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बिहार: दमित दलित

फोटोः प्रशांत रवि
फोटोः प्रशांत रवि

विश्लेषण, आकलन, अनुमान और इधर-उधर से उधार-साभार लेकर बात आगे बढ़ाने से पहले हालिया दिनों में बिहार में घटित कुछ घटनाओं पर नजर डालते हैं. इनका संबंध दलितों के साथ लगातार बढ़ रही ज्यादती से है. इनको लेकर आए दिन  राजनीति गर्माती है, कुछ आयोजन जैसी गतिविधियां होती हैं, कुछ बयानों का टकराव होता है और फिर सब शांत हो जाता है. शुरुआत बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के अपने जिले गया में 25 सितंबर को हुई घटना से करते हैं. उस दिन पुरागांव के सौ से अधिक महादलित अपना घर-गांव छोड़कर दूसरे गांव की ओर पलायन कर गए. वजह थी प्राथमिक कृषि साख समिति (पैक्स) के चुनाव के चक्कर में हुई एक हत्या. हत्या के खिलाफ आवाज बुलंद करने के जवाब में महादलितों को इलाके के सवर्ण दबंगों द्वारा सामूहिक तौर पर जान से मार दिये जाने की धमकी दी जाने लगी. उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी पुरागांव का दौरा करेंगे. वे बात-बेबात गया जाते रहते हैं, लेकिन इस घटना के बाद उन्होंने घटनास्थल का दौरा करने की जरूरत नहीं समझी. प्रशासन अपने स्तर पर समझा-बुझाकर पुरागांव के महादलितों को फिर से गांव में वापस ले आया. बात आयी-गयी हो गई. इस घटना के पीड़ित सुनील कहते हैं, ‘आज भी मुख्य आरोपी गुड्डू शर्मा गांव में आता-जाता रहता है लेकिन पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर रही है.’

इसके बाद दो बड़ी घटनाएं बिहार के चर्चित जिला भोजपुर यानी आरा में घटित हुईं. आठ अक्टूबर को सिकरहट्टा थाना के कुरमुरी गांव में छह दलित महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ. महिलाएं गरीब दलित परिवार की थीं. कबाड़ बेचने का काम करती थीं. अपने काम के सिलसिले में वे सवर्णों के मुहल्ले में थीं. मोल-तोल करने के बहाने दबंगों ने उन महिलाओं को रोक लिया. फिर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया. आरोपियों में सबसे प्रमुख नाम रणबीर सेना से संबद्ध रहे नीलनिधि सिंह का सामने आया. घटना के 24 घंटे बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज की. एफआईआर फाइलों में सिमटकर रह गई. मुख्यमंत्री का बयान भी आया कि मामले में त्वरित कार्रवाई हो, पीिड़तों को रोजगार मिले, फास्ट ट्रैक कोर्ट में मामला निपटाया जाय. भाषणबाजी के स्तर पर बहुत कुछ हुआ लेकिन उस थानेदार पर कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिसके इलाके में इतनी बर्बर घटना हुई और कायदे से जिस पर सबसे पहले कार्रवाई होनी चाहिए थी. बेचैनी और भय का आलम यह है कि इस घटना की पीड़िताएं और उनका परिवार अब इस मामले में मीडिया से कोई बात तक नहीं करना चाहता. वे सीधे इनकार कर देते हैं. वे इस बात की भी चर्चा करने को तैयार नहीं हैं कि उनके ऊपर किसी तरह का दबाव आदि तो नहीं है.

गया में 25 सितंबर को पुरा गांव के सौ से अधिक महादलित सवर्णों की धमकी पर अपना गांव छोड़ गए, आठ अक्टूबर को सिकरहट्टा में छह दलित महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ

इसके अगले महीने यानी नवंबर में आरा में ही एक और घटना घटी. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आरा के दौरे पर थे. वे अपनी राजनीतिक यात्रा पर निकले थे. वहां पार्टी के कुछ छात्र नेता नीतीश के मंच पर चढ़ने की कोशिश में पुलिस के हाथों पीटे गए. वे छात्र नेता पुलिस को देख लेने की धमकी देते हैं, पुलिस उन्हें पीटती है. इस मामले को मुख्यमंत्री ने पूरी गंभीरता से लिया. बलात्कारवाली घटना में चुप रहनेवाली सरकार ने इस मामले में एसपी और डीएसपी का ट्रांसफर कर दिया. दलित महिलाओं के बलात्कार के मामले में एक दरोगा तक नहीं हटाया जा सका, लेकिन दबंग छात्रों के मामले में सरकार पूरी तरह से सक्रिय हो गई.

आरा और गया की घटना तो फिर भी सुर्खियों में आ गई थी, लेकिन लगभग उसी दौरान नवादा जिले में घटी एक घटना को अखबारों में जगह नसीब नहीं हुई. नवादा में एक दलित परिवार के यहां शादी में नाच-गाने का आयोजन किया गया था. इलाके के दबंगों का मान इस बात से आहत हो गया कि कोई दलित नाच-गाना कैसे करा सकता है. दलितों को धमकी दी जाने लगी, लिहाजा भयभीत दलित परिवार गांव छोड़कर एक स्कूल में शरण लेने को मजबूर हो गए. इन घटनाओं के दरम्यान ही राजधानी पटना से सटे बिहटा में भी एक घटना सामने आई. वहां इंटर कॉलेज में पढ़नेवाली एक महादलित लड़की के साथ पास ही के गांव दिलावरपुर के कुछ सवर्ण लड़कों ने बलात्कार किया.

घटनाएं यहीं नहीं रुकीं. रोहतास जिले के काराकाट क्षेत्र के मोहनपुर की एक घटना भी इसी समय चर्चा में आई. मोहनपुर में साईं राम नाम के 14 वर्षीय नाबालिग दलित बच्चे को एक सवर्ण ने इसलिए जलाकर मार दिया क्योंकि बच्चे की बकरी उसके खेत में चरने चली गई थी. मृतक साईं राम के पिता जीउत राम से बात होती है तो वे बिलखने लगते हैं. बड़ी मुश्किल से उनके मुंह से आवाज निकलती है, ‘मुझे नहीं मालूम की मेरे बेटे की हत्या का केस कहां तक पहुंचा है, मैंने पता भी नहीं किया, किसी ने बताया भी नहीं.’ वे आगे कहते हैं, ‘अभी केस से ज्यादा बड़ी चुनौती आगे की जिंदगी है. मेरा वही एक बेटा था जो काम लायक था, अगले महीने वह 14 साल का हो जाता. एक और बेटा है लेकिन वो दिमागी रूप से थोड़ा कमजोर है.’ जीउत राम बताते हैं कि उनके बेटे की मौत के बाद उनके यहां नेताओं की लाइन लग गई थी. लोगों ने उनसे कई वादे भी किए थे, लेकिन चंद दिनों में ही वे सारी बातें भूल गए. जीउत राम को बेटे की मौत के मुआवजे में 28,000 रुपए का एक चेक भर मिला है. और भी कई चीजों का वादा किया गया था, लेकिन अभी भी वे वादे ही बने हुए हैं. इसमें मुफ्त राशन, नौकरी और भूमि जैसे कई वादे थे. अब उनके यहां कोई झांकने भी नहीं आता. बेटे की मौत के बाद जब मामला पुलिस में पहुंचा था, तब दबंग आरोपितों की तरफ से उन्हें धमकियां दी जाने लगीं थी. यह पूछने पर कि क्या उन्हें अभी भी धमकियां मिल रही हैं, जीउत राम कहते हैं, अभी तो रुक गया है लेकिन आगे का क्या पता.

साईं राम की दुर्दशा का अंत यहीं नहीं हुआ. अंतिम संस्कार के लिए उसे छह फुट जमीन भी मयस्सर नहीं हुई, मजबूरन उसे सड़क के किनारे ही दफनाना पड़ा.

ऐसी ही कई और छोटी-बड़ी खबरें इन दिनों बिहार की दैनिक बहसों के केंद्र में हैं. इन घटनाओं पर प्रशासन में किसी तरह कि बेचैनी या चेतना का संचार होता नहीं दिख रहा. राज्य के महादलित मुख्यमंत्री इन घटनाओं के इतर अपने अटपटे बयानों के लिए हर दिन सुर्खियां बटोर रहे हैं. उनके हालिया कुछ बयान ध्यान देने लायक हैं- दलित, महादलित, कुछ अतिपिछड़े ही मूलवासी हैं, बाकी विदेशी हैं… मैं पहले दलित का बेटा हूं, उसके बाद मुख्यमंत्री… राजा हम, राज भी हमारा होगा… मेरे पिता बंधुआ थे, मैं भी बंधुआ, किसी तरह  पढ़ा… लुढ़कते-लुढ़कते सीएम बन गया, ठोकर खाते-खाते एक दिन पीएम भी बन जाउंगा… मुझे कोई समझाए नहीं, मैं किसी से कम ज्ञानी नहीं, टूट जाऊंगा लेकिन झुकूंगा नहीं, रैदास, वाल्मिकी की कृपा से सीएम बना हूं… नीतीश भगवान हैं, मेरे घर में भगवान नहीं नीतीश की तस्वीर लगी है… उनके ये बयान सुर्खियां बटोरते हैं और शायद इसी वजह से उनकी अपनी जाति के साथ हो रहे अत्याचार कहीं दबकर रह जाते हैं.

मुख्यमंत्री के ऐसे बयानों पर बवाल मचना स्वाभाविक है. बवाल होता भी है. विपक्ष के नेता कम घेरते हैं, अपने ही दल यानी जदयूवाले मांझी को ज्यादा घेरने लगते हैं. जदयू के विधायक अनंत सिंह मुख्यमंत्री को रांची के पागलखाने में भरती करने की बात कह चुके हैं और फिर भी पार्टी में बने हुए हैं, जदयू के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी मांझी को जबान संभालकर बोलने की नसीहत दे चुके हैं, मुन्ना शाही के मुताबिक मांझी का दिमागी संतुलन खो गया है, जदयू के ही दबंग विधायक सुनील पांडेय कहते हैं कि नीतीश को जनादेश मिला था, मांझी को नहीं. ये सभी बयान एक-दूसरे से टकराते रहते हैं और नीतीश कुमार की चुप्पी बनी रहती है. उनके नए सहयोगी बेबाक लालू प्रसाद यादव भी अनपेक्षित रूप से इन विवादों पर चुप्पी साधे रहते हैं. मजेदार बात है कि उनके बयान के बचाव में रामविलास पासवान और भाजपा के लोग यदाकदा खड़े दिखते हैं.

मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी पूर्वी चंपारण के रघुनाथपुर बड़गंगा के एक महादलित टोले मेंं. फोटो: सुजीत
मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी पूर्वी चंपारण के रघुनाथपुर बड़गंगा के एक महादलित टोले मेंं. फोटो: सुजीत

यह तमाम घटनाएं तीन माह से भी कम समय के भीतर घटित हुई हैं. सितंबर के अंत से लेकर नवंबर के दौरान. नवंबर के आखिरी दिनों में बिहार के मीडिया में यह माहौल था कि अब तो हद हो चुकी है इसलिए नीतीश कुमार अब मांझी को हटाएंगे और खुद मुख्यमंत्री बन जाएंगे. मीडिया अनुभव की बजाय अनुमानों पर दांव लगा रही थी. ऐसा कुछ नहीं हुआ, अनुमान गलत साबित हुए. नवंबर के आखिरी में काफी दिनों बाद मांझी बुझे मन से नीतीश कुमार से मिलने पहुंच गए. घंटे भर साथ रहने के बाद दोनों नेता अंदर से मुस्कुराते हुए बाहर निकले. मीडिया की अटकलें गलत सिद्ध हुईं.

मीडिया अपनी अटकलों के फेर में कुछ जरूरी बातों को नजरअंदाज करता रहा है. वहां इस बात पर विचार नहीं हो रहा है कि क्या बिहार में दलितों के साथ घट रही सारी घटनाएं महज मांझी के सीएम बनने की वजह से हो रही है या इसकी पृष्ठभूमि कुछ और है. मीडिया यह भी नहीं बताता कि बिहार में ऐसी घटनाओं के घट जाने और फिर उसे हाशिये पर धकेल दिये जाने का सिलसिला न जाने कितने सालों से चल रहा है. फारबिसगंज में पसमांदा मुसमलानों के मार दिये जाने की घटना, नालंदा में एक नाई महिला के गुप्तांग में नाखून काटनेवाला चाकू घुसा देने का मामला, डुमरांव स्टेशन पर एक लड़की के साथ सरेआम सामूहिक बलात्कार की घटना, शेखपुरा में प्रेम करने के जुर्म में एक दलित बच्चे को दबंगों द्वारा सरेआम फांसी पर लटका देने का मामला. ये तमाम घटनाएं हमारे इसी दौर की बानगी हैं. इन तमाम घटनाओं को भूलकर मीडिया लगातार यह माहौल बनाने में लगी हुई है कि यह जो मांझी हैं, जब से सीएम बने हैं, राज्य को संभाल नहीं पा रहे, कानून व्यवस्था कंट्रोल में नहीं है, इसलिए ऐसी घटनाएं हो रही हैं. जाहिर है मीडिया की अपनी एक सीमा है, इसलिए वह तह तक कारणों पर विचार करने में अपना समय नहीं लगाती. वह घटनाओं के दूसरे पहलू को समझने में नाकाम सिद्ध हो रही है कि अगर मांझी के आने के बाद से ही इस तरह की घटनाएं बढ़ी हैं तो कहीं यह सामाजिक स्तर पर एक दलित के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद एक बड़े तबके में उपजे असंतोष, घबराहट, तिलमिलाहट और बेचैनी का परिणाम तो नहीं है?

मीडिया का अपनी सीमाएं हैं लेकिन बिहार के राजनीतिक दायरों में भी ये सारे सवाल महत्वपूर्ण नहीं बन पाते. यह सवाल नहीं उठता कि आखिर क्या वजह रही कि भाजपा और जदयू का गठबंधन टूटने के बाद ही ऐसी घटनाएं बिहार में एकबारगी से बढ़ गई हैं? ये सवाल अनुत्तरित हैं.

मांझी के मुख्यमंत्री बनने के बाद अचानक से दलितों के साथ भेदभाव की घटनाएं बढ़ गई है. दिन-ब-दिन दलितों के साथ हो रहे अत्याचार का रिश्ता राजनीति के शीर्ष पर हुए बदलाव से भी है

नवंबर बीतने के बाद दिसंबर महीने में घटित कुछ राजनीतिक घटनाएं दलितों पर हो रहे अत्याचारों पर हो रही नग्न राजनीति का इशारा करती हैं. छह दिसंबर को हर साल पटना में बड़े पैमाने पर काला दिवस मनाने की परंपरा रही थी, बाबरी ध्वंस के विरोध में, लेकिन इस बार छह दिसंबर को पटना में काला दिवस नहीं मना. इस बार सिर्फ बाबा साहब भीम राव अंबेडकर की पुण्यतिथि का आयोजन बड़े पैमाने पर हुआ. गौरतलब है कि इन आयोजनों में हिस्सा लेनेवाले वही सत्ताधारी लोग हैं जिन पर दलितों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है. लेकिन वे लोग घटनाओं पर मुंह बंद रखकर आयोजनों के जरिए एक नए किस्म की राजनीति कर रहे हैं. दलितों के भयादोहन की राजनीति. समय बदल चुका है, अब काला दिवस मनाकर कोई खतरा उठाने को तैयार नहीं है, इससे हिंदुत्व के जगने का खतरा है, जबकि बाबा साहब के नाम पर दलितों को अपने पक्ष में एकजुट करना आसान है.

बहरहाल, काला दिवस नहीं मना, लेकिन उसी दिन एक बड़े सरकारी आयोजन में मुख्यमंत्री मांझी और नीतीश एक साथ शामिल हुए. हाल के दिनों में कई आयोजनों में नीतीश कुमार, मांझी की वजह से कन्नी काटते रहे हैं. लेकिन छह दिसंबर के आयोजन में वे पहुंचे. इस कार्यक्रम में नीतीश का थोड़ा विरोध भी हुआ. नीतीश का विरोध कर रहे टोलासेवकों को देखकर मुख्यमंत्री मांझी मुस्कराते रहे. इस कार्यक्रम में उन्होंने महादलितों के लिए योजनाओं की झड़ी लगा दी. अंबेडकर फाउंडेशन खोलने से लेकर टोलासेवकों को दस हजार रुपये प्रति माह देने का वायदा और साठ साल तक काम करने का वचन उन्होंने वहीं दे दिया. नीतीश-मांझी के इस सम्मेलन से इतर उसी दिन पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में शूद्र एकता सम्मेलन भी आयोजित किया गया था, जिसमें भाजपा छोड़ सभी दलों के दलित नेता शामिल हुए.

अंबेडकर की पुण्यतिथि के पहले चंद्रवंशी समाज जरासंध की जयंती भी मना चुका है और चंद्रवंशी समाज के एक भाजपायी नेता प्रेम कुमार को मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर चुका है. अंबेडकर की पुण्यतिथि के बाद पटना की सड़कों पर पाटलीपुत्र के सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के राज्यारोहरण समारोह के बड़े-बड़े पोस्टर भी प्रकट हो चुके हैं. जरासंध को चंद्रवंशियों ने याद किया तो चंद्रगुप्त मौर्य को कुशवाहा समाज याद कर रहा है. विशेष प्रयोजनवाली आयोजन की ये खबरें सुर्खियों में आती रही इस दौरान. इसी दौरान नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए यात्रा पर निकले नीतीश कुमार की नयी यात्रा भी खूब सुर्खियों में रही. नीतीश की यात्रा के साथ ही विपक्ष के नेता सुशील मोदी द्वारा नीतीश कुमार से रोजाना एक सवाल पूछने का सिलसिला भी चर्चा में रहा. इस तरह हर रोज नये विषय चर्चा में आते जा रहे हैं और इन्हीं तीन महीनों के दौरान राज्य में दलितों के साथ घटित चार बड़ी घटनाएं भुला दी गईं.

भोजपुर के सिकरहट्टा में छह लड़कियों के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के बाद आरोपितों के कपड़ों की फॉरेंसिक जांच करती टीम, फोटोः प्रशांत रवि
भोजपुर के सिकरहट्टा में छह लड़कियों के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के बाद आरोपितों के कपड़ों की फॉरेंसिक जांच करती टीम, फोटोः प्रशांत रवि

बेपरवाह बिहार की सियासत आजकल ऐसे ही उबड़-खाबड़ रास्ते पर चल रही है, इसमें बड़ी से बड़ी घटनाएं राजनीतिक बयानबाजी के बीच में गुम हो जा रही हैं और यह सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि मांझी के मुख्यमंत्री बनने के बाद एकबारगी से बिहार में दलितों के साथ भेदभाव की घटनाओं की बाढ़ क्यों आ गई है. क्या दिन-ब-दिन दलितों के साथ हो रहे अत्याचार का रिश्ता राजनीति के शीर्ष पर हुए बदलाव से है, समाज के निचले पायदान पर इस बदलाव को लकर कोई असहजता पैदा हो गई है. सवाल कई और भी हैं मसलन क्या भाजपा और जदयू के अलगाव के बाद बिहार में ऐसी घटनाओं में तेजी आयी है या इस तरह की घटनाएं पहले से ही जारी थीं. सवालों के बीच एक आशंका यह भी पैदा हुई है कि क्या पिछले साल जब बिहार में मीयांपुर, लक्ष्मणपुर बाथे और नगरीकांड के अभियुक्तों को बरी किया गया, तो उसके परिणाम स्वरूप सामंती तबके का मन बढ़ा और ऐसी घटनाओ में तेजी आ गई. इसी तरह की मनबढ़ई की आशंका दो साल पहले, जब रणवीर सेना सुप्रीमो ब्रहमेश्वर मुखिया की हत्या हुई और उनके शव को पटना लाया गया, तब भी देखने को मिली थी. मुखिया के समर्थकों को पटना में गुंडागर्दी की छूट दी गयी. इससे शायद एक वर्ग का मन बढ़ा और वे अनियंत्रित हो गए हैं. जानकारों के मुताबिक हाल के दिनों में दलितों के साथ बढ़ी भेदभाव की घटनाओं का एक सूत्र पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों से भी जुड़ता है. नीतीश कुमार की पार्टी जदयू की चुनावों में हुई करारी हार के बाद भाजपा समर्थक सवर्ण तबका लंबे समय बाद बिहार में खुद को राजनीतिक रूप से मजबूत स्थिति में पा रहा है. इसके नतीजे में ऐसी घटनाएं ज्यादा तेजी से घटने लगी हैं.

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‘बिहार की नब्ज है पुरागांव’

जैसे पूरे पतीले के चावल का अंदाजा एक चावल को छूकर मिल जाता है वैसे ही पुरागांव की घटना से बिहार की जातिगत वैमनस्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है. बीते सितंबर माह में गया जिले का पुरागांव रातोंरात चर्चा में आ गया था. यह मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के गृह जिले का एक गांव है. खबर आई थी कि दंबगों ने यहां इस कदर दहशत का माहौल बनाया कि गांव के लगभग सौ महादलित परिवार यहां से पलायन कर गए. चार सौ घरों की इस बस्ती में इतने ही दलित परिवार थे, और लगभग सारे के सारे गांव से निकल गए. मामला यह था कि वहां स्थानीय स्तर पर पैक्स का चुनाव हो रहा था. इस चुनाव में एक ओर सवर्ण जाति का उमीदवार था, तो दूसरी ओर गांव के ही मुसहर समुदाय का युवक वकील मांझी भी चुनाव लड़ रहा था. वकील मांझी के बड़े भाई अर्जुन मांझी अपने भाई के पक्ष में प्रचार कर रहे थे. यह बात गांव के सवर्णों को हजम नहीं हुई. इस रंजिश में अर्जुन मांझी की हत्या कर दी गई. अर्जुन मांझी की हत्या का मामला पुलिस तक पहुंचा तो गांव के दबंगों ने महादलितों को धमकाना शुरू कर दिया. रणबीर सेना की तर्ज पर दलितों के नरसंहार की धमकियां दी जाने लगीं. भयभीत दलितों ने कोई उपाय न देख सामूहिक रूप से गांव छोड़ने का फैसला किया. गांव छोड़कर सभी परिवारों ने टेकारी नामक जगह पर शरणार्थीयों की तरह डेरा डाल दिया. जल्द ही खबर फैलने लगी. बात बढ़ी तो जिला प्रशासन ने आनन-फानन में महादलितों को गांव वापस ले जाने की प्रक्रिया शुरू की. मुख्यमंत्री मांझी के बयान आने लगे, हालांकि उन्होंने पुरागांव जाने की जहमत नहीं उठाई.

अर्जुन मांझी की पत्नी राम प्यारी देवी को पांच लाख का मुआवजा मिला, हर महीने पेंशन देने की घोषणा भी की गई और गांव के दलितों की स्थिति सुधारने का वादा भी किया गया. अब तक 26 भूमिहीनों को पर्चा बांटा जा चुका है. दर्जन भर से अधिक पुलिस के जवान गांव में डेरा जमाए हुए हंै, पुलिस पोस्ट स्थापित करने की योजना भी है. छह आरोपी समर्पण कर चुके हैं, लेकिन मुख्य आरोपी गुड्डू शर्मा अभी भी फरार है. गांववालों का कहना है कि पुलिस गुड्डू को पकड़ना ही नहीं चाहती. इस मामले को लेकर आंदोलन करनेवाले सतीश, जो कि खुद भी अपने परिवार के साथ टेकारी पलायन कर गए थे, कहते हैं, ‘सब जानते हैं कि गुड्डू शर्मा रोज रात में आता है. अब भी रोज धमकाता है, लेकिन पुलिस उसे नहीं पकड़ रही है.’ वे आगे कहते हैं, ‘हमारी सुरक्षा के ढेरों वायदे किए गए थे, लेकिन सारे वायदे दो माह में ही फाइलों में दफन होकर रह गए हैं.’ दलितों के साथ पुरा गांव में हो रही ज्यादती का यह पहला मामला नहीं है. अर्जुन मांझी के बड़े भाई राम स्वरूप मांझी का पिछले कई सालों से कोई अता-पता नहीं है. उनका भी यही अपराध था कि वो दबंगों के खिलाफ मुखिया का चुनाव लड़ना चाहते थे. उनका अपहरण कर लिया गया. लोग मान चुके हैं कि राम स्वरूप को सवर्णों ने मार दिया होगा.

पुरा के बाद हम आरा जिले के चर्चित पूरीमारी बलात्कार कांड की स्थिति जानना चाहते हैं. वहां प्रशासनिक महकमे से कोरासा जवाब मिलता है- ‘गवाही चल रही है. पीड़ित गवाही दे चुके हैं. कुल छप्पन की गवाही हो चुकी है. अब बचाव पक्ष की गवाही चल रही है. छह में से पांच पीड़ितों को नौकरी मिल चुकी है. जब फैसला आएगा तो आपको पता चल जाएगा. वैसे यह मामला पुराना हो चुका है.’ इस मामले की पीड़िताएं अब इस मामले पर मीडिया से कोई बात नहीं करना चाहती हैं.

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जानकारों की एक राय यह भी है कि एक दलित मुख्यमंत्री पद पर बैठा है जिसकी प्रतिक्रिया में निचले स्तर पर ताकतवर जातियां अराजक होकर ऐसी गतिविधियों को अंजाम दे रही हैं. हो सकता है कि जानकारों की राय सही हो, यह भी हो सकता है कि ये सारी वजहें एक साथ इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार हों, लेकिन बिहार की राजनीति में न तो अब ऐसे सवाल सत्ता के लिए महत्वपूर्ण रह गये हैं, न विपक्ष के लिए. राजनीति से जुड़े लोग इन सवालों पर कन्नी काटते हैं ज्यादा ईमानदार जवाब के लिए सियासत से इतर लोगों को ढूंढ़ना पड़ता है. लेकिन किसी के जवाब या बयान के पहले आंकड़ों के जरिये घटनाओं को समझना जरूरी है.

आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि बिहार में दलितों के खिलाफ अत्याचार की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं. 2002 से 2005 के बीच दलित उत्पीड़न के 5,538 मामले दर्ज हुए थे. 2006 से 2009 के बीच यह संख्या बढ़कर 9,052 पर पहुंच गई. 2012 का आंकड़ा बताता है कि 4,950 घटनाएं इस एक साल के दौरान घटीं. इनमें 191 बलात्कार की घटनाएं थीं. यह संख्या घटती-बढ़ती रहती है. जब हम जनवरी 2013 के बाद के आंकड़ों पर नजर डालते हैं तब हमें समझ आता है कि यह अचानक से अपने चरम की ओर बढ़ने लगी हैं. जनवरी 2014 से अगस्त 2014 के बीच दलितों के खिलाफ अत्याचार के 10,681 मामले दर्ज हुए हैं. इनमें 91 हत्या के हैं. समाजशास्त्री डॉ. एस नारायण के पास इसका एक अलग तर्क है. वे कहते हैं, ‘स्वाभाविक तौर पर जीतन राम मांझी के सीएम बनने के बाद एक बड़े तबके में बेचैनी है और वह अराजक हुआ है, लेकिन बिहार की इन घटनाओं को सिर्फ मांझी फेज से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं.’

एक मांझी को केंद्र में रखकर बिहार की राजनीति हो रही है और मीडिया भी उसी में उलझा हुआ है या यूं कहें कि मीडिया लोगों को उसी में उलझा रहा है. साल 2013 में बिहार में 580 चुने हुए जनप्रतिनिधियों की हत्या हुई, उसमें 60 प्रतिशत के करीब दलित-महादलित जातियों से थे. इस पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई. उस दौरान नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे और भाजपा उनकी सहयोगी थी. डॉ. नारायण कहते हैं, ‘ऊपरी तौर पर सियासी समीकरण बिठाने के लिए तमाम बयान दिये जा रहे हैं और उसमें ही बिहार की राजनीति उलझ गई है, जमीनी स्तर पर और लंबे समय तक महादलितों का लाभ हो, इसके लिए कुछ नहीं हो रहा है, बिहार में यह देखना महत्वपूर्ण है.’ वे आगे बताते हैं, ‘मांझी आज जो बयान दे रहे हैं, उसके आगे-पीछे भी दलितों की राजनीति और उनके विकास को समझना होगा. मांझी कोई एकबारगी से राजनीति में नहीं आये हैं. पिछले तीन दशक से राजनीति में हैं और कई महकमों के मंत्री रहे हैं. मांझी के साथ ही आठ और विधायक अभी महादलित समुदाय से आते हैं. इतने वर्षों में मांझी ने या किसी और महादलित नेता ने क्या कभी महादलितों के लिए समग्रता में विकास की कोई योजना बनायी. इससे आप समझ सकते हैं कि व्यक्तिगत सियासत को चमकाने के लिए महादलितों पर ज्यादा बात हो रही है, उनके विकास की बातें अभी भी हाशिये पर हैं.’

दलितों में चेतना आई है, वे प्रतिरोध कर रहे हैं. इसके विरोध में यथास्थितिवादी शक्तियां भी सक्रिय हो गई हैं, जो दलितों के खिलाफ अपने विरोध और प्रहार को लगातार तेज कर रही हैं

डॉ. नारायण की ही बातों को बिहार के मशहूर समाजशास्त्री एमएन कर्ण भी आगे बढ़ाते हैं. वे कहते हैं, ‘बेशक जीतन राम मांझी के सीएम बनने के बाद महादलितों में चेतना पैदा हुई है और उनमें उत्साह पैदा हुआ है लेकिन जो राजनीति में हो रहा है वह सब वोटबैंक को ध्यान में रखकर हो रहा है. बिहार सरकार ही बताये कि क्या उसके पास महादलितों की सामाजिक-शैक्षणिक स्थिति के सही-सही आंकड़े हैं. जवाब मिलेगा नहीं.’ राज्य अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य बबन रावत बिहार में दलितों और महादलितों पर बढ़ रही अत्याचार की घटनाओं की विवेचना अलग तरीके से करते हैं. वे कहते हैं कि दलितों पर अगर जुल्म बढ़े हैं, तो इससे यह साफ होता है कि दलित समाज अब मरा हुआ समाज नहीं रह गया है. कोई भी हमला जिंदा समाज पर होता है. इसलिए यह दलितों के सशक्तिकरण का ही एक पैमाना है.

जितने लोगों से बात होती है उतने मत सामने आते हैं. एएन सिन्हा इंस्टीटयू्ट ऑफ सोशल साइंस के निदेशक डॉ. डीएम दिवाकर मानते हैं कि आज बिहार में एक दलित मुख्यमंत्री हैं जो लगातार दलितों को जगने का आह्वान कर रहा है और इससे दलितों के उत्साह और विश्वास की वृद्धि हुई है. प्रतिरोध स्वरूप उन पर जुल्म भी बढ़ रहे हैं क्योंकि सदियों से जो समाज उन्हें नीची निगाह से देखता आया है वह दलितों के इस सशक्तिकरण को पचा नहीं पा रहा है. राज्य अनुसूचित जाति आयोग के ही एक और सदस्य विद्यानंद विकल मानते हैं कि यह सब इसलिए हो रहा है ताकि राज्य में अराजक स्थिति बने और लोगों में यह संदेश जाए कि एक दलित मुख्यमंत्री राज्य नहीं चला सकता और फिर अगले कुछ साल तक दलितों को फिर से मुख्यमंत्री पद पर नहीं बिठाया जा सके. विकल के अपने तर्क हैं और हो सकता है इसका भी सच्चाई से कुछ वास्ता हो. लेकिन इन घटनाओं और दलितों से जुड़े असल सवालों पर फिर भी कोई बात नहीं कर रहा.

जीतन राम मांझी दलितों की अस्मिता को उभारकर अगले विधानसभा चुनाव तक मजबूत वोटबैंक खड़ा करना चाहते हैं. नीतीश कुमार इस पूरी हलचल पर चुप्पी साधकर महादलित, अतिपिछड़ा, मुसलमान, कुरमी और यादव का एक नया समीकरण पनपते देख रहे हैं जिसमें अगला चुनाव जिताने की पूरी कूवत है. भाजपा सवर्णों की पार्टी बन चुकी है और वह साथ में कुशवाहा, बनिया, पासवान आदि को मिला लेने के बाद कुछ अतिपिछड़ों को अपने पाले में कर राजनीति को आगे बढ़ा रही है. इस बीच दलितों से जुड़े, महादलितों से जुड़े हुए कई सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब मांगे जाने चाहिए. मुख्यमंत्री मांझी से भी, नीतीश कुमार से भी और भाजपा से भी. मांझी महादलितों को पांच डिसमिल जमीन देने और आवासीय विद्यालयों में दलित छात्र-छात्राओं की संख्या बढ़ाने की रचनात्मक राजनीति करना चाह रहे हैं, जबकि भाकपा माले के राज्य सचिव कुणाल जैसे लोग दलितों से जुड़े जमीनी सवाल उठा रहे हैं. कुणाल कहते हैं कि जब खुलकर जाति की राजनीति ही हो रही है तो क्यों नहीं मांझीजी बंदोपाध्याय कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार जमीन का बंटवारा कर रहे हैं. आखिर बंदोपाध्याय कमिटी की रिपोर्ट तो नीतीश कुमार ने ही तैयार करवाई है और स्थायी विकास या भला चाहनेवालों को इससे क्या दिक्कत हो सकती है.

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‘यह सवर्ण बनाम दलित नहीं, पिछड़ा बनाम दलित की लड़ाई है’

प्रेम कुमार मणि

यूं तो बिहार में पहचान की राजनीति का दौर कई वर्षों से चल रहा है, लेकिन इन दिनों यह द्वंद्व-दुविधा से गुजरते हुए टकराव के मुहाने पर पहुंच गई है. कई वर्षों से पिछड़े नेता पहचान की राजनीति को चमका रहे थे, स्वाभाविक तौर पर अब उनके बाद उनके नीचेवालों की ही बारी थी.

इसी कड़ी में इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी जो बोल रहे हैं, उस पर बवाल मचाया जा रहा है. उनकी बातों पर बहस की जरूरत है, लेकिन कोई बहस के लिए तैयार नहीं है. मांझी जो बोल रहे हैं या जो कर रहे हैं, उससे यह साफ झलक रहा है कि वह नीतीश कुमार और लालू प्रसाद की तुलना में ज्यादा सचेत नेता हैं. वह बार-बार दलित, महादलित, कुछ अतिपिछड़ों और आदिवासियों पर ही जोर दे रहे हैं. कभी उन्होंने समग्रता में पिछड़ी जातियों को एक समूह के तौर पर रखकर बात नहीं की. उन्होंने पिछले दिनों जब सवर्णों और अन्य को बाहरी कहा, तो यह भी कहा कि आदिवासी, दलित और कुछ पिछड़ी जातियां ही मूलवासी हैं.

मांझी इतिहास के छात्र रहे हैं, वह इंजीनियरिंग के छात्र नहीं हैं. उन्हें अतीत की समझ है, इसीलिए वह भविष्य की राजनीति का संकेत दे रहे हैं. बिहार में मांझी के पहले भी दो दलित मुख्यमंत्री बने थे. भोला पासवान शास्त्री और रामसुंदर दास. दोनों ही मजबूरी में बनाए गए थे, कठपुतली की तरह. दोनों ने कमोबेश कठपुतली की ही तरह काम भी किया. नीतीश कुमार की मंशा भी मांझी को कठपुतली की ही तरह चलाने की थी, लेकिन मांझी वैसे नहीं रह सके.

मांझी ने राजनीति का एक नया अध्याय शुरू कर दिया है और खुद ही एक बड़ी परिघटना बन गए हैं. उत्तर प्रदेश में जिस तरह से कांशीराम ने बैकवर्ड और दलित राजनीति को दो अलग छोरों पर ला खड़ा किया था, बिहार में मांझी भी वही काम कर रहे हैं.

भले ही आज इसे सतही तौर पर सवर्ण बनाम दलित राजनीति के घेरे में रखकर देखने की कोशिश हो रही है, लेकिन यह उचित नहीं है. मांझी का विरोध करनेवाले सिर्फ सवर्ण नहीं हैं और मांझी भी इस बात को समझ रहे हैं. इसीलिए वे बार-बार कह भी रहे हैं कि वह जिसे समझाना चाहते हैं, वह वर्ग उनकी बातों को अच्छी तरह से समझ रहा है. केसी त्यागी, शरद यादव, अनंत सिंह जैसे नेता लगातार मांझी का विरोध कर रहे हैं, लेकिन मांझी अपनी लय में हैं.

दूसरी ओर नीतीश समझ चुके हैं कि साल 1966 का इतिहास फिर से दुहराया जा रहा है. 1966 में इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया समझकर प्रधानमंत्री बनाया गया था, लेकिन उस गूंगी गुड़िया ने भारतीय राजनीति में सबकी जुबान बंद कर दी थी. मांझी भी उसी राह पर हैं. अब बिहार की राजनीति दो खाने में बंटकर होगी. एक ओर दलित राजनीति, दूसरी ओर अपर बैकवर्ड पॉलिटिक्स. जो सवर्ण हैं, वे भी अपना ठिकाना तलाशेंगे. उनके लिए अपर बैकवर्ड से ज्यादा आरामदेह ठिकाना मांझी वाला होगा. चुनाव के पहले बहुत सारे सवर्ण नेता भाजपा में जाने की कोशिश करेंगे. भाजपा की एक सीमा होगी, वह सबको नहीं ले पाएगी. ऐसे में जो लोग बचेंगे, वे मांझी के नेतृत्व को स्वीकार करेंगे.

पहले उत्तर प्रदेश में यह देखा जा चुका है कि मुलायम से उकताया हुआ समूह मायावती के नेतृत्व में आ गया था, विशेषकर सवर्ण समूह. बिहार में भी वैसा ही होगा. अपर बैकवर्ड क्लास का राज पिछले तीन दशक से है. उससे उकताये हुए लोग नए नेतृत्व की तलाश करेंगे. उनका प्रतिनिधित्व अब मांझी करेंगे. आइडेंटिटी पॉलिटिक्स के इस दौर में मांझी बिहार में चैंपियन नेता बन चुके हैं. इस मायने में वह लालू और नीतीश को पीछे छोड़ चुके हैं.

मांझी की समझदारी पर भी गौर करना होगा. वह कभी किसी जाति के खिलाफ नहीं बोलते. वह सिर्फ दलित, आदिवासियों व अतिपिछड़ों के कुछ खास समूहों के पक्ष में बोल रहे हैं. वह सबसे तालमेल बिठाकर चल रहे हैं. वह केंद्र की भी प्रशंसा दिल खोलकर करते हैं और नीतीश का भी गुणगान करते हैं. वह बखूबी समझते हैं कि बिहार की राजनीति में आगे क्या होनेवाला है और उसके लिए उन्हें किस राह पर चलना चाहिए.

लेखक राजनेता व राजनीतिक विश्लेषक हैं. उनके विचार निराला से बातचीत पर आधारित हैं. 

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बंदोपाध्याय कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 21 लाख एकड़ जमीन है. यहां 17 लाख लोग भूमिहीन हैं. छह लाख लोगों के पास घर बनाने के लिए भी जमीन नहीं है. घोषणा ही करनी थी या कुछ करना ही था तो वही करते कि बंदोपाध्याय के बताये रास्ते के अनुसार 21 लाख एकड़ जमीन को गरीबों, दलितों, महादलितों, भूमिहीनों, घरहीनों के बीच बांट देते. महादलितों से जुड़ा एक अहम मुद्दा मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी और खुद मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के इलाके, गया से भी है, जहां हर साल दर्जनों बच्चे सुविधा, जागरूकता के अभाव में इंसेफलाइटिस की वजह से मर जाते हैं, जो बच जाते हैं वे जीवनभर विकलांग बने रहते हैं. अब तक ना तो नीतीश कुमार-भाजपा की सरकार की ओर से इस पर कोई ठोस पहल हुई थी और न ही जीतन राम मांझी की ओर से इस पर बात हुई है.

एक सवाल सीतामढ़ी के टेम्हुआ गांव का भी है, जहां कालाजार से 50 के करीब दलितों की मौत हुई है. सवाल तो यह भी है कि बिहार में जो अराजक स्थिति उत्पन्न हुई है, उसमें सबसे ज्यादा भूमिका हाल के वर्षों में नीतीश कुमार और भाजपा सरकार की ही देन रही है. नीतीश कुमार की सरकार ने ही अमीरदास आयोग को रिपोर्ट तैयार कर देने के बाद भंग कर दिया था, जिस अमीरदास आयोग की रिपोर्ट से इस बात का खुलासा होना था कि नब्बे के दशक में बिहार में हुए नरसंहारों में रणबीर सेना के जरिए राजनीतिक दलों के लोगों ने शामिल होकर तमाम कुकृत्य किए थे. इसका एक उदाहरण हाल के दिनों में दिखा, जब भाजपा के कोटे से केंद्र में मंत्री बने गिरिराज सिंह के बारे में (मानवाधिकार आयोग के आईजी अमिताभ दास) ने यह रिपोर्ट दी कि गिरिराज सिंह के संबंध रणबीर सेना से रहे हैं. गिरिराज सिंह मंत्री बन चुके हैं, माना जा रहा है कि अब अमिताभ दास को इसकी सजा मिलेगी.

मांझी के इर्द-गिर्द घूम रही राजनीति के चक्र में बिहार के सामयिक सवाल गायब हो चले हैं. अभी चुनाव में दस माह बाकी हैं लेकिन चुनावी जंग अभी से सिर चढ़ने लगी है. मांझी के बयान को बार-बार सवर्ण बनाम दलित नेता के रूप में दिखाने की कोशिश हो रही है. प्रेमकुमार मणि जैसे राजनीतिक विश्लेषक व नेता बार-बार बता रहे हैं कि सत्ता के शीर्ष की राजनीति से तो सवर्ण कई साल पहले ही आउट हो चुके हैं. दरअसल यह लड़ाई अब पिछड़ा बनाम दलित की लड़ाई हो चुकी है. मणि की बातें इस नए टकराव की तरफ इशारा करती हैं. मांझी अपनी बातों में कभी पिछड़ों की बात नहीं करते. वे बार-बार दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक और अतिपिछड़ा समूह की वकालत करते हैं. पिछड़े नेता ऊर्जा लगाये हुए हैं कि मांझी जिस नये राजनीतिक समूह का निर्माण कर रहे हैं, उसमें किसी तरह पिछड़ों को भी शामिल कर लें, लेकिन मांझी अपनी धुन में हैं. शायद वे जानते हैं कि पिछड़ों से दलितों को अलगकर ही वे आगे भी चैंपियन नेता बने रह सकते हैं, इसलिए वे बार-बार दुहरा रहे हैं कि दलितों की आबादी 22 प्रतिशत है. मुसलमान 16 प्रतिशत. बस यही मिल जाए तो किसी की जरूरत नहीं. मांझी खुद तहलका से बातचीत में कह चुके हैं कि वे ठेके-पट्टे में पिछड़ों को आरक्षण देने के पक्ष में नहीं हैं, वे दलितों के लिए और विशेषकर महादलितों के लिए आरक्षण चाहते हैं. मांझी तहलका से बातचीत में कह चुके हैं कि लालू यादव दलितों के हितैषी नेता नहीं हैं. मांझी तहलका से बातचीत में कह चुके हैं कि समय बतायेगा कि किसके नेतृत्व में चुनाव होगा. मांझी अपनी सारी बातें कह चुके हैं, कही हुई बातों के अनुसार ही राजनीति कर रहे हैं. वे नीतीश को भगवान भी कहते हैं, नरेंद्र मोदी को शानदार-जानदार प्रधानमंत्री भी कहते हैं. वे सत्ता की सियासत को साधने में ऊर्जा लगाये हुए हैं, दलितों की अस्मिता को उभारकर, लेकिन दलितों के मूल सवालों से मुंह चुराकर.

आलोचना की रस्म

cultureसन 1980 के बाद बदलते समय में साहित्य का मिजाज भी बदला है और इस बदलाव के चलते रचनाओं ने हमें आश्वस्त भी किया है क्योंकि जो अनजाने लोग थे. उनकी पहचान इस रूप में बनी है कि उनकी कलम ने दस्तक दी. यूं तो 2014 में आकर हमें मिली-जुली साहित्यक आवाजें आज भी सुनाई देती हैं जिन्होंने नए प्रतिमान गढ़े थे. यथार्थ और कला का समीचीन संगम हमारे सामने खुलता जाता है. दूधनाथ सिंह की ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ , उदय प्रकाश की ‘तिरिछ’ और चंद्रकिशोर जायसवाल की कहानी ‘नकबेसर कागा ले भागा’ अपनी अलग-अलग छटा में हमें प्रभावित करती हैं तो उपन्यासों में डूब, सूखा बरगद, सात आसमान, कलिकथा वाया बायपास जैसे उपन्यासों को पाठकों ने पढ़ा और सराहा. एक उपन्यास ‘मुझे चांद चाहिए’ अपनी तरह का अनूठा रहा था उन दिनों से आज तक.

मेरी बात यहां आलोचना से संबंधित है, इसलिए कहना चाहूंगी कि रचना के बाद ही आलोचना की भूमिका शुरू होती है. पुराने समय से आजतक आलोचकों के नामों से बनी श्रृंखला में वे ही गण्यमान हो पाते हैं जिन्होंने रचनाओं के लिए वकील की नहीं, जज की भूमिका निभाई है. बेशक अपनी योग्यता और क्षमता के स्तर को निर्धारित किया है. साहित्य में यह मान्यता बनी हुई है कि आलोचक की कृपा पर रचना का उठना और गिरना निर्भर करता है.

मुझे साहित्य जगत में चली आ रही मान्यता पर शक होता है. ‘मुझे चांद चाहिए’ इसका अप्रतिम उदाहरण है. चांद चाहने वाली लड़की (सिलविल) वर्षा वशिष्ठ शाहजहांपुर से निकलकर दिल्ली के नाट्य विद्यालय में आती है और अभिनय की प्रतिभा पर सवार होकर मुंबई की फिल्म नगरी पर छा जाती है. वर्षा वशिष्ठ की इस कथा पर समीक्षक दांतों तले उंगली दबाकर रह गए. उनकी अब तक की प्रिय रही नायिकाओं के छक्के छूटने लगे. आलोचकों के खेमों में खलबली थी कि इस नायिका को किस खांचे में फिट बिठायें? आलोचक तो फिर आलोचक होते हैं. अपनी धुन और जिद के स्वामी, वर्षा वशिष्ठ को नकली स्त्री घोषित कर डाला. यह आलोचना की अवसन्न अवस्था थी. अपने होश में स्त्री चरित्रों को लेकर हमारे समीक्षकों को ‘मित्रो मरजानी’ की मित्रावंती याद थीं जिसने देहभाषा को साहित्य के दरमियान परिभाषित किया. ‘आपका बंटी’ की शकुन भुलाने वाली महिला नहीं है, जिसने पति से तलाक लेने की हिम्मत दिखाई.

‘चितकोबरा’ को भी याद कर लिया गया जिसके यौनिक वर्णन की चर्चा रही. हमारे मन में सवाल यह भी है कि इन नायिकाओं के आचरण को देखकर क्या समीक्षक विचलित नहीं हुए थे? बेशक विचलित हुए थे लेकिन इन्हीं नायिकाओं ने उस विचलन को संभाल लिया क्योंकि उपन्यासों में चरित्रगत विचलन से बचने बचाने की युक्तियां भी नत्थी थीं. मिसाल के तौर पर ‘मित्रो’ का अंतिम चरण में अपनी मां के यहां लौट जाता, शकुन साहिबा का अपने दूसरे विवाह के आगे कंधे डाल देना और चितकोबरा की नायिका का संबंध अपने ही पति से होना.

‘मुझे चांद चाहिए’ की वर्षा वशिष्ठ खुद को निशाने पर रखती है क्योंकि घर-परिवार और समाज की परंपराओं को धो-फींचकर घर की खपरैल पर सूखने डाल जाती है और बिन ब्याही मां बनती है. ‘उफ! चांद चाहने वाली लड़की, तू कहने के लिए नहीं करने के लिए बनी है!’ समीक्षा जगत में अंधेरा सा छा गया. लेकिन साहित्य में किसी कृति को स्थापित या विस्थापित करने के लिए माना गया आलोचक अपनी शक्ति को नापता-मांपता हुआ उठा और वर्षा वशिष्ठ को संघर्ष विहीन, रेड कारपेटिड नायिका घोषित कर डाला. अब यह अलग बात है कि समीक्षक डाल-डाल तो पाठक पात-पात.

क्रूर आलोचकीय असहमतियों के बावजूद उपन्यास के संस्करण दर संस्करण छपते चले गए. और थोड़े ही दिन बाद इसका ठीक उल्टा ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के साथ हुआ. समीक्षकों के बड़े महान तबके के हिसाब से यह उपन्यास साहित्य जगत की अपूर्व घटना थी लेकिन पाठकों ने इसका जरा-सा भी असर नहीं लिया. राजेंद्र यादव के शब्दों में यह किताब ‘पुस्तकालय संस्करण’ थी.

दो उदाहरण देकर मैं समीक्षकों की समझ पर सवाल खड़े करना नहीं चाहती बल्कि पाठकों के लिए साहित्य का क्या रूप हो या साहित्य से उनका नाता क्या है,   यह दिखाना चाहती हूं. समीक्षा के जरिए किताब आने की सूचना अवश्य मिल जाती है लेकिन वह पाठक भी पैदा करे यह जरूरी नहीं. कई बार तो लगता है कि समीक्षक अरुचिकर किताबों की ओर इशारा करता है जिससे पाठक बिदक सकता है. आलोचक की विश्वसनीयता धूमिल पड़ती है. कारण यह भी है कि वह एक ही विचारधारा से विभिन्न समुदायों और समाजों पर आलोचकीय नतीजे चस्पा करता जाता है. जबकि जरूरी यह है कि वह निष्पक्षता के साथ रचना में आए संदर्भों के बीच से कुछ गुणात्मक खोजने-तलाशने का दायित्व निभाए. और ऐसा हुआ भी है कि रचना को अपने खारिजनामें के बाद कोई सुधी समीक्षक मिला है, जिसने अपनी तर्कबुद्धि से वहां सार्थकता सिद्ध की है. महाश्वेता देवी के लेखन के साथ ऐसा ही गुजरा जब मान्यवर समीक्षकों ने चुप्पी साध ली थी.

ग्राम आधारित रचना हो या सबअल्टर्न अध्ययन का दायरा, दमित वर्ग के बीच आलोचक अपने नजरिए को कुलीनतावाद से नहीं बचा पाता फिर यह दुचित्ती नीति सही-गलत के फैसले पर अपनी प्रमाणिकता कैसे सिद्ध करेगी? इसी तरह स्त्री के लिए आलोचक का रवइया न चाहते हुए भी रह रहकर जब सामंती होने लगता है तब आलोचक के औजारों का पुरानापन बुरी तरह खटकता है. समय बदला कलम बदली, पुरुषों की लेखनी से स्त्री की कथा ने आजादी पायी. यह ख्याल समीक्षकों के जेहन में रहे तो कुछ नया हो. यह नया ही तो हुआ है कि जिन ग्रामीण स्त्रियों के बारे में लिखकर पुरुष लेखक अपने लेखन को समग्रता की सार्थकता से सजा लेते थे, वह बंट गया है.

मगर आलोचक फतवा जारी करने से नहीं हिचकते, ‘गांव की कोई युवती बिना बलात्कार हुए गर्भवती हो जाए और उत्पीड़ित न हो तो उसकी विद्रोही मुद्रा का तर्क क्या है? विवाह संस्था के बाहर रहकर गर्भधारण का अधिकार उसे नहीं. दूसरी स्त्री पति-पुत्र-सास-ससुर के भरे-पूरे संयुक्त परिवार में रहते हुए प्रेम का अधिकार चाहती है- यह देह राग ही है. ये पात्र यौन संबंधों के शरणागत हैं. आर्थिक मुक्ति की चाह से मुक्त.’ इस टिप्पणी पर सवाल उठता है कि बलात्कार होना चाहिए. तभी बिन पति की स्त्री के गर्भ को क्षमा किया जाएगा? विधवा स्त्री  की अपनी इच्छा से हुआ शिशु सामाजिक अपराध रहा है तो क्या अब भी रहेगा? वैसे लोग गर्भवती विधवा के उत्पीड़न में कोई कोर-कसर नहीं उठा रखते. क्या स्त्री का प्रेम देह राग ही होता है? कितनी उथली समझदारी है कि प्रेम राग को देह राग का फतवा देना? संदर्भों को खोलने की बजाय संदर्भों को काटने के उपक्रम को हम स्वस्थ समीक्षा कहेंगे क्या? समीक्षकों की सूचना के लिए है यह कि किसान स्त्रियां दिहाड़ी पर काम नहीं किया करतीं और न वे महिने की पगार पर अपना श्रम बेचती हैं. उनका प्राप्य कागज के नोट नहीं, खेतों की फसलें होती हैं. और घर के द्वार पर बंधे गाय-भैंस जैसे जानवर उनकी पूंजी होते हैं. आज उनकी आर्थिक मुक्ति के साधन यही हैं, हक के साथ. इस बात पर आलोचक गौर करें या न करें, गांव कस्बों के पाठक अच्छी तरह समझ लेते हैं. इसी पाठकीय समझ पर आलोचकों की धोबी पछाड़ों के बावजूद ग्राम केंद्रित साहित्य अपनी पैठ बनाता जाता है.

यह भी सोचने का विषय है कि जो लेखक समाज की विद्रूपताओं से भीषण संघर्ष करता हुआ इबारत रचता है, घटाटोप अंधेरों को चीरकर उजाले की राह बनाता है, वह आलोचक के सामने कंधे क्यों डाल देता है? केवल इसलिए कि उसे आलोचक की मेहरबानी चाहिए? कैसी खाम ख्याली है यह भी. पिछले दिनों का वाकया मुझे ही नहीं बहुत से लोगों को याद होगा जब एक युवा लेखिका की रचना को किस-किस आलोचक ने अपनी कलम कृपा से धन्य-धन्य नहीं किया था. राजेंद्र यादव के साथ वयोवृद्ध समीक्षकों के बयान नत्थी थे. किताब श्री नामवर जी के लिखित वक्त्व्य से सजाकर भव्य समारोह में रखी गई थी. तीन-तीन लोकार्पण हुए, बला लोग दिल खोलकर बोले, लेकिन अब उस किताब का अता-पता कहां हैं? हम बधाई देते तब तक तो सब कुछ खत्म हो गया. यह उदाहरण है गैर जिम्मेदार समीक्षा का.

साहित्य में यह गोरखधंधा है. देखा यह भी गया है कि समीक्षक जब-जब कमजोर पडे़गा वह लेखक के लिए दहशत पैदा करने लगेगा. तब हमें निराला और रेणु के तेवर अपनाने होंगे जिन्होंने साहित्य को किसी का निजी किला या गढ़ नहीं माना. हमें यह भी जानना होगा कि ऐसे किले और गढ़ों से जो ऐलान आते हैं वे या तो लेखक को सूली पर चढ़ा देते हैं या पोदीने के पेड़ पर.

कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी वरिष्ठ विदुषी लेखिकाएं इसी दहशत के हवाले होकर झिझकती ठिठकती रही हों. हौसला करके निकलीं और तौबा-तौबा करके लौटीं. राजेंद्र यादव ने लिखा है, ‘उपन्यासों की प्रबुद्ध सुशिक्षित विचारवान और व्यक्तित्व सम्पन्न नायिकाएं उसी परम्परागत बलिदान और त्याग के रास्ते का वरण करती हैं, मानो ‘नारी मुक्ति’ के आंदोलनों को मुंह चिढ़ाती हुई वे उन्हें नकारने के लिए ठीक उलटी दिशा में चल पड़ती हैं. एक शहीदी ‘संकल्प दृढ़ता’ के साथ घुटन और पुराने मूल्यों के चुनाव को कहा जा रहा है, नई नारी की अपनी चेतना.’

समीक्षा के जरिए किताब आने की सूचना मिल जाती है लेकिन वह पाठक भी पैदा करे यह जरूरी नहीं. कई बार समीक्षक अरुचिकर किताबों की ओर इशारा करता है

औरत की साहसिक कर्मशीलता को झेलने का दमखम परिवार में नहीं होता लेकिन क्या समीक्षक भी पारिवाकि रुग्ण मानसिकता का पक्षधर हो जाता है? बस यही देखकर तकलीफ होती है. क्या समीक्षक मेरे इस मत से सहमत होंगे कि संघर्ष छोड़कर लौट जाना ही था तो संषर्ष का अर्थ क्या रहा? इस सवाल को दरकिनार करते हुए सन 1990 से पहले और कुछ बाद की साहित्यक नायिकाएं अपनी लेखिकाओं के हाथ लौट जाने के लिए  अभिशप्त रहीं. इन रचनाकारों पर कौन से कहे-अनकहे दबाव थे? मशहूर कृति ‘मित्रों मरजानी’ की मितरावंती की बेबाक आवाज की टंकार कर्मभूमि पर उतरते ही अवरुद्ध क्यों हो गई? जंग की जमीन से पांव उखड़कर मायके की ओर मुड़ गए. लगभग क्षमायाचना के साथ यह लौटना कि जो कुछ बोला-झांसा वह तो एक वेश्या की बेटी (मित्रो) के बोल वचन थे. कुलीन लोगों का इससे क्या लेना देना. यही हाल ‘आपका बंटी’ उपन्यास का रहा. तलाकनामा पेश करने वाली बहादुर नायिका शकुन आर्थिक स्वावलम्बिनी भी रही, ओहदा भी शानदार था प्रिंसीपल साहिबा का. मगर विवाह संस्था ने उस स्त्री को दोबारा अपने दलदल में घसीट लिया. दूसरे पति के साथ रहे या बंटी को लेकर चली जाए? इस दुविधा में शकुन ने पति का घर चुना. बंटी के साथ अपना स्वाभिमान भी त्याग दिया. स्त्री के लिए जैसे विवाह की समस्या, सुख-सुविधा का रूप हो. कई उपन्यास इन्ही गुत्थियों में उलझ कर बदलाव के फैसले नहीं दे सके. मगर इन कथा रचनाओं में समीक्षकों की भरपूर प्रशंसा का दबाव रचनाकार पर सबसे बड़ा बोझ होता है. ऐसे दबावों से जब तक मुक्ति नहीं मिलेगी तब तक स्त्री भी मुक्त नहीं हो सकेगी.

आज तो ऐसी तमाम रचनाओं के पुनर्पाठ की जरूरत है जो समीक्षा/ आलोचना के गलत निर्णयों के नीचे दबी पड़ी हैं. पुनर्पाठ के जरिए ही हम जानेंगे कि जिस घटना को हमने उत्सर्ग, त्याग और बलिदान माना है, वह पितृसत्ता की खुशी के लिए की गई आत्महत्याएं और हत्याएं थीं, राजा-महाराजाओं के लिए वफादारी थी या खालिस गुलामी? प्रेम के अधिकार पर सदा स्त्री को कंगाल रखा गया या तबाह किया गया?

‘अस्मिता के प्रश्न, जीवन के मूलभूत प्रश्नों के लिए रोड़ा बनते हैं’

neelesh ji

आप की मूल पहचान कवियत्री के रूप में है. लेकिन आपने अन्य विधाओं में भी रचना की है. विभिन्न विधाओं के रचनाकर्म में क्या फर्क देखती हैं?

यूं तो सारी विधाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं. हर विधा का अपना मूल स्वभाव होता है. लेकिन सबके भीतर कहीं न कहीं कविता छिपी होती है. जैसे कि आप हर समय उदास नहीं रह सकते, उसी तरह हर समय खुश भी नहीं रह सकते. एक जैसा जीवन नहीं जी सकते. उसी तरह दूसरी विधाओं में जाना अच्छा लगता है, लेकिन सुकून और मन की खुशी कविता में ही मिलती है. रही बात रचना कर्म में फर्क की तो सारी विधाओं के आपस में जुडे़ होने के बाद भी रचना कर्म में बहुत फर्क होता है.

आपने बाल नाटकों पर भी काम किया है. एक तो नाटक वैसे ही कम लिखे जा रहे हैं उस पर भी बच्चों के लिए लिखना? इसमें क्या कुछ चुनौतियां पेश आईं.

मैंने बाल नाटक नहीं लिखे. नाट्य रूपांतर किए हैं. रंगकर्म सामूहिक विधा है. कहानी को कैसे नाटक में बदला जाए, उसके मूल स्वभाव से छेड़छाड़ किए बिना, निश्चित ही यह चुनौतीपूर्ण है. विभा मिश्र के साथ मैंने काफी थिएटर किया. मंच से परे के सभी कार्यों में उनके साथ मेरी सहभागिता होती थी. विभा मिश्र ने बच्चों के लिए काफी थिएटर किया. उसी दौरान मैंने काफी नाट्य लेखन किया. अब विभा मिश्र के न होने से मेरे रंग लेखन की यात्रा भी ठहर गई है.

आजकल बच्चों के लिए लिखना कम होता जा रहा है. खासतौर पर स्थापित साहित्यकार बच्चों के लिए लगभग नहीं लिखते हैं. इसके पीछे क्या कारण देखती हैं?

इसके बारे में और इसके कारणों के बारे में कुछ भी कहना अभी मेरे लिए संभव नहीं है.

मैंने कहीं आपका वक्तव्य पढ़ा था कि ‘मुझे इस पार या उस पार का जीवन अच्छा लगता है.’ इसकी थोड़ा व्याख्या करें.

इसकी व्याख्या करना तो बड़ा मुश्किल है. दरअसल मुझे बीच का रास्ता अच्छा नहीं लगता. मध्यमवर्गीय जीवन से जाने क्यों मुझे चिढ़ होती है. या तो सब कुछ हो, या फिर कुछ भी न हो. एक जैसा जीवन, एक-सी दिनचर्या, हर समय सुरक्षा के कवच की चिंता और समृद्धि के कुचक्र में उलझे रहना. कुल मिलाकर उधार की समृद्धि से तंगहाली अच्छी.

तमाम नए पुराने रचनाकार इन दिनों सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय हैं. वह पाठक-लेखक संवाद का एक बेहद लोकतांत्रिक मंच बनकर उभरा है. आप कम सक्रिय हैं. ऐसा क्यों?

ऐसा नहीं है. बस… मैं कमेंट ज्यादा नहीं करती और पोस्ट भी नहीं लगाती. धीरे-धीरे मैं उसके साथ फ्रेंडली होने की कोशिश कर रही हूं. मैं सोशल मीडिया के महत्व को नकारती नहीं हूं. लेकिन हर समय उसी में उलझे रहना भी नहीं चाहती. वैसे बाकी दूसरों को पढ़ती भी हूं, सुनती भी हूं.

इस बीच अचानक हिंदी साहित्य जगत में कवियों की बाढ़-सी आ गई है. एक के बाद एक नए संग्रह आ रहे हैं. कुछ आलोचकों ने इसे अच्छी कविता का संकट काल कहा है. आप इस नए रुझान को किस तरह देखती हैं?

मैं इस नए रूझान को पूरी उम्मीद से देखती हूं और मुझे कहीं भी इस तरह का संकट काल नजर नहीं आता. कविता का संकट काल यह नहीं है कि किताबें छप रही हैं, बल्कि कविता, साहित्य या कहें कि जीवन का संकट काल हमारी सामाजिक मुखरता और हस्तक्षेप का न होना है.

पिता आपके रचनाकर्म में बार-बार आते हैं. आपने पिता को केंद्र में रखकर कविताएं रची हैं. आपका उपन्यास एक कस्बे के नोट्स भी पिता और पुत्र के रिश्तों पर केंद्रित है.

वह इसलिए कि मेरे जीवन पर पिता का बहुत प्रभाव है. बचपन से ही मैं पिता के बहुत निकट रही. उनके संग साथ रही. हर बात उनसे कहती रही. मैंने कभी भी, कोई भी बात अच्छी या बुरी उनसे छिपाई नहीं. मैंने पिता से विपरीत परिस्थितयों में भी जीवन और समय को अपने अनुकूल करना सीखा. और उपन्यास सिर्फ पिता और पुत्र के रिश्ते पर ही केन्द्रित नहीं है बल्कि उसमें तो और भी रिश्ते हैं.

एक कस्बे के नोट्स में पिता और मां की छवियों में जबरदस्त विरोधाभास है. एक ओर आत्मनिर्भर बनाते वरदान सरीखे पिता तो दूसरी ओर पितृसत्ता की पोषक मां. हालांकि यह रचनाकार का विशेषाधिकार है लेकिन मैं यह पूछने की धृष्टता कर रही हूं कि क्या ऐसा चित्रण सायास है?

नहीं यह सायास बिल्कुल नहीं है. उपन्यास में जीवन अपने ठोस रूप में है. उसमें पितृसत्ता की पोषक अकेली मां नहीं है बल्कि पिता को छोड़कर और दूसरे स्त्री-पुरुष भी हैं.

आपकी कविताओं में जबरदस्त वैविध्य है. वहां कभी स्मृतियों का घना आयतन नजर आता है, कभी घर की छोटी-छोटी चीजें कविता का विषय बनती हैं. आपकी कविताओं के स्त्री विमर्श में वर्गीय और लैंगिक चेतना अलहदा दृष्टिकोण लेकर प्रकट होती है.

अगर आपको मेरी रचनाएं विविधतापूर्ण लगती हैं तो यह मेरे लिए बहुत खुशी की बात है. रही बात कविताओं के स्त्री विमर्श में वर्गीय और लैंगिक चेतना का नजरिया दूसरों से अलग होने की तो शायद यह इसलिए है क्योंकि जीवन में भी ऐसा ही है. मैं जीवन और रचना के बीच कोई फांक महसूस नहीं करती.

हाल ही में आपको स्त्री लेखन का शैलप्रिया सम्मान देने की घोषणा की गई है. देश में स्त्री लेखन की मौजूदा धारा को लेकर आपकी क्या राय है?

मैं लेखन में किसी भी तरह के बंटवारे के विरूद्ध हूं. यूं भी अस्मिता के प्रश्न, जीवन के मूलभूत प्रश्नों के लिए रोड़ा बनते हैं. वे हमें भटकाते हैं और लड़ाई को शुरू होने से पहले ही खत्म करने की कोशिश करते हैं.

अबकी बार, जनता का अधिकार

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विकास कुमार

दिसंबर के पहले हप्ते में देश के अलग-अलग इलाकों के तमाम जनसंगठन एक मंच के तले अपनी मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर एकत्रित हुए. इस महाजुटान का मकसद केंद्र में बनी एक अतिशक्तिशाली सरकार को अनियंत्रित होने से रोकना और जन सरोकार से जुड़े मसलों पर सरकार को कायम रखना है

बचपन में दूरदर्शन पर देखी गई गणतंत्र दिवस की झांकी भला किसे याद नहीं होगी? देश के अलग-अलग प्रांतों, अलग-अलग हिस्सों की वह रंगबिरंगी झांकी जिसमें सबकुछ बहुत खुशहाल और हरा-भरा नजर आता है. मानो अगर कहीं स्वर्ग है तो बस यहीं है. लेकिन इसे देखने वाले भी जानते हैं कि यह सच नहीं है. दिसंबर की दो तारीख की सुबह जब हम राजधानी के प्रख्यात धरना स्थल जंतर-मंतर पहुंचे तो लगा मानों वहां भी पूरा देश ही उतर आया है. अपनी-अपनी बोली-बानी लिए बिहार, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और झारखंड सब वहां आ जुटे थे. जो बात उसे गणतंत्र दिवस से अलग बना रही थी वह थी झांकी और खुशियों की कमी.

सुनहरी झांकी के बजाय पूरा जंतर-मंतर नारों से गूंज रहा था. अबकी बार, मोदी सरकार की तर्ज पर अबकी बार, हमारा अधिकार के नारे लग रहे थे. नारेबाजी और प्रदर्शन के बीच लोगों में गजब की एकता और तालमेल नजर आ रही थी. सब एकजुट थे क्योंकि सबके दिलों में चुभन एक सी थी. लोगों के हाथ में प्ले कार्ड लहरा रहे थे. जिनमें कोई जल, जंगल, जमीन पर अपने अधिकार के लिए दुखी था तो कोई और नरेगा में किए जा रहे बदलाव को लेकर असंतुष्ट. इस जुटाव के पीछे मुख्य तौर पर चार जनसंगठनों की भूमिका थी- जनआन्दोलनों का राष्ट्रीय समंवय (एनएपीएम),  राष्ट्रीय रोजगार अधिकार मोर्चा, पेंशन परिषद और रोजी रोटी अधिकार अभियान. इन संगठनों ने इसी साल अगस्त में तय किया था कि जन संगठनों का एक साक्षा मंच हो.

भीड़ में सबसे आगे की कतार में बैठे एक शख्स का नाम अर्जुन सिंह है, वे अपने कई साथियों के साथ राजस्थान से आए हैं. पचास की उम्र में पहुंच चुके सिंह से जब सवाल किया जाता है कि वे 400 किमी का सफर तय करके यहां क्यों आए हैं तो वे कहते हैं, ‘जब पेट पर मार पड़ने वाली हो तो शरीर के बाकी अंगों को समय रहते हरकत में आ जाना चाहिए. अगर जो ऐसा न किया जाए तो सारा शरीर बेकार हो जाएगा क्योंकि पेट भरेगा, तभी शरीर चलेगा.’ वो आगे कहते हैं, ‘हम गांव में रहते हैं. वहां यहां की तरह हर दिन काम तो होता नहीं है. खेती का काम भी कम ही होता है. पूरा देश जानता है कि राजस्थान के लोगों को नरेगा से कितना फायदा मिला है. नरेगा जैसी योजना को और बढ़ाने की जरुरत है लेकिन यह सरकार उल्टे उस योजना पर कैंची चलाने की बात कर रही है. जिन योजनाओं से हमारा पेट भरता है उनपर कैंची चल जाए और जिनके पास थोड़ी बहुत जमीन है उसे उनसे लेकर बाकी का काम भी तमाम कर दिया जाए.’

अर्जुन सिंह की बात अभी खत्म हुई ही थी कि बिहार के मोतिहारी से आए 30 वर्षीय कुंदन पटेल बोल उठते हैं, ‘बिहार में नरेगा का काम ठप है. काम के लिए पूछते हैं तो पता चलता है कि केंद्र से फंड ही नहीं मिल रहा है. सरकारी दुकान से मिलने वाले तेल-राशन के बदले पैसा देने की बात हो रही है. गरीब के पेट में रोटी जाने का जुगाड़ नहीं है और बैंक अकाउंट खुलवा रहे हैं. क्या करेंगे बैंक अकाउंट का? भुख लगेगी तो चाटेंगे क्या?’ कुंदन अपने इलाके के एक कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई कर रहे हैं. बटाई पर खेती करते हैं और कॉलेज की पढ़ाई करते हैं. कुंदन उन युवाओं में से हैं जो खेती करके अपने जीवन और पढ़ाई को बड़ी मुश्किल से चला पा रहे हैं. इनके परिवार के कई लोग नरेगा से काम पाते रहे हैं. इनके घर में जन वितरण प्रणाली की सरकारी दूकान से चीनी और केरोसिन का तेल आता है और अब उन्हें डर लग रहा है कि कोटे की दुकान से मिलने वाला सामान बंद हो जाएगा और उसके बदले कुछ नगद पैसे पकड़ा दिए जाएंगे. नरेगा का काम पहले ही ठप है और अब सरकार जो बदलाव इस कानून में करने जा रही है उनसे इनके परिवार की आय का एक स्रोत भी बंद हो जाएगा.

बिहार के कुंदन और राजस्थान के अर्जुन सिंह की तरह यहां हजारों लोग हैं जिनकी लगभग-लगभग यही आशंकाएं हैं. ये लोग अपनी इन्हीं आशंकाओं को खत्म करने और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को यह याद दिलाने के लिए  यहां आए हैं कि भूख लगने पर पैसे नहीं, अन्न खाया जाता है. यहां इकट्ठा हुए कई लोग यह पूछते हैं कि जब सरकार हमारे बगल के सरकारी अस्पताल में आजतक दवाई नहीं पहुंचा सकी तो इसका भरोसा कैसे किया जाए कि वो सभी योजनाओं के बदले नकद पैसा अकाउंट में पहुंचा देगी? इनलोगों की चिंता और सरकार के प्रति इनकी शंकाओं ने ही इस बड़े प्रदर्शन की नींव रखी है.

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विकास कुमार

सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे अपनी बातचीत में उन आशंकाओं को एक साथ जोड़ते हैं जिसकी वजह से यह साझा मंच बना और यह प्रदर्शन हुआ. वो कहते हैं, ‘केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार है. यह सरकार सत्ता में आई तो अच्छे दिनों के वायदे के साथ है लेकिन आते ही इसने अपने असल इरादे साफ कर दिए. नरेगा में बदलाव करने के प्रस्ताव दिए जाने लगे हैं. इस योजना को देश के कुछ जिलों तक सीमित कर देने का प्रस्ताव है. सूचना के अधिकार को लोगों के लिए और मुश्किल बनाने के बारे में विचार हो रहा है. लोगों की जमीन का अधिग्रहण आसानी से कैसे हो इसके लिए उपाये खोजे जा रहे हैं. असल में यह सरकार एक तरफ से कई हर जन कल्याण योजना को बंद या कमजोर करना चाह रही है. तो ऐसे में जन संगठनों की जिम्मेदारी बनती है कि वो एक जगह आएं. सरकार को चेतावनी दें कि वो जो-जो करना चाह रही है वैसा होने नहीं दिया जाएगा और यह प्रदर्शन इसी दिशा में पहली कोशिश है.’

हालांकि यह मंच अभी अपनी शुरुआती अवस्था में है और इसका कोई एक नाम भी अभी तय नहीं हुआ है. लेकिन निखिल डे की बातों से यह आभास मिलता है कि मजबूत सरकार और कमजोर विपक्ष की स्थिति में यह मंच भविष्य में एक नियंत्रक की भूमिका अख्तियार कर सकता है. मोर्चे के ढांचागत विकास की प्रक्रिया जारी है. विभिन्न संगठनों के प्रमुखों के मुताबिक  अगर सरकार मनमाने तरीके से काम करती रही तो उनके संगठन इस साझे मंच से सरकार के खिलाफ देश भर में इसी तर्ज पर धरना-प्रदर्शन करते रहेंगे.

चूंकि मंच अभी भी गठन की प्रक्रिया में है इसलिए स्पष्ट तौर पर इनकी मांगों की कोई सूची सामने नहीं आई लेकिन बातचीत में जो चिंताएं उभर रहीं है उनके मुताबिक नरेगा से लेकर भूमि अधिग्रहण और श्रम कानूनों पर सरकार की तिरछी नजर से इन संगठनों के भीतर एक किस्म की आशंका व्याप्त है जो आगे चलकर इनकी मांगों में परिवर्तित हो सकती है. बहुत कुछ आगे केंद्र सरकार के रुख पर भी निर्भर करेगा. एक विशेषता यह भी थी कि प्रदर्शन में शामिल लोग अलग-अलग राज्य से आए थे और उनकी अपनी-अपनी समस्याएं हैं. एक मुददे पर सभी संगठनों की एक राय थी कि केंद्र की सरकार का मौजूदा रुख निजी कंपनियों के हित में जाता दिख रहा है. सरकार एक-एक कर जन कल्याण की सभी योजनाओं को या तो बंद करना चाहती है या उसे कमजोर करना चाह रही है.

यहां इकट्ठा हुए लोगों की भारी संख्या इस बात की उम्मीद जगाती हैं कि केंद्र सरकार के लिए इन्हें अनदेखा करके फैसले लेना आसान नहीं होगा लेकिन ऐसे साझे मंच और प्रयास को लेकर एक ऐसी चिन्ता भी है जिसका निवारण उनलोगों को करना है जो इसका नेतृत्व कर रहे हैं. चिन्ता यह है कि क्या इतने सारे जनसंगठन लंबे समय तक एक मंच पर और एक साथ रह पाएंगे? इस बात की पूरी संभावना है कि आपसी मतभेद की वजह से फिलहाल आपस में मंच साझा कर रहे जनसेवी और सामाजिक कार्यकर्ता बाद में अलग-अलग राह चले जाएं.

इस चिंता को जब बिहार से आए वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता आशीष रंजन के सामने रखा गया तो उन्होंने इसे खारिज कर दिया. आशीष उन लोगों में से एक हैं जिनके प्रयास से करीब 30 जनवादी संगठनों का यह मंच अस्तित्व में आ सका है. वो कहते हैं, ‘देखिए, अभी-अभी तो सब लोगों के प्रयास से एक साझे मंच का निर्माण हुआ है. अभी तो इस मंच का कोई नाम भी नहीं रखा जा सका है. सो अभी से इस बारे में कुछ कहना या अंदाजा लगाना सही नहीं होगा.’ वो आगे कहते हैं, ‘यह मंच लोगों का है. यहां कोई नेता नहीं है. किसी का अपना कोई हित नहीं है. सारे लोग अलग-अलग मुद्दों की लड़ाई लड़ रहे हैं सो इस वजह से ऐसा होना तो नहीं चाहिए. अगर ऐसा होता है तो जनता नेतृत्व करने वालों से हिसाब मांगेगी. लोग इतनी दूर फिर कभी नहीं आएंगे. जंतर-मंतर आने के लिए न तो चन्दा देंगे और न ही झोली फैलाकर चन्दा जुटाएंगे.’

नर्मादा बचाओ आंदोलन से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर इस साझे मंच को मौजूदा समय की सबसे बड़ी जरुरत बताती हैं. उनके शब्दों में, ‘यह सरकार बनी तो है देश की बहुसंख्य गरीब जनता के वोट से लेकिन काम कर रही है प्राईवेट कंपनियों के लिए. मेक इन इंडिया के लिए ये लोग देश के बचे खुचे श्रम कानून को खत्म कर देंगे. सरकार एक मिनट में, अदानी को कई करोड़ का कर्ज दे देती है लेकिन आमलोगों का बैंक अकाउंट खुलवाने का ढोल पीटती है. सामने कंपनी की सरकार है अगर ऐसे में हम सब एक साथ नहीं आएंगे तो टिक नहीं पाएंगे.’ इस प्रदर्शन में जन संगठनों ने जो हुंकार भरी है वो केंद्र सरकार की नीतिओं पर कितना असर डालेगी और यह साझा मंच कब तक एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार के सामने टिका रहेगा इसका जवाब जल्द ही मिलने लगेगा. फिर भी इतना साफ है कि सरकार के लिए उस आवाज को, जो गांव की पगडंडी से चलकर देश की संसद के पास तक पहुंची है, अनसुना कर पाना मुश्किल होगा.

कनहर कथा

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कई बार सच्चाई कहानियों से ज्यादा फैंटेसी समेटे होती है. कनहर बांध परियोजना भी ऐसी ही सच्चाई है. इस सच्चाई के एक छोर पर अधर में लटकी एक बांध परियोजना है और दूसरे छोर पर एक लाख के करीब आदिवासी ग्रामीण आबादी है. यह बांध परियोजना उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में बहने वाली कनहर नदी पर प्रस्तावित है. आज नए सिरे से यह परियोजना गांव, जंगल और पहाड़ के लिए डूब का संदेश लेकर आई है.

कनहर सोन की सहायक नदी है. सोनभद्र जिला उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है, इसका क्षेत्रफल 6788 वर्ग किलोमीटर है जिसका 3792.86 वर्ग किलोमीटर इलाका जंगल से घिरा है. सोनभद्र की सीमाएं उत्तर पूर्व में बिहार से, पूर्व में झारखंड से, दक्षिण में छत्तीसगढ़ और पश्चिम में मध्यप्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर तथा चंदौली जिलों से मिलती है. सोनभद्र  की 70 फीसदी आबादी आदिवासी है जिसमें गोंड, करवार, पन्निका, भुईयां, बइगा, चेरों, घासिया, धरकार और धौनार आते हैं. अधिकतर ग्रामीण आदिवासी अपनी जीविका के लिए जंगलों पर निर्भर हैं, वे जंगल से तेंदूपत्ता, शहद, सूखी लकड़ियां और जड़ी-बूटियां इकट्ठा कर उन्हें बाजार में बेचते हैं. कुछ के पास छोटी जोतें भी हैं जो ज्यादातर चावल और कभी-कभी सब्जियां पैदा करते हैं. इस इलाके में रहने वाले बहुत से आदिवासियों को रिजर्व फॉरेस्ट एक्ट के अनुच्छेद 4 तथा अनुच्छेद 20 ने उनकी जमीन और वनाधिकार से वंचित कर रखा है. रिजर्व फॉरेस्ट एक्ट की वजह से बहुत से लोगों पर फर्जी मुकदमे लाद दिए गए हैं. यह कहानी एक अलग रिपोर्ट की मांग करती है.

सोनभद्र जिला भारत के विकास के उस मॉडल का शिकार है जिसे आजादी के बाद अपनाया गया. पूरा सोनभद्र औद्योगिक प्रदूषण और विस्थापन की मार से दो-चार है. अध्ययन बताते हैं कि सोनभद्र का पानी जहरीला हो चुका है और हवा प्रदूषित. इसी सोनभद्र में विस्थापन की एक नई कहानी लिखने की तैयारी कर रहा है कनहर बांध. कनहर बहुद्देशीय परियोजना की कहानी शुरू होती है छह जनवरी 1976 से जब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने इस परियोजना का शिलान्यास किया था. कनहर नदी पर बनने वाली इस परियोजना का असर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, छत्तीसगढ़ के सरगुजा और झारखंड के गढ़वा जिले पर पड़ना था. एक अनुमान के मुताबिक तैयार होने के बाद इसका जलक्षेत्र 2000 वर्ग किलोमीटर का होगा और तीन राज्यों के करीब 80 गांव इसके प्रभाव क्षेत्र में आएंगे. इसी अनुमान के मुताबिक तकरीबन एक लाख ग्रामीण-आदिवासी आबादी हमेशा के लिए अपनी पुश्तैनी जमीनों से उजड़ जाएगी.

कनहर बहुद्देशीय परियोजना को सितंबर 1976 में केंद्रीय जल आयोग की अनुमति मिली और इसकी प्रारंभिक अनुमानित लागत 27 करोड़ रुपये आंकी गई. 1979 में इसे 55 करोड़ रुपये के साथ नए सिरे से तकनीकी अनुमति मिली. मध्य प्रदेश (अब छत्तीसगढ), बिहार और उत्तर प्रदेश के बीच पानी और डूब क्षेत्र को लेकर चलने वाले विवाद को नजरंदाज करके परियोजना को अनुमति दी गई और अंततः उसकी लागत 69 करोड़ रुपये बताई गई. तीनों ही प्रदेशों के पर्यावरण मंत्रालयों ने इस इलाके में होने वाले भयानक नुकसान की आशंका को नजरंदाज किया और कोई भी ऐसा विस्तृत सर्वेक्षण नहीं किया जो परियोजना द्वारा पर्यावरण और आबादी पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का ठीक-ठाक आकलन करता हो. एक शुरुआती अध्ययन के अनुसार यह अनुमान लगाया गया कि तकरीबन एक लाख पेड़, 2500 कच्चे घर, 200 पक्के घर, 500 कुएं, करीब 30 स्कूल और कुछ अन्य इमारतें डूब क्षेत्र में आएंगी. आज यह आकंड़े और बढ़ गए होंगे. इस बांध परियोजना से होने वाले विस्थापन के विरुद्ध शुरू हुए कनहर बचाओ आंदोलन के सक्रिय आदिवासी नेता विश्वनाथ खरवार बताते हैं कि परियोजना के शिलान्यास के बाद एक एकड़ का 22 सौ रुपये की दर से मुआवजा दिया गया था. लेकिन जैसा कि दावा किया गया था जमीन के बदले जमीन किसी को नहीं दी गई. परियोजना पर जो भी थोड़ा बहुत काम हुआ उसमें बाहर से मजदूर बुलाए गए और स्थानीय लोगों को मजदूर के लायक भी नहीं समझा गया.

कनहर बहुद्देशीय परियोजना को सितंबर 1976 में केंद्रीय जल आयोग की अनुमति मिली और इसकी प्रारंभिक अनुमानित लागत 27 करोड़ रुपये आंकी गई

1976 में पहले शिलान्यास के बाद साल दर साल कनहर की कहानी नाटकीय होती गई. नियमित अंतराल के बाद काम शुरू होता, फिर बंद हो जाता. यहां कभी भी लगातार काम नहीं चला. सिंचाई विभाग और लोक निर्माण विभाग के दस्तावेज देखने पर पता चलता है कि पैसे का खर्च लगातार दिखाया जाता रहा. 1984 में काम रुक गया और सूत्र यह बताते हैं कि उसका पैसा दिल्ली में होने वाले एशियाई खेलों की तरफ स्थानांतरित कर दिया गया. 1989 में पुन: काम शुरू हुआ और 16 परिवार उजाड़ दिए गए. इसके बाद दो दशक से ज्यादा या तो काम बंद रहा या छिटपुट कामकाज होता रहा. कनहर बांध की साइट पर जाकर देखा जा सकता है कि करोड़ों रुपये के यंत्र यूं ही धूप-धूल और मिट्टी में बर्बाद हो रहे हैं. लेकिन इस नाटक में कई और मोड़ आने बाकी थे. इस रुकी हुई परियोजना के लिए एक नया शिलान्यास उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने 15 जनवरी 2011 को किया. काम फिर भी शुरू नहीं हो सका. कनहर बांध के स्पिल वे का निर्माण कार्य शुरू करने के लिए एक नया शिलान्यास सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण मंत्री शिवपाल सिंह यादव द्वारा सात नवंबर 2012 को हुआ. शिलान्यास दर शिलान्यास चलता रहता है  लेकिन काम शुरू नहीं होता और गांव वालों के सिर पर तलवार हमेशा लटकती रहती है. बजट बनता है, पैसा खर्च होता है और लोग अर्ध विस्थापन में जीने को बाध्य रहते हैं.

इस हाल से तंग आकर ग्राम स्वराज समिति की पहलकदमी पर आदिवासी किसानों ने सन 2000 में कनहर बचाओ आंदोलन की शुरुआत की. इस आंदोलन का उद्देश्य था कनहर बांध से होने वाले पर्यावरण विनाश और विस्थापन के खिलाफ व्यापक जनगोलबंदी करना. कनहर बचाओ आंदोलन के जरिए ग्रामीण आदिवासियों ने कनहर बांध को नकार दिया. ग्राम स्वराज समिति के संयोजक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता महेषानंद कहते हैं, ‘सन 1976 में शुरू की गई यह परियोजना 1984 में परित्यक्त कर दी गई. आज 30 साल बाद बिना किसी नई अनुमति या अध्ययन के उसे फिर से शुरू करने का क्या औचित्य है? यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि परियोजना के आरंभ होने से पहले सरकार ने अधिसूचना जारी कर भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की थी किंतु 1984 में योजना के परित्यक्त हो जाने के बाद अधिग्रहण की प्रक्रिया स्वतः ही समाप्त हो जाती है.’

केवल इतना ही नहीं बल्कि अधिग्रहित जमीनों पर उसके मालिक ही काबिज रहे. वह इस जमीन पर खेती करते रहे और उसका कर्ज भरते रहे और कुछ लोगों ने इस जमीन के आधार पर कर्ज भी लिया. इस सबका रिकॉर्ड राजस्व विभाग की फाइलों में दर्ज है. यानी अधिग्रहण के बाद भी जमीन की मिल्कियत किसानों के पास ही रही. इस संबंध में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि यदि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया किसी कारण से समाप्त हो जाती है तो चाहे उस व्यक्ति ने मुआवजा ले भी रखा हो तो भी भूमि अधिग्रहण कानून 1894 की धारा 48 (3) के अंतर्गत ऐसे व्यक्ति की जो मानसिक व आर्थिक क्षति पहुंची है इसके लिए सरकार उसे मुआवजा देने के लिए बाध्य है. इन्हीं सब आधारों पर डूब क्षेत्र में आने वाली सोनभद्र की सभी ग्राम सभाओं ने कनहर बांध के विरोध में पहले ही प्रस्ताव पारित कर रखा है. इन सभी ग्राम सभाओं ने अपने प्रधानों के माध्यम से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक याचिका (697043/2011) भी दायर कर रखी है.

कनहर बचाओ आंदोलन से जुड़े पीयूसीएल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता रवि किरन जैन कहते हैं, ‘कनहर बांध सिर्फ गैर कानूनी ही नहीं बल्कि असंवैधानिक भी है. 73वें संविधान संशोधन के बाद अब ग्राम सभाएं उतनी ही महत्वपूर्ण संस्थाएं बन गई हैं जितनी की संसद या विधानसभाएं हैं. यानी कनहर क्षेत्र में भूमि सुधार, खेती के विकास या सिंचाई से संबंधित योजनाएं अगर बननी हैं तो यह ग्राम सभाओं के अधिकार क्षेत्र में हैं. ये योजनाएं अब ग्राम सभाएं बनाएंगी न कि केंद्र या राज्य सरकार उन पर लादेंगी. वास्तविकता यह है कि प्रभावित होने वाले गांव की ग्राम सभाओं ने सर्वसम्मति से बांध को नकार दिया है. उत्तर प्रदेश सरकार को नियामगिरी के अनुभव से सबक लेना चाहिए.’ इस लिहाज से देखा जाय तो यह परियोजना गांव के संवैधानिक आधिकारों को चुनौती देना है. केवल इतना ही नहीं है इन क्षेत्रों में लगातार पंचायत चुनाव होते रहे हैं. पंचायतें निर्माण एवं विकास कार्य करती रही हैं और यहां मनरेगा जैसी योजनाएं भी लागू हैं.

इन स्थितियों को नजरअंदाज करके स्थानीय प्रशासन ने विधायक रुबी प्रसाद की अध्यक्षता में पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना के मसले पर ग्रामीणों की सभा बुलाई. 16 जून 2014 को आयोजित इस सभा में हजारों लोग मौजूद थे. मंच पर आकर सभी ग्रामीण आदिवासियों ने कनहर बांध के विरोध में बात रखी. यहां वक्ताओं में वे ग्राम प्रधान भी मौजूद थे जिन्होंने बांध के विरोध में प्रस्ताव पारित कर रखा है. अंत में मुख्यमंत्री को संबोधित एक ज्ञापन भी प्रशासन को सौंपा गया, लेकिन जब इस सभा की कार्यवाही की रपट प्रधानों के पास पहुंची तो वे चकित रह गए. इसमें सिर्फ सरकारी अधिकारी एवं विधायक के वक्तव्य थे. जनता के विरोध को उसमें जगह ही नहीं दी गई थी. इससे पता चलता है कि प्रशासन एवं सरकार एक कृत्रिम सहमति बनाने की कोशिश कर रही है.

फिलहाल सोनभद्र में टकराव की स्थिति है. प्रशासन अभी कुछ कहना नहीं चाहता. कनहर बचाओ आंदोलन की ओर से कई जगह परियोजना प्रस्ताव की प्रतियां जलाने का कार्यक्रम प्रस्तावित किया गया है. कहनर बांध की कहानी जारी है. तीन शिलान्यास, करोड़ों रुपये, विस्थापन की आशंका और सोनभद्र का पहले से ही घबराया हुआ पर्यावरण अपनी जगह कायम है. वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता ओडी सिंह कहते हैं कि इस परियोजना की अगर कायदे से जांच हो तो एक बहुत बड़ा आर्थिक घोटाला सामने आ सकता है.

महाराष्ट्र: घोटालों की पाठशाला

फोटोः प्रतीक गोयल
फोटोः प्रतीक गोयल
फोटोः प्रतीक गोयल

एक भव्य इमारत के सामने फैली हरी घासवाले मैदान में गुलाबी और नीले रंग की स्कूली ड्रेस पहने कुछ बच्चे  खेल रहे हैं. इमारत पर लिखा है ‘शासकीय प्राथमिक व माध्यमिक आश्रमशाला’. यह चित्र महाराष्ट्र के आदिवासी विकास विभाग की सूचना पुस्तिका का मुखपृष्ठ है. इस पुस्तिका के माध्यम से हमें एक आदर्श आश्रमशाला का परिचय मिलता है. लेकिन महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में चल रही इन आश्रमशालाओं की जमीनी हकीकत सूचना पुस्तिका के मुख्यपृष्ठ से एकदम परे है. साल 2001 से 2013 के दौरान इन आश्रमशालाओं में 793 बच्चों की जान जा चुकी है, कुछ की मामूली तबीयत ख़राब होने से और कुछ की सांप-बिच्छू के काटने से. हर बार इन आदिवासी बच्चों की मृत्यु का मुख्य कारण आश्रमशालाओं में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी को बताया जाता है. आदिवासियों के हित की लड़ाई लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सालाना 300 करोड़ रुपये का बजट होने के बावजूद भी आदिवासी बच्चों के लिए बनी इन आवासीय आश्रमशालाओं की हालत जर्जर है. स्कूल इमारतों की खस्ता हालत, घटिया स्तर का भोजन और यौन शोषण की घटनाएं यहां रोजमर्रा का किस्सा बन चुकी हैं.

जुलाई 2012 में गोंदिया जिले के मक्कड़घोड़ा क्षेत्र की एक आश्रमशाला में जमीन पर सो रहे छह बच्चों को सांप ने काट लिया. इनमें से दो बच्चों की मौत हो गई. शाला में पलंगों की कमी के चलते ये बच्चे जमीन पर सोने को मजबूर थे. इस आश्रमशाला की कुल क्षमता 384 है, इनमें से 150 बच्चे पलंगों के आभाव में जमीन पर सोते हैं.

दिसंबर 2012 में नासिक जिले की एक आश्रमशाला के प्रांगण में एक 18 वर्षीय आदिवासी बालिका के सामूहिक बलात्कार का मामला सामने आया था, जिसके बाद शाला में कार्यरत अधीक्षक समेत 15 लोगों को निलंबित कर दिया गया था. ये सभी 15 आरोपित कर्मचारी ड्यूटी के वक्त आश्रमशाला से नदारद थे, जबकि नियमों के अनुसार बच्चों की सुरक्षा के लिहाज से अधीक्षक को स्थायी रूप से आश्रमशाला में रहना चाहिए.

जनवरी 2009 में पालघर जिले के गोवडे नामक गांव की एक आश्रमशाला में 15 वर्षीय बालिका के गर्भवती होने का मामला उजागर हुआ था. बाद में पता चला कि शाला अधीक्षक ने आदिवासी छात्रा की पारिवारिक समस्याओं को सुलझाने का लालच देकर उसका यौन शोषण किया था.

इन आश्रमशालाओं की वास्तविकता से रूबरू होने के लिए तहलका ने महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल नंदुरबार जिले का दौरा किया. आदिवासी जनसंख्या के हिसाब से नंदुरबार महाराष्ट्र का सबसे बड़ा जिला है, यहां की 70 फीसदी आबादी आदिवासी है, इस जिले में भील, तडवी और पावरा समुदाय के आदिवासियों की बहुलता है.

सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित अक्कलकुवा तहसील के दहेल गांव की एक आश्रमशाला का नजारा विचित्र था. 14 नवंबर की सुबह करीब साढ़े दस बजे 12 साल की दो लड़कियां उस झोपड़ीनुमा इमारत के एक कमरे के फर्श पर झाड़ू लगा रही थीं. लगभग 350 वर्ग फीट के कमरे के कोनों में लोहे के छोटे बक्से पड़े हुए थे, दीवारों पर दो ब्लैकबोर्ड लगे हुए थे. कमरे की बाहरी दीवार पर प्रदेश और जिले के नक्शे के साथ साथ हिन्दू देवी सरस्वती का धूमिल सा चित्र टंगा हुआ था,  और कमरे के दरवाजे के ठीक ऊपर आदिवासी विकास विभाग का लोगों देखा जा सकता था. ठीक सामने की झोपड़ी के बाहर छोटी उम्र के कुछ लड़के फटे, मैले ,बदरंग कपड़ो में, जो कि स्कूल का यूनिफार्म था,  बैठे हुए दिखते है. वे आपस में कुछ बातचीत कर रहे थे. पास ही की झोपड़ी में 5-6 नौजवान एक चारपायी पर बैठे हुए थे. निरक्षरता के मामले में पूरे महाराष्ट्र में अक्कलकुवा पहले स्थान पर है. चारपायी पर बैठे नौजवानों में से एक ने अपना परिचय देते हुए कहा, ‘मेरा नाम राम्या वसावे है. मैं यहां पर अस्थायी शिक्षक की हैसियत से काम करता हूं.’ वे आगे बताते हैं,’हम लोग प्रधानाध्यापक का इंतजार कर रहे हैं, उनके आने के बाद हम बाल दिवस मनायेंगे.’

फोटोः प्रतीक गोयल
फोटोः प्रतीक गोयल

वसावे बताते हैं कि दहेल आश्रमशाला में 340 आदिवासी छात्र रहते और पढ़ते हैं.यहां पहली से सातवीं तक की कक्षाएं लगती हैं. 340 विद्यार्थियों में से 280 विद्यार्थी यहीं रहते हैं और बाकी गांव में रहते हैं. उन्होंने बताया, ‘लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग रहने की व्यवस्था है, बच्चों के रहने के लिए यहां तीन भवन हैं. इनमें से 190 लड़कियां हैं जो दो भवनों में रहती हैं, बाकी बचे हुए एक भवन में  90 लड़के रहते हैं.’

साल 2001 से 2013 के दौरान इन आश्रमशालाओं में 793 बच्चों की जान जा चुकी है, कुछ की मामूली तबीयत खराब होने से और कइयों की सांप-बिच्छू के काटने से

दहेल की इस आश्रमशाला के भूगोल को समझा जाए तो कुल चार झोपड़ियां नजर आती हैं. इनमें से तीन को स्कूल और बोर्डिंग दोनों के लिए इस्तेमाल किया जाता है और बची हुई एक झोपड़ी में विद्यार्थियों के लिए भोजन बनाया जाता है. सबसे बड़ी झोपड़ी में तीन कमरे हैं, इनमें से एक कमरे में कक्षाएं भी लगती है और विद्यार्थी भी रहते हैं और बाकी दो कमरों का उपयोग दफ्तर और भंडारगृह के रूप में होता है. गौरतलब है कि 280 बच्चों के लिए आश्रमशाला में 350 वर्ग फीट के पांच कमरे हैं, जिसका मतलब छह से 14 साल के करीबन 50-60 बच्चों को 350 वर्ग फीट के एक कमरे में रखा जाता है. यह हालत सिर्फ दहेल की आश्रमशाला की ही नहीं बल्कि प्रदेश भर की ज्यादातर आश्रमशालाओं की यही दुर्दशा है.

आदिवासी विकास विभाग के नियमों के अनुसार एक आश्रमशाला में भलीभांति निर्मित एक भवन होना चाहिए जिसका विद्यालय और विद्यार्थी आवास के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके. एक कंप्यूटर सेंटर होना चाहिए, एक प्रधानाध्यापक और अधीक्षक समेत विभिन्न विषयों के लिए विशेष शिक्षक होने चाहिए. बच्चों को नियमित रूप से अंडे, दूध, फल, सब्जी, रोटी, चावल, दाल युक्त पौष्टिक आहार मिलना चाहिए. स्वास्थ्य संबंधित सेवाएं मिलनी चाहिए, हर तीन महीने में चिकित्सकीय जांच होनी चाहिए. स्कूल यूनिफॉर्म, किताबें, सोने के लिए गद्दे, चादरें, छात्र-छात्राओं के रहने के लिए अलग-अलग आवासीय परिसर होना चाहिए. अलग शौचालय इत्यादि जैसी व्यवस्थाएं होना अनिवार्य हैं.

लेकिन दहेल की आश्रमशाला में बिजली और पानी जैसी बुनियादी व्यवस्था तक नहीं है, अलग शौचालय और कंप्यूटर सेंटर तो बहुत दूर की बात है. इस आश्रमशाला में अगर कुछ है तो वह कुछ अंधियारे कमरे जहां स्टील के बक्से पड़े हैं. इनमें यहां रहने वाले आदिवासी बच्चे अपना सामान रखते हैं, कुछ ब्लैक बोर्ड्स हैं और मुश्किल से तीन-चार फीट लम्बे रेक्सिन के कवर से बने कुछ तकियेनुमा गद्दे जिनका इस्तेमाल यहां के बच्चे बिस्तर के रूप में करते हैं.

आश्रमशालाएं बिजली-पानी की बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं, अलग शौचालय और कंप्यूटर तो दूर की बात है. बच्चे सीलन भरे अंधियारे कमरों में रहने को मजबूर हैं

फोटोः प्रतीक गोयल
फोटोः प्रतीक गोयल

जब यहां पढ़ने वाले बच्चों से बात की गई तो समझ में आया की इन बच्चों के भोजन पर जो लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं वह सिर्फ सरकारी फाइलों तक ही सीमित हैं, क्योंकि यहां रह रहे बच्चों को ढंग से तीन वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता है. 13 साल की कपिल (बदला हुआ नाम), जो की सातवीं कक्षा में पढ़ती हैं, झिझकते हुए कहती हैं, ‘हमें सुबह सात बजे नाश्ता मिलता है, दस बजे दोपहर का खाना और शाम को छह बजे रात का खाना मिलता है, इसके बाद हमें कुछ नहीं दिया जाता, तीनों समय हमें पोहा और खिचड़ी दिया जाता है.” जब उससे पूछा गया कि क्या उन्हें यहां दूध या चाय दी जाती है तो वह सीधे न में जवाब देती है.

छठवी कक्षा में पढ़ रहीं 12 वर्षीय सुनीता (बदला हुआ नाम) कहती हैं , ‘यहां स्नानघर और शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं हैं, हम सभी को नहाने या शौच के लिए नदी पर जाना पड़ता है.’ दहेल की इस आश्रमशाला में शौचालय के नाम पर बिना छत की , ईंट की दो दीवारें खड़ी हैं.

जब दोनों छात्राओं से पूछा गया कि क्या वे बाल दिवस मनाएंगी, तो दोनों ने गर्दन हिलाते हुए न में इशारा किया.

आश्रमशालाओं का सालाना बजट 300 करोड़ का है लेकिन इस बजट का एक-तिहाई हिस्सा ही इनकी देखरेख पर खर्च होता है, बाकी नई आश्रमशालाओं के निर्माण में खर्च हो रहा है

कुछ और बच्चों से बातचीत करने पर पता चलता है कि आश्रमशाला में स्वास्थ्य सुविधा जैसी को सुविधा उपलब्ध नहीं हैं. बच्चों की नियमित तौर पर होने वाली अनिवार्य चिकत्सकीय जांच भी कभी नहीं होती है. और इन सबसे हटकर जब विद्यालय के मुख्य मकसद यानी पढ़ाई-लिखाई पर बात की गई तो एक और कड़वी हकीकत से सामना हुआ. छात्रों ने बताया कि प्रधानाध्यापक पिछले एक महीने से आश्रमशाला नहीं आये हैं और अधीक्षक सुबह आकर शाम को अपने घर लौट जाते हैं. गौरतलब है कि, नियमों के अनुसार आश्रमशालाओं में कार्यरत अधीक्षक को आश्रमशाला में प्रवास करना चाहिए. बच्चों की देखभाल और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी अधीक्षक पर होती है.

इस बात की पुष्टि वहां मौजूद कुछ दूसरे शिक्षकों से करने की कोशिश की गई तो उन्होंने दबी जुबान में स्वीकार किया, ‘यह बात सही है कि प्रधानाध्यापक नहीं आ रहे हैं और अधीक्षक अपने घर चले जाते हैं, लेकिन हम उन्हें कुछ नहीं बोल सकते. हम तो दैनिक वेतन पर हैं 56 रुपये प्रति घंटे के हिसाब से हमें पैसे मिलते हैं. वे लोग तो स्थायी कर्मचारी हैं उनकी तनख्वाह 35,000 रुपये से ऊपर है. वे हमें कभी भी बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं.’

जब उनसे पूछा गया कि अधीक्षक की गैर मौजूदगी में रात को बच्चों का ध्यान कौन रखता है, तब एक शिक्षक ने नाम ना बताने की शर्त पर कहा, ‘अधीक्षक ने मेहनताने पर एक चौकीदार रखा है जो रात को आश्रमशाला में रहता है.’

दहेल आश्रमशाला में बच्चों के लिए भोजन बनाने वाली आशा वलवी शिकायत करती हैं, ‘जून में हमारी नियुक्ति के बाद से ही हमें तनख्वाह नहीं मिली है, न ही हमें यह बताया गया कि कितने पैसे मिलेंगे, पता नहीं अब कब तनख्वाह मिलेगी.’

क्षेत्र की बाकी आश्रमशालाएं भी इसी तरह की दुर्दशा की शिकार हैं. सरी गांव की आश्रमशाला का जायजा लेते वक्त जब वहां के प्रधानाध्यापक केपी तड़वी से बातचीत करने की कोशिश की गई तो वे उत्तेजित होकर बोले, ‘न यहां पानी है, न बिजली है. पानी पीने के लिए भी बच्चों को एक किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. पहाड़ पर बनी सडकों की हालत भी जर्जर है. नेता भी यहां तभी आते हैं जब उन्हें आदिवासियों के वोटों की जरूरत पड़ती है. मैं खुद भी आदिवासी हूं, बचपन से यहीं हूं पर आज तक कुछ भी अच्छा नहीं हुआ ऊपर से हमारे ऊपर लांछन लगा दिया जाता है कि  हम नक्सल हैं.’

सरी स्थित आश्रमशाला में 400 आदिवासी बच्चे पढ़ते हैं, यहां पहली से दसवी तक कक्षाएं लगती हैं. ये बच्चे भी बिना किसी सुविधा के इस आश्रमशाला के छोटे और गंदे कमरो में रहते हैं. सरी आश्रमशाला की अधीक्षक अनीता वसावे बताती हैं, ‘बरसात के समय यहां की स्थिति और भी खराब हो जाती है, छत से पानी टपकता रहता है, बिजली नहीं रहती. इसके चलते विद्यार्थियों और शिक्षकों को भारी मुसीबत का सामना करना पड़ता है. मानसून के बाद बिजली तो आती है लेकिन 15 दिन में एक बार.

आश्रमशालाओं में शौचालयों के अभाव के चलते जब लड़कियां नहाने के लिए नदियों पर जाती हैं तो गांव के मनचले उन्हें अक्सर परेशान करते हैं

फोटोः प्रतीक गोयल
फोटोः प्रतीक गोयल

वे कहती हैं, ‘यहां बाथरूम-टॉयलेट कुछ नहीं है. लड़की-लड़के सभी को नहाने इत्यादि के लिए नदी पर जाना पड़ता है. यह बेहद असुरक्षित तरीका है लेकिन क्या कर सकते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है.’

पिछले आठ वर्षों से यहां काम कर रहे एक अस्थायी कर्मचारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं, ‘मोटी तनख्वाह मिलने के बावजूद भी स्थायी कर्मचारी ड्यूटी पर नहीं आते, कानूनन उन्हें तीन साल तक एक आश्रमशाला में काम करना पड़ता है, लेकिन वह एक-डेढ़ साल काम करके यहां से निकल जाते हैं. इन शिक्षकों का इस तरह का रवैया बच्चों की पढ़ाई के लिए बहुत नुकसानदेह है.’

गौरतलब है कि आश्रमशाला में कार्यरत स्थायी शिक्षकों को 35,000 से 56,000 रुपये प्रति माह तक वेतन मिलता है, वहीं दूसरी ओर अस्थायी शिक्षकों को एक दिहाड़ी मजदूर की तरह घंटे के हिसाब से वेतन दिया जाता है, इन शिक्षकों को 56 रुपये प्रति घंटे के

हिसाब से पैसे मिलते हैं और आम तौर पर ये अस्थायी शिक्षक पांच घण्टे काम करते हैं.

मोलगी गांव की पश्चिम खानदेश भील सेवा मंडल प्राथमिक व माध्यमिक आश्रमशाला का दफ्तर तो अच्छा नजर आता है, यहां पर बच्चों की संख्या 504 है, एक कंप्यूटर सेंटर भी है लेकिन बच्चों के रहने की व्यवस्था यहां भी दहेल और सरी की तरह ही दयनीय है. सरकारी सहायता प्राप्त यह आश्रमशाला इलाके के प्रभावशाली नेता सुहास नटावडकर के निजी ट्रस्ट द्वारा संचालित होती है. यहां के प्रधानाध्यापक वीएच चौधरी ने बताया कि उन्हें सरकार से सालाना 33 लाख रुपये की आर्थिक मदद मिलती है, यह बेहद कम है. वे कहते हैं, ‘आश्रमशाला को सुचारु रूप से चलाने के लिए और पैसे की जरुरत है.’ जब उनसे आश्रमशाला की दयनीय अवस्था के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘नए भवन का निर्माण करने की योजना चल रही है लेकिन कुछ कानूनी कारणों से काम शुरू नहीं हो पा रहा है.’

स्थायी शिक्षकों को 35,000 से 56,000 रुपये प्रति माह वेतन मिलता है, जबकि अस्थायी शिक्षकों को दिहाड़ी मजदूर की तरह 56 रुपये प्रति घंटे के हिसाब से पैसा मिलता है

नंदुरबार की शहादा तहसील की शासकीय आश्रमशाला भी मोलगी गांव की आश्रमशाला से मेल खाती है, फर्क इतना भर है कि इसके अगल बगल का माहौल थोड़ा शहरी है. शाला की रसोई के पास कूड़े का ढेर और गंदगी का साम्राज्य नजर आता है. पढ़ाई का आलम यह है कि यहां दसवीं कक्षा के बच्चे अंग्रेजी के मामूली शब्द जैसे शुगर और एलीफेंट जैसे सामान्य शब्द भी नहीं पढ़ सकते. यह तब है जबकि अंग्रेजी भाषा आश्रमशालाओं के पाठ्यक्रम का हिस्सा है. यहां के प्रधान अध्यापक आरओ भरारी कहते हैं, ‘हमारी आश्रमशाला निर्माणाधीन है इसलिए अभी आश्रमशाला किराये की इमारत में चल रही है. इसी वजह से यहां की हालत ऐसी है, पैसों की कमी के चलते हम पिछले छह महीनों से किराया भी नहीं दे पाये हैं.’

लोक संघर्ष मोर्चा की महासचिव प्रतिभा शिंदे पिछले 21 वर्षों से नंदुरबार जिले में आदिवासियों के विकास और उनके हक की लड़ाई लड़ रही हैं. वे बताती हैं, ‘सरकारी आश्रमशालाओं का कोई बुनियादी ढांचा नहीं है. शिक्षक सिर्फ नाम के लिए यहां पढ़ाने आते हैं और स्थायी शिक्षक जिनकी मोटी तनख्वाह है वह तो ड्यूटी से अक्सर नदारद ही रहते हैं.’ वे आगे बताती हैं, ‘सरकारी सहायता प्राप्त आश्रमशालाएं अधिकतर नेताओं और उनके रिश्तेदारों की जागीर बन चुकी है. ये नेता सभी पार्टियों से आते हैं. इनके लिए आश्रमशालाएं एक व्यवसाय हैं. शालाओं में जितने बच्चे होते उससे ज्यादा बच्चे इनके रजिस्टर में दर्ज होते हैं. ये गलत आंकड़े दिखाकर सरकार से पैसा ऐंठते हैं.’

फोटोः प्रतीक गोयल
फोटोः प्रतीक गोयल

शिंदे के मुताबिक बच्चों की सुरक्षा इन आश्रमशालाओं की प्राथमिकता में कहीं नहीं आता. कई बार तो ऐसा होता है कि रात को अधीक्षक बच्चों को बाहर से बंद करके अपने घर चले जाते हैं, छोटे बच्चे जिनको रात को शौच जाना होता है बाहर नहीं जा पाते और कमरों में शौच कर देते हैं और अगले दिन जब अधीक्षक आता है तो ना सिर्फ वह बच्चों को मारता-पीटता है बल्कि उन्हीं से सफाई भी करवाता है. आश्रमशालाओं में शौचालयों के अभाव के चलते जब लड़कियां नहाने के लिए नदियों पर जाती हैं तो अक्सर गांव के मनचले उन्हें परेशान करते हैं.

लोक संघर्ष मोर्चा के एक सर्वेक्षण का हवाला देते हुए शिंदे बताती हैं कि तलोदा, अक्कलकुवा, धाडगांव और शहादा, नंदुरबार जिले की चार तहसीलें हैं. इनमें से शहादा को छोड़कर बाकी तीन कुपोषित इलाकों की श्रेणी में आती हैं. हर साल इन तहसीलों के गांवों की 70 प्रतिशत आबादी (बच्चों सहित ) काम और भोजन की तलाश में दूसरे शहरों में जाती है. ये लोग छह से सात महीने दूसरे शहरों में रहते हैं. जब इतने लम्बे समय के लिए इतनी बड़ी आबादी बाहर रहती है तो फिर कैसे इन आश्रमशालाओं में 400-500 बच्चे पूरा-पूरा साल पढ़ रहे हैं. इन शालाओं के अधिकारी और नेता बच्चों के गलत आंकड़े दिखाकर सरकार से अनुदान ले रहे हैं. वे कहती हैं, ‘इन शालाओं में भ्रष्टाचार चरम पर है, उत्तर महाराष्ट्र की सभी आश्रमशालाओं को बंद कराने के लिए जल्द ही हम एक आंदोलन करने वाले हैं.’

एक स्थानीय आदिवासी कार्यकर्ता सुमित्रा वसावे ने बताती हैं कि  पिछले साल धड़गांव तहसील के रोशमाल गांव की एक आश्रमशाला का दसवीं कक्षा का परिणाम शून्य प्रतिशत आया था, सभी विद्यार्थी फेल हो गए थे. उन्होंने बताया कि इस आश्रमशाला के अगल बगल शराब की बहुत सारी भट्टियां हैं और शिक्षक भी शाला में शराब पीकर पहुंच जाते थे.

जब तहलका ने आदिवासी विकास विभाग प्रकल्प अधिकारी शुक्राचार्य दुधाड़ से उनके तलोदा स्थित दफ्तर में बात की तो उन्होंने बताया, ‘तलोदा में 62 आश्रमशालाएं हैं, जिसमें से 40 सरकारी हैं और बाकी सरकारी सहायता प्राप्त (निजी संस्थाओं द्वारा संचालित ). औसतन एक आश्रमशाला पर सालाना एक करोड़ रुपये खर्च किये जाते हैं. आदिवासी विकास विभाग आश्रमशालाओं को बेहतर बनाने का प्रयास कर रहा हैं. बाकी प्रदेशों के मुकाबले हमारा काम अच्छा है.’

महाराष्ट्र में आदिवासी विकास विभाग के 24 प्रकल्प हैं, जिनमे से 11 प्रकल्पों को संवेदनशील बताया गया है. इन संवेदनशील प्रकल्पों में तलोदा, जवाहर, पांढरकवड़ा, अहेरी, गढ़चिरोली, भामरागढ़, नासिक, कलवन, डहाणु, धारणी और किनवट का नाम आता है. विभाग के नियमों के अनुसार इन इलाकों में प्रकल्प अधिकारी आईएएस दर्जे का होना चाहिए और उसका कार्यकाल कम से कम तीन वर्ष का होना चाहिए. लेकिन प्लानिंग कमीशन के पूर्व सदस्य जयंत पाटिल की समिति की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1982 से लेकर अब तक इन संवेदनशील क्षेत्रों में सिर्फ पांच आईएएस अधिकारियों की पोस्टिंग हुई और इन पांचों का कुल कार्यकाल मिलाकर भी तीन वर्षों से कम रहा है. जयंत पाटिल समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में छह से 14 वर्ष की आयुवर्ग में 19 प्रतिशत आदिवासी बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं, इनमें से सात प्रतिशत बच्चे महाराष्ट्र से हैं.

प्रदेश में आश्रमशालाओं की दयनीय स्थिति को देखते हुए कुछ सामाजिक कार्यकर्ता इनको बंद कराने की मांग कर रहे हैं. नागपुर में सक्रिय विदर्भ जन आंदोलन समिति के नेता किशोर तिवारी उनमें से एक हैं. साल 2012 में तिवारी द्वारा मुंबई हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एमएस शाह को प्रदेश में आश्रमशालाओं की जर्जर स्थिति पर लिखा गया पत्र जनहित याचिका में तब्दील हो गया था. इसके आधार पर कोर्ट ने तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार को आश्रमशालाओं की स्थिति पर हलफनामा पेश करने का नोटिस जारी कर दिया था.

तिवारी कहते है, ‘आश्रमशालाओं के नाम पर राजनेता करोड़ों रुपये खा रहे हैं, जबकि बच्चों का कुछ भला नहीं हो रहा है इसलिए इन आश्रमशालाओं को बंद कर देना चाहिए. इसकी बजाय सरकार को आधुनिक सुविधाओं से लैस हॉस्टल इन आदिवासी बच्चों के लिए हर तहसील में खोलने चाहिए. इन आदिवासी बच्चों को दूसरे बच्चों के साथ अच्छे स्कूलों में तालीम मिलनी चाहिए जिससे इनका भविष्य सुरक्षित हो सके.’ तिवारी के अनुसार इस समस्या का मूल कारण है आदिवासी विकास के लिए घोषित निधि का दूसरे विभागों में बंट जाना.

फोटोः प्रतीक गोयल
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इस पूरे गड़बड़झाले पर तहलका ने आदिवासी विकास विभाग आयुक्त संजीव कुमार से बात की तो उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र में कुल 1108 आश्रमशालाएं हैं. इनमें से 552 सरकारी हैं और बाकी सरकारी सहायता प्राप्त हैं. कुमार कहते हैं, ‘हमें पता है कि आश्रमशालाओं की हालत खराब है लेकिन हम इसे ठीक करने का भरसक प्रयास कर रहे हैं. शालाओं में शिक्षकों की कमी है इसलिए हम 647 नए शिक्षकों की भर्ती कर रहे हैं जो कि अगले एक-दो हफ्ते में प्रदेश भर की आश्रमशालाओं में नियुक्त कर दिए जाएंगे.’

एक रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र से 1794 कंप्यूटर, 299 प्रिंटर और 299 टेबलों के लिए दस करोड़ रुपये की मंजूरी के बावजूद सिर्फ 166 कंप्यूटर ही आश्रमशालाओं के लिए खरीदे गए

आश्रमशालाओं के लिए सरकार ने लगभग 300 करोड़ रुपये का सालाना बजट तय किया है. कुमार मानते हैं कि यह बजट पर्याप्त है लेकिन इस बजट का दो-तिहाई हिस्सा नई आश्रमशालाओं के निर्माण में खर्च किया जा रहा है जिसकी वजह से पुरानी शालाओं के संचालन में रुराकवटें आ रही हैं. आदिवासी विकास विभाग के मुताबिक आदिवासियों के विकास के लिए आदिवासी उप योजना के तहत 4968 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान है. इसमें से छह प्रतिशत हिस्सा आश्रमशालाओं के लिए निर्धारित है.

फरवरी 2014 में हेमानंद बिस्वाल के नेतृत्व में स्टैंडिंग कमिटी ऑन सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट ने लोकसभा में अपनी एक रिपोर्ट पेश की थी. इस रिपोर्ट के तहत साल 2001 से 2013 के दौरान महाराष्ट्र में चल रही आश्रमशालाओं में 793 बच्चों की सांप-बिच्छू के काटने और मामूली बिमारियों के चलते मौत हुई थी. नासिक संभाग में सबसे ज्यादा 393 मौतों का मामला सामने आया था. इनमें से 116 बच्चों की मौत नंदुरबार जिले की तलोदा तहसील में हुई थी.

आश्रमशाला योजना के नियमों के अनुसार मृत बच्चों के परिजनों को मुआवजे के तौर पर 15,000 रुपये मिलने चाहिए, लेकिन कमेटी के अनुसार 340 परिवारों को कोई मुआवजा नहीं दिया गया. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र में आश्रमशालाओं के निरीक्षण में कमियां थी और ऑडिट रिपोर्ट में भी इन खामियों की तरफ इशारा किया गया था. इसके पूर्व 2005 में बनी परफॉरमेंस ऑडिट की रिपोर्ट में कहा गया है कि महाराष्ट्र सरकार ने 1953-54 में शुरू हुई आश्रमशाला योजना का कभी कोई मूल्यांकन नहीं किया. 2005 में आई इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि 1999 से 2004 तक किसी भी आश्रमशाला में बच्चों की चिकित्सकीय जांच भी नहीं हुई. जबकि नियमानुसार एक साल में ऐसी चार जांचें होनी चाहिए थीं. रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र से 1794 कंप्यूटर, 299 प्रिंटर और 299 टेबलों के लिए दस करोड़ रुपये की मंजूरी के बावजूद 166 कंप्यूटर ही आश्रमशालाओं के लिए खरीदे गए.

गढ़चिरोली जिले में आदिवासियों के हित की लड़ाई लड़नेवाले लालसू सोमा कहते हैं, ‘शिक्षक इस इलाके की आश्रमशालाओं में आदिवासी बच्चों को पढ़ाना नहीं चाहते. आश्रमशालाओं में बुनियादी ढांचा भी नहीं है, एक ही शिक्षक सारे विषय पढ़ाता है, यह किस तरह की पाठशाला  है.’ सोमा बिनागुंडा गांव (महाराष्ट्र की सीमा से लगे अबूझमाड़ इलाके का एक गांव ) का उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘इस इलाके के बच्चे आश्रमशाला में सिर्फ दो रोटी खाने के लिए जाते हैं, क्योंकि यहां कुपोषण बड़ी समस्या है.’

जब तहलका ने महाराष्ट्र के आदिवासी विकास मंत्री विष्णु सावरा से इन तमाम मुद्दों पर चर्चा की तो वे बोले, ‘मुझे आश्रमशाला की समस्याओं का अंदाजा है. अगले हफ्ते मैं इसका पूरा जायजा लूंगा और इससे संबंधित समस्याओं को सुलझाने के लिए ठोस कदम उठाऊंगा.’ आदिवासी विकास मंत्री के रूप में यह सावरा का दूसरा कार्यकाल है, इसके पूर्व वे सेना-भाजपा सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं.

इंटरनेट बिन सून

मनोचिकित्सकों की माने तो सोशल मीडिया से जुड़ाव के कारण लोग निजी और सार्वजनिक जीवन में फर्क करना भी भूल गए हैं.
मनोचिकित्सकों की माने तो सोशल मीडिया से जुड़ाव के कारण लोग निजी और सार्वजनिक जीवन में फर्क करना भी भूल गए हैं.

30 साल के रितेश दिल्ली में रहते हैं और एक निजी कंपनी में अकाउंटेंट हैं. इनके पास स्मार्ट फोन है जो कि हाई स्पीड इंटरनेट से जुड़ा हुआ है. रितेश के दिन की शुरुआत स्मार्ट फोन पर मैसेज पढ़ने से होती है फिर वह फेसबुक पर नए अपडेट देखते हैं. ट्वीटर के ट्रेंडिंग टॉपिक्स पर भी नजर मारते हैं. इसके बाद वाट्स अप या दूसरे किसी चैटिंग ऐप के जरिए अपने दोस्तों से हाय-हैलो करते हैं. इसके बाद वह जल्दी से तैयार होकर अपने दफ्तर के लिए निकल जाते हैं. रितेश अपने दफ्तर तक की दूरी अमूमन मैट्रो या ऑटो से तय करते हैं और इस दौरान भी वह अपने मोबाईल पर व्यस्त रहते हैं. दफ्तर के काम से जब भी उन्हें थोड़ी फुर्सत मिलती है तो वह फिर से एक बार अपने मोबाईल या सिस्टम की मदद से सोशल मीडिया की दुनिया में दाखिल हो जाते हैं. रात में देर रात तक ऑनलाइन रहते हैं.  सोने से पहले रितेश अपना मोबाईल अपने बगल में ही रखकर सोते हैं. अगर मोबाईल उनसे दूर रहे तो उन्हें नींद आने में दिक्कत होती है.

बंगलुरू में रहनेवाले राहुल खन्ना और उनकी पत्नी अपने 18 वर्षीय बेटे को लेकर थोेड़ा परेशान हैं. इनका बेटा आजकल इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर हद से ज्यादा समय बिता रहा है. इस वजह से वह पढ़ाई में लगातार पीछे होता जा रहा है. सुबह नाश्ते की टेबल से लेकर रात में सोने के बिस्तर तक वो अपने फोन और लैपटॉप की मदद से इंटरनेट की दुनिया में रहता है. बेटे की इस आदत को रोकने की मंशा से एक दिन खन्ना दंपति ने घर का वाईफाई बंद कर दिया और उसे बताया कि वाईफाई खराब हो गया है. इसके बाद उनका बेटा उदास हो गया और दिन भर अपने कमरे में पड़ा रहा. राहुल अपने बेटे की एक मनोचिकित्सक से कांउसलिंग करवा रहे हैं.

यह घटना पिछले साल अक्टूबर की है. महाराष्ट्र के परभानी में रहनेवाली और कॉलेज में पढ़नेवाली एक लड़की ने आत्महत्या कर ली. लड़की अपने माता-पिता के साथ रहती थी. मरने से पहले उसने एक छोटा-सा सुसाईड नोट लिखा था जिसमे उसने इस बात का जिक्र किया था कि उसके माता-पिता उसे फेसबुक के इस्तेमाल से रोकते थे और इसी वजह से वो आत्महत्या कर रही है. लड़की ने अपने सुसाईड नोट में लिखा था, ‘क्या फेसबुक इतना खराब है? मैं इस तरह की पाबंदियों के साथ घर में नहीं रह सकती क्योंकि मैं फेसबुक के बिना जिंदा नहीं रह सकती हूं.’

जून 2013 में मुंबई की लोकल ट्रेन से एक 16 वर्षीय छात्रा गिर गई जिससे उसकी मौत हो गई. बताया गया कि गेट के पास खड़े होकर वो अपने मोबाईल में व्यस्त थी.

मई 2014 गुड़गांव में 12वीं की एक छात्रा ने इस वजह से आत्महत्या कर ली क्योंकि उसकी स्कूल टीचर ने उसे क्लास में बैठकर फेसबुक इस्तेमाल करते हुए पकड़ लिया था और आगे से ऐसा न करने की हिदायत दी थी.

ये पांचो मामले लगातार बदल रहे भारत की तस्वीर हैं और एक बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व भी करते हैं. इनकी ठीक-ठीक संख्या किसी को नहीं मालूम लेकिन देश के डॉक्टर इन्हें बीमार मानते हैं. मनोचिकित्सकों के मुताबिक ऐसी समस्या से जूझ रहे लोगों को असल में इंटरनेट की लत पड़ चुकी है और यह लत इन ‘बीमारों’ के लिए उतनी ही खतरनाक है जितनी कि शराब, बीड़ी या सिगरेट की लत. मोबाईल एसोसिएशन ऑफ इंडिया और आई.एम.आर.बी इंटरनेशनल ने मिलकर ‘भारत में इंटरनेट-2014’ के नाम से एक सर्वेक्षण किया है. इस सर्वे के मुताबिक फिलहाल देश में करीब तीस करोड़ लोगों तक इंटरनेट की पहुंच है. इसी रिपोर्ट से यह जानकारी भी मिलती है कि शहरी इलाकों में इंटरनेट का इस्तेमाल करनेवालों में से 93 फीसदी लोगों के लिए इंटरनेट पर सबसे पहली जरूरत चैटिंग करना, सर्च करना और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना है.

भारत के शहरों में रहनेवाले करीब उन्नीस करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं. इन लोगों में से अधिकतर लोगों के बारे में कहा जा सकता है कि वे ऑनलाइन दुनिया में भी बसते हैं. इनकी सक्रियता वास्तविक दुनिया के मुकाबले ऑनलाइन की आभासी दुनिया में ज्यादा रहती है. अभी तक यह बात हल्के-फुल्के ढंग से कही जाती थी. लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है. देश के डॉक्टर इस समस्या को लेकर गंभीर हैं. बंगलुरू में इंटरनेट और सोशल मीडिया के बीमार लोगों के इलाज के लिए एक केंद्र खुल चुका है. यह देश का पहला ऐसा केंद्र है जहां सोशल मीडिया और इंटरनेट की लत से जूझ रहे लोगों का इलाज हो रहा है, उनकी काउंसलिंग हो रही है और लोग स्वस्थ भी हो रहे हैं.

डॉक्टरों में इंटरनेट के फैलाव को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है. उनका मानना है कि इसकी वजह से युवाओं की एक ऐसी फौज तैयार हो रही है जो मानसिक तौर पर बीमार है

बंगलुरू स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (निमहांस) ने इस सेंटर की शुरुआत की है. निमहांस ने बंगलुरू के करीब 400 युवकों के ऊपर एक सर्वे किया. इस सर्वे में हर आय वर्ग के युवकों को शामिल किया गया जो नतीजे सामने आए वह बेहद चौंकानेवाले थे. 70 प्रतिशत लोगों को इंटरनेट और सोशल मीडिया के बिना समय बिताने में दिक्कत आ रही थी. एक सवाल यह उठता है कि ऐसे कौन से लक्षण हैं जिनके आधार पर यह जाना जा सके कि किसी व्यक्ति को इंटरनेट या सोशल मीडिया की लत लग चुकी है या फलां व्यक्ति सामान्य इंटरनेट यूजर है? इस सवाल के जवाब में निमहांस के मनोचिकित्सक डॉ. मनोज शर्मा कहते हैं, ‘हम कई तरह के टेस्ट करते हैं. हाव-भाव की निगरानी करते हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण है, व्यक्ति में चार ‘सी’ की खोज करना. इनमें से पहला सी है ‘क्रेविंग’ इसका मतलब यह है कि व्यक्ति में सोशल मीडिया को लेकर कितनी बेचैनी है. उसे इसकी कितनी आदत है. दूसरा है ‘कंट्रोल’ यानी कि जब वह इंटरनेट या किसी सोशल मीडिया पर होता है तो उसका अपने-आप पर कंट्रोल है या नहीं. इस दौरान कुछ लोगों को समय का अंदाजा ही नहीं होता. तीसरा ‘सी’ है कंपल्शन. मतलब अगर आपको इंटरनेट पर जाने की या सोशल मीडिया पर एक्टिव होने की जरूरत न भी हो तो भी आप ऐसा करते हैं और आखिरी है, कॉन्सीक्वेंसेज यानी कि बाकी तीन ‘सी’ की वजह से व्यक्ति को कितना और क्या-क्या नुकसान हो रहा है.’

निमहांस की टीम ने जब इन चार ‘सी’ के आधार पर बंगलुरू के 400 युवकों को परखा तो उनमें से ज्यादातर फेल हो गए और इंटरनेट के नशे के शिकार पाए गए. इसी से मिलता-जुलता एक अध्ययन 2014 में टाटा कंसल्टेंसी ने भी किया है. इस सर्वे में करीब-करीब 71 फीसदी लोगों ने अपने स्मार्ट फोन को अपना पसंदीदा गैजेट बताया है. यह सर्वे देश के 12 शहरों के करीब-करीब 1200 छात्रों पर किया गया था. एक तरफ स्मार्ट फोन सस्ते हो रहे हैं. ज्यादा से ज्यादा लोग सूचना के क्षेत्र में आई क्रांति का हिस्सा बन रहे हैं वहीं देश के डॉक्टरों में इस बात को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है कि इस फैलाव के साथ बच्चों और युवाओं की एक ऐसी फौज तैयार हो रही है जो मानसिक तौर पर बीमार है. इस फौज को इंटरनेट के बिना सब कुछ सूना-सूना सा लगता है. ये लोग अपनी आभासी दुनिया से बाहर निकलकर वास्तवकि दुनिया में चहलकदमी नहीं करना चाहते.

अभी तक जो थोड़े-बहुत आंकड़े और नतीजे सामने आए हैं उनसे यह पता चलता है कि इस लत के शिकार लोगों में एक समय के बाद अवसाद, सर दर्द, नींद न आना, पढ़ाई-लिखाई में मन न लगना, शारीरिक विकास का सही से न हो पाना और दिमागी विकास का भी रुक जाना जैसे लक्षण दिखते हैं. एक सवाल यह भी है कि इंटरनेट या सोशल मीडिया की आदत व्यक्ति को लगती कैसे है. क्यों कोई व्यक्ति अपने आस-पास मौजूद वास्तविक लोगों की बजाय दूर-दराज के लोगों से ज्यादा लगाव महसूस करने लगता है. दिल्ली में कैक्टस लिली नामक संस्था चलाने -वाली और ऐसी समस्याओं का सामना कर रहे परिवारों को परामर्श देने वालीं मंजू छाबड़ा इस सवाल के बारे में कहती हैं, ‘इस समस्या की जड़ में शहरी रहन-सहन और उसके तौर-तरीके हैं. एकल परिवारों में रहनेवालों के आस-पास इतने लोग नहीं होते जिनसे हंस-बोल सकें. हर व्यक्ति अपने आप में व्यस्त है. आज के हर परिवार में अमूमन तीन-चार सदस्य होते हैं. बच्चे और माता-पिता. बस यही परिवार है. हर कोई अपने काम में व्यस्त है. पति और पत्नी दफ्तर जाते हैं. बच्चे या तो दाई के हवाले होते हैं या प्ले स्कूल में होते हैं. इस तरह से न तो बच्चों की परवरिश हो पाती है और न ही पति-पत्नी की परवरिश बतौर माता-पिता हो पाती है.’

मंजू छाबड़ा के मुताबिक आजकल के परिवारों में हर किसी की अपनी परेशानी है. ऐसे में अगर बच्चे किसी वीडियो गेम या स्मार्ट फोन के लिए जिद करते हैं तो पति-पत्नी लिए सबसे आसान तरीका यही है कि उन्हें जो चाहिए वह फौरन दे दिया जाए. किसी को समझाने की फुर्सत नहीं है. ऐसे माहौल में बच्चों को समझ में आता है कि उन्हें जो चाहिए सब मिल जाएगा. इसका इंटरनेट की लत से कोई सीधा संबंध है? इस सवाल पर छाबड़ा बताती हैं, ‘शुरुआत तो यहीं से होती है. मां-बाप ने पहले बच्चे को चुप रखने के लिए खुद ही उसे उन चीजों से जोड़ दिया जहां सब कुछ चमत्कारिक है. रोमांच से भरपूर है. भले वहां जो भी है वह सब आभासी है. इससे बच्चे को तो आदत पड़ेगी ही. वो कुछ दिनों के बाद स्मार्ट फोन या इंटरनेट के बिना रहने की सोच भी नहीं पाता. वह फुटबॉल भी वीडियो गेम पर ही खेलता है और लिखता भी वहीं पर है.’ शहरों के कामकाजी मां-बाप के लिए यह और बड़ी समस्या बन गया है. अक्सर दोनों दफ्तर जाते हैं. अगर इनमे से कोई एक दफ्तर नहीं भी जाता है तो वह कहीं न कहीं व्यस्त रहता है. यह शहरी जीवन का दुष्प्रभाव है जहां खाली रहना बुरा माना जाता है. जाहिर है दोनों के काम की अपनी-अपनी परेशानियां हैं, अपने-अपने तनाव हैं. दोनों में से किसी के पास इतना समय नहीं है कि वे एक- दूसरे को समझने-समझाने की हद तक बात करें. इस एक वजह से बहुत हद तक संभव है कि दोनों काफी देर तक इंटरनेट पर किसी अनजान चेहरे से चैट करते हों. या इंटरनेट पर ही किसी और तरह के टाइम पास से जुड़े हुए हों. तहलका से बातचीत में छावड़ा एक और बात बताती हैं कि जो लोग इंटरनेट के माध्यम से चैट करने के आदी हो जाते हैं वे बाहरी दुनिया के लोगों से कम बातचीत करते हैं. कहने का मतलब कि जो हमसे-आपसे कम बात करते हैं. जो वास्तविक दुनिया में बहुत चुप-चुप रहते हैं वैसे लोग इंटरनेट की मदद से अनजान लोगों से बातचीत करने में ज्यादा रूचि रखते हैं. और ऐसे लोग किसी भी आयु वर्ग में मिल सकते हैं. इस बारे में मुंबई स्थित लीलावती अस्पताल से जुड़ी क्लिनिकल साईकोलॉजिस्ट और साईकोथेरिपिस्ट बरखा चुलानी का मानना है कि हम वास्तविक और आभासी दुनिया के बीच का फर्क भूलते जा रहे हैं और इसी वजह से यह दिक्कत आ रही है. वो कहती हैं, ‘हम देख रहे हैं कि लोग अब निजी और सार्वजनिक जीवन को बांटने -वाली उस मोटी लकीर को देख नहीं पा रहे हैं और वे सोशल मीडिया को लेकर जुनूनी हो गए हैं.’

लोग अब अपने वास्तविक जीवन में भी फेसबुक की तरह ‘लाइक’ बटन ढूंढ़ रहे हैं. लोग अब बहुत खुश होते हैं, दुखी होते हैं, खुद को अकेला महसूस करते हैं और यहां तक कि आत्महत्या जैसे विचारों को अपने परिवार या दोस्तों के साथ साझा नहीं करते बल्कि अपने ‘फेसबुक दोस्तों’ और ट्विटर  ‘फॉलोअर्स’ के साथ साझा करते हैं. यह बात उन ट्वीट और स्टेटस अपडेट में खासतौर पर दिखती है, जो आत्महत्या के विचार को दर्शाते हैं. इनसे काफी हद तक व्यक्ति की मनोदशा समझी जा सकती है. ऐसे कुछ भाव हैं, ‘निराश’, ‘अपमानित महसूस कर रहा/रही हूं’, ‘सब खत्म हो गया’ या ‘अंदर से अकेला महसूस होना’ आदि.

मनोचिकित्सकों की माने तो सोशल मीडिया से जुड़ाव के कारण लोग निजी और सार्वजनिक जीवन में फर्क करना भी भूल गए हैं. लोग पहले की तुलना में ज्यादा खुलकर बोलने लगे हैं. सार्वजनिक मामलों में खुलकर बोलना, गलत का विरोध करना और उसके लिए सोशल नेटवर्किंग साईट पर खुलकर लिखने-बोलने में कोई बुराई नहीं है बल्कि यही तो इस माध्यम की असली ताकत है. लेकिन जैसे ही यह उन्मुक्तता निजी जिंदगी में घुसती है वैसे ही परेशानी शुरू हो जाती है और कई बार यह परेशानी इतनी बड़ी हो जाती है कि इसकी वजह से भयंकर घटनाएं घट जाती हैं.

यह समस्या बड़ी होती जा रही है लिहाजा इसके इलाज की तरफ लोगों का ध्यान तेजी से गया है. कैसे इंटरनेट और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हुए भी उसके दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है? ऐसे कौन से जतन किए जाएं कि इंटरनेट का  केवल सकारात्मक उपयोग होता रहे. इस बारे में ज्यादातर चिकित्सक एक मत हैं. चिकित्सक मानते हैं कि हर बीमारी की तरह इसके लिए भी इलाज की बजाय बचाव पर ध्यान देना चाहिए. इंटरनेट से, फोन से उतना ही संपर्क रखा जाए जितनी जरूरत हो. ऑनलाइन गेम खेलने से बचना चाहिए. बच्चों को तो जहां तक हो सके बाहर पार्क में खेलने और दूसरे बच्चों से मिलने देना चाहिए. जो लोग आपस में साथ रह रहे हैं उन्हें इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि वह दूसरों के लिए एक-एक दिन को खास बनाएं जिससे की सुबह उठते ही इंटरनेट पर जाने, चैट करने या वीडियो गेम खेलने की जरूरत महसूस ही न हो. डॉक्टरी सलाह के इतर लगभग साल भर पहले देश के जानेमाने अर्थशास्त्री, नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने भी इंटरनेट पर ज्यादा समय बितानेवालों को एक सलाह दी थी. जयपुर में आयोजित होनेवाले साहित्य मेले में बोलते हुए अमर्त्य सेन ने कहा था, ‘इंटरनेट आपकी सहायता कर सकता है लेकिन आपको किताबें ज्यादा से ज्यादा पढ़नी चाहिए.’

सितारा देवी: ओझल सितारा…

सितारा देवी (8 नवंबर, 1920 - 24 नवंबर, 2014)
सितारा देवी (8 नवंबर, 1920 – 24 नवंबर, 2014)

94 की उम्र में अपने निधन से पहले वह लंबे समय से बीमारियों से जूझ रही थीं. सितारा देवी ने हिंदी सिने जगत में कथक का न केवल प्रवेश कराया बल्कि उसे एक अलग पहचान भी दिलाई. उनको याद करने के कई बहाने हैं. दिलों पर राज करना एक ऐसा मुहावरा है जो शायद सितारा देवी के लिए ही बना होगा. यही वजह है कि न्यूयॉर्क शहर से लेकर नौगांव जैसी छोटी जगह तक उनके अनगिनत चाहने वाले हैं. इसका श्रेय उनकी वाक् कला को जाता है जिसकी मदद से वह कहीं भी दर्शकों से तत्काल रिश्ता कायम कर लेती थीं. शायद यह काबिलियत उनमें बचे बनारसीपन से आई होगी. वह बनारस के एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती थीं जिसका काम ही किस्सागोई करना था.

यही वजह है कि सितारा देवी की पूरी शख्सियत में यह गुण शामिल था. कभी वह अपने नृत्य में किस्सागोई करतीं तो कभी दूसरों के अफसानों में उनके किस्से होते. उर्दू अदब की जानी पहचानी शख्सियत सआदत हसन मंटो कहते थे कि सितारा के नाच में लखनवी नजाकत नदारद है. मंटो कहते, ‘वह औरत नहीं, एक तूफान है, एक ऐसा तूफान जो सिर्फ एक मर्तबा आके नहीं टलता, बार-बार आता है.’ मंटो सच ही तो कहते थे. कोलकाता के आयोजन में सितारा देवी बिना रुके लगातार 12 घंटे तक नाचती रहीं. इतना ही नहीं मुंबई में भी वह कई बार लगातार 8-9 घंटे तक नृत्य करती रहीं. यकीनन वह ऊर्जा की खान थीं.

उनके पिता सुखदेव महाराज ने जब सितारा देवी को कथक सिखाना शुरू किया तो उनके पड़ोसियों ने सख्त आपत्ति दर्ज कराई. उनको अपने पड़ोस के घर से आ रही घुंघरुओं की खन-खन कतई नामंजूर थी. लेकिन सुखदेव महाराज नहीं माने. उनको ब्राह्मण बिरादरी से बाहर कर देने तक की बातें हुईं लेकिन वह अड़े रहे. सुखदेव महाराज खुद नेपाल के राजपरिवार में बतौर शाही नर्तक काम करते थे. अगर वह उस समय लोगों के विरोध और उनकी जिद के आगे झुक गए होते तो शायद हमें कथक में तांडव और लास्य का वह मेल देखने को न मिलता जो सितारा देवी ने खुद से ईजाद किया था.

लोगों की जिद के आगे न झुकने और उनकी परवाह न करने को सितारा ने अपने जीवन का मूल मंत्र बना लिया था. उनके लिए जीवन का एक ही सत्य था और वह था कथक नृत्य. कथक को लेकर उनका लगाव और उस नृत्य पर उनकी पकड़ ऐसी थी कि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर ने उनको नृत्य सम्राज्ञिनी की उपाधि दी थी.

मुंबई आने के बाद उन्होंने कुछ ही फिल्मों में काम किया था जब उनका फिल्मों से मोहभंग होना शुरू हो गया. लेकिन वह कभी भी फिल्मी सर्किल से बाहर नहीं हुईं. तमाम फिल्मी कलाकारों से उनकी दोस्ती थी और वह उनके साथ नजर आ जाया करती थीं. कम ही लोगों को पता होगा कि मधुबाला और माला सिन्हा समेत उस दौर की अनेक अभिनेत्रियों को कथक का प्रशिक्षण सितारा देवी ने ही दिया था.

सितारा देवी सही समय पर सही सम्मान न दिए जाने से क्षुब्ध भी रहा करती थीं बहुत बाद में दिए गए पद्म सम्मान को उन्होंने यह कहकर ठुकरा दिया था कि अब इसे देने का कोई मतलब नहीं रह गया.

सितारा देवी में इस कदर उदारता भरी हुई थी कि उनके सामने किसी चीज की तारीफ किए जाने पर वह झट उसे सामने वाले को भेंट कर दिया करतीं. एक दफा जब बिरजू महाराज के चाचा शंभू महाराज ने सितारा देवी के हीरे के हार की तारीफ की तो उन्होंने यह कहते हुए वह उन्हें भेंट कर दिया कि महाराज यह आपसे अच्छा थोड़े न है!

महज 11 की उम्र में बनारस छोड़ देने वाली सितारा देवी अपने अंतिम समय में बनारस जाना चाहती थीं लेकिन उनकी यह ख्वाहिश पूरी न हो सकी. हजारों-लाखों की आंखों की सितारा देवी अब खुद सितारा बन चुकी हैं. इस बार कभी जो जोर से बिजली कड़के तो आसमान की ओर गौर से देखिएगा. शायद आपको सितारा देवी की एक झलक मिल जाए!

लीग में लीद

राहत मुदगल समममि ने आईसीसी के मुमिया एन श्रीमनवासन को मैच मिमससंग आरोपों में दोषी नहीं पाया, िोटोः एपी
राहत: मुदगल समिति ने आईसीसी के मुखिया एन श्रीनिवासन को मैच फीक्सिंग के आरोपों में दोषी नहीं पाया, फोटो: एपी
राहत: मुदगल समिति ने आईसीसी के मुखिया एन श्रीनिवासन को मैच फीक्सिंग के आरोपों में दोषी नहीं पाया, फोटो: एपी

आईपीएल में भ्रष्टाचार पर जस्टिस मुकुल मुदगल की रिपोर्ट आ चुकी है लेकिन जैसा कि सोचा जा रहा था, इसने भ्रष्टाचार को एक हद तक उजागर तो किया लेकिन गोल-गोल तरीके से. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपनी तरह का 29 पृष्ठ वाला यह दस्तावेज अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट संघ (आईसीसी) के मुखिया एन श्रीनिवासन के लिए राहत भरा साबित हुआ है. हालांकि उनके दामाद गुरुनाथ मयप्पन और साथ ही लीग के सीओओ सुंदर रमन को मुदगल रिपोर्ट ने अज्ञात सट्टेबाजों से संबंध रखने के लिए दोषी ठहराया है. पहले माना जा रहा था कि रिपोर्ट जेंटलमैन्स गेम कहे जाने वाले इस खेल की गंदगी उजागर करते हुए कुछ साफ-साफ निष्कर्ष देगी. इस लिहाज से रिपोर्ट कुछ हद तक निराश करने वाली है. फिर भी आईपीएल के लिए यह एक ऐसा मौका है जिसका लाभ उठाकर वह अपने चारों ओर छाए अविश्वास के माहौल और शंकाओं को दूर कर सकता है. फिर से इस रिपोर्ट की बात करें तो अभी इससे तीन सबसे महत्वपूर्ण बातें सामने आई हैं. क्रिकेट प्रबंधन के सबसे ताकतवर व्यक्ति श्रीनिवासन साफ-साफ बच गए हैं.  मयप्पन और राजस्थान रॉयल्स के मालिक राज कुंद्रा को सट्टेबाजी में लिप्त पाया गया है. तीसरी बात यह है कि रमन सटोरियों के संपर्क सूत्रों से ‘एक सीजन में आठ बार मिले’ थे. आईपीएल के सीओओ (चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर) ने यह बात मानी है कि वे एक व्यक्ति के संपर्क में थे लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि उसके सटोरियों से संबंध हैं. इस रिपोर्ट के बाद ऐसा लग रहा है कि इसने क्रिकेट के इन संदिग्ध सामंतों को और अड़ियल बना दिया है. ये नाम उजागर होने के बाद तुरंत ही स्पष्टीकरण दिया गया था कि रमन के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं होने जा रही है. रमन को श्रीनिवासन का दाहिना हाथ माना जाता है. दूसरी तरफ सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग के आरोपों से मुक्त होने के बाद श्रीनिवासन को अब कोई खतरा नहीं है. रिपोर्ट के निष्कर्ष उन्हें उनकी महत्वाकांक्षा पूरी करने यानी बीसीसीआई का मुखिया बनाने में मददगार साबित होंगे. रिपोर्ट में यह जरूर कहा गया है कि उन्होंने आईपीएल के ‘कोड ऑफ कंडक्ट’ का उल्लंघन किया था लेकिन यह बहुत ही हल्का आरोप है और तकनीकी गलती मानकर इसे ज्यादा तूल नहीं दिया गया. आईपीएल में चल रहे गड़बड़झालों को उजागर करने के लिए जब मुदगल समिति गठित की गई थी तब से मयप्पन के सट्टेबाजी में शामिल होने की बात कही जा रही थी. अपनी अंतरिम रिपोर्ट से इतर इस बार की रिपोर्ट में श्रीनिवासन के दामाद के बारे में कहा गया है कि वह लीग आयोजन के समय चेन्नई सुपरकिंग्स का अधिकारी था. आईपीएल के कोड ऑफ कंडक्ट के प्रावधानों के हिसाब से यदि कोई भी फ्रेंचाइजी, उसका मालिक या कंपनी, लीग की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाने वाले कामों में लिप्त पाए जाते हैं तो उस टीम को आईपीएल से बाहर किया जा सकता है.

असल खिलाड़ी: मुदगल समिति की रिपोर्ट में गुरुनाथ मयप्पन का नाम आने के बाद उनके भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग गया है
असल खिलाड़ी: मुदगल समिति की रिपोर्ट में गुरुनाथ मयप्पन का नाम आने के बाद उनके भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग गया है

यह बात बेहद दिलचस्प है कि कई नियमों का उल्लंघन, जिनमें मयप्पन और कुंद्रा द्वारा सटोरियों को सूचना पहुंचाना भी शामिल है, को आईसीसी की भ्रष्टाचार निरोधक इकाई ने कार्रवाई लायक आरोप नहीं माना था. इस इकाई ने मैच फिक्सिंग के आरोपों की जांच के बाद रमन के खिलाफ कार्रवाई की बात जरूर कही थी लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि कार्रवाई क्या होनी चाहिए.

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किसने क्या किया

आईपीएल के कुछ बड़े ‘खिलाड़ियों’ का नाम मुदगल समिति की रिपोर्ट में आया है.

एन श्रीनिवासन

जस्टिस मुदगल समिति की रिपोर्ट कहती है कि श्रीनिवासन मैच फिक्सिंग में शामिल नहीं थे. उन्होंने जांच प्रभावित करने का काम भी नहीं किया. लेकिन उनकी जानकारी में यह बात थी कि कुछ खिला़ड़ियों (जिनके नाम उन्हें नहीं पता थे) ने आईपीएल के कोड ऑफ कंडक्ट का उल्लंघन किया है.

सुंदर रमन

आईपीएल के पिछले सीजन में सुंदर रमन की सटोरियों के एक संपर्क सूत्र से आठ बार मुलाकात या बात हुई थी. उन्हें पहले से यह जानकारी थी कि गुरुनाथ मयप्पन और राज कुंद्रा सट्टेबाजी में शामिल थे लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की.

गुरुनाथ मयप्पन

समिति ने माना है कि मयप्पन चेन्नई सुपरकिंग्स से आधिकारिक रूप से जुड़े हुए थे और आईपीएल के दौरान सट्टेबाजी में शामिल रहे हैं.

राज कुंद्रा

सटोरियों से संपर्क थे. एक दिलचस्प तथ्य यह है कि राजस्थान पुलिस ने कुंद्रा के खिलाफ इस मामले की जांच बीच में ही रोक दी थी. कुंद्रा का एक दोस्त, जो जानामाना सट्टेबाज है, ने माना है कि उसने कुंद्रा की तरफ से कई बार सट्टे में दांव लगाए थे.

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असल खिलाड़ी: मुदगल समिति की रिपोर्ट में राज कुंद्रा का नाम आने के बाद उनके भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग गया है
असल खिलाड़ी: मुदगल समिति की रिपोर्ट में राज कुंद्रा का नाम आने के बाद उनके भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग गया है.

आईपीएल मैच फिक्सिंग मामले का खुलासा पिछले साल मई में हुआ था. उसके तुरंत बाद श्रीसंत सहित तीन खिलाड़ियों को मुंबई पुलिस ने हिरासत में ले लिया था. इस मामले में दूसरी बड़ी गिरफ्तारी मयप्पन की हुई थी. मयप्पन की गिरफ्तारी के बाद लगातार ये खबरें आने लगी थीं कि वे चेन्नई सुपरकिंग्स से आधिकारिक रूप से नहीं जुड़ें हैं. यह एक तरह से मयप्पन को बचाने का जनसंपर्क अभियान था. लेकिन मुदगल समिति की जांच में पहले यही बात साफ हुई कि मयप्पन टीम से आधिकारिक रूप से जुड़े थे. अंतरिम रिपोर्ट के पहले समिति के सदस्य और वरिष्ठ वकील निलय दत्ता मयप्पन के खिलाफ और सबूत जुटाना चाहते थे जबकि बाकी सदस्यों के हिसाब से उनके पास पर्याप्त सबूत थे. तब समिति एकराय नहीं थी. इस बार ऐसा नहीं है. फिर भी यह देखना होगा कि वर्तमान कानूनी प्रावधानों के तहत आरोपित लोगों के खिलाफ क्या प्रभावी कार्रवाई संभव होगी.

समिति की रिपोर्ट आने के साथ ही बीसीसीआई ने रमन को बचाने की कोशिश शुरू कर दी है. इस बारे में बीसीसीआई का कहना है कि रमन ने पहले ही इस मामले में आईसीसी की भ्रष्टाचार निरोधक इकाई से हस्तक्षेप की मांग की थी. सटोरियों के संपर्क सूत्रों से उनकी आठ मुलाकातों पर भी पर्दा डालने की कोशिश हो रही हैं.

एक आम क्रिकेट प्रेमी की नजर से देखें तो आईपीएल में जो कुछ चल रहा है और जांच से जो कुछ निकल रहा है वह किसी पहेली से कम नहीं है. जो लोग लीग के रोजाना के कामकाज पर नजर रखते हैं वे उन रास्तों और अवसरों को खत्म नहीं कर पा रहे जिनसे होकर भ्रष्टाचार फल-फूल रहा है. ऐसे में एक सवाल अब भी अनुत्तरित है- क्या आईपीएल के आयोजनकर्ता भ्रष्टाचार के खिलाफ एक साथ हैं? शायद नहीं और इस ‘शायद’ की वजह सबसे ऊपर से शुरू होती है. इंडिया सीमेंट्स कंपनी के मालिक श्रीनिवासन का बीसीसीआई का मुखिया बनना मुदगल समिति की अंतरिम रिपोर्ट के हिसाब से ‘हितों में टकराव’ का मामला था. चेन्नई सुपरकिंग्स का मालिकाना हक इंडिया सीमेंट्स के पास ही है. हितों के टकराव की बात मयप्पन का नाम सामने आने के बाद और स्पष्ट हुई. समिति की रिपोर्ट आने के बाद यह बात साबित हो चुकी है. मयप्पन सट्टेबाजी में शामिल रहे हैं और उन्होंने टीम की जानकारी भी सटोरियों को मुहैया करवाई थी. लेकिन शुरुआत में इन्हीं आरोपों पर श्रीनिवासन का कहना था कि मयप्पन तो बस एक ‘जुनूनी क्रिकेट प्रशंसक’ हैं. फिर मयप्पन को चेन्नई सुपरकिंग्स से अलग दिखाने की कोशिशें शुरू हुईं पर आखिरकार मुदगल समिति ने इन सब कोशिशों पर पानी फेर दिया. कहा जा रहा है कि यह सब फ्रेंचाइजी बचाने के लिए किया जा रहा था.

इस पूरे प्रकरण से यह बात फिर से खुलकर सामने आई है कि बीसीसीआई ने आईपीएल टीम की फ्रेंचाइजी लेने के जो नियम बनाए हैं उनमें कई झोल हैं और भविष्य में ऐसी और घटनाएं सामने आ सकती हैं. एक प्रोफेशनल लीग की कमान नाकाबिल लोगों के हाथों में है. चेन्नई सुपरकिंग्स के ‘प्रिंसिपल’ रहे मयप्पन को तो अपने कारगुजारियों का नतीजा भुगतना ही होगा, अभी तक चर्चा से दूर रहे कुंद्रा का भविष्य भी अब उतना सुरक्षित नहीं है. कुंद्रा के बारे में बड़ा मजेदार तथ्य है कि जब आईपीएल में सट्टेबाजी की बात सामने आई तब वे यह कहते सुने गए थे कि उन्हें तो मालूम ही नहीं था कि भारत में सट्टेबाजी गैरकानूनी है. कुंद्रा की इस  अदा को चाहे क्रिकेट के प्रति उनका ‘जुनून’ कही जाए या उनकी ‘मासूमियत’ लेकिन वे कार्रवाई से बच नहीं पाएंगे.

मुदगल समिति की रिपोर्ट सामने आने के बाद एक सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर बीसीसीआई बीते पंद्रह सालों से कुंभकर्णी नींद मे क्यों सो रही थी. आज से डेढ़ दशक पहले सीबीआई जांच में दक्षिण अफ्रीका के पूर्व कप्तान हैंसी क्रोन्ये और कुछ भारतीय खिलाड़ियों की मैच फिक्सिंग में भूमिका सामने आई थी. उसके बाद भी बोर्ड की भ्रष्टाचार निरोधक इकाई कोई ऐसा तंत्र विकसित नहीं कर पाई जिससे क्रिकेट की छवि धूमिल करने वाली घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके. यही वजह है कि क्रिकेट को एक बड़ा ब्रांड बनाने के लिए शुरू की गई आईपीएल लगातार उसकी बदनामी की वजह बनती जा रही है.

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raman_prabhavक्रिकेट पर रमन प्रभाव

क्या आईपीएल के सीईओ सुंदर रमन क्रिकेट पर अपना असर बरकरार रख पाएंगे?

यह आईपीएल शुरू होने की कुछ महीने पहले की बात है. 2008 में आईपीएल की वजह से क्रिकेट हर दिन चर्चा में आ रहा था. यह भी पहली बार हो रहा था कि कोई क्रिकेट खिलाड़ी नहीं बल्कि एक खेल मैनेजर अखबारों की सुर्खियां बटोर रहा था. आईपीएल के चेयरमैन और कमिशनर ललित मोदी क्रिकेट के उभरते हुए सितारे बन चुके थे. इन्हीं दिनों रमन की मोदी से मुलाकात हुई थी. माइंडशेयर नाम की एक मीडिया कंपनी (जो विज्ञापनों के लिए इलेक्टॉनिक या प्रिंट मीडिया में जगह खरीदने का काम करती है) के सीईओ रमन ने आईपीएल कमिश्नर के सामने प्रेजेंटेशन दिया. मोदी रमन से बहुत प्रभावित हुए. मोदी विज्ञापन जगत के इस रणनीतिकार को आईपीएल में ले आए. इसे रमन की काबलियत ही माना जाएगा कि जब मोदी विवादों से घिरे और उन्हें आईपीएल से बाहर होना पड़ा तब भी उन्होंने अपनी जगह बनाए रखी. यही नहीं वे मोदी की जगह पर भी आ गए. श्रीनिवासन रमन की प्रतिभा से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने रमन को आईसीसी की व्यावसायिक शाखा में भी जगह दे दी. कहा जाता है कि आईपीएल सहित भारत में होने वाले हर टूर्नामेंट की कॉमेंट्री टीम का फैसला रमन ही लेते हैं. इसके जरिए उन्होंने पूर्व क्रिकेट खिलाड़ियों से मजबूत संबंध बनाए हैं और उनकी स्वीकार्यता क्रिकेट के हर स्तर पर है. यह भी कहा जाता है कि वे श्रीनिवासन के सबसे विश्वासपात्र हैं. मुदगल समिति में नाम आने से उनके लिए खतरे की घंटी तो बज गई है लेकिन अभी भी उनका भविष्य इस पर निर्भर है कि बीसीसीआई का कमान संभालने वाले लोग क्या चाहते हैं.

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उत्तर प्रदेश: स्टांप ड्यूटी घोटाला

 

फोटोः एपी
फोटोः एपी

उत्तर प्रदेश में रियल इस्टेट कंपनियों, प्रशासनिक अधिकारियों और राजस्व विभाग के कर्मचारियों का एक गठजोड़ संगठित तरीके से कानूनी पेचीदगियों का फायदा उठाते हुए मोटा पैसा बना रहा है और राजकोष को करोड़ों रुपये का चूना लगा रहा है. यह मामला संपत्ति कर विभाग से जुड़ा है.

राज्य में भू-माफिया कृषि योग्य जमीनों को उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार कानून 1950 (यूपीजेडएएलआर) के तहत खरीदते हैं. इसके बाद तत्काल उस भूमि का लैंड यूज कृषि से बदलवा कर आबादी भूमि में करवाया जाता है. यह काम संपत्ति विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से होता है. लैंड यूज बदलने के बाद इस भूमि को आवासीय क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाता है. इसके बाद एक बार फिर से इसका लैंड यूज आबादी की जमीन से कृषि योग्य भूमि में बदलवा दिया जाता है. इसके बाद इसे बाजार भाव पर बेचा जाता है. इस तरह से कृषि भूमि की बिक्री पर सिर्फ चार प्रतिशत स्टांप ड्यूटी भरनी पड़ती है. जबकि आबादी के रूप में रजिस्टर भूमि पर न्यूनतम सात प्रतिशत स्टांप ड्यूटी अदा करनी पड़ती है.

इस घोटाले के अलावा रियल इस्टेट कंपनियां एक और गड़बड़ी में लिप्त हैं. वे अपने हिस्से का संपत्ति कर भी नहीं चुका रही हैं. एक बार किसी जमीन का लैंड यूज कृषि से आबादी में परिवर्तित हो जाने के बाद वह भूमि संपत्ति कर के दायरे से बाहर हो जाती है. उत्तर प्रदेश में पांच लाख तक की जमीनों की खरीद-फरोख्त स्टांप ड्यूटी से मुक्त है.

मथुरा की एक रियल इस्टेट कंपनी ने इस घोटाले से पर्दा हटाने का काम किया है. कंपनी ने अपने क्षेत्र के उपजिलाधिकारी के खिलाफ राज्य के लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा के यहां शिकायत दर्ज करवाई. जल्द ही लोकायुक्त ने स्टांप ड्यूटी को धता बताकर राजस्व विभाग को कृषि योग्य भूमि की खरीद-फरोक्त में लगाई जा रही जबर्दस्त चपत की जानकारी प्रदेश सरकार को दी. यह पूरा गिरोह राजस्व विभाग के अधिकारियों, जिले और तहसील के प्रशासनिक अधिकारी और कंपनियों की आपसी मिलीभगत से फल-फूल रहा है.

मथुरा की सदर तहसील के तहसीलदार ने एक रियल इस्टेट कंपनी की याचिका पर कार्रवाई करते हुए तेहरा गांव की चार हेक्टेयर जमीन का लैंड यूज बदल कर पहले उसे कृषि से आवासीय कर दिया. यह दिसंबर 2008 की घटना है. यह आदेश यूपीजेडएएलआर की धारा 143 के तहत पास किया गया. 2013 में मथुरा विकास प्राधिकरण ने इस भूमि के ऊपर एक बहुमंजिला आवासीय योजना को विकसित करने की संस्तुति दी.

भूमि का लगभग आधा हिस्सा खाली छोड़ दिया गया. बाद में कंपनी ने उसी कोर्ट में शेष बचे हुए 2.3 हेक्टेयर भूमि के टुकड़े का लैंड यूज एकबार फिर से आबादी से बदल कर कृषि योग्य करने की याचिका दायर कर दी. यह याचिका यूपीजेडएएलआर की धारा 144 के तहत दायर की गई थी.

संबंधित लेखपाल और कानूनगो से रिपोर्ट मंगाकर तहसीलदार ने लैंड यूज बदलने का आदेश पारित कर दिया. पिछले दिसंबर महीने में कंपनी ने इस कृषि योग्य भूमि को दिल्ली की एक रियल इस्टेट कंपनी के हाथों चार करोड़ रुपये में बेच दिया. इस पूरे लेन देन में राज्य सरकार को स्टांप ड्यूटी का नुकसान हुआ और आयकर विभाग को इस सौदे से होने वाले 30 प्रतिशत कैपिटल गेन का नुकसान हुआ. इस तरह से लैंड यूज परिवर्तित करना अपने आप में एक अपराध है. इस पूरी कवायद का एकमात्र मकसद स्टांप ड्यूटी बचाना था क्योंकि कृषि योग्य भूमि पर लगने वाली स्टंप ड्यूटी आबादी वाली भूमि के मुकाबले बहुत कम होता है.

इस भूमि की कीमत 26.5 करोड़ रुपये थी जिस पर करीब 1.85 करोड़ रुपये स्टांप ड्यूटी अदा करनी थी. जबकि इस पूरे लेन देन में 28 लाख रुपये की स्टांप ड्यूटी अदा की गई. राज्य सरकार को स्टांप ड्यूटी में करीब 1.58 करोड़ का नुकसान हुआ. इसी प्रकार 26.5 करोड़ पर आयकर विभाग का कैपिटल गेन करीब 6.75 करोड़ रुपये होता है. इस प्रकार केंद्र और राज्य सरकार को एक ही सौदे में करीब नौ करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.

लोकायुक्त की जांच में मथुरा के तत्कालीन जिलाधिकारी विशाल चौहान ने स्टांप ड्यूटी में की गई धांधली की पुष्टि की है. जांच के पश्चात स्टांप विभाग के अतिरिक्त पुलिस निदेशक ने भी इस बात की पुष्टि की है कि उक्त भूमि का पहले आवासीय उद्देश्य से इस्तेमाल किया गया, उस पर बहुमंजिला आवासीय योजना विकसित की गई और इसके बाद एक बार फिर से उसका लैंड यूज आवासीय से बदल कर कृषि करने का मकसद सिर्फ स्टांप ड्यूटी की चोरी करना था.

वर्ष 2013-14 के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार को स्टांप और पंजीकरण विभाग द्वारा 10,000 करोड़ रुपये से थोड़ा ज्यादा राजस्व की प्राप्ति हुई थी. इसमें तीन करोड़ से ज्यादा की भूमि और अन्य संपत्तियों की खरीद फरोख्त हुई थी. वर्ष 2014-15  में सरकार ने स्टांप और पंजीकरण विभाग के लिए 12,722 करोड़ रुपये राजस्व की प्राप्ति का लक्ष्य निर्धारित किया है. मौजूदा वित्त वर्ष के लिए उत्तर प्रदेश सरकार का कुल राजस्व आय का लक्ष्य 81,000 करोड़ रुपये है.

लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा बताते हैं, ‘मथुरा मामले की जांच में जो तथ्य सामने आएं हैं, वह तो इस पूरे घोटाले का बहुत छोटा सा हिस्सा है. यह नेटवर्क पूरे प्रदेश में बड़े पैमाने पर काम कर रहा है.’ वे आगे बताते हैं, ‘जहां तक मेरी जानकारी है स्टांप ड्यूटी में चोरी का कारोबार सूबे के पांच बड़े जिलों में धड़ल्ले से चल रहा है. लेकिन मैं इसे रोकने के लिए कुछ नहीं कर सकता क्योंकि मेरे पास इन जिलों से कोई शिकायत नहीं आई है. अगर मैं अपने स्तर पर जिले के प्रशासनिक अधिकारियों को कोई निर्देश जारी भी करता हूं तो कंपनियां हाईकोर्ट में इसे चुनौती देकर इस पर स्टे ले लेंगी.’

लोकायुक्त के मुताबिक स्टांप ड्यूटी में चोरी का कारोबार सूबे के पांच बड़े जिलों में धड़ल्ले से चल रहा है. बिल्डर इसके जरिए सरकार को करोड़ो रुपए का चूना लगे रहे हैं

मथुरा जिले से शिकायत मिलने के बाद लोकायुक्तने दूसरे जिलों के जिलाधिकारियों से भी इस संबंध में रिपोर्ट मांगी है कि क्या वहां भी इस तरह की गड़बड़ी चल रही है. सभी जिलों के जिलाधिकारियों ने अपने यहां राजस्व विभाग के अधिकारियों और रियल इस्टेट कंपनियों की मिलीभगत से स्टांप ड्यूटी की खुलेआम हो रही चोरी की बात स्वीकार की है.

‘लैंड यूज में फेरबदल करके स्टांप ड्यूटी में चोरी करना कोई नई बात नहीं है,’ स्टांप एवं रजिस्ट्रेशन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं. ‘यह धांधली पिछले एक दशक से जारी है, लेकिन सरकार इस गड़बड़ी से निपटने का कोई पुख्ता तरीका आज तक नहीं खोज सकी है. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि स्टांप एवं पंजीकरण विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से यह काम हो रहा है लेकिन वे तब तक अकेले इस काम को अंजाम नहीं दे सकते जब तक कि इसमें राजस्व विभाग के लोग शामिल नहीं हों. क्योंकि अंतत: वे ही भूमि के रिकॉर्ड में फेरबदल करने का काम करते हैं.’

‘भूमि की जांच रेवेन्यु रिकॉर्ड कीपर और राजस्व अधीक्षक द्वारा की जाती है. वे ही किसी भूमि को कृषि अथवा आवासीय होने का प्रमाणपत्र देते हैं. इसी रिपोर्ट के आधार पर भूमि का रजिस्ट्रेशन होता है. जो घोटाला मथुरा में सामने आया है वह तो कुछ भी नहीं है. यहां एक भारी-भरकम नेटवर्क है जो पूरे राज्य में संगठित तरीके से काम कर रहा है. सिर्फ एक साल के भीतर यह नेटवर्क सैंकड़ों करोड़ रुपये का चूना केंद्र और राज्य सरकार को लगा रहा है.’

2007-08 से अब तक सिर्फ मथुरा में ही इस तरह के 32 मामले सामने आ चुके हैं जिसमें लैंड यूज को पहले कृषि से आवासीय में बदला गया और बाद में उसे फिर से कृषि में तब्दील कर दिया गया. अगर जिले के संबंधित अधिकारियों ने यूपीजेडएएलआर की धारा 144 के तहत ये बदलाव नहीं किए होते तो राज्य सरकार के खाते में चार करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजस्व आया होता. अब तक राज्य सरकार ने इन 32 मामलों में कोई भी कर्रवाई नहीं की है. लोकायुक्त भी खुद को इस मामले में अक्षम पाते हैं क्योंकि न तो किसी ने उनके पास शिकायत दर्ज करवाई है न ही राज्य सरकार ने इस मामले की जांच उनके सुपुर्द की है.

एक अध्ययन के मकसद से लोकायुक्त ने पिछले दो सालों के दौरान गौतम बुद्ध नगर, लखनऊ, आगरा, कानपुर, बाराबंकी और गाजियाबाद के जिलाधिकारियों से पिछले दो सालों के दौरान लैंड यूज में किए गए बदलावों की सूचना मांगी थी.

  • गाजियाबाद के जिलाधिकारी ने स्वीकार किया कि लैंड यूज में बदलाव के जरिए स्टांप ड्यूटी में 7.15 करोड़ रुपये का नुकसान राज्य सरकार को हुआ है.
  • कानपुर में लैंड यूज में बदलाव के कुल 32 मामले सामने आए हैं. इस बदलाव से सूबे को करीब तीन करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ है.
  • आगरा के जिलाधिकारी ने बताया कि पिछले दो सालों के दौरान लैंड यूज में बदलाव के कुल छह मामले सामने आए हैं. इससे राजस्व को करीब 4 लाख रुपये का घाटा हुआ है.
  • बीते दो सालों के दौरान बाराबंकी जिले में लैंड यूज में बदलाव के कुल 17 मामले सामने आए. इसमें राज्य सरकार को करीब 75 लाख रुपये के राजस्व का नुकसान बताया गया.

राज्य सरकार को भेजी गई अपनी रिपोर्ट में लोकायुक्त ने पिछले पांच सालों के दौरान हुए इस तरह के सभी भूमि सौदों की जांच की सिफारिश की है. अपनी जांच में उन्होंने कहा है कि इस जांच की जिम्मेदारी राजस्व बोर्ड के चेयरमैन या उसके किसी सदस्य को सौंपी जानी चाहिए. साथ ही रिपोर्ट उन अधिकारियों के लिए कठोर दंड की मांग भी करती हैं जिन्होंने लैंड यूज बदल कर राजकोष को नुकसान पहुंचाया है.