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मणिपुर में इनर लाइन परमिट विवाद

ILP - WEBइनर लाइन परमिट (आईएलपी) को लेकर हंगामा क्यों?

मणिपुर में इनर लाइन परमिट को लेकर पिछले दो महीने से चला आ रहा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है. राज्य में बाहरी लोगों की आबादी के लगातार बढ़ने से स्थानीय आबादी असुरक्षित महसूस कर रही है. अब हालात ऐसे हो गए हैं कि इनकी आबादी राज्य की बहुसंख्यक आबादी मेइतेई के आसपास पहुंच चुकी है. मणिपुर में मेइतेई की आबादी सबसे ज्यादा 7.51 लाख के करीब है जबकि बाहरी लोगों की आबादी की जनसंख्या 7.04 लाख पहुंच चुकी है. इस आबादी को नियंत्रित करने के लिए इनर लाइन परमिट (आईएलपी) का प्रस्ताव 13 जुलाई 2012 को विधानसभा में लाया गया था. मुख्यमंत्री ने इस बारे में केंद्र सरकार को अगस्त 2012 में लिखा था लेकिन तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री ने यह कहते हुए इस मांग को ठुकरा दिया था कि आईएलपी को मणिपुर में लागू नहीं किया जा सकता.

क्या है आईएलपी?

इनर लाइन परमिट एक विशेष पास है, जो अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और मिजोरम में प्रवेश करने के लिए भारतीय नागरिकों के लिए जरूरी होता है. आईएलपी बंगाल ईस्टर्न फ्रंटियर विनियम, 1873 के अंतर्गत जारी किया जाता है. ब्रिटिश शासन में ही इसे लागू किया गया था. आईएलपी एक निश्चित समय का यात्रा दस्तावेज है, जो भारत सरकार की ओर से देश के कुछ संरक्षित राज्यों में आने-जाने के लिए नागरिकाें को जारी किया जाता है. इसके जरिये सरकार अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे राज्यों में बाहरी लोगों की आवाजाही नियमित करती है. मणिपुर में भी इसे लागू किया गया था, लेकिन 1950 में इसे खत्म कर दिया गया. अब राज्य में बाहरियों की बढ़ती आबादी के चलते वहां के लोग इसे फिर से लागू करने के लिए आंदोलनरत हैं.

क्या है वर्तमान हालात?

31 अगस्त को दक्षिण मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में एक बार फिर हिंसा भड़्क उठी. इस शहर में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के अलावा पांच विधायकों के घर जला दिए गए. लोग मणिपुर विधानसभा में आईएलपी से जुड़े तीन विधेयकों के पास होने से आक्रोशित हैं. इससे पहले एक प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में एक छात्र की मौत के बाद राज्य के कुछ इलाकों में हिंसा भड़क उठी थी. आईएलपी को लागू करवाने की मांग पर मणिपुर में एक गैर-सरकारी संगठन ‘फ्रैंड्स’ सहित कुछ महिला व छात्र संगठन लामबंद हो चुके हैं. राज्य में प्रदर्शन और भूख हड़ताल का दौर जारी है. हजारों की संख्या में स्कूली छात्र-छात्राएं भी इन प्रदर्शनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं.

गीताप्रेस में महाभारत

IMG-20150531-WA0027हिंदू धर्म पर आधारित पुस्तकें प्रकाशित करने वाले विश्वप्रसिद्ध संस्थान गीताप्रेस में कर्मचारियों और प्रबंधन में चल रही खींचतान ने एक बार फिर बवाल और हंगामे का रूप ले लिया है. हालांकि इस बार बवाल की तीव्रता इतनी ज्यादा थी कि इस प्रकाशन संस्था के बंद होने की अफवाह उड़ गई, जिसने मीडिया में खूब सुर्खियां बटोरीं. सोशल मीडिया में गीताप्रेस को बचाने की मुहिम चल पड़ी. इतना ही नहीं अब तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गोरखपुर के सांसद आदित्यनाथ और विधायक राधामोहन दास अग्रवाल से गीताप्रेस को बचाने की अपील होने लगी है.

जिओ (राजाज्ञा) के अनुसार न्यूनतम वेतनमान लागू करने, वेतन विसंगति, भत्ता और इंक्रीमेंट देने की मांग को लेकर कर्मचारियों के आंदोलन ने पिछले साल तीन दिसंबर को तूल पकड़ा था. अपनी मांगों को लेकर बीते साल कर्मचारियों ने गोरखपुर के दूसरे मजदूर संगठनों के साथ जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन किया था. उस वक्त जिलाधिकारी ने आश्वासन देकर कर्मचारियों को शांत करा दिया था. हालांकि बाद में इस प्रदर्शन के कारण कुछ कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया था, जिसे बाद में बातचीत के आधार पर वापस ले लिया गया. उपश्रमायुक्त के यहां मामले की कई बार सुनवाई भी हो चुकी है मगर फिलहाल कोई ठोस हल नहीं निकल पाया है. अब तक सिर्फ प्रबंधन आश्वासन देकर ही काम चला रहा है.

कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच का यह विवाद कई साल पुराना है. मांगों के प्रति प्रबंधन के लचर रवैये ने बीते सात अगस्त को इस विवाद को फिर से ताजा कर दिया. समझौते के तहत प्रबंधन द्वारा इस साल जुलाई से तीन स्तर के कर्मचारियों- अकुशल, अर्द्धकुशल व कुशल को क्रमश: 600, 750 व 900 रुपये की वेतन वृद्धि दी जानी थी.  कर्मचारी पिछले सभी विवाद समाप्त कर दें और पांच वर्ष तक कोई नई मांग न रखें, इस शर्त पर प्रबंधन ने वेतन वृद्धि लागू करने की सहमति जताई थी. इस शर्त के बाद कर्मचारियों ने सात अगस्त को सहायक प्रबंधक मेघ सिंह चौहान को धक्के देकर गेट से बाहर कर दिया. अगले दिन यानी आठ अगस्त को सहायक प्रबंधक से हाथापाई और मारपीट के आरोप में 17 कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया. इनमें 12 स्थायी और पांच अस्थायी कर्मचारी हैं. इसके बाद से ही कर्मचारी हड़ताल शुरू कर दी और गीताप्रेस में प्रकाशन का काम ठप पड़ा है. गीताप्रेस में कुल 525 कर्मचारी हैं, जिनमें 200 स्थायी हैं जबकि 325 ठेके पर काम करते हैं.

गीताप्रेस के कर्मचारी रवींद्र सिंह बताते हैं, ‘सहायक प्रबंधक से मारपीट नहीं की गई थी, सिर्फ धक्का-मुक्की हुई थी, क्योंकि सात अगस्त तक वेतन नहीं आया था, जबकि चार से पांच तारीख तक वेतन अकाउंट में आ जाता है. प्रबंधन की ओर से कहा जा रहा था कि कर्मचारी सारी पुरानी मांगों को रद्द कर एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर दें, जिसके बाद वेतन वृद्धि लागू कर दी जाएगी. इसी बात पर कर्मचारी आक्रोशित हो गए और सहायक प्रबंधक के साथ धक्का-मुक्की हो गई, जिसके बाद कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया.’

इस विवाद के बाद से गीताप्रेस के सभी कर्मचारियों ने काम ठप कर दिया है, जिसकी वजह से धार्मिक पुस्तकों के प्रकाशन का काम पूरी तरह से रुक गया है. कर्मचारियों का कहना है कि जब तक निलंबन वापस नहीं लिया जाता कर्मचारी काम पर नहीं लौटेंगे.  उधर, गीताप्रेस के बंद होने की अफवाहों के बीच प्रबंधन ने एक विज्ञप्ति जारी कर इसका खंडन किया है. विज्ञप्ति में प्रबंधन ने कहा है, ‘कुछ मीडिया संस्थान गीताप्रेस के खिलाफ भ्रामक प्रचार कर रहे हैं. गीताप्रेस बंद नहीं हुआ है, केवल कर्मचारियों की हड़ताल की वजह से काम बंद हुआ है. संस्थान न तो बंद होने की स्थिति में है और न ही इसे बंद होने दिया जाएगा. किसी तरह की कोई आर्थिक समस्या भी नहीं है. कर्मचारियों की अनुशासनहीनता के कारण प्रबंध तंत्र पिछले एक साल से परेशान है. पिछले दिनों हद पार करते हुए कर्मचारियों ने सहायक प्रबंधक से मारपीट की, जिसके बाद कुछ कर्मचारियों को निलंबित किया गया है.’ विज्ञप्ति में यह भी स्पष्ट किया गया है कि गीताप्रेस किसी तरह का कोई चंदा नहीं लेता है. साथ ही लोगों से अपील की है कि वे गीताप्रेस के नाम पर किसी को चंदा न दें.

सन 1923 में अपनी स्थापना के बाद से गीताप्रेस में 55 करोड़ से ज्यादा पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है. यहां से 11 भाषाओं में श्रीमद्भगवतगीता का प्रकाशन होता है. गीताप्रेस के 92 साल के इतिहास में कर्मचारी आंदोलन की यह पहली घटना है. बहरहाल ये मामला एक बार फिर उपश्रमायुक्त के दरबार में है. यहां कर्मचारियों और प्रबंध तंत्र के बीच जल्द ही बातचीत होने वाली है. इसका क्या नतीजा होगा यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इस विवाद ने उन पाठकों को सबसे ज्यादा मायूस किया है जो यहां की धार्मिक पुस्तकों के मुरीद हैं.

क्राउड फंडिंग : काम का नया फंडा

Crowd Funding‘चंदा’ या कहें ‘क्राउड फंडिंग’ अब कोई नया शब्द नहीं रह गया है. देश में इसकी परंपरा काफी पुरानी है. हिंदू धर्म में सत्संग, दुर्गा पूजा जैसे कार्यक्रमों के सफल आयोजन का आधार चंदा ही रहा है. इसके अलावा दूसरे धर्मों में भी चंदा मांगकर सार्वजनिक कार्य पूरे किए जाते हैं. गांवों में अब भी शादी से लेकर अंतिम संस्कार तक आपसी मदद से ही हो रहे हैं. गांवों में किसी आयोजन को लेकर लिए जाने वाले ‘चंदे’ का चलन शहरों में ‘क्राउड फंडिंग’ के रूप में तेजी से बढ़ रहा है. पुल बनवाना, मोहल्ले की सफाई कराना, सड़क बनवाना या फिर फिल्म बनाने का काम हो, क्राउंड फंडिंग का इस्तेमाल अब आम हो गया है. अपनी अर्थपूर्ण फिल्मों के लिए मशहूर श्याम बेनेगल से लेकर दूसरे कई फिल्मकार भी चंदे के पैसों से फिल्में बना चुके हैं और कुछ बना रहे हैं.

क्राउड फंडिंग का ताजा उदाहरण हरियाणा के सिरसा जिले के एक गांव में देखने को मिला. गांववाले क्राउड फंडिंग के जरिए 1 करोड़ रुपये इकट्ठा कर एक पुल का निर्माण करा रहे हैं. घग्गर नदी पर बन रहा यह पुल 250 फुट लंबा और 14 फुट चौड़ा है. यह पुल अकीला और पनिहारी गांवों को जोड़ेगा, जिससे सिरसा की दूरी 30 किलोमीटर तक घट जाएगी. गांव के बाशिंदे इस पुल के उद्घाटन किसी नेता से नहीं करवाना चाहते क्योंकि क्षेत्र के नेताओं ने पुल के निर्माण के नाम पर दो दशक से उन्हें सिर्फ बेवकूफ बनाया है.

क्राउड फंडिंग एक परंपरा है जिसके तहत किसी परियोजना या व्यवसाय के लिए लोग एक साथ मिलकर आर्थिक सहयोग करते हैं. आम तौर पर इसका प्रयोग वो लोग करते हैं जिनके पास पैसों की कमी होती है. आज के दौर में इंटरनेट के माध्यम से सबसे ज्यादा क्राउड फंडिंग हो रही है. 2008 में अमेरिका में आई आर्थिक मंदी के दौरान वहां के लोगों ने जोर-शोर से क्राउड फंडिंग का इस्तेमाल शुरू किया. फिल्म निर्माता, संगीतकार से लेकर निवेशकों तक ने अपनी परियोजनाओं के लिए इंटरनेट के जरिए लोगों से पैसा जमा किया. दुनिया की सबसे बड़ी क्राउड फंडिंग कंपनी ‘किकस्टार्टर’ कमोबेश हर क्षेत्र जैसे फिल्म, पत्रकारिता, संगीत, कॉमिक, वीडियो गेम से लेकर विज्ञान और तकनीक के लिए क्राउड फंडिंग करती है. किकस्टार्टर ने वर्ष 2014 तक 224 देशों के 58 लाख लोगों से तकरीबन तक दस अरब रुपये जुटाए हैं. इसका इस्तेमाल दो लाख लोगों ने विभिन्न योजनाओं के लिए किया. आज के समय में क्राउड फंडिंग एक ऐसा मंच माना जा रहा है, जिसके जरिए उन होनहार कलाकारों को अपनी कला की नुमाइश करने का भी मौका मिलता है, जो पैसों की कमी के कारण कुछ कर पाने से रह जाते हैं. भारत में भी ऐसे कई उदाहरण हैं जहां लोगों ने क्राउड फंडिंग के जरिए फिल्म बनाने से लेकर कई दूसरे सार्वजनिक काम सफलतापूर्वक किए हैं.

हालांकि सरकार की ओर से इसे अभी उतनी तवज्जाे नहीं मिल रही जितनी की ये हकदार है. भाजपा सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र के बजट में पिछले साल के मुकाबले 20 फीसदी की कटौती की है. अब स्वास्थ्य का बजट 352 अरब से घटाकर 297 अरब रुपये कर दिया गया है. भारत में स्वास्थ्य की स्थिति पहले से ही चिंताजनक है. निजी अस्पतालों में इलाज कराना काफी महंगा है. निचले तबकों के लिए तो यह और भी मुश्किल हैै. ऐसे में बेंगलुरु के रघुराम कोटे ने क्राउड फंडिंग के लिए ‘राइट टू लिव’ नाम की एक संस्था की शुरुआत की. यह संस्था अब तक कई लोगों की जान बचाने में सफल रही है, जो पैसों के कमी की वजह से इलाज कराने में अक्षम थे. स्वास्थ्य के क्षेत्र में ‘राइट टू लिव’ भारत का पहला क्राउड फंडिंग संस्थान है. अभी तक इस संस्था ने क्राउड फंडिंग के जरिए तकरीबन दो करोड़ रुपये जुटाए हैं. इन पैसों से 51 लोगों की गंभीर बीमारियों जैसे, कैंसर, कार्डियक सर्जरी, किडनी ट्रांसप्लांट, बोन मैरो ट्रांसप्लांट से लेकर ओपन हार्ट सर्जरी जैसे इलाज करवाए गए हैं. यह संस्था अपनी वेबसाइट पर लोगों की बीमारियों के साथ उनका नाम और आर्थिक स्थिति प्रदर्शित करता है, ताकि लोग उनकी मदद कर सकें.

राइट टू लिव के निदेशक रघुराम कोटे के मुताबिक, ‘कोई भी इंसान जिसके पास इलाज के पैसे नहीं हैं, वह हमारे संस्थान से संपर्क कर सकता है. हम पहले उसकी आर्थिक स्थिति की जांच करते हैं फिर उसकी सारी जानकारी अपनी वेबसाइट पर डालते हैं. इलाज कराने में लगने वाले पैसे और समय की जानकारी भी वेबसाइट पर डाली जाती है. राइट टू लिव की खास बात यह है कि लोगों के दिए गए पैसे शत-प्रतिशत मरीजों के इलाज में खर्च किए जाते हैं. मरीजों के हाथ में पैसा नहीं दिया जाता है हम सीधे इलाज करवाते हैं.’

बकौल कोटे, ‘सरकार हमारे तमाम मसले नहीं सुलझा सकती और अगर बेंगलुरु जैसे शहर की बात करें तो यहां के मध्य और उच्च वर्ग के लोग स्वास्थ्य क्षेत्र में दान करना चाहते हैं. यहां के लोग एक-दूसरे की मदद भी करना चाहते हैं. यही वजह है कि हम गरीबों का इलाज कराने के लिए क्राउड फंडिंग कर पाने में सक्षम हैं. यहां के लाखों लोग महीने में 250 रुपये भी दान करें तो इससे ज्यादा से ज्यादा मरीजों का इलाज कराया जा सकता है.

पत्रकारिता में क्राउड फंडिंग

अमेरिकी संस्था ‘बीकन’ क्राउड फंडिंग के जरिये पत्रकारों की मदद करती है. पत्रकार वहां विषयवार स्टोरी आइडिया भेजते हैं. बीकन के सदस्य उनमें से अच्छे आइडिया का चयन कर उसे क्राउड फंडिंग के लिए वेबसाइट पर डालते हैं. लोग अपनी पसंद के अनुसार स्टोरी के लिए क्राउड फंडिंग करते हैं. इस तरह पत्रकारों को भी अपनी स्टोरी करने में इस माध्यम से मदद मिल जाती है.

ब्रिटेन में ‘जर्नलिस्ट ऑफ द ईयर’ खिताब से दो बार नवाजे गए खोजी पत्रकार जॉन पिल्गर क्राउड फंडिंग के जरिए ‘द कमिंग वॉर’ नाम की डॉक्युमेंट्री फिल्म बना रहे हैं. उन्होंने इस फिल्म के निर्माण के लिए इंडिगो गो क्राउड फंडिंग वेबसाइट का सहारा लिया. क्राउड फंडिंग से पिल्गर इससे पहले भी तीन फिल्में बना चुके हैं. अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘ग्लोबल इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म’ खोजी पत्रकारों के लिए क्राउड फंडिंग करवाती है. यह पत्रकारों को प्रशिक्षण देने से लेकर खोजी पत्रकारिता से जुड़े तमाम संसाधन भी मुहैया कराती है. ये संस्था 54 देशों में 118 एनजीओ के साथ मिलकर पत्रकारों के लिए क्राउड फंडिंग करती है.

हालांकि भारत में अभी पत्रकारिता के लिए क्राउड फंडिंग की शुरुआत नहीं हुई है. हां, मगर हमारे यहां भी कुछ समाचार वेबसाइट्स हैं, जो जनता से पैसे लेकर जनहित में खबर चलाने का दावा करती हैं. इनमें से एक ‘न्यूज लॉन्ड्री’ है जो लोगों से जुटाए गए पैसों पर चलने का दावा करती है. बहरहाल ऐसी स्थिति में जब लोग खुद पत्रकारों को क्राउड फंडिंग के जरिए योगदान करेंगे तो पत्रकार निष्पक्ष होकर पत्रकारिता कर सकेंगे.

वैसे इसकी कुछ सीमाएं भी हैं. क्राउड फंडिंग को लेकर अभी कोई साफ दिशा-निर्देश नहीं हैं. भारत में मीडिया हाउस और पत्रकारों पर कॉरपोरेट हाउसों के दबाव में आकर खबर लिखने का आरोप लगता रहता है. ऐसे में क्राउड फंडिंग से कितनी निष्पक्ष पत्रकारिता हो पाएगी, यह बड़ा सवाल है. बीकन के संस्थापक डैन फ्लेचर का मानना है, ‘क्राउड फंडिंग के जरिए कोई भी मनचाहे पत्रकार की आर्थिक मदद करना चाहता है तो वह सीधे कर सकता है. हमारी वेबसाइट ऐसी सुविधा मुहैया कराती है जिससे पत्रकारों को निष्पक्ष होकर पत्रकारिता करने की आजादी हो.’

फिल्मों में भी क्राउड फंडिंग

देश में वर्गीज कुरियन के नेतृत्व में आई दुग्ध क्रांति पर 1975 में श्याम बेनेगल ने ‘मंथन’ नाम की फिल्म क्राउड फंडिग के माध्यम से ही बनाई थी. फिल्म बनाने के लिए उन्होंने पांच लाख लोगों से दो-दो रुपये इकट्ठा किए थे. इसके बाद 1987 में बेनेगल ने एक और फिल्म ‘सुस्मन’ क्राउड फंडिंग के माध्यम से बनाई. बुनकरों के जीवन पर आधारित इस फिल्म के निर्माण के लिए उन्होंने बनारस और कर्नाटक के कुछ शहरों में स्थित हैंडलूम केंद्रों से पैसा इकट्ठा किया. इसी तरह फिल्म निर्माता ओनीर ने 2010 में क्राउड फंडिंग के जरिए एक बहुचर्चित फिल्म ‘आई एम’ का निर्माण किया. फिल्म समीक्षकों ने इसकी काफी तारीफ की थी. ओनीर के मुताबिक उनके लिए क्राउड फंडिंग करने वाले तमाम लोग उनकी फिल्म आई एम के सह मालिक हैं. कुछ साल पहले कन्नड़ फिल्मकार पवन कुमार ने बिना स्टार कास्ट और बिना किसी फिल्मी मसाले के फिल्म बनाने की सोची तो उनके लिए निर्माता ढूंढना मुश्किल हो गया. ‘लुसिया’ नाम की इस फिल्म के लिए उन्होंने ब्लॉग के जरिये 50 लाख रुपये जमा करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन उन्हें इस बात पर यकीन नहीं हुआ कि एक महीने के भीतर ही उन्होंने यह लक्ष्य पा लिया. 20 जुलाई 2013 को यह पहली कन्नड़ फिल्म बन गई जिसका प्रीमियर लंदन में हुआ.

इसी तरह से पवन कुमार श्रीवास्तव क्राउड फंडिंग से ‘नया पता’ नाम की फिल्म बना चुके हैं. इसे भी समीक्षकों की खूब सराहना मिली. क्राउड फंडिंग के जरिए अब वो एक नई फिल्म ‘हाशिये के लोग’ का निर्माण करने जा रहे हैं. उनके मुताबिक, ‘भारत में क्राउड फंडिंग को बढ़ावा देना चाहिए. सरकार को भी चाहिए कि वह क्राउड फंडिंग के लिए सुनियोजित तरीके से गाइडलाइन बनाए और बढ़ावा दे ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग चंदा देकर समाज में कला को बढ़ा सकें’.

विज्ञान और तकनीक में क्राउड फंडिंग

विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भी इसकी शुरुआत हो चुकी है. पुणे के कुछ युवाओं ने इसके लिए ‘इग्नाइट इंटेंट’ नाम की वेबसाइट बनाई है. इसके संस्थापक रींकेश शाह ने ‘तहलका’ से बातचीत में बताया कि ‘हमारी वेबसाइट पर विज्ञान और तकनीक से जुड़ी परियोजनाओं के लिए क्राउड फंडिंग की जाती है. मेरा मानना है कि सरकार को भारत में क्राउड फंडिंग के लिए नियम बनाने चाहिए और इसे बढ़ावा देना चाहिए. पहले भारत में ऑफलाइन क्राउड फंडिंग होती थी पर अब समय बदल रहा है लोग ऑनलाइन क्राउड फंडिंग को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं.’ चंदे से हुई शुरुआत भले ही आज के समय में क्राउड फंडिंग के रूप में विकसित हो गई है, लेकिन भारत जैसे देश में बिना जागरूकता इसकी राह अभी बहुत आसान नजर नहीं आ रही है.

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‘भारत सरकार को क्राउड फंडिंग के लिए नीति बनानी चाहिए’

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‘राइट टू लिव’ की वाइस प्रेसिडेंट शेरिल ओबल से बातचीत

भारत में राइट टू लिव के सफर के बारे में बताएं?

राइट टू लिव भारत का पहला क्राउड फंडिंग संस्थान है. 2012 में जब इसकी शुरुआत हुई तब यहां ऐसा कोई संस्थान नहीं था. हम सिर्फ उन लोगों के लिए पैसे जमा करते हैं, जो गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं. इससे मिली शत-प्रतिशत रकम को इलाज पर खर्च करते हैं. भारत जैसे देश में ऐसे संस्थानों की जरूरत है.

इलाज के लिए जरूरतमंद लोगों की आर्थिक स्थिति के बारे में कैसे जानते हैं?

हम आवेदक के घर जाकर उनकी आर्थिक स्थिति और आय प्रमाण पत्र की समीक्षा करते हैं. उनकी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी अस्पताल से लेते हैं. उसके बाद उनका इलाज शुरू करवाते हैं.

सरकार से कोई मदद मिलती है ?

हमें सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती है मगर हम इलाज के लिए सरकारी मदद मरीजों को दिलाते हैं. जरूरतमंद लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े कागजात बनवाते हैं ताकि उन्हें सरकार से भी मदद मिल सके.

क्या सरकार से कोई योजना चाहती हैं ?

सरकार को क्राउड फंडिंग के लिए योजना बनानी चाहिए. सरकार ने जीवन बीमा व दुर्घटना बीमा योजना शुरू की पर स्वास्थ्य बीमा जैसी कोई सुविधा नहीं दी. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वास्थ्य क्षेत्र में जीडीपी का 5 प्रतिशत खर्च करने की सिफारिश की है, लेकिन भारत में सिर्फ एक प्रतिशत ही खर्च किया जाता है.

किस तरह की मुश्किलों का सामना होता है?

क्राउड फंडिंग में मुश्किलें आती हैं. लोग जिन्हें व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते उनके लिए दान करना नहीं चाहते हैं. इस स्थिति में लोगों को दान कराने के लिए राजी करना चुनौती भरा होता है.

क्राउड फंडिंग को किस रूप में देखती हैं?

क्राउड फंडिंग भारत में काफी सफल होगा. यहां अमीर-गरीब के बीच गहरी खाई है. यह उसे पाटने में अहम भूमिका निभा सकता है. इसके जरिए अमीर मिलकर गरीबों की मदद कर सकते हैं. इससे उन लोगों की की जिंदगी में बदलाव आएगा, जो पैसों की कमी की वजह से इलाज से महरूम रह जाते हैं. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तकनीक के मामले में भारत की दुनिया में अलग पहचान है. भारत के सुनहरे भविष्य के लिए क्राउड फंडिंग अहम भूमिका निभा सकती है.

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‘देश में क्राउड फंडिंग को सिर्फ गरीबों की मदद करना समझा जाता है…’

क्राउड फंडिंग से बनी फिल्म ‘आई एम’ के निर्माता ओनीर ने कई ऑफबीट फिल्में बनाई हैं. ‘माई ब्रदर निखिल’, ‘बस एक पल’, ‘सॉरी भाई’ जैसी फिल्में बनाने वाले ओनीर से बातचीत

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फिल्म के लिए क्राउड फंडिंग कैसे की?

जब मैं ‘आई एम’ बना रहा था तो भारत में क्राउड फंडिंग की कोई वेबसाइट नहीं थी. मैंने सोशल मीडिया साइट्स के जरिए फिल्म के लिए पैसे जुटाए. सिर्फ फेसबुक, ट्विटर और ईमेल का इस्तेमाल किया. लगभग 400 लोगों ने इस फिल्म को बनाने में आर्थिक मदद की. जिन लोगों ने इसे बनाने में सहयोग किया है वो सभी इस फिल्म के सह मालिक हैं.

क्राउड फंडिंग की राह में किस तरह की मुश्किलें आईं?

भारत में लोग दान का मतलब सिर्फ गरीबों और लाचारों की मदद करना समझते हैं. दूसरे देशों में ऐसा नहीं है वहां लोग कला और मनोरंजन के लिए भी क्राउड फंडिंग करते हैं. जब सवाल लोगों से पैसा लेकर फिल्म बनाने का हो तो भारत में इसकी राह बहुत आसान नहीं है. ‘आई एम’ के लिए क्राउड फंडिंग जरूरत बन गई थी. फिल्म में अलग-अलग कहानियां हैं, पैसों की कमी की वजह से हमें सभी कहानियों को एक फिल्म में समेटना पड़ा. भारत में आप डॉक्युमेंट्री बनाने के लिए क्राउड फंडिंग करने की सोच भी सकते हैं. अगर फिल्म के लिए क्राउड फंडिंग करेंगे तो लोग उतनी मदद नहीं करते. भारत में लोग कला फिल्मों को उतनी तवज्जो नहीं देते हैं जितना दूसरे देशों में देते हैं.

क्या क्राउड फंडिंग स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं के लिए उपयोगी है ?

भारत में धीरे-धीरे बहुत से फिल्म निर्माता क्राउड फंडिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं. क्राउड फंडिंग का इस्तेमाल तब किया जा सकता है जब आप कोई फीचर फिल्म न बना रहे हों, किसी और काम के लिए पैसे जुटाना भारत में आसान है.

क्या आगे भी क्राउड फंडिंग से फिल्म बनाएंगे ?

नहीं, मेरा मकसद सिर्फ फिल्म बनाना है इसलिए ‘आई एम’ के बाद मैंने क्राउड फंडिंग से फिल्म बनानी बंद कर दी. जैसा कि मैंने पहले भी कहा भारत में क्राउड फंडिंग से फिल्म बनाना मुश्किल भरा काम है.

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‘अगर लोग मदद के लिए आगे नहीं आएंगे तो सामाजिक फिल्में बननी बंद हो जाएंगी’

पवन कुमार श्रीवास्तव ने 2012 में क्राउंड फंडिंग के जरिए ‘नया पता’ नाम की फिल्म बनाई थी. अब एक बार फिर इसी विधा के इस्तेमाल से वह ‘हाशिये के लोग’ नाम की फिल्म बना रहे हैं

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क्राउड फंडिंग से फिल्म बनाने के बारे में कैसे सोचा?

जब मैंने ‘नया पता’ फिल्म बनाने की सोची तब मुझे क्राउड फंडिंग की कोई जानकारी नहीं थी. मैं फिल्म को लेकर मुंबई के निर्माताओं से मिला पर सभी ने पैसे लगाने से इनकार कर दिया. तभी मैंने क्राउड फंडिंग से बनी ओनीर की फिल्म ‘आई एम’ देखी. मैंने तब सोच लिया कि अगर ओनीर क्राउड फंडिंग से फिल्म बना सकते हैं तो मैं क्यों नहीं. मैंने भाई से 50 हजार रुपये लेकर फिल्म पर शोध करना शुरू किया. एक महीने तक क्राउड फंडिंग के बारे में जानकारी इकट्ठा की. फिर मैंने फिल्म से जुड़े कुछ फोटो और सारांश ईमेल से कुछ लोगों को भेजे. सोशल मीडिया पर भी फिल्म की जानकारी साझा की. पहले मेरे दोस्तों और रिश्तेदारों ने मुझे 500 से 3000 रुपये तक चंदे के रूप में देना शुरू किया. फिर दूसरे लोगों ने मदद की.

क्राउड फंडिंग क्यों आैैर इससे क्या मिलेगा?

हम जहां रहते हैं वहां एक-दूसरे की मदद के बिना समाज नहीं चल सकता. अगर लोग इस तरह की मदद के लिए आगे नहीं आएंगे तो पैसों की कमी के चलते सामाजिक फिल्में बननी कम हो जाएंगी और सिर्फ बाजार आधारित फिल्में ही बना करेंगी. क्राउड फंडिंग से फिल्म बनाने पर जिम्मेदारी बढ़ जाती है. हम हर कदम उनके बारे में सोचकर उठाते हैं, जिन्होंने हमें मदद की है. वो हम पर नजर रखते हैं. अगर हम किसी निर्माता के पैसों से फिल्म बनाते हैं तो हमें लोगों की चिंता शायद ही होती.

लोगों से पैसे जुटाने में क्या मुश्किलें आईं?

भारत में क्राउड फंडिंग से कम ही लोग वाकिफ हैं. हमारे समाज में अगर फिल्म बनाने के लिए पैसे मांगो तो लोग पहले समझते है कि यह पैसा लेकर भाग जाएगा या बेवकूफ बना रहा है. वैसा ही मेरे साथ हुआ, लोगों को समझाना मुश्किल था. इसलिए मैंने रिश्तेदारों और दोस्तों से मिले पैसों से फिल्म की शूटिंग शुरू की. फिल्म मैंने कई चरणों में बनाई ताकि इसका कुछ हिस्सा लोगों को दिखा कर क्राउड फंडिंग की जा सके. धीरे-धीरे लोग मदद को आगे आए और फिल्म का निर्माण पूरा हुआ.

आपने फिल्म को सिर्फ पीवीआर में रिलीज किया. ऐसे में वो तबका इससे महरूम रह गया जिसके लिए आपने यह फिल्म बनाई?

आपने मेरा इंटरव्यू क्यों लेना चाहा? इसलिए क्योंकि आपको ‘नया पता’ फिल्म की जानकारी है. अगर मेरी फिल्म रिलीज ही नहीं होती तो इसके बारे में किसी को पता भी न चलता. ऐसे तमाम स्वतंत्र फिल्म निर्माता हैं जो सरोकारी फिल्में तो बनाते हैं पर उसे रिलीज नहीं करा पाते. मेरा मानना है कि फिल्म का प्रदर्शन महत्वपूर्ण है. मेरे पास पैसे की कमी थी और ‘पीवीआर डायरेक्टर्स कट’ स्वतंत्र फिल्म निर्देशकों की फिल्म बगैर पैसे के रिलीज करता है इसलिए मैंने इसे पीवीआर में रिलीज कराया. सिंगल स्क्रीन और मल्टीप्लेक्स में फिल्म रिलीज कराने के लिए पैसों की जरूरत होती है. मैं अकेला इस फिल्म को उन लोगों तक नहीं पहुंचा सकता जिनके लिए इसे बनाया है. विदेशों में कई संस्थान हैं जो ऐसी फिल्मों को बिना पैसा लिए प्रदर्शित करते हैं. ऐसी व्यवस्था भारत में भी लागू होनी चाहिए.

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इस फिल्म को बनाने में किसी क्राउड फंडिंग वेबसाइट या संस्था का सहारा लिया?

2012 में भारत में क्राउड फंडिंग कराने वाली वेबसाइट नाममात्र की ही थी. मैंने तब ऐसा कुछ सोचा भी नहीं था. मेरी फिल्म लगभग बन चुकी थी तो ‘विशबेरी’ क्राउड फंडिंग वेबसाइट ने मदद देने की बात कही पर मैंने इनकार कर दिया. अब ‘हाशिये के लोग’ फिल्म का निर्माण क्राउड फंडिंग वेबसाइट के जरिये कर रहा हूं. लोगों ने इसके लिए क्राउड फंडिंग शुरू कर दी है. मैं किसी बड़े अभिनेता को फिल्म में नहीं रख सकता इसलिए मैं अलग-अलग शहरों में फिल्म संस्थानों की मदद से पात्रों के लिए ऑडिशन करूंगा.

भारत में क्राउड फंडिंग का भविष्य क्या है?

इन दिनों भारत में भी क्राउड फंडिंग पकड़ बना रहा है. क्राउड फंडिंग के लिए नई वेबसाइट और संस्थान खुल रहे हैं. अगले कुछ वर्षों में ऐसे फिल्म निर्देशकों को भी मौका मिलने लगेगा जिनकी सामाजिक फिल्में पैसों की कमी की वजह से खटाई में पड़ जाती है.

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चलो चलें, धनियाझोर की ओर…

108_2924-webबाल मृत्य दर के मामले पर खूब बहस चल रही है. गांव और आदिवासी संकट में बताए जाते हैं. इसी बहस के बीच हम (मौजूदा मानकों के हिसाब से अविकसित) वनग्राम धनियाझोर पहुंच गए. यहां 11 जुलाई 2009 को जगोतीन  और सुकलाल के बेटे महेंद्र की असमय मौत हो गई थी. इसके बाद ठीक छह साल गुजर रहे हैं. पांच साल से कम उम्र के किसी बच्चे की मृत्यु नहीं हुई है. साल 1941 में जन्मे प्रताप सिंह मरकाम ने बड़ी जबरदस्त बात कही, ‘बिना कुछ साथ लिए जंगल में जाकर आप कई दिन रह लो, भूख से नहीं मरोगे. शहद मिल जाएगा, जड़ें मिल जाएंगी, फल और भाजियां भी मिलती हैं. शहर में यदि आपके पास खीसे (जेब) में पैसा न हो, तो इंसान जिंदा ही नहीं रह सकता.’

गांव का आधुनिक मतलब है एक पिछड़ी और आनंद से विहीन इकाई. इस इकाई का तोड़ा जाना विकास के लिए जरूरी है. आदिवासी का मतलब माना जाने लगा है गरीब, पिछड़े, अनुत्पादक और विकास न करने देने वाले लोग, जो बहुत सारी जमीन पर कब्जा किए हुए हैं.

थोड़ा सोचा तो हमें लगा कि चलो, बिना कुछ कहे, बिना कोई मानक ज्ञान लिए गांव को देखते हैं और आदिवासियों की बात सुनते हैं. जो वह कहें, उसे सुनना. मन में कोई धारणा न बनाना और यह मानकर न जाना कि यह अपने समाज का कमजोर या पिछड़ा हिस्सा है. बहुत कुछ कह और बताकर हमने बहुत कुछ बिगाड़ लिया है. जितना बताया गया, उतना समझा, देखा और महसूस नहीं किया गया. एक अपराध बोध के चलते अब लगता है कि सुनकर समझने और फिर कुछ मानने से ही प्रायश्चित हो सकेगा. इसी भाव के चलते हमने सोचा कि बस सुनेंगे और जानेंगे. और हम बालाघाट जिले में एक गांव में पहुंच गए. धनियाझोर नाम का यह गांव राजधानी भोपाल से 515 किलोमीटर की दूरी पर है. इस गांव को सपनों के गांव की तरह मैं नहीं देखता. बस एक छोटी से सूचना वहां खींचकर ले गई. सूचना थी कि यह गांव अपनी जरूरत का अनाज पैदा करता है. खेती में रसायनों और मशीनों का उपयोग नहीं करता है.

बालाघाट जिले का धनियाझोर गांव जून 1974 में कान्हा राष्ट्रीय अभयारण्य की स्थापना के दौरान बिना किसी पुनर्वास के मुक्की क्षेत्र से विस्थापित किया गया था. तब सौधर, घुरीला, बिशनपुरा और ओरयीं गांव के 417 परिवार ऐसे हटाए गए कि वे अपने घर से रसोई के बर्तन, पहनने के कपड़े और अनाज भी उठा न पाए. सब तितर-बितर कर दिए गए थे. वन विभाग का तत्कालीन आदेश तो कहता था कि कान्हा अभयारण्य से प्रभावित होने वाले परिवारों का पुनर्वास करते हुए उन्हें उस जगह तक भेजा जाएगा, जहां उन्हें घर और जमीन मिल रही है. उन्हें नकद सहायता भी दी जाएगी, पर ऐसा हुआ नहीं. तब बेघर किए गए कुछ परिवारों ने बालाघाट के बैहर विकासखंड के जंगलों में आकर जमीन के एक छोटे से टुकड़े पर बसना शुरू किया. 41 साल बाद उस बसाहट ने धनियाझोर गांव का रूप ले लिया है. आज के 46 गोंड आदिवासी परिवारों के इस गांव के लोग खेती के उत्पादन और सामाजिक जीवन में कुछ उसूलों के साथ जिंदगी बिता रहे हैं.

आज के दौर में जब इस बात का जोर है कि कृषि का उत्पादन बढ़ाने और फसलों को बीमारी से बचाने के लिए रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों का इस्तेमाल किया ही जाना चाहिए, तब धनियाझोर के इन 46 परिवारों में से कोई भी व्यक्ति अपनी जमीन और फसल के लिए रसायनों का इस्तेमाल नहीं करता है. गांव के मुखिया 74 वर्षीय प्रताप सिंह टेकाम कहते हैं, ‘ऐसा नहीं है कि हमें रासायनिक खाद या कीटनाशकों के बारे में पता नहीं है. गांव में सरकारी लोग भी आते हैं और कंपनी के लोग भी. वे हमें बताते रहे हैं कि इन्हें डालोगे तो उत्पादन बढ़ जाएगा. कीड़े नहीं लगेंगे. और खूब आय होगी. तब हमने आपस में बात की कि जितना धरती दे सकती है, उतना ही तो देगी. यदि हम इन रसायनों का उपयोग करेंगे तो इसका मतलब है कि हम मिट्टी की ताकत और क्षमता से ज्यादा उलीचेंगे. यह तो गलत है. आज मिट्टी की ताकत खींच लेंगे, तो कल क्या बचेगा? कल का भी तो सोचना है?’

तिहारू सिंह टेकाम कहते हैं, ‘हाट बाजार जाओ या फिर जिले में, हर जगह यह कहा जाता है कि यदि उत्पादन बढ़ाना है तो दवाइयां और फला कंपनी की खाद डालनी पड़ेगी. जब हम यह पूछते हैं कि अगर हम खाद डालेंगे तो कब तक डालना पड़ेगा! इसका जवाब आता है कि इसे तो हर बार और बार-बार डालना पड़ेगा. इसका मतलब है कि मिट्टी और धरती को कोई बीमारी तो है नहीं कि एक बार दवाई डाली और वह ठीक हो गई. यह तो जमीन को निचोड़ने का तरीका है. हमने अपने समाज के बुजुर्गों से बात की, जो अच्छी खेती करने वाले लोग हैं. तब यही पता चला कि एक बार खाद डालने के बाद न केवल इसे बार-बार डालना पड़ेगा, बल्कि हर बार एक किलो की बजाय डेढ़ किलो और फिर दो किलो रसायन डालना पड़ेगा. तब समझ में आया कि यह तो जाल जैसा है.’

प्रताप सिंह टेकाम कहते हैं, ‘जमीन की ताकत पत्तियों, गोबर और पानी से है. कोई भी खाद मिट्टी को खराब करेगी. उसकी स्वाभाविक गुणवत्ता को बचाकर रखना सबसे जरूरी है. अगर वह खत्म हो गई तो वह कई सौ सालों तक ठीक नहीं होगी. वह बीमार हो जाएगी. अभी एक एकड़ में 10 कुंतल धान होता है. इसे बढ़ाना क्यों? जितना होता है, उससे कुछ अपनी जरूरत पूरी हो जाती है और कुछ बाजार में बेच आते है. गांव में अगर किसी को दुख होता है या कमी होती है, तो जरूरत के हिसाब से उसे अनाज दे दिया जाता है. जब किसी को ज्यादा अनाज की जरूरत होती है, जैसे शादी के लिए, तो जितना अनाज लोग सहयोग में देते हैं, उससे थोड़ा ज्यादा वह वापस कर देता है.’

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धन्नो सिंह मरकाम के मुताबिक, ‘नए बीज के साथ रसायनों का उपयोग जरूरी होता जा रहा है. अब तक हम केवल वही बीज उपयोग में लाते हैं, जिनसे नया बीज बन सके और जो बिना रसायन के पैदा हो जाए. अब तो अपना बीज बचाना भी कठिन होता जा रहा है क्योंकि इस तरह की खेती के लिए सरकारी मदद नहीं मिलती है.’

बहरहाल, अब भी इस गांव के लोग छह तरह के धान, कोदो, कुटकी, सरसों, मक्का सरीखे अनाज, उरद, मसूर, चना, जैसी दालें उगाते हैं. उनका उत्पादन उनकी जरूरत को पूरा कर देता है. बिना रसायनों के वे भिंडी, लौकी जैसी 10 सब्जियां भी पैदा करते हैं. आठ तरह की भाजी जंगल से ही मिल जाती है. लगभग एक किलोमीटर की दायरे में फैले धनियाझोर गांव में और इसके आस-पास आम के 90 पेड़, पपीते के 70 पेड़, कटहल और इमली के 20 पेड़. लगे हुए हैं. सरसों का तेल उनके उपयोग में अहम है.

इस आदिवासी समाज में जिस तरह लोगों के रहने के लिए घर बने हैं, उसी तरह के घर पशुधन के लिए भी हैं. कोई भेदभाव नहीं. वे अच्छे से जानते हैं कि बिना पशुधन के इस तरह की खेती असंभव है. यही कारण है कि इस गांव के सभी घरों में 5 से लेकर 20 जानवर हैं. जो इन परिवारों को केवल दूध नहीं देते, बल्कि मक्खन भी देते हैं. वे मानते हैं कि जानवर के दूध पर सबसे पहला हक उसके बच्चे का होता है. जब तक पूरा दूध न पी ले, तब तक जानवर का दूध नहीं निकला जाता है. समाज स्वच्छता के अपने मानक बनाता है. हर घर साफ और मिट्टी-गोबर से लिपा हुआ है. अगर स्वच्छता का मतलब केवल शौचालय बनाना नहीं हो तो, इस गांव के घरों और लोगों से ज्यादा कुछ स्वच्छ नहीं है. महुआ से बना मादक पेय आदिवासी समुदाय की पहचान और चरित्र माना जाता रहा है. वे कहते हैं कि महुआ केवल पेय बनाने के काम नहीं आता है. यह भोजन भी रहा है और इसकी गुल्ली से तेल भी बनता है.

जंगल उनके जीवन का केंद्र रहा है, परंतु अब यह उनसे छीना जा रहा है. उन्हें पास के जंगल में प्रवेश की अनुमति नहीं है. प्रताप सिंह कहते हैं, ‘यदि कोई जानवर गांव के किसी व्यक्ति को मार देता है, तो कोई पूछने नहीं आता. साही और जंगली सूअर पूरी फसल उजाड़ देते हैं, तब भी कोई पूछने नहीं आता लेकिन अगर कोई हिरन अपनी मौत भी मर जाए, तो चार गाड़ियां आकार खड़ी हो जाती है. उन्हें लगता है कि हमने जानवर को मारा है.’ जंगल की तरफ देखते हुए वे कहते हैं, ‘इससे हमें अचार (चिरौंजी), मशरूम, कांदे, भाजी, आंवला, इमली और कई बीमारियों की दवाइयां मिलती थीं. अब हम खाली हाथ हैं. बारिश में कड़वा कांदा, गिर्ची कांदा और कनिहा कांदे मिलते हैं. अब मुश्किल होती है क्योंकि जंगल में जा नहीं सकते.  बहुत कुछ बचा होने के बाद भी कुछ चुनौतियां सामने बनी रहती हैं. अब केवल अनाज पैदा कर लेने से जिंदगी नहीं चलती है. अब तो नकद चाहिए क्योंकि इलाज गांव में संभव नहीं. बाहर जाना पड़ता है और फीस देनी पड़ती है, दवाइयां खरीदनी पड़ती हैं. पिछले पांच-छह सालों में जब नकद की जरूरत बढ़ी, तो गांव से बाहर जाना ही पड़ा. अब कुछ लोग पैसा कमाने शहर जाते हैं और वापस भी आ जाते हैं. किसी ने गांव अब तक तो नहीं छोड़ा है. कब तक नहीं छोड़ेंगे, यह कह नहीं सकते.’

गांव की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता प्रभा धुर्वे कहती हैं, ‘अब गांव के लोग अपने उत्पादों को बाजार में बेचना चाहते हैं. खूब आम-पपीते होते हैं, खुद नहीं खाते हैं और बाजार में बेचते हैं. गांव की जड़ें बहुत मजबूत हैं, इसीलिए इस गांव में वर्ष 2004-05 के बाद पांच साल से कम उम्र के एक भी बच्चे की मृत्यु नहीं हुई है. गांव की आंगनबाड़ी में दर्ज 33 बच्चों में से दो बच्चियों का वजन कम था. इनमें से राजकुमारी को वर्ष 2012 में पोषण पुनर्वास केंद्र भेजा गया था. वहां उसका इलाज हुआ, जबकि रेखा को गांव में ही अंडा, आलू और घर का खाना सही तरीके से खिलाकर कुपोषण से मुक्त करवा लिया. बहरहाल जन्म लेते ही दो बच्चों की मृत्यु जरूर हुई है. वे कहती हैं कि अब महिलाओं को मूसली खाने को नहीं मिलती है, यह महिलाओं को स्वस्थ बनाती थी.’ वह कहती हैं, ‘धनियाझोर में बच्चों का टीकाकरण होता है. लोग कभी विरोध नहीं करते. बीमारी होने पर अब सबसे पहले इलाज अस्पताल या डाक्टर से करवाते हैं. यह व्यवहार तो ठीक ही बदला है, लेकिन गांव में और जंगल से मिलने वाले खाने को बचाना भी जरूरी है.’

मौसम पर भी गांव के लोगों की नजर बनी हुई है. जिस तरह से मौसम का चक्र और व्यवहार बदला है, वह संकट का संकेत है. प्रताप सिंह बताते हैं कि पहले जब बारिश शुरू होती थी, तब शुरुआती दिनों में खूब पानी गिर जाता था. वह बारिश अच्छे मौसम की बारिश होती थी. फिर थोड़े दिन रुककर बारिश होती थी. अब शुरुआत या तो बहुत तेज बारिश से होती है या बहुत कम बारिश से. दो दिन में ही इतना पानी गिर जाता है कि जमीन तो बहुत गीली हो जाती है, पर धार तेज होने के कारण पानी बह जाता है. इस तरह की बारिश कांदे और पुत्ती (मशरूम) के लिए अच्छी नहीं होती है. हमारी खेती भी ढलान की जमीनों पर है, जिससे थोड़ा पानी ज्यादा दिनों के लिए चाहिए होता है.

आजीविका की कमी से बढ़ रहा तनाव

पिछले 15 सालों में हिरमा बाई की ही मातृ मृत्यु हुई है, लेकिन अब यहां स्थिति बदल रही है. जंगल न जा पाने, आजीविका के अवसरों की कमी और बाजार के लिए नकद धन की बढ़ती जरूरत महिलाओं समेत सबको तनाव और डर दे रही है. अपनी जरूरत को सीमित रखकर गांव वाले जीना चाहते हैं, मगर वक्त उन्हें ऐसा करने नहीं दे रहा है. इस जंगल में 118 वन कम्पार्टमेंट हैं. धनियाझोर के लोगों ने इसमें हिस्सेदारी मांगी है क्योंकि उनका मानना है कि वे जंगल का केवल उपयोग नहीं करते हैं, बल्कि हमेशा से इसे बचाते भी आए हैं. वे सरकार से कहते भी हैं, ‘जब जंगल में आग लगी है तो उसे कौन बुझाता है- हम बुझाते हैं, हमारे गांव का हर बच्चा आग बुझाने जाता है. लेकिन वन अधिकार कानून तो केवल शमशान, गोठान, नाले, सड़क के ही हक देता है. पिछले 20-30 सालों में थोड़ी-बहुत भुखमरी आने का केवल यही कारण है.’ भोपाल और दिल्ली जा कर आ चुके प्रताप सिंह दो वाक्यों में इनसे अपने गांव की तुलना करते हैं, ‘इन शहरों में हमने केवल दो गोड़ (पैर) वाले जानवर देखे, हमारे यहां तो असंख्य हैं. शहर कभी साफ हवा और साफ पानी पैदा नहीं कर सकता, हमारा गांव करता है. मैंने कभी जूते नहीं पहने, शहर जाकर पहने क्योंकि वो लोग मुझ पर हंसते थे, पर हम उन पर नहीं हंसते. गांव हमें अनाज दे सकता है, सब्जी दे सकता है, जंगल हवा देता है, पानी देता है, हरियाली देता है, जानवरों को घर देता है. शहर क्या देता है? बहुत कुछ देता है, पर जो शहर देता है, क्या उसके बिना जीवन संभव नहीं है? शायद है… मगर जो गांव और जंगल देते हैं, क्या उसके बिना जीवन संभव है, यह सोचने वाली बात है.’

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विवाह की लमसना परंपरा

समाज एक संरक्षक की भूमिका में भी रहता ही है. ‘लमसना’ परंपरा के तहत जिया लाल की बेटी फगनी बाई का बैजलपुर के नैन सिंह के साथ विवाह हुआ. धनियाझोर के गोंड समुदाय के जिस आदिवासी परिवार में केवल लड़की होती है, वहां दूसरे परिवार या दूसरे गांव के परिवार के लड़के को सदस्य के रूप में स्थान दिया जाता है. वह लड़का कुछ महीने तक उसी परिवार में रहता है. और यदि परिवार के सदस्य और लड़की उसे ‘लायक’ पाते हैं, तो सहमति होने पर उसका विवाह लड़की से किया जाता है. यदि लड़के को लायक नहीं पाया जाता है, तो वह अपने घर वापस चला जाता है. विवाह के बाद लड़का लड़की के घर पर ही रहता है. इस परंपरा से कहीं कोई टकराव या वैमनस्यता नहीं होता है. फगनी बाई के लिए विवाह का मतलब जबरिया का बंधन नहीं था. फगनी को अगर कभी ये लगे कि उसके जीवन साथी का व्यवहार और शैली मानकों के मुताबिक नहीं है, तो वह सम्मान के साथ अलग भी हो सकती हैं. इसमें उस पर कोई दोषारोपण नहीं होगा. इस तरह की स्त्री के अस्तित्व को सम्मान और समानता का दर्जा देने वाली खुली और जिम्मेदार व्यवस्था क्या आधुनिक समाजों में है? बहरहाल सरकारी पंचायती राज व्यवस्था धनियाझोर गांव को कभी नहीं सुहाई. वे मानते हैं कि इससे हमारे रिश्ते टूटे हैं और अपने की लोगों पर अविश्वास बढ़ा है.

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कभी रवीश कुमार मत बनना

Ravish Kumar-webअपने आप को नौजवानों की आंखों में चमकते देखना किसे नहीं अच्छा लगता होगा. कोई आप से मिलकर इतना हैरान हो जाए कि उसे सबकुछ सपने जैसा लगने लगे तो आप भी मान लेंगे कि मुझे भी अच्छा लगता होगा. कोई सेल्फी खींचा रहा है कोई ऑटोग्राफ ले रहा है. लेकिन जैसे-जैसे मैं इन हैरत भरी निगाहों की हकीकत से वाकिफ होता जा रहा हूं, वैसे-वैसे मेरी खुशी कम होती जा रही है. मैं सुन्न हो जाता हूं. चुपचाप आपके बीच खड़ा रहता हूं और दुल्हन की तरह हर निगाह से देखे जाने की बेबसी को झेलता रहता हूं. एक डर-सा लगता है. चूंकि आप इसे अतिविनम्रता न समझ लें इसलिए एक मिनट के लिए मान लेता हूं कि मुझे बहुत अच्छा लगता है. मेरे लिए यह भी मानना आसान नहीं है लेकिन यह इसलिए जरूरी हो जाता है कि आप फिर मानने लगते हैं कि हर कोई इसी दिन के लिए तो जीता है. उसका नाम हो जाए. अगर सामान्य लोग ऐसा बर्ताव करें तो मुझे खास फर्क नहीं पड़ता. मैं उनकी इनायत समझ कर स्वीकार कर लेता हूं लेकिन पत्रकारिता का कोई छात्र इस हैरत से लबालब होकर मुझसे मिलने आए तो मुझे लगता है कि उनसे साफ-साफ बात करनी चाहिए.

मुझे यह तो अच्छा लगता है कि पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ने वाले तेईस-चौबीस साल के नौजवानों के चेहरे पर अब भी वही आदर्श और जुनून दिखता है. मुझसे मिलने वाले छात्रों में यह ललक देखकर दिल भर जाता है. सचमुच प्यार आता है. अच्छा लगता है कि तमाम निराशाओं के बाद भी आने वाले के पास उम्मीदों की कोई कमी नहीं है. उनके सवालों में यह सवाल जरूर होता है कि आप कितने दबाव में काम करते हैं. सवाल पूछने के लिए दबाव होता है या नहीं. रिपोर्टिंग कैसे बेहतर करें. आपका सारा शो देखते हैं. मेरे घर में सब प्राइम टाइम देखते हैं. मेरी मां तो आपकी फैन है. दीदी के ससुराल में भी सारे लोग देखते हैं. आप फिर कब रवीश की रिपोर्ट करेंगे. सर, क्या हम चुनाव की रिपोर्टिंग में आपके साथ चल सकते हैं. हमने आपकी रिपोर्ट पर प्रोजेक्ट किया है.

दोस्तों, ईमानदारी से कह रहा हूं, आपकी बातें लिखते हुए आंखें भर आईं हैं. पर आपकी बातों से मुझे जो अपने बारे में पता चलता है वो बहुत कम होता है. इस कारण मैं भी आपके बारे में कम जान पाता हूं लेकिन जो पता चलता है उसके कारण लौटकर दुखी हो जाता हूं. मुझे नहीं मालूम कि पत्रकारिता की दुकानों में क्या पढ़ाया जाता है और क्या सपने बेचे जाते हैं क्योंकि मुझे पत्रकारिता के किसी स्कूल में जाने का मन नहीं करता. जब विपरीत स्थिति आएगी तो चला जाऊंगा क्योंकि मेहनताना तो सबको चाहिए लेकिन जब तक अनुकूल परिस्थिति है मेरा जी नहीं करता कि वहां जाकर मैं खुद भी आप जैसे नौजवानों के सपनों का कारण बन जाऊं. इसलिए दोस्तों साफ-साफ कहने की अनुमति दीजिए. आपमें से ज्यादातर को पत्रकारिता की पढ़ाई के नाम पर उल्लू बनाया जा रहा है. मुझे नहीं लगता कि दस-बीस शिक्षकों को छोड़कर हमारे देश में पत्रकारिता पढ़ाने वाले योग्य शिक्षक हैं. हमें समझना चाहिए कि पत्रकारिता की पढ़ाई और शाम को डेस्क पर बैठकर दस पंक्ति की खबर लिख देना एक नहीं है. पत्रकारिता की पढ़ाई का अस्सी फीसदी हिस्सा अकादमिक होना चाहिए. कुछ शिक्षकों ने व्यक्तिगत दिलचस्पी लेकर इस क्षेत्र में अपने आपको बेहतर जरूर किया है लेकिन उन तक कितने छात्रों की पहुंच हैं. इन दो-चार शिक्षकों में से आधे से ज्यादा के पास अच्छी और पक्की नौकरी नहीं है.

जिन लोगों को पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए नौकरी मिली है वो हमारे ही पेशे से गए हुए लोग हैं. जो नौकरी करते हुए डिग्री ले लेते हैं और नेट करने के बाद कहीं लग जाते हैं. इनमें से ज्यादतर वे लोग होते हैं जो पेशे में खराब होते हैं, किसी वजह से चटकर अपने राजनीतिक और जातिगत टाइप के संपर्कों का इस्तेमाल कर लेक्चरर बन जाते हैं. कुछ इस संयोग से भी बन जाते हैं कि संस्थान को कोई दूसरा नहीं मिला. कुछ उम्र के कारण पत्रकारिता में बेजरूरी कर दिए जाते हैं तो अपनी इस डिग्री को झाड़पोंछ कर क्लास में आ जाते हैं. इनमें से कुछ लगन से पढ़ाते हुए अच्छे शिक्षक भी बन जाते हैं लेकिन इस कुछ का प्रतिशत इतना कम है कि उनके आधार पर आपके भविष्य की बात नहीं की जा सकती.

मैं यह जानते हुए कि हमारे पेशे में अनेक खराबियां हैं, कहना चाहता हूं कि ऐसे संस्थानों और शिक्षकों से पढ़कर आप कभी पत्रकार नहीं बन सकते हैं. भारत में पत्रकारिता को ढंग से पढ़ाने और प्रशिक्षण देने के लिए कुछ सेंटर जरूर विकसित हुए हैं लेकिन ज्यादातर इसके नाम पर दुकान ही हैं. जहां किसी कैमरामैन या किसी एंकर को लेक्चर के लिए बुला लिया जाता है और वो अपना निजी अनुभव सुनाकर चला जाता है. मैं कई अच्छे शिक्षकों को जानता हूं जिनके पास नौकरी नहीं है. वे बहुत मन से पढ़ाते हैं और पढ़ाने के लिए खूब पढ़ते हैं. जो शिक्षक अपने जीवन का बंदोबस्त करने के तनावों से गुजर रहा है वो  आपकी उम्मीदों को खाद-पानी कैसे देगा. सोचिए उनकी ये हालत है तो आपकी क्या होगी. इसलिए बहुत सोच-समझकर पत्रकारिता पढ़ने का फैसला कीजिएगा. इंटर्नशिप के नाम पर जो गोरखधंधा चल रहा है वो आप जानते ही होंगे. मुझे ज््यादा नहीं कहना है. सारी बगावत मैं ही क्यों करूं. कुछ समझौते मुझे भी करने दीजिए.

आप छात्रों से बातचीत करते हुए लगता है कि आपको भयंकर किस्म के सुनहरे सपने बेचे गए हैं. यही कि आप पत्रकार बनकर दुनिया बदल देंगे और मोटी फीस इसलिए दीजिए कि मोटे वेतन पर खूब नौकरियां छितराई हुई हैं. नौकरियां तो हैं पर खूब नहीं हैं. वेतन भी अच्छे हैं पर कुछ लोगों के अच्छे होते हैं. आप पता करेंगे कि तमाम संस्थानों से निकले छात्रों में से बहुतों को नौकरी नहीं मिलती है. कुछ एक-दो साल मुफ्त में काम करते हैं और कुछ महीने के पांच दस हजार रुपये पर. दो-चार अच्छे अखबार और चैनल अपवाद हैं. जहां अच्छी सैलरी होती हैं लेकिन वहां भी आप औसत देखेंगे तो पंद्रह-बीस साल लगाकर बहुत नहीं मिलता है. ज्यादातर संस्थानों में पत्रकारों की तनख्वाह धीमी गति के समाचार की तरह बढ़ती है. हो सकता है कि उनकी योग्यता या काम का भी योगदान हो लेकिन ये एक सच्चाई तो है ही. अभी देख लीजिए कुछ दिन पहले खबर आई थी कि सहारा में कई पत्रकारों को समय पर वेतन नहीं मिल रहा है. पत्रकारों की नौकरियां चली गईं या जा रही हैं या ऐसी हालत है कि करना मुश्किल है. जो भी परिस्थिति हो लेकिन पत्रकार को कौन पूछ रहा है. उन्हें न तो नई नौकरी मिल रही है न नया रास्ता बन पा रहा है. ठीक है कि ऐसी परिस्थिति किसी भी फील्ड में आती है लेकिन दुखद तो है ही. सहारा छोड़ दीजिए तो आप जिलों में तैनात पत्रकारों की सैलरी का पता कर लीजिए. पता होना चाहिए. एक स्टार एंकर की सच्चाई पत्रकारिता की सच्चाई नहीं हो सकती.

आपने उन सपनों को काफी पैसे देकर और जिंदगी के कीमती साल देकर खरीदे हैं. इन सपनों को बेचने के लिए हम जैसे दो-चार एंकर पेश किए जाते हैं. आपकी बातचीत से यह भी लगता है कि आपको हमारे जैसे दो-चार एंकरों के नाम तो मालूम हैं लेकिन अच्छी किताबों के कम. ये आपकी नहीं, आपके टीचर की गलती है. आपमें से ज्यादातर साधारण या ठीकठाक परिवेश से आए हुए होते हैं इसलिए समझ सकता हूं कि पांच सौ, हजार रुपये की किताब खरीदकर पढ़ना आसान नहीं है. यह भी पता चलता है कि आपके संस्थान की लाइब्रेरी अखबारों-चैनलों में काम कर रहे दो-चार उत्साही लोगों की औसत किताबों से भरी पड़ी है जिनके शीर्षक निहायत ही चिरकुट टाइप के होते हैं. मसलन रिपोर्टिंग कैसे करें, एंकरिंग कैसे करें या राजनीतिक रिपोर्टिंग करते समय क्या-क्या करना, मीडिया और समाज, अपराध रिपोर्टिंग के जोखिम. एक बात का ध्यान रखिएगा कि हमारे नाम का इस्तेमाल कर लिखी गईं किताबों से आपको पेशे के किस्से तो मिल जाएंगे मगर ज्ञान नहीं मिलेगा. प्रैक्टिकल इतना ही महत्वपूर्ण होता तो मेडिकल के छात्रों को पहले ही दिन आॅपरेशन थियेटर में भेज दिया जाता. देख-पूछकर वो भी तीन महीने के बाद आॅपरेशन कर ही लेते.

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पढ़ाई को पढ़ाई की तरह किया जाना चाहिए. हो सकता है कि अब मैं बूढ़ा होने लगा हूं इसलिए ऐसी बातें कर रहा हूं लेकिन मैं भी तो आपके ही दौर में जी रहा हूं. पढ़ाई ठीक नहीं होगी तो चांस है कि आपमें से ज्यादातर लोग अच्छे पत्रकार नहीं बन पाएंगे. हिंदी के कई पत्रकार साहित्य को ही पढ़ाई मान लेते हैं. उन्हें यह समझना चाहिए कि साहित्य की पत्रकारिता हो सकती है मगर साहित्य पत्रकारिता नहीं है. साहित्य एक अलग साधना है. इसमें कोई प्राणायाम नहीं है कि आप इसका पैकेज बनाकर पत्रकारिता में बेचने चले आएंगे. इसलिए आप अलग से किसी एक विषय में दिलचस्पी रखें और उससे जुड़ी किताबें पढ़ें. जैसे मुझे इन दिनों चिकित्सा के क्षेत्र में काफी दिलचस्पी हो रही है. इरादा है कि दो तीन साल बाद इस क्षेत्र में रिपोर्टिंग करूंगा या लिखूंगा या कम से कम देखने-समझने का नजरिया तो बनेगा. इसके लिए मैंने मेडिकल से जुड़ी तीन-चार किताबें खरीदी हैं और एक दो किसी ने भेज दी हैं.

तो मैं कह ये रहा था कि पढ़ना पड़ेगा. आज भी चैनलों में कई लोग जो अपने हिसाब से अच्छा कार्यक्रम बनाते हैं (वैसे होता वो भी औसत और कई बार घटिया ही है) उनमें भी पढ़ने की आदत होती है या ये कला होती है कि कहां से क्या पढ़ लिया जाए कि कुछ बना दिया जाए. मगर ‘कट’ और ‘पेस्ट’ वाली से बात बनती नहीं है. ये आपको बहुत दूर लेकर नहीं जाएगा. मैं यह नहीं कह रहा कि आप पढ़ते नहीं होंगे लेकिन यह जरूर कह सकता हूं कि जो आपको पढ़ाया जा रहा है उसका स्तर बहुत अच्छा नहीं है. आप इसे लेकर बेहद सतर्क रहें. अगर पढ़ाया जाता तो पत्रकारिता संस्थानों से आए छात्रों की बातचीत में किताबों या संचार की दुनिया में आ रहे बदलाव या शोध का जिक्र तो आता ही.

मैंने बिल्कुल भी यह नहीं कहा कि पत्रकारिता की समस्या ये है कि आने वाले छात्रों में जज्बा नहीं है या वे पढ़े-लिखे नहीं हैं. इस तरह के दादा टाइप उपदेश देने की आदत नहीं है. आप लोग हमारे दौर से काफी बेहतर हैं. मैं बता रहा हूं कि सिस्टम आपको खराब कर रहा है. वो आपके जज्बेे का सही इस्तेमाल ही नहीं करना चाहता. किसी को इंतजार नहीं है कि कोई काबिल आ जाए और धमाल कर दे. वैसे इस लाइन में किसी को काबिल बनने में कई साल लग जाते हैं. मेरी राय में लगने भी चाहिए तभी आप इस यात्रा का आनंद लेना सीख सकेंगे. कई जगहों पर जाएंगे, कई बार खराब रिपोर्ट करेंगे, उनकी आलोचनाओं से सीखेंगे. यह सब होगा तभी तो आप पांच खराब रिपोर्ट करेंगे तो पांच अच्छी और बहुत अच्छी रिपोर्ट भी करेंगे.

अब आता हूं आपकी आंखों में जो एंकर होते हैं उन पर. मित्रों आप खुद को धोखा दे रहे हैं. हम जैसे लोग उस मैनिक्विन (पुतला) की तरह है जो दुकान खुलते ही बाहर रख दिए जाते हैं. मैनिक्विन की खूबसूरती पर आप फिदा होते हैं तो ये आपकी गलती है. पत्रकारिता में आप पत्रकार बनने आइए. किसी के जैसा बनने मत आइए. फोटोकाॅपी चलती नहीं है. कुछ समय के बाद घिस जाती है. राहू-केतु के संयोग पर यकीन रखते हैं तो मैं अपनी सारी बातें वापस लेता हूं. इस लाॅजिक से तो आप कुछ कीजिए भी नहीं, एक दिन क्या पता प्रधानमंत्री ही बन जाएं या फिर बीसीसीआई के चेयरमैन या क्या पता आपकी बनाई किसी कंपनी में मैं ही नौकरी के लिए खड़ा हूं. मुझे लगता है कि आप लोग खुद को धोखा दे रहे हैं और आपको धोखा दिया जा रहा है. एक दिन आप रोएंगे. धकिया दिए जाएंगे. इसलिए अपना फैसला कीजिए. आपका दिल टूटेगा तब आपको रवीश कुमार बनने का वो सपना बहुत सताएगा.

मैं क्यों कह रहा हूं कि आपको रवीश कुमार नहीं बनना चाहिए. इसलिए कि आपकी आंखों में खुद को देख मैं डर जाता हूं. मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है जिससे आप प्रभावित हों. आप पत्रकार बनने वाले हैं, कम-से-कम प्रभावित होने की प्रवृत्ति होनी चाहिए. यह भी ठीक नहीं होगा कि देखते ही मुझे गरिया दें लेकिन प्लीज खुदा न कहें और मेरी तुलना किसी फिल्म स्टार से न करें. मैं ऐसा कुछ भी नहीं हूं जो आपको बनना चाहिए. हम न अपने आप में संस्थान हैं न सिस्टम. हम न बागी हैं, न क्रांतिकारी. यही सीखा है कि अपना काम करते चले जाओ. अगर आप ने मुझे मंजिल बना लिया तो निराशा होगी.

मुझे पता है कि आपसे इंटरव्यू में पूछा जाता है कि किसी अच्छे पत्रकार का नाम बताओ या किसके जैसा बनना चाहते हो. इंटरव्यू लेने वाले फिर मुझे बताते हैं कि ज्यादातर छात्र आप ही का नाम लेते हैं. आपको क्या लगता है कि मैं खुश हो जाता हूं. सुन लेता हूं लेकिन मेरा दिल बैठ जाता है. यह सोचकर कि क्या उन्हें पता है कि रवीश कुमार होना कुछ नहीं होना होता है. किसी के जैसा बनने का यह सवाल भी गिनीज बुक के लिए रिकॉर्ड बनाने जैसा वाहियात है कि किसके जैसा बनना है. आपको मैं बता रहा हूं कि मैं कुछ नहीं हूं. मेरे पास न तो कोई जमीन है और न आसमान. आप मुझे देखते हुए किसी शक्ति की कल्पना तो बिल्कुल ही न करें. जरूर हम लोग व्यक्तिगत साहस और ईमानदारी के दम पर सवाल पूछते हैं लेकिन हम किसी सिस्टम या पेशे की सच्चाई नहीं हो सकते. हम अपवाद भी तो हो सकते हैं.

मोटा-मोटी मैं यह कह रहा हूं कि हम लोग सामान्य लोग होते हैं. हमारे जैसे लोग चुटकी में चलता कर दिए जाते हैं और सिस्टम डस्टबिन में फेंक देता है. समाज भूल जाता है. अनेक उदाहरण हैं. कुछ उदाहरण हैं कि समाज बहुत इज्जत भी करता है और याद भी रखता है. प्यार भी करता है. कई लोग लस्सी और दूध लेकर आ जाते हैं. मेरे दर्शकों ने मुझे घी और गुड़ भी दिया है. कैडबरी के चाॅकलेट भी दिए हैं. लेकिन मैं आपके सपनों की सच्चाई नहीं हो सकता. हम सबको पेशे में आने वाले उतार-चढ़ावों से गुजरना पड़ेगा. कुछ गुजरे भी हैं और जो नहीं गुजरे हैं वे दावे से नहीं कह सकते कि उनके साथ ऐसा नहीं होगा. इसलिए अगर आप पत्रकारिता के छात्र हैं जो दो-चार एंकरों का चक्कर छोड़िए. उनके शो देखकर इस भ्रम में मत रहिएगा कि आप पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ रहे हैं. अगर भ्रम में नहीं रहते हैं तो बहुत अच्छी बात है. आप तमाम माध्यमों को देखिए, जहां हिंदी-अंग्रेजी के कई पत्रकार अच्छी और गहरी समझ से रिपोर्ट लिख रहे हैं. उनकी रिपोर्ट का विश्लेषण कीजिए. उनसे बात कीजिए कि खबर तक पहुंचने के क्या कौशल होना चाहिए. आपके टीचर ने गलत बताया है कि टीवी का पत्रकार बनना है तो चैनल देखो या रवीश कुमार को देखो. उनसे कहियेगा कि खुद रवीश कुमार महीने में कुल जमा चार घंटे भी चैनल नहीं देखता है.

आप सबकी मासूमियत और ईमानदारी देखकर जी मचलता है. लगता है कि क्या किया जाए कि आपको खरोंच तक न लगे. जज्बा बचा रहे. पर मैं एक व्यक्ति हूं. मैं सोच सकता हूं, लिख सकता हूं इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकता. सही बात है कि अब कुछ करना भी नहीं चाहता. शायद इसी बेचैनी के कारण यह सब लिखने की मूर्खता कर रहा हूं. आपके रवीश कुमार कुछ नहीं हैं. आप उनकी वक्ती लोकप्रियता पर मोहित मत होइए. हमने जरूर अपने अनुशासन से साख बनाई है और यह जरूरी हिस्सा है लेकिन यह भी समझिए कि मुझे बहुत अच्छे मौके मिले हैं. सबकी कहानी में दुखभरी दास्तान होती हैं. मेरी भी है लेकिन इसके बावजूद मुझे अच्छे मौके मिले हैं. पूरी प्रक्रिया को समझिए और फिर उसमें हम जैसे तथाकथित स्टार एंकरों को रखकर देखिए.

पूरी पत्रकारिता को स्टार एंकर की अवधारणा में नहीं समेटा जा सकता. एंकर हर खबर या हर रिपोर्टर का विकल्प नहीं हो सकता. कम से कम मैं नहीं हो सकता. लेकिन अब का दौर ऐसा ही है. आपके पास टीवी में इसका विकल्प नहीं है. कई जगहों पर प्रयास हो रहा है लेकिन जैसे ही कोई मसला आता है वे मसाला बनाने में लग जाते हैं. दर्शक भी वैसे ही हो गए हैं. किसी रिपोर्टर की स्टोरी को ध्यान से नहीं देखते. यही गिनती करते रहते हैं कि किस एंकर ने कौन सी स्टोरी पर बहस की और किस पर नहीं की ताकि वे खुद को संतुष्ट कर सकें कि ऐसा उसने किसी पार्टी के प्रति पसंद-नापसंद के आधार पर किया होगा.

इसलिए आप इन एंकरों को महाबलि न समझें कि वह देश के तमाम मुद्दों पर इंसाफ कर देगा. हर मुद्दे पर प्रतिबद्धता साबित कर देगा या सही तरीके से कार्यक्रम कर देगा. सबको सबक सीखा देगा. बैकग्राउंड में तूफान फिल्म का गाना बजेगा, आया-आया तूफान… भागा-भागा शैतान… ऐसा होता नहीं है दोस्तों. आप देख ही रहे हैं कि हम एंकरों की तमाम चौकसी के बाद भी जवाब कितने रूटीन हो गए हैं. दरअसल ये जवाब बताते हैं कि तुम सिस्टम का कुछ नहीं बिगाड़ सकते. ज्यादा करोगे तो सोशल मीडिया के जरिए दर्शकों को बता देंगे कि हमारी पार्टी के खिलाफ हो. दर्शक भी जल्दी ही अपनी पार्टी की निष्ठा की नजर से देखने लगेंगे और आपका साथ छोड़ देंगे. मैं रोज इस अकेलेपन को जीता हूं. यह भयावह है. आप व्यापमं करो तो लोग कहते हैं कि यूपी में भी तो व्यापमं है. इन उदाहरणों में फंसाकर आपसे कहा जाता है कि तराजू के पलड़े पर बेंग (मेंढक) तौलकर दिखाओ. एक बेंग इधर रखेंगे तो दूसरा उधर से कूद जाएगा.

इसलिए नौजवान दोस्तों कभी रवीश कुमार मत बनना. अपना रास्ता खुद बनाओ. मुझे जो बनना था कथित रूप से बन चुका हूं. तुम्हें दिनेश बनना होगा, असलम बनना होगा, जाटव बनना होगा, संगीता या सुनीता बनना होगा. ये तभी बनोगे जब तुम्हें कोई मौका देगा. जब तुम उस मौके के लिए अपने आप को तैयार रखोगे और अपने हिसाब से सीमाओं का विस्तार करते चलोगे. हाॅस्टल में बैठ कल मेरा फैन बनकर अपना वक्त मत बर्बाद करना. बहुत ही महत्वपूर्ण दौर है तुम्हारा. इसका सदुपयोग करो. लोकप्रियता किसी काम की नहीं होती है. कोई तुम्हें हम लोगों का नाम लेकर ठग रहा है. बचना इससे. इसके लिए पत्रकार मत बनना. पत्रकार बनना पत्रकारिता के लिए, बशर्ते कोई तुम्हारे इस जज्बेे का इंतजार कर रहा हो. मुझे भी बताना कौन तुम्हारा बेसब्री से इंतजार कर रहा है.

(लेखक एनडीटीवी में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं)

पत्रकारिता या पीआर

क्या नेटवर्क 18, दैनिक भास्कर समूह, जी नेटवर्क, टाइम्स ग्रुप या ऐसे तमाम मीडिया समूह जनतंत्र की मूल आत्मा और उसके ढांचे के लिए खतरनाक हैं जो एक ही साथ दर्जनभर से ज्यादा ब्रांड को चमकाने और उनसे अपने मीडिया बिजनेस का प्रसार करने में लगे हैं? देश के इन प्रमुख मीडिया घरानों के संबंध में अगर ये बात सवाल की शक्ल में न करके बयान देने के तौर पर की जाए तो बहुत संभव है कि इनकी ओर से संबंधित व्यक्ति पर मानहानि का मुकदमा या कम से कम कानूनी नोटिस तो भेजा ही जाएगा. लेकिन भारत सरकार का सूचना और प्रसारण मंत्रालय, उसकी सहयोगी संस्था टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) और मीडिया के मालिकाना हक को लेकर समय-समय पर गठित कमेटी पिछले कुछ सालों से लगातार इस बात को दोहराती आई हैं कि जो मीडिया संस्थान एक ही साथ प्रिंट, टेलीविजन, रेडियो, ऑनलाइन और मीडिया के कई दूसरे व्यवसाय से जुड़े हैं, वे दरअसल देश के लोकतांत्रिक ढांचे और उसकी बुनियाद कमजोर करने का काम कर रहे हैं.

15 फरवरी 2013 को ट्राई ने मीडिया के मालिकाना हक को लेकर करीब सौ पेज से भी ज्यादा का जो परामर्श पत्र तैयार किया, उसमें क्रॉस मीडिया ओनरशिप को परिभाषित किए जाने से लेकर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय एवं उसके आदेश से तैयार की गई उन तमाम रिपोर्टों की चर्चा है जो कि क्रॉस मीडिया ओनरशिप को जनतंत्र के लिए खतरा मानती है. इस पत्र में बहुत ही स्पष्ट शब्दों में लिखा गया है कि प्रिंट, टेलीविजन, रेडियो और ऑनलाइन जैसे दूसरे माध्यमों पर कुछ ही मीडिया संस्थानों का कब्जा होने से समाचार एवं मनोरंजन सामग्री की बहुलता नष्ट होती है. माध्यम के अलग होने के बावजूद भी कंटेंट के स्तर पर बहुत अधिक भिन्नता नहीं होती. ऐसे में माध्यमों के रूप बदलने और संख्या में इजाफा होते जाते जाने पर भी विविधता जो कि जनतंत्र के लिए अनिवार्य है, आ नहीं पाती, उनका प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता. लिहाजा इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूत है.

एक ही मीडिया घराने के समाचारपत्र, न्यूज चैनल, एफएम रेडियो और वेबसाइट से गुजरने वाले पाठक-दर्शक ये बात बहुत आसानी से समझ सकते हैं कि माध्यम के बदले जाने के बावजूद कंटेंट और प्रभाव के स्तर पर हमारे बीच सूचना एवं मनोरंजन के दायरे का विस्तार क्यों नहीं हो पाता? ये भी संभव है कि सामान्य दर्शक-पाठक को इस बात की जानकारी तक न हो कि वो जो अखबार पढ़ रहे हैं, न्यूज चैनल देख रहे हैं, एफएम रेडियो सुन रहे हैं या विज्ञापन से गुजर रहे हैं, वो सबके सब एक ही मीडिया संस्थान की उपज है. इन सबों पर एक ही संस्थान का मालिकाना हक है.

मीडिया इंडस्ट्री पर आधारित वेबसाइट ‘न्यूज लॉन्ड्री’ ने ये बताने के लिए कि दर्शक-पाठक जिस मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानकर जुड़ते हैं, उन पर किन-किन व्यावसायिक घरानों का कब्जा है और किस घराने में किन राजनीतिक, कॉर्पोरेट और मीडियाकर्मियों का पैसा लगा है, अलग से एक विंडो ही बनाई हुई है. वेबसाइट पर ‘हू ओन्स योर मीडिया’ (आपका मीडिया कौन चला रहा है) नाम से एक साइड बार है जिससे गुजरने पर क्रॉस मीडिया ओनरशिप की पूरी वंशावली स्पष्ट हो जाती है.

सूचना और प्रसारण मंत्रालय एवं ट्राई अभी तक क्रॉस मीडिया ओनरशिप के तहत सिर्फ माध्यमों के मालिकाना हक पर रिपोर्ट तैयार करती आई है. इस वेबसाइट के जरिए मालिकाना हक की वंशावली से जब गुजरते हैं तब अंदाजा लगता है कि जिस क्रॉस मीडिया ओनरशिप को ये जनतंत्र के लिए खतरा बता रहे हैं, वो सिर्फ प्रारंभिक चरण है. इस खतरे को समझने के लिए ऊपर की परतें हैं जबकि मीडिया की जो व्यावसायिक शक्ल है वो इससे कहीं अधिक चिप्पीदार हैं जिनमें एक ही मीडिया संस्थान पर इतने सारे व्यवसाय के पैबंद लगे हैं कि इस निष्कर्ष तक पहुंचने में बहुत मुश्किल नहीं होती कि मौजूदा दौर में मीडिया दरअसल वो वॉल मार्ट है जो अपनी दखल उन तमाम व्यवसायों में रखना चाहता है जिसका संबंध या तो प्रत्यक्ष मुनाफे या फिर अप्रत्यक्ष व्यावसायिक लाभ (सरोगेट बिजनेस प्रॉफिट) से है. मिसाल के तौर पर डीएमके प्रमुख करुणानिधि के पड़पोते और कपड़ा मंत्री दयानिधि मारन के भाई कलानिधि मारन जो कि देश में सबसे ज्यादा पैसा कमाने वाले सीईओ हैं, एक ही साथ 45 रेडियो स्टेशन, दर्जनभर से भी ज्यादा टीवी चैनल, समाचारपत्र और पत्रिकाओं पर मालिकाना हक रखने के साथ-साथ स्पाइसजेट एयरलाइंस, फिल्म प्रोडक्शन और डीटीएच सेवा के व्यवसाय से जुड़े हैं यानी उनकी कंपनी ‘कल मीडिया सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड’ का एक तरफ तो मीडिया के तमाम रूपों पर व्यावसायिक कब्जा है, इससे बिल्कुल अलग एयरलाइंस जैसे व्यवसाय में भी दखल है.

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ये कहानी सिर्फ सन ग्रुप की नहीं है. यही स्थिति भास्कर ग्रुप, दैनिक जागरण समूह, जी नेटवर्क या ऐसे दूसरे दर्जनों मीडिया घरानों की है जो एक ही साथ न्यूज चैनल, रेडियो स्टेशन, समाचारपत्र के कारोबार में लगी है तो दूसरी तरफ चिटफंड, ठेकेदारी, कोयला एवं खनन, मॉल एवं रियल एस्टेट से लेकर स्कूल चलाने तक धंधे का विस्तार करने में लगी है. पर्ल ग्रुप, लाइव इंडिया समूह जैसे मीडिया के दर्जनों संस्थान ऐसे हैं जिनका मुख्य व्यवसाय चिटफंड या रियल एस्टेट रहा है, जिनकी मदर कंपनी मीडिया नहीं है. अपने कई दूसरे व्यवसायों के साथ-साथ वो मीडिया के भी कारोबार में भी हाथ आजमाने उतरे हैं.

ऊपरी तौर पर जो स्थिति बनती है इसमें तीन तरह के कारोबार प्रमुखता से जुड़े हैं. एक तो कॉर्पोरेट जिसमें कि चिटफंड से लेकर रियल एस्टेट तक के बिजनेस शामिल हैं, दूसरा राजनीति और तीसरा डिस्ट्रीब्यूशन एवं पीआर प्रैक्टिस. मीडिया का पूरा कारोबार किसी न किसी रूप में इन्हीं व्यवसायों से जुड़े लोगों के बीच चल रहा है. अब अलग से कहने की जरूरत नहीं है कि खबरों या मनोरंजन का कारोबार करते हुए मीडिया संस्थान एक ही साथ कई दूसरे कारोबार के लिए अपनी पृष्ठभूमि बनाने या संतुलन बनाने का काम करते हैं.

मीडिया के इस ओनरशिप पैटर्न को हम कंटेंट के हिसाब से समझने की कोशिश करें तो स्वाभाविक है कि माध्यमों की बहुलता के बावजूद सामग्री के स्तर पर एकरूपता होगी. लेकिन इसका दूसरा पक्ष जो कि आमतौर पर चर्चा में नहीं आ पाता वो ये है कि क्या एक मीडियाकर्मी प्रेस कार्ड का पट्टा लगाकर सिर्फ अपने पत्रकारीय धर्म का निबाह कर रहा होता है या फिर उसका काम सिर्फ पत्रकारिता का रह गया है? दूसरा कि क्या उस पर सिर्फ अपने संबंधित न्यूज चैनल या अखबार के प्रसार की चिंता है? ये सवाल तब और भी जरूरी हो जाता है जब एस्सेल ग्रुप (जिसके दूसरे कई कॉर्पोरेट उपक्रम के अलावा मीडिया में जी न्यूज से लेकर जी सलाम जैसे दर्जनभर से भी ज्यादा चैनल हैं और डिश टीवी नेटवर्क का कारोबार है) के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा लोकसभा चुनाव 2014 में एक राजनीतिक दल के लिए कुरुक्षेत्र में रैली के दौरान वोट देने की अपील करते हैं. इस रैली को जी न्यूज पर लाइव प्रसारित किया जाता है और फिर प्राइम टाइम की खबर बनती है. इस चैनल का संपादक जब खबर के बदले विज्ञापन में बिचौलिए की भूमिका में सौदेबाजी करने के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है तो इंडिया गेट पर इस चैनल के मीडियाकर्मियों को मोमबत्ती जलाकर विरोध प्रदर्शन करने के लिए दवाब बनाया जाता है. देर रात सामान्य दर्शक स्टूडियो में रुक नहीं सकते तो इंडिया टीवी अपने ही कर्मचारियों को मेल जारी करते हुए अपने रिश्तेदारों को बतौर दर्शक मौजूद रहने के आदेश देता है. ऐसे में क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि मीडिया की इस ओनरशिप पैटर्न में मीडियाकर्मी का काम सिर्फ पत्रकारिता के दायरे के तहत काम करना रह गया है. स्वाभाविक है कि जैसे-जैसे मीडिया संस्थानों ने पत्रकारिता के नाम पर अपने व्यवसायिक दायरे का विस्तार किया है, मीडियाकर्मियों की जिम्मेदारी पत्रकारिता से आगे जाकर पीआर, लॉबिंग, लाइजनिंग, रिसेप्शनिस्ट जैसे उन कामों की भी हो गई है जिसका सैद्धांतिक तौर पर मीडिया से दूर-दूर तक का संबंध नहीं है.

दूसरा कि खासकर टेलीविजन इंडस्ट्री के संदर्भ में सब टीआरपी के लिए किया जाता है, मुहावरा ही बन गया है और अब तो ये मुहावरा इतना घिस गया है कि गली-मोहल्ले के सामान्य दर्शक तो बात-बेबात इसका इस्तेमाल करते हैं. पैनल डिस्कशन में अक्सर राजनीतिक दलों के प्रवक्ता तक बोलते नजर आते हैं. एक तरह से मीडिया के इस बदलते चरित्र पर पर्दा ही डालने का काम करते हैं. पत्रकारीय जिम्मेदारी से छिटककर मीडियाकर्मी जिन सारी गतिविधियों में शामिल हैं उनसे टीआरपी का सवाल दूर-दूर से जुड़ा नहीं है बल्कि ये वो गतिविधियां हैं जिसका संबंध मीडिया संस्थान के उस प्रमुख व्यवसाय से है जिसके बूते चैनल के बने रहने की संभावना मजबूत होती है. जिस दिन मीडिया संस्थान का मूल व्यवसाय गड़बड़ाया नहीं कि मीडिया के कारोबार पर भी ताला लगते देर नहीं लगेगी. हमारे सामने एक के बाद एक चैनलों के बंद होने के उदाहरण हैं जो ये स्पष्ट करते हैं कि ये इसलिए बंद नहीं हुए क्योंकि टीआरपी की दौड़ में पिछड़ गए या इन्हें विज्ञापन नहीं मिले. ये इसलिए बंद होते चले गए क्योंकि अपने रियल एस्टेट, चिटफंड, राजनीति या ठेकेदारी के जिस मूल व्यवसाय की दम-खम पर टिके थे, उसमें कंपनी को भारी नुकसान हुआ और जिसका सीधा असर पहले कटौती, फिर वेतन रोक दिए जाने और अंत में इसके बंद ही कर दिए जाने पर हुआ. ऐसे में इस ओनरशिप पैटर्न के तहत मीडियाकर्मी लगातार इस बात की सलामती चाहते हैं कि कंपनी का जो मूल व्यवसाय है वो हर हाल में सुरक्षित रहे. एक ही मीडिया घराने का मीडियाकर्मी अंग्रेजी से हिंदी, टीवी स्क्रीन से ऑनलाइन तक पर जब दिखते हैं तो बात फिर भी समझ आ जाती है कि उनके ऊपर एक संस्थान के लिए काम करने का मतलब एक चैनल या वेबसाइट के लिए काम करना नहीं है, उन तमाम ब्रांड के लिए काम करना है जिसे उसकी कंपनी चलाती है.

नेटवर्क 18 में साल 2012-13 में रातोंरात सैंकड़ों मीडियाकर्मियों की छंटनी हुई, उसका आधार भी यही था. लेकिन एक मीडियाकर्मी पत्रकारिता के अलावा भी दूसरे कई काम कर रहा है वो कभी-कभार मीडिया संस्थान की ओर से आयोजित कॉन्क्लेव या फेस्टिवल में भले दिख जाते हों लेकिन खुले तौर पर सामने नहीं आ पाता.

ये स्थिति तो उस कॉर्पोरेट मीडिया का है जिसकी ओनरशिप माध्यमों के दायरे से लांघकर उस पैटर्न पर आकर टिकी है कि जहां-जहां मुनाफे की संभावना है, मीडिया संस्थान अपने पैर वहां-वहां बढ़ाएंगे. लेकिन पिछले कुछ सालों से खासकर लोकसभा चुनाव 2009 के बाद से चुनावी राजनीति की जो शक्ल बदली है उसमें एक नए किस्म की मीडिया ओनरशिप का दौर शुरू हुआ है.

ये कोई नई परिघटना नहीं है कि जो भी सरकार सत्ता में आती है, पब्लिक ब्रॉडकास्टिंग से लेकर सरकारी विज्ञापनों पर निर्धारित खर्च को अपने पक्ष में इस्तेमाल करती है. ऑल इंडिया रेडियो से लेकर सरकारी भोंपू दूरदर्शन जैसे कई मुहावरे इतने प्रचलित रहे हैं कि इनकी व्याख्या किए बिना समझ आ जाता है कि माध्यमों पर कब्जा उसी का होगा, जिसका चुनाव के जरिए जनतंत्र पर है और तब वो अपनी सुविधानुसार छवि का जनतंत्र गढ़ने का काम करेंगे.

लोकसभा चुनाव 2009 के बाद फिक्की-केपीएमजी की मीडिया और मनोरंजन से संबंधित जो रिपोर्ट आती है, उसके बाद से मीडिया ओनरशिप का एक नया पैटर्न उभरकर आता है. रिपोर्ट का दिलचस्प पहलू है कि जब दुनियाभर में आर्थिक मंदी का दौर था और जिसका सीधा असर इस देश के कारोबार पर भी पड़ा, उस वक्त भी मीडिया इंडस्ट्री न केवल मुनाफे में रही बल्कि उसका विकास दर पहले से कहीं ज्यादा रहा. इसकी बड़ी वजह चुनाव से हासिल राजस्व रहा. मीडिया के लिए ये बात समझना कोई मुश्किल नहीं रहा कि एफएमसीजी, ऑटोमोबाइल और टेलीकॉम के विज्ञापनों की तरह राजनीति दल भी बेहतरीन क्लाइंट हो सकते हैं और न ही राजनीतिक दलों को इंडिया शाइनिंग के जबरदस्त पिट जाने के वाबजूद अंतिम सत्य मान लेने में देरी लगी कि भारी लागत के विज्ञापनों के बिना वे चुनाव में टिके रह सकते हैं. नतीजा माध्यमों पर निर्भरता का एक ऐसा दौर शुरू हुआ कि जिसमें विज्ञापन से कहीं ज्यादा इवेंट, पीआर प्रैक्टिस, स्ट्रैटजी और प्रोपेगेंडा प्रभावी होते चले गए.

आज देश के सभी प्रमुख राजनीतिक दल बाकायदा पट्टाधारी मीडियाकर्मियों को अपने वॉररूम के लिए नियुक्त कर रहे है. उन्हें उसी तरह बायमेट्रिक कार्ड पंच करके शिफ्ट वाइज काम करना होता है जैसा कि मीडिया दफ्तरों में किया जाता है. उनका काम सोशल मीडिया से लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया की एक-एक सामग्री पर नजर रखनी होती है जो कि उनके पक्ष-विपक्ष में अपनी बात कर रहे होते हैं. उनका काम वेतन देने वाली अपनी राजनीतिक पार्टी के लिए लगातार पक्ष में माहौल बनाना होता है जिसे सोशल मीडिया की भाषा में ‘बज़’ क्रिएट करना कहते हैं. इसे चाहें तो कार्यकाल मीडिया ओनरशिप कह सकते हैं जिसकी स्ट्रैटजी में हर अगला पांच साल शामिल है. ऊपरी तौर पर जो राजनीतिक पार्टियां सरकार चलाती हुई दिख रही हैं, विपक्ष में बैठी नजर आ रही है वो एक ऐसे वॉररूम की ओनरशिप लिए बैठी हैं जो बिल्कुल न्यूजरूम की शक्ल में काम करता है.

इस वॉररूम के एजेंडे जितने स्पष्ट हैं, उसकी राजस्व संरचना उतनी ही धुंधली. मसलन जब इन राजनीतिक दलों की गतिविधियां ही सीधे-सीधे न आकर वाया मेनस्ट्रीम मीडिया या सोशल मीडिया आ रही हैं तो बैलेंस शीट आने में तो सालों लग जाएंगे, लेकिन ओनरशिप के इस नए पैटर्न से इतना तो स्पष्ट है कि ट्राई अपनी रिपोर्ट में जनतंत्र के भीतर जिस बहुलता की चिंता करती है, वो यहां तक आते-आते बादशाहत कायम करने के सवाल पर टिक जाता है. कंटेंट का सवाल बहुत मामूली और पीछे रह जाता है. और इन सबके बीच सबसे बड़ी बात कि अब इस पर आखिर चिंता कौन जाहिर करे, जिसे चिंता करनी चाहिए वो तो खुद वॉररूम को और भी आक्रामक बनाने की कवायद में जुटे हैं.

(लेखक मीडिया अध्ययन से जुड़े हैं)

इस पेशे में हर शख्स बीमार सा

Cअनिश्चित दिनचर्या और खाने-पीने का कोई सही समय न हो पाने की वजह से पत्रकारों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है. कुछ साल पहले मीडिया स्टडीज ग्रुप की ओर से देश में कार्यरत मीडियाकर्मियों की कार्यस्थिति और जीवन-स्तर का अंदाजा लगाने के उद्देश्य से एक सर्वेक्षण किया गया. 13 जुलाई, 2008 से 13 जून, 2009 तक चले इस सर्वेक्षण के दौरान 150 मीडियाकर्मियों ने अपनी राय दी थी. आम तौर पर मीडियाकर्मियों के स्वास्थ्य को लेकर बहुत ही कम सर्वे किए जाते हैं. यह अपनी तरह का अनूठा सर्वे था, जो मीडियाकर्मियों की बुरी हालत की झलक दिखाता है. इसे नजीर के तौर पर देखें तो आज कई सालों बाद मीडिया में लोगों के काम करने की स्थितियां कमोबेश वैसी ही हैं जैसी सर्वे होने के समय थीं.

इस सर्वेक्षण में शामिल मीडियाकर्मियों में से 83.67 फीसदी पुरुष और 16.33 फीसदी महिलाएं हैं. इनमें से 34.48 फीसदी लोगों का आयु-वर्ग 21 से 27 वर्ष तक था. 31.72 फीसदी लोग 28 से 35 के आयु-वर्ग के थे. 36 वर्ष से अधिक आयु-वर्ग के 33.79 फीसदी मीडियाकर्मी थे. सर्वेक्षण में दस वर्ष से अधिक का मीडिया में अनुभव रखने वाले 43.15 फीसदी कर्मचारियों ने भाग लिया. 15.07 फीसदी लोग ऐसे हैं, जो पांच से दस साल तक का अनुभव रखते हैं. तीन से पांच साल तक के अनुभवी मीडियाकर्मियों का प्रतिशत भी 15.07 ही है. इसके अलावा 6.85 फीसदी मीडियाकर्मी एक से तीन साल और 19.86 फीसदी मीडियाकर्मी एक साल से भी कम समय का अनुभव रखते हैं. 54.14 फीसदी प्रिंट मीडिया से, 24.31 फीसदी टेलीविजन, 9.39 फीसदी वेब मीडिया, 6.63 फीसदी एजेंसी से और 5.52 फीसदी लोग रेडियो से संबद्ध थे. इनमें से 69.44 फीसदी मीडियाकर्मी मुख्यालय में कार्यरत थे. 24.31 फीसदी क्षेत्रीय कार्यालय और 6.25 फीसदी मीडियाकर्मी जिला कार्यालय में अपनी सेवाएं दे रहे थे. इसके अलावा 54.11 फीसदी डेस्क पर और 46.89 फीसदी फील्ड में कार्यरत थे. सर्वेक्षण में भाग लेने वालों में 34.46 फीसदी वरिष्ठ मीडियाकर्मी थे, 40.56 फीसदी मध्य-स्तर के पदों पर आसीन थे और 20.98 फीसदी कनिष्ठ.

सर्वेक्षण का निष्कर्ष

  • 65.51 फीसदी मीडियाकर्मियों को प्रतिदिन आठ घंटे से अधिक काम करना पड़ता था. 23.65 फीसदी लोगों ने स्वीकार किया कि उनसे आठ घंटों तक ही काम लिया जाता था. जबकि 12.84 फीसदी ने यह भी माना कि उन्हें आठ घंटों से भी कम काम करना पड़ता था.
  • 71.53 फीसदी मीडियाकर्मियों को एक दिन का साप्ताहिक अवकाश मिलता था. 17.36 फीसदी लोगों को दो दिनों का साप्ताहिक अवकाश मिलता था. जबकि 11.11 फीसदी लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें कोई साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलता था.
  • 13.50 फीसदी मीडियाकर्मी हृदय एवं रक्तचाप संबंधी रोगों से पीड़ित थे. 13.81 फीसदी मीडियाकर्मी मधुमेह से परेशान थे. दांत के रोग से पीड़ित मीडियाकर्मियों का प्रतिशत 11.39 था. 13.08 फीसदी लोगों ने खुद को पेट संबंधी रोगों से पीड़ित बताया. 10.97 फीसदी लोगों ने स्वीकार किया है कि वे मानसिक दबाव और अवसाद से पीडि़त हैं. 14.34 फीसदी मीडियाकर्मियों ने हड्डी एवं रीढ़ की तकलीफों से खुद को परेशान बताया. 11.81 फीसदी लोगों को आंख से संबंधी बीमारी पाई गई. बस 2.10 फीसदी लोगों ने कमजोरी, थकान और सिरदर्द से खुद को पीड़ित बताया.
  • 48.06 फीसदी मीडियाकर्मी का दुख ये था कि उन्हें इलाज के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता, लेकिन, 51.94 फीसदी मीडियाकर्मियों के लिए यह संभव नहीं हो पाता.
  • 61.27 फीसदी मीडियाकर्मियों के खाने-पीने का कोई निर्धारित समय नहीं था. जबकि 17.61 फीसदी मीडियाकर्मियों ने अपने भोजन का समय निर्धारित कर रखा था. 21.13 फीसदी मीडियाकर्मी यह कहते हैं कि कभी उनके भोजन का समय निर्धारित रहता है और कभी नहीं.
  • कार्य-संस्कृति के सवाल पर 33.57 फीसदी मीडियाकर्मियों का मानना था कि उनके संगठन में बेहतर कार्य-संस्कृति है. 54.55 फीसदी मीडियाकर्मियों ने अपने कार्य-स्थल की कार्य-संस्कृति को औसत ही माना. जबकि 11.89 फीसदी लोग ऐसे भी थे, जिन्हें उनके संस्थान की कार्य-संस्कृति बुरी लगती थी.
  • 45.52 फीसदी मीडियाकर्मी अपने सहकर्मियों के आपसी व्यावसायिक संबंध को बेहतर मानते थे. 49.66 फीसदी लोग सहकर्मियों के बीच व्यावसायिक संबंध को औसत मानते थे, जबकि 4.83 फीसदी लोगों का अनुभव है कि उनके सहकर्मियों से बीच अच्छे व्यावसायिक संबंध नहीं थे.
  • 54.17 फीसदी मीडियाकर्मी अपनी नौकरी के लिए असुरक्षा महसूस करते थे, लेकिन 45.82 फीसदी ने अपनी नौकरी को सुरक्षित माना.
  • 12.59 फीसदी मीडियाकर्मियों ने 6 या उससे अधिक जगहों पर अपनी सेवाएं दी थी. 66.43 फीसदी ऐसे थे जो दो से पांच नौकरियां बदल चुके थे. एक ही संस्थान/संगठन में काम करने वालों का प्रतिशत 28.98 था.
  • 56.25 फीसदी मीडियाकर्मी दस किलोमीटर या उससे अधिक दूरी तय कर अपने कार्य-स्थल तक पहुंचते थे. 21.53 फीसदी को इसके लिए 5 से 10 किलोमीटर तक की दूरी तय करनी पड़ती थी. 1 से 5 किलोमीटर तक दूरी तय करने वाले लोगों का प्रतिशत 10.06 था. 1 से भी कम किलोमीटर की दूरी से आने वाले सिर्फ 4.17 प्रतिशत हैं.
  • 52.35 फीसदी मीडियाकर्मी दिन की पाली में और 76 फीसदी लोग शाम की पाली में काम कर रहे थे. 14.71 फीसदी मीडियाकर्मियों का रात के समय काम करना निश्चित होता है. 11.18 फीसदी लोग सुबह की पाली में काम करते थे.
  • मीडिया में उनका पसंदीदा क्षेत्र के बारे में पूछने पर 61.63 फीसदी प्रिंट माध्यम में और 22.09 फीसदी मीडियाकर्मी इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में काम करना चाहते थे. 4.65 फीसदी की पसंद रेडियो थी और 6.98 फीसदी वेब मीडिया से जुड़े रहना चाहते थे. 4.65 फीसदी मीडियाकर्मी समाचार एजेंसी में काम करने का इच्छुक बताया. 15. 54.55 फीसदी मीडियाकर्मी अपने काम से संतुष्ट थे, जबकि 45.45 फीसदी मीडियाकर्मी असंतुष्ट.

(संजय कुमार बलौदिया के सहयोग से)

पत्रकारिता : प्रतिनिधित्व का पाखंड

Anil Chamadia2मीडिया के भीतर जब एक साथ धर्म, जाति और लैंगिक आधार पर भेदभाव और उनके प्रतिनिधित्व के अभाव को लेकर बातचीत करनी होती है तो ये कहना पड़ता है कि 8 प्रतिशत हिंदू सवर्ण पुरुषों का मीडिया के भीतर वर्चस्व है. मीडिया स्टडीज ग्रुप के एक अध्ययन में ये साफ हुआ कि मीडिया के भीतर फैसले लेने वाले दस प्रमुख पदों के 86 प्रतिशत हिस्से पर उनका कब्जा बना हुआ है. मुख्यधारा, जिसे ‘राष्ट्रीय मीडिया’ कहा जाता है में यह स्थिति है कि समाज में हाशिये के वर्ग मसलन महिलाएं, पिछड़े, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व तो कहीं नाम मात्र के लिए भी नहीं नजर आ रहा है.

मीडिया में प्रतिनिधित्व की बहस

मुख्यधारा के मीडिया में वंचित वर्गों के प्रतिनिधित्व का सवाल 70 के दशक से पहले उठाया नहीं गया. भारत में प्रथम प्रेस आयोग की रिपोर्ट 1954 में आई थी, जिसमें कहा गया कि मीडिया संस्थानों में संपादकीय विभागों में नियुक्तियों को लेकर कोई व्यवस्थित प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती और भाई-भतीजे एवं राजनीतिक प्रभाव में होने वाली नियुक्तियों पर टिप्पणी की गई. आयोग ने नियुक्तियों के लिए जिस तरह की योग्यताओं और दस वर्षों में 300 स्नातक पत्रकारों की अनुशंसा की, उससे तो लगा कि किसी वंचित सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधित्व का किसी को कोई ख्याल ही नहीं है. जबकि मीडिया के जरिए एक धार्मिक समूह के खिलाफ दूसरे धार्मिक समूहों के हमलों की तरह जातियों के खिलाफ हमले की शिकायतें आम थी. दूसरे प्रेस आयोग (मंडल आयोग) का गठन जनता पार्टी की सरकार ने किया था लेकिन मध्यावधि चुनाव के बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व में जब कांग्रेस वापस सत्ता में आई तो उसने नए सिरे से दूसरे प्रेस आयोग का गठन किया. संभवत: ये पहला प्रयास था जब पत्रकार और जाति के संबंधों को लेकर सामान्य किस्म के अध्ययन की जरूरत महसूस की गई. इसकी एक वजह यह थी कि देश के विभिन्न हिस्सों में जातियों के खिलाफ मीडिया की आक्रामकता सतह पर दिखने लगी थी. भारत में मीडिया के विस्तार के साथ-साथ ही जातीय पूर्वाग्रह तो दिखते रहे हैं लेकिन वंचित जातियों के खिलाफ मीडिया की खुली आक्रामकता की घटनाएं समाज के वंचित वर्गों की सत्ता में हिस्सेदारी के लिए संवैधानिक प्रावधानों को खासतौर से लागू करने के फैसले लेने के दौरान हुई. प्रेस आयोग लिखता है कि जनगणना से जाति गणना को हटा दिया गया है लेकिन सामाजिक-आर्थिक की तरह राजनीतिक संबंधों में जाति एक महत्वपूर्ण पहलू बना हुआ है. आयोग ये भी लिखता है कि छुआछूत के खिलाफ अभियान में मीडिया की एक भूमिका रही है लेकिन फिर भी अवचेतन में जातीय पूर्वाग्रह के खतरे बने हुए हैं.

यह बहुत निश्चित होकर नहीं कहा जा सकता है कि मीडिया में दलितों और आदिवासियों की स्थिति का पहला अध्ययन कब किया गया. मैंने बिहार में इस तरह का एक अध्ययन 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध में किया था. इसमें संवाददाताओं की सामाजिक पृष्ठभूमि से लेकर शैक्षणिक, आर्थिक और राजनीतिक विचारधारात्मक पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी ली गई थी. संपादकीय में 75.55 प्रतिशत सवर्ण थे. पिछड़ों की तादाद 6.66 प्रतिशत थी. अनुसूचित जाति के एक सदस्य थे जो कि बिहार से बाहर के थे और उनकी जाति को लेकर किसी के बीच स्पष्टता नहीं थी. हिन्दी के समाचार पत्रों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दैनिक जनशक्ति में एक मात्र मुस्लिम व्यक्ति थे.

पश्चिमी देशों की तर्ज पर मीडिया में हिस्सेदारी की बहस भारत में 20वीं सदी के अंतिम दशक में क्रमश: तेज हुई है. अमेरिका और ब्रिटेन में वहां के वंचित वर्गों का मीडिया में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए प्रयास चलते है. अंग्रेजी के पत्रकार बीएन उनियाल ने 16 नवंबर 1996 को  ‘इन सर्च ऑफ ए दलित जर्नलिस्ट’ लिखा और इसकी प्रेरणा उन्हें ‘वाशिंगटन पोस्ट’ के केनेथ कूपर से मिली थी. ‘वाशिंगटन पोस्ट’ के लिए दिल्ली में काम करते हुए केनेथ कूपर ने बीएन उनियाल से किसी दलित पत्रकार के बारे में पूछा था. केनेथ का लेख 6 सितंबर 1996 को ‘इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून’ में छपा था. बीएन उनियाल ने ‘पायनियर’ में प्रकाशित अपने लेख में लिखा, ‘अचानक मुझे लगा कि मैं तीस वर्षों से पत्रकारिता कर रहा हूं और मुझे एक भी दलित पत्रकार नहीं मिला; एक भी नहीं. और सबसे तकलीफ की बात तो यह है कि मुझे कभी इसका एहसास तक नहीं हुआ कि हमारे पेशे में इतना बड़ा अभाव है.’

मीडिया में दलित, आदिवासी व दूसरे वंचित समूहों के प्रतिनिधित्व के सवाल पर विमर्श के केंद्र में आने की पृष्ठभूमि में मंडल आयोग की अनुशंसाओं के लागू होने के बाद मीडिया की आरक्षण विरोधी भूमिका और कांशीराम के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी और दूसरी दलित-पिछड़ी जातियों के आंदोलन रहे हैं.  संसद में 2006 में पिछड़ी जातियों के विद्यार्थियों के लिए शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण के फैसले के दौरान आरक्षण विरोधी मीडिया की भूमिका पहले की तरह ही दिखाई दी. मीडिया स्टडीज ग्रुप ने सीएसडीएस से संबद्ध प्रो. योगेंद्र यादव के साथ दिल्ली स्थित राष्ट्रीय मीडिया के माने जाने वाले 37 नामी संस्थानों में ऊपर के दस पदों पर बैठे 315 संपादकीय विभाग के अधिकारियों के बीच एक सर्वे किया. 315 में एक भी दलित व आदिवासी नहीं है. ‘भारत की समाचार पत्र क्रांति’ के लेखक रॉबिन जेफ्री ने लिखा कि भारतीय भाषाओं के अखबारों के दस साल से ज्यादा के अध्ययन के दौरान, बीस सप्ताह के दौरों में बीस शहरों में रुककर उन्होंने 250 से ज्यादा लोगों से मुलाकात की. दर्जनों अखबारों के दफ्तरों में गए पर मुख्यधारा में दलित संपादक और मालिक की बात तो दूर, एक भी दलित पत्रकार नहीं मिला.

महिला प्रतिनिधित्व

मीडिया में समाचार पत्रों और चैनलों का जिलों के स्तर पर तेजी से विस्तार हुआ है लेकिन मीडिया स्टडीज ग्रुप ने देश के 250 से ज्यादा जिलों में स्थानीय पत्रकारों में महिलाओं की तादाद की जानकारी हासिल की तो वहां महिलाओं की भागीदारी महज 2.7 प्रतिशत थी. उनमें भी ‘मुख्यधारा’ के समाचार पत्रों और चैनलों में तादाद बेहद कम थी. ये कहना कि राजधानियों के अलावा दूसरी जगहों पर जोखिम के कारण महिलाएं नहीं आती हैं, केवल एक बहाना ही हो सकता है. उचित प्रतिनिधित्व को बाधित करने के नए-नए बहाने बनाए जाते हैं. इन तथ्यों को इस पृष्ठभूमि से भी समझा जा सकता है. जुलाई 1979 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से प्रेस इंस्टीट्यूट ने एक अध्ययन में यह पाया कि मद्रास (अब चेन्नई) और हरियाणा के रोहतक में पत्रकारिता का कोर्स करने वाले कुल छात्रों में आधी से ज्यादा संख्या लड़कियों की थी. चंडीगढ़ में आधी संख्या भी उन ही की थी. कलकत्ता (अब कोलकाता) में तीस प्रतिशत लड़कियां थीं, लेकिन इतनी बड़ी तादाद में लड़कियों की उपस्थिति मीडिया संस्थानों में नहीं दिखती थी. दूसरा महिलाओं को खास तरह के ही काम दिए जाते थे, जैसे विज्ञापन, जनसंपर्क विभाग उनके हिस्से में ज्यादा आता था.

2006 के बाद मीडिया में प्रतिनिधित्व  

मीडिया के भीतर सामाजिक पृष्ठभूमि का पहलू संवेदनशीलता की मांग करता है. भारत में मीडिया के भीतर सामाजिक पृष्ठभूमि के स्तर पर घोर असंतुलन के दुष्परिणामों को भी स्पष्ट किया जा चुका है लेकिन यहां समाज में अपने स्तर पर परिवर्तन की चेतना की गति बेहद धीमी रही है. बाहरी दबाव की भाषा को यहां का समाज और संस्थाएं ज्यादा समझते हैं.

दलित आदिवासियों के मीडिया में प्रतिनिधित्व से जुड़े अध्ययनों के बाद दिल्ली के एक दैनिक में ऊपर के दस पदों में एक पद पर गैर-सवर्ण पुुरुष की बहाली की गई. बिहार में किए गए एक अध्ययन के नतीजों के अनुसार मीडिया में 73 प्रतिशत पद उच्च जाति के हिन्दुओं के अधीन है जबकि पिछड़े वर्ग का हिस्सा दस प्रतिशत है. दलित एक प्रतिशत हैं और आदिवासी हैं ही नहीं. झारखंड में एक मोटी जानकारी के अनुसार मुख्यधारा के प्रत्येक हिन्दी दैनिक में आदिवासी हैं लेकिन केवल एक समाचार पत्र में दो और बाकी के पत्रों में एक-एक हैं.

‘पायनियर’ के संपादक चंदन मित्रा ने मीडिया के जाति सर्वे पर आधारित सीएनबीसी-टीवी18 के कार्यक्रम में बताया कि उनके अखबार में दलित कॉलम छपता है और उनका एक सहायक संपादक दलित है लेकिन ये राजधानियों में आने वाले कुछेक परिवर्तन हैं. देशभर में जिला स्तर तक जो स्थिति बनी हुई है वह सामाजिक प्रतिनिधित्व के नाते और बदतर है.

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गांवों के देश में पत्रकारिता का शहरी मिजाज

मौजूदा स्थितियों में मांग की जानी चाहिए कि पत्रकारिता के प्रशिक्षण संस्थानों से प्रशिक्षण लेने वालों को सीधे शहरों में नियुक्ति देने या लेने से पहले ग्रामीण इलाके में जाना अनिवार्य होगा. मीडिया कंपनियों के लिए भी यह अनिवार्य होगा कि वे प्रशिक्षण के बाद सीधे मुख्यालय में नियुक्ति के बजाय ग्रामीण इलाकों में पहली नियुक्ति दें. कंपनियां ग्रामीण इलाकों की खबरों के लिए जिन लोगों की अंशकालीन नियुक्ति करती हैं उनमें अधिकतर को इतनी राशि भी नहीं दी जाती है कि वे ठीक ढंग से दो वक्त का खाना खा सकें और परिवार पाल सकें. उनके बारे में आमतौर पर यह धारणा भी बनी हुई है कि उनमें से ज्यादातर पत्रकारिता की ताकत का इस्तेमाल अपने हितों में करते हैं जो आखिरकार स्थानीय संवाददाताओं के पूर्वाग्रहों के रूप में सामने आते हैं. इस बात को भी अनदेखा किया जाता है कि दूरदराज के इलाके से खबरें देने वाले लोग सचमुच वैसे खतरों से घिरे रहते है जो आखिरकार उनके लिए जानलेवा साबित होते हैं. बड़े शहरों में वैसे खतरे बहुत कम होते हैं और उनकी सुरक्षा के लिए संरक्षण और संस्थाएं भी खड़ी रहती हैं.

शहरों में पत्रकारिता का प्रशिक्षण लेने वालों के पास दूरदराज के इलाकों में काम करने का कोई तजुर्बा नहीं होता है, न ही दूरदराज के इलाकों के जीवन और समाज के बारे में अनुभव. एक सर्वेक्षण करें तो हम यह आसानी से पा सकते हैं कि सरकार के नए कृषि चैनल ‘डीडी किसान’ में अधिकतर पत्रकारों का कृषि से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कोई रिश्ता नहीं रहा है. कृषि चैनल पर कृषि और पत्रकार के रिश्ते के कई हास्यास्पद किस्से सुनने को मिल सकते हैं. यह कोई नई बात नहीं है. गांवों के इस देश में पत्रकारिता शहरी मिजाज और शहरी भाषा से ही होती रही है. पहले इस भूमिका में आने वाले लोगों में ज्यादातर की पृष्ठभूमि ग्रामीण होती थी. लिहाजा पत्रकार की समझ में ग्रामीण पृष्ठभूमि और शहरी प्रशिक्षण का एक संतुलन दिख सकता है लेकिन मौजूदा दौर में बेहद शहरी माहौल और मिजाज के साथ गांवों के इस देश में पत्रकारिता बेहद तकलीफदेह साबित हो रही है.

ग्रामीण स्तर पर शुरुआती तैनाती (पोस्टिंग) के बाद शहरों की तरफ प्रशिक्षित पत्रकारों के आने से पत्रकारिता की समझ में थोड़ा फर्क पड़ सकता है. पत्रकारिता के लिए बुनियादी काम करने वाले अप्रशिक्षित पत्रकारों व संवाददाताओं के लिए एक नए तरह का अनुभव साबित होगा. इस समय पत्रकारिता में ‘पहली नियुक्ति, पहले गांव’ के नारे जैसे एक नए प्रयोग की जरूरत है.

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विदर्भ में मीडिया संस्थानों की सामाजिक पृष्ठभूमि को लेकर शोध छात्र दिनेश मुरार ने एक अध्ययन किया. उसमें ये तथ्य सामने आए कि विदर्भ के दैनिक अखबारों के संपादकीय प्रमुख के पदों पर 100 प्रतिशत नियंत्रण सवर्ण पुरुषों का है. विदर्भ की पत्रकारिता में 42 प्रतिशत सवर्ण, 43 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग, 14 प्रतिशत दलित और केवल 1 प्रतिशत आदिवासी पत्रकार हैं. लैंगिक आधार पर विदर्भ की पत्रकारिता में 91 प्रतिशत पुरुष और केवल 9 प्रतिशत महिलाएं हैं. विदर्भ में भी खासतौर पर हिन्दी में सवर्ण वर्चस्व दिखता है. लोकमत समूह की हिंदी इकाई ‘दैनिक लोकमत समाचार’ में 12 प्रतिशत पत्रकार दलित, 4 प्रतिशत पत्रकार आदिवासी, 24 प्रतिशत पत्रकार पिछड़े वर्ग और 60 प्रतिशत पत्रकार सवर्ण हैं. हिन्दी अखबार दैनिक भास्कर में 3 प्रतिशत दलित, 27 प्रतिशत पत्रकार पिछड़े वर्ग के और 70 प्रतिशत पत्रकार सवर्ण हैं. इस संस्थान में एक भी पत्रकार आदिवासी नही हैं. हिन्दी पत्र नवभारत में 17 प्रतिशत पत्रकार दलित, 28 प्रतिशत पत्रकार पिछड़े वर्ग से और 55 प्रतिशत पत्रकार सवर्ण हैं. इस संस्थान में भी आदिवासी पत्रकार नहीं हैं.

मीडिया स्टडीज ग्रुप के देश के 620 जिलों में मीडियाकर्मियों की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से जुड़े तथ्यों में एक यह भी है कि झारखंड के गोड्डा में तीन सरकारी मान्यता प्राप्त पत्रकारों में एक भी न तो दलित है और न आदिवासी है. छत्तीसगढ़ के जशपुर में चार मान्यता प्राप्त पत्रकारों में तीन ब्राह्मण और एक बनिया है. ओडिशा के मल्कानगिरी में 22 मान्यता प्राप्त पत्रकारों में 19 सवर्ण, 2 दलित और एक पिछड़ा है. पूरे देश में जिला स्तर पर एक प्रतिशत भी दलित और आदिवासी पत्रकार नहीं होंगे. भारतीय समाज को योग्यता के पैमाने को इस रूप में समझना होगा कि वह वंचितों को वंचित रखने के नजरिये के साथ विकसित हुए हैं. भारतीय लोकतांत्रिक नजरिये से भारतीय मीडिया में योग्यता का पैमाना बनाया नहीं जा सका है.

निजी क्षेत्र बनाम सरकारी क्षेत्र

सरकारी मीडिया में भी महिलाओं और सामाजिक स्तर पर पिछड़े वर्गों को प्रतिनिधित्व नहीं मिलता. रेडियो, राज्यसभा टीवी, लोकसभा टीवी, दूरदर्शन के विज्ञापनों में आरक्षण शब्द तक की चर्चा नहीं होती है. दूरदर्शन और आकाशवाणी में सामाजिक वर्गों के संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक प्रतिनिधित्व नहीं है. मीडिया के दो बड़े संस्थानों आकाशवाणी और दूरदर्शन में 40 हजार से ज्यादा कर्मचारी हैं. आकाशवाणी दूरदर्शन के मुकाबले बड़ा संगठन है, लेकिन संसद की एक रिपोर्ट के मुताबिक वहां ‘क’ श्रेणी के पदों पर केवल 14 प्रतिशत महिलाएं हैं जबकि दूरदर्शन में 25 प्रतिशत हैं. दूरदर्शन में कुल 4714 दलित और आदिवासी है और उनमें महिलाओं की संख्या 203 और 101 है.

(लेखक रिसर्च जर्नल जन मीडिया और मास मीडिया के संपादक हैं)

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उर्दू मीडिया की स्थिति

ये आंकड़े फरवरी 2010 तक के हैं. राज्यसभा द्वारा प्राप्त सूचनाओं के अनुसार सदन में समाचार पत्रों के प्रतिनिधियों को प्रवेश के लिए मान्यता देने का सिलसिला 1952 से शुरू किया गया. समाचार पत्रों से पहले 1951 में ऑल इंडिया रेडियो को ही ये मान्यता थी. दूरदर्शन को 1965 में ये मान्यता मिली. 1952 में दैनिक आज, अमृत बाजार पत्रिका, हिन्दुस्तान, असम ट्रिब्यून, फ्री प्रेस जर्नल, द हिंदू, द स्टेट्समैन, द टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, तेज, समाज, जन्मभूमि को मान्यता वाले समाचार पत्रों की सूची में शामिल किया गया लेकिन उर्दू समाचार पत्रों में 1952 और 1993 के बीच केवल एक समाचार पत्र को राज्यसभा में मान्यता दी गई. 2010 में दिल्ली के तीन, बेंगलुरु, लखनऊ, हैदराबाद और रांची के एक-एक उर्दू समाचार पत्र को मान्यता प्राप्त हुई.

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मुद्दों की लड़ाई से दूर पत्रकार यूनियन

P&C-11July2पिछले दिनों एक मीडिया समूह ने 50 पत्रकार और गैर-पत्रकार कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया. मीडिया समूहों के लिए यह कोई नई बात नहीं थी. इससे पहले भी अलग-अलग संस्थानों से कभी 150 तो कभी 350 लोगों को बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है. वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट के अंतर्गत काम के छह घंटे जैसी बातें मीडिया हाउसेज में भुलाकर आठ घंटे से लेकर असीमित घंटों में तब्दील हो चुकी हैं. ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि पत्रकारों के लिए बनी यूनियनें और प्रेस क्लब पत्रकारों के हित के लिए क्या कर रही हैं? सवाल इसलिए भी खड़े हो रहे हैं क्योंकि पत्रकार यूनियनें अपने वर्ग के हित की लड़ाई छोड़कर बस में किराया नहीं लगे, मकान के लिए प्लॉट आवंटित हों आदि मुद्दों पर जोर देने लगी हैं.

इसके बारे में बृहन मुंबई जर्नलिस्ट यूनियन के महासचिव एमजे पांडेय कहते हैं, ‘दरअसल 1980 के अंतिम वर्षों में नियमित रोजगार की जगह कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम लाया जा रहा था तब टाइम्स समूह के सभी अखबारों के लोगों ने इसका बहुत जोरदार विरोध किया था लेकिन शीर्ष पर बैठे संपादकों और हमारे बीच के कुछ पत्रकारों ने कुछ प्रमोशन और इंक्रीमेंट के लालच में उनका साथ दिया और दिन-रात एक करके अखबार निकाले. मेरी समझ में एक बात आज तक नहीं आई कि टाइम्स ग्रुप ने इस दौरान एक नया अखबार क्यों शुरू किया और फिर साल-डेढ़ साल चलाकर क्यों बंद कर दिया? ‘द इंडीपेंडेंट’ नाम के इस अखबार में सिर्फ और सिर्फ कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर करने वाले लोगों को रखा गया था. इस अखबार के संपादक विनोद मेहता थे. कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम लागू हो जाने की वजह से यूनियन के हाथ में ज्यादा कुछ नहीं रह गया. एक बात और है कि न्याय व्यवस्था में आप किसी लड़ाई को लेकर जाते हैं तो वहां 20-22 साल फैसले के लिए इंतजार करना पड़ता है.

एक पत्रकार को देश की सबसे बड़ी न्यूज एजेंसी से 1993 में नौकरी से बाहर कर दिया गया था. मामला आजतक अदालत में चल रहा है. यह सच है कि कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम के आने से पत्रकार यूनियनें कमजोर तो हुई हैं लेकिन धीरे-धीरे उसके भीतर भी खामियों का टीला सा खड़ा होता चला गया. इस बारे में दिल्ली जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल पांडेय कहते हैं, ‘पत्रकारों के लिए बनी यूनियनों में ही बहुत भ्रष्टाचार व्याप्त है. उनके पदाधिकारी अपने लिए फेलोशिप जुगाड़ने में या फिर नेताओं से संपर्क साधकर पैसा कमाने में लगे हैं. आखिर क्या वजह है कि यूनियन में एक ही व्यक्ति तीन दशक से अध्यक्ष के पद पर बने हुए हैं?’

गौरतलब है कि के. विक्रम राव पिछले 31 सालों से इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्ल्यूजे) के अध्यक्ष हैं  और लगभग एक दशक से  परमानन्द पांडेय इस यूनियन के महासचिव हैं. क्या आपकी यूनियन में प्रतिनिधियों के चयन के लिए कोई चुनाव नहीं होते हैं? इस सवाल के जवाब में  परमानन्द कहते हैं, ‘हमारे यहां ढाई साल में चुनाव होता है. हमारी यूनियन में प्रतिनिधियों के चुनाव के लिए हाल ही में चुनाव हुए हैं. के. विक्रम राव हर बार र्निविरोध चुने जाते हैं. उनके खिलाफ कोई चुनाव में खड़ा ही नहीं होता है.’  हालांकि इस संगठन से अलग हो चुके जयपुर के श्रमजीवी पत्रकार संघ में शीर्ष अधिकारी रह चुके एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि असल में आइएफडब्ल्यूजे राज्यों की अपनी इकाई को सेमिनार की इजाजत देती है और उसके बदले में पैसे वसूलती है. यही वजह है कि इस संगठन के शीर्ष अधिकारी दूसरों की हाथों में यूनियन की बागडोर नहीं जाने देना चाहते हैं. वे बताते हैं, ‘यूनियन का एक शीर्ष अधिकारी मजीठिया की सिफारिशों को लागू करवाने के लिए मोर्चा ले रहे पत्रकारों की कानूनी लड़ रहे हैं. वे हर पत्रकार से दस-दस हजार रुपये बतौर फीस ले रहे हैं. मुझे यह समझ नहीं आता है कि आप खुद पत्रकार रहे हैं. आप एक पत्रकार यूनियन के शीर्ष अधिकारी हैं फिर आप इतनी फीस कैसे ले सकते हैं?’

हकीकत यह है कि लड़ाई को नेतृत्व देने का खामियाजा उठाना पड़ता है, सो पत्रकार यूनियन से जुड़े लोगों को भी इसका खामियाजा उठाना पड़ा है. इंडियन एक्सप्रेस समूह की यूनियन से जुड़े रहे पत्रकार और गैर-पत्रकार यूनियन के सदस्य रहे वरिष्ठ पत्रकार सत्येंद्र रंजन ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा, ‘बछावत समिति की रिपोर्ट को लागू करने के लिए हम लड़ रहे थे तब उस वक्त जनसत्ता के संपादक हमारी एकता को कमजोर करने के लिए लोगों को प्रमोशन देने से लेकर नौकरी से निकालने तक की धमकी दे रहे थे.’ वहीं दूसरी ओर ब्रह्मानंद पांडेय को ‘जनसत्ता’ से इसलिए निकाला गया था क्योंकि वे बोनस की लड़ाई लड़ रहे थे. बोनस की मांग को लेकर हड़ताल दो महीने खिंच गया था. आईएफडब्ल्यूजे के महासचिव ब्रह्मानंद पांडेय उस मंजर को याद करते हुए बताते हैं, ‘1987 में मैं जनसत्ता में बोनस की लड़ाई का नेतृत्व कर रहा था. जनसत्ता के संपादक प्रभाष जोशी और इंडियन एक्सप्रेस के संपादक अरुण शौरी ने लड़ाई को तोड़ने की हरसंभव कोशिश की. हड़ताल तोड़ने के लिए गुंडे तक बुलाए गए थे और मैं नौकरी से निकाल दिया गया.’

नाउम्मीद नहीं हैं यूनियन

बीते दो-तीन दशकों से पत्रकारों को सुरक्षा नहीं दे पाने की वजह से यूनियन ने अपनी प्रासंगिकता खो सी दी है लेकिन बीते कुछ सालों में पत्रकारों ने मीडिया संस्थानों या कंपनियों के लगातार बढ़ रहे शोषण के खिलाफ लड़ने के अलावा कोई और विकल्प बचा हुआ न देख यूनियन से नजदीकियां बढ़ाई है. एमजे. पांडेय ने बताया, ‘वे यूनियन के भविष्य को लेकर नाउम्मीद नहीं हुए हैं. यह सही है कि पत्रकारिता संस्थानों से पढ़कर निकले बच्चों को जर्नलिस्ट एक्ट और प्रेस एक्ट के बारे में ज्यादा पता नहीं है लेकिन वे अपने नागरिक और कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर सजग हो रहे हैं और लड़ने के मूड में दिख रहे हैं. यह एक अच्छा संकेत है. आप इसे वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करवाने के संदर्भ में देख सकते हैं.’ कभी पत्रकार रहे और अब वकालत कर रहे ब्रह्मानंद पांडेय ने जानकारी दी कि वे अलग-अलग मीडिया संस्थानों से केवल मजीठिया की मांग वाले लगभग एक हजार पत्रकारों की लड़ाई रहे हैं.

बदल रही है प्रेस क्लब की छवि

देश में प्रेस क्लब की छवि शाम को शराब पीने के अड्डे के तौर पर बन चुकी है. एक पत्रकार ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया, ‘मुझसे प्रेस क्लब के चुनाव के तीन-चार महीने पहले किसी ने क्लब की मेंबरशिप लेने के लिए कहा तो मैंने पूछा कि क्या करूंगा मेंबरशिप लेकर. उनका जबाव था कि शहर के केंद्र में किसी के साथ मिलने-जुलने और खाने-पीने की इससे सस्ती जगह और क्या हो सकती है?’ यह हाल दिल्ली स्थित प्रेस क्लब का है. लखनऊ, चंडीगढ़ और मुंबई की छवि भी इससे अलग नहीं है. प्रेस क्लबों में बैठने वाले पत्रकार भी मानते हैं कि यहां पत्रकार के नाम पर बहुत दलाल किस्म के लोग आते-जाते हैं. दलाल से उनका आशय मंत्री, नेताओं और चैनलों के मालिकों के पीआर करने से है. भला ऐसा क्यों न हो जब मुंबई प्रेस क्लब में हर साल एक कोर्स पीआर पत्रकारिता का आयोजन होता है. हालांकि प्रेस क्लब अपनी इस बदनुमा छवि से बाहर आने की कोशिश में जुटा हुआ है. पिछले कुछ सालों से यहां समय-समय पर अलग-अलग विषयों पर सेमिनार या बहसें होने लगी हैं. मानवाधिकार के हनन के सवाल पर भी यहां आयोजित होने वाली चर्चा-बहसों में शामिल किए जाने लगे हैं लेकिन अभी भी क्लब और यूनियन को मीलों का सफर करना बाकी है

जन मीडिया नहीं अभिजन मीडिया कहें

Subhash Gatade2अपने एक लेख ‘मीडिया एंड गवर्नेंस’ की शुरुआत करते हुए पत्रकार मुकुल शर्मा आधुनिक राजनीति के बारे में दिलचस्प बातें कहते हैं. उनका कहना है कि आधुनिक राजनीति एक मध्यस्थता करने वाली राजनीति है, जो ज्यादातर नागरिकों द्वारा ब्रॉडकास्ट और प्रिंट मीडिया के जरिए अनुभव की जाती है. जाहिर सी बात है कि उनका मानना है कि समकालीन समाजों में जनतंत्र का अध्ययन दरअसल इस बात का भी अध्ययन है कि मीडिया किस तरह राजनीतिक घटनाओं और मुद्दों को प्रस्तुत करता है और किस तरह वह राजनीतिक प्रक्रियाओं और सार्वजनिक मत को प्रभावित करता है.

एक बानगी देखिए ‘आप के इलाके में भूख का ट्रेंड कैसा है?’ कालाहांडी के एक दूरस्थ गांव में भूख से मर रहे शख्स से ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में न्यूजरूम में बैठे पत्रकार द्वारा पूछा गया यह सवाल. गोया यह काफी नहीं हो, तो दूसरा सवाल देखें, ‘वहां का वातावरण कैसा है और क्या अपने भूखे परिवारों के साथ लोग खुश हैं?’  कई बार रियल लाइफ परदे पर नजर आती जिंदगी यानी रील लाइफ को मात देती दिखती है. ओडिशा में भूख से हो रही मौतों को लेकर टीवी की लाइव रिपोर्टिंग शायद इसी बात की ताकीद कर रही थी. वैसे ‘इंफोटेनमेंट’ के इस जमाने में मीडिया में भूखे-प्यासों-मजलूमों की यह अचानक मौजूदगी अंग्रेजी जुबां में कहें तो कॉमिक रिलीफ प्रदान करती है.

एक तरफ यह आलम है कि भूख से मर रहा शख्स टीवी पर ‘सजीव हाजिर’ कर दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ यह स्थिति है कि जो लोग बेहतर इंसानी जिंदगी पाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, उनके प्रति सचेत चुप्पी बरती जाती है, गोया कुछ हो नहीं रहा है.

पिछले दिनों नर्मदा आंदोलन के तीस साल पूरे होने पर सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक जुटान का आयोजन राजधानी दिल्ली में हुआ. यह आंदोलन जिसने विस्थापन एवं पुनर्वास को लेकर देश के पैमाने पर व्यापक बहस खड़ी की, उसकी इस अहम बैठक का विवरण भी शायद ही किसी अख़बार में आया. एक वेबसाइट (हस्तक्षेप डॉट कॉम) पर यह खबर देखकर कि ‘दिल्ली में आंगनबाड़ी कर्मचारी अपनी मांगों के लिए छह दिन से भूख हड़ताल पर हैं’, मै थोड़ा चकित हुआ क्योंकि एकाध अपवादों को छोड़ दें तो जिसे मुख्यधारा का मीडिया कहा जाता है, वहां इसे लेकर विराट मौन पसरा था.

एक आम बात यह है कि जब श्रमिकों का विशाल जुटान राजधानी में होता है, जब देश के कोने-कोने से आए मजदूर अपनी मांगों को लेकर आवाज बुलंद करते हैं तो दूसरे दिन के अखबारों में उनकी मांगों को लेकर, सरोकारों को लेकर कोई बात नहीं होती. आम तौर पर उसे ब्लैकआउट कर दिया जाता है. हां, इस बात का अवश्य उल्लेख होता है कि किस तरह मजदूरों के आने से सड़कें जाम हो गईं थीं और दिल्लीवालों को कितनी परेशानी का सामना करना पड़ा!

यह सोचने का सवाल है. बकौल पी.साईनाथ, ‘जन मीडिया और जनयथार्थ में बढ़ता अंतराल किस वजह से है, जहां से गरीब को ढांचागत तौर पर बाहर कर दिया गया है.’ और जब जन के सरोकारों को जगह नहीं फिर उसके आंदोलनों को कहां ठौर मिलेगा. अपनी एक अन्य तकरीर में पी. साईनाथ ने इसका विचलित करनेवाला चित्रण किया था. उनका कहना था, ‘भारत का मीडिया समाज के अभिजात तबके को ही अहमियत देता है. हर साल मुंबई में आयोजित एक फैशन शो को कवर करने के लिए मीडिया के 512 प्रतिनिधि हाजिर रहते हैं, जबकि राष्टीय मीडिया के आधा दर्जन प्रतिनिधि विदर्भ के उन गांवों में जाकर रहना नहीं चाहते ताकि वह किसानों की आत्महत्या का ठीक से अध्ययन कर सकें.’ इसके अलावा, ‘महज एक टीवी चैनल और अखबार को छोड़ दें तो किसी भी मीडिया संगठन को समूचे देश में तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार की यह स्वीकारोक्ति कि 1997 से 2007 के दरमियान 1.6 लाख किसानों ने आत्महत्या की, प्रसारण योग्य समाचार नहीं लगा.’ साईनाथ के अनुसार, ‘मीडिया में, महाराष्ट्र सरकार द्वारा घर-घर जाकर किसानों पर किए गए उस सर्वेक्षण का भी कोई समाचार नहीं छपा जिसमें यह विचलित करने वाला तथ्य उजागर हुआ था कि 20 लाख किसान परिवार बेहद कठिनाई की स्थिति में जी रहे हैं.’

विडंबना यही है कि यह सब ऐसे दौर में हो रहा है जबकि मीडिया का जबरदस्त विस्तार हुआ है. कई सारी बहुदेशीय कंपनियां मीडिया के व्यवसाय में घुसी हैं जिन्होंने यहां की कंपनियों से गठजोड़ बनाया है या यहां की अग्रणी कंपनियों ने खुद अपने दायरे का प्रचंड विस्तार किया है. निश्चित ही आजादी के बाद कुछ दशकों तक, भले ही उन दिनों प्रिंट मीडिया का बोलबाला था, स्थिति इससे निश्चित ही बेहतर थी. जानकारों के मुताबिक सत्तर-अस्सी के दशक तक अखबारों में अलग-अलग ‘बीट’ की तरह श्रमिक बीट भी हुआ करती थी, जिसमें उसका जिम्मा संभाले रिपोर्टरों को श्रमिक जगत की खोज-खबर लेनी पड़ती थी, उसके जुलूसों औरआंदोलनों को ‘कवर’ करना पड़ता था. अब आलम यह है कि न केवल उस बीट को समाप्त कर दिया गया है, अब वहां पर सिर्फ बिजनेस बीट ही है, जहां पर तैनात रिपोर्टर को सीआईआई, फिक्की से लेकर विभिन्न मंत्रालयों की खाक छाननी पड़ती है. देश के सबसे मानिंद अखबारों में शुमार रहे पेपर में- जिसके संपादक ने कभी यह बात कही थी कि भारत में दो लोगों की बातों को ही जनता गंभीरता से लेती है, एक प्रधानमंत्री और दूसरा प्रस्तुत अखबार का संपादक. एक दशक से कार्यरत एक मित्र ने निजी बातचीत में बताया कि हमें साफ निर्देश है कि गरीबों, मजलूमों के दुख-परेशानियों की खबरें नहीं छापनी हैं, इससे हमारे उपभोक्ताओं एवं विज्ञापनदाताओं पर विपरीत असर पड़ता है. क्या इस समूचे मंजर को किसी संपादक के व्यक्तिगत आग्रहों, रुझानों का परिणाम कहा जा सकता है? या इसकी कुछ गहरी ढांचागत वजहें हैं. निश्चित ही इसकी ठीक से विश्लेषण करने की जरूरत है.

आखिर ऐसा क्यों मुमकिन हो सका है कि जो मीडिया तानाशाही निजामों को बेदखल करने की, औपनिवेशिक हुकूमत के खिलाफ व्यापक जनमानस को गोलबंद करने की या सामाजिक सरोकार के मसलों पर जनता को चेतना से लैस एवं सक्रिय करने की ताकत रखता रहा है, वह मुख्यतः खाये-अघाये लोगों के मनोरंजनों, चिंताओं, पूर्वाग्रहों तक सिमट गया है?

मीडिया में आ रहे इन बदलावों को वेस्टमिंस्टर विश्वविद्यालय में इंटरनेशनल कम्युनिकेशंस के प्रोफेसर दया किशन थुस्सू  ‘मर्डाकीकरण’ (रूपर्ट मर्डाक, जो स्टार मीडिया समूह के मालिक हैं और उनके नेटवर्क का प्रसार दुनिया के तमाम मुल्कों में है) के तौर पर संबोधित करते हैं, जो एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके तहत मीडिया की सत्ता का सार्वजनिक से चलकर निजी मिल्कियत, अंतर्देशीय, मल्टीमीडिया कॉर्पोरेशंस के हाथों में हस्तांतरण है, जो न केवल वितरण प्रणालियों और बल्कि वैश्विक सूचनाओं के नेटवर्क की अंतर्वस्तु को भी नियंत्रित करते हैं.

विशाल मीडिया समूहों के हाथों मीडिया की मिल्कियत का संकेंद्रीकरण, विज्ञापनों पर अत्यधिक निर्भरता, ब्रेकिंग न्यूज पर अत्यधिक फोकस, कुछ ‘विशेष’ स्टोरीज पर जोर और ‘कुछ भी चलता है’ की रणनीति, संपन्न मध्यम वर्ग (जो विज्ञापनदाताओं का सबसे लाभदायक निशाना रहता है) उसके लिए प्रिय लगने वाले मुददों पर कार्यक्रम और मार्केटिंग और संपादकीय विभागों के बीच बढ़ती दूरी और खबरों का वस्तु में रूपांतरण हो जाना’ आदि मर्डाकीकरण के ऐसे पहलू हैं जो भारत के मीडिया में विभिन्न स्तरों पर देखे जा सकते हैं. वहीं देश के एक अग्रणी मीडिया समूह की विकास यात्रा पर निगाह डाल कर हम इसे समझ सकते हैं. जानकारों के मुताबिक अस्सी के दशक में जब जनाब समीर जैन ने टाइम्स समूह का जिम्मा संभाला तबसे उसमें जबरदस्त बदलावों का आगाज हुआ. उनका बिजनेस चिंतन सरल था- वह वस्तुओं के विक्रेताओं को, ग्राहकों के इस विशाल बाजार के साथ जोड़ने का काम करेगा, बाजार के विस्तार के लिए उसे खबरी पत्रकारिता की तरफ से कोई व्यवधान नहीं चाहिए था, मगर ऐसी मार्केटिंग रणनीतियों की आवश्यकता थी जिससे खर्चे में कटौती हो और ब्रांड को भी उभारा जा सके.

चीजें किस तरह बदली हैं इसे हम अमेरिका की मशहूर मैगजीन ‘द न्यूयॉर्कर’ में प्रकाशित एक लेख के सहारे देख सकते हैं, जिसमें भारत के सबसे बड़े मीडिया घराने पर बात की गई थी. सांसद हरिवंश ने राज्यसभा में दिए अपने भाषण में इसका उल्लेख किया था. लेख के मुताबिक उस मीडिया के मालिक ने कहा था, ‘हम लोग अखबार के व्यवसाय में नहीं हैं. हम लोग विज्ञापन के व्यवसाय में हैं. अगर आप के द्वारा पढ़ी गई 90 फीसदी खबरें विज्ञापनों से आती हैं, तो आप विज्ञापन के व्यवसाय में हैं.’

वैसे इसमें कोई दोराय नहीं कि जबसे भाजपा का देश की सियासत में बोलबाला बढ़ा है तबसे उन्होंने भारतीय जनमानस के ‘सहजबोध’ को सांप्रदायिक शक्ल देने के लिये सुनियोजित, सुचिंतित योजनाएं चलाई हैं और इसके पीछे उनकी एक दूरगामी योजना भी रही है. जनमानस के सांप्रदायिककरण के प्रोजेक्ट को नवउदारवादी पूंजीवाद की उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों से परोक्ष-अपरोक्ष रूप में काफी मदद पहुंचती है.

अपनी एक चर्चित किताब ‘रिच मीडिया, पूअर डेमोक्रेसी’ में इलिनायस इंस्टिट्यूट के कम्युनिकेशन रिसर्च के प्रोफेसर रॉबर्ट मेकसेनी ठीक ही उल्लेख करते हैं कि किस तरह पूंजी के वैश्वीकरण की प्रक्रिया मीडिया को व्यवसायीकरण से परिपूर्ण कर देती है. उसके तहत उपभोक्तावाद, वर्गीय असमानता और व्यक्तिवाद को स्वाभाविक माना जाता है जबकि राजनीतिक गतिविधि, नागरिक हस्तक्षेप और बाजार विरोधी गतिविधियों को हाशिये पर डाला जाता है. साफ है कि ऐसी स्थितियां सांप्रदायिकता के विश्व दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने का रास्ता सुगम करती हैं जो बौद्धिकता या स्वतंत्र चिंतन की विरोधी है और जो ‘हम’ और ‘वे’ के ऐसे सरलीकरणों पर टिका है जिसे आम जनता द्वारा आसानी से ग्रहण किया जाता है. लाजिमी है कि लोकतंत्र को बहुसंख्यकवाद में रूपांतरित करने के इस माहौल में आमजन, उसके सरोकार और उसकी हलचलें अधिकाधिक हाशिये पर ढकेल दी जाती हैं.

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक हैं)