Home Blog Page 1386

manji-the-mountain-man-web

सबको दशरथ की कहानी अविश्वसनीय क्यों लग रही थी जबकि 60 के दशक में पहाड़ काटने का काम शुरू कर 22 सालों की अथक मेहनत से दशरथ मांझी पहाड़ काटकर रास्ता बना चुके थे.

दशरथ को जीते-जी उनके काम के लिए वह सम्मान कहां मिला!  मृत्यु के कुछ साल पूर्व से उन्हें सम्मान मिलना शुरू हुआ. अखबारों में, मीडिया में खबर आई, बावजूद इसके एक बड़ा खेमा ऐसा भी था, जो दशरथ को उसके इस विराट कार्य का श्रेय नहीं देना चाहता था. पहाड़ काट देने के बाद भी मीडिया का एक खेमा यह कहता रहा कि दशरथ ने यदि पहाड़ काटा तो कटने के बाद निकलने वाला पत्थर कहां गया! उसकी छर्री कहां गई? वन विभाग ने पहाड़ काटने पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? आदि. संभ्रांत व सामंतमिजाजी समाज ने तो कभी चाहा ही नहीं कि प्रेम के ऐसे उद्दात स्वरूप का श्रेय मांझी को जाए, इसके लिए वह आखिरी समय तक माहौल बनाने में लगा रहा. मुझे तो लगता है कि बाद के दिनों में दशरथ मांझी ने आध्यात्मिकता में मन इसीलिए लगा लिया था कि शायद उन्हें सर्वमान्यता मिले. वे कबीरपंथी हो गए थे लेकिन तब भी श्रेष्ठतावादी व शुद्धतावादी समाज उन्हें वह मान्यता नहीं दे सका.

लेकिन सुनते हैं कि नीतीश कुमार ने तो उन्हें अपनी कुर्सी पर बिठाया था?

यह सब तो बहुत बाद की बात है. 1982 में दशरथ मांझी पहाड़ काट चुके थे लेकिन उन्हें सम्मान तीन दशक बाद मिलना शुरू हुआ.

 आपकी तो कई बार बात-मुलाकात हुई होगी. पहाड़ काटने की सही घटना क्या है?

वे कई बार मिले. हम एकभाषी थे तो आत्मीयता से मगही में बात होती थी. वे मेरे दफ्तर में भी आते थेे. पहाड़ में रास्ता पहले से था पर बहुत ही संकरा. वे पहाड़ के उस पार खेत में काम करने जाते थे. उनकी पत्नी फगुनी देवी उसी संकरे रास्ते से उनके लिए खाना-पीना लेकर खेत में जाया करती थीं. एक दिन वह जा रही थीं कि  उस संकरे रास्ते में फंस गईं. खाना-पानी सब गिर गया. दशरथ का प्यास के मारे हाल-बेहाल था लेकिन पानी उन तक पहुंच नहीं सका. उन्होंने पत्नी की हालत देखी और उसी दिन तय किया कि कोई न कोई रास्ता तो निकालना होगा. फगुनी के लिए भी और उन तमाम महिलाओं के लिए भी, जो रोज खेत पर खाना-पानी लेकर आती हैं. दशरथ ने उसी दिन से अपनी रोजमर्रा की मजदूरी को जारी रखा लेकिन समय निकालकर पहाड़ को काटना भी शुरू कर दिया और 22 सालों में उस रास्ते को बना दिया. दशरथ फगुनी से प्रेम करते थे लेकिन फगुनी के बहाने कई स्त्रियों की मुश्किलें भी उनके सामने थीं. यही सच है, प्रेम व्यक्तिगत होता है लेकिन जब वह समूह का हो जाता है तो क्रांति हो जाती है. दशरथ ने क्रांति ही की. दुनिया में कोई मजदूर ऐसा नहीं होगा, जो अपनी मजदूरी करते हुए छेनी-हथौड़ी से ऐसा कीर्तिमान कायम कर दे, प्रेम की ऐसी निशानी बना दे.

आपने बताया सभी ने दशरथ की कहानी हटाकर सिर्फ जेहल की कहानी को प्रकाशित किया. जेहल की कहानी इतनी पावरफुल थी कि कई लोग उस पर फिल्म बनाने को तैयार थे लेकिन आप साथ में दशरथ की कहानी रखकर ही फिल्म बनाने की सलाह दे रहे थे. जेहल की कहानी भी बताइए.

जेहल भी गया जिले के अतरी प्रखंड इलाके के ही थे. वे मुसहर जाति के थे. दुल्लू सिंह जमींदार थे, जिनके यहां जेहल बनिहारी (मजदूरी) करते थे. जेहल की शादी दुल्लू सिंह ने अपनी ससुराल की राजमुनी से करवा दी. राजमुनी के पिता नचनिया थे और उसकी मां दुल्लू सिंह के ससुर की रखनी (रखैल) थीं, तो जेहल की पत्नी के आने के बाद दुल्लू सिंह ने कहा कि तेेरी मां को मेरे ससुर ने रखनी रखा था तो हम राजमुनी को रखेंगे. जेहल बेचारा क्या बोलता लेकिन राजमुनी ने विद्रोह कर दिया. एक दिन अचानक वह घर से निकल गई. रास्ते में जेहल मिला, जो टेउंसा बाजार से अपने मालिक के लिए गांजा लेकर आ रहा था. राजमुनी ने अपने पति से कहा, ‘वह जा रही है लेकिन एक दिन लौटकर आएगी, अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जिएगी, लेकिन तुम्हारे साथ ही’. राजमुनी वहां से भागकर बनारस में एक थियेटर कंपनी में नाचने लगी. इस बीच लोग जेहल को चिढ़ाते रहते थे कि तुम्हारी पत्नी तो गया में कोठे पर दिखी थी. कोई कुछ और कहता पर जेहल सबकी बात चुपचाप सुनता. वह मेरे पास भी आता था, मुझसे पूछता कि आपकी भी पत्नी है, वह भी तो भाग गई होंगी. पत्नी तो भाग ही जाती है न! जेहल बहुत ही मासूम इंसान था.

राजमुनी जिस थियेटर कंपनी में काम करती थी, वह एक बार राजगीर के मलमास मेले में आई. राजमुनी को फिर से दुल्लू सिंह ने देख लिया, वह बलात फिर उसे ले जाने लगे, इस बार राजमुनी ने दुल्लू की हत्या कर दी और फिर भाग गई. एक बार फिर से जेहल को किसी ने चिढ़ा कर कह दिया कि उसकी राजमुनिया तो नदी के उस पार मजार पर चादर चढ़ाने आई है, अभी-अभी दिखी है वहां. जेहल भागते-भागते नदी किनारे आया. नदी के उस पार जाने का कोई रास्ता नहीं था. उसने उस पार, राजमुनी के पास जाने के लिए भादों की उफनती हुई नदी में छलांग लगा दी, नदी से फिर उसकी लाश ही निकली. और संयोग कुछ ऐसा हुआ कि कुछ देर बाद सच में राजमुनी को लेकर दारोगा उसके गांव में पहुंचा. राजमुनी उसके पास रहने आई थी लेकिन जेहल जा चुका था. राजमुनी ने उसके पांवों के पास ही अपनी चूडि़यां तोड़ीं. मैंने समानांतर रूप से दशरथ और जेहल की प्रेम कहानी को लेकर ‘आदिमराग’ लिखी थी, यह बताने के लिए प्रेम का दायरा सिर्फ निजी स्तर पर होता है तो उसकी निष्पत्ति कैसी होती है और जब प्रेम समूह से जुड़ता है तो उसका स्वरूप कैसा होता है.

आपने यह कहानी भी प्रकाश झा को दी थी?

प्रकाश झा जी प्रेम पर फिल्म नहीं बनाना चाहते. उनके विषय दूसरे होते हैं. उन्होंने बेबीलोन पर बात की. एक बार दिल्ली बुलाया, मैंने 18 घंटों में एक कहानी लिखी- ‘अभिशप्त’. तीन साल बाद उस पर ‘मृत्युदंड’ फिल्म बनी. बासुभट्टाचार्य को भी जेहल की कहानी पसंद थी.

 आप मुंबई जाते नहीं, मुंबई आपकी शर्तों पर आता नहीं. यह जिद क्यों?

कोई जिद नहीं है. मैं खुद को िक्रएटिव बनाए रखने के लिए काम करता हूं, मुंबई के लिए नहीं. ‘पुरुष’ फिल्म के दौरान राजकुमार संतोषी ने एक फिल्म की कहानी मांगी थी. मैंने हां कह दिया था लेकिन फिर मुंबई नहीं गया. मुझे होटलों में रहकर स्क्रिप्ट और कहानी लिखना पसंद नहीं. मैं अपनी जमीन पर रहकर काम करना चाहता हूं. जिससे मन मिलेगा, काम करूंगा, नहीं तो कोई बात नहीं. मैंने कभी अपनी आकांक्षाएं उतनी बड़ी की ही नहीं कि मेरे मन पर मंुबई का मोहपाश भारी पड़ जाए. एक बार विक्रम चंद्र ने कहा कि आप गया में क्या कर रहे हैं, आपको मुंबई में होना चाहिए. मैंने उनसे कहा कि आप मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के लिए लिखते हैं तो आप लंदन में क्या कर रहे हैं? बात हंसी-हंसी में खत्म हो गई.

mrityudand-web

आपकी जानकारी में दशरथ मांझी पर और किन लोगों ने फिल्म बनाने की कोशिश की?

हमेशा ही कोई न कोई बात करता रहा. रुबीना गुप्ता ने तो डॉक्यूमेंट्री भी बनाई. उस डॉक्यूमेंट्री के लिए मैंने एक कविता भी लिखी, ‘ बोल देने से नहीं होता है प्रेम. क्रांति महज इतन नहीं है कि बोल दो नारा. उठा लो शस्त्र. प्रेम करना सीखो. जैसे यह श्वेत पुष्प जीना सीखता है रक्त समुदाय के साथ. मेरे भीतर.’

और भी कई लोगों ने कोशिश की. कुछ तो कहते हैं िक उन्होंने  दशरथ मांझी से जीते-जी लिखवा लिया था कि वे लिख दे कि उन पर फिल्म बनाने का अधिकार सिर्फ उनका ही होगा लेकिन केतन मेहता इसमें बाजी मार ले गए. दशरथ मांझी पर साहित्य हमेशा उपलब्ध रहा लेकिन साहित्य के क्रूर यथार्थ को लोक की रुचि के अनुसार सत्य में ढालने का काम ही तो निर्देशक का होता है, सिनेमा वही तो करता है और उस कहानी को केतन फिल्म के जरिये दर्शकों के सामने रखी.

 

आपने कहा कि होटलों में रहकर कहानियां लिखने से वह बात नहीं आ पाती. क्या आज की फिल्मों के साथ ऐसा ही है?

नहीं, ऐसा कैसे कह सकते हैं. एक से एक फिल्में आ रही हैं. अच्छी कहानियां लिखी जा रही हैं. अनुराग कश्यप की फिल्में हैं, राजकुमार हिरानी की फिल्में हैं और भी कई कहानियां हैं. दम लगा के हईशा, मसान… कई फिल्में आई हैं लेकिन मल्टीप्लेक्स के दौर में बड़े स्टार को ध्यान में रखकर कहानियां लिखी जाने लगीं तो फिल्मों का मामला गड़बड़ा गया. बड़े स्टार साल में कितनी फिल्में कर सकते हैं और स्टार हैं ही कितने! इसलिए स्टार के दायरे से फिल्मों को निकालना होगा. वह निकलने भी लगा लेकिन फिर वही प्रेम और शादी के इर्द-गिर्द फंसता गया. प्रेम, शादी के इतर की दुनिया भी है, जो सिनेमा का इंतजार कर रही है. सिनेमा में कुछ निर्देशक उस इतर दुनिया को तो सामने ला रहे हैं लेकिन अब भी गांव की वापसी का रास्ता नहीं दिख रहा. गांव को भी तो वापस लाना होगा.

गांव भी तो अब पहले जैसे नहीं रहे?

क्या बात कर रहे हैं आप? देखिए चलकर, एक से एक गांव मिलेंगे और उन गांवों में एक से एक कहानियां मिलेंगी. मध्ययुगीन क्रूरता अब भी मिलेगी.

केतन की फिल्म की स्क्रिप्ट आपने देखी होगी. क्या वे असल दशरथ मांझी को लेकर आ रहे हैं?

मैंने कहा न कि सहमति-असहमति कई बिंदुओं पर हो सकती है लेकिन केतन को बधाई दीजिए िक वे इसे कर रहे हैं. तीन दशक तक फिल्म इंडस्ट्री के लोग इस कहानी को अविश्वसनीय ही मानते रहे और अब केतन ने इसे पूरा किया है. बाकी कई बिंदुओं पर असहमति हो सकती है, वह अलग बात है. अब जब यह फिल्म चल रही है तो याद रखिए कि दशरथ जैसे मामूली लोगों को लेकर बायोपिक फिल्मों का दौर लौटेगा और तब कई मांझियों की कथा सेल्यूलॉयड के जरिये सामने आएगी. गांव-कस्बों में एक से बढ़कर एक नायक हुए हैं, जिनकी कहानियां दुनिया को प्रेरित कर सकती हैं. जैसे दशरथ की कहानी में खास है कि एक मजदूर ने प्रेम की ऐसी निशानी दी कि शहंशाह का प्रेम हाशिये पर चला गया, वैसी ही कई कहानियां हैं अपने देश में.

‘मैं खुद को क्रिएटिव बनाए रखने के लिए काम करता हूं, मुंबई के लिए नहीं’

18-web आप विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं, ऐसे में लेखन की प्रेरणा कहां से मिली?

हम लोग मूल रूप से बिहार के ‘बाढ़’ कस्बे के रहने वाले हैं. वहीं पढ़ाई-लिखाई हुई. मेरे पिताजी राजकमल चौधरी (प्रसिद्ध मैथिल और हिंदी लेखक) के पिता के साथ शिक्षक थे. बिहार के एक उपन्यासकार अनूप लाल मंडल के साथ भी उन्होंने काम किया. पिताजी भी लिखते थे. इसका असर मुझ पर और मेरे बड़े भाई पर भी पड़ा. आठवीं क्लास से मैं भी बाल कविताएं लिखने लगा. बाल भारती आदि में कविताएं छपने लगीं. मैट्रिक पास किया तो बड़ों के लिए कविताएं लिखने लगा. फिर इंटर पास करने के बाद मैं और बड़े भाई मिलकर ‘कथाबोध’ नाम की पत्रिका निकालने लगे. शे.रा. यात्री, नरेंद्र कोहली जैसे लेखकों ने उस वक्त हमारी पत्रिका में लिखा बाकी जो बेहतरीन कहानीकार होते थे, हम लोग उनकी कहानियां छापते थे. जो स्थानीय लेखक थे, जिनकी कहानियां नहीं छपती थीं, उनकी किताबें भी सहयोग के तौर पर छापते थे, इस तरह लेखन से लगाव होता गया.

आप कविताएं लिखते थे लेकिन पहचान कथाकार की है. कथा की दुनिया में कब प्रवेश किया?

जब से कथाबोध पत्रिका निकालने लगा तभी से कहानियों की समझ होने लगी थी. ग्रेजुएशन के पहले साल में मैंने ‘और सीढि़यां टूट गईं…’ शीर्षक से एक कहानी लिखी. वह कहानी ‘रेखा’ पत्रिका में प्रकाशित हुई. उसके बाद ‘अपर्णा’, ‘कात्यायनी’ आदि पत्रिकाओं में कहानियां भेजने लगा. कहानियां तो लिखने लगा लेकिन कविता से न तो सरोकार कम हुआ, न लिखना बंद किया.

यानी कि तब से लगातार लिख रहे हैं!

नहीं. अभी तो लिखना शुरू ही किया था कि दूसरे किस्म की परेशानी सामने आ गईं. हम भाइयों ने जिस पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया था, वह एक साल बाद बंद हो गई. इस बीच पिताजी की तबियत ज्यादा खराब हुई तब उन्होंने स्कूल जाना छोड़ दिया. बड़े भाई की भी तबियत खराब रहने लगी. घर में आर्थिक संकट था. मैंने तब कॉलेज में नया-नया दाखिला लिया था. संकट के उस दौर में मैंने सब छोड़-छाड़कर अर्थोपार्जन की ओर ध्यान लगाया और एक साथ पांच-छह ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया. उससे जो आमदनी होती थी, उससे अपनी पढ़ाई भी करता था और घर की देखरेख भी.

इस तरह लेखन छूट जाने पर एक लंबा गैप रहा. लेखन से एक लंबे समय तक दूरी बनी रही. वह तो जब बीएससी आखिरी साल में पढ़ रहा था तो राजकमल चौधरी का एक पत्र आया, जिसमें लिखा था कि वे बाढ़ आने वाले हैं. नीलम सिनेमा हॉल के मैनेजर को भी बता दीजिएगा कि आने वाला हूं. आप और क्या-क्या लिख रहे हैं, यह भी देखूंगा और यह भी बताइए कि आप लेखन के अलावा और क्या करते हैं? तब मैं क्या जवाब देता कि अब लेखन छोड़कर सब करता हूं. बीएससी के बाद साइंस टीचर के रूप में मेरी नौकरी राजगीर के पास एक गांव में लगी. मुझे बुलाकर ले जाया गया, क्योंकि उस समय साइंस टीचर कम मिलते थे, उनकी बड़ी इज्जत भी होती थी लेकिन उस गांव में सांप्रदायिक तनाव इतना रहता था कि मैं नौकरी छोड़कर चला आया. फिर रिजर्व बैंक फील्ड सर्विस में नौकरी की लेकिन 11 बाद वहां से भी नौकरी छोड़नी पड़ी. बाद में प्रखंड सांख्यिकी पर्यवेक्षक के तौर पर मेरी नौकरी लगी और पटना जिले के बाढ़ को छोड़कर घोसी में नौकरी करने आ गया. वही घोसी इलाका मेरे कथालेखन का गुरु बना और आज भी कथालेखन के क्षेत्र में उसी इलाके को मैं अपना गुरु मानता हूं.

वह इलाका कैसे गुरु हुआ?

वहां जिस पद पर आया था, उसके लिए पूरे इलाके को घूमना जरूरी था. घूमता रहा तो फिर से कथाकार मन जागृत हो गया. मैं हर 15वें दिन एक कहानी लिखकर ‘कहानी’ पत्रिका के संपादक संपत राय को भेजता था. वह मेरी हर कहानी लौटा देते और लिखते कि शैवाल तुम में बड़ी आग है लेकिन इस आग को एक आकार कैसे दिया जाए, फिलहाल मैं नहीं समझ पा रहा इसलिए यह कहानी लौटा रहा हूं. उनके बार-बार लौटाने के बाद भी मैंने लिखना नहीं छोड़ा. उसी क्रम में 1976 में ‘दामुल’ कहानी मैंने भेजी और वह वहां छप गई. घोसी में रहते हुए ही मैंने ‘कहानी’ पत्रिका को कहानी भेजने के साथ ही, ‘रविवार’ पत्रिका मंे ‘गांव’ नाम से कॉलम लिखना शुरू किया. गांव में मेरी एक कहानी ‘अर्थतंत्र’ भी छप चुकी थी, साथ ही धर्मयुग में ‘समुद्रगाथा’ कहानी भी छपी थी.

कविताओं से कहानियों की दुनिया, फिर फिल्म लेखन की प्रेरणा कहां से मिली?

‘रविवार’ में एक पत्रकार अरुण रंजन थे. 1980 के करीब बिहारशरीफ में दंगा हुआ था. सभी पत्रकार बिहारशरीफ जा रहे थे. मैं भी अरुण रंजन के साथ गया. सबने रिपोर्ट वगैरह लिखी, मैंने बिहारशरीफ दंगे पर कुछ छोटी-छोटी कविताएं लिखीं. कविताएं छपीं. तब बिहारशरीफ दंगे पर प्रकाश झा एक डॉक्यूमेंट्री बना रहे थे. उन्होंने मुझे पत्र लिखा कि वे अपनी डॉक्यूमेंट्री में मेरी कविताओं का इस्तेमाल करना चाहते हैं. इस तरह प्रकाश झा से मेरे रिश्ते की शुरुआत हुई. बाद में उनसे खतो-किताबत का रिश्ता बन गया. उन्होंने फिल्म के लिए और कहानियां मांगी, मैंने दे दीं. समुद्रगाथा भेजी, उन्हें पसंद आईं. फिर कालसूत्र कहानी पर बात हुई. ‘दामुल’ की कहानी कालसूत्र नाम से ही प्रकाशित हुई थी. तीन साल तक  ‘दामुल’ पर काम चला और बाद में 1985 में फिल्म आई तो सबने देखा-जाना. उस साल राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में उसे सर्वोच्च फिल्म का पुरस्कार भी मिला. उसके बाद ‘सारिका’ में एक कहानी प्रकाशित हुई थी ‘बेबीलोन’, प्रकाशजी उस पर भी फिल्म बनाना चाहते थे, बात भी हुई थी लेकिन किसी वजह से वह रुक गई.

damul-web

प्रकाश झा के साथ इतनी फिल्मों पर बात की, साथ मिलकर दामुल जैसी फिल्म भी दी. फिर आगे बात क्यों नहीं बन सकी?

प्रकाश झा जी के साथ उसके बाद मृत्युदंड फिल्म तो की ही थी मैंने. ऐसा नहीं कि प्रकाश झा से मेरे व्यक्तिगत रिश्ते कभी खराब हुए, अब भी उनसे बात होती है. आज भी मैं उन्हें बड़े गुलाम अली खां ही कहता हूं और वे मुझे फटीकचंद औलिया बुलाते हैं. व्यक्तिगत रिश्तों की गर्माहट बनी हुई है लेकिन फिल्मों में हमारे रास्ते बदल गए. प्रकाशजी ने दूसरी तरह की फिल्मों की ओर रुख कर लिया, उन्होंने बाजार के बड़े रास्ते की ओर रुख कर लिया पर मेरा मन कभी उस बड़े-चौड़े रास्ते के प्रति आकर्षित नहीं हुआ.

दामुल इतनी चर्चित हुई, राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला, मृत्युदंड की कहानी को उस साल की सर्वश्रेष्ठ कहानी की श्रेणी में नामित किया गया, तो क्या मुंबईवालों ने कभी संपर्क नहीं किया?

क्यों नहीं किया! बहुत बार संपर्क किया और मैं लगातार काम करता रहा लेकिन मैं अपनी जमीन छोड़कर काम नहीं कर सकता. जब मैं घोसी रहने गया और बाद में गया आया तो लगा कि अपने जीवन में कम से कम मध्य बिहार की ही बड़ी-छोटी घटनाओं का साहित्यिक दस्तावेजीकरण कर दूं, तो मेरे कर्तव्य के लिए यह बड़ी बात होगी. मैंने ऐसा करने की हरसंभव कोशिश भी की. मध्य बिहार में कोई ऐसी घटना-परिघटना नहीं हुई, जिसे मैंने अपनी कहानियों में नहीं लिया. यह मेरी प्राथमिकता रही लेकिन प्रकाशजी के इतर ‘पुरुष’ फिल्म बनी तो उसकी स्क्रिप्ट लिखी. राजन कोठारी  ने जब ‘दास कैपिटल’ बनाने की सोची तो उनका साथ भी दिया. प्रकाशजी के ही असिस्टेंट और मित्र अनिल अिजताभ ने जब भोजपुरी फिल्म बनाने की सोची तो पहली बार भोजपुरी फिल्म ‘हम बाहुबली’ लिखी और अभी निर्देशकों की मांग के बाद कम से कम चार कृतियों की स्क्रिप्टिंग का काम हो चुका है, उन पर काम चल रहा है. वैसे काम लगातार चलता ही रहा, कभी रुका नहीं.

केतन मेहता की फिल्म  ‘मांझी- द माउंटेनमैन’  के प्रोमो में उन्होंने आपका नाम डायलॉग कंसल्टेंट के बतौर दिया है. उनसे कैसे जुड़े? फिल्म के बारे में क्या राय है?

इसके लिए तो पहले केतन मेहता को बधाई और बहुत शुभकामनाएं कि जिस विषय पर फिल्म बनाने की बात 1980 से बड़े-बड़े निर्देशक करते रह गए, सोचते रह गए, स्क्रिप्ट वगैरह पर काम कर के भी रुक गए, उस फिल्म को लाने का काम केतन ने किया. केतन मेहता बड़े फिल्मकार हैं. 2013 में एक दिन वे पत्नी दीपाजी  (दीपा साही) के साथ मेरे घर आए. गया की बेतहाशा गर्मी में हाथ वाला पंखा लेकर पसीने से तर-ब-तर होकर चार घंटे तक दशरथ मांझी पर बात करते रहे. मुझे जितनी जानकारी थी, मैंने उनसे साझा की. स्क्रिप्ट में कुछ सुझाव-सलाह देने थे, वो दिए. बाद में प्रकाश झा जी का फोन आया कि डायलॉग भी देख लीजिए तो प्रकाशजी की बातों के बाद मैं कुछ बोल नहीं पाता, न आगे-पीछे पूछ पाता हूं. केतनजी बड़े फिल्मकार और नेकदिल इंसान हैं ही, तो डायलॉग्स में जो संभव था, वह भी किया. और अब तो फिल्म ही रिलीज हो चुकी है. फिल्म से सहमति-असहमति की बात अलग हो सकती है लेकिन केतन मेहता के साहस को सलाम करना चाहिए, वरना तीन दशक से अधिक समय से बॉलीवुड की दुनिया दशरथ के कृतित्व व व्यक्तित्व को समझने में ही ऊर्जा लगाती रही.

तीन दशक का क्या अर्थ? पहले किसने कोशिश की?

बात 80 के दशक की है. दामुल बन चुकी थी. उसी वक्त मेरी एक कहानी धर्मयुग में प्रकाशित हुई थी- आदिमराग. उस कहानी के छपने की भी एक कहानी थी. आदिमराग की पूरी कहानी, दो प्रेम कहानियों की थी. एक कहानी दशरथ मांझी की और दूसरी कहानी जेहल की. दोनों की प्रेम कहानी समानांतर रूप से आदिमराग में चलती है. मैं उस कहानी के जरिये सिर्फ यह बताना चाहता था कि किसी भी प्रेम की शुरुआत व्यक्तिगत स्तर पर ही होती है लेकिन जब उसका जुड़ाव समूह से हो जाता है तो वह उद्दात रूप ले लेता है और क्रांति होती है और तब दशरथ मांझी जैसी प्रेम की निशानी पहाड़ काटने के सामने शाहजहां का ताजमहल भी बौना लगने लगता है. मैंने यह कहानी धर्मवीर भारती को भेजी. उन्होंने कहा कि जेहल की कहानी विश्वसनीय है लेकिन दशरथ मांझी वाली कहानी अविश्वसनीय है, इसलिए इसके हिस्से को काटकर छापूंगा. दशरथ की कहानी कट गई, आदिमराग कहानी छपी. उस पर देशभर से प्रतिक्रिया आई.

उसी क्रम में मैं मुंबई गया तो बासु भट्टाचार्य मुझसे मिलने मनमोहन शेट्टी के दफ्तर में आए और बोले कि ‘आदिमराग’ पर फिल्म बनाना चाहता हूं, आप उसकी स्क्रिप्ट पर काम कीजिए. मैंने कहा कि धर्मयुग में आदिमराग कहानी अधूरी  छपी है, पूरी तो मेरे पास है. वह तो सिर्फ जेहल की कहानी है, दशरथ की कहानी को भी जोड़ना होगा. बासु को भी दशरथ की कहानी अविश्वसनीय लगी. बावजूद इसके उन्होंने उस पर काम शुरू करवाया, स्क्रिप्टिंग हुई लेकिन फिल्म बन न सकी. फिर आदिमराग की ही मांग गौतम घोष ने की. उन्होंने संदेशा भिजवाया कि आदिमराग पर फिल्म बनाना चाहते हैं, उन्हें भी मैंने यही कहा िक कहानी अधूरी है, कहानी दशरथ से पूरी होती है. पर उन्हें भी दशरथ की कहानी अविश्वसनीय लगी.

[ilink url=”https://tehelkahindi.com/continued-part-of-shaiwal-interview/” style=”tick”]आगे पढ़ें [/ilink]

लौटने लगे हैं लोग मेरे गांव के…

Ghar wapasiउत्तर प्रदेश के कानपुर की अनिता मिश्रा ने जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की और ‘गृहलक्ष्मी’ पत्रिका से जुड़ गईं. अचानक एक दिन घर से फोन आया कि उनके पिताजी पक्षाघात के शिकार हो गए. वे अपने पिता की सेवा-सुश्रूषा के लिए कानपुर चली गईं. हालांकि अब पिताजी का साया भी सिर से उठ चुका है. लिखने के शौक ने ही पत्रकारिता के क्षेत्र में धकेला और इसी सिलसिले में वह दिल्ली भी आईं. वे कानपुर तो कुछ समय के लिए गई थीं लेकिन पिताजी के न रहने पर यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि मां की देखभाल और पिताजी द्वारा खड़े किए गए इंटीरियर डेकोरेशन के कारोबार को कौन चलाएगा? अनिता को लिखने का शौक है, सो उनके मन में दिल्ली छोड़कर कानपुर में इंटीरियर डेकोरेशन के कारोबार संभालने को लेकर बहुत लंबे समय तक उनके मन में द्वंद्व चलता रहा.

उन्होंने लिखने का सिलसिला आज भी जारी रखा है और घर के कारोबार की जिम्मेदारी भी बखूबी अपने कंधों संभाल ली है. जमे-जमाए कारोबार के अलावा कानपुर वापसी में कौन-कौन से कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई? इस सवाल के जवाब में वे कहती हैं, ‘मुझे दिल्ली में हर आदमी भागता हुआ नजर आता था. दिनचर्या की एेसी-तैसी हो जाती थी. मतलब आप सुबह उगते हुए सूरज से ठहरकर दो मिनट बात नहीं कर सकते और न ही रात में चांद की रोशनी से नहाए आसमान के नीचे टिककर सुस्ता सकते हैं. महीने में जो पगार मिलती है, वह सब मकान, बिजली, पानी, मोबाइल सहित कई तरह के बिल के भुगतान में रफूचक्कर हो जाती है. इन परिस्थितियों के बीच पिताजी की बीमारी की खबर के समय जब मुझे यहां आना पड़ा और जब यहां रुकने या यहां से दिल्ली लौटने के सवालों से मैं टकराई तो थोड़ी मुश्किल और थोड़ी घबराहट जरूर हुई थी, पर आज कोई अफसोस नहीं है. हो भी भला क्यों, अब व्यवसाय और लेखन दोनों के साथ अच्छा तालमेल बिठाना संभव जो हो गया है.’

कानपुर की अनिता से इंदौर (मध्य प्रदेश) के अजय सोडानी के घर लौटने की कहानी बिल्कुल जुदा है. अजय ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में पढ़ाने की पेशकश ठुकराकर अपने प्रदेश में काम करना बेहतर और जरूरी समझा. अजय 1990 के दौर में दिल्ली पहुंचे थे. वे अखिल एम्स में न्यूरोलॉजी की पढ़ाई के लिए आए थे. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें यहां पढ़ाने का प्रस्ताव भी मिला था, मगर उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकराकर इंदौर में न्यूरोलॉजी पढ़ाने की ठान ली. उस वक्त मध्य प्रदेश में कहीं भी सरकारी-गैरसरकारी मेडिकल कॉलेज में न्यूरो की पढ़ाई नहीं होती थी. लगभग डेढ़ दशक तक उन्हें इस काम को परवान चढ़ाने के लिए संघर्ष करना पड़ा. वे फिलहाल इंदौर के सेम्स मेडिकल कॉलेज एंड पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट में पढ़ा रहे हैं और न्यूरोलॉजी विभाग के अध्यक्ष हैं.

लोगों के अपने वतन, अपने शहर या गांव लौटने की वजह थोड़ी मिलती-जुलती और थोड़ी-थोड़ी जुदा भी हैं. ऐसी कहानी अकेले अनिता या अजय ही नहीं बल्कि लोगों की संख्या हजारों में है. एक आंकड़े के अनुसार देश की एक बीपीओ कंपनी सर्को ग्लोबल सर्विसेज में 47 हजार लोग काम कर रहे हैं और इसके 40 फीसदी कर्मचारी महानगरों से इतर छोटे शहरों में कार्यरत हैं. इस कंपनी में हर महीने 300 नियुक्तियां होती हैं और इन नियुक्तियों के लिए आने वाले आवेदनों में से लगभग सात फीसदी लोग वडोदरा और विजयवाड़ा जैसे छोटे शहरों में अपनी पोस्टिंग की इच्छा जताते हैं. एसार कंपनी की बीपीओ समूह से संबद्घ एजिस कंपनी के एक अधिकारी ने नाम न उजागर करने की शर्त पर बताया कि पिछले डेढ़ साल में लगभग चार सौ आवेदन दिल्ली-गुड़गांव से दूर के अपेक्षाकृत छोटे शहरों मसलन इंदौर, भोपाल, जालंधर, विजयवाड़ा, रायपुर, सिलीगुड़ी, कोच्चि के लिए आए हैं. दिलचस्प यह है कि इन आवेदनकर्ताओं की उम्र 25-35 के आसपास की है.

घर लौटने की चाहत इस कदर बढ़ी है कि कई पीढ़ियों से विदेशों में रह रहे परिवार भी अपनी-अपनी जड़ें तलाशने भारत आने लगे हैं. विदेशों से 2003 में लगभग 60 हजार आईटी पेशेवर भारत के बंगलुरु, दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद लौटे थे. असल में दो या तीन पीढ़ी पहले गए भारतीयों के बच्चे जो वहीं पैदा हुए, पले और बड़े हुए हैं. हाल-फिलहाल वे अपनी आर्थिक बेहतरी, सांस्कृतिक अस्मिता की पहचान की खोज में अब वापस लौट रहे हैं. अमेरिका से बंगलुरु लौटीं एक आईटी पेशेवर सविता ने मीडिया से बातचीत में कहा, ‘मेरे पिता 1960 में ही अमेरिका जाकर वहीं बस गए. मैं वहीं पैदा हुई. पली-बढ़ी और पढ़ाई पूरी की. मैं एक बड़ी आईटी कंपनी में अच्छी सैलरी पर काम करती थी लेकिन मुझसे आज भी हर कोई यही पूछता था कि तुम कहां से हो? यह सवाल मुझे भीतर तक कुरेदता रहा. मुझे यह बहुत अटपटा लगता है कि यहां मेरे बाद की और कितनी पीढ़ियों को इस सवाल से टकराना पड़ेगा कि तुम कहां से हो?’

प्रसिद्घ समाजशास्त्री प्रोफेसर आनंद कुमार इस चलन के बारे में ‘तहलका’ कोे बताते हैं, ‘समाजशास्त्र में पलायन या घर लौटने के लिए परिस्थितियां आपको आकर्षित करती हैं या धकेलती हैं. आप इसे ऐसे समझें कि पहले बिहार से 12वीं या बीए पास लड़के दिल्ली आकर ऑटो चलाने से लेकर फैक्टरियों में काम करते थे लेकिन जब वहां उन्हें स्कूलों में नौकरी के अवसर मिले तो वे वापस घर की ओर लौटने लगे. इस तरह कई बार सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियां उठ खड़ी होती हैं और रोजी-रोटी के बहुत अच्छे या थोड़े कम अवसर पाकर भी लोग घर लौटने को तैयार हो जाते हैं.’

विदेशों में बसे ऐसे तमाम लोग हैं जो अपने-अपने देश या अपने देश के महानगरों से छोटे शहरों अथवा अपने गांवों को लौटना चाहते हैं. हम ऐसे ही कुछ लोगों के बारे में बात कर रहे हैं जो अपने गांव या शहरों को लौट चुके हैं और आज वे बेहद संतुष्ट हैं. हालांकि एक सच तो यह भी है कि मजबूरी में पलायन कर चुकी एक बड़ी आबादी ऐसा चाहकर भी कर पाने में अपने को समर्थ नहीं पाती है. दलित-पिछड़े और आदिवासी समुदायों की आबादी का एक बड़ा तबका मजबूरी में अपनी जड़ाें से उखड़कर आसपास के शहरों-महानगरों को पहुंचता है और उसकी विडंबना यह है कि उसमें से ज्यादातर लोगों के पास घर लौटने पर स्वागत करने लायक न जमीन का कोई टुकड़ा होता है और न ही कोई पुश्तैनी पूंजी.

गांव से शहर आने और फिर वापस गांव लौटने की ऐसी ही एक कहानी शिव कुमार की है. शिव, बिहार के एक छोटे से गांव मड़वन के रहने वाले हैं. 40 वर्षीय शिव ने स्नातक किया है. बिहार पुलिस में सिपाही बनने के लिए उन्होंने कई कोशिशें की लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी. इस बीच उनकी शादी हो गई और दो वक्त की रोटी के जुगाड़ में उन्हें शहर आना पड़ा. लेकिन परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि दो-ढाई साल शहर में बिताने के बाद शिव को फिर गांव लौटना पड़ा. उनकी दो बेटियां हैं जिन्हें वे गांव के पास के स्कूल में पढ़ाते हैं और खुद अपनी जमीन पर खेती करते हैं.

शिव के अनुसार, ‘2009 में मेरी शादी हुई. शादी के एक साल बाद मैं अपने गांव का खेत-खलिहान छोड़कर दिल्ली आया. यहां निजी गार्ड की नौकरी मिली. दो साल तक गार्ड की नौकरी करने के बाद समझ आया कि इस शहर में तो इतने पैसे में रहना और जीना भी मुश्किल है. इन दो सालों में काम के घंटे बढ़ते गए लेकिन पैसे कभी नहीं बढ़े. इन्हीं वजहों से परेशान होकर 2013 के दिसंबर में मैं वापस अपने गांव लौट आया. दिल्ली जाने से पहले खेत में काम करना अच्छा नहीं लगता था. मेरी पत्नी को भी मेरा खेत में दिन-दिनभर काम करना नहीं सुहाता था लेकिन अब तो हमें खेती से ही कमाना अच्छा लगता है और जिंदगी भी ठीक चल रही है.’

गांव वापस लौटने के बारे में शिव बताते हैं,  ‘यहां ठीक है. बहुत अच्छा नहीं तो बहुत बुरा भी नहीं. दिल्ली में तो बदरपुर और जैतपुर जैसे इलाकों में रहना भी मुश्किल होने लगा था… यहां कम से कम अपना एक मकान है. थोड़ी-सी जमीन है, जीवन चल रहा है. कुछ दिन और दिल्ली में रहे होते तो मुझे टीबी की बीमारी हो जाती. खाने-पीने का कोई ठिकाना नहीं था और बारह-बारह घंटे की नौकरी…’ शिव गांव इसलिए लौटे क्योंकि दिल्ली में जितने पैसे उन्हें मिलते थे, उसमें गुजारा कर पाना मुश्किल होता जा रहा था. जिंदगी पटरी से उतर जाने की चिंता सताती रहती थी.

खड़कपुर मेंे रह रहे 50 वर्षीय राधेश्याम शर्मा को ऐसी कोई दिक्कत नहीं थी. फिर भी दो साल पहले वो अपने पैतृक निवास छपरा लौट आए. राधेश्याम ने आईआईटी खड़कपुर से पढ़ाई की और फिर वहीं अपना व्यवसाय शुरू किया. कई साल व्यवसाय करने के बाद उन्हें लगा कि अगर वो अपना पैसा छपरा में निवेश करेंगे तो उन्हें ज्यादा फायदा होने के साथ प्रतिष्ठा भी मिलेगी. आज राधेश्याम शर्मा छपरा में व्यवसाय कर रहे हैं.

पटरी पर जिंदगी लाने की जद्दोजहद

वहीं समाजसेवी और पर्यावरणविद अनुपम मिश्र एक ऐसे वर्ग के बारे में जिक्र कर रहे हैं जिनके लिए स्थितियां न तो बड़े शहरों में अनुकूल हैं और न ही वहां जहां उनकी जड़ें थीं. वह कहते हैं, ‘विकास के नाम पर बिजली, घर, बांध, सड़क आदि के निर्माण के लिए लोगों को उजड़ने के लिए मजबूर किया जाता है और इनका नए शहर में कोई स्वागत करने वाला नहीं होता है. बड़े शहरों में जब मुश्किलें सताने लगती हैं तब इनके पास अपनी जड़ों की ओर लौटना भी संभव नहीं होता है क्योंकि इनका वहां भी कोई स्वागत करने वाला नहीं होता है. पिछले कुछेक वर्षों में एक ऐसा बड़ा वर्ग सामने आया है जो बड़े शहरों की चकाचौंध को छोड़कर अपने गांव, अपने कस्बे में लौट आया है और वहां वो अपने जीवन को पटरी पर लाने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रहा है.’

सबसे बड़ी जरूरत जिंदा रहना

सीएसडीएस के एसोसिएट फेलो चंदन श्रीवास्तव का मानना है कि इंसान की सबसे बड़ी जरूरत है जिंदा रहना. जब उसे गांव-देहात में आजीविका नहीं मिली तो वो शहर की तरफ भागा और आज जब बड़े शहरों में एक तबके के लिए अपना जीवन चलाना मुश्किल हो चला है तो वो वापस गांव या उन शहरों की तरफ लौट रहा है या लौटना चाह रहा है जहां के बारे में उसे लगता है कि वहां वो अपनी जीविका कमा लेगा और अपने जीवन की गाड़ी को सही तरीके से चला पाएगा.

चंदन कहते हैं, ‘विदेशों से वापस देश में आने वालों को या देश में ही बड़े शहरों से छोटी शहरों की तरफ लौटने वालों को दो अलग-अलग तबके में बांट लीजिए. पहला तबका वह है जो वहां अपने पैसे को बढ़ता हुआ देख रहा है. जिसे यह दिख रहा है कि अगर कुछ लाख रुपये वो बिहार के छपरा, हाजीपुर या उत्तर प्रदेश के कानपुर में लगाएगा तो उसे दिल्ली, मुंबई की तुलना में कम पूंजी लगानी पड़ेगी और मुनाफा भी ज्यादा मिलेगा. दूसरा तबका वह है जिसके लिए बड़े शहरों में जीवित रहना ही मुश्किल हो रहा है. उसे लगता है कि अगर वो अपने पैतृक गांव या शहर लौट जाएगा तो उसका जीवन सुधर जाएगा. उसके जीवन की गाड़ी पटरी पर आ जाएगी.’ चंदन यह भी कहते हैं कि अगर उन्हें मौका मिला तो वो खुद जल्द से जल्द अपने पुश्तैनी गांव लौट जाएंगे.

दो तरह के लोग

इस बारे में प्रो. विवेक कुमार कहते हैं, ‘जिनके पास पैसे हैं, गांव में जमीन है… उसके लौटने और जिसके पास कुछ खास नहीं है उसके लौटने में बड़ा अंतर है. एक वर्ग तो ऐसा है जिसने शहर में धन कमा लिया, घर भी बना लिया और फिर वो अपने गांव या कहें कि जहां से भी उसका स्थाई पता है वहां लौटता है. वो वहां भी एक सुंदर घर बनवाता है. वहां जाता है, रहता है. अपने समाज में उठता-बैठता है. ऐसा करने में उसे गर्व महसूस होता है. उसे लगता है कि उसने अपनी अमीरी की झलक वहां तक फैला ली है जहां उसके बाप-दादा रहते थे.’ प्रो. कुमार आगे कहते हैं, ‘इनके अलावा दूसरे वो लोग हैं जिनका जीवन न अपने-अपने गांव-कस्बों में बेहतर था और न ही बड़े शहरों में. अब ऐसे में लगता है कि यार… वहीं ठीक थे, अपना घर तो था. भले झोपड़ी थी, अपनी तो थी. उसे लगता है वहीं चला जाए और मेहनत की जाए.’

[box]

खेत से इश्क, मिट्टी बनी सोना

गिरींद्र नाथ झा, पूर्णिया, बिहार

girindra 03webगिरींद्रनाथ की फेसबुक प्रोफाइल छानेंगे तो कभी वे अपने खेत की मिट्टी को सोना बनाने में व्यस्त नजर आते हैं तो कभी मिट्टी की सौंधी खुशबू में लिपटी हुई पोस्ट में खेती-किसानी की बात करते. दरअसल बहुत लंबा समय दिल्ली और कानपुर में पत्रकारिता की नौकरी करने के बाद वे कुछ साल पहले पूर्णिया के अपने गांव चनका लौट गए अौर वहां रहकर खेती-किसानी में रम गए हैं. दिलचस्प यह है कि उन्होंने लिखने-पढ़ने से अपना नाता बरकरार रखा हुआ है.

असल में गिरींद्र कभी दिल्ली पढ़ने के सिलसिले में आए. स्नातक की पढ़ाई पूरी भी नहीं हुई थी कि सीएसडीएस-सराय के फेलोशिप प्रोग्राम के लिए उनका चयन हो गया. इस फेलोशिप के तहत उन्होंने दिल्ली के प्रवासी कॉलोनियों में टेलीफोन बूथ संस्कृति पर शोध कार्य को अंजाम दिया. इसके बाद उन्होंने पेशे के बतौर पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा. हाड़-तोड़ मेहनत के बाद छोटी-सी पगार मिलती जिसे महीना शुरू होते ही महानगर की महंगाई चट कर जाती. इस खर्च को पूरा करने के लिए खाली समय में वे अनुवाद का काम भी करने लगे. जिंदगी की भागमभाग से वे अक्सर तंग आ जाते और उनके मन को चौबीस घंटे यह सवाल कुरेदता रहता कि आखिर जिंदगी से उन्हें हासिल क्या हो रहा है? उन्हें अधिकांश समय इसका उत्तर नकारात्मकता की गहरी खाई में धकेलता. वे विकट परिस्थितियों से जूझते और महानगर की भागमभाग और रेलमपेल से लय बिठाने की हरसंभव कोशिश करते. लड़ते-जूझते हुए दिल्ली में उन्होंने नौ साल गुजार दिए.

2009 में गिरींद्र की शादी हो गई. जाहिर है कि अब रोजमर्रा का खर्च और बढ़ गया था. नौकरी और अनुवाद के बाद भी घर का खर्च चलाना मुश्किल होने लगा था. उन्होंने इससे निपटने के लिए यह तय किया कि दिल्ली की तुलना में किसी छोटे शहर को कूच कर लिया जाए. इस कड़ी में उन्हें कानपुर के दैनिक जागरण के टेबलॉयड और उसके डिजिटल कंटेंट नेटवर्क से जुड़ने का मौका मिला तो वे दिल्ली छोड़कर कानपुर चले गए. दिल्ली की तुलना में कानपुर सस्ता शहर था. वहां कुछ साल तक जीवन ठीक-ठाक चलता रहा. इस बीच गिरींद्र एक बच्ची के पिता बन गए और एक बार फिर से पत्रकारिता की छोटी पगार और पारिवारिक खर्च में इजाफा मन को बेचैन करने लगा था.

2012 के अप्रैल की बात है. एक दिन गिरींद्र के घर से फोन आया कि बाबूजी की तबियत बहुत बिगड़ गई है. इस खबर ने उनकी दुविधा के बांध को मानो जोरदार धक्का देकर तोड़ दिया. गिरींद्र के मन की बेचैनी को पत्नी भी समझ रही थीं, इसलिए उन्होंने भी गांव जाने के नाम पर एकबार भी एतराज नहीं जताया और वे अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर पूर्णिया लौट गए. पिता को बेटे की घर वापसी से संबल मिला लेकिन थोड़े समय के बाद वे जबरदस्त मानसिक आघात के शिकार हो गए थे. पिछले दिनों उनका स्वर्गवास हो गया. गिरींद्र को पिता ने खेती-किसानी शुरू करने से पहले उन्हें ग्रामीण परिवेश को समझने की सलाह दी थी. गिरींद्र ने उनकी सलाह गांठ बांधकर रख ली और वे सिर्फ गांव को समझ ही नहीं रहे हैं बल्कि आज वे वहां पूरी तरह रच-बस गए हैं.

गिरींद्र हर रोज सुबह 8 बजे खेत पहुंच जाते हैं और शाम ढलने तक खेती-किसानी को व्यवस्था देने में लगे रहते हैं. वे खेती को अपनी मेधा के बल पर नए तरीके से परिभाषित करने में लगे हुए हैं. एक ओर जहां देश में खेती घाटे का सौदा साबित हो रहा है तो वहीं दूसरी ओर पूर्णिया जैसे कम विकसित इलाके में गिरींद्र जैविक और नए तौर-तरीकों की खेती के बल पर खुद के और इलाके के किसानों का भरोसा खेती में लौटाने में लगे हुए हैं. वे इसमें सफल भी हो रहे हैं. वे अपनी 16.5 बिगहा की जमीन पर दो फसलें एक साथ उपजा रहे हैं. पारंपरिक अनाज के साथ वे मौसमी फलों का भी उत्पादन कर रहे हैं. इसके अलावा अपनी खेती का किस्सा अपने ब्लॉग ‘अनुभव’ पर नियमित लिखते हैं जिसके चलते उनकी खेती देखने के लिए देश ही नहीं विदेश से भी लोग उनके गांव चनका पहुंच रहे हैं.

शहर में लंबा समय गुजारने के बाद गांव में रचना-बसना आसान नहीं होता है. गिरींद्र के लिए भी गांव में टिकने का यह फैसला बहुत मुश्किलों भरा था. गिरींद्र के शब्दों में, ‘पूर्णिया जिले में बिजली आपूर्ति की हालत ठीक होने की वजह से लिखना-पढ़ना आसान हो गया है. मैं यहां से देश की अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं के लिए खेती-किसानी के संकटों पर लगातार लिख पा रहा हूं. नियमित ब्लॉग लिखता हूं. फेसबुक और ट्विटर पर भी खूब सक्रिय हूं.’ गौरतलब है कि राजकमल प्रकाशन के सार्थक उपक्रम के तहत गिरींद्र की लघु प्रेम कथा श्रृंखला की किताब ‘इश्क में माटी सोना’ बहुत जल्द प्रकाशित होने वाली है.

[/box]

Continue…. 

 

…Continued from last page

[box]

छोटे शहर में बसा संगीत का सर्जक

केशव कुंडल, देवास, मध्य प्रदेश

इंटरनेट की वजह से दुनिया छोटी होती जा रही है. इस जुमले को मध्य प्रदेश के एक बहुत छोटे से शहर देवास के केशव कुंडल ने चरितार्थ कर दिखाया है. असल में केशव ने फिल्म और सीरियल में इस्तेमाल होने वाली एक महत्वपूर्ण तकनीक ‘साउंड स्कोर’ का काम देवास स्थित अपने घर से करना शुरू कर दिया है. आमतौर पर इस काम को इससे पहले मुंबई में स्थित स्टुडियो में अंजाम दिया जाता रहा था लेकिन इंटरनेट, आधुनिक यंत्र और केशव की कुशलता ने बॉलीवुड का ध्यान देवास की ओर आकर्षित किया है. सच तो यह है कि बॉलीवुड के अधिकांश लोगों को देवास के बारे में पता ही नहीं है इसलिए केशव को उन्हें देवास की बजाय खुद को इंदौर का बताना पड़ता है.

keshav

यह केशव की मेहनत का ही नतीजा है कि सिर्फ आठ-नौ महीने में उन्होंने आम आदमी पार्टी के लिए संगीत बनाने से लेकर जैकी भगनानी सहित कई सितारों से सजी फिल्मों के लिए बैकग्राउंड स्कोर (दो लोगों के संवाद के बीच प्रभाव डालने के लिए संगीत का इस्तेमाल किया जाता है) देने का काम है. इसका इस्तेमाल गाने में मिक्सिंग के तौर पर भी किया जाता है. केशव ने ऑस्ट्रेलिया और मुंबई जैसी जगहों में मिल रहे मौकों को छोड़कर अपने शहर देवास में रहकर अपने काम को अंजाम देने का जोखिम उठाया तो उनके मां-पिता थोड़े अचरज में पड़ गए. हैरत तो यह है कि वे इंदौर के स्टूडियो की तुलना में पांच से दस गुना ज्यादा फीस की मांग करते हैं लेकिन अच्छी गुणवत्ता की वजह से आज उनके पास काम की कमी नहीं है. परिवार के कई सदस्यों और मित्रों ने केशव को ऑस्ट्रेलिया में ही बसने और काम करने की लाख हिदायतंे दीं लेकिन उन्होंने अपनी जिद के आगे किसी की नहीं सुनी और आज उनके इस फैसले से सभी बहुत खुश हैं. मां संतोष कुंडल आत्मविश्वास से भरकर अपने बेटे के बारे में बताती हैं, ‘जब केशव ने देवास में रहने का फैसला सुनाया तो मुझे अच्छा भी लगा लेकिन लगा कि यहां क्या करेगा? मुझसे और पापा से अक्सर तर्क-वितर्क करता और हमलोगों को समझाने की कोशिश करता लेकिन आज स्टूडियो को स्थापित हुए एक साल भी नहीं हुए और हमारे छोटे से घर में मुंबई से लोग केशव से काम करवाने पहुंचते हैं. मुझे अच्छा लगता है कि मेरा लड़का मेरे पास है और उसका काम भी अच्छा चल रहा है.’

केशव के पिता राजेंद्र प्रसाद कुंडल बिजली विभाग में डिवीजनल इंजीनियर हैं जबकि मां गृहिणी हैं. केशव की स्कूल की पढ़ाई देवास के सरस्वती शिशु मंदिर में हुई. स्कूल की पढ़ाई के बाद उन्होंने देवास स्थित एक कॉलेज से इंजीनियरिंग की डिग्री ली और आगे की पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया चले गए. केशव को स्कूली दिनों से ही संगीत में गहरी दिलचस्पी थी.  ‘तहलका’ से केशव अपनी कॅरिअर की यात्रा साझा करते हुए बताते हैं,  ‘आॅस्ट्रेलिया में पढ़ाई के दौरान और उसके बाद वहां मैं संगीत और साउंड रिकॉर्डिंग के क्षेत्र में काम करे रहे तमाम बड़े लोगों से मिलता रहता और अपने भीतर पनप रही इच्छा को हवा देता रहा. लगभग दो साल पहले इंजीनियरिंग की पढ़ाई ऑस्ट्रेलिया में पूरी करके मैं देवास छुट्टियों में आया था तब आॅस्ट्रेलिया और भारत के रिश्तों को लेकर एक फिल्म बन रही थी. गिरीश मकवाना इस प्रोजेक्ट से जुड़े हुए थे. ऑस्ट्रेलिया में उनके एक शो के दौरान मैं उनसे मिल चुका था. फिर उनका फेसबुक पर एक मैसेज आया कि तुम अगर भारत में हो तो मुझसे संपर्क करो. मुझे सोनू निगम और सुनिधि चौहान का गाना रिकॉर्ड कराना है.’

इस प्रोजेक्ट को हाथ में लेते वक्त केशव ने देवास में अपना स्टूडियो शुरू नहीं किया था. ऑस्ट्रेलिया में केशव ने रेस्तरां में प्लेट धोकर कुछ पैसे जमा किए थे, उस पैसे से अपने डुपलेक्स फ्लैट के ऊपरी माले पर फटाफट 10 लाख रुपये खर्च करके स्टूडियो तैयार करवाया. स्टूडियो के लिए पापा ने भी थोड़ी आर्थिक मदद की. यह पूछने पर कि आपने देवास का विकल्प क्यों चुना? वे कहते हैं, ‘मेरे पास दो विकल्प थे- मुंबई या इंदौर में स्टूडियो खड़ा करने के लिए पैसे लगाता या फिर देवास में उच्च गुणवत्ता वाले उपकरणों के साथ स्टूडियो तैयार करवाता. मैंने जोखिम लिया और देवास को चुना क्योंकि मुंबई में बहुत मारामारी है. अगर आपके पास संपर्क है, बिजली व इंटरनेट की सुविधा है तो इस काम को कहीं भी किया जा सकता है. अभी इसे करते हुए सालभर भी पूरा नहीं हुआ है और मैं औसतन साल का 15 लाख रुपये कमा ले रहा हूं.’

केशव के पास इस समय कैलाश खेर और राजा हसन सहित बहुत सारे लोगों के म्यूजिक  रिकॉर्डिंग प्रोजेक्ट हैं. केशव ने फिल्म ‘वेलकम टू कराची’ में ‘लल्ला लल्ला लोरी…’ गाना रिकॉर्ड किया. ऑस्ट्रेलिया की एक फिल्म ‘कलर ऑफ डार्कनेस’ की रिकॉर्डिंग पूरी हो चुकी है. इसके अलावा जैकी भगनानी अभिनीत फिल्म का भी एक प्रोजेक्ट है. आम आदमी पार्टी का भी एक प्रोजेक्ट है. इसके अलावा उनके पास कई दूसरे बड़े प्रोजेक्ट भी हैं. यह पूछने पर कि अगर आपका काम और बढ़ेगा तब क्या आप मुंबई शिफ्ट होने की सोचेंगे? वे मुस्कराते हैं और आत्मविश्वास से लबरेज होकर कहते हैं, ‘मैं बहुत हुआ तो इंदौर तक शिफ्ट हो सकता हूं. इंदौर यहां से सिर्फ 35 किमी. दूर है. अगर मुंबई ही जाना था तो ऑस्ट्रेलिया आज कौन-सा बहुत दूर है?’

[/box]

[box]

मेंथा की खेती, दिल्ली को ‘राम-राम’

सुशील कुमार, बाराबंकी, उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के सुशील कुमार घाटे का सौदा हो चुकी खेती से परिवार का भरण-पोषण कर पाने में सक्षम नहीं हो पा रहे थे तो 2008 में कमाने, खाने और बचाने के उद्देश्य से दिल्ली के लिए कूच कर गए. पत्नी और दो बच्चों को गांव में ही छोड़ दिया. दिल्ली पहुंचकर वे मुनिरका में प्लेसमेंट सर्विस दिलाने वाले किसी व्यक्ति से मिले, जिन्होंने 500 रुपये लेकर नौकरी दिलाने की बात की. प्लेसमेंट सर्विस वाले साहब ने उन्हें कुछ दिनों बाद कहा, ‘तुम वसुंधरा (गाजियाबाद) चले जाओ, तुम्हें वहां नौकरी मिल जाएगी.’

susheel

इसके बाद सुशील को गाजियाबाद की एक कॉलोनी में गार्ड की नौकरी मिल गई. वहां लगभग 50 फ्लैट थे जिसकी रखवाली अकेले सुशील को करनी होती थी. 4500 रुपये महीने की तनख्वाह तय हुई, पर यह कभी भी समय पर नहीं मिली. सुशील पैसा बचाने के उद्देश्य से उसी कॉलोनी के किसी कोने में रात गुजार लेते और किसी भी परिवार द्वारा दिया हुआ भोजन खा लेते थे. इन वजहों से उनकी ड्यूटी 24 घंटे की हो गई थी. कभी कोई अवकाश नहीं. चार साल लगातार दिन-रात मेहनत के बाद भी इतनी बचत नहीं हो पाई कि कोई छोटी-मोटी दुकान ही शुरू की जा सके. यहां की जद्दोजहद और परिवार के लिए कुछ खास नहीं कर पाने की हालत में उन्होंने 2012 में घर लौटना तय कर लिया. बकौल सुशील, ‘घर से दूर रहकर भी रोजी-रोटी के लिए कुछ मामूली जुगाड़ भी न हो पाए तो ऐसी नौकरी का क्या फायदा? गांव में परिवार के साथ रहने के लिए एक रोटी कम खाना उन्होंने मुनासिब समझा और दिल्ली को राम-राम कहकर वापस अपने घर चला आया.’

गांव लौटकर सुशील के सामने यह समस्या पेश आई कि वे क्या करें कि उनकी गृहस्थी की गाड़ी थोड़ी सुगमता से चल सके. ऐसे में उनके गांव के एक डॉक्टर साहब ने उन्हें मेंथा (पुदीना) की खेती शुरू करने की सलाह दी. अब आलम यह है कि उन्हें लगभग पांच बीघे की खेती से सालाना 65-70 हजार रुपये की कमाई हो जाती है. गांव में न किराये का खर्चा, न ही महंगाई का तनाव. बच्चे गांव के स्कूल में ही पढ़ रहे हैं. सुशील इन दिनों अपनी बहन के लिए लड़का देख रहे हैं. पिछले चार साल में मेंथा की खेती से की गई बचत से वह जल्द ही बहन की शादी करने वाले हैं.

[/box]

 

[box]

शहर में चाकरी करने से गांव में पढ़ाना बेहतर

आभाष मिश्र, पूर्णिया, बिहार

आभाष मिश्र दिल्ली में अपना जमा-जमाया कॅरिअर छोड़कर इसलिए अपने छोटे-से शहर पूर्णिया में आ बसे क्योंकि उन्हें महानगर की दौड़ती-भागती जिंदगी परेशान करने लगी थी. दरअसल आभाष 1990 में सिविल सेवा की तैयारी के उद्देश्य से दिल्ली आए थे. उन्हें इस परीक्षा के प्रारंभिक दौर में सफलता तो मिली, लेकिन अंतिम दौर में कामयाबी हासिल करने से वे चूक गए.

Abhash mishra

इस असफलता के बाद उन्होंने जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ाने के लिए एक मार्केटिंग कंपनी में नौकरी शुरू कर दी थी. इस कंपनी ने उनकी काबिलियत को पहचाना और उन्हें राजस्थान का मार्केटिंग एंड रिसर्च का प्रमुख बना दिया. कंपनी का काम वे दिल्ली से ही ऑपरेट कर रहे थे. लगभग चार साल उस कंपनी में नौकरी करने के बाद उन्हें हिंदुस्तान लीवर कंपनी में नौकरी का ऑफर मिल गया, तब नौकरी छोड़ने का एक महीने का जरूरी नोटिस देकर वह पूर्णिया अपने घर चले गए. हालांकि किन्हीं कारणों से नई नौकरी की जॉइनिंग की तारीख वाले दिन वह दिल्ली नहीं लौट पाए, इसलिए

उन्होंने जॉइनिंग की तारीख एक सप्ताह आगे खिसकाने के लिए कंपनी से कहा, लेकिन कंपनी ने ऐसा करने से मना कर दिया था.

आभाष याद करते हुए ‘तहलका’ से बताते हैं, ‘नए जुड़ने वाले कर्मचारियों के लिए कंपनी के पास एक सप्ताह इंतजार करने का भी वक्त नहीं था. फिर मुझे इस बात का एहसास हो गया कि बड़े शहर में काम के अवसर ज्यादा जरूर हैं लेकिन यहां शांति-सुकून नहीं है. दफ्तर और घर की दूरी नापते-नापते ही दिन का बारह-चौदह घंटा निकल जाता है. एक दिन की छुट्टी में मैं अगले सप्ताह ऑफिस जाने की ही तैयारी में लगा रहता था. मसलन घर की साफ-सफाई, कपड़े धोने और घर और रसोई के लिए जरूरत का सामान जुटाने में ही सप्ताह की छुट्टी स्वाहा हो जाती. मेरे लिए पूर्णिया के एक स्कूल में बच्चों को पढ़ाने एक विकल्प नजर आ रहा था. इसलिए फिर दिल्ली नहीं लौटा.’

आभाष ने शहर के विद्या विहार स्कूल में बतौर शिक्षक नौकरी शुरू की और वहां एक साल तक अपनी सेवाएं दीं. उसके बाद मीलिया कॉन्वेंट में लगभग नौ साल तक पढ़ाया. शहर के कुछ और स्कूलों को अपनी सेवाएं दीं अब वे इसी शहर के विजेंद्र पब्लिक स्कूल के उप-प्राचार्य हैं. इस स्कूल को उन्होंने बतौर शिक्षक जॉइन किया था. इस स्कूल को स्थापित करने का श्रेय आभाष को भी दिया जाता है. तीन साल पहले उनका एक छात्र ‘कौन बनेगा करोड़पति’ गेम शो में भी शामिल हुआ था और अंतिम पायदान से एक-दो कदम पूर्व तक पहुंचने में कामयाबी पाई थी. सच तो यह है कि उनके बहुत सारे छात्र-छात्राएं अलग-अलग क्षेत्रों में कामयाबी का झंडा गाड़ने में सफल हुए हैं.

[/box]

[box]

‘दूसरों के लिए जीने की मंशा ने बूंडू में बांध दिया’

रेशमा दत्त, बूंडू, रांची

रेशमा का नाम रांची और आसपास के लोग बहुत सम्मान से लेते हैं. इसकी वजह ये है कि उन्होंने शांति निकेतन से फाइन आर्ट में स्नातक और वडोदरा से स्नातकोत्तर की डिग्री लेने के बाद एक फेलोशिप पर तीन साल के लिए जापान चली गईं. उन्हें कहीं भी अच्छी नौकरी मिल सकती थी, लेकिन जापान  से वह सीधे अपने गांव बूंडू लौट आईं. वजह, बूंडू और आसपास की महिलाओं के लिए उम्मीद का चिराग जलाकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की तमन्ना उनके मन में बस गई थी. इसके बाद में अपने पैतृक घर से उन्होंने एक को-ऑपरेटिव सोसाइटी ‘आधार महिला शिल्प उद्योग’ की नींव रखकर अपने अभियान को मुकाम तक पहुंचाने में जुट गईं. आज उनकी संस्था में बने उत्पादों की मांग देश के अलग-अलग हिस्सों में है.Reshma 01

रांची से 40 किलोमीटर दूर रांची-जमशेदपुर हाईवेे से थोड़ा अंदर बूंडू में रेशमा सुबह आंख खुलने से लेकर शाम को सूरज ढलने तक आदिवासी, मुस्लिम और गैर-आदिवासी समाज की गरीब महिलाओं से घिरी रहती हैं. वे बीते 15 साल से महिलाओं को काम सिखा रही हैं. वे उन्हें कपड़ा सिलने, मिट्टी (टेराकोटा) की कलात्मक वस्तुएं बनाने, आभूषण बनाने, पत्थर पर पेंटिंग करने का एक महीने का प्रशिक्षण देती हैं. प्रशिक्षित होने के बाद ये महिलाएं यहां काम करने लगती हैं. फिलहाल रेशमा के साथ गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) आने वाली 80 महिलाएं जुड़कर अपना और अपने परिवार आजीविका चलाने में सफल हो गई हैं. संस्था के लिए फंड जुटाने से लेकर यहां तैयार होने वाले उत्पादों को बेचने, महिलाओं के काम में आने वाली बाधाओं से लेकर बही-खाते का हिसाब देखने तक के काम रेशमा अकेले ही देखती हैं. बुंडू के पास ही नेशनल हाईवे पर वे हर रविवार को ‘कला हाट’ लगाती हैं, रांची में कुसुम नाम से एक शोरूम भी खोला है. रेशमा की कला किसी के ड्राइंगरूम की चमक बढ़ाने से ज्यादा गरीब महिलाओं के जीवन को बचाने में ढाल का काम कर रही हैं. उन्होंने कला को महिलाओं के जीवन में बदलाव लाने का हथियार बना लिया है. वे बताती हैं, ‘हमारे साथ की बहुत सारी महिलाएं पढ़ी-लिखी नहीं होती हैं जिसके चलते उन महिलाओं को मेले आदि में उत्पाद खरीदने-बेचने में मुश्किलें आती हैं.’

रेशमा के गांव में बिजली की दिक्कत भी बहुत रहती है. सिर्फ पांच-छह घंटे ही बिजली आती है. बिजली न रहने के कारण दिक्कत पेश आती होगी? वे कहती हैं, ‘अभी कुछ दिन पहले ही हम लोगों ने जेनरेटर की व्यवस्था की है. इस काम के दौरान आई आर्थिक परेशानियों के चलते उन्हें कई बार लगा कि यह सब कुछ छोड़-छाड़ कर कहीं अपने लिए कुछ कर लिया जाए. आज भी कई बार आर्थिक दिक्कतें उठ खड़ी होती हैं, लेकिन अब खुद पर बहुत भरोसा हो चुका है.’ यह पूछने पर कि दिक्कतों के पेश होने पर क्या अब लगता है कि कहीं छोड़कर निकल लिया जाए? वह कहती हैं, ‘अब तो इन झंझटों से ही दोस्ती हो गई. वैसे भी अब मुझे कौन नौकरी देगा!’

[/box]

झाड़ू लगाकर कमाए गए दो रुपये आज भी याद हैं

Friendship Day3339-webबात शायद 1996-97 की है. हम अविभाजित उत्तर प्रदेश के अल्मोड़ा जिले में सराईखेत नाम के गांव में रहते थे. पिताजी फौज में थे और मां स्वास्थ्य विभाग में कर्मचारी के बतौर वहीं तैनात थीं. ये वो दौर था जब कुमाऊं-गढ़वाल के उस सुदूर इलाके में मेरे माता-पिता का सरकारी नौकरी में होना अपने आप में एक बड़ी बात थी. मूल रूप से उस क्षेत्र का न होने के बावजूद शायद माता-पिता के व्यवहार और सफलता के कारण ही दूर-दूर तक लोग हमारे प्रति अपनत्व और आदर का भाव रखते थे.

उस समय मनोज नाम का मेरा एक मित्र था, उम्र में शायद मुझसे कुछ बड़ा. वह नेपाली मूल का था. उसके माता-पिता मजदूरी करके गुजारा करते थे. उनका हाथ बंटाने के लिए मनोज भी कबाड़ जमा करता था. हम दोनों की सामाजिक पृष्ठभूमि एक-दूसरे के ठीक विपरीत थी. उम्र इतनी छोटी थी कि भेदभाव, ऊंच-नीच, अमीर-गरीब जैसे बड़े शब्दों के मायने समझ से परे थे. हम अक्सर साथ घूमते, साथ-साथ खेलते और कई बार घूमते-घूमते मैं उसके साथ कबाड़ ढूंढने भी निकल पड़ता था. गांव में स्कूल था पर अभी मेरी उम्र अभी स्कूल जाने की नहीं हुई थी.

एक रोज खेल-खेल में ही मनोज ने मुझे बताया कि वह हर शाम बस में झाड़ू लगाता है जिसके बदले में उसे दो रुपये मिलते हैं. दो रुपये उन दिनों गांव के एक तीन-चार साल के एक बच्चे के लिए यह बड़ी रकम हुआ करती थी. दो रुपये में तब शायद 10 कंचे आते थे. उत्साह में आकर मैंने भी बस में झाड़ू लगाने की इच्छा जाहिर की और मनोज के साथ चल पड़ा.

शाम को स्टैंड पर बस पहुंची नहीं कि हम उस पर टूट पड़े. उत्साह इतना था कि अभी सवारी निकली भी नहीं थी कि मैंने झाड़ू लगानी शुरू भी कर दी थी. मेरी उत्सुकता देखकर एक सज्जन ने मुझसे नाम पूछ लिया. मैंने झट से नाम बताया और कहा, ‘मुझे काम में देरी हो रही है.’ यह कहकर उनसे बाहर जाने का आग्रह किया.

चंद मिनटों में बस साफ हो गई और दो रुपये का सिक्का लिए मैं और मनोज अपने दूसरे दोस्तों के साथ खेलने निकल गए. चेहरे पर एक अलग-सी चमक छा गई और सिर गर्व से ऊपर हो गया था. भला हो भी क्यों न… आखिर यह मेरी पहली कमाई जो थी. अपनी मेहनत का पैसा जो था!

घर पहुंचा तो देखा बस में मिले सज्जन सामने कुर्सी पर बैठे चाय पी रहे हैं. मुझे देख मां ने कहा बेटा मामा को प्रणाम करो. मेरी तरफ देख वे चौंककर मां से बोले, ‘ये आपका बेटा है? थोड़ी देर पहले तो ये बस में झाड़ू लगा रहा था! एक और लड़का भी था इसके साथ.’ इसके बाद घर में जो महाभारत हुआ उसके बारे में मैं क्या लिखूं… मुझ पर क्या-क्या कहर बरपा होगा, आप समझ ही गए होंगे.

मनोज से मिलने पर पाबंदी लगा दी गई. मैं गुमसुम रहता था. मां को मेरी बढ़ती हुई बेचारगी की चिंता सताने लगी. नतीजा ये हुआ कि स्कूल के प्रधानाचार्य से बात करके यह इंतजाम कराया गया कि मेरी कम उम्र के बावजूद बिना नाम दर्ज किए कक्षा में बैठने की अनुमति मिल गई. मकसद ये था कि स्कूल में रहूंगा तो बच्चों के साथ कम से कम क, ख, ग तो सीख ही लूंगा. बंद मुट्ठी में रखी रेत की तरह वक्त बीतता गया… गांव में अच्छे स्कूल की कमी के कारण मुझे नैनीताल भेज दिया गया और मनोज की यादें दिनों-दिन धुंधली होती चली गईं.

आज इस घटना को हुए करीब दो दशक बीत गए हैं पर कभी-कभी याद आती है मनोज की, बचपन की बेपरवाही और हमारी निश्छलता की. वह मासूमियत जो तमाम सामाजिक कारकों को दरकिनार करते हुए मन को भेदभाव के अंधेरे से दूर रखती थी. मनोज आज न जाने कहां है. पर जब भी नौकरी और तनख्वाह की चर्चा होती है तब मुझे यकायक बस में मनोज के साथ झाड़ू लगाकर दो रुपये कमाने की वह घटना याद आ जाती है. आशा करता हूं मनोज भी कहीं किसी कोने में मेरे इस लेख या समझिये पत्र को पढ़ रहा होगा.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं)

एक शून्य के बाद दूसरा शून्य

Anil Yadv

इंटरनेट न होने का बहाना भी नहीं चल सकता. यूरोप में भटक रहा हूं. जैसे हमारे यहां गांव में किसी अतिथि के आने पर पानी दिया जाता है वैसे ही यहां किसी घर, होटल या पब में पहुंचने पर वाईफाई मिल जाता है. जिंदगी तकनीक पर इस कदर निर्भर हो चुकी है कि दरवाजों पर सेंसर, किचन में बरतन धोने वाली मशीनें और यांत्रिक मुखमुद्राएं देखते हुए डर लगता है कि क्या जल्दी ही मशीनें आदमी को गुलाम बना लेंगी. तब उसके सुविधाओं के निरंतर आदी होते शरीर और अनिश्चित परिस्थितियों में नया रास्ता खोज लेने वाले स्वतंत्रचेता दिमाग का क्या होगा. इस भय को खंगालने वाली फिल्मों और फिक्शन की रेलमपेल के बीच ऑस्ट्रिया में ऐसे लोगों की बस्तियां बसने लगी हैं जो टेलीविजन, मोबाइल फोन और हर बात के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते. हो सकता है कि कभी वहां जाकर अपने ही रचे जंजाल से बचने का रास्ता खोजने वाले मन से मिलने का मौका मिले.

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं विक्रम हूं या नहीं लेकिन हर पखवाड़े मेरा सामना बेताल यानि इस कॉलम से होता है. जवाब नहीं देने पर सिर के छिन्न-भिन्न हो जाने की अपनी प्रसिद्ध शर्त का जिक्र किए बिना वह मुझसे प्रश्न करता है इसबार क्या लिखोगे? मुझे कुछ समझ नहीं आता, सिर्फ सन्नाटे में बेताल की भारी सांसों की आवाज सुनाई पड़ती है, मेरे भीतर पानी की तरह रिसती हुई बेचैनी भरने लगती है. लिखने के मुद्दे इफरात में सामने सजे हैं और कॉलम लिखने वाली कोई मशीन होती तो कितना अच्छा होता, मैं उसे झट से खरीद लेता.

अभी ऐसा नहीं है इसलिए मैं खुद से सवाल करने लगता हूं, तुम इस तत्परता से लिखने वाले होते कौन हो. क्या तुम्हें दुनिया के बारे इतना पता है कि अपने पाठकों को कुछ नया बता सको. क्या सूचना एवं प्रसारण मंत्री समेत प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या जिंदगी भर किसी एक विषय पर ही छेनी चलाने वाले ज्ञानी को भी इतना पता होता है? हर आदमी सीमित ज्ञान और विराट अबोधता के बीच न जाने किस आत्मविश्वास से संतुलन बनाए हुए झूल रहा है. हर बार मुझे यह त्रस्त कर देने वाला झूला दिख जाता है और मेरा दिल बैठने लगता है. हां, हर आदमी दुनिया को ऐसे जैविक कोण से जानता है कि कोई दूसरा वैसे नहीं जान सकता. यहीं एक गुंजाइश दिखती है कि अपने इस नजरिए के बारे में बात हो सकती है. विचारों और अनुभूतियों को साझा करना आदमी की नैसर्गिक जरूरत है. अतीत में कभी उसे इस डर से चुप बैठा नहीं पाया गया कि वह कम जानता है इसलिए नहीं बोलेगा. वह तो इस डर के बारे में ही बात करने लगेगा.

 यहां आकर एक जादू जैसी चीज घटित हुई है. गोरा कम गोरा, भव्य कम भव्य लगने लगा है. नीली आंखें विलक्षण नहीं, आंखों का सिर्फ एक और प्रकार लगने लगी हैं. यूरोप में अपने घर में खड़ा आदमी वैसे आत्मविश्वास से भरा नहीं दिखता जैसे वह भारत में अपने से गरीब, कद-काठी में कमजोर और किंचित चकित लोगों के सामने दिखता है. उसके चेहरे पर अकेलापन और उन प्रपंचों की परछाइयां आती-जाती दिखने लगी हैं जिनसे उनकी जिंदगी दो-चार है. यही सापेक्षता का फंडा समझ में आता है. हर चीज एक-दूसरे की तुलना में ऐसी या वैसी है वरना वह अपने आप में कैसी भी नहीं है.

 एक शाम जर्मनी से इटली के मेलपान्सा एयरपोर्ट पहुंच कर काफी देर तक टूलने के बाद भी मेरी मेजबान अलेस्सांद्रा कांउसेलारो का पता नहीं चला जो मुझे लेने अंजारा गांव से आने वाली थीं. फोन मिलाने पर आवाज आती थी  इल नुमेरो दालेई सेलेत्सियानो नोन्न एजिस्ते (जो नंबर आपने डायल किया है मौजूद नहीं है). थोड़ा वक्त और बीता, कई तरह की बेंचों पर बैठते और मशीनों से परिचय पाते हुए अचानक डर लगा कि एकदम अनजाने इतालवी शहर में अब कहां जाऊंगा. उसी डर के भीतर एक उत्तेजना भी थी कि आज से तुम्हारी वास्तविक यात्रा की शुरुआत होने वाली है. खैर वह मुझे एयरपोर्ट के भीतर तेज कदमों से जाती हुई दिख गईं, वह मुझे खोजने के लिए अनाउंसमेंट कराने जा रही थीं. मैंने पूछा कि आप का नंबर लग क्यों नहीं रहा है. उन्होंने मेरा फोन लेकर नंबर डायल किया और कहा, आपने एक ही जीरो लगाया है, इंटरनेशनल कॉल के लिए दो जीरो लगाने चाहिए थे. मैंने यूरोप से अब तक यही एक चीज सीखी है कि ज्ञान एक शून्य के बाद दूसरा शून्य है.

‘स्वच्छ भारत’ का सच

Swach Bharatपिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अक्टूबर को ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत की, जिसकी घोषणा उन्होंने 68वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में लाल किले के अपने उद्बोधन में की थी. मोदी ने कहा था, ‘गरीबों को सम्मान मिलना चाहिए और मैं चाहता हूं कि इसकी शुरुआत सफाई से हो. देश के हर एक स्कूल में शौचालय का निर्माण करवाकर इसे अंजाम दिया जाएगा. छात्राओं के लिए हर स्कूल में अलग से शौचालय का निर्माण करवाया जाएगा. ऐसा करके ही बेटियों को पढ़ाई बीच में छोड़कर जाने से रोका जा सकता है.’

स्कूलों में छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय की दरकार है. प्रधानमंत्री ने सभी स्कूलों में लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय बनाने की बात की और देश को यह भरोसा दिलाया कि वह इस लक्ष्य को जल्द से जल्द पूरा भी कर लेंगे. जाहिर है कि यह उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है. पर सालभर बीत जाने के बाद भी परिस्थितियों में कोई खास बदलाव नहीं आया है. हां, इस बारे में थोड़ी हलचल तो है लेकिन यह केवल बात के स्तर पर ही देखी जा सकती है. इस बारे में हकीकत में कुछ खास होता हुआ नहीं दिखता.

बीते दिनों जमशेदपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर सरायकेला जिले की 200 छात्राओं ने स्कूल छोड़ दिया. कारण शौचालयों की कमी. गौरतलब है कि सरायकेला के इस कस्तूरबा आवासीय विद्यालय में लगभग 220 लड़कियां पढ़ती थीं और शौचालय हैं मात्र पांच. इसी वजह से लड़कियां खेतों में शौच के लिए जाती हैं जहां उन्हें स्थानीय लड़कों द्वारा छेड़छाड़ का सामना करना पड़ता था. कई शिकायतों के बाद भी शौचालय और सुरक्षा की कोई पुख्ता व्यवस्था न होने के कारण लड़कियों ने अपनी पढ़ाई की परवाह किए बिना स्कूल जाना ही बंद कर दिया.

स्वच्छ भारत अभियान में ‘स्वच्छ भारत, स्वच्छ विद्यालय’ की बात भी प्रधानमंत्री ने की थी, जिसका लक्ष्य देश के सभी स्कूलों में पानी, साफ-सफाई और स्वास्थ्य सुविधाओं का पुख्ता इंतजाम रखा गया. यह अभियान सेकेंडरी स्कूलों में लड़कियों की एक बड़ी आबादी को रोकने में अहम भूमिका निभा सकता है.

शहरी विकास मंत्रालय ने शौचालयों की उपलब्धता के बारे में एक सामान्य आंकड़ा जारी किया, जिसके अनुसार देश में 3.83 लाख घरेलू और लगभग 17,411 सामुदायिक शौचालयों का निर्माण हुआ लेकिन बीते दस महीनों में कितने स्कूलों में शौचालयों का निर्माण हुआ, इसका जवाब न सरकारी विभागों के पास है और न ही किसी सामाजिक संगठन के पास.

ऐसे किसी आंकड़े की उपलब्धता से राजग के सत्ता में आने से एक दशक पूर्व का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है. राष्ट्रीय विश्वविद्यालय शैक्षिक योजना और प्रशासन (न्यूपा) द्वारा कराए गए एक सर्वे के अनुसार, 2005-06 में छात्राओं के लिए चार लाख (37 फीसदी) स्कूलों में अलग से शौचालय थे जबकि 2013-14 में ये बढ़कर 10 लाख (91 फीसदी) हो गए.

ये आंकड़े दस्तावेजों में भले ही सही हों लेकिन सर्वेक्षण के अनुसार, जिन स्कूलों में शौचालय हैं, उनमें से अधिकांश बंद या जाम पड़े हैं. ये शौचालय इस्तेमाल में लाने योग्य नहीं हैं और तमाम खस्ताहाल हैं. उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में यह दावा किया जाता है कि 96 फीसदी शौचालय इस्तेमाल योग्य हैं. अगर हालात छोड़कर इन तथ्यों पर भरोसा किया जाए तो फिर राज्य के ग्रामीण इलाकों में लड़कियां पढ़ाई बीच में ही क्यों छोड़कर चली जाती हैं?

यूनिसेफ के एक सूत्र के अनुसार, ‘न्यूपा के आंकड़ों को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए. हम इस आंकड़े को इसलिए मान्य नहीं ठहरा सकते क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में शौचालयों को इस्तेमाल योग्य बताया गया है. दूसरी बात, अगर इन शौचालयों में से अधिकतर बुरे हाल में हैं तो इसका अर्थ यह है कि राज्य सरकार शौचालयों के रख-रखाव के लिए बजट मुहैया नहीं कराती. ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में शौचालयों में पानी की अनुपलब्धता बड़ी चिंता का विषय है.’

शौचालयों की संख्या के बारे में नए आंकड़े अभी तक उपलब्ध नहीं हैं, पर इनकी हालत जानने के लिए असल स्थिति जाननी बहुत जरूरी है. क्या सेकेंडरी स्कूलों में लड़कियों के दाखिलों में कोई इजाफा हुआ? यह सर्वविदित है कि लड़कियां अक्सर स्कूलों में शौचालय की बुरी हालत की वजह से पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं. खुले में शौच की वजह से डायरिया जैसी बीमारी होती है तो क्या डायरिया की दर में कोई कमी आई है? क्या मासिक धर्म के दौरान सामुदायिक शौचालयों में महिलाओं को पूर्ण निजता मुहैया कराई जाती है? इन सवालों का जवाब न में ही मिलता है. स्वच्छ भारत अभियान की सफलता या असफलता इन्हीं बातों पर ही निर्भर करती है.

वास्तव में स्वच्छता अभियान की पहल नए मैनहोल में पुराना कीचड़ डालने जैसी है. 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम की शुरुआत की थी. 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे थोड़ी ऊंचाई देते हुए पूर्ण स्वच्छता अभियान का नाम दिया. मोदी सरकार ने इसका पुनर्निर्माण करते हुए फ्लश सिस्टम वाले शौचालयों पर ध्यान केंद्रित किया और खुले में शौच बंद करने और मानव द्वारा मल उठाने पर रोक लगाने की बात की थी. इसके अलावा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाने की भी बात शुरू की गई.

हालांकि, सरकार के कामकाज के तौर-तरीकों में मुश्किल से तब्दीली आती है. ठेकेदारी राज की बदौलत नए शौचालयों के निर्माण को लेकर तो उत्साह होता है पर पहले से बने शौचालयों के रख-रखाव में कोई दिलचस्पी नहीं दिखती. मानव संसाधन व विकास मंत्रालय के एक सूत्र ने ‘तहलका’ कोे बताया, ‘सरकार वास्तव में स्कूलों के शौचालय के लिए बजट मुहैया कराने में बहुत दिलचस्पी नहीं दिखाती. खराब शौचालयों को ठीक करने के लिए इस साल फरवरी तक सिर्फ 52 फीसदी फंड मुहैया हुआ जबकि ऐसे शौचालयों की संख्या लगभग 84,619 है.’

इस राह में फंड की कमी, कमजोर प्रबंधन और पानी की घोर दिक्कत आदि विकट चुनौतियां हैं. तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली स्थित सोसायटी फॉर कम्युनिटी ऑर्गनाइजेशन एंड पीपुल्स एजुकेशन (स्कोप) द्वारा कराए गए एक सर्वे के अनुसार, ‘शौचालयों की कमी और उपलब्ध शौचालयों की खराब हालत से न केवल मासिक धर्म के दौरान लड़कियों को परेशानी होती है बल्कि इसका खामियाजा महिलाओं को भी उठाना पड़ता है.’

इस सर्वे में 18-45 वर्ष आयु वर्ग की 40 महिलाओं को शामिल किया गया और पाया कि मासिक धर्म के दौरान उनके द्वारा सामुदायिक नल के इस्तेमाल पर प्रतिबंध रहता है. इस दौरान महिलाएं पानी की जरूरतें पूरी करने के लिए नदियों तक जाती हैं, जहां निजता नाम की कोई चीज नहीं होती. इसके अलावा इस सर्वे में महिलाओं ने अविवाहित लड़कियों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई. मासिक धर्म के दौरान साफ-सफाई के लिए निजता न होने की वजह से दूसरी मुश्किलें भी पेश आती हैं. साथ ही अज्ञानतावश मासिक धर्म के दौरान इस्तेमाल किए गए कपड़े को भी शौचालय में ही बहा दिया जाता हैै. अब जब महिलाएं साधारण कपड़े की बजाए अजैविक उत्पाद (सैनिटरी नैपकिन आदि) इस्तेमाल करती हैं तो शौचालय जाम होने की स्थिति और बदतर हो जाती है. शहर के संभ्रांत इलाकों की ही तरह ग्रामीण सामुदायिक शौचालयों की सफलता उचित देखरेख के जरिए ही सुनिश्चित की जा सकती है.

भारत को स्वच्छ बनाने के लिए बहुत बड़े बदलाव की जरूरत है. एक गैर-सरकारी संगठन ‘पाथ’ से जुड़ीं सुष्मिता मालवीय का कहना है, ‘हम शहरों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की बात करते हैं लेकिन ग्रामीण इलाकों या शहरी झोपड़पट्टी में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के बारे में कोई स्पष्टता नहीं और न ही इस बारे में कोई दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं. इस बारे में राष्ट्रीय स्तर पर दिशा-निर्देश बनाए जाने की दरकार है. मासिक धर्म के अपशिष्ट के लिए बजट, सूचनाएं और उचित उपकरणों की व्यवस्था करनी होगी.’

साझा उपयोग के शौचालयों में व्यक्तिगत जिम्मेदारी सुनिश्चित नहीं की जा सकती, इसके लिए पूरी व्यवस्था को दुरुस्त करना होगा. यहां तक कि जब घरों के शौचालयों के गड्ढे सूख जाते हैं या फिर चेंबर पूरी तरह भर जाते हैं या पाइप बंद हो जाता है तो ऐसे हाल में फंड की कमी समस्याओं को और ज्यादा बढ़ा देती है. स्कूल के शौचालय भी इन्हीं दिक्कतों से जूझ रहे हैं.

प्रशासन का दावा है कि आगामी चार साल में स्वच्छता अभियान के तहत 52,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे. कंपनी अधिनियम 2013 में सुधार करके कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) के जरिये स्वच्छ भारत कोष (एसबीके) तैयार किया गया है. जिसके जरिये एकत्रित किए गए धन से 2.57 लाख शौचालयों का रख-रखाव किया जाएगा. फरवरी 2015 तक राज्य की ओर से 58 फीसदी, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से 41 फीसदी और निजी कंपनियों से एक फीसदी फंड आना बाकी था.

स्वच्छता जीवन से जुड़ा जरूरी मसला है और सरकार को इस बारे में सोचना होगा. शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने विश्व शौचालय सम्मेलन में कहा था, ‘भारत में 80 फीसदी बीमारियां जल प्रदूषण की वजह से होती हैं इसलिए स्वच्छता कार्यक्रम लागू करना बहुत जरूरी है.’ प्रधानमंत्री अब इस बात को महसूस कर रहे होंगे कि ये कहना तो आसान था पर पूरा करना कठिन है. ये जानने के लिए 2019 तक इंतजार करना होगा कि स्वच्छ भारत अभियान एक ठोस पहल था या कि केवल हवा का गुब्बारा!

आतंक का ऑनलाइन चेहरा

Burhan‘कितना सुंदर चेहरा है हमारे भाई का’… फेसबुक पर ‘ट्राल- द लैंड ऑफ मार्टियर्स’ (शहीदों की जमीन) नाम के पेज पर हुई एक पोस्ट में लिखा है जिसके नीचे दक्षिणी कश्मीर में हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की धुंधली आंखों वाली एक तस्वीर लगी है जिसमें बुरहान ने अपने हाथ सिर के पीछे रखे हुए हैं. इस तस्वीर के अपलोड होने के 12 घंटों के अंदर ही इस पर 900 लाइक्स और 60 कमेंट्स आए, जिनमें अधिकतर उसकी प्रशंसा में थे. पेज पर ऐसे कई तस्वीरें अपलोड की गई हैं, जिसमें वो मिलिट्री ड्रेस पहने हथियारों से लैस नजर आ रहा है.

वानी कश्मीरी उग्रवादियों की नई पीढ़ी का ‘पोस्टर बॉय’ बनकर उभरा है, जिसे घाटी के इस हिस्से में दम तोड़ते जिहाद को फिर से जिंदा करने का श्रेय दिया जाता है. 22 साल का वानी 2010 की गर्मियों में हिजबुल में तब शामिल हुआ था जब पुलिस फायरिंग में एक किशोर तुफैल मट्टू की मौत के बाद घाटी विरोध में सुलग उठी थी. तमाम विरोध प्रदर्शन चल रहे थे. ऐसे ही एक प्रदर्शन के दौरान उसे एक आर्मी कैंप में पीटा गया, जिसके तीन महीने बाद अपने परिजनों के उकसाने पर वह इस हिजबुल में शामिल हो गया.

उसके दादा, हाजी गुलाम मोहम्मद वानी, जो एक सरकारी कर्मचारी हैं, याद करते हुए बताते हैं, ‘वो जब उस दिन घर लौट कर आया तो बहुत गुस्से में था. उसे ये समझ नहीं आ रहा था कि जब उसने कुछ गलत नहीं किया तो उसे मार क्यों पड़ी.’ हाजी अपने पोते के हथियार उठा लेने के इस फैसले पर गर्व महसूस करते हैं. वे कहते हैं ‘वो हमेशा से एक अच्छा लड़का रहा है. वो पांचों वक्त की नमाज पढ़ता है और एक आज्ञाकारी बेटा भी है. अब जब वो एक सही कारण के लिए आतंकी बना है तो हम सब उसके साथ हैं.’

पिछले पांच सालों में, अपने शहर ट्राल के पास की ही किसी पहाड़ी से हिजबुल को ऑपरेट करते हुए वानी ने कश्मीरी आतंकियों की ऑनलाइन उपस्थिति दर्ज कराते हुए संगठन का चेहरा ही बदल दिया है. इसकी शुरुआत उस तस्वीर से हुई थी जिसमें वानी एक क्लाशिनकोव राइफल लिए खड़ा है. यही तस्वीर अब और लोगों को भर्ती करने के इस अभियान का मुख्य चेहरा बन गई है. उनका संगठन अब ऐसी ही फोटो अपलोड करता है. वो उन पहाड़ियों में कैसे रहते हैं, इसके भी वीडियो अपलोड करते हैं. और ये सब करते हुए वे अपने चेहरे किसी नकाब से नहीं छिपाते बल्कि वो पोज दे रहे होते हैं या मुस्कुराते हुए कैमरा की तरफ देख कर हाथ हिलाते हैं. ये ऑनलाइन शो-ऑफ सुरक्षा एजेंसियों को कोई मदद देने की बजाय हिजबुल के ही उद्देश्यों की पूर्ति कर रहा है.

अगर पुलिस के आंकड़ों की मानें तो वानी को अपने उद्देश्य में सफलता मिलती दिखती है. पिछले दस सालों में पहली बार, घाटी के कुल आतंकवादियों में स्थानीय लोगों की संख्या बाहरी आतंकियों से ज्यादा है. 142 सक्रिय आतंकवादियों में से 88 स्थानीय हैं जबकि बाकि पाकिस्तान या पाक अधिकृत कश्मीर से हैं. और इसमें वानी के  दक्षिण कश्मीर क्षेत्र से सर्वाधिक 60 लोग हैं. पिछले 6 महीनों में इस संगठन में शामिल 33 युवाओं में से 30 दक्षिण से ही हैं. इस साल सेना द्वारा तकरीबन 29 आतंकवादियों को सीमा रेखा और अंदरूनी भागों में हुए ऑपरेशनों में खत्म कर दिया गया. पुलिस इन नए लोगों के इस आतंकी संगठन में हो रही भर्ती में आई बढ़त को स्वीकारती है. सीआईडी के इंस्पेक्टर जनरल अब्दुल गनी लोन ‘तहलका’ को बताते हैं, ‘हां, वहां नई भर्तियां हो रही हैं और हम इससे निपटने का कोई प्रभावी उपाय तलाश रहे हैं.’

online jihad-web

इन भर्तियों ने सेना को भी चिंता में डाल दिया है. नॉर्दन कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हूडा इसे दुखद करार देते हुए कहते हैं, ‘युवाओं की ऐसे संगठनों में भर्ती को मैं त्रासदी के रूप में देखता हूं. हालांकि इनकी संख्या बहुत ज्यादा नहीं है पर फिर भी युवाओं को दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से बंदूक उठाते देखना त्रासद है.’ हूडा मीडिया के सामने ये स्वीकार भी कर चुके हैं कि आतंकियों के लिए सोशल मीडिया एक बड़ा हथियार बन चुका है. वे कहते हैं, ‘जिस तरह से वे (आतंकी संगठन) सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं, युवाओं को अपने साथ जोड़ रहे हैं, यह काफी गंभीर बात है.’

फेसबुक पर वानी को समर्पित करीब दर्जन भर पेज बने हुए हैं, जिनमें से कुछ के नाम हैं, ‘वी लव बुरहान वानी, बुरहान भाई सन ऑफ कश्मीर, लवर्स ऑफ मुजाहिद बुरहान ट्राली.’ ये पेज चौबीसों घंटे वानी की फोटो या जिहादी संदेशों के साथ पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मध्य पूर्व के देशों की तस्वीरें अपलोड करते रहते हैं, जिन पर ढेरों लाइक्स और कमेंट्स आते हैं. टिप्पणी करने वाले वानी की तारीफ करते हुए उसके संगठन की प्रगति पर खुशी जाहिर करते हैं. एक पोस्ट में लिखा है, ‘जब तक सूरज-चांद रहेगा, बुरहान तुम्हारा नाम रहेगा’, वहीं एक पोस्ट कहती हैं, ‘खुदा तुम्हें सलामत रखे. अल्लाह करे तुम्हें अपने मकसद में कामयाबी मिले और कश्मीर को उसकी आजादी.’ कई बार वहां हथियार उठाने की अपील भी की जाती है जो कई युवा दोहराते दिखते हैं, मगर ये फर्जी अकाउंट लगते हैं. मोईन भट नाम का एक शख्स 11 क्लाशिनकोव के साथ एक तस्वीर पर लिखता है, ‘मेरी जिंदगी में सिर्फ एक ख्वाहिश है कि मेरे हाथों में एके 47 हो. इस्लाम जिंदा रहे. मुजाहिदीन जिंदा रहें.’

बंदूकों को लेकर ये लगाव 1990 के उस वक्त की याद दिलाता है जब घाटी में आतंकी संगठनों के ढेरों उत्साही अनुयायी हुआ करते थे. हालांकि उनका ये भ्रम जल्दी ही टूट ही गया जब उनके वादे में कही हुई ‘आजादी’ लोगों को नहीं मिली और घाटी में खून-खराबा आम बात हो गई. इसके बाद भी आतंक का दौर जारी रहा पर जिहाद की ये लड़ाई अब तक पाकिस्तान या अफगानिस्तान से आए लड़ाकों के कंधों पर थी. जिहाद लाने के लिए सुसाइड बम और कार विस्फोट करने वाले बाहरी आतंकियों की तुलना में स्थानीय लोगों का प्रतिशत और संगठन में उनकी सहभागिता लगातार कम होती गई. ये इराक और मध्य पूर्व में ये सब दोहराए जाने के बहुत पहले हुआ था. अब जब टेक-सेवी नई पीढ़ी आतंकी संगठनों से जुड़ी है, तस्वीरें और वीडियो अपलोड करने का नया खेल शुरू हुआ है तो लगता है कि एक समय का एक चक्र पूरा हो गया है. घाटी में हथियारबंद संघर्ष की फसल दोबारा खड़ी हो गई है और यहां समस्या सिर्फ आतंकियों में स्थानीयों का बढ़ता प्रतिशत या सोशल मीडिया पर मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं है बल्कि मुठभेड़ में हुई किसी आतंकी की मौत के बाद वहां पसरने वाला व्यापक शोक है.

23 जून को, दक्षिण कश्मीर के कुलगाम में दो आतंकियों- जावेद अहमद भट और इदरीस अहमद के अंतिम संस्कार के समय हजारों की भीड़ जमा हुई जो कश्मीर की आजादी से जुड़े नारे लगा रही थी. जब ये मुठभेड़ चल रही थी तब प्रदर्शनकारियों के एक बड़े समूह ने सुरक्षा दलों पर पथराव करते हुए आतंकियों को भागने में मदद की थी.

कुछ ऐसे ही तथ्यों को रॉ के पूर्व प्रमुख एएस दुलत ने भी अपनी किताब ‘द वाजपेयी ईयर्स’ में शामिल किया है. किताब में 1990 के कश्मीर के बारे में कई चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं. हाल ही में दिए गए एक साक्षात्कार में दुलत ने कहा भी कि कश्मीर फिर 1990 के पहले जैसे हालात में पहुंच गया है. दुलात कहते हैं, ‘1996 में, नेशनल कांफ्रेंस के सत्ता में आने का कारण था कि बाकी किसी ने भी इस चुनाव को गंभीरता से नहीं लिया. आज कश्मीर में वैसे हालात नहीं हैं पर राजनीतिक रूप से देखें तो या तो समय कहीं रुक गया है या हम कुछ आगे निकल गए हैं. जिस तरह का आतंकवाद हम पिछले कुछ समय से देख रहे हैं वह भयावह है. आतंकी संगठनों में जाने वाले ये लड़के अच्छे मध्यम और उच्च वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं और प्रशिक्षित इंजीनियर हैं, तो इन्हें ऐसे संगठनों से जुड़ने की क्या जरूरत है? ये खौफनाक है.’

यहां वानी का मुद्दा प्रमुख है. उसके पिता मुजफ्फर अहमद वानी एक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य हैं. इस संपन्न परिवार का तीन-मंजिला घर ट्राल शहर को जाने वाले मुख्य रास्ते से थोड़ी दूर पर लगभग दो कनाल की जमीन पर बना है. वानी की इस समृद्ध पृष्ठभूमि से आने की बात से आस-पास के इलाकों और घाटी में उसके दोस्तों के बीच उसका रुतबा और बढ़ा ही है.

बुरहान वानी के ‘नायकत्व’ के ऑनलाइन प्रचार के बाद अब दक्षिणी कश्मीर के कुछ हिस्सों और श्रीनगर के बाहरी इलाकों में उसके ‘ग्रैफिटी’ (दीवारों पर बने चित्र या नारे) भी दिखने लगे हैं. श्रीनगर के बाहर पम्पोर में एक दीवार पर लिखा दिखता है, ‘ट्राल, बुरहान जिंदाबाद! वी वांट हिजबुल मुजाहिदीन, तालिबान एंड लश्कर-ए-तैयबा.’

व्यापमं की राह पर…

asaram-WEBउत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में एक मंजिला घर के अंदर कीचड़ वाले लॉन में चार साल का बच्चा अंश खेल रहा था. अंश इतना बड़ा नहीं हुआ है कि वह अपने परिवार वालों की पीड़ा को महसूस कर सके. दरअसल उसके पिता कृपाल सिंह को हाल ही में दिन के उजाले में किसी बाइक सवार ने गोली मार दी. कृपाल को जब गोली मारी गई तब वे अपने घर से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर थे. खुद को ईश्वर का दूत मानने वाले आसाराम बापू द्वारा एक लड़की के यौन उत्पीड़न मामले में कृपाल गवाह थे. उन्होंने लगभग एक साल पहले कोर्ट में आसाराम के खिलाफ बयान दर्ज कराया था. उन्हें अगली तारीख पर न्यायालय में उपस्थित होना था.

मामले में पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है, जबकि हत्यारे अभी तक पकड़े नहीं गए हैं. कृपाल सिंह के परिवारवालों का आरोप है कि उनकी हत्या आसाराम के गुंडों ने की है. यौन उत्पीड़न के इस मामले में दो प्रमुख गवाहों की हत्या पहले ही हो चुकी है. कृपाल की हत्या के तीन दिन बाद भी पुलिस अभियुक्तों की शिनाख्त नहीं कर पा रही थी.

शाहजहांपुर पहुंचने पर कानून एवं व्यवस्था को लेकर परेशान एक पुलिसवाले ने पूछा, ‘आप दिल्ली से यहां क्यों आए हुए हैं? आप इस घटना की रिपोर्टिंग इंटरनेट के सहारे भी कर सकते थे.’ पुलिस स्टेशन के अंदर पहुंचने पर एक अधिकारी अंडरवियर और बनियान में मिला जो हमें अपना परिचय देने और इस मामले पर बातचीत करने से बचता रहा. शाहजहांपुर कुछ दिन पूर्व यहां हुई एक पत्रकार की हत्या की वजह से सुर्खियों में आया था. यहां के एक विधायक के गुंडों ने पुलिस की मदद से उस पत्रकार को जिंदा जला दिया था.

कृपाल सिंह की पत्नी मोनी सिंह गर्भवती हैं और उन्होंने तीन दिन से कुछ भी नहीं खाया है. वे रोते हुए कहती हैं, ‘मेरे पति की मौत के लिए पुलिस और प्रशासन जिम्मेदार है. वे हत्या के तीन दिन बाद तक अभियुक्त की शिनाख्त नहीं कर पाए हैं. मैं उनसे किसी तरह की उम्मीद भी नहीं कर रही हूं.’ कृपाल के परिवार ने राज्य सरकार को धमकी दी है और कहा है कि अगर वह इस मामले में कुछ नहीं कर पाती है तो इसके परिणाम बहुत गंभीर होंगे. मोनी की बहन ने चेतावनी देते हुए कहा, ‘हमने उन्हें खो दिया है और अब हमें न्याय चाहिए. हम कुछ दिन सरकार से न्याय के लिए पहल का इंतजार करेंगे और अगर वह कुछ नहीं करती है तो हम उन्हें बताएंगे कि हम क्या कर सकते हैं?’ आसाराम के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकार पीड़िता के पिता करमवीर सिंह द्वारा दर्ज कराए गए मामले में कृपाल का नाम बतौर गवाह शामिल है. करमवीर, शाहजहांपुर में ट्रांसपोर्टर हैं.

मीडिया की रिपोर्ट में कृपाल को आसाराम का कर्मचारी बताया जाता रहा है जबकि करमवीर की मानें तो वह एलआईसी में बतौर एजेंट कार्यरत थे और उनके कर्मचारियों को बीमा पॉलिसियां बेचने के लिए अक्सर उनके यहां आते-जाते रहते थे. करमवीर ने बताया, ‘जिस रोज कृपाल की हत्या हुई, उस दिन भी वह मेरे पास आए थे. हम दोनों दोस्त थे और आसाराम के सत्संग में साथ ही जाते थे.’ अचरज की बात तो यह है कि कृपाल के परिवार के लोगों को इस बात की कोई खबर नहीं थी कि आसाराम मामले में वह भी गवाह थे. यह बात उनके परिवार के लोगों को मीडिया के माध्यम से पता चली.

मृतक गवाह कृपाल सिंह
मृतक गवाह कृपाल सिंह

मोनी अपने आंसू पोछते हुए बताती हैं, ‘हमें यह भी पता नहीं था कि वे आसाराम के सत्संग में जाते हैं. हमने उनसे जब इस बारे में पूछा था तब उन्होंने टाल दिया था. उन्हें इस मसले में साजिश के बतौर गवाह बनाया गया है. जब आसाराम के साथ उनके संबंध नहीं थे तब उन्हें गवाह क्यों बनाया गया? इससे इतर जब सरकार को यह पता चला कि वे इस मामले में मुख्य गवाह हैं तब फिर उन्हें सुरक्षा क्यों नहीं दी गई?’ करमवीर को मोनी की यह बात अच्छी नहीं लगी.

करमवीर ने बताया, ‘मेरी उनके साथ पूरी सहानुभूति है लेकिन वे पूरी तरह डरी हुई हैं. कृपाल, आसाराम के संगठन की स्थानीय युवा इकाई के अध्यक्ष भी रहे थे. हकीकत तो यह है कि कृपाल के परिवार के लोग आसाराम का साहित्य वितरित करते थे. कृपाल और उसके परिवार के लोगों को अदालत में बयान नहीं देने के लिए धमकाया जा रहा था. परिवारवालों ने कृपाल पर बयान न देने का दबाव भी बनाने की कोशिश की थी.’

करमवीर इस घटना से पहले आसाराम के भक्त थे. उन्होंने आसाराम द्वारा 15 अगस्त 2013 को जोधपुर में अपनी बेटी के यौन उत्पीड़न के खिलाफ 19 अगस्त 2013 को दिल्ली के कमला नगर थाने में शिकायत दर्ज कराई थी. आसाराम का सत्संग दिल्ली में चल रहा था, इसलिए उन्होंने वहां शिकायत दर्ज कराई थी. करमवीर ने पहली बार 2001 में रायबरेली में हुए आसाराम के सत्संग में भाग लिया था. शाहजहांपुर से रायबरेली सिर्फ 75 किमी की दूरी पर है. इसके बाद वह आसाराम के सत्संग में नियमित रूप से आने-जाने लगेे. कुछ समय बाद उन्होंने अपनी बच्ची को आसाराम के मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित गुरुकुल में भेज दिया. मामले का पता तब चला जब उनकी 17 वर्षीय बेटी स्कूल में अचानक बीमार हो गई.

आसाराम को कभी ईश्वर की तरह माननेवाले करमवीर उन्हें धुआंधार तरीके से गाली देते हुए बताते हैं, ‘मुझे गुरुकुल से एक दिन फोन आया कि आपकी बेटी बीमार पड़ गई है. मैं जब वहां पहुंचा तो मुझसे कहा गया कि अपनी बेटी को लेकर जोधपुर स्थित आसाराम के आश्रम चले जाओ. मैं उसे लेकर वहां गया और फिर वापस घर आ गया. बाद में मेरी बेटी का फोन आया और उसने अपने कटु अनुभव मुझसे बताए. यही वजह है कि मैंने आसाराम के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई.’ दूसरी ओर कृपाल को जब इस घटना के बारे में पता लगा तो उन्होंने भी आसाराम के आश्रम जाना छोड़ दिया और इस मामले में गवाह बन गए. मामला दर्ज कराने के बाद से ही कृपाल और करमवीर को लगातार जान से मारने की धमकियां मिलती रहीं. करमवीर ने अपनी सुरक्षा के लिए प्रशासन को आवेदन भी दिया था लेकिन कृपाल ने कभी इस बारे में आवेदन तक नहीं दिया. करमवीर कहते हैं, ‘वह बहादुर थे और बहादुर आदमी की तरह उन्होंनेे इस बात को हलके में लिया. मैंने उनसे कई बार सुरक्षा लेने को कहा लेकिन हर बार उन्होंनेे मना कर दिया. मैंने पुलिस से जान से मारने की धमकियां मिलने की शिकायत कई बार की थी.’ पुलिस ने कृपाल सिंह की मौत के बाद करमवीर की सुरक्षा बढ़ा दी है.

इस मामले में धमकियां और हमले केवल गवाहों तक ही सीमित नहीं हैं. यहां के एक पत्रकार जो राष्ट्रीय हिंदी दैनिक के लिए काम करते हैं, जो इस मामले पर लिखते रहे, उन पर छुरे और ब्लेड से जानलेवा हमला हो चुका है. पत्रकार नरेंद्र यादव का कहना है, ‘मुझे जान से मारने की धमकियां दी गईं और जब मैंने तब भी इस मुद्दे पर लिखना जारी रखा तब मुझे पांच लाख रुपये की पेशकश भी की गई. इसके बावजूद मैंने इस मुद्दे पर लिखना जारी रखा तब मुझ पर दो लोगों ने छुरी और ब्लेड से जानलेवा हमला किया. संयोग से  मैं बच गया और अब मैं आसाराम के मसले पर विशेषज्ञ की तरह हूं. सच तो यह है कि मैं इस मसले पर पुलिस से ज्यादा जानकारी रखता हूं.’ नरेंद्र का दावा है कि उन्होंने आसाराम से जुड़े इस मसले पर अब तक 287 रिपोर्ट लिखी हैं. नरेंद्र अपने ऊपर हुए हमले के बाद खुद की लाइसेंस वाली बंदूक साथ में लेकर सड़क पर निकलते हैं. उन्हें पुलिस की सुरक्षा भी मिली हुई है. उन्होंने इस मामले की तहकीकात  सीबीआई से कराए जाने की मांग की है. जोधपुर कोर्ट से बाहर मीडिया के सवालों के जवाब देते हुए आसाराम ने कहा था, ‘दुनिया में सारे हमले मैं ही करवाता हूं. राष्ट्रपति से कहो जांच करवाने के लिए.’

आसाराम मामले में 50 से ज्यादा गवाह हैं और इनमें से तीन की मौत हो चुकी है जबकि अब तक नौ गवाहों पर हमले हो चुके हैं. सरकार को इस मामले के गवाहों की सुरक्षा के लिए अनिवार्य तौर पर कुछ कार्रवाई करनी चाहिए अन्यथा यह कहीं दूसरा व्यापमं न साबित हो जाए.

‘आरएसएस इस देश को एक हिंदू राष्ट्र बनाना चाहता है’

Teesta-Webआप पर म्यूजियम बनाने के लिए फोर्ड फाउंडेशन से मिले धन का गबन करने का आरोप है. इसमें कितनी सच्चाई है?

गुजरात पुलिस की क्राइम ब्रांच के द्वारा हम पर लगाए गए किसी भी आरोप में कोई सच्चाई नहीं है. इनमें से कुछ आरोप अभी हाल में सत्ता द्वारा नियंत्रित सीबीआई द्वारा लगाए गए हैं. क्राइम ब्रांच ऐसे अधिकारियों के हाथों में है जिनका पेशेवर रवैया गुजरात हाईकोर्ट में चल रहे जकिया जाफरी के केस को लेकर शक के दायरे में है. हमने जांचकर्ताओं को दस्तावेजी सुबूत (जो लगभग 25 हजार पेज हैं) मुहैया कराए हैं . वैसे अब तक इस मामले में चार्जशीट भी दायर नहीं हुई है बस हमें सार्वजनिक जीवन में धमकाया, परेशान और तिरस्कृत किया जा रहा है.

गुलबर्ग सोसायटी के कुछ पीड़ितों की मुख्य शिकायत एक ड्रीम प्रोजेक्ट, गुलबर्ग मेमोरियल के लिए इकट्ठा किए गए लगभग चार लाख साठ हजार रुपये को लेकर थी, जिसे जमीन के दामों में हुए जबरदस्त उछाल के बाद रद्द करना पड़ा. वो पैसा अब भी उन खातों में पड़ा हुआ है. बदले की भावना से हो रही कार्रवाई की ये पूरी श्रृंखला क्राइम ब्रांच ने शुरू की और आक्रामक तरीके से जारी रखी.  ये वही क्राइम ब्रांच है जिसके कई अधिकारियों को 2002 में गैरकानूनी रूप से की गई हत्याओं के मामले में हाल ही में बरी किया गया है. ये सब जनवरी, 2013 में शुरू हुआ जब हमारे खातों को गैर-कानूनी तरीके से सील कर दिया गया. उसके बाद फरवरी 2015 में हमें हिरासत में लेने के प्रयास सफल नहीं हो पाए, जब हाईकोर्ट ने हमारी अग्रिम जमानत याचिका नामंजूर की और हाईकोर्ट के आदेश के चंद मिनटों के अंदर क्राइम ब्रांच हमारे घर पहुंच गई. जब ये योजना भी काम नहीं आई तब गुजरात के गृह मंत्रालय ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की एफसीआरए डिवीजन को एक पत्र लिखा. इसके बाद तो जैसे जांचों की बाढ़-सी आ गई. ये सब उन्हीं के द्वारा किया जा रहा है, जो 2002 के बाद हमें मिली सफलता से चिढ़े हुए हैं. हमारा मुंह बंद कराने के तमाम प्रयासों के असफल होने के बाद उनका गुस्सा और बढ़ गया है.

अधिकारियों का आरोप है कि आपने विदेशी दानदाताओं से मिले पैसे का उपयोग राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के लिए किया. उन्होंने आपको राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा भी कहा है. आपका क्या कहना है?

ये न्याय पर आधारित भारत के संविधान और गणतंत्र का घोर अपमान है, जहां शांति-व्यवस्था को मजबूत करने को राष्ट्र-विरोधी कहा जा रहा है. ये निश्चित रूप से, वर्तमान सत्तारूढ़ दल की रीढ़ यानी फासीवाद-समर्थक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा के बिल्कुल विपरीत है.

हमने कोई कानून नहीं तोड़ा. एफसीआरए, 2010 की धारा 3 के तहत चुनिंदा व्यक्तियों, जिसमें राजनीतिक दलों और उसके पदाधिकारी, सरकारी मुलाजिम, रजिस्टर्ड न्यूजपेपर से जुड़े लोग, खबरों के निर्माण और प्रसारण से जुड़े लोग आते हैं, को विदेशी चंदा लेने की मनाही है.

हालांकि उसी अधिनियम की धारा 4, यह बताती है कि किन व्यक्तियों पर धारा 3 लागू नहीं होगी. इसके अनुसार ये धारा किसी भी व्यक्ति पर लागू नहीं होगी जिनका उल्लेख धारा 3 में है तथा जिनके द्वारा धारा 10 (ए) के प्रावधानों के तहत विदेशी चंदा स्वीकार किया गया है जैसे कि वेतन, मजदूरी या अन्य पारिश्रमिक जो उनको देय हो या किसी व्यक्ति, समूह को जो उसके अधीन काम कर रहा हो, किसी विदेशी स्रोत से या फिर ऐसे किसी विदेशी स्रोत के द्वारा भारत में घटित किसी सामान्य व्यवसायिक गतिविधि में किया गया भुगतान हो.

मासिक ‘कम्युनलिज्म कॉम्बेट’ का प्रकाशन करने वाली सबरंग कम्युनिकेशन प्रा. लि. कंपनी ने 2004 और 2006 में फोर्ड फाउंडेशन के साथ एक कंसल्टेंसी समझौता किया, जिसका उद्देश्य जात-पात और सांप्रदायिकता के मुद्दों को उठाना था. उसका ‘कम्युनलिज्म कॉम्बेट’, जावेद आनंद या तीस्ता सीतलवाड को संपादकीय/प्रबंध से जुड़े कार्यों के बदले मिले भत्ते से कोई लेना-देना नहीं था. नामी कानूनी परामर्शदाताओं की सलाह के बाद ही सबरंग कम्युनिकेशन ने कंसल्टेंसी समझौते पर हस्ताक्षर किए जिन्होंने बताया कि ये समझौता एफसीआरए 2010 की धारा 4 में मिली छूट के अंदर है और इस तरह जो कंसल्टेंसी फीस होगी (अनुदान या दान नहीं) उससे एफसीआरए 2010 का उल्लंघन नहीं होगा. फोर्ड फाउंडेशन ने सबरंग कम्युनिकेशन को भुगतान की गई कंसल्टेंसी फीस की सभी किस्तों पर टीडीएस भी काटा था. जो काम किए गए और उन पर जितना खर्च आया वे सब समझौते के मुताबिक थे. फोर्ड फाउंडेशन की संतुष्टि के लिए गतिविधियों और वित्तीय रिपोर्ट्स को हर साल जमा किया जाता था.

2002 दंगों को लेकर जिस तरह आपने कानूनी लड़ाई जारी रखी है, क्या लगता है कि गुजरात की पूर्व की मोदी सरकार के बाद अब केंद्र की मोदी सरकार आपको निशाना बना रही है?

यहां इसकी शुरुआत जाननी बहुत महत्वपूर्ण है. इसकी शुरुआत 4 जनवरी 2014 को, गुलबर्ग सोसायटी से जुड़े कथित गबन के आरोप में हम पांच लोगों पर तथ्यहीन एफआइआर दर्ज होने के साथ हुई. गुलबर्ग म्यूजियम के लिए कुल चार लाख साठ हजार रुपये इकट्ठा हुए थे, तो जांच भी उन्हीं पैसों के मामले में होनी चाहिए थी. पर गुजरात पुलिस ने शुरू से ही बढ़-चढ़कर काम किया. पुलिसिया कहानी के आधार पर मीडिया जिन करोड़ों रुपये की बात करता है वो सारा पैसा कानूनी सहायता और दोनों ट्रस्टों के कामकाज के लिए इकट्ठा किया गया था. इस एफआइआर का एक मकसद हमें नीचा दिखाना था ताकि हमारे समर्थकों और दंगे में बचे लोगों का हम पर से विश्वास उठ जाए. बॉम्बे हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत मिलने के बाद हम अहमदाबाद सत्र न्यायालय गए. यहां भी हमारी जमानत याचिका नामंजूर हो गई. जांच अधिकारी ने जो आरोप लगाए वे शपथ पत्र पर थे, वो भी बिना किसी दस्तावेजी प्रमाण के. मार्च 2014 से लेकर फरवरी 2015 तक जब अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई, हमने उन आरोपों का पांच हजार पेज के दस्तावेजों के आधार पर खंडन किया. हमने मेरे क्रेडिट कार्ड उपयोग आदि से जुड़े आरोपों को भी गलत साबित किया. मैं जैसे चाहे रह सकती हूं, शराब पी सकती हूं और इस बात से मैं बिल्कुल इंकार नहीं करती पर ये सब मेरी निजी कमाई से होता है न कि जैसा आरोप है वैसा.

सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद हमने 21 हजार पेज के दस्तावेज और पेश किए. यानी अब तक हमने कुल 25 हजार पेज के दस्तावेज पेश किए हैं, जिसे गुजरात पुलिस में कोई स्वीकारने वाला नहीं है. यहां गौर करने वाली बात ये है कि कैसे हमारी निजता का हनन हुआ और इस जांच का दायरा कितना बड़ा बनाया गया. इस साल 10 मार्च को गुजरात के गृह विभाग ने एफसीआरए को एक पत्र लिख ा. इस मामले में शिकायतकर्ता गुजरात सरकार है. गृह मंत्रालय या एफसीआरए स्वतंत्र रूप में नहीं बल्कि गुजरात सरकार के इशारे पर ये सब कर रहे हैं.

इसमें कोई चौंकने वाली बात नहीं है कि हमें नोटिस मिले. हमने पूरा सहयोग किया क्योंकि हमें विश्वास था कि हमारी तरफ से कोई उल्लंघन नहीं किया जाएगा. इन सबका उद्देश्य सिर्फ हमें कानूनी पचड़ों में उलझाए रखकर हमारे काम को कमजोर करना है, जो संविधान के अनुरूप है और इस सरकार की विचारधारा को चुनौती देता है (जिसके पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की प्रतिबद्धता है) और उस भीड़ में संतुष्टि बनाए रखना है, जो इस विचारधारा का समर्थन करती है.

गृह मंत्रालय ने सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस (सीजेपी) और सबरंग के दस्तावेजों से जांच की शुरुआत की थी और अब उनके निशाने पर सबरंग कम्युनिकेशन है. हमारा केस अपने आप में अलग और अनोखा है जहां पर देश की मशीनरी का उपयोग बदले की भावना को पूरा करने के साधन के रूप में किया जा रहा है. अब जब हमारी जमानत याचिका पर सुनवाई होनी है तब हमारा ध्यान भटकाने के लिए तमाम तरकीबें अपनाई जा रही हैं. यह सरकार का स्पष्ट एजेंडा लगता है, जिसका सीधे-सीधे पालन किया जा रहा है. सीबीआई को दिल्ली से सीधे हमारे घर और दफ्तरों पर छापे मारने के लिए भेज दिया जाता है. बावजूद इसके कि हमने 30 जून 2015 को खुद ही आगे बढ़कर सीबीआई (मुंबई आर्थिक अपराध शाखा को भी) पत्र लिखकर पूरा सहयोग देने की इच्छा जाहिर की थी.

ऐसी निरंकुशता क्यों? क्या ये कोई संयोग है कि वाइसी मोदी (एनडीए-1 की सरकार में सीबीआई में रहते हुए हरेन पंड्या मर्डर की जांच को कमजोर करने के जिम्मेदार) और एके शर्मा, अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के पूर्व संयुक्त पुलिस आयुक्त (स्नूपगेट और इशरत जहां हत्याकांड में लीपापोती के जिम्मेदार) को पीएमओमें शामिल कर लिया जाता है. और फिर ये अधिकारी राजनेताओं की निजी सेना की तरह काम करने लगते हैं!

teesta web

आपके अनुसार आपके घर पर सीबीआई के हालिया छापों का एक कारण 2002 के दंगों से संबंधित सुनवाई भी हो सकती है. कृपया ये स्पष्ट कीजिए और इस मामले में हुई हालिया कानूनी प्रगति के बारे में भी बताइए.

हाईकोर्ट में जकिया जाफरी की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को गुलबर्ग केस, जिसमें एहसान जाफरी समेत 69 लोगों की हत्या हुई थी, के साथ मत जोड़िए. ये याचिका 2002 के गुजरात दंगों के समय हुई सभी घटनाएं आपराधिक या प्रशासनिक मिलीभगत से संबंधित है. इस तरीके से देखें तो ये एक ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई है. 8 जून 2006 को हमारे सहयोग से जकिया जाफरी द्वारा आपराधिक शिकायत दायर करने के साथ इसकी शुरुआत हुई. जब एफआइआर दर्ज नहीं हुई तो हम एफआइआर दर्ज कराने के निर्देश लेने हाईकोर्ट गए. हाईकोर्ट ने भी हमारी याचिका खारिज की, तब हम सुप्रीम कोर्ट गए.

27 अप्रैल 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने जांच उसी एसआइटी को सौंप दी जिसका गठन दूसरे मामलों के लिए किया था जिसमें हम शामिल थे लेकिन इस शर्त और चेतावनी के साथ कि गुजरात से बाहर के अधिकारी इस मामले को देखें. वो जांच 2009 में शुरू हुई. मैंने जुलाई 2009 में अपने बयान दर्ज कराए. उस वक्त दस्तावेजी सुबूत के तौर पर हमारे पास आईपीएस अधिकारी राहुल शर्मा (जिन्होंने 2002 के दंगों के दौरान भाजपा, विहिप के सदस्यों और पुलिस अधिकारियों के मोबाइल फोन रिकॉर्ड का अध्ययन किया था) और दूसरे अन्य अधिकारियों के शपथ पत्र थे जो उन्होंने नानावटी कमीशन के पास जमा किए थे. हमारे पास आईपीएस अधिकारी आरबी श्रीकुमार के शपथ पत्रों का अनुबंध भी था जो शपथ पत्र से भी ज्यादा महत्वपूर्ण था क्योंकि उन्होंने राज्य की खुफिया रिपोर्टों को सार्वजनिक कर दिया था. आपराधिक कानून के मुताबिक ये किसी व्यक्ति की राय नहीं बल्कि विश्वनीय दस्तावेजी सुबूत हैं.

आपको यह क्यों लगता है कि सीबीआई केंद्र सरकार के इशारे पर आपके खिलाफ काम कर रही है?

मेरी राजनीतिक सक्रियता 1975 में उस समय शुरू हुई जब मैं 10वीं कक्षा में पढ़ती थी. पिताजी ने कहा परीक्षा छोड़ो और आपातकाल के खिलाफ लड़ाई लड़ो. मुद्दा किसी राजनीतिक पार्टी विशेष के खिलाफ लड़ाई का नहीं बल्कि लोकतंत्र में तानाशाही के खिलाफ था. आपातकाल का माहौल उसके लगने के दो साल पहले से शुरू हुआ, जब तीन जजों के निर्णय के अतिक्रमण के रूप में न्यायपालिका पर पहला हमला हुआ. मैं आज फिर वही माहौल बनते देख रही हूं. मुझे लगता है कि नियंत्रण रखने के प्रति जितना झुकाव कांग्रेस और यूपीए में था, कमोबेश वही प्रवृत्ति एनडीए में भी है. अंतर केवल इतना है कि एनडीए के पीछे आरएसएस की विचारधारा है जो इस देश को संवैधानिक और गणतांत्रिक देश नहीं बल्कि एक हिंदू राष्ट्र बनाना चाहता है. हम देख सकते हैं कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय में शिक्षा, संस्कृति और एफटीआईआई को लेकर क्या चल रहा है! तानाशाही वहीं होती है, जहां राजनीतिक पार्टियां जांच एजेंसियों पर भी नियंत्रण रखना चाहती हैं और राष्ट्र की विचारधारा पर कब्जा कर लेती हैं. यही आरएसएस और भाजपा कर रहे हैं. दोनों का समान रूप से विरोध करने की जरूरत है. सीबीआई पर भी यही बात लागू होती है. जब हवाला और अन्य मामले सामने आए तब सीबीआई की एक छवि थी, इसे एक स्वतंत्र एजेंसी के तौर पर देखा जाता था. ऐसा भी वक्त था जब राजनेता सीबीआई का दुरुपयोग करने की हिमाकत नहीं करते थे. यहां हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सीबीआई कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के मातहत काम करती है जो पीएमओ के अधीन है, गृह मंत्रालय के नहीं. हमारे केस को छोड़ भी दें लेकिन ये जरूरी है कि सीबीआई संसद के प्रति जवाबदेह हो न कि सरकार के प्रति.

बतौर एक मानवाधिकार कार्यकर्ता आपको 2002 के दंगा पीड़ितों के साथ काम करने में किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा?

मुझे लगता है कि ऊपर दिए गए सभी जवाब इस बात को दर्शाते हैं कि बदले की भावना में शासन तंत्र किस हद तक जा सकता है. गुजरात सरकार ने न्यायालय और अपनी पुलिस के जरिए 2004 से ही मेरे और मेरे संगठनों के खिलाफ बदनाम करने और डराने-धमकाने का मानो अभियान छेड़ रखा है. मेरे खिलाफ आधा दर्जन प्रार्थना-पत्र तथ्यहीन आरोप लगाते हुए दायर किए गए हैं. अब ये अभियान और तेज हो गया है और मेरे परिवार तक पहुंच गया है. केंद्र में सत्ता बदलते ही केंद्रीय एजेंसियों को भी पीछे लगा दिया गया है. इसी बीच हमें (सीजेपी और तीस्ता) गवाहों को प्रभावित करने के आरोपों से बरी भी किया जाता रहा है.

  • रजिस्ट्रार जनरल बीएम गुप्ता की रिपोर्ट- अगस्त 2005
  • सरदारपुरा स्पेशल कोर्ट (ट्रायल) का फैसला- 9.11.2011
  • नरोदा पाटिया स्पेशल कोर्ट (ट्रायल) का फैसला- 29.08.2012
  • बेस्ट बेकरी स्पेशल कोर्ट का फैसला (ट्रायल) फरवरी 2006 और अपील 4.7.2012

इस सबने 2002 हिंसा से जुड़ी कानूनी लड़ाई को कैसे प्रभावित किया है?

ये सब बहुत थकाऊ, शक्तिहीन कर देने जैसा है और बहुत चुनौतीपूर्ण भी. मगर अब तक हिम्मत नहीं टूटी है, हमें जो समर्थन मिला वो अभूतपूर्व था.