आपके उपन्यास और फिल्म पीके की समानता के बारे में आपको पहले-पहल कब जानकारी हुई? मैंने फिल्म पीके एक जनवरी 2015 को देखी. फिल्म देखकर मैं एकदम अवाक ही रह गया. मुझे फिल्म के दौरान ही इस बात का अहसास होने लगा कि यह तो हूबहू मेरे उपन्यास ‘फरिश्ता’ पर आधारित है. बात केवल फिल्म के प्लॉट की नहीं है, बल्कि कई जगह तो मेरे उपन्यास के संवाद तक मामूली फेरबदल के साथ इस्तेमाल कर लिए गए हैं. इस बात ने मुझे एकदम से बेचैन कर दिया. अगर ऐसा एक-दो जगह हुआ होता तो मैं मान लेता कि यह संयोग है, लेकिन पूरी फिल्म में ऐसी समानताओं का एक सिलसिला है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती.
आपने यह उपन्यास कब लिखा था? इस उपन्यास को लिखने का विचार मेरे मन में पहली बार वर्ष 2006 में आया था. मैंने 2007 में इसे लिखना शुरू किया था और 2009 में जाकर यह उपन्यास पूरा हुआ. हालांकि इसका प्रकाशन वर्ष 2013 में जाकर हुआ. इसके प्रथम संस्करण की 800 प्रतियां छपी थीं.
क्या किसी और ने भी आपको बताया इस समानता के बारे में? जी नहीं. मुझे किसी ने कुछ नहीं बताया. चूंकि यह फिल्म काफी चर्चा में थी, इसलिए मैं इसे देखने गया था. पहले वक्त नहीं निकाल पाया इसीलिए फिल्म रिलीज होने के काफी दिन बाद मैंने इसे देखा.
आपने इतनी देर से शिकायत क्यों की? इसकी वजह भी यही है कि मैं पहले फिल्म देख ही नहीं पाया, न ही ऐसा कोई संयोग बना कि कोई मुझे इस समानता के बारे में बता पाता.
क्या अदालत की शरण में जाने से पहले आपने निर्माता-निर्देशक से किसी तरह का संपर्क किया? नहीं, कोई सीधा संपर्क तो नहीं हुआ, लेकिन मैंने चार जनवरी को फिल्म राइटर्स एसोसिएशन मुंबई के पास ईमेल से अपनी शिकायत दर्ज करवा दी थी. अगले ही दिन यानी 5 जनवरी को मेरे पास उनका जवाब भी आ गया, जिसमें उन्होंने मेरे दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि चूंकि मैं संस्था का सदस्य नहीं हूं, इसलिए इस मामले में कुछ नहीं किया जा सकता.
क्या अदालती नोटिस जारी होने के बाद किसी ने आपसे कोई संपर्क किया. जी नहीं. अभी तक तो किसी ने कोई संपर्क नहीं किया है. वैसे मैं आपको बता दूं कि यह एक लेखक की रचना के बेजा इस्तेमाल का मामला है, इसलिए मैं इस लड़ाई में किसी भी सूरत में पीछे हटनेवाला नहीं हूं.
आपकी मांग क्या है? मेरी मांग है कि मुझे इस फिल्म में मेरे उपन्यास के इस्तेमाल के लिए पूरा श्रेय दिया जाए और साथ ही एक करोड़ रुपये की राशि बतौर हर्जाना मुझे दिलाई जाए.
फिलहाल क्या स्थिति है? अदालत ने मेरी याचिका को स्वीकार कर लिया है और नोटिस जारी करते हुए आरोपी पक्ष को 16 अप्रैल तक अपना पक्ष रखने की तारीख तय की है. उस दिन फिल्म के निर्देशक राजकुमार हिरानी, निर्माता विधु विनोद चोपड़ा और पटकथा लेखक अभिजात जोशी को संपूर्ण दस्तावेज के साथ अदालत में हाजिर रहने का निर्देश दिया गया है.
अगर अदालत के बाहर समझौते की कोई पेशकश होती है तो आपकी क्या शर्तें होंगी? मामला अदालत में है. मैं अपनी बात पर कायम हूं. मैं कोई भी बात हवा में नहीं कर रहा हूं, सारे आरोप तथ्यों पर आधारित हैं. बॉलीवुड की सबसे हिट और कमाई करनेवाली फिल्म पूरी तरह से मेरे उपन्यास पर आधारित है. मैं फिल्म निर्माता से इस मुद्दे पर बहस करने को भी तैयार हूं.
फिल्म की जबर्दस्त कमाई और लोकप्रियता के लालचवश भी तो आप ऐसा कर सकते हैंै. ऐसा कुछ नहीं है. मामला कोर्ट में है. कोई रचनाकार ऐसा करके लोकप्रिय नहीं हो सकता है. उसे अपनी रचना की ताकत पर ही भरोसा करना होता है. जहां तक मेरी बात है, तो मेरे पाठकों के बीच मेरी पर्याप्त स्वीकार्यता है. कम से कम इस काम के लिए तो मुझे किसी फिल्मकार के साथ विवाद की जरूरत नहीं है.
भारत सरकार अपने उपक्रम कोल इंडिया (सीआईएल) में 10 फीसदी हिस्सेदारी 358 रुपये प्रति शेयर के भाव से बेचने का फैसला किया है. यह इसके आज के बंद भाव से पांच फीसदी कम है. इस बिक्री में 20 फीसदी हिस्सा रिटेल निवेशकों के लिए सुरक्षित रखा गया है, जिन्हें तय भाव पर पांच फीसदी की छूट दी गई है. सरकार को इस बिक्री से तकरीबन 22,000 करोड़ रुपये हासिल होने की उम्मीद है.
सरकार ने इस साल सरकारी कंपनियों में हिस्सा बेचकर 43,425 करोड़ रुपए हासिल करने का लक्ष्य रखा है और अकेले सीआईएल के शेयर की बिक्री से ही केन्द्र सरकार को इसका आधा लक्ष्य पाने में कामयाबी मिल जाएगी. वर्तमान में सीआईएल में सरकार की हिस्सेदारी 89.25 फीसदी है, जो बिक्री के बाद घटकर 79.25 फीसदी रह जाएगी.
वित्तीय घाटे को कम करने के लिए कंपनियों में हिस्सेदारी की बिक्री की फेहरिस्त में सीआईएल के बाद अगला नाम ओएनजीसी है, जिससे सरकार तकरीबन 15000 करोड़ रुपए जुटाने की उम्मीद कर रही है.
पहले गणतंत्र दिवस के भव्य आयोजन की तैयारी की गई, फिर इश्तहार निकाला गया. लेकिन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के इश्तहार में संविधान के प्रस्तावना की जो कॉपी लगाई गई, उससे ‘सोशलिस्ट और सेक्युलर’ शब्द गायब थे. कांग्रेस के विरोध के बाद जब विवाद ने तूल पकड़ा, तो राज्य मंत्री ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि इस ‘बात पर बेवजह सियासत की जा रही है. संविधान को लागू करते वक्त जिस प्रस्तावना का इस्तेमाल हुआ था, उसी की कॉपी छापी गई.’ लेकिन कांग्रेस प्रस्तावना की कॉपी पर नहीं, बल्कि भाजपा की मंशा पर सवाल उठाए हैं. अहम बात यह है कि इसी कॉपी का इस्तेमाल पिछली कांग्रेस सरकार ने भी किया था.
गणतंत्र दिवस का सरकारी इश्तहार
लेकिन सूचना एवं प्रसारण मंत्री रविशंकर प्रसाद ने शिवसेना सांसद संजय राउत की ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को संविधान से हटाने की मांग को जायज ठहरा कर आग में घी डालने का काम कर दिया है. प्रसाद ने इशारा करते हुए कहा कि समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता, ये दोनों शब्द 1976 के आपातकाल के दौरान प्रस्तावना में जोड़े गए थे. ‘इन दोनों शब्दों पर बहस करने में क्या दिक्कत है. बहस से देशवासियों को तय करने देना चाहिए कि वे क्या चाहते हैं.’ कांग्रेस पर निशाना साधते हुए प्रसाद ने कहा, ‘धर्मनिरपेक्ष शब्द को संविधान निर्माताओं ने प्रस्तावना में शामिल नहीं किया. क्या पंडित नेहरू की धर्मनिरपेक्षता की समझदारी मौजूदा कांग्रेसी नेताओं से कम थी.’
वहीं इस बयान से शह पाकर राउत ने एक और दांव फेंकते हुए कह दिया ‘शिवसेना प्रमुख बाला साहेब और उनसे पहले सावरकर हमेशा से कहते आए हैं कि देश का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था. पाकिस्तान मुसलमानों के लिए विभाजित किया गया था, जो बच गया वह हिन्दू राष्ट्र है.’
विकास के मुद्दे पर जनादेश प्राप्त करने वाली भाजपा के कई सांसद अटपटे बयान दे चुके हैं. साध्वी निरंजन ज्योति से लेकर उन्नाव के सांसद साक्षी महाराज अपने बयानों से सरकार की छवि को पहले ही ठेस पहुंचा चुके हैं. ऐसे में प्रसाद के इस बयान ने नया विवाद खड़ा कर दिया है. काफी संभव है कि जिस दलील के तहत प्रसाद और राउत ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द पर बहस या उसे हटाने की मांग कर रहे हैं, उसी का इस्तेमाल कर ‘समाजवाद’ को हटाने की मांग भी की जा सकती है.
हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं में वर्ष 2014 में प्रकाशित 100-150 पुस्तकों के बीच से साहित्यिक गुणवत्ता की दृष्टि से सिर्फ 10 श्रेष्ठ पुस्तकों का चुनाव करना निश्चय ही चुनौतीपूर्ण काम है लेकिन आपका साहित्यिक विवेक इस निर्णय को आसान कर सकता है यदि आपमें कोई पूर्वग्रह या राग-द्वेष न हो. यह प्रसन्नता की बात है कि इस वर्ष भी कुछ अच्छी पुस्तकें आई हैं, जिनसे हिंदी साहित्य समृद्ध हुआ है.
आज साहित्यिक विधाओं में जिस प्रवृत्ति की सबसे ज्यादा चर्चा है, उसमें फैंटेसी के साथ फिक्शन है, जो यथार्थ तक पहुंचने में हमारी मदद करता है. पिछले दिनों अपने एक वक्तव्य में अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक सलमान रुश्दी एक सवाल उठाते हैं, ‘फिक्शन में यथार्थ के क्या मायने हैं ? फिर इस सवाल को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं- ‘कथा की पहली सीमा यह है कि यह सच नहीं होती. कहानी; उन घटनाओं को दर्ज नहीं करती है, जो घटती हैं, उन लोगों को सामने लाती है, जो सचमुच नहीं है. उसी तरह जो नहीं होता है, वह सब वहां होता है. यह उपन्यास का प्रवाह है. उपन्यास सीधे-सीधे बताता है कि यह सब सच्चाई नहीं है. इस तरह साहित्य में तब सच का क्या मतलब रह जाता है?’ स्पष्टतः हम जो लिखते या समझते हैं, अंततः वह मानवीय सच्चाई है.
इस वर्ष प्रकाशित उपन्यासों के बीच से मैंने तीन उपन्यासों को इस वर्ष की उपलब्धि के रूप में भाषा, शिल्प, कथा संयोजन और संवाद की दृष्टि से उल्लेख करने के लिए चुना है. हालांकि रवीन्द्र श्रीवास्तव लेखक पुराने हैं, लेकिन ‘रुक्काबाई का कोठा’ उनका पहला ही उपन्यास है, जिसमें उन्होंने हमारे समाज के कोने और अंधेरे में झांकने की कोशिश की है. वेश्याओं की जिन्दगी को लेकर अब तक हिंदी में बहुत कुछ लिखा गया है- ‘वैशाली की नगरवधू’ चतुरसेन शास्त्री, ‘ये कोठेवालियां’ अमृतलाल नागर, ‘जलते हुए मकान में कुछ लोग’ राजकमल चौधरी, ‘मुरदाघर’ जगदंबा प्रसाद दीक्षित, ‘खुदा सही सलामत है’ रवीन्द्र कालिया, ‘सलाम आखिरी’ मधु कांकरिया आदि, लेकिन यह पहली बार हुआ है कि इस अंधेरी दुनिया की गलाजत में डूबकर किसी लेखक ने हमारे समाज के सर्वाधिक उपेक्षित और घृणा की दृष्टि से देखे जाने वाले वर्ग के शोषण और उसके शोषकों की मक्कारियों और चालबाजियों को बेनकाव किया है. उपन्यास का मुख्य घटनास्थल रांची शहर और वहां के कोठों के मोहल्ले की लेखक की अपनी परिकल्पना है. कहानी का मुख्य पात्र रमाकांत है और पूरी कहानी फ्लैशबैक में चलती है. इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता इसका नया शिल्प और भाषा की जीवंतता है, जिसके माध्यम से सुदूर अतीत के भयावह समय को प्रस्तुत किया गया है.
प्रतिष्ठित कथाकार अखिलेश के दूसरे उपन्यास ‘निर्वासन’ को समय-समाज की भावनाओं की बेदखली का आख्यान कहा गया है. बेशक यह उपन्यास पारंपरिक ढंग का नहीं है लेकिन उपन्यास का कथा-संयोजन जिस तरह किया गया ह,ै उसमें यथार्थवाद, आधुनिकतावाद और जादुई यथार्थवाद का समावेश है. निर्वासन शब्द के अर्थ को इस उपन्यास में एक व्यापक आयाम दिया गया है, जिसके कारण इसके घेरे में समय, समाज और भावनाओं का निर्वासन भी है. निर्वासन की कथा तो छोटी है, लेकिन इसका प्रत्याख्यान बड़ा है. पर्यटन निदेशालय का दफ्तर है, जिसमें उसके उच्चाधिकारी और कर्मचारी हैं. वहां संपूर्णानंद बृहस्पति हैं, जो पर्यटन के अध्यक्ष ही नहीं, प्रदेश के मुख्यमंत्री के सलाहकार भी हैं. चूंकि वे बहुत महत्वाकांक्षी हैं इसलिए टकराहट तो होनी ही थी और वह टकराहट हुई पर्यटन के उपनिदेशक सूर्यकांत से, जो अंततः बृहस्पति से त्रस्त होकर अपनी नौकरी छोड़ने को विवश है. अपने एक पत्रकार मित्र की सहायता से उसे एक बड़ा प्रोजेक्ट मिलता है, जिसमें उसे करना यह है कि वह रामअयोर पांडे के बाबा, जो भारत से गिरमिटिया मजदूर के रूप में सूरीनाम गए थे, के पुश्तैनी गांव का पता लगाएं. उस स्थान की भौगोलिक स्थिति के बारे में सिर्फ इतना भर ज्ञात है कि वह उत्तर प्रदेश में है और गांव का नाम गोंसाईगंज है. पांडे अपने गांव की खोज तो करवाना ही चाहता था, साथ ही साथ अपने पुरखों की जीवनी भी लिखवाना चाहता था. उपन्यास रोचक और पठनीय है. लेकिन कहीं-कहीं इसकी भाषा अमर्यादित ही नहीं फूहड़ भी है. फिर भी इस वर्ष का यह एक उल्लेखनीय उपन्यास है.
हिंदी के सुपरिचित कथाकार भगवान दास मोरवाल का चौथा उपन्यास ‘नरक मसीहा’ अब तक उनके द्वारा लिखे गए उपन्यासों की विषयवस्तु से अलग हटकर है. इसमें पिछले कई दशकों से भारत में तेजी से पनपती गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) की महागाथा है. यूं तो आजादी के कुछ दशकों बाद ही मानवीय मूल्यों का हृास होना शुरू हो गया था. औपनिवेशिक पूंजीवाद की उपभोक्तावादी संस्कृति और कॉरपोरेट जगत की मिलीभगत ने हमारे समाज, उसके विचार, विश्वास, प्रतीक और अवधारणाओं को न केवल हाइजैक कर लिया, बल्कि समाज-सेवा की आड़ में देशी-विदेशी अनुदानों के बल पर एक ऐसी संस्कृति विकसित की जिसने हमारे तमाम मानवीय, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों को नष्ट कर दिया. यह गैर सरकारी संगठन आज भारत में खूब फल-फूल रहे हैं. इस उपन्यास का आरंभ एक पात्र गंगाधर आचार्य द्वारा कभी न देखी जाने वाली प्रचंड गर्मी से होता है और अंत उसी गंगाधर आचार्य द्वारा सारी आत्मस्वकृतियों को बापू के चरणों में अर्पित कर उनकी समाधि स्थल से बाहर आते हुए होता है. यह बेहद दिलचस्प उपन्यास है और एनजीओ के कोने-अंतरे में झांकते हुए उसकी गतिविधिओं को बेनकाव करनेवाला.
उपन्यास की तुलना में इस वर्ष कहानी-संग्रहों की संख्या भी कम नहीं है, जिसमें नए और पुराने लेखकों के संग्रह शामिल हैं. सुपरिचित वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया का इसी वर्ष महत्वपूर्ण नया कहानी-संग्रह ‘थोड़ा सा प्रगतिशील’ आया है जिसमें उनकी 13 कहानियां संकलित हैं. ये कहानियां उनकी लेखन-प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जिसमें एक ओर प्रेम है तो दूसरी ओर बदलते समाज की धड़कने. अपने लेखन की वजह का खुलासा वे कुछ इस तरह करती हैं, ‘समय के सवालों से जूझने की चुनौती और उत्कंठा तथा जीवन के प्रति नित-नूतन विस्मय ने ही रचनाओं का लिखना संभव किया है.’ कहानी में यथार्थ की गुजांइश के बारे में उनका मानना है कि ‘बड़ा अजीब लगता है कि कहानी में पहले अपने यथार्थ को कल्पना बनाओ, फिर उसे कथा यथार्थ बनाकर ऐसे लिखो कि वह अकेले एक की नहीं, हर एक की कथा लगे. इस प्रक्रिया में यथार्थ से एक जायज दूरी हासिल करनी होती है और उन स्मृतियों से भी छुटकारा मिलता है, जो आपके मन पर बैठी रहती हैं.’ ममता जी की कहानियों की एक बड़ी उपलब्धि यह है कि उनमें सहज, सरल और पारदर्शी भाषा के साथ गजब की पठनीयता है, जो पाठक को पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लेती है.
‘वागर्थ’ में प्रकाशित ‘तक्षशिला में आग’ कहानी से चर्चित राकेश मिश्र का दूसरा कहानी-संग्रह है ‘लाल बहादुर का इंजन’, जिसमें उनकी सात कहानियां संकलित हैं. राकेश मिश्र की ये तमाम कहानियां कहानी के पारंपरिक ढांचे से न केवल अलग हटकर हैं बल्कि कथावस्तु की दृष्टि से बिखरी हुई भी हैं. यह उनके कथा शिल्प की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी ताकत है, क्योंकि वे कहानी में यथार्थ को ऊपर से नहीं थोपते हैं, बल्कि उस यथार्थ के भीतर से कहानी निकालते हैं. यह उनकी कहानी ‘शोक’ और ‘लाल बहादुर का इंजन’ में उभरकर आया है.
यह सच है कि आज कविता पहचान के संकट से गुजर रही है. यह संकट इसलिए भी है कि आज लिखी जा रही बुरी कविताओं ने अच्छी कविताओं को आच्छादित कर दिया है, लेकिन इस अंधेरे में भी अच्छी कविता की चमक दूर तक फैल जाती है. ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि केदारनाथ सिंह का इसी वर्ष प्रकाशित संग्रह ‘सृष्टि पर पहरा’ एक विलक्षण संग्रह है. अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ 1959 में संकलित कविताओं के बाद स्वतंत्र रूप से उनका संग्रह ‘अभी बिल्कुल अभी’ 1960 में प्रकाशित हुआ. मूलतः रोमानी भूमि से अपनी यात्रा आरंभ करते हुए केदारनाथ सिंह की काव्य यात्रा लोकभूमि तक पंहुच गई है. एक ओर उनकी स्थानीयता के भूगोल का विस्तार हुआ है तो दूसरी तरफ उनकी कविताओं की भाषा पारदर्शी और संवादधर्मी भी है. इस संग्रह में वैसे तो 7-8 कविताएं ऐसी हैं, जिनका उल्लेख करना जरूरी है. इस संग्रह की दूसरी कविता ‘विद्रोह’ में घर की तमाम वस्तुओं का विद्रोह अपनी जड़ों तक लौटने के लिए है. ‘ज्यां पॉल सार्त्र की कब्र पर’ शीर्षक कविता है तो छोटी, लेकिन बेहद संवेदनशील और बेधक है. इसी तरह ‘देश और घर’ इस संग्रह की एक अच्छी कविता है. ‘हिंदी मेरा देश है/भोजपुरी मेरा घर/घर से निकलता हूं/तो चला जाता हूं देश में/देश से छुट्टी मिलती है/तो लौट आता हूं घर.’ ‘निराला की आवाज’, ‘त्रिलोचन को पढ़ना’, ‘सृष्टि पर पहरा’ भी इस संग्रह की उल्लेखनीय कविताएं हैं.
हिंदी के सुपरिचित आलोचक डॉ. नंदकिशोर नवल की इस वर्ष प्रकाशित आलोचना पुस्तक ‘हिंदी कविता अभी, बिल्कुल अभी’ में नौ कवियों- विनोद कुमार शुक्ल, विष्णु खरे, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, आलोक धन्वा, श्याम कश्यप, ज्ञानेन्द्रपति, उदय प्रकाश और अरुण कमल पर लंबे आलोचनात्क लेख हैं. उन्होंने ‘आधुनिक हिंदी कविता का इतिहास’ भी लिखा है. जो लोग यह समझते हैं कि प्रस्तुत पुस्तक उनके ‘इतिहास’ का परिशिष्ट है, उसके बारे में डॉ. नवल का रेने वेलेफ के साक्ष्य से कहना है, ‘चूंकि इतिहास की कसौटी पर उनकी कविता अभी नहीं चढ़ी, इसलिए मैं इस पुस्तक को ‘इतिहास’ का परिशिष्ट नहीं कह सकता.’ इस तरह यह पुस्तक आज लिखी जा रही कविता के गवाक्ष को खोलती है.
हाल के वर्षों में आत्मकथा लेखन के क्षेत्र में डॉ. तुलसीराम का नाम विशेष उल्लेखनीय है. उनकी आत्मकथा का पहला खंड ‘था ‘मुर्दहिया’ और इस वर्ष प्रकाशित इसी श्रृंखला का दूसरा खंड ‘मणिकर्णिका’ आया है. पुस्तक की भूमिका में वे लिखते हैं, ‘मुर्दहिया में आजमगढ़ में 16-17 साल तक की अवस्था का लेखा-जोखा था. उसके आगे करीब 10 साल मैंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) में बिताया, जिसका परिणाम ‘मणिकर्णिका’ है. उनकी आत्मकथा की एक बड़ी विशेषता यह है कि यह मात्र आत्मकथा नहीं है. यह वस्तुतः एंेथ्रोपोलोजी (मानव विज्ञान) पर किया गया काम भी है. इसलिए इसे सामाजिक इतिहास भी कहा गया है.
साहित्यिक विधाओं में सबसे नाजुक विधाएं हैं आत्मकथा, डायरी और पत्र. कवि-आलोचक डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की सद्यः प्रकाशित डायरी ‘दिन रैन’ पुस्तक फरवरी 1968 गोरखपुर से शुरू होती है और 20 जून 2013 को गोरखपुर में ही समाप्त होती है यानी 45 वर्ष के समय को समेटे हुए. इस तरह ‘दिन रैन’ मात्र डायरी ही नहीं है, बल्कि साहित्यिक और राजनीतिक उथल-पुथल की भी एक दिलचस्प कहानी है, जो लिखी तो गई है डायरी की शैली में लेकिन इसे पढ़ने से तिवारी जी का बहिरंग ही नहीं अंतरंग भी जाना जा सकता है. कोई सोच भी नहीं सकता कि अध्यक्ष बनने के बाद पहली सुबह आईआईसी के किसी कमरे के एकांत में बैठा साहित्य अकादेमी का नवनिर्वाचित अध्यक्ष सुबक-सुबक कर काफी देर तक रोता रहा अपने पूर्वजों को याद करते हुए.
वैसे तो इस वर्ष पुराने नाटककार बादल सरकार के तीन नाटकों के अतिरिक्त शंकर शेष के नाटक ‘पोस्टर’ का नया संस्करण प्रकाशित हुआ, लेकिन नाटक के क्षेत्र में इस वर्ष की एक बड़ी उपलब्धि है ‘ताजमहल का टेंडर’ से चर्चित नाटककार अजय शुक्ला का दूसरा नाटक ‘ताजमहल का उद्घाटन’. मुगलकाल की न केवल विश्वप्रसिद्ध इस कलाकृति ‘ताजमहल’ के टेंडर के बाद उसके उद्घाटन को लेकर मुगल शासकों की समस्या, दांव-पेंच, भ्रष्टाचार आदि को न केवल आधुनिक संदर्भ में रखा गया है, बल्कि उसे आज के समय से उसे जोड़ा भी गया है. शिल्प की नवीनता और भरपूर नाटकीयता इसकी खासियत है.
मैत्रेयी पुष्पा की औपन्यासिक यात्रा जितनी बहुरंगी है उतनी ही मार्मिक भी. उनका नवीनतम उपन्यास ‘फरिश्ते निकले’ हाशिये की स्त्री का महाकाव्यात्मक आख्यान है. दस शीर्षकों में विस्तृत उपन्यास में दो आख्यान प्रमुख हैं. एक में कथा-नायिका बेला बहू की संघर्ष गाथा है, जिसके पिता की बचपन में मृत्यु हो जाती है. आर्थिक विपन्नता के कारण उसकी मां उसके स्वर्गीय पिता से भी अधिक आयु के व्यक्ति के साथ उसका विवाह कर देती है. बालिका वधू पर उसके पति का अत्याचार, कालान्तर में उसका सौदा, छद्म प्रेमी तथा उसके भाइयों द्वारा उसका शोषण कहानी की विषय वस्तु है. दूसरी कहानी बुन्देलखण्ड के ग्रामीण परिवेश में लोहापीटा परिवार की लड़की उजाला और गांव के जमींदार के बेटे वीर की प्रेम कहानी है जिसका मूल्य उसे अपने ऊपर जानलेवा यौन हमला झेलकर चुकाना पड़ा. उपन्यास में अनेक ऐसे पात्र भी हैं जिनकेे जीवन संघर्ष, द्वन्द्व, संघात और उनके अन्तर्विरोध इस उपन्यास को एक क्लासिक गरिमा प्रदान करते हैं. परिवेश और चरित्र दोनों ही इतने प्रभावी हैं कि न तो परिवेश चरित्रों पर हावी होने पाता है और न ही चरित्र परिवेश को कमजोर होने देते हैं.
उपन्यास की कथावस्तु का कालखण्ड विगत चार दशकों के ग्रामीण भारत के उपेक्षित, वंचित और सताए हुए स्त्री-पुरुषों का वह आख्यान है जो अपराध की दुनिया में प्रवेश करने को विवश होते हैं, लेकिन इसके बावजूद हमारी संवेदना के पात्र बनते हैं. ये कालान्तर में न सिर्फ मुख्य धारा में लौटते हैं, वरन शिक्षासेवी और समाजसेवी का दायित्व भी निभाते हैं.
पुस्तक: फरिश्ते निकले लेखक: मैत्रेयी पुष्पा मूल्य: 395 रुपये पृष्ठ: 240 प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
मैत्रेयी का यह उपन्यास स्त्री के शोषण और उसके उत्पीड़न की एक ऐसी महागाथा है, जिसे पढ़ते हुए हम दुःख की एक विशाल नदी को पार करते हैं और राजसभा में अपमानित हो रही महाभारत की द्रौपदी से लेकर आज की निर्भया हमारे सामने प्रत्यक्ष हो जाती है.
उपन्यास में लोहापीटा परिवारों का जैसा सजीव चित्रण हुआ है, वह अनूठा है. उनकी परम्परा, रीति-रिवाज, रहन-सहन और विकास के इस आधुनिक युग में उनकी आजीविका पर आये संकट को जिस प्रकार मैत्रेयी ने अभिव्यक्त किया है, वैसा पहले किसी उपन्यास में नहीं हुआ.
यह उपन्यास मानव सभ्यता के विकास क्रम को लेकर एक बड़ा सवाल छोड़ जाता है. एक पूर्व डकैत अजय सिंह द्वारा बेला को लिखी चिठ्ठी देखिए, ‘अखबार में हम क्या पढ़ें? हत्याओं, बलात्कारों और औरतों को जलाने की वारदातों से पटा पड़ा रहता है. हमें अजूबा लगता है बिन्नू कि हमें लोग डकैत, हत्यारा क्यों मान रहे हैं? औरतों और लड़कियों की गुहार ऐसी कि रास्ता न सूझे… क्या वे बाहर निकलना छोड़ दें, सड़क उनके लिए नहीं है, विश्वविद्यालय खूनी जंगल हैं, बसें बलात्कारियों के लिए सेफ जगह…’ के उत्तर में बेला क्या लिखे? क्या यही कि, ‘कैसा विधान है कि नागरिक डाका डाल रहे हैं, हत्या कर रहे हैं, बलात्कारों के क्षेत्र बनाते जा रहे हैं और एक डाकू तथाकथित अपराधी, समाज का कलंक इस स्थिति पर विलाप कर रहा है, सज्जनता की रस्सियों में बंधा छटपटा रहा है.’ निश्चय ही यह उपन्यास बहुत सारी अमानवीयता के विरुद्ध न सिर्फ खड़े होने का साहस प्रदान करता है वरन सामाजिक बदलाव का संदेश भी देता है.
अपनी पेंसिल के जरिए लंबे समय से आम आदमी की आवाज को बुलंद करते आ रहे कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण नहीं रहे. 93 साल के लक्ष्मण लम्बे अरसे से किडनी से संबंधित रोग से जूझ रहे थे. बीते कई दिनों से वह जीवन रक्षक प्रणाली (लाईफ स्पोर्ट सिस्टम) पर थे. उनका निधन 26 जनवरी को देर शाम पुणे के दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल में हुआ.
परिवार में सबसे छोटे और प्रसिद्ध उपन्यासकार आरके नारायण के भाई लक्ष्मण का जन्म 1921 में मैसूर में हुआ था. उन्होंने छोटी उम्र से ही मालगुडी को चित्रांकित करना शुरू कर दिया था. 1940 में उन्होंने बतौर कार्टूनिस्ट काम करना शुरू किया और स्वतंत्र भारत में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ से जुड़े, जिसने पांच दशकों तक उनके ‘कॉमन मैन’ को ‘यू सेड इट’ नामक कॉलम में जगह दी.
आश्चर्यजनक सत्य यह भी है कि भारत के सफलतम कार्टूनिस्ट रहे लक्ष्मण को प्रसिद्ध जेजे कालेज ऑफ आर्ट्स, बम्बई ने दाखिला देने से मना कर दिया था. आवेदन को वापस करते हुए जेजे कालेज ने कहा था कि उनके अंदर ‘दाखिले के लिए जरूरी न्यूनतम प्रतिभा की कमी है.’
लक्ष्मण अपने कार्टूनों में अचूक कटाक्ष और व्यंग्य के लिए जाने जाते हैं. सात दशकों तक कार्टून की दुनिया पर राज करने वाले कॉमन मैन के जनक लक्ष्मण लगातार राजनेताओं की गलतियों को अपनी पेंसिल से रेखांकित करते आए थे. शायद ही कोई राजनेता रहा हो जो लक्ष्मण के व्यंग्यात्मक कार्टून से बच सका हो. लक्ष्मण ने एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर तंज कसते हुए एक हास्य चित्र बनाया था, जिसके बाद खुद नेहरू ने उन्हें पत्र लिखा था. उस पत्र में नेहरू ने शिकायत नहीं, बल्कि लक्ष्मण से गुजारिश की थी कि वह अपने हस्ताक्षर के साथ चित्र की कॉपी उन्हें भेजें.
इंदिरा गांधी भी लक्ष्मण के हास्य चित्रों का निशाना रही थीं. आपातकाल के दौरान तो उन पर लक्ष्मण के हमले और तीखे हो गए थे. सेंसरशिप जब अपने चरम पर थी, तब उन्होने अपने कॉमन मैन को अखबार के नीचे सिर छिपाए हुए दिखाया था, जिस पर ‘वेरी गुड, वेरी हैप्पी’ के शीर्षक लगे थे.
आपातकाल की सेंसरशिप को कॉमन मैन का जवाब
जनता की आवाज माने जाने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण भी लक्ष्मण के व्यंग्यों से बचने में नाकामयाब रहे थे.
लोकनायक जयप्रकाश नारायण पर लक्ष्मण का कार्टून
दशकों तक राजनैतिक कार्टूनों के जरिए खुद को अभिव्यक्त करने वाले लक्ष्मण ने बदली राजनीतिक पृष्ठभूमि पर कहा था, ‘मुझे नहीं लगता कि राजनेता आम आदमी का प्रतिनिधत्व करते हैं. वे आम आदमी को भूल चुके हैं, उन्हें लगता है कि आम आदमी उनके लिए है, उनकी सेवा के लिए है.’
सलमान की ‘हिट एंड रन’ केस पर लक्ष्मण का कार्टून
लक्ष्मण के कार्टून केवल राजनीति तक ही सीमित नहीं थे. दूरदर्शन के दर्शकों के दिलों पर लंबे समय तक राज करने वाले धारावाहिक ‘मालगुडी डेज’ की पहली झलक आरके लक्ष्मण के बनाए ‘कॉमन मैन’ के साथ शुरू होती थी. फिल्म अभिनेता सलमान खान के विवादित ‘हिट एंड रन’ मामले पर भी लक्ष्मण ने अपने खास अंदाज में टिप्पणी की थी.
साल 2005 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था. इसी साल उन्हें मैसूर विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट की उपाधि भी दी थी. इससे पहले उन्हें 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था. वह साल 1984 में मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित हुए थे.
लक्षमण ने दो विवाह किए थे और दोनों पत्नियों का नाम कमला था. पहली पत्नी भरतनाट्यम नर्तकी और फिल्म अदाकारा थी और दूसरी पत्नी लेखिका थी.
आम आदमी के अलावा एशियन पेंट्स का प्रसिद्ध मैस्कॉट ‘गटू’ भी उनकी पेंसिल से ही निकला था. 2003 के पैरालिसिस अटैक में लक्ष्मण के शरीर के बायें हिस्से ने काम करना बंद कर दिया था जिससे वह कभी पूरी तरह उबर नहीं सके.
उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी सहित कई जानी-मानी हस्तियों ने ट्वीट के जरिए शोक प्रकट किया है.
सरकारी सर्कुलर के जरिए शनिवार के दिन सरस्वती पूजा आदेश जारी किया गया है.
म्युनिसिपल स्कूल बोर्ड (एएमसी) के प्रशासनिक अधिकारी एलडी देसाई के द्वारा जारी किए गए इस विवादास्पद सर्कुलर के अनुसार ‘सभी नगर निगम के स्कूलों को सूचितकिया जाता है कि बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती की अराधना की जाती है, वो ज्ञान की देवी हैं. बच्चों के जीवन में शिक्षा का महत्व समझाने के लिए इस अवसर पर सभी छात्रों को सरस्वती वंदना और पूजन कराया जाए. इस आदेश का पालन सभी स्कूल सुनिश्चित करें.’
अहमदाबाद में 300 सरकारी स्कूल हैं. इनमें करीब 10,000 मुस्लिम छात्र भी पढ़ते हैं. यह आदेश उन बच्चों पर भी लागू होगा. ऐसे में एक धार्मिक विवाद खड़ा होने कीप्रबल संभावना है. शहर के 50 उर्दू मीडियम स्कूलों के प्रधानाध्यापकों ने इस विवादास्पद सर्कुलर को लागू करने के प्रति अपनी असमर्थता जतायी है. उर्दू माध्यम के स्कूलों के शिक्षक खुद को सरकारी सर्कुलर और अभिभावकों के बीच फंसा हुआ पा रहे हैं. यह आदेश जारी करने वाले अधिकारी देसाई से स्थानीय पत्रिका अहमदाबाद मिरर ने बातचीत की जिसमें उनका कहना था ‘मां सरस्वती हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई सबके लिए ज्ञान की देवी हैं. मुझे नहीं लगताकी उर्दू माध्यम के स्कूलों को इस आदेश का पालन करने में कोई दिक्कत होगी. सर्कुलर सभी एएमसी विद्यालयों पर लागू है लिहाजा उर्दू स्कुलों सहित सबको इसका पालन करना है.’ ऐसा पहला वाक्या नहीं है जब देसाई ने विवादित सरकुलर जारी किया हो. इससे पहले भी वह सरकारी स्कुलों में हिन्दु प्रथानाओं की वंदना करने जैसे आदेश जारी कर चुके हैं.
महीने भर के भीतर गुजरात में धार्मिक भावनाओं के टकराव का यह दूसरा बड़ा मामला सामने आया है. इससे पहले सूरत में पुलिस ने मॉक ड्रिल के दौरान आंतकवादी की भूमिका निभा रहे एक व्यक्ति को नमाजी टोपी पहना दिया था. देश भर में सूरत पुलिस के इस कृत्य की कड़ी अलोचना हुई थी.
किसी भी राजनीतिक दल, खासतौर पर क्षेत्रीय दल, के जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. कई राज्यों में एक दल का आना और दूसरे का जाना बारी-बारी से चलता रहा है. केरल में कभी एलडीएफ, तो कभी यूडीएफ की सरकार आती रहती है. तमिलनाडु में कभी करुणानिधि, तो कभी जयललिता सत्ता में आते-जाते रहते हैं. लेकिन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा की क्षेत्रीय पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल पिछले 10 सालों से सत्ता से बाहर है और अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है.
साल 2014 के विधानसभा चुनाव में इसे 19 सीटें जरूर मिली हैं, लेकिन इसके वोटों में कमी का क्रम लगातार जारी है. यह लगातार चौथा ऐसा विधानसभा चुनाव है जिसमें पार्टी के वोटों में कमी आई है. ऐसे में राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि पार्टी इस समय अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए संघर्ष कर रही है. पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश चौटाला तथा उनके बेटे अजय सिंह चौटाला शिक्षक भर्ती घोटाले के आरोप में दस साल की सजा काट रहे हैं. इसके अलावा उन पर आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में मुकदमा भी चल रहा है.
ओम प्रकाश चौटाला और अजय चौटाला के जेल में होने की वजह से पार्टी की कमान इस समय ओम प्रकाश चौटाला के बेटे अभय चौटाला एवं अजय चौटाला के सांसद पुत्र दुष्यंत चौटाला के हाथों में है. चुनावों में पार्टी की हार के मद्देनजर पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अशोक अरोड़ा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन उसे पार्टी ने मंजूर नहीं किया था. अब पार्टी की उम्मीदें सीबीआई अदालत द्वारा ओम प्रकाश चौटाला तथा अजय चौटाला को शिक्षक भर्ती घोटाले में मिली दस साल की सजा के फैसले के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में की गई अपील के फैसले पर लगी हैं. सुनवाई पूरी हो चुकी है और अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा है. चौटाला का कहना है कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है. पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आरएस चौधरी का कहना है कि अदालत के फैसले से दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा.
हालांकि ओम प्रकाश चौटाला आरोप लगा चुके हैं कि हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने सीबीआई से मिलकर साजिश करके उन्हें इस मामले में फंसाया था. अपने आरोप को सच साबित करने के लिए वह आम आदमी पार्टी के नेता प्रशांत भूषण द्वारा जारी उस डायरी का हवाला देते हैं, जिसमें हुड्डा की सीबीआई के तत्कालीन निदेशक रंजीत सिन्हा से कई बार हुई मुलाकातों का उल्लेख है.
साल 2014 के विधानसभा चुनाव में इसे 19 सीटें जरूर मिली हैं, लेकिन इसके वोटों के प्रतिशत में गिरावट का क्रम लगातार जारी है
हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा और इनेलो के बीच तालमेल की बात भी चली थी, लेकिन मुख्यतः चौटाला को सजा होने के चलते यह बातचीत सिरे नहीं चढ़ पाई थी. चुनाव के दौरान शुरू में इनेलो उम्मीदवारों ने नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट भी मांगे थे. चुनाव प्रचार के दौरान वे कहते रहे कि उनका वोट मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के काम आएगा. लेकिन मतदान से पहले मोदी ने अपनी जनसभा में कह दिया कि मतदाता उनके नाम पर वोट मांगनेवालों से सावधान रहें. लेकिन फिर भी सिरसा और हिसार लोकसभा सीटों से इनेलो के उम्मीदवार जीत गए.
वैसे चौटाला के समर्थकों के साथ ही साथ उनके कट्टर विरोधी भी उनकी इच्छाशक्ति की दाद जरूर देते हैं. दस साल की सजा मिलने और अस्सी साल की उम्र पार करने के बावजूद उनका मनोबल नहीं डिगा है. विधानसभा चुनाव के दौरान जेल से जमानत पर रिहा हुए चौटाला ने अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के लिए कई जगहों पर सभाएं कीं. इस पर जब सीबीआई ने उनकी जमानत रद्द करने के लिए अदालत में याचिका डाली, तो चौटाला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ही आरोप लगा दिया कि उन्हें सत्ता में आने से रोकने के लिए उनके इशारे पर एजेंसी ने यह कार्रवाई की है. उस दौरान उनके इस बयान पर काफी प्रतिक्रिया हुई थी, जब उन्होंने कहा था कि वह मुख्यमंत्री पद की शपथ तिहाड़ जेल से ही लेंगे.
पार्टी को उम्मीद है कि इस मामले में अदालत से बरी होने के बाद कार्यकर्ताओं में नया जोश पैदा होगा. फिलहाल तो अभय चौटाला, अशोक अरोड़ा और दुष्यंत चौटाला अलग-अलग पार्टी के कार्यकर्ताओं की बैठकें करके उनका मनोबल बनाए रखने में जुटे हुए हैं. इनेलो नेतृत्व अपनी रणनीति के तहत भाजपा द्वारा विधानसभा चुनाव के दौरान किए गए वायदे पूरे न करने को लेकर सरकार के खिलाफ बयानबाजी कर रहा है. दुष्यंत चौटाला का कहना है कि पार्टी ने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करवाने का वायदा किया था, जो पूरा नहीं किया. पंजाब के कर्मचारियों के बराबर वेतनमान देने सहित कई अन्य मामलों पर पार्टी मनोहर सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही है. हालांकि पार्टी अभी भाजपा के नेतृत्ववाली सरकार के खिलाफ कोई आंदोलन अभी तक नहीं चला पाई है, वैसे भी सरकार को बने अभी करीब ढाई महीने ही हुए हैं और सरकार ने ऐसा कोई जनविरोधी निर्णय भी नहीं लिया है जिसे लेकर कोई आंदोलन खड़ा किया जाता.
उधर अभय चौटाला कह रहे हैं कि उनकी पार्टी प्रदेश में मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाएगी. डेरा सच्चा सौदा द्वारा भाजपा को समर्थन देने और कांग्रेस द्वारा उन्हें सत्ता में आने से रोकने के लिए अंदरखाने भाजपा को समर्थन देने को वह पार्टी की हार की अहम वजह मान रहे हैं. अभय चौटाला प्रदेश में खाद की कमी को लेकर भी सरकार को आड़े हाथों ले रहे हैं. अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न देने के मामले पर पहले तो अभय चौटाला ने सरकार पर इस सम्मान का भगवाकरण करने का आरोप लगाते हुए कह दिया कि वाजपेयी का देश को आजाद करवाने में कोई योगदान नहीं था, लेकिन बाद में मुख्यमंत्री मनोहर लाल से मिलने के बाद उन्होंने अपना स्टैंड बदल लिया. इस बीच अशोक अरोड़ा ने मनोहर लाल को अनुभवहीन मुख्यमंत्री बताते हुए यहां तक कह दिया कि मुख्यमंत्री को तो प्रदेश के पचास गांवों के नाम तक नहीं पता.
भले ही पार्टी मिल-जुलकर मनोहर सरकार का विरोध करने की कोशिश कर रही हो, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी में वर्चस्व को लेकर दुष्यंत चौटाला और अभय चौटाला के बीच अंदरखाने खींचतान भी है. हालांकि इस सवाल का जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन अगर गुजरे दौर पर नजर डालें तो देवीलाल के प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते उनके दोनों बेटों ओमप्रकाश चौटाला और रणजीत सिंह में भी काफी रस्साकशी रहती थी. बाद में ऐसी ही स्थितियां अजय चौटाला और अभय चौटाला के बीच भी चलती रहीं, लेकिन अजय चौटाला अपनी कार्यप्रणाली के कारण पार्टी में प्रभावी भूमिका में बने रहे. हालांकि बाद में अजय चौटाला के शिक्षक भर्ती घोटाले में जेल में बंद होने की वजह से अभी अभय चौटाला अहम भूमिका में हैं और पार्टी के जनाधार को बनाए रखने के लिए संघर्षरत हैं.
यदि हम इतिहास के पन्ने पलट कर देखें, तो जाटों और किसानों के कद्दावर नेता और पूर्व उप-प्रधानमंत्री देवीलाल की पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं. 1990 के चर्चित मेहम कांड के बाद हुए विधानसभा और लोकसभा चुनावों में पार्टी न केवल चुनाव हार गई थी, बल्कि देवीलाल खुद राजनीति में नौसिखिया माने जाने वाले भूपेंद्र सिंह हुड्डा से रोहतक लोकसभा सीट से चुनाव हार गए थे. यही नहीं, देवीलाल विधानसभा चुनाव में जाट-बहुल घिराय सीट से भी छत्तरपाल से हार गए थे. इस दौर में साल 1991 से 1999 तक पार्टी सत्ता से बाहर रही.
1999 के लोकसभा चुनाव में इनेलो और भाजपा ने गठबंधन कर पांच-पांच सीटों पर चुनाव लड़ा था और सारी सीटें जीत ली थीं. लेकिन 2004 के लोकसभा चुनाव में पार्टी अपना अस्तित्व तक नहीं बचा पाई और राज्य की सभी 10 लोकसभा सीटें हार गई. ध्यान रहे कि उस समय हरियाणा में इनेलो की सरकार थी. साल 2005 के विधानसभा चुनाव में इनेलो बुरी तरह हारी और इसे महज 9 विधानसभा क्षेत्रों में ही जीत हासिल हो सकी. हालांकि सत्ताधारी कांग्रेस के प्रति लोगों के गुस्से की वजह से 2009 के चुनाव में इसे 31 विधानसभा क्षेत्रों में जीत मिल गई थी, लेकिन इसके वोट फीसदी में पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले कमी आई थी.
हरियाणा में धारणा है कि देवीलाल ने जीवन भर किसी भी जाट नेता को उभरने नहीं दिया बल्कि स्थापित जाट नेताओं के खिलाफ राजनीति करते रहे
बीते विधानसभा चुनाव में इनेलो सिरसा, फतेहबाद, हिसार और जींद जिले के अलावा मेवात इलाके में अपना प्रभाव दिखाने में कामयाब रही. अक्टूबर में हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी के 19 विधायक चुने गए तथा करीब एक दर्जन सीटों पर पार्टी के उम्मीदवार तीन हजार मतों के अंतर से चुनाव हारे. सोनीपत जिले की राई विधानसभा सीट पर तो पार्टी उम्मीदवार महज तीन वोट से ही चुनाव हारा. हालांकि यहां यह बताना भी जरूरी है कि इसके कई उम्मीदवार अपने प्रभाव की वजह से और बिरादरी का समर्थन होने के कारण जीत पाए. लेकिन पार्टी के सांसद दुष्यंत चौटाला विधानसभा चुनाव में उचाना सीट से केंद्रीय ग्रामीण राज्य मंत्री बीरेंद्र सिंह की पत्नी प्रेमलता से चुनाव हार गए, हालांकि लोकसभा चुनाव में उस विधानसभा क्षेत्र से दुष्यंत करीब 58,000 वोटों से जीते थे.
इनेलो का जनाधार खिसकने की एक अहम वजह यह भी रही है कि जाट राजनीति के गढ़ पुराने रोहतक जिला में हुड्डा ने इनेलो को पछाड़ने में कामयाबी हासिल कर ली. विधानसभा चुनाव में पुराना रोहतक जिला में, जिसके अंतर्गत सोनीपत, झज्जर जिले भी आते हैं, कांग्रेस के टिकट पर भूपेन्द्र सिंह हुड्डा के ज्यादातर उम्मीदवार जीत गए. हालांकि बाकी क्षेत्रों में जाट वोट बैंक इनेलो के साथ जुड़ा रहा. यहां यह उल्लेखनीय है कि देवीलाल जाटों और किसानों के एकछत्र नेता रहे थे. लेकिन साल 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद हुड्डा ने पुराने रोहतक जिले में लगभग सभी विधानसभा क्षेत्रों में इनेलो को प्रभावहीन कर दिया.
प्रतीक पूजा चौधरी देवीलाल की विरासत के जरिए साख बचाने की कोशिश
कहने को तो पार्टी का नाम इंडियन नेशनल लोकदल है, लेकिन इसका आधार मुख्यत: हरियाणा में ही रहा है. हालांकि पार्टी ने बारह वर्ष पहले पड़ोसी राज्यों राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश में पैर जमाने की कोशिश की थी, लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई थी. हालांकि बीते दौर में राजस्थान और दिल्ली में पार्टी के एक-एक विधायक रह चुके हैं.
दुष्यंत का कहना है कि इनेलो इस बार दिल्ली विधानसभा चुनाव में हरियाणा की सीमा से लगे दिल्ली के क्षेत्रों में उम्मीदवार खड़े करेगी. पार्टी ने राजस्थान तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना जनाधार बनाने की कोशिश की थी, लेकिन नाकामयाब रही. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट नेता हरेन्द्र मलिक को पार्टी ने हरियाणा से राज्यसभा का सदस्य भी बनाकर भेजा था, लेकिन चुनावों में इनेलो को इसका कोई फायदा नहीं हुआ. राजनीतिक विश्लेषक डॉ. रमेश मदान का कहना है कि इनेलो की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य के चलते पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल काफी हद तक टूट चुका है.
सवाल पैदा होता है कि पहली पंक्ति का नेतृत्व न होने की वजह से क्या पार्टी अपने अस्तित्व को बनाए रख पाएगी या यह अपनी रणनीति में परिवर्तन करेगी? पार्टी का समर्थक वर्ग कम होता जा रहा है. इनेलो का जनाधार अंबाला, कुरुक्षेत्र, करनाल, रोहतक, हिसार, सोनीपत, अहीरवाल क्षेत्र में काफी हद तक खिसक चुका है. पार्टी का मतदाता अपने निजी स्वार्थों को ध्यान में रखते हुए पहले कांग्रेस के पक्ष में गया और अब सत्ताधारी भाजपा के साथ जाता दिख रहा है.
हरियाणा में लोगों के मन में एक धारणा यह भी है कि देवीलाल ने अपने पूरे जीवनकाल में किसी भी जाट नेता को उभरने नहीं दिया. उनके समय में जो भी स्थापित जाट नेता थे, देवीलाल उनके खिलाफ चुनाव लड़े या उनके खिलाफ राजनीति करते रहे. देवीलाल ने जाट नेता बलराम जाखड़ के खिलाफ चुनाव लड़ा था. इसके अलावा जाट नेताओं नाथू राम मिर्धा, कुंभा राम आर्य तथा अजित सिंह से भी देवीलाल का छत्तीस का आंकड़ा रहा. इसी तरह ओमप्रकाश चौटाला ने प्रभावशाली जाट नेता बीरेन्द्र सिंह और कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला के खिलाफ चुनाव लड़ा. इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए दुष्यंत चौटाला ने सांसद होने के बावजूद जाट नेता बीरेन्द्र सिंह की पत्नी के खिलाफ विधानसभा चुनाव लड़ा. जातिवादी मतदान के इस दौर में पार्टी का मतदाता यह सोचने लगा है कि चौटाला परिवार अपनी जाति या बिरादरी के खिलाफ ही राजनीति करता है और यह परिवार पूरे हरियाणा में अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहता है. इसके अतिरिक्त अहीर, गुज्जर, राजपूत, रोड़ तथा अन्य कृषक जातियां इनेलो को केवल एक जाति विशेष, क्षेत्र विशेष और परिवार विशेष की पार्टी मानने लगी हैं, जिसका इसे नुकसान उठाना पड़ा है. ऐसे में अगर पार्टी ने अपनी रणनीति नहीं बदली और परिवार, जाति, क्षेत्र से ऊपर उठकर मुद्दों की राजनीति नहीं की, तो इसके अस्तित्व पर संकट की स्थिति आ जाएगी.
नामांकन दाखिल करने के आखिरी दिन ‘आप’ ने अपने दो उम्मीदवारों का टिकट काट दिया. पार्टी ने ‘आंतरिक लोकपाल’ की जांच के बाद महरौली और मुंडका से अपने उम्मीदवारों को बदल दिया है. अब महरौली से नरेश यादव और मुंड़का से सुखबीर दलाल आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी होंगे.
पार्टी के मुताबिक, महरौली के गोवर्धन सिंह को मोदी की रैली में बसों में भर कर भीड़ जुटाने, जबकि मुंडका के राजिंदर डबास पर ‘टिकट खरीदने’ की अफवाह फैलाने के आरोप साबित होने के बाद यह फैसला लिया गया. इस फैसले के बाद दोनों उम्मीदवारों के समर्थकों ने‘आप’ के दफ्तर के बाहर विरोध-प्रदर्शन किया.
पार्टी के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया ने गोवर्धन सिंह और उनके परिवार के लोगों पर मोदी की रैली में 10 बसों में भीड़ एकत्र कर भेजने का आरोप लगाया था. सिसोदिया ने कहा था, ‘मोदी की राम लीला मैदान वाली रैली में उनके परिवार के लोगों ने भीड़ जुटा कर बसों के जरिए भेजी थी. यह उचित कदम नहीं था.’
इसके जवाब में सिंह ने कहा, ‘मैं तो चुनाव ही नहीं लड़ना चाहता था, पिछले 15 दिनों से प्रचार में जुटा हुआ था. केजरीवाल के अनुरोध पर मैंने पर्चा भरा.’ सिंह दिल्ली के 350 जाट गांवों में ‘आप’ का चेहरा थे. उनके मुताबिक, ‘यह जाट समुदाय की बेइज्जती है.’
इससे पहले पार्टी ने वजीरपुर से सुरेश भारद्वाज का टिकट काटकर स्थानीय नेता राजेश गुप्ता को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया था.
कर भला तो हो भला! कहने को तो यह महज एक कहावत है, दूसरी कहावतों जैसी लेकिन जीवन में कई वाकये ऐसे होते हैं, जो इन कहावतों पर यकीन पक्का कर देते हैं.
करीब 12 साल पुरानी बात है. स्कूल से घर लौटते वक्त गांव में घुसते ही पता चला कि धनई मास्टर के बेटे कमरू को पड़ोसी गांव के भैंसवार यानी भैंस चरानेवाले लड़कों ने क्रिकेट के खेल के दौरान हुई लड़ाई में बुरी तरह पीट दिया है.
मैं वहां पहुंचा, तो धनई मास्टर और उनका पूरा परिवार रोनेपीटने में लगा हुआ था. वहीं गांववाले इकठृठा होकर दूसरे गांव की धज्जियां उड़ाने को बेताब थे. इन सबको पार करते हुए मैं कमरू के पास पहुंचा, जो अब तक तकरीबन बेहोश हो चुका था. मैंने धनई मास्टर से पूछा, इसे अस्पताल क्यों नहीं ले गए? इतना पूछना था कि गांव के एक नेतानुमा जीव बोल पड़े- अस्पताल क्यों? मारपीट का मामला है, पहले थाने में रपट लिखवाई जाएगी. उस पूरे गांव को एक ही रस्सी में बंधवाकर जेल भेजा जाएगा. मैं समझ गया कि एक के बाद एक प्रधानी का चुनाव हार चुके नेताजी वाहवाही लूटने का यह मौका गंवाना नहीं चाहते. मैंने जरा तेज आवाज में लड़के को अस्पताल ले जाने की बात दुहराई तो धनई मास्टर रोने लगे. बोले मैं तो कब से फरियाद कर रहा हूं, कोई सुन ही नहीं रहा है, आप ही कुछ कीजिए, शायद मेरा बेटा बच जाए.
शाम का धुंधलका गहरा चुका था. जिला अस्पताल हमारे गांव से पैंतीस किलोमीटर दूरी पर है. मैंने गांव के लोगों को सुनाया- लड़के को फिलहाल अस्पताल पहुंचाना ज्यादा जरूरी है. क्या कुछ लोग धनई मास्टर के साथ लड़के को लेकर जिला अस्पताल जा सकते हैं? इतना सुनना था कि लोगों की भीड़ छंटने लगी. धनई मास्टर ने फरियादी निगाहों से मुझे देखा. मैं स्कूल से थका-हारा लौटा था. मेरी पत्नी की तबीयत भी कुछ नासाज़ चल रही थी. लेकिन हालात कुछ ऐसे थे कि मेरे मुंह से झट से निकला- चलो मेरी मोटर साईकिल पर कमरू को लेकर बैठो, नोनहवां से जीप कर लेंगे. नोनहवां में एक जीप वाला मिला, लेकिन वह आगे केवल बर्डपुर तक जाने को तैयार हुआ. उसके आगे हमें खुद इंतजाम करना था. रास्ते में मेरा चचेरा भाई चिनकू मिल गया, तो वह भी साथ हो लिया.
‘प्रधान जी ने कहा- नौकर ने सिर्फ मेरे हिस्से का खाना बनाया होगा, वरना आप लोगों को भी खाना खिलाकर भेजता’
हम लोगों ने घायल लड़के को जिला अस्पताल में भरती कराया और उसकी हालत में सुधार होने लगा. धनई मास्टर उन दिनों बर्डपुर चौराहे पर ही अपनी टेलरिंग की दुकान चलाया करते थे. उनकी दुकान एक संपन्न प्रधान जी के बड़े से कटरे में किराए पर चलती थी. संयोग से लड़के को जिला अस्पताल लाते वक्त प्रधान जी हमें बर्डपुर में मिल गए थे और साथ हो लिए थे.
बरसात की उमस भरी गर्मियों का मौसम था. रात के लगभग साढ़े आठ बज रहे थे. टैक्सी स्टैंड पर बर्डपुर के लिए शायद ही कोई सवारी गाड़ी मिलती. लेकिन प्रधान जी लौट रहे थे, तो मैंने उनसे कहा कि वे मुझे और चिनकू को भी साथ में लेते चलें. प्रधान जी ने कहा ठीक है, बर्डपुर तक चलिए, लेकिन आगे कैसे जाएंगे? चूंकि मेरी पत्नी की तबीयत खराब थी, इसलिए मैं प्रधान जी के साथ बर्डपुर के लिए चल पड़ा.
हम बर्डपुर पहुंचे तो रात के साढ़े नौ बज चुके थे. प्रधान जी ने हमें अपने बड़े से व्यावसायिक कॉम्पलेक्स के सामने मोटर साईकिल से उतारते हुए कहा- नौकर ने सिर्फ मेरे हिस्से का खाना बनाया होगा, वरना आप लोगों को भी खिलाकर भेजता, मोटर साईकिल में तेल भी कम है, वरना ले जाने देता. मौसम काफी खराब हो रहा है, अब आप लोग निकल लीजिए. बड़े मकान और छोटे दिल वाले प्रधान जी के सर्द रवैये से दुखी, मैं और चिनकू तेज कदमों से गांव के लिए चल पड़े.
थोड़ा आगे जूनियर हाई स्कूल के सामने पहुंचते ही टार्च की तेज रोशनी मेरे चेहरे पर पड़ी. साथ ही किसी ने कड़क कर पूछा- कौन है, रुक जाओ, नहीं तो अच्छा नहीं होगा! एक शख़्स लड़खड़ाता हुआ मेरे पास पहुंचा. टार्च की रोशनी में हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा. शराब के नशे में मस्त वह मेरे परिचित ‘बुलई’ बैटरीवाले थे.
पूरी बात सुनकर बुलई हाथ जोड़कर कहने लगे, गुरु जी गरीब जरूर हूं, लेकिन मेरा दिल नहीं गरीब है. आप मेरे घर चलकर रुकें, सवेरे जाइएगा. तबतक मेरी नज़र पीछे खड़ी उनकी साईकिल पर पड़ चुकी थी. मैंने घर जाने के लिए साईकिल मांगी. बुलई काफी भावुक हो चुके थे, बोले साईकिल जरूर दूंगा, लेकिन पहले आपको कुछ खिला दूं. जिद पर अड़े बुलई ने स्कूल गेट के सामने की दुकान में सो रहे अंडेवाले को जगाया और आमलेट बनवाकर देने के बाद ही हमें साईकिल दी. साथ ही अपनी टार्च भी दी. मैंने घर पहुंच कर सारी कहानी बयान की तो मेरी अम्मा के मुंह से यही शब्द निकले थे- कर भला तो हो भला!