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जो सच बोलेंगे, मारे जाएंगे…

Seema Azaad2इसी वर्ष एक जून को  के पत्रकार जगेंद्र को जिस तरह एक मंत्री के आदेश पर जिंदा जला दिया गया, वह दिल दहला देने वाला था. जगेंद्र एक स्वतंत्र पत्रकार थे और उनकी हत्या के आरोपी  की मौजूदा सरकार में राज्य मंत्री हैं. इससे भी जरूरी परिचय ये है कि वे क्षेत्र के खनन माफिया हैं, जिनके खिलाफ जगेंद्र ने लिखने की जुर्रत की थी. परिणाम उन्हें भुगतना पड़ा. जगेंद्र को जलाकर मार डालने की यह घटना नेताओं, माफियाओं के खिलाफ खड़े पत्रकारों पर दमन की ताजा बर्बर मिसाल है.

2009 में जब पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में छत्रधर महतो के संगठन ने आताताई सरकार को वहां से बाहर निकलने पर मजबूर कर दिया था, उसी संदर्भ में तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने खुलेआम धमकी दी थी कि छत्रधर महतो और उनके पक्ष में लिखने-बोलने वालों पर भी यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि निरोधक कानून) लगाया जाएगा. यह धमकी सीधे-सीधे मानवाधिकार कर्मियों के साथ पत्रकारों को भी थी. 2010 की फरवरी में जब यूपी एसटीएफ ने मुझे गिरफ्तार किया तो उनके सवाल थे-

‘लालगढ़ की घटना के लिए मुख्य तौर पर आप किसे जिम्मेदार मानती हैं?’

‘आपने लालगढ़ पर ही क्यों लिखा, कोई दूसरा विषय नहीं था?’

मुझे तुरंत चिदंबरम की धमकी याद आई थी. इसके अलावा कुछ और सवाल थे-

‘घूरपुर के किन-किन गांवों में गई हैं?’(इलाहाबाद का यह क्षेत्र यमुना के किनारे है और खनन माफियाओं के खिलाफ पारंपरिक बालू मजदूरों और उनके आंदोलनों के लिए जाना जाता है, जिस पर मैंने लेख लिखा और इनका पक्ष भी लिया)

‘एआईकेएमएस से आपका क्या रिश्ता है?’ (ये बालू मजदूरों का संगठन है)

‘दस्तक (पत्रिका, जिसे मैं अन्य लोगों के सहयोग से निकालती हूं) का सर्कुलेशन कहां-कहां हैं?’

‘बलिया और फर्रूखाबाद (जहां मैं गंगा एक्सप्रेस वे और इसके खिलाफ होने वाले आंदोलनों के बारे में जानने और लिखने के लिए गई थी) में किस-किस को जानती हैं?’

‘महिला मुद्दे तो ठीक हैं, लेकिन आप दलितों और मुसलमानों के मुद्दों पर क्यों लिखती हैं?’

ध्यान दें, ये सारे सवाल मेरे पत्रकारिता जीवन से जुड़े सवाल हैं, न कि मेरे माओवादी होने या न होने से. गिरफ्तारी के तुरंत पहले मैंने आपरेशन ग्रीन हंट के खिलाफ एक पुस्तिका भी निकाली थी, जिसका शीर्षक था ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट : आदिवासियों को उजाड़ने की साजिश, समस्या कौन, माओवादी या भारतीय राज्य.’ यह शीर्षक दरअसल हिमांशु कुमार के एक लेख का है. इस पुस्तिका के विमोचन कार्यक्रम के दौरान ही मैं निशाने पर आ गई थी और मुझे मेरे फोन रिकॉर्ड होने के संकेत मिलने लगे थे. गिरफ्तार करने के बाद उन्होंने मुझसे जो सवाल पूछे उससे जाहिर है कि उन्हें समस्या मेरे माओवादी होने की नहीं थी, बल्कि पत्रकार होने से थी. ऐसी पत्रकार जिसके लेख उनके लिए असुविधाजनक स्थितियां खड़ी कर रहे थे.

मेरी गिरफ्तारी के बाद एनडीटीवी के एक कार्यक्रम में बरखा दत्त ने तत्कालीन मंत्री मणिशंकर अय्यर से सवाल पूछा कि उत्तर प्रदेश की एक पत्रकार सीमा आजाद को यह आरोप लगाकर जेल में डाला गया है कि उसके पास से माओवादी साहित्य मिला है, न कि कोई हथियार. हम पत्रकार साक्षात्कार के लिए या लेख लिखने के लिए माओवादियों या अलगाववादियों से मिलते भी हैं और उनका साहित्य भी पढ़ते हैं. इस तरह तो हम सभी खतरे में हैं?  जवाब में मणिशंकर अय्यर ने जो कहा वह महत्वपूर्ण है. उन्होंने कहा, ‘गैरकानूनी साहित्य रखना हथियार रखने से भी बड़ा अपराध है. हमें ये अंतर समझना होगा कि हथियार उतना खतरनाक नहीं है, जितना कि विचार.’ मणिशंकर अय्यर का यह वक्तव्य स्पष्ट कर देता है कि सरकारें और उनके बनाए कानून लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में कैसे सोचते और काम करते हैं. इस तरह इनके निशाने पर पत्रकारों का एक समूह हमेशा ही रहेगा, जो उनसे विरोधी विचार रखता है.

वास्तव में पत्रकार जब कुछ लिख रहा होता है तो वह किसी न किसी विचार को ही फैला रहा होता है. जब यह विचार सरकारों के विचार से मेल खाता है तो उस पत्रकार को पुरस्कारों और दूसरी बहुत-सी सुविधाओं से नवाजा जाता है और जब ये विचार सरकारों के विरोध में होती हैं तो उन्हें धमकी मिलती है, धक्के खाने पड़ते हैं, जेल जाना पड़ता है, कई बार तो जान से हाथ भी धोना पड़ता है. पिछले 25-30 सालों से सरकारों की आर्थिक नीतियां जितनी आक्रामक होती जा रही हैं, पत्रकार इनका दो तरीकों से शिकार हो रहे हैं. पहला ऐसे कि वे ज्यादा से ज्यादा अपने मालिक के गुलाम बनाए जा रहे हैं, उनकी छंटनी, बेगारी कराने और तमाम सुविधाओं को छीने जाने की तलवार ज्यादा धारदार होती जा रही है. दूसरी ओर वे सरकारों का सीधा शिकार भी हो रहे है. यानी निशाने पर सिर्फ जनद्रोही नीतियों की मुखालफत करने वाले सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं हैं, बल्कि सच कहने वाला पत्रकार भी हैं.

व्यापमं मामले में अन्य लोगों के अतिरिक्त इस पर खोजी रिपोर्टिंग करने गए दो पत्रकारों की रहस्यमय मौत का मामला अभी ताजा ही है. इसके पहले भी पत्रकारों के दमन का सिलसिला है. कुछ सालों का ही उदाहरण देख लें तो 2014 के सितंबर महीने में गुवाहाटी से एक टीवी पत्रकार जैकलांग ब्रह्मा को गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तारी के कुछ ही दिन पहले उन्होंने ‘डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ असम’ के एक धड़े के कमांडर का साक्षात्कार लिया था. पुलिस का आरोप है कि जैकलांग इसी संगठन से जुड़ाव रखते हैं.

2002 में कश्मीर टाइम्स के पत्रकार इफ्तिखार गिलानी को आईएसआई का एजेंट बताकर गिरफ्तार कर लिया गया और उनके पास से ऐसे दस्तावेज होने का हौव्वा बनाया गया, जो वास्तव में भारतीय कानून की नजर में भी गैरकानूनी नहीं थे.

2008 की जनवरी में रायपुर के एक पत्रकार प्रफुल्ल झा को गिरफ्तार कर कहा गया कि वे माओवादियों के शहरी नेटवर्क को खड़ा करने में सहयोगी थे. इस मामले में वे 7 साल सजा काटने के बाद इसी साल की शुरुआत में बाहर आए हैं. उन्हें सजा दिलाकर संतुष्ट होने के बाद पुलिस ने बयान दिया कि प्रफुल्ल माओवादी नहीं हैं, उन्हें इसलिए गिरफ्तार किया गया था ताकि इससे दूसरों को सबक मिल सके.

2008 के ही मार्च महीने में तमिलनाडु के पत्रकार जयप्रकाश सित्ताम्पलम को गिरफ्तार किया गया. वे संडे टाइम्स से जुड़े तमिलनाडु के प्रतिष्ठित पत्रकार हैं. उन पर लिट्टे से संबंध रखने का आरोप लगाकर राज्य की सरकार ने न सिर्फ गिरफ्तार किया, बल्कि 20 साल की सजा भी सुनाई. इस सजा की आलोचना तो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी की.

2008 में ही देहरादून के पत्रकार प्रशांत राही को गिरफ्तार कर लिया गया. वे सालों तक ‘स्टेट्समैन’ से जुड़े रहे और जब उन्हें गिरफ्तार किया गया, उस समय वे पत्रकार से ‘एक्टिविस्ट’ की भूमिका में आ चुके थे क्योंकि उन्हें लगने लगा था कि पत्रकार के तौर पर वे समाज परिवर्तन का जमीनी काम नहीं कर पा रहे हैं. सरकारों के लिए यह ‘नीम चढ़े करेले’ जैसा था और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर तमाम फर्जी आरोपों से नवाज दिया.

उत्तराखंड के ही पत्रकार हेम चंद्र पांडेय को तो गिरफ्तार करने की बजाय सीधे मार डाला गया. मारे जाने के समय हेम माओवादी पार्टी के नेता आजाद के साथ थे. दोनों को पकड़कर ठंडे दिमाग से मारा गया और इसे मुठभेड़ का नाम दिया गया. सरकारी निजाम इसकी जांच कराने को भी तैयार नहीं हुआ. हेम को भी पहले माओवादी ही बताया गया, जब लोगों ने उसे पहचाना तब सरकार ने माना कि वो दिल्ली का एक उभरता हुआ पत्रकार था. गौरतलब है कि हेम चंद्र के लिखे और छपे लेखों में एक लेख का शीर्षक था ‘पत्रकारिता का पेशा हुआ जोखिम भरा’. इस जोखिम को समझते हुए भी उसने माओवादी नेता आजाद से मिलने की हिम्मत की और सरकारी गोली का शिकार हुआ.

इनके अलावा भी ऐसे न जाने कितने पत्रकार होंगे जिन्हें अनाम रहते हुए ही कुचल दिया गया. जरूरी नहीं कि उन्हें जेलों में ठूंसकर या उनकी हत्या कर ही कुचला गया हो, बल्कि इस बात का खौफ दिखाकर भी न जाने कितने साहसी और समाजोपयोगी पत्रकारों को आकार लेने के पहले ही खत्म कर दिया गया होगा. इनकी जगह जिन पत्रकारों का जन्म हुआ, उनसे कौन-से समाज को लाभ मिल रहा है, ये आसानी से समझा जा सकता है. यह पूरी एक व्यवस्था है जो ऐसे पत्रकारों को जन्म देती है, जिनका मकसद पत्रकारिता से सिर्फ कमाई करना ही नहीं, बल्कि ‘पैसे बनाना’ है. पत्रकारिता के पेशे में आए ज्यादातर नौजवान आदर्शवादी ही होते हैं. सच लिखना, सच लिखकर नेताओं की पोल खोलना, समाज में परिवर्तन लाना आदि ज्यादातर नवागंतुक पत्रकारों का सपना होता है लेकिन इनमें से ज्यादातर के आदर्शों का हरण हो जाता है और उनकी पत्रकारिता का क्षरण. इनमें से कई तो पत्रकार से दलाल की भूमिका में आ जाते हैं, खबरों की दलाली शुरू कर देते हैं. मैंने अपने इर्द-गिर्द भी ऐसे पत्रकारों को बनते देखा है.

अपनी पत्रकारिता की शुरुआत मैंने देहरादून से की थी. जिस समय मैं वहां के एक अखबार से जुड़ी, तीन लोग और जुड़े. हम सब एक जैसी स्थिति वाले लोग ही थे. हमारे पास अपनी गाड़ी नहीं थी, रिपोर्टिंग के लिए टेम्पो से ही जाया करते थे. मेरे साथ दो लड़के जो क्राइम रिपोर्टर थे. उनमें से एक ने एक-दो महीने के भीतर ही अपने पैसे से बाइक खरीद ली, जबकि हमारी तनख्वाह इतनी थी ही नहीं. कुछ दिन बाद जब हम सबमें अच्छी दोस्ती हो गई तो उसने मुझे इसका राज बताया कि ये गाड़ी उसने पुलिस वालों की मदद से खरीदी है जिनकी खबरें वह उनके अनुसार ही लिखा करता है. जब मैंने आश्चर्य जताया और इसे गलत बताया तो उसने कहा कि तुम ऐसे ही रह जाओगी. कुछ दिन बाद मेरी साइकिल चोरी हो गई,  मैंने उसे ये बात बताई तो उसने कहा कि तुमने मुझे पहले ही क्यों नहीं बताया. मैंने कहा कि अरे इतने दिन बीत गए अब उसे पुलिस भी नहीं खोज सकेगी. उसने हंसते हुए कहा, ‘अरे तुम्हारी वाली नहीं मिलेगी तो, दूसरी दिला दूंगा पुलिस वालों से.’ मैंने मना कर दिया पर उसकी ऐसी बातें सुनकर मैं उस वक्त आश्चर्य में पड़ जाती थी. उस वक्त मैं इतनी समझदार भी नहीं थी कि इन बातों का सही विश्लेषण कर पाती, पर इस रास्ते की ओर मेरा आकर्षण कभी नहीं बना. मुझे मेरी मेहनत से लिखे लेखों को छपा हुआ देखना ही अच्छा लगता था. प्रशांत राही उस वक्त देहरादून में स्टेट्समैन में पत्रकार थे. उनसे भी मेरी जान-पहचान थी. वे भी मुझे लेखों के विषय पढ़ने और लिखने के लिए सुझाया करते थे. उस वक्त देहरादून का मुख्य डाकघर ही उनका ऑफिस हुआ करता था, जहां से वे अपनी खबरें लिखकर अखबार को भेजा करते थे. वे पत्रकारों के घुमंतू और ‘जगलर’ घेरे से दूर रहते थे, प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी कम ही जाते थे. जब मेरी उनसे दोस्ती हो गई तो वे मुझे भी इनसे दूर रहने को कहते थे. इस कारण ज्यादातर पत्रकार प्रशांत को पसंद नहीं करते थे, उन्हें घमंडी कहते थे. मैं क्योंकि इस क्षेत्र में नई थी, इसलिए मुझे तो इनका घेरा आकर्षित करता था लेकिन जब उनकी चर्चा का स्तर देखती थी, तो प्रशांत राही की हिदायत सही भी लगती थी. मैं इन दोनों के बीच झूलती रही. अब जबकि मैं दूर खड़ी होकर अपने पत्रकारी जीवन की इस शुरुआत को देखती हूं तो लगता है कि प्रशांत की बात सही थी, लेकिन उनके बीच रहकर मुझे जो अनुभव मिला वो भी उतना ही महत्वपूर्ण है. शायद हर नया पत्रकार इसी उधेड़बुन से गुजरता होगा और अपना रास्ता चुनता होगा कि उसे कैसा पत्रकार बनना है. सच को सामने लाने के खतरे उठाने वाला, सुरक्षित रहते हुए सिर्फ नौकरी करने वाला या पत्रकारिता से पैसे बनाने वाला.

किताबों में पत्रकारों को तटस्थ रहना सिखाया जाता है. वास्तव में उन्हें तटस्थता के नाम पर समाज से कटे रहना सिखाया जाता है लेकिन जमीन पर ‘तटस्थता’ जैसी कोई स्थिति होती नहीं है. जब पूरा समाज पक्षों में बंटा हो तो पत्रकार कैसे तटस्थ हो सकता है. उसे सही या गलत कोई पक्ष चुनना ही होता है, तभी न केवल वह अच्छा और बौद्घिक पत्रकार बन सकता है बल्कि सिर्फ तभी वह सही रिपोर्टिंग भी कर सकता है. वास्तव में ‘तटस्थता’ भी अपने आप में एक पक्ष है, जो इस संदर्भ में ज्यादातर नकारात्मक होती है. पत्रकारिता में प्रगतिशीलता तटस्थता का दूसरा पक्ष है.

इससे ही जुड़ी एक महत्वपूर्ण बात ये भी है कि सच लिखने वाले नेताओं, माफियाओं, नौकरशाहों की पोल खोलने वाले पत्रकारों का दायरा इतने दमन के बीच भी अपने काम में मुस्तैदी से लगा है. ऐसे पत्रकारों की एक खेप हर साल आती है. वास्तव में यह देखना महत्वपूर्ण है कि हमारे संवैधानिक अधिकारों के चलते सच लिखना उतना मुश्किल भी नहीं है और सच लिखने वाले बहुत से पत्रकार आज बेहद सफल भी है. उन्होंने अपना एक मुकाम बनाया है. सरकारों को उनसे कोई खास शिकायत भी नहीं होती है. थोड़ी असुविधा भले ही हो सकती है. उसे समस्या तभी लगती है, जब पत्रकार सच लिखने के साथ-साथ सरकार विरोधी आंदोलनों की आवाज बनने लगता है. जब उसके लिखे द्वारा आंदोलन की खबरें फैलने लगती हैं,  तब उसका काम सरकार विरोधी मान लिया जाता है और उसकी सजा दी जाती है, जो जेल से लेकर मौत तक हो सकती है. ऊपर जितने पत्रकारों का जिक्र है उनसे सरकारों को यही खतरा था. यह खतरा सिर्फ भारत की सरकार को ही नहीं है बल्कि पूरी दुनिया की सरकारों को है.

‘कमेटी फॉर प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट’ के मुताबिक सन 2014 में पूरी दुनिया में कुल 221 पत्रकारों को जेल भेजा गया. 2013 में 211 और 2012 में 232 पत्रकारों को. इनमें से ज्यादातर सरकार की अलोकतांत्रिक नीतियों के खिलाफ और आंदोलनों के पक्ष में लिखने वाले पत्रकार हैं. यानी खतरा ऐसे पत्रकारों से ही है जो आंदोलन का बीज बोते हैं या उसका परागण करते हैं. देश में आजादी की लड़ाई के समय में भी इस तरह के पत्रकार मौजूद थे जिन्होंने इसका दंश झेला. आज भी इस खतरे को उठाते हुए बहुत से पत्रकार इस जमात में शामिल हो रहे है और इसे मजबूत कर रहे हैं. वर्ना पत्रकारिता की जो स्थिति है उसे देखते हुए उसे लोकतंत्र का चौथा खंभा कहे जाने पर ही कई सवाल खड़े होते हैं. जैसे- वो कैसा लोकतंत्र है जिसके लिए मीडिया जगत खंभा बना हुआ है? वास्तव में वो कौन हैं जो इस खंभे की नींव हैं- मीडिया के कॉरपोरेट घराने या पत्रकार? पत्रकारों को इस लोकतंत्र के लिए खंभा बने रहना आवश्यक है या इसे कंधा देना? आखिर में- इस खंभे का बने रहना जरूरी है या इसका ढह जाना, ताकि नए सिरे से इसकी बुनियाद रखी जा सके? पत्रकारों को इन सभी सवालों पर सोच कर अपनी पत्रकारिता की दिशा और अपना भविष्य चुनना है.

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं)

हाथ में कलम, सिर पर कफन

Priyanka Kaushal2राज्य के पत्रकार नक्सल प्रभावित इलाकों से न सिर्फ समाचार भेजता है बल्कि कई बार तो उन्हें जवानों के क्षत-विक्षत शवों को भी गंतव्य तक पहुंचाना पड़ता है. 17 अप्रैल 2015 की एक घटना है. दक्षिण बस्तर के पामेड़ पुलिस थाने के तहत आने वाले नक्सल क्षेत्र कंवरगट्टा में पुलिस और नक्सलियों की मुठभेड़ हुई थी. इसमें आंध्र प्रदेश के ग्रे हाउंड्स फोर्स (नक्सल ऑपरेशन के लिए आंध्र प्रदेश में खासतौर पर तैयार फोर्स) के सर्किल इंस्पेक्टर शिवप्रसाद बाबू शहीद हो गए थे. लेकिन आंध्र प्रदेश व छत्तीसगढ़ पुलिस चार दिन तक शहीद अधिकारी के शव को बाहर नहीं निकाल सकी. फिर नवभारत अखबार के बीजापुर संवाददाता गणेश मिश्रा को पुलिस टीम के साथ भेजा गया. उन्होंने मध्यस्तता कर ग्रामीणों से शव सौंपने का अनुरोध किया. तब कहीं जाकर पुलिस अधिकारी का शव पामेड़ लाया गया. उस समय बस्तर आईजी हिमांशु गुप्ता ने पत्रकार का आभार माना था. इस पूरे मामले में गणेश मिश्रा ही वह पहले पत्रकार थे, जो घटनास्थल पर पहुंचे थे. उन्होंने ही वहां से लौटकर इस बात की तस्दीक की थी कि शिवप्रसाद बाबू नक्सलियों की गोलियों का शिकार हो गए हैं. इसके पहले तक तो पुलिस अपने अधिकारी को लापता ही मान रही थी. जवान का शव आंध्र प्रदेश व छत्तीसगढ़ की सीमा से लगभग 20 किलोमीटर दूर कंवरगट्टा गांव में तालाब की मेड़ पर लावारिस हालत में पड़ा हुआ था. जिला मुख्यालय बीजापुर से घटनास्थल की दूरी 85 किलोमीटर थी. घटना के बाद पुलिस तीन दिनों तक कंवरगट्टा नहीं पहुंच पाई थी. तब गणेश मिश्रा ही ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए, अपनी जान की परवाह न करते हुए उस इलाके में पहुंचे, जहां नक्सलियों ने पुलिस को पीछे खदेड़ दिया था और एंबुश के डर से पुलिस दोबारा उस इलाके में नहीं घुस पा रही थी.

छत्तीसगढ़ में ऐसे असंख्य मामले हैं, जिनमें पत्रकारों ने कभी स्वेच्छा से तो कभी पुलिस के अनुरोध पर न केवल मृतकों की संख्या की तस्दीक की, बल्कि उनके शवों को सुरक्षित बाहर निकालने का काम भी किया. छत्तीसगढ़ में अब यह भ्रांति भी टूटने लगी है कि नक्सली पत्रकारों पर हमला नहीं करते. नक्सलियों द्वारा गरियाबंद के नेमीचंद जैन और बस्तर के साईं रेड्डी की हत्या करने के बाद अब पत्रकारों की जान पर खतरा और बढ़ गया है

यह तो एक छोटा-सा उदाहरण है, जब बस्तर के किसी पत्रकार ने अपनी जान जोखिम में डालकर पुलिस अधिकारी का शव लाने में मदद की है. छत्तीसगढ़ में ऐसे असंख्य मामले हैं, जिनमें पत्रकारों ने कभी स्वेच्छा से तो कभी पुलिस के अनुरोध पर न केवल मृतकों की संख्या की तस्दीक की, बल्कि उनके शवों को सुरक्षित बाहर निकालने का काम भी किया. छत्तीसगढ़ में अब यह भ्रांति भी टूटने लगी है कि नक्सली पत्रकारों पर हमला नहीं करते. नक्सलियों द्वारा गरियाबंद के नेमीचंद जैन और बस्तर के साईं रेड्डी की हत्या करने के बाद अब पत्रकारों की जान पर खतरा और बढ़ गया है. हालांकि दोनों की हत्या करने के बाद नक्सलियों की दंडकारण्य जोनल कमेटी के प्रवक्ता गुडसा उसेंडी ने बयान जारीकर माफी मांगी और भविष्य में ऐसा न करने की बात भी कही. लेकिन पत्रकारों पर मंडराता खतरा यहीं खत्म नहीं हो जाता. उन्हें लगातार प्रेशर बम, लैंड माइन बिछे हुए इलाकों में काम करना होता है. कई बार वे पुलिस व नक्सली मुठभेड़ की क्रॉस फायरिंग में भी फंस जाते हैं. पत्रकारों पर पुलिस की तरफ से पड़ने वाले दबाव भी हैं. बस्तर के अंदरूनी इलाकों में घुसने के लिए रास्तेभर पड़ने वाले पुलिस चेक पोस्ट पर रुककर आगे जाने की अनुमति लेना. कई बार पुलिस द्वारा पत्रकारों को वापस कर दिया जाना और फिर नए व खतरनाक रास्तों से पुलिस को बगैर बताए उन इलाकों में पहुंचकर सच्चाई की पड़ताल करना बस्तर के पत्रकारों के काम का हिस्सा है. हालांकि इतने खतरों के बावजूद एक अनुमान के मुताबिक बस्तर में करीब 270 पत्रकार काम कर रहे हैं. राजधानी रायपुर से नियमित बस्तर जाकर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की संख्या अलग है.

55 वर्षीय सुधीर जैन पिछले 35 सालों से बस्तर में ही रहकर पत्रकारिता कर रहे हैं. जगदलपुर में रहने वाले सुधीर दैनिक भास्कर, नवभारत जैसे हिंदी दैनिकों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. फिलहाल वे तीन समाचार एजेंसियों के लिए काम कर रहे हैं. सुधीर बताते हैं, ‘बस्तर में रिपोर्टिंग करते वक्त कोई भी दिन आपकी जिंदगी का आखिरी दिन साबित हो सकता है. आप इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि यह दो धारी तलवार पर चलने जैसा है, एक तरफ नक्सली हैं तो दूसरी तरफ पुलिस. खबर कवर करने से लेकर लिखने तक की प्रक्रिया इतनी चुनौतीपूर्ण होती है कि एक आम पत्रकार से हमारा तनाव सौ गुना ज्यादा बढ़ा हुआ होता है. कई बार ऐसा भी हुआ है कि कोई खबर निर्भीक होकर नहीं लिख पाया हूं.’

27 वर्षीय पवन दहट बताते हैं, ‘बस्तर में काम करते वक्त कई बार ऐसी परिस्थिति आई है कि हमने कई टुकड़ों में बंटी हुई लाश को समेटने का काम भी किया है. ऐसा किसी दबाव में नहीं, बल्कि मानवता के नाते किया है. यह भी हमारी नौकरी का एक अघोषित हिस्सा हो गया है. 2014 में लोकसभा चुनाव के दौरान 10 अप्रैल को बस्तर में मतदान था. मैं वहां रिपोर्टिंग के लिए पहुंचा था. कनकापाल नाम के एक धुर नक्सल प्रभावित इलाके में रिपोर्टिंग करते वक्त मेरा पैर एक प्रेशर बम पर पड़ गया. गनीमत तो यह थी कि वह प्रेशर बम फटा नहीं, नहीं तो मैं आज आपसे बात नहीं कर रहा होता.’ पवन पिछले तीन सालों से छत्तीसगढ़ में ‘द हिंदू’  के राज्य संवाददाता हैं. पवन बस्तर में अपनी धुआंधार रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं. पिछले तीन सालों में उन्होंने बस्तर के अनगिनत दौरे किए हैं और कई मामलों को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया है. वह कहते हैं, ‘मुझे अच्छी तरह से याद है कि कनकापाल को उस दिन एक तरफ से नक्सलियों ने तो दूसरी तरफ से पुलिस ने घेर रखा था. बस्तर जैसे इलाकों में जहां नक्सलवाद अपने चरम पर है, रिपोर्टिंग करना बेहद मुश्किल भरा और खतरनाक होता है. नक्सलियों और पुलिस दोनों तरफ से अपने-अपने किस्म के दबाव होते हैं.’ पवन के अनुसार, ‘अगर आपको दोरनापाल से जगरगुंडा तक जाना हो तो हर चेकपोस्ट पर हाजिरी देनी होती है, बार-बार लिखवाना होता है कि आगे जाने का आपका मकसद क्या है. मुझे तो अपनी खबर रोकने के लिए कई बार पुलिस के आला अफसरों की तरफ से धमकियां भी मिली हैं, कई तरह के प्रलोभन भी दिए गए हैं. सरकेगुड़ा जैसी जगहों पर पुलिस ने हम पत्रकारों को जाने से रोका हैं, जहां ग्रामीणों के घर जला दिए गए थे. जहां तक बात नक्सलियों की है तो वे भी हमारा काम प्रभावित करने की कोशिश तो करते ही हैं. जिस इलाके में नक्सली नहीं चाहते कि पत्रकार आएं, वहां आप घुस भी नहीं सकते. अगर किसी गांव में उन्होंने लोगों को प्रेस से बात करने की मनाही कर दी है, तो आप लाख कोशिश कर लो, गांववाले सहयोग ही नहीं करते, बात ही नहीं करते. कई बार हमें सलाह दी जाती है कि हम बुलेटप्रूफ जैकेट पहनकर एंटी लैंड माइन व्हीकल में ही रिपोर्टिंग करने पहुंचे लेकिन यह संभव ही नहीं है. सीधी-सी बात है कि इतना सारा जोखिम होते हुए भी अगर सावधानियों पर ध्यान देने लगे तो बस्तर में रिपोर्टिंग कभी संभव ही नहीं हो पाएगी. यहां तो जान हथेली पर रखकर चलना ही पड़ता है.’

पत्रकार तामेश्वर सिन्हा कहते हैं, ‘अंतागढ़ से कोयलीबेड़ा जाते वक्त अर्धसैनिक बलों के चार कैंप पड़ते हैं. हर कैंप में हाजिरी लगानी पड़ती है. कई बार घंटों बैठा दिया जाता है. पत्रकार हूं, यह बोलना ही मूर्खतापूर्ण लगने लगता है. कौन हो, क्या हो, क्यों जा रहे हो, कई तरह के सवाल किए जाते हैं, हमें शंका की नजर से देखा जाता है. पुलिसवाले वापस जाने की नसीहत तक दे डालते हैं. ऐसे ही एक बार पुलिस के सवालों से जूझते हुए किसी घटना स्थल पर मैं पहुंचा और वहां नक्सलियों ने पुलिस का मुखबिर समझकर पकड़ लिया. बड़ी मुश्किल से उन्हें समझा पाया और जान छूटी.’ अबूझमाड़ में लंबे समय से काम कर रहे तामेश्वर नक्सल मामलों में दिलचस्पी रखते हैं. इन दिनों वह भूमकाल समाचार नाम के अखबार में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. तामेश्वर बताते हैं, ‘बस्तर में तथ्यपूर्ण खबर लिखना पुलिस या नक्सलियों के निशाने पर आने जैसा है. यहां पत्रकारिता करना जोखिम का काम है. पुलिस पत्रकारों पर नक्सलियों के सहयोगी होने का आरोप लगा देती है, वहीं नक्सली पत्रकारों पर पुलिस के मुखबिर होने का आरोप लगाते हैं. हमें तो दोनों तरफ से शिकार होना पड़ता है.  हमारे कई वरिष्ठ साथी पत्रकारों को पुलिस ने नक्सलियों के सहयोगी होने के आरोप में जेल में ठूंस दिया है. जब नक्सली किसी पुलिस वाले का अपहरण करके ले जाते हैं तो उस समय पुलिस को पत्रकारों की याद आती है, बाकी समय हमें संदेह की नजरों से देखा जाता है. ठीक ऐसे ही जब नक्सलियों को अपनी बात रखनी होती है तो वे पत्रकारों को याद करते हैं, बाकी वक्त उन पर पुलिस के लिए मुखबिरी का आरोप लगाते रहते हैं.’ वह बताते हैं, ‘वैसे भी हम अंदरूनी इलाकों में काम कर रहे लोगों को प्रशासन व पुलिस पत्रकार ही नहीं मानती है. सबसे दुखद पहलू यह भी है कि हम जिस संस्थान के लिए काम कर रहे होते हैं, वह भी हमारी सुरक्षा की कोई जबावदेही नहीं लेता है.’

ऐसे ही चाहे पंखाजूर के 34 वर्षीय पत्रकार शंकर हों या 16 सालों से बस्तर में पत्रकारिता कर रहे 33 वर्षीय रजत बाजपेयी, प्रभात सिंह या बप्पी राय. सभी ने कभी न कभी किसी अपहृत पुलिसकर्मी की कुशलता का समाचार लाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली है. 25 मई 2013 को हुए झीरम घाटी नक्सल हमले में पत्रकार नरेश मिश्र ने ही सबसे पहले पहुंचकर दिंवगत कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल को अस्पताल पहुंचाने में मदद की थी. नरेश की ही मोटरसाइकिल से भागकर कांग्रेस विधायक कवासी लखमा ने अपनी जान बचाई थी. छत्तीसगढ़ के विभिन्न इलाकों में काम कर रहे इन पत्रकारों की जान की सुरक्षा का जोखिम उनका खुद का है. न तो सरकार और न ही उनका अपना संस्थान उनके प्रति किसी भी तरह की जबावदेही लेने को तैयार है. वर्षों से इन्हीं परिस्थितियों में काम कर रहे पत्रकार शायद अब मौत की इस मांद में काम करने के आदी हो गए हैं. हों भी क्यों न, पत्रकार लोकतंत्र का वह हिस्सा है, जिसने अपना काम निडरता, सहजता और जुनून की हद तक करने की कसम जो खाई है.

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं)

आत्म नियमन फेल नियमन की जरूरत

Press regulation2अब ये लगभग सिद्ध हो गया है कि मीडिया उद्योग द्वारा आत्म नियमन के जरिए खुद को दुरूस्त करने के तमाम दावे नाकाम हो चुके हैं. वैसे तो आत्मनियमन हकीकत से ज्यादा रूमानियत भरी कल्पना थी, एक भ्रम था और उसके लिए कोई जरूरी ढांचा तो था ही नहीं इसलिए ऐसा होना ही था. एक सदिच्छा जरूर थी लेकिन वह केवल पत्रकारों या मीडियाकर्मियों में थी, जो सरकारी दखलअंदाजी रोकने के लिए और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए कुछ कोशिशें करते रहते थे. जब तक बाजार का जोर नहीं था तो मीडिया घरानों के मालिकान भी इसका समर्थन करते थे, इसलिए नहीं कि उनकी इनमें श्रद्धा थी, बल्कि इससे उन्हें लाभ होता था. वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल अपने व्यापारिक हितों को साधने के लिए करते थे. इसीलिए जब न्यूज चैनलों के संपादकों ने आत्म नियमन का शोर मचाया तो उन पर आरोप लगा कि वे मालिकों के कहने पर ऐसा कर रहे हैं.

बहरहाल, सच्चाई चाहे जो हो लेकिन ये तो स्पष्ट हो चुका है कि मौजूदा परिस्थितियों में आत्म नियमन से मीडिया को सुधारना संभव नहीं है. ऐसा इसलिए भी कि मीडिया पर पत्रकारों का जो थोड़ा-बहुत प्रभाव होता था, वह भी खत्म हो चुका है और स्वामित्व सर्वशक्तिमान बन चुका है. स्वामित्व पर तरह-तरह से लाभ कमाने का लोभ सवार हो चुका है और उसने आत्मनियमन की न्यूनतम मांग से भी खुद को मुक्त कर लिया है. उसने उन पत्रकारों-संपादकों को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया है जो नैतिकता, दायित्व और सरोकारों आदि की बातें करते हैं. उन्हें ऐसे दलाल चाहिए जो थाना स्तर से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक उनके स्वार्थ साधने में मददगार साबित हों और उनके मीडिया प्रतिष्ठानों को लाभप्रद बनाने के लिए काम करें.

यदि आज मीडिया उद्योग एक तरह की अराजकता और दायित्वहीनता से गुजर रहा है तो उसकी यही सबसे बड़ी वजह है. वह लोकतंत्र के चौथे खंभे के बजाय मीडिया स्वामियों और बाजार का उपकरण बन चुका है और उसी के हितों के लिए काम करने पर तैनात हो गया है. उसके उद्देश्य बदल चुके हैं. जन सरोकारों से उसका रिश्ता बहुत पहले ही कमजोर था, अब वह पूरी तरह टूट चुका है. जो थोड़ा-बहुत बचा है वह दिखावे के लिए. इसलिए ये जरूरी हो गया है कि आत्मनियमन के भ्रमजाल से निकला जाए और नियमन की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं.

नियमन की वकालत करने का मतलब अकसर ये निकाला जाता है या इसे इस तरह से प्रचारित भी किया गया है मानो ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित-बाधित करने का प्रयास हो. वास्तव में उल्टा है. मीडिया स्वछंदता में धारा 19-1-ए के तहत भारतीय नागरिकों को मिले संवैधानिक अधिकार का तरह-तरह से दुरुपयोग कर रहा है. यही नहीं, इसके साथ जो दायित्व जुड़े हुए हैं, उनकी अवहेलना भी वह किए जा रहा है. उसकी इस प्रवृत्ति ने मीडिया की साख को बेहद कमजोर किया है और जाहिर है कि अभूतपूर्व विस्तार के जरिए शक्ति हासिल करने के बावजूद वह घृणा का पात्र बन चुका है. ये स्थिति न तो मीडिया के लिए अच्छी है और न ही लोकतंत्र के लिए.

हालांकि ये एक विश्वव्यापी परिघटना है और मीडिया के इस ढहते चरित्र से हर जगह हाहाकार मचा हुआ है. ब्रिटेन स्वतंत्र मीडिया का झंडाबरदार माना जाता है, लेकिन रूपर्ट मर्डोक की पत्रिका न्यूज ऑफ द वर्ल्ड के फोन हैकिंग कांड के बाद वहां इस मसले पर लंबा वाद-विवाद चला और वह आज भी जारी है. लॉर्ड जस्टिस लेवसन ने इस मामले की जांच के बाद मीडिया के चरित्र की पोल खोलते हुए कड़े नियमन की सिफारिश की. इन सिफारिशों के आधार पर ब्रितानी संसद ने रॉयल चार्टर तैयार किया जिसे लागू करने की कोशिश की जा रही है. ध्यान रहे ऑफकॉम पहले ही वहां एक नियामक की भूमिका अदा कर रहा था, इसके बावज़ूद स्थितियां इस क़दर बिगड़ीं की सरकारी हस्तक्षेप की वजह बन गईं. भारत में तो ऐसा कोई नियमन ढांचा या संस्था है ही नहीं और अगर कल को सरकार अपनी ओर से कुछ करने पर आमादा हो जाए तो क्या होगा? बल्कि पिछली सरकार तो कंटेंट कोड लागू करने पर आमादा हो गई थी और इसके लिए उसने इंस्पेक्टर राज व्यवस्था कायम करने का फैसला भी कर लिया था. अगर मीडिया इस तरह के हमलों से बचना चाहता है तो उसे आत्मनियमन की बहानेबाजी से बाहर आकर स्वतंत्र नियमन के पक्ष में काम करना चाहिए.

दुर्भाग्य ये है कि हमारे देश में अधिकांश उद्योग-धंधों के लिए एक तो नियमन की कोई व्यवस्था है नहीं और अगर नियामक बनाए भी गए हैं तो उन्हें काम नहीं करने दिया जाता. उद्योगों और सरकार के दबाव में वे नाकारा हो जाते हैं. मसलन, भारतीय प्रेस परिषद को ले लीजिए. एक तो उसका दायरा केवल प्रिंट मीडिया तक ही सीमित है. दूसरे, वह एक नख-दंत विहीन संस्था है. उसके पास इस तरह के अधिकार ही नहीं हैं कि वह उन पत्र-पत्रिकाओं के ख़िलाफ काम कर सके जो पत्रकारीय मानदंडों का उल्लंघन करते हैं या उनके विरूद्ध काम कर रहे हैं. पेड न्यूज का उदाहरण हमारे सामने है. प्रेस परिषद ने इसके लिए एक कमेटी बैठाई, जिसने अपनी रिपोर्ट भी दे दी. लेकिन प्रेस परिषद में मालिकों का वर्चस्व है और उसमें सांसदों का भी प्रतिनिधित्व है. बस उन्होंने मिलकर रिपोर्ट को जारी ही नहीं होने दिया. जद्दोजहद के बाद उसे काट-छांटकर जारी किया गया. हालांकि पूर्ण रिपोर्ट अनाधिकारिक तौर पर भी जारी कर दी गई लेकिन इससे परिषद की हैसियत का पता तो चलता ही है.

टेलीविजन चैनलों के मीडिया कंटेंट को नियमित करने के लिए नेशनल ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) भी काम कर रही है. लेकिन उसका कोई खास असर नहीं देखा गया. अव्वल तो ज्यादातर न्यूज चैनल इसके सदस्य ही नहीं हैं. फिर यदि किसी चैनल को उसकी कोई बात पसंद नहीं होती तो वह उससे बाहर हो जाता है. एनबीए के पास कोई विशेष अधिकार भी नहीं है. वह एक तरह की एडवायजरी भूमिका निभा रही है. वह कभी-कभार चैनलों को हल्के दंड दे देती है जिसे चैनल आंख बंद करके स्वीकार कर लेते हैं, मगर उनके चाल-चलन में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. इसी तरह न्यूज चैनलों के संपादकों ने ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएसन (बीईए) का गठन किया था, मगर वह भी पूरी तरह से नाकाम साबित हो चुकी है.

पिछले दो-तीन सालों में भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने मीडिया के नियमन के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाने की कोशिशें की हैं लेकिन वह पूरी तरह से नाकाम रहा. मसलन, उसने सन् 1995 के केबल अधिनियम के प्रावधानों का हवाला देकर चैनलों को एक घंटे में बारह मिनट से अधिक विज्ञापन न दिखाने का निर्देश दिया. लेकिन ये आज तक लागू नहीं किया जा सका है क्योंकि उसे चुनौती दे दी गई और सरकार ने भी उसे इस पर अमल न करने के लिए दबाव डाला. इसी तरह उसने उद्योग से जुड़े सभी पक्षों से विचार-विमर्श करने के बाद संपादकीय विभाग की स्वतंत्रता और क्रॉस मीडिया ओनरशिप जैसे अति महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी सिफारिशें सरकार को भेजीं, लेकिन आज भी वे सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में धूल खा रही हैं.

जाहिर है कि शक्तिशाली मीडिया घरानों ने उस पर दबाव बना रखा है इसलिए वह उन सिफारिशों को लागू करना नहीं चाहती. वैसे ट्राई के साथ एक तो मुश्किल ये है कि उसके अधिकार क्षेत्र को लेकर ही भ्रम बने हुए हैं इसलिए उसके हर निर्णय या सिफारिश पर तुरंत सवाल खड़े कर दिए जाते हैं जिससे मामले लटक जाते हैं.

अब चाहे प्रेस परिषद को मीडिया परिषद में तब्दील करने का सुझाव हो या फिर ट्राई को अधिक अधिकार देने का मसला, निर्णय लेने का समय आ गया है. सच्चाई तो ये है कि इसमें पहले ही काफी देर हो चुकी है और अब और अधिक देरी आत्मघाती होगी. नियमन की शुरुआत के लिए ब्रिटेन के जस्टिस लेवसन ने मीडिया नियमन के लिए जो सिफारिशें की हैं, उन्हें आधार बनाया जा सकता है. कोई जरूरी नहीं कि हम ब्रितानी संसद द्वारा बनाए गए रॉयल चार्टर की हू-ब-हू नकल करें, लेकिन भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर उससे उपयोगी चीजों को स्वीकार कर लेने में कोई हर्ज नहीं है. एक बात तो ये समझ ली जानी चाहिए कि मीडिया का विस्तार इस पैमाने पर हो गया है कि कोई एक नियामक संस्था हर तरह के मीडिया का नियमन नहीं कर सकती. प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक एवं इंटरनेट, तीनों माध्यमों के अपने विशिष्ट गुण एवं आवश्यकताएं हैं इसलिए उन सबको एक बंडल में बांधने के बजाय अगर उनका अलग-अलग नियमन किया जाए तो वह ज्यादा कारगर होगा.

नियमन के बारे में सबसे ज्यादा वाद-विवाद इस मुद्दे को लेकर है कि उसे कैसे किया जाए और कौन करे. लेकिन ये बहस बेमानी है. इसमें तो किसी तरह का संदेह होना ही नहीं चाहिए कि नियमन  सरकारी प्रभाव से पूरी तरह मुक्त होना चाहिए और स्वतंत्र व्यक्तियों द्वारा ही किया जाना चाहिए. इसमें उन पत्रकारों और संपादकों को भी शामिल नहीं किया जा सकता जो सरकार या मीडिया मालिकों के हितों के रक्षक बन सकते हैं और न किसी भी रूप में सरकार या नौकरशाही के नुमांइदे नहीं होने चाहिए. विभिन्न क्षेत्रों के जाने-माने विद्वानों को अगर ये जिम्मेदारी सौंपी जाएगी तो वे सामाजिक हितों को ध्यान में रखकर बेहतर परिणाम देने में सक्षम होंगे.

अच्छी बात ये है कि विधि आयोग विभिन्न पक्षों से नियमन पर विचार-विमर्श कर रहा है और उम्मीद करनी चाहिए कि वह जल्द ही एक ठोस प्रारूप तैयार कर लेगा. ये भी उम्मीद की जानी चाहिए कि उसमें इस तरह के कानूनी प्रावधान होंगे कि नियमन सबके लिए बाध्यकारी हों और नियामक के पास ऐसे अधिकार भी हों कि जरूरत पड़ने पर वह चैनलों के लाइसेंस निलंबित या रद्द कर सके. मीडिया जगत से भी यही उम्मीद की जाएगी कि वह किंतु-परंतु छोड़कर नियमन को लागू करने में मदद करे, न कि उसकी राह में नई अड़चनों की चालबाजियों में उलझे.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

हर शाख पे उल्लू बैठा है

Anil Yadavपत्रकारिता के अव्वल, दोयम और फर्जी संस्थानों से हर साल सपनीली आंखों वाले लड़के-लड़कियों के झुंड बाहर निकल रहे हैं. इनमें से बहुतेरे किसी दोस्त, परिचित के हवाले से मुझसे मिलते हैं. कॅरिअर के बारे में सलाह मांगने के बीच में अचानक उतावले होकर बोल पड़ते हैं, सर! कोई नौकरी हो तो बताइए, मैं अपनी जान लगा दूंगा या दूंगी. तब किसी आदिम प्रवृत्ति के तहत मेरा ध्यान उनके मांसल पुट्ठों और नितंबों की ओर चला जाता है जैसे वे किसी कसाईबाड़े में जाने को आतुर पगहा तुड़ाते जवान जानवर हों और मैं उनका गोश्त तौल रहा हूं.

उन्हें मेरी सोच क्रूर और हिंसक लग सकती है लेकिन सच यही है कि दस-बारह साल के भीतर उनका शरीर भले फैल जाएगा लेकिन उनके बौद्धिक और मानसिक सारतत्व का जरा-सा हिस्सा बहुत सस्ते दामों में खरीदकर घटिया कामों में इस्तेमाल कर लिया जाएगा बाकी हताशा में बर्बाद होने के लिए छोड़ दिया जाएगा. मैं उनसे कहता हूं कुछ भी कर लो मीडिया में मत जाओ, वे मुझे संदेह से देखते हैं जैसे मैं उनका पत्ता साफ कर देने के लिए कोई षडयंत्र बुन रहा हूं, फिर उलझ पड़ते हैं तो सर आप क्यों पत्रकार हो गए और अब तक बने हुए हैं?

मैं उन्हें कैसे समझाऊं कि पत्रकारिता की आत्मा कब की सस्ते में नीलाम हो चुकी है और अब पत्रकार होना जिंदगी भर के लिए गरीब, संदिग्ध, असुरक्षित और सारे धतकर्मों का मूकदर्शक होना है. तिस पर तुर्रा यह है कि इन दिनों पत्रकारों को दल्ले-भंड़ुवे जैसे संबोधनों से नवाजने का फैशन जोर पकड़ चुका है. ऐसा करने वाले अधिकतर वे हैं जो किसी न किसी अवैध धंधे में शामिल हैं. उन्हें दिल से लगता है कि उन्हें अपनी तिकड़मों से माल काटने की अबाध आजादी मिलनी ही चाहिए.

मैंने पिछले पच्चीस सालों में हिंदी-अंग्रेजी पत्रकारिता के कई घाटों का पानी पीया है और अब भी प्यासा भटक रहा हूं. एक घाट यानी दुनिया के सबसे बड़े हिंदी अखबार दैनिक जागरण में मेरे एक संपादक थे, जो लखनऊ के हजरतगंज में दफ्तर की छत पर अखबार के सर्कुलेशन और विज्ञापन के मैनेजरों को मुर्गा बनाया करते थे, रिपोर्टरों को लप्पड़ रसीद कर दिया करते थे, महिला पत्रकारों को छिनाल और रंडी कहकर बात किया करते थे. वे खुद भी अक्सर लात खाते थे लेकिन उन्हें इसकी कुछ खास परवाह नहीं थी. पत्रकारों के साथ दासों जैसा व्यवहार करने वाले अखबार के कॉरपोरेटी हो रहे मालिक उन्हें हार्ड टास्क मास्टर कहा करते थे और चाहते थे बाकी संस्करणों के संपादक भी उन्हीं जैसे हो जाएं. उनकी नकल बहुतों ने की (अब भी करते हैं) लेकिन बराबरी कोई नहीं कर पाया.
उनका तरीका यह था कि वे अखबार के मालिकों के सारे सही गलत काम (राज्यसभा के टिकट से लेकर सस्ती दरों पर प्लॉट और महंगी दरों पर विज्ञापन हथियाने तक के काम) नेताओं और अफसरों के संपर्क में रहने वाले ब्यूरो के रिपोर्टरों को धमकाकर बड़ी तत्परता से कराते थे. चार काम मालिकों के होते थे तो दो अपने भी करा लेते थे. वे इतने दहपट थे कि पशुपालन और बागवानी जैसी बीट देखने वाले गरीब रिपोर्टरों से भी दवाएं और गमले निचोड़ लेते थे. अगर कोई होशियार रिपोर्टर उनके वाले दो काम कराते हुए एक अपना भी करा ले तो उसकी शामत आ जाती थी, तब वह दल्ला हो जाता था. उसकी नौकरी पर बन आती थी. उनसे गाली और लप्पड़ खाए कई पत्रकार इस वक्त कई बड़े अखबारों के संपादक हैं, उन्हीं की फोटोकॉपी बनना चाहते हैं. उनका जिक्र वे अपने गुरु, निर्माता और गाइड की तरह कानों को हाथ लगाकर करते हैं.

जागरण घाट के पानी का स्वाद बताने से गरज यह है कि लात-जूता और गालियों को निकाल दें तो सारे अखबार और चैनल उसी ढर्रे पर कॉरपोरेटी शालीनता का स्वांग करते हुए चल रहे हैं यानी अपने उपभोक्ताओं (पाठकों) को ठगते हुए धंधा कर रहे हैं. अगर पत्रकारिता के पतन पर बात करनी है तो निरीह पत्रकारों को नहीं कोसा जाना चाहिए जो वेतन आयोगों की निर्धारित तनख्वाह भी नहीं मांग पाते हैं, बेहद विपरीत परिस्थितियों में काम करते हुए हर दिन नौकरी बचाते अपने परिवार पाल रहे हैं. बात मीडिया के मालिकों से शुरू होनी चाहिए जिन्होंने करोड़ों की पूंजी से अरबों का मुनाफा बनाने की हवस में पत्रकारिता को भ्रष्ट नेताओं, अफसरों और जो भी उनके हित साध सकता है उनके हाथों बेच दिया है. इन मालिकों को अभिव्यक्ति की आजादी का उच्चारण करने से भी रोक दिया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने उसे भ्रष्टाचार की आजादी में बदल दिया है.

संपादक या तानाशाह

Cover  15 December  2011, National_Layout 1.qxdकुछ बरस पहले एक दिन सुबह-सुबह बिंदु (बदला हुआ नाम) का फोन आया. वो बहुत ही घबराई हुई लग रही थी. मुझे थोड़ा-बहुत अंदाजा तो लग गया लेकिन बिंदु ने जो बताया, वह मेरी कल्पना से परे था. बिंदु अपनी पीड़ा साझा करते हुए कभी सिसकती और कभी रोने लग जाती. वह अपने संपादक के किस्से सुना रही थी. जिस न्यूज एजेंसी में वह काम करती थी उसके संपादक अपने कर्मचारियों से बहुत ही बदतमीजी से पेश आते थे. दफ्तर में एक-दो लोग ही थे जिन पर उनके नेह की बारिश होती थी, वरना सभी उनके आगे खुद को करमजला ही मानते थे. मानें भी तो क्यों नहीं? नई दिल्ली के आरके पुरम स्थित ऑफिस से आखिरी दिन जब बिंदु उनसे बेइज्जत होकर  अपने घर के लिए बस में सवार हुई तो उसे अपने स्टॉप पर उतरने का होश ही नहीं रहा. बदरपुर में जब बस आखिरी स्टॉप पर रुकी और सभी के उतरने के बाद भी वह बस में ही बैठी रही तो कंडक्टर ने आकर कहा, ‘बहन जी उतर जाओ. बस आगे नहीं जाएगी. कहां जाना है, आपको?’ बिंदु मानो किसी दुःस्वप्न से अचानक बाहर निकल आई हो. उसने कंडक्टर से पूछा, ‘आप मुझे कहां ले आए? मुझे बिल्कुल समझ में नहीं आ रहा है.’ बस कंडक्टर संवेदनशील व्यक्ति था, उसे समझ में आ गया कि वह किसी परेशानी में है. उसने बिंदु से मोबाइल लिया और उसमें फीड नंबर में से मां का नंबर निकालकर उन्हें फोन किया. कंडक्टर ने मां को बात समझाई, घर का पता लिया और ऑटो वाले को पता देकर बिंदु को घर के लिए रवाना किया. इस घटना के लगभग पंदह-बीस दिन बाद बिंदु ने मुझे फोन किया था.

बिंदु कई महीनों से परेशान थी. मुझे 15-20 दिन में उसका फोन जरूर आ जाता था. बातचीत का 95 फीसदी हिस्सा किसी दूसरे संस्थान में नौकरी मिलने की संभावना को लेकर ही केंद्रित होता था. मैं भी बिंदु के साथ उसी न्यूज एजेंसी में काम करता था. नौकरी की खोज में दो महीने की अथक मेहनत के बाद उस न्यूज एजेंसी की नौकरी को मैंने तीन महीने में ही अलविदा कह दिया था.

बिंदु हमारे संपादक की प्रताड़ना का अक्सर शिकार होती थी. बिंदु कौन थी? वह दिल्ली की एक पॉश इलाके के बीच बसी एक कच्ची कॉलोनी में रहती थी. अपने घर की महिला सदस्यों के बीच पढ़-लिखकर नौकरी करने वाली संभवतः पहली महिला थी. वह हमेशा साधारण कपड़ों में होती और उसकी बातचीत के लहजे से किसी को भी उसकी सादगी का पता सहजता से लग सकता था. वह सीधी होने के साथ थोड़ी दब्बू भी थी या हो गई थी. नौकरी संभवतः उसकी मजबूरी रही होगी. शायद इसलिए दबना उसने अपने लिए तय कर रखा था क्योंकि हम जब उससे कहते कि तुम संपादक से बात करो तो वह टाल देती. कभी जवाब न देना भी उसकी प्रताड़ित होने की एक बड़ी वजह रही हो. हमारे संपादक को अपने मातहतों को प्रताड़ित करने में मजा आता था. उन्होंने अलग-अलग मातहतों को प्रताड़ित करने के अलग-अलग दिन तय कर रखे थे. मेरे लिए गुरुवार का दिन तय था. वह अक्सर मेरी कॉपियों में मात्रा की गलतियां लगाकर मुझे बुलाते और कहते कि इस तरह की दिक्कतें रहेंगी तो फिर मेरे साथ चलना मुश्किल होगा. किसी को नौकरी पर रखने से पहले वह पूरे तीन दिन तक उससे काम करवाते. यह उनके परीक्षा लेने का एक अनोखा ढंग था. मेरी समझ में यह कभी नहीं आया कि इतना ठोंक-बजाकर नौकरी देने के बाद भी उनका हर मातहत चंद दिन बाद ही खोटा सिक्का क्यों साबित होने लग जाता था? वे अक्सर भाषण देते हुए कहते, ‘जर्नलिज्म शुड फ्लो इन योर ब्लड.’ अब ये संपादक एक बड़े एनजीओ में पीआर का काम देख रहे हैं.

जब वे अपने बॉस के सामने होते तो उनके दोनों हाथ सामने की ओर बंधे हुए होते और हर बात पर हामी भरने के जोश से भरे होते. उनके मुंह से सेना की जवान की तरह दो शब्द ही निकलते ‘यस सर… यस सर…’ हिंदी पत्रकारिता में यह गुण-दोष उनके जैसे तमाम कड़क और पीड़ित करने को आतुर दिखने वाले लोगों में समान रूप से पाया जाता है. मीडिया के तहखाने में प्रताड़ना के ऐसे हजारों किस्से दबे हुए जो कभी तनु और कभी बिंदु के माध्यम से मजबूरी में ही बाहर आ पाते हैं. टीवी पत्रकारिता को नया आयाम देनेवाले एसपी सिंह ने शायद इन संपादकों के आचरण के अनुभव के बाद ही अपने मित्रों से कहा था, ‘संपादक अपने कमरे में तानाशाह होता है.’

स्ट्रिंगर : नींव के निर्माता

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साल 2011 की गर्मियों में दमोह से छतरपुर को जोड़ने वाले उबड़-खाबड़ सड़कों पर लगभग हर दस मीटर में बड़े-बड़े गड्ढे मौजूद थे. नर्मदा घाटी के जंगलों में खड़े विशाल टीक के पेड़ों के धूलधूसरित पत्तों से छनकर अप्रैल की कड़ी धूप उनके चेहरे पर गिर रही थी. एक सफेद रंग की इंडिगो कार में वह मेरे साथ पीछे की सीट पर बैठे थे. हम बुंदेलखंड में ‘बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के बाद जिंदा जला दी जा रही लड़कियों’ के परिवारों, पुलिस अफसरों और वकीलों से मिलने के लिए छतरपुर से लेकर दमोह तक की खाक छान रहे थे. उस दिन उन्होंने पूरी बांह वाली बैगनी रंग की कमीज, नीली जींस और सफेद रंग स्पोर्ट्स जूते पहने थे. हाथों में जलाई जा चुकी लड़कियों की लिस्ट लिए वह मुझे बुंदेलखंड और पत्रकारिता की अपनी अनगिनत यात्राओं से जुड़ी छोटी-बड़ी कहानियां सुनाते जा रहे थे. मैं आंखें चौड़ी करके चुपचाप उनकी बातें सुन रही थी. मैंने उनके जैसा साहसी और उत्साह से लबरेज पत्रकार अब तक नहीं देखा था. ‘प्रियंका जी, इसके बाद आपको यह स्टोरी जरूर करनी चाहिए’, हर दस मिनट में एक नए स्टोरी आइडिया के साथ यह कहते हुए ओपी भाई का खिला हुआ चेहरा आज भी नहीं भूल पाती हूं.

ओमप्रकाश तिवारी छतरपुर जिले के रहने वाले पत्रकार थे. वह छतरपुर जिले से एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल के स्ट्रिंगर थे और साथ ही कई स्थानीय अखबारों में भी लिखा करते थे. सभी साथी पत्रकार प्यार से उन्हें ओपी कहकर बुलाते थे. 2013 में कैंसर का ठीक से इलाज न करवा पाने की वजह से उनका निधन हो गया. आमतौर पर कैंसर जैसी कमरतोड़, लंबी और महंगे इलाज की दरकार रखने वाली जानलेवा बीमारी का इलाज करवाने की हैसियत बड़े शहरों के बड़े अखबारों और टीवी चैनलों में काम करनेवाले ज्यादातर पत्रकारों की भी नहीं है. ओपी भाई तो फिर भी मध्य प्रदेश के एक छोटे से जिले में स्ट्रिंगर थे. छह फुट लंबे, जिंदादिल, हंसमुख और ऊर्जा से भरपूर ओपी भाई ने अपने काम की बदौलत मध्य प्रदेश की पत्रकारिता में अपना अलग स्थान बनाया था. बुंदेलखंड की जानलेवा गर्मियों में भी वह अपने सिर पर सिर्फ एक गमछा बांधकर अपनी मोटरबाइक पर लगभग हर रोज सैकड़ों मील की यात्रा किया करते थे. छतरपुर, दमोह से लेकर पन्ना, दतिया और झांसी तक पूरा बुंदेलखंड उनकी उंगलियों पर हुआ करता था. हर गांव में उनका नेटवर्क था. एक ऐसा विश्वसनीय नेटवर्क जो सिर्फ सालों की मेहनत और स्थानीय लोगों के साथ के भरोसे का एक रिश्ता बनाने के बाद ही विकसित हो पाता है. बुदेलखंड के मुद्दों और विकास को लेकर भी ओपी भाई में गजब का पैशन था. ओपी भाई उन चुनिंदा पत्रकारों में से थे जिन्होंने 2010-11 में पहली बार पन्ना नेशनल पार्क से बाघों के सफाये को उजागर किया था. उस दोपहर उन्होंने मुझे बताया, ‘दरअसल जब मुझे पता चला कि सरकार पार्क में 40 बाघ बताकर बजट ले रही है तो मैंने रोज सुबह पार्क के चक्कर लगाने शुरू कर दिए. हफ्तों तक रोज सुबह पैदल ही पूरा पार्क घूम जाता था लेकिन बाघ दिखते ही नहीं थे. मुझे शक हुआ कि पार्क में बाघ लगभग खत्म हो गए हैं. फिर कुछ दिन और खोजबीन की और फिर खबर ब्रेक कर दी.’ खबरों के लिए ओपी भाई के जुनून से मैं आज तक प्रेरित महसूस करती हूं.

बुदेलखंड में जलाई गईं लड़कियों की कहानी पर रिपोर्ट करते वक्त मैं सिर्फ 23 साल की थी और यह ड्रग ट्रायल के बाद मेरी दूसरी बड़ी रिपोर्ट थी. जाहिर है अनुभव और उम्र दोनों ही में मैं ओपी भाई से दशकों छोटी थी. फील्ड पर उन्होंने न सिर्फ मेरा उत्साह बढ़ाया बल्कि काम करते वक्त बहुत कुछ सिखाया भी. तब एक पत्रकार के जीवन में डिफॉल्ट मोड की तरह मौजूद रहने वाली वाली ‘हर रोज की हिंसा’ से मेरा नया-नया परिचय हुआ था और अभी मेरी कच्ची संवेदना बहुत कमजोर थीं. नोट्स लेते वक्त अक्सर मेरा चेहरा आंसुओं से भीग जाता और कई बार तो लड़कियों की मांओं से बात करते हुए मैं उनके साथ सिसकियां लेते हुए रोने लगती. यह ओपी भाई का बड़प्पन ही था कि उन्होंने मुझे डांटकर वापस नहीं भगाया बल्कि करुणा और समझदारी के साथ बिना रोए अपना काम करने की समझाइश दी. वकीलों और बड़े पुलिस अधिकारियों से गुस्से में उलझते हुए भी उन्होंने मुझे कई बार बचाया. उन्होंने मुझे अपनी पीड़ा और गुस्से को दिशा देकर अपने लेखन में उतारने के लिए प्रेरित किया. फील्ड पर अपने गुस्से पर काबू रखना उन्होंने मुझे सिखाया. बाद में बुंदेलखंड की लड़कियों की कहानी ‘तहलका’ में कवर स्टोरी बनी और राज्य महिला आयोग ने तुरंत मामले को संज्ञान में लिया. राज्य स्तरीय मीटिंग में दमोह और छतरपुर के पुलिस अधीक्षकों और कलेक्टरों को फटकार लगाई गई और लड़कियों के मारे जाने के मामलों की तहकीकात करने के आदेश जारी किए गए. बाद में इस कहानी को रामनाथ गोयनका पुरस्कार भी मिला पर उससे ज्यादा बड़ा पुरस्कार स्टोरी पढ़ने के बाद ओपी भाई के चेहरे पर आई मुस्कराहट थी.

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आखिर इस पेशे में इतना कम पैसा क्यों मिलता है कि आदमी अपना इलाज भी ठीक से नहीं करा पाते? और कम पैसे देने ही हैं तो कम से कम रिपोर्टरों के एक मजबूत मेडिकल कवर का नियम क्यों नहीं है? अगर बड़े शहरों में काम करने वाले कुछ ‘बड़े पत्रकारों’ के लिए ये मेडिकल कवर है तो स्ट्रिंगर्स के लिए क्यों नहीं है?

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सन 2012 में उनकी पैर में एक छोटा सा घाव हुआ था. कुछ दिन गुजर गए और ठीक होने की बजाय वह बढ़ता गया. बाद में पता चला कि कैंसर है. जब इलाज के लिए वह मुंबई के एक बड़े अस्पताल में भर्ती थे तब मेरी कई बार उनसे फोन पर बात हुई. मैं सेहत के बारे में ज्यादा पूछती तो कहते, ‘यह सब छोड़िए और बताइए क्या खबर है? काम कैसे चल रहा है?’. मैं हर बार उनसे कहती कि उन्हें ठीक होकर जल्दी वापस आना है और हमें मिलकर बहुत काम करना है. लेकिन एक साल तक चले इलाज ने ओपी भाई और उनके परिवार को पूरी तरह से तोड़कर रख दिया. मुंबई जैसे शहर में रहने का खर्चा और महंगे इलाज का खर्च अलग. आखिरी बार जब उनसे फोन पर बात हुई तो बड़ी धीमी आवाज में बोले, ‘प्रियंका जी, अब नहीं बच पाऊंगा मैं. दो छोटे-छोटे बच्चे, पत्नी और छोटा भाई हैं. सब परेशान हैं मेरी वजह से और बीमारी है कि ठीक होने का नाम ही नहीं ले रही. पैसे भी पूरे खत्म हो चुके हैं.’ इतना सुनकर ही मैंने रोते हुए उनकी हिम्मत बंधाई थी. फिर साथी पत्रकारों को फोन करके मदद के बारे में पूछा तो मालूम हुआ कि स्थानीय पत्रकार अपनी छोटी-छोटी तनख्वाहों में से ही पैसे निकलाकर जितना हो सकता था, ओपी भाई की मदद कर रहे थे. मगर 10 लाख रुपये का इलाज करवा पाना उनमें से किसी के बस में नहीं था.

जनवरी 2013 की एक शाम खबर मिली कि ओपी भाई नहीं रहे. पैसे की कमी की वजह से हमारे बीच के एक व्यक्ति का ठीक समय पर इलाज नहीं हो पाया और सिर्फ चालीस साल की उम्र में वह चल बसा. दुनिया को न्याय दिलवाने के लिए लड़ने वाले हम पत्रकार अपने ही बीच के आदमी की जान नहीं बचा पाए थे. और हम ये भी जानते हैं कि कोई भी बड़ी बीमारी हो जाए तो शायद अपनी जान भी नहीं बचा पाएंगे. असहाय महसूस करते हुए मैंने अपनी छोटी सी सैलरी स्लिप देखी और खुद से पूछा कि आखिर मैं क्यों कर रही हूं ये सब? आखिर इस पेशे में इतना कम पैसा क्यों मिलता है कि आदमी अपना इलाज भी ठीक से नहीं करा पाते? और कम पैसे देने ही हैं तो कम से कम रिपोर्टरों के एक मजबूत मेडिकल कवर का नियम क्यों नहीं है? अगर बड़े शहरों में काम करने वाले कुछ ‘बड़े पत्रकारों’ के लिए ये मेडिकल कवर है तो स्ट्रिंगर्स के लिए क्यों नहीं है?

हकीकत ये हैं कि स्ट्रिंगर्स की फौज न हो तो बड़े शहर का बड़ा पत्रकार दूरदराज के क्षेत्रों में खबरों के लिए एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाएगा. जो स्ट्रिंगर्स पूरे देश में जमीनी पत्रकारिता की नींव हैं और अपने आपको सबसे ज्यादा खतरे में डालकर काम करते हैं, उनकी सुरक्षा के लिए हमारे बीच से कभी आवाज क्यों नहीं उठती?

अब जिक्र इस पेशे और स्ट्रिंगरों की जिंदगी से जुड़े खतरे का हुआ है तो एक और बात बतानी जरूरी है. ‘तहलका’ में नवंबर 2011 में प्रकाशित कवर स्टोरी ‘मध्युगीन प्रदेश’ का एक हिस्सा मैंने मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले से रिपोर्ट किया था. तब भोपाल से मंदसौर सिर्फ एक ही ट्रेन जाती थी और वह जिला स्टेशन पर आधी रात के बाद पहुंचती थी. उस रात जब नवंबर की हाड़ कंपा देने वाली ठंड में मैं मंदसौर स्टेशन पर उतरी तो वहां के एक स्थानीय पत्रकार मित्र मुझे लेने स्टेशन पहुंचे हुए थे. मंदसौर जैसे छोटे से शहर में उनके बिना किसी अंजान होटल के दरवाजे पर दस्तक देने की हिम्मत भी शायद नहीं होती मेरी. पर मुझसे मिलते ही उन्होंने शहर के सबसे सुरक्षित होटल में मेरा सामान रखवाया और रात के लगभग 2 बजे हम स्टोरी के लिए निकल पड़े. स्टोरी नीमच-मंदसौर-रतलाम हाईवे के किनारे सालों से चल रहे बाछड़ों के डेरों पर तस्करी कर लाई गईं छोटी बच्चियों को जबरदस्ती वेश्यावृति में धकेलने पर थी. और यही इन ‘ हाईवे-ब्रोथल्स’ का सही ‘बिजनेस टाइम’ था. मैंने ओवरकोट और एक लंबी शाल में अपने आप को छुपाया और हम दोनों ने एक ग्राहक की तरह अंडरकवर डेरों पर जाने के के इरादे से हाईवे पर उतर आए. इंवेस्टिगेशन तो पूरी हुई पर स्टोरी करने के लिए मेरे स्थानीय पत्रकार मित्र ने अपनी जान को मुझसे ज्यादा जोखिम में डाला.

दरअसल रात के वक्त जब सारी टैक्सी एजेंसियों ने हमें वहां ले जाने से इनकार कर दिया तो मेरे मित्र अपनी गाड़ी से ही मुझे स्पॉट तक ले गए. काम करते वक्त डेरों पर मौजूद कट्टे से लैस खतरनाक दलालों ने उनकी गाड़ी का नंबर देख लिया था और बाद में उन्हें फोन पर धमकियां भी मिली थीं. मैं तो अगली ही शाम मंदसौर से लौट आई पर उन्हें वहीं रहना था और हमारी स्टोरी के बाद उनके लिए खतरा और बढ़ गया था. हालांकि ‘जब आप नहीं डर रहीं तो मैं क्यों डरूं?’ कहते हुए उन्होंने स्टोरी करने के लिए मेरा हौसला बढ़ाया था. मगर मैं जानती थी कि नवंबर की उस कोहरे भरी रात में दो बजे अपनी गाड़ी में मेरे साथ हाईवे चलकर छोटी बच्चियों की तस्करी के सबूत जुटाने जाने के लिए राजी होने के पीछे उनके पास ‘स्वप्रेरणा’ और ‘मिशन की भावना’ के सिवाय कोई कारण नहीं था. मध्य प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से रिपोर्ट की गई इस कवर स्टोरी को बाद में एक राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला, पर मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार उन बच्चियों का रेसक्यू ऑपरेशन में बचाया जाना था और शायद मेरे साथी मित्र के लिए भी.

ये बहादुर स्ट्रिंगर और स्थानीय पत्रकार मुट्ठीभर पैसों के लिए हर रोज अपनी जिंदगी दांव पर नहीं लगाते हैं, ज्यादातर खबरें सिर्फ स्व-प्रेरणा और बदलाव के लिए पैशन की वजह से की जाती हैं. तो फिर तमाम खतरों और कम तनख्वाह के बावजूद पत्रकारिता का बोझ हर रोज अपने कंधों पर उठाने वाले स्ट्रिंगर को स्वास्थ और सुरक्षा जैसी सुविधाएं दिए जाने के लिए लड़ाई आखिर कब शुरू होगी?

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं)

पत्रकारों का भविष्य और भविष्य की पत्रकारिता

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पांच साल या हो सकता है कि दो साल में ही, पूरा सीन बदल जाएगा. और बदलेगा इतनी तेजी से और इतना ज्यादा कि शक्लोसूरत पहचान में नहीं आएगी. मेरा अनुमान है कि दो साल के बाद इस देश में कुछ करोड़ लोग पत्रकारिता कर रहे होंगे और 80 फीसदी से ज्यादा पत्रकारों के पास करने के लिए कुछ और काम होगा या कोई काम नहीं होगा. मैं पत्रकारों की नौकरियां जाने की ही बात कर रहा हूं.

अमेरिकी स्कॉलर एन. कूपर ने आज से कुछ साल पहले कहा था, ‘सवाल यह नहीं है कि पत्रकार कौन है. सवाल यह है कि पत्रकारिता कौन कर रहा है.’ क्या वह आदमी पत्रकार माना जाएगा, जिसने राडिया टेप कांड के बारे में, मेनस्ट्रीम कहे जाने वाले मीडिया में, पहली लाइन लिखे या बोले जाने से पहले टेप को यूट्यूब पर डाल दिया था और एक पत्रिका में पहली बार राडिया टेप के बारे में रिपोर्ट होने से पहले लाखों लोगों को पता था कि राडिया टेप कांड हो चुका है और वे इस बारे में कमेंट और जवाबी कमेंट पढ़कर अपना नजरिया भी बना चुके थे. वे किसी के बताने के पहले जान चुके थे कि इस देश में कॉरपोरेट पब्लिक रिलेशन का तंत्र

इतना ताकतवर हो चुका है कि वह केंद्रीय मंत्रिमडल में कौन होगा और कौन नहीं और कौन-सा मंत्री किस विभाग में होगा, आदि तय कर रहा है.

और अगर वह शख्स पत्रकारिता कर रहा था, जिसने राडिया टेप को यूट्यूब में डाला, तो यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि भारत भी करोड़ों पत्रकारों के युग में प्रवेश कर चुका है. पूरी दुनिया में और खासकर पश्चिमी दुनिया में मास मीडिया के क्षेत्र में जो चल रहा है, उसने अब भारत को भी अपनी चपेट में ले लिया है. जो लोग इस बदलाव को नोटिस नहीं करना चाहते, वे किसी एक दिन जगेंगे, तो उन्हें लगेगा का सब कुछ बदल चुका है.

हालांकि इंटरनेट के जरिए भी, हम तक ज्यादातर समाचार परंपरागत टीवी चैनलों और अखबारों के पोर्टल के जरिए ही पहुंच रहे हैं, फिर भी आज एक आदमी जिसके पास ढाई-तीन हजार रुपये का स्मार्टफोन है और 10 रुपये का इंटरनेट पैक है, वह अपनी किसी सूचना या समाचार को टेक्स्ट, फोटो या वीडियाे के जरिए करोड़ों लोगों तक पहुंचाने की ताकत रखता है. हालांकि यह बात सिद्धांत रूप में ही सच है और ऐसा अक्सर नहीं होता, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह संभव है. अब देश दुनिया की कई सूचनाएं हम तक इसी तरह पहुंचने लगी हैं.

परंपरागत पत्रकारों के लिए यह चुनौतीपूर्ण स्थिति है. इंटरनेट की वजह से लोग पहले से ही तमाम माध्यमों से खबर लेने में सक्षम हो चुके हैं. ऐसे में करोड़ों पत्रकारों के युग में उनके लिए विश्वसनीय होने और सबसे अलग होने की चुनौती भयंकर शक्ल ले चुकी है. एक दुर्घटना या किसी नेताजी के एक भाषण का जो वीडियो हर किसी के पास है या प्रधानमंत्री का एक ट्वीट जो सबके पास है, उसके बारे में कोई पत्रकार अलग से ऐसा क्या बताएगा, जिसे जानने देखने के लिए एक ग्राहक अखबार खरीदे या टीवी देखे? किसी रैली में सैकड़ों की भीड़ को लाखों की भीड़ बताने के दौर का भी अंत हो चुका है. ऐसा कोई पत्रकार अपनी साख खोने के जोखिम के साथ ही कर सकता है. वर्तमान समय में अगर पत्रकारिता पेशे की इज्जत निम्नतम स्तर पर पहुंच चुकी है और पिछले दस साल में जिस भी फिल्म में पत्रकार आया है, वह विलेन या मसखरे की शक्ल में आया है, तो इसकी दर्जनों वजहों में से यह भी एक है कि समाचारों के ग्राहक अब कई माध्यमों के बीच अपना सच चुनने की स्थिति में आ गए हैं.

उपभोक्ताओं के लिए न्यूज कंज्यूम करने का प्लेटफॉर्म लगातार बदल रहा है. मिसाल के तौर पर मेरे अपार्टमेंट में जो न्यूजपेपर एजेंट सारे फ्लैट्स में अखबार देता है, उसने मुझे कुछ दिलचस्प जानकारियां दीं. उसकी दी कई जानकारियों में यह सूचना इस लेख के लिए महत्वपूर्ण है कि 2200 फ्लैट वाले इस अपार्टमेंट में जिन फ्लैट्स में रहने वाले सारे लोग 25 साल से कम उम्र के हैं, वहां कोई अखबार नहीं जाता. जाहिर है, 25 साल से कम उम्र के लोग देश दुनिया की सूचनाओं और समाचारों से अनजान नहीं हैं. शायद वे पुरानी पीढ़ी से ज्यादा अवेयर है, फर्क सिर्फ यह है कि उन लोगों ने सूचनाएं लेने का तरीका बदल लिया है. इन लोगों के लिए सूचनाओं का माध्यम वेब हो चुका है. पूरी दुनिया के साथ भारत में भी ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है.

एक और बदलाव यह है कि सूचनाओं और समाचार का प्राथमिक स्रोत सोशल मीडिया बनता जा रहा है. फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन जैसे माध्यम अब बड़ी संख्या में लोगों के लिए वह जरिया बन चुके हैं, जहां उन्हें देश, दुनिया या पड़ोस में होने वाली हलचल की पहली जानकारी मिलती है. ऐसे लोग कई बार न्यूज वेबसाइट पर जाते होंगे और इस बारे में कोई स्टडी नहीं है कि कितने लोग सोशल मीडिया में कोई सूचना पाने के बाद ऐसा नहीं करते. लेकिन सूचना के पहले स्रोत के रूप में सोशल मीडिया का स्थापित होना स्थापित तथ्य बनता जा रहा है. इसके महत्व का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक और अब तो कंपनियां भी कई बार अपनी घोषणाएं सबसे पहले सोशल मीडिया पर डाल रही हैं.

एक समय था जब केंद्र सरकार की खबरें मीडिया को देने वाली संस्था प्रेस इनफॉर्मेशन ब्यूरो यानी पीआईबी पत्रकारों को प्रेस रिलीज जारी करता था. यह रिलीज छपे हुए कागज पर पत्रकारों को मिलती थी. प्रेस रिलीज पाना पत्रकारों का विशेषाधिकार था. इसके बाद वे इस सूचना को अगले दिन अखबारों के जरिए पाठकों को पहुंचाते थे. लेकिन अब अरसा हो चुका है जब पीआईबी पत्रकारों को प्रेस रिलीज जारी करता था. अब प्रेस रिलीज पीआईबी की वेबसाइट पर अपलोड की जाती हैं और जिस समय ये रिलीज पत्रकारों को मिलती है, उसी समय दुनिया के हर उस व्यक्ति के पास यह होती है, जिसके पास इंटरनेट है और जिसकी प्रेस इनफॉर्मेशन ब्यूरो की रिलीज में दिलचस्पी है. कई कंपनियां भी प्रेस रिलीज अपनी साइट पर अपलोड करने लगी हैं. सूचनाओं के सीमित और नियंत्रित प्रवाह के अभ्यस्त पत्रकारों के लिए यह नई और कुछ के लिए तो यह विषम परिस्थिति है.

टीवी पर समाचार अब भी देखा जा रहा है. लेकिन समाचार के परंपरागत अर्थों में देखें तो टीवी का समाचार समाचार नहीं है. वह दरअसल मनोरंजन है और टीवी सीरियल से यह सिर्फ इस मायने में अलग है कि इसमें तात्कालिक सूचनाएं हैं. टीवी समाचारों को लेकर न्यूजरूम की सोच से लेकर उसे पैकेज करने की प्रक्रिया में इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि उसकी शक्ल एंटरटेनमेंट की हो, ताकि लोग ज्यादा से ज्यादा समय तक टीवी से चिपके रहें. हालांकि इस शक्ल में भी टीवी का समाचार कब तक जिंदा रह पाएगा, इसे लेकर पक्के तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता. मनोरंजन के क्षेत्र में टीवी समाचारों का बाकी के मनोरंजन, खेल और फिल्म तथा कार्टून चैनलों के साथ कड़ा मुकाबला है. जिन लोगों ने समाचार के पहले स्रोत के तौर पर वेब को स्वीकार कर लिया है, उनके लिए टीवी समाचारों का समाचार के तौर पर महत्व खत्म हो चुका है. दिल बहलाने के लिए वे बेशक टीवी चैनल देखते हैं.

एक और बड़ा बदलाव जो आते-आते रह गया है और कभी भी आ सकता है, वह है वेब पर न्यूज देखने के लिए ब्रॉडबैंड का फ्री होना. यानी, अब जब आप कुछ खास वेबसाइट पर जाएंगे तो वहां सर्फिंग करने पर आपका ब्रॉडबैंड खर्च नहीं होगा. ऐसी साइट्स में न्यूज साइट्स भी हो सकती हैं. ‘नेट न्यूट्रलिटी’ के नाम पर भारत के बड़े समाचारपत्र और टीवी समूहों की सामूहिक लॉबिंग की वजह से हालांकि यह होना टल गया है लेकिन परंपरागत मीडिया कॉरपोरेशन इसे कब तक रोक पाएंगे, यह देखना होगा.

देश के ज्यादातर न्यूज चैनल लंबे समय तक फ्री टू एयर रहे और कई न्यूज चैनल अब भी फ्री टू एयर हैं. इन्हें दिखाने के लिए केबल ऑपरेटर या डीटीएच प्लेटफॉर्म कोई फीस नहीं लेते. बल्कि न्यूज चैनल इस बात के लिए बड़ी रकम खर्च करते हैं कि उन्हें दिखाया जाए. इतना खर्च करके एक न्यूज चैनल खुद को फ्री टू एयर बना देता है और दिखाए जाने के लिए केबल और डीटीएच प्लेटफॉर्म को करोड़ो रुपये की फीस भी देता है तो इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि ये चैनल विज्ञापन से कमाई करके उसकी भरपाई करने के मॉडल पर चलते हैं. इसी तरह अखबार भी अपने प्रोडक्शन कॉस्ट के चौथाई से भी कम कीमत पर इसलिए बेचे जाते हैं क्योंकि उनके लिए कमाई का मुख्य स्रोत सर्कुलेशन रेवेन्यू नहीं, बल्कि एड रेवेन्यू है.

टीवी और प्रिंट में जिस तरह फ्री या कम कीमत पर माल बेचने का चलन है, वह वेब पर न हो, इसका कोई कारण नहीं है. ये साइट अपनी कमाई और बाकी खर्च की भरपाई विज्ञापनों से करेंगे. अब कल्पना कीजिए कि फेसबुक जैसी सोशल साइट पर सर्फिंग करने से अगर ब्रॉडबैंड का खर्च न आए और अगर फेसबुक न्यूज देना शुरू कर दे तो? यानी फेसबुक, किसी खबर का लिंक न देकर सीधे सीधे खबर दे और फेसबुक देखने का ब्रॉडबैंड खर्चा जीरो हो तो क्या पत्रकारों की दुनिया वैसी ही रह जाएगी, जैसी अभी है?

मुझे नहीं लगता इसकी वजह यह है कि अपने भारी भरकम यूजर बेस के साथ फेसबुक, न्यूज स्पेस का बड़ा हिस्सा घेर लेगा. वह समाचारों के लिए किसी एक या दो समाचार संकलनकर्ता से समझौता करेगा जिनके साथ वह विज्ञापन रेवेन्यू साझा करेगा या जिनसे वह खबरें खरीद लेगा. इस तरह किसी एक बाजार में दर्जनों चैनलों और अखबारों की जगह एक या दो न्यूज विक्रेता रह जाएंगे, जिनका माल फेसबुक बेचेगा. न्यूज कंज्यूम करने वालों के लिए इसका मतलब यह होगा कि समाचार जानने का उनका खर्च शून्य हो जाएगा बदले में वे विज्ञापन देखेंगे और माल खरीदेंगे. फ्री टू एयर न्यूज चैनलों और लगभग कौड़ियों के मोल मिल रहे अखबारों के जरिए उसके साथ यही हो रहा है. फर्क सिर्फ यह है कि ऐसा ही वेब पर भी हो जाएगा. साथ ही फेसबुक अपने यूजर के सर्फिंग बिहेवियर को ध्यान में रखते हुए उसे प्राथमिकता के आधार पर वैसी खबरें देगा, जिनमें उनकी या उनके दोस्तों की दिलचस्पी है.

पत्रकारों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक हो सकती है, क्योंकि इसका मतलब यह है कि बड़ी संख्या में चैनल और अखबार बंद होंगे. पत्रकारिता तो फिर भी होती रहेगी. करोड़ों लोग पत्रकारिता कर रहे होंगे. सूचनाओं और समाचारों का प्रवाह पहले से कई गुना बढ़ चुका

होगा. लेकिन पत्रकार के पेशे का आकार बेहद छोटा हो चुका होगा.

पत्रकार महोदय, क्या आप यह सब होता हुआ महसूस कर पा रहे हैं?

(लेखक इंडिया टुडे के मैनेजिंग एडिटर रह चुके हैं और अब भारतीय पत्रकारिता के सामाजिक चरित्र पर जेएनयू में शोधरत हैं)

टिटिहरी पत्रकार, बरसाती चैनल

Abhishek TV Graphic-F

फरवरी-2015 की गुनगुनी धूप और निजी कंपनियों के दफ्तरों से बजबजाता नोएडा का सेक्टर-63… दिन के बारह बज रहे हैं और एक बेरोजगार पत्रकार तिपहिया ऑटो से एक पता खोज रहा है. उसने सुना है कि यहां कोई नया समाचार चैनल खुलने वाला है. किसी माध्यम से उसे यहां मालिक से मिलने के लिए भेजा गया है. कांच के इस जंगल में करीब आधे घंटे की मशक्कत के बाद उसे वह इमारत मिल जाती है. हर इमारत की तरह यहां भी एक गार्ड रूम है. रजिस्टर में एंट्री करने के बाद उसे भीतर जाने दिया जाता है. प्रवेश द्वार एक विशाल हॉल में खुलता है जहां लकड़ी रेतने और वेल्डिंग की आवाज़ें आ रही हैं. एक खूबसूरत-सी लड़की उसे लेने आती है. ‘आप थोड़ी देर बैठिए, सर अभी मीटिंग में हैं’, उसे बताया जाता है. वह ऐसे वाक्यों का अभ्यस्त हो चुका है.

करीब आधे घंटे बाद लड़की उसे एक कमरे में लेकर जाती है. सामने की कुर्सी में बिखरे बालों वाला अधेड़ उम्र का एक वजनी शख्स धंसा हुआ है. ‘आइए… वेलकम… मौर्या ने मुझे बताया था आपके बारे में.’ बातचीत कुछ यूं शुरू होती है, ‘आप तो जानते ही हैं, हम लोग उत्तरी बिहार के एक खानदानी परिवार से आते हैं. अब बिहार से दिल्ली आए हैं तो कुछ तोड़-फोड़ कर के ही जाएंगे, क्यों?’ पत्रकार लगातार गर्दन हिलाता रहता है. हर दो वाक्य के बाद बगल में रखे डस्टबिन में वह शख्स पान की पीक थूकता है. ‘हम सच्चाई की पत्रकारिता करने वाले लोग हैं. हमें खरा आदमी चाहिए, बिलकुल आपकी तरह. बस इस महीने रुक जाइए, रेनोवेशन का काम पूरा हो जाए, फिर आपकी सेवाएं लेते हैं.’ पत्रकार आश्वस्त होकर निकल लेता है. उसके भरोसे की एक वजह है. चैनल का मालिक बिहार में एक जमाने के मकबूल कवि कलक्टर सिंह केसरी का पौत्र है. केसरी हिंदी की कविता में नकेनवाद के तीन प्रवर्तकों में एक थे. उसे लगता है कि हो न हो, आदमी साहित्यिक पृष्ठभूमि का है तो गंभीर ही होगा.

छह महीने बीत चुके हैं और उसके पास कोई फोन नहीं आया. उसे वहां भेजने वाले मौर्या ने पूछने पर बताया कि ‘न्यूज सेंट्रल’ नाम का यह चैनल खुलने से पहले ही बंद हो गया क्योंकि फंडर ने हाथ खींच लिया. दो महीने बाद बिहार विधानसभा के चुनाव हैं और ‘सच्चाई की पत्रकारिता’ करने वाले केसरी जी के पोते किसी नए जुगाड़ में हैं. जब-जब इस देश में कोई चुनाव आया है, यह कहानी हर बार तमाम लोगों के साथ दुहराई गई है,  दिल्ली में बीते साल 19 फरवरी से ‘डी6 टीवी’ की शुरुआत हुई थी. करीब छब्बीस लोगों के साथ शुरू हुए इस चैनल के बारे में अफवाह थी कि चैनल में कांग्रेसी नेता कपिल सब्बल का पैसा लगा है. चैनल से जुड़ने वाले पत्रकारों से कहा गया कि यह एक वेब चैनल है, आगे चलकर इसे सैटेलाइट करने की योजना है. उस दौरान यह चैनल सिर्फ लोकसभा चुनाव के लिए खोला गया था. यह बात कई कर्मचारी बखूबी जानते थे. चैनल के मालिक अशोक सहगल ने कर्मचारियों से बड़े-बड़े वादे किए. चुनाव के बाद मालिक ने बिना किसी पूर्व सूचना के 14 कर्मचारियों को बाहर निकाल दिया. आज चैनल बंद पड़ा है और दर्जनों कर्मचारी सड़क पर हैं.

चुनावों और चैनलों का रिश्ता इस देश में उतना ही पुराना है जितनी टीवी चैनलों की उम्र है, लेकिन समय के साथ यह रिश्ता व्यावसायिक होता गया है जो आज की तारीख में विशुद्ध लेनदेन का गंदा धंधा बन चुका है. हर चुनावी चैनल के खुलने और बंद होने की पद्धति एक ही होती है. मसलन, किसी छोटे/मझोले कारोबारी को अचानक कोई छोटा/मझोला पत्रकार मिल जाता है जो उसे चैनल खोलने को प्रेरित करता है. उसे दो लोभ दिए जाते हैं. पहला, कि चुनावी मौसम में नेताओं के विज्ञापन व प्रचार से कमाई होगी. दूसरा, राजनीतिक रसूख के चलते उसके गलत धंधों पर एक परदा पड़ जाएगा. एक क्षेत्रीय चैनल खोलने के लिए दस करोड़ की राशि पर्याप्त होती है जबकि चिटफंड, रियल एस्टेट, डेयरी, खदान और ऐसे ही धंधे चलाने वाले कारोबारियों के लिए यह रकम मामूली है. शुरुआत में किराये पर एक इमारत ली जाती है और उपकरणों की खरीद की जाती है. अधिकतर मामलों में आप पाएंगे कि उपकरणों को खरीदने के लिए जिन व्यक्तिों या एजेंसियों की मदद ली जाती है, वे आपस में जुड़े होते हैं या एक होते हैं. आर्यन टीवी, मौर्या टीवी, कशिश टीवी, समाचार प्लस, बंसल न्यूज, खबर भारती, न्यूज एक्सप्रेस, महुआ न्यूजलाइन, आदि में मशीनरी के शुरुआती ठेकेदार एक ही थे. यह पैसा बनाने का पहला पड़ाव होता है. मसलन, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर इन्हीं तीन राज्यों में प्रसारण के लिए 2011 में एक चिटफंड समूह द्वारा खोले गए चैनल ‘खबर भारती’ में शुरुआत में विदेश से जो कंप्यूटर आए, वे होम पीसी थे. बाद में इन्हें लौटाया गया और इससे पैसा बनाया गया. इसी तरह विजुअल देखने के लिए पीआरएक्स नाम का जो सॉफ्टवेयर खरीदा गया, वह महीने भर बाद ट्रायल संस्करण निकला.

उपकरण खरीद के बाद संपादक मनचाहे वेतनों पर मनचाही भर्तियां करता है. फिर आती है लाइसेंस की बारी. कुछ चैनल लाइसेंस के लिए आवेदन कर देते हैं तो कुछ दूसरे चैनल या तो किराये पर लाइसेंस ले लेते हैं या खुले बाजार से कई गुना दाम पर खरीद लेते हैं. जैसे, ‘न्यूज एक्सप्रेस’ ने खुले बाजार से काफी महंगा लाइसेंस खरीदा था जबकि कुछ दूसरे छोटे चैनल ‘साधना’ से किराये पर लाइसेंस लेकर प्रसारण कर रहे थे. लाइसेंस किराये पर देने का भी एक फलता-फूलता धंधा चल निकला है. नोएडा से खुलने वाला हर नया समाचार चैनल ‘साधना’ के लाइसेंस पर चलता सुना जाता है. बहरहाल, पैसे कमाने का अगला पड़ाव चैनल का वितरण होता है. यह सबसे महंगा काम है. अधिकतर चैनल इसी के चलते मात खा जाते हैं. इन तमाम इंतजामों के बाद किसी भी नए चैनल को ऑन एयर करवाने में अधिकतम दो से तीन माह लगते हैं, जब पेड न्यूज का असली खेल शुरू होता है.

आजकल प्रायोजित खबरों यानी पेड न्यूज की कई श्रेणियां आ गई हैं- प्री-पेड न्यूज, पोस्ट-पेड न्यूज और हिसाब बराबर होने के बाद टॉप-अप. जितना पैसा, उतनी खबर. जितनी खबर, उतना पैसा. छत्तीसगढ़ में आज से तीन साल पहले सरकारी जनसंपर्क विभाग द्वारा ऐसे घालमेल का पर्दाफाश हुआ था, जिसके बाद पिछले साल जनवरी में राज्य के महालेखा परीक्षक (एजी) ने राज्य सरकार को टीवी विज्ञापनों के माध्यम से उसके प्रचार पर 90 करोड़ के ‘अनावश्यक और अतार्किक’ खर्च के लिए झाड़ लगाई थी. एक जांच रिपोर्ट में एजी ने कहा था कि समाचार चैनलों को जो भुगतान किए गए, वे कवरेज की जरूरत के आकलन के बगैर किए गए थे और कुछ मामलों में तो इनके लिए बजटीय प्रावधान ही नहीं था. केवल कल्पना की जा सकती है कि अगर एक राज्य एक वित्त वर्ष में 90 करोड़ की धनराशि चैनलों पर अपने प्रचार पर खर्च कर सकता है, तो किसी भी कारोबारी को इसका एक छोटा सा अंश हासिल करने में क्या गुरेज होगा. चुनावों के बाद बेशक कमाई के न तो साधन रह जाते हैं, न ही चैनल को जारी रखने की कोई प्रेरणा. एक दिन अचानक चैनल पर ताला लगा दिया जाता है और सैकड़ों कर्मचारी सड़क पर आ जाते हैं.

जाहिर है, इसका असर खबरों पर तो पड़ता ही है क्योंकि ऐसे चैनल खबर दिखाने के लिए नहीं, बल्कि विशुद्ध कमाई के लिए खोले जाते हैं. झारखंड में पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान रांची में चुनाव आयोग ने वहां के एक समाचार चैनल ‘न्यूज 11’ के खिलाफ गलत खबर के प्रसारण पर एक मामला दायर किया था. चुनाव आयोग ने खबर को आचार संहिता के खिलाफ और बदनीयती माना था. इस चैनल ने मतदान के एक दिन पहले यह खबर चला दी थी कि सदर विधानसभा सीट पर भाजपा को टक्कर कांग्रेस नहीं, निर्दलीय प्रत्याशी दे रहा है. काफी देर तक चली इस खबर का असर मतदान पर पड़ा और नतीजतन अल्पसंख्यक वोटों का ध्रुवीकरण कांग्रेस से हटकर निर्दलीय प्रत्याशी की ओर हो गया.

समाचार चैनलों को टिकाए रखना कितना घाटे का सौदा है, यह हाल में बंद हुए या संकटग्रस्त कुछ चैनलों की हालत से समझा जा सकता है. चिटफंड समूह पर्ल ग्रुप द्वारा संचालित ‘पी7’ के मामले को देखें तो कह सकते हैं कि देश के इतिहास में पहली बार हुआ जब किसी चैनल पर कर्मचारियों ने कब्जा कर लिया और परदे पर यह सूचना चला दी, ‘सैलरी विवाद के कारण पी7 न्यूज हुआ बंद.’ इसी तरह ‘टीवी-9’ के एक एंकर ने बुलेटिन के बीच में ही वेतन भुगतान का मामला उठा दिया था और चैनल की स्थिति का पर्दाफाश कर दिया था. सहारा समूह का ताजा मामला हमारे सामने है जहां हजारों कर्मचारियों की आजीविका दांव पर लगी हुई है. नोएडा के श्रम आयुक्त के सामने एक माह का वेतन देने संबंधी हुए समझौते के बावजूद उसका पालन नहीं किया गया है जबकि वेतन छह माह का बाकी है. मीडिया के बड़े-बड़े नामों को अपने साथ जोड़ने वाले न्यूज एक्सप्रेस, भास्कर न्यूज, जिया न्यूज और सीएनईबी बंद पड़े हैं. एक और चिटफंड समूह का चैनल ‘लाइव इंडिया’ बंदी के कगार पर है, उसके बावजूद उसने अपने अखबार और पत्रिका को रीलॉन्च करने के लिए लोगों को टिकाए रखा है जबकि रीलॉन्च के लिए मुकर्रर तीन तारीखें गुजर चुकी हैं. कुख्यात दलाली कांड के बाद खुला नवीन जिंदल का ‘फोकस न्यूज’ बंद होने के कगार पर है जबकि ‘इंडिया न्यूज’ के क्षेत्रीय चैनल वितरण की मार से जूझ रहे हैं और प्रसारण के क्षेत्रों में ही वे नहीं दिखते. घिसट रहे चैनलों में एक तरफ हजारों मीडियाकर्मी हैं जिनके सिर पर लगातार छंटनी और बंदी की तलवार लटकी है, तो दूसरी ओर बंद हो चुके चैनलों से खाली हुए तमाम पत्रकार हैं जो ऐसी ही किसी जुगत में फंडर या नए बरसाती मेंढकों की तलाश कर रहे हैं.

समाचार चैनलों की बदनाम हो चुकी दुनिया इसके बावजूद थकी नहीं है. उत्तर प्रदेश के चुनावों के ठीक बाद नोएडा फिल्म सिटी में ‘महुआ’ के चैनल ‘न्यूजलाइन’ में पत्रकारों की सबसे पहली सफल हड़ताल हुई थी. इस बारिश में वहां से एक नया कुकुरमुत्ता उग रहा है. तीन साल के दौरान तीन चिटफंडिया चैनलों में भ्रष्ट मालिकों के संसर्ग का तजुर्बा ले चुके एक मझोले कद के पत्रकार कहते हैं, ‘छह महीने का टारगेट रखा है मैंने… एक लाख का प्रस्ताव दे दिया है. मिल गया तो ठीक, नहीं मिला तो अपना क्या जाता है.’ इस चैनल की कमान एक पिटे हुए पत्रकार के हाथ में है जो सहारा से लेकर अरिंदम चौधरी के प्लानमैन मीडिया तक घाट-घाट का पानी पी चुके हैं. इस दौरान ‘न्यूज सेंट्रल’ से निकलने के बाद मौर्या नाम का शख्स एक नए ‘प्रोजेक्ट’ पर काम कर रहा है- नाम है ‘ग्रीन टीवी.’ वह कहता है, ‘क्या करें भाई साहब… कुछ तो करना ही है.’

बिहार चुनाव तो सिर पर है, लेकिन बंगाल और उत्तर प्रदेश के चुनाव में अभी काफी वक्त बाकी है. वहां भी नए ‘प्रोजेक्ट’ की तलाश में पुराने पत्रकार नए मालिकों को बेसब्री से तलाश रहे हैं. यहां चुनावी चैनलों की आहट तो फिलहाल नहीं सुनाई दे रही है, लेकिन पर्ल समूह की पत्रिका ‘शुक्रवार’ को लखनऊ में नया मालिक मिल चुका है और राज्य सरकार की छत्रछाया में ‘सोशलिस्ट फैक्टर’ का प्रकाशन शुरू हो चुका है जिसके पहले अंक में मुलायम सिंह यादव को भारत का फिदेल कास्त्रो बताया गया है. हर दिन यहां मारे और जलाए जाते पत्रकारों की हृदयविदारक खबरों के बीच मीडिया और सत्ता की अश्लील लेन-देन मुसलसल जारी है. आकाश में टकटकी लगाए टिटिहरी पत्रकारों को बस चुनावी बूंदें टपकने का इंतजार है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

चिराग तले अंधेरा

Main Picपारले-जी के एक छोटे पैकेट में लगभग 316 कैलोरी होती है. औसत रूप से स्वस्थ व्यक्ति को एक दिन में लगभग 2500-3000 कैलोरी की जरूरत होती है. अमित पांडेय दिन में दो बार यानी दोपहर के खाने के समय और रात के खाने में पारले-जी के इस छोटे पैकेट से गुजारा कर रहे थे. ऐसा कई हफ्तों तक चला और आखिरकार भूख के कारण उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया और लखनऊ के एक अस्पताल में अमित ने दम तोड़ दिया.

मगर ये अमित पांडेय हैं कौन और आखिर क्यों उन्हें ऐसी मौत मिली? अमित सहारा समूह के टीवी न्यूज चैनल ‘समय’ (उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड) में असिस्टेंट प्रोड्यूसर थे और खराब आर्थिक स्थिति के चलते बिस्कुट खाकर जीने को विवश थे. उन्हें तीन महीनों से वेतन नहीं मिला था और स्वाभिमानी अमित को दोस्तों से आर्थिक सहायता मांगना गवारा नहीं था. वो अपनी भूख को नजरअंदाज करते हुए इस उम्मीद में संस्था के लिए काम करते रहे कि कभी तो प्रबंधन वेतन देगा. अमित की मौत के बाद चैनल ने ये बकाया राशि उनके परिजनों को दी.

टीआरपी के शोरगुल में उठती हेडलाइंस और ब्रेकिंग न्यूज की भूलभुलैया में अमित की मौत की खबर कहीं गुम हो गई या यूं कहें कि गैर-जरूरी समझकर नजरअंदाज कर दी गई. ये मौत पूरी भारतीय मीडिया के लिए आंखें खोलने वाली हो सकती थी पर स्थानीय अखबार के पन्नों में एक छोटी खबर बनकर रह गई. मीडिया संस्थानों के संपादकों और प्रबंधन ने भी इससे नजर फेरना ही ठीक समझा- शायद पहली बार नहीं, न ही आखिरी बार. अमित की मौत से मीडिया पर कोई फर्क नहीं पड़ा. सहारा मीडिया के विभिन्न विभागों में कार्यरत हजारों कर्मचारी अब भी अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं. उनका कहना है कि उन्हें कई महीनों से तनख्वाह नहीं मिली है- कुछ बताते हैं कि छह महीनों से वेतन नहीं मिला क्योंकि प्रबंधन कहता है कि उसके पास पूंजी ही नहीं है.

जुलाई, 2012 में महुआ टीवी चैनल के 150 से ज्यादा कर्मचारियों को ह्यूमन रिसोर्स (एचआर) विभाग द्वारा सूचना दी जाती है कि चैनल के मालिक पीके तिवारी ने चैनल को बंद करने का निर्णय लिया है. मगर इस बात पर एचआर ने चुप्पी साध ली कि कर्मचारियों का बकाया वेतन कब दिया जाएगा और चैनल बंद करने के हर्जाने के रूप में उन्हें क्या मिलेगा. एक दिन पहले तक वहां सब सामान्य था. इस सूचना को देने के लिए एचआर ने योजनाबद्ध तरीके से इतवार का दिन चुना, क्योंकि सप्ताहांत पर कम ही कर्मचारी काम पर आते हैं, इसलिए उनके विरोध की संभावना भी कम हो जाती है. हालांकि कुछ ही मिनटों में सभी कर्मचारी नोएडा फिल्म सिटी में इकट्ठा होकर चैनल परिसर में विरोध पर बैठ गए और तब तक विरोध प्रदर्शन करने की बात कही जब तक उनके सभी भुगतान मिल न जाए. प्रबंधन ने पुलिस को बुला लिया, पानी की सप्लाई बंद करवा दी, बाउंसरों को बुलाने की भी धमकी दी पर कर्मचारियों पर कोई फर्क नहीं पड़ा. विडंबना देखिए कि ये सब देश के उस मीडिया हब में हो रहा था, जहां देश के लगभग सभी बड़े हिंदी और अंग्रेजी न्यूज चैनलों के दफ्तर हैं. इन चैनलों के वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों से बार-बार निवेदन किया गया कि वो भी इस विरोध का साथ दें पर अपने साथी पत्रकारों के साथ हो रहा ये अन्याय इन चैनलों की टिकर लाइन में चलने वाली खबर में भी नहीं पहुंच सका. ये प्रदर्शन तीन दिनों तक चला जिसके बाद महुआ टीवी प्रबंधन कर्मचारियों की मांगें मानने के लिए विवश हो गया.

फिर अचानक एक दिन, बिना कोई कारण बताए महुआ टीवी के 125 कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया जाता है और पूरा भारतीय मीडिया चुप्पी साध लेता है! आज तीन साल बाद भी कई कर्मचारी बेरोजगार हैं तो कईयों ने आजीविका चलाने के लिए पत्रकारिता छोड़कर दूसरा काम शुरू कर दिया है. इन हालातों से जाहिर होता है कि कैसे भारत के मीडियाकर्मियों का एक बड़ा वर्ग अपने काम के साथ न्याय करने के लिए अपने कार्यस्थल पर लगातार आ रही ऐसी विपरीत परिस्थितियों से जूझ रहा है.

नवंबर 2014 में, एक राष्ट्रीय समाचार चैनल पी7 पर ‘ब्रेकिंग न्यूज’ में ये खबर चलने लगी : ‘वेतन को लेकर हुए विवादों के चलते पी7 न्यूज चैनल हुआ बंद’. ये खबर चैनल के आउटपुट डेस्क के कर्मचारियों के द्वारा चलाई गई थी, जिन्हें पिछले तीन महीनों से तनख्वाह नहीं मिली थी. हालांकि इन कर्मचारियों को निराशा ही हाथ लगी. उन्होंने सोचा था कि उनके विरोध के इस तरीके के बाद साथी मीडियाकर्मियों का सहयोग और सहानुभूति मिलेगी, लोग उनके समर्थन में आगे आएंगे पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. जब तक ये खबर चली चैनल का प्रसारण ‘ऑफ एयर’ हो चुका था. ये खबर सिर्फ दफ्तर के परिसर तक ही सीमित रह गई. इसके बाद कर्मचारियों ने वेतन भुगतान न करने को लेकर प्रबंधन के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया और चैनल निदेशक के केबिन के आगे धरने पर बैठ गए. उनका कहना था कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं वे वहां से नहीं हटेंंगे पर नोएडा पुलिस ने उन्हें वहां से खदेड़ दिया. इन कर्मचारियों ने साथी पत्रकारों और मीडिया के बड़े नामों के सहयोग के लिए ‘जस्टिस फॉर पी7 एम्प्लॉय’ नाम से एक फेसबुक पेज भी बनाया. पर जब पी7 के ये कर्मचारी अपने प्रबंधन से न्याय के लिए लड़ रहे थे, बाकी मीडिया चैनलों और अखबारों ने इस ओर से आंखें मूंद रखी थीं. वाह! अपने पेशे के लिए क्या एकजुटता दिखाई!

यहां अगर आपको ये लगता है असंवैधानिक रूप से बर्खास्त किए जाने, विरोध प्रदर्शन करने के बावजूद भी इन कर्मचारियों को अपने मीडिया के साथियों का समर्थन नहीं मिला, ये मुख्यधारा की खबरों में इसलिए जगह नहीं बना पाए क्योंकि ये किसी नामी ग्रुप के चैनल से नहीं जुड़े थे तो ये गलत है.

16 अगस्त 2013 को नेटवर्क 18 ने अपने 300 कर्मचारियों को कॉस्ट कटिंग यानी खर्च में कटौती के नाम पर नौकरी से निकाल दिया. सीएनएन-आईबीएन में रिपोर्टर, कैमरामैन और तकनीशियन के बतौर काम कर रहे ढेरों कर्मचारियों के लिए ये सदमे की तरह था. इस तरह सामूहिक रूप से लोगों को बर्खास्त करने की खबर जंगल की आग की तरह फेसबुक और ट्विटर पर फैली पर इसके खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाने की बजाय मुख्यधारा के मीडिया ने फिर चुप रहना बेहतर समझा. निकाले गए अधिकतर कर्मचारी वे थे जो कथित रूप से एक समूह विशेष का हिस्सा नहीं थे, जिस वजह से ये ‘कॉस्ट-कटिंग’ का कारण महज बहाना लगता है. चैनल के एचआर विभाग को निकाले जाने वाले नामों की एक सूची दी गई थी और उन्होंने पूरी बेशर्मी दिखाते हुए इस पर अमल भी किया. एचआर ने इन कर्मचारियों को ‘टर्मिनेशन लैटर’ देते हुए दफ्तर से 10 मिनट के अंदर बाहर निकल जाने को कहा था. इस सामूहिक बर्खास्तगी पर उस समय सीएनएन-आईबीएन के एडिटर-इन-चीफ राजदीप सरदेसाई ने ट्वीट कर ये प्रतिक्रिया दी, ‘चोट और दर्द अकेले ही सहने होते हैं. आपको अकेले ही शोक मनाना चाहिए. गुडनाइट…’ उस वक्त आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष थे, जिन्होंने बाद में आम आदमी पार्टी जॉइन की, मगर इस बर्खास्तगी पर उनके पास भी मौन के अलावा कोई जवाब नहीं था.

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इसके बाद इन निष्कासित कर्मचारियों ने विरोध करने की ठानी और इसके लिए आनन-फानन में ही ‘पत्रकार एकजुटता मंच’ बनाया गया और नोएडा फिल्म सिटी में नेटवर्क 18 के दफ्तर के बाहर विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ. मीडिया के किसी चर्चित, प्रभावशाली व्यक्ति के इनके साथ न आने, यहां तक कि किसी समाचार चैनल द्वारा इस घटनाक्रम को कवर न करने, तवज्जो न देने से एक बार फिर ये साबित हो गया कि कैसे मीडिया अपने ही साथियों के प्रति हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने से मुंह चुराता है! कैसे जरूरत पड़ने पर भी, मीडिया को चलाने वाले अपने ही साथी पत्रकारों और सहकर्मियों के साथ हो रहे शोषण के खिलाफ खामोश रहे!

अलग-अलग समय पर हुईं ये चार घटनाएं, एक ही-सा कारण, मीडिया द्वारा एक समान नजरअंदाजी! क्यों मीडिया में इसके अपने कर्मचारियों-पत्रकारों आदि के साथ हुए इस अन्याय को प्रसारित करने का साहस नहीं है? वो आखिर इतनी सहनशीलता क्यों दिखा रहे हैं? जवाब वरिष्ठ पत्रकार जेपी शुक्ल देते हैं, ‘अधिकतर सभी मीडिया संस्थान, खासकर टीवी चैनलों के मालिक बड़े कॉरपोरेट घराने, रियल एस्टेट या चिट-फंड कंपनियों से जुड़े लोग हैं. मीडिया एक छोटा क्षेत्र है जहां ऊंचे पदों पर बैठे सभी लोग एक-दूसरे को जानते हैं, ऐसे में अपने ही लोगों के खिलाफ कौन रिपोर्ट करेगा?’

यहां एक और विडंबना भी है. अपने साथियों के खिलाफ हो रहे अन्याय पर मौन हो जाने वाला मीडिया किसी ‘आउटसाइडर’ के द्वारा इनकी कार्य-पद्धति पर सवाल उठाने पर बौखला के उसके खिलाफ हो जाता है. नवंबर 2011 में भारतीय प्रेस काउंसिल के तत्कालीन अध्यक्ष मार्कंडेय काटजू ने मीडिया पर एक ऐसी ही तीखी टिप्पणी की थी. सामान्य रूप से पूरे मीडिया के बारे में अपनी राय जाहिर करते हुए काटजू ने कहा था कि मीडिया में अधिकांश लोग बहुत ही निम्न स्तर का बौद्धिक कौशल रखते हैं, साथ ही उन्हें अर्थशास्त्र, राजनीति, दर्शन या साहित्य के बारे में बिलकुल भी ज्ञान नहीं है. इस पर और गंभीर होते हुए जस्टिस काटजू ने यहां तक कहा कि भारतीय मीडिया लोगों के हित के लिए काम नहीं करता.

काटजू के इस बयान पर मीडिया के हर धड़े में बौखलाहट देखी गई. भाषा और क्षेत्र के बैरियर को तोड़ते हुए सभी टीवी चैनल एक स्वर में काटजू की निंदा कर रहे थे. ‘काटजू ने हदें पार कीं’ और ‘सठिया गए हैं काटजू’ दो ऐसी हेडलाइंस थीं जो चैनलों पर लगातार चल रहीं थीं. ये निसंदेह एक ऐसी बात थी जहां मीडिया अपनी गलतियों की अवहेलना करते हुए उन पर गर्व का अनुभव कर रहा था.

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चैनलों से मीडियाकर्मियों के निकाले जाने की खबरें सुर्खियां नहीं बटोर पातीं. मीडियाकर्मी अपने ही साथियों के साथ हो रहे अन्याय से किनारा कर लेते हैं

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वरिष्ठ पत्रकार और निजी हिंदी समाचार चैनलों की पहली द्विभाषी एंकर सुधा सदानंद बताती हैं, ‘टीवी समाचारों के संदर्भ में ‘विश्वसनीय मीडिया’ कहना ही एक विरोधाभास है, ठीक उसी तरह जैसे ‘दयालु तानाशाह’ कहना. वैसे दिलचस्प बात ये है कि चैनलों के एडिटर-इन-चीफ बिलकुल ऐसे ही व्यवहार करते हैं. कई बार खबरें इकट्ठी करके उनका प्रसारण करना एक गिरोह की कार्य-पद्धति जैसा होता है, जहां ‘मुखिया डॉन’ किसी नेता/अभिनेता/एनजीओ/फिल्म के खिलाफ सुपारी दे देता है और एंकर बिना कोई शोध किए, बिना पृष्ठभूमि जाने चिल्ला-चिल्लाकर उस बात को सनसनीखेज खबर में बदल देता है.’

काटजू की मीडिया पर टिप्पणी पर जहां टीवी मीडिया पूरे जोर-शोर से उनके खिलाफ दलीलें दे रहा था, वहीं अगर सोशल मीडिया की मानें तो लोग जस्टिस काटजू की बात से सहमत लग रहे थे. मीडिया की उस आक्रामक प्रतिक्रिया ने मीडिया के प्रति आम लोगों के दृष्टिकोण को संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया था. अब दर्शक और पाठक मीडिया के लोगों की विश्वसनीयता पर प्रश्न करने लगे थे. मीडिया आलोचक सुदीप दत्ता कहते हैं, ‘जस्टिस काटजू का बयान पत्रकारिता की गंभीरता के प्रति उनकी जागरूकता का परिणाम था, मीडिया यहां इसे अपनी कमजोरियों को सुधारने के लिए प्रयोग कर सकता था पर उन्होंने नाराज होकर असल संदेश को ही कुचल दिया.’

जिन लोगों ने समाचार चैनलों, खासकर हिंदी समाचार चैनलों के लिए काम किया है वे अच्छी तरह जानते हैं कि नौकरी या प्रमोशन का मिलना आपकी शैक्षणिक योग्यता और पत्रकारिता कौशल के इतर कई अन्य बातों पर निर्भर करता है. एक राष्ट्रीय हिंदी समाचार चैनल के असिस्टेंट आउटपुट एडिटर बताते हैं, ‘जब संपादक किसी को नौकरी पर रखते हैं तो क्षेत्रवाद और किसी विशेष के लिए तरफदारी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और फिर ऐसे पत्रकार से आप कैसे काम की उम्मीद रखेंगे जो अपनी योग्यता नहीं बल्कि किसी के प्रभाव के बलबूते चैनल में आया है?’ पर फिर अब योग्य पत्रकारों की आवश्यकता ही किसे है?

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संदर्भ में देखें तो एक रिपोर्टर की भूमिका अब बस एक ‘साउंड-बाईट’ एकत्र करने वाले की हो गई है. संपादकों को अमूमन न्यूज रूम में रिपोर्टरों को धमकाते हुए सुना जा सकता है, ‘मैं एक कैमरामैन को ही किसी नेता की साउंड-बाईट लाने को भेज सकता हूं तो मुझे तनख्वाह देकर रिपोर्टर रखने की क्या जरूरत है?’

चैनलों में सुबह-सुबह होने वाली संपादकीय मीटिंग्स में दिनभर की खबरों के लिए जो एजेंडा बनाया जाता है वो मूलतः उस दिन के अखबार की खबरों पर आधारित होता है. रिपोर्टर्स को किसी मुद्दे विशेष पर किसी नेता की बाईट (मुख्यतः उनकी प्रतिक्रिया) लाने की जिम्मेदारी दी जाती है और ओबी वैन से कुछ लाइव फीड देने को कहा जाता है. अब खबरें फील्ड में नहीं बल्कि न्यूज रूम में बनती हैं. चैनल को गेस्ट-कोऑर्डिनेटर को कुछ ‘विशेषज्ञों’ को बुलाने को कहा जाता है. हर चैनल के पास अपने चुनिंदा विशेषज्ञ होते हैं. खबरें भले ही बदलती रहें पर ये विशेषज्ञ शायद ही कभी बदलते हैं. इन विशेषज्ञों में बेकार नेता, कुछ वरिष्ठ पत्रकार और कुछ समाजसेवी होते हैं. सुबह से ही इन बहसों के प्रोमो चैनल पर दिखते हैं और फिर घिसे-पिटे छह से आठ खिड़कीनुमा ग्राफिक में प्राइम टाइम पर इस मनोरंजक बहस को खबर के रूप में पेश किया जाता है. सुधा कहती हैं, ‘रिपोर्टर्स अब बेकार हो चुके हैं और डेस्क पर वो लोग हैं जिनमें बाहर यानी फील्ड में जाकर काम करने की कूवत ही नहीं है. महज तस्वीरों के लिए स्क्रिप्ट लिखना! क्या कोई बताएगा ये क्या मूर्खता है? खैर मुझे इस बारे में नहीं जानना कि किस खूबी के आधार पर प्राइम टाइम के लिए एंकर चुना जाता है. मुझे एक ऐसा चैनल बता दीजिये जहां पर एंकर शीर्ष पद का न हो, या ऐसा कोई खूबसूरत चेहरे का मालिक जिसे साधारण प्रश्न भी प्रोडक्शन कंट्रोल रूम से बताए जाते हों. हां अपवाद हैं पर वो बहुत ही कम हैं.’

मीडिया में ऐसी बातें इसलिए भी देखी जाती हैं क्योंकि अच्छी खोजी रिपोर्ट्स और सामाजिक रिपोर्ट्स के लिए निवेश की भारी कमी है. अधिकांश चैनल घाटे में चल रहे हैं तो ऐसे में उनका फोकस बस यही रहता है कि कैसे रिपोर्टर को बिना फील्ड में भेजे, दफ्तर में बैठे-बैठे ही ज्यादा से ज्यादा खबरें इकट्ठी कर ली जाएं- इस अभ्यास को सामान्यतया ‘आर्मचेयर जर्नलिज्म’ यानी कुर्सी पर बैठ कर की जाने वाली पत्रकारिता के रूप में जाना जाता है. और साफ सी बात है कि इस तरह बिना जमीनी विश्लेषण के की गई इस रिपोर्टिंग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना लाजिमी है. जमीनी रिपोर्टिंग की कमी की भरपाई स्टूडियो में होने वाली डिबेट या बहस से की जाती है, जो या तो निरुद्देश्य होती है या वही पुरानी बातें दोहराती हैं.

एक नामी हिंदी चैनल के संपादक बताते हैं, ‘ये सब टीआरपी का खेल है. हम वही दिखाते हैं जो ज्यादा बिकता है और हमें टीआरपी के चार्ट में ऊपर ले जा सकता है. लोग यही देखना चाहते हैं. कितने दर्शकों में किसी सामाजिक मुद्दे पर तीस मिनट लंबी डाक्यूमेंट्री देखने का धैर्य होता है?’ संयोग की बात ये है कि ये संपादक चैनल में दोहरी भूमिका निभाते हैं. पहली तो खबरों को देखना और दूसरा चैनल में रेवेन्यू जनरेशन यानी धन की आवाजाही का भी ध्यान रखना. ये संपादक आगे बताते हैं, ‘रिपोर्टर्स की महत्ता धीरे-धीरे कम होती जा रही है. मैं एजेंसीज द्वारा दी गई साउंड-बाईट के आधार पर 24 घंटे का एक समाचार चैनल चला सकता हूं. तो ऐसे में उसी नेता की वही साउंड बाईट लाने के लिए रिपोर्टर रखना सिर्फ फिजूलखर्ची होगी!’

क्या पत्रकारिता के बाहर की दुनिया न्यूजरूम, पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के प्रबंधन के बीच में होने वाली इन घटनाओं से वाकिफ है? शायद हां, क्योंकि जिस तरह की खबरों और विचारों को इकठ्ठा किया जाता है, इनका प्रसारण होता है उससे लोग प्रभावित होते हैं. न्यूज चैनलों के माध्यम से ही वो अपने आस-पास से लेकर दुनियाभर की गतिविधियों को जान पाते हैं और बेशक समाचारों का ये बदलता स्तर उनके जीवन को प्रभावित करता है.

खबरों के बनने और उन्हें प्रसारित करने में दूसरा प्रभावी पहलू किसी विशेष दृष्टिकोण की ओर झुकाव भी है. कोई भी दर्शक बहुत ही आसानी से बता सकता है कि कौन-सा चैनल किस पार्टी या विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहा है. ऐसे मुद्दे जहां पर घोर असहमति होती है वहां कई बार केवल एक ही पक्ष के हित की बात की जाती है और ईमानदारी से सच और असल तथ्यों को जानने की कोशिश नहीं होती. ऐसे में भ्रामक खबरों का प्रसार बढ़ता है. उदाहरण के लिए, अन्ना हजारे को या तो ‘दूसरा गांधी’ कहा जाता है या बदमाशों के दल का नेता! सामान्य रूप से गंभीर खबरों के गिरते स्तर के पीछे गैर-जरूरी समाचार चैनलों का लगातार मुख्यधारा में बने रहना भी है. उलटे-सीधे, निरर्थक नाईट ऑपरेशनों ने भी मीडिया का खासा नुकसान किया है. ऐसे कई चैनल किसी चुनाव के समय की अंधी दौड़ में शुरू होते हैं. ये किसी पार्टी विशेष का प्रचार करते हैं, विज्ञापनों से अपने हिस्से का धन बटोरते हैं और फिर काम खत्म होते ही रातोंरात चैनल बंद करके, सैकड़ों कर्मचारियों को बेरोजगार करते हुए निकल जाते हैं. ऐसा ही केस ‘जिया न्यूज चैनल’ का है जो 2014 के लोकसभा चुनावों के समय बड़े जोर-शोर से शुरू हुआ और चुनाव परिणाम आने के कुछ ही महीनों के अंदर बोरिया-बिस्तर समेटकर चलता बना.

मीडिया पर कम होते भरोसे के पीछे चिट-फंड कंपनियों का चैनल मालिक होना है. राष्ट्रीय चैनल न्यूज एक्सप्रेस का उदाहरण देखिए. इस चैनल की मालिक एक चिट-फंड कंपनी है और चैनल की संपादकीय नीतियां मालिक की जरूरतों के हिसाब से निर्धारित की जाती हैं.

ढेरों मुश्किलों और धमकियों से जूझ रहा मीडिया अपने अस्तित्व को बचाने के लिए लड़ रहा है, लोकतंत्र में तो मीडिया का महत्त्व और बढ़ जाता है, ऐसे में वर्तमान भारतीय मीडिया एक दोराहे पर खड़ा हुआ है. आज इनके द्वारा लिया गया कोई भी कदम भले ही सही हो या गलत, सोशल मीडिया पर उसका गहरा विश्लेषण किया जाता है. ये सारी जिम्मेदारियां उस पत्रकार की समझी जाती हैं जो किसी हलवाई की दुकान के मजदूर जितनी असुरक्षा में जी रहा है, जिसके ऊपर काम संबंधी सारे उत्तरदायित्व हैं पर उसके अधिकारों के बारे में कोई बात नहीं है. ये शायद इनकी नियति बन गई है पर क्या ये उचित है?

भुरभुरी दिल्ली में सब रामभरोसे चल रहा है

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भूकंप के बारे में सोचते हुए हमें अपने कैलेंडर, इतिहास और प्रकृति का कैलेंडर और उसकी घटनाओं का इतिहास मन में दोहरा लेना चाहिए. आज दिल्ली राजधानी है लेकिन इससे पहले भी यह अलग-अलग लोगों को राजधानी की तरह अपनी सेवाएं दे चुकी हैं. हमलोगों की स्मृति में इस शहर का इतिहास तो कोई एक हजार साल का होना ही चाहिए. यह संभव है कि इतने समय के इतिहास में ऐसा कोई भूकंप नहीं आया हो जो हमें कड़वा सबक सिखा गया हो. यह हमेशा याद रखना चाहिए कि यह शहर जिस जगह बसा है, वह भूकंप के लिहाज से कोई सरल जगह नहीं कही जाएगी. जिस पैमाने पर भूकंप की तीव्रता नापी जाती है, वह हमारा बनाया हुआ है. यह सही है कि पैमाना बहुत मेहनत से बनाया गया है लेकिन यह हमारा ही बनाया हुआ है. यह कोई जरूरी नहीं है कि प्रकृति ने वह पैमाना पढ़ रखा हो. प्रकृति को जिस दिन लगेगा वह उस दिन उससे कम या ज्यादा का नमूना दिखा सकती है. इसलिए दिल्ली शहर को किसी भी चीज का विस्तार करते हुए इस बात को अपने मन से कभी भी हटने नहीं देना चाहिए.

दुर्भाग्य से हम लोग ऐसे समय से गुजर रहे हैं जब आर्थिक नीतियों ने गांव से उजाड़कर शहर की ओर धकेला है. बांध, बिजलीघर, सड़कों का चौड़ीकरण आदि कई तरह की विकास की योजनाएं हैं. इन सबके नीचे जो भी चीजें आती हैं सबको उठाकर फेंक दिया जाता है. इस काम में न कोई संवेदना है और न ही व्यवस्था देने की कोई योजना है. लोग तो अपने-अपने पेड़ों से गिर जाते हैं और न जाने जब पेड़ की पत्तियां थोड़ी भी हिलती-डुलती हैं और थोड़ी भी हवा या आंधी चलती है तो वह सब उड़कर न जाने कहां चले जाते हैं. ऐसी सभी जगहों से उखड़े लोग अपने आसपास के शहरों की ओर ठेले जाते हैं. इन शहरों का आकर्षण कहिए या चुंबक, जो लोगों को अपनी ओर खींचते हैं. इन शहरों में कुछ लोग चाहकर और कुछ बिना चाहत के अपनी मजबूरी में आकर बसते है. ऐसे लोगों की सेवाएं बहुत महत्वपूर्ण हैं, इसे नहीं भूलना चाहिए. अपनी जगह छोड़कर जो लोग नई जगह पहुंचते हैं, उनका कोई स्वागत करने वाला नहीं मिलता है. उसे अपने रहने के लिए कहीं-न-कहीं छप्पर डालना होता है. इसी तरह से एक बस्ती बस जाती है, जिसका ठीक-ठीक नाम भी मेरी भाषा आजतक नहीं खोज पाई है. इसे हम कभी झुग्गी-झोपड़ी, मलिन बस्ती, गंदी बस्ती आदि कुछ कह देते हैं. इस तरह इन बस्तियों के कई नाम होते हैं. अंग्रेजी में तो इसे सीधे-सीधे ‘स्लम’ कहते हैं. शहर को बहुत सारी अनिवार्य सेवा देने वाली आबादी को हम तरह-तरह के अपमानजनक नामों से पहचान पाते हैं.

डीडीए के 10-20 साल पुराने मकानों की गारंटी लेने को कोई तैयार नहीं है. कुछ इमारतों की हालत ऐसी है कि बिना भूकंप के ही कोई छू दे तो ये गिर जाए

इसमें एक वैध और अवैध शब्द भी जुटता है. प्रायः मुखर लोग जहां रहते हैं वो वैध इलाके कहलाते हैं और जहां अपनी जगह से उखड़े या उजड़े लोग रहते हैं, वो अवैध बस्तियां कहलाती हैं. चूंकि यह दौर संख्या का है इसलिए इनकी गिनती करने के लिए राजनेता या राजनीति करने वाले आगे आते है. इसके बाद राजनेता उनसे यह वादा भी करते हैं कि तुम अपना मत मुझे दे दो तो हम चुनाव जीतने के बाद आपके इलाके को वैध बना देंगे. जो राजनेता बस्ती को वैध बनाने की बात चुनाव के दौरान करते हैं, बाद में जब उनकी सरकार बन जाती है तब वे ही इन बस्तियों में बुलडोजर चलाने के लिए पहुंच जाते हैं. कभी शहर को सुंदर बनाने, कभी अवैध निर्माण, कभी सड़क, सफाई आदि के नाम पर बस्तियों पर बुलडोजर चलाए जाते हंै. कभी रात को मूसलाधार बारिश में, कभी एक-दो डिग्री की कड़क ठंड में तो कभी 47-48 डिग्री की आग बरसाती धूप में बस्तियों को निर्ममता से उजाड़कर फेंक दिया जाता था. यह शहर का एक मजबूरी वाला हिस्सा है, जिसे हम साधन-संपन्न कहते हैं जो पहले से वैध कही जानेवाली बस्तियों में रहता है. उसके सपने कुछ और बढ़कर हैं. इस आबादी के लोग दिल्ली के आसपास बसने वाली अटपटे नामों वाली कॉलोनियों में 20-30 लाख से लेकर अब तो 20-30 करोड़ वाली कॉलोनियों में अपनी जगह तलाशते हैं. जैसा हम गरीब लोगों की बस्तियों का नाम अपनी भाषा में ढूंढ़ नहीं पाए, वैसे ही हम वैध बस्तियों के नाम अपनी भाषा में तलाश नहीं कर पाए हैं. हमें ऐसी बस्तियों के नाम इतालवी और दूसरी भाषा के मिलते हैं जिसका मतलब हम नहीं जानते हैं. नोएडा, गुड़गांव और फरीदाबाद में कुछ कॉलोनियों में ऐसे नाम हमें मिल जाते हैं जिसके बारे में हम ‘ऐ…’ ही कह सकते हैं. ‘ऐ…’ कहने का मतलब यह कि भाई समझा नहीं जरा इसका मतलब बताना. इनमें रामपुर और रामनगर टाइप पते नहीं बसे हैं. जिस दौर में हिंदुत्व का सबसे अधिक शोर है उसमें से ऐसे नाम वाले पते शामिल नहीं हैं.

इन सब तरह की समस्याओं के बीच भूकंप के लिहाज से शहर को देखना भी जरूरी है. भगवान न करे कि ऐसा कोई भी दिन हमारी दिल्ली पर आए. लेकिन आए तो हमारी कोई तैयारी नहीं है यह कह देना ज्यादा सरल है. अवैध मानी जानेवाली बस्तियों में वैध तरीके से मकान खड़ा करने की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती है. अपनी मेहनत-मजूरी से पैसे बचाकर एक-एक, दो-दो ईंट जोड़कर एक कमरा डाल लेते हैं, उसके ऊपर एक और कमरा ऐसा ही कुछ-कुछ करके डाल लेते हैं ताकि उसमें से कुछ किराया मिलने लगे. इस प्रयास में तीन-चार मंजिल का निर्माण तो हो ही जाता है. इन बस्तियों में ऐसे मकान भी होते हैं, केवल झुग्गियां ही नहीं होती हैं. इन मकानों में सबसे सस्ती और कमजोर सामग्री लगाई जाती है. एक तरफ तो यह है और दूसरी तरफ बड़े-बड़े बिल्डर हैं. उनके राजनीतिक संपर्क हैं. जमीनें भी उनमें से बहुतों ने अवैध तरीके से ली हैं लेकिन वो सब वैध बनती चली जाती हैं. उनके द्वारा बनाई गई बिल्डिंगों में किस स्तर की सामग्री लगी है, यह ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता. हालांकि जिस तरह से तुरंत पैसा कमाने की प्रवृत्ति दिखती है, उसके चलते उनकी बसाई बस्तियों के बारे में भी बहुत भरोसा नहीं जमता है. भगवान न करे कि ऐसा दिन आए कि वैध बस्तियों को शक्ति परीक्षण के दौर से गुजरना पड़े. संभव है कि हमारी दोनों ही बस्तियां प्रकृति के शक्ति परीक्षण में असफल हो जाएं. इन दो बसावटों के बीच दिल्ली की एक तीसरी बसावट वो है जिसे सरकारी माध्यमों से बनाकर खड़ा किया गया है. सरकारी बस्तियां हैं, सरकारी इमारतें हैं. दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के 10-20 साल पुराने मकानों की गारंटी लेने को कोई तैयार नहीं है. इन इमारतों में से कुछ की हालत तो इतनी बुरी है कि बिना भूकंप आए ही कोई छू दे तो यह भरभरा के गिर जाएं. ये तो उन इमारतों में रहने वालों ने किसी तरह बस उसे टिकाए रखा है. इस तरह देखा जाए तो पूरी दिल्ली पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं.

चाहे वह वैध बस्तियां हों या अवैध-दोनों जगहों पर नगरपालिका पानी की मांग पूरी करने लायक बची नहीं है. दोनों ही जगहों को अपने-अपने ढंग से पानी जमीन के नीचे से खींचना पड़ता है. हर जगह पंप, बोरिंग और हैंडपंप लगे हैं. ये पानी पीने लायक हैं या नहीं, यह एक अलग विषय है लेकिन इन दोनों ही इलाकों में से पानी रोज-रोज निकाला जाता है. भूजल स्तर के कम होने के साथ-साथ जो दबाव है, वह धीरे-धीरे कम होता जाता है. पानी के सोखे जाने से जमीन में एक खोखलेपन के वातावरण का भी निर्माण होता जाता है. इस साल से पहले इस बात का इतना खतरा नहीं था क्योंकि हर साल इतनी बरसात हो जाती थी कि एक तरफ जमीन से हम पानी निकालते हैं तो दूसरी ओर प्रकृति भरपूर पानी गिरा देती थी. हम कुछ बूंद जमीन से निकालते थे, प्रकृति कुछ बूंद ऊपर से गिरा देती थी. अब हमने प्रकृति के पानी डालने के रास्ते सड़कें बनाकर, मकान बनाकर, पार्क में टाइल्स लगाकर बंद कर दिए. हमने अपनी सार्थक भूमिका तो निभाई नहीं लेकिन प्रकृति के सार्थक भूमिका को भी बाधित कर दिया. अब ऐसे में खोखली होती जमीन को लेकर प्रकृति अपनी छोटी-मोटी हलचल में कितना नुकसान करेगी, इसका कोई वैज्ञानिक अध्ययन अभी तक नहीं हुआ है. यहां सबकुछ रामभरोसे ही चल रहा है.

(स्वतंत्र मिश्र से बातचीत पर अाधारित)