहीं न कहीं इस समुदाय के भीतर 2005 में नरेंद्र मोदी को वीजा न दिए जाने की कसक रही और वह इस तथ्य में प्रगट भी हुई कि नरेंद्र मोदी के लिए 2014 में वही कुर्सी तैयार रखी गई, जिस पर 2005 के अपने दौरे में उन्हें बैठना था. इसी अनिवासी भारतीय समुदाय ने नरेंद्र मोदी के लिए मैडिसन स्क्वेयर को मोदीसन स्क्वेयर में बदल डाला.

निस्संदेह अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी नरेंद्र मोदी के दौरे को अहमियत दी, इसका प्रमाण यह तथ्य है कि दोनों ने मिलकर वाशिंगटन पोस्ट में एक साझा टिप्पणी लिखी जिसे पहले संपादकीय का नाम दिया जा रहा था. आजकल नरेंद्र मोदी जो कुछ भी करते है, उसे ऐतिहासिक करार दिए जाने की बहुत ख़तरनाक बीमारी के प्रति एक सुचिंतित दूरी बरतते हुए भी यह कहना पड़ेगा कि यह कदम वाकई इस मायने में ऐतिहासिक है कि पहले ऐसी कोई दूसरी मिसाल याद नहीं आती जब दो राष्ट्राध्यक्षों ने मिलकर किसी साझा लेख पर अपनी मुहर लगाई हो. यह प्रश्न गौण है कि उस लेख में कहा क्या गया, महत्त्वपूर्ण बात यह है कि नरेंद्र मोदी और बराक ओबामा रिश्तों के स्तर पर इतने करीब आए या दिखने की कोशिश करते रहे जिसमें वे साथ-साथ लेख तक लिख सकते हैं.

तो नरेंद्र मोदी की एक बड़ी उपलब्धि तो यही है कि उन्होंने बराक ओबामा के साथ ऐसी संगति बिठाई जो बिल्कुल बराबरी पर दिखाई पडती है. बेशक, मोदी की इस हैसियत के पीछे भारत में उनको मिले विराट बहुमत के अलावा अमेरिका में बसे 33 लाख भारतीय प्रवासियों की लगातार मजबूत हो रही आर्थिक-सामाजिक और कुछ हद तक राजनीतिक पकड़ का भी हाथ है जिन्हें बराक ओबामा की पार्टी नजरअंदाज नहीं कर सकती. अमेरिका में बसे 40 लाख चीनियों के बाद भारतीयों की तादाद सबसे बड़ी है और कई इलाकों में उनकी राजनीतिक हैसियत भी अहमियत रखती है. इस हैसियत को ध्यान में रखते हुए बराक ओबामा के लिए यह मुमकिन नहीं था कि भारतीय प्रधानमंत्री पांच दिन के लिए अमेरिका की धरती पर आएं और उन्हें नज़रअंदाज कर दिया जाए.

लेकिन क्या वाकई अमेरिका भारत या नरेंद्र मोदी के आगे उस तरह बिछा या नतमस्तक दिखाई देता रहा जैसा भारतीय मीडिया अमेरिका में बसे भारतीयों की मार्फत दिखाता और बताता रहा? दरअसल मोदी के अमेरिका दौरे के मूल्यांकन की सीमाएं और मुश्किलें यहीं से शुरू होती हैं. भारतीय मीडिया जैसे बताता रहा कि ओबामा को नरेंद्र मोदी का बेसब्री से इंतज़ार है. जबकि सच्चाई यह है कि अमेरिका या बराक ओबामा की तात्कालिक चिंता भारत या दक्षिण एशिया की नहीं, पश्चिम एशिया की राजनीति है जहां आइएस जैसा खूंखार आतंकवादी संगठन बाकायदा अपना राज स्थापित करता दिखाई पड़ रहा है. लीबिया से इराक तक सबकुछ तहस-नहस करने के बाद अमेरिका पा रहा है कि इन आतंकवादियों को रोकने में उसकी मदद भी अब तक कारगर नहीं हो पाई है. इसके अलावा सीरिया, सऊदी अरब, ईरान और इराक के उलझे हुए राजनीतिक समीकरणों के बीच कोई शांतिपूर्ण समाधान भी फिलहाल नज़र से दूर है. इन सबसे अलग अफगानिस्तान और पाकिस्तान की तालिबानी पट्टी अमेरिका का एक और सिरदर्द है.

बराक ओबामा ने सिर्फ नरेंद्र मोदी के लिए अपना दस्तरखान बिछाया हो, ऐसा नहीं है. इस साल रमजान के महीने में वे छह बार वाइट हाउस में इफ्तार डिनर दे चुके हैं और एक दिन उपवास भी रख चुके हैं. जाहिर है, उन्हें मालूम है कि अमेरिका की बदनीयती या नेकनीयती या नासमझी की वजह से इस्लामी दुनिया में उसके प्रति जो शत्रु भाव पैदा हुआ है, वह हथियारों से नहीं, दूसरी तरह के सरोकारों से ही ख़त्म होगा. लेकिन ऐसा नहीं है कि भारत की उनके लिए कोई अहमियत ही नहीं है. 70 और 80 के दशकों में अमेरिका के लिए एशिया में जो हैसियत चीन रखता था, वह अब भारत की है. चीन अब अमेरिका के लिए दोस्त से ज्यादा प्रतिद्वंद्वी है और इस विशाल प्रतिद्वंद्वी की पूरी घेराबंदी के लिए अमेरिका को भारत जैसे विशाल देश से ज्यादा उपयुक्त साथी और कौन मिलेगा. इत्तेफाक से अमेरिका अगर अपने पीछे लगे चीन से परेशान है तो भारत अपने से काफी आगे खड़े चीन से. अगर आने वाले दशक एशिया के होने हैं तो एशिया में वह चीन के साथ-साथ भारत के भी दशक हों, इसके लिए भारत को अमेरिका जैसा मजबूत सहयोगी चाहिए. दरअसल नरेंद्र मोदी और बराक ओबामा के बीच की बातचीत का सबसे अहम पहलू यही है- दोनों अगर साथ चलते हैं तो दोनों के हित सधते हैं. भारत के साथ इस दोस्ती में अमेरिका की हिचक बस इतनी होगी कि वह उस पाकिस्तान का क्या करे जो अपनी भौगोलिक हैसियत से दक्षिण एशिया में है, लेकिन अपनी मज़हबी पहचान के साथ पश्चिम एशिया के राजनीतिक समीकरणों से भी जुड़ा हुआ है.

जहां तक भारत और अमेरिका के आपसी लेनदेन का सवाल है, वहां इस दौरे के बावजूद दोनों ने एक-दूसरे की अपेक्षाएं पूरी की हों, ऐसा नहीं दिखता. सुरक्षा परिषद में भारत के प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर अमेरिका ने एक लंबा कूटनीतिक जवाब दिया है जिसमें बदली हुई सुरक्षा परिषद में भारत की नुमाइंदगी बढ़ाने की ज़रूरत को रेखांकित भर किया गया है. अमेरिका सीधे-सीधे एक बार भी कहने को तैयार नहीं है कि वह भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन करता है. दूसरी तरफ विश्व व्यापार संगठन के समझौते को लेकर भी भारत ने अपना रुख़ बरक़रार रखा है कि जब तक भारत की खाद्य सुरक्षा का खयाल नहीं रखा जाता, तब तक ऐसे समझौते उसके लिए संभव नहीं हैं. शांतिपूर्ण ऐटमी सहयोग की बातचीत आगे बढ़ाने की बात है, लेकिन यह साफ़ नहीं है कि भारत में ऐटमी जवाबदेही कानून के मौजूदा रूप से नाखुश अमेरिकी कंपनियां अब यहां कारोबार करने को तैयार हैं या नहीं. बेशक, भारत ने मेक इन इंडिया नीति के तहत अमेरिका की प्रतिरक्षा कंपनियों को भारत आने का न्योता दिया है और नरेंद्र मोदी अमेरिका की 17 बड़ी कंपनियों के कर्ताधर्ताओं से निजी तौर पर मिले हैं, लेकिन उनकी दिलचस्पी के बावजूद उनके निवेश की ठोस हकीकत खुलनी अभी बाकी है.

बहरहाल, नरेंद्र मोदी के इस कामयाब अमेरिकी दौरे का सबसे बड़ा खतरा वही दिखाई पड़ता रहा जो उनकी अंदरूनी राजनीति में दिखाई पड़ता है- उनके पीछे किसी अविवेकी हुजूम की तरह खड़ा वह घोर दक्षिणपंथी और अतिराष्ट्रवादी तबका, जिसे देश में उसकी राजनीतिक हैसियत ने नई ताकत दे दी है और विदेश में उसकी आर्थिक हैसियत ने. यह तबका देश में लव जेहाद से लेकर सांस्कृतिक उन्माद तक फैलाता रहता है और विदेश में नरेंद्र मोदी के दौरे की ठोस हकीकत को नजरअंदाज कर कुछ इस तरह पेश करना चाहता है जैसे वे अमेरिका न गए हों, आसमान में उड़ रहे हों. दुर्भाग्य से इस देसी-विदेशी तबके के साथ वह नया भारतीय मीडिया भी खड़ा है जिसके भीतर तार्किक विश्लेषण का गुण लगातार कम हो रहा है. वरना संयुक्त राष्ट्र की जिस आम सभा में पौने दो सौ मुल्कों के नेता अपनी बारी आने पर 15-15 मिनट बोलने वाले हों, वहां नरेंद्र मोदी के हिंदी भाषण में भी ऐतिहासिकता खोजने की नासमझ कोशिश करता वह नहीं दिखता. इसी तरह मैडिसन स्क्वेयर गार्डन के कार्यक्रम में भी अपने देश के प्रधानमंत्री का भाषण सुनने के लिए टिकट ख़रीद कर बैठे उत्साही प्रवासी भारतीयों के ‘मोदी-मोदी’ के स्वाभाविक हुंकारे को वह अखिल अमेरिकी आह्वान में बदलने का उत्साह न दिखाता. या फिर भारत के वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई के साथ हुई बदतमीज़ी को वह तरह-तरह के वीडियो पेश करके ढंकने की कोशिश न करता.

दरअसल यह एक आसान देशभक्ति है जो छोटे-छोटे कर्तव्य पूरे करके संतुष्ट हो लेती है और उसके बड़े दाम वसूल करना चाहती है. अमेरिकियों के लिए भारत आने पर वीजा या आप्रवासी भारतीयों के लिए जीवन भर का वीजा जैसी घोषणाओं के साथ मोदी ने इसकी शुरुआत की है. आने वाले दिनों में उसे कारोबार में रियायतें चाहिए, गुड़गांव और ग्रेटर नोएडा के फ्लैटों में इन्वेस्टमेंट के नाम पर लगाई गई रकम का शानदार रिटर्न चाहिए और हवाई अड्डों, सड़कों और इमारतों के बीच ऐसा साफ-सुथरा हिंदुस्तान चाहिए जहां धरती पर पांव रखने से वे गंदे न हों. इस तबके के लिए नरेंद्र मोदी का दौरा ऐतिहासिक होगा, लेकिन बाकी सवा अरब के भारत के लिए उसकी अहमियत क्या है. यह आने वाले दिन बताएंगे.

इक्कीसवीं सदी में भारत-अमेरिका की नई साझेदारी

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लोकतंत्र, स्वतंत्रता, विविधता और उद्यमशीलता के लिए अपनी प्रतिबद्धता के चलते भारत और अमेरिका को साझे मूल्य और पारस्परिक हित एक-दूसरे से जोड़ते हैं. हम दोनों ने ही मानव इतिहास की सकारात्मक यात्रा को गढ़ा है और अपनी साझा कोशिशों के जरिये हमारी सहज और अनोखी साझीदारी अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा और शांति को एक आकार देने में आगामी कई वर्षों तक मददगार हो सकती है.

अमेरिका और भारत के बीच रिश्ते की जड़ें न्याय और समानता के लिए हमारे नागरिकों की साझी इच्छा में हैं. जब स्वामी विवेकानंद ने हिंदू धर्म को विश्व धर्म के रूप में प्रस्तुत किया था तो ऐसा उन्होंने 1893 में शिकागो में हुई विश्व धर्मसंसद में किया था. जब मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने अमेरिका में अश्वेतों के खिलाफ होने वाले भेदभाव और पूर्वग्रह को खत्म करना चाहा था तो उन्हें महात्मा गांधी की अहिंसा की शिक्षाओं से प्रेरणा मिली थी. खुद गांधी जी हेनरी डेविड थोरो के साहित्य से प्रभावित थे.

हम दोनों ही देश अपने नागरिकों की उन्नति के लिए दशकों से साझीदार रहे हैं. भारत के लोग हमारे आपसी सहयोग की मजबूत बुनियाद को याद करते हैं. हरित क्रांति के तहत बढ़ा अन्न उत्पादन और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) हमारे पारस्परिक सहयोग के कई नतीजों में से हैं.

आज हमारी साझेदारी मजबूत, विश्वसनीय और टिकाऊ है और इसका विस्तार हो रहा है. हमारे बीच पहले से भी ज्यादा आपसी सहयोग हो रहा है. केवल केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर ही नहीं बल्कि हमारी सेनाओं, हमारे निजी क्षेत्र और नागरिक समाज के बीच भी. वास्तव में इतने अधिक सहयोग के चलते ही 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐलान किया था कि हम स्वाभाविक साझीदार हैं.

तब से लेकर अब तक कई वर्षों के दौरान हमारा यह आपसी सहयोग बढ़ता ही गया है. हर दिन हमारे छात्र शोध परियोजनाओं पर साथ-साथ काम करते हैं,  हमारे वैज्ञानिक अत्याधुनिक तकनीक विकसित करने के काम में लगे हैं और हमारे वरिष्ठ अधिकारी वैश्विक मुद्दों पर करीबी बातचीत करते हैं. हमारी सेनाएं जल, थल और नभ में संयुक्त अभ्यास कर रही हैं. हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रम इस सहयोग को अभूतपूर्व क्षेत्रों में ले जाते हुए हमें पृथ्वी से मंगल तक ले जा रहे हैं.

इस साझीदारी में भारतीय अमेरिकी समुदाय हमारे बीच एक जीवंत सेतु की तरह काम करता रहा है.  इसकी सफलता हमारे नागरिकों की चेतना, अमेरिका के उदार समाज और दोनों देशों के मेल की मजबूती का सबसे सजीव प्रतिबिंब रही है.

फिर भी इस संबंध की वास्तविक क्षमताओं का फलीभूत होना अभी बाकी है. भारत में एक नई सरकार का आगमन हमारे रिश्ते को व्यापक और गहरा बनाने का एक स्वाभाविक अवसर है. एक नई ऊर्जा से युक्त महत्वाकांक्षा और पहले से भी ज्यादा विश्वास के साथ हम अपने पारंपरिक लक्ष्यों के परे जा सकते हैं. यह एक नये एजेंडे का समय है जो हमारे नागरिकों को ठोस लाभ पहुंचा सके. यह एजेंडा ऐसे पारस्परिक लाभप्रद रास्ते खोजने में हमारी मदद करेगा जो व्यापार, निवेश और प्रौद्योगिकी में हमारे सहयोग का विस्तार कर सकें. ऐसे रास्तेे जो भारत के महत्वाकांक्षी विकास एजेंडे अनुरूप हों और साथ ही प्रगति के एक वैश्विक इंजन के रूप में अमेरिका को भी मजबूती दें. आज जब हम वाशिंगटन में मिलेंगे तो हम उन तरीकों पर चर्चा करेंगे जिनसे हम विनिर्माण को बढ़ावा और सस्ती अक्षय ऊर्जा को विस्तार दे सकें और इसके साथ ही अपने साझे पर्यावरण का भविष्य भी सुरक्षित कर सकें.  हम चर्चा करेंगे कि किस तरह हमारे कारोबार, वैज्ञानिक और सरकारें आपस में साझीदारी कर सकते हैं. भारत खासकर अपने निर्धनतम नागरिकों के लिए बुनियादी सुविधाओं की गुणवत्ता, विश्वसनीयता और उपलब्धता को सुधारना चाहता है. इस काम में अमेरिका सहयोग के लिए तैयार है. हमारे तत्काल और ठोस समर्थन का एक क्षेत्र स्वच्छ भारत अभियान है जिसमें हम सारे भारत में स्वच्छता और सफाई की स्थिति सुधारने के लिए नए तरीकों, विशेषज्ञता और प्रौद्योगिकी का लाभ उठाएंगे.

हमारे साझे प्रयासों से हमारे अपने लोगों को फायदा होगा. हम चाहते हैं कि हमारी साझेदारी बड़ी से बड़ी हो. एक राष्ट्र और समाज के रूप में हम सबके लिए बेहतर भविष्य की कामना करते हैं. एक ऐसा भविष्य जिसमें हमारी रणनीतिक साझेदारी बड़े पैमाने पर पूरी दुनिया के लिए फायदेमंद हो. भारत को अमेरिकी निवेश और तकनीकी साझेदारियों से उपजने वाली प्रगति से लाभ होता है तो अमेरिका भी एक मजबूत और पहले से ज्यादा खुशहाल भारत से लाभान्वित होता है. नतीजतन एक क्षेत्र और पूरी दुनिया को भी उस स्थिरता और सुरक्षा से लाभ होता है जो हमारी मित्रता से उपजती है. हम उन प्रयासों के लिए प्रतिबद्ध हैं जिससे दक्षिण एशिया को संगठित किया जा सके और इसे केंद्रीय और दक्षिण पूर्व एशिया के बाजारों और लोगों के साथ जोड़ा जा सके.

वैश्विक साझीदारों के रूप में आतंकवादी विरोधी और कानून का पालन करवाने वाले तंत्र के आपसी सहयोग के जरिये हम अपने देश की सुरक्षा बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. साथ ही हम समुद्री रास्तों में परिचालन की स्वतंत्रता और वैध कारोबार की निरंतरता के लिए भी प्रतिबद्ध हैं. स्वास्थ्य के क्षेत्र में हमारा आपसी सहयोग मुश्किल से मुश्किल चुनौतियों से निपटने में हमारी मदद करेगा, फिर भले ही वह ईबोला को फैलने से रोकना हो, कैंसर के इलाज पर शोध हो या टीबी, मलेरिया और डेंगू जैसे रोगों पर विजय पाने की कवायद. साथ ही हम चाहते हैं कि महिला सशक्तिकरण, क्षमताओं के संवर्धन और अफगानिस्तान व अफ्रीका में खाद्य सुरक्षा सुधारने के लिए सहयोग के जो नए क्षेत्र हमने बनाए हैं उनका विस्तार हो.

अंतरिक्ष का अन्वेषण आगे भी हमारी कल्पनाओं को पंख देता रहेगा और हमें अपनी महत्वाकांक्षाएं बढ़ाने के लिए ललकारता रहेगा. मंगल की परिक्रमा करते हम दोनों के उपग्रह अपनी कहानी खुद कहते हैं. एक बेहतर भविष्य का यह वादा सिर्फ भारतीयों और अमेरिकियों के लिए नहीं है. यह हमें

संकेत भी देता है कि एक बेहतर दुनिया के लिए हम साथ-साथ आगे बढ़ें. यह 21वीं सदी के लिए एक नई परिभाषा गढ़ती हमारी साझीदारी का केंद्रीय आधार है. चलें साथ-साथ.

खेल का निकला तेल

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भारत में क्रिकेट के लिए जूनून घड़ी के पेंडुलम की तरह दोनों दिशाओं में आवृत्ति करता है. टीम जीती तो वह सारे देश की आंखों की तारा हो जाती है और हारी तो खिलाड़ियों के घरों पर पत्थर पड़ने तक की खबरें आने लगती हैं. कुछ ऐसा ही टीम के कप्तान के मामले में होता है. कई कहते भी हैं कि भारत में राष्ट्रीय क्रिकेट टीम का कप्तान प्रधानमंत्री के बाद सबसे अहम व्यक्ति होता है.

लेकिन क्या यह सिर्फ भारतीयों का क्रिकेट के प्रति जूनून ही है जो इद दिनों भारतीय क्रिकेट टीम और उसके मुखिया महेंद्र सिंह धोनी को संदेह के घेरे में खड़ा कर रहा है? या फिर बात कुछ और भी है ?

सचिन तेंदुलकर के बाद धोनी भारत के सबसे लोकप्रिय क्रिकेटर हैं. बतौर कप्तान धोनी 2007 में ट्वेंटी ट्वेंटी वर्ल्ड कप जीते. 2008 में उन्होंने टेस्ट टीम की कमान संभाली और एक साल के भीतर ही भारतीय टेस्ट टीम खेल के इस संस्करण की रैंकिंग में पहले स्थान पर पहुंच गई. धोनी से पहले कोई भी भारतीय कप्तान ऐसी उपलब्धि हासिल नहीं कर पाया था. फिर मार्च 2011 में वह दिन या कहें कि रात भी आई जब धोनी की कप्तानी में भारत वन डे क्रिकेट का चैंपियन बना.  2013 में भारत चैंपियंस ट्रॉफी भी जीता. क्रिकेट के अलग अलग प्रारूपों में ऐसी उपलब्धियां हासिल करने वाले धोनी एक मात्र कप्तान हैं.

लेकिन आज भारतीय टेस्ट टीम रैंकिंग में पांचवें स्थान पर है. जो क्रिकेट प्रशंसक धोनी -धोनी जपा करते थे आज वे ही धोनी के टेस्ट टीम की कप्तानी क्या बल्कि उनके टेस्ट टीम में होने तक पर सवाल उठा रहे हैं. हाल में ही खत्म हुए इंग्लैंड दौरे में भारतीय टीम लॉर्ड्स में 28 साल बाद टेस्ट मैच जीतने में कामयाब रही. लेकिन उसके बाद वह लगातार तीन टेस्ट मैच हार गई. हार क्या गई बल्कि कहिए तो ध्वस्त हो गई. ओवल में हुए सीरीज के अंतिम टेस्ट में तो टीम पारी और 244 रनों अंतर से हारी. 1974 से ओवल के इस टेस्ट के बीच की अवधि में भारतीय टेस्ट टीम को ऐसी बुरी पराजय कभी नहीं झेलनी पड़ी थी.

सीरीज के बाकी दो टेस्ट मैचों पर नजर डालें तो टीम और कप्तान की कमजोरियों का एक पिटारा सा खुलता है. साउथेम्प्टन में 266 रनों की हार और मैनचेस्टर में एक पारी और 54 रनों की हार. इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है लार्ड्स टेस्ट को छोड़ भारतीय टीम बाकी के टेस्ट मैचों के दौरान इंग्लैंड की टीम से किसी भी स्तर पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाई. साउथेम्प्टन के टेस्ट मैच में जो 13 सत्र थे उनमें हर एक में भारतीय टीम 19 ही ठहरी. वहीं मैनचेस्टर और ओवल टेस्ट मैचों में सीम और स्विंग करती गेंदों के सामने भारतीय बल्लेबाजों की कलई खुल गई और टीम का पुलिंदा 150 से 170 रनों  के बीच बंध गया. इसके बाद भी जब दौरे के आखिर में पूर्व इंग्लिश कप्तान नासिर हुसैन ने धोनी से पूछा कि आप दौरे को कैसे देखते हैं तो धोनी का जवाब था, ‘दौरा अच्छा था’. एक दशक में लगातार दूसरी बार इंग्लैंड में टेस्ट सीरीज बुरी तरह से हारने के बाद कप्तान का ऐसा जवाब सुनकर कइयों को हैरानी हुई.

बहुत से जानकार यह भी मानने लगे हैं कि भारतीय खिलाड़ियों की तकनीक भी अब टेस्ट के लिए उतनी माकूल नहीं रह गई है

इससे कई अहम सवाल खड़े होते हैं. मसलन क्या भारतीय क्रिकेटरों की मौजूदा पीढ़ी के लिए टेस्ट क्रिकेट की कोई खास अहमियत नहीं है. अगर नहीं है तो क्यों? सवाल और भी हैं. जैसे कि आखिर क्या वजह है जो  भारतीय टीम की क्रिकेट के इस लंबे संस्करण में इतनी दुर्गति हो रही है. यह भी कि खेल के आम प्रशंसकों के दिल में अब टेस्ट क्रिकेट की क्या जगह है?

दरअसल देखा जाए तो खेल का शास्त्रीय प्रारूप कहे जाने वाले टेस्ट क्रिकेट में भारत की दुर्गति कुछ तो खिलाड़ियों और खेल प्रशासकों के रवैय्ये का नतीजा है और कुछ इस संस्करण के वक्त से तालमेल न बिठा पाने का. ज्यादातर लोग मानते हैं कि इसका नुकसान आखिरकार खेल को ही होना है.

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पहले सवाल से शुरू करते हैं. टेस्ट क्रिकेट के लिहाज से देखें तो भारतीय टीम लगातार नीचे लुढ़कती जा रही है. इंग्लैंड दौरे ने इस कथन पर मुहर भी लगा दी है. लेकिन दौरे के तुरंत बाद भारतीय टेस्ट टीम के अधिकांश खिलाडी चैंपियंस लीग (ट्वेंटी ट्वेंटी सीरीज) में जीतोड़ ताकत लगा रहे हैं. उधर, मैनचेस्टर टेस्ट मैच तीन दिन में ही हारने के बाद धोनी बोल रहे थे कि तीन दिन में हार का एक पहलू यह भी है कि अगला टेस्ट मैच शुरू होने पहले टीम को दो दिन का अतिरिक्त आराम मिल जाएगा. उनकी यह बात साफ संकेत देती है कि बतौर क्रिकेटर और टीम वे टेस्ट क्रिकेट से कितनी जल्दी छुट्टी लेना चाहते हैं. 2011 में लगातार दो विदेशी दौरों पर करारी हार के बाद कप्तान धोनी ने यहां तक कह दिया था कि 2013 के आखिर तक वे यह फैसला ले लेंगे कि उन्हें टेस्ट क्रिकेट आगे खेलना चाहिए या नहीं.

आखिर क्यों मौजूदा भारतीय खिलाड़ी इस खेल के लंबे प्रारूप को लेकर उत्साहित नहीं दिखते जबकि कहा जाता है कि टेस्ट क्रिकेट शास्त्रीय संगीत की तरह है जो सही मायने में खिलाड़ी की गहराई को परखता है. उसके खेल को संपूर्णता देता है. वर्तमान में क्रिकेट खेल रहे खिलाड़ियों ने 90 का वह दशक देखा है जब एकदिवसीय क्रिकेट की लोकप्रियता अपने चरम पर थी. यही वजह है कि उनके मन और खेल पर खेल के इस छोटे प्रारूप की बनिस्बत बड़ी छाप पड़ी. बाद में ट्वेंटी ट्वेंटी मैचों ने क्रिकेट के छोटे प्रारूप को नए आयाम दे डाले. इनका संबंध सिर्फ खेल से ही नहीं, उसमें छिपी कारोबार और नतीजतन आर्थिक मुनाफे से भी था. पांच दिन तक चलने वाले टेस्ट मैच से कहीं गुना ज्यादा मैच फीस खिलाड़ियों को तीन घंटे के एक आईपीएल मैच में मिलने लगी. टेस्ट मैच धैर्य और तकनीक की परीक्षा लेता है तो आईपीएल जैसे आयोजनों में धैर्य की दीवारों को तोड़ने की मांग रहती है. महेंद्र सिंह धोनी, रविंदर जडेजा, विराट कोहली, शिखर धवन, अश्विन आज एक दिवसीय क्रिकेट के माने जाने सितारे हैं, लेकिन बहुत से लोग हैं जो इन्हें तेंदुलकर, द्रविड़, कुंबले और गांगुली की कतार में रखने से हिचकते हैं. कहते हैं कि जो क्रिकेट खिलाड़ी टेस्ट क्रिकेट में सफल हो सकता है वह क्रिकेट की किसी भी विधा में सफल हो सकता है. तेंदुलकर, गांगुली और द्रविड़ की इस खूबी ने ही उन्हें क्रिकेट की हर विधा में सफल बनाया. मुरली विजय, चेतेश्वर पुजारा, शिखर धवन, विराट कोहली और अजिंक्य रहाणे ऐसे नाम हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे टेस्ट क्रिकेट में भारतीय टीम के नए स्तंभ हैं. कोहली को जब से टेस्ट टीम में सचिन तेंदुलकर द्वारा छोड़ी गई जगह यानी नंबर चार पर बल्लेबाजी करने का मौका मिला है तब से मीडिया पंडित एक अति आशावाद से साथ उनमें नए तेंदुलकर को ढूंढ़ने का अथक प्रयास कर रहे हैं. लेकिन तेंदुलकर जैसे खिलाड़ी ग्लैमर की चकाचौंध नहीं बल्कि विशुद्ध खेल के प्रति सम्मान का परिणाम होते हैं.

कुछेक अपवाद जरूर होंगे, लेकिन मौजूदा भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ियों के मन में टेस्ट क्रिकेट के लिए कितना सम्मान है यह तो टीम के मुखिया धोनी का रवैय्या काफी कुछ बतला देता है. बहुत से जानकार यह भी मानने लगे हैं कि इन खिलाड़ियों की तकनीक भी अब टेस्ट के लिए उतनी माकूल नहीं रह गई है. बल्लेबाजी को ही लें. ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट के इस दौर में छक्के-चौकों की अहमियत इतनी बढ़ गई है कि लगभग सारे बल्लेबाज अपने बल्ले को मजबूती से पकड़ते हैं ताकि शॉटों में जान आ सके. टेस्ट क्रिकेट, खासकर इंग्लेंड, दक्षिण अफ्रीका और आस्ट्रेलिया में खेली जाने वाले टेस्ट क्रिकेट में सफलता के लिए जरूरी है कि बल्लेबाज बैट पर मजबूत पकड़ यानी हार्ड ग्रिप न बनाएं बल्कि गेंद की दिशा (Length) और उछाल (Bounce) को देखते हुए ग्रिप का इस्तेमाल करें. इंग्लैंड की परिस्थितियों में यही तकनीकी दिक्कत भारतीय बल्लेबाजो के पतन का कारण बनती रही है. दरअसल वहां की परिस्थितयों में गेंद सीम और स्विंग करती है. ऐसे में बल्लेबाज के लिए जरूरी होता है कि वह गेंद को जितना हो सके देर से खेले. मतलब गेंद को पूरी तरह से भांपने की कोशिश करे और फिर उसे सॉफ्ट हैंड्स के साथ खेले. लेकिन हुआ इसका उल्टा. भारतीय बल्लेबाज अपने अति उत्साह के चलते गेंद को जल्दी खेलने की कोशिश करते रहे. नतीजा टेस्ट सीरीज के आखिरी तीन मैचों में पूरी टीम का 150 -160 रनों के बीच पुलिंदा बंधने के रूप में सामने आया. यदि तकनीक की खामियां ढूंढने लगें तो बहुत कुछ मिल सकता है, लेकिन इन तकनीकी कमियों की जड़ बल्लेबाजों की उस ही प्राथमिकता में नजर आती है जिसका जिक्र लेख में पहले आ चुका है. यानी ट्वेंटी ट्वेंटी क्रिकेट.

एक आम व्यक्ति जो क्रिकेट मनोरंजन के लिए देखता है वह टी-20 के जरिए ग्लोबलाइज्ड हो रहे क्रिकेट का आदी हो चुका है. उसे टेस्ट क्रिकेट नहीं भाता

जहां तक स्पिनरों की बात है तो तो उनके लिए भी प्राथमिकता वही है जिसका जिक्र बल्लेबाजों के संदर्भ में आ चुका है.  ट्वेंटी ट्वेंटी क्रिकेट के बाद से स्पिनरों की वह खेप खत्म होती दिख रही है जो गेंद को फ्लाइट कराना चाहती है या बल्लेबाज को फ्रंट फुट पर लाना चाहती है. आजकल स्पिनर ट्वेंटी ट्वेंटी क्रिकेट में छक्के-चौकों के डर से इतना भयभीत हैं कि गेंद को फ्लाइट कराने से डर रहे हैं. आर अश्विन, रविंदर जडेजा से लेकर हरभजन सिंह जैसे गेंदबाज तक लगभग हर गेंद पर कंधे का इस्तेमाल करते हैं. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इंग्लैंड दौरे पर भारतीय टीम में एक लेग स्पिनर जरूर होना चाहिए था. इंग्लिश बल्लेबाज लेग स्पिन के सामने कुशलता से नहीं खेल पाते. इसकी पुष्टि समकालीन इतिहास के महानतम लेग स्पिनर शेन वार्न के इंग्लैंड के खिलाफ रिकार्ड पर नजर डालने से भी होती है. वार्न हर एशेज श्रृंखला में इंग्लिश बल्लेबाजों को अपनी लेग स्पिन की धुन से परेशान कर दिया करते थे. भारतीय क्रिकेट में अमित मिश्रा और पीयूष चावला को छोड़ ऐसा कोई भी लेग स्पिनर नहीं है जिसे इस दौरे पर ले जाया जा सकता था. फिर यह भी है कि लेग स्पिनरों पर कप्तान धोनी का विश्वास हमेशा संदेह की नजर से देखा गया है. भारतीय टीम शुरूआती तीन टेस्ट मैचों में सपाट विकेट पर ट्वेंटी ट्वेंटी खेलने वाले रविंदर जडेजा के साथ उतरी. जडेजा अपनी गेंदबाजी से कम और इंग्लिश तेज गेंदबाज जेम्स एंडरसन के साथ विवाद के लिए सुर्खियां बटोरते रहे. यह विवाद न जडेजा की गेंदबाजी में कुशलता का सृजन कर पाया न भारतीय टीम के प्रदर्शन में. साफ है कि भ्रमवश या फिर मजबूरी के मारे भारतीय टीम उन खिलाड़ियों के साथ खेल रही है जो टेस्ट क्रिकेट के माकूल नहीं दिखते.

बदलाव एक जमाना था जब टेस्ट मैचों के दौरान स्टेडियम खचाखच भरे रहते थे, लेकिन अब दर्शक नाममात्र के होते हैं
बदलाव एक जमाना था जब टेस्ट मैचों के दौरान स्टेडियम खचाखच भरे रहते थे, लेकिन अब दर्शक नाममात्र के होते हैं

लेकिन क्या बात सिर्फ क्रिकेट खिलाड़ियों की कुशलता और अकुशलता तक जाकर खत्म हो जाती है? भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) और प्रसंशकों का इसमें कोई योगदान नहीं? कहते हैं कि किसी भी समाज की पहचान उसकी राजनीति में परिलक्षित होती है. उसी तरह भारत के क्रिकेट प्रशंसक की रुचि भारतीय क्रिकेट में परिलक्षित होती है. सवाल यह है कि क्या आज भारतीय क्रिकेट टीम का कोई आम प्रशंसक टेस्ट क्रिकेट को गंभीरता से लेता है. यदि हां तो फिर यह ‘हां’ टेस्ट क्रिकेट में भारतीय टीम को सफलता के लिए प्रेरित क्यों नहीं कर पा रहा?

शायद इसका जवाब उस विशाल बाजार के पास है जो क्रिकेट को क्रिकेट से ज्यादा जैकपॉट समझ रहा है और इसे जैकपॉट जैसा दिखाने में बीसीसीआई की अहम भूमिका है.एक तर्क यह दिया जाता है कि बोर्ड को सर्वाधिक राजस्व आईपीएल जैसे निजी उपक्रम से प्राप्त होता है. अगर देश में लोक सभा चुनाव हो रहे हों तो आईपीएल को मध्य पूर्व एशिया के क्रिकेट मैदानों जैसे शारजाह और आबू धाबी में कराने पर कोई आपत्ति नहीं होती. ज्ञात हो कि आईपीएल से पहले मध्य पूर्व एशिया में तकरीबन 13 सालों से भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान के साथ एक दिवसीय मैचों की एक सीरीज को छोड़ अन्य कोई भी मैच नहीं खेली है क्योंकि इन देशों को सट्टेबाजो का गढ़ बताया जाता रहा. लेकिन आज वैश्वीकरण और स्पोर्ट्स प्रोफेशनलिज्म के नाम पर शारजाह और आबू धाबी जेसे स्थानों पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होती. इन जुमलों के पीछे जाकर कोई यह बात नहीं करना चाहता कि क्यों हर साल आईपीएल में भ्रष्टाचार का कोई न कोई मामला सुर्खियां बनता है या फिर क्यों देश की सर्वोच्च अदालत बोर्ड अध्यक्ष को आईपीएल की गतिविधियों से दूर रखने के लिए उन्हें अध्यक्ष पद से हटा देती है.

दुनिया के अधिकांश खेल आज बाजार की दिशाओं के अनुसार वक्त बेवक्त नियंत्रित और अनियंत्रित होते रहते हैं ऐसे में हर खेल को देखने वाली सर्वोच्च संस्था की यह जिम्मेदारी होती है कि वह किस हद तक खेल को खेल बने रहने दे और किस हद तक इसमें बाजार का योगदान हो. भारतीय क्रिकेट बोर्ड के संदर्भ में उक्त कथन संतुलन की अवस्था में नहीं दिखता. जब 90 के दशक में कोलकाता के ईडेन गार्डन्स में टेस्ट मैच होते थे तो एक लाख की क्षमता वाला यह मैदान खचाखच भरा होता था. लेकिन अब यही मैदान अपनी क्षमता के महज दस फीसदी दर्शकों का गवाह बन रहा है. भारत के अन्य टेस्ट मैदानों का भी यही हाल है. बताते हैं 80 और 90 के दशक में भारत के अधिकांश मैदानों में साधारण दर्जे के टायलेट भी नहीं थे लेकिन मैदान खचाखच भरे रहते थे. आज पूंजी की बयार में टॉयलेट तो विश्व स्तरीय हैं लेकिन टेस्ट मैचों के दौरान उनका प्रयोग करने के लिए लोग ही नहीं आते. दर्शकों की यह कम भीड़ भी टेस्ट स्तरीय खिलाड़ियों को हतोत्साहित करती है. कई यह भी मानते हैं कि पिछले दो दशक में आए सामाजिक बदलावों के चलते आज क्रिकेट प्रशंसकों के एक बड़े वर्ग के पास टेस्ट क्रिकेट के लिए समय ही नहीं है. उसे आईपीएल जैसे आयोजन ज्यादा आकर्षित करते हैं जिनका समय तब होता है जब ऑफिस का समय नहीं होता और जो फटाफट निबट जाते हैं. एक आम व्यक्ति जो क्रिकेट मनोरंजन के लिए देखता है वह टी-20 के जरिए ग्लोबलाइज्ड हो रहे क्रिकेट का आदी हो चुका है जिसे लाइव ड्रामा और एक्शन के साथ रिजल्ट चाहिए. उसे पांच दिन तक चलने वाला टेस्ट मैच देखना भारी लगता है.

साफ है कि यह टेस्ट क्रिकेट के लिए संकट काल है. कुछ हद तक अंतरष्ट्रीय क्रिकेट परिषद  (आईसीसी) भी इसके लिए जिम्मेवार है. क्रिकेट की सर्वोच्च संस्था होने के बाद भी यह बीसीसीआई की महत्वकांक्षाओं पर लगाम नहीं लगा सकी. हालांकि दूसरी तरफ से देखा जाए तो क्रिकेट की इस सर्वोच्च संस्था की लगाम आज पूरी तरह से बीसीसीआई के हाथ में ही है. आज आईसीसी के मामलों में उसके पास सबसे ज्यादा वीटो पावर है. इस वीटो पावर के पीछे सबसे बड़ा कारण भारत से आने वाली स्पांसरशिप और राजस्व है. बीसीआई नहीं तो आईसीसी का क्या होगा, यह सवाल बीसीसीआई अधिकारियों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से आईसीसी के सामने खड़ा किया जाता रहा है. जिन एन श्रीनिवासन पर बतौर बोर्ड के अध्यक्ष और चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक के रूप में हितों के टकराव का आरोप लगा आज वे ही आईसीसी के चेयरमैन हैं और भारत की सर्वोच्च अदालत आईसीसी के मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती. फलस्वरूप, ग्लैमर, चकाचौंध, चीयर गर्ल्स और दर्शकों का रुझान सब कुछ बीसीसीआई के हिसाब से चल रहा है. यह आर्थिक शक्ति भारत के उस मध्यवर्ग को बहुत लुभाती है जो भारत को विश्व पटल पर एक महाशक्ति के रूप में देखना चाहता है. यह भी एक वजह है कि टेस्ट क्रिकेट पुराने जमाने की किसी बात की तरह देखा जा रहा है तो ट्वेंटी ट्वेंटी  क्रिकेट के भविष्य के रूप में.

जिन श्रीनिवासन पर बोर्ड के अध्यक्ष और चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक के रूप में हितों के टकराव का आरोप लगा आज वे ही आईसीसी के चेयरमैन हैं

ऐसे में सवाल उठता है कि फिर सारा दोष खिलाड़ियों पर डालना कितना वाजिब है. जानकारों का एक वर्ग है जो मानता है कि कुछ तो खेल खिलाड़ी को बदलता है और कुछ खिलाड़ी भी खेल को बदलते हैं. इस लिहाज से टेस्ट क्रिकेट में भारतीय टीम की दुर्गति में उसके खिलाड़ियों का अहम योगदान तो है ही. कप्तान धोनी को ही लीजिए. पूर्व ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर और दिग्गज इयान चैपल तो अभी से कह चुके हैं कि यदि धोनी टेस्ट मैचों में ऐसे ही कप्तानी करते रहे तो भारतीय टीम को साल के अंत में आस्ट्रेलिया में फिर से 4-0 से शिकस्त झेलनी पड़ेगी. गौर से देखा जाए तो पता चलता है कि भले ही बतौर कप्तान धोनी की रणनीतियां क्रिकेट के छोटे प्रारूप में उन्हें बहुत सी सफलताएं दिला चुकी हैं, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में उनकी यही रणनीतियां टीम को हार की और लेकर जाती हैं. कहते हैं कि टेस्ट क्रिकेट में आक्रामकता ही सुरक्षा का सबसे बेहतरीन तरीका है. लेकिन धोनी किसी छोटी सी साझेदारी के बनने से पहले ही ऐसी फील्डिंग लगा लेते हैं मानो किसी एक दिवसीय मैच के अंतिम ओवरों के लिए फील्डिंग सजा रहे हों. टेस्ट मैच के पहले दिन ही 20 वें ओवर तक लॉन्ग आन या फिर डीप मिड विकेट पर फील्डिंग लगाना गेंदबाज के उत्साह को तो कमजोर करता ही है, विपक्षी बल्लेबाज को रन बनाने का मौका भी देता है. यही वजह है कि आज क्रिकेट जगत में धोनी को एक सुरक्षात्मक कप्तान के रूप में जाना जाने लगा है.

साथ ही धोनी की बल्लेबाजी तकनीक टेस्ट क्रिकेट के लिए कितनी माकूल है, इस पर भी कई सवाल उठ रहे हैं. अगर बतौर बल्लेबाज उनके रिकार्डों पर नजर डालें तो महसूस होता है कि भारत में विकेटकीपर बल्लबाजों की एक ऐसी खेप जरूर रही है जो शायद टेस्ट में धोनी से बेहतर बल्लेबाजी कर सकते थे. कई साल तक तमिलनाडु के दिनेश कार्तिक घरेलू क्रिकेट में रनों का अंबार लगाते रहे . लेकिन एक दिवसीय क्रिकेट में धोनी की सफलता भारत के चयनकर्ताओं से लेकर जनमानस क को इस कदर प्रभावित करती रही की किसी ने धोनी से आगे देखने की कोशिश ही नहीं की.

धोनी आईपीएल में खेलने वाली एक टीम चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान हैं. इस टीम का स्वामित्व इंडिया सीमेंट्स नाम की एक कंपनी के पास है जिसके मुखिया वर्तमान आईसीसी चेयरमैन एन श्रीनिवासन हैं. धोनी इंडिया सीमेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट भी हैं. हितों के इस टकराव पर चर्चा होती रहती है और दबी जबान में यह भी कहा जाता रहता है कि भारतीय टीम में उन खिलाड़ियों को तरजीह मिलती है जिनका संबंध चेन्नई सुपरकिंग्स से हो. इंग्लेंड दौरे पर कमेंट्री करते वक्त शेन वॉर्न ने रविंदर जडेजा को टेस्ट स्तर का गेंदबाज मानने से असहमति जता दी थी. ज्ञात हो कि जडेजा चेन्नई सुपर किंग्स के लिए खेलते हैं. कई आरोप लगाते हैं कि आर अश्विन, मुरली विजय, मोहित शर्मा आदि को  भारतीय टीम में जगह मिलती है तो इसकी वजह यह भी है कि वे चेन्नई सुपर किंग्स के खिलाड़ी हैं. उधर, प्रज्ञान ओझा, अमित मिश्रा और उमेश यादव जैसे कई और नाम कुछ मैचों में मेहमान के तौर पर बुलाए जाते हैं और फिर बिना कोई मैच खेले अगले दौरे से बाहर कर दिए जाते हैं.

धोनी की मैदान के अंदर और बाहर की नीतियां भारतीय क्रिकेट आगे कहां लेकर जाती हैं इसका जवाब अगले साल आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में होने वाले विश्व कप तक मिल जायेगा. तब तक चयनकर्ता धोनी को ही कप्तान बनाए रखेंगे इसमें कोई संदेह नहीं दिखता. धोनी साल के अंत में आस्ट्रेलिया में तीन टेस्ट मैचों की सीरीज हारते हैं तो वे ऐसे कप्तान बन जाएंगे जिसका रिकॉर्ड घर से बाहर कप्तानी करने के मामले में सबसे खराब रहा है.

धोनी के समर्थक कहते हैं कि अगर धोनी नहीं तो कप्तानी का विकल्प कौन है. धोनी के विकल्प के रूप में देखे जा रहे विराट कोहली का प्रदर्शन इंग्लैंड में बहुत खराब रहा इसलिए टेस्ट कप्तानी के लिहाज से उनकी संभावनाएं भी कमजोर हुई हैं. लेकिन टेस्ट क्रिकेट में जिस प्रकार से भारत हार झेल रहा है उसे देखकर लगता है कि कप्तान कोई भी हो क्या कोई टीम इस से बुरा प्रदर्शन कर सकती है.

नयी सहस्त्राब्दी में भारतीय क्रिकेट टीम ने सौरव गांगुली की कप्तानी में जो सबसे बड़ी छवि बनाई थी वह यही थी कि अब भारतीय टीम उपमहाद्वीप के बाहर भी प्रतिस्पर्धा करती है. लेकिन धोनी की कप्तानी में यह छवि आसमान पर पहुंचने के बाद अब गर्त तक पहुंच गई है. लेकिन इसके बाद भी बीसीसीआई की ओर से वैसे कदम नहीं उठाए गए जो उठाए जाने चाहिए थे.

हार, हार होती है और बिना प्रतिस्पर्धा के हो जाए तो ज्यादा दुखदायी होती है. भले ही भारत एक दिवसीय क्रिकेट में चैम्पियन हो, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में उसकी प्रत्येक हार खेल के हर प्रारूप में किसी न किसी तरह से उसके लिए नुकसानदेह ही होगी. गायक भले ही गीत गाए या गजल, रियाज की उपेक्षा आखिरकार उसका नुकसान ही करती है. इसलिए टेस्ट क्रिकेट के लिहाज से देखें तो बीसीसीआई और खिलाड़ियों की सोच और प्राथमिकताओं में बदलाव होना जरूरी है क्योंकि सवाल खेल का है और कोई भी खिलाडी खेल से बड़ा नहीं होता.

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दिल बदलते दल

sonia
फाइल फोटो

परिवर्तन सनातन सिद्धांत है. जितना सच यह भौतिक जगत के लिए है उतना ही खरा यह वैचारिक और सैद्धांतिक धरातल पर भी है. बदलाव की प्रक्रिया दो रूपों में सामने आती है. ज्यादातर मामलों में होता यह है कि परिस्थितियां ऐसी उत्पन्न हो जाती हैं जिनमें लोग बदलाव करने के लिए विवश हो जाते है. जिस तरह के हालात बनते हैं लोग खुद को उसके हिसाब से ढालते रहते हैं. चार्ल्स डार्विन ने इसे सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट यानी योग्यतम की उत्तरजीविता कहा था. कई बार ऐसा भी होता है कि कुछ विलक्षण लोग ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर देते हैं जिनमें लोगों को अपने भीतर बदलाव करने पड़ते हैं. भारतीय राजनीति ऐसे दुर्लभ पड़ावों की साक्षी रही है. 1947 में भारत ने पश्चिम द्वारा ईजाद की गई लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनी राजव्यवस्था का हिस्सा बनाया. ये वे लोग थे जिनका उससे पहले लोकतंत्र से दूर दूर तक कोई लेना-देना नहीं था. उस दौर के दूरदर्शी नेतृत्व ने एक और बड़ा काम किया. संविधान के रूप में एक ऐसा दस्तावेज तैयार किया जिसकी मूल आत्मा धर्मनिरपेक्षता थी. आजाद भारत के शुरुआती दिनों में ये कुछ ऐसे कदम थे जिनके सफल-असफल होने की संभावना एक समान थी. पिछले 67 सालों से यह विचार पूरी सफलता के साथ काम करता रहा. देश की राजव्यवस्था धर्म और पंथ के मसलों से खुद को दूर रखते हुए अपना काम बखूबी करती रही है.

अब भारतीय राजनीति में एक नए दौर की आहट है. एक नया नेतृत्व आया है जिसने पिछले 60-65 सालों की स्थापित मान्यताओं को पुनर्परिभाषित करना शुरू किया है. एक आम सोच देखने को मिल रही है कि भारतीय जनता पार्टी को हालिया लोकसभा चुनावों में मिली भारी सफलता के पीछे की तमाम वजहों में से एक वजह गैर भाजपाई दलों की अत्यंत मुसलिम परस्त छवि भी थी. इसकी वजह से बहुसंख्यक हिंदू समाज का बड़े पैमाने पर भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण हुआ. नतीजों के बाद जो हालात पैदा हुए हैं उनमें गैर भाजपा दल तेजी से खुद में ऐसे बदलाव करते दिख रहे हैं जिनके बारे छह महीने पहले तक सोचना भी मुश्किल था. उदाहरण के लिए कांग्रेस ने अपनी राज्य इकाइयों को निर्देश जारी किया है कि वे आगे से सभी हिंदू त्यौहार मनाएं, समाजवादी पार्टी ने भी अपने मुसलिम हितैषी रुख में नरमी दिखाई है. आजम खान जैसे नेता फिलहाल हाशिए पर डाल दिए गए हैं. सुदूर दक्षिण की सनातन धर्म विरोधी पार्टी डीएमके ने भी पहली बार विनायक चतुर्थी की शुभकामना दी है. साफ है कि चुनावी नतीजों के बाद राजनीतिक फलक पर बदलाव की एक नई इबारत लिखी जा रही है. वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय के शब्दों में, ‘यह भारतीय राजनीति में एक नए चरण की शुरुआत है. पुराने स्थापित मापदंड पिघल रहे हैं. नए मापदंड स्थापित हो रहे हैं. भारत की राजनीति करवट ले रही है.’

लोकसभा चुनाव के नतीजों ने कुछ दिलचस्प तथ्य सामने रखे हैं. 282 सीटें जीतने वाली भाजपा के पास एक भी मुसलिम सांसद लोकसभा में नहीं है. इससे पैदा हुई स्थितियों में बाकी राजनीतिक दल तेजी से अपनी वैचारिक और राजनैतिक जमीन टटोल रहे हैं, उसे ‘रीएडजस्ट’ कर रहे हैं. इसके जो संदेश हैं वे एक ही बात का इशारा करते हैं कि अब देश की राजनीति 16 मई 2014 के पूर्व की स्थापित मान्यताओं के मुताबिक नहीं चलेगी. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक परंजय गुहा ठाकुर्ता कहते हैं, ‘यह सच है कि भारत एक धर्म प्रधान देश है, लेकिन यह राजनीति में धर्म का नया रूप है. मंदिर आंदोलन के समय भी दूसरे राजनीतिक दल इस तरह से नहीं बदले थे. यह एक खतरनाक ट्रेंड है. धर्म और मेजोरिटेरियन आइडियोलॉजी  यानी बहुसंख्यकवादी विचारधारा का आपस में मिलना बहुत गंभीर बात है. देश की ज्यादातर अशिक्षित और गरीब जनता को समय रहते इस खतरे को समझना होगा.’

‘बाकी पार्टियों को चिंता सताने लगी है कि उन्होंने धर्मनिरपेक्षता पर ज्यादा जोर दिया तो उन्हें चुनावी नुकसान होगा. इसलिए वे अपने पुराने स्टैंड से पीछे हट रही हैं’

सबसे पहले बात देश की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की. पिछले 14 अगस्त को पार्टी की दिल्ली इकाई ने एक घोषणा की. इसके मुताबिक 17 अगस्त को पार्टी के दिल्ली स्थित प्रदेश कार्यालय में कृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाना था. साथ में भजन संध्या का भी आयोजन किया गया था. दिल्ली इकाई के नेताओं ने इस कार्यक्रम में पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी को भी आमंत्रित किया था. बहरहाल राहुल गांधी इस कार्यक्रम से दूर रहे लेकिन कार्यक्रम निर्धारित योजना के हिसाब से संपन्न हुआ. पूरे देश में महज 44 सीटों पर सिमट गई कांग्रेस के इस कदम को भाजपा के उस आरोप का जवाब माना जा रहा है जिसके मुताबिक कांग्रेस मुसलिम परस्त राजनीति करती है. इन आरोपों को चुनाव से पहले हुई उस घटना से भी बल मिला जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के घर पर जामा मस्जिद के शाही इमाम सैय्यद अहमद बुखारी मिलने पहुंचे और बाद में उन्होंने मुसलमानों से कांग्रेस के पक्ष में वोट डालने की अपील की. ताजा हालात के मद्देनजर पार्टी ने जो कदम उठाए हैं उसके बारे में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘कांग्रेस पार्टी गैर मुसलिमों को साफ-साफ संदेश देना चाहती है कि वह सबकी आस्था का सम्मान करती है. दिल्ली के बाद पार्टी दूसरे राज्यों और दूसरे त्यौहारों में भी इस प्रयोग को दोहराएगी.’

धर्म का आसरा सपा नेता पवन पांडे एक धार्मिक कार्यक्रम में शिलान्यास करते हुए
धर्म का आसरा सपा नेता पवन पांडे एक धार्मिक कार्यक्रम में शिलान्यास करते हुए

कांग्रेस की दिक्कत यह है कि उसका अपना इतिहास भी भगवा खेमे के आरोपों को बल देता है. पार्टी के राष्ट्रीय मुख्यालय 24 अकबर रोड में जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के जन्म और मृत्यु से संबंधित आयोजनों के अलावा जो एकमात्र आयोजन बड़े पैमाने पर किया जाता है वह है रमजान के दौरान होने वाली ‘इफ्तार पार्टी’. पार्टी के नेता कहते हैं, ‘अब हमें खुद में बदलाव की जरूरत है. इसलिए हमने अब दूसरे त्यौहारों को भी मनाने का फैसला किया है.’ पार्टी के रुख को भांपते ही कांग्रेस की राज्य इकाइयां अपने-अपने स्तर पर हरकत में आ गई हैं. 29 अगस्त को मध्य प्रदेश के भोपाल स्थित कांग्रेस दफ्तर में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव ने एक भव्य गणेश प्रतिमा स्थापित करवाई और गणेश चतुर्थी पर पूजा-पाठ किया. ऐसा पहली बार हुआ. देखादेखी पूरे प्रदेश के कांग्रेस कार्यालयों में गणेश प्रतिमा स्थापित करने की होड़ लग गई. परंजय कहते हैं, ‘अस्सी और नब्बे के दशक में तेजी से भाजपा का कांग्रेसीकरण हुआ था. उतना ही बड़ा सच यह भी है कि हाल के सालों में कांग्रेस का उससे ज्यादा तेजी से भाजपाईकरण हुआ है. जब भाजपा और संघ ने हिंदुत्व को विकास से जोड़ने का काम किया तो दबे-छुपे कांग्रेस ने भी वही काम करना शुरू कर दिया.’

पार्टी के रुख में आए इस बदलाव की एक वजह लोकसभा चुनाव में हुई हार की समीक्षा करने के लिए बनी एके एंटनी कमेटी की रिपोर्ट भी मानी जा रही है. अपनी रिपोर्ट में पूर्व रक्षा मंत्री ने कहा है कि पार्टी के ऊपर जो मुसलिम परस्त होने का ठप्पा लगा हुआ है वह पार्टी को भारी पड़ा है. इस नई परंपरा की बाबत मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष अरुण यादव का कहना था कि उन्हें नहीं पता कि अब तक ऐसा क्यों नहीं किया गया और न ही वे इस पर कोई टिप्पणी करना चाहते हैं.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति विभाग के प्रोफेसर और वरिष्ठ चिंतक प्रो. तुलसीराम बताते हैं, ‘धर्म निरपेक्ष पार्टियां संघ और भाजपा के व्यूह में फंस गई हैं. भाजपा राष्ट्रवाद के रूप में असल में सांप्रदायिकता को बढ़ा रही है. बाकी राजनीतिक पार्टियों को यह चिंता सताने लगी है कि यदि उन्होंने धर्म निरपेक्षता पर ज्यादा जोर दिया तो उन्हें चुनावी नुकसान होगा. इसलिए वे अपने पुराने स्टैंड से पीछे हट रही हैं. लेकिन तय मान लीजिए कि ऐसा करके बाकी राजनीतिक पार्टियां आने वाले समय में और भी कमजोर होंगी. सांप्रदायिकता और राष्ट्रवाद जैसे विषयों में संघ को महारत है. कोई भी उन्हें उनकी पिच पर जाकर मात नहीं दे सकता. यह बड़े खतरे का समय है और बाकी राजनीतिक दलों को इस समय धर्मनिरपेक्षता पर डटे रहने की जरूरत है.’

जो प्रयोग कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर कर रही है वही रसायन क्षेत्रीय दल राज्यों के स्तर पर तैयार कर रहे हैं. चुनाव के नतीजे उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी के लिए भी बेहद निराशाजनक रहे हैं. इन नतीजों की पृष्ठभूमि में पार्टी ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं जिससे यह लगता है कि पार्टी अपने पुराने रुख में कुछ बदलाव कर रही है. पार्टी के सबसे अहम मुसलिम नेता आजम खान को हाशिए पर डाल दिया गया है. ये वही आजम खान हैं जिन्हें पार्टी अब तक अपने सबसे मुखर मुसलिम चेहरे के तौर पर पेश करती आई है. लोकसभा चुनावों के दौरान आजम खान ने भी माहौल को हिंदू बनाम मुसलिम बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी. पर नतीजे आने के बाद पार्टी ने आजम खान से लगभग किनारा कर लिया है. पार्टी मुखिया मुलायम सिंह ने आजम खान की कीमत पर उनके सबसे बड़े विरोधी अमर सिंह से रिश्ते सुधारने की पहल की है. पार्टी की अहम बैठकों से फिलहाल उन्हें दूर रखा जा रहा है या शायद वे स्वयं ही उनसे दूर रह रहे हैं.

सपा पर मुसलिम तुष्टिकरण का जो आरोप लगा था उससे निपटने की कोशिश मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने स्तर पर भी कर रहे हैं. मुख्यमंत्री ने उस बनारस के घाटों के पुनरोद्धार और सौंदर्यीकरण के लिए करोड़ों की योजना की घोषणा की है. गौरतलब है कि बनारस उनके धुर विरोधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निर्वाचन क्षेत्र है. इतना ही नहीं, बनारस नगर से सपा का कोई विधायक भी नहीं है. जाहिर है बनारस जैसे धार्मिक नगर से शुरू किए गए किसी कार्यक्रम का अपना राजनीतिक संदेश होता है. वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू कहते हैं, ‘आजम खान को लेकर पार्टी के रुख में आया बदलाव महत्वपूर्ण है. बाकी घटनाओं के बारे में अभी पूरे विश्वास से कुछ कह पाना मुश्किल है.’

डीएमके नेता एमके स्टालिन द्वारा ट्विटर पर दी गई  बधाई
डीएमके नेता एमके स्टालिन द्वारा ट्विटर पर दी गई  बधाई

बदलाव की सुगबुगाहट सपा के विधायकों और नेताओं में व्यक्तिगत स्तर पर भी देखने को मिल रही है. अयोध्या से विधायक तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडे का उदाहरण प्रासंगिक है. लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद पवन पांडे ने अपने क्षेत्र में विकास की गतिविधियों और शिलान्यास की झड़ी लगा दी है. ध्यान देने पर हम पाते हैं कि इनमें से ज्यादातर काम काज हिंदू धार्मिक महत्व से जुड़े हैं न कि सामान्य विकास से. अयोध्या में हर साल लगने वाले सावन मेला, राम विवाह मेला और रामायण मेला को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पांच सौ की क्षमता वाले सत्संग भवन की नींव रखी है. इसके अलावा एक करोड़ की लागत से पांच सुलभ शौचालयों का काम भी चल रहा है. सबसे महत्वपूर्ण काम उन्होंने अयोध्या के नया घाट पर 65 लाख रुपये की लागत से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम द्वार की आधारशिला रखने का किया है. पांडे के इस अतिशय धार्मिक रुझान पर उनकी पार्टी क्या सोचती है? इस बारे मंे पवन पांडे बताते हैं, ‘पार्टी ने मुझे कभी भी नहीं रोका. बल्कि स्वयं मुख्यमंत्रीजी ने हर तरह से मुझे समर्थन और प्रोत्साहन दिया है. मुख्यमंत्रीजी ने अयोध्या में पांच हजार की क्षमता वाले एक ऑडिटोरियम का निर्माण करवाने का आश्वासन भी दिया है.’

बदलाव की बयार उत्तर से लेकर सुदूर दक्षिण तक की राजनीतिक पार्टियों में चल रही है. तमिलनाडु में डीएमके ने 29 अगस्त को एक ऐसा काम किया जिससे देखते ही देखते द्रविड़ राजनीति में भूचाल आ गया. डीएमके के उत्तराधिकारी स्टालिन ने अपने फेसबुक और ट्विटर एकाउंट पर तमिलनाडु की जनता को विनायक चतुर्थी की शुभकामनाएं दी. पेरियार की ब्राह्मणवाद विरोधी विचारधार पर चलने वाली डीएमके ने पहली बार किसी हिंदू धार्मिक त्यौहार की बधाई दी थी. अब तक आम तौर पर पार्टी के मुखिया एम करुणानिधि सनातन धर्म की परंपराओं का विरोध करते ही पाए जाते थे. शुरुआत में स्टालिन के स्टेटस को उनके समर्थकों का जबर्दस्त समर्थन मिला. देखते ही देखते फेसबुक पर 2700 से ज्यादा लाइक आ गए,  200 से ज्यादा कमेंट आ गए और करीब इतने ही लोगों ने इसे शेयर भी कर दिया. इसके बाद विरोध के सुर उभरने शुरू हुए.

MKदरअसल पेरियार की जिस विचारधारा पर डीएमके की राजनीति टिकी है उसमें हिंदू धर्म के तमाम प्रतीकों और स्थापित परंपराओं का विरोध निहित है. इस बात को लेकर स्टालिन की आलोचना शुरू हो गई कि क्या डीएमके अपनी पुरानी विचारधारा से पीछे हट रही है. क्या इसके पीछे तमिलनाडु में भाजपा को मिली सफलता की भी कोई भूमिका है और क्या इसे करुणानिधि का समर्थन भी प्राप्त है. गौरतलब है कि लोकसभा चुनावों में तमिलनाडु की 39 सीटों में से 37 सीटें जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके ने जीती हैं जबकि दो सीटें भाजपा और उसके सहयोगी दल पीएमके के खाते में आई हैं. दक्षिण के सूबे में भाजपा को मिली यह सफलता इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि पार्टी की अब तक वहां नाममात्र की भी उपस्थिति नहीं रही है और सूबे की दूसरी महत्वपूर्ण पार्टी डीएमके का सूपड़ा ही साफ हो गया. नतीजा यह हुआ कि शाम होते-होते डीएमके पिछले पांव पर आ गई. पार्टी की तरफ से जारी सफाईनामे में कहा गया कि वह पोस्ट गलतीवश प्रकाशित हुआ है. पार्टी पेरियार की सोच पर कायम है. दोनों पोस्ट डिलीट कर दिए गए. पार्टी समर्थक टेलीविजन नेटवर्क कलाइनार टीवी पर शाम को ही इससे संबंधित कार्यक्रम प्रसारित कर विनायक चतुर्थी की निरर्थकता पर प्रकाश डाला गया.

तो राजनीतिक दलों के रुख में आए इस बदलाव को क्या माना जाय? यह समय की मांग है या राजनीतिक दलों का अवसरवाद है. राम बहादुर राय के शब्दों में, ‘संसदीय राजनीति में वोटरों का रुझान महत्व रखता है. तथ्य इतना भर है कि 2014 में आए नतीजे न तो यह हिंदुत्व को वोट हंै न ही भाजपा को. जिस तरह से नरेंद्र मोदी को निशाना बनाया जा रहा था उनके समर्थकों ने उसी तरह से उसका प्रतिकार भर किया है. मैं इसे राजनीतिक दलों का अवसरवाद नहीं कहूंगा. यह स्थापित सच है कि जो शासक दल होता है वह देश की राजनीतिक संस्कृति को निर्धारित करता है, उसे परिभाषित करता है और उसे पुनर्निर्धारित करता है.’

तो क्या यह सिर्फ मोदी समर्थकों और विरोधियों के बीच का मसला है. जानकारों की राय इस विषय में अलग-अलग है. प्रो. तुलसीराम के शब्दों में, ‘भाजपा की जीत के साथ सांप्रदायिकता व्यवस्था का हिस्सा बन गई है. इससे धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण तेज हुआ है. पहले लोग धर्मनिरपेक्ष विचारधारा को हर फोरम पर मजबूती से रखते थे. इसकी वजह से कम्युनल ताकतें पिछले पांव पर रहती थीं. अस्सी के दशक तक स्थिति यह थी कि जनसंघ और भाजपा यही बयान देते थे कि हमारा हिंदुत्व से कोई लेना-देना नहीं है. पिछले दो दशकों में आरएसएस और भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत की है और दूसरी पार्टियों ने अपना रुख तेजी से बदला है. इन राजनीतिक पार्टियों के लचर रवैये के कारण ही नरेंद्र मोदी आज इस रूप में हमारे सामने उभरे हैं वरना अगर धर्मनिरपेक्ष पार्टियां अपने रुख पर मजबूती से कायम रहती तो 2002-03 में ही नरेंद्र मोदी का राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो जाता.’

बदली हवा के हिसाब से खुद ढालने में राजनेताओं का कोई सानी नहीं होता. यह बात साफ है कि इस समय राजनीतिक दलों के रुख में आ रहे बदलाव के पीछे कुछ हद तक भाजपा की प्रचंड जीत की भूमिका है. पर बहती हवा के साथ बह जाने का नाम लोकतंत्र नहीं है. वैचारिक विभिन्नता लोकतंत्र की ऑक्सीजन है. जल्द ही राजनीतिक दलों को नकल से होने वाले नुकसान का अहसास हो जाएगा. अपने आप नहीं होगा तो लोकतंत्र में खुद भी इतनी ताकत होती है कि वह गलतियों को सुधारने के लिए विवश कर दे.

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स्वर्ग का बेड़ा गर्क

विनाश श्रीनगर में पानी की निकासी का एकमात्र स्रोत झेलम नदी गाद भरने के चलते काफी उथली हो चुकी है. इसके चलते भी बाढ़ विकराल हुई
विनाश श्रीनगर में पानी की निकासी का एकमात्र स्रोत झेलम नदी गाद भरने के चलते काफी उथली हो चुकी है. इसके चलते भी बाढ़ विकराल हुई
विनाश श्रीनगर में पानी की निकासी का एकमात्र स्रोत झेलम नदी गाद भरने के चलते काफी उथली हो चुकी है. इसके चलते भी बाढ़ विकराल हुई. फोटो: आबिद भट्ट

कश्मीर के राजवंशों का विस्तृत वर्णन करने वाले कल्हण के महाकाव्य राजतरंगिणी में एक दिलचस्प किस्सा मिलता है. यहां आठवीं सदी में हुए राजा ललितादित्य पीड़ चाहते थे कि राजधानी को श्रीनगर से हटाकर इससे कुछ आगे झेलम किनारे ही स्थित एक इलाके परिहासपुर ले जाया जाए. दरअसल कभी श्रीनगर को राजधानी बनाने की वजह यह थी कि एक तो यह राज्य के केंद्र में था और दूसरे, एक विशाल दलदली जमीन पर होने के कारण इसमें दर्जनों जलमार्ग थे जिनसे नावों के जरिये सुगमता से व्यापार हो सकता था. लेकिन पानी की प्रचुरता का दूसरा पक्ष यह था कि बाढ़ के खतरे के चलते यहां एक निश्चित सीमा से ज्यादा आबादी नहीं बसायी जा सकती थी. फिर भी जब आबादी बढ़ने लगी तो ललितादित्य को लगा कि जान-माल की तबाही से बेहतर है कि राजधानी कहीं और ले जाई जाए. लेकिन लोग इसके लिए खास इच्छुक नहीं थे. इससे क्षुब्ध  ललितादित्य ने एक दिन मदिरा के नशे में अपने मंत्री को आदेश दिया कि वह राजधानी को आग लगा दे ताकि इससे डरकर लोग शहर छोड़ दें. मंत्री चतुर था. उसने घास के एक विशाल ढेर में आग लगाकर राजा को बताया कि आदेश का पालन हो गया है. यह अलग बात है कि अगले दिन सुबह नशा उतरने पर राजा को बहुत ग्लानि हुई, लेकिन जब उसने श्रीनगर को सुरक्षित देखा तो वह मंत्री की चतुराई से बहुत खुश हुआ.

यह किस्सा बताता है कि कश्मीर घाटी में बाढ़ का खतरा एक ऐसा मुद्दा है जो नया नहीं है. यह अलग बात है कि इसके समाधान के मामले में स्थिति कमोबेश वही है जो सदियों पहले ललितादित्य के समय में थी.

कश्मीर में आई विनाशकारी बाढ़ को एक महीना हो चुका है. पानी धीरे-धीरे श्रीनगर की कालोनियों, गलियों और सड़कों से उतर रहा है. घरों के भीतर घुस आई गाद को साफ करने में लगे लोग अपने जीवन को फिर से पटरी पर लाने की कोशिशें कर रहे हैं. इसी के साथ बहुत से सवालों पर भी बहस शुरू हो चुकी है. पूछा जा रहा है कि अगर जरूरी उपाय किए गए होते और लोगों को वक्त रहते चेतावनी दे दी गई होती तो क्या बाढ़ का विनाशकारी असर कम किया जा सकता था.

भूविज्ञानी शकील रामशू ने 2010 में ही भविष्यवाणी कर दी थी कि कश्मीर अपने इतिहास की सबसे भयानक बाढ़ के मुहाने पर खड़ा है और अगर नीति बनाने वालों ने युद्धस्तर पर अतिरिक्त पानी निकालने वाले एक वैकल्पिक चैनल का निर्माण नहीं किया तो श्रीनगर ऐसी बर्बादी देखेगा जैसी उसने पहले कभी नहीं देखी होगी. रामशू कहते हैं, ‘लोगों को यह पता ही नहीं था कि वे ऐसी बाढ़ की जद में आ सकते हैं. जागरूकता के अभाव ने अतिआत्मविश्वास पैदा किया और यही सबसे बड़ी वजह थी कि सरकार ने बिल्कुल आखिरी वक्त पर शहर के कुछ इलाकों को खाली कराने की सोची.’

रामशू आगे कहते हैं, ‘बारिश का ठीकरा तो आप मौसम में आ रहे बदलाव पर फोड़ सकते हैं, लेकिन शहर को जो नुकसान हुआ उसमें तो साफ तौर पर इंसानों की ही भूमिका है. इस विनाश को टाला भले ही न जा सकता हो, लेकिन कम तो किया ही जा सकता था. सरकार ठीक से काम करती तो लाल चौक तक पानी पहुंचता ही नहीं.’

हालांकि राज्य सरकार इस आरोप को सिरे से खारिज करती है. सत्ताधारी नेशनल कॉनफ्रेंस के नेता तनवीर सादिक कहते हैं, ‘हमारे यहां बाढ़ के खतरे का जो निशान बना हुआ है उसकी अधिकतम ऊंचाई 28 है. इस बार पानी की ऊंचाई 34 तक पहुंच गई. और पानी डाइवर्ट करते भी तो कहां? कश्मीर के दक्षिणी हिस्से में तो पहले से ही बाढ़ आई हुई थी और ऊपर से झेलम के साथ इतना सारा पानी श्रीनगर की तरफ आ रहा था.’

क्या हो सकता था और क्या नहीं, इस पर बहस अभी लंबे समय तक जारी रहेगी. हो सकता है कि इसकी आधिकारिक जांच की प्रक्रिया भी जल्द शुरू हो जाए. लेकिन यह निष्कर्ष निकालने के लिए किसी भारी कवायद की जरूरत नहीं कि अनियोजित विकास और पानी के प्राकृतिक रास्तों में अतिक्रमण ने कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी थी कि श्रीनगर इस बाढ़ से बच पाता.

‘बारिश का ठीकरा तो आप मौसम में आ रहे बदलाव पर फोड़ सकते हैं, लेकिन शहर को जो नुकसान हुआ उसमें तो साफ तौर पर इंसानों की ही भूमिका है’

1989 में जब घाटी में अलगाववादी आंदोलन शुरू हुआ तो श्रीनगर में अवैध निर्माण की प्रक्रिया ने काफी गति पकड़ ली. इसके साथ शहर की आखिरी सांसें भी उखड़ने लगीं. एक के बाद एक अवैध आवासीय कालोनियां बनती गईं जिन्होंने शहर के चप्पे-चप्पे को भर दिया. इन्हें बनाने वालों ने श्रीनगर नगर निगम से इसके लिए कोई अनुमति नहीं ली थी. वे नगर निगम के अधिकारियों को रिश्वत देते और निर्माण चलता रहता.  जहां बगीचे थे, खेत थे, दलदल थे या नहरें थीं वहां मकान बन गए. लोगों ने डल झील को भी नहीं बख्शा. उसे भी पाटकर इमारतें खड़ी कर दी गईं. इन कालोनियों के पीछे वे जमीन माफिया थे जिन्हें किसी भी कीमत पर सिर्फ मुनाफे से मतलब था. श्रीनगर के पश्चिम में स्थित बेमीना का ही उदाहरण लें. इस पॉश इलाके को एक दलदली जमीन पर बसाया गया. इसमें कुछ सरकार की भी भूमिका रही जिसने इस जमीन को पाटा, फिर इसमें प्लॉट काटे और फिर इन्हें लोगों को बेचा. यही नहीं, इस इलाके में सरकारी इमारतें तक बनवा दी गईं. हज हाउस, झेलम वैली मेडिकल कॉलेज, भू अभिलेख विभाग की इमारतें यहां पर बनीं. यहां तक कि शहर के व्यवस्थित विस्तार का जिम्मा संभालने वाले श्रीनगर विकास प्राधिकरण ने भी बेमीना में अपना दफ्तर बना लिया. बाढ़ ने इन इमारतों को 10 फीट पानी के भीतर खड़ा कर दिया. सात सितंबर को पानी आने तक भी इलाके में भरी जेब और खाली समझ को साफ-साफ दर्शाती दर्जनों इमारतों के निर्माण का काम चल रहा था. ऐसे कई उदाहरण हैं. झेलम के बहाव के साथ लगता इसका जो बायां किनारा था वह कभी खाली हुआ करता था. झेलम का जलस्तर बढ़ता तो तटबंध पर बने निकास खोलकर अधिकारी अतिरिक्त पानी वहां छोड़ देते थे. लेकिन बीते कुछ समय में इस जगह भी अवैध बस्तियां बस गईं. तो ऐसे में झेलम का पानी वहां छोड़ना भी मुश्किल हो गया. सोइतांग एक ऐसी ही कालोनी थी. यहां स्थानीय विधायक जावेद मुस्तफा कई हजार निवासियों के साथ चौकसी कर रहे थे ताकि तटबंध से पानी छोड़ने का सरकार का कोई भी प्रयास असफल किया जा सके. यह अलग बात है कि श्रीनगर को डुबाने के बाद तटबंध खुद ही टूट गया.

आपदा निचले इलाकों में अवैध कालोनियों के निर्माण ने बाढ़ की विभीषिका और बढ़ा दी
आपदा निचले इलाकों में अवैध कालोनियों के निर्माण ने बाढ़ की विभीषिका और बढ़ा दी

श्रीनगर की इस समस्या का राज्य में चल रहे राजनीतिक टकराव से भी गहरा सबंध है. स्थानीय जानकार बताते हैं कि निर्माण के मामले में यहां अराजकता 1975 से शुरू हुई. यह वही साल था जब शेख अब्दुल्ला और इंदिरा गांधी के बीच एक समझौता हुआ था जिसके बाद कश्मीरियों को आत्मनिर्णय का अधिकार देने के अब्दुल्ला के 23 साल पुराने अभियान का अंत हो गया था. अब्दुल्ला का राजनीतिक लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया इसलिए उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को दूसरे तरीके से संतुष्ट करने की सोची. ऐसा उन्होंने उनके लिए नियमों में ढील देकर किया. इसका नतीजा शहर के व्यावसायिक इलाकों में खुल्लमखुल्ला अतिक्रमण के रूप में सामने आया और इसके चलते ही बेमीना जैसे इलाके वजूद में आए.

पिछले 25 साल के अलगाववाद ने इस समस्या को और विकराल किया. 90 के दशक में जब सरकारी तंत्र ढह गया था तो उसी दौरान राज्य के ग्रामीण इलाकों से से लोग बड़ी संख्या में श्रीनगर की तरफ पलायन कर रहे थे. इन लोगों में एक बड़ी संख्या उनकी थी जो पैसे वाले थे और आतंकवाद और इसके चलते हो रही परेशानियों के चलते गांव छोड़ना चाहते थे.  इस पलायन के चलते मकानों की जरूरत काफी बढ़ गई. इस जरूरत को भूमाफियाओं ने पूरा किया. जल्द ही बिल्डरों और प्रॉप्रटी डीलरों के एक नेटवर्क ने खाली जमीनों को कंक्रीट के जंगल में तब्दील करना शुरू कर दिया. इनमें से ज्यादातर जमीनें उन इलाकों में पड़ती थीं जो कभी झेलम का विस्तार संभालते थे. लेकिन ये महंगे दामों पर बिकने लगीं और कइयों के दाम तो साल भर में दोगुने हो गए. बाद में सरकारी तंत्र में थोड़ी जान लौटी भी तो अधिकारी और नेता इस नेटवर्क के साथ मिल गए. इसके एवज में उन्हें अकूत मुनाफा जो मिलने वाला था. रियल एस्टेट पिछले एक दशक के दौरान घाटी में सबसे प्रमुख कारोबार बन गया और इसने श्रीनगर के हर खाली हिस्से को पाटकर आपदा को न्यौतने जैसा काम कर दिया.

पीडीपी नेता नईम अख्तर कहते हैं, ‘देखा जाए तो नया श्रीनगर की प्लानिंग सरकार ने नहीं बल्कि भूमाफिया ने की है. पिछले 20 साल के दौरान जो भी कॉलोनियां बनीं उन्होंने श्रीनगर का गला घोंटने का काम किया और इस बाढ़ से हुए विनाश की भूमिका लिखी.’ अख्तर बताते हैं कि 1975 से पहले राज्य सरकार ने श्रीनगर में दो आवासीय कॉलोनियां बसाई थीं और दोनों इस बाढ़ से अछूती रहीं. इनमें पहली शहर के उत्तर में स्थित सौरा इलाके में है और दूसरी दक्षिणी हिस्से में स्थित संतनगर और रावलपुरा में. 1947 से पहले महाराजा हरि सिंह ने कर्णनगर बसाया था. आज यह एक भव्य बाजार है. यह इलाका भी बाढ़ से अछूता रहा.

लेकिन बाढ़ से अपना भविष्य सुरक्षित करने के ऐसे प्रयासों में क्या यह भी शामिल होगा कि पिछले 25 साल की गलतियों को सुधारा जाए?

1903 की भयानक बाढ़ के समय हरि सिंह के चाचा महाराजा प्रताप सिंह का शासन था. इस बाढ़ के बाद उन्होंने आगे इससे बचने के रास्ते सुझाने के लिए अंग्रेज इंजीनियरों को श्रीनगर बुलाया था. 1902 में भी श्रीनगर में भारी बाढ़ आई थी. तब भी वह श्रीनगर के एक बड़े हिस्से को निगल गई थी और हर तरफ तबाही का मंजर हो गया था. इन इंजीनियरों ने शहर में छोटी और बड़ी नहरों का एक नेटवर्क बनाया जो बाढ़ की स्थिति में अतिरिक्त पानी को शहर से बाहर ले जाता था. प्रताप सिंह ने कई जगहों पर झेलम के तल की खुदाई भी करवाई थी. इससे नदी की गहराई और नतीजतन ज्यादा पानी आने की सूरत में भी खतरा न होने की संभावना बढ़ गई थी. श्रीनगर में कोई निर्माण करवाते हुए भी काफी ध्यान रखा जाता था कि वह पानी के स्वाभाविक रास्ते में न हो. नहरों के नेटवर्क और दूरदर्शिता से बना यह एक तंत्र था जो श्रीनगर शहर को बाढ़ से बचाए रखता था.

लेकिन बीते दो दशक के दौरान इस तंत्र की धज्जियां उड़ा दी गईं. अराजक तरीके से हुए निर्माण ने आपदा का असर काफी बढ़ा दिया. बाढ़ में कई पुलों का बह जाना साफ संकेत है कि लोग भूल चुके थे कि यह पानी का रास्ता है. रामशू कहते हैं, ‘2014 की इस भयानक बाढ़ का सबसे अहम कारण यही है कि झेलम से उसकी जगह छीन ली गई. पानी के रास्तों पर हुए अतिक्रमण, नदियों में जमी गाद और नदी के किनारों पर सड़क निर्माण ने झेलम घाटी में बाढ़ का खतरा बढ़ा दिया था.’

बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी का भी मानना है कि कि आपदा की प्रमुख वजह दलदली जमीन (वेटलैंड्स) पर हुआ अतिक्रमण था. सोसायटी के निदेशक डॉ. असद रहमानी कहते हैं, ‘पिछले 30 सालों के दौरान कश्मीर घाटी में वेटलैंड्स में करीब 50 फीसदी की कमी आई है. इसका कारण है अंधाधुंध निर्माण जिसमें पर्यावरण के लिए कोई सम्मान नहीं है. यह निर्माण मुख्यत: व्यावसायिक गतिविधियों के चलते हुआ है.’ वे आगे कहते हैं, ‘अगर इन वेटलैंड्स को सुरक्षित रखा जाता तो जान-माल को हुए इस भयानक नुकसान को कम से कम किया जा सकता था.’

इस आपदा ने राज्य सरकार के लिए मुश्किल में डालने वाले कुछ सवाल पैदा कर दिए हैं. लोग पूछ रहे हैं कि आखिर क्यों प्रशासन ने उस जगह को बचाने के लिए सारे जरूरी कदम नहीं उठाए जो राज्य की राजधानी होने के साथ-साथ प्रशासन और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र भी है.

सवाल यह भी उठ रहे हैं कि इन वजहों को देखते हुए श्रीनगर को राजधानी बनाए रखना कितना व्यावहारिक है. अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण शहर हमेशा ही बाढ़ के खतरे की जद में है. ऊपर से अंधाधुध और बेतरतीब निर्माण के बाद यह खतरा और बढ़ गया है.  शहरों की योजना में विशेषज्ञता रखने वालीं अनीस द्रबू कहती हैं, ‘हकीकत यह है कि श्रीनगर और इसके आसपास का इलाका बाढ़ के लिहाज से खतरनाक है. मौसम में आ रहे बदलावों के चलते ग्लेशियरों का पिघलना इस खतरे को और बढ़ा रहे हैं. शहर के लिए पानी की निकासी का एकमात्र रास्ता झेलम है जिसमें गाद भरी होने के चलते उसका दम फूल रहा है. निकासी के लिए जब तक तत्काल गंभीर प्रयास नहीं किए जाते तब तक ऐसी बाढ़ भविष्य में आम हो सकती है.’

श्रीनगर स्थित शेरे कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नॉलॉजी का एक अध्ययन बताता है कि 2031 तक श्रीनगर में एक इंच भी जगह खाली नहीं बचेगी. राज्य के मुख्य सचिव इकबाल खांडे कह रहे हैं कि भविष्य में ऐसी किसी भी आपदा को रोकने के लिए झेलम दरिया में स्पिल चैनल निर्माण के लिए 22 हजार करोड़ की योजना का प्रस्ताव है और उन्हें उम्मीद है कि केंद्र सरकार इसे मंजूरी दे देगी. उनके मुताबिक दक्षिण कश्मीर में संगम के निकट झेलम दरिया के पास से ही एक स्पिल चैनल अथवा फ्लड चैनल बनाया जाएगा. यह नहर उत्तरी कश्मीर में वुल्लर झील तक होगी और जब भी झेलम का जलस्तर बढ़ेगा, यह नहर बढ़े हुए पानी को वुल्लर तक पहुंचाएगी.

लेकिन बाढ़ से अपना भविष्य सुरक्षित करने के ऐसे प्रयासों में क्या यह भी शामिल होगा कि पिछले 25 साल की गलतियों को सुधारा जाए? लालच, भ्रष्टाचार और हिंसा के जिस गठजोड़ ने बादशाहों, यात्रियों, कवियों और सूफियों को लुभाने वाले श्रीनगर को बदसूरत बना दिया है, वह खत्म हो.

जो हालात हैं उनमें फिलहाल तो ऐसा होना संभव नहीं लगता.

hindi@tehelka.com

मांझी के मन में क्या है?

फोटोः प्रशांत रवि
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फोटोः प्रशांत रवि

बिहार में एक लोककथा अक्सर सुनने को मिलती है.  अमावस की रात एक पंडित के यहां चोरों ने सेंध मारी. पंडित-पंडिताइन दोनों जान गए कि चोर आए हैं. पंडिताइन पंडित से बोली, ‘देखोजी, चोर आए हैं. शोर मचाओ.’ पंडित ने पंडिताइन को इशारे से समझाया, ‘भाग्यवान, अभी कुछ नहीं बोलो. अभी शोर मचाने का साइत नहीं.’ चोर चोरी करके चलते बने. लगभग एक महीने बाद पूर्णिमा की रात पंडित ने जोर-जोर से चोर-चोर का शोर मचाना शुरू किया. गांववाले पंडित के घर की ओर लाठी-डंडा लेकर दौड़े. पूछा कि किधर है चोर. पंडित ने कहा, ‘आज और अभी थोड़ी न आए हैं चोर, वे तो अमावस्या की रात आए थे, आज तो शोर मचाने का साइत-संजोग ठीक बन रहा है, इसलिए शोर मचाया.’ गांववाले पंडित को कोसते हुए आधी रात को वापस लौट आये और यही बतियाते रहे कि पंडितजी की बात भरोसे लायक नहीं .

इन दिनों जब बिहार में  मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के एक मंदिर में जाने के बाद उस मंदिर की सफाई के प्रसंग पर जमकर राजनीतिक बवाल हो रहा है तो बहुत से लोग इस किस्से को भी याद कर रहे हैं. यह विवाद 28 सितंबर को तब शुरू हुआ जब बिहार के दिग्गज दलित नेता रहे और पूर्व मुख्यमंत्री भोलापासवान शास्त्री के जयंती समारोह में मांझी ने यह बताया कि राज्य में हालिया उपचुनाव के दौरान जब वे मधुबनी जिले के एक मंदिर में गए तो उनके जाने के बाद मंदिर का शुद्धिकरण करने के लिए उसे धोया गया. मूर्तियों को भी धोया गया. मांझी ने कहा कि यह सूचना उन्हें राज्य के खान एवं भूतत्व मंत्री रामलखन राम रमण ने दी. मांझी ने कहा कि उन्हें बहुत दुख हुआ. उनका कहना था, ‘मेरे पास काम के लिए लोग आते हैं तो पैर छूते हैं. मैं जान नहीं पाता कि उनके मन में क्या है? बाद में ऐसा व्यवहार करते हैं. मैं अछूत हूूं, इसलिए… मेरा अनुसूचित जाति के घर में जन्म लेना ही कसूर है न!’  मांझी ने ऐसी कई भावुक बातें कहीं. इसकी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक ही था. देखते ही देखते मांझी के पक्ष में सहानुभूति की लहर चलने लगी.

लेकिन अब मांझी अपने ही बयान में फंसते दिख रहे हैं. सबसे पहले तो उन्हें उनके ही मंत्री रामलखन राम रमण ने झटका दिया. रमण के हवाले से ही मंदिर के शुद्धिकरण की सूचना मिलने की बात मांझी ने सार्वजनिक मंच पर साझा की थी. रमण ने कहा कि पता नहीं क्यों और कैसे मुख्यमंत्री ने उनका नाम लिया क्योंकि वे उस आयोजन में मांझी के साथ नहीं थे. रमण यहां तक बोले कि वे चुनाव प्रचार में भी मांझी के साथ नहीं थे. जदयू के प्रमुख नेता, राज्य सरकार में मंत्री व पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के बेटे नीतीश मिश्र ने भी बिना देर किए कहा कि मुख्यमंत्री को दी गई सूचना गलत और भ्रामक है. तहलका से बातचीत में वे कहते हैं, ‘उपचुनाव के दौरान मुख्यमंत्री का कार्यक्रम अंधराठाढ़ी में था, रास्ते में मां परमेश्वरी का मंदिर पड़ता है, मुख्यमंत्री ने वहां रुककर पूजा-अर्चना की थी. बात बस इतनी-सी ही है.’ मिश्र आगे जोड़ते हैं, ‘जिस मूर्ति को धोने की बात मुख्यमंत्री बता रहे हैं वह मिट्टी का पिंड है, जिसे कभी धोया ही नहीं जाता.’

मंदिर प्रकरण को छोड़ भी दें तो मांझी शुरुआत से ही महादलितों व दलितों के मसले पर अपना अलग रुख दिखाकर एक निश्चित दिशा में जाते हुए दिखते हैं 

मांझी यह बात कहकर अपनों से तक घिरते गए. उनके दो मंत्रियों के अलावा जदयू के ही विधान पार्षद विनोद सिंह ने भी कहा कि उस दिन वे मुख्यमंत्री के साथ थे और ऐसी कोई घटना नहीं हुई. उधर, मंदिर के पुजारी अशोक कुमार झा भी इसकी पुष्टि करते हैं. वे कहते हैं, ‘मंदिर में भगवती की कोई प्रतिमा नहीं है. वैसे तो रोजाना ही सुबह-शाम मंदिर की साफ-सफाई होती है, लेकिन 18 अगस्त को सीएम के आने की वजह से ज्यादा लोग आए थे तो उस शाम सफाई तक भी नहीं हो सकी थी. 19 की सुबह ही सफाई हुई थी.’

मांझी ने भोला पासवान को याद करते हुए जो कहा, वह क्यों कहा, किस मकसद से कहा, यह तो वही बता सकते हैं. लेकिन वे फिलहाल यह बताने की बजाय अपने बयान से बने जाल से निकलने की कोशिश में लगे हुए हैं. मांझी ने जब यह बात कही तो तुरंत जांच की बात उठी और बिना कोई वक्त लिए जांच कमिटी भी गठित हो गई. जांच का जिम्मा दरभंगा प्रमंडल के आयुक्त बंदना किन्नी और आईजी एके आंबेडकर को दिया गया है. जो परिणाम सामने आएंगे, हो सकता है उनमें वक्त लगे, लेकिन अभी से जो संकेत मिल रहे हैं, उससे मांझी इस मामले में फंसते ही नजर आ रहे हैं. मंदिर के पुजारी अशोक झा  ने जांच दल को बताया कि मंदिर के पिंड को कभी धोया नहीं जाता, सुबह-शाम घी लगाया जाता है. उनके मुताबिक जिस दिन मुख्यमंत्री आए थे उस दिन मंदिर के बाहर मटका फोड़ का आयोजन भी था इसलिए भीड़-भाड़ की वजह से शाम को साफ-सफाई भी नहीं हुई थी. पुजारी अशोक झा ताल ठोकते हुए कह रहे हैं कि हर तरह की जांच हो जाए. यह भी कि अगर वे गलत हैं तो उन्हें फांसी पर चढ़ाया जाये और अगर बात में सच्चाई नहीं है तो गलत बात कहने वाले को सजा मिले. स्थानीय ग्रामीणों का भी कहना है कि जिस मंदिर की बात मुख्यमंत्री उठा रहे हैं उसमें इस रास्ते से गुजरनेवाले दलित-महादलित अधिकारी नियमित आते हैं और कभी किसी को रोका नहीं गया. गांव के लोग यह भी बताते हैं कि उस मंदिर में होने वाले भजन में जो नियमित ढोल बजानेवाला है, वह दलित चौठी राम ही है.

ऐस कहनेवाले अब सिर्फ पुजारी या ग्रामीण नहीं हैं. मांझी इस मामले में अब चारों तरफ से घिरते नजर आ रहे हैं. एक तरफ उन्हें इस मुद्दे पर अपने दल की ओर से कोई सहयोग नहीं मिल रहा तो दूसरी ओर भाजपा को जैसे बैठे-बिठाए एक मौका मिल गया है. पार्टी नेता सुशील मोदी कहते हैं कि अगर यह घटना सही है और सीएम के जाने की वजह से मंदिर का शुद्धिकरण हुआ है तो वे इसकी निंदा करते हैं लेकिन अगर यह सही नहीं है तो फिर जिस मंत्री ने मुख्यमंत्री को यह सूचना दी, उसे बर्खास्त करना चाहिए. उनका कहना था, ‘अगर सीएम झूठ बोल रहे हैं तो उन पर आईपीसी की धारा 152 एक के तहत मामला दर्ज होना चाहिए जिसके तहत गैर जमानती वारंट और तीन साल की सजा का प्रावधान है.’ मोदी इस मसले पर सवर्णों के बीच पार्टी को और मजबूत करने में लगे हैं. साथ ही वे इसे मिथिला इलाके का अपमान बताकर क्षेत्र की राजनीति को भी साध लेने की जुगत लगाये हुए हैं.

सुशील मोदी राजनीति करते हैं, इसलिए स्वाभाविक है कि वे हर मुमकिन मौके से राजनीतिक फायदा उठाना चाहेंगे और वे वैसा ही कर रहे हैं. लेकिन इस पूरे प्रकरण में यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि आखिर मांझी ने एक घटना के इतने दिनों बाद, वह भी एक प्रमुख दलित नेता के जयंती समारोह में अचानक ही यह बात हवा में क्यों उछाल दी. जदयू के पूर्व पार्षद रहे और अब राजद से ताल्लुक रखनेवाले नेता व लेखक प्रेम कुमार मणी कहते हैं, ‘मांझी ऐसी बात कर रहे हैं कि समझ में ही नहीं आ रहा. मान लिया कि घटना सही भी हो. लेकिन क्या कोई एसपी, डीएसपी आकर कहे कि उसे तो एक उचक्के ने आज रास्ते में पीट दिया तो क्या करें?’ वे आगे कहते हैं, ‘मांझी मुख्यमंत्री हैं. अगर इस बात की सूचना उन्हें एक माह से भी अधिक समय पहले मिली थी तो उन्होंने तुरंत ही क्यों नहीं इसकी पुष्टि और जांच करवाकर अस्पृश्यता निवारण कानून के तहत केस नहीं किया? एक मुख्यमंत्री इतनी उम्मीद तो की ही जाती है.’

ऐसे सवालों के जवाब में मांझी कहते हैं कि वह उपचुनाव का समय था और वे ऐसा कहते तो सामाजिक तनाव का खतरा होता. उधर, मणी कहते हैं, ‘उस दिन भी जीतन राम मांझी सार्वजनिक तौर पर यह बात एक महादलित की तरह बता रहे थे, जबकि उन्हें हमेशा यह याद रखना चाहिए  िक वे सिर्फ महादलित नहीं प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हैं और इस तरह की बातें, इतने दिनों बाद कहकर भी वे सामाजिक तनाव बढ़ाने का ही काम करेंगे.’ उनके मुताबिक सवाल यह भी है कि अगर महादलितों के साथ आज भी बिहार में ऐसा ही सुलूक होता है तो यह तो नीतीश कुमार के शासनकाल पर भी एक सवाल है. वे कहते हैं, ‘इसलिए कि उनके शासनकाल में सबसे ज्यादा महादलितों की स्थिति ही सुधारने और उनके विकास की बात कही जाती है लेकिन इतने सालों क्या स्थितियों में कोई बदलाव नहीं हुआ.’  इस बारे में बात करने पर हाल तक जद यू के प्रमुख नेता रहे शिवानंद तिवारी कहते हैं, ‘मामला समझ में नहीं आ रहा. क्यों मांझी इतने दिनों तक चुप रहने के बाद बोले? जिसके हवाले से बोले वही इंकार कर रहा है, उनकी पार्टी के नेता इंकार कर रहे हैं.’ तिवारी कहते हैं कि इस बात को सार्वजनिक मंच से कहकर मांझी अपनी पार्टी की फजीहत ही करवा रहे हैं.

‘वे जानते हैं कि अगर महादलितों और दलितों का नेता बना जाए तो जदयू-राजद गठबंधन के लिए उन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा’

मंदिर धुलाई मामले में मांझी सच बोल रहे हैं या झूठ अभी तो साफ-साफ नहीं कहा जा सकता. इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि बिहार के कई हिस्सों में आज भी दलितों से अछूतों की तरह व्यवहार किया जाता है और रोजमर्रा के जीवन में उन्हें मानसिक प्रताड़ना का सामना भी करना पड़ता है. लेकिन मांझी अगर दूसरे संदर्भ में, दूसरे प्रसंग के साथ यह बात रखते तो बात इतनी आगे नहीं बढ़ती. यह भी सच है कि अब आगे जांच के परिणाम चाहे जो आएं, घटना के लगभग डेढ़ माह बाद सनसनी के साथ, वह भी किसी के जरिये प्राप्त जानकारी का हवाला देकर सार्वजनिक मंच पर ऐसी बात कहकर उन्होंने अपनी पार्टी को न उगलने-न निगलनेवाली स्थिति में ला दिया है.

अब सवाल दो हैं. पहला यह कि क्या मांझी इतने नासमझ नेता हैं कि ऐसा कहने के पहले उन्होंने जरा भी सोचा नहीं होगा कि इसके आगे-पीछे ढेरों सवाल खड़े होंगे. इससे पार्टी की छवि को भी नुकसान होगा और इससे एक नयी बहस का दौर भी शुरू होगा. या फिर मांझी ने सबकुछ सोच-समझकर यह बात कही होगी.

मांझी को नासमझ नेता मानने को शायद ही कोई तैयार हो. इसकी वजहें भी हैं. मांझी पिछले तीन दशक से अधिक समय से बिहार की राजनीति में सक्रिय हैं और अच्छे ओहदे के साथ भी राजनीति करते उन्हें एक लंबा समय हो गया है. यूं भी राजनीति में वे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और धाकड़ कूटनीतिक नेता सत्येंद्र नारायण सिन्हा के चेले माने जाते हैं. जगन्नाथ मिश्र को भी उनका गुरू कहा जाता है. सत्येंद्र नारायण सिन्हा और जगन्नाथ मिश्र की राजनीति को जाननेवाले जानते हैं कि दोनों सधी हुई चाल चलने में उस्ताद नेता रहे हैं. कई राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक इस लिहाज से देखें तो मांझी को कभी भी इतना नासमझ नेता नहीं माना जा सकता कि वे बिना सोचे कुछ भी बोल दें.

मंदिर शुद्धिकरण मामले की जांच के चाहे जो नतीजे निकलंे. संभव है मांझी ने किसी के कहे पर ही जो बात हवा में उछाली है, वह सही भी साबित हो जाए. तब भी इस मामले को लेकर मांझी पर उठे सवाल अपनी जगह रहेंगे. सबसे पहला सवाल कि वे इतने दिनों तक वह चुप्पी क्यों साधे रहे. अगर उन्हें सार्वजनिक तौर पर यह कहना ही था तो पहले जांच ही क्यों नहीं करवा ली? उसके बाद इस बात को सार्वजनिक तौर पर कहते. मांझी को करीब से जाननेवाले गया के एक पत्रकार बताते हैं, ‘मंदिर मामले में क्या सच्चाई है, मैं यह तो नहीं कह सकता, लेकिन यह तय है कि मांझी जो बोलते हैं बहुत कैलकुलेट कर बोलते हैं.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘मांझी एक साथ कई तरह की राजनीति साध लेने की जुगत में हैं. जिस दिन वे मंदिर प्रकरण पर बोले थे, उसी दिन उन्होंने यह भी कहा था कि वे सिर्फ 15 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करनेवाले नेता नहीं है, बल्कि महादलित के साथ दलितों को मिलाकर 23 प्रतिशत की आबादी होती है बिहार में और अगर यह एकजुट हो जाए तो फिर अगला मुख्यमंत्री इसी समुदाय से होगा.’ मांझी को करीब से जाननेवाले गया के इस पत्रकार जैसी बातें ही कुछ दूसरे जानकार भी कहते हैं.

भाजपा नेता सुशील मोदी चुटकी लेने के अंदाज मंे कहते हैं कि मांझी को नीतीश कुमार ने रोबोट सीएम बनाया था, लेकिन मांझी खुद ही रोबोट के माउस को आॅपरेट करने लगे हैं. मोदी विपक्षी नेता हैं, इसलिए कहा जा सकता है कि वे चुटकी ले रहे हैं या मंदिर मामले से राजनीतिक फसल काटने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन और भी कई हैं जो मानते हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही मांझी अपनी अलग राह बना रहे हैं और मंदिर मामले को उठाकर उन्होंने बिना किसी की परवाह करते हुए सोच-समझकर एक चाल चली है.

साथ-साथ! विरोधियों का आरोप है कि मांझी, नीतीश कुमार की छाया से बाहर निकलने की कोशिश में हैं
साथ-साथ! विरोधियों का आरोप है कि मांझी, नीतीश कुमार की छाया से बाहर निकलने की कोशिश में हैं

दरअसल मंदिर मामले को भोला पासवान शास्त्री के नाम पर होनेवाले आयोजन के दिन उठाकर और उसी दिन दलित-महादलितों की संख्या के अनुसार राजनीतिक ताकत बताकर मांझी अपनी पार्टी के अंदर भी बहुत संदेश देना चाहते थे. वे अपनी आकांक्षा भी बयां कर रहे थे. असल में मांझी बिहार में दलितों-महादलितों के सर्वमान्य नेता बनने और उनकी सहानुभूति-समर्थन बटोरकर अपनी स्थिति को और मजबूत करना चाहते हैं. हालांकि विश्लेषकों के एक वर्ग दूसरी बात भी कहता है. उसके मुताबिक जीतन राम मांझी यह जानते हैं कि विपक्षी पार्टी भाजपा ने हालिया वर्षों में महादलितों और दलितों के मतों में भी संेधमारी की है और आगामी विधानसभा चुनाव में भी वह ऐसी सेंधमारी करने की कोशिश में है. इसलिए भाजपा की कोशिशों को नाकाम करने के लिए उन्होंने भावनात्मक राजनीति की चाल चली है. हालांकि ऐसा माननेवाले विश्लेषकों का समूह थोड़ा छोटा है. उतना ही छोटा समूह, जितना छोटा समूह यह मानता है कि आनेवाले दिनों में अगर जदयू-राजद की ओर से मांझी को सीएम की तरह पेश नहीं किया गया तो वे दलितों-महादलितों के बड़े नेता के तौर पर खुद को स्थापित कर कभी भी पाला बदलने का खेल कर सकते हैं और दुश्मन के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ा सकते हैं.

मंदिर मामले में मांझी ने इतने दिनों बाद क्या सोचकर बयान दिया और इससे वे क्या मकसद साधना चाहते हैं, यह वही बता सकते हैं. हां, यह साफ है कि उन्होंने आहत-मर्माहत होकर बयान नहीं दिया है. अगर आहम-मर्माहत होने वाली बात होती तो वे इतने दिनों तक चुप नहीं रहते. मंदिर प्रकरण को छोड़ भी दें तो मांझी शुरुआत से ही महादलितों व दलितों के मसले पर अपना अलग स्टैंड रखकर खुद को महादलितों के सर्वमान्य और बड़े नेता के तौर पर स्थापित करने की प्रक्रिया में लगे हुए नेता की तरह दिखते रहे हैं. जब वे मुख्यमंत्री बने थे तो कई समारोहों-सभाओं में यह कहा करते थे कि बिहार में सर्वांगीण विकास हुआ है, बहुत कुछ हुआ है लेकिन महादलित समुदाय का उस तरह से विकास नहीं हुआ है, वह करेंगे. ऐसा कहककर मांझी नीतीश कुमार के सबसे बड़े एजेंडे और उपलब्धिगान पर ही प्रहार करते रहे हैं. कुछ समय पहले तहलका से बातचीत में ही जीतन राम मांझी ने कई ऐसी बातें कही थी जिनसे साफ संकेत मिले थे कि वे दलितों व महादलितों के बड़े नेता के तौर पर स्थापित होकर आगे सत्ता और शासन की राजनीति को साधने की नयी जुगत में हैं. तहलका से बातचीत में मांझी ने कहा था कि एससी/एसटी छात्रों के लिए जो आवासीय विद्यालय हैं, उसकी स्थिति बहुत दयनीय है, बहुत ही खराब हाल है और संख्या भी बहुत कम है. यह काम हो ही नहीं सका है, वे पहले करेंगे. उन्होंने यह भी कहा था कि ‘यह पूरा बिहार और पूरा देश जानता है कि जीतन राम मांझी जिस दल में रहता है, महादलित उधर ही वोट करते हैं. जब जीतन राम मांझी कांग्रेस में था तो महादलित कांग्रेस को वोट करते थे, जब मांझी राजद में आया तो महादलित राजद के साथ हुए और अब जदयू के पास मांझी है ता महादलित बिना इधर-उधर गये जदयू के साथ इंटैक्ट हैं.’ तहलका से ही बातचीत में मांझी ने यह भी कहा था कि जो जाति जदयू के साथ इंटैक्ट है, उस दल का नेता अब प्रदेश का मुखिया है और काम हो रहा है तो बिहार में आगे किसके नेतृत्व में चुनाव होगा, इस पर भी वक्त आने पर सोचना पड़ेगा और तभी देखा जाएगा.

तहलका से ही बातचीत में कई ऐसी बातें कहकर मांझी कुछ और संकेत दे रहे थे जिसकी एक पराकाष्ठा अभी मंदिर वाले मामले में दिख रही है, जब वे एक पुरानी घटना को बड़े समारोह में उचित अवसर देखकर हवा मंे उछाल देते हैं. इसके पहले पिछले माह जहानाबाद में भी उन्होंने ऐसा ही कुछ किया था. वे एक बड़े पिछड़े नेता के जयंती समारोह में गए थे. वहां लोगों ने तख्तियों के साथ बिजली की मांग की और नारा लगाया कि बिजली नहीं तो वोट नही तो मांझी मंच से ही भड़कते हए बोल पड़े थे कि ‘तख्ती नहीं दिखाइए, आपलोगों के वोट से हम मुख्यमंत्री के पद तक नहीं  पहुंचे हैं.’ तब भी बवाल मचा था लेकिन मांझी ने चुप्पी साध ली थी.

मांझी को करीब से जाननेवाले एक अधिकारी कहते हैं, ‘वे कुछ भी अनायास या औचक नहीं बोल रहे. सब आगे की राजनीति को ध्यान में रखकर कह रहे हैं. वे जानते हैं कि अगर महादलितों और दलितों का नेता बना जाए तो जदयू-राजद गठबंधन के लिए आसान नहीं होगा कि उन्हें नजरअंदाज कर फिर नीतीश कुमार या किसी और के नाम पर चुनाव लड़ने की बात दिलेेरी के साथ कह सके.’ और अगर ऐसा होता भी है तो मांझी इस कोशिश में भी हैं कि वे खुद को 23 प्रतिशत मतदाता समूह के एक ऐसे नेता के तौर पर स्थापित कर दें जिसकी उस समुदाय पर सबसे ज्यादा पकड़ हो ताकि किसी दूसरे दल के साथ जाने पर भी अधिक से अधिक तवज्जो मिले.

संभव है, मांझी यह सब बातें सोचकर ही ऐसा कर रहे हों. यह भी संभव है कि ऐसा न हो और वे जीवन के अनुभव से उपजी कड़वी सच्चाइयों को सामने बयां करनेवाले सहज व्यक्ति के तौर पर सारी बातें कर रहे हों. दोनों में से जो भी सही हो लेकिन इससे उनकी पार्टी जदयू की बार-बार फजीहत हो रही है. हालांकि फिलहाल जदयू और नीतीश कुमार के पास ऐसा कोई रास्ता भी नहीं िक वे मांझी को भी सार्वजनिक मंच से सलाह देकर समझा सकें. इसके अलग खतरे हैं.

मंदिर मामले को उठाकर अपने ही दल में लगभग अकेले पड़ चुके मांझी को समर्थन देने के लिए भी कुछ लोग सामने आ रहे हैं. राजद के एक नेता, दरभंगा के जिलाध्यक्ष फुलहसन अंसारी ने अपनी ओर से कोशिश की िक वे मंदिर में जांच करने गई टीम के सामने अपनी बात रखंे. वे जांच टीम के पास पहुंचकर यह कहने लगे कि पास के महादलित गांव के लोगों के बयान भी लिये जाएं. लेकिन गांववालों ने अंसारी का विरोध किया तो वे वापस चले गए. बिहार सरकार के एक मंत्री भीम सिंह ने भी यह कहकर भी मुख्यमंत्री को समर्थन देने की कोशिश की है कि ऐसा  कई जगहों पर होता है. यह बात सच है. बिहार में बहुत जगह अभी ऐसा होता है. महादलित-दलित क्या दूसरे कई समुदायों के साथ सामाजिक स्तर पर अछूत जैसा व्यवहार होता है. दलितों पर अत्याचार के मामले में बिहार देश के अग्रणी राज्यों में भी शामिल है. लेकिन यहां सवाल दूसरा है. यहां सवाल एक महादलित के साथ-साथ एक मुख्यमंत्री के बयान का है, जो एक घटना होने पर डेढ़ माह बाद बड़े समारोह में अपनी बात रखता है. वह भी कहासुनी का हवाला देकर और उसके बाद उस बात के समर्थन में ठोस तथ्य नहीं जुट पाता.


विवाद के उस्ताद

मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही जीतन राम मांझी के बयान निरंतरता के साथ विवाद का विषय बन रहे हैं.  कुछ लोग कहते हैं कि उनकी जबान फिसल जाती है. कुछ कहते हैं  िक वे सरल स्वभाव वाले हैं इसलिए बिना ज्यादा सोचे मन की बात कह डालते हैं. कई यह भी मानते हैं कि मांझी, लालू प्रसाद के साथ भी बहुत दिनों तक राजनीति कर चुके हैं इसलिए जानबूझकर ऐसा कुछ कहते रहते हैं जिससे सुर्खियों में बने रहें. उधर, कुछ राजनीतिक विश्लेषक मांझी के बयानों को सधी हुई राजनीतिक चाल की तरह भी देखते और आंकते हैं.

मांझी इस बार मंदिर प्रकरण को लेकर विवाद मंे हंै. मधुबनी जिले के एक मंदिर मंे उनके जाने के बाद मंदिर के शुद्धिकरण की बात घटना के डेढ़ माह बाद बताकर. इससे कुछ दिन पहले वे दानापुर मंे एक बयान देकर चर्चा में आए थे. मांझी वहां भूमिहीनों के बीच थे. दलितों के भविष्य की चिंता जताते हुए वे बोल पड़े, ‘आप बच्चों पर ध्यान नहीं देते क्योंकि आप नशा करते हैं. दारू पीजिए, लेकिन रात में. थोड़ा-थोड़ा, दवाई जैसा.’ अभिभावक या हितैषी वाले अंदाज में कही गई उनकी इस बात का खूब मजाक उड़ा. इससे पहले वे बिहार राज्य खाद्यान्न व्यवसायी संघ के राज्यस्तरीय सम्मेलन में अतिथि के तौर पर पहुंचे थे. वहां छोटे व्यवसायियों का मन बढ़ाने के उत्साह में कह बैठे कि छोटे कारोबारी अगर जमाखोरी करके माल बटोरते हैं और अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ाते हैं तो यह चलेगा और ऐसा करनेवाले धन्यवाद के पात्र हैं. आगे बोले कि देश को बड़े कारोबारी अपने कालाबाजारी से खोखला कर रहे हैं. छोटे कालाबाजारी पोठिया मछली की तरह हैं जबकि बड़े वाले मगरमच्छ हैं. मांझी के इस बयान पर भी बवाल कटा. इससे पहले भी वे ग्रामीण विकास विभाग के एक आयोजन में गए थे. वहां भ्रष्टाचार को शिष्टाचार बताने के फेर में अपना एक प्रसंग भी सुना गए. उन्होंने कहा कि उनके मंत्री रहते हुए उनके घर का बिजली का बिल 25 हजार का आ गया तो बेटे ने बिजली विभाग से सेटिंग कर उसे पांच हजार करवाकर मामला निबटा दिया. और फिर लगे हाथ भ्रष्टाचार पर यह भी बोल गए कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में बेशक बिहार का विकास हुआ, लेकिन भ्रष्टाचार भी बढ़ा.

मांझी यह सब सहजता में कहते जाते हैं या कुछ सोचकर, यह उनके करीबी भी नहीं बता पाते. एक बार दलित स्टूडेंट वेलफेयर के एक आयोजन में गए तो वहां उन्होंने जाति बंधन को तोड़कर अंतरजातीय विवाह की अच्छी बातें शुरू कीं और फिर लगे हाथ यह सलाह भी दे दी कि अधिक से अधिक जनसंख्या बढ़ाइए तभी भला होगा. इस सबके बीच जहानाबाद के एक आयोजन में बिजली की मांग करनेवालों को हड़काते हुए उनका बयान तो खूब चरचे में रहा ही था जिसमें उन्होंने मांग करनेवालों से कहा था कि ‘आपलोग वोट नहीं देते हैं, आपके वोट से सीएम नहीं बने हैं, हम अपने वोट से यहां तक पहुंचे हैं.’

जीतन राम मांझी बोलते समय शायद यह भूल जाते हैं कि वे प्रदेश के मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ जदयू के एक अहम नेता भी हैं जिनके कहे का असर पार्टी और सरकार दोनों पर पड़ता है. वे समय-समय पर अपनी पार्टी की राजनीति को प्रभावित करनेवाले बयान भी देकर सुर्खियों मंे बने रहते हैं. जब लालू प्रसाद के साथ महागठबंधन बनने की बात चल ही रही थी कि मांझी ने अपनी ओर से कह दिया था कि महागठबंधन के नेता नीतीश ही होंगे. उनके इस बयान के बाद कुछ दिन तक राजद और जदयू में वाकयुद्ध भी चला. नीतीश कुमार जब महागठबंधन बनाने में ऊर्जा लगाए हुए थे तो उस समय मांझी ने यह भी कहा था कि लालू प्रसाद के दिल में पिछड़ों के लिए ही सबकुछ है, वे दलितों-महादलितों को तरजीह नहीं देते.

मंगल की ओर

mangalyaan

काम और कामयाबी इसरो के मंगल मिशन के साथ काम करने वाले वैज्ञानिक

मंगल का एक पारंपरिक नाम भौम भी है. इसका अर्थ होता है भूमि या पृथ्वी का पुत्र. जैव विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया की तरह क्या यह पुत्र पृथ्वी पर चल रहे जीवन को एक नया विस्तार दे सकता है, इस संभावना पर लंबे समय से बहस होती रही है. इस पुरानी संभावना को नई नजर से जांचने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) का मंगलयान बीते पखवाड़े अपने अंतिम लक्ष्य यानी मंगल ग्रह की अंडाकार कक्षा में सफलतापूर्वक पहुंच गया. करीब 10 महीनों और 67 करोड़ किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद यहां पहुंचा यह उपग्रह मंगल के वायुमंडल और उसकी सतह का अध्ययन करेगा.

भारत के लिए यह उपलब्धि दो तरह से अहम है. एक तो वह दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया है जिसने मंगल अभियान के अपने पहले ही प्रयास में कामयाबी का झंडा गाड़ दिया. सफल मंगल अभियानों की कतार में भारत से पहले खड़े अमेरिका, रूस और यूरोपीय संघ का इस दिशा में पहला प्रयास असफल रहा था. दूसरे, उसने सबसे कम लागत में यह सफलता अर्जित की. इस अभियान पर खर्च हुई 450 करोड़ रु की रकम दूसरे देशों के ऐसे ही अभियानों के मुकाबले काफी कम है. उदाहरण के लिए लगभग इसी अवधि के दौरान भेजे गए नासा के ऐसे ही मंगल अभियान मैवन की लागत इससे करीब 10 गुना ज्यादा है. कुछ लोग यह दिलचस्प तथ्य भी साझा कर रहे हैं कि मंगलयान पर बनी हॉलीवुड की हालिया चर्चित फिल्म ग्रैविटी से भी कम लागत आई है जिसका बजट करीब 600 करोड़ डॉलर था. ग्रैविटी की कहानी भी एक अंतरिक्ष अभियान के इर्दगिर्द ही घूमती है.

करीब 200 अरब डॉलर राजस्व वाले अंतरिक्ष उत्पाद और सेवा क्षेत्र में मंगलयान जैसे अभियान भारत के लिए बड़ी उम्मीद जगाते हैं  

मानव जीवन के भविष्य के लिहाज से मंगल को बहुत अहम माना जाता है. वैज्ञानिकों के मुताबिक कई अरब साल पहले जब पृथ्वी आग का दहकता हुआ गोला थी तो मंगल पर जीवन के लिए बेहद अनुकूल वातावरण मौजूद था. इसकी सतह पर पर्याप्त पानी था और इस ग्रह का अपना एक घना वायुमंडल भी था. धीरे-धीरे धरती ठंडी और फलत: जीवनदायिनी हुई और मंगल पर परिस्थितियां कठोर होती चली गईं. उसकी सतह बहुत ठंडी हो गई. वायुमंडल सघन से विरल हो गया और इस ग्रह की सतह का सारा पानी सूखकर उड़ गया. मंगलयान से मिली जानकारी बेहतर तरीके से यह जानने में मदद कर सकती है कि ऐसा कैसे हुआ और क्या अब भी मंगल पर जीवन की कोई संभावना मौजूद है. यह मंगल के वातावरण में मीथेन गैस की मौजूदगी भी जांचेगा. गौरतलब है कि धरती पर अरबों टन मीथेन है जिसका अधिकतर हिस्सा छोटे-छोटे जीवाणुओं से आता है. एक वर्ग है जो मानता है कि मीथेन पैदा करने वाले जीवाणु यानी मीथेनोजेंस मंगल पर भी हो सकते हैं जो वहां के कठोर वातावरण के चलते सतह के नीचे मौजूद हों.

माना यह भी जा रहा है कि मंगलयान जैसे अभियानों से मिलने वाली जानकारियां भविष्य में वहां मानव बस्तियां बसाने के लिहाज से काफी अहम होंगी. 2030 तक इंसान के मंगल पर उतरने की बात हो रही है. दरअसल आज भी हमारे सौरमंडल में पृथ्वी के बाद मंगल ही है जो इंसानों के रहने के लिए अनुकूल है. इसकी सतह के नीचे पानी की मौजूदगी है. यह न तो बहुत गर्म है और न बहुत ठंडा. सोलर पैनलों के लिए यहां पर सूरज की पर्याप्त रोशनी है. इसका गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के मुकाबले 38 फीसदी है और बहुत से वैज्ञानिक मानते हैं कि मानव शरीर खुद को इसके मुताबिक ढाल सकता है. विरल ही सही, पर यहां एक वायुमंडल है जो सौर विकिरण से ढाल का काम कर सकता है. मंगल पर दिन-रात का चक्र भी पृथ्वी जैसा है. यहां एक दिन 24 घंटे 39 मिनट और 35 सेकेंड का है.

हालांकि मंगलयान सहित भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम एक वर्ग में आलोचना का विषय भी बना है. ऐसे भी लोग हैं जिनका मानना है कि अंतरिक्ष कार्यक्रम अमीर औद्योगिक देशों के शगल हैं जिनकी देखादेखी भारत को नहीं करनी चाहिए. वह इस पैसे का इस्तेमाल शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी उन बुनियादी सेवाओं में कर सकता है जो आम आदमी को सीधे प्रभावित करती हैं और जिनका हाल देश में बहुत बुरा है. वहीं इसके उलट बहुत से लोग यह भी मानते हैं कि इसके अपने फायदे हैं. अंतरिक्ष उत्पाद और सेवा क्षेत्र का बाजार भविष्य के लिए काफी संभावनाओं से भरा हुआ है. अमेरिका स्थित सेटेलाइट इंडस्ट्री एसोसिएशन की सितंबर 2014 में ही आई एक रिपोर्ट बताती है कि 2013 में सेटेलाइट उद्योग से करीब 195 अरब डॉलर का राजस्व पैदा हुआ. कई दूसरी रिपोर्टें हैं जो बताती हैं कि अगले कुछ साल में व्यावसायिक मकसद के लिए लांच किए जाने वाले सेटेलाइटों का कारोबार कम से कम 15 फीसदी सालाना की दर से बढ़ेगा. इस क्षेत्र में सफल खिलाड़ी गिने-चुने ही हैं. मंगलयान ने एक बार फिर संदेश दिया है कि कोई कम खर्च में अपना उपग्रह अंतरिक्ष में भेजना चाहे तो उसे नासा या यूरोपियन स्पेस एजेंसी की बजाय इसरो की तरफ देखना चाहिए.

लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि विज्ञान और तकनीक में निवेश अंतत: योग्यता और क्षमता को प्रोत्साहन देता है. इससे उन प्रतिभाओं के उभरने में मदद मिलती है जो व्यापक रूप में अर्थव्यवस्था और समाज को लाभ पहुंचाती हैं. इस लिहाज से देखें तो मंगलयान की सफलता हर नजरिये से मंगलकारी दिखती है.

सोने पर निशाना

फोटोः एएफपी
फोटोः एएफपी
फोटोः एएफपी

वर्ष 2014 के राष्ट्रमंडल खेलों (ग्लास्गो में आयोजित) के ट्रायल से एक दिन पहले जीतू राय बहुत उत्साहित थे. उनकी खुशी की वजह यह नहीं थी कि उन्हें अपनी पसंदीदा स्पर्धा 10 मीटर एयर पिस्टल में क्वालिफाई करने का यकीन था, बल्कि वह इसलिए खुश थे क्योंकि उनकी छुट्टी मंजूर कर ली गई थी. उनका दिमाग कहीं और था और यही वजह थी कि वे क्वालिफाई करने से चूक गए. हालांकि 27 साल का यह नौजवान निशानेबाज 50 मीटर पिस्टल में क्वालिफाई करने में सफल रहा. उन्होंने स्कॉटलैंड में डंडी स्थित बैरी बडॉन शूटिंग रेंज में इस स्पर्धा का स्वर्ण पदक भी जीता.

नेपाली मूल के इस निशानेबाज के लिए पिछले कुछ महीने कठिनाई भरे रहे. एक सूटकेस के साथ शिविरों में जीवन बिता रहे राय का जीवन 10 मीटर अथवा 50 मीटर दूर स्थित लक्ष्य पर निशाना साधते बीत रहा था. इस बीच उन्हें जबरदस्त तरीके से ध्यान केंद्रित करना पड़ता था. एकाग्रता इतनी जरूरी कि दिल धड़कने तक से संतुलन बिगड़ा और निशाना चूका.

स्वर्ण पदक या कोई भी पदक उनके लिए बहुत मायने रखता है. हालांकि उनके मन का एक हिस्सा अभी भी आराम करने और जिंदगी की आम खुशियां हासिल करने के लिए तरसता है. मसलन पहाड़ों पर जाना और धान या आलू के खेतों पर नजर दौड़ाना जहां एक वक्त वे कड़ी मेहनत करते थे, या फिर अपनी मां के साथ नेपाल स्थित अपने जन्मस्थान संखूवसाभा में समय बिताना.

दक्षिण कोरिया के इंचियोन में आयोजित 17वें एशियाई खेलों में भारत के लिए पहला स्वर्ण पदक जीतने के कुछ ही मिनट बाद उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा, ‘मैं घर जाकर आराम करना चाहता हूं.’ लेकिन इसके तत्काल बाद उन्होंने कहा, ‘लेकिन मैं आराम नहीं कर सकता. अभी विश्व कप फाइनल्स बाकी हैं.’ यह मुकाबला अक्टूबर में अजरबैजान के गबाला में होना है.

पदकों की बात की जाए तो राय काफी खुशकिस्मत रहे हैं लेकिन निशानेबाजी में जिस कदर कठिन परिश्रम की आवश्यकता होती है उसे देखते हुए यह तो सोचा भी नहीं जा सकता है कि उन्हें यह सब आसानी से हासिल हुआ होगा.

लेकिन इसके बावजूद जब आप उनसे बात करेंगे तो आपको लगेगा कि वह इस बात को समझते हैं यह उनके खेल के लिए जरूरी है. हालिया सफलता के बाद स्वदेश वापसी पर तो मीडिया उन पर टूट ही पड़ा. उनकी मुस्कान किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर सकती है. उनकी सादगी का आलम यह है कि वे खेल जगत के सुपरस्टार की छवि में बेमेल नजर आते हैं.

राय कहते हैं कि उनकी मां उनकी उपलब्धियों की अहमियत नहीं समझती है. शायद वह खुद भी नहीं समझते लेकिन एक बात जिसे वह बखूबी समझते हैं वह यह कि अभी बहुत कुछ हासिल करना है. शायद यही उनका स्वभाव है और वह यह मानते भी हैं कि वह अपने भविष्य के निशानेबाजी कार्यक्रमों के अलावा बहुत कुछ नहीं सोचते.

वह अपने रूसी कोच पॉवेल स्मिरनोव का जिक्र करते हुए कहते हैं कि उन्हें उनका साथ पसंद है. राय अपना ज्यादातर समय उन्हीं के साथ बिताते हैं. राय कहते हैं, ‘मैं उनसे बात करता हूं और मैंने उनसे काफी कुछ सीखा है… उनके पास बताने को काफी कुछ है. मैं उनका ऋणी हूं.’

निशानेबाजी ऐसी विधा है जिसमें मामूली सी चूक समस्या खड़ी कर सकती है. यहां चूक की गुंजाइश बहुत कम है क्योंकि निशानों का दायरा सीमित होता हैै

img1भारतीय टीम के सबसे सम्मानित कोच में से एक मोहिंदर पाल, राय के बारे में कहते हैं, ‘मानसिक रूप से वह बेहद मजबूत है, शायद हमारी टीम में सबसे ज्यादा लेकिन इसके बावजूद जीतू भीतर एक कोना ऐसा है जिसका ख्याल रखना पड़ता है. ऐसा इसलिए क्योंकि उसका पूरा ध्यान शूटिंग पर होता है. इसमें कोई दोराय नहीं कि वह बेहद प्रतिभाशाली है.’

राय तथा अन्य भारतीय खिलाड़ियों के साथ काम करने वाले खेल मनोविज्ञानी वैभव अगाशे कहते हैं, ‘यह सीजन बहुत लंबा खिंचा और यह स्वर्णपदक पूरी तरह शारीरिक स्थायित्व और मानसिक मजबूती की बदौलत है. वह हमारी टीम के सबसे मजबूत निशानेबाज हैं और उनके प्रशिक्षण में कार्डियो भी शामिल है जो उनको मजबूत बनाता है.’

उनके कोच स्मिरनोव इस बात से सहमति जताते हुए कहते हैं कि वह लगातार मेहनत किए जा रहे हैं और अब उनको पूरी तरह आराम की आवश्यकता है.

राय के लिए यह सत्र बहुत लंबा साबित हुआ है. जून में उन्होंने विश्व कप में नौ दिन के भीतर तीन पदक जीते. उसके बाद राष्ट्रमंडल खेल और विश्व चैंपियनशिप का आगमन हुआ और उसके बाद एशियाई खेल. निश्चित तौर पर ये पदक उनके लिए आर्थिक समृद्धि लाएंगे लेकिन जो बात उनको कष्ट पहुंचाती है वह है उत्तर प्रदेश के निवासी के रूप में उनकी मान्यता को लेकर राज्य सरकार की संवेदनहीनता. तमाम दस्तावेजों की मौजूदगी के बावजूद राज्य में उनको बाहरी समझा जाता है और यह बात उनको बहुत व्यथित करती है. उन्होंने अन्य राज्यों का प्रतिनिधित्व करने के बारे में भी चर्चा की लेकिन ऐसा प्राय: तात्कालिक क्रोध में हुआ. अब जबकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उनके लिए 50 लाख रुपये के पुरस्कार की घोषणा कर दी है तो कहा जा सकता है कि पैसा और मान्यता दोनों उनकी ओर बढ़ रहे हैं.

हाल के दिनों में राय 10 मीटर एयर पिस्टल में दुनिया के पहले जबकि 50 मीटर एयर पिस्टल में पांचवे नंबर के खिलाड़ी रह चुके हैं. हालात हमेशा से ऐसे नहीं थे.

वह 11 साल पहले सेना में शामिल हुए और वहीं उनका परिचय निशानेबाजी से हुआ. वह निशानेबाजी के बजाय अन्य विधाओं में अधिक रुचि दिखा रहे थे लेकिन आखिरकार उनको लगा कि वह इस विधा में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं. सन 2007 में लगातार खराब प्रदर्शन ने उन्हें सेना के निशानेबाजी शिविर से बाहर कर दिया लेकिन 2009 में वे वापस लौटे.

जुलाई, 2011 में जब उन्होंने तीन पदक जीते तो यह उनके लिए एक नई शुरुआत थी. उनको सेना की मार्क्समैन इकाई में बुलाया गया और वर्ष 2012 उनके लिए सबक से भरा वर्ष बन गया. फिर उन्हें देश की राष्ट्रीय टीम के लिए चुन लिया गया.

एयर पिस्टल और फ्री पिस्टल प्रतियोगिताओं में निरंतरता के साथ ही उन्होंने गत वर्ष दक्षिण कोरिया में अपनी अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा के लिए भारतीय टीम में जगह सुनिश्चित कर ली. वहां वह अंतिम दौर तक पहुंचे और सातवें स्थान पर रहे. उसके बाद कुवैत में एशियाई एयर गन प्रतियोगिता में उन्होंने तीन रजत पदक हासिल किए. फोर्ट बेनिंग में आयोजित विश्व कप के बाद वह भारतीय टीम के स्थायी सदस्य बन गए. उस दौर को याद करते हुए राय कहते हैं, ‘उसी वक्त मुझे लगा कि मैं बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी पदक जीत सकता हूं.’

शारीरिक और मानसिक शक्ति का तालमेल एक विश्वस्तरीय निशानेबाज के लिए बेहद जरूरी होता है. यही वह जगह है जहां प्रतिभागी की मजबूती और हर चीज से निजात पाने की उसकी क्षमता काम आती है. राय ने अपनी फिटनेस के लिए कड़ी मेहनत की. उनकी सहायता करने वालों में फिर चाहे वह कोच मोहिंदर और स्मिरनोव हों या मानसिक प्रशिक्षक अगाशे, सभी उनकी बहुत तारीफ करते हैं. निशानेबाजी एक ऐसी विधा है जिसमें मामूली सी चूक समस्या खड़ी कर सकती है. गले और कंधों को इसमें काफी दबाव झेलना पड़ता है. इस खेल में चूक की गुंजाइश बहुत कम है क्योंकि इन निशानों का दायरा बहुत सीमित होता है. 10 मीटर की प्रतियोगिता में बुल्स आई 11.5 मिमी जबकि 50 मीटर में 50 मिमी की होती है.

राय 11 गोरखा रेजिमेंट के जवान हैं और मानसिक रूप से मजबूत होने के बावजूद हर सफलता के बाद उन पर उम्मीदों का बोझ जरूर बढ़ता होगा. आश्चर्य नहीं कि उनके कोच आसपास मौजूद सभी लोगों से यह कहते नजर आते हैं कि इन निशानेबाजों पर और बोझ न डाला जाए. उन पर पहले ही उम्मीदों का भारी बोझ है. अब जबकि 2016 का ओलंपिक करीब है, उम्मीद की जानी चाहिए कि राय ब्राजील में बिना किसी दबाव के शानदार प्रदर्शन करेंगे.