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ग्रह से पहले पूर्वग्रह

ellमिशन- बृहस्पति के चंद्रमा ‘टाइटन’ पर जीवन की खोज.

मिशन की मौजूदा बाधा- उड़ान के वक्त नारियल का पहली बार में न फूटना.

वैज्ञानिक अब टाइटन पर- अभी टाइटन की सरजमीं पर उतर के अपना ताम-झाम सेट करते और जीवन की खोज में खटते कि उनकी नजर सामने एक बड़ी सी चट्टान पर गई. वहां पर कोई बैठा हुआ था. चमत्कार! उतरते ही दिख गए साले! वे दो एलियंस थे. वैज्ञानिक खुशी से उछलना चाहते थे, क्योंकि जब वह यान की तरफ बढ़ रहे थे, तब एक अनहोनी और हुई थी. हुआ यह कि जब वैज्ञानिकों का दल यान की ओर बढ़ रहा था, तब बिल्ली ने उनका रास्ता काट दिया था. वह भी काली. लेकिन यहां आकर कुछ भी अशुभ नहीं हुआ, जैसा कि उनके मन में खटका था. इतनी महत्वपूर्ण खोज, इतना कुछ होने के बाद भी वे उछल नहीं सके. मन मसोस कर रह गए. अगर उछलते तो न जाने कहां जाते. वहां पृथ्वी के जैसा गुरूत्वाकर्षण नहीं था. उछलने से खुद को रोक लेना एलियंस की खोज के बाद वैज्ञानिकों की दूसरी बड़ी उपलब्धि थी.

टाइटन पर कुछ शंकाएं- एलियंस मिल तो गए, तो अब आगे क्या किया जाए! अभी वैज्ञानिकों का दल सोच ही रहा था कि दोनों ऐलियन पास आ गए. उनका व्यवहार मित्रवत लग रहा था. उनसे सम्पर्क बनाने में कोई खतरा नहीं, यह सूंघने के बाद दल भी उनके पास आ गया. फिर भी एहतियातन दल के एक वैज्ञानिक ने एक एलियन को छूकर भी देखा. सुरक्षा का विश्वास होते ही दल ने एलियंस पर प्रश्नों की बौछार कर दी.

दल द्वारा सबसे पहला सवाल जो पूछा गया, वह था, ‘तुम किस जाति के हो? कुछ अन्य सवाल जो उनकी तरह उछाले गए, वे इस प्रकार हैं- ‘तुम सबका धर्म क्या है?’ ‘तुम्हारी उपासना पद्धति क्या है?’ ‘तुम्हारा ईश्वर कौन है?’ ‘कौन-सा सम्प्रदाय है तुम्हारा?’ ‘तुम्हारी भाषा क्या है?’ ‘तुम कौन-सी बोली बोलते हो?’ ‘तुम्हारी बिरादरी के बाकी लोग कहां हैं ?’ ‘क्या तुम दोनों की आपस में रिश्तेदारी है?’ ‘तुम में एक ज्यादा काला क्यों हैं?’

वैज्ञानिकों का दल मुश्किल में- अभी उनके ऊपर प्रश्नों की बौछार हो रही थी कि दल को प्रश्न दागने  के क्रम को तोड़ना पड़ा. ऐसा स्वर्णिम अवसर कौन खोना चाहता था, मगर मजबूरी थी, क्योंकि तब तक एक एलियन की मौत हो चुकी थी. प्रश्नों की संख्या से या प्रश्नों की प्रकृति से, आदमी की संगत से या उसके संसर्ग में आने से हुए किसी, संक्रमण से, यह बता पाना बहुत मुश्किल है. बहरहाल, एक एलियन का शव सामने था और दूसरा एलियन सरपट अपने सिर पर पैर रख कर वहां से भाग चुका था. दो वैज्ञानिकों को छोड़कर दल के बाकी सदस्य भूलोक पर लौट आए.

सरकार को दल के अगुए द्वारा भेजी गई रिर्पोट- हमें विश्वास नहीं हो रहा है कि हमने वहां जीवन ही नहीं जीवधारियों की भी खोज कर ली है. हमारे दो सदस्य वहीं पर बने हुए हैं. एक, भागे हुए एलियन की खोज में वहां भाग रहे हैं. दूसरे, शव की सुरक्षा में बैठे हुए हंै. जीवित या मृत एलियन लाने के विषय में हमारे पास कोई पूर्व दिशा-निर्देश या योजना नहीं थी. अतः सरकार से अनुरोध है कि इस विषय को अपने संज्ञान में लेते हुए हमें शीघ्र निर्देशित करने का कष्ट करें. साथ में बहुत दुख के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि कुछ मुख्य बातें जैसे उनकी जाति-धर्म-कर्मकांड वगैरह के विषय में हम कोई जानकारी प्राप्त नहीं कर सके. हमें आशा नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि हम जैसे ही दूसरे एलियन को खोज निकालेंगे, वैसे ही ये महत्वपूर्ण जानकारियां हासिल कर लेंगे. यह जानकारी निस्संदेह हमारे देश की उन्नति में योगदान करेगी. धन्यवाद! जय हिंद!

 

कथा जैसी दिलचस्प

पुस्तक ः उस रहगुजर की तलाश है लेखक ः राजेन्द्र राव मूल्य ः 300 रुपये प्रकाशन ः सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
पुस्तकः उस रहगुजर की तलाश है लेखक ः राजेन्द्र राव मूल्यः 300 रुपये  प्रकाशन ः सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
पुस्तक ः उस रहगुजर की तलाश है
लेखक ः राजेन्द्र राव
मूल्य ः 300 रुपये
प्रकाशन ः सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली

क्या कथेतर लेखन भी कहानी या उपन्यास की तरह दिलचस्प और मार्मिक हो सकता है? वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र राव के कथेतर लेखन के संग्रह ‘उस रहगुजर की तलाश है’ को पढ़कर लगता है कि ऐसा संभव है. संग्रह में शामिल रिपोर्ताज, संस्मरण और साक्षात्कार खासे दिलचस्प हैं. कोलकाता की यौनकर्मियों के जीवन पर लिखा गया रिपोर्ताज ‘हाटे बाजारे’ किसी उपलब्धि से कम नहीं है. यह लंबा रिपोर्ताज मनोहर श्याम जोशी के आग्रह पर लिखा गया था जिसे उन्होंने ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में तीन किस्तों में छापा था. यौनकर्मियों के जीवन का इतना जीवंत वर्णन अन्यत्र दुर्लभ है. यह रिपोर्ताज यौनकर्मियों के प्रति करुणा का भाव जागृत करता है. एक जगह लेखक लिखता है, ‘मेरी आंखों के आगे बहुबाजार के वे मकान छा गए, जिनके बाहर बीस-बीस लड़कियां, औरतें और प्रौढ़ाएं सज-धजकर शाम से रात तक बैठी रहती हैं. उनकी आंखंे सड़क पर आने-जाने वालों पर लगी रहती हैं. आखिर कितने खरीदार आ सकते हैं. ज्यादातर बैठे-बैठे जम जाती हैं, उनके शरीर सुन्न पड़ जाते हैं.’ ऐसी पंक्तियां सोचने पर मजबूर करती हैं कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम ऐसा क्यों देख-सुन रहे हैं?

शिवमूर्ति पर लिखे संस्मरण में लेखक ने उनके व्यक्तित्व के कई गुणों की चर्चा की है. सहजता, फक्कड़पन किसी के मदद के लिए सदैव तत्पर रहना आदि अनेक चीजें शिवमूर्ति को बेहतर लेखक होने के साथ बेहतर मनुष्य भी बनाती हैं. लेकिन राव बताना नहीं भूलते कि साहित्यकारों के फितरती व्यसनों से दूर रहने के बावजूद उनमें कमजोरी भी है और वह है नारी सौंदर्य के प्रति अदम्य आकर्षण. शिवमूर्ति के गांव पर लिखे अपने रिपोर्ताज में लेखक ने उनके जीवन और रचनाओं में शामिल स्त्रियों का आंखों देखा हाल प्रस्तुत किया है. पुस्तक में कथाकार कामतानाथ और दुबई में रह रहे लेखक कृष्ण बिहारी पर भी रोचक संस्मरण है. सुप्रसिद्ध राष्ट्रवादी कवि सोहनलाल द्विवेदी और राजेन्द्र यादव का लेखक द्वारा लिया गया साक्षात्कार खासा जरूरी है. दोनों साक्षात्कारों को संस्मरण की शक्ल में प्रस्तुत किया गया है. लाखों-करोड़ों लोगों को अपनी कविताओं के द्वारा हिंदी से जोड़ने वाले इस अघोषित राष्ट्रकवि को उसके जीवन के अंतिम दिनों में उसके हाल पर उपेक्षित छोड़ दिया गया था. इस कवि का संस्मरणनुमा साक्षात्कार हमारी संवेदना को झकझोरता है. दिलचस्प अंदाज में लिया गया राजेन्द्र यादव का साक्षात्कार भी उनके व्यक्तित्व और चिंतन की कई परतों को उद्घाटित करता है.

‘दारु-विमर्श तथा अन्य स्वास्थ्यवर्धक बातें’

ellक्या दारू स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हो सकती है? क्या शुगर फ्री टाइप की चीजें या जीरो कैलोरी ड््रिंक्स वगैरह लेने से वजन नहीं घटता? आपका लेख पढ़कर तो ऐसा ही लगा. कभी एंटीऑक्सीडेंट्स क्या होते हैं, यह भी तो बतला दें. कहते हैं कि स्वस्थ रहने में इनका भी बड़ा रोल होता है, साहब.

मेरे पिछले कॉलम (मेटाबॉलिक सिंड्रोम) के छपने के बाद बहुतों ने मुझे फोन करके ये बातें कीं. विशेष तौर पर अल्कोहल को लेकर तो कई पाठक आश्चर्य प्रकट करने लगे कि दारू भी क्या स्वास्थ्यप्रद हो सकती है? एक-दो ने तो इसे मेरे व्यंग्यकार पक्ष से जोड़ने की कोशिश की और माना कि बात मजाक में लिखी गई होगी. कॉलम की अपनी सीमा होती है. मेटाबॉलिक सिंड्रोम में कदाचित ये बातें इस विस्तार से नहीं बता पाया तभी इतने भ्रम तथा प्रश्न उठे हैं. आज मैं दारू, बनावटी मिठास वाले प्रॉडक्ट्स औैर एंटीऑक्सीडेंट नाम की बला के बारे में कुछ ऐसी बातें बताता हूं कि आप भी कहेंगे कि वाह, क्या बात है.

दारू लाभदायक भी हो सकती है.
दारू से हमारा तात्पर्य है- बीयर, वाइन और व्हिस्की जैसी अन्य कोई भी दारू. सुना तो यही था कि दारू पीना बुरी बात है. इससे अल्सर, लीवर सिरोसिस और न जाने क्या बीमारियां हो जाती हैं. यह भी पता था. पी के नाली में घुस जाते हैं, यह तो स्वयं देखा भी था, बल््कि एकाध बार तो स्वयं ही घुस गए थे. फिर? फिर कोई कैसे कह सकता है कि यह स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है, मेटाबॉलिक सिंड्रोम कंट्रोल करती है, डायबिटीज, हार्ट अटैक आदि खतरे भी कम कर सकती है?

हां, यह सत्य है.
दारू यदि कंट्रोल डाेज में ली जाए तो ये सारे फायदे हो सकते हैं, ऐसा कई अध्ययनों से सिद्ध हो चुका है. पर यह कंट्रोल डोज क्या है? फिर कब लेना ठीक कहाएगा? यह माना गया है कि रात के खाने से ठीक पहले यदि दो (पुरुषों के लिए) या डेढ़ (महिलाओं के लिए) ड्रिंक्स लिए जाएं तो यह फायदा पहुंचाएगी. अब आप पूछोगे कि एक ड्रिंक का क्या मतलब? तो सुनिए, एक ड््रिंक का मतलब है 360ml बीयर, 150ml वाइन या फिर 45ml की तथाकथित हार्ड ड्रिंक्स. अब इसे डेढ़ से दो ड््रिंक्स के हिसाब से लगा लें. बस इतना लें. वाइन में भी रेड वाइन.

हां! इस डाेज को पार किया कि दारू के उल्टे असर शुरू. वहां फिर वे सारी बीमारियां शुरू जिनके कारण दारू बदनाम है. यदि दारू को नशे या किक प्राप्त करने के लिए न पीकर स्वास्थ्यवर्धक दवाई के तौर पर पीना चाहते हैं तो पी सकते हैं. नशे के लिए पीने वाला कुछ समय बाद ही इस सुरक्षित डोज को पार कर जाता है और कहीं का नहीं रह जाता. गड़बड़ बस इतनी है. वर्ना इस सुरक्षित डोज में दारू क्या-क्या लाभ पहुंचा सकती है, इसकी लिस्ट लंबी है. बताता हूंः

क्या आप जानते हैं कि इस मात्रा में दारू एक बेहतरीन इंसुलिन सेेंसीटाइजर है?
तात्पर्य यह कि दारू का डोज इंसुलिन के प्रभाव को बढ़ाता है जिसके कारण ब्लड शुगर बेहतर कंट्रोल होता है. देखा गया है कि रात में खाने से ठीक पहले यदि ‘रेड  वाइन’ का एक ग्लास पी लें तो एक स्वस्थ व्यक्ति में भोजन के बाद का  ’ब्लड शुगर लेवल’ 30% तक कम हो सकता है. यही प्रभाव डायबिटीज और मेटालॉजिक सिंड्रोम में भी देखा गया है. बीयर और अन्य दारूओं से भी यह 20 % तक कम हो सकता है.

दारू के साथ दिक्कत यही है कि आदमी तय डोज पर रुकने को राजी नहीं होता. इसीलिए डॉक्टर लोग इस इलाज का जिक्र ही नहीं करते  

खाना खाने के बाद की ’ब्लड शुगर’ कम होने से क्या फायदा है? फायदा है न. फायदा समझने के लिए पहले यह वैज्ञानिक तथ्य समझें कि जब हम भोजन करते हैं तो खाना खाने के बाद का ’ब्लड शुगर’ लेवल बढ़ सकता है जो शरीर चलाने के लिए जरूरी भी है. पर यह बढ़ा लेवल शरीर में ’फ्री रेडिकल्स’ नामक हानिकारक पदार्थ भी पैदा करता है. अचानक बढ़ी शुगर से पूरे शरीर में ऊतकों में ‘इन्फ्लेमेशन’ (एक किस्म की सूजन कह लें) भी हो जाता है. यह होता बहुत कम समय के लिए है पर होता तो है. ये फ्री रेडिकल्स और यह ‘सिस्टेमिक इन्फ्लेमेशन’ हार्ट अटैक, स्ट्रोक, डायबिटीज, हार्ट फेल्योर और डेमेंशिया आदि खतरनाक बीमारियों की जड़ में माने जाते हैं. कई स्टडीज से यह सिद्ध हुआ है कि यदि रात के खाने से ठीक पूर्व, बताए गए डोज में दारू ली जाए तो डायबिटीज होने का खतरा 30% से 40% तक कम किया जा सकता है. कहा तो यहां तक जाता है कि इससे हार्ट अटैक का खतरा भी लगभग 30% और ‘ओवर ऑल’ मृत्यु को लगभग 20% तक कम किया जा सकता है. अब और क्या चाहिए, यार?

परंतु मैं पुन: कहूंगा कि दारू के साथ दिक्कत यही है कि आदमी तय डोज पर रुकने को राजी नहीं होता. यही वह खतरा है जिसकी वजह से डॉक्टर लोग इस इलाज का जिक्र ही नहीं करते जिसकी चर्चा मैंने ऊपर विस्तार से की.

‘आर्टिफिशियल स्वीटनर्स’ वजन बढ़ा सकते हैं.
हम या तो मिठाइयां  भकोसते हैं या एकदम से सैकरीन-एस्पार्टेम आदि कृत्रिम मिठास वाली चीजों पर उतर आते हैं. याद रखें कि हमारी जीभ को मीठा स्वाद पता तब चलता है जब 200 में से 1 पार्ट भी शक्कर का हो. जबकि कृत्रिम स्वीटनर्स मिठास का इतना ‘स्ट्रोग सेंसेशन’ पैदा कर सकते हैं कि हमारी जीभ को 1,000 में से एक पार्ट भी पता चल जाएगा. नतीजा? नतीजे दो हैं. विशेष तौर पर ऐसी ’जीरो कैलोरी’ ड्रिंक्स जो मीठी तो हैं पर कैलोरीज से खाली हैं. लोग इन्हें पीते हैं. सोचते हैं, कितना भी पिओ इनमें कैलोरीज तो हैं नहीं! पर इन्हें पीने, पीते रहने से हमारे शरीर में एक अनोखा बदलाव हुआ जाता है. अब हमारा शरीर मिठास और कैलोरी भक्षण के संबंध को समझना बंद कर देता है. यह महाखतरनाक है. इससे हार्मोंस तथा दिमाग के ‘न्यूरोबिहेवियर’ कनेक्शनों में गड़बड़ पैदा हो जाती है. ज्यादा खाते हैं और दिमाग के सेटइटी (तृप्ति) सेंटर को पता ही नहीं चलता. तृप्ति का भाव दब जाता है. आदमी पतले के बजाए मोटा हो सकता है. स्टडीज से पता चला है कि ये ’कृत्रिम मिठास’ वाले पदार्थ कोकीन के नशे से भी ज्यादा आदी बनाने वाले पदार्थ हैं. इनकी जीरो कैलोरी ड्रिंक्स के आप आदी भी हो सकते हैं.

देखिए कि फिर भी एंटीऑक्सीडेंट्स आदि के बारे में इस बार भी बताने को रह ही गए. क्या करें? कॉलम की सीमा पर खड़े होकर वायदा ही कर सकते हैं कि फिर कभी!

स्त्री लेखन लिखें तो लिखें कैसे?

ellअभिव्यक्ति के बारे में सोचना एक गुदगुदाने वाला ख्याल है. हर कोई अभिव्यक्ति के खतरे जानता है, लेकिन खतरे उठाकर भी लोग खुद को अभिव्यक्त करते हैं, करना चाहते हैं. पर जैसे स्त्री और पुरुष की अभिव्यक्ति की भाषा, कथ्य, अनुभव और शैली में फर्क है वैसे ही उनके अभिव्यक्ति के खतरों में भी फर्क है. स्त्रियों के लिए अभिव्यक्ति के खतरे ज्यादा बड़े, व्यापक और तीव्र हैं. खुद को अभिव्यक्त करना उनके लिए एक चुनौती है. लेखन की ही बात करें तो हिंदी साहित्य का इतिहास ‘अज्ञात हिंदू औरत’, ‘बंग महिला’ आदि कईं गुमनाम लेखिकाओं की बेहद महत्वपूर्ण रचनाओं का गवाह है. आखिर ‘सीमन्तनी उपदेश’ जैसी आधुनिक, प्रगतिशील, और विस्फोटक विचारों वाली पुस्तक की लेखिका को गुमनाम क्यों रहना पड़ा? क्यों उन्हें ‘अज्ञात हिंदू औरत’ के नाम से किताब लिखनी पड़ी? इसी गुमनामी का नतीजा है कि दुनिया 19वीं सदी के अंत में आने वाली स्त्री विमर्श की बेहद महत्वपूर्ण किताब ‘सीमन्तनी उपदेश’ को नहीं जानती. 20वीं सदी की ‘सेकेंड सेक्स’ (हिंदी में स्त्री उपेक्षिता) को जानती है लेकिन ‘सीमन्तनी उपदेश’ या उसकी लेखिका ‘एक अज्ञात हिंदू औरत’ को कोई नहीं जानता. क्यों? सवाल उठता है कि यदि यह पुस्तक किसी पुरुष ने लिखी होती तो क्या वह भी ‘अज्ञात पुरुष’ के नाम से लिखता और हम उसे नहीं पहचानते. निश्चित तौर पर नहीं. यह है स्त्री लेखन और लेखिकाओं का कड़वा सच.

हमारी पूरी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक, शैक्षिक संरचना स्त्री लेखन के लिए बड़ी चुनौती है. महिलाओं की साक्षरता दर (65.46 प्रतिशत) आज भी पुरुषों की साक्षरता दर (82.14 प्रतिशत) से कम है. आज भी देश की ज्यादातर लड़कियां आठवीं, दसवीं, या ज्यादा से ज्यादा बारहवीं तक ही पढ़ पाती हैं. नि:संदेह सिर्फ किताबी ज्ञान ही लेखन की बुनियाद नहीं है, लेकिन किताबें हमारे वैचारिक मानस को तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाती हैं. लेकिन कोर्स से अलग किताब पढ़ना न तो हमारी शैक्षिक व्यवस्था हमें सिखाती है, न ही हमारी सामाजिक-पारिवारिक संरचना लड़कियों से यह अपेक्षा करती है कि वे हर तरह की मनचाही किताबें पढ़ें क्योंकि यह उनके लिए ‘समय की बर्बादी’ माना जाता है.

संवैधानिक समानता के बावजूद आज भी लड़कियों को परिवार में लड़के के समान प्यार, सम्मान और स्वतंत्रता नहीं मिलती. लड़कियों की जिंदगी घर, स्कूल-कॉलेज, ससुराल और फिर बच्चों के स्कूल तक ही सिमट कर रह जाती है. गांव, कस्बे या शहरों में ऐसी लड़कियों की तादाद आज भी बड़ी है जो सिर्फ शादी के वक्त ही अपने गांव से पहली बार दूसरे गांव, कस्बे या शहर जा रही होती हैं. घर की परिधि ही लड़कियों के लिए पार्क, सिनेमाहॉल, मेला, पर्यटन स्थल आदि है. आखिर घर और पड़ोस किसी लड़की या स्त्री के अनुभवों में कितने अध्याय दर्ज कर सकते हैं और कब तक? जबकि लड़कों के लिए न घर के इर्द-गिर्द ही चक्कर काटने की बाध्यता है न ही समय पर घर में घुसने की. जो लड़कियां कॉलेज जाने की आजादी पा गई हैं उनमें भी ये डर हमेशा रहता है कि निश्चित समय तक उन्हें घर में होना है नहीं तो सवालों की बौछार के लिए तैयार रहें. जब दिमाग सवालों की लंबी फेहरिस्त के झूठे जवाब बनाने में लगा रहेगा तो आप घर से दूर रहकर भी कितना किसी घटना, स्थान या बात में डूब सकते हैं?

संवैधानिक समानता के बावजूद लड़कियों को परिवार में लड़के के समान स्वतंत्रता नहीं मिलती. लड़कियों की जिंदगी घर, स्कूल-कॉलेज, ससुराल और फिर बच्चों के स्कूल तक ही सिमट कर रह जाती है

फिर शादी के बाद भी यदि ऑफिस जाने की आजादी है तो सिर्फ घर से ऑफिस और ऑफिस से घर की ही तो आजादी है. वह भी स्त्री की आर्थिक आजादी या व्यक्तित्व निर्माण के लिए नहीं बल्कि मंहगाई दर का सारा बोझ सिर्फ बेटे पर ना पड़े इसलिए मिलती है. रूटीन से हटकर घर से बाहर समय बिताने के लिए स्वीकृति पत्र लेना पड़ता है वह भी ढेर सारे सवालों के ‘संतोषजनक’ जवाब देने के बाद ही मिलता है. घर से स्कूल, स्कूल से घर, घर से ऑफिस, ऑफिस से घर ये सब न लिखने की बुनियादी शर्तें हो सकती हैं लिखने की नहीं. ये लिखने में सिर्फ ‘अनुभवहीनता’ बढ़ाने में सहयोग करती हैं अनुभव बढ़ाने में नहीं यानी हमारी पूरी सामाजिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक बुनावट हमें न सिर्फ अनुभव संपन्न होने से रोकती है बल्कि हमें स्वतंत्र रूप से अपनी कोई वैचारिक दृष्टि रखने में भी बाधक बनती है. शिक्षा, विचार और अनुभव से वंचित हम जब तक किसी अनुभव को डूबकर महसूस नहीं करेंगे या फिर बार-बार नए-पुराने अनुभवों से नहीं गुजरेंगे तक तक ‘स्मृति’ कैसे बनेगी दिमाग में? लेकिन हमारी साक्षरता, शिक्षा, विचार, अनुभव, स्मृति और व्यक्तित्व निर्माण पर तो परिवार, समाज, संस्कृति और पितृसत्ता के पहरे लगे हैं. ये तमाम पहरे स्त्रियों के लेखन की बुनियादी समस्या है.

घर, परिवार और बच्चों की अंतहीन जिम्मेदारी हमेशा ही लेखन में बाधा बनती है. कोई नया वैचारिक अंकुर फूटा नहीं कि खाना बनाने का समय हो गया जिसे आप चाहें भी तो नहीं टाल सकतीं. आप विचार या लेखन के चरम क्षणों में डूबकर बही जा रही हंै कि बच्चा या पति अपनी-अपनी जरूरतों के साथ सामने हाजिर हैं. आप पति को एक बार को टाल सकती हैं लेकिन बच्चे को टाला तो अपराधबोध से घिर जाएंगी. वर्जीनिया वुल्फ ‘अपने कमरे’ के होने पर जोर देती है. लेकिन ‘अपने कमरे’ में समय भी हमारा अपना ही होगा इसकी क्या गारंटी है? गारंटी इसकी तो है कि भारतीय स्त्री के अपने कमरे में भी समय सिर्फ उसका नहीं है. स्त्री के अपने समय पर पहला हक बच्चे, पति, सास-ससुर व रिश्तेदारों का है. उसके बाद भी यदि समय बचे तो फिर वह जो चाहे करे. मां, पत्नी, बहू के रोल निभाने के साथ हममें लेखन का माद्दा बचा हो तो हो. हम अपने कमरे का दरवाजा बंद करके लिख जरूर सकती हैं, लेकिन उन तमाम भूमिकाओं में से चाहे जिसकी भी जरूरत हो उठकर तो हमें ही कमरे से कागज और कलम छोड़कर आना होता है. हाल ही में ब्रिटेन की एक सामाजिक मुद्दों पर शोध करने वाली संस्था ने कामकाजी महिलाओं पर एक शोध किया. शोध में सामने आया कि गृहस्थी के साथ नौकरी करने वाली महिलाएं एक दिन में सिर्फ 26 मिनट का समय ही अपने लिए निकाल पाती हैं. यानी सप्ताह में सिर्फ तीन घंटे का समय हमारा अपना है जिसमें हम चाहे जो करें.

एक शोध में सामने आया है कि गृहस्थी के साथ नौकरी करने वाली महिलाएं एक दिन में सिर्फ 26 मिनट का समय ही अपने लिए निकाल पाती हैं. यानी के सप्ताह में सिर्फ तीन घंटे का समय हमारा अपना है जिसमें हम चाहे जो करें

ellइन तमाम बुनियादी अड़चनों के बाद भी यदि लिखने का कीड़ा दिमाग में कुलबुलाता है तो फिर कुछ और ‘रचनात्मक तरह’ की मुश्किलें हमार इंतजार करती हैं. तमाम तरह के दैनिक, पाक्षिक या मासिक पत्र-पत्रिकाओं में शीर्ष पदों पर पुरुषों की उपस्थिति है. जहां-जहां (अधिकांशत:) पुरुष और पितृसत्ता का गहरा गठबंधन रहता है वहां-वहां हम ज्यादातर दो तरह के व्यवहारों से टकराती हैं. एक तरफ लिखे हुए प्रकाशन के एवज में सत्ताधारी लोगों की तरफ से प्रत्यक्ष/ परोक्ष दैहिक या अर्धदैहिक संबंधों की तलवार लटकती है. यदि ऐसी किसी संभावना से हम बच निकल आती हैं तो फिर हमारे लेखन को महत्वहीन या फालतू समझा जाता है. हमारे लेखन को यथायोग्य मान्यता नहीं मिलती. यहां पितृसत्ता का ‘दंभ’ अपनी अहम भूमिका निभाता है कि एक औरत उससे अच्छा या ज्यादा महत्व का भला कैसे लिख सकती है? पार्टी, गुट और खेमे से बचकर हम ज्यादा दूर तक नहीं चल सकतीं क्योंकि जो ‘तटस्थ’ होते हैं वे कहीं

नहीं होते! अकसर ही स्त्रियों के सिर्फ स्त्री संबंधी मुद्दों पर लिखे हुए को ही मान्यता मिलती है. इतर विषयों पर किए गए स्त्री लेखन को न तो स्वीकृति मिलती है, न सम्मान मिलता है, न ही मान्यता. इसके पीछे भी वही सामंती सोच है कि औरत की जगह सिर्फ रसोई और प्रसव घर ही है बाकी जगह का उसे क्या ज्ञान और कितना ज्ञान? जैसे हरेक क्षेत्र के अपने-अपने ज्ञानी मठाधीश हैं वैसे स्त्री को सिर्फ स्त्री विषयों का ही ज्ञाता मानने का दबाव पितृसत्ता के दिमाग में हमेशा रहता है. इतर विषयों पर उसके ज्ञान को अक्सर ही अधूरा, कच्चा और स्तरहीन ही माना जाता है. यदि महिलाओं द्वारा किए गए लेखन को हिंदी के शीर्षस्थ, परम विद्वान आचार्यों, आलोचकों, समीक्षकों ने स्वीकार किया होता, उसे उचित सम्मान व मान्यता दी होती तो सुमना राजे को ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ अलग से लिखने की जरूरत ना पड़ती.

भाषा और उसके पीछे की समस्या भी स्त्री लेखन के सामने अक्सर ही आती है. लिंगभेदी भाषा खासतौर से उस वक्त हमें सताती है जब हमें अपना गुस्सा और आक्रोश प्रकट करना होता है. लाख ना चाहने पर भी हमें भी उन्हीं मां-बहन की गंदी गालियों का प्रयोग करना पड़ता है जिन पर हम नाक-भौं सिकोड़ती हैं. आखिर हमारी आक्रोश की भाषा क्या हो? साहित्य का पूरा इतिहास लेखकों द्वारा स्त्री देह और स्त्री देह के साथ मनचाहे संबंधों के बखान से भरा पड़ा है. यहां तक कि एक काल का नाम ही ‘श्रृंगार काल या रीति काल’ है लेकिन जब हम अपने देह और अपने संबंधों को अपने नजरिए से देखती और लिखती हैं तो हमारे लेखन को अश्लील, पोर्न, स्तरहीन, घटिया की श्रेणी में रखा जाता है. क्यों? एक लेखक को कभी भी अपने अनुभवजन्य सत्य या विचार लिखने के लिए मां-बाप, ससुराल या रिश्तेदारों में अपमानित नहीं होना पड़ेगा चाहे वह सत्य या विचार कितना भी सामाजिक मर्यादाओं, नियमों के विरुद्ध हो. लेकिन एक स्त्री को सामाजिक मर्यादा विरुद्ध सत्य या विचार लिखने के एवज में न सिर्फ मायके, ससुराल, रिश्तेदारों में अपनी मान-प्रतिष्ठा गंवानी पड़ेगी बल्कि उसे खौलते हुए सवालों के कड़ाह में भी फेंका जाएगा!

‘श’ से शौचालय ‘विहीन’

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छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में कई शौचालय ऐसी हालत में हैं जिनका उपयोग नहीं किया जा सकता. दोनों फोटो: प्रतीक चौहान

बात इसी पंद्रह अगस्त की है. स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्रचीर से दिए गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की. वह ऐसा भाषण था जिसकी पूरे देश में चर्चा हुई. कई लोग इससे प्रभावित भी हुए होंगे लेकिन कुछ के लिए वह उनके पुराने जख्म कुरेदने वाला साबित हुआ. हम यहां राजनीतिक जख्मों की बात नहीं कर रहे हैं. दरअसल प्रधानमंत्री ने उस दिन बेझिझक स्वीकार करते हुए यह कहा था कि देश के अधिकांश स्कूलों में शौचालय नहीं हैं. यह बात छत्तीसगढ़ के धमतरी में रहने वाली 13 साल की सुनीता (बदला हुआ नाम) को इतना परेशान कर गई कि वे तुरंत रुआंसी हो गई. सुनीता बताती है, ‘ मुझे लगा जैसे प्रधानमंत्री मेरी ही बात कर रहे थे. हमारे यहां तो कोई सुनता-समझता ही नहीं कि हम लड़कियां को बिना शौचालय वाले स्कूलों में क्या झेलना पड़ता है. ‘ सुनीता बेशक राज्य की सभी लड़कियों की बात कर रही थीं लेकिन ऐसे स्कूल से जुड़ी खुद उनकी आपबीती हमारी शिक्षा व्यवस्था के एक खतरनाक पक्ष को उजागर करती है. एक साल पहले तक एक सरकारी स्कूल की सातवीं कक्षा की छात्रा थीं. यहां लड़कियों का शौचालय नहीं है इसलिए वे स्कूल से कुछ दूरी पर खड़े खंडहर को शौचालय की तरह इस्तेमाल करती हैं.  आमतौर पर लड़कियां यहां अकेले नहीं जाती बल्कि अपनी किसी सहेली के साथ जाती हैं. लेकिन एक दिन सुनीता को लघुशंका के लिए वहां अकेले जाना पड़ा.  उन्हें इसबात का कतई अंदाजा नहीं था कि वह खंडहर उनके लिए किसी तरह खतरनाक साबित हो सकता है. सुनीता जब वहां नित्यकर्म से निवृत्त हो रही थीं तभी वहां कुछ लड़के आ गए जो शायद कई दिनों से यहां आनेवाली लड़कियों पर नजर रखे हुए थे. इससे पहले की सुनीता कुछ समझ पाती दो लड़कों उसे दबोच लिया. लेकिन शायद सुनीता की किस्मत कुछ अच्छी थी कि ठीक उसी समय स्कूल की कुछ और लड़कियां वहां आ गई और उनके शोर मचाने के बाद ये लड़के भाग गए. किसी अनहोनी घटना से बच जाना इस सातवीं की छात्रा के लिए बहुत अच्छी बात रही लेकिन इस घटना के बाद वह कभी स्कूल नहीं जा पाई. उसके माता-पिता आज भी ऐसे स्कूल में अपनी बेटी को भेजने के लिए तैयार नहीं है. उस घटना के बाद खुद सुनीता भी स्कूल नहीं जाना चाहती लेकिन उसे यह बात सालती रहती है कि अब वह किताबों की उस दुनिया में कभी नहीं लौट पाएगी जो उसे बहुत अच्छी लगती थी.  प्रधानमंत्री के भाषण ने उसके इसी जख्म को अनजाने में ही फिर कुरेद दिया था.

grialयदि हम छत्तीसगढ़ में शिक्षा व्यवस्था के बुनियादी ढांचे को देखें तो यह बात साफ समझ में आती है यहां सुनीता जैसी एक नहीं बल्कि और भी लड़कियां होंगी जिन्होंने ऐसी ही कुछ घटनाओें की वजह से स्कूल जाना छोड़ा होगा. ऐसी लड़कियां की संख्या का कोई सीधा आंकड़ा तो  दिया जाना मुमकिन नहीं है. लेकिन दूसरे आंकड़ों से यह बात साबित होती है कि राज्य में शौचालय विहीन स्कूलों की वजह से कई छात्र-छात्राओं को एक अलग तरह की दिक्कत का सामना करना पड़ रहा होगा.

ऊपर लिखी बातें हैरान इसलिए करती हैं क्योंकि कभी सूचना प्रोद्यौगिकी में तरक्की तो कभी धान के उत्पादन के लिए, तो कभी सावर्जनिक वितरण प्रणाली को कम्प्यूटरीकृत करने के लिए देश में अव्वल रहने वाला छत्तीसगढ़ अब पिछड़ा राज्य नहीं कहलाता. हर साल प्रति व्यक्ति आय में तेजी से हो रही बढ़ोत्तरी छत्तीसगढ़ की आर्थिक समृद्धि का प्रतीक बनती जा रही है. राज्य सरकार के दावे के अनुसार 2011-12 में जहां राज्य की प्रति व्यक्ति आय 44 हजार 505 रुपए थी वह 2012-13 में 50 हजार 691 रुपए हो गई. वर्ष 2013-14 में यह 56 हजार 990 रुपए होने का अनुमान है. लेकिन इसके बावजूद छत्तीसगढ़ उन राज्यों में भी शुमार है, जहां हजारों स्कूलों में आज भी शौचालय नहीं हैं और जहां हैं, वे उपयोग करने लायक स्थिति में नहीं हैं. छत्तीसगढ़ में 47 हजार 526 स्कूल हैं. इनमें 17 हजार से ज्यादा स्कूलों में छात्रों और छात्राओं दोनों के लिए शौचालय ही नहीं हैं. इनमें प्रदेश के 8 हजार 164 कन्या विद्यालय भी शामिल हैं. कुछ समय पहले रायपुर से अलग होकर नया जिला बना है गरियाबंद. यहां 1561 स्कूलों में से 604 स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय नहीं है, जबकि 206 स्कूलों में छात्रों के लिए शौचालय नहीं है.

सुनीता की तरह ही 17 वर्षीय राधा (बदला हुआ नाम) की पढ़ाई छूटने की वजह भी स्कूल में शौचालय न होना रहा है. राधा रायपुर के सबसे सघन इलाके मोदहापारा में रहती है. तीसरी कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उसने कभी मुड़कर स्कूल की तरफ नहीं देखा. ऐसा नहीं है कि वह पढ़ना नहीं चाहती थी या उसके परिजन उसे पढ़ाना नहीं चाहते थे. लेकिन राधा मजबूरी यह थी कि उसके स्कूल में शौच या लघुशंका के लिए कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी. ऐसे में पढ़ाई के दौरान अपने इन प्राकृतिक क्रियाकलापों को निपटाने के लिए उसे दो किलोमीटर दूर स्थित अपने घर का रुख करना पड़ता था. यह ऐसी दिक्कत थी जिसका हल उसकी समझ से यही आया कि वह अपनी पढ़ाई छोड़ दे. उसके मां-बाप को भी यही ठीक लगा.  आज तीसरी पास यह लड़की एक दफ्तर में चाय-पानी पिलाने का काम करती है और अपने आसपास पढ़ी लिखी लड़कियों को देखकर अफसोस करती है कि काश वह और आगे पढ़ पाती.

छत्तीसगढ़ में 47 हजार 526 स्कूल हैं. इनमें 17 हजार से ज्यादा स्कूलों में छात्रों और छात्राओं दोनों के लिए शौचालय नहीं हैं

राधा की कहानी में सबसे बड़ी विंडबना यह है कि वह तो प्रदेश की राजधानी रायपुर में रहती है. तब भी उसे उसके विद्यालय में शौचालय की सुविधा नहीं मिल पाई. इन हालात में उन लड़कियों की मुश्किल तो और भी ज्यादा है जो अल्पसंख्यक समुदाय से आती हैं. राधा की ही सहेली फौजिया (बदला हुआ नाम) (15 वर्ष) की भी यही कहानी है. फौजिया के पिता शेख उस्मान फलों का ठेला लगाते हैं. उस्मान अपनी इकलौती संतान को खूब पढ़ाना चाहते थे ताकि समुदाय में उनका मान सम्मान बढ़ सके. लेकिन शासकीय प्राथमिक शाला, कचना में पढ़ने वाली फौजिया ने पांचवीं के बाद ठीक उसी वजह से पढ़ाई छोड़ी जिस वजह से राधा ने स्कूल जाना बंद किया था. अब फौजिया नमकीन बनाने वाले एक कारखाने में काम करती है.

राधा और फौजिया के साथ ही अकेले रायपुर में हजारों लड़कियां ऐसी हैं जिन्होंने या तो स्कूल छोड़ दिया या फिर पढ़ाई के दौरान उस यातना को भोगने को मजबूर हैं, जिसकी तरफ आजादी के 67 साल बीतने के बाद भी केंद्र और राज्य सरकारों ने गंभीरता से ध्यान नहीं दिया.

केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के हालिया सर्वे के मुताबिक अकेले रायपुर के 78 स्कूलों में छात्राओं और 220 स्कूलों में छात्रों के लिए शौचालय की व्यवस्था नहीं है. वहीं राजधानी के 1000 स्कूलों में छात्राओं के 583 और छात्रों के लिए बने 516 शौचालय खराब स्थिति में हैं. इन शौचालयों का इस्तेमाल करना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो गया है. यह स्थिति तब है जब रायपुर को राजधानी बने 13 साल बीत चुके हैं. मानव संसाधन मंत्रालय का सर्वे यह भी बताता है कि प्रदेश के जिन स्कूलों में छात्राओं के लिए शौचालय बनाया गया था वे रख-रखाव के अभाव में अनुपयोगी हो चुके हैं. इनकी संख्या रायपुर में 583, कांकेर में 156, धमतरी में 150, बेमेतरा में 213, मुंगेली में 149 और बलौदाबाजार में 135, सूरजपुर में 503, बस्तर में 359, सरगुजा में 323, गरियाबंद में 235, कोरबा में 238, कोरिया में 189, जशपुर में 166 है.  आदिवासी क्षेत्र के स्कूलों की बात करें तो यहां हालत और भी बुरी है.  बस्तर में 738,  सूरजपुर में 683, सरगुजा में 560, गरियाबंद में 394, जशपुर में 369, कोरिया में 358 और कांकेर में 323 स्कूलों में शौचालय का निर्माण तो किया गया था लेकिन अब वे अनुपयोगी हो चुके हैं. इसी पखवाड़े की शुरुआत में राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप खुद भी शौचालय विहीन स्कूलों को लेकर चिंता जता चुके हैं. कश्यप ने नए रायपुर स्थित मंत्रालय में आला अफसरों की बैठक बुलाकर उन्हें जल्द से जल्द स्कूलों में शौचालयों के निर्माण के निर्देश दिए हैं. केदार कश्यप तहलका से कहते हैं, ‘यह सच है कि कई छात्राओं ने केवल इसी कारण स्कूल जाना छोड़ दिया. लेकिन हम उन लड़कियों के लिए भी किसी ऐसी योजना पर विचार कर रहे हैं, जो उनकी स्कूली पढ़ाई फिर से शुरू करवा सके.’ स्कूली शिक्षा के सचिव सुब्रत साहू का कहना है, ‘ प्रदेश के सभी स्कूलों में शौचालय की समुचित व्यवस्था की दिशा में काम शुरू कर दिए हैं. आने वाले समय में सभी स्कूलों में इसकी बेहतर व्यवस्था देखने को मिलेगी.’

भले ही स्कूल शिक्षा मंत्री स्कूल छोड़ रही छात्राओं पर दुख जता रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि वे इसे पहले नहीं रोक सकते थे. छत्तीसगढ़ में स्कूल शिक्षा विभाग तीसरा ऐसा विभाग है, जिसका सालाना बजट दूसरे विभागों से कहीं ज्यादा होता है. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य निर्माण के वक्त यानि वर्ष 2001-2002 में स्कूल शिक्षा विभाग का बजट केवल 813 करोड़ 58 लाख रुपये था, जो 2013-14 में बढ़कर 6 हजार 298 करोड़ रुपये हो गया है. बजट में जो बिंदु विशेष रूप से उल्लेखित किए गए हैं, उसमें कहीं भी शौचालय निर्माण को शामिल करने की जहमत भी नहीं उठाई गई है. जबकि शालाओं में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए (जिसमें प्रयोगशाला उपकरण के साथ फर्नीचर खरीदी को भी शामिल किया गया है) 175 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. जाहिर है कि मूलभूत सुविधाओं में शौचालय भी आता है, लेकिन इसके निर्माण में राज्य सरकार ने कुछ कम ही दिलचस्पी दिखाई है. छत्तीसगढ़ में लंबे समय से काम कर रहे है ऑक्सफैम इंडिया के कार्यक्रम अधिकारी विजेंद्र अजनबी कहते हैं, ‘स्कूलों में आवश्यक सुविधाओं का अभाव लड़कियों में कई बीमारियों को भी जन्म दे रहा है. हमारी टीम के सामने लगातार कई ऐसे मामले आए हैं, जो चिंताजनक हैं.’

अपने निर्माण के 13 साल बाद ही सही इस संवेदनशील मुद्दे पर राज्य सरकार सक्रिय होते दिख रही है. ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि शिक्षा क्षेत्र में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं की ही नहीं बल्कि छात्र-छात्राओं से सहित उनके अभिभावकों की भी चिंताएं जल्दी दूर होंगी.

priyanka.kaushal@tehelka.com

‘अब ये लड़ाई नहीं छोड़ी जा सकती’

कौन

1998 से 2001 के बीच दिल्ली में नौकरी से हटाए गए होम गार्ड्स जवान

कब

2006 से

कहां

जंतर मंतर, नई दिल्ली

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क्यों

‘आज मेरी उम्र 45 साल है. घर में दो बच्चे हैं. नौकरी तो गई लेकिन परिवार और अपने खर्चे तो बंद नहीं हुए. खाना चाहिए. बच्चों को स्कूल भेजना होता है. कम से कम दो वक्त की रोटी तो चाहिए ही. इसलिए अब हम दिहाड़ी मजदूरी करते हैं. जब जैसा काम मिल जाता है, कर लेते हैं. दस-ग्यारह साल नौकरी करने के बाद आज मजदूरी करके पेट भर रहे हैं. मजदूरी करके रोटी कमाना और नौकरी पाने के लिए धरने पर बैठना. यही रोज का किस्सा है.’ चार लाइनों की यह आपबीती है 1990 में दिल्ली में होम गार्ड्स ज्वाइन करने वाले लक्ष्मी प्रसाद की. वे उन हजारों जवान में से एक हैं जिन्हें 1998 से 2001 के बीच कार्य मुक्त कर दिया गया. यह सब अचानक हुआ. किसी को कोई कारण नहीं बताया गया. बस एक दिन उनको सीधे-सीधे जानकारी दी गई कि उस दिन से वे अपनी सेवाएं समाप्त समझें. होम गार्डस एक तरह अर्धसैन्य बल है जिसका गठन पुलिस की मदद के लिए किया गया है. यह विभाग बंबई होम गार्ड्स अधिनियम, 1947 के प्रावधानों से संचालित होता है. इसके मुताबिक होम गार्ड्स ‘स्वंयसेवक’ का कार्यकाल तीन साल का होता है और इसके बाद स्वंयसेवक को कार्यमुक्त कर दिया जाता है लेकिन दिल्ली सहित देश कुछ दूसरे राज्यों में ऐसा हो नहीं रहा है.

आज की तारीख में होम गार्ड्स से पूरे आठ घंटे की ड्यूटी ली जाती है. तीन साल की जगह 10 साल और 15 साल तक सेवा ली जाती है और फिर उन्हें कार्यमुक्त कर दिया जाता है. देश के कई राज्यों में होम गार्ड्स को 60 साल की उम्र तक सेवा देने का प्रावधान है. लेकिन दिल्ली में 1998 के बाद से हर साल कुछ न कुछ पुराने होम गार्ड्स को हटा दिया जाता है फिर उनकी जगह नए लोगों की भर्ती होती है. विभाग इसके पीछे कानून का हवाला देता है लेकिन विरोध कर रहे जवान इसके पीछे भ्रष्टाचार को जिम्मेदार मानते हैं. दस साल तक होम गार्ड्स रहे और आज इस लड़ाई का नेतृत्व कर रहे सुरेश कुमार कौशिक का मानना है कि ऊंचे पद पर बैठे अधिकारियों की मुट्ठी तभी गर्म होती है जब नए लोगों की बहाली होती है. आज तो लाख-लाख रुपये की घूस चलती है. सुरेश बताते हैं, ‘सीधा-सा हिसाब है. पुराने जाएंगे, तभी नए आएंगे. नए लोगों की बहाली होगी तो माल मिलेगा. इसी वजह से हम बाहर हैं. दस साल नौकरी बजाने के बाद सड़क पर धरना दे रहे हैं. कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं.’ इन जवानों की समस्या कई विभागों के बीच गोल-गोल घूम रही है. दिल्ली सरकार का कहना है कि होम गार्ड्स एक अलग विभाग है इसलिए वह ही इस बारे में फैसला लेगा.

संसद में पूछे गए एक सवाल (अतारांकित प्रश्न संख्या 2982, दिनांक: 11.03.2003) के जवाब में केंद्र सरकार कहती है कि ऐसे होमगार्ड्स जिन्हें कार्यमुक्त कर दिया गया है उन्हें फिर से सेवा में लिए जाने के लिए कार्यवाही शुरू हो गई है. लेकिन जब ये जवान इस बाबत दिल्ली होम गार्ड्स विभाग से संपर्क करते हैं तो विभाग कहता है कि ऐसी किसी कार्यवाही के बारे में उसे जानकारी नहीं है. यह सब जानकारी उन फाइलों के पुलिंदे में कैद है जिसे धरने पर बैठे ये जवान अपने पास रखे हुए हैं. कुछ मिनटों की बातचीत के बाद ये लोग इन कागजों को दिखाने लगते हैं. भूतपूर्व होम गार्ड्स जवानों में से एक का सवाल है, ‘अगर नहीं करना तो ये इतने साल से हमारे से साथ ऐसा मजाक क्यों कर रहे हैं. नेता कुछ कहते हैं. संसद कुछ कहती है और विभाग कुछ और ही बात समझाता है. हमें समझ नहीं आ रहा कि किसका भरोसा करें. क्या करें और क्या न करें?’  एक लंबी और बेहद थकाऊ लड़ाई के बाद इन लोगों को टूट जाना चाहिए था. लेकिन ऐसा नहीं है. ये और मजबूती से एक साथ आए हैं. अपने अधिकारों के लिए. अपनी रोजी-रोटी के लिए. सुरेश कौशिक कहते हैं, ‘देखिए, कोई और रास्ता भी नहीं था. हम जान दे नहीं सकते थे. सो हमने लड़ने का फैसला किया. हम लड़ रहे हैं. रोज. घर के भीतर भी और बाहर भी. पता नहीं क्या होगा. लेकिन अब तो लड़ना भी नहीं छोड़ सकते. इसकी भी आदत हो गई है.’

‘उस रात मुझे अन्याय के प्रतिरोध की सीख मिली’

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मनीषा यादव

यह घटना 1985 की है. तब मेरी तैनाती उत्तराखंड में चमोली जिले के अगस्त्यमुनि विकास खंड में थी. क्षेत्र में एक विभागीय बैठक के बाद मैं शाम के लगभग छह बजे रुद्रप्रयाग पहुंचा. इस कस्बे से अगस्त्यमुनि लगभग 20 किमी दूर  है. शाम हो चुकी थी इसलिए बस मिलने का तो प्रश्न ही नहीं था, लेकिन उस दिन आमतौर पर चलने वाली कोई एंबेसडर कार भी नहीं दिख रही थी. पहाड़ों में सर्दियों में सात बजे लगभग अंधेरा हो जाता है इसलिए थोड़े इंतजार के बाद मैंने सोचा कि रात यहीं गुजारी जाए.

तभी सामने से मेरे एक पूर्व विभागीय मित्र बंशीलाल आते दिख गए, उनका घर भी अगस्त्यमुनि से कुछ पहले एक गांव में था. मैंने उन्हें कोई गाड़ी न होने की जानकारी दी. उन्होंने कहा कि एक ड्राइवर उनका परिचित है जो हम दोनों को छोड़ देगा. बंशीलाल ने एक दुकान से फोन करके उसे बुलाया. वह आ गया और हम कार में बैठकर चल दिए. थोड़ी ही दूर जाकर ड्राइवर ने तेल भरवाने के लिए एक पेट्रोल पंप पर कार लगा दी. वहीं हमने देखा कि पंप से कुछ दूर एक इंस्पेक्टर सहित चार-पांच पुलिस वाले वाहनों की चेकिंग कर रहे थे. हमारे ड्राइवर ने तेल भरवाकर गाड़ी आगे बढ़ाई तो सामने खड़े पुलिसवाले ने हाथ देकर उसे रोक दिया और कहा कि वह गाड़ी के कागज इंस्पेक्टर से चेक करवाए.

लभगग 20 मिनट बाद ड्राइवर बड़बड़ाता हुआ लौटा. उसके हाव-भाव से लग रहा था कि वह परेशान है. हम पांच मील आगे आ गए थे लेकिन वह अपने आप से बड़बड़ाए जा रहा था, अचानक उसने जेब से एक कागज निकाला तथा उसे पीछे बंशीलाल की तरफ बढ़ाते हुए बोला, ‘देखो तो साहब इन लोगों ने मुझे किस बात पर टांगा है.’

वह चालान पेपर था जिसमें लिखा था कि उसकी गाड़ी में ओवरलोडिंग (सात सवारी) है जबकि हम केवल दो व्यक्ति ही थे. ‘फिर पुलिसवालों ने कैसे चालान कर दिया,’ हम दोनों एकसाथ बोले, ‘अरे भाई तुमने बताया नहीं कि गाड़ी में सात सवारी कहां हैं? सिर्फ दो जन बैठे हैं?’

ड्राइवर ने पुलिसवालों को एक भद्दी गाली दी और बोला, ‘साहब अगर इनकी मुट्ठी गर्म करो तो सब ठीक है नहीं तो सब गलत है’

ड्राइवर ने  पुलिस वाले को एक भद्दी गाली दी और बोला, ‘अरे साहब अगर इनकी मुट्ठी गर्म कर दो तो सब ठीक है, नहीं तो सब गलत है.’ बंशीलाल बोले, ‘गाड़ी मोड़ो और वापस चलो.’ ड्राइवर ने कहा, ‘कुछ नहीं होगा सर, उल्टे आपको बेइज्जत होना पड़ेगा.’ बंशीलाल मानने को तैयार नहीं थे. बोले,  ‘होने दो, वापस लौटो.’

मैं भी इन सब लफड़ों में नहीं पड़ना चाहता था, इसलिए मैंने भी कहा, ‘वहां जाकर कुछ नहीं होगा, उल्टा हमको भी कुछ सुनना पड़ेगा.’ लेकिन बंशीलाल नहीं माने. नतीजतन थोड़ी ही देर में हम वापस रुद्रप्रयाग में थे. बंशीलाल चालान पेपर हाथ में लेकर सीधे इंस्पेक्टर के पास गए और जाते ही बिना किसी प्रस्तावना के बोले, ‘अभी कुछ देर पहले यह चालान आपने किया है, किस वजह से? ओवरलोडिंग के कारण जबकि गाड़ी में केवल दो व्यक्ति थे, आपने ऐसा क्यों किया?’

इसंपेक्टर पुलिसिया अंदाज में बोला, ‘अरे तू है कौन जो इस ड्राइवर का वकील बनकर मुझे सिखा रहा है. हमें क्या करना है और क्या नहीं यह अब तुझसे पूछना पड़ेगा.’ बंशीलाल ने जवाब दिया, ‘मैं केवल एक पैसेंजर हूं. इस गाड़ी में केवल हम दो लोग बैठे थे.’ इंस्पेक्टर फिर गुर्राया,  ‘अच्छा तुम केवल दो पैसेंजर थे.’ इसके बाद वह एक पुलिसवाले से बोला, ‘इनको ले चल थाने, गाड़ी होगी सीज और इन तीनों को वहीं बैठा, इनको नेतागिरी का शौक लगा है.’

मुझे काटो तो खून नहीं, ड्राइवर अलग परेशान. लेकिन बंशीलाल अविचल थे. वे बोले, ‘पहले तो तमीज से बात करो, फिर चलो जहां चलना है, लेकिन थाने जाने से पहले मैं आपके एसपी से जरूर बात करना चाहूंगा.’ यह कहने के साथ ही वे पेट्रोल पम्प कार्यालय के अंदर गए और वहां रखा फोन घुमाने लगे.

इंस्पेक्टर पल भर में ही जमीन पर आ गया. वह मुझसे बोला, ‘इन भाई साहब को समझाइए. इतना गुस्सा ठीक नहीं.’ फिर ड्राइवर से बोला, ‘ला इधर कागज.’ ड्राइवर ने वह चालान इंस्पेक्टर को पकड़ाया और इंस्पेक्टर ने उसके कई टुकड़े कर हवा में उछालते हुए ड्राइवर की तरफ देखते हुए कहा, ‘ले खुश! जा तू भी मजे कर.’

मैं पेट्रोल पम्प कार्यालय में गया तो देखा बार-बार नंबर डायल कर रहे बंशीलाल लाइन व्यस्त होने के कारण बुरी तरह झुंझला रहेे हैं. मैं लगभग धकियाते हुए उन्हें बाहर लाया. उनके चेहरे पर गुस्से, झुंझलाहट और प्रतिरोध के वही भाव पूर्ववत तैर रहे थे.

रात लगभग 10 बजे मैं अपने कमरे पर पहुंचा. लेकिन एक नई सीख के साथ कि अन्याय चाहे खुद के साथ हुआ हो या किसी और के साथ, उसका प्रतिरोध अत्यंत दृढ़ता के साथ किया जाना चाहिए.

लेखक सेवानिवृत्त जिला समाज कल्याण अधिकारी हैं और देहरादून में रहते हैं.

कूटनीति बड़ी कि तमाशा !

modiयह किसी से छुपा नहीं है कि हमारे न्यूज चैनल तब तक अंतर्राष्ट्रीय खबरों और वैदेशिक मामलों की कवरेज से परहेज करते हैं, जब तक कि कोई बहुत बड़ी घटना (जैसे युद्ध जिसमें अमेरिका शामिल हो या जैसा आतंकवादी हमला) न हो जाए. इस मामले में भारतीय चैनल सचमुच, ‘भारतीय’ हैं. आमतौर पर हमारे चैनलों की विदेश और वैदेशिक-कूटनीतिक रिपोर्टिंग की सीमा पाकिस्तान और बहुत हुआ तो चीन से आगे नहीं जाती है. लेकिन मजा देखिए कि इन्हीं चैनलों पर इन दिनों कभी भूटान, कभी नेपाल, कभी जापान और पिछले पखवाड़े अमेरिका छाया हुआ था.

सुर कुछ ऐसे थे जैसे चैनलों को अचानक इलहाम हुआ हो कि भारत दुनिया की एक बड़ी ताकत बन चुका है और अब महाशक्ति बनने की ओर है. कहना मुश्किल है कि यह कितने दिन रहेगा लेकिन उनका जोश देखते ही बनता है. उनके रिपोर्टरों/संपादकों में अचानक वैदेशिक/कूटनीतिक मामलों के कई जानकार निकल आए हैं और प्राइम टाइम पर भारत-जापान, भारत-चीन, भारत-अमेरिका संबंधों पर बहसें और चर्चाएं छा सी गईं हैं.

आखिर यह ह्रदय परिवर्तन कैसे हुआ? बहुत अनुमान लगाने की जरूरत नहीं है. यह ‘न भूतो, न भविष्यति’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चमत्कार है. वे जहां जाते हैं, चैनल उनके आगे-पीछे रहते हैं. असल में, मोदी में खबर है और खबर में मोदी हैं. आजकल खबरें उन्हीं से शुरू होती हैं और उन्हीं से खत्म होती हैं. चूंकि पिछले चार महीनों में उन्होंने चार देशों की यात्राएं की हैं, चीन के राष्ट्रपति और आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री भारत आए, इसलिए चैनलों पर भी उनकी यात्राएं और मुलाकातें छाईं हुईं हैं. मजे की बात यह है कि अपने पूर्ववर्तियों के उलट मोदी विदेश दौरों पर पत्रकारों/संपादकों के भारी-भरकम दल को साथ नहीं ले जा रहे हैं. इसके बावजूद उनकी विदेश यात्राओं के लेकर चैनलों का अतिरेकपूर्ण उत्साह देखते बनता है. यह चमत्कार नहीं तो क्या है!

मोदी की ताजा अमेरिका यात्रा को ही लीजिए. टीवी पत्रकारिता के सभी स्वनामधन्य संपादकों, एंकरों और स्टार रिपोर्टरों सहित चैनलों की टीमें कई दिन पहले ही अमेरिका पहुंच गईं. आप किसी स्टार संपादक/एंकर/रिपोर्टर का नाम लीजिए और पूरी संभावना है कि वे उस दौरान न्यूयार्क के मैडिसन स्क्वायर या पार्क या ह्वाइट हाउस के आसपास ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाती भीड़ के साथ ‘नमो-नमो’ करते दिखाई दें. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, यह अब तक सबसे बड़ा मीडिया दल था जो प्रधानमंत्री के दौरे को कवर करने अमेरिका पहुंचा था और उसने प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों की 24X7 कवरेज में कोई कोर कसर नहीं उठा रखा.

लेकिन इस कवरेज में हमेशा की तरह उत्साह अधिक और तैयारी कम थी. गल्प अधिक और तथ्य कम थे. तत्व कम और तमाशा अधिक था. ऐसा लग रहा रहा था कि यह प्रधानमंत्री मोदी की नहीं रॉकस्टार मोदी की यात्रा हो. आश्चर्य नहीं कि चैनलों के स्टार पत्रकारों के पास इस यात्रा के राजनीतिक-कूटनीतिक निहितार्थों, प्रधानमंत्री और उनकी राष्ट्रपति ओबामा, इजरायली प्रधानमंत्री नेतान्याहू समेत अन्य राष्ट्राध्यक्षों, नेताओं और बड़ी कंपनियों के सी.ई.ओ से हुई मुलाकातों के बारे में तथ्यपूर्ण और ठोस जानकारियां कम थीं. जाहिर है कि घोषित बयानों/भाषणों और प्रेस रिलीज से आगे पर्दे के पीछे की कूटनीति के बारे में अनुमानों और कयासों से ही काम चलाया जा रहा था. देश ने इन मुलाकातों और शिखर वार्ताओं क्या खोया और क्या पाया- इसकी कोई बारीक तथ्यपूर्ण पड़ताल नहीं दिखी.

लेकिन चैनलों को इससे क्या लेना-देना? उनकी दिलचस्पी तो वैसे भी तमाशे में ज्यादा रहती है. जाहिर है कि यह सिर्फ संयोग नहीं था कि वहां तमाशे का भी भरपूर इंतजाम था. चैनल हमेशा की तरह उसी में खुश थे. चलिए, बजाइए ताली-हो गई वैदेशिक-कूटनीतिक रिपोर्टिंग!

चाट मसाला

hrithik-roshanमत बन ओशो, अच्छा नहीं ये शो
रितिक रोशन नए रजनीश ओशो हैं. फिल्म इंडस्ट्री के ओशो. लेकिन वे जितने अच्छे अभिनेता हैं, बतोलेबाजी में उतने ही खराब ओशो. दुख किसके जीवन में नहीं है, हारता कौन नहीं है, घर में दरारें किसके नहीं हैं, लेकिन रितिक अपनी परेशानियों को फिल्म के लिए की जाने वाली पीआर से आगे ले जाकर दर्शकों को इरीटेट करने वाला ओशो-छाप प्रवचन बना देते हैं. एक सामान्य सवाल के जवाब में पूरा हस्तिनापुर बसा देते हैं, त्रासदी की कथा वाचना के साथ. ‘बैंग बैंग ने व्यक्तिगत परेशानियों का सामना करने में मेरी मदद की.’ ‘बैंग बैंग मेरी सबसे बड़ी विजय है, उसका पूरा होना ही विजय है.’ ‘विषम परिस्थितियां ही, संघर्ष या दर्द, आदमी के दिमाग की मसल्स को मजबूत बनाती हैं. जैसे आप शरीर के लिए जिम जाते हैं, विषम परिस्थितियां आपके दिमाग के लिए जिम हैं.’ क्या है ये सब आखिर? एक सेंसिबल अभिनेता दुनिया को यह दिखाने के लिए कि वह पाजिटिव है और संघर्ष से हार नहीं मानता आखिर इतना बैचेन क्यों हैं? गंभीर शोध तो बनता है!

katrina-kaifअभिनय की ऐसी की तैसी!
कैटरीना सबकुछ करेंगी. बहन इसाबेल की फिल्मों में मदद. लांच के वक्त महंगी कारों के रुख से परदा हटाना. जरूरत पड़ने पर सलमान से मदद लेना. सर्जरी कराकर लौटे रणबीर कपूर का ध्यान रखना. शॉपिंग करना. बैंग बैंग के लिए एक्शन सीन्स करना. उन एक्शन सीन्स को अभिनय बताकर उसकी पीआरगीरी करना. अपनी भविष्य की ननद करीना कपूर की तारीफ करना. बैंग बैंग को अपने जीवन की कठिनतम फिल्म बताना. लेकिन वे अभिनय नहीं करेंगी. बैंग बैंग भी धूम 3 की तरह करेंगी, जैसा कि फिल्म के ट्रेलर से विदित है, और आगे भी वे ही फिल्में करेंगी जो भले ही उनसे अच्छा अभिनय न मांगें, उनकी खूबसूरती मांगें, उनका नृत्य मांगें. लेकिन इसमें उनका भी पूरा कसूर नहीं है. जब लोग-बाग सिर्फ उनका कमली गाना देखने के लिए धूम 3 जैसी फिल्म तीन बार देखने जाते हैं, आलोचना आलू-चना खाकर सो जाती है, और कैट जैसे सुपरसितारे फिल्मों में अभिनय की जरूरत पर सवाल अपनी मुस्कान से हर जगह उठाते नजर आते हैं.

kajolकाजोल काहे तुम ऐसी घनघोर?
काजोल की तुनकमिजाजी से सब वाकिफ हैं. कई सालों तक अच्छे अभिनय की आड़ में वे कभी कुनकुनी तुनकती रहीं कभी उबल के तुनकती रहीं. लेकिन जैसे-जैसे करण जौहर सरीखों ने उनका साथ छोड़ा उनके तुनकने का तना कम चौड़ा होता गया. अब हाल ये है कि एक प्रोडक्ट के विज्ञापन के लिए हाल ही में हुई शूटिंग के दौरान सभी उनका प्यार से भरापूरा व्यवहार देखकर दंग रह गए. वे समय से आईं, और नन्हे-मुन्ने बच्चों के सही शॉट देने का पेशेंस से इंतजार करती रहीं. कलयुग से सतयुग में जाने की जल्दी रखने वाले जरा रुकें. कुछ दिन बाद, एक दूसरे विज्ञापन की शूट के दौरान वे पुराने घनघोर रूप में फट से लौट आई, और सहायकों पर ऐसे जमकर चिल्लाई जैसे चिली खाकर आईं हों. जब डायरेक्टर ने उनसे एक सीन के लिए दूसरा टेक देने को कहा, काजोल ने उन्हें ऐसे घूरा जैसे डायरेक्टर ने टेक नहीं चाय देने को कहा. अच्छा हुआ डायरेक्टर ने तमीज से अभिनय करने को नहीं कहा, वरना…!

एलबमः हैदर

एलबमः हैदर गीतकार » गुलजार, फैज अहमद फैज संगीतकार » विशाल भारद्वाज
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एलबमः हैदर
गीतकार » गुलजार, फैज अहमद फैज
संगीतकार » विशाल भारद्वाज

हैदर का ‘आओ न’ पांच के ‘सर झुका खुदा हूं मैं’ की ऊंचाई का गीत है. और बस यही सर्वश्रेष्ठ है कहा ही था कि बाकी के गीत आंखें तरेरते खड़े हो गए. अच्छी चीजों का घमंड भी अच्छा ही होता है. बाकी के अच्छे-गजब गीतों में ‘सो जाओ’ मरे हुए लोगों का गीत है, कश्मीर की वह त्रासदी कहता गीत जिसे गुलजार-विशाल ही गीत बना सकते थे. अद्भुत को छोटा शब्द बना देने वाला गीत. रूह में चुभकर सुकून छीनने वाला गीत. बाद इसके ‘बिसमिल’ है, हैदर के आक्रोश को दुनिया के लिए कमाल तरीके से मंचित करता, कहानी कहता और उसपर नाचता नचवाता. गवाता. तीन गीत बाद फैज के ‘गुलों में रंग भरे’ को मेंहदी हसन से गाने के सबक लेकर गाते अरिजित हैं, और उतना ही सुख देते हैं जितना सर्दी में अदरक डले गर्म दूध के साथ गुड़ की डेली. वे इसके बाद ‘खुल कभी’ गाते हैं, और हम सुनना विशाल को चाहते हैं, फिर भी उन्हें सुनते जाते हैं, बस अनगिनत से थोड़े कम बार. झुमका-झूमकर की तुकबंदी संग गुलजार की तपती इमेजरी की दुकान है ये गीत. अगले दो गीत ‘त्रासदी नदी की भी है इंसान की भी’ सिखाते हैं. सालों से अपने किनारों पर जुल्म होते देख रही झेलम को विशाल भारद्वाज ‘झेलम’ गीत बनाकर बहा देते हैं. आप बह सकें साथ तो बहें, नहीं तो सहें. लेकिन सारे दुख जो हम सहते हैं छोटे लगते हैं जब रेखा भारद्वाज फैज की नज्म ‘आज के नाम’ गाती हैं. मां, ब्याहताओं, हसीनाओं, बेवाओं के दर्द को चादर पर बिछाकर धूप में सुखाने रख देने वाला यह रूदन-गीत दिल ठहरा देता है, सृष्टि के बाकी दर्दों को झुठला देता है. आखिर में सुरेश वाडेकर हैं. बादल सी मुलायम उनकी आवाज है और उतना ही मुलायम गीत है. ‘दो जहान’, जो हमारी किस्मत से हमारे जहान में है.