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कारतूस के साये में कलम

34-35-1-2तकरीबन तीन हफ्ते पहले कश्मीर घाटी के सोपोर में जब छह लोगों की अज्ञात बंदूकधारियों ने हत्या कर दी तो 1990 के दशक की याद आ गई जब इस तरह की घटनाएं आम थीं. उस वक्त बहुत सारे लोग मारे गए, किसी ने न तो इसकी जिम्मेदारी ली थी और न ही सरकार पर सवाल उठाए गए. मामलों की जांच बहुत ही दबे अंदाज में की गई. इन मामलों का सच अगर जाना जाता तो सिर्फ विश्वसनीय लोगों के बीच ही उसे साझा किया जाता. कश्मीर में किसी पत्रकार के लिए यह अस्पष्ट और अव्यस्थित वास्तविकता है, जो इस ‘विवादित राज्य’ को पत्रकारिता के लिहाज से चिंता या तनावपूर्ण जगह बना देती है. सोपोर में हुई हत्याएं पत्रकारिता की चुनौतियों की झलक दिखाती हैं, जिसका एक विशिष्ट विश्वासघाती पहलू यहां लगातार जारी हिंसा है.

हालिया हिंसा की शुरुआत 25 मई को हुई जब एक नए और कम चर्चित आतंकी संगठन लश्कर-ए-इस्लाम ने बीएसएनएल के एक आउटलेट पर हमला कर 26 साल के मोहम्मद रफीक की हत्या कर दी थी. इस हमले में तीन लोग घायल हुए थे. इससे पहले इस संगठन ने पोस्टर लगाकर दूरसंचार टावर अपने घरों में लगाने वालों से टावर हटाने की धमकी दी थी, जिसके तुरंत बाद ही गुलाम हसन डार की हत्या कर दी गई थी, जिनकी संपत्ति में एक ट्रांसमिटिंग टावर लगा हुआ था. हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा और दूसरे अलगाववादी संगठनों ने इन हत्याओं से खुद को अलग रखते हुए लश्कर-ए-इस्लाम को सरकारी सहायता प्राप्त संगठन बताया. साथ ही इस संगठन को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के उस बयान से जोड़ा, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘आतंकवादियों को खत्म करने के लिए आतंकवादी होने की जरूरत है.’ इससे उलट राज्य की पुलिस ने इसके लिए पहले हिजबुल और बाद में एक दूसरे अलगाववादी संगठन को इन मौतों का जिम्मेदार ठहराया. वहीं लश्कर-ए-इस्लाम ने खुद को विशुद्ध मुजाहिदीन बताने पर जोर दिया और हिजबुल और लश्कर-ए-तैयबा को उनकी साख की जांच फिर से करने की चुनौती भी दी. इस बीच संगठन के फील्ड ऑपरेशन के प्रवक्ता गाजी अबु सरीक ने आरोप लगाया कि सैयद अली शाह गिलानी के नेतृत्व वाले हुर्रियत के कुछ सदस्यों ने चार शीर्ष आतंकवादियों के साथ विश्वासघात किया, जिसकी वजह से वे मारे गए. हालांकि हुर्रियत ने इन आरोपों को खारिज कर दिया. इसके बाद सोपोर में खामोशी छा गई, जो 1989 में अलगाववादी आंदोलन शुरू होने के बाद से एक आंतकवादी गढ़ रहा है. अलगाववादियों और सुरक्षा एजेंसियों के बीच की स्थिति और कठोर हो गई और दोनों एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे थे. इसके बाद मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने मामले की समयबद्ध जांच के आदेश दे दिए हैं, जो अब भी शुरू होनी बाकी है. पुलिस की ओर से सोपोर में पोस्टर लगाए गए जिसमें हिजबुल से अलग हुए आतंकी संगठन के दो कमांडरों के बारे में जानकारी देने और हत्याओं की जानकारी देने वाले को 10 लाख रुपये का इनाम देने की घोषणा की गई है.

अब दो हफ्तों के बाद कश्मीर के हालात फिर से सामान्य हो गए हैं. ये घटना अब समाचार की हिस्सा नहीं है और न ही इस मुद्दे पर कोई राजनीतिक बहस ही हो रही है. अब आप इस खबर की सच्चाई लोगों को कैसे बताएंगे? उन छह लोगों को किसने मारा, जिससे चार महिलाएं विधवा और 14 बच्चे अनाथ हो गए? और क्यों मारा? इस मामले में स्पष्टता बहुत ही कम है. पत्रकार की जिज्ञासा कश्मीर के अपने ‘अजनबीपन’ से आपको परिचित कराएगी, यह एक अंधेरी जगह है, जहां बहुत ही कम दिखाई देता है और जहां हर कोने पर खतरा मौजूद है. कश्मीर में ये खतरा हर समय मीडियाकर्मियों का पीछा करता है. पिछले 25 सालों के दौरान प्रेस पर तमाम हमले हुए जिसमें कुछ पत्रकारों को अपनी जान गंवानी पड़ी. अतीत की ओर निगाह दौड़ाएं तो पता चलता है कि कई सारे किस्से हमारे लिए मौजूद हैं, जिसमें उस समय के खतरों और डर की झलक हमें मिलती है. इतना ही नहीं ये किस्से इस बात की भी समझ बनाते हैं कि कश्मीरी पत्रकारों को एक खबर के लिए किस हद के खतरों से गुजरना पड़ता है. ऐसी ही एक घटना 1990 में हुई जिसने पत्रकारिता को हिलाकर रख दिया था. एक सफल स्थानीय अखबार ‘अलसफा’ के संपादक मोहम्मद शाबान वकील की हत्या कर दी गई थी. वकील के नेतृत्व में अलसफा कश्मीर में जारी उथल-पुथल की लगातार रिपोर्टिंग कर रहा था. वकील को उनके ऑफिस से खींचकर बाहर निकाल गया और हत्या कर दी गई. इसके बाद कई और हत्याएं हुईं. 1997 में ‘आंखों देखी’ के सैदीन शफी और 2003 में ‘न्यूज एंड फीचर्स अलायंस’ के परवाज सुल्तान की हत्या कर दी गई. इन हत्याओं के जिम्मेदार लोगों की कभी पहचान नहीं की जा सकी.

 इतना ही नहीं कश्मीर में व्याप्त राजनीतिक और वैचारिक विभाजन के बीच पत्रकार सुरक्षा एजेंसियों और आतंकवादियों के लिए आसान निशाना होते हैं. घाटी के खतरनाक माहौल में फंसे पत्रकार एक ऐसी जगह फंसे हुए हैं जहां उनके अपराधकर्ताओं के लिए उनकी हत्याएं करना काफी आसान है. 1995 में पत्रकार युसूफ जमील ने ऐसा ही अनुभव किया. एक बुर्कानशीं ने उनके ऑफिस में उनके लिए ‘उपहार’ के तौर पर एक पार्सल छोड़ा. जमील, जो उस वक्त बीबीसी के संवाददाता थे, के इस पार्सल को खोलने से पहले ही उनके युवा फोटोग्राफर मुश्ताक अली ने उसे खोल दिया. यह उपहार एक बम था. अली के उपहार खोलने के साथ ही यह फट गया और तुरंत ही उनकी मौत हो गई. इस खौफनाक घटना के डेढ़ दशक होने के बावजूद भी मुश्ताक इसके सदमे से उबर नहीं पाए. जमील के सहकर्मी और ‘द एशियन एज’ के फोटोग्राफर हबीब नक्श ने चार बार मौत को मात दी. वे उस वक्त मुश्ताक अली के साथ ही थे जब ऐसी घटनाएं हुईं. फिर 1999 में एक दिन नक्श कश्मीर के तब के रक्षा प्रवक्ता मेजर पी. पुरुषोत्तम के साथ सेना के एक दफ्तर में बैठे हुए थे. उसी वक्त वहां फिदायीन हमला हो गया. हमले में एक अधिकारी मारे गए. उनकी मौत से कुछ मिनट पहले ही मेजर ने नक्श और उनके साथी पत्रकारों को वॉशरूम में छिपा दिया था. एक साल बाद नक्श श्रीनगर के रेजिडेंसी रोड पर एक एंबेसड कार की तस्वीर ले रहे थे कि तभी उसमें धमाका हो गया, जिसमें नौ लोग और हिन्दुस्तान टाइम्स के एक फोटोग्राफर मारे गए.

जफर इकबाल ने जब पत्रकारिता शुरू की थी तब उन पर अज्ञात बंदूकधारियों ने हमला किया था. उस समय वह स्थानीय अंग्रेजी अखबार ‘कश्मीर इमेजेज’ के दफ्तर में बैठे थे. शुक्र की बात ये थी कि इस हमले में इकबाल बाल-बाल बच गए और अब राज्य में वह पत्रकारिता के जाने-माने नाम हैं, जो जम्मू से एनडीटीवी के लिए रिपोर्टिंग करते हैं. कूका परे, जो इखवान (आत्मसमर्पण कर चुके आतंकवादी जो सुरक्षा एजेंसियों के लिए आतंकवादियों के खिलाफ सशस्त्र अभियान चलाते थे) का नेतृत्व कर रहे थे, ने एक बार कुछ स्थानीय अखबारों के संपादक और कुछ संवाददाताओं का अपहरण कर सुरक्षा एजेंसियों के खिलाफ जवाबी कार्रवाईयों के पक्ष में कवरेज करने की मांग की थी. राज्य के पत्रकारों पर आतंकवादियों का भी खूब दबाव होता था. आतंकी कई बार अखबार में प्रकाशित होने वाली सामग्री तय करते थे कि क्या प्रकाशित किया जाए, उसकी रिपोर्ट कैसे की जाए. यहां तक कि खबर का पेज पर डिजाइन कैसा होना चाहिए, ये भी तय करने की कोशिश करते थे. आलोचना को बर्दाश्त न करने के क्रम में आतंकवादियों की तरह ही सुरक्षा प्रतिष्ठान भी थे, लेकिन आतंकवादियों या इखवान की तुलना में ये दबाव के अप्रकट साधन अपनाते थे. 90 के दशक में जब कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था तब वहां पत्रकारिता करना उतना ही मुश्किल काम था. पत्रकारों पर हर समय खतरा मंडराता रहता था. नए भूराजनीतिक बदलावों में घाटी फंस गई और इसकी वजह से श्रीनगर से लेकर अफगानिस्तान तक यह एक अस्थिर राज्य का सहज हिस्सा बन गया, बल्कि भारत और पाकिस्तान के बीच के युद्धक्षेत्र में भी तब्दील हो गया. शीर्ष कश्मीरी पत्रकार मुजामिल जलील राज्य में पत्रकारिता पर लिखते हैं, ‘कश्मीर में वास्तविकता के कई चरण और आयाम हैं. कश्मीर की अपनी एक हकीकत है, फिर भारत में उसे देखने का एक राष्ट्रीय नजरिया है और इस एक आयाम पाकिस्तान से भी जुड़ा हुआ है. ये सभी हकीकत एक-दूसरे से मुठभेड़ और विरोध भी करते हैं. कभी-कभार ये आपस में घुले-मिले से भी नजर आते हैं. दुखद ये है कि कश्मीर में किसी भी तरह की तटस्थ स्थिति नहीं हैं. पत्रकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती हिंसा से तबाह इस इलाके में इस तटस्थ स्थिति को फिर से वापस पाना है.’

 कश्मीर में पत्रकारिता की जो स्थितियां हैं कुछ वैसी ही स्थितियां हिंसा से ग्रस्त भारत के दूसरे इलाकों की भी हैं. उत्तर-पूर्व और वनों के गढ़ वाले राज्य माओवादी हिंसा से प्रभावित हैं. हालांकि इन स्थितियों में कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं. ब्रिटेन के ‘जेन डिफेंस वीकली’ से जुड़े रक्षा पत्रकार राहुल बेदी के अनुसार, ‘कश्मीर में विवाद के अंतरराष्ट्रीय आयाम भी हैं जो दूसरे इलाकों में नहीं हैं. कश्मीर में हिंसा शहरी और ग्रामीण इलाकों में सामान रूप से है जबकि उत्तर-पूर्व और माओवाद प्रभावित राज्यों से हिंसा मुख्य रूप से गांवों में ही है. उग्रवाद प्रभावित उत्तर-पूर्व और माओवाद प्रभावित राज्यों में जारी हिंसा की तुलना में कश्मीर में जारी हिंसा हमेशा से ही ज्यादा नुकसानदायक रही है.’ हालांकि उत्तर-पूर्व में काफी समय से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार समुद्र दास गुप्ता इन राज्यों में जारी हिंसा और पत्रकारिता की चुनौतियों में काफी समानता देखते हैं. उनके अनुसार, ‘मणिपुर में उग्रवादी गुट ये चाहते हैं कि उनके बयानों को उसी तरह से लिया जाए जैसा कि वे कहे गए हैं और कभी-कभी वे चाहते हैं कि उनके विरोधी गुटों के बयानों को न जारी किया जाए.’ वह बताते हैं, ‘इस तरह की स्थितियां कई बार उग्रवादी गुटों और पत्रकारों के बीच विवाद खड़े कर देती हैं, जो स्थितियां कई बार पत्रकारों पर जानलेवा हमले का भी रूप ले लेती हैं.’ कश्यप 1997 के उन दिनों को याद करते हैं जब वह ग्रामीण विकास कार्यकर्ता संजय घोष की ब्रह्मपुत्र नदी के मजुली द्वीप पर हुई हत्या की रिपोर्टिंग कर रहे थे. इस दौरान वे उग्रवादी संगठन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) की नजरों में चढ़ गए थे. उस समय एक फोन बूथ से जब वे इस खबर की जानकारी अपने दफ्तर को दे रहे थे तब उन्होंने पाया कि एक व्यक्ति काफी देर से उन पर नजर रख रहा था. बाद में उस व्यक्ति ने उनसे अपनी पहचान उल्फा के उग्रवादी के रूप में बताई. वह पीबी (उल्फा नेता परेश बरुआ) का आदमी था. कश्यप बताते हैं, ‘उस उग्रवादी ने बताया कि उसका काम उनकी (कश्यप) की सुरक्षा करना था.’

उत्तर-पूर्व में पत्रकारिता की और क्या-क्या चुनौतियां हैं इस पर ‘तहलका’ के पूर्व संवाददाता रतनदीप चौधरी कहते हैं, ‘यहां सैकड़ों जनजातियां और उप-जनजातियां हैं, जिनके बीच रिश्ता कभी भी बहुत सामान्य नहीं रहे हैं. इस क्षेत्र में तकरीबन 50 उग्रवादी संगठन हैं और विभिन्न जातियों और अलग-अलग नेतृत्व में करीब-करीब 10 अलगाववादी आंदोलन चलाए जा चुके हैं. इसलिए पत्रकारों को यहां बहुत ही सावधानी से पत्रकारिता करनी होती है. यह भी सुनिश्चित करना होता है कि आपकी खबर तथ्यात्मक रूप से सही और संतुलित हो. इसके अलावा आपकी पत्रकारिता को इस तरह से देखा जाता है कि आप किसी एक या दूसरे संगठन के इशारे या फिर सुरक्षा एजेंसियों के लिए काम कर रहे हैं.’

हालांकि उत्तर-पूर्व और उग्रवादी आंदोलनों की रिपोर्टिंग कर चुकीं ‘द टेलीग्राफ’ की संवाददाता सोनिया सरकार हिंसाग्रस्त इलाकों में पत्रकारिता करने में सिर्फ विवादों को तवज्जो देने को सही नहीं मानतीं. उनके अनुसार, ‘इन क्षेत्रों से सकारात्मक खबरें भी की जा सकती हैं और उन लोगों की कहानियां बताई जा सकती हैं जो इन क्षेत्रों में अपना अस्तित्व बचाते हुए जीवनयापन कर रहे हैं.’ अपनी एक रिपोर्ट में वह बताती हैं कि कैसे हिंसा से ग्रस्त मणिपुर के तमाम लोग पढ़ाई और रोजगार की तलाश में इस राज्य को छोड़कर चले गए थे और फिर वापस यहां लौटकर अपना कारोबार शुरू कर रहे हैं. सरकार ने एक फीचर स्टोरी मॉलीवुड (मणिपुरी सिनेमा उद्योग) पर किया, जिसमें महिला प्रधान फिल्में खुद युवा महिलाएं ही बना रही हैं. सोनिया तर्क देती हैं, ‘कई बार कुछ पत्रकार स्थितियों को बहुत ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की कोशिश करते हैं ताकि दूसरों को ये महसूस करा सकें कि उनकी रिपोर्ट से महत्वपूर्ण वे खुद हैं.’ हालांकि रक्षा पत्रकार राहुल बेदी कश्मीर के हालात को दूसरे राज्यों की तुलना में अलग मानते हैं. वह बताते हैं, ‘कश्मीर में जो विवाद है वह अपने गंभीर राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक आयामों के साथ देश में दूसरी किसी भी जगह के विवाद की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ा है.’ दूसरी ओर घाटी में लगातार कम होती हिंसा मीडिया के लिए खतरनाक माहौल में थोड़ी-सी ढील जरूर देती है, फिर भी राज्य ने शांति के हालात बहुत ही कमजोर स्थिति में हैं. बहरहाल निर्दोष लोगों की जान की कीमत पर घाटी में हिंसा का खेल खेला जा रहा है. यहां पत्रकारिता करना बहुत जोखिम भरा है और पत्रकार एक कमजोर कड़ी है जिसे कभी-भी तोड़ा जा सकता है.

गांव का पत्रकार, चुनौतियां हजार

IMG_6891-2खबरों की दुनिया में मुख्यधारा की पत्रकारिता की अपनी अलग चुनौतियां तो हैं ही, ग्रामीण इलाकों में भी चुनौतियां कुछ काम नहीं हैं. ग्रामीण पत्रकारिता बहुत आसान नहीं है. संसाधनों की कमी से जूझते ग्रामीण पत्रकार की चुनौतियों में से सबसे बड़ी चुनौती अनियमित तनख्वाह है. कई बार तो इन पत्रकारों को दो जून की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाता है. इसलिए गांवों में जो भी लोग पत्रकारिता से जुड़े हैं वे कोशिश करते हैं कि उनके पास आय के दूसरे स्रोत भी हों ताकि परिवार का खर्च चलाने में मुश्किलें न आएं.

रूरल जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आरजेएआई) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरुण सिंह चंदेल बताते हैं, ‘ग्रामीण पत्रकारों में से अधिकांश 100 से 200 रुपये रोजाना पर गुजर-बसर करते हैं. इसलिए वे खेती जैसे आजीविका के दूसरे साधनों पर भी निर्भर रहते हैं.’ मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त और भारत में ग्रामीण पत्रकारिता के जाने-पहचाने नाम पी. साईनाथ भी इस बात से सहमति रखते हैं. उनके अनुसार, ‘ग्रामीण पत्रकारों को बहुत ही कम वेतन पर गुजारा करना पड़ता है, जिसकी वजह से उन पर दबाव ज्यादा होता हैं. पत्रकार संगठनों की कमी और कॉन्ट्रैक्ट (ठेका) आधारित नौकरी के चलते पत्रकारों की स्वतंत्रता खत्म हो रही है.’

दैनिक अखबार ‘आज’ से जुड़े ग्रामीण पत्रकार विनोद मिश्रा कहते हैं, ‘सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जो ग्रामीण पत्रकारिता की चुनौतियों को बढ़ाता हैं. पत्रकारों पर अलग-अलग तरह से स्थानीय राजनीतिक दबाव होता है, इसलिए हमारे लिए सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है.’ उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर के ग्रामीण पत्रकार राकेश कुमार मौर्य ‘अमेठी किसान’ नाम से अपना अखबार निकालते हैं. राजनीतिक और खबर न छापने के दबाव के बारे में वे कहते हैं, ‘2012 में मैंने जिलाधिकारी और कोतवाल की अनियमितताओं के बारे में खुलासा किया था. उसके बाद वे दोनों एक रात मेरे घर पहुंचे और तोड़-फोड़ की.’ राकेश करीब एक दशक से पत्रकारिता कर रहे हैं. वे बताते हैं, ‘पैसों की कमी और डर के कारण कई बार पत्रकारों को बाहुबलियों के पक्ष में खबर लिखनी पड़ती है. ऐसे में 80 फीसदी तक दलाली होती हैं. पत्रकार ऐसा तुरंत पैसा बनाने के चक्कर में करते हैं.’

गांवों में पत्रकार जब किसी खबर की छानबीन करता है तब जाति और आर्थिक स्थिति जैसे तमाम तत्व काम करते हैं. पी. साईनाथ कहते हैं, ‘मामलों का अतिसंवेदनशील होना भी ग्रामीण पत्रकारों के लिए बड़ा मसला है. ग्रामीण क्षेत्रों में पत्रकारिता करते वक्त हम (शहरी मध्य वर्ग पेशेवर) में से अधिकांश को हमारी जाति, श्रेणी और सामाजिक पृष्टभूमि के आधार पर फायदा मिलता है. ग्रामीण पत्रकारों के लिए कई बार ये सब बड़ी चुनौतियां साबित होती हैं.’

मुख्यधारा के पत्रकारों की तुलना में अपने संस्थानों से सहयोग की कमी के कारण उनकी रिपोर्ट की गुणवत्ता में कमी आती है. पेड न्यूज की बात करें तो पी. साईनाथ ने ‘द हिंदू’ के लिए रिपोर्टिंग करते हुए पैसों के बदले में किसी व्यक्ति या संस्था के अनुकूल खबर प्रकाशित करने में मुख्यधारा के मीडिया की भूमिका का खुलासा किया था. वह कहते हैं, ‘पेड न्यूज से संबंधित कोई खबर अगर एक ग्रामीण पत्रकार करता तो उसे कई तरह के गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते. इनता ही नहीं खबर को प्रकाशित करवा पाना उसके लिए और बड़ी चुनौती साबित होता. उनकी तुलना में हम लोग ज्यादा महफूज हैं, इसलिए उनके लिए स्थितियां और कठिन हैं ऐसा भी कहा जाता है की शहरी पत्रकारों की तुलना में ग्रामीण पत्रकारों के लिए इस तरह की रिपोर्टिंग कहीं ज्यादा श्रमसाध्य और खतरों से निपटना कठिन होता है.’ पत्रकरिता के क्षेत्र में इस तरह के उदहारण भी मौजूद हैं जहां ग्राउंड रिपोर्ट करने पर ग्रामीण पत्रकारों को उनका मेहनताना तक नहीं मिल पाता. पी. साईनाथ कहते हैं, ‘अक्सर देखा जाता है कि ग्रामीण पत्रकार मौके पर मौजूद होता है. ऐसे में गांवों से जब कोई खबर राष्ट्रीय स्तर की बनती है तो यह ग्रामीण पत्रकार की वजह से ही संभव हो पता है. कई बार ऐसा होता है जब गांव की कोई खबर बड़ी होकर राष्ट्रीय महत्व की हो जाती है, तब मुख्यधारा का मीडिया उस ग्रामीण पत्रकार का नाम तक नहीं देता जो उस खबर को सबसे पहले उठाता है.’

देश के ग्रामीण इलाकों में बुनियादी और दूसरी सुख-सुविधाओं की कमी का भी सामना पत्रकारों को करना पड़ता है. बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के ग्रामीण पत्रकार अनवर हक बताते हैं, ‘कहीं आने-जाने के लिए काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं आने-जाने के साधन बहुत ही सीमित होते हैं. इतना ही नहीं संस्थानों से कहीं आने-जाने का खर्च मिल पाना भी मुश्किल होता है. इसके अलावा गांवों में इलेक्ट्रॉनिक सुविधाओं की भी कमी होती है. इंटरनेट की स्थिति बहुत ही खराब होती है. स्पीड नहीं मिल पाती और खबर भेजने में काफी दिक्कत होती है.’ हक जैसे दूसरे ग्रामीण पत्रकार आय के पहले स्रोत के रूप में खेती पर निर्भर हैं. हक कहते हैं, ‘ये तो हम शौक के लिए करते हैं. आजीविका के लिए हम पूरी तरह से पत्रकारिता पर निर्भर नहीं रह सकते.’

भारत में ग्रामीण पत्रकारिता के क्षेत्र में इन भयानक स्थितियों के बावजूद आशा की कुछ किरणें भी नजर आती हैं. उदाहरण के तौर पर ‘खबर लहरिया’ नाम का एक ग्रामीण अखबार है जो उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण इलाकों में अच्छी पकड़ रखता है. इसकी प्रसार संख्या भी 80 हजार से ऊपर है. यह अखबार दूसरों से इस मामलों में अलग है, क्योंकि इसे पूरी तरह से महिलाएं ही प्रकाशित करती हैं. अखबार की सारी पत्रकार भी महिलाएं हैं.

दुखद ये है कि ग्रामीण भारत में पत्रकारिता बहुत व्यवस्थित नहीं है. हालांकि 2014 में पी. साईनाथ ने एक प्रोजेक्ट ‘पीपुल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया’ (पीएआरआई) नाम से शुरू किया था. इसका उद्देश्य ग्रामीण भारत पर एक पत्रिका निकालने का था. पी. साईनाथ अपनी वेबसाइट पर लिखते हैं, ‘पीएआरआई ग्रामीण इलाकों की रिपोर्टिंग करेगा जो इस वक्त प्रचलित और समकालीन है. इसके अलावा एक खबरों का डेटाबेस (बैंक) तैयार करेगा, जिसमें प्रकाशित हो चुकी रिपोर्ट, वीडियो और ऑडियो शामिल होंगे.’ इस तरह के प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों की कठिन परिस्थितियों में आशा की किरण जैसे हैं. राष्ट्रीय स्तर पर शोहरत पाने के लिए ग्रामीण पत्रकारों को अभी लंबी लड़ाई लड़नी है. तब तक ग्रामीण पत्रकारों को न सिर्फ अपने ऊपर के दबाव से निपटना होगा, बल्कि सामाजिक लांछन, राजनीति और गरीबी से भी लड़ना होगा.

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Web-F2ज्यादा वक्त नहीं बीता जब ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने सोशल मीडिया पर फिल्म अभिनेत्री दीपिका पादुकोण को लेकर कामुक टिप्पणी की और वीडियो अपलोड किया. इसे ‘ओह माय गॉड! दीपिका’ज़ क्लीवेज शो’ जैसे घटिया शीर्षक के साथ लगाया गया था, जिसके बाद इस हरकत की आलोचना का दौर शुरू हुआ और दीपिका पादुकोण ने अखबार को करारा जवाब दिया. सोशल मीडिया पर यह वीडियो लगातार शेयर होता रहा. बहसें होती रहीं. इस पूरी बहस का परिणाम यह हुआ कि ‘द गार्जियन’ और बीबीसी जैसे विदेशी मीडिया संस्थानों ने आगे बढ़कर इस मुहिम में दीपिका पादुकोण का समर्थन किया.

विडंबना ये रही कि इस पूरी आलोचनात्मक कार्रवाई का परिणाम उलटा पड़ गया. एक तरह से टाइम्स समूह की वेबसाइट के लिए यह असफलता ख्याति में तब्दील हो गई. यानी दीपिका पादुकोण के वीडियो पर हुए अनगिनत हिट्स की बदौलत यह मीडिया समूह लगातार चर्चा में बना रहा. आजकल सभी मीडिया समूह धीरे-धीरे उस ओर बढ़ रहे हैं जहां ‘क्लिक’ और ‘हिट्स’ की बदौलत पाठकों तक अपनी पहुंच और खबरों की गुणवत्ता को मापा जाता है.

आजकल भारतीय ऑनलाइन मीडिया में भी किसी विषय पर राय रखने के लिए क्रमवार तरीके से पॉइंट्स बना कर लिखने का चलन हो गया है. अंग्रेजी में इसे ‘लिस्टिकल’ कहते हैं. हाल ही में एक दोस्त ने किसी फिल्म पर अपनी राय रखने के लिए लिस्टिकल का प्रयोग किया. जब किसी ने प्रश्न किया तो जवाब में उसने कहा, ‘आजकल मीडिया में लिस्टिकल ही काम की चीज है’. जाहिर भी है क्योंकि आज के समय में जिस तेजी की दरकार है, उसके साथ खबरों के विस्तृत स्वरूप पीछे छूट जाते हैं. वे दिन अब बीतने लगे हैं जब लोगों की बालकनियों में हॉकर अखबार फेंक जाया करते थे और उन अखबारों के संपादकीय पन्नों को छानने में लंबा वक्त गुजरता था. अब मोबाइल और लैपटॉप पर खबरें देखकर काम पर निकल जाने का समय आ चुका है. साथ ही साथ तमाम मीडियाघरों के एप्स और वेबसाइटों ने खबर खंगालने के पुराने दिनों को चलता कर दिया है. अब यह दौर ज्यादा दिलचस्प और अतिशयोक्तिपूर्ण सनसनीखेज पत्रकारिता का है.

चलताऊ अर्थों में सनसनीखेज पत्रकारिता के नाम से जाना जाने वाला ‘क्लिकबेट जर्नलिज्म’ दरअसल पत्रकारिता का वह नुस्खा है जिसका मकसद गहरी और सही खबरों की आड़ में ऑनलाइन राजस्व पैदा करना होता है. यहां बेट का अर्थ चारे से है. मौजूदा समय में पाठक रोज-ब-रोज सोशल मीडिया पर सक्रिय होते जा रहे हैं, ऐसे में प्रकाशकों को करना सिर्फ इतना होता है कि वे अपने कंटेंट को पाठकों की न्यूजफीड में दाखिल कर दें और यह सुनिश्चित करें कि पाठक वह पढ़ लें. लेकिन इसके बाद प्रश्न उठता है कि ऐसी क्या चीज है कि ऑनलाइन खबरें पढ़ने वाला किसी खबर पर क्लिक करे? जवाब आता है ‘हेडलाइन’. पाठक वह पढ़ने में ज्यादा यकीन रखता है, जो समसामयिक हो, थोड़ा जाना-पहचाना विषय हो और सनसनीखेज हो. इसलिए खबरें बनाते समय ऐसे की-वर्ड्स यानी खास शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है ताकि पाठक का ध्यान खुद-ब-खुद उन खबरों की ओर चला जाए और वह उन पर क्लिक करे. ऑनलाइन कंटेंट लेखक नयनतारा मित्र के मुताबिक, ‘किसी खबर की हेडलाइन में यदि सनी लियोन का नाम है तो जाहिर है कि वह खबर भारी संख्या में पाठकों को रिझाएगी.’

ठीक इसी तरह राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी या योग के हेडलाइन से जुड़ी खबर देश के किसी हिस्से में खाद्यान्न की कमी से जुड़ी खबर से ज्यादा पढ़ी जाएगी. दीपिका पादुकोण के जवाब के बाद अपनी सफाई में टाइम्स समूह ने दावा किया, ‘ऑनलाइन दुनिया अखबारों की दुनिया से काफी अलग है. यह दुनिया ज्यादा अव्यवस्थित, हो-हल्ले और सनसनीखेज हेडलाइनों से भरी हुई है.’

कोई भी एक डिजिटल मीडिया संस्थान अपने पाठक समूह के रूप में 15 से 25 साल के उत्साही युवाओं को चुनती है, जो सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय रहते हैं. ऐसा माना जाता है कि इस पाठक समूह की ध्यानावधि कम होती है, जिसके दौरान वे ज्यादा मसालेदार सामग्रियां तलाशते हैं. इस संबंध में ‘स्कूपव्हूप’ नाम की वेबसाइट का जिक्र आता है, जो इस समय चर्चा में है. भारत के ‘बजफीड’ के नाम से मशहूर ‘स्कूपव्हूप’ ने अपने उद्घाटन के बाद से ही लाखों पाठकों को आकर्षित करना शुरू कर दिया था. इस समय ‘स्कूपव्हूप’ के ट्विटर पर 30 हजार के आसपास फाॅलोवर हैं तो वहीं फेसबुक पेज पर 10 लाख से ज्यादा लाइक्स. इसके सह-संस्थापक और चीफ ऑपरेटिंग अफसर ऋषि प्रतिम मुखर्जी अपने यहां की खबरों की खासियत बताते हुए कहते हैं, ‘उनकी खबरें दिल से ‘सोशल’ होती हैं. किसी स्टोरी में पाठक की रुचि और पाठक द्वारा सोशल मीडिया पर उसकी शेयरिंग को देखकर उन्हें अपनी वेबसाइट के लिए सामग्री का चयन करने में मदद मिलती है.’

‘क्योरा’ जैसे माध्यमों पर बहुत सारे पाठकों ने ऐसी वेबसाइट की खबरों और भाषा को औसत दर्जे का करार दिया है. हालांकि इस पर मुखर्जी तर्क देते हैं, ‘एक बड़े, तेज और अस्थिर पाठक समूह तक अपनी बात पहुंचाने के लिए खबरें बनाने और उन्हें पेश करने के तरीके में भारी बदलाव आया है. यही कारण है कि आज की तारीख में ऐसी खबरों, स्लाइड-शो और वीडियो की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है, जिनके ‘रीड एंड शेयर’ वाला हिस्सा आसमान छू रहा है.’

क्लिकबेट पत्रकारिता का यह नया स्वरूप आम बोलचाल की भाषा के इस्तेमाल के साथ-साथ खबरों की प्रकृति पर भी निर्भर है. सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा शेयर होने वाली खबरें वे होती हैं जिनके शीर्षक भ्रामक और रोचक लगते हैं, जिससे पाठक में उत्सुकता जगे. मिसाल के लिए ‘क्या आपके इस्तेमाल किए गए शब्दों से आपकी उम्र का अंदाजा लगाया जा सकता है?’ या ‘आपको भरोसा नहीं होगा कि इस बच्ची ने अपने पालतू जानवर के साथ क्या किया’ जैसे शीर्षक और ज्यादा पाठकों का ध्यानाकर्षण करने के लिए इस्तेमाल में लाए जाते हैं.

इसके साथ अब ऐसी खबरों का भी चलन है जो पाठकों को उनके बीते वक्त में ले जाती हैं. ‘15 कारण कि क्यों एक तमिल फ्रेंड का होना जरूरी है’ या ‘20 चीजें जिन्हें सिर्फ 90 दशक के बच्चे ही जान सकते हैं’, ऐसे शीर्षक व खबरें और ज्यादा पाठकों को रिझाने का नायाब नुस्खा बनते जा रहे हैं क्योंकि तमिलनाडु से जुड़ा हुआ कोई व्यक्ति या किसी तमिल व्यक्ति से जुड़ा हुआ व्यक्ति या 90 के दशक का कोई भी व्यक्ति इन खबरों को जरूर पढ़ेगा और शेयर करेगा.

डिजिटल मीडिया के इन प्रकाशकों के लिए यह गर्व करने की बात क्यों न हो, लेकिन मुख्यधारा के अखबारों, मीडिया महकमों और मीडिया आलोचकों द्वारा प्रस्तुतिकरण का यह नया तरीका आलोचनाओं के घेरे में है. ऑनलाइन पत्रिका ‘बायलाइन’ को दिए गए अपने साक्षात्कार में प्रसिद्ध भाषा विज्ञानी और मीडिया स्कॉलर नॉम चोम्स्की ने ‘बजफीड’ मार्का क्लिकबेट जर्नलिज्म को प्रचार का नया कलेवर कहा था. चोम्स्की ने कहा था कि ऐसे प्रयासों का लक्ष्य समाज के अभिजात्य और प्रभावशाली वर्गों के पक्ष में सहमति का निर्माण करना होता है.

आज वायरल हो रही सामग्री बाद में किसी न किसी प्रकार के विज्ञापन के रूप में खुलकर सामने आती है यहां तक कि आजकल डिजिटल मीडिया द्वारा प्रकाशित की जा रही सामग्री का बड़ा हिस्सा प्रायोजित होता है जिसे संपादकीय कलेवर में लपेटकर परोसा जाता है. ‘स्कूपव्हूप’ के मुखर्जी सफाई देते हैं, ‘स्कूपव्हूप पर हर महीने प्रकाशित होने वाली सामग्री में सिर्फ 2 प्रतिशत हिस्सा प्रायोजित होता है. सारे ऑनलाइन मीडिया में ऐसा नहीं है.’ चोम्स्की के बयान से सहमत होते हुए मुखर्जी कहते हैं, ‘खुद इंटरनेट अपने में एक लोकतांत्रिक जगह है, जहां हाशिए के समुदाय को भी सुना, समझा और सराहा जाता है. यही कारण है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया चुनाव के सिद्धांत पर आधारित हैं. इंटरनेट यूजर उसी सामग्री को चुनता है, जिसे वह चुनना चाहता है. यहां किसी किस्म का दबाव प्रयोग में नहीं लाया जाता.’

जाहिर है कि आखिर में यह पाठक को ही तय करना होता है कि वह क्या पढ़े और क्या नहीं. इसके साथ पाठक के पास यह अधिकार भी होना चाहिए कि वह वही सामग्री पढ़े, जिसकी उसे जरूरत है. लेकिन भ्रमित करने वाले शीर्षकों के अधीन विज्ञापित सामग्रियां प्रकाशित कर रही वेबसाइट पाठकों की इस जरूरत का हनन करती हैं.

यहां इस मामले का सबसे कम ध्यान इस पहलू पर दिया गया है कि अब क्लिकबेट जर्नलिज्म धीरे-धीरे अपनी सीमा का विस्तार करके मुख्यधारा की मीडिया तक भी पहुंच गया है. टाइम्स समूह की वेबसाइट ने अब ‘टाइम्स प्वाइंट’ नाम से एक लॉयल्टी कार्यक्रम की शुरुआत की है. इस कार्यक्रम में फ्रीक्वेंट फ्लायर (टाइम्स वेबसाइट पर रोजाना खोलने पर दिया जाने वाला प्वाइंट) और शेयर खान बैज (वेबसाइट की सामग्री को सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा शेयर करने पर मिलने वाले प्वाइंट) जैसे और भी ऐसे कई किस्म के आभासी इनाम हैं. अंग्रेजी अखबार डीएनए ने भी पाठकों को रिझाने के लिए अमिताभ बच्चन के सिनेमा पर एक गंभीर साक्षात्कार का जो शीर्षक दिया था, वह था, ‘मुझे ‘पीकू’ की सक्सेस पार्टी में नहीं बुलाया गया.’

ये दुखद है लेकिन ये तरीके कारगर साबित हो रहे हैं. इस तरह की पत्रकारिता में आई तेजी ने कहीं न कहीं मुख्यधारा की पत्रकारिता की जगह ले ली है और इससे पाठकों की रुचि और उनकी पढ़ने की आदतों को प्रभावित किया है. साथ ही ‘खबर’ की परिभाषा में भी बदलाव आया है. पाठकवर्ग और मीडिया एक-दूसरे के साथ ऐसे प्रतीकात्मक संबंध में हैं, जिसमें दोनों एक दूसरे को लाभांवित करने में व्यस्त हैं. जहां एक तरफ मीडिया एजेंसी ऐसी ‘खबरें’ प्रकाशित कर रही हैं जो पाठकों के क्लिक को रिझा रही हों, वहीं पाठक उन खबरों को क्लिक-शेयर के माध्यम से एजेंसी की रीडरशिप और प्रचार-प्रसार में मदद कर रहे हैं.

ऐसे में प्रश्न उठना लाजिम है कि क्या अब भी पाठक पारंपरिक मीडिया के प्रति प्रतिबद्ध रहेंगे या यह डिजिटल क्षेत्र के नए खिलाड़ियों द्वारा अतिक्रमित कर दिए जाने की कगार पर आ गया है और पत्रकारिता की इस रेस में हार रहा है? क्या इस डिजिटल क्लिक और शेयर की बेशर्म भेड़चाल से उस पत्रकारिता का अंत हो जाएगा, जिसे हम सब जानते हैं?

तथ्यों पर भारी तेजी

बहुत से लोगों को ये पता भी नहीं होगा कि प्रसारण पत्रकारिता के इतिहास के सबसे बड़े क्षण ने एक बड़े विवाद को जन्म दिया था. 1967 में डेविड फ्रॉस्ट अपने शो ‘फ्रॉस्ट प्रोग्राम’ में एमिल सवुंद्रा से सवाल-जवाब कर रहे थे. सवुंद्रा श्रीलंकाई काले बाजार के एक व्यापारी थे जिन पर उस वक्त एक बड़े मोटर इंश्योरेंस घोटाले का आरोप था. सवुंद्रा इस घोटाले को लेकर खबरों में थे और इस प्रोग्राम में ये सोचकर आए थे कि उन्हें अपने ऊपर लगे आरोपों के खिलाफ अपना पक्ष जनता के सामने रखने का मौका मिलेगा. पर हुआ इसके उलट. फ्रॉस्ट के आक्रामक सवालों के सामने सवुंद्रा टिक नहीं पाए. इंटरव्यू शुरू हुए दस ही मिनट हुए थे कि फ्रॉस्ट के सवालों में उलझे सवुंद्रा ये कह गए कि उनकी किसी के भी प्रति कोई कानूनी या नैतिक जिम्मेदारी नहीं है. जहां सवुंद्रा को इस बात के लिए दर्शकों का गुस्सा झेलना पड़ा वहीं फ्रॉस्ट की इस पर की गई गुस्से भरी प्रतिक्रियाओं को दर्शकों की तालियां मिलीं. जनता को न केवल ये लगा कि फ्रॉस्ट इस मामले के पारखी हैं बल्कि सवुंद्रा के जवाबों पर फ्रॉस्ट की गुस्से भरी प्रतिक्रियाओं से उन्हें लगा कि फ्रॉस्ट उनमें से ही एक हैं. इस कार्यक्रम के कुछ महीनों बाद सवुंद्रा को अपराधी घोषित कर जेल भेज दिया गया और फ्रॉस्ट अपने टीवी पत्रकारिता के कॅरिअर में सफलता की ऊंचाइयों की ओर बढ़ने लगे.

जब टीवी पत्रकारिता में हुई इस ऐतिहासिक घटना ने लोगों को प्रभावित किया, तब मीडिया और बाहरी दुनिया में टेलीविजन पर होने वाले बर्ताव और अदालती मुकदमे जैसी पूछताछ से उपजी गलतफहमियों से शो के निर्माताओं ने शो के प्रति अतिरिक्त सावधानी बरतनी शुरू कर दी. और इसी तरह पहली बार ‘ट्रायल बाय टेलीविजन’ शब्द चलन में आया.

उस समय फ्रॉस्ट को निजी सवाल पूछने के कारण, एक कठिन साक्षात्कारकर्ता का जो तमगा मिला था, आज दशकों बाद टीवी पर रोज होने वाली बहसों को देखते हुए हम उसकी जटिलताएं समझ सकते हैं. मीडिया के ऐसे व्यवहार पर चर्चा एक बार फिर शुरू हो गई है जब हाल ही में पत्रकार अविरूक सेन की किताब ‘आरुषि’ सामने आई. ये किताब देश की सबसे बड़ी ‘मर्डर मिस्ट्री’ कहे गए आरुषि तलवार हत्याकांड पर बात करती है.

2008 में 14 साल की आरुषि की संदिग्ध मौत ने देशभर का ध्यान अपनी तरफ खींचा था. इसके पीछे कौन था, ये आज तक एक पहेली बना हुआ है. बहुत-सी बातें किसी जासूसी उपन्यास के रहस्य की तरह आज भी अबूझ हैं, जैसे कि क्यों बस एक दीवार के फासले पर सोए आरुषि के माता-पिता को उसकी हत्या का पता नहीं चला, घर के नौकर हेमराज की हत्या कैसे और किसने की और कैसे उसकी लाश छत पर पहुंच गई?

ये हत्याकांड सुर्खियों में ही था जब तलवार दंपति पर ही उंगलियां उठने लगीं. फिर जल्द ही नई बहसों का जन्म हुआ और विशेषज्ञों, जिनमें नामी लेखिका शोभा डे भी शामिल थीं, ने तलवार दंपति के खिलाफ स्पष्ट निर्णय दे दिया. कुछ ने आरुषि को उच्छृंखल कहा तो कुछ का ये भी कहना था कि ये ‘ऑनर किलिंग’ का मामला है. ये भी कहा गया कि तलवार दंपति दिल्ली के एक विशिष्ट ‘वाइफ स्वैपिंग क्लब’ के सदस्य थे. एक चैनल ने तो सभी हदें पार कर दीं, बाल अधिकारों का उल्लंघन करते हुए उन्होंने एक एमएमएस क्लिपिंग दिखाई जिसमें एक किशोर लड़की कैमरे के सामने अपने कपड़े उतार रही थी. चैनल का दावा था कि ये बच्ची आरुषि है.

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जहां एक तरफ ये ‘कामुक सुर्खियां’ खबर बना रही थीं, जांच एजेंसियों की बताई कहानियां भी कुछ ऐसी ही थीं. ऐसा लग रहा था कि अपने ‘अनाम सूत्रों’ से प्राप्त ‘एक्सक्लूसिव’ खबरों  को चलाने वाले चैनल इन जांच एजेंसियों के प्रवक्ता के रूप में ही ये बात कह रहे थे. इस तरह मीडिया ने घोषित किया कि आरुषि के माता-पिता ‘दोषी’ हैं और नवंबर 2013 में अदालत ने भी उन्हें दोषी करार दिया.

हालांकि तलवार दंपत्ति के दोषी या निर्दोष होने पर कोई टिप्पणी करना अनजाने में ही पूर्वाग्रहों के हिसाब से चलना होगा, पर मीडिया द्वारा जनता में फैलाई गई राय से प्रभावित होकर अदालत के फैसला सुनाने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता. पत्रकार और ‘आरुषि’ किताब के लेखक अविरूक सेन ‘तहलका’ को बताते हैं, ‘जब तक ‘मुंबई मिरर’ ने 2012 में मुझे इस केस के ट्रायल के बारे में लिखने की जिम्मेदारी नहीं दी थी, मेरी इस मामले के बारे में कोई राय नहीं थी, सिवाय इसके कि उसके माता-पिता ने ही ये अपराध किया होगा क्योंकि पूरा मीडिया यही कह रहा था. इस बात ने जनता और मामले के प्रमुख लोगों को भी प्रभावित किया ही होगा और चाहें ये जांच एजेंसियां हों या अदालत, वे भी तो इसी जनता में ही आते हैं. ऐसे में हम इस केस में मीडिया के प्रभाव को नजरअंदाज कर ही नहीं सकते.’

मार्च 2015 में, दिसंबर 2012 में हुए निर्भया कांड पर आधारित लेस्ली उडविन की डॉक्यूमेंट्री ‘इंडिया’ज डॉटर’ ने देशभर में एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया. इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने डॉक्यूमेंट्री के प्रसारण पर बैन लगाने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन कहने वाली एक याचिका की सुनवाई में कहा था, ‘मीडिया ट्रायल जजों को प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं. इससे अप्रत्यक्ष रूप से एक दबाव बनता है जिससे आरोपी/अपराधी की सजा का निर्णय प्रभावित होता है.’

याचिकाकर्ता ने ये भी कहा कि किसी डॉक्यूमेंट्री पर बैन लगाने से मीडिया द्वारा विचाराधीन मामलों में झूठी रिपोर्ट आने की संभावना बढ़ जाएगी और कोर्ट ने ये माना भी कि कैसे पहले ये अलिखित कोड था कि विचाराधीन मामलों के बारे में रिपोर्ट नहीं की जाएगी, मगर अब ऐसा कुछ नहीं माना जाता.

इसी तरह 17वें विधि आयोग में अपनी 200वीं रिपोर्ट में मीडिया ट्रायल और खबरों की अधिकता के भविष्य को देखते हुए केंद्र से ये सिफारिश की थी कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोपी के गिरफ्तार होने से लेकर फैसला आ जाने तक किसी भी तरह की रिपोर्टिंग करने से मीडिया पर रोक होनी चाहिए, ताकि आरोपी के अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े. रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया कि किसी भी मीडिया माध्यम को किसी आपराधिक मामले के बारे में कोई भी प्रकाशन या प्रसारण को निर्देशित करने का अधिकार हाईकोर्ट को होना चाहिए. साथ ही मीडिया द्वारा ऐसे किसी मामले के प्रयोग को नियंत्रित करने का अधिकार भी हाईकोर्ट को होना चाहिए. आयोग ने कहा, ‘आजकल टेलीविजन और केबल के बढ़ते व्यापक प्रसार में समाचार प्रकाशन का स्वरूप बदल गया है और ऐसे कई प्रकाशन संदिग्धों, आरोपियों, गवाहों यहां तक कि जजों यानी पूरे न्याय तंत्र को भी प्रतिकूल तरीके से प्रभावित कर सकते हैं.’

जहां एक ओर तलवार दंपति के मामले को भारतीय प्रेस काउंसिल ने मीडिया द्वारा लोगों पर नकारात्मक प्रभाव बनाने के रूप में देखा, वहीं एसएआर गिलानी के विवादित राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामले और खुर्शीद अनवर पर यौन उत्पीड़न के आरोप, दो ऐसी ‘ब्रेकिंग न्यूज’ रहे जिन्होंने मीडिया के प्रति विश्वास को ‘ब्रेक’ यानी तोड़कर रख दिया. 13 दिसंबर 2001 को देश की संसद पर पांच आतंकियों द्वारा किए गए हमले के दूसरे ही दिन दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने दावा किया कि उन्होंने इस हमले में शामिल कई संदिग्धों को ढूंढ लिया है. इस मामले में उन्होंने 12 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें चार कश्मीरी शामिल थे- दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एसएआर गिलानी, शौकत हुसैन गुरु और मोहम्मद अफजल गुरु व अफज़ल की पत्नी अफ्जान.

उनकी गिरफ्तारी से पहले ही मीडिया में उनके अपराध के विवरण के साथ उनके कुबूलनामे की खबरें आ चुकी थीं. ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने लिखा था कि ‘आतंकवादियों’ ने पाकिस्तान के नंबर पर फोन कॉल करने से पहले गिलानी को कॉल किया था, वहीं ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की हेडलाइन में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर को आतंकी योजनाओं का सरगना कहा गया था. जहां ऐसी खबरों ने पहले ही संदिग्धों के खिलाफ एक राय कायम कर दी थी, जी न्यूज के डॉक्यू ड्रामा ‘13 दिसंबर’, जिसमें संसद हमले के पूरे घटनाक्रम का नाट्य रूपांतरण किया गया था, को सरकार की सहमति और समर्थन के बाद प्रसारित किया गया जिसने इन संदिग्धों को आतंकवादी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

जब हाईकोर्ट को गिलानी पर लगे इन आरोपों को साबित करने वाला कोई तथ्य नहीं मिला तो उन्होंने गिलानी और अफ्जान को बरी कर दिया, मगर तब तक बरी हो चुके इन लोगों के लिए अपनी सामान्य जिंदगी में लौटना नामुमकिन हो चुका था. क्या कोर्ट के इन्हें बेगुनाह मानने के बाद लोगों की इनके बारे में राय बदल सकती थी? क्या मीडिया संस्थान अपनी कहानियां वापस ले सकते थे? क्या वो तथ्यों को गलत तरीके से पेश करने के लिए गिलानी से माफी मांग सकते थे? अफजल इस मामले में बदकिस्मत रहे कि अपनी बेगुनाही साबित कर बरी हो पाने के लिए उन्हें पर्याप्त सुबूत नहीं मिले, इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा भी कि उन्हें ‘सामूहिक अंतःकरण की संतुष्टि’ के लिए मरना ही होगा. अफजल के खिलाफ मीडिया द्वारा हुईं चूकों ने जिस सामूहिक विवेक को जन्म दिया वो दिखाता है कि कैसे प्रेस किसी व्यक्ति के जीने-मरने को प्रभावित कर सकता है.

2013 में इसी तरह का एक और निंदा अभियान टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर तब चला जब ‘इंस्टिट्यूट फॉर सोशल डेमोक्रेसी’ नाम के एक एनजीओ के कार्यकारी निदेशक खुर्शीद अनवर पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगे. जबकि इन आरोपों की सच्चाई पर ही संदेह था. सोशल मीडिया और इंडिया टीवी पर लगातार इस मुद्दे पर हो रही बहस ने खुर्शीद अनवर को अपनी जिंदगी खत्म कर देने जैसा गंभीर कदम उठाने पर मजबूर कर दिया. मीडिया ने आरोपों के आधार पर ही उन्हें बलात्कारी घोषित कर दिया. इंडिया टीवी ने तो अभियान ही शुरू कर दिया था, जिसमें बार-बार ‘औरतों पर अन्याय को बढ़ावा देने वाले आदमी को सजा मिलनी चाहिए’ जैसी बातें पूरी उत्तेजना के साथ कही जा रही थीं, इसके बाद ही खुर्शीद ने अपने घर की छत से कूदकर जान दे दी.

अनवर के शुभचिंतकों, शिक्षाविदों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों आदि ने मीडिया द्वारा एफआईआर से पहले ही अनवर को बलात्कारी घोषित कर देने की घोर निंदा की. एक फोरम ‘जस्टिस फॉर खुर्शीद अनवर’ की सदस्य अंकिता चंद्रनाथ बताती हैं, ‘रजत शर्मा द्वारा इंडिया टीवी पर अनवर द्वारा किए गए कथित बलात्कार की रिपोर्ट निर्भया कांड के ठीक एक साल बाद पेश की गई थी. मीडिया को दिसंबर तक इंतजार करने की क्या जरूरत थी जब कथित बलात्कार का मामला सितंबर की शुरुआत का था? इंडिया टीवी की रिपोर्ट पूरी तरह से एकपक्षीय थी. यहां तक कि उस लड़की का अनवर के खिलाफ बयान हद दर्जे तक संपादित था, साथ ही चैनल आक्रामक रूप से उसे ‘दूसरी निर्भया’ के नाम से प्रसारित कर रहा था.’ 2008 में हुए मुंबई हमले की बात  करें तो उस समय ऐसी खबरें भी आई थीं कि सेना की कार्रवाई का सीधा प्रसारण आतंक फैलाने वालों के आका देखकर आतंकियों को निर्देश दे रहे थे. इसी तरह पिछले दिनों गुरदासपुर में हुई आतंकी वारदात के समय खुफिया विभागों को समाचार चैनलों से सीधा प्रसारण न करने की अपील करनी पड़ी थी. ऐसे में मीडिया संस्थानों को इस बात पर भी सोचने और ध्यान देने की जरूरत है कि उनकी सीमाएं किस हद तक हैं और कहीं इससे किसी व्यक्ति विशेष या फिर राष्ट्र का हित तो नहीं प्रभावित हो रहा है.

विश्वस्त सूत्रों के हवाले से

दिल्ली के एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘अकेले रिपोर्टर को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता. सूत्रों पर आधारित पत्रकारिता इसके खतरों के बावजूद खबरें इकठ्ठा करने का एक महत्वपूर्ण साधन है. और जहां संवाददाताओं की अपराध की वास्तविक स्थिति तक सीधी पहुंच नहीं है, तथ्यों की कोई जानकारी नहीं है, वहां उन्हें अधिकारियों द्वारा उनके हितों के अनुरूप चुने गए तथ्यों पर ही निर्भर रहना पड़ता है. तथ्यों की इस चयनात्मक प्रस्तुति से कई बार बड़े नाटकीय निष्कर्ष निकलते हैं. एक टीवी न्यूजरूम के अंदर जो कहानियां हेडलाइन बनती हैं वो सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती हैं. अगर एक चैनल किसी घटना पर संतुलित रिपोर्ट दिखाता है और दूसरा चैनल उसी खबर को सनसनीखेज तरीके से दिखाता है तो दर्शकों का ध्यान उस सनसनीखेज रिपोर्ट पर ही जाएगा, जिससे टीआरपी भी बढ़ती है और साथ ही विज्ञापनों से आने वाला धन भी. कॉरपोरेट घरानों द्वारा चलाए जा रहे इस क्षेत्र में कई बार रिपोर्टरों को अनाम स्रोतों के नाम पर ऐसी कहानियां गढ़ने को कहा जाता है, जिससे चैनल की टीआरपी बढ़ाई जा सके. यहां पर इन अनाम सूत्रों पर भी सवाल उठता है, जिन्हें अमूमन ‘उच्च पदस्थ’ बताया जाता है. सरकारी महकमों के सूत्र सामान्यतया अपना नाम बताने से बचते हैं, ऐसे में कहानियां गढ़ने में और आसानी हो जाती है.

वर्तमान में मीडिया के किसी हत्या, बलात्कार की रिपोर्टिंग में लांघी गई नैतिकता की सीमाओं के एवज में चैनल सिर्फ चुप्पी साध लेता है.

 

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जहां निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

भारतीय मीडिया संस्थान केवल सनसनीखेज खबरें देते हैं ये कहना भी सही नहीं होगा. चार ऐसे मामले जहां न्याय की लड़ाई में पत्रकारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है

 

  • जेसिकालाल हत्याकांड के मुख्य आरोपी को बरी करने के विरोध में एक अनाम एसएमएस विभिन्न मीडिया संस्थानों में पहुंचा और मीडिया के ढेरों लोग इंडिया गेट पर कैंडल लाइट मार्च के रूप अपना विरोध दर्ज कराने पहुंच गए. 1999 में दिल्ली के एक रेस्तरां-बार में हरियाणा के एक सांसद के बेटे मनु शर्मा ने 200 लोगों के सामने जेसिकालाल की गोली मारकर हत्या कर दी थी क्योंकि उन्होंने देर रात शराब परोसने से मना कर दिया था. इस हाई प्रोफाइल मामले में मीडिया द्वारा बनाए गए दबाव के फलस्वरूप अदालत ने उसके सांसद पिता के प्रभाव को नजरअंदाज करके सजा सुनाई थी.
  • नीतीश कटारा की उस समय हत्या कर दी गई जब उनके भारती यादव से प्रेम संबंध के बारे में भारती के घरवालों को पता चला. 2002 में हुआ यह मामला ऑनर किलिंग का था. उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता डीपी यादव के बेटों विशाल और विकास यादव ने नीतीश की हत्या की क्योंकि वे अलग जाति के थे. विकास यादव इस मामले में अपने पिता के प्रभाव के कारण साफ बचकर निकल गए होते अगर एनडीटीवी चैनल उसके इकबाल-ए-जुर्म की ऑडियो रिकॉर्डिंग सामने नहीं लाया होता.
  • एस. मंजूनाथ इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन में ग्रेड ‘ए’ के अधिकारी थे . 2005 में, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में मंजूनाथ ने दो पेट्रोल पंपों को मिलावटी पेट्रोल बेचने के संदेह के चलते सील कर दिया था. मंजूनाथ की हत्या इसलिए हुई क्योंकि वे महीने भर पहले ही खुले एक पेट्रोल पंप का औचक निरीक्षण करने से पहुंच गए थे. इस केस में पेट्रोल पंप के मालिक पवन कुमार मित्तल सहित छह लोगों को दोषी घोषित किया गया. मंजूनाथ को मिले इसे न्याय का श्रेय उन कार्यकर्ताओं और मंजूनाथ षणमुगम ट्रस्ट को जाता है जिन्होंने इतने लंबे समय तक इस केस को जिंदा रखा.
  • संजीव नंदा को 1999 के हिट एंड रन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 5 साल की सजा सुनाई पर 2 साल बाद ही उन्हें छोड़ दिया गया. नशे में धुत संजीव ने तीन पुलिसकर्मियों सहित छह लोगों को बीएमडब्ल्यू कार से कुचल दिया था, जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई थी. यदि मीडिया का दबाव न होता तो अपने दादा एसएम नंदा (पूर्व नेवी प्रमुख) के रसूख के चलते संजीव को बरी कर दिया गया होता.

निकिता लांबा

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लोग गाते-गाते गरियाने लगे हैं!

Shambhu Nath2एक मशहूर टीवी न्यूज चैनल के एंकर ने एक बार मुझे बताया कि अब काम करना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है. उनकी हर स्टोरी पर लोग-बाग इस तरह रिएक्ट करते हैं कि लगता है अगर उन्हें वे अकेले पा जाएं तो मार ही दें. यह कहने वाले कोई आम या सड़कछाप लोग नहीं हैं बल्कि वे लोग हैं जो प्रभावशाली पदों पर बैठे हैं और सरकार के चहेते हैं. मुझे यह तो अंदेशा था कि उन्हें धमकियां मिलती होंगी पर कोई सरकार का असरदार व्यक्ति ऐसी धमकी देगा मुझे भरोसा नहीं हो रहा था. लेकिन पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की मृत्यु हो जाने पर जिस तरह से उन एंकर ने उसी असरदार नेता की प्रतिक्रिया लेते हुए उसे सर कह कर संबोधित किया तो मेरा माथा ठनका. मैंने गौर किया कि उस नेता की प्रतिक्रिया लेते वक्त उस नामी एंकर ने एक बार भी टीवी पर सामने की तरफ अपना चेहरा नहीं किया. यह दुखद है. असरदार लोग अब सीधे ही पत्रकारों को नहीं धमकाते बल्कि उनके मालिकों पर भी दबाव डालते हैं कि अपने उस पत्रकार को या तो काबू करो अथवा उसे चलता करो. यह पीड़ा अकेले उन्हीं एंकर की नहीं है बल्कि वे सभी पत्रकार आजकल ऐसे हमलावर तेवरों वाले नेता और उनके फालोअरों से तंग हैं. एक महिला टीवी पत्रकार ने तो अपने साथियों से कहा था कि उसे अक्सर फोन आते हैं कि तुमने अगर अपने को न सुधारा तो तुम्हारा रेप कर दिया जाएगा. वह बेचारी बस सरकार की नाकामियों को कुछ ज्यादा ही तीखे अंदाज में उजागर कर रही थी. इसी तरह एक अखबार के संपादक को भी ऐसी ही धमकी अक्सर दी जाती हैं.

यह गंभीर चिंता का विषय है कि आखिर लोग इतने असहिष्णु और अमर्यादित क्यों होते जा रहे हैं. क्यों जरा-सी भी वह बात उन्हें सहन नहीं होती जो परंपरागत लीक से हटकर हो. याकूब मेनन की फांसी पर कुछ लोगों ने राष्ट्रपति से अपील क्या कर दी कि तत्काल कुछ लोगों ने उन्हें राष्ट्रद्रोही साबित कर दिया. सवाल इस बात का है कि अब क्या समानांतर रेखा पनपने नहीं दी जाएगी. अब तक हम यही तुलना सदैव अपने समानांतर रेखा से करनी चाहिए पर जब समानांतर रेखा ही समाप्त कर देंगे तो तुलना का प्रश्न ही नहीं उठता. लोगों में कितना गुस्सा और नफरत भरी हुई है यह जानना हो तो आज सोशल मीडिया को देखिए. कुछ भी ऐसा लिख दिया जाए जो सरकार की अंध लाइन के विरोध में हो तत्काल लोग ऐसे टूट पड़ते हैं मानो पता नहीं कौन-सा कहर आन पड़ा. किसी ने मोदी सरकार की किसी नीति की निंदा कर दी तो तत्काल उसे देशद्रोही होने का फतवा जारी कर दिया जाएगा. किसी ने भी कथित भारतीय सभ्यता के छिद्रों पर हमला किया तो उसे धर्मद्रोही करार दे दिया जाएगा. मानों राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रभक्ति और समूचे हिंदू धर्म का ठेका इन्हीं असहिष्णु लोगों ने ले रखा हो. अभी कुछ वर्ष पूर्व तक हालात यह नहीं थे. लोग अलग राय रखते और उस पर दृढ़तापूर्वक खड़े भी रहते थे लेकिन क्या मजाल कि कोई उन पर हमला करे फौरन उनके पक्ष के लोग अपने-अपने तर्कों के साथ आ जाते थे. पर अब उलटा है अगर आप पर हमला हो रहा है तो भी आप की बात पर समान राय रखने वाले लोग या तो डर से चुप रहेंगे अथवा आग में घी डालने का काम करेंगे.

यह एक तरह की गुंडागर्दी है, अराजकता है कि अलग राय रखने वाले को अकेला कर देना और उसे उसकी राय को लेकर अपराधी करार दे देना. जो लोग इस अभियान को चला रहे हैं वे सफल हो रहे हैं क्योंकि वे भारी पड़ते जा रहे हैं. फेसबुक पर, ट्विटर पर या टीवी चैनलों पर अलग राय रखने वाले पहचान में आ जाते हैं इसलिए उन पर हमले शुरू हो जाते हैं. सवाल यह उठता है कि क्या सरकार समर्थक राय रखना ही देशभक्ति की निशानी है. सरकार के विरोध में खिसकने का मतलब राष्ट्रद्रोह कब से हो गया? लोकतंत्र में मीडिया की आजादी ही उसके मजबूत पायों की निशानी है. अगर किसी लोकतंत्र में मीडिया को खुलकर बात रखने की आजादी नहीं है तो वह लोकतंत्र भले हो मगर बीमार कहा जाएगा. आज देश में अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है. अभिव्यक्ति की बात करते समय अराजकता अथवा गुंडागर्दी का समर्थन नहीं कर रहा बल्कि मेरा आशय यह है कि सरकार को अगर अपनी निंदा सुनने का साहस नहीं है तो वह लोकतंत्र एक तरह का भीड़तंत्र है जिसमें भेड़ें हांकी जाती हैं और ये भेड़ें अपना दिमाग तो रखती नहीं. वे बस वही रास्ता पकड़ती हैं जो लीक उन्हें समझा दी जाती है. इस तरह हमारे देश का डिजिटल संसार यदि रोबोट पैदा कर रहा है तो क्या फायदा होगा. जहां मशीनें तो होंगी लेकिन संजीदा लोग नहीं होंगे. यह एक पूरी पीढ़ी को बरबाद कर देने की तैयारी है जो उनके स्वतंत्र विचार को कुंद कर रही है और इसका खामियाजा आगे आने वाली पीढि़यों को भुगतना पड़ेगा.

बनारस में एक मोहल्ला है अस्सी और इस अस्सी में सामाजिक अड्डेबाजी का ठिकाना है पप्पू चाय की दुकान. पप्पू चाय की दुकान में बैठकर आप दुनिया-जहान की बातें कर सकते हैं और मोदी से लेकर बराक ओबामा तक खुलकर अपनी राय रख सकते हैं. आपको काउंटर करने वाले भी मिलेंगे और आपसे इत्तेफाक रखने वाले भी लेकिन ऐसी अड्डेबाजी फेसबुक पर क्यों नहीं है? यहां तो आपने जरा-सी भी नाइत्तेफाकी दिखाई कि लोग-बाग टूट पड़ेंगे और आप पर गालियों की इस तरह बौछार शुरू कर देंगे कि आपको वहां से निकल जाना ही बेहतर लगेगा. फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्स एप ने आदमी को एक ऐसा हथियार मुहैया करा दिया है कि वह अपनी सारी भड़ास इसी माध्यम से व्यक्त करने लगा है. इस भड़ास में जहां ईर्ष्या है, द्वेष और जलन है तथा ये सारे के सारे कलुषों को बाहर कर देने का एक जरिया है. लेकिन बोला हुआ शब्द चाहे कम मार करे पर लिखा हुआ शब्द ज्यादा तीखी मार ही नहीं बल्कि ऐसी मार करता है जिसका असर तात्कालिक ही नहीं सालों तक दिखता है. आप कुछ भी ऐसा लिखिए जो लीक से हटकर हो तो पता चलता है कि तत्काल सोशल मीडिया में प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है. कोई आपको देशद्रोही, धर्मद्रोही और जातिद्रोही बताने में लग जाता है तो कोई आपको प्रतिक्रियावादी, रूढि़वादी और लकीर का फकीर बताने में पूरा जोर लगा देता है. मजे की बात कि लिखा हुआ मैटर एक ही है लेकिन प्रतिक्रिया भिन्न स्रोतों से अलग-अलग. यानी कोई भी विवेकपूर्ण बात सुनने की या पढ़ने की क्षमता धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही है. हमारे कान बस वही सुनना चाहते हैं जो हमें पसंद हो अथवा जो हमारी रुचि के अनुसार लिखा गया हो. मगर कुछ वर्षों पूर्व तक ऐसा नहीं था. तब काफी कुछ ऐसा लिखा जाता था जो हमारी धारणा के प्रतिकूल होता था मगर उसे पढ़ा जाता था और सधी हुई प्रतिक्रिया व्यक्त की जाती थी.

हमारे समाज का इस तरह एकरस हो जाना और उसकी विविधता खत्म हो जाने का एक कारण तो समाज में उत्पादक और अनुत्पादक शक्तियों में आया बदलाव है. हर समाज की संस्कृति उसके उत्पादन के साधन और उसकी भौगोलिक स्थिति से प्रभावित होती है. अब भौगोलिक स्थिति तो अचानक बदलती नहीं पर उत्पादन के साधन जरूर तेजी से बदल जाते हैं. आज जिस तरह मध्यवर्ग को अपनी लाइफ स्टाइल और मूल्यों को बनाए रखने के लिए दिन-रात जूझना पड़ता है और परिवार के हर सदस्य को आय का जरिया तलाशने पर जोर देना पड़ता है, उस वजह से उसकी आंतरिक खुशी में कमी आई है. अब प्रसन्नता का स्रोत उसे परिवार से नहीं बल्कि मनोरंजन के अन्य साधन तलाशने से मिलता है. भले वह बाहर जाकर खाना खाना हो अथवा मल्टीप्लेक्स में जाकर सिनेमा देखना, वह सब जगह एक भीड़ और भागमभाग देखता है जिस वजह से जीवन में एकरसता आने लगती है. सुबह उठकर ऑफिस के लिए घर से निकलने से लेकर शाम जल्दी घर पहुंचने तक वह बस एक ही चीज देखता है भीड़ और भागते हुए लोग. यह भीड़ और भागमभाग उसके जीवन से विवेक छीन लेता है और आदमी बस एक ही तरीके से सोचना शुरू करता है. इसमें उसके अपनी वैल्यूज होती हैं और अपनी तरह के तमाम ईगो और टैबू. वह कुछ भी अलग हटकर सोचना बंद कर देता है तथा ऐसी हर बात को खारिज कर देता है जो उसके वैल्यूज और भ्रमों को तोड़ता हो. इससे एक तरह की जड़ता आती है और एक ही समझ विकसित होती है. यह जड़ता और एकरस समझ उसे कुछ भी भिन्न देखते ही प्रतिक्रिया करने पर प्रेरित करता है और नतीजा होता है भड़ास.

असली चिंता उन लोगों की है जो अपनी एकांतिक सोच के कारण विवेक खोते जा रहे हैं. मनुष्य की एकांतिक सोच उसे समाज से काटती है. वह अपने मन की दुनिया में रहने लगता है जहां विरोध नहीं है, जहां उसके प्रतिकूल न तो कोई बात कही जाती है न कोई चरित्र उसकी मर्जी के बिना विचरण करता है. यह उसकी अपनी दुनिया तो है लेकिन यह दुनिया हकीकत नहीं बन सकती यह सिर्फ आभासी दुनिया रह सकती है जो वर्चुअल है और जिसमें सब कुछ सिर्फ ब्लिंक करता है. वास्तविक दुनिया में दुख है, शोक है, पीड़ा है और अकेलापन है मगर सुख भी अपार है और वह सुख जो वास्तविक है. मगर भागमभाग वाली जिंदगी आदमी को वास्तविक दुनिया से नहीं उस वर्चुअल दुनिया की तरफ धकेलती है जो झूठ और छद्म पर टिकी है. पर जो लोग इस आभासी दुनिया में पीड़ाएं और हकीकत को व्यक्त करते हैं उस पर ये सारे लोग हमले शुरू कर देते हैं जो झूठ और फरेब की अपनी दुनिया में अपने तरीके से ही मगन हैं.

(लेखक अमर उजाला के संपादक रह चुके हैं)

फिल्म पत्रकारिता : पैसा दो, प्रशंसा लो

phdeath2भारतीय सिनेमा बाजार पर अमेरिकी फिल्मों के बढ़ते वर्चस्व की समस्या का निदान निकालने हेतु अंग्रेजों ने 1927-28 में टी. रंगाचारियार की अध्यक्षता में एक सिनेमेटोग्राफ इंक्वायरी कमेटी गठित की. कमेटी का उद्देश्य अमेरिकी फिल्मों के बरक्स ब्रिटिश फिल्मों को बढ़ावा देने पर विचार करना था. इस कमेटी का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि लगभग 90 साल बीतने के बाद भी कमेटी की बातें आज भी उतनी ही सच लगती हैं, जितनी 1927-28 में रही होंगी. ऐसा सिर्फ इसलिए नहीं कि फिर एकबार भारतीय सिनेमा के सामने हॉलीवुड एक बड़ी चुनौती बन कर उभर रहा है, बल्कि इसलिए कि सिनेमा पत्रकारिता की भी जो स्थिति उस समय थी, वही कमोबेश आज भी है.

कमेटी ने उस समय भारतीय सिनेमा के प्रतिनिधि के रूप में दादा साहब फाल्के और हिमांशु राय से भी विचार विनिमय किए. भारतीय समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अमेरिकी फिल्मों को तरजीह दिए जाने के सवाल पर हिमांशु राय ने स्पष्ट कहा था, ‘प्रत्येक समाचार पत्र को सीधे फिल्म की टंकित समीक्षा विदेशी निर्माताओं के माध्यम से उपलब्ध करा दी जाती है. समाचार पत्र उसे प्रकाशित करने को इसलिए बाध्य रहते हैं कि इससे उनके व्यवसायिक हित जुडे होते हैं.’ इसी कमेटी की एक गवाही में स्पष्ट कहा गया कि उस समय सिर्फ स्टेट्समैन एकमात्र अखबार था, जो समीक्षाओं में अपने विवेक से छेड़छाड़ करता था, बाकी अखबार ज्यों का त्यों छापते थे. स्टेट्समैन को सिनेमा के बड़े विज्ञापनों से हाथ धोकर इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ता था.

आज स्थितियां इस रूप में बदल गई हैं कि अब अखबारों पर फिल्म कंपनियों को दबाव बनाने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि अखबारों ने अपने इंटरटेनमेंट पेज की परिकल्पना ही फिल्म कंपनियों को समर्पित कर दी है. कुछ अखबार तो घोषित रूप से अपने सिनेमा के पृष्ठ को ‘एडवर्टोरियल’ कहकर निकाल रहे हैं, तो कुछ लुके-छिपे विज्ञापनों के माध्यम से स्पेस के सौदे तय कर रहे हैं. वहां विज्ञापन नहीं, खबरों से लेकर सितारों के इंटरव्यू तक की कीमत तय है. तेल माफिया द्वारा मार दिए गए मंजूनाथ पर केंद्रित फिल्म बनाने वाले संदीप वर्मा ने एक बातचीत में काफी दर्द के साथ बताया कि किस तरह फिल्म के संवेदनशील विषय के प्रति भी वे ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ को ‘मंजूनाथ’ के लिए जगह देने को राजी नहीं कर सके थे, जबकि इस फिल्म के लिए उन्होंने अपनी सारी पूंजी लगा दी थी और बाद में आईआईएम, लखनऊ के मंजूनाथ के साथियों के सहयोग से वे फिल्म पूरी कर सके. उन्होंने स्पष्ट कहा था, ‘मंजूनाथ पर बनी फिल्म के लिए जगह खरीदना मंजूनाथ की स्मृति का अपमान होता, मैंने इंकार कर दिया.’

वास्तव में मुंबई की मुख्यधारा की फिल्म पत्रकारिता सीधे-सीधे खरीद-फरोख्त पर चल रही है. नई फिल्म की रिलीज के पहले निर्माता की सफलता इसी से मानी जाती है कि वह कितने पत्रकारों को खरीद सका, कितने अखबारों को उपकृत कर सका. उपकृत होने में विज्ञापनों के साथ अब एक नया तुर्रा जुड़ गया है प्रमोशनल इवेंट का. फिल्म स्टार से अब उम्मीद की जाती है कि वे जिस भी शहर में जाएं, वहां के अखबार के दफ्तर में भी पहुंचें, फोटो खिंचाएं और अखबार का महत्व स्पष्ट करें. यह वैसा ही है जैसे सितारे फीस लेकर शादियों में उपस्थित होकर परिवार वालों से निकटता का अभिनय करते हैं. अब अखबार उपकृत हो गए तो चाहे अनचाहे इन पत्रकारों को वही लिखना होता है, जो कलाकार या फिल्मकार लिखवाना चाहते हैं. आश्चर्य नहीं कि आज पीआरओ और मुंबई के फिल्म पत्रकारों में फर्क करना मुश्किल हो गया है. फिल्म की रिलीज के पहले ही अखबारों में आधे-आधे पृष्ठ और पत्रिकाओं में कवर स्टोरी आने लगती है तो स्पष्ट लगता है कि प्रायोजन की हद कहां तक पहुंची है. याद कर सकते हैं किस तरह देश के एक बड़े साप्ताहिक में ऋतिक रोशन पर कवर स्टोरी उनकी पहली फिल्म रिलीज होने के पहले ही छप गई थी. कुछ ही समय पहले जब उसी पत्रिका में भोजपुरी फिल्म स्टार निरहुआ पर तीन पृष्ठों का आलेख छपा तो साफ लग रहा था कि न तो लेखक ने और न ही संपादक ने कभी निरहुआ की कोई फिल्म देखी है. वास्तव में अखबारों में किस फिल्म को कितनी जगह दी जानी है, यह फिल्म से तय नहीं होता, बल्कि दिए गए विज्ञापन के आकार या प्रायोजन की रकम से तय होता है. यहां तक कि सितारों और निर्देशकों के साक्षात्कार के आकार भी कहीं न कहीं आज ऐसे ही तय हो रहे हैं. क्या आप याद कर सकते हैं कि बीते वर्षों में किसी भी सितारे के अभिनय पर कोई समीक्षात्मक टिप्पणी पढ़ी हो? अमिताभ बच्चन से लेकर रणवीर सिंह तक आप सिर्फ और सिर्फ जयकारे ही देख सकते हैं.

हिंदी की सिनेमा पत्रकारिता का यह एक आश्चर्यजनक पहलू है कि इस गति को प्राप्त पत्रकारिता की शुरुआत काफी गरिमापूर्ण तरीके से हुई थी. महादेवी वर्मा, वृंदावन लाल वर्मा, प्रेमचंद, सेठ गोविंद दास, ऋषभ चरण जैन, सत्यकाम विद्यालंकार, जैनेंद्र कुमार, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, डॉ.नगेंद्र जैसे श्रेष्ठतम विद्वानों, साहित्यकारों ने सिनेमा पत्रकारिता को अपने सार्थक हस्तक्षेप से समृद्ध करने की कोशिश की. ऋषभ चरण जैन ने तो 1933 में ही ‘चित्रपट’ नाम से पत्रिका निकाली थी, जिसके संपादन में गोपाल सिंह नेपाली, नरोत्तम नागर, संपत लाल पुरोहित जैसे साहित्य और कला जगत की प्रतिष्ठित हस्तियों का सहयोग रहा. बावजूद इसके यह कहने में संकोच नहीं किया जा सकता कि अपेक्षाकृत इस नई कलाविधा के प्रति साहित्यकारों का रुख सद्भावपूर्ण कम, दुराग्रह भरा अधिक था. उन्होंने इस नई कलाविधा को समझने की जरूरत ही नहीं समझी. सिनेमा के प्रति साहित्यकारों के दुराग्रहपूर्ण रवैये ने विचार जगत और सिनेमा के मध्य वांछित पुल को सिरे ही नहीं चढ़ने दिया. सिनेमा पर बात करने के लिए एक नई कसौटी गढ़ने के बजाय परंपरागत कसौटी पर कसकर सिनेमा को वे लगातार खारिज करते रहे और सिनेमा पर बात करने के लिए नासमझों के लिए गुंजाइश बनती गई. ऐसे में बीच-बीच में अरविंद कुमार के संपादन में निकलने वाली ‘माधुरी’, अज्ञेय और फिर रघुवीर सहाय के संपादन में निकलने वाली ‘दिनमान’ ने अवश्य बर्फ पिघलाने की कोशिश की और सिनेमा पर लिखने के लिए कुंवर नारायण, प्रयाग शुक्ल, विजय मोहन सिंह, मंगलेश डबराल, विष्णु खरे, त्रिपुरारी शरण जैसे सक्षम लेखकों का समूह तैयार किया. बाद के दिनों में मध्य प्रदेश फिल्म विकास निगम की सिनेमा पर केंद्रित पत्रिका ‘पटकथा’ भी आई, लेकिन वह इतनी दुरूह थी कि अप्रासंगिक होकर कुल जमा 14 अंकों के बाद ही बंद हो गई.

पश्चिम में सिनेमा के साथ ही सिनेमा पर गंभीर विमर्श की शुरुआत हो गई थी. यह शुरुआत बाहर से नहीं, सिनेमा से जुडे लोगों की पहल से ही हुई थी. सत्यजीत रे कहते थे,‘फिल्म पर लिखने वाले, फिल्मकार और दर्शकों के बीच सेतु का निर्माण करते हैं और यही उनका अहम दायित्व भी है.’ हिंदी साहित्य में जितनी ही शिद्दत से इस ‘सेतु’ की अनिवार्यता आज भी समझी जाती है, हिंदी सिनेमा के लिए यह उतनी ही त्याज्य रही है. जैसे-जैसे सिनेमा को लोकप्रियता मिलती गई, अपने संप्रेषणीयता के अहम में मगन सिनेमा को अपने और दर्शकों के बीच किसी भी सेतु की जरूरत का एहसास खत्म होता चला गया. भारत में भी आरंभिक दौर में दादा साहब फाल्के ने ‘नवयुग’ में कुछेक टिप्पणियां लिखीं, लेकिन बाद में उनके लिए भी कैमरे महत्वपूर्ण हो गए. बांग्ला में सत्यजीत रे और ऋत्विक घटक जैसे फिल्मकारों ने लगातार सिनेमा पर लिखकर एक वृहत्तर समुदाय बनाने की सफल कोशिश की लेकिन हिंदी में किसी भी फिल्मकार ने अपने लेखन से विचार जगत को करीब लाने की कोशिश नहीं की. इसके विपरीत अधिकांश फिल्मकार अपनी बौद्धिक छवि बनाने में संकोच करते दिखे. यहां करण जौहर और डेविड धवन की तो बात ही अलग है, यह श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, प्रकाश झा, महेश भट्ट सरीखे नया सिनेमा, समांतर सिनेमा और कला सिनेमा के एक-एक कर ढहते स्तंभों में भी देखा जा सकता है.

प्रकाश झा ने ‘राजनीति’ की सफलता के बाद कहा था, ‘दामुल के बारे में आज मैं सोच भी नहीं सकता, ऐसी फिल्में क्यों बनाऊंगा जिसे दर्शक देखना ही नहीं चाहे.’ प्रकाश झा के बयानों को देखकर यही लगता है कि ‘दामुल’ बनाकर उन्होंने एक ‘गलती’ की थी. यह कुछ ऐसा ही है कि निर्मल वर्मा कहने लगते मैं ‘चीड़ों पर चांदनी’ नहीं लिखूंगा क्योंकि अब पाठक पढ़ना ही नहीं चाहते, मैं भी गुलशन नंदा और प्रेम वाजपेयी की तरह ‘पिघलता आसमान’ और ‘बरसते नैन’ ही लिखूंगा क्योंकि पाठक यही पढ़ना चाहते हैं.

हिंदी फिल्मकारों ने बेहतर सिनेमा को लोकप्रिय बनाने की दिशा में या फिर सिनेमा को कला परिदृश्य के केंद्र में लाने के लिए स्वयं तो कोई कोशिश नहीं ही की, हिंदी में सिनेमा पर गंभीर पत्रकारिता की परंपरा को हतोत्साहित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी. आमतौर पर किसी भी कला विधा के समालोचक और पत्रकार अलग होते हैं. दोनों के कार्य भी, दोनों के महत्व भी. एक का महत्व अभिष्ट कला विधा में घट रही दैनंदिनी घटनाओं की सूचना पाठकों तक पहुंचाना है तो दूसरे का उस कला विधा का विश्लेषण कर पाठकों को उसके अधिकाधिक रसास्वादन के लिए तैयार करने का, लेकिन भारतीय सिनेमा शायद ऐसी एकमात्र कला विधा होगी जहां फिल्म समीक्षक और फिल्म पत्रकार में फर्क नहीं किया जाता. जो भी फिल्मों पर लिख रहे हैं सभी फिल्म क्रिटिक मान लिए गए, चाहे वे शूटिंग रिपोर्ट या फिल्म के जनसंपर्क अधिकारियों के द्वारा उपलब्ध सामग्रियों के आधार पर आने वाली फिल्मों की कथा ही क्यों ना प्रस्तुत कर रहे हों. आश्चर्य नहीं कि ‘बजरंगी भाईजान’ की समीक्षा में फिल्म पर बातें कम होती हैं, कबीर खान पर बात कम होती हैं, सलमान के व्यक्तित्व और उनके ‘बीइंग ह्यूमन’ होने की चर्चा अधिक होती है. ये बिरादरी चूंकि फिल्म को प्रमोट करने में सक्षम थी इसलिए फिल्मकारों ने इन्हें ही हाथोंहाथ लिया. कई पत्रकारों को बड़े-बड़े सितारे सार्वजनिक रूप से अपना घनिष्ठ मित्र जाहिर कर गौरवांवित होते थे और गौरवांवित करते थे. यह गंभीर पत्रकारों की पांत कमजोर करने का यह दोहरा षडयंत्र था. आम जनता की नजर में पत्रकारों का रुतबा बढ़ाने का और खास पत्रकार की नजर में अपना रुतबा बनाने का. इसका प्रतिदान देने में पत्रकार भी संकोच नहीं करते. यह कभी उनके लिए लंबा विचारोत्तेजक इंटरव्यू बनाकर दिया जाता तो कभी उन्हें ‘न भूतो न भविष्यति’ अभिनेता के रूप में स्थापित करते हुए प्रोफाइल लिखकर. क्या आश्चर्य नहीं कि हरेक साल आपस में हजारों प्रायोजित अवार्ड बांट लेने वाले हिंदी सिनेमा को सम्मानित करने के लिए कभी पत्रकारों की याद नहीं आती. कमाल है कि क्रिटिक्स अवार्ड की श्रेणी तो बनाई जाती है, क्रिटिक्स के लिए कोई श्रेणी नहीं होती. वास्तव में जिस भाषा में सिनेमा का विस्तार एक कलाविधा के रूप में नहीं, बल्कि व्यवसाय के रूप में किए जाने की संभावना तलाशी जा रही हो, उसके लिए बौद्धिक जगत से दूरी शायद अनिवार्यता भी है.

आज इस स्थिति को लेकर संतोष व्यक्त किया जा सकता है कि हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं का सिनेमा को लेकर पूर्वाग्रह थोड़ा ढीला पड़ा है. ‘पहल’, ‘बहुवचन’, ‘पाखी’ से लेकर ‘वागर्थ’ तक में भी सिनेमा पर सामग्रियां दी जा रही हैं लेकिन निश्चित रूप से व्यवसाय के दबाव में गले तक डूबी हिंदी की सिनेमा पत्रकारिता के लिए यह नाकाफी है. इसलिए आश्चर्य नहीं कि हिंदी में सिनेमा पत्रकारिता की जो एक मुकम्मल तस्वीर उभरती है, वह निहायत ही अबौद्धिक और गैर जिम्मेदार है. वास्तव में हिंदी की फिल्म पत्रकारिता अब कलम नहीं, कैमरे के सहारे चल रही है. फिल्म के पन्नों से छपे हुए शब्द धीरे-धीरे बेदखल हो रहे हैं. उनका स्थान बड़ी-बड़ी तस्वीरें ले रही हैं. फिल्म समीक्षा से अधिक स्थान शूटिंग रिपोर्ट को दियाजा जा रहा है. एक वरिष्ठ फिल्म पत्रकार ने बताया, ‘हम जैसे गंभीर बात करने की कोशिश करने वाले लोग अप्रसांगिक होते जा रहे हैं. आज के लड़के एसएमएस से इंटरव्यू कर लेते हैं. कलाकार भी खुश कि पत्रकार से मिलकर समय जाया नहीं करना पड़ा, पत्रकार भी खुश कि घर बैठे नौकरी हो गई.’ वे बताते हैं कि अपने अखबार के आठ इंटरटेनमेंट पृष्ठों में अपने 800 शब्द के कॉलम को बचाने के लिए किस तरह संघर्ष करना पड़ता है.

तय है कि आज भले ही दर्शकों और सिनेमा दोनों को पत्रकारिता की इस स्थिति से फीलगुड हो रहा हो, अंतिम खामियाजा भुगतना सिनेमा को ही पड़ेगा. प्रजातंत्र के इस चौथे स्तंभ का कमजोर पड़ना हमारे समाज के लिए घातक है, उसी तरह फिल्म पत्रकारिता भी कमजोर पड़ती गई तो हिंदी फिल्मों के लिए रास्ते और भी कठिन होते जाएंगे. क्या हॉलीवुड फिल्मों की नई धमक में हिंदी सिनेमा यह आहट नहीं सुन पा रहा है?

(लेखक वरिष्ठ फिल्म पत्रकार हैं)

हिंदी बनाम अंग्रेजी : पत्रकारिता के दो रंग

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अपने एक कमरे के छोटे-से किराये के ‘घर’ के दरवाजे पर ताला मारकर मैं दौड़ी-दौड़ी घर के सामने वाले चौराहे पर पहुंची. ‘ब्लू डार्ट’ से मेरे लिए एक लिफाफा आया था. जल्दी से दस्तखत कर कुरियर वाले को पर्ची पकड़ाई और लिफाफा लेकर वापस कमरे की तरफ दौड़ी. लिफाफे के एक सिरे को धीरे से फाड़ा और अंदर मौजूद पेमेंट इनवॉइस और 32 हजार रुपये का चेक निकाल कर देखा. यह एक स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर मेरी पहली कमाई थी और मुझे याद है कि चेक हाथ में लेकर मैं खुशी से उछल पड़ी थी. खुश होने की वजह भी थी. अब मैं भारत भर में फैली करोड़ों खबरों में से अपनी पसंद की स्टोरी चुनकर उसे कर सकती थी, उस पर दस दिन का समय खर्च कर सकती थी, ग्राउंड पर जाकर उसे रिपोर्ट कर सकती थी और फिर कम से कम तीन हजार शब्दों में दिल खोलकर लिख सकती थी. साथ में तस्वीरें भी भेज सकती थी और कम से कम छह रुपये हर एक शब्द के हिसाब से पैसे भी ले सकती थी. मतलब मैं बिना किसी दफ्तर में काम किए अपनी पसंद की इन-डेप्थ स्टोरीज कर सकती थी और पैसे भी कमा सकती थी. ज्यादा नहीं तो कम से रिपोर्ट के फील्ड वर्क के दौरान होने वाली यात्राओं में ट्रांसपोर्ट का खर्चा तो अलग से पेमेंट में जुड़कर मिल ही रहा था.
मेरे लिए यह सेटअप एक स्वतंत्र जीवन, मनचाहे काम और जरूरत भर पैसों की चाभी था. बहुत संभव है कि अंग्रेजी में काम कर रहे स्वतंत्र पत्रकारों को सिर्फ 6 रुपये प्रति शब्द की दर कम लगे या फील्ड बजट का कम होना अखरे या हर फिर पेमेंट में से दस फीसदी की कर कटौती तकलीफ दे. अंग्रेजी में स्वतंत्र तौर पर काम कर रहे मेरे बहुत से मित्र जब मुझसे कहते थे कि फ्रीलांसिंग की कमाई से उनका खर्च चलना मुश्किल है तब मैं सिर्फ मुस्कुरा कर उनकी बात सुन लेती थी. और आज अपना पहला चेक आने पर मैं इतनी खुश थी जैसे उतने पैसो से सारी जिंदगी गुजर सकती हो.
वजह शायद हिंदी पत्रकारिता में गुजारे गए साढ़े तीन साल का अनुभव था. हिंदी में काम करते हुए मैंने बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों की राजधानियों में फोटो पत्रकारों को सिर्फ सौ-सौ रुपये में तस्वीरें बेचते और कॉलम लिखने वालों को सिर्फ चार या पांच सौ रुपये में खुशी से लिखते हुए देखा था. मैंने देखा था कि कैसे एक ही मीडिया संस्थान की हिंदी इकाई में एक प्रशिक्षु की भर्ती 12 हजार रुपये/महीने पर होती है और ज्यादा सुविधाओं के साथ वही काम उसी संस्था की अंग्रेजी इकाई में करने वाले प्रशिक्षु की भर्ती कम से कम 25 हजार रुपये/महीने पर होती है. मैंने देखा था कि कैसे एक हिंदी के पत्रकार को खबर के लिए जाते वक्त थर्ड एसी का किराया भी मुश्किल से जारी होता है जबकि अंग्रेजी में सभी ज्यादातर हवाई जहाज से यात्रा करते थे. अंग्रेजी की दो पेज की रिपोर्ट पर होने वाले खर्च में हम हिंदी में दस-दस पेजों की कवर स्टोरी फाइल कर दिया करते थे.
हिंदी में कभी हमारे पास अंग्रेजी के बराबर संसाधन नहीं रहे और अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए अच्छे काम के सिवा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था. इसलिए हमने कम बजट में काम करने के लिए खुद को ट्रेन कर लिया था. उदाहरण के लिए सिर्फ 30 हजार रुपयों में देश के सुदूर कोनों में एक हफ्ते काम करना और दस पन्ने से ज्यादा लंबी पड़ताल के साथ लौटना. इसी बजट में फोटोग्राफर को भी दफ्तर से साथ ले जाना होता था. पत्रकार अगर कोई लड़की है तो दिक्कत दोगुनी. बाहर रुकने के लिए एक सुरक्षित जगह चाहिए और फोटोग्राफर के लिए अलग कमरा भी. हिंदी पत्रिका या अखबार के दफ्तर में ज्यादा बजट की मांग भी नहीं कर सकते वर्ना स्टोरी पर जाने से ही रोक दिए जाने का खतरा रहता है और अगर पत्रकार स्टोरी नहीं करेगा तो करेगा क्या? ऐसे में हिंदी का पत्रकार जुगाड़ के जरिए सारे काम करना सीख जाता है.
कम बजट में रिपोर्ट करने के लिए वह अपना ह्यूमन रिसोर्स नेटवर्क और बड़ा करता है. यही ‘नेटवर्क’ हिंदी के हर पत्रकार की असली पूंजी होता है. हर जिले, हर शहर में उसके चार मित्र, दो परिचित तो होते ही हैं. सस्ते होटलों, धर्मशालाओं, मस्जिदों, गुरुद्वारों और चर्च से लेकर गांव-खेड़े में चारपाई या फिर तिरपाल बिछाकर भी सो जाता है. वह फिर भी खुश है क्योंकि उसकी कंडीशनिंग ऐसे वातावरण में की गई है जहां उसकी रिपोर्ट प्रकाशित करके संपादक उस पर एक तरह से एहसान करता है और उसे इसी पुरस्कार के लिए संस्था का शुक्रगुजार होना चाहिए. उसने जहां अंग्रेजी के बराबर तनख्वाह या काम करने की बेहतर स्थितियों की मांग की, पहले खुद लाखों रुपये पा रहे संपादक उसको ‘देश या पत्रकारिता के नाम पर शहीद होने’ की समझाइश देंगे और दोबारा कहने पर तो उसे तुरंत रिपोर्टिंग छोड़ने को कह दिया जाएगा या फिर सेमी-पोर्न खबरें वेबसाइट पर अपलोड कर रहे साथियों की टीम में शामिल हो जाने के लिए कहा जाएगा.
अंग्रेजी और हिंदी पत्रकारिता (आउटपुट) में जमीन-आसमान का फर्क है यह तो सभी कहते हैं मगर यह कोई नहीं कहता कि हिंदी और अंग्रेजी में ‘विशाल सैलरी गैप’ के साथ-साथ काम करने के माहौल और काम करने के तौर-तरीके में भी बहुत फर्क है.
उदाहरण के लिए मुख्यधारा के समाचार प्रकाशनों में (अपवादों को छोड़कर) 
  •  हिंदी के ज्यादातर संस्थानों में आगे बढ़ने की सीढ़ी चमचागिरी की चाशनी में लिपटी हुई है. स्टाफ अपना मत, खास तौर पर मतभेद, एडिटोरियल मीटिंग में नहीं रख सकता. अगर रख दिया तो संपादक और वरिष्ठों के पास स्टाफ को परेशान करने के सौ तरीके हैं. अंग्रेजी में ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से बहस होती है और काम से संबंधित किसी भी बात पर आपत्ति जताने पर वरिष्ठ उसे अपने ईगो पर नहीं लेते.
  • हिंदी अखबारों के ज्यादातर संपादकों और वरिष्ठों का मानसिक  स्तर और नजरिया बहुत राष्ट्रवादी है. महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर इनके संपादकीय पढ़कर ऐसा लगता है जैसे संघ की शाखा से लौटकर लिखे गए हों. किसी भी प्रोग्रेसिव स्टोरी आइडिया पास करवाने की प्रक्रिया में रिपोर्टर दीवार से सर फोड़ लेगा फिर भी दस में से नौ बार आइडिया रिजेक्ट कर दिया जाएगा. अल्टरनेटिव सेक्सुअलिटी तो दूर की बात है, सेक्सुअलिटी शब्द से ही न्यूज रूम में असहजता फैल जाती है. अपराध और रक्षा से जुड़े मामलों को हिंदी के सबसे बड़े अखबार ऐसे कवर करते हैं जैसे वे अखबार नहीं, पुलिस और आर्मी के माउथपीस हैं! अंग्रेजी में हर तरह की कहानियों के लिए जगह है. हर तरह के पत्रकारों के लिए जगह है. अंग्रेजी में आलोचनात्मक नजरिया अब भी जिंदा है इसलिए उनकी रिपोर्ट्स में भी फर्क दिखता है.
  • हिंदी अखबारों के दफ्तरों में गणेश पूजन, नवरात्रि आदि मनाए जाते हैं. आरती, टीका और प्रसाद का पूरा कार्यक्रम होता है जबकि ईद और क्रिसमस के दौरान स्टाफ के लिए अलग से प्रार्थना करने की जगह तक नहीं बनवाई जाती. अंग्रेजी दफ्तरों में किसी भी तरह की पूजा नहीं होती.
  • हिंदी में छुट्टी-बाईलाइन से लेकर प्रमोशन तक सब कुछ ‘वरिष्ठ’ की कृपा पर निर्भर करता है. अंग्रेजी के पत्रकार का करिअर ग्राफ उसके काम पर निर्भर करता है.
  •  अंग्रेजी में किसी बड़ी रिपोर्ट के समय जिस शिद्दत से डेस्क के कर्मचारी, रिपोर्टर के साथ खड़े रहते हैं (इंटरव्यू टेप सुनकर लिखने से लेकर रिसर्च और एडिटिंग में मदद करने तक) हिंदी में ऐसा कभी नहीं होता. हिंदी डेस्क के लोग ‘बाईलाइन देकर एहसान किया है’ वाले सिंड्रोम से ही बाहर नहीं निकल पाते.
  • अंग्रेजी के पत्रकार के पास किताबें खरीदने, उन्हें पढ़ने, फिल्में देखने और दुनिया में हो रही घटनाओं पर सोच पाने के लिए समय और पैसा, दोनों ही हिंदी के पत्रकारों से ज्यादा होता है. वहीं हिंदी के पत्रकार को छह दिन दफ्तर में बैलों की तरह जोता जाता है और सातवां दिन वह हफ्ते भर के जमा कपड़े धोने में निकल जाता है

मगर हिंदी और अंग्रेजी में इतने फर्क के बावजूद भी, आज तक सभी पत्रकारों के लिए ‘समान रैंक पर समान वेतन और समान सुविधाएं’ दिए जाने को लेकर कोई लंबा आंदोलन नहीं किया गया और न ही दुनियाभर में मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले अंग्रेजी के साथी हिंदी के अपने साथियों लिए आवाज उठाने उनके साथ आए. एक ही अखबार की अंग्रेजी विंग में जा रहे रिपोर्टर ने कभी नहीं सोचा कि उसी के साथ हेल्थ बीट कवर करने वाले उसी की रैंक के हिंदीे रिपोर्टर को उससे आधा मेहनताना क्यों दिया जा रहा है? हिंदी में जब नौकरीपेशा पत्रकारों की ये हालत है आप अंदाजा लगा ही सकते हैं की 500 रुपये में रिपोर्ट लिखने वाले हिंदी के फ्रीलांसर का भूखों मर जाना तय है.

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं)

मजीठिया पर महाभारत

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इस आयोग की सिफारिशें मीडिया कर्मचारियों के लिए सिर्फ सपना बनकर रह गई हैं, जिसे हकीकत बनाने के लिए तमाम मीडिया मालिकान के खिलाफ मुट्ठी-भर पत्रकार ही संघर्ष कर रहे हैं. न्यायपालिका के सख्त आदेशों के बावजूद मीडिया संस्थान इसे लागू करने में आनाकानी कर रहे हैं. सिफारिशें न लागू करने के हर तरह के हथकंडे संस्थान अपना रहे हैं. मसलन उनके खिलाफ कोर्ट में जाने वाले पत्रकारों का शोषण, कंपनी को छोटी यूनिटों में बांटना, कम आय दिखाना, कर्मचारियों से कांट्रैक्ट साइन करवाना कि उन्हें आयोग की सिफारिशें नहीं चाहिए. इतने झंझावातों के बावजूद पत्रकार अपने हक के लिए लगातार लड़ रहे हैं. हालांकि इस लड़ाई में अभी भी पत्रकारों की एकजुटता काफी कम है. पत्रकारों के लिए दिवतिया आयोग, शिंदे आयोग, पालेकर आयोग, बछावत आयोग, मणिसाना आयोग और उसके बाद मजीठिया वेतन आयोग आया है, जिनका उद्देश्य पत्रकारों को एक समान वेतनमान दिलाना और उनके आर्थिक पहलू को मजबूत करना है. हाल ये है कि आज भी बड़े-बड़े अखबारों में होने वाला सबसे छोटे पद ‘उपसंपादक’ का मासिक वेतनमान 12 से 15 हजार रुपये है, जबकि आयोग की सिफारिशें लागू करने पर यह तनख्वाह कम से कम 35 हजार हो जाएगी.

मजीठिया आयोग ने अखबारी और एजेंसी कर्मियों के लिए 65 प्रतिशत तक वेतन वृद्धि की सिफारिश की है. साथ में मूल वेतन का 40 प्रतिशत तक आवास भत्ता और 20 प्रतिशत तक परिवहन भत्ता देने का सुझाव दिया है, जिसे आज तक मीडिया मालिकों ने लागू नहीं किया. आयोग की सिफारिशों के अनुसार पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारियों के मूल वेतन और डीए में, 30 प्रतिशत अंतरिम राहत राशि और 35 प्रतिशत वैरिएबल पे को जोड़कर तय किया गया है. समाचार पत्र उद्योग के इतिहास में किसी आयोग ने इस तरह की सिफारिश पहली बार की है. महंगाई भत्ता मूल वेतन में शत प्रतिशत ‘न्यूट्रलाइजेशन’ के साथ जुड़ेगा. ऐसा अब तक केवल सरकारी कर्मचारियों के मामले में होता आया है. वेतन बोर्ड ने 60 करोड़ रुपये या इससे अधिक के सकल राजस्व वाली समाचार एजेंसियों को शीर्ष श्रेणी वाले समाचार पत्रों के साथ रखा है. इस प्रकार समाचार एजेंसी पीटीआई शीर्ष श्रेणी में जबकि यूएनआई दूसरी श्रेणी में है. उदाहरण के अनुसार सिफारिशें लागू हों तो 1000 करोड़ की कंपनी में वरिष्ठ उप संपादक का वेतन 85 हजार से ऊपर हो जाएगा लेकिन इस समय उसे मात्र 17 हजार से 25 हजार के बीच ही वेतन मिल रहा है. इसके अलावा शहरों की श्रेणी के अनुसार पत्रकारों को तमाम दूसरी तरह की सहूलियतें देने की भी सिफारिश की गई हैं.

नवंबर 2011 से लागू करने की बात

सुप्रीम कोर्ट ने 7 फरवरी 2014 को अखबारों और समाचार एजेंसियों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने का आदेश दिया और कहा कि वे अपने कर्मचारियों को संशोधित पे स्केल के हिसाब से भुगतान करें. न्यायालय के आदेश के अनुसार यह वेतन आयोग 11 नवंबर 2011 से लागू होगा जब इसे सरकार ने पेश किया था और 11 नवंबर 2011 से मार्च 2014 के बीच बकाया वेतन भी पत्रकारों को एक साल के अंदर चार बराबर किस्तों में दिया जाएगा. आयोग की सिफारिशों के अनुसार अप्रैल 2014 से नया वेतन लागू किया जाएगा. तत्कालीन चीफ जस्टिस पी. सतशिवम और जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस एसके सिंह की बेंच ने इस आयोग की सिफारिशों को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दीं. बेंच ने सिफारिशों को वैध ठहराया और कहा कि सिफारिशें उचित विचार-विमर्श पर आधारित हैं और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इसमें हस्तक्षेप करने का कोई वैध आधार नहीं है. बहरहाल तमाम अखबारों के प्रबंधन मजीठिया आयोग के विधान, काम के तरीके, प्रक्रियाओं और सिफारिशों से नाखुश थे. इनका मानना था कि अगर इन सिफारिशों को पूरी तरह माना गया तो वेतन में एकदम से 80 से 100 फीसदी तक इजाफा करना पड़ सकता है, जो छोटे और कमजोर समूहों व कंपनियों पर तालाबंदी का अंदेशा बढ़ा सकता है. दलील यह भी थी कि अन्य उद्योगों की तुलना में प्रिंट मीडिया में गैर-पत्रकार कर्मचारियों को वैसे भी ज्यादा वेतन दिया जा रहा है. अगर सिफारिशें लागू की गईं तो वेतन में अंतर का यह दायरा और बढ़ जाएगा. हालांकि सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इनमें से किसी दलील को तवज्जो नहीं दी. साथ ही कहा कि यह केंद्र सरकार का विशेषाधिकार है कि वह सिफारिशों को मंजूर करें या खारिज कर दंे. कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर सरकार ने कुछ सिफारिशें मंजूर नहीं कीं तो यह पूरी रिपोर्ट को खारिज करने का आधार नहीं है. इसके बाद मीडिया घरानों की रिव्यू पिटीशन भी सुप्रीम कोर्ट में 10 अप्रैल 2014 को खारिज हो चुकी है.

मीडिया मालिक यहां फंसा रहे पेंच

सूत्रों की मानें तो दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर,  हिन्दुस्तान व अन्य बड़े अखबारों के प्रबंधन ने अपने कर्मचारियों से एक फॉर्म पर साइन ले लिए हैं, जिस पर लिखा है कि उन्हें मजीठिया आयोग नहीं चाहिए, वे कंपनी प्रदत्त वेतन एवं सुविधाओं से संतुष्ट हैं. कंपनी उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखती है. समय से उन्हें प्रमोशन मिलता है, अच्छा इंक्रीमेंट लगता है, बच्चों (अगर हैं) की पढ़ाई-लिखाई, स्वास्थ्य-चिकित्सा, उनकी बेहतरी का पूरा ख्याल कंपनी रखती है.

सुप्रीम कोर्ट में दे रहे ये दलील

एक बड़े अखबार में काम करने वाले वरिष्ठ उप संपादक सुरेश राय (बदला हुआ नाम) बताते हैं कि कागजों पर हस्ताक्षर को लेकर ये दलील दी जा रही है कि कर्मचारी लिखित में दे चुका है कि वह मौजूदा वेतन से संतुष्ट है. मामले को लेकर कर्मचारी और अखबार सुप्रीम कोर्ट तक चले गए हैं. सुनावाई के दौरान कुछ अखबार मालिकों ने अपने यहां कार्यरत पत्रकारों के बारे में दलील दी है कि वे प्रबंधकीय कार्य करने वाले कर्मचारी हैं और वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के अनुसार प्रबंधकीय कार्य करने वाले कर्मचारियों पर वेज बोर्ड लागू नहीं होता है. सवाल यह है कि ऐसे फार्मों-बांडों-कागजों-करारनामों पर साइन-दस्तखत करा लेने का कोई कानूनी-वैधानिक आधार है? कानून की किताबें तो इसे गैरकानूनी, अवैध, गलत बताती हैं. विशेष रूप से द वर्किंग जर्नलिस्ट्स एंड अदर न्यूजपेपर इंप्लाइज (कंडीशन ऑफ सर्विस) एंड मिस्लेनियस प्रोविजंस एक्ट 1955 के चैप्टर चार का अनुच्छेद 16, वर्किंग जर्नलिस्ट्स (कंडीशन ऑफ सर्विस) एंड मिस्लेनियस प्रोविजंस रूल्स 1957 के चैप्टर छह का अनुच्छेद 38 और द पेमेंट ऑफ वेजेज एक्ट 1936 का अनुच्छेद 23 तो यही कहता है. इन कानूनों का निचोड़ यही है कि इनके कोऑर्डिनेशन से हुआ या किया गया कोई भी समझौता अमान्य, निष्प्रभावी, अशक्त, अकृत, शून्य हो जाता है.

सुप्रीम कोर्ट का उड़ा रहे मखौल

भारतीय लोकतंत्र की अन्योन्याश्रित चार प्रमुख शक्तियां हैं:- विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और मीडिया, लेकिन आयोग की सिफारिशें लागू न करने का ताजा प्रसंग अब ये संदेश देने लगा है कि अब तक सिर्फ राजनेता, अफसर और अपराधी ही ऐसा करते रहे हैं, अब मीडिया भी डंके की चोट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का मजाक बनाने लगा है. मजीठिया वेज बोर्ड से निर्धारित वेतनमान न देने पर अड़े मीडिया मालिकों को जब सुप्रीम कोर्ट ने अनुपालन का फैसला दिया तो उसे अनसुना कर दिया गया. इस समय मीडियाकर्मी अपने हक के लिए दोबारा सुप्रीम कोर्ट की शरण में हैं.

यूनिट बनाकर कम दिखा रहे लाभ

सूत्रों की माने तो अखबार मालिक यूनिट के लाभ को आधार बनाकर सिफारिशें लागू करने की फिराक में हैं. कुछ अखबारों ने ऐसा किया भी है. ये कंपनी को कई यूनिटों में बांटकर लाभ को कम करके दिखा रहे हैं, जबकि यह सरासर गलत है. वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के अनुसार कंपनी एक है तो उसे यूनिट में विभाजित कर लाभ-हानि नहीं दिखाए जा सकते. एक कंपनी के कई अखबार और कई प्रदेशों से प्रकाशन होने पर भी मदर कंपनी का ही लाभ और हानि देखा जाएगा.

प्रताड़ना, तबादला और बर्खास्तगी

मध्यप्रदेश में राजस्थान पत्रिका समूह में काम कर रहे पत्रकार दुर्गेश दत्त (बदला हुआ नाम) ने बताया, ‘पत्रिका प्रबंधन को यकीन था कि उनके खिलाफ कोर्ट में कोई नहीं जाएगा. हालांकि हुआ इसके उलट. सुप्रीम कोर्ट के फैसला लागू नहीं होने पर कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट में अखबार मालिक के खिलाफ अवमानना की याचिका दायर कर दी. इससे अखबार मालिक आग बबूला हो गए. उन्होंने कर्मचारियों के जबरन तबादला और नौकरी से निकाले जाने की प्रताड़ना शुरू कर दी. भोपाल पत्रिका में दो कर्मचारियों को नौकरी से बाहर कर दिया गया जबकि पांच लोगों के तबादले 1900 किमी दूर तक कर दिया गया. बाकी बचे आठ याचिकाकर्ताओं पर भी नौकरी से बर्खास्तगी और तबादले की तलवार लटकी हुई है.’ उधर, राजस्थान में भी राजस्थान पत्रिका अपने सैकड़ों कर्मचारियों का तबादला दूर-दूर कर रहा है. ये सभी मालिक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में खड़े हैं. लगभग यही हालात दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर और तमाम बड़े-छोटे हिंदी और भाषाई अखबारों की है.

अखबारों में शोषण की परंपरा

संस्थानों में पत्रकारों का शोषण आज की देन नहीं है. यह काफी समय से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है. मजीठिया आयोग की सिफारिशों के बाद ये शोषण और बढ़ा है. यह आयोग पत्रकारों के लिए एक उम्मीद लेकर आया. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पत्रकारों को यकीन का था कि मीडिया घराने कम से कम देश की न्यायपालिका को तो ठेंगा नहीं दिखाएंगे. मीडिया मालिकों ने मई 2015 में सिफारिशों के अनुसार वेतन तो नहीं दिया बल्कि उनका शोषण और बढ़ा दिया. उनसे अधिक काम लिया जाने लगा ताकि वे मजीठिया के बारे में सोच भी न पाए और उन्हें हमेशा अपनी नौकरी बचाने की ही चिंता रहे.

हायर की नई कंपनियां

राजस्थान में काम करने वाले पत्रकार अभिमन्यु सागर (बदला हुआ नाम) बताते हैं, ‘जर्नलिस्ट एक्ट के अनुसार प्रिंट मीडिया में पत्रकारों के लिए दिन की नौकरी छह घंटे की और रात में साढ़े पांच घंटे की निर्धारित है. लेकिन अखबार में पत्रकारों से दस से 12 घंटे तक काम लिया जाता है और उन्हें ओवरटाइम भी नहीं दिया जाता है. डीए देना बंद कर दिया गया. सैलरी स्लिप नहीं दी जाती है यहां तक कि पेड लीव भी नहीं दी जाती और न ही उनका इनकैश किया जाता है. मजीठिया वेतन आयोग आने के पहले से ही अखबार मालिकों ने एक नई कंपनी हायर कर ली है और अधिकतर कर्मचारियों को उसमें शिफ्ट कर दिया गया, ताकि वे जिंदगी में कभी भी मजीठिया वेतन की मांग नहीं कर सके. अब लोगों को कॉन्ट्रेक्ट पर ही रखा जा रहा है.’

राज्य सरकारों को दिया निर्देश

मजीठिया वेज बोर्ड में 28 अप्रैल 2015 को कंटेम्प्ट पिटीशंस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों से मजीठिया वेज बोर्ड लागू होने की जानकारी वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 17 बी के तहत मांगी है. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को तीन माह का वक्त दिया था, जो वक्त पूरा हो गया है. कोर्ट ने विशेष लेबर इंस्पेक्टर नियुक्त करने को कहा ताकि देश में मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू होने की सही स्थिति की जानकारी मिल सके. अगस्त में इस मामले में सुनवाई होनी है. इस बीच दिल्ली को छोड़ शायद ही किसी राज्य ने मजीठिया बोर्ड के फैसले पर कोई सकारात्मक काम किया है. दिल्ली सरकार ने राज्य के पत्रकारों को मजीठिया आयोग की सिफारिशें दिलाने की घोषणा की है. मीडिया में ये स्थितियां कुछ वैसी ही हैं जैसी 1989 में बनी थीं. तब भी मीडिया कंपनियां बछावत आयोग की सिफारिशें लागू करने में ना-नुकुर कर रही थीं लेकिन तब राजीव गांधी की सरकार ने सख्ती बरतते हुए उन्हें आयोग की सिफारिशें लागू करने के लिए बाध्य किया लेकिन वर्तमान में ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा है.

(लेखक पत्रकार हैं)

सोशल मीडिया: खबरों की लूट और बंटवारा

Awinash Das2एक जमाने में खजाना लूटा जाता था. अस्मत भी लूटी जाती थी. तमाम तरह की लूटों के किस्से सदियों तक तैरते रहते थे. इतिहास को समझना आसान करते थे. लुटेरे इतिहास-कथा के रोचक सूत्रधार थे. आज लुटेरे लुटेरों जैसे नहीं लगते. न्यायप्रिय पदों, कपड़ों, लहजों में वे बिखरे हुए हैं. उनके जुमले सम्मोहन मंत्र की तरह काम कर जाते हैं. तुम हम पर विश्वास करो, हम तुम्हें लूट लेंगे. लूट की यह सनक सत्ता से समाज तक फैल गई है. समाज इन दिनों सबसे अधिक कुछ लूट रहा है, तो वह है खबरें. खबरों की लूट के बाद उनका बंटवारा होता है. आखिर में एक चीथड़ा बचता है. यह चीथड़ा दरअसल लोकतंत्र का होता है.

सरकार और सरकारी बुद्धिजीवियों की एक बड़ी जमात है, जिनका मानना है कि सोशल मीडिया इस लुटेरी सनक का शाहकार है. कई मुल्कों में सोशल मीडिया को नियंत्रित भी कर दिया गया है. हिंदुस्तान में भी धारा 66ए थी, जो अभिव्यक्ति के नागरिक अधिकारों को नियंत्रित करती थी, लेकिन इसी साल मार्च के आखिरी हफ्ते में इसे खत्म कर दिया गया. एक आजाद मुल्क में जबानें भी आजाद होती हैं. यह एक सच है कि दंड विधान की कोई भी धारा सवा सौ करोड़ जबानों को खींचने या काटने में सक्षम नहीं हो सकती.

मामला तब संगीन होता है, जब संवेदनशील खबरों को समाज का एक हिस्सा लूट लेता है और उसे अपने लोभ-लालच के खंडहर में बांटने का काम करता है. कई दंगों में हमने इस लूट की करामात देखी है. ऐसे मामलों में समाज के सामूहिक विवेक को इसका जिम्मेदार बनाने की जगह सरकारें और मुख्यधारा के मीडिया, सोशल मीडिया को निशाना बनाती हैं. जबकि इंटरनेट से पहले भी दंगे होते थे, चरित्र हनन होता था.

भारत में सोशल मीडिया की गतिविधियों पर नजर रखने की शुरुआत यूपीए सरकार के वक्त हो चुकी थी. कपिल सिब्बल पहले घोषित शत्रु के रूप में सामने आए थे, जब 2011 के आसपास न्यूयॉर्क टाइम्स ने रिपोर्ट जारी की थी कि सिब्बल ने सोशल नेटवर्किंग साइट्स के प्रतिनिधियों के साथ एक गुप्त बैठक की थी, जिसमें उन पर सरकार विरोधी कंटेंट को हटाने का दबाव डाला गया था. बाद में सिब्बल ने अपने बयान में कहा भी था कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर नकेल कसने की जरूरत है. गूगल ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट 2011 के मुताबिक भारत सरकार ने अपने 68 शिकायती पत्रों के जरिए 358 आइटम्स को हटाने की गुजारिश की थी, जिनमें गूगल ने आधी शिकायतों पर ही कार्रवाई की. सरकार ने 1739 एकाउंट्स की निजी जानकारी गूगल से मांगी, जिनमें से 70 प्रतिशत की जानकारी दे दी गई. यह पूरी प्रक्रिया गैरकानूनी है और सरकार के अधिकारों का दुरुपयोग है – लेकिन सरकार ने ऐसा किया. इससे साफ है कि सरकार चाहे तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स की जबान बंद करने में सक्षम है लेकिन अपने इन अधिकारों का उपयोग करने के पीछे सरकार की मंशा कभी सकारात्मक नहीं रही. सरकार अपनी तरह से अभिव्यक्ति के तमाम माध्यमों पर अपनी पकड़ चाहती है. यूपीए सरकार ने अपनी आलोचना की धार कुंद करने के लिए सोशल मीडिया की निगरानी की बात की, वहीं मोदी सरकार ने अपनी छवि चमकाने के लिए और विरोधियों की लानत-मलानत करने के लिए इसका इस्तेमाल किया.

रूपर्ट मर्डोक का बड़ा मशहूर बयान है, ‘वस्तु नहीं, वस्तु की छवि बेचो.’ 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की छवि को चमकाने के लिए भाजपा ने अपना आईटी सेल खोला और उसमें हजारों नवयुवकों की भर्ती की. उनका काम था सच को अपने चश्मे से देखना और उसका श्रृंगार करके वर्चुअल वर्ल्ड में उतारना. इसमें दुनिया के किसी भी हिस्से के सच को भारतीय परिस्थितियों की फोटोशॉप्ड चादर में लपेटकर भ्रम फैलाना शामिल था. यह योजना इतनी असरकारी साबित हुई कि मोदी ईश्वर का अवतार लगने लगे और अंतत: प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गए. बहुसंख्यक हिंदुओं को भरमाकर सत्ता में आई सरकार को लग गया कि अफवाहों में यकीन करने वाला जनमानस उसका सबसे बड़ा सेफगार्ड है. यह सबसे खतरनाक समय है, जब एक ऐसा हथियार, जिसने जनता को लोकतांत्रिक आत्मसम्मान दिया, उसका इस्तेमाल जनता को ही बरगलाने के काम में लिया जा रहा है.

सरकारें ही नहीं, कॉरपोरेट कंपनियां भी सोशल मीडिया का बेजा इस्तेमाल करती हैं. दो साल पहले कोबरा पोस्ट ने खुलासा किया था कि कैसे कंपनियां अपने ग्राहकों के बीच अधिक लोकप्रिय दिखने के लिए फर्जी तौर-तरीके अपनाती हैं. बाबा नागार्जुन की एक कविता इस मौके के लिए बड़ा मौजूं है. कविता तो बड़ी है, पर यहां आखिरी चार पंक्तियां देखिए: ‘अंदर टंगे पड़े हैं गांधी तिलक जवाहरलाल, चिकना तन चिकना पहनावा चिकने चिकने गाल; चिकनी किस्मत चिकना पेशा मार रहा है माल, नया तरीका अपनाया है राधे ने इस साल.’

सोशल मीडिया चूंकि अब सरकार और मुनाफाखोर कंपनियों का भी खिलौना बन चुका है, इसलिए ये बहस बेमानी है कि जनसमूह इसका दुरुपयोग कर रहा है और इससे अराजकता फैल रही है. दरअसल आविष्कार या विज्ञान को फैलने से कोई रोक नहीं सकता. जो हो चुका है, वह होता रहेगा. सिनेमा जब आया था, तो गांधी ने लिखा था कि यह विज्ञान समाज के लिए ठीक नहीं है. गोविंद निहलानी ने अपने एक लेख में इसका जिक्र किया है. गांधी का एक बड़ा सामाजिक आधार था, इसके बावजूद सिनेमा ने अपनी जगह बनाई. आज अच्छा सिनेमा, बुरा सिनेमा की चर्चा जरूर होती है लेकिन सिनेमा की तकनीक को लेकर कोई बहस नहीं है. पोस्टकार्ड और अंतर्देशीय पत्रों से आत्मीय पीढ़ियों ने मोबाइल संदेशों के खिलाफ एक बड़ा माहौल बनाया. लेकिन आज पुराने संवाद माध्यम अप्रासंगिक हो चले हैं. तकनीक के प्रयोग को लेकर बहस हो सकती है लेकिन तकनीक को लेकर बहस बेमानी है.

दो उदाहरण हैं. एक पाकिस्तान का और एक अपने देश का. 2011 में पाकिस्तान में कुछ दिनों के लिए फेसबुक पर पाबंदी लगी थी. एक पेज क्रिएट किया गया था, जिस पर पैगंबर मोहम्मद के आपत्तिजनक कार्टून बनाने की प्रतियोगिता चल रही थी. मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप के चलते पाकिस्तान के एक न्यायालय ने फेसबुक पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगा दिया. न्यायालय ने पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय को निर्देश भी दिया कि वह ईशनिंदा में बनाए गए कार्टून के मामले को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठाए. बाद में जिस फेसबुक यूजर ने ‘एवरीवन ड्रॉ मोहम्मद डे’ प्रतियोगिता आयोजित की थी, उसने वह पृष्ठ हटा लिया. इस अभियान से जुड़ा ब्लॉग भी उसने डिलीट कर दिया.

दूसरा उदाहरण गोवा का है. एक नवयुवक, जिसके दिल में देश में तेजी से फैल रहे भ्रष्टाचार के जंगल को लेकर एक वाजिब गुस्सा उबल रहा था, उसने ट्रैफिक पुलिस वालों की अवैध वसूली के खिलाफ मोर्चा लेने की ठानी. वह अपना कैमरा लेकर रोज एक चौराहे पर जाता और वाहन चालकों से अवैध वसूली की तस्वीरें उतारता और फेसबुक पर मौजूद इंडिया अगेंस्ट करप्शन के पेज पर उसे पोस्ट कर देता. एक बार उसे पुलिस वालों ने देख लिया और उसे इतनी बुरी तरह पीटा कि उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ा लेकिन उस हालत में भी अपने दोस्त की मदद से उसने फेसबुक के जरिए भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना जारी रखा. गोवा प्रशासन के पास पूरे देश से इतने फोन गए कि घटना की सुबह होते-होते दोषी पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया.

इन दोनों ही उदाहरणों के जरिए समझना आसान है कि तकनीक के उपयोग का सबका अपना-अपना हिसाब है. ऐसे मान लें कि अंतर्जाल एक बड़ी परती जमीन है, उसके अलग-अलग हिस्सों पर एक आदमी गंदगी फैला रहा है, एक आदमी पौधे लगा रहा है, एक आदमी तालाब बना रहा है और एक आदमी पत्थर हटा रहा है. अब फिर अपने मूल सवाल पर लौटते हैं. दरअसल खबरें तटस्थ होती हैं, व्यक्ति तटस्थ नहीं होता. आधिकारिक मीडिया एजेंसी से जब खबरें व्यक्ति के पास आती हैं, तो व्यक्ति उसे अपने तरीके से हासिल करता है और अपने नजरिए के छौंक के साथ उसे आगे बढ़ाता है. यह हमेशा से होता रहा है. सोशल मीडिया ने इस होने को और आसान बना दिया है. लेकिन यह सिर्फ एक सामाजिक व्यक्ति का मामला नहीं है, यह सिस्टम और उसकी नीतियों का भी मामला है कि किसी घटना या खबर पर फैलने वाले भ्रम को किस तरह से साफ करे.

आज फेसबुक और ट्वीटर पर सबसे अधिक लोगों की आवाजाही है. पूरी दुनिया में फेसबुक के 1.44 बिलियन यूजर्स हैं और ट्वीटर के 302 मिलियन यूजर्स. अकेले भारत में 22.2 मिलियन लोग ट्वीटर पर सक्रिय हैं और फेसबुक इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या 112 मिलियन है. इसमें तेजी से इजाफा हो रहा है. अभिव्यक्ति का पानी पूरे वेग से बह रहा है. अगर आप एक नदी का मुंह बंद करेंगे, तो दूसरी धारा बन जाएगी. इसलिए जरूरी है कि शिक्षा और सलाहियत जैसे मुद्दों पर समाज को विवेकवान बनाने की बात करें. अभिव्यक्ति की इन खुली हुई खिड़कियों को कनखियों से और संदेह से भरकर देखने की जरूरत नहीं है.

(लेखक ब्लॉगर और वरिष्ठ पत्रकार हैं)

दूरदर्शन: एक स्वप्न भंग की दास्तां

Anand Pradhan2निजी चैनलों के सार्वजनिक हित और उससे जुड़ी प्राथमिकताओं को नजरंदाज़ करने और मनोरंजन के नाम पर सस्ते-फूहड़-फिल्मी मनोरंजन को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति भी किसी से छुपी नहीं है. वे लोगों के वास्तविक मुद्दों के बजाय छिछले, सनसनीखेज और हल्के मुद्दों को बड़ा बनाकर उछालने में लगे रहते हैं. यह भी कि निजी चैनल अधिक से अधिक दर्शक यानी टीआरपी जुटाने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं क्योंकि टीआरपी से ही उनकी विज्ञापन आय और मुनाफा जुड़े हुए हैं. निजी चैनलों की यह और ऐसी ही अनेकों आलोचनाएं हैं जो बिलकुल वाज़िब हैं. इस बात के लिए इन चैनलों की खूब लानत-मलामत भी होती है.

लेकिन सवाल यह है कि जनता के पैसे से चलने वाले दूरदर्शन, लोकसभा और राज्यसभा चैनलों का क्या हाल है? इन्हें लोक प्रसारक यानी जनता का प्रसारण माना जाता है. उनसे उम्मीद की जाती है कि सार्वजनिक धन से चलने वाले ये लोक प्रसारक खासकर दूरदर्शन और आकाशवाणी निजी चैनलों के सस्ते मनोरंजन और सतही/सनसनीखेज सूचनाओं का लोगों को विकल्प पेश करेंगे. लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि प्रसार भारती (दूरदर्शन और आकाशवाणी) जिसका सालाना बजट लगभग 2800 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है, उनके कामकाज और प्रदर्शन पर बहुत कम चर्चा होती है.

यह सवाल जायज है कि जनता की गाढ़ी कमाई के 1850 करोड़ रुपये सालाना खर्च करने वाले दूरदर्शन का हाल क्या है? बिजनेस अखबार ‘इकनामिक टाइम्स’ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल बजट में वृद्धि के बावजूद दूरदर्शन के चैनल दर्शकों की पसंद में काफी पीछे हैं. हाल में गठित ब्रॉडकास्ट ऑडियेंस रिसर्च काउंसिल (बीएआरसी-बार्क) की टेलीविजन रेटिंग के अनुसार, 15 मनोरंजन चैनलों की सूची में दूरदर्शन 13वें स्थान, 13 खेल चैनलों में डीडी-स्पोर्ट्स 10वें स्थान, 14 न्यूज चैनलों में डीडी-न्यूज 8वें स्थान और 11 सांस्कृतिक चैनलों में डीडी-भारती 10वें स्थान पर हैं. यहां तक कि हाल में शुरू हुआ किसान चैनल अपनी श्रेणी के 11 चैनलों में 9वें स्थान पर है. यही हाल दूरदर्शन के भाषाई-क्षेत्रीय चैनलों का भी है जो अपनी-अपनी श्रेणियों में लोकप्रियता के मामले में बहुत पीछे हैं.

यह ठीक है कि लोक प्रसारणकर्ता की गुणवत्ता को टीआरपी की ‘लोकप्रियता’ के मानदंडों पर नहीं मापा जाना चाहिए. लेकिन सवाल यह है कि क्या दूरदर्शन एक लोक प्रसारणकर्ता के बतौर गुणवत्ता के उन मानदंडों पर खरा उतरता है जो एक लोक प्रसारक से अपेक्षा की जाती है? असल में, एक स्वायत्त प्रसार भारती के तहत दूरदर्शन और आकाशवाणी से यह अपेक्षा थी कि वे व्यावसायिक दबावों से दूर और देश के सभी वर्गों-समुदायों-समूहों की सूचना, शिक्षा और मनोरंजन संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए काम करेंगे. वे भारत जैसे विकासशील देश और समाज की बुनियादी जरूरतों को ध्यान में रखेंगे और एक ऐसे लोक प्रसारक के रूप में काम करेंगे जिसमें देश और भारतीय समाज की विविधता और बहुलता अपने श्रेष्ठतम सृजनात्मक रूप में दिखाई देगी.

उनके साथ यह उम्मीद भी जुड़ी हुई थी कि वह वास्तव में ‘लोगों का, लोगों के लिए और लोगों के द्वारा’ चलनेवाला ऐसा प्रसारक होगा जो सामाजिक लाभ के लिए काम करेगा. लेकिन प्रसार भारती के पिछले 19 सालों के अनुभव एक स्वप्न भंग की त्रासद दास्तां हैं. हालांकि प्रसार भारती का दावा है कि वह भारत का लोक प्रसारक है और इस कारण ‘देश की आवाज’ है. लेकिन सच यह है कि वह ‘देश की आवाज’ बनने में नाकाम रहा है. कानूनी तौर पर स्वायत्तता मिलने के बावजूद वह व्यावहारिक तौर पर अब भी एक सरकारी विभाग की ही तरह काम कर रहा है जहां नीति निर्माण से लेकर दैनिक प्रबंधन और संचालन में नौकरशाही हावी है. इस कारण उसकी साख में कोई खास सुधार नहीं हुआ है बल्कि दिन पर दिन उसमें गिरावट ही आई है.

हैरानी की बात नहीं है कि सरकार चाहे जिस भी पार्टी, रंग, झंडे और गठबंधन की रही हो लेकिन दूरदर्शन और आकाशवाणी की स्थिति कार्यक्रमों की गुणवत्ता, सृजनात्मकता और स्वायत्तता के मामले में स्थिति लगातार बदतर ही हुई है. हालांकि यह भी सच है कि इन डेढ़ दशकों में प्रसार भारती का संरचनागत विस्तार हुआ है. दूरदर्शन के चैनल लगभग सभी प्रमुख भाषाओं और राज्यों में उपलब्ध हैं, खेल-कला/संस्कृति और समाचार के लिए अलग से चैनल हैं और एफएम प्रसारण के जरिये आकाशवाणी ने भी श्रोताओं के बीच कुछ हद तक वापसी की है. यह भी सच है कि निजी चैनलों की अति व्यावसायिक, महानगर केंद्रित और मुंबईया सिनेमा के फॉर्मूलों पर आधारित मनोरंजन कार्यक्रमों, सनसनीखेज और समाचारों के नामपर तमाशा करने में माहिर निजी समाचार चैनलों से उब रहे बहुतेरे दर्शकों को दूरदर्शन के चैनल ज्यादा बेहतर नजर आने लगे हैं.

लेकिन प्रसार भारती के सामने खुद को एक बेहतर और आदर्श ‘लोक प्रसारक’ और वास्तविक अर्थों में ‘देश की आवाज’ बनाने की जितनी बड़ी चुनौती है, उसके मुकाबले इस क्रमिक सुधार से बहुत उम्मीद नहीं जगती है. यही नहीं, प्रसार भारती में हाल के सुधारों की दिशा उसे निजीकरण और व्यवसायीकरण की ओर ले जाती दिख रही है. प्रसार भारती पर अपने संसाधन जुटाने का दबाव बढ़ता जा रहा है और इसके कारण विज्ञापन आय पर बढ़ती निर्भरता उसे निजी चैनलों के साथ अंधी प्रतियोगिता में उतरने और उनकी सस्ती अनुकृति बनने के लिए मजबूर कर रही है. हालांकि दूरदर्शन के व्यवसायीकरण की यह प्रक्रिया 80 के दशक में ही शुरू हो गई थी लेकिन नब्बे के दशक में निजी प्रसारकों के आने के बाद इसे और गति मिली.

इस कारण आज दूरदर्शन और निजी चैनलों में कोई बुनियादी फर्क कर पाना मुश्किल है. कहने की जरूरत नहीं है कि व्यावसायिकता और लोक प्रसारण साथ नहीं चल सकते हैं. दुनिया भर में लोक प्रसारण सेवाओं के अनुभवों से साफ है कि लोक प्रसारण के उच्चतर मानदंडों पर खरा उतरने के लिए उसका संकीर्ण व्यावसायिक दबावों से मुक्त होना अनिवार्य है. इसकी वजह यह है कि प्रसारण का व्यावसायिक मॉडल मुख्यतः विज्ञापनों पर निर्भर है और विज्ञापनदाता की दिलचस्पी नागरिक में नहीं, उपभोक्ता में है. उस उपभोक्ता में जिसके पास क्रय शक्ति है और जो उत्पादों/सेवाओं पर खर्च करने के लिए इच्छुक भी है. इस कारण वह ऐसे दर्शक और श्रोता खोजता है जिन्हें आसानी से उपभोक्ता में बदला जा सके. इसके लिए वह ऐसे कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करता है जो इसके उद्देश्यों के अनुकूल हों.

एक मायने में, कॉरपोरेट जन माध्यम अपने पाठकों और दर्शकों को एक सक्रिय नागरिक के बजाय निष्क्रिय उपभोक्ता भर मानकर चलते हैं और उनके साथ उसी तरह का व्यवहार करते हैं. इस कारण लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत विचारों की विविधता और बहुलता के लिए कॉरपोरेट जन माध्यमों में जगह दिन पर दिन सिकुड़ती जा रही है. दूसरी ओर, जन माध्यमों के कंटेंट में भी आम लोगों और उनके सरोकारों, जरूरतों और इच्छाओं के लिए जगह कम होती जा रही है. लेकिन कॉरपोरेट जन माध्यमों के इस बुनियादी चरित्र और उद्देश्य को लेकर लंबे अरसे से सवाल उठते रहे हैं और चिंता जाहिर की जाती रही है.

इसी पृष्ठभूमि में जनहित को सर्वोपरि मानने वाले और लोगों के जानने और स्वस्थ मनोरंजन के अधिकार के लिए समर्पित लोक सेवा प्रसारण को मजबूत करने और आगे बढ़ाने की मांग होती रही है. इसकी वजह यह है कि इस मुद्दे पर अधिकांश मीडिया अध्येता और विश्लेषक एकमत हैं कि निजी पूंजी के स्वामित्व वाले जन माध्यमों की सीमाएं स्पष्ट हैं क्योंकि वे व्यावसायिक उपक्रम हैं, मुनाफे के लिए विज्ञापनदाताओं और निवेशकों के दबाव में कंटेंट के साथ समझौता करना उनके स्वामित्व के ढांचे में अंतर्निहित है और वे व्यापक जनहित और लोकतांत्रिक मूल्यों की उपेक्षा करते रहेंगे.

लेकिन इसके उलट अगर लोक सेवा प्रसारण को लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरना है तो उसमें कार्यक्रमों के निर्माण से लेकर उसके प्रबंधन में आम लोगों और बुद्धिजीवियों/कलाकारों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है. लेकिन पिछले कुछ दशकों में व्यावसायिक प्रसारण माध्यमों के बढ़ते वर्चस्व के बीच इस विचार को हाशिए पर ढकेल दिया गया था. यह मान लिया गया था कि व्यावसायिक प्रसारण के विस्तार और बढ़ोत्तरी में लोक सेवा की जरूरतें भी पूरी हो जाएंगी. यही कारण है कि देश में लोक प्रसारण सेवा की स्थिति संतोषजनक नहीं है. हालत यह हो गई है कि लोक प्रसारण के नाम पर राज्य और सरकार के नियंत्रण और निर्देशों पर चलने वाले दूरदर्शन और आकाशवाणी को न तो पर्याप्त संसाधन मुहैया कराए जाते हैं, न उन्हें सृजनात्मक आजादी हासिल है और न ही वे जनहित में प्रसारण कर रहे हैं.

इस आलोचना में काफी दम है कि वे सरकार के भोंपू में बदल दिए गए हैं और दूसरी ओर, उन्हें निजी प्रसारकों के साथ व्यावसायिक प्रतियोगिता में ढकेल दिया गया है. इस कारण लोगों में एक ओर उनकी साख बहुत कम है और दूसरी ओर, निजी प्रसारकों के साथ व्यावसायिक प्रतियोगिता में उनका इस हद तक व्यवसायीकरण हो गया है कि उनमें लोक प्रसारण सेवा की कोई विशेषता नहीं दिखाई देती है. इस प्रक्रिया में वे न तो लोक प्रसारण सेवा की कसौटियों पर खरे उतर पा रहे हैं और न ही पूरी तरह व्यावसायिक प्रसारक की तरह काम कर पा रहे हैं. यह कहना गलत नहीं होगा कि सत्तारूढ़ दल और नौकरशाही के साथ-साथ व्यावसायिक शिकंजे में उनका दम घुट रहा है.

सच यह है कि भारत में लोक सेवा प्रसारण के विचार के प्रति एक व्यापक सहमति, ध्वनि तरंगों (प्रसारण) को स्वतंत्र करने के बाबत सुप्रीम कोर्ट के फैसले और संसद में प्रसार भारती कानून के पास होने के बावजूद प्रसार भारती वास्तविक अर्थों में एक सक्रिय, सचेत और स्वतंत्र-स्वायत्त लोक प्रसारक की भूमिका नहीं निभा पा रहा है. हालांकि 70 और 80 के दशकों की तुलना में प्रसार भारती यानी दूरदर्शन और आकाशवाणी में बीच के दौर में सीमित सा खुलापन आया लेकिन इसके बावजूद उसकी लोक छवि एक ऐसे प्रसारक की बनी हुई है कि जो सरकार के नियंत्रण और निर्देशों पर चलता है और जहां नौकरशाही के दबदबे के कारण सृजनात्मकता के लिए बहुत कम गुंजाइश बची है.

हैरानी की बात यह भी है कि सार्वजनिक धन और संसाधनों से चलने वाली प्रसार भारती की मौजूदा स्थिति और उसके कामकाज पर देश में कोई खास चर्चा और बहस नहीं दिखाई देती है. उसके कामकाज पर न तो संसद में कोई व्यापक चर्चा होती है और न ही सार्वजनिक और अकादमिक मंचों पर कोई बड़ी बहस सुनाई देती है. यहां तक कि खुद प्रसार भारती के अंदर उसके कर्मचारियों और अधिकारियों में अपनी स्वतंत्रता और स्वायत्तता को लेकर कोई सक्रियता और उत्साह नहीं दिखाई पड़ता है.

इसके उलट कर्मचारी संगठनों ने प्रसार भारती को भंग करके खुद को सरकारी कर्मचारी घोषित करने की मांग की है. इसके पीछे वजह सरकारी नौकरी का स्थायित्व, पेंशन, आवास सुविधा आदि हैं. लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि प्रसार भारती के कर्मचारियों में मौजूदा ढांचे और कामकाज को लेकर कितनी निराशा, उदासी और दिशाहीनता है. यहां तक कि प्रसार भारती कानून के मुताबिक न तो उसके बोर्ड का गठन हुआ और न ही उस कानून को ईमानदारी से लागू किया गया.

आज प्रसार भारती कानून को अमल में आए कोई 19 साल हो गए. इस बीच, उसकी दशा-दिशा तय करने के लिए अलग-अलग सरकारों ने कोई पांच समितियों का गठन किया. इनमें वर्ष 1996 में बनी नीतिश सेनगुप्ता समिति, वर्ष 1999-2000 में बनी नारायण मूर्ति समिति, वर्ष 2000 में बनी बक्शी समिति के अलावा यूपीए सरकार के कार्यकाल में गठित सैम पित्रोदा समिति का गठन किया गया लेकिन कहना मुश्किल है कि इन समितियों की रिपोर्टों पर किस हद तक अमल हुआ?

नतीजा, सबके सामने हैं. कहां तो प्रसार भारती को बीबीसी की तरह स्वायत्त, स्वतंत्र और लोकप्रिय बनाने का वायदा था और कहां दूरदर्शन निजी चैनलों की बदतर अनुकृति भर बनकर रह गया है. यह वैसे ही है जैसे बानर से नर बनने की प्रक्रिया में एक हिस्सा चिम्पांजी बनकर रह गया, वैसे ही दूरदर्शन, दूरदर्शन से बीबीसी बनने की प्रक्रिया में बदतर दूरदर्शन बनकर रह गया है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और मीडिया अध्यापन से जुड़े हैं)