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नरगिस का नया अवतार

हॉलीवुड और बॉलीवुड के मेल से जुड़ी दूसरी खबर नरगिस फाखरी के बारे में है. अरे वही फिल्म ‘रॉकस्टार’ वाले जनार्दन जाखड़ की ‘हीर’. बॉलीवुड में चार-पांच फिल्में करने के बाद इस अमेरिकी बाला ने ऐसी पलटी मारी है कि तमाम लोग जल-भुन गए हैं. नरगिस की पहली हॉलीवुड फिल्म ‘स्पाई’ ने पिछले हफ्ते ही बॉक्स ऑफिस पर दस्तक दी है. फिल्म ने अच्छा कलेक्शन भी कर लिया है. इस फिल्म में वे जेसन स्टेथम, मेलिसा मैकार्थी और जूड लॉ जैसे हॉलीवुड के दिग्गज कलाकारों के साथ स्क्रीन शेयर कर रही हैं.

‘कैटी पेरी और मेरी शादी से ज्यादा लंबी तो हिंदी फिल्में चलती हैं. अगर मौका मिले तो दीपिका पादुकोण से प्यार फिर शादी करना चाहूंगा’

रसल ब्रांड, ब्रिटिश अभिनेता

 

इसके अलावा नरगिस ने क्रिकेटर अजहरुद्दीन पर बनने वाली फिल्म में संगीता बिजलानी के किरदार वाला रोल भी लपक लिया है. अब क्या बताएं कि कितना हंगामा मचा हुआ है. जिनको लगता था कि बॉलीवुड में उनकी गाड़ी लंबी रेस में भाग नहीं ले सकती, उन्हें जोर का झटका धीरे से लगा है. बहरहाल, नरगिस का नया अवतार काबिले-तारीफ है.

 

 

 

हम बिहार में चुनाव लड़ रहे हैं

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पाठकों, मैं वह हरिशंकर नहीं हूं, जो व्यंग्य वगैरह लिखा करता था. मेरे नाम, काम, धाम सब बदल गए हैं. मैं राजनीति में शिफ्ट हो गया हूं. बिहार में घूम रहा हूं और मध्यावधि चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा हूं.

अब मेरा नाम है- बाबू हरिशंकर नारायण प्रसाद सिंह याद रखियेगा- नहि ना भूलियेगा हंसियेगा नहीं. हम नया आदमी है न. अभी सुद्ध भासा सीख रहे हैं. जैसा बनता है न, वैसा कोहते हैं.

मैं बिहार की जनता की पुकार पर ही बिहार आया हूं. जनता की पुकार राजनीतिज्ञों को कैसे सुनाई पड़ जाती है, यह एक रहस्य है धंधे का, नहीं बताऊंगा. जनता की पुकार कभी-कभी मेमने की पुकार जैसी होती है. वह पुकारता है मां को और आ जाता है भेड़िया. मेमना चुप रहे तो भी कभी भेड़िया पहुंचकर कहता है-तूने मुझे पुकारा था. मेमना कहता है मैंने तो मुंह ही नहीं खोला, भेड़िया कहता है तो मैंने तेरे हृदय की पुकार सुनी होगी. बिहार की जनता कह सकती है हमने तुम्हें नहीं पुकारा. हमें तुम्हारे द्वारा अपना उद्धार नहीं करवाना. तुम क्यों हमारा भला करने पर उतारू हो?

मैं कहूंगा मैंने दूर मध्य प्रदेश में तुम्हारे हृदय की पुकार सुन ली थी. वहां मध्यावधि चुनाव नहीं हो रहे हैं इसलिए वहां की जनता की सेवा नहीं कर सकता और बिना सेवा किए जीवित नहीं रह सकता. तुम राजी नहीं होओगे तो बलात सेवा कर लूंगा. सेवा का बलात्कार! समझे?

अकेला मैं नहीं, भगवान श्रीकृष्ण भी बिहार की जनता का उद्धार करने आ पहुंचे हैं. बिहार की बाढ़, सूखा और महामारी सी पीडि़त जनता! अकाल से पीडि़त जनता! एक दिन मेरी कृष्ण भगवान से भेंट हो गई. मैंने पहचान लिया, वही मोर मुकुट, पीतांबर और मुरली! मैंने कहा, ‘भगवान कृष्ण हैं न.’ वे बोले, हां वहीं हूं पर मेरा नाम अब भगवान बाबू कृष्णनारायण प्रसाद सिंह हो गया है. कृष्ण बाबू भी कह सकते हैं.

मैंने कहा, भगवान क्या गोरक्षा आंदोलन का नेतृत्व करने पधारे हैं? चुनाव आ रहा है, तो गोरक्षा होगी ही. आप गोरक्षा आंदोलन के जरिए पाॅलिटिक्स में घुस जाएंगे. कृष्ण ने कहा, नहीं उस हेतु नहीं आया. गोरक्षा आंदोलन आम चुनाव के काम का है. मध्यावधि छोटे चुनाव में तो मूषक रक्षा आंदोलन से भी काम चल जाएगा. मूषक रक्षा में गणेश जी की रुचि हो सकती है, अपनी नहीं.

मैंने कहा, तो फिर आपको रामसेवक यादव ने बुलाया होगा यादवों के वोट संसोपा को दिलवाने के लिए. कृष्ण खीज पडे़. बोले मुझे भी तो बताने दो. मैं बिहार की जनता की पुकार पर आया हूं.

मैंने कहा, आपको भ्रम हो गया, भगवन. वे तो कृष्णवल्लभ सहाय के समर्थक थे, जो उन्हें टिकट देने के लिए ऐसी जोर की आवाज लगा रहे थे कि दिल्ली में कांग्रेस हाईकमान को सुनाई पड़ जाए. वे कृष्णवल्लभ बाबू का नाम ले रहे थे, आप समझे जनता आपको पुकार रही है. कृष्ण ने कहा, नहीं मैंने खुद सुना, जनता कह रही थी, हे भगवान अब तो तेरा ही सहारा है. तू ही उद्धार कर सकता है. इसी पुकार को सुनकर मैं यहां आ गया.

ऐसा हो सकता है. बात यह है कि चौथे चुनाव के बाद सिर्फ भगवान की सत्ता ही स्थिर है. बिहार के मुसीबतजदा लोग पटना में एक सरकार से अपनी कहते, तब तक दूसरी सरकार आ जाती. हो सकता है, उन्होंने ईश्वर की एक मात्र सरकार से गुहार की हो.

मैंने कहा, ठीक किया जो आप आ गए. अब इरादा क्या करने का है?

उन्होंने कहा, मेरा तो घोषित कार्यक्रम है, त्रिसूची साधुओं का परित्राण, दुष्कर्मियों का नाश और धर्म की संस्थापना.

मैंने पूछा, कोई आर्थिक कार्यक्रम वगैरह?

वे बोले, नहीं बस वही त्रिसूची कार्यक्रम है.

मैंने पूछा यहां राजनीतिज्ञों में कोई साधु मिले?

एक भी नहीं.

और असाधु?

एक भी नहीं. हर एक अपने को साधु और दूसरों को असाधु कहता है. किसका नाश कर दूं समझ में नहीं आता?

इसी वक्त मुझे ख्याल आया कि इनके हाथ में सुदर्शन चक्र तो है नहीं नाश कैसे करेंगे. मैंने पूछा तो कृष्ण ने बताया, चक्र घर में रखा है क्योंकि उसका लाइसेंस नहीं है. फिर इधर अभी से धारा 144 लगी हुई है.

मैंने उन्हें समझाया, भगवान अगर सुदर्शन चक्र का लाइसेंस मिल जाए तो भी किसी को मारने पर दफा 302 में फंस जाएंगे.

कृष्ण पसोपेश में थे. कहने लगे फिर धर्म की संस्थापना कैसे होगी?

मैंने कहा, धर्म की संस्थापना तो सांप्रदायिक दंगों से हो रही है. आप एक हड्डी का टुकड़ा उठाकर मंदिर में डाल दीजिए और हिंदू धर्म के नाम पर दंगा करवा दीजिए. धर्म का उपयोग तो अब दंगा करने के लिए ही रह गया है. आप के विचार काफी पुराने पड़ गए हैं. हम लोग तो दुष्कर्मियों का परित्राण करने के लिए यह व्यवस्था चला रहे हैं. सबसे असुरक्षित तो साधु ही हैं.

भगवान कृष्ण को मैंने समझाया, आप संसदीय लोकतंत्र में घुसे बिना जन का उद्धार नहीं कर सकते. आप चुनाव लडि़ए और इस राज्य के मुख्यमंत्री बन जाइए. रुक्मिणी जी को बुला लीजिए. जिस टूर्नामेंट का आप उद्घाटन करेंगे, उसमें वे पुरस्कार वितरण करेंगी. घर के ही एक जोड़ी से कर कमलों में दोनों का काम हो जाएंगे.

बड़ी मुश्किल से उनके सामंती संस्कारों के गले में लोकतंत्र उतरा. इससे ज्यादा आसानी से तो दरभंगा नरेश बाबू कामाख्या नारायण सिंह लोकतंत्री हो गए थे. कृष्ण को चुनाव के मैदान में उतारने में मेरा स्वार्थ था. राजनीति में नया-नया आया हूं. पहले किसी बड़ी हस्ती का चमचा बनना जरूरी है. दादा को चमचा चाहिए और चमचे को दादा. दादा मुख्यमंत्री, तो चमचा गृहमंत्री. मैंने सोचा, लोग शंकराचार्य को अपनी तरफ ले रहे हैं, मैं साक्षात भगवान कृष्ण के साथ हो जाऊं.

हम लोगों ने तय किया कि पहले अपने पक्ष में जनमत बनाएं और फिर राजनीतिक पार्टियों से तालमेल बिठाएं. हम लोगों से मिलने निकल पडे़. मैं तो चमचा था. भगवान का परिचय देकर चुप हो जाता. जिन्होंने बहस कर करके अर्जुन को अनचाहे लड़वा दिया था, वे तर्क से लोगों को ठीक कर देंगे- ऐसा मुझे विश्वास था. पर धीरे-धीरे मेरी चिंता बढ़ने लगी. कृष्ण की बात जम नही रही थी. कुछ राजनीति करने वालों से बातें हुईं. कृष्ण ने बताया कि चुनाव लड़ रहा हूं.

वे बोले हां, हां आप क्यों न लडि़येगा. आप भगवान हैं. आपका नाम है. आपका भजन होता है. आपका आरती होता है. आपका कथा होता है. आपका फोटू बिकता है. आप नहीं लडि़एगा तो कौन लडे़गा, आप यादव हैं न?

कृष्ण ने कहा, मैं ईश्वर हूं. मेरी कोई जाति नहीं है.

उन्होंने कहा देखिए न, इधर भगवान होने से तो काम नहीं न चलेगा. आपको कोई वोट नहीं देगा. जात नहीं रखिएगा तो कैसे जीतिएगा?

जाति के इस चक्कर से हम परेशान हो उठे भूमिहार, कायस्थ, क्षत्रिय, यादव होने के बाद ही कोई कांग्रेसी, समाजवादी या साम्यवादी हो सकता है. कृष्ण को पहले यादव होना पडे़गा, फिर चाहे वे मार्क्सवादी हो जाएं.

कृष्ण इस जातिवाद से तंग आ गए. कहने लगे, ये सब पिछडे़ लोग हैं. चलो विश्वविद्यालय चलें. हमें प्रबुद्ध लोगों का समर्थन लेकर इस जातिवाद की जडें़ काट देनी चाहिए.

विश्वविद्यालय में राजनीति के प्रोफेसर से हम बातें कर रहे थे. उन्होंने साफ कह दिया, मैं कायस्थ होने के नाते कायस्थों का ही समर्थन करूंगा.

कृष्ण ने कहा, आप विद्वान होकर भी इतने संकीर्ण हैं?

प्रोफसर ने समझाया, देखिए न, विद्या से मनुष्य अपने सच्चे रूप को पहचानता है. हमने विद्या प्राप्त की, तो हम पहचान गए कि हम कायस्थ हैं.

कृष्ण घबड़ाकर एक पेड़ की छांह में लेट गए. कहने लगे, सोचते हैं लौट जाएं. जहां भगवान को भगवान होने के कारण एक भी वोट न मिले, वहां अपने राजनीति नहीं बनेगी.

उधर, कृष्ण के राजनीति में उतरने की बात खूब फैल गई थी और राजनीतिक दल सतर्क हो गए थे. जनसंघ का ख्याल था कि गोपाल होने के कारण बहुत करके कृष्ण अपना साथ देंगे पर अगर विरोध हुआ तो उसकी तैयारी कर लेनी चाहिए, उन्होंने कथावाचकों को बैठा दिया था कि पोथियां देखकर कृष्ण की पोल खोजो. गड़बड़ करेंगे तो चरित्र हनन कर देंगे.

चरित्र हनन शुरू हो गया था. कानाफूसी चलने लगी थी. कृष्ण शीतल छांह में सो गए थे. मैं बैठा था. तभी एक आदमी आया. मेरे कान में बोला- यह भगवान श्रीकृष्ण हैं न? मैंने कहां, हां. देखो क्या रूप है.

उसने कहा एक बात बताऊं. किसी से कहिएगा नहीं. इनकी डब्ल्यू का मामला बड़ा गड़बड़ है. भगाई हुई है. रुक्मिणी नाम है. बड़ा दंगा हुआ था, जब उन्होंने रुक्मिणी को भगाया था. सबूत मिल गए हैं. पोथी में सब लिखा हुआ है. जो किसी की लड़की को भगा लाया, वह अगर शासन में आ गया तो हमारी बहू-बेटियों की इज्जत का क्या होगा?

कृष्ण उठे, तो मैंने कहां, प्रभु आपका करेक्टर एसेसिनेशन शुरू हो गया. अब या तो आप चुनाव में हिम्मत से कूदिए ये मुझे छोडि़ये. मैं कहीं अपना तालमेल बिठा लूंगा. आपके साथ रहने से मेरा भी राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ जाएगा.

कृष्ण का दिमाग सो लेने के लिए खुल गया था. वे बडे़ विश्वास से बोले, एक बात अभी सूझी है. यहां मेरे कई हजार पक्के समर्थक हैं जिन्हें मैं भूल ही गया था. मेरे हजारों मंदिर हैं. उनके पुजारी तो मेरे पक्के समर्थक हैं ही. मैं उन हजारों पुजारियों के दम पर सारी सीटें जीत सकता हूं. चलो, पुजारियों से बात कर लें.

हम एक मंदिर में पहुंचे. पुजारी ने कृष्ण को देखा तो खुशी से पागल हो गया. नाचने लगा, बोला धन्यभाग! जीवन भर की पूजा हो गई. भगवान को साक्षात देख रहा हूं. कृष्ण ने पुजारी को बताया कि वे चुनाव लड़ने वाले हैं. वोट दिलाने की जिम्मेदारी पुजारी की होगी. पुजारी ने कहा, आप प्रभु हैं, वोट की आपको कौनो कमी है. कृष्ण ने कहा, फिर भी पक्की तो करनी पडे़गी, तुम तो वोट मुझे ही दोगे न?

पुजारी ने हाथ मलते हुए कहा आप मेरे आराध्य हैं प्रभु, पर वोट का ऐसा है कि वह जात वाले का ही जाएगा. जात से कोई खड़ा न होता तो हम जरूर आपको ही वोट देते. कृष्ण की इतनी दीन हालत तब भी नहीं हुई होगी जब शिकारी का तीर उन्हें लगा था. कहने लगे, अब सिवा भूदान आंदोलन में शामिल होने के कोई रास्ता नहीं है. जिसका अपना पुजारी धोखा दे जाए, ऐसे पिटे हुए राजनीतिज्ञ के लिए या तो भारत सेवक समाज है या सर्वोदय. चलो बाबा के पास.

मैंने कहा, अभी वह स्टेज नहीं आई. अभी तो हम एक भी चुनाव नहीं हारे. पांच-पांच बार चुनाव हारकर भी लोग सर्वोदय में नहीं गए. चलिए, राजनीतिक दलों से बातचीत करें.

पहले हम कांग्रेस के दफ्तर गए. वहां बताया गया कि यहां कांग्रेस है ही नहीं. मंत्री ने कहा, इधर तो कृष्णवल्लभ बाबू हैं, महेश बाबू हैं, रामखिलावन बाबू हैं, मिसरा बाबू हैं, कांग्रेस तो कोई नहीं है और फिर कांग्रेस से मिलकर क्या करियेगा. जो गुट सरकार में चला जाता है, वह कांग्रेस रह जाता है. जो सत्ता में नहीं रहता वह कांग्रेस का भी नहीं रहता. कांग्रेस कौन है, यह चुनाव के बाद ही मालूम होगा. कांग्रेस अब सरकार नहीं बनाती, सरकार गिराती है. आप चुनाव लडि़ए. अगर आपके साथ चार-पांच विधायक भी हों तो हमारे पास आइए. आपकी मेजोरिटी बनाकर आपकी सरकार बनवा देंगे. हमने मंडल की सरकार बनवाई थी न.

हम संसोपा के पास गए. उन लोगों ने पहले परीक्षा ली. जब हमने कहा कि जवाहरलाल जो गुलाब का फूल शेरवानी में लगाते थे, वह कागज का होता था, तो वे लोग बहुत खुश हुए. कहने लगे,  बड़े क्रांतिकारी विचार हैं आपके. देखो यह नेहरू देश को कितना बड़ा धोखा देता रहा. मैंने कहा, हम लोग समाजवादी होना चाहते हैं.

वे बोले, समाजवादी होना उतना भी जरूरी नहीं है जितना गैर कांग्रेसी होना. डाकू भी अगर कांग्रेस विरोधी हैं तो बडे़ से बडे़ समाजवादी से श्रेष्ठ हैं. कृष्ण ने कहा लेकिन कोई आइडियोलॉजी तो है ही.

संसोपाई बोले, गैर कांग्रेसवाद एक आइडियोलॉजी तो है ही. इस आइडियोलॉजी के कारण सबसे तालमेल बैठ जाता है, गोरक्षा में जनसंघ के साथ पूंजी की रक्षा में स्वतंत्र पार्टी के साथ, जनतांत्रिक समाजवाद में प्रसोपा के साथ, जनक्रांति में कम्युनिस्टों के साथ.

मैंने पूछा, डॉक्टर लोहिया ने कहा था कि जनता का विश्वास प्राप्त करने के लिए गैर कांग्रेसी सरकार छह महीने के भीतर कोई चमत्कारी काम करके बताएं. ऐसा हुआ था क्या? उन्होंने कहा, हां एक नहीं कितने चमत्कारी काम हो गए. हमारे मंडल बाबू ने ही कितना बड़ा चमत्कारी काम किया.

हम दोनों साम्यवादी दलों के पास गए. दक्षिणपंथी साम्यवादी दल ने कहा, तो कॉमरेड कृष्ण आपका हिस्ट्री हमने पढ़ा है. आप में वामपंथी दुस्साहसिकता और वामपंथी भटकाव दोनों हैं. आपने इस तरह के काम किए थे. आप मार्क्सवादियों के पास जाइए. मार्क्सवादियों ने कह दिया, तुम तो संशोधनवादी हो तुम्हारा सारा वर्गचरित्र प्रतिक्रियावादी है.

जनसंघ ने खुले दिल से स्वागत किया. कहा आप तो द्वापर से हमारी पार्टी के सदस्य थे. आइए आपका बौद्धिक हो जाए. उन्होंने कागज की एक पर्ची पर लिखा हिंदू राष्ट्र, गोरक्षा, भारतीय संस्कृति. पर्ची को एक छपे हुए कागज में रखा. फिर अलमारी से ताला चाबी निकाले. वे एक औजार से कृष्ण का सिर खोलने लगे. कृष्ण चौंककर हट गए. बोले यह क्या कर रहे हो?

उन्होंने समझाया, आपका बौद्धिक संस्कार कर रहे हैं. सिर खोलकर ये विचार आपके दिमाग में रखकर ताला लगा देंगे और चाबी नागपुर गुरुजी के पास भेज देंगे. न चाबी आएगी, न दिमाग खुलेगा, न परकीय और अराष्ट्रीय विचार आपके दिमाग में घुसेंगे.

कृष्ण आतंकित हो गए. वे एक झटके से उठे और बाहर भागे. पीछे से वह आदमी चिल्लाया, रुकिए रुकिए, हमारे स्वयंसेवकों को एक-एक सुदर्शन चक्र तो देते जाइए. हम भागे तो सीधे शोषित दल वालों के पास पहुंचे. उन्होंने कहा, अभी से आप शोषित कैसे हो सकते हैं? शोषित तब होता है जब विधायक हो जाए, पर आप मंत्री न हो. आप मंत्री नहीं बन सके तभी तो शोषित होंगे. तब हमारे साथ हो जाइए.

क्रांतिदल के महामाया बाबू से मिलने का भी इरादा था, पर सुना कि जब से उन्होंने कामाख्या बाबू के खिलाफ दायर 218 मुकदमे उठाए, तब से उनकी खदान में ही गुप्त वास कर रहे हैं.

खदान के बाहर ही राजा कामाख्या नारायण सिंह मिल गए. उन्होंने कहा, मेरे साथ होने से आप लोगों को राजनीति की दुनिया की पूरी सैर करनी पड़ेगी. आप थक जाएंगे. हर आदमी में मेरे जैसी फुर्ती नहीं है. देखिए न मैंने जनता पार्टी बनाई. फिर स्वतंत्र पार्टी में चला गया. फिर कांग्रेस में लौट आया. फिर भारतीय क्रांतिदल में चला गया. फिर भारतीय क्रांतिदल से निकलकर जनता पार्टी बना ली. मेरे लिए राजनीतिक दल अंडरवियर है, ज्यादा दिन एक ही को नहीं पहनता क्योंकि बदबू आने लगती है. अपने पास कुल सत्रह विधायक होते हैं, पर कोई भी सरकार मेरे बिना चल नहीं सकती. आप लोग तो अपनी अलग पार्टी बनाइए, अपने कुछ लोगों को विधानसभा में ले आइए और फिर सिंहासन पर बैठकर कांग्रेसवाद, संघवाद, क्रांतिवाद, समाजवाद, साम्यवाद सबसे चरण दबवाइए. सिद्धांत पर अड़ेंगे तो मिटेंगे. सबसे बड़ा सिद्धांत सौदा है.

हमें भी बोध हुआ कि किसी दल से अपनी पटरी पूरी तरह बैठेगी नहीं. अपना अलग दल होना चाहिए. अगर अपने चार पांच विधायक भी रहे, तो जोड़ तोड़ उठापटक और उखाड़ पछाड़ के द्वारा प्रदेश की सरकार हमेशा अपने कब्जे में रहेगी.

हमने एक नई पार्टी बना ली है, अभी यह पार्टी सिर्फ बिहार में कार्य करेगी. यदि मध्यावधि चुनाव में इसे जनता का समर्थन अच्छा मिला, तो अखिल भारतीय पार्टी बना देंगे. इस पार्टी का संक्षिप्त मेनिफेस्टो यहां दे रहे हैं

भारतीय राजनीति में व्याप्त अवसरवाद, मूल्यहीनता और अस्थिरता को देखकर हर सच्चे जनसेवक का हृदय फटने लगता है. राजनीतिक भ्रष्टाचार के कारण आज देश के करोड़ाें मानव भूखे हैं, नंगे हैं बेकार हैं. वे अकाल, बाढ़, सूखा और महामारी के शिकार हो रहे हैं. असंख्य कंठों से पुकार उठ रही है. हे भगवान आओ और नई राजनीतिक पार्टी बनाकर सत्ता पर कब्जा करो और हमारी रक्षा करो. जनता के आर्त्तनाद को सुनकर भगवान कृष्ण बिहार में अवतरित हो गए हैं और उन्होंने हरिशंकर नारायण प्रसाद सिंह नाम के विश्वविख्यात जनसेवक के साथ मिलकर एक पार्टी की स्थापना कर ली है. पार्टी का नाम भारतीय जनमंगल कांग्रेस होगा.

नाम में जन या जनता या लोक रखने का आधुनिक राजनीति में फैशन पड़ गया है. इसलिए हमनें भी जन शब्द रख दिया है. जनता से प्रार्थना है कि जन को गंभीरता से न लें, इसे वर्तमान राजनीति का एक मजाक समझें. पार्टी के नाम पर भारतीय इसलिए रखा है कि आगे जरूरत हो तो भारतीय जनसंघ के सथ मिलकर सत्ता में हिस्सा बंटा सकें. कांग्रेस इसलिए रखा है कि अगर इंदिरा जी वाली कांग्रेस को अल्पमत सरकार बनाने की जरूरत पडे़ तो पहले हमें मौका दे.

जनता शब्द की व्याख्या किसी दल ने नहीं की है. हम पहला बार ऐसा कर रहे हैं. जनता उन मनुष्यों को कहते हैं जो वोटर हैं और जिनके वोट से विधायक तथा मंत्री बनते हैं. इस पृथ्वी पर जनता की उपयोगिता कुल इतनी है कि उसके वोट से मंत्रिमंडल बनते हैं. अगर जनता के बिना सरकार बन सकती है, तो जनता की कोई जरूरत नहीं है. जनता कच्चा माल है. इससे पक्का माल विधायक, मंत्री आदि बनते हैं. पक्का माल बनने के लिए कच्चे माल को मिटना ही पड़ता है.

हम जनता को विश्वास दिलाते हैं कि उसे मिटाकर हम ऊंची क्वालिटी की सरकार बनाएंगे. हमारा न्यूनतम कार्यक्रम सरकार में रहना है. हम इस नीति को मानते हैं यथा राजा, तथा प्रजा. राजा अगर ठाठ से ऐशो आराम में रहेगा तो प्रजा भी वैसी ही रहेगी. राजा अगर सुखी होगा तो प्रजा भी सुखी होगी. इसलिए हमारी पार्टी के मंत्री ऐशो आराम से रहेंगे. जनता को समझना चाहिए कि हमें मजबूर होकर सुखी जीवन बिताना होगा, जिससे जनता भी सुखी हो सके. यथा राजा तथा प्रजा.

हमारे उम्मीदवार विधायक होने के लिए चुनाव नहीं लड़ेंगे वे मंत्री बनने के लिए वोट मांगेंगे. हमारी पार्टी के उम्मीदवार को जब जनता वोट देगी, तो मंत्री को वोट देगी. हम अपनी पार्टी के हर विधायक को मंत्रिमंडल में लेंगे, जिससे कोई दल न छोड़े.

यदि हमारे किसी मंत्री को दल छोड़ना है तो उसे पहले हमसे पूछना होगा. वह तभी दल छोड़ सकेगा, जब हम उसकी मांग पूरी न कर सकेंगे. सरकार का काम राज करना है, रोजी रोटी की समस्या का हल करना नहीं है. सरकार का काम राज करना है, इसलिए वह अन्न उत्पादन नहीं करेगी. जिस कंपनी को अन्न उत्पादन करना हो, उसे बिहार की जमीन दे दी जाएगी.

हम जाति के हिसाब से अलग-अलग जिला बना देंगे. ब्राह्मणों के जिले में क्षत्रिय नहीं रहेगा. जिलाधीश की नियुक्ति जाति पंचायत करेगी.

बिहार में भूख और महामारी से बहुत लोग मरते हैं. पर काशी बिहार में नहीं है. गया यहां श्राद्ध के लिए है. हम आंदोलन करके काशी को बिहार में शामिल करेंगे, जिससे बिहार का आदमी यहीं काशी में मरकर गया में पिंडदान करवा ले.

हम जनता को वचन देते हैं कि जिस सरकार में हम नहीं होंगे, उस सरकार को गिरा देंगे. अगर हमारा बहुमत नहीं हुआ, तो हम हर महीने जनता को नई सरकार का मजा देंगे. घोषणा पत्र की यह रूपरेखा है. विस्तार से आगे बताएंगे. जनता हमारी पार्टी की विजय के लिए प्रार्थना करे. ठेकेदार, उद्योगपति, दंगा करने वाले शर्तें तय करने के लिए अभी संपर्क करें.

हमारे भाई, भतीजे, मामा, मौसा, फूफा, साले बहनोई जो जहां भी हों, बिहार में आकर बस जाएं और रिश्तेदारी के सबूत समेत जीवन सुधारने की दरख्वास्त अभी से दे दें. देर करने से नक्काल फायदा उठा लेंगे.

‘फैसले की तारीख करीब थी और सब एक-दूसरे के प्रति आशंकित होने लगे थे’

Babri_Mosque

बात उन दिनों की है जब मै रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई कर था, दोस्तों के साथ विभाग के बाहर सामने बरगद पेड़ के पास बने चबूतरे पर रोज ‘छात्र संसद’ लगती थी. यहां हम मित्रों के बीच अंतरंग बातों के अलावा देश की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक हालात को लेकर जमकर चर्चा होती थी. इन्हीं बहसों में सांप्रदायिकता और जातिवाद पर भी अक्सर चर्चा होती थी लेकिन इसे संवेदनशील मुद्दा समझकर छोड़ दिया जाता था. मै इस मुद्दे पर हमेशा चर्चा जारी रखना चाहता था क्योंकि हम सब पत्रकारिता की दुनिया का हिस्सा होने जा रहे थे. हमारे लिए इसे समझना जरूरी था. हमारे मधुकर सर अक्सर इन सब मुद्दों पर क्लास में चर्चा करते थे लेकिन सारे लोगों की इस विषय पर उदासीनता को देखकर वे भी खामोश हो जाते थे. लेकिन कुछ दिन गुजरने के बाद ही हमें इस बात को समझने और इस विषय से रूबरू होने का आखिकार एक मौका मिल गया.

बाबरी मस्जिद और रामजन्म भूमि विवाद को लेकर इलाहबाद हाई कोर्ट का बहुप्रतीक्षित फैसला 30 सितंबर 2010 को आने वाला था. फैसले की तारीख जैसे-जैसे करीब आ रही थी गली, मोहल्लों और चौक-चौराहों पर इस बात की चर्चा थी कि फैसला किसके पक्ष में आएगा. हर तरफ माहौल में एक अजीब सी उत्सुकता और बेचैनी पसर गई थी.

सुबह-सुबह राजू अखबार फेंककर चिल्लाया, ‘भैया, आज का अखबार पढ़कर ही बाहर निकलना बाहर पूरा टेंशन है, सब कह रहे हैं कि दंगा भड़क जाएगा.’ मैं उसकी आवाज पर अचकचाया और अखबार उठाकर देखना शुरू कर दिया. अखबार की सुर्खियां और रिपोर्टिंग देखकर राजू की कही हुईं बातें दिमाग में गूंजने लगीं. हिंदी अखबार ने ऐसी भड़काऊ सुर्खियां लगा रखी थीं कि मानो कोई भारत-पाकिस्तान युद्ध की रिपोर्टिंग हो.उस रोज दोपहर 3 बजे फैसला आना था. बाहर हर तरफ सन्नाटा पसरा था. सड़कें सूनी थीं. स्कूल, कॉलेज, दुकानें सब बंद थे. शहर के भीड़भाड़ वाले इलाकों में भी इक्का-दुक्का लोग ही दिखाई दे रहे थे. हर अजनबी चेहरे को देखकर लोग आशंकित हुए जा रहे थे. हर कोई यह सोचकर डर रहा था कि फैसला किसके पक्ष में आएगा और दूसरा पक्ष अदालत के फैसले को मानेगा या नहीं? इस तरह के कई खयालात मन में आ रहे थे, और कई तरह की आशंकाओं से दिल बैठा जा रहा था. अखबार, टीवी चैनलों, चाय की दुकानों, हर तरफ इसी बात की चर्चा थी.

‘भैया, आज का अखबार पढ़कर ही बाहर निकलना बाहर पूरा टेंशन है, सब कह रहे हैं कि दंगा भड़क जाएगा’

मैं वापस अपने कमरे में आकर लेट गया. थोड़ी देर में आशीष का कॉल आया, ‘यार बाहर तो पूरा माहौल खराब है, क्या कर रहा है तू? ठीक है ना?’ मेरा जवाब सुने बगैर एक ही सांस में वह कई सवाल पूछ बैठा. ‘मै आता हूं तेरे पास’ बोलकर उसने कॉल काट दी और थोड़ी देर में वो मेरे रूम में पहुंच गया. मेरा कमरा मस्जिद से लगा हुआ था, जहां अजान और नमाज की आवाजें साफ सुनाई देती थीं, आशीष कई बार आ चुका था और वो यहां के माहौल से अच्छी तरह से परिचित था. हमारे बीच मजहब कभी भी दीवार नहीं बनी, बात की शुरुआत करते ही बोला कि हमें कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे डर और भय का माहौल खत्म हो.

हमलोग बाइक पर सवार हो कर शहर की ओर निकल पड़े, वो माथे पर टीका लगाए था और मैंने कुरता-टोपी पहन लिया था. हमलोग हर गली-मोहल्लों में जाकर लोगों से मिलते, बातें करते, महिला-पुरुष, बच्चे सब लोग हमें ऐसे ताज्जुब से देखते मानो कोई अजूबा काम कर रहे हों.

शहर के बीचोबीच ओबी वैन के साथ  रिपोर्टर सन्नाटे और दहशत के माहौल को रेखांकित करने में मशगूल थे, तो फोटोग्राफर इसे कैमरे में कैद कर रहे थे. हमें देखकर वो लोग मुस्कुराये और ‘लगे रहो’ कहकर ‘जीत की दो उंगलियां’ लहराई. सांप्रदायिक सौहार्द का पैगाम देते हुए हम दोनों आगे बढ़ते गए. इलाहाबाद हाइकोर्ट का फैसला किसी के पक्ष में नहीं था बल्कि विवादस्पद जमीन को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला किया गया था, जिस पर लोग अपनी-अपनी समझ से तर्क पेश कर रहे थे, पर आम व खास सब लोग चैन की सांस ले रहे थे.

मजबूत भी मजबूर भी

लालू से मिलन :  मजबूरी में मजबूती का वास्ता!

मांझी प्रकरण की तपिश अब कम होती जा रही है. हालांकि चुनाव तक मांझी इसे बनाए रखना चाहेंगे और भाजपा इसमें हवा-पानी-घी आदि देकर उसे ज्वलंत भी बनाए रखना चाहेगी. अब नीतीश की राजनीतिक यात्रा में उनका और उनकी पार्टी का लालू यादव से मिलन सबसे गर्म मुद्दा बन चुका है. लालू और नीतीश के मिलन को अलग-अलग नजरिये से देखा जा रहा है. सबके अपने-अपने तर्क हैं, सबके तर्क में दम भी हैं. एक वर्ग मानता है कि नीतीश ने लालू यादव के खिलाफ ही सियासत कर बिहार में अपनी पहचान बनाने के साथ उम्मीद जगाई. वह लालू के खिलाफ मिले वोट की बदौलत ही है तो ऐसे में सिर्फ सत्ता के लिए लालू से मिलकर उन्होंने भारी भूल की.

दूसरा वर्ग मानता है कि यह वक्त की जरूरत थी. सामाजिक न्याय की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए, भाजपा जैसी सांप्रदायिक शक्तियों के विकास के लिए बेहद जरूरी था. नीतीश-लालू के मिलन में भाजपा समेत जो दूसरी पार्टियां हंगामा कर रही हैं, उन्हें यह अधिकार नहीं. भाजपा से लेकर तमाम दूसरी पार्टियां ऐसे गठजोड़ करती रही है. आज रामविलास पासवान और भाजपा का गठजोड़ कोई राजद-जदयू से कम आश्चर्यजनक नहीं. या मांझी का एनडीए का हिस्सा बन जाना कोई कम आश्चर्यजनक नहीं. भाजपा द्वारा जम्मू-कश्मीर में सत्ता पाने के लिए अपने विरोधी मुफ्ती मोहम्मद सईद से समझौता करना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है. इस नजरिये से देखें तो लालू और नीतीश का मिलन भी हैरान करने वाला नहीं. लोकसभा चुनाव के बाद नीतीश कुमार के पास आगे की राह को  संभावनाशील बनाने के लिए बहुत कम विकल्प थे. जितने विकल्प उपलब्ध थे, उसमें यह एक विकल्प था. लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें यह एहसास हो गया कि वे अकेले कमजोर हैं.

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फिलहाल जातीय समीकरण साधकर ही वे दोबारा सत्ता पा सकते हैं. नीतीश को यह एहसास हो गया है कि एक बार सत्ता हाथ से गई तो फिर बिहार की राजनीति में वे अप्रासंगिक हो जाएंगे, क्योंकि उम्र भी एक चीज होती है. सारे दांव खेलकर नीतीश ने लालू से गठजोड़ किया है. लोकसभा चुनाव के पहले से लेकर बाद तक न जाने कितने किस्म का मोर्चा बनाने में उन्होंने ऊर्जा लगाए रखी. महाविलय जैसे शब्द बहुत दिन तक चलते रहे. संभव है कि इस मिलन से नीतीश को फायदा हो लेकिन बिहार में होने वाले इस गठजोड़ से उन्होंने अपने लिए नुकसान का भी रास्ता चुना. अपनी ही बनाई छवि को उन्होंने ध्वस्त किया. लालू ने मुलायम के जरिये ना सिर्फ महाविलय के प्रस्ताव को रसातल में डाला बल्कि इस गठजोड़ से भी वे आखिरी समय तक भागते रहे, नीतीश कुमार उनका पीछा करते रहे, इसका लोगों में गलत संदेश गया. यह सत्ता के लिए तड़पते और बेचैन नेता की तरह उन्हें स्थापित करता रहा.

मांझी लगातार आक्रामक होते रहे और नीतीश लगातार अपने लोगों से उन पर वाक प्रहार करवाते रहे. कभी अनंत कुमार ने मांझी को पागल करार दिया तो कभी किसी दूसरे ने भस्मासुर की उपाधि दे दी

लालू से गठजोड़ के बाद नीतीश के पास भाषण के विकल्प कम होंगे. न तो वे सुशासन पर जोर से बोल पाएंगे, न भ्रष्टाचार पर और न ही सामाजिक न्याय पर. लालू के कुशासन का ही वास्ता देकर नीतीश कुमार बिहार की सत्ता मे आए और दूसरी बार भी मुख्यमंत्री बने. लालू तो सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता पर बोल सकते हैं लेकिन सीधे नीतीश खुद इस पर बोल सकने की स्थिति में भी नहीं होंगे, क्योंकि तब भाजपा कहेगी कि हम सांप्रदायिक थे तो इतने सालों से क्या कर रहे थे साथ में. विकास की बात करेंगे तो भाजपा कहेगी कि हम भी साथ में थे. लालू के साथ आने से दूसरी परेशानियां बढ़ गई हैं. लालू ज्यादा बोलेंगे तो नीतीश को नुकसान होगा, कम बोलेंगे, तो भी नीतीश को नुकसान होगा. लालू कम बोलेंगे तो यादव मतदाताओं में संदेश जाएगा कि मिलान के बाद उनके नेता को नीतीश ने हाइजैक कर लिया हैं, बोलने तक नहीं दे रहे, इसलिए वे बहक सकते हैं.

बात इतनी ही नहीं, नीतीश ने लालू से मिलन के पहले सामाजिक समीकरणों पर भी ठीक से काम नहीं किया. इस गठजोड़ से सामाजिक न्याय की धारा को ध्यान में नहीं रखा गया. लालू और नीतीश के रूप में दो ऐसी जातियों के नेता शीर्ष पर हैं, जो पिछले 25 सालों से सत्ता में हैं. इनके नेतृत्व के जरिये दूसरी जातियों की गोलबंदी आसान नहीं होगी, क्योंकि नीतीश को मालूम होगा कि 2005 में जब वे मुख्यमंत्री बने तो तमाम समीकरणों के बीच एक अहम समीकरण गैर यादव पिछड़ों का यादवी नेतृत्व के खिलाफ गोलबंदी भी था. दूसरी बात यह भी है कि नीतीश कुमार ने अतिपिछड़ा या महादलितों की राजनीति की जरूर लेकिन किसी एक बड़े नेता को उन समूहों से अपने इस गठजोड़ में दिखावे के लिए भी साथ नहीं रखा.

श्याम रजक, उदयनारायण चौधरी जैसे नेता साथ में जरूर हैं, लेकिन वे कम बोलते हैं या जब बोलते हैं तो उनके पास तथ्य और तर्क नहीं होते. नीतीश-लालू के इस मिलन में सामाजिक न्याय की और भी कई विडंबनाएं सामने आईं, जिस पर पहले से काम नहीं हो सका, जिसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. किसी अल्पसंख्यक नेता को भी समानांतर रूप से सामने नहीं रखना, गलत संदेश दे रहा है. इस गठजोड़ को लेकर दिल्ली से लेकर लखनऊ तक दौड़ लगाने में ही इतनी ऊर्जा खपाते रहे कि इन चीजों पर सोचने का उन्हें मौका तक नहीं मिला और अब उनके पास जो टीम है और जिसके सहारे वे चुनावी जंग में उतरने जा रहे हैं, उनमें से कोई पुराना संगी-साथी नहीं बचा, जो नीतीश की बातों को काट भी सके. मिलने के पहले दोनों नेता इन बातों पर भी अभ्यास करते तो शायद यह गठजोड़ और कारगर होता. मांझी को बाय करने के पहले उदय नारायण चौधरी को सामने उन्हें पार्टी का चेहरा बनाकर यह गठजोड़ करते तो शायद वह ज्यादा फायदेमंद साबित होता.

मौनी बाबा: एकरागी गान, जिद्दी धुन

नीतीश कुमार की राजनीति को जो लोग करीब से जानते हैं या दूर से भी देखते हैं, वे यह जानते हैं कि नीतीश सार्वजनिक जीवन के सवालों को और राजनीति के सार्वजनिक पक्षों को भी व्यक्गित मसला बनाकर उसका बदला लेने वाले नेता रहे हैं. वे राजनीति को व्यक्तिवादी बनाने के पक्षधर हैं और उनके लिए खुद की राजनीति को, खुद के व्यक्तित्व को बनाए-बचाए रखना एक अहम मसला होता है. इसके लिए वे तमाम तरीके के हथियारों का इस्तेमाल करते रहे हैं, जिसमें एक अहम हथियार जिद्दी बन जाना, दूसरा मौन साधना और तीसरा एकरागी गान करना. इनमें से दो बातें बार-बार देखी जा चुकी हैं. जब भी वे दुविधा और द्वंद्व के दोराहे पर खड़े होते हैं, मौन साध लेते हैं. नीतीश के दस सालों के शासन में कई बार ऐसे मौके आए, जब उनसे अपेक्षा की जाती थी वे खुलकर बोले और बतौर मुखिया अपनी बात रखे लेकिन उन्होंने मौन साधकर बहुत कुछ साधना चाहा, जिससे उनकी किरकिरी हुई.

लालू ने मुलायम के जरिये ना सिर्फ महाविलय के प्रस्ताव को रसातल में डाला बल्कि इस गठजोड़ से भी वे आखिरी समय तक भागते रहे, नीतीश कुमार उनका पीछा करते रहे, इसका लोगों में गलत संदेश गया

ऐसा कई मौके पर देखा गया, जिनमें दो तो बहुत ही चर्चित रहे. एक मौका तब आया जब फारबिसगंज के भजनपुरा में अल्पसंख्यकों पर पुलिस ने अत्याचार किया। बूट और गोलियों से बच्चों, गर्भवती महिलाओं समेत सात लोगों को मारा. देशभर में इसकी चर्चा हुई, नीतीश की थू-थू हुई. तब यह बात सामने आई  थी कि जिस व्यक्ति की फैक्ट्री को लेकर पुलिस ने गोलीबारी की, वह भाजपा नेता है और सुशील मोदी के करीबी भी, इसलिए नीतीश कुछ बोल नहीं रहे थे. नीतीश भाजपा के दबाव में चुप रहे हों या स्वविवेक से, यह आज तक कोई हीं जान सका, लेकिन एक अच्छे नेतृत्वकर्ता के तौर पर इससे उनकी छवि जरूर  प्रभावित हुई.

एक दूसरा मौका भी आया, जब रणवीर सेना सुप्रीमो ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या आरा में हुई. आरा में हत्या के बाद ब्रहमेश्वर मुखिया की लाश को पटना जलाने के लिए लाया गया. शव के पटना पहुंचने के बाद राजधानी की सड़कों पर खूब बवाल हुआ. मुखिया के समर्थकों ने गोली चलाई, तोड़फोड़ की, सरकारी गाड़ियां  जला दीं, महिलाओं से अभद्रता की, मुख्यमंत्री आवास की ओर भी बढ़ने की कोशिश की. तब भी नीतीश कुछ नही बोले. ऐसे मौन वे कई बार साधते रहे, जिससे उनकी छवि का नुकसान होता रहा. नीतीश के राजनीतिक जीवन में भजनपुरा कांड एक ऐसा मसला है, जो उन्हें खुलकर कभी सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता पर बोलने नहीं देगा.यह इकलौता सवाल वर्षों बाद भी उन्हें कटघरे में खड़ा रखेगा. मामला चाहे पुलिस एक्शन हो या पुलिस के द्वारा वक्त के अनुसार की गई जरूरी कार्रवाई, लेकिन यह उम्मीद किसी भी मुख्यमंत्री से की जा सकती है कि वह इतनी ब़ड़ी घटना पर मौका-ए-हालात को जाकर देखे. खुलकर बोले. फारबिसगंज में राहुल, लालू, रामविलास समेत तमाम नेता पहुंचे लेकिन नीतीश नहीं गए. एक न्यायिक जांच आयोग गठित भी किया तो वह चार माह तक टालू रवैया अपनाए रहा.

नीतीश की मंशा चाहे जो रही हो, मगर लोग कहते हैं कि भाजपा के दबाव में नीतीश इतने जिद्दी बन गए. ऐसा नहीं कि यह पहली बार हुआ था जब सांप्रदायिकता के सवाल पर नीतीश ने मौन साधने या जिद्दी बन जाने की राजनीति की हो. यह सब जानते हैं कि नीतीश नरेंद्र मोदी से रोमांटिक दुश्मनी निभाते रहे हैं. उनके नाम से भड़कते रहे हैं लेकिन जब गुजरात में गोधरा कांड हुआ था, तब नीतीश केंद्रीय रेल मंत्री थे. तब भी वह मौन साध गए थे, गोधरा नहीं गये थे. बाद में नीतीश ने कहा था कि गोधरा नहीं जाना उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी भूल थी. गोधरा की भूल को वे फारबिसगंज में भी नहीं सुधार सके. ऐसा नहीं कि नीतीश ने सिर्फ अल्पसंख्यकों के ऐसे सवाल पर ही मौन साधे. कुछ साल पहले बिहार के सिमरिया में अर्द्धकुंभ हुआ था. तब भाजपा उनके साथ थी. नीतीश मुख्यमंत्री थे. बवाल मचा था. नीतीश इस पर भी मौन साधे रहे. उनकी ओर से बिहार धार्मिक न्यास परिषद के किशोर कुणाल मोर्चा  संभालने आए थे. उस आयोजन में भाजपा के नेताओं के साथ विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगड़िया भी सिमरिया में पहुंचे थे. तोगड़िया हिंदुत्व का पाठ पढ़ाकर, हुंकार भरकर लौट गए थे. त्रिशूल बांटने से लेकर और भी कई बातें हुई थीं तब.

हालांकि उस बीच नीतीश यह कहते रहे कि वे गठबंधन की राजनीति चलाने के लिए मनमोहन सिंह की तरह मजबूर नहीं, लेकिन व्यावहारिक तौर पर जब-जब मौका आया उनसे कम मजबूर नहीं दिखे. लेकिन एक दूसरा पक्ष भी है. नीतीश कुमार बोलते भी खूब हैं. मसलन बिहार को विशेष राज्य दर्जा दिलाने के  अभियान की ही बात करें. नीतीश उस एक मसले को पिछले दस सालों से ऐसे खींचते रहे कि वह खुद एक डेड इश्यू बन गया. उसकी अपील खत्म हो गई. वह सभी मर्जों की एक ही दवा बताते रहे. एक ऐसी दवा, जिसे पूरा किया जाना न तो मनमोहन सिंह के बस में था, ना नरेंद्र मोदी के बस में नजर आ रहा है.  बिहार से ज्यादा बड़े दावेदार दूसरे राज्य हैं और अगर केंद्र की सरकार ने सबको विशेष राज्य का दर्जा देना शुरू किया तो फिर विशेष राज्य का हश्र भी वही होगा, जो बिहार के महादलित माॅडल का हुआ. जिसमें एक जाति को छोड़कर सभी महादलित हो गए और बाद में वह भी महादलित हो गया और दलित जैसी राजनीतिक जाति खत्म हो गई!

जाति की राजनीति :  लगाव भी, अलगाव भी

बिहार की राजनीति की जो भी थोड़ी बहुत समझ रखते हैं, वे जानते हैं कि नीतीश कुमार के निर्माण में कुर्मी चेतना रैली की बड़ी भूमिका रही है. पटना के गांधी मैदान में उसी रैली के मंच से नीतीश की भव्य लॉन्चिंग हुई थी. नीतीश कुमार इस पर कुछ नहीं बोलते लेकिन यह सब जानते भी हैं. इसमें कुछ बुरा भी नहीं. बिहार की राजनीति जाति के खोले में समाने के लिए जानी जाती है. हर नेता अपने-अपने तरीके से जाति का इस्तेमाल करता रहा है. नीतीश ने भी एक बड़ा इस्तेमाल किया. यह हर कोई मानता है कि नीतीश का 2005 में जब उभार हुआ तो उसमें जातीय गोलबंदी की बड़ी भूमिका थी. नीतीश के पक्ष में गैर यादव पिछड़ी जातियों की गोलबंदी हुई. साथ में दूसरों ने समूह का निर्माण किया तो लालू यादव का वोट बैंक बिखर गया. उसके बाद नीतीश ने पीछे पलटकर नहीं देखा.

नीतीश ने भविष्य की राजनीति को और सुविधाजनक बनाने के लिए पिछड़ों में अतिपिछड़ों का अलग से एक समूह निकाला और दलितों में महादलितों का अलग समूह तैयार किया. तब नीतीश ने कहा था कि जो पिछड़ों में अतिपिछड़े हैं, उनको पंचायत चुनाव आदि में अलग से आरक्षण दिया जाना जरूरी है. उन्हें मजबूत की जरूरत है, इसलिए वे ऐसा कदम उठा रहे हैं. नीतीश के इस कदम की सराहना हुई. इससे बिहार की राजनीति में बड़ा फर्क भी आया. लालू यादव लगातार कमजोर होते गए. नीतीश कुमार मजबूत होते गए. नीतीश की मजबूती के समानांतर ही अब तक हाशिये पर पड़ी रहने वाली जातियों में राजनीतिक चेतना का विकास भी होता रहा. उनमें राजनीतिक आकांक्षा भी जगती रही. हालांकि तब भी महादलितों के गठन में नीतीश की नीति की आलोचना हुई. उन्होंने कुल मिलाकर अंत तक सभी दलित जातियों को महादलित में शामिल कर लिया लेकिन पासवानों को छोड़ दिया. तब बिहार का राह चलता आदमी भी यह कहने लगा कि नीतीश ने पासवानों को सिर्फ इसलिए अलग रखा है ताकि रामविलास पासवान अलग-थलग पड़ जाए. ऐसा कर नीतीश ने जगहंसाई ही की थी. बाद में जीतनराम मांझी जब मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने पासवानों को भी महादलित में शामिल कर और सभी दलितों को महादलित बनाकर नीतीश के इस अविवेकी फैसले पर करारा प्रहार ही किया.

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बहरहाल, 2010 में जब नीतीश कुमार ने अपार बहुमत से जीत हासिल की तो एक वर्ग में एक बात तेजी से फैली कि बिहार जाति की खोली से बाहर निकला है. जीत में इसे अहम भी माना गया. नीतीश ने बिहार में विकास और गवर्नेंस को मुद्दा बनाकर इस आकलन को बल भी प्रदान किया था. बहुत हद तक यह सच भी था कि विकास और गवर्नेंस को ऊपरी तौर पर ही सही, चुनावी राजनीति का मुद्दा बनाने का श्रेय नीतीश को जाता है. लेकिन दूसरी ओर जो बिहार की राजनीति की बारीकियों को जानते हैं, वे यह भी साफ-साफ जानते हैं कि नीतीश ने जातीय राजनीति की सधी हुई चाल चली थी. अब भी चलते रहते हैं.

खैर, नीतीश भी राजनीति ही करते हैं इसलिए यदि वह ऐसे आयोजनों के जरिये राजनीतिक आधार की तलाश करते हैं तो इस लिहाज से उनमें अतिशुद्धतावादी आदर्श की तलाश भी करना एक तरीके से अतिवाद होगा.

दूसरे पहलू की बात करें तो पिछली बार महादलित और अतिपिछड़ा का प्रयोग कर उन्होंने लालू यादव और रामविलास पासवान को एक साथ साधा था. लेकिन उस चुनाव के बाद नीतीश ने जिस तरह से अपने ही फाॅर्मूले को किनारे करना शुरू किया, उससे दूसरे संकेत और संदेश तेजी से फैलने लगे. नीतीश कुमार की दूसरी पारी में महादलित आयोग का पुनर्गठन ही पेंच में फंस गया. नीतीश ने कोई खबर नहीं ली. अतिपिछड़ा आयोग भी बना था लेकिन उसकी ओर से भी कोई रिपोर्ट नहीं आई. वह क्या कर रहा है, क्या नहीं, इसकी खबर किसी ने लेने की कोशिश नहीं की. चुनाव जीतने के बाद नीतीश ने बड़े जोर-शोर से सवर्ण आयोग का गठन किया. सवर्ण आयोग कार्यालय के लिए तरसता रहा. उसके अध्यक्ष कहां रहते हैं, इसकी जानकारी लेना भी पटना से दिल्ली पैदल जाने के बराबर साबित होता रहा. हालांकि अब सवर्ण आयोग की भी एक रपट आ गई है लेकिन संदेशा यह गया है कि नीतीश कुमार ने चुनाव आने पर खानापूर्ति के लिए यह करवाया.

महादलितों के बीच रेडियो बंटवारे की शुरुआत हुई. रेडियो आउटडेटेड हो चुका तब नीतीश कुमार ने रेडियो को बंटवाना शुरू किया. यह भी हंसी का विषय बना. नीतीश महादलित और अतिपिछड़ों का बंटवारा कर उनकी राजनीतिक आकांक्षा को तो जगा दिया लेकिन उनसे सरकार वह हमदर्दी नहीं दिखा सकी, जिसकी अपेक्षा थी. बिहार में एक भयानक बीमारी इंसेफलाइटिस का प्रकोप हर साल जारी रहता है. इस बीमारी से मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी व गया जिले में हर साल दर्जनों मौतें होती हैं. मरनेवाले अधिकांश बच्चे अतिपिछड़े और महादलित समुदाय से ही ज्यादा रहते हैं. पूरे देश में इंसेफलाइटिस से बिहार में होने वाली मौत एक मसला बना रहा लेकिन नीतीश उन इलाकों में एक बार भी नहीं गए. एक बार भी इस बात को लेकर सख्त निर्देश देते नजर नहीं आए. बात इतनी ही नहीं हुई. नीतीश कुमार महादलित और अतिपिछड़ों को एक ठोस समूह के तौर पर विकसित करने में और उन्हें अपने पक्ष में रखने में लगातार कई भूलों से चुकते गए. दोनों समुदायों ने से उन्होंनेे कोई ऐसा नेता खड़ा नहीं किया जो नीतीश के दायें-बायें दिखे. बल्कि उनके आजू-बाजू अधिकांश सवर्ण नेता ही दिखते रहे और महादलितों या अतिपिछड़ों से कोई स्वतंत्र फेस वैल्यू रखने वाला नेता नहीं पनप सका.

भीम सिंह एक अतिपिछड़े समूह से थे जो नीतीश के मंत्रिमंडल के सदस्य थे लेकिन वे भी मांझी की बगावत में उनके साथ चले गए. बात इतनी ही नहीं रही, ऐन मौके पर अमीरदास आयोग को भंग करना, उसकी रिपेार्ट को दबा देने की तोहमत नीतीश के मत्थे हमेशा के लिए लगा रहेगा. अमीरदास आयोग की रिपोर्ट से रणवीर सेना की भूमिका का पता चलना था और उसमें कई भाजपाइयों के नाम सामने आने वाले थे, जिसकी वजह से नीतीश ने दबाव में उसे भंग कर दिया. और अंत में तो मांझी के मुख्यमंत्रितत्व काल में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिससे बच पाना नीतीश कुमार के लिए हमेशा मुश्किल होगा. भोजपुर से लेकर गया तक दलितों-महादलितों पर जुल्म की घटनाएं अचानक से बढ़ीं. नीतीश कुमार मौन साधे रहे. वे ताकतवर स्थिति में थे, राज्य की जनता उन्हें सुपर सीएम मान रही थी लेकिन कोई ठोस कार्रवाई करवाने की बजाय मांझी को कुशासन का प्रतीक कहते रहने में उन्होंने अपनी सारी ऊर्जा लगाये रखी. इसका संदेश भी गलत गया.

सोच अलग-क्रिया अलग

बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दस सालों के सफर को देखें तो कई ऐसे पड़ाव दिखेंगे, जब लगेगा कि जो वे करना चाहते हैं, वे नहीं कर पाते और जो नहीं करना चाहते वह होता जाता है. कथनी और करनी में फर्क उन्हें द्वंद्व और दुविधा से भरे नेता के रूप में स्थापित करता रहा. सबको याद होगा कि पहली पारी में नीतीश ने बिहार में भूमि सुधार के लिए बंदोपाध्याय कमेटी बनाते समय कहा था कि भूमि-सुधार ही यहां की सबसे बड़ी समस्या और चुनौती है. इसके बगैर बिहार का भला और समग्र विकास नहीं होगा. बंदोपाध्याय कमेटी बनने से हलचल मची. आलोचक भी उनके इस साहस भरे कदम के लिए प्रशंसक हो गए और प्रशंसक रातो-रात आलोचकों की फौज में शामिल हो गए. नीतीश ने परवाह नहीं की. कमेटी ने रिपोर्ट तैयार की. रिपोर्ट के कई हिस्से सार्वजनिक हुए लेकिन जब उसे लागू करने की बारी आई तो नीतीश ने उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया.

नीतीश के राजनीतिक जीवन में भजनपुरा कांड एक ऐसा मसला है, जो उन्हें खुलकर कभी सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता पर बोलने नहीं देगा. यह इकलौता सवाल वर्षों बाद भी उन्हें कटघरे में खड़ा रखेगा

इसी तरह मुचकुंद दुबे की अध्यक्षता में समान स्कूल शिक्षा प्रणाली में भी नीतीश कुमार ने एक आयोग का गठन किया. आयोग ने रिपोर्ट दी, वह भी ठंडे बस्ते में चली गई. किसान आयोग, प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन कर भी उन्होंने बेहतर पहल की थी लेकिन वहां भी पेंच में फंसता रहा. हो सकता है कि ऐसे आयोगों को गठन करते वक्त नीतीश के जेहन में यह इच्छा रहती हो कि इसके दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे और जब लागू करने की बात आती हो तो सत्ता पर असर पड़ता हुआ दिखता हो, लेकिन स्टेट्समैन और पोलिटिशियन का फर्क भी तो यही होता है. पॉलीटिशियन सत्ता के इर्द-गिर्द बातें सोचता है, स्टेट्समैन उसके बाद की भी बातों पर गौर करता है. जिस बिहार में मुचकुंद दुबे की कमेंटी शिक्षा की स्थिति सुधारने व शिक्षा में समानता लाने के लिए बनी थी, उस बिहार में शिक्षा आज सबसे बुरे दौर में है और शिक्षक सबसे नियंत्रणहीन. नीतीश कुमार न तो शिक्षकों के विरोध को ठीक से डील कर सके और न ही शिक्षा की स्थिति में सुधार लाने के लिए कोई ठोस कदम उठा सके. नतीजा यह है कि नीतीश कुमार आज जब भी विकास की बात करते हैं या चुनावी सभाओं में करेंगे तो शिक्षा जैसे अहम मसले पर उन्हें चुप्पी साध लेनी पड़ेगी.

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मजबूत भी मजबूर भी

व्यक्तिवाद-परिवारवाद

नीतीश कुमार के बारे में एक बात कही जाती है कि वे औरों से बहुत अलग हैं. ऐसा है भी. लालू प्रसाद, रामविलास पासवान या उनके पहले के भी बहुतेरे नेताओं की तुलना में नीतीश एक मामले में अलग छवि रखते हैं. इनके सत्ता में आने के बाद भी इनके निकटवर्ती या दूरदराज के रिश्तेदारों की फौज राजनीति में खड़ी नहीं हुई. नीतीश के बड़े भाई सतीश बाबू आज भी नीतीश के प्रभाव का कभी कोई इस्तेमाल नहीं करते. नीतीश के बेटे भी प्रभाव का फायदा उठाने से बहुत दूर रहते हैं. अन्य रिश्तेदारों की तो बात ही दूर. इस आधार पर नीतीश के जरिये एक संभावना जगी थी कि परिवारवाद का खात्मा करने में नीतीश ही सक्षम होंगे. हालांकि शुरू में इस मुद्दे पर कुछ देर ही टिके रहने के बाद नीतीश लगातार समर्पण की मुद्रा में नजर आए.

समान स्कूल शिक्षा प्रणाली में नीतीश ने एक आयोग गठित की. आयोग ने रिपोर्ट दी, वह ठंडे बस्ते में चली गई. किसान आयोग, प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन कर बेहतर पहल की लेकिन वहां भी पेंच फंसता रहा 

व्यक्तिगत तौर पर यदि अपनी छवि बचाए रखने की बात हो तो सिर्फ नीतीश ही क्या, इसी बिहार में कई नेता पहले भी हुए, जिन्होंने अपने परिजनों को अपने जीते-जी राजनीति से दूर रखा. लेकिन नीतीश कुमार अपने ही दल में परिवारवाद और वंशवाद को नहीं रोक सके. महेंद्र सहानी के बेटे अनिल सहानी को राज्यसभा भेजकर, जगदीश शर्मा की पत्नी का टिकट काटने के बाद उनके बेटे राहुल शर्मा को देकर, मुन्ना शुक्ला की पत्नी अन्नु शुक्ला को टिकट देकर, अश्वमेघ देवी, मीना सिंह, कौशल्या देवी आदि को चुनावी राजनीति में मुकाम दिलाकर नीतीश ने खुद को भी ‘औरों’ की श्रेणी में शामिल कर लिया.

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बात सिर्फ परिवारवाद पर ही खत्म होती तो और बात होती, राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ बयान और फास्ट ट्रैक ट्रायल के जरिये अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुंचाने की प्रक्रिया नीतीश को बहुत हद तक वाहवाही तो दिलवाती है लेकिन अनंत सिंह, तसलीमुद्दीन, उनके बेटे सरफराज, सुनील पांडेय, उनके भाई हुलास पांडेय आदि के साथ कई नामचीन बाहुबलियों की पत्नियों को राजनीतिक संरक्षण देना उनकी मजबूरी को दर्शाता रहा. खगड़िया में शिक्षकों की सभा में, नीतीश के अंगरक्षकों के रहते जदयू नेता रणधीर यादव द्वारा सरेआम फायरिंग करना तो एक उदाहरण बन गया. दरौंदा विधानसभा की घटना भी  नजीर बनी तो उसमें नीतीश की ही भूमिका थी, जिसे आज भी लोग चटखारे लेकर सुनाते हैं. दरौंदा में एक सीट को बचाने के लिए नीतीश ने बाहुबली अजय सिंह की शादी आननफानन में शादी करवा दी और उनकी पत्नी कविता सिंह को टिकट देने का फैसला कर विधायक बनवा दिया.नीतीश उस वक्त इस एक सीट को हार भी जाते तो यह हार कई जीतों से बड़ी होती. लेकिन नीतीश ने ऐसा नहीं किया.

इन दस सालों में कई मौके ऐसे भी आए, जब नीतीश कुमार घोर व्यक्तिवादी राजनीति करते नजर आए और खुद को उभारने के लिए, खुद को स्थापित करने के लिए अपने लोगों को लगातार दरकिनार करते रहे. इसका एक बड़ा उदाहरण तब नजर आया जब राजगीर शिविर में उनके दल के सांसद शिवानंद तिवारी ने नीतीश कुमार को नसीहत देने की कोशिश की. नीतीश उस समय मौन साधे रहे बाद में शरद यादव से शिवानंद तिवारी, एनके सिंह और साबिर अली को बाहर का रास्ता दिखा दिया. तब पहले यह बताया गया कि नीतीश एक बार ही किसी को राज्यसभा भेजते हैं, इसलिए ऐसा किया लेकिन अली अनवर जैसे चुप रहनेवाले नेताओं को उन्होंने दोबारा राज्यसभा भेजा तो यह भ्रम टूट गया.

प्रेम कुमार मणि, शंभू शरण प्रसाद जैसे नेता जो नीतीश के काफी करीबी रहे लेकिन एक-एक करके या तो निकाले जाते रहे या निकलने को मजबूर किए जाते रहे. इसका असर नीतीश की छवि पर पड़ता रहा 

दरअसल नीतीश कुमार के लिए यह कोई पहला मौका नहीं था  कि उन्होंने अपने खिलाफ बोलने वाले अपने लोगों को दरकिनार किया बल्कि उनकी राजनीतिक शैली में यह उनकी खास अदा भी मानी जाती है कि जो भी उनकी थोड़ी आलोचना करता है, उसे वे मौन साधकर किसी दूसरे नेता से किनारे करवाते हैं. सबसे बड़ा आरोप तो जॉर्ज फर्नांडिस से लेकर दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं को दरकिनार कर देने का है, जिस पर न तो नीतीश और न ही उनके करीबी आज तक जवाब दे पाते हैं. प्रेम कुमार मणि, शंभू शरण प्रसाद जैसे नेताओं की तो फौज ही है, जो नीतीश के काफी करीबी रहे लेकिन एक-एक करके या तो नीतीश द्वारा निकाले जाते रहे या निकलने को मजबूर किए जाते रहे. इसका सीधा असर भले न हुआ हो लेकिन इससे नीतीश की छवि पर लगातार असर पड़ता रहा.

बात अगर प्रशासनिक कार्यकलाप की करें तो कई और चीजें दिखाई पड़ेंगी, जिससे साफ हो जाता है कि नीतीश खुद को केंद्र में रखकर ही काम करने में भरोसा करते हैं. वे समानांतर रूप से किसी को भी सत्ता शासन का श्रेय नहीं लेने देना चाहते. इसका एक बड़ा उदाहरण उनके आवास में लगने वाला जनता दरबार है. जनता दरबार नीतीश कुमार जब घंटों लोगों की फरियाद सुनते हैं तब कुछ देर के लिए लगता है कि चाहे इसका नतीजा जो होता हो, नीतीश इतनी देर बैठते तो हैं. लोगों की बात तो सुनते हैं. एक आम आदमी उनसे मिलकर अपनी बात तो रख सकता है. लेकिन यह सब एक हद के बाद गिरावट की स्थिति में आने लगता है. जब एक फरियादी के चार-चार बार पहुंचने के बाद भी समस्याओं का समाधान नहीं पाता या फरियाद सुनाने के एवज में अधिकारियों की धौंस का सामना करता है तो वह टूट जाता है. नीतीश अपनी धुन में नियमित तौर पर तो दरबार में आते हैं, समस्याएं सुनते हैं लेकिन शायद बाद में यह जानने की कोशिश नहीं करते कि उनके पास दूरदराज से किसी तरह पहुंचने वाले लोगों के आवेदन पर अधिकारी गंभीरता से कार्रवाई कर भी रहे हैं या नहीं. अगर नीतीश बीच-बीच में इसकी खबर भी लेते तो शायद आरटीआई से सूचना मांगने पर लंबित मामलों की इतनी सूची इस तरह की नहीं होती.

इसी तरह नीतीश यात्राओं पर भी जमकर निकलते हैं. सेवा यात्रा, विकास यात्रा, न्याय यात्रा वगैरह-वगैरह. यात्राओं के दौरान जो भी आवेदन उन्हें मिलते हैं, उसे भी अधिकारी ठंडे बस्ते में रखते हैं. इसके बजाय नीतीश कुमार के पास शासन का दूसरा मॉडल भी था. वे अधिकारियों को ज्यादा जवाबदेह बना सकते थे. सिस्टम को ठीक कर सकते थे. दस सालों के शासन में सिस्टम को ही इतना चुस्त-दुरुस्त कर सकते थे कि लोगों को छोटी-छोटी फरियाद लेकर उनके पास नहीं आना पड़ता. लेकिन वह खुद को ही केंद्र में रखकर शासन करने की उनकी प्रक्रिया में लगे रहे, जिससे उनका नुकसान ही हुआ.

पॉपुलर पॉलीटिक्स बनाम कार्यकर्ताओं की उपेक्षा

नीतीश कुमार पॉपुलर पॉलीटिक्स करने के माहिर खिलाड़ी बनते रहे. कुछ साल पहले जब विधायक फंड खत्म करने की घोषणा की तो इसकी चौतरफा प्रशंसा हुई. जब आरटीएस को लागू करवाया तो प्रशंसा हुई. जब देश में अन्ना आंदोलन उफान मार रहा था, तो उन्होंने खुलकर समर्थन किया, राइट टू रिकाॅल पर अन्ना के पक्ष में बयान दिया. यह सब नीतीश को लोकप्रिय बनाते हैं. नीतीश वक्त की नजाकत समझने में माहिर हैं, इसलिए अन्ना आंदोलन के दिनों में उन्होंने एक भ्रष्ट अधिकारी का घर जब्त कर उसमें स्कूल खोल वाहवाही भी लूटी. किसी समाचार चैनल द्वारा सामान्य सम्मान मिलने पर भी सरकारी फंड से बड़े-बड़े होर्डिंग लगते रहे. अखबारों में विज्ञापन का बजट बढ़ाकर भी वह लोकप्रियता के सूत्र तलाशते रहे. यह सब अच्छा रहा लेकिन इस बीच नीतीश यह भूलते रहे कि वे सत्ताधारी पार्टी के नेता हैं और आगे की लड़ाई के लिए सिर्फ उनकी इकलौती लोकप्रियता काफी नहीं होगी बल्कि उन्हें एक टीम भी चाहिए. सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ताओं संभाले रखना बहुत मुश्किल काम होता है.

‘नीतीश सब काम सरकारी तंत्र से करवाते रहे. सरकारी तंत्र तो किसी का होता नहीं. वह आज आपके साथ है, कल देखेगा कि दूसरा मजबूत है, अपना चरित्र बदल लेगा. नीतीश की यह सबसे बड़ी भूल रही’

उन्होंने अपनी छवि बनाने के लिए जिला प्रशासन और थानों तक परोक्ष तौर पर यह आदेश दिया कि किसी की बात न सुनी जाए. इसका असर यह हुआ कि प्रभावशाली लोगों की बात तो प्रशासन सुनती रही, पुलिस भी मानती रही लेकिन जदयू कार्यकर्ताओं को सत्ताधारी से जुड़ाव के बावजूद अपनी औकात में रहना पड़ा. वे अपने इलाके में छोटी पैरवी करने में भी असमर्थ हो गए. विधायक फंड खत्म होने से छोटे-छोटे ठेके-पट्टे के काम भी मिलने बंद हो गए. नीतीश कुमार सरकार को प्रशासन के जरिये चलाने में पूरी ऊर्जा लगाए रखे, उनकी तमाम योजनाएं सरकारी तंत्रों से संचालित होती रही और जदयू कार्यकर्ता हाशिये पर जाते रहे. नतीजा यह हुआ कि जिला स्तर पर भी कई जगहों पर जदयू का संगठन खड़ा नहीं हो सका. इतने सालों तक सत्ता में रहने के बावजूद पार्टी का एक स्वरूप नीतीश कुमार खड़ा नहीं कर सके, इसका असर अब उनकी पार्टी पर दिख रहा है. कार्यकर्ताओं को उन्होंने पेड़ लगाकर सदस्यता अभियान चलाने के उपक्रम में लगाया. जाहिर सी बात है कि ऐसे अभियान की हवा निकलनी थी. लोगों की बात कौन करे, जदयू कार्यकर्ताओं ने नीतीश के इस अभियान में साथ नहीं दिया. शिवानंद तिवारी कहते हैं, ‘इसका गहरा असर होगा. जो भी क्षेत्र में कार्यकर्ता होता है, नेता होता है, वह दिन-रात मेहनत कर अपनी साख बनाता है. उसकी इतनी अपेक्षा रहती है कि वह भी जनता के बीच नेता की तरह माना जाए. वह भी किसी की मदद कर सके. उसकी बात भी कहीं न कहीं शासन में सुनी जाए, लेकिन नीतीश कुमार ने ऊपर से आदेश देकर किसी को भी मदद नहीं करने की बात कह दी तो कार्यकर्ता इनके पास रहेंगे कैसे?’ उनके अनुसार, ‘नीतीश ने अपनी योजनाएं चलाने के लिए भी कार्यकर्ताओं को पर्याप्त छूट नहीं दी. सब सरकारी तंत्र से करवाते रहे और सरकारी तंत्र तो किसी का होता नहीं. वह आज आपके साथ है, कल देखेगा कि दूसरा मजबूत है, अपना चरित्र बदल लेगा. नीतीश की यह सबसे बड़ी भूल रही.’

मजबूत भी मजबूर भी

nitish kumar

बिहार में विधानसभा चुनाव सामने है. हालांकि इसमें अभी तकरीबन तीन महीने का समय है लेकिन चुनाव की खुमारी अभी से परवान चढ़ने लगी है. पोस्टर वार और बयानों की जंग से राज्य का माहौल गरमा रहा है. चुनाव आयोग ने बिहार के चुनाव को ‘मदर आॅफ इलेक्शन’ कहा है. इस बार होने वाला बिहार का चुनाव अब तक हुए सभी चुनावों में दिलगोचस्प होने जा रहा है. दो ध्रुव में बंटकर जिगरी दोस्त रहे कई दल, कई नेता आपस में भिड़ने को तैयार हैं, या यूं कहें कि भिड़ना शुरू कर चुके हैं. केंद्र में नीतीश कुमार हैं. सब से ज्यादा निगाहें उन पर ही हैं कि उनका क्या होगा? यह सवाल सहज और स्वाभाविक भी है. नीतीश कुमार हालिया दिनों में बिहार में सिर्फ एक नेता, एक मुख्यमंत्री के तौर पर नहीं उभरे, बल्कि अंधेरे में उम्मीदों की तरह भी नजर आए. उनका राजनीतिक कद इस कदर बढ़ गया था कि वे देश के प्रधानमंत्री पद तक के दावेदार माने जाने लगे थे. परोक्ष तौर पर उस रेस में उनके चहेतों ने, उनके लोगों ने शामिल भी करवा दिया. हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी से हुए उनके विवाद से उनकी छवि भी काफी प्रभावित हुई.

बहरहाल इन दिनों नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक पारी की सबसे मुश्किल लड़ाई में फंस गए हैं. बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी फिर उन्हें मिल सकेगी या नहीं, यही उनकी लड़ाई और  उनकी राजनीतिक कमाई का सबसे प्रमुख एजेंडा हो गया है. उन्हें भी मालूम है कि इस बार के बिहार चुनाव में अगर वे परास्त हुए तो फिर परिस्थितियां ऐसी हैं या होने वाली हैं कि उन्हें दोबारा इस तरह दम लगाने और खम ठोंकने का मौका आसानी से नहीं मिलने वाला. नीतीश की जो तैयारियां हैं, संभव है वे चुनाव जीत भी जाएं, लेकिन क्या वे इस बार का चुनाव जीतकर भी जीतने जैसा अनुभव करेंगे? संभव है कि वे मुख्यमंत्री फिर से बन जाएं, लेकिन क्या वे दुबारा वही नीतीश कुमार बन पाएंगे, जिनकी राजनीति, सोच और कार्यप्रणाली की वजह से बदनाम बिहार ने देश को उम्मीद की एक किरण दिखाई थी और यह संभावना बनी थी कि इस जमाने में भी नेताओं के बीच से स्टेटसमैन पैदा होने की गुंजाइश शेष बची हुई है. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री के तौर पर दसवें साल में प्रवेश कर चुके हैं. बीच में कुछ माह को छोड़कर, जब उन्होंने लोकसभा चुनाव के बाद जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री का पद सौंपा. नीतीश कुमार ने जब मांझी को पद सौंपा तब भी और जब मांझी से पद ले लिया तब पहले प्रशंसा हुई, बाद में उन्हें चौतरफा आलोचना भी झेलनी पड़ी. प्रशंसा की भी वजह थी. यह राजनीति की एक जरूरत थी. दोनो ही कदम नीतीश कुमार ने मजबूरी में और खुद को मजबूत बनाने के लिए भी उठाए. फिलहाल राज्य में एक अदद नेता की तलाश में भटकती भाजपा और दूसरे दलों में विकल्पहीनता वाले इस दौर में विकल्पहीन नेता बनकर नीतीश कुमार पूरे दम-खम के साथ मैदान में हैं और विकल्पहीनता की स्थिति ही उनके लिए जीत की सबसे बड़ी उम्मीद भी दे रही है. लेकिन सवाल यही है कि क्या वे जीतकर भी नायक बन पाएंगे?

सत्ता में एकाध पारी और खेलकर भी क्या नीतीश कुमार अपनी उसी प्रतिष्ठा को वापस अर्जित कर सकेंगे, जिसकी उम्मीद उनसे की जाती थी या एक सामान्य मुख्यमंत्री भर बनकर रह जाएंगे, जैसा कि देश के दूसरे राज्यों में हैं और पारी दर पारी सत्ता संभाल रहे हैं. यह सवाल बिहार में और बिहार के संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि पिछले एक साल में ही नीतीश कुमार की साख तेजी से गिरी है. सत्ता के समीकरण साधने और भविष्य में संभावनाओं को बनाने के लिए वे पल-पल इतने पाले बदलते नजर आए कि वैसा खेल राजनीति में बहुत ही सामान्य माना जाता है. बिहार में नीतीश के लिए यह चुनाव सिर्फ जीत-हार के लिहाज से महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि इस बार उनके व्यक्तित्व-कृतित्व का आकलन खुद उनके मुकाबले ही होना है. अब तक उनका आकलन लालू और लालू-राबड़ी शासनकाल के मुकाबले किया जाता था. तब नीतीश अतुलनीय लगते थे, लेकिन अब वह लालू यादव के साथ हैं. लोकसभा चुनाव में तो नरेंद्र मोदी की आंधी की वजह से नीतीश दूसरे राज्यों की तरह भहराकर गिर गए.

अब विधानसभा चुनाव में असली परीक्षा होनी है कि क्या वे बिन भाजपा के भी उतने ही मजबूत हैं, जितने पिछले एक दशक से रहे हैं! जीत-हार के साथ ही कई और चीजों का आकलन भी होगा, मसलन क्या विनम्र नीतीश में जब-तब जो अहंकार हावी होता है, वह अब नहीं दिखेगा! क्या अब तक कई बार कथनी और करनी का जो फर्क दिखता रहा है, वह नहीं दिखेगा! क्या सिर्फ खुद की छवि साफ रखते हुए भी गलत किस्म के लोगों से छुटकारा नहीं पा सकने की विडंबना से वे मुक्ति पाने की कोशिश करेंगे! क्या अब तक नीतीश कुमार के जो संगी-साथी एक-एक कर उन्हें छोड़कर जाते रहे हैं या छोड़ने को मजबूर होते रहे हैं, वह सिलसिला रुक जाएगा!

ऐसे ही कई और सवाल हैं, जो नीतीश कुमार के लिए अब उठ रहे हैं और आगे भी उठते रहेंगे. इस चुनाव में पाॅपुलर पॉलिटिक्स करने के बावजूद ये सवाल उनके सामने बने रहेंगे और वही चुनौती भी होगी, जिससे उन्हें पार पाना होगा. संभव है नीतीश जीत हासिल कर लें, यह भी संभव है कि पहले से भी बड़ी जीत हासिल कर लें, लेकिन पिछले दस साल में जो सवाल उनसे जुड़े हुए हैं, जो चूक उनसे हुई है या वे करते रहे हैं, वे सारे के सारे इस चुनाव में भी उनके सामने आ सकते हैं.

भाजपा :  तब क्यों जुटे-अब क्यों हटे!

नीतीश कुमार इस चुनाव में सीधे-सीधे भाजपा से लड़ रहे हैं. लोकसभा चुनाव में भी वे भाजपा से लड़े थे लेकिन साथ ही लालू प्रसाद यादव से भी लड़ाई जारी रखे हुए थे. कायदे से यह पहला मौका ही होगा, जब उनकी पूरी ऊर्जा अपने उस जिगरी दोस्त से लड़ने में लगेगी, जिससे करीब डेढ़ दशक का साथ रहा और करीब आठ साल तक उन्होंने सत्ता का सुख भी भोगा. अब उसी भाजपा की वजह से अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ने को मजबूर हुए नीतीश कुमार के सामने एक बड़ा सवाल यह है कि आज अगर राज्य में भाजपा उन्हें चुनौती देने की स्थिति में है तो इसके लिए वे खुद ही जिम्मेदार तो नहीं? ऐसा इसलिए क्योंकि नीतीश से जुड़ने से पहले तक भाजपा का दायरा दक्षिण बिहार, जो अब झारखंड है, में सिमटा रहता था. नीतीश से मिलने के बाद ही भाजपा का बिहार में दायरे का विस्तार शुरू हुआ. इसे दूसरे शब्दों में कहें तो भाजपा से गठजोड़ के बाद ही नीतीश कुमार बिहार में सत्ता पाने लायक नेता बनने की ओर अग्रसर होना शुरू हुए.

‘नीतीश कुमार को भोज रद्द नहीं करना चाहिए था. यह तो ऐसे भी बहुत भद्दी बात थी कि किसी को अपने घर खाने पर बुलाकर उसे अपमानित कर भोज रद्द कर देना. और फिर जब एक बार इतनी तल्खी बढ़ा ही दी थी तो फिर भाजपा के साथ बने रहने का कोई औचित्य नहीं था, उसे छोड़ देना चाहिए था’

शिवानंद तिवारी, पूर्व जदयू नेता

अब जब वह भाजपा को देश तोड़ने वाली पार्टी से लेकर सांप्रदायिकता का जहर फैलाने वाली पार्टी तक बोल रहे हैं, और बार-बार यह भी बता रहे हैं कि कैसे जनता पार्टी से लेकर बीपी सिंह सरकार तक को गिराने का खेल भाजपा करती रही है, तब यह सवाल उठता है कि क्या नीतीश यह सब पहले से नहीं जानते थे. क्या भाजपा एकबारगी से ऐसा हो गई. भाजपा के साथ नीतीश का जुड़ाव तब हुआ था जब भाजपा एक तरीके से अछूत सी थी. बाबरी विध्वंस के बाद तक भाजपा अछूत ही मानी जाती थी. लेकिन उसके पक्ष में हिंदुत्व की लहर का उभार हुआ था. तो क्या यह माना जाना चाहिए कि नीतीश भी उसी हिंदुत्व की लहर पर सवार होने के लिए भाकपा माले जैसे वामपंथी सहयोगी का एक झटके में साथ छोड़कर सीधे नब्बे डिग्री पर पाला बदलते हुए दक्षिणपंथी भाजपा के साथ हो गए थे. बात सिर्फ तब जुड़ने की भी होती तो एक बात होती. उसके पक्ष में नीतीश के पास तर्क रहता है कि भाजपा से उन्होंने एजेंडे पर सहमति बना ली थी तब भाजपा को सांप्रदायिकता से दूर कर दिया था. लेकिन गोधरा कांड के बाद इसे लेकर खूब आलोचना हुई.

भाजपा का सांप्रदायिक चेहरा फिर से उजागर हुआ लेकिन नीतीश तब भी साथ बने रहे. इसका जवाब नीतीश के पास अब तक नहीं होता. भाजपा से राहें अलग करने की बात इतनी ही नहीं रही. उनका अलगाव भाजपा के नाम पर नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी के नाम पर शुरू हुआ. इसके लिए वे आडवाणी को ऐसे नेता के तौर पर स्थापित करने में ऊर्जा लगाने लगे, जैसे आडवाणी भाजपा के विचारों से अलग कोई दूसरे नेता हो. बाबरी विध्वंस के लिए रथ यात्रा के जरिए माहौल बनाने वाले आडवाणी, नीतीश कुमार के लिए बेहतर नेता बनते गए, मोदी से उनकी दूरी बनती गई और एक समय ऐसा आया जब मोदी के नाम पर उन्होंने पटना में भाजपा नेताओं को दिए भोज तक रद्द कर दिया. हालांकि उसके बाद भी नीतीश के लोग यह बताने की कोशिश करते रहे कि भाजपा के साथ वे इसलिए जुड़े हैं, क्योंकि उन्हें देश बनाना है, बिहार बनाना है और लालू-राबड़ी के आतंक राज से बिहार को मुक्त रखना है. धीरे-धीरे वह भाजपा को छोड़ नरेंद्र मोदी से दुश्मनी जैसा रिश्ता निभाने लगे. भाजपा से रिश्ते का यह एक टर्निंग पॉइंट था. नीतीश कुमार के साथ रहे नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं कि भोज रद्द ही नहीं करना चाहिए था.

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अपने से दूरी नीतीश कुमार के कभी बहुत करीबी रहे जीतन राम मांझी ही अब उनके सबसे बड़े दुश्मन हो गए

इससे पूरे बिहार में संदेश गया कि नीतीश व्यक्तिगत तौर पर अहंकारी नेता हैं और दूसरे राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तरक्की से उन्हें सौतिया डाह हो गया है, इसलिए उन्होंने बाढ़ पीड़ितों के सहायतार्थ आए पैसे भी लौटाए और भोज भी रद्द कर दिया. तिवारी कहते हैं, ‘यह तो ऐसे भी बहुत भद्दी बात थी कि किसी को अपने घर खाने पर बुलाकर उसे अपमानित कर भोज रद्द कर देना. और फिर जब एक बार इतनी तल्खी बढ़ा ही दिया था तो फिर भाजपा के साथ बने रहने का कोई औचित्य नहीं था, उसे छोड़ देना चाहिए था.’

यह बात सही है कि नीतीश कुमार को इतनी तल्खी के बाद भाजपा का साथ छोड़ देना चाहिए था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने दूसरे रास्ते निकाले. वे नरेंद्र मोदी को अछूत साबित करने में लगे रहे. वे मोदी से हाथ मिलाने और उनके साथ फोटो खिंचवाने से भी बचते रहे. यह नीतीश कुमार की बड़ी भूल थी. ऐसा व्यावहारिक तौर पर होता नहीं कि आप एक पूरे परिवार से मेल रखने की कोशिश करें और उसके सबसे प्रिय सदस्य को ही गालियां देते रहे. भाजपा नीतीश को तब ही समझ चुकी थी, जब वह उनके साथ जुड़ी थी. इसलिए वह शुरू से ही अपने दायरे के विस्तार के अभियान में लगी रही जबकि नीतीश भाजपा से जुड़कर इतने निश्चिंत हुए कि अपनी पार्टी के विस्तार तक की चिंता छोड़ पूरी तरह भाजपा पर आश्रित होते चले गए. नतीजा यह हुआ कि नीतीश द्वारा भोज वगैरह रद्द होने और मोदी से दुश्मनी का रिश्ता शुरू करने के बाद 2010 में जब बिहार विधानसभा चुनाव हुआ तो 141 सीटों पर चुनाव लड़कर नीतीश की पार्टी ने 115 पर जीत हासिल की जबकि भाजपा ने 102 सीटों पर चुनाव लड़कर 91 को अपने खाते में कर लिया था. उसके एक साल पहले जब लोकसभा चुनाव हुआ था तो भी भाजपा ने नीतीश के साथ रहते ही 40 में से 12 सीटों पर कब्जा जमा लिया था. यह नीतीश के लिए खतरे की घंटी थी.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, नरेंद्र मोदी को अछूत साबित करने में लगे रहे. वे मोदी से हाथ मिलाने और उनके साथ फोटो खिंचवाने से भी बचते रहे. यह नीतीश कुमार की बड़ी भूल थी 

नीतीश के साथ रहते ही भाजपा ने अपनी यह ताकत दिखा दी थी. बाद में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद वह भाजपा से अलग ही हो गए. तब बिहार में 2014 के लोकसभा चुनाव में क्या परिणाम आया, यह सबने देखा-जाना. भाजपा ने लोकसभा चुनाव में नीतीश को वहां पहुंचा दिया, जहां पहुंचने के बाद लालू यादव तक ने भी उनसे बढ़त ले ली और उनकी राह में सिर्फ और सिर्फ रोड़े ही रोड़े बच गए. उनके पास सिर्फ एक विकल्प बचा कि वे राजनीतिक जिंदगी में एक बार फिर से यू टर्न लें और उन्हीं लालू यादव से जा मिले, जिनका विरोध कर और जिन्हें एक जिंदा खलनायक के तौर पर मजबूत कर वे वर्षों खुद को मजबूत करने की सियासत करते रहे थे. इस स्थिति तक पहुंचने में भाजपा के समानांतर ही नीतीश की भी भूमिका रही.

मांझी प्रयोग : क्यों बनाया, क्यों हटाया

2014 में लोकसभा चुनाव के पहले अपने सबसे बड़े दुश्मन नरेंद्र मोदी की वजह से वर्षों के प्यार के बाद यार से दुश्मन बनी भाजपा से जब नीतीश का अलगाव हुआ तो उन्हें भरोसा था कि वे खुद के दम पर लोकसभा चुनाव की नैया पार कर लेंगे. इतना ही भरोसा नहीं, उन्हें यह भी विश्वास था कि वे भाजपा और लालू  दोनों को एक साथ परास्त कर देंगे. लेकिन भाजपा भारी जीत हासिल करने में कामयाब रही और हाशिये की ओर जाते लालू भी नीतीश की पार्टी से ज्यादा बढ़त हासिल करने में सफल हो गए. यह नीतीश के लिए दोहरा झटका था. नए दुश्मन से भी हार और पुराने दुश्मन से भी हार. तब उन्होंने नैतिकता की दुहाई दी, एक बड़ा प्रयोग किया. मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और बहुत सोच-विचारकर, कई उपलब्ध विकल्पों में से सबसे भरोसेमंद और आसानी से हैंडल किए जाने लायक नेता जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया.

नीतीश तब भी गलती कर रहे थे. पार्टी के अंदर खूब हो-हल्ला मचा. इसके बावजूद नीतीश लोकसभा चुनाव हारकर भी बड़ी जीत हासिल करते दिखे. अपने इस साहसिक और ऐतिहासिक फैसले से वे बडे़ नायक बने. नीतीश ने लगे हाथ उत्साह में ऐलान किया कि वे अब संगठन का काम देखेंगे और सरकार के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करेंगे. तब दुनिया में नीतीश की तारीफ हो रही थी. तारीफ सुनने के आदि और अभ्यस्त हो चुके नीतीश तब फूले नहीं समा रहे थे. बेशक यह एक बड़ा प्रयोग था. बड़े साहस का काम भी लेकिन नीतीश तब कुछ बातों को भूलकर यह प्रयोग कर रहे थे. जीतनराम मांझी के बारे में उन्हें जानकारी थी कि वे अच्छे दिनों का साथ देने वाले नेता रहे हैं. जब कांग्रेस के बेहतर दिन थे, मांझी कांग्रेस के साथ थे. राजद के अच्छे दिन आए थे तो मांझी राजद वाले थे और जब नीतीश कुमार के अच्छे दिन आने वाले थे तब मांझी उनके पाले में आ गए थे. यानी मांझी अच्छे दिनों में साथ रहने के अभ्यस्त नेता थे. नीतीश यह भूल गए थे कि वे मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश की बजाय बेहतर संभावनाओं को ज्यादा तरजीह देंगे. इसमें कोई बुराई भी नहीं थी, क्योंकि यही काम नीतीश भी करते रहे थे. जब उन्हें जरूरत थी तब वाम दलों के साथ राजनीति करते और जब जरूरत पड़ी थी भाजपा के साथ आ गए थे. मांझी ने वही किया, जो होना तय था. इसमें कोई आश्चर्यजनक बात नहीं थी कि मांझी एक बार मुख्यमंत्री बनने के बाद कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं थे लेकिन नीतीश कुमार लगातार मांझी मामले को डील करने में चुकते गए.

मांझी उस समुदाय के नेता थे या हैं, जिस समुदाय को राजनीतिक स्वर देने का काम लालू यादव के बाद नीतीश ने ही किया. नीतीश ने ही दलितों में से भी ‘महादलितों’ को अलग कर एक नई धारा बहाई. मांझी उसी धारा के एक प्रमुख नेता थे. नीतीश ने जब उन्हें राजपाट सौंपा था तो हटाने की प्रक्रिया अलग होनी चाहिए थी लेकिन नीतीश ने दूसरा रास्ता अख्तियार कर लिया. और खुद मौन साधकर अपने लोगों से लगातार मांझी पर बयानों के हमले करवाते रहे. मांझी को एक अराजक राज कायम करने वाला नेता और कुशासन का प्रतीक बताते रहे. यह एक बड़ी भूल की तरह रही. एक तरीके से नीतीश खुद को ही कटघरे में खड़े करते रहे. बिहार को फिर से कुशासन की ओर जाने की बात करते रहे और जनता के बीच यह संदेश जाता रहा कि यह उन्हीं की वजह से हो रहा है. ना वे  मांझी का प्रयोग करते और ना ऐसा होता.

बीते लोकसभा में नीतीश कुमार को दोहरा झटका लगा. भाजपा की भारी जीत हुई. हाशिये की ओर बढ़ चले लालू भी नीतीश की पार्टी से ज्यादा बढ़त बनाने में सफल हुए. वे नए दुश्मन से भी हारे और पुराने दुश्मन से भी

दूसरी ओर मांझी इस बात का प्रचार करते रहे, जो बहुत स्वाभाविक भी था कि एक दलित को कुर्सी पर बैठाकर नीतीश फिर से सत्तासीन होने के लिए ऐसे आरोप लगा रहे हैं. दलित का अपमान कर रहे हैं. वे उन्हें कठपुतली बनाकर रखना चाहते थे. मांझी लगातार आक्रामक होते रहे और नीतीश लगातार अपने लोगों से उन पर वाक प्रहार करवाते रहे. कभी नीतीश के दल के अनंत कुमार ने मांझी को पागल करार दिया तो कभी किसी दूसरे ने भस्मासुर की उपाधि दे दी. ऐसा करके नीतीश एक ऐसी भूल करती रहे, जिसका हिसाब-किताब शायद बहुत जल्दी चुकता नहीं होने वाला, इस विधानसभा में जीत हासिल करने के बाद भी. मांझी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाने, फिर हटाने और उसके पहले जदयू नेताओं ने जिस तरह से मांझी की फजीहत की, उसमें भाजपा की भूमिका होते हुए भी नीतीश की गरिमा कम हुई. यह माना गया कि दरअसल नीतीश ने तब जिस कुर्सी का त्याग किया था वह नैतिक जिम्मेदारी नहीं बल्कि मोदी की हार से व्यक्तिगत अहंकार और भ्रम के टूटने का फौरी असर था. साथ ही मांझी को मुख्यमंत्री बनाकर वे किसी दलित को सत्ता के शीर्ष पर उभरने का मौका नहीं दे रहे थे बल्कि एक बेहतर कठपुतली चाहते थे.

बेशक तब नीतीश की मजबूरी थी, क्योंकि अगर वे मांझी को सत्ता से नहीं हटाते तो भाजपा राज्य में राष्ट्रपति शासन की स्थिति पैदा करवाती और फिर विधानसभा चुनाव में अपने अनुकूल माहौल तैयार करती. फिलहाल मांझी भाजपा के साथ गठजोड़ कर चुके हैं. कल को उनका कितना असर होगा, अभी कहना मुश्किल है. लेकिन यह तय है कि नीतीश कुमार की गिनती अब सदा-सदा कांग्रेसी परंपरा वाले उन नेतृत्वकर्ताओं की श्रृंखला में होगी, जिन्होंने समय-समय पर दलित नेतृत्व को कठपुतली की तरह शीर्ष पर बैठाकर इस्तेमाल करने की कोशिश की. मांझी कल को क्या कर पाएंगे, कहना कठिन है. वे चुनाव में दलितों का कितना वोट अपने, भाजपा या गंठबंधन की ओर पक्ष में करवा पाएंगे, यह अनुमान लगाना मुश्किल है. लेकिन मांझी प्रकरण से संभावनाओं के एक नए द्वार बिहार की राजनीति मे भी खुले हैं.

राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार मणि कहते हैं, ‘बिहार की सियासत अब उत्तर प्रदेश की राह पर आ चुकी है. दलित और पिछड़ों की राजनीति अलग होगी. आज दस्तक पड़ी है, कल इसका असर दिखेगा. जब ऐसा होगा तो नीतीश कुमार को इसलिए भी याद किया जाएगा कि उन्होंने सामाजिक न्याय की राजनीति तो की लेकिन जाने-अनजाने पिछड़ों तक ही राजनीतिक नेतृत्व को समेटे रखने में ऊर्जा लगाए रहे. नीतीश कुमार कहते हैं, मांझी विभीषण साबित हुए, पीठ में खंझर भोका. उधर, मांझी कह रहे हैं, लालू को हटाने के लिए नीतीश टीम बनाकर भाजपा की गोदी में बैठ गए थे और वर्षों सत्ता सुख भोगा तो वह सही और मैं गलत!’

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अकेले नहीं आते बाढ़ और अकाल

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आज से कोई सौ बरस पुरानी घटना है. वह घटना यदि घटी न होती तो शायद हम आज यहां एकत्र भी न हो पाते. सन 1910 का किस्सा है. राजेंद्र बाबू तब कलकत्ता में वकालत पढ़ रहे थे. यहां एक दिन उन्हें उस दौर के प्रसिद्ध बैरिस्टर परमेश्वर लाल ने बुलाया था. वे कुछ समय पहले ही गोखलेजी से मिले थे. बातचीत में गोखलेजी ने उनसे कहा था कि वे यहां के दो-चार होनहार छात्रों से मिलना चाहते हैं. परमेश्वर जी ने सहज ही राजेंद्र बाबू का नाम सुझा दिया था.

राजेंद्र बाबू गोखलेजी से मिलने गए, अपने एक मित्र श्रीकृष्ण प्रसाद के साथ. सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसायटी की स्थापना अभी कुछ ही दिन पहले हुई थी. गोखलेजी उस काम के लिए हर जगह कुछ अच्छे युवकों की तलाश में थे. उन्हें यह जानकारी परमेश्वरजी से मिल गई थी कि वे बड़े शानदार विद्यार्थी हैं. वकालत उन दिनों ऐसा पेशा था जो प्रतिष्ठा और पैसा एक साथ देने लगा था. इस धंधे में सरस्वती और लक्ष्मी जुड़वां बहनों की तरह आ मिलती थीं.

कोई डेढ़ घंटे चली इस पहली ही मुलाकात में राजेंद्र बाबू से श्री गोखले ने सारी बातों के बाद आखिर में कहा था, ‘हो सकता है तुम्हारी वकालत खूब चल निकले. बहुत रुपये तुम पैदा कर सको. बहुत आराम से ऐश-इशरत में दिन बिताओ. बड़ी कोठी, घोड़ा-गाड़ी इत्यादि दिखावट का सामान सब जुट जाए. और चूंकि तुम पढ़ने में अच्छे हो तो तुम पर यह दबाव और भी अधिक है.’

गोखलेजी थोड़ा रुक गए थे. कुछ क्षणों के उस सन्नाटे में भी राजेंद्र बाबू के मन में न जाने कितनी उथल पुथल मची होगी. वे फिर बोलने लगे ‘मेरे सामने भी यही सवाल आया था, ऐसी ही उमर में. मैं भी एक साधारण गरीब घर का बेटा था. घर के लोगों को मुझसे बहुत बड़ी-बड़ी उम्मीदें थीं. उन्हें लगता था कि मैं पढ़कर तैयार हो जाऊंगा, रुपये कमाऊंगा अौर सबको सुखी बना सकूंगा. पर मैंने उन सबकी आशाओं पर पानी फेरकर देशसेवा का व्रत ले लिया. मेरे भाई इतने दुखी हुए कि कुछ दिनों तक तो वे मुझसे बोले तक नहीं. हो सकता है यही सब तुम्हारे साथ भी हो. पर विश्वास रखना कि सब लोग अंत में तुम्हारी पूजा करने लगेंगे.’ श्री गोखले के मुख से मानों एक आकाशवाणी सी हुई थी.

बाद का किस्सा लंबा है. लंबी है राजेंद्र बाबू के मन में कई दिनों तक चले संघर्ष की कहानी औैर घर में मचे कोहराम की, रोने धोने की, बेटे के साधू बन जाने की आशंका की. यह घटना नहीं हुई होती तो आज आकाशवाणी के इस कार्यक्रम के निमित्त आदरणीय राजेंद्र प्रसाद जी की पावन स्मृति में उनको प्रणाम करने का सौभाग्य हमें नहीं मिल पाता.

इस किस्से से ऐसा न मान लें हम लोग कि वे अगले ही दिन अपना सब कुछ छोड़कर देशसेवा में उतर पड़े थे. श्री गोखले खुद बड़े उदार थे. उन्होंने उस दिन कहा था कि ‘ठीक इसी समय उत्तर देना जरूरी नहीं है. सवाल गहरा है. फिर भी एक बार और मिलेंगे, तब अपनी राय बताना.’

अगले दस बारह दिनों का वर्णन नहीं किया जा सकता. भाई साथ ही रहते थे. इनके व्यवहार में आ रहे बदलाव वे देख ही रहे थे. राजेंद्र बाबू ने कोर्ट जाना बंद कर दिया था. न ठीक से खाते पीते, न किसी से मिलते जुलते थे. फिर एक दिन हिम्मत जुटाई. एक पत्र, काफी बड़ा पत्र, भाई को लिखा और घर छोड़ने की आज्ञा मांगी. पत्र तो लिख दिया पर सीधे उन्हें देते नहीं बना. सो एक शाम जब भाई टहलने के लिए गए थे, तब उसे उनके बिस्तरे पर रख खुद भी बाहर टहलने चले गए.

भाई ने लौटकर पत्र देखा, और अब वे खुद राजेंद्र बाबू को तलाशने लगे. जब वे बाहर कहीं मिल गए तो भाई बुरी तरह से लिपटकर रोने लगे. राजेंद्र बाबू भी अपने को रोक नहीं पाए. दोनों फूट-फूट कर रोते रहे. ज्यादा बातचीत की हिम्मत नहीं थी फिर भी तय हुआ कि कलकत्ता से गांव जाना चाहिए. मां, चाची और बहन को सब बताना होगा.

राजेंद्र बाबू को अब लग गया था कि देश प्रेम और घर प्रेम में घर का वजन ज्यादा भारी पड़ रहा है. वे इतनी आसानी से इस प्रेम बंधन को काट नहीं पाएंगे. गोखलेजी अभी वहीं थे. राजेंद्र बाबू एक बार और उनसे भेंट करने गए. सारी परिस्थिति बताई. गोखलेजी ने भी उन्हें पाने की आशा छोड़ दी.

‘रेल लाइनों के कारण बाढ़ की भयंकरता बढ़ जाती है. मेरा यह दृढ विचार है कि रेलवे लाइन और दूसरी ऊंची-ऊंची सड़कें बाढ़ के प्रमुख कारण हैं’

गांव पहुंचने का किस्सा तो और भी विचित्र है. चारों तरफ रोना-धोना. बची खुची हिम्मत भी टूट गई थी. जैसे थे वैसे ही बन गए. फिर से लगा कि पुरानी जिंदगी पटरी पर वापस आने लगी है.

पर उस दिन जो आकाशवाणी हुई थी, वह झूठी कैसे पड़ती? यही वकालत उन्हें आने वाले दिनों में, पांच-छह बरस के बाद चंपारण ले गई. वहां उन पर, उनके जीवन पर नील का रंग चढ़ा. नील का रंग यानी गांधी जी के चंपारण आंदोलन का रंग. यह रंग इतना चोखा चढ़ा कि वह फिर कभी उतरा ही नहीं.

गांधी रंग में रंगे राजेंद्र बाबू फिर बिना किसी पद की इच्छा के देश भर घूमते रहे और सार्वजनिक जीवन के क्षेत्र में जितनी तरह की समस्याएं आती हैं उनके हल के लिए अपने पूरे मन के साथ तन अर्पित करते रहे और जहां जरूरत दिखी वहां धन भी जुटाते-बांटते रहे. उन समस्याओं की, उन विषयों की गिनती गिनाना कठिन काम है. आज तो हम दो विषयों पर, दो समस्याओं पर ही कुछ बातें करेंगे. ये हैं बाढ़ और अकाल. पानी के स्वभाव के ये दो छोर हैं. एक में, बाढ़ में चारों तरफ पानी ही पानी और दूसरे में हर कहीं पानी का अभाव ही अभाव. राजेंद्र बाबू ने इनमें से जो भी समस्या सामने आई, बाकी हाथ के कामों को गौण मानकर सबसे पहले इन्हीं पर ध्यान दिया. लेकिन इसके विस्तार में जाने से पहले हम जरा आज का संदर्भ भी दुहरा लें.

चुनाव के दिनों में हम देखते हैं किसी को किसी राजनीतिक दल ने अपना उम्मीदवार नहीं बनाया तो उसने गुस्से में आकर दल छोड़ दिया. किसी ने निराश होकर आत्महत्या कर ली तो किसी ने उस दल की ऐसी बखिया उधेड़ दी, इतने सारे दोष अवगुण गिना डाले कि सुनने पढ़ने वाले को अचरज होने लगे कि ये अब तक उस दमघोटू संसार में सांस कैसे ले रहे थे. इसके पीछे एक धारणा यह बन गई है कि मुझे कोई पद नहीं मिलेगा तो देश की सेवा कैसे हो पाएगी मुझसे.

इस विचित्र धारणा को पालने पोसने और आगे बढ़ाने में सारे दल उनके सदस्य धर्म, लिंग, जाति, अगड़े, पिछड़े सभी में गजब की सहमति दिखती है. ऐसे में हमें राजेंद्र बाबू के कुछ विचार आज एक फिर दुहरा लेने चाहिए.

यह प्रसंग आज से कोई 93 बरस पहले का है. नवंबर का महीना था. अवसर था कौंसिल और असेम्बली के चुनाव का. छोटी-छोटी बातों पर तब के बड़े-बड़े नामों तक में मतभेद ही नहीं, मनभेद के भी कड़वे किस्से सामने आने लगे थे. क्या ऐसी ही नींव पर, कमजोर नींव पर आजादी के बाद की दलगत राजनीति का महल नहीं बन रहा था.

राजेंद्र बाबू ने उस समय अपना मन मजबूत कर ‘देश’ नामक अखबार में एक लेख लिखा था. उन्हें उन्हीं के साथियों ने पसंद नहीं किया था. उन्हीं के शब्दों को यहां दुहरा लेना चाहिए ‘जब देश के स्थान पर हम किसी जाति विशेष अथवा धर्म विशेष अथवा दल विशेष को बिठाना चाहते हैं, तब इस तरह की लड़ाई हुए बिना नहीं रह सकती.’

‘देश सेवकों के लिए एक ही रास्ता है कि कम से कम तब तक जब तक देश पूर्णरूपेण स्वतंत्र नहीं हो जाता, वे किसी स्थान, पद अथवा प्रतिष्ठान के लिए लालायित न हों और केवल सेवा को ही ध्येय बनाकर काम करते जाएं.’

इस लेख में वे आगे लिखते हैं ‘मैं इसको प्रवंचना मात्र मानता हूं, जब कोई यह सोचता और कहता है कि सेवा करने के लिए उसे किसी पद विशेष की आवश्यकता है तथा उस पद के बिना वह सेवा नहीं ही कर सकता.’

इस ऐतिहासिक लेख के अंत में वे कहते हैं, ‘सेवक के लिए हमेशा जगह खाली पड़ी रहती है. उम्मीदवारों की भीड़ सेवा के लिए नहीं हुआ करती. भीड़ तो सेवा के फल के बंटवारे के लिए लगा करती है. जिसका ध्येय केवल सेवा है, सेवा का फल नहीं है, उसको इस धक्का-मुक्की में जाने की और इस होड़ में पड़ने की जरूरत नहीं है.’

जमीन पर यह सब हो रहा था और उधर आसमान से भी एक भयानक विपत्ति उतर आई थी. आश्विन के महीने में बिहार के छपरा जिले में एक दिन घोर बरसात हुई. चौबीस घंटों में लगभग छत्तीस इंच वर्षा हुई. नतीजा यह हुआ कि पूरा जिला भयानक बाढ़ में डूब गया. वहां के सरकारी कर्मचारियों ने लोगों की इस मुसीबत में बहुत उदासीनता और उपेक्षा का भाव दिखाया. तब आज की तरह ढेर सारे अखबार, दिन रात निरर्थक खबरें बहाने वाले ढेर सारे टेलीविजन चैनल तो थे नहीं, पर जो भी थोड़े से अखबार छपते थे, सभी ने यह बात लिखी कि जब लोग, घर, गांव, खेत, मवेशी पानी में डूब रहे थे, त्राहि-त्राहि पुकार रहे थे, ऐसे में कुछ अधिकारी कर्मचारी नावों में चढ़कर ‘झिरझिरी’ खेल रहे थे.

झिरझिरी एक तरह से लुकाछिपी का खेल होता है. डूबते लोगों को, यहां तक कि सि्त्रयों और बच्चों को भी बचाने में इन अधिकारियों ने कोई मदद नहीं की. लोग डूबते रहे, प्रशासन लुकाछिपी ही खेलता रहा. ऐसी भयंकर परिस्थिति में एक अंग्रेज न्यायाधीश और एक भारतीय उप न्यायाधीश ने खूब मदद की लोगों की. राजेंद्र बाबू जैसे शालीन व्यक्ति अपनी आत्मकथा में उस दिन का वर्णन करते हुए कहते हैं कि कलेक्टर और पुलिस के अफसर तथा डिप्टी मजिस्ट्रेट ‘टस से मस’ नहीं हुए. सरकार के ऐसे घृणित व्यवहार को लेकर अगले दिन बाढ़ के पानी के बीच ही छपरा में एक विशाल सार्वजनिक सभा हुई और उसमें सरकार की खुलेआम निंदा की गई और साथ ही मदद देने आगे आए लोगों की खूब प्रशंसा भी हुई और उनके प्रति कृतज्ञता भी प्रकट की गई थी.

देहातों का हाल तो और भी बुरा था. उन दिनों छपरा से मशरक तक जाने वाली रेल लाइन के कारण बाढ़ का सारा पानी आगे बहने के बदले एक बड़े भाग में फैल गया था और पीछे से आने वाली विशाल धारा उसका स्तर लगातार उठाते जा रही थी. लोगों को इससे बचने का एक ही रास्ता दिखा था रेलवे लाइन काट देना और चढ़ते पानी को आगे के भूभाग में फैलने देना ताकि यहां कुछ सांस ली जा सके. पर कलेक्टर ने उनकी एक न सुनी. और तो और ऐसी ही तबाही मचा रही अन्य रेलवे लाइनों पर सशस्त्र पहरा बिठा दिया गया था. सीवान के पास एक ऐसी ही जगह बहुत पानी जमा हो गया था. गांव वालों ने तब खुद ही रेल लाइन काटना तय कर लिया पर सामने सशस्त्र पुलिस देख उनकी हिम्मत न पड़ी.

राजेंद्र बाबू इसका वर्णन करते हुए लिखते हैं ‘कष्ट सहते गए लोग. पर जब वह बर्दाश्त से बाहर हो गया तो दो चार आदमी कंधे पर कुदाल रखकर पानी में तैरते हुए रेल लाइन की तरफ बढ़े. पुलिस ने उन्हे देखा और उनको धमकाया. उन्होंने जवाब दिया कि पानी में डूबकर तो हम मर ही रहे हैं और तुम लाइन काटने नहीं देते. अब तक हमने बर्दाश्त किया. अब और बर्दाश्त नहीं कर सकते. मरना तो दोनों हालातों में है डूब कर मरें या गोली खाकर मरें. हमने निश्चय कर लिया है कि गोली खाकर मरना बेहतर है. हम लाइन काटेंगे तुब गोली मारो.’

बहते पानी में यह बहादुर लोग तैरते हुए मजबूत बांध की तरह उठी उस रेल लाइन पर अपने दृढ़ निश्चय से कुदाल चलाते गए. पुलिस की हिम्मत नहीं हुई गोली चलाने की. लाइन अभी थोड़ी सी ही कट पाई थी कि पीछे भर रहे पानी की ताकत ने लोगों के संकल्प में साथ दिया और लाइन भड़ाक से टूटी और विशाल बाढ़ का पानी उसे किसी तिनके की तरह अपने साथ न जाने कहां बहा ले गया. पीछे के अनेक गांव पूरी तरह से डूबने से बच गए थे. बाद में पुलिसवालों ने भी रिपोर्ट में लिखा कि बाढ़ के पाने के दबाव से ही रेल लाइन कट गई थी.

इस सारी विपत्ति में राजेंद्र बाबू और वे जिस दल से जुड़े थे उसके अनगिनत कार्यकर्ताओं ने दिनभर काम किया था. छपरा की उस बाढ़ में किसी बड़े अधिकारी ने यहां तक कह दिया था कि ये सारी शिकायतें लेकर मेरे पास क्यों आए हो, जाओ जाओ गांधी के पास जाओ. और गांधी मतलब कांग्रेस के लोग, और उसमें भी राजेंद्र बाबू होता था.

इन सब दुखद प्रसंगों से राजेंद्र बाबू ने देखा था कि बाढ़ और साथ ही अकाल अकेले नहीं आते. इससे पहले समाज में और भी बहुत कुछ ऐसा होता है जो होना नहीं चाहिए. यह सब कभी धीरे-धीरे तो कभी बड़ी तेजी से होता है. गति जो भी हो, समाज के नीति निर्धारकों, संचालकों और नेतृत्व का ध्यान इन बातों की तरफ नहीं जा पाता और फिर बाढ़ या अकाल सामने आ खड़ा हो जाता है.

बुरे कामों की बाढ़ आ जाती है. बिना पानी का स्वभाव समझे ही विकास के नाम पर कई तरह के काम होते रहते हैं. यह किसी एक कालखंड की बात नहीं है. दुर्भाग्य से सब समय में ऐसी ही गलतियां दुहराई जाती रहती हैं. तो एक तरफ प्रकृति, पर्यावरण के खिलाफ ले जानेवाले कामों की बाढ़ आ जाती है तो दूसरी तरफ अच्छे कामों का अकाल पड़ने लगता है. अच्छे विचारों का अकाल पड़ने लगता है.

राजेंद्र बाबू के जमाने में उन इलाकों में अंग्रेजों की व्यापारिक नीतियों या कहें अनीतियों के कारण बड़ी तेजी से रेल की लाइनें बिछाई गई थीं. रेल लाइन उनके व्यापार और शासन के लिए भी बड़ी खास चीज बन गई थी. इसलिए उसे आसपास की जमीन से ऊंचा उठाकर रखना जरूरी था. आज लोग इस बात को भूल चुके हैं कि कभी हमारे देश में फैल रहा रेल व्यवस्था का यह जाल अंग्रेज सरकार के हाथों में नहीं था. वह कुछ निजी अंग्रेजी कंपनियों की जेब में था.

खुद राजेंद्र बाबू अपनी आत्मकथा में इस दुखद प्रसंग में लिखते हैं, ‘रेल लाइनों के कारण बाढ़ की भयंकरता बढ़ जाती है. अपने सूबे में पिछले तीस बरसों में जितनी बड़ी और भयंकर बाढ़ें आईं हैं सबका मुझे काफी अनुभव है. मेरा यह दृढ़ विचार है कि रेलवे लाइन और डिस्ट्रिक बोर्ड की तथा दूसरी ऊंची सड़कें बाढ़ के प्रमुख कारण हैं. यदि इनमें जगह-जगह काफी संख्या में चौड़े पुल बने रहते तो हालत ऐसी न होती… पर यहां तो रेल की कंपनियों के मुनाफे पर ही अधिक ध्यान रखा जाता है. उनको पुल बनवाने के लिए मजबूर नहीं किया जाता, लाइन काटना तो दूर की बात है… बीएडब्ल्यू रेलवे ने इस मामले में बहुत कंजूसपन दिखलाया है. यद्यपि अब उसमें कई जगह पुल बने हैं. तथापि अब भी बहुत से ऐसे स्थान है, जहां पुल की जरूरत है. उसने जो पुल बनवाए हैं, वे जनता के कष्ट दूर करने के ख्याल से नहीं, अपने मुनाफे के ख्याल से, क्योंकि जब तक केवल जनता के कष्ट की बात रही, एक न सुनी गई, पर जब प्रकृति ने लाइन को इस तरह तोड़ा कि महीनों रेल चलनी बंद हो गई तो उसने मजबूरन कई पुल बनवा दिए.’

कहीं कम कहीं ज्यादा, वर्षा हर जगह होती है, विभिन्न जगहों में रहने वाले समाज ने अपने वर्षों के अनुभव से इसके साथ अपना तालमेल बिठा लिया था

सन 1937 तक आते-आते तो उस बड़े भूभाग की हालत ऐसी हो गई थी कि बिहार के राज्यपाल ने उस वर्ष बाढ़ की समस्या को लेकर एक बड़ा सम्मेलन पटना में बुलाया था. इसमे राजेंद्र बाबू को भी भाग लेने का निमंत्रण भेजा गया था. खुद राज्यपाल ने अपने मुख्य भाषण में बाढ़ के आने के जो कई कारण बताए जाते हैं, प्रकृति के विरुद्ध जाने के जो अनेक बुरे काम किए जाते हैं, उन सबका वर्णन करते हुए श्रोताओं से माफी तक मांगी थी कि उनके भाषण का एक बड़ा भाग सकात्मक होने के बदले काफी कुछ नकारात्मक सा हो गया था.

राजेंद्र बाबू अचानक अस्वस्थ हो गए थे. वे उस सम्मेलन में भाग नहीं ले पाए थे, लेकिन उन्होंने इस विषय पर एक बड़ी टिप्पणी लिखकर भेजी थी. सम्मेलन में इसे उस दिन श्री अनुग्रह नारायण सिन्हाजी ने पढ़कर सुनाया था.

वर्षा तो हर साल होती ही है पूरे देश में. कहीं कम कहीं ज्यादा, कहीं बहुत ज्यादा भी पर इन विभिन्न जगहों में रहने वाले समाज ने अपने वर्षों के अनुभव से इस कम ज्यादा वर्षा के साथ अपना जीवन कैसे ढालना है- यह ठीक से सीख लिया था.

एक तरफ तो है जैसलमेर, जहां वर्षा का आंकड़ा इंचों में बात करें तो वर्षभर में मात्र 6 इंच से ऊपर नहीं जाता, तो दूसरी तरफ हमने देखा कि बिहार के छपरा में मात्र एक दिन में 36 इंच वर्षा हो गई थी. फिर उत्तर पूर्व में हमारे एक प्रदेश का तो नाम ही मेघों का घर रखा गया है. इन सभी जगह के समाजों ने पीढ़ियों के अनुभव से अपने आसपास के मौसम, धरती, हवा, पेड़-पौधे और वहां के पशुओं के साथ आत्मीय संबंध बना लिए थे.

आज हम देखते हैं कि जलनीतियां बनाई जाने लगी हैं. पहले ऐसा नहीं होता था. समाज अपना एक जलदर्शन बनाता था और उसे कागज पर न छापकर लोगों के मन में उकेर देता था. समाज के सदस्य उसे अपने जीवन की रीत बना लेते थे. फिर यह रीत आसानी से टूटती नहीं थी. जलनीतियां आती जाती सरकारों के साथ बनती बिगड़ती रहती हैं पर जलदर्शन बदलता नहीं. इसी रीत से उस क्षेत्र विशेष की फसलें किसान समाज तय कर लेता था. सिंचाई के लिए अपने साधन जुटा लेता था.

अभी हमने जैसा बिहार के संदर्भ में देखा कि अंग्रेजों ने बिना उस इलाके को समझे रेल की पटरियां खूब ऊंची उठाकर बिछा दीं और गंगा और अन्य नदियों के विशाल मैदान को जगह-जगह रोक लिया. उस बड़े भूभाग में पानी की बेरोकटोक आवक जावक के लिए उसने समुचित प्रबंध भी नहीं सोचा, उसे करने की बात तो कौन कहे. रेल लाइन में कितने अंतर पर बड़ी-बड़ी पुलिया बननी चाहिए इस पर उसने ध्यान नहीं दिया, कम खर्च में ज्यादा मुनाफा खींच लेने का काम किया और बाद में पता चला कि यह तो उनकी अपनी भाषा अंग्रेजी की कहावत की तरह परिणाम दे रहा है. कहावत है ‘पैनी वाईज, पाउंड फुलिश.’ पैसा बचाने में होशियारी की, रुपया गंवा बैठे.

जब अंग्रेज हमारे यहां आए थे तो हमारे देश में कोई सिंचाई विभाग नहीं था. कोई इंजीनियर नहीं था, इंजीनियरिंग की पढ़ाई नहीं थी, वैसी शिक्षा देने वाला कोई विद्यालय, महाविद्यालय तक नहीं था. सिंचाई की शिक्षा नहीं थी पर सिंचाई का शिक्षण हर जगह था और समाज उस शिक्षण को अपने मन में संजोकर रखता था और उस शिक्षण को अपनी जमीन पर उतारता था. जब अंग्रेज यहां आए थे- एक बार फिर दुहरा लें तब हमारे यहां एक भी सिविल इंजीनियर नहीं था पर सचमुच कश्मीर से कन्याकुमारी तक, पश्चिम से पूरब तक कोई 25 लाख छोटे-बड़े तालाब थे. इनमें से भी ज्यादा संख्या में जमीन का स्वभाव देखकर अनगिनत कुएं बनाए गए थे. वर्षा का पानी तालाबों में कैसे आएगा, किस तरह के क्षेत्र से, यहां वहां से बहता आएगा. उसका आगौर अनुभवी आंखों से नाम लिया जाता था. फिर यह पानी साल भर कैसे पीने का पानी जुटाएगा और किस तरह की फसलों को जीवन देगा. इस सबकी बारीक योजना कहीं सैकड़ों मील दूर बैठे लोग नहीं बनाते थे, वहीं बसे लोग उस क्षेत्र में अपना बसना सार्थक करते थे. यह परंपरा आज भी पूरी तरह से टूटी नहीं है, हां उसकी प्रतिष्ठा जरूर गिर गई है, नए पढ़े लिखे समाज के मन में. पर हमारे इस पढ़े लिखे समाज को आज यह जानकर अचरज होगा कि हमारे देश की तकनीकी शिक्षा, सिविल इंजीनियरिंग की सारी आधुनिक शिक्षा की नींव में ये अनपढ़ माना गया, अनपढ़ बता दिया गया समाज ही प्रमुख था. आज बहुत कम लोग यह बता पाएंगे कि हमारे देश में पहला इंजीनियरिंग काॅलेज कहां और कब खुला था. इसे संक्षेप में दुहरा लेना चाहिए.

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अकेले नहीं आते बाढ़ और अकाल

देश का पहला इंजीनियरिंग कॉलेज खुला था हरिद्वार के पास रुड़की नामक एक छोटे से गांव में. और सन था 1847. तब ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था. ब्रितानी सरकार भी नहीं आई थी. कंपनी का घोषित लक्ष्य देश में व्यापार था. प्रशासन या लोक कल्याण नहीं. व्यापार भी शिष्ट शब्द है. कंपनी तो लूटने के लिए ही बनी थी. ऐसे में ईस्ट इंडिया कंपनी देश में उच्च शिक्षा के झंडे भला क्यों गाड़ती. वह किस्सा लंबा है. आज उसे यहां पूरा बताना जरूरी नहीं. पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि उस दौर में आज के पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यह भाग एक भयानक अकाल से गुजर रहा था. अकाल का एक कारण था वर्षा का कम होना. पर अच्छे कामों और अच्छे विचारों का अकाल पहले ही आ चुका था और इसके पीछे एक बड़ा कारण था ईस्ट इंडिया कंपनी की अनीतियां.

सौभाग्य से उस क्षेत्र में, तब उसे नाॅर्थ वेस्टर्न प्रॉविंसेस कहा जाता था, एक बड़े ही सहृदय अंग्रेज अधिकारी काम कर रहे थे. ऊंचे पद पर थेे. वे वहां के उपराज्यपाल थे. नाम था उनका जेम्स थॉमसन. लोगों को अकाल में मरते देख उनसे रहा नहीं गया. उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशकों को एक पत्र लिखकर इस क्षेत्र में एक बड़ी नहर बनाने का प्रस्ताव रखा था. ऊपर से उस पत्र का कोई जवाब तक नहीं आया. शायद पत्र मिलने की सूचना, पहुंच तक नहीं आई. थॉमसन ने फिर एक पत्र लिखा. इस बार फिर वही हुआ. कोई जवाब नहीं.

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तब जेम्स थॉमसन ने तीसरे पत्र में अपनी योजना में पानी और अकाल, लोगों के कष्टों के बदले व्यापार की, मुनाफे की चमक डाली. उन्होंने हिसाब लिखा कि इससे इतने रुपये लगाने से इतने ज्यादा रुपये सिंचाई के कर की तरह मिल जाएंगे. ईस्ट इंडिया कंपनी की आंखों में चमक आ गई. मुनाफा मिलेगा तो ठीक. बनाओ. पर बनाएगा कौन? कोई इंजीनियर तो है नहीं कंपनी के पास. थॉमसन ने कंपनी को आश्वस्त किया था कि यहां गांवों के लोग इसे बना लेंगे. कोई ऐरी गैरी छोटी मोटी योजना नहीं थी यह. हरिद्वार के पास गंगा से एक नहर निकाल कर उसे कोई 200 किलोमीटर तक के इलाके में फैलाना था. यह न सिर्फ अपने देश की एक पहली बड़ी सिंचाई योजना थी, कई अन्य देशों में भी उस समय ऐसा कोई काम नहीं हुआ था.

विस्तृत योजना का विस्तार से वर्णन यहां नहीं करना है. बस इतना ही बताना है कि वह योजना खूब अच्छे ढंग से पूरी हुई. तब थॉमसन ने कंपनी से इसकी सफलता को देखते हुए इस क्षेत्र में इसी नहर के किनारे रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज खोलने का भी प्रस्ताव रखा. इसे भी मान लिया गया क्योंकि थॉमसन ने इस प्रस्ताव में भी बड़ी कुशलता के साथ कंपनी को याद दिलाया था कि इस कॉलेज से निकले छात्र बाद में आपके साम्राज्य का विस्तार करने में मददगार होंगे.

यह था सन 1847 में बना देश का पहला इंजीनियरिंग कॉलेज. देश का ही नहीं, एशिया का भी यह पहला कॉलेज था, इस विषय को पढ़ाने वाला. और आगे बढ़ें तो यह भी जानने लायक तथ्य है कि तब इंग्लैंड में भी इस तरह का कोई कॉलेज नहीं था. रुड़की के इस कॉलेज में कुछ साल बाद इंग्लैंड से भी छात्रों का एक दल पढ़ने के लिए भेजा गया था.

तो इस कॉलेज की नींव में हमारा अनपढ़ बता दिया गया समाज मजबूती से सिर उठाए खड़ा है. वह तब भी नहीं दिखा था अन्य लोगों को और आज तो हम उसे पिछड़ा बताकर उसके विकास की बहुविध कोशिश में लगे हैं. इस प्रसंग के अंत में यह भी बता देना चाहिए कि सन 1847 में कॉलेज खुलने से पहले वहां बनी वह लंबी नहर आज भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेतों में गंगा का पानी सिंचाई के लिए वितरित करती जा रही है. आज रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज को शासन ने और ऊंचा दर्जा देकर उसे आईआईटी रुड़की बना दिया है.

कॉलेज का दर्जा तो उठा है पर दुर्भाग्य से कॉलेज जिन लोगों के कारण बना, जिनके कारण वह विशाल सिंचाई योजना जमीन पर उतरी, जिन लोगों ने अंग्रेजों के आने से पहले देश में देश के मैदानी भागों में, पहाड़ों में, रेगिस्तान में, देश के तटवर्ती क्षेत्रों में जल दर्शन का सुंदर संयोजन किया था वे लोग आज कहीं पीछे फेंक दिये गए हैं.

कश्मीर से कन्याकुमारी तक, पश्चिम से पूरब तक 25 लाख छोटे बड़े तालाब थे. इनमें से भी ज्यादा संख्या में जमीन का स्वभाव देखकर कुएं बनाए गए थे

देश ने कई मामलों में खूब उन्नति की है, इसमें कोई शक नहीं है, लेकिन बेशक इतना तो जोड़ना ही पड़ेगा कि इसी दौर में देश में सबसे सस्ती कार बिकने आई थी और सबसे महंगी दाल भी तथा देश के आधे भाग में भयानक अकाल भी पड़ा था. पानी तो गिरता ही है. कभी कम तो कभी ज्यादा. औसत का एक आंकड़ा हम पिछले सौ-पचास साल से भले ही रखने लगे हों, यह बहुत काम नहीं आता. गणित के दम पर आंकड़ों के दम पर जीवन नहीं चल पाता.

आधुनिक बांधों से भी अकाल दूर हो गए हों- आज भी ऐसा पक्के तौर पर नहीं कह सकते. पंजाब, हरियाणा में, देश के अन्य भागों में, महाराष्ट्र में भयानक अकाल पड़ा था. पूर्व कृषिमंत्री शरद पवार इसी प्रदेश से हैं और उन्होंने ही अपने एक बयान में कहा था कि उन्होंने अपने जीवन में महाराष्ट्र सा भयानक अकाल पहले कभी नहीं देखा था. इसलिए बड़े बांधों से बंध जाना ठीक नहीं है. उन बांधों में भी पानी तो तभी भरेगा जब ठीक वर्षा होगी.पर प्रकृति ठीक नहीं, ठीक ठाक वर्षा करती है. वह मां है हमारी, लेकिन मदर डेयरी की मशीन नहीं कि जितने टोकन डालो, ठीक उतना ही पानी गिरा देगी. एक तरफ हम बड़े बांधों से बंध गए और दूसरी तरफ नई तकनीक से भूजल को बाहर उलीज लेने के लिए नए साधन खोज निकाले हैं. शहरों, गांवों में छलनी की तरह छेदकर डाले हमने और सचमुच मिट्टी की विशाल गुल्लक में पड़ी इस विशाल जलराशि को ऊपर खींच निकाला. उसमें डाला कुछ नहीं इस तरह यह धरती की गुल्लक ही खाली हो चली है. भूजल भंडार में आई गिरावट को बताने के लिए यों तो जिलावार, प्रदेशवार आंकड़े भी दिए जा सकते हैं पर जब जीवन का प्राणदायी रस ही निचुड़ता जा रहा हो तो नीरस आंकड़े नया और क्या बता पाएंगे. फिर भी बिना किसी कटुता के यह तो कहा ही जा सकता है कि इस दौर में हमारी राजनीति ज्यादा गिरी है कि भूजल, यह तय कर पाना कठिन है. इन दोनों का स्तर ऊपर उठना होगा.

पिछले कुछ समय से एक नया शब्द हमारे बीच आया है, जन-भागीदारी. जैसा अक्सर होता है ऐसे शब्द पहले अंग्रेजी में आते है, फिर हम बिना ज्यादा सोचे समझे उनका अपनी भाषा में अनुवाद कर लेते है. पर जब यह शब्द नहीं था, यह नकली शब्द नहीं था तब हमारे समाज में पानी के मामले में गजब की भागीदारी थी. उस जन-भागीदारी में सचमुच तीन भूमिकाएं होती थीं. लोग खुद अपने गांव में शहर में पानी की योजना बनाते. यह हुई पहली भूमिका. फिर उस योजना को अमल में उतारते थे, तालाब नहर, कुएं आदि बनाते थे. यह थी दूसरी भूमिका. और तीसरी भूमिका में इन बन चुनी योजनाओं के रखरखाव की जिम्मेदारी भी स्वयं ही उठाते थे. वह भी कोई दो चार बरस के लिए नहीं बल्कि दो चार पीढ़ी तक उसका रखरखाव करते थे. उसे अपना काम मानकर करते थे. ऐसे में कहीं-कहीं समाज राज की भागीदारी भी कबूल कर लेता था. एक तरह से देखा जाए तो राज और समाज परस्पर तालमेल बिठाकर इन कामों को बड़ी सहजता से संपन्न कर लेते थे. आज बहुत कम लोगों को इस बात का कुछ अंदाज बचा है कि हमारे कुछ नामों के, परिवारों के नामों के चिह्न इन्हीं कामों में से निकले थे. नहर की देखरेख करने वाले नेहरू थे तो पहाड़ों में सिंचाई करने का ढांचा एक तरह की पहाड़ी नहर, कूल बनाने वाले कोहली थे तो गूल बनाने वाले गुलाटी थे. देश में इस कोने से उस कोने तक ऐसी अनेक जातियां, अनेक लोग थे जो गांवों और शहरों के लिए पानी का काम करते थे. इसमें अकाल और बाढ़ की मार को कम करने का काम भी शामिल था और यह सचमुच अपने तन, मन और धन से करते थे.

जो काम उनके मन में उतर गया था, उसे वे अपने तन पर भी संजोकर रखते थे. देश के सभी भागों में शरीर पर गुदना गोदवाने की एक बड़ी परंपरा रही है. इसमें शुभ चिह्न आदि तो चलन में थे ही पर पूरे देश के कुछ भागों में एक विशेष चिह्न भी पाया जाता था. इसका नाम था सीता बावड़ी. सीधी सादी आठ दस रेखाओं से एक भव्य चित्र कलाई पर किसी भी मेले, ठेले में देखते ही देखते गोद दिया जाता था. इस तरह पानी का काम मन से तन पर तन से श्रम में उतरता जाता था जमीन पर.

लेकिन आज जमीन की कीमतें आसमान छूने लगी हैं. शहरों में भी और अनेक गांवों में भी तालाब एक के बाद एक पुरते जा रहे हैं, कचरे से पटते जा रहे हैं. जल संकट सामने है पर हम उसे पीठ दिखा रहे हैं. अपने तालाबों को, अपने जलस्रोतों को नष्टकर देने के बाद ऐसे प्यासे शहरों के लिए दूर से, बहुत दूर से किसी और का हक छीनकर बड़ी खर्चीली योजनाओं को बनाकर पानी लाया जा रहा है. पर हमें एक बात नहीं भूलनी चाहिए. इन्द्र देवता से इन शहरों ने ऐसी अपील तो की नहीं है कि हमारा पीने का पानी तो अब सौ दो सौ किलोमीटर दूर से आ रहा है. आप हम पर पानी ना बरसायें. पहले ये तालाब ही वर्षा के दिनों में शहरों से गिरने वाले पानी को अपने में संजोकर, समेट कर इन शहरों को बाढ़ से बचा लेते थे.

इंद्र का एक पुराना नाम, विशेषण है पुरंदर. पुरंदर यानी जो पुरों को, किलों को, शहरों को तोड़ देता है. इस नाम को रखा गया है तो इसका अर्थ यह भी है कि इंद्र के समय में भी शहर नियोजन में कमियां होती थीं. और ऐसे अव्यवस्थित शहरों को इंद्र अपनी वर्षा के प्रहार से ढहा देता था, बहा देता था.

दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, बंगलुरु, जयपुर, हैदराबाद जैसे पुराने, महंगे हो चले आधुनिक हो चले, सभी शहर बारी-बारी ऐसी बाढ़ की चपेट में आ रहे हैं, जैसी बाढ़ उन जगहों में पहले कभी नहीं आती थी.

हमारे देश की समुद्रतटीय रेखा बहुत बड़ी है. पश्चिम में गुजरात के कच्छ से लेकर नीचे कन्याकुमारी घूमते हुए यह रेखा बंगाल में सुंदरबन तक एक बड़ा भाग घूम लेती है. पश्चिमी तट पर बहुत कम, लेकिन पूर्वी तट पर अब समुद्री तूफानों की संख्या और उनकी मारक क्षमता भी बढ़ती जा रही है. अभी कुछ साल पहले ओडिशा और आंध्र प्रदेश में आए चक्रवात की पूर्व सूचना समय रहते मिल जाने से बचाव की तैयारियां बहुत अच्छी हो गई थीं और इस कारण बाकी नुकसान एक तरफ, कीमती जानें बच गईं. लेकिन उसी के कुछ ही दिनों बाद वहां आई बाढ़ में उससे भी ज्यादा नुकसान हो गया था.

हमारे पूर्वी तटों पर समुद्री तूफान आते हैं पर अब नुकसान करने की उनकी क्षमता बढ़ती ही जा रही है. इनके पीछे एक बड़ा कारण है हमारे कुल तटीय प्रदेशों में उन विशेष वनों का लगातार कटते जाना, जिनके कारण ऐसे तूफान तट पर टकराते समय विध्वंस की अपनी ताकत काफी कुछ खो देते थे.

समुद्र और धरती के मिलन बिंदु पर, हजारों वर्षों से एक उत्सव की तरह खड़े ये वन बहुत ही विशिष्ट स्वभाव लिए होते हैं. दिन में दो बार ये खारे पानी में डूबते हैं तो दो बार पीछे से आ रही नदी के मीठे पानी में. मैदान, पहाड़ो में लगे पेड़ों से, वनों से इनकी तुलना करना ठीक नहीं. वनस्पति का ऐसा दर्शन अन्य किसी स्थान पर संभव नहीं. यहां इन पेड़ों की, वनों की जड़ें भी ऊपर रहती है. अंधेरे में, मिट्टी के भीतर नहीं, प्रकाश में, मिट्टी के ऊपर. जड़ें, तना फिर शाखाएं, तीनों का दर्शन एक साथ करा देने वाला यह वृक्ष, उसका पूरा वन इतना सुंदर होता है कि इस प्रजाति का एक नाम हमारे देश में सुंदर, सुंदरी ही रख दिया गया था. उसी से बना है सुंदरबन.

लेकिन आज दुर्भाग्य से हमारा पढ़ा लिखा संसार, हमारे वैज्ञानिक कोई 13-14 प्रदेशों में फैले इस वन के, इस प्रजाति के अपने नाम एकदम से भूल गए हैं. जब भी इन वनों की चर्चा होती है, इन्हें अंग्रेजी नाम मैंग्रोव- से ही जाना जाता है. हमारे ध्यान में भी यह बात नहीं आ पाती कि देश में कम से कम इन प्रदेशों की भाषाओं में, बोलियों में तो इन वनों का नाम होगा, उसके गुणों की स्मृति होगी. प्रसंगवश यहां यह भी जान लें कि मैंग्रोव शब्द भी अंग्रेजी का नहीं है, उस भाषा में यह पुर्तगाली से आया है.

तटीय प्रदेशों से प्रारंभ करें तो पश्चिम में ऊपर गुजराती, कच्छी में इसे चैरव, फिर मराठी, कोंकणी में खारपुटी, तिवर, कन्नड में कांडला काडु, तमिल में सधुप्पू निल्लम काड्ड, तेलुगू में माडा आडवी, उड़िया में झाऊवन कहा जाता है. बांग्ला में तो सुंदरबन सबने सुना ही है. एक नाम मकडसिरा भी है और हिंदी प्रदेश में तो समुद्र के तट से दूर ही है. पर ऐसा नहीं होता कि जो चीज जिस समाज में नहीं है उस समाज की भाषा उसका नाम नहीं रखे. हिंदी में चमरंग वन कहते थे. पर अब यह नए शब्दकोषों से बाहर हो गया है.

शहरों, गांवों में छलनी की तरह छेद कर डाले हमने और मिट्टी की विशाल गुल्लक में पड़ी इस विशाल जलराशि को खींच निकाला. उसमें डाला कुछ नहीं

पर्यावरण को ठीक से जानने वाले बताते हैं कि आंध्र प्रदेश और ओडिशा में खासकर पारद्वीप वाले भाग में चमरंग वनों को विकास के नाम पर खूब उजाड़ा गया है. इसलिए पारद्वीप ऐसे ही एक चक्रवात में बुरी तरह से नष्ट हुआ था. फिर यह भी कहा गया था कि उसके लिए एक मजबूत दीवार बना दी जाएगी.

कुछ ठंडे देशों का अपवाद छोड़ दें तो पूरी दुनिया में धरती और समुद्र के मिलने की जगह पर प्रकृति ने सुरक्षा के ख्याल से ही यह हरी सुंदर दीवार, लंबे-चौड़े सुंदरवन खड़े किए थे. आज हम अपने लालच में इन्हें काटकर उनके बदले पांच गज चौड़ी सीमेंट कंक्रीट की दीवार खड़ी कर सुरक्षित रह जाएंगे- ऐसा सोचना कितनी बड़ी मूर्खता होगी- यह कड़वा सबक हमें समय न सिखाए तो ही ठीक होगा. चौथी की कक्षाओं में यह पढ़ा दिया जाता है कि पृथ्वी के कोई सत्तर प्रतिशत भाग में समुद्र है और धरती बस तीस प्रतिशत ही है. समुद्र के सामने हम नगण्य हैं. ये सुंदरबन, चमरंग वन हमारी गिनती बनी रहे, ऐसी सुरक्षा देते हैं.

दीवारें खड़ी करने से समुद्र पीछे हट जाएगा, तटबंद बना देने से बाढ़ रुक जाएगी, बाहर से अनाज मंगवाकर बांट देने से अकाल दूर हो जाएगा, बुरे विचारों की ऐसी बाढ़ से, अच्छे विचारों के ऐसे ही अकाल से हमारा यह जल संकट बढ़ा है.

राजेंद्र बाबू ने अपने समय में या कहें समय से ही पहले ही समाज का ध्यान ऐसी अनेक बातों की तरफ खींचा था. श्री गोखले से भेंट होने के बाद राजेंद्र बाबू कोई बावन बरस तक सार्वजनिक जीवन में रहे. उनका बचपन जिस गांव में बीता था, उस गांव में नदी नहीं थी, वे तैरना नहीं सीख पाए थे. लेकिन इस बावन बरस के एक लंबे दौर में उन्होंने अपने समाज को देश को अनेक बार डूबने से बचाया था. अंतिम बारह बरस वे देश के सर्वोच्च पद पर रहे. जब वह निर्णायक भूमिका पूरी हुई तो सन 1962 के मई महीने में वे एक दिन रेल में बैठे और दिल्ली से पटना के लिए रवाना हो गए थे. उसी सदाकत आश्रम के एक छोटे से घर में रहने के लिए, जहां से उन्होंने सार्वजनिक जीवन की अपनी लंबी यात्रा प्रारंभ की थी.

ललित मोदी विवाद

3 sawalललित मोदी पर क्या हैं आरोप?

आईपीएल के पूर्व अध्यक्ष ललित मोदी पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने वित्तीय अनियमितताओं (फेमा) के आरोप लगाए हैं. उनपर आईपीएल में घोटाले और मैच फिक्सिंग के भी आरोप हैं. आईपीएल 2010 फाइनल के बाद ललित मोदी को आईपीएल के अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद से मोदी लंदन में हैं. ईडी का आरोप यह भी है कि मोदी जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं. पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने भाजपा पर आरोप लगाते हुए कहा कि 2011 में ही ललित मोदी का पासपोर्ट रद्द किया गया था फिर वो लंदन में कैसे रह सकते हैं. उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ 16 केस हंै. यह समझ से परे है कि उन्हें नया पासपोर्ट किस आधार पर जारी किया गया? फिलहाल भारत में उनके खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी किया जा चुका है.

क्या है सुषमा-ललित प्रकरण?

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा ललित मोदी को मदद पहुंचाने का मामला सामने आते ही भारतीय राजनीति में भूचाल आ गया है. विपक्षी दल सुषमा से इस्तीफे की मांग कर रहा है. लंदन के संडे टाइम्स में छपी खबर से इस बात का खुलासा हुआ है कि सुषमा स्वराज ने ललित मोदी को पत्नी के इलाज के लिए पुर्तगाल भेजने में मदद की. उन्होंने इस बारे में ब्रिटेन की सांसद कीथ वाज से सिफारिश की थी. इस मामले पर सफाई देते हुए सुषमा स्वराज ने कहा कि हमने मानवीय आधार पर उनकी मदद की क्योंकि उनकी पत्नी को कैंसर है. हमने सिर्फ ब्रिटेन से यह आग्रह किया था कि अगर वहां का कानून इजाजत देता है तो उनकी पत्नी को इलाज के लिए पुर्तगाल जल्द भेज देना चाहिए.

इस मामले में भाजपा सुषमा स्वराज के साथ खड़ी है, गृहमंत्री राजनाथ सिंह के मुताबिक उन्होंने कोई गलती नहीं की. ललित मोदी की पत्नी कैंसर से पीड़ित हैं और मानवीय आधार पर सुषमा ने उनकी मदद की.

वसुंधरा राजे को लेकर क्या है विवाद?

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर भी ललित मोदी की मदद करने के आरोप लग रहे हैं. वसुंधरा ने ललित की इमिग्रेशन अर्जी का अपने नाम की गोपनीयता रखने के शर्त पर समर्थन किया और सीक्रेट विटनेस बनी रहीं. 2011 में उन्होंने ललित के पक्ष में दिए बयान में कहा था, ‘मैं यह बयान ललित मोदी की इमिग्रेशन एप्लीकेशन के समर्थन में दे रही हूं लेकिन मेरे इस सहयोग का पता भारतीय अधिकारियों को नहीं चलना चाहिए’

कांग्रेस ने दस्तावेज पेश करते हुए वसुंधरा राजे पर ललित मोदी के साथ मिलकर धौलपुर महल को निजी जायदाद में बदलने का भी आरोप लगाया है. हालांकि कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा है कि 1954 के दस्तावेज यह साबित करते हैं कि धौलपुर महल किसी की निजी नहीं बल्कि सरकारी संपत्ति है. इस प्रकरण के बाद कांग्रेस जहां वसुंधरा राजे का इस्तीफा मांग रही है वहीं वसुंधरा ने इस मुद्दे पर चुप्पी ओढ़ रखी है.

दिवालिया होने की दहलीज पर ग्रीस

greeceग्रीस बीते कुछ सालों से आर्थिक संकट से जूझ रहा है. लगातार संकट गहराने की वजह से कभी दुनिया जीतने का सपना देखने वाला यह देश दिवालिया होने की कगार पर आ खड़ा हुआ है. ग्रीस पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का 11 लाख करोड़ रुपये का कर्ज चढ़ चुका है. आईएमएफ ने ग्रीस को 12 हजार करोड़ रुपये की पहली किश्त चुकता करने के लिए 30 जून तक की मोहलत दी थी.

आईएमएफ ने ग्रीस के सामने कुछ शर्तें रखी हैं और यदि वह उन शर्तों को नहीं मानता है तो वह यूरोपियन यूनियन और यूरो जोन से बाहर हो सकता है. ग्रीस की लगातार कोशिशों के बाद भी आईएमएफ कर्ज चुकाने की मोहलत बढ़ाने को राजी नहीं हो रहा है. ग्रीस के प्रधानमंत्री एलेक्सिस सिप्रास ने देश के बैंकों को 7 दिन तक बंद रखने का ऐलान किया है. वहां के लोगों को एटीएम से सिर्फ 60 यूरो तक ही निकालने की इजाजत दी गई है. साथ ही सभी विदेशी लेनदेन पर भी पाबंदी लगा दी गई है. आम लोग इस बात से चिंतित हैं कि अगर यूरो को पुरानी करेंसी ड्रैकमा में तब्दील कर दिया गया तो उनकी मुद्रा की कोई कीमत नहीं रह जाएगी.

इधर ग्रीस के कर्ज में डूबने की वजह से भारत सहित हांगकांग और जापान के शेयर बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की गई. जानकारों का मानना है कि ग्रीस में आए इस संकट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर लंबी अवधि में कोइ फर्क नहीं पड़ेगा. इस संकट की वजह 1999 में आए भीषण भूकंप को माना जा रहा है. इस भूकंप के बाद 50000 इमारतों का पुनर्निर्माण सरकारी पैसे से कराया गया था. ग्रीस पर 2004 के ओलंपिक खेलों में जरूरत से ज्यादा पैसा खर्च करने के भी आरोप हैं. अगर वह आईएमएफ का कर्ज चुकाने में नाकाम रहा तो उसे 21वीं सदी का पहला डिफॉल्टर देश बनने से कोई नहीं बचा पाएगा. आईएमएफ ने कर्ज चुकाने की मियाद बढ़ाकर 20 जुलाई घोषित की है. डिफॉल्टर घोषित होने पर उसे अपनी पुरानी मुद्रा ड्रैकमा लागू करनी होगी.