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तबाही का इंतजार करती दिल्ली

delhi_images_copy.107113609इस साल 25 अप्रैल को नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के झटके जब दिल्ली तक महसूस किए गए तो यहां अधिकारियों को आपदा प्रबंधन योजना की समीक्षा और उसे अपडेट करने के काम में लगा दिया गया. यह योजना कितनी अपडेट हुई इसका तो पता नहीं लेकिन अगर दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए) की एक रिपोर्ट पर गौर करें तो भूकंप का खतरा अभी टला नहीं है. खतरा हमारे सिर पर मंडरा रहा है.

डीडीएमए की ‘हैजार्ड एंड रिस्क असेसमेंट’ रिपोर्ट बता रही है कि हम एक बड़ी तबाही का इंतजार कर रहे हैं. इस रिपोर्ट में चेताया गया है कि राष्ट्रीय राजधानी को भूकंप का एक बड़ा झटका लग सकता है और इससे होने वाले नुकसान का असर एक परमाणु बम के हमले से कई गुना ज्यादा होगा. फिलहाल यह रिपोर्ट डीडीएमए के अध्यक्ष उपराज्यपाल नजीब जंग को सौंप दी गई है.

रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का भूकंपीय व्यवहार इन दिनों कुछ वैसा ही है जैसा 2001 में गुजरात का था. पृथ्वी का अध्ययन करने के लिए तिब्बत स्थित चीन के केंद्र और और दक्षिण पूर्व तिब्बत स्थित तिब्बती निगरानी केंद्र ने भी अपने अध्ययनों में कुछ ऐसे ही बदलावों का पता लगाया जो दिल्ली में भूकंप की ओर इशारा कर रहे हैं.

हैरत की बात ये है कि आपदा प्रबंधन से जुड़े हमारे जिम्मेदार जान-माल का नुकसान रोकने की योजना बनाने की बजाय किसी और ही चिंता में व्यस्त हैं. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस संबंध में जब डीडीएमए के सचिव (राजस्व/आपदा प्रबंधन) अश्विनी कुमार से पूछा गया तो उनकी चिंता कुछ और ही नजर आई. उन्होंने कहा, ‘भूकंप की घटना के बाद संचार सेवा ठप न पड़े और बचाव कार्य अबाध गति से जारी रखा जा सके, इसकी समीक्षा की जा रही है. मोबाइल टावरों को और मजबूत बनाने के लिए मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों के प्रतिनिधियों से बातचीत की जा रही है.’ अश्विनी कुमार आपदा की तैयारियों को लेकर यह बताना भी नहीं भूले कि अभी राजधानी दिल्ली में 48 घंटे के पावर बैकअप के साथ 7000 मोबाइल टावर हैं और आपदा की तैयारी के लिहाज से इनकी संख्या और क्षमता में वृद्घि के लिए मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों के साथ डीडीएमए सलाह-मशविरा कर रहा है.

आपदा से पूर्व क्षति को कम-से-कम करने के लिए डीडीएमए क्या एहतियात बरत रही है, इस बारे में विभाग की वेबसाइट पर दिए गए अलग-अलग अधिकारियों के अलग-अलग नंबरों पर लगातार कोशिश के बावजूद कोई बात करने को तैयार नहीं हुआ. सब टालमटोल करते रहे. कमोबेश यही हालत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) की भी है.

खैर, इस बारे में पर्यावरणविद हिमांशु ठक्कर बताते हैं, ‘दिल्ली में एक बार इस बात की कोशिश कुछ वर्ष पहले हुई थी कि यहां कितने मकान भूकंप के झटके बर्दाश्त कर सकते हैं. ताज्जुब है कि इस सर्वेक्षण को भी दस फीसदी से कम मकानों तक सीमित रखा गया और कभी दोबारा उसकी मॉनिटरिंग नहीं की गई. डीडीएमए का काम बतौर एहतियात मॉक ड्रिल आदि कराना है लेकिन यह भी सिर्फ कागजों तक ही सीमित होता है.’ सच तो यह है कि एक सरकारी आंकड़े के अनुसार दिल्ली की 31 लाख इमारतें भूकंप के झटकों को सह पाने में पूरी तरह समर्थ नहीं हैं.

देश को भूकंप की संवेदनशीलता के लिहाज से चार अलग-अलग क्षेत्रों (2, 3, 4 और 5) में बांटा गया है. दिल्ली भूकंप क्षेत्र- 4 में आता है और संवेदनशीलता के लिहाज से यह बहुत ही जोखिम भरा क्षेत्र है. दिल्ली सरकार ने लगभग एक दशक पहले आपदा से निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण इमारतों को झटके बर्दाश्त करने के लिहाज से तैयार कराने का निर्णय लिया था . डीडीएमए के एक अधिकारी ने नाम न उजागर करने की शर्त पर बताया कि अभी तक महज तीन-चार इमारतों को भूकंप के झटके बर्दाश्त करने योग्य बनाया जा सका है. ऐसे आलम में डीडीएमए की वर्तमान रिपोर्ट किसी को भी कंपकंपा देने के लिए काफी हो सकती है.

रिपोर्ट के मुताबिक, ‘भूकंप का एक चक्र होता है. हम भारत के भूकंप के बड़े चक्रों पर गौर फरमाएं तो हमारी परेशानी और बढ़ सकती है. दिल्ली में इस लिहाज से 1999 के बाद से भूकंप का इस चक्र का आना बाकी है. यह आगामी 70 साल के दौरान कभी भी आ सकता है. अलग-अलग छोटे झटकों से आपदा टल रही है और अगले छह महीने तक कुछ नहीं होता है तो आगामी तीन साल तक कुछ नहीं होगा. लेकिन सभी प्रत्यक्ष घटनाओं को इकट्ठा करके देखें तो बहुत सुकून नहीं महसूस हो सकता.’

गौरतलब है कि 1999 में उत्तराखंड के चमोली में भूकंप आया था तब वहां जानमाल का भारी नुकसान हुआ था. चमोली, दिल्ली से 250 किलोमीटर दूर होने के बावजूद इसके झटकों से अछूता नहीं रह पाया था. इस भूकंप के दौरान दिल्ली की कई इमारतों में दरारें पड़ गईं थीं.

भूकंप चक्र क्या है, इस सवाल पर हिमांशु ठक्कर कहते हैं, ‘जब यह सूचना दी जाती है कि इस इलाके में 7-8 मैग्नीट्यूड क्षमता का भूकंप आना बाकी है और यदि चार मैग्नीट्यूड के भूकंप आ रहे हैं तब ऐसे बहुत सारे भूकंप और आएंगे. दरअसल भूकंप का काम धरती के अंदर पैदा हो रहे तनाव को बाहर निकालना होता है. अब इसे नेपाल में आए भूकंप के संदर्भ में समझा जा सकता है. नेपाल में 8.5 मैग्नीट्यूड का भूकंप आना था जबकि वहां इस साल के अप्रैल महीने में 7.8 मैग्नीट्यूड का भूकंप आया था. इसका मतलब यह है कि वहां धरती के नीचे बने तनाव को बाहर निकलने के लिए अभी 7.9 की तीव्रता वाले कम-से-कम 10 भूकंप आ सकते हैं. अगर सरल शब्दों में कहा जाए तो छोटे-छोटे भूकंप के झटके, बड़े भूकंप के झटकों को स्थानांतरित नहीं कर सकते हैं.’

दिल्ली ही नहीं भूकंप के लिहाज से देश के अधिकांश हिस्से अति-संवेदनशील है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर रिक्टर स्केल पर 6 मैग्नीट्यूड की क्षमता वाला भूकंप आ जाए तो देश का 70 फीसदी हिस्सा तबाही का शिकार हो सकता है जबकि दिल्ली में इस पैमाने के भूकंप से लगभग 80 लाख लोग काल के गाल में समा सकते हैं.

एनडीएमए की एक रिपोर्ट के अनुसार देश के 24 मेट्रो शहरों में से सात, जिनकी आबादी दो लाख से ज्यादा है, वे भूकंप क्षेत्र- 4 के अंतर्गत आते हैं. इन मेट्रो शहरों में दिल्ली, पटना, ठाणे, लुधियाना, अमृतसर, मेरठ और फरीदाबाद शामिल हैं. दिल्ली में खासकर ट्रांस-यमुना इलाके की मिट्टी जलोढ़ होने की वजह से भूकंप के झटके बर्दाश्त करने की क्षमता और भी कम हो जाती है. करेले पर नीम चढ़े की तर्ज पर यह इलाका अति सघन आबादी वाला है. इस इलाके के अधिकांश मकान भूकंप के झटके बर्दाश्त करने योग्य नहीं हैं जिसके चलते यहां जानमाल की क्षति ज्यादा होने की संभावना जताई गई है. एनडीएमए ने 1999 में चमोली में आए भूकंप के बाद एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसके अनुसार तब दिल्ली में सिर्फ तीन फीसदी मकान कंक्रीट के बने हुए हैं जबकि 85 फीसदी मकानों में ईंट और पत्थर का इस्तेमाल किया गया है.

old delhiइन मकानों में लोहे की छड़ या खंभों को उपयोग में नहीं लाया गया था. इस रिपोर्ट में अहमदाबाद जैसे आधुनिक शहरों के मकानों के बारे में चर्चा की गई है जिसके अनुसार ये शहर भूकंप के झटके सह सकने के लिहाज से नहीं बनाए गए हैं. उस समय देश के 8.22 लाख अभियंता और पुरातत्वविदों के बीच एक सर्वे आयोजित कराया गया था जिसमें से सिर्फ 14,700 लोगों यानी 1.79 % ने यह स्वीकार किया था कि उन्हें भूकंप सुरक्षा अभियांत्रिकी का प्रशिक्षण प्राप्त है. इस भयावह परिदृश्य के बीच देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के अनुसार हिमालयी क्षेत्र की टेक्टॉनिक प्लेट 1 सेंटीमीटर प्रति वर्ष की गति से यूरेशियाई प्लेट की ओर सरक रही है जिसकी वजह से पृथ्वी में लगातार हलचल पैदा हो रही है.

सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के अनुसार पांच मंजिल और उससे ज्यादा तल वाले मकान या फिर 100 से अधिक आबादी वाली हाउसिंग सोसाइटी में भूकंपरोधी प्लेट का उपयोग जरूरी हो. लेकिन इसे अमल में कितना लाया जा रहा है यह किसी से छिपा नहीं है.

हुर्रियत: प्रासंगिकता पर प्रश्न

syed geelani(Left) with Umar Farooq at a protest. Photo by Javed Dar/Tehelkaपिछले साल नवंबर में जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के समय अलगाववादियों ने हमेशा की तरह चुनाव का बहिष्कार करने का फरमान जारी किया था. लेकिन जैसे-जैसे चुनाव प्रचार ने जोर पकड़ा और भाजपा अपने आक्रामक चुनाव प्रचार के कारण एक मजबूत विकल्प के तौर पर उभरकर सामने आई वैसे ही कुछ अलगाववादी धड़ों ने अपनी प्राथमिकता बदल दी. इतना ही नहीं इन्हें शह देने वाला पड़ोसी मुल्क भी घाटी में बदले माहौल से हैरत में है. इन धड़ों के कुछ नेताओं को पाकिस्तान की तरफ से हमेशा से ही उकसाया जाता रहा है. जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनाव पर हर बार पाकिस्तान की पैनी नजर बनी रहती है. बहरहाल अलगाववादी किसी भी सूरत में नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा को राज्य में नहीं आने देना चाहते थे. सूत्रों ने दावा किया है कि यही वजह है जिससे घाटी में अलगाववादियों के सबसे बड़े संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस ने चुनाव बहिष्कार करने के साथ राज्य के एक बड़े समुदाय को वोट न देने के लिए षडयंत्रपूर्ण तरीके से अभियान चलाया.

हुर्रियत के नरमपंथी धड़े के एक शीर्ष नेता कहते हैं, ‘इस बात की निहित समझ बनी हुई थी कि अगर चुनाव में मतदाताओं की भागीदारी कुछ प्रतिशत बढ़ती भी है तो हमें परेशान होने की जरूरत नहीं है. माना गया था कि मतों में बढ़ोतरी भाजपा को सत्ता से दूर ले जाएगी.’ कुछ हद तक ऐसा हुआ भी. घाटी में भाजपा के एक भी उम्मीदवार नहीं जीत सका. इसके उलट जम्मू संभाग में भगवा परचम लहराते हुए भाजपा को 25 सीटें मिल गईं. यह राज्य में भाजपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था. इसके बाद राज्य में 28 सीटें जीतने वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) से गठबंधन कर भाजपा जम्मू कश्मीर की सत्ता में जगह पाने में कामयाब हो गई. इसके अलावा भाजपा को राज्य में पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के रूप में एक नया और महत्वपूर्ण साथी मिल गया. अलगाववादी से राजनीति की मुख्यधारा में शामिल हुए सज्जाद लोन के नेतृत्व वाली इस पार्टी ने दो सीटों पर जीत दर्ज की है.

विधानसभा चुनाव के बाद गठबंधन को लेकर भाजपा और पीडीपी में कई दौर की बातचीत चली. कुछ मुद्दों पर सहमति बनती थी तो कुछ मुद्दों पर नाराजगी. आखिरकार तमाम मुद्दों पर दोनों दल एक हुए और मुफ्ती मोहम्मद सईद ने राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली. तब गठबंधन को लेकर हो रही बातचीत के बीच मुफ्ती मोहम्मद सईद की दिग्गज हुर्रियत नेता अब्दुल गनी भट्ट से मुलाकात ने सबको हैरत में डाल दिया था. 1989 में अलगाववादी आंदोलन शुरू होने के बाद यह पहली बार था जब हुर्रियत का कोई नेता मुख्यधारा के किसी राजनीतिज्ञ को चुनाव में मिली सफलता पर बधाई देने के लिए उसके घर पहुंचा था.

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वर्षों से राज्य के राजनीतिक धरातल पर हाशिये पर रहे अलगाववादी परेशान हैं कि पल-पल बदलते परिदृश्य में कहीं वे दर्शक मात्र न बनकर रह जाएं

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वास्तव में इस बार के विधानसभा चुनाव में लोगों की अभूतपूर्व भागीदारी और मुख्यधारा की राजनीति में विस्तार के चलते राज्य में भाजपा की स्थिति मजबूत हो गई थी, जिसके चलते अलगाववादियों के हौसले पस्त हो गए. वर्षों से राज्य के राजनीतिक धरातल पर हाशिये पर रहे अलगाववादी इस बात से परेशान नजर आ रहे हैं कि पल-पल बदलते परिदृश्य में कहीं वे दर्शक मात्र न बनकर रह जाएं. इसमें आश्चर्य की बात नहीं कि इन स्थितियों ने अलगाववादियों को अपनी कार्यप्रणाली को लेकर फिर से सोचने और आत्मावलोकन करने पर मजबूर कर दिया है. यह आत्मावलोकन इसलिए ताकि राज्य में न सिर्फ उनका अस्तित्व बचा रहे बल्कि वे राजनीति में अपनी खोई हुई जमीन वापस पा सकें.

अब सवाल ये है कि जम्मू कश्मीर में बढ़ती हुई अप्रासंगिकता के खिलाफ खुद को बचाने के लिए अलगाववादियों को कौन सी राह पकड़नी होगी? अभी इस सवाल का जवाब दे पाना थोड़ा मुश्किल है. हालांकि इसके इतर इस सवाल का जवाब ढूंढना उनके लिए अब कुछ ज्यादा ही जरूरी हो गया है. बीते कुछ हफ्तों में विभिन्न अलगाववादी धड़ों के नेताओं ने नई रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया है. वहीं इनमें से कुछ समाज के दूसरे प्रतिनिधियों से सलाह लेने से भी नहीं चूक रहे हैं. सलाह के लिए इन्हें बाकायदा अपने यहां खाने पर भी बुलाया गया था. कुल मिलाकर लब्बोलुआब ये दिख रहा है कि हुर्रियत को राज्य में अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए मुख्यधारा की चुनावी राजनीति में उतरना चाहिए जिसका अलगाववादी लंबे समय से बहिष्कार करते रहे हैं. अलगाववादी आंदोलन की शुरुआत होने के बाद से ही हुर्रियत के सभी धड़ों ने चुनावी प्रक्रिया का बहिष्कार किया है. चुनावी प्रक्रिया को लेकर इन धड़ों की सोच में आया बदलाव भारत सरकार में विश्वास प्रकट करने के समान है.

लंबे समय से आतंकवादियों के जरिए जब तक सशस्त्र अभियान चलाए जाते रहे तब तक अलगाववादियों का राजनीतिक प्रभाव घाटी में मजबूत रहा है. हाल के समय में आतंकी गतिविधियों में आई कमी से वहां अलगाववादियों की स्थिति कमजोर हुई है. इन स्थितियों की वजह से तमाम अलगाववादी नेता यह सोचने को मजबूर हुए हैं कि आतंकी गतिविधियों की बजाय उन्हें खुद के राजनीतिक और वैचारिक ताकत के दम पर अपनी प्रासंगिकता फिर से कायम करनी होगी और खुद को प्रासंगिक बनाए रखने का यह लक्ष्य तब तक पूरा नहीं हो सकता है जब तक हुर्रियत को वह राह न मिल जाए जिसकी बदौलत वो कश्मीरियों के हर दिन की समस्या को उठा सके.

अब चुनाव में भागीदारी के सवाल पर एक बड़ा मुद्दा ये है कि क्या अलगाववादी धड़ों को अपने उम्मीदवार उतारने चाहिए या फिर छद्म उम्मीदवारों के जरिए चुनाव में हिस्सा लेना चाहिए. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव के मद्देनजर एक वरिष्ठ अलगाववादी नेता की ओर से सलाह आई थी कि पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवारों के खिलाफ छद्म उम्मीदवार उतारे जाने चाहिए, लेकिन उनकी इस सलाह को खारिज कर दिया गया. ‘तहलका’ से बातचीत में एक नरमपंथी हुर्रियत नेता कहते हैं, ‘अगर उस प्रस्ताव को मान लिया गया होता तो मैं मुझे पूरा भरोसा है कि मुफ्ती सईद और उमर अब्दुल्ला की जमानत जब्त हो जाती. और भारत और विश्व के लिए यह हमारी तरफ से एक राजनीतिक संदेश भी होता.’

अब सवाल उठता है कि क्यों इस प्रस्ताव को नहीं माना गया? इसका कारण इस तथ्य में निहित है कि कश्मीर विवाद का समाधान एक ऐसा मुद्दा है जिसकी वजह से पिछले कई दशकों में चुनाव में हिस्सा लेना बहुत ही जटिल बना हुआ है. ऐसे में कश्मीरी लोगों को मनाने जैसे कठिन काम पर बात करने को लेकर हुर्रियत काफी चौकन्नी नजर आ रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि ये चुनाव का बहिष्कार काफी लंबे समय से करते चले आ रहे हैं. ऐसे में चुनाव में अपना या छद्म उम्मीदवार उतारने से अलगाववादियों के एजेंडे को झटका लगने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. इसके अलावा यह एक तरह से घाटी में हुए सैन्य कब्जे को भी वैधता देने के समान होगा और चुनाव बहिष्कार की उनकी रणनीति को झटना देने वाला भी साबित होगा.  साथ ही इस मुद्दे की तरफ बढ़ाया गया कोई भी कदम नरमपंथी और चरमपंथी धड़े के बीच की असहमति को और बढ़ा देगा. आखिर में हमेशा यह सवाल उठता है कि क्या पाकिस्तान इस मामले के बीच आएगा?

बहरहाल, अभी इस मुद्दे पर चर्चा बंद दरवाजों के भीतर और हुर्रियत के नरमपंथी धड़े के बहुत ही छोटे से हिस्से में हो रही है, जो चुनावी हस्तक्षेप के कुछ रूपों के पक्ष में हैं. यह धड़ा इस बात को लेकर आशावादी है कि ‘इस्लामाबाद’ इस मामले में उनका साथ देगा. इसी साल 23 मार्च को पाकिस्तान दिवस मनाने के आधिकारिक कार्यक्रम में पाक के उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने हुर्रियत के नरमपंथी धड़े के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक से दो घंटे की मीटिंग की थी. वह सैयद अली शाह गिलानी के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल से भी मिले. साथ ही नरमपंथी धड़े के प्रमुख नेता अब्दुल गनी भट्ट से भी मुलाकात कर चुके हैं. भट्ट एक निष्ठावान नरमपंथी रहे हैं और लीक से हटकर कश्मीर समस्या का समाधान करने के समर्थक हैं. भट्ट उनमें से रहे हैं जिन्होंने चुनावी भागीदारी का हमेशा से विरोध किया है. उनका मानना है कि यह हुर्रियत के लिए ठीक रास्ता नहीं है. वह इस बात पर जोर देते हैं कि चुनाव मैदान में उतरे बिना भी राज्य में प्रासंगिक रहा जा सकता है. वह कहते हैं, ‘हम लोगों की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं. मुफ्ती को उनका काम करने दीजिए, हम अपना काम करते रहेंगे.’

Jn Kबहुत से अलगाववादियों ने मुफ्ती सईद के ‘विचारों के युद्घ’ का समर्थन किया था, जिसमें उन्होंने वादा किया था कि चुनाव बाद सत्ता में आने पर वे घाटी में उनकी गतिविधियों को संचालित करने की अनुमति देंगे. राज्य में नई सरकार के कमान संभालने के ठीक बाद कट्टर अलगाववादी नेता मसर्रत आलम को रिहा करने के फैसले से इस नीति की शुरुआत हुई. लेकिन अपनी ही रैली में पाकिस्तान के झंडे लहराने के बाद मसर्रत के फिर से गिरफ्तार हो जाने के बाद उनकी गतिविधियों पर एक तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया. तब गिलानी अधिकांश समय अपने घर तक सीमित रहा करते थे. इसके अलावा दूसरे नेताओं की गतिविधियों को भी कड़ाई से नियंत्रित किया गया था.

वहीं कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के तहत भाजपा और पीडीपी के बीच एक महत्वपूर्ण सहमति ये बनी थी कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार कश्मीर मुद्दे पर बातचीत के लिए हुर्रियत से संपर्क करेगी, लेकिन उसके बाद से केंद्र सरकार की ओर से उठाए गए कदमों से अलगाववादियों को यह विश्वास होता चला गया कि वह सिर्फ एक चुनावी वादा था, जो तोड़ने के लिए किया गया था. इस संबंध में एक राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र से की गई बातचीत में एक वरिष्ठ भाजपा नेता कहते हैं, ‘अलगाववादियों से बातचीत की किसी भी प्रक्रिया में केंद्र सरकार शामिल नहीं होगी. मुख्यमंत्री को खुद विकल्पों का मूल्यांकन करना है और अगर वे चाहते हैं तो उन्हें इसी आधार पर राज्य स्तर पर आगे बढ़ना होगा.’

इसके साथ ही पाकिस्तान के साथ बातचीत भी अनिश्चित है, जिसने कश्मीर विवाद के समाधान की तरफ हो रही किसी भी प्रगति को रोका है. ऐसे में अलगाववादी धड़े निकट भविष्य में राजनीतिक तौर पर कोई भी प्रगति होते नहीं देख रहे. इन स्थितियों ने राज्य में हुर्रियत के विभिन्न धड़ों में अस्तित्व का खतरा पैदा कर दिया है. वे नहीं जानते कि उन्हें क्या करना चाहिए. लगातार बदलते भू-राजनीतिक और राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य में अपना अस्तित्व बचाते हुए स्थानीय राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत बनने में ये धड़े खुद को असमर्थ पा रहे हैं. इस दुविधा का नतीजा ये हुआ कि हुर्रियत के नरमपंथी धड़े के आठ घटक चरमपंथी गिलानी के नेतृत्व में एक हो गए. भट्ट कहते हैं, ‘निश्चित रूप से इस बात की जरूरत महसूस होने लगी है कि हम अपनी रणनीतियों में फिर से संशोधन करें और ऐसा कदम उठाएंगे जो हमारे आंदोलन को मजबूत करने के लिए सबसे बेहतर साबित होगा.’

 

‘डोंगी से यात्रा में बार-बार महसूस हुआ कि आगे बढ़ना मुश्किल है’

safar ek dongi main dagmag_HBआपने दिल्ली के यमुना हेड (आगरा नहर) से अपनी यात्रा शुरू की और कोलकाता तक गए. डोंगी से पूरी की गई इस यात्रा के दौरान आप चंबल भी गए? इस अनोखी यात्रा के बारे में बताएं?

दिल्ली से आगरा नहर के जरिए मैंने अपनी यात्रा आगे बढ़ाई. धौलपुर से हम चंबल नदी में प्रवेश कर गए. चंबल में हमारी यात्रा के पांच से छह दिन गुजरे. इसके बाद हम पंचनद पहुंचे. यहां पांच नदियां (यमुना, चंबल, कुंआरी, सिंध और पहुज) मिलती हैं. यह उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के जगम्मनपुर का इलाका है जहां इन नदियों का संगम होता है. इसके बाद शेरगढ़, मूसानगर, फतेहपुर, बांदा, कौशांबी, इलाहाबाद पहुंचे. यहां यमुना गंगा में मिलती है. इलाहाबाद से बढ़ने पर अरैल, फिर तमसा नदी मिलती है. फिर विंध्याचल, चुनार से बनारस, गाजीपुर, जमनिया, बक्सर से आगे बलिया (बैरिया घाट). आगे चिरांध में गंगा से दो और नदियां मिलती हैं- सोन और घाघरा. फिर थोड़ा आगे जाकर गंडकी मिलती है और गंगा यहां बहुत विकराल हो जाती है. आगे चलकर गंगा में एक और बड़ी नदी मिलती है- कोसी. पटना, मोकामा, मुंगेर, भागलपुर, साहेबगंज, फरक्का, ब्रह्मपुर, बर्द्घमान होते हुए कोलकाता पहुंचे.

यात्रा के दौरान क्या कभी लगा कि अब आगे बढ़ना संभव नहीं होगा?

ऐसा तो यात्रा के कदम-कदम पर महसूस होता रहा. दिल्ली से शुरू किया तो यमुना में पानी ही नहीं था. चंबल नदी में घुसे तो लोगों ने कई बार चेताया कि आप कहां जाएंगे? यहां तो कदम-कदम पर खतरनाक डाकू मिलेंगे. मेरे साथ जो साथी दिल्ली से चले, उन्हें मैंने कहा कि आपको तैरना नहीं आता है, आप वापस चले जाइए. वे लखनऊ लौट गए. एक नए साथी ने वहां से मेरे साथ शुरुआत की तो वे इलाहाबाद तक मेरे साथ गए. नदी में जब यात्रा करने की दिशा के विपरीत हवा चलती तो बहुत परेशानी होती. मुंगेर, भागलपुर से आगे हवा की वजह से दस-दस फीट तक लहरें उठती थीं. मल्लाह गुनारी लगाते थे. रस्सी लगाकर चादर तान देते हैं अगर यात्रा की दिशा में यात्रा की जा रही है तो नाव तेजी से बढ़ती जाती है लेकिन हवा उल्टी दिशा में हो तो बहुत मुश्किल पेश होती है. पूरी यात्रा के दौरान हमेशा यह लगता रहा कि अब यहां से आगे कैसे बढ़ंे? लेकिन हम थोड़ा-थोड़ा बढ़ते रहे और यात्रा पूरी हो गई.

आपने अपनी डोंगी का नाम राहुल सांकृत्यायन के नाम पर राहुल रखा. राहुल जी की कौन-सी यात्रा का जिक्र आप करना चाहेंगे?

राहुल जी और मेरी यात्रा में बुनियादी अंतर यह है कि वे ज्ञान की खोज में निकलते थे. वे तिब्बत गए तो बहुत सारी बौद्घ-धर्म से जुड़ी पांडुलिपियां लेकर लौटे. मध्य एशिया गए तो उन्होंने दर्शन-दिग्दर्शन लिखा. उनका अनुवाद किया. अपनी हर यात्रा मैंने रोमांच और शौक के लिए की. राहुल जी ने भी कुछ यात्राएं अपने शौक व रोमांच के लिए की होंगी. हालांकि इस बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है. अबतक मैंने उनका जो भी यात्रा साहित्य पढ़ा है, उसके आधार पर यह कहा जाना ज्यादा सटीक है कि वे ज्ञान की खोज में भटकते रहे. एक ज्ञानी और घुमक्कड़ का राहुल जी दुर्लभ संयोग थे.

1975 में जब आपने यात्रा की तब फरक्का बैराज बन गया था?

हां, फरक्का बैराज उस समय बन गया था.

आपने अपनी यात्रा-वृतांत में गंगा किनारे की ठेकेदारी प्रथा का जिक्र किया है. इससे किनको दिक्कत पेश हुई?

मैंने अपनी किताब में इस बात का जिक्र किया है कि पहले नदी पार कराने के लिए डोंगियों का सहारा लिया जाता था जिसके बदले में उन्हें आसपास के गांवों के लोग साल में अनाज-पानी दे दिया करते थे. हालांकि अब भी नदी पार कराने का काम उन्हीं गरीब मल्लाहों के हाथ में है लेकिन उन्हें अब ठेकेदार के रहमोकरम पर जीना

पड़ता है. यह नुकसान कमोबेश गंगा के हर छोटे-बड़े घाट पर हुआ है.

गंगा के अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग तरह के प्रतिबंध घोषित किए गए हैं. मिसाल के तौर पर भागलपुर में  ‘डॉल्फिन संरक्षित क्षेत्र’  घोषित किया गया है?

मैं जब 1976 में इस इलाके से गुजरा था तब इस तरह के प्रतिबंध जैसी कोई बात नहीं थी. डॉल्फिन संरक्षित क्षेत्र आदि की घटना बहुत बाद की है. हां, यह जरूर है कि उस समय चंबल नदी में मगरमच्छ संरक्षित क्षेत्र विकसित करने के प्रयास शुरू हो गए थे.

फरक्का बैराज गंगा नदी पर बना और उससे बिजली भी मिलने लगी. लेकिन गंगा नदी पर उसका कितना असर पड़ा?

मैं नदी के बारे में ज्यादा नहीं बता पाऊंगा. मैं उस विषय का विशेषज्ञ तो हूं नहीं. मैंने यात्रा अपने शौक से की और जितना देखा और जो महसूस किया उसे अपनी किताब में दर्ज कर दिया है.

फिर आप कभी दोबारा फरक्का वाले इलाके में नहीं गए?

नहीं, मैं कभी दोबारा नहीं जा पाया.

लोग बताते हैं और मुझे भी याद है कि मुंगेर, भागलपुर और साहेबगंज वाले इलाके में गंगा का पाट बहुत चौड़ा होता था?

हां, राजमहल वाले इलाके में गंगा अपने व्यापक रूप में थी और एक किनारे से दूसरा किनारा नहीं दिखाई देता था. मुझे लगभग चार दशक बीत गए तो इस बीच गंगा में कितना पानी बह गया कैसे बताऊं? जाहिर है बहुत से बदलाव आए होंगे.

आपने इसके अलावा और कौन-कौन सी यात्राएं की हैं?

इस यात्रा से पहले मैं साइकिल से लखनऊ से काठमांडू गया और काठमांडू से लखनऊ वापस भी आया था. उस यात्रा के अनुभव मैंने ‘पहियों के इर्द-गिर्द’ किताब में दर्ज किए. वह किताब 1976 में ही प्रकाशित हो गई थी. मैंने नेवी वालों के साथ बनारस से बलिया तक नाव से यात्रा की. डोंगी से दिल्ली से कोलकाता तक की यात्रा करने से पूर्व दो अन्य यात्राएं मैंने की.

आप किताब में जिस इलाके के बारे में लिख रहे होते हैं, वहां की भाषा का छौंका भी डालने की कोशिश करते हैं?

जहां तक अलग-अलग इलाकों की भाषा एवं बोलियों के जिक्र का सवाल है तो मैं स्कूल के दिनों से डायरी लिखने का आदी रहा हूं. जिस इलाके से गुजरता था अपने काम की बातें वहां की भाषा में लिख लेता था. मेरे मां-पिता दोनों ही पढ़े-लिखे थे. घर में किताबें बहुत थीं. मेरी भी पढ़ने में दिलचस्पी शुरू से रही. मेरे पिताजी कहते थे कि खूब घूमो. घुमक्कड़ी से ज्ञान बढ़ता है. घूमने के साथ-साथ मैं डायरी भी लिखता था, अगर डायरी नहीं लिखता होता तो शायद यह किताब भी आज नहीं होती. डायरी में नोट लेने के बाद जब लिखने बैठा तो जिस इलाके के बारे में लिख रहा होता तो उसके बारे में उस इलाके के लोगों से पूछ लेता. मैंने अगर आगरा के आसपास की भाषा में कुछ लिखा तो अमृतलाल नागर से पूछ लिया या उन्हें दिखा दिया. उनका संबंध आगरा से बहुत गहरा रहा है. मैं इस तरह की मदद उनसे तो लेता ही था और दूसरों से भी लेने में कभी संकोच नहीं करता था. अब चंबल गए तो वहां के मेरे मित्र चंदू यादव मेरे साथ हो लिए. वे उसी इलाके इटावा के थे. उनकी भाषा तो आज भी मैं अच्छे से बोल-समझ और लिख सकता हूं. अवधी मुझे आती है. बनारस में कई साल रह चुका था तो भोजपुरी मेरे लिए अंजानी नहीं थी. लेकिन जब मुंगेर और भागलपुर की तरफ बढ़ा तो अंगिका के कुछ शब्द और वाक्य मैंने नोट कर लिए जिसका उपयोग मैंने किताब में किया है. बंगाल के इलाके से गुजरा तो मैंने वहां के जरूरतभर संवाद डायरी में नोट कर लिए.

हिंदी या उससे जुड़ी भाषाओं को थोड़ा सतर्क होकर समझने की कोशिश की जाए तो एक हिंदीभाषी परिवार को दूसरे हिंदीभाषी परिवार की भाषा समझने में शायद ही बहुत मुश्किल पेश आए?

हां, लेकिन किसी भी भाषा को बोलने के तरीके को आप नहीं पकड़ पाए तो फिर आपको मुश्किल होगी और उसमें से मजा जाता रहेगा. बोलियों की जान उसकी टोन ही है. टोन ही उसकी गमक है. टोन बरकरार रखने से उन भाषाओं के बोलने वाले आपकी फीलिंग तक पहुंच पाते हैं और आपकी कही या लिखी हुई चीजों से जुड़ते हैं. हालांकि मैंने यह यात्रा-वृत्तांत पेशेवर लेखक की तरह नहीं लिखा इसलिए पाठकों के जुड़ने के बारे में कभी सोचा नहीं था. मैंने चौमासा लिखे और उसमें 50 के करीब दोहे लिखे. बुंदेलखंड के इलाके के दोहे बुंदेलखंडी में लिखे तो वहां के लोगों ने समझा मैं उसी इलाके का हूं. जब उत्तराखंड पर लिखा तो वहां के लोगों को लगा कि मैं उत्तराखंडी हूं.

आप लिखते हैं कि यात्रा करने वालों की मुश्किल यह होती है कि अपने यात्रा के साथ छूट गए बहुत सारे लोग बाद में याद आते हैं लेकिन उनसे दोबारा मिलना शायद ही संभव हो पाता है. कोई ऐसा व्यक्ति या कोई पात्र है जिनकी याद जब-तब आती है या फिर उनमें से कोई ऐसा है जिन्होंने आपको कभी याद किया हो?

मैंने यह यात्रा 1976 में की थी और 1995 में मैं मूसानगर, पुरातत्व विभाग की ओर से गया तो वहां यमुना के घाट पर पहुंचते ही ठेकेदार ने मुझे तुरंत पहचान लिया. आप देखिए कि 20 साल तक उस व्यक्ति ने एक यात्री को इस तरह याद रखा था. मैं बतौर यात्री 23 की उम्र में गया था और विभाग के काम से जब दोबारा पहुंचा तब 42-43 का हो चुका था. इस बीच शारीरिक रूप से मुझमें बहुत परिवर्तन आ गए थे. मुझे यात्रा के दौरान ऐसे बहुत सारे लोग मिले जिनके नाम आज तो याद नहीं हैं लेकिन उन्होंने मेरी जो आवभगत की और जिस गर्माहट के साथ मिले, वो आज भी मेरे भीतर एकदम ताजा है.

हम दो व्यक्ति के कुछ खास गुणों के बारे में जिस तरह बात करते हैं तो अगर आपसे कहूं कि गंगा और यमुना के बारे में बताएं तो क्या कहेंगे?

यमुना एक स्थाई नदी है. उसने जमीन को काटकर अपना बहाव सुनिश्चित कर लिया है. यमुना गहरी नदी है. गंगा अभी भी अपने को स्थिर करने में लगी हुई है इसलिए उसका पाट चौड़ा है. उसका बहाव तेज है. यमुना में अधिकांश पानी विंध्य का है. यमुना में चंबल, बेतवा, केन आदि का पानी है. गंगा में अधिकांश पानी हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने से आता है.

ऐसा कोई अनुभव जो पाठकों के साथ साझा करना चाहेंगे?

आप जब इस तरह की यात्रा करते हैं तब आप प्रकृति के बहुत करीब जाते हैं और उससे जो अनुभव मिलते हैं, वह अद्वितीय होते हैं. सामान्य तौर पर आदमी बहुत आत्मकेंद्रित होता है लेकिन जब वह प्रकृति के करीब जाता है तब उसे इस बात का एहसास होता है कि वह बहुत तुच्छ है. प्रकृति बार-बार आपको यह संदेश देती है कि आप उसके बहुत छोटे से हिस्से हैं.

‘मुझे माओवादी आंदोलन के शहरी चेहरे के रूप में पेश करना एक बड़े षडयंत्र का हिस्सा है’

Photo: Vijay Pandey
Photo: Vijay Pandey

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और मानवाधिकार कार्यकर्ता जीएन साईबाबा  को पिछले दिनों महाराष्ट्र की नागपुर सेंट्रल जेल से 14 महीने के एकांत कारावास के बाद ‘अस्थायी’ जमानत पर रिहा किया गया. ‘रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट’, जिसे सरकार द्वारा गैर-कानूनी घोषित सीपीआई (माओवादी) का मुख्य संगठन माना गया है, के संयुक्त सचिव के बतौर शारीरिक रूप से अक्षम साईबाबा ने मध्य भारत के घने जंगलों और आदिवासियों की बसावट वाले क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के अत्याचारों के विरुद्ध चलाए जा रहे अभियान के लिए समर्थन जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. 9 मई 2014 को विश्वविद्यालय से घर जाते समय पुलिस ने उन्हें उठा लिया था. उन्हें नागपुर ले जाकर माओवादियों से संबंध रखने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. लगभग 90 प्रतिशत विकलांग साईबाबा को नागपुर जेल के बदनाम ‘अंडा सेल’ में रखा गया. इस दौरान उचित देखभाल और स्वास्थ्य सेवाओं के बिना साईबाबा की तबीयत कई बार बिगड़ी. साईबाबा ने अपनी गिरफ्तारी और पुलिस प्रताड़ना के बारे में दीप्ति श्रीराम  से बात की. इस बातचीत में उन्होंने सरकार द्वारा आदिवासियों के किसी भी असंतोष को माओवादी गतिविधि के नाम पर दबाने के तरीके पर भी सवाल खड़े किए.

14 महीनों की कैद में 4 बार आपकी जमानत याचिका खारिज की गई, अब जब  ‘अस्थायी’  जमानत मिली है, तो आपकी क्या प्राथमिकताएं होंगी?

इस समय तो मेरा स्वास्थ्य ही मेरी पहली प्राथमिकता है. मैं शारीरिक रूप से बेहद कमजोर हो चुका हूं. दिल की बीमारी के अलावा कैद की इस अवधि के दौरान मेरी शारीरिक व्याधियां कुछ और बढ़ गई हैं. कुछ अंग काम करना बंद कर रहे हैं और अगर उचित इलाज नहीं करवाया तो मेरा बचना मुश्किल होगा. ये सब मेरे साथ पहली बार हो रहा है और मैं इसके लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराता हूं.

परिजन और दोस्तों ने आपकी इस अनुपस्थिति का सामना कैसे किया?

मैं, मेरे दिल्ली के दोस्तों का शुक्रिया अदा करना चाहूंगा कि उनकी बदौलत मेरी गिरफ्तारी के बाद मेरी मां, पत्नी और बेटी को अपार सहयोग मिला, सबने उनका बहुत ख्याल भी रखा. जिस कॉलेज में मैं पढ़ाता हूं, उन्होंने भी मेरे परिवार की आर्थिक जरूरतों का ध्यान रखा. मेरी रिहाई के लिए कई मंचों पर अभियान भी चलाए गए, इन सभी को मैं एक बहुत ही सकारात्मक संदेश के रूप में देखता हूं और ये कह सकता हूं कि जब मैं अपने सेल में बैठा, अपने परिवार के बारे में सोचता था तब मुझे ज्यादा चिंता नहीं होती थी.

आपकी गिरफ्तारी पर दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन का क्या रवैया था?

केंद्रीय विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार अगर कोई प्रोफेसर निलंबित होता है तो वो पहले तीन महीनों तक अपने वेतन के 50 प्रतिशत का हकदार होता है, जिसके बाद इसे 75 प्रतिशत कर दिया जाता है. पर दिल्ली विश्वविद्यालय ने इन नियमों को दरकिनार करते हुए इन 14 महीनों में मुझे मेरे वेतन का पचास प्रतिशत ही दिया. ये बात किसी को भी बुरी लगेगी वो भी तब, जब आपको कई लोन चुकाने हों. यदि हमारे पास कोर्ट का आदेश न होता तब तो शायद वो मेरे परिवार को स्टाफ क्वार्टर से भी निकाल देते.

आपके कारावास के दौरान क्या आपकी पत्नी को किसी प्रकार की प्रताड़ना झेलनी पड़ी?

आप उनसे ये प्रश्न पूछ सकती हैं पर क्योंकि ये कठिन समय उन्हें मेरी वजह से देखना पड़ा तो मैं आपको बता सकता हूं कि उन्होंने क्या भोगा. 12 सितंबर 2013 को मेरे घर पर पहली बार छापा पड़ा था. पूरे घर में पुलिस के लोग काफी थे. ऐसे में मेरी मां, पत्नी और बेटी के लिए कहीं भी आना-जाना मुश्किल हो गया, क्योंकि वे लोग हर जगह उनके पीछे जाया करते थे चाहे दिन हो या रात. उनकी ऐसी डराने वाली रणनीति को देख राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर से कहा भी था कि घर के सामने कोई भी निगरानी नहीं करेगा. पर मेरे गिरफ्तार होने के कुछ समय बाद ही कई अपरिचित लोग मेरे घर के आस-पास दिखने लगे. मेरी पत्नी का पीछा किया जाता था, उन्हें धमकी भरे फोन कॉल्स भी आते थे. वो अगर कभी जेल में मेरे लिए किताबें आदि लेकर आतीं तो जेल प्रशासन उन्हें मुझे वो देने की अनुमति ही नहीं देता था. अगर वो मुझसे बात करने आतीं तो वो उन्हें जितना हो सके उतना टालते थे. और सबसे खराब ये था कि मुझे कभी वो दवाइयां नहीं दी गईं जो मेरी पत्नी मेरे लिए लाई थीं. और अगली बार मिलने तक हम दोनों ही इस बात से अनजान रहते. मेरी पत्नी इन्हीं वजहों से परेशान रहती थीं. मैं कह सकता हूं कि एक तरह से जो पीड़ा और यंत्रणा मैंने जेल के अंदर भोगी वो उन्होंने जेल के बाहर रहते हुए झेली.

ऐसी खबरें थीं कि आपने जेल में भूख हड़ताल की थी. ये कदम क्यों उठाना पड़ा?

मैं जब जेल में था तब मुझे छोटी-छोटी जरूरतों जैसे टॉयलेट, मेज, फल, चारपाई आदि को पूरा करने के लिए ट्रायल कोर्ट को चिट्ठी लिखनी होती थी. मेरी जैसी शारीरिक स्थिति में आप जमीन पर नहीं सो पाते हैं. हर बार जब मैं कोर्ट को लिखता वो मेरे ही पक्ष में फैसला देती पर कोर्ट के किसी भी फैसले पर कभी भी अमल नहीं किया गया. सामान्यतया कैदी अपने सेल के दरवाजे की छोटी-सी जगह में से अपने मिलने वालों से बातें कर लिया करते हैं पर ह्वीलचेयर पर होने के कारण मैं ऐसा भी नहीं कर सकता था, तो कोर्ट ने एक आदेश पारित करते हुए मुझे सेल से बाहर पर जेल परिसर के अंदर ही अपने मिलने वालों से बात करने की अनुमति दी पर जेल अधिकारियों ने इस बात की भी मंजूरी नहीं दी. केवल एक समय वो मेरे पक्ष में कुछ करते थे वो तब जब मेरी जमानत याचिका पर सुनवाई होती. तब वो मुझे हर सुविधा देते थे जो वो दे सकते थे पर जमानत याचिका खारिज होते ही सब चीजें वापस ले ली जाती थीं. ऐसा मेरे साथ लगातार चार बार हुआ. तब मैंने भूख हड़ताल की. हफ्ते भर के अंदर ही मैं अचेत हो गया क्योंकि मैं न खाना खा रहा था न दवाइयां. मुझे एक सरकारी अस्पताल में भर्ती करवाया गया. बाद में कोर्ट ने मुझे निजी अस्पताल में भर्ती करवाने का आदेश भी पारित किया पर उसका भी पालन नहीं किया गया. मई के महीने तक मेरी हालत और बिगड़ चुकी थी. तब जो डॉक्टर मेरा इलाज कर रहे थे उन्होंने अंडा सेल के ही एक आदिवासी कैदी लड़के को मेरी देखभाल करने को कहा. छत्तीसगढ़ और गढ़चिरौली (महाराष्ट्र) से आने वाले इन किशोरों को फर्स्ट-एड की तकनीकें सिखाई जाती हैं, तो जब भी मैं बेहोश हो जाता तो वो मुझे होश में ले आते. इस समय कोर्ट ने जेल अधिकारियों को मुझे पांच सहायक और एसी या कूलर की सुविधा देने का आदेश दिया पर ये भी नहीं हुआ. अब तक मेरी हालत बहुत बिगड़ चुकी थी. इसी समय राष्ट्रीय अखबार ‘द हिंदू’ में मेरी सेहत की बिगड़ती हालत पर एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई और एक कार्यकर्ता पूनम उपाध्याय, जिनसे मैं आजतक कभी नहीं मिला, ने ये रिपोर्ट चीफ जस्टिस को ईमेल कर दी. Hem Mishra

वैसे तो यहां कोई तुलना नहीं की जा सकती पर आपको हिरासत में लेने से पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय(जेएनयू) के शारीरिक रूप से एक अक्षम छात्र हेम मिश्रा को भी माओवादी संपर्क रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. जहां एक तरफ आपको सहयोग मिला, यहां तक कि आपका मुद्दा एक पत्रिका के मुखपृष्ठ पर भी आया, वहीं हेम को कहीं भुला-सा दिया गया. क्या कह सकते हैं कि ऐसे कई और हेम मिश्रा अभी तक जेलों में हैं?

हेम बहुत साहसी हैं. उन्होंने जेल में लगभग 28 दिनों तक थर्ड डिग्री टॉर्चर झेला क्योंकि उनसे एक ‘स्क्रिप्ट’ (लिखी-लिखाई कहानी) मानने के लिए कहा जा रहा था. उन्होंने हेम को ये स्वीकारने के लिए कहा कि ‘साईबाबा माओवादियों के संपर्क में हैं और माओवादियों को कुछ सूचनाएं पहुंचाते हैं.’ मैं कभी नहीं सोच सकता कि इस हद तक प्रताड़ित होने के बाद भी कोई उतना साहस दिखा सकता है जितना हेम ने दिखाया. मैं आपकी बात से पूरा इत्तेफाक रखता हूं. मैं 14 महीनों तक सेल में था और अब मुझे अस्थायी जमानत दी गई है. हेम 60 प्रतिशत विकलांग हैं, पिछले दो सालों से जेल में हैं और आज तक उन्हें जमानत नहीं मिली है. यहां सोचने वाली एक और बात है कि जब हेम जैसे कार्यकर्ता को 28 दिनों तक लंबा टॉर्चर झेलना पड़ा तो उन आदिवासी लड़कों के बारे में सोचिए जिन्होंने लगातार 400 दिनों तक इस अत्याचार को झेला था! कौन-सी अदालत पुलिस को इतने लंबे समय तक आरोपी को हिरासत में रखने की अनुमति देती है? कोई भी इन बातों की परवाह नहीं करता.

2013 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर किए एक हलफनामे में कहा था,  ‘सीपीआई (माओेइस्ट) के विचारकों और शहरी समर्थकों ने केंद्र सरकार को गलत बताने के लिए सम्मिलित रूप से एक व्यवस्थित प्रचार अभियान शुरू किया है. इन्हीं विचारकों ने ये माओवादी अभियान अबतक जिंदा रखा हुआ है और ये पीपुल्स लिबरेशन गोरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) के लोगों से कहीं ज्यादा खतरनाक हैं.’  यानी सरकार आपको उन व्यक्तियों के रूप में पहचानती है जो शहरों में माओवादी अभियान का राजनीतिक समीकरण आगे बढ़ा रहे हैं?

मेरे ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ के विरोध का माओवादी आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है. मेरी लड़ाई जनसंहार के खिलाफ है. मुझे माओवादी आंदोलन का शहरी चेहरा कहना मूर्खता होगी. मुझे लगता है मुझे या अरुंधती राॅय को माओवादी आंदोलन के शहरी चेहरे के रूप में पेश करना एक बड़े षडयंत्र का हिस्सा है. हम सभी समाज में बुद्धिजीवी या लेखक के रूप में अपना एक स्वतंत्र स्थान रखते हैं. इन स्थानों पर हम हर उस चीज से जुड़ते हैं जिससे हमारा सामना होता है. एक शोधार्थी और अध्यापक के बतौर मैंने सीखा है कि साहित्य से जुड़ें और विभिन्न तरह के संघर्षों के बारे में पढ़ें. मैं सोचता हूं कि एक बुद्धिजीवी होने के नाते हम सभी को लोगों से जुड़े आंदोलनों का हिस्सा बनना चाहिए, इनका अध्ययन करना चाहिए. तो अगर सरकार ये कहती है कि हम किसी आंदोलन का ‘शहरी चेहरा’ भर हैं तो वो बस हमें नीचे गिराने की कोशिश कर रही है.

तो फिर ओडिशा और आंध्र प्रदेश ने  ‘रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेटिक फ्रंट’  (आरडीएफ) को बैन क्यों कर दिया?

आरडीएफ इन दो राज्यों में सशस्त्र संघर्ष की बात नहीं कर रहा था. ओडिशा में लोगों का हाल दिन-ब-दिन बद से बदतर होता जा रहा था. ऐसे में आरडीएफ ने विकास के वैकल्पिक मॉडल का प्रस्ताव रखा. जैसे कि हमने सरकार को बड़े बदलावों की बजाय छोटे बदलाव करने के लिए कहा. उदाहरण के लिए, हमने बड़े बांधों के निर्माण की बजाय छोटे बांधों के निर्माण का प्रस्ताव रखा जिससे कि उन्हें ज्यादा लोगों को विस्थापित न करना पड़े और न ही किसी प्राकृतिक आपदा का खतरा रहे. जल्द ही लोगों ने हमें गंभीरता से लेना शुरू कर दिया. इससे नाराज ओडिशा सरकार ने हम पर प्रतिबंध लगा दिया. आंध्र प्रदेश में भी ऐसा ही कुछ हुआ था. वैसे प्रतिबंध के बावजूद भी इन दोनों राज्यों में कभी भी, किसी भी गतिविधि के लिए आरडीएफ का कोई सदस्य गिरफ्तार नहीं किया गया. पर दिल्ली में, जहां आरडीएफ पर कोई प्रतिबंध नहीं है, वहां मुझे यानी आरडीएफ के एक सदस्य को माओवादी गतिविधियों के आरोप में हिरासत में ले लिया गया. इसके बाद मुझे नागपुर की सेंट्रल जेल में भेजा गया यानी महाराष्ट्र में जहां पर भी आरडीएफ पर कोई प्रतिबंध नहीं है. तो स्पष्ट रूप से इस मामले में मेरी गिरफ्तारी के कारण कुछ और ही थे.

आप पिछली सरकार यानी यूपीए के कार्यकाल के दौरान संदेह के घेरे में थे. मोदी सरकार के आने से हफ्तेभर पहले आपको हिरासत में ले लिया गया. आपको दोनों सरकारों के कार्यकाल में क्या अंतर नजर आता है?

(हंसते हुए) मुझे लगता है इस बारे में मुझसे बेहतर आप बता सकती हैं क्योंकि आपने बाहर रहकर सब देखा है. मैं सरकार के अबतक के कार्यकाल के दौरान जेल में था तो मैं नहीं समझता कि मैं इस सरकार का कोई विश्लेषण कर सकता हूं. मुझे तो जेल में अखबार तक नहीं दिया जाता था.

अलविदा कॉमरेड

11707656_10152839702726012_3494383671858891480_nAप्रद्योत लाल

6 नवंबर 1957 – 12 जुलाई 2015 

कॉमरेड क्या आप सुन रहे हैं? मैंने आपसे कुछ महीने पहले जो वादा किया था, उसे निभा रहा हूं. वह सांझ, दूसरी सांझों की ही तरह ही थी जब मैं आपके साथ बैठा था और मैंने आपसे एक वादा किया था. हालांकि मैं इसमें एक और बात जोड़ना चाहता हूं कि हम दोनों ने तब उस वादे को गंभीरता से नहीं लिया था. हमारे बीच कई ऐसी बातें थीं जो हम निर्लिप्त भाव से किया करते थे.

मैं आपसे ‘जिंदादिली’ सीख रहा था और आपके शब्दों में कहूं तो मैं इस कला में तेजी से माहिर हो रहा था. उस शाम को थोड़ी-सी शराब पीने के बाद आप अपने पसंदीदा पुराना गाना गाने लगे और फिर अचानक गंभीर हो गए. यह आपके मिजाज से बिल्कुल जुदा बात थी. जो लोग आपको जानते हैं क्या वे आपके ‘गंभीर’ होने की गवाही दे पाएंगे और शायद वे आपके शब्दकोश में इस शब्द को ढूंढते हुए निराश हो जाएंगे. आपने कहा था, ‘मुझे लगता है कि मैं चार-पांच साल से ज्यादा नहीं जी पाऊंगा.’ मैं थोड़ी देर के लिए अचरज में पड़ गया था लेकिन तब मैंने आपकी आंखों में एक शरारतभरी चमक देखी. हम दोनों ने जोरदार ठहाका लगाया था. क्या मैंने आपकी इस शरारत का यह जवाब दिया था कि अगर ऐसा हुआ तो मैं आपकी श्रद्घांजलि लिखूंगा?

चीफ, आपने मुझे कुछ और साल दिए होते ताकि मैं अपना वादा पूरा कर पाता. इस बात की कल्पना कैसे की जाए कि अब हम कभी बात नहीं कर पाएंगे. इस बात कि कल्पना कैसे करुं कि जो मेरे साथ के लोग हैं और जो मुझे बहुत प्रिय हैं, जो मुझे प्रेरणा देते रहे, वे मुझे श्रद्घांजलि लिखना सिखाएंगे? आपकी श्रद्घांजलि का मतलब हमसब- आपके मित्र, आपका परिवार, आपके आलोचक (शायद ही कोई हो) अगर कुल जमा कहना चाहें तो क्या कहेंगे? हम सभी के लिए कुछ भी कह पाना असंभव होगा.

कॉमरेड, क्या आपने कभी भी यह महसूस किया कि आप खुद में एक संस्थान हैं? हम यह आपके लिए आदर से कहना चाहेंगे कि आपने 35 साल का लंबा कैरियर पत्रकारिता में गुजार दिया, सच तो यह है कि तहलका के 80 फीसदी पत्रकार अभी 35 के भी नहीं हुए हैं. मुझे अच्छी तरह से याद है कि मैं जब सात महीने पहले ‘तहलका’ में दूसरी पारी के लिए आया था तब आप ही पहले व्यक्ति थे जो सबसे पहले स्वागत के लिए मेरी ओर बढ़कर आए थे. आपने उसी एक पहल से मेरा हृदय जीत लिया था और अपने लिए मेरे मन में आजीवन आदर का बीज बो गए. यही वो अलहदा प्रद्योत लाल थे. अंदर से खालिश भद्र पुरुष. एक ऐसे पत्रकार जो हर तरह के अहंकार से मुक्त थे. एक ऐसे लेखक जो सिर्फ अच्छा ही जानते थे और जो संकीर्णता से कोसों दूर थे. उनके इस दुर्लभ गुण के बारे में वह भी जानते हैं जिन्होंने पत्रकारिता में कुछ वर्ष बिताए हों या जिन्होंने कुछ बायलाइन रिपोर्ट लिखी हो.

आप हमेशा अपनी तारीफ से बचना चाहते थे बल्कि उससे दो-चार होते और अक्सर ऐसे समय में आप बातचीत को दूसरी दिशा में बहा ले जाते थे. इस बारे में मैं आपको बताऊं, आप तहलका के किसी भी युवा पत्रकार से पूछ सकते हैं. आपको सभी प्रिय थे और उनसे कुछ देर की बातचीत में ही आप उनपर अपनी जबरदस्त छाप छोड़ जाते थे. इन युवाओं के लिए आपके गुण पर भरोसा करना थोड़ा अविश्वसनीय होता था. वे आपको गूगल के समान मानते थे. आप कुर्सी पर बैठकर पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों के लिए मुक्तिदाता की तरह थे. आप उनके लिए न्यूजरूम में सहज उपलब्ध थे. उनके बीच सांस ले रहे थे. चहल-पहल कर रहे होते थे औरहमेशा  नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने की कोशिश कर रहे होते थे. आपकी पत्नी मंजुला भी आपकी बेचैनी के बारे में कुछ-कुछ ऐसा ही वर्णन करती हैं.

बीते एक साल के दौरान ‘तहलका’ ने कई उतार-चढ़ाव देखे. हमने न्यूनतम संसाधनों के साथ काम किया और खुद को हर बार साबित किया. आप संगठन और हमलोगों के साथ चट्टान की तरह खड़े रहे. आपकी बालसुलभ उत्सुकता और चुनौतियों से पार पाने के लिए अगली पंक्ति में झट से खड़े हो जाना, हमलोगों के लिए हमेशा प्रेरणादायी रहा.

और हां, आपकी रंगीन जिंदगी जिसको आपने नेतृत्व दिया, उसका जिक्र करना कैसे भला कोई भूल सकता है. हमारे दोस्त और ‘तहलका’ के हमारे पूर्व साथी हरीश नांबियार ने आपके चरित्र को क्या खूब पहचाना है. उनके शब्दों में, ‘प्रद्योत लाल की व्यवस्थता उल्लेखनीय थी. वे शिक्षित सर्वहारा और विद्वान पत्रकार थे. मितव्ययी थे. क्रिकेट और दिलीप कुमार को लेकर वे जुनूनी थे. मैं उनकी बात से पूरी तरह से सहमत हूं. आप संगीत, क्रिकेट, देव आनंद, दिलीप कुमार, टाइगर पटौदी (कभी खत्म न होने वाली सूची) के दीवाने हो सकते हैं.’

अक्सर ऐसा होता था कि काम का दबाव होता और प्रेस की डेडलाइन होती और इस बीच आप अपनी पसंदीदा पुरानी फिल्मों के बारे में बातचीत करने लग जाते. आप फिल्मों से जुड़ी चीजों को कैसे याद रखते थे, इसकी बारीकियों के बारे में आप हमें बताते रहते थे. ऐसा आप ही कर सकते थे और हम मंत्रमुग्ध होकर सुना करते थे.

कॉमरेड और एक बात यह कि आपके उत्साही पाठक आपसे बहुत जुड़ाव महसूस करते थे. आपके द्वारा प्रयोग किए जानेवाले शब्द आनंदित करते थे और आपके द्वारा इस्तेमाल में लाए जानेवाले मुहावरों की वजह से पंक्तियां गाने लग जाती थीं. लेकिन आपके अधिकांश प्रशंसक इस बात को नहीं जानते होंगे क्योंकि वे आपके साथ न्यूजरूम में नहीं होते थे, इसलिए मैं उसका जिक्र करने की स्वतंत्रता यहां ले सकता हूं. कभी ऐसे समय में जब कोई ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होती और शब्द नहीं सूझ रहे होते और शोध का समय नहीं होता तब आप आगे आकर मोर्चा लेते.

मेरी आपसे एक मात्र शिकायत यह है कि आपने अपनी उदासी को अपने दिल में ही दबाए रखा. आपके लिए कुछ अधूरा रह गया था जिसे न हासिल करना आपको सालता रहा. कई बार आपसे जीवंत बातचीत के दौरान भी उस दर्द की झलक मिल जाती थी, जिसे आपने दिल में दबा रखा था. आपने जितना किया, आप उससे कहीं ज्यादा करना चाहते थे. हम जब आखिरी बार मिले थे तब मैंने आपसे कहा था कि आप अपनी जीवनी क्यों नहीं लिखते हैं? आपने जवाब में कहा था, ‘अगर मैं ऐसा करना चाहूं तो मुझे कुछ समय के लिए मीडिया की मुख्यधारा से दूर रहना पड़ेगा. मैं नहीं चाहता कि लोग मुझे भूल जाएं.’

कॉमरेड, क्या आप तब सचमुच गंभीर थे जब आप यह कह रहे थे कि लोग शायद आपको भूल जाएंगे? मुझे यकीन है कि यह आपकी तरफ से अंतिम चुटकुला था.

मध्ययुगीनप्रदेश

26 जून की रात नरसिंहपुर जिले के गांव मड़गुला के अहिरवार (अनुसूचित जाति) समुदाय के लोगों के लिए जानलेवा साबित हुई, जब उनके ही गांव के दबंग राजपूतों ने लाठी, बल्लम, तलवार और हॉकी से उन पर हमला कर दिया. इस दौरान अहिरवार मोहल्ले के बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख्शा गया. इस हमले में एक व्यक्ति की मौत हो चुकी है और करीब 17 लोग घायल हैं जिसमें से सात लोगों की हालत गंभीर है. पूरा मामला खेतों में कम मजदूरी पर काम करने से इनकार कर देने का है, जिसके बाद सबक सिखाने के लिए इस हमले को अंजाम दिया गया. गौरतलब है कि इस गांव में अहिरवार समुदाय का उत्पीड़न नया नहीं है. इससे पहले भी वहां इस तरह की घटनाएं होती रही हैं. 2009 में यहां इस तरह की बड़ी वारदात तब हुई थी जब मड़गुला और आसपास के गांवों के अहिरवार समुदाय ने मृत मवेशियों को न उठाने का निर्णय लिया था. इसके बाद गांव की दबंग जातियों द्वारा उनपर सामाजिक और आर्थिक प्रतिबंध थोप दिया गया.

raju ahirvaar 226 जून की घटना के बाद से सभी अहिरवार परिवारों ने गांव छोड़ दिया है और वर्तमान में गाडरवारा नगरपालिका के मंगल भवन परिसर में रह रहे हैं, पीड़ितों का कहना है कि उनका ठीक से इलाज नहीं किया जा रहा है. कई लोगों को समय से पहले ही अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया और उन्हें दवाइयां भी बाहर से पैसे देकर खरीदनी पड़ रही हैं. सभी लोग दहशत में हैं और किसी भी कीमत पर गांव वापस नहीं जाना चाहते.

पीड़ितों के अनुसार पूरा घटनाक्रम कुछ इस प्रकार है. घटना से दो दिन पहले सुबह महादेव राजपूत और भगवान अहिरवार के बीच दो एकड़ खेत में तुअर के फर्रे बीनने की बात 1000 रुपये में तय हुई, जब भगवान अहिरवार महादेव के खेत में गया तो पाया कि खेत दो एकड़ का नहीं बल्कि साढ़े तीन एकड़ का था. इसके बाद वह काम करने नहीं गया, बाद में मिलने पर जब महादेव राजपूत ने भगवान से पूछा कि तुम काम पर क्यों नहीं आए तो भगवान ने उसे यह कहते हुए काम करने से मना कर दिया कि जमीन साढ़े तीन एकड़ की है जबकि सौदा दो ही एकड़ का हुआ है. इसी बात को लेकर दोनों के बीच कहासुनी हो गई और महादेव राजपूत ने भगवान अहिरवार की जूते से पिटाई कर दी और उसे जातिगत गाली देते हुए कहा कि ‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई काम से मना करने की… यह हमारा खेत है तो हम जानेंगे कि कितना बड़ा है कि तुम जानोगे.’ उस समय भगवान अहिरवार वापस आ गया लेकिन बाद में मौका पाकर उसने साइकिल की चेन से महादेव राजपूत पर तीन वार किए. इसके बाद रात में आठ-साढ़े आठ बजे के बीच बड़ी संख्या में राजपूत समुदाय के लोगों ने अहिरवार मोहल्ले पर हमला कर दिया. उस समय कुछ लोग खाना खा रहे थे तो कुछ सो रहे थे. हमला करने से पहले बिजली भी काट दी गई थी. पीड़ितों का कहना है कि करीब पंैतीस से चालीस हमलावर थे, सभी के हाथों में लाठी, बल्लम, तलवार और हॉकी जैसे हथियार थे. इस दौरान घरों में तोड़-फोड़ भी की गई. कई लोगों की गाड़ियां भी जला दी गईं.

धर्मेंद्र अहिरवार, जिनके ताऊ की इस हमले में मौत हो गई, बताते हैं कि हमले के समय वे घर पर ही थे और तखत के नीचे छुपकर उन्होंने अपनी जान बचाई. हमलावरों के वापस जाने के बाद धर्मेंद्र ने सबसे पहले 108 नंबर पर एंबुलेंस के लिए फोन किया लेकिन वहां बात करने वाले ने यह कहते हुए फोन काट दिया कि उन्हें नींद आ रही है और वे नहीं आ सकते. धर्मेंद्र ने दोबारा फोन लगाया तो वहां से एक नंबर देते हुए कहा गया कि एंबुलेंस के लिए ऑनलाइन नरसिंहपुर पर बात करो. धर्मेंद्र ने जब दिए गए नंबर पर बात की तो वहां से एक और फोन नंबर दिया गया जो कि साईखेड़ा थाने का था. इसके बाद धर्मेंद्र ने साईखेड़ा थाने में फोन किया, जहां उनकी थानेदार से बात हुई, जिसके करीब 45 मिनट बाद पुलिस गांव पहुंची.

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‘कुछ लोग अस्पताल आकर दबाव डालने और डराने की कोशिश कर रहे हैं’

इस पूरे घटनाक्रम में जिस एक व्यक्ति की मौत हुई है वह राजू अहिरवार के पिता अजुद्दा अहिरवार थे. 25 साल के राजू अहिरवार भी बुरी तरह से घायल हैं और इस समय उनका गाडरवारा के सरकारी अस्पताल में इलाज चल रहा है. राजू के दोनों पैर और एक हाथ पर गंभीर चोटें आई हैं. घटना के बाद उन्हें जबलपुर शासकीय विक्टोरिया अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उन्हें केवल तीन दिन तक रखा गया. उसके बाद उन्हें अस्पताल से जबरदस्ती डिस्चार्ज कर दिया गया. राजू का कहना है कि मेरे पिता जी नहीं रहेे, इस वजह से मैं सदमे में था. उसी दौरान मुझसे डिस्चार्ज पेपर पर दस्तखत करा लिए गए. राजू बताते हैं कि जब वे जबलपुर अस्पताल में भर्ती थे तब उनके तीन हजार रुपये तक खर्च हो गए थे क्योंकि उन्हें बाहर से दवा लाने को कहा जाता था. गाडरवारा अस्पताल में भी यही हो रहा है. यहां भी बाहर से दवा लेने में उनके करीब चार हजार रुपये खर्च हो चुके हैं. वे कहते हैं कि यहां पर मेरा सही इलाज नहीं हो रहा है, डॉक्टर ध्यान नहीं देते और दूर से ही देखकर चले जाते हैं, अगर इसी तरह से मेरा इलाज चला तो मुझे ठीक होने में एक साल भी लग सकता है.

पिता की मृत्यु के बाद राजू के घर में अब कोई कमाने वाला नहीं है. घर में राजू के अलावा उसके बूढ़े दादा-दादी हैं, वे भी हमले मेंे घायल हुए हैं. इसके अलावा परिवार में उनकी मां और पंद्रह साल का भाई है. ये सभी लोग गाडरवारा के मंगल भवन में रह रहे हैं. अभी मुआवजे के रूप में उन्हें पिताजी की अंत्येष्टि के लिए 4000 रुपये मिले थे जो उसी में खर्च हो चुके हैं. राजू अहिरवार का कहना है कि उन पर राजीनामे के लिए लगातार दबाव बनाया जा रहा है. कुछ लोग अस्पताल आकर उन पर दबाव डालने और डराने की कोशिश कर रहे हैं.

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मड़गुला पहुंचकर पुलिस वालों ने लोगों की गंभीर स्थिति देखते हुए सबसे पहले एंबुलेंस के लिए फोन किया तब जाकर वहां छह एंबुलेंस पहुंच सकीं, जिनमें 17 बुरी तरह से घायल लोगों को अस्पताल पहुंचाया गया. इन 17 लोगों में से 6 की हालत बहुत गंभीर थी. सभी को पहले नरसिंहपुर ले जाया गया फिर वहां से गंभीर रूप से घायल लोगों को जबलपुर रेफर कर दिया गया. घटना के अगले ही दिन सुबह एक व्यक्ति अजुद्दा अहिरवार की मृत्यु हो गई जो कि हमले के दौरान गंभीर रूप से घायल हो गए थे.

कालिया बाईइस घटना के बाद मड़गुला गांव के करीब साठ अहिरवार परिवारों के एक सौ अस्सी लोग गाडरवारा पलायन कर गए, जहां स्थानीय नेता सुनीता पटेल ने उनके रहने-खाने का इंतजाम करवाया. करीब एक सप्ताह बाद नरसिंहपुर के कलेक्टर ने नगरपालिका को निर्देश दिया कि पीड़ितों के लिए नगरपालिका के मंगल भवन परिसर में रहने-खाने की व्यवस्था की जाए. इसके बाद पीड़ित वहां  दो दिन ही रह पाए थे कि नगरपालिका के लोगों ने उन्हें गांव वापस जाने को कह दिया और कहा कि अगर वे वापस नहीं जाते हैं तो उन्हें यहां भी नहीं रहने दिया जाएगा. मजबूरन ये लोग फिर सुनीता पटेल के यहां वापस आ गए. वहां एक रात ही रहे थे कि इसी दौरान भोपाल से अहिरवार समाज संघ के कुछ पदाधिकारी आ गए, जिन्होंने इस संबंध में एसडीएम और तहसीलदार से बात की, जिसके बाद पीड़ितों को दोबारा मंगल भवन में रहने की जगह मिल पाई, जहां वे अभी तक रह रहे हैं. पीड़ितों की शिकायत भी है कि मात्र 2000 रुपये के अलावा अभी तक किसी को भी मुआवजा नहीं मिला है जबकि कलेक्टर ने पीड़ितों से घायलों को एक लाख अस्सी हजार और मृतकों के परिवार को सात लाख रुपये देने की बात कही थी.

धर्मेंद्र अहिरवार बताते हैं कि चूंकि घटना के अगले ही दिन एक व्यक्ति की मौत हो गई थी तो वे एफआईआर तो दर्ज नहीं करा पाए लेकिन इस मामले में शामिल 37 लोगों के नाम पुलिस को दे दिए थे, जिसमें से 21 लोगों को ही नामजद किया गया है. इन 21 लोगों में से भी दो ऐसे नाम हैं जिस नाम का कोई व्यक्ति गांव में रहता ही नहीं है. अभी तक इस मामले में कुल पंद्रह लोगों की गिरफ्तारी हुई है, बाकी लोग फरार हैं. पीड़ितों का कहना है कि उन्हें एफआईआर की कॉपी एक सप्ताह बाद प्राप्त हुई पर अबतक किसी पीड़ित का बयान तक ठीक से दर्ज नहीं किया गया है.

इसको लेकर अहिरवार समाज संघ, मप्र के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. जगदीश सूर्यवंशी जो पीड़ितों से मिल भी चुके हैं, का कहना है, ‘इस केस को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है. प्रशासन इस मामले में लीपापोती कर रहा है. आरोपियों पर हत्या की धारा 302 नहीं लगाई गई है जबकि एक व्यक्ति की मौत हो चुकी है.’

पीड़ितों द्वारा प्रशासन पर इलाज में लापरवाही बरतने का भी आरोप लगाया जा रहा है. पीड़ितों का कहना है कि उनका ठीक से इलाज नहीं किया गया. गंभीर रूप से घायलों को भी जबलपुर से समय से पहले डिस्चार्ज करके गाडरवारा में भर्ती कर दिया गया, जहां सुविधाओं का अभाव है. उन्हें बाजार की दवाइयां लिखी जा रही हैं और लोग अपने पैसों से दवाइयां खरीदने को मजबूर हैं. डॉ. सूर्यवंशी कहते हैं कि लोगों का इलाज सही तरीके से नहीं हो रहा है. राज्य सरकार के नियमों के अनुसार किसी भी मरीज को बाहर की दवाई नहीं लिखी जा सकती है. इस तरह के प्रकरण में तो मानवता के आधार पर भी ध्यान रखा जाना चाहिए, इसके बावजूद पीड़ितों को बाहर से दवाई खरीदनी पड़ रही है.

अब ये लोग किसी भी कीमत पर मड़गुला गांव वापस नहीं जाना चाहते. उन्हें प्रशासन पर भी कोई भरोसा नहीं है जो दोनों पक्षों के बीच समझौता करवाने और गांव में ही एक पुलिस चौकी स्थापित करने का भरोसा दिला रहे हैं. पीड़ितों की मांग है कि उन्हें किसी दूसरी जगह बसने के लिए जमीन उपलब्ध कराई जाए. कलेक्टर की तरफ से घायलों को एक लाख अस्सी हजार रुपये देने का जो वादा किया गया है, वह भी अपर्याप्त है क्योंकि पीड़ितों के अनुसार सब को नई जगह पर नए सिरे से जिंदगी शुरू करनी होगी, जमीन मिलने पर सबसे पहले घर बनाना होगा इसलिए घर बनाने और जिंदगी पटरी पर लाने के लिए उन्हें सरकार से और ज्यादा मदद चाहिए. कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष रामेश्वर नीखरा भी गाडरवारा का दौरा कर चुके हैं. उनका कहना है, ‘हमारी लोगों से बात हुई है, लोग काफी डरे हुए हैं, इलाज भी ठीक ढंग से नहीं हुआ है. इस पूरे मामले में प्रशासन की तरफ से गंभीरता नहीं दिखाई गई है. अब लोग अपने गांव वापस नहीं जाना चाहते हैं लेकिन उन पर वापस जाने का दबाव डाला जा रहा है. हमने प्रशासन से मांग की है कि इन्हें कहीं और बसाया जाए ताकि ये भयमुक्त रहें. साथ ही साथ पीड़ितों को उचित मुआवजा भी दिया जाए.’

2009 में भी मड़गुला और आसपास के गांवों में जातिगत उत्पीड़न की बड़ी वारदात देखने को मिली थी. इसको लेकर सामाजिक संगठनों द्वारा एक फैक्ट फाइंडिंग टीम भी गठित की गई थी, जिसमें पता चला कि इसकी शुरुआत अहिरवार समुदाय के लोगों के सामूहिक रूप से लिए गए उस निर्णय से हुई जिसमें उन्होंने कहा कि अब वे मरे हुए मवेशी नहीं उठाएंगे. उनका कहना था कि चूंकि वे सदियों से मरे हुए मवेशी उठाते आ रहे हैं इसीलिए उनके साथ छुआछूत व भेदभाव का बर्ताव किया जाता है. इसके जवाब में मड़गुला गांव के दबंगों ने पूरे अहिरवार समुदाय पर सामाजिक और आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया. कोटवार के माध्यम से यह ऐलान करवाया कि अहिरवार समुदाय के जो लोग सवर्णों के यहां बटाईदारी करते हैं उन्हें उतना ही हिस्सा मिलेगा जितना वे तय करेंगे. इसी तरह से मजदूरी भी आधी कर दी गई. इसके अलावा उनके सार्वजनिक स्थलों के उपयोग जैसे सार्वजनिक नल, किराने की दुकान से सामान खरीदने, चक्की से अनाज पिसाने, शौचालय जाने के रास्ते और अन्य दूसरी सुविधाओं के उपयोग पर जबर्दस्ती रोक लगा दी गई. उस समय भी कई सारे परिवार गांव से पलायन कर गए थे और प्रशासन द्वारा बहुत बाद में इनकी सुध ली गई थी.

लेकिन यह घटना चिंगारी के रूप में बनी रही और साल 2012 में गाडरवारा तहसील के मारेगांव में दोबारा उभर कर सामने आई, जहां एक बार फिर मामला मृत मवेशी को उठाने का था. इस उत्पीड़न को लेकर वरिष्ठ पत्रकार लज्जाशंकर हरदेनिया और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन किया गया और इसकी रिपोर्ट के अनुसार मारेगांव के अहिरवार समुदाय पर गांव के सवर्णों द्वारा मृत मवेशी उठाने के लिए दबाव डाला जा रहा था लेकिन वे लोग मना कर रहे थे. जिसके बाद गांव में ढिंढोरा पिटवाकर यह ऐलान करा दिया गया कि अहिरवार समाज से कोई भी किसी तरह का संबंध नहीं रखेगा. उनके गांव के अंदर आने पर रोक लगाई गई. गांव के सभी दुकानदारों को अहिरवार समाज के लोगों को राशन, किराने का सामान देने से मना कर दिया. आटा चक्की वालों से भी कहा गया कि वे अहिरवार समाज के किसी भी परिवार का अनाज नहीं पीसेंगे. गांव के हैंडपंप और कुओं से उनके पानी लेने पर रोक लगा दी गई. यहां तक कि गांव के तालाब पर तारों की बाड़ लगा दी गई ताकि अहिरवार समाज का व्यक्ति नित्यकर्म के लिए भी तालाब के पानी का उपयोग न कर सके. मंदिर के दरवाजे भी उनके लिए बंद कर दिए गए. अहिरवार समुदाय के लोगों के गांव में मजदूरी करने पर रोक लगा दी गई. यह सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक बहिष्कार लंबे समय तक चला. इस मामले में लगातार प्रयास कर रहे लज्जाशंकर हरदेनिया का कहना है कि हम 2012 से लगातार मारेगांव में हुई घटना को लेकर प्रयास कर रहे हैं लेकिन स्थिति में बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुआ है.

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दरअसल यह केवल गाडरवारा तहसील का मसला नहीं है. मध्य प्रदेश में जातिगत भेदभाव की जड़ें कितनी गहरी है इसका अंदाजा 2010 में मुरैना जिले के मलीकपुर गांव में हुई एक घटना से लगाया जा सकता है. वहां एक दलित महिला ने सवर्ण जाति के व्यक्ति के कुत्ते को रोटी खिला दी, जिस पर कुत्ते के मालिक ने पंचायत में कहा कि एक दलित द्वारा रोटी खिलाए जाने के कारण उसका कुत्ता अपवित्र हो गया है और गांव की पंचायत ने दलित महिला कोे इस ‘जुर्म’ के लिए 15000 रुपये के दंड का फरमान सुनाया. इन उत्पीड़नों के कई रूप हैं, जैसे नाई द्वारा बाल काटने से मना कर देना, चाय के दुकानदार द्वारा चाय देने से पहले जाति पूछना और दलित बताने पर चाय देने से मना कर देना या अलग गिलास में चाय देना, दलित पंच/सरपंच को मारने-पीटने, शादी में दलित दूल्हे के घोड़े पर बैठने पर रास्ता रोकना और मारपीट करना, मरे हुए मवेशियों को जबरदस्ती उठाने को मजबूर करना, मना करने पर सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार कर देना, सावर्जनिक नल से पानी भरने पर रोक लगा देना जैसी घटनाएं उदाहरण मात्र ही हैं जो अब भी यहां के अनुसूचित जाति के लोगों की आम दिनचर्या का हिस्सा हैं.

2011 की जनगणना के अनुसार मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति की आबादी 15.6 प्रतिशत है. पिछले पांच साल के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2009 से 2012 के बीच दलित उत्पीड़न के दर्ज किए गए मामलों में मध्य प्रदेश का स्थान पांचवां बना रहा है. 2013 में यह एक पायदान ऊपर चढ़कर चौथे स्थान पर पहुंच गया.

डॉ. सूर्यवंशी कहते हैं कि पूरे मध्य प्रदेश में इस तरह की घटनाएं कम होने की बजाय बढ़ रही हैं और स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है. वे दावा करते हैं कि राज्य के 99 प्रतिशत गांवों में दलितों को मंदिरों में प्रवेश नहीं दिया जाता है, 75 प्रतिशत से अधिक गांवों में दलित सावर्जनिक शमशान घाट में क्रियाकर्म नहीं कर सकते हैं और मजबूरन उन्होंने अलग शमशान घाट बना रखे हैं. 25 प्रतिशत से अधिक गांवों में सावर्जनिक नल या हैंडपंप से दलित समुदाय के लोगों को पानी पीने नहीं दिया जाता, 50 प्रतिशत से अधिक मामलों में मध्याह्न भोजन के समय दलित बच्चों को अलग बैठाकर भोजन कराया जाता है.

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छुआछूत में सबसे आगे

• नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड की तरफ से इसी साल आई एक रिपोर्ट के अनुसार देश के 27 प्रतिशत लोग किसी न किसी रूप में छुआछूत को मानते हैं और इस मामले में मध्य प्रदेश 53 प्रतिशत के साथ देश में पहले नंबर पर है.

• स्थानीय संगठन दलित अधिकार अभियान द्वारा 2014 में जारी रिपोर्ट ‘जीने के अधिकार पर काबिज छुआछूत’ के अनुसार मध्य प्रदेश के 10 जिलों के 30 गांवों में किए गए सर्वेक्षण के दौरान निकल कर आया है कि इन सभी गांवों में लगभग सत्तर प्रकार के छुआछूत का प्रचलन है. इसी तरह केे भेदभाव के कारण लगभग 31 प्रतिशत दलित बच्चे स्कूल में अनुपस्थित रहते हैं.

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आखिर क्या वजह है कि प्रदेश में लगातार इतने बड़े पैमाने पर दलितों के साथ अत्याचार के मामले सामने आ रहे हैं. इसके बावजूद मध्य प्रदेश की राजनीति में दलित उत्पीड़न कोई मुद्दा नहीं बन पा रहा है? इसका जवाब यह है कि प्रदेश के ज्यादातर प्रमुख राजनीतिक दलों के एजेंडे में दलितों के सवाल सिरे से ही गायब हैं. तभी तो मड़गुला की घटना पर बयान देते हुए गाडरवारा से भाजपा विधायक गोविंद पटेल कहते हैं, ‘ऐसे झगड़े तो होते रहते हैं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है. पाकिस्तान का भी भारत से झगड़ा चल रहा है. जो घटना हुई है वह किसी भी तरह से जातिवाद की लड़ाई नहीं है.’ अब यह केवल इत्तेफाक तो नहीं हो सकता कि मध्य प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष रामेश्वर नीखरा भी कहते हैं, ‘यह जातीय संघर्ष नहीं है इसे कुछ लोग जबरदस्ती जातीय संघर्ष बना रहे हैं. नरसिंहपुर तो बड़ा समरसता वाला जिला रहा है. वहां तो पहली बार इस तरह की कोई घटना घटी है.’ इन सब पर वरिष्ठ पत्रकार लज्जाशंकर हरदेनिया कहते हैं, ‘हमारा अनुभव यह है कि मध्य प्रदेश में दलितों को लेकर राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर संवेदनहीनता व्याप्त है और ये लोग दलितों की समस्या को समस्या ही नहीं मानते हैं.’

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इस साल की प्रमुख घटनाएं

• जनवरी में दमोह जिले के अचलपुरा गांव में दबंगों द्वारा दलित समुदाय के लोगों को पीटा गया. इसके बाद प्रशासन और पुलिस के अधिकारियों की मौजूदगी में 12 दलित परिवार गांव छोड़कर चले गए क्योंकि उन्हें पुलिस और प्रशासन पर अपनी सुरक्षा का भरोसा नहीं था.

• मई में अलीराजपुर जिले के घटवानी गांव के 200 दलितों ने खुलासा किया कि वे एक कुएं से गंदा पानी पीने को मजबूर हैं क्योंकि छुआछूत की वजह से उन्हें गांव के इकलौते सार्वजनिक हैंडपंप से पानी नहीं लेने दिया जाता है, जबकि जानवर वहां से पानी पी सकते हैं.

• 10 मई को रतलाम जिले के नेगरुन गांव में दबंगों ने दलितों की एक बारात पर इसलिए पथराव किया क्योंकि दूल्हा घोड़ी पर सवार था.

इसके बाद बारात को पुलिस सुरक्षा में, दूल्हे को हेलमेट पहनाकर निकलना पड़ा.

• शिवपुरी जिले के कुंअरपुर गांव में इस साल हुए पंचायत चुनाव में एक दलित महिला गांव की उपसरपंच चुनी गई थीं, जिनसे गांव के सरपंच और कुछ दबंगों ने मिलकर मारपीट की और उनके मुंह में गोबर भर दिया.

•13 जून को छतरपुर जिले के गणेशपुरा में दलित समुदाय की एक 11 वर्षीय लड़की हैंडपंप से पानी भरने जा रही थी. इसी दौरान एक दबंग व्यक्ति ने लड़की की पिटाई कर दी क्योंकि उसके खाने पर लड़की की परछाई पड़ गई थी.

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नीतीश-लालू को झटका, पर भाजपा की बल्ले-बल्ले नहीं

niteesh_laluतमाम उठापटक के बीच बिहार में सबसे बड़ी खबर विधान परिषद का चुनाव परिणाम है. 24 सीटों पर चुनाव हुआ था. 11 सीटें सीधे भाजपा की झोली में गईं. दो सीटें भाजपा के सहयोगी दल लोजपा को और कटिहार की एक सीट भाजपा व एनडीए के सहयोग से निर्दलीय प्रत्याशी अशोक अग्रवाल को मिली. लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, कांग्रेस, एनसीपी को मिलाकर जो महागठबंधन बिहार की चुनावी राजनीति के लिए बना है, उसे नौ सीटों पर ही सिमट जाना पड़ा.

जदयू को पांच, राजद को तीन और कांग्रेस को एक सीट पर संतोष करना पड़ा है. पटना सीट, जहां सभी दलों ने जोर लगाया था, प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया था, वह निर्दलीय प्रत्याशी रीतलाल यादव के खाते में चली गई है. ये वही रीतलाल यादव हैं, जिन्हें बाहुबली माना जाता रहा है. विगत लोकसभा चुनाव के दौरान वे खूब चर्चा में आए थे जब लालू प्रसाद यादव ने रामकृपाल को रुखसत करने के बाद अचानक रातोरात रीतलाल को पार्टी का महासचिव बना दिया, फिर रीतलाल और उनके पिता से मिलने भी चले गए.

पिछले लोकसभा चुनावों में बाहुबली रीतलाल की शरण में भी जाना लालू प्रसाद की बेटी मिसा यादव की जीत सुनिश्चित नहीं करवा सका था. बाद में दोनों में कुट्टी हो गई. बहरहाल यह तो दूसरी बात है. अभी बात यह हो रही है कि विधान परिषद के चुनाव में जो समीकरण उभरकर आए हैं, क्या वे आगामी विधानसभा चुनाव के भी कुछ संकेत दे रहे हैं. परिणाम सीधे तौर पर विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल हो या फाइनल हो, विधानसभा चुनाव का सीधा कनेक्शन इससे जुड़ा हुआ है, ऐसा कुछ कहना जल्दबाजी होगी. लेकिन यह तय है कि पिछले दो माह से राष्ट्रीय स्तर से लेकर बिहार तक में बैकफुट पर चल रही भाजपा के लिए यह चुनाव परिणाम सही समय पर संबल बढ़ाने वाले और उम्मीदें जगाने वाले संदेश और संकेत लेकर आया है.

मजेदार यह है कि इस चुनाव परिणाम के बाद नीतीश कुमार ने कहा कि यह सीधे जनता का चुनाव नहीं था, जनप्रतिनिधियों के मत से हुआ चुनाव था, इसलिए इसको उस तरह से न देखा जाए, फिर भी हम हार की समीक्षा कर अपनी तैयारी दुरुस्त करेंगे. नीतीश कुमार बात ठीक कह रहे हैं लेकिन एक सच यह भी है कि इस बार के विधान परिषद चुनाव में उन्होंने खुद और उनकी पार्टी ने एड़ी-चोटी का जोर लगाया था. नीतीश कुमार खुद उम्मीदवारों का नामांकन तक कराने गए थे. राज्य सरकार के लगभग तमाम मंत्री और जदयू के छुटभैये से लेकर बड़े नेताओं तक ने इस चुनाव में पूरी ऊर्जा लगाकर काम किया. नीतीश कुमार के लिए हार सिर्फ इस मायने में झटका नहीं देने वाली है कि इतनी ऊर्जा लगाने के बाद भी वे भाजपा से हार गए बल्कि दूसरी ठोस वजह भी दिख रही है जो आगे के लिए चिंता का सबब है.

वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं, ‘नीतीश कुमार को इसे मान लेना चाहिए कि अगले विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की स्थिति का संकेत मिल गया है. जिन 24 सीटों पर विधान परिषद का चुनाव हुआ, उनमें 80 प्रतिशत के करीब सीटों पर जो जनप्रतिनिधि वोटर थे, वे उसी सामाजिक न्याय समूह से थे, जिसकी अगुवाई करने को नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव बेताब हैं और जिस पर एकाधिकार का दावा भी करते हैं.’ शिवानंद तिवारी जो सवाल उठा रहे हैं, वह सच है और नीतीश की अगली राजनीति के लिए महत्वपूर्ण भी. हालांकि लालू प्रसाद यादव, जिनकी पार्टी इस विधान परिषद चुनाव में बुरी तरह परास्त हुई, वह कहते हैं, ‘बाप बड़ा न भइया, सबसे बड़ा रुपइया की तर्ज पर चला… यह चुनाव. सब पैसे पर मैनेज कर लिया भाजपा वाला लोग लेकिन विधानसभा चुनाव में धूल चटा देंगे.’ लालू प्रसाद यादव ऐसा कहकर विधानसभा चुनाव में अपनी स्थिति को खुद ही कमजोर बता रहे हैं. अगर उनकी बातों को सच मान भी लिया जाए तो फिर राजद-जदयू गठबंधन के लिए यह और भी मुश्किल भरा सवाल है, क्योंकि अगर विधान परिषद चुनाव में भाजपा पैसे के बल पर लालू-नीतीश के कोर वोटर बैंक के चुने हुए प्रतिनिधियों को मैनेज कर सकती है तो फिर विधानसभा चुनाव में भी उसके लिए ऐसा करना

आसान होगा.

विधानसभा चुनाव में धनबल और जाति से ही इस बार का भविष्य तय होना है, यह लगभग तय होता दिख रहा है. इतना ही नहीं, बिहार में यह भी सच है कि गांव, पंचायत अथवा प्रखंड स्तर पर जो जनप्रतिनिधि हैं, उन्हें आम जनता न भी माने तो भी यह माना जाता है कि वे सीधे-सीधे जनता के संपर्क में रहते हैं और आम जनता को प्रभावित करने की क्षमता किसी पार्टी के बूथ मैनेजरों या कार्यकर्ताओं से ज्यादा रखते हैं. नली-गली से लेकर इंदिरा आवास, मनरेगा जॉब कार्ड, लाल कार्ड-पीला कार्ड, शादी-ब्याह आदि कई ऐसे काम होते हैं, जिसके लिए जनता उनसे सीधे संपर्क में रहती है और वे उसके जरिये अपनी पकड़ मजबूत बनाकर उन्हें अपने पक्ष में भी रखते हैं. ऐसे में अगर जनप्रतिनिधियों का मूड पैसे पर तय होता है तो भाजपा उन्हें अपने पेड कार्यकर्ता के तरीके से इस्तेमाल कर सकती है. तब इसमें हैरत की बात नहीं होनी चाहिए हालांकि इससे विधानसभा चुनाव में नीतीश-लालू प्रसाद की जोड़ी को परेशानी हो सकती है. इस तरह देखें तो विधान परिषद चुनाव का विधानसभा चुनाव से सीधा रिश्ता नहीं होते हुए भी और इसे सेमीफाइनल नहीं कहते हुए भी, इसमें कई ऐसे संकेत छिपे हुए हैं, जिससे आगे की राजनीति के संकेत मिल रहे हैं. नीतीश-लालू प्रसाद की जोड़ी को परेशान करने के लिए ये संकेत काफी भी है. लेकिन यहां सवाल दूसरा है कि क्या यह परिणाम हताश-निराश-परेशान और आपस में ही जोर-आजमाइश कर रही भाजपा और उसके गठबंधन दलों के लिए इतनी बड़ी खुशी का पैगाम लेकर आया है कि वह इसी के सहारे विधानसभा चुनाव में भी करिश्मा कर लें, ऐसा कतई नहीं कहा जा सकता.

अव्वल तो यह है कि बिहार के चुनाव परिणामों में पिछले 20 सालों से एक दिलचस्प उदाहरण भी रहा है. कोई चुनाव परिणाम रिपीट नहीं हुआ. अगर 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद की पार्टी को भारी जीत मिली तो अगले ही साल 2005 में विधानसभा चुनाव में वे बिहार की सत्ता से बेदखल हो गए. 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा उपचुनाव हुआ तो लालू प्रसाद की पार्टी को कई जगहों पर जीत मिली, उसे भी सेमीफाइनल कहा गया था लेकिन अगले ही साल 2010 में जब विधानसभा चुनाव हुआ तो लालू प्रसाद की पार्टी और बुरी तरह से परास्त हो गई.

इसी तरह 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सारे रिकार्ड तोड़कर बिहार में जीत हासिल की और यह माना गया कि यह आंधी अभी विधानसभा चुनाव तक कायम रहेगी लेकिन एकाध माह में ही विधानसभा उपचुनाव में लालू-नीतीश की जोड़ी ने कमाल कर दिखाया, भाजपा पिछड़ गई. इस तरह हर छोटे चुनाव को सेमीफाइनल कहा जाता रहा है लेकिन वह सेमीफाइनल कभी फाइनल के बारे में निर्णय देने वाला नहीं हो सका है.

biharभाजपा के सामने यही और इतनी ही मुश्किल नहीं है. उसके पास रोज-ब-रोज चुनौतियां भी तो बढ़ती जा रही हैं. पप्पू यादव और जीतन राम मांझी ने साथ संवाददाता सम्मेलन कर और मांझी को एनडीए की ओर से सीएम पद का उम्मीदवार बनाए जाने की मांग कर अलग से सियासी हलचल पैदा कर दी है. हालांकि इस बारे में यह भी कहा जा रहा है कि यह भाजपा की ही सधी हुई चाल है कि मांझी और पप्पू यादव साथ मिलकर चुनाव लड़ें और उसमें किसी तरह ओवैसी का मिलान हो ताकि बिहार में त्रिकोणीय चुनाव हो और फिर उसके लिए राह कुछ आसान हो. भाजपा के लिए दूसरी मुश्किलें भी हैं. काफी दिनों से अदृश्य और पटना के ‘फरार सांसद’ कहे जाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता शत्रुघ्न सिन्हा भी अचानक प्रकट हो गए हैं. वे भाजपा के बडे़ से बड़े आयोजनों में नहीं दिखे थे लेकिन अब अचानक दिखे हैं तो बोलना शुरू कर दिया है. बोलना शुरू किया तो मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा के तमाम प्रत्याशियों को खारिज कर लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान का नाम आगे कर दिया. मुश्किल इतनी ही नहीं, भाजपा में खेमेबाजी इतनी तेज हो गई है कि सुशील मोदी की सभा में कभी बिहार का मुख्यमंत्री कैसा हो, सीपी ठाकुर जैसा हो… जैसे नारे भी आराम से लगाए जा रहे हैं. भाजपा की अपनी परेशानियां अपनी जगह बनी हुई हंै. विधान परिषद चुनाव परिणाम लालू-नीतीश के लिए झटका है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह भाजपा के लिए किसी बड़ी खुशफहमी को पालने का मौका दे दे.

इतनी ही नहीं, भाजपा में खेमेबाजी इतनी तेज हो गई है कि सुशील मोदी की सभा में कभी बिहार का मुख्यमंत्री कैसा हो, सीपी ठाकुर जैसा हो… जैसे नारे भी आराम से लगाए जा रहे हैं. भाजपा की अपनी परेशानियां अपनी जगह बनी हुई हंै. विधान परिषद चुनाव परिणाम लालू-नीतीश के लिए झटका है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह भाजपा के लिए किसी बड़ी खुशफहमी को पालने का मौका दे दे.

‘मुख्यमंत्री खुद व्यापमं घोटाले में शामिल हैं और मेरी मौत चाहते हैं’

व्यापमं से जुड़ा खौफ पिछले दिनों तब और बढ़ गया जब टीवी पत्रकार अक्षय सिंह की मृत्यु के बाद आशीष ने दावा किया कि अक्षय का इस घोटाले से जुड़े सात-आठ प्रमुख लोगों के नाम जान लेना ही उनकी मौत का कारण बना. इस पूरे कांड में मुख्यमंत्री की संदिग्ध भूमिका और एक व्हिसल-ब्लोअर होने के जोखिमों के बारे में आशीष चतुर्वेदी ने अमित भारद्वाज से बात की

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व्यापमं कांड के विरोध में उतरने की क्या वजह रही?

मेरी कैंसर पीडि़त मां के प्रति डॉक्टरों के व्यवहार और स्वास्थ्य विभाग में फैले भ्रष्टाचार ने मुझे गुस्से से भर दिया था. दिसंबर 2011 में मेरी मां का देहांत हुआ और उसके दो साल बाद ही मेरे भाई की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई और तब मैंने प्री-मेडिकल टेस्ट (पीएमटी) प्रवेशों में तेजी से बढ़ रहे भ्रष्टाचार को देखकर इसकी कलई खोलने की ठान ली. मेरा पूरा विश्वास है कि इन अनैतिक गतिविधियों के चलते ही स्वास्थ्य विभाग में इतनी अव्यवस्थाएं हैं.

कब और कहां से इन खुलासों की शुरुआत हुई?

इसके लिए मैंने 2009 बैच के पीएमटी छात्र बृजेंद्र रघुवंशी के साथ पूरा एक साल बिताया. बृजेंद्र अवैध तरीके से मेडिकल प्रवेश करवाने वाले एक रैकेट से जुड़ा हुआ था. जुलाई 2011 में मैंने पीएमटी काउंसलिंग के नाम पर हो रहे गैर-कानूनी प्रवेशों पर एक स्टिंग ऑपरेशन किया और घोटाले से जुड़े बड़े नामों जैसे डॉ. दीपक गुप्ता का नाम सामने लेकर आया. साथ ही इसमें मिलकर काम कर रहे निजी और सरकारी मेडिकल कॉलेजों के संगठित नेटवर्क का भी खुलासा किया. इस स्टिंग ऑपरेशन के आधार पर पीएमटी में हो रही इस धांधली से जुड़े 15 संदिग्धों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की गई थी.

क्या इन सब खुलासों से आपकी सुरक्षा पर कोई असर पड़ा है?

जी बिलकुल, इन खुलासों के दौरान मुझ पर तकरीबन 10 बार हमला हुआ जिसमें कई बार मैं घायल भी हुआ. कई बार, कई जगहों पर, यहां तक कि मेरे घर पर भी मुझे अनजान हमलावरों ने मार देने या टुकड़े करके फेंक देने की धमकी दी. दो सालों में मेरे 70 निजी सुरक्षा अधिकारी बदले जा चुके हैं, कुछ ने मुझे मेरे कामों के भयानक परिणामों के प्रति चेताया भी है पर मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है.

इन हमलों का जिम्मेदार कौन है?

शुरुआती हमले तो उन छात्रों ने करवाए थे, जो फर्जी प्रवेशों के मामले में मेरे किए खुलासों के बाद जांच के घेरे में आ गए थे. उनके वकीलों ने भी मुझ पर हमले करवाने की कोशिश की. जब मैं व्यापमं में फैली इस धांधली को जड़ से उखाड़ने के इरादे से और आगे बढ़ा तो सरकार भी इन हमलावरों की सूची में शामिल हो गई. मुझे सरकार से सुरक्षा तो मिली हुई है पर रूलिंग पार्टी मुझे रास्ते से हटाना चाहती है.

क्या आपका इशारा मुख्यमंत्री की ओर है?

जी हां, मुख्यमंत्री खुद व्यापमं घोटाले में शामिल हैं और मेरी मौत चाहते हैं. वो अपने सहयोगियों और रिश्तेदारों को बचाना चाहते हैं.

ये कैसे कह सकते हैं कि वो दोषियों को बचा रहे हैं?

मैंने ग्वालियर बेंच के एक पूर्व सहायक महाधिवक्ता (एडिशनल एडवोकेट जनरल) एमपीएस रघुवंशी के इस मामले में संलिप्त होने के खिलाफ कई बार मुख्यमंत्री के पास शिकायत दर्ज करवाई पर आज तक कोई एक्शन नहीं लिया गया, वो अब भी अपने पद पर बने हुए हैं. मेरे पास दस्तावेज हैं जो साबित करते हैं कि 2009 में हुए पीएमटी घोटाले की जांच में उन्होंने एक अभ्यर्थी को बचाया था और राजकीय फोरेंसिक साइंस लैब, सागर की एक रिपोर्ट में हेराफेरी करने के बदले दस लाख रुपये रिश्वत ली थी. शुरू में उन्होंने मुझे भी मुंह बंद रखने के लिए कीमत देने का प्रयास किया था. पर जब मैं नहीं माना तब वे बोले, ‘बहुत से लोग सड़क दुर्घटनाओं में मरते हैं. अगर मेरा नाम व्यापमं मामले में आया तो तुम सावधान रहना.’

आप  ‘शाखा’  के सदस्य है. पसंदीदा राजनेता कौन हैं?

मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पसंद करता हूं, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी पसंद हैं. हालांकि प्रधानमंत्री जी की कथनी और करनी में आ रहे फर्क को देखते हुए मेरा उनपर से विश्वास कम हुआ है. व्यापमं और शिवराज सिंह चौहान पर उनका मौन रहना दुखद है. मैंने 2 नवंबर 2014 को शिवराज सिंह चौहान सहित व्यापमं घोटाले से जुड़े 200-300 लोगों के नामों की सूची उन्हें भेजी थी पर वो सरकार को वापस भेज दी गई. अब वो ग्वालियर के एएसपी के पास है. आप खुद ही बताइए कैसे कोई एएसपी या इंस्पेक्टर जनरल (आईजी) भी राज्य के मुख्यमंत्री के खिलाफ जा सकता है?

रोजे बिना इफ्तार कैसा!

2_071215102610रमजान में कुछ खास तस्वीरों से अखबार मनोरंजक हो उठते हैं और समाचार चैनल सिनेमाई भव्यता पा जाते हैं. इस बार भी वही नजारा है. इफ्तार पार्टियों में सेकुलर कहे जाने वाले लीडरान चारखानेदार काफिए, गमछे गले में डाले, गोल जालीदार टोपियां लगाए रोजेदारों के साथ हाथ उठाए दुआ कर रहे हैं, निवाला तोड़ रहे हैं, खैरियत पूछ रहे हैं, खिलखिला रहे हैं. चारा सामने है, भाई मिल रहे हैं. वे साथ फोटो खिंचाने के लिए अचूक ढंग से हर बार कोई धार्मिक रंगत वाला चेहरा वैसे ही छांट लेते हैं जैसे आसमान में उड़ती चील अपने लिए कोई चूजा चुनती है.

इस रोचकता का एक कारण तो वह परिवर्तन है जो दीन के लगभग दीवाने मुसलमान का मेकअप और अभिनय करने के कारण इन नेताओं के चेहरों पर नुमायां हो जाता है. बरबस ख्याल चला आता है, अगर ये वाकई मुसलमान होते तो क्या ऐसे ही दिखते? वे लोग झूठे साबित होते लगते हैं जो दावा करते हैं कि वे किसी मुसलमान को शक्ल से पहचान लेते हैं. अगर हुलिए में ऐसा साफ नजर आने वाला कोई अंतर होता तो पहचान के उन पक्के तरीकों की जरूरत क्यों पड़ती जो दंगों के समय किसी की जान लेने से पहले आजमाए जाते हैं. तभी दिमाग बिल्कुल दूसरे छोर पर जाता है. देश में बहुत से मुस्लिम नेता भी हैं. वे कभी नवरात्र में कलश स्थापना के समय किसी मंदिर या घर में धोती पहने पूजा करते नहीं दिखाई देते. कहीं ऐसा तो नहीं है कि यह बहुमत की सीनाजोरी है! हम आपके धार्मिक अवसरों का इस्तेमाल अपनी राजनीति के लिए करेंगे लेकिन ऐसा ही आप करना चाहेंगे तो नहीं कर पाएंगे.

दस्तरख्वान के दृश्यों को दूर तक भेजने और चुनाव में भुनाने की नीयत से आयोजित की जाने वाली इस नौटंकी की उपयोगिता के बारे में सेकुलर नेताओं को पुख्ता यकीन है लेकिन वहीं कुछ और सुराग भी मिलते हैं जिससे मुसलमानों के वोट बैंक में बदलने की कीमियागिरी पर रोशनी पड़ती है. मिसाल के तौर पर यही कि कोई सेकुलर नेता अपने घर से गोल नमाजी टोपी और चारखाने का गमछा लेकर इन पार्टियों में नहीं जाता. तस्वीरों में उन्हें आराम से पहचाना जा सकता है जो उन्हें लपक कर टोपी पहनाते हैं और फोटो खिंचने तक के लिए अपनों में से एक बना लेते हैं. यह प्रजाति भाईचारे से अधिक सत्ता के करीब रहा करती है, बल्कि कहना चाहिए कि कौम और सत्ता के बीच बिचौलिए की भूमिका निभाती है. मुसलमानों के बीच उनके अपने नेताओं के उभरने के आसार दूर तक नहीं दिखाई देते अलबत्ता यही प्रजाति खूब फल-फूल रही है. इन्हीं के नक्शे कदम पर चलते हुए हिंदी पट्टी में अब सेकुलरों की चुनावी सभाओं में अरबी की छौंक लगे भाषण देने वाले जोशीले वक्ता भी किराए पर मिलने लगे हैं जो एक ही सीजन में कई पार्टियों के नेताओं के कसीदे गाते मिलते हैं.

धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र से नाभि-नाल जुड़ा हुआ एक बड़ा और आधुनिक विचार है जिसे भारतीय नेताओं ने अवसरवाद की ट्रिक या जुगाड़ में बदल दिया है. इस विरोधाभास पर गौर किया जाना चाहिए कि जो राजनीति में धर्म के दखल के खिलाफ हैं वे मुस्लिम धार्मिक प्रतीकों से खुद को नत्थी करने के लिए करोड़ों फूंक रहे हैं. भ्रष्टाचार के पैसे से वंशानुगत आधार पर पार्टियां चलाने, चुनाव लड़ने वाले अपराधी मिजाज के नेता सत्ता में भागीदारी, सरकार गिराने, गठबंधन बनाने-तोड़ने समेत सारे काम देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने की रक्षा करने के नाम पर करते हैं. धर्मनिरपेक्ष होना बहुत आसान है उसके लिए बस कुछ प्रतीकों की जरूरत पड़ती है जिनमें से टोपी लगाकर इफ्तार पार्टियों में जीमना भी एक है. कोई ताज्जुब नहीं है कि इन दिनों छद्म धर्मनिरपेक्षता एक ज्यादा वजनी शब्द हो गया है. मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने, उनकी हिफाजत करने का दावा करने वालों की विश्वसनीयता बुरी तरह गिरी है क्योंकि वे तिकड़मों से देश में सतत सांप्रदायिक तनाव और अगर वह मंदा पड़ने लगे तो दंगों की जरूरत को बनाए रखना चाहते हैं ताकि उनकी पूछ बनी रहे. पिछले लोकसभा चुनाव में गोधरा का कलंक माथे पर होने के बावजूद मोदी को जो धमाकेदार जीत मिली उसका कारण सिर्फ कांग्रेस का कुशासन ही नहीं सेकुलरों की तिकड़मों का बेनकाब हो जाना भी है.

गनीमत है कि मुसलमानों की नई पीढ़ी इस नौटंकी को समझने लगी है. मुसलमान नौजवान पूछ रहे हैं कि जो रोजा नहीं रखते वे इफ्तार क्यों करते हैं?

गुंडागर्दी का समाजवाद!

river miningलखनऊ के सिविल अस्पताल के बर्न वार्ड में बुरी तरह झुलसे जगेंद्र सिंह बार-बार सिर्फ एक ही सवाल पूछते हैं, ‘उन्होंने मुझे जलाया क्यों? अगर मंत्री और उनके गुंडों को मुझसे कोई दुश्मनी ही थी तो मुझ पर केरोसीन डालने कि बजाय मुझे पीट लेते!’ जगेंद्र 60 प्रतिशत तक जल चुके थे और ये अच्छी तरह समझ चुके थे कि उनका बचना मुश्किल है. उस भीषण पीड़ा को लगभग आठ दिन तक सहने के बाद जगेंद्र ने 8 जून को दम तोड़ दिया.

इसके साथ ही वे देश के सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य की बेईमान प्रशासनिक व्यवस्था का एक और शिकार बन गए, वो राज्य जहां कई बार एक माफिया डॉन और राजनेता में फर्क कर पाना मुश्किल होता है. वह राज्य जहां प्रशासन की गल चुकी व्यवस्थाओं के खिलाफ आवाज उठाने की सजा मौत है, जैसा जगेंद्र सिंह के साथ हुआ. जगेंद्र को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में उनके परिवार वालों के सामने जिंदा जला दिया गया था. इस दुष्कृत्य का आरोप राज्य के एक मंत्री राममूर्ति वर्मा और उनके आदमियों पर है. गौरतलब है कि मंत्री ‘जी’ फरार हैं और एक हफ्ते के अंदर आजम खान की भैंसों को ढूंढ लेने वाली ‘सजग’ उत्तर प्रदेश पुलिस वर्मा को पकड़ पाने में असमर्थ है.

आईटीआई में ट्रेनिंग लेने के बाद जगेंद्र ने कुछ समय निजी फर्मों में काम किया, कुछ दिनों बाद पत्रकारिता ने उनका ध्यान आकर्षित किया और वो कलम की ताकत को जानने लगे. थोड़े समय कुछ संस्थानों के साथ काम करने के बाद उन्होंने फ्रीलांस (स्वतंत्र रूप से) काम करने की ठानी क्योंकि किसी भी संस्थान के अधीन काम करने में कई खबरों पर अनुचित रूप से कैंची चलानी पड़ती है या अपने असल विचारों को दबाकर संस्थान के अनुरूप लिखना पड़ता है.

कुछ समय बाद जगेंद्र ने ‘शाहजहांपुर समाचार’ के नाम से एक फेसबुक पेज शुरू किया. जल्द ही ये पेज स्थानीय खबरों और खुलासों का महत्वपूर्ण स्रोत बन गया. उन्हें अपराध और राजनीति से जुड़ी रिपोर्टिंग में खासी दिलचस्पी थी और इसी के चलते वो भ्रष्टाचार के एक बड़े केस तक पहुंचे जिसके सिरे लखनऊ में बैठे मंत्री राममूर्ति वर्मा से जुड़ते थे. जगेंद्र ने इस बारे में अपने फेसबुक पेज पर वर्मा पर आरोप लगाया कि उन्होंने बहुत बड़े भूखंड का गैरकानूनी रूप से अधिग्रहण कर के उस पर खनन कर के ढेर सारा पैसा कमाया है. उन्होंने वर्मा पर बलात्कार का भी आरोप लगाया था. चूंकि जगेंद्र के पेज की अच्छी पहुंच थी, इसलिए ये बातें फैलने में देर नहीं लगीं.

जगेंद्र के परिजनों के अनुसार, 1 जून को इंस्पेक्टर श्री प्रकाश राय के नेतृत्व में पुलिसकर्मियों का एक दल मंत्री वर्मा के बाहुबलियों के साथ उनके घर पहुंचा. गाली-गलौज और धमकियों के बाद उन्होंने जगेंद्र को आग लगा दी. इस बीच बेबस परिजन चिल्लाते रहे, पड़ोसियों से मदद की गुहार लगाते रहे.

जगेंद्र को उसके घर पर ही अधमरी हालत में छोड़कर पुलिस ने अपने रिकॉर्ड में ये दर्ज किया कि उसे गिरफ्तार करने के लिए किए गए छापे में उसने खुद को आग लगा ली. सोशल मीडिया पर मुद्दा उठने, जगेंद्र के मरने से पहले दिए गए बयान का वीडियो वायरल होने और जगेंद्र के बेटे के बयान कि मंत्री वर्मा के कहने पर ही उसके पिता को जलाया गया, के सामने आने के बाद ही शाहजहांपुर के पुवायां पुलिस थाने में मंत्री राममूर्ति वर्मा और पुलिस वालों को मिलाकर कुल पांच लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई.

हालांकि अगर समाजवादी पार्टी के राज में हुए पिछले वाकयों को देखें तो ये शुरुआत से ही साफ हो गया था कि वर्मा को बचाने की हरसंभव कोशिश की जाएगी. सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल यादव, राममूर्ति वर्मा के बचाव में आ चुके हैं. वर्मा पर लगे आरोपों पर क्या कदम उठाया जाएगा, ये सवाल पूछने पर शिवपाल कहते हैं, ‘ऐसा कई बार पहले भी हो चुका है कि मंत्रियों पर आरोप लगे हैं पर कभी कुछ साबित नहीं हो पाया है.’ शिवपाल यादव राज्य सरकार में लोक निर्माण विभाग मंत्री हैं और इस बात से साफ इंकार करते हैं कि जब तक मामले की जांच पूरी नहीं हो जाती तब तक वर्मा को मंत्री पद से नहीं हटाया जाएगा. उन्होंने ये भी कहा कि वर्मा की कुर्सी अभी सुरक्षित है. शिवपाल यादव अपनी ऊटपटांग बयानबाजी के लिए भी जाने जाते हैं. ये वही नेता हैं जिन्होंने कुख्यात ‘निठारी कांड’ को ‘छोटा और सामान्य’ बताया था. ये संवेदनहीनता पार्टी के डीएनए में घुली लगती है. एक और कैबिनेट मंत्री पारसनाथ यादव भी वर्मा के पक्ष में हैं, ‘कुछ घटनाएं कुदरत और किस्मत के हाथ में ही होती हैं और आप किस्मत से तो नहीं लड़ सकते.’ राममूर्ति वर्मा के साथ पूरे प्रशासन के दृढ़ता से खड़े होने के कारण स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर के पत्रकार इस मुद्दे पर बोलने से बचते रहे, ऐसे में जब तक राज्य सरकार कोई कदम नहीं उठाती, मृतक के परिजनों के पास सिर्फ अनिश्चितकालीन धरने पर बैठने का विकल्प बचा था. ये सिर्फ सोशल मीडिया था जो खुलकर जगेंद्र के परिजनों के साथ खड़ा था और इसी के चलते राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया मेंे ये मुद्दा उठाया गया.

I‘तहलका’ को मिली जानकारी के अनुसार, जब ये सब चल रहा था, राममूर्ति वर्मा की गिरफ्तारी की मांग की जा रही थी और पुलिस द्वारा उन्हें फरार घोषित कर दिया गया था, वो और उनके सहायक शाहजहांपुर के निकट ही समाजवादी पार्टी के एक और नेता के फार्महाउस पर जश्न मना रहे थे.

इस मुद्दे पर राज्य सरकार ने गहरी चुप्पी साधी हुई थी पर सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका के आधार पर केंद्र और राज्य सरकार दोनों को इस मामले की सीबीआई जांच कराने के लिए नोटिस जारी किया है. इसके बाद ही मुख्यमंत्री अखिलेश यादव मृतक के परिजनों से मिले और उन्हें अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल खत्म करने के लिए कहा. राज्य सरकार ने मुआवजे के बतौर जगेंद्र के परिवार को तीस लाख रुपये और दो परिजनों को नौकरी देने की भी बात कही है. आश्चर्य की बात नहीं है कि ऐसे माहौल में समाजवादी पार्टी के निचले स्तर तक के नेता और उनके साथी लगातार अपराधों से जुड़े हुए हैं क्योंकि वो जानते हैं कि उन्हें इनकी सजा नहीं मिलेगी. पार्टी के नेतृत्व पर नजर डालें तो तस्वीर और साफ होती है. पहला चेहरा विनोद सिंह उर्फ पंडित सिंह का है जो राज्य में माध्यमिक शिक्षा मंत्री हैं पर जब वो बोलना शुरू करते हैं तब किसी भी बच्चे को उनके पास से भी नहीं गुजरना चाहिए. पंडित सिंह गाली-गलौज भरी भद्दी भाषा का ऐसा मुजाहिरा करते हैं कि ‘शिक्षा मंत्री’ की ही शिक्षा पर संदेह होने लगता है. पंडित सिंह और विवादों का पुराना नाता है. उनके खिलाफ कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें लापरवाही से मौत, हमला करवाना और रैश ड्राइविंग प्रमुख हैं. अक्टूबर 2012 में उन्हें मंत्रालय से हटा दिया गया था क्योंकि उन्होंने गोंडा के चीफ मेडिकल ऑफिसर (सीएमओ) को अपहृत करके मारा-पीटा था. सीएमओ का अपराध यह था कि उसने कुछ नियुक्तियों के मामले में मंत्री ‘जी’ का फरमान मानने से मना कर दिया था.

इन सबसे अनजान गोंडा के ही एक युवक आकाश अग्रवाल ने अपने फेसबुक अकाउंट पर स्थानीय अखबार में आई एक खबर साझा की, जिसमें लिखा था कि कैसे पुलिस वालों ने मंत्री पंडित सिंह की गाड़ी के शीशे से काली फिल्म उतारी. उस अखबार के पास जाने से आसान उन्हें आकाश को धमकाना लगा. उन्होंने आकाश के पिता की दुकान बंद करवाने के लिए पुलिस को भेजा, आकाश को फोन कर के गाली-गलौज की और धमकाया. यहां तक कि पुलिस आकाश के पिता को मंत्री ‘जी’ के पास लेकर गई जहां उन्हें कथित रूप से धमकाया गया कि उन्हें फर्जी आरोप में जेल भेजा जा सकता है और वो ‘मर के ही वहां से वापस आ पाएंगे’.

अगर राज्य में फैली अराजकता की स्थिति अब भी साफ न हुई हो तो राज्य के खनन मंत्री गायत्री प्रजापति के मुद्दे पर नजर डालिए. हाल ही में हुई एक घटना में लखनऊ में एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल की पूरी टीम (ओबी वैन के ड्राइवर और इंजीनियर सहित) के साथ बेरहमी से, उनके चैनल के दफ्तर के ही सामने मारपीट की गई. क्यों? क्योंकि चैनल ने प्रजापति के काले-कारनामों की खबर दिखाने की जुर्रत की. लखनऊ की मीडिया के लगातार दबाव के बाद लखनऊ के गौतमपल्ली थाने में मामला तो दर्ज किया गया पर अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है.

प्रजापति पहले ही कथित तौर पर अपने कार्यालय का दुरुपयोग करके सैकड़ों करोड़ की संपत्ति जमा करने के मामले में लोकायुक्त की जांच के घेरे में हैं. लोकायुक्त जस्टिस (रिटा.) एनके मेहरोत्रा ने पिछले साल दिसंबर में प्रजापति के खिलाफ जांच तब शुरू की, जब ओम शंकर द्विवेदी नाम के एक व्यक्ति ने प्रजापति और उनके रिश्तेदारों द्वारा गलत तरीकों से राज्य में हासिल की गई संपत्ति के बारे में 1,727 पृष्ठों की शिकायत याचिका दर्ज करवाई. उन पर अनिवार्य पर्यावरणीय मंजूरियों के बिना अपने सगे-संबंधियों को खनन लाइसेंस जारी करने का भी आरोप है. जैसे ही लोकायुक्त ने मंत्री के खिलाफ जांच और पूछताछ शुरू की, कथित रूप से उनके साथियों की खोली गई ये फर्जी कंपनियां बंद होने लगीं. शिकायत में उन पांच कंपनियों के भी नाम थे जिनमें प्रजापति की पत्नी और बेटा निदेशक थे.

दिलचस्प बात ये है कि आज लगभग 900 करोड़ की संपत्ति के मालिक प्रजापति 2002 में बीपीएल कार्ड होल्डर थे. 2012 में उन्हें गरीबी रेखा से ऊपर का प्रमाण पत्र मिला है. इसी साल उन्होंने 1.13 करोड़ की पूंजी की घोषणा भी की थी. वर्तमान में वे लक्जरी गाड़ियों के एक बेड़े के मालिक हैं.

उत्तर प्रदेश के एक और मंत्री जो गलत कारणों से ही चर्चाओं में हैं, वो हैं कैलाश चौरसिया. कैलाश मिर्जापुर से विधायक और राज्य सरकार में बेसिक शिक्षा और बाल विकास मंत्री हैं. चौरसिया पर एक असिस्टेंट रोड ट्रांसपोर्ट ऑफिसर (एआरटीओ) चुन्नीलाल को पीटने का आरोप है. चुन्नीलाल ने चौरसिया की अनुचित मांग को न मानने पर ये सजा पाई.

चुन्नीलाल ने मीडिया को बताया, ‘एक दोपहर मंत्री जी ने मुझे अपने दफ्तर बुलाया और मेरे दफ्तर के एक क्लर्क को जॉइनिंग संबंधी कागज देने से मना किया. मैंने उन्हें बताया कि इस मामले में हाईकोर्ट का आदेश है और ऐसा करना बहुत जरूरी है वरना हम पर कोर्ट की अवमानना को लेकर कार्रवाई हो सकती है.’

उन्होंने आगे बताया कि इतना सुनते ही मंत्री उत्तेजित हो गए और उन्हेंे मारने- पीटने और गाली देने लगे. एआरटीओ ने कटरा पुलिस थाने में इसकी रिपोर्ट दर्ज करवानी चाही पर अब तक कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई है. पुलिस का कहना है कि उन्हें इस बारे में कोई शिकायत नहीं मिली है. चौरसिया को इस साल मार्च में, मिर्जापुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 1995 में हुए एक डाकिए को धमकाने और दुर्व्यवहार के मामले में दोषी पाया था. हालांकि मई में जिला अदालत ने उन्हें इस मामले से बरी कर दिया.

समाजवादी पार्टी की ‘प्रतिष्ठा’ को और बढ़ाने वाला नाम राज्यसभा सांसद चंद्रपाल सिंह यादव का है. पिछले दिनों उनकी एक सरकारी अधिकारी को धमकाने वाली ऑडियो क्लिपिंग सामने आई है. मामला तहसीलदार गुलाब सिंह के अवैध खनन में लिप्त एक ट्रैक्टर को जब्त करने से शुरू हुआ. चंद्रपाल ने उन्हें फोन कर के दबाव बनाया कि ट्रैक्टर छोड़ दिया जाए पर जब गुलाब सिंह ने ऐसा करने से मना कर दिया तब चंद्रपाल ने उन्हें खतरनाक नतीजों का डर दिखाकर धमकाना शुरू कर दिया. ऑडियो रिकॉर्डिंग में गुलाब सिंह कहते हैं, ‘सर, मुझे माफ कीजिए पर ये लोग सरकार की साख खराब कर रहे हैं, ये हमारे लिए शर्म की बात है कि दिन के उजाले में ये सब हो रहा है.’ जिस पर सांसद जवाब देते हैं, ‘तो क्या तुम सरकार की साख बढ़ा रहे हो?’ बात आगे बढ़ती है तो सांसद कहते हैं, ‘हां, बहुत अच्छे! तुम आला दर्जे के चोर हो. अगर अभी पैसा मिल जाता तो तुम तुरंत ट्रैक्टर छोड़ देते.’ जब इस पर भी तहसीलदार नहीं माने तब सांसद ने अपना तुरूप का पत्ता फेंका, ‘मुझे तुम्हें जिंदगी भर का सबक सिखाने में बस 24 घंटे लगेंगे. मैं कह रहा हूं, इसका नतीजा बहुत बुरा होगा.’

शायद इस अधिकारी को खुद को भाग्यशाली मानना चाहिए कि इस तकरार के बाद भी सिर्फ उनका तबादला हुआ. उन्हें झांसी से कानपुर देहात भेज दिया गया. ये देश का कड़वा सच है कि एक ईमानदार अफसर के कमजोर पड़ते ही एक भ्रष्ट नेता को इस तरह के कारनामे करने के लिए प्रोत्साहन मिल जाता है.