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‘अगर हिंसा करनी पड़ी तो वो भी करूंगा’

Iपाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पीएएएस) की शुरुआत के बारे में बताइए?

संगठन की शुरुआत 2011 में लौहपुरुष सरदार पटेल की जयंती पर हुई थी. मैं इस संगठन को अहमदाबाद के विरामगाम और मंडल इलाके से सिर्फ पाटीदार समुदाय के लिए चला रहा था. समाज के संवेदनशील तबके, जिसमें  हिंसा की शिकार महिलाएं और किसान शामिल हैं, की रक्षा करना हमारा उद्देश्य है. इसलिए हम उनके लिए काम कर रहे हैं और पिछले दो सालों में लगभग 12 हजार लोग हमारे संगठन से जुड़ चुके हैं.

उस समय तमाम पाटीदार ये शिकायत किया करते थे कि उन्हें न तो नौकरी मिल रही है और न ही शिक्षण संस्थाओं में एडमिशन. पिछले दो सालों में ऐसे मामलों को देखते हुए मैंने जाना कि इन समस्याओं के पीछे आरक्षण सबसे बड़ा और मुख्य कारण है. कोई 80 प्रतिशत अंक पाता है, फिर भी उसे एडमिशन नहीं मिल पाता, वहीं आरक्षण की वजह से उससे कम अंक वाले का एडमिशन हो जाता है और उनकी नौकरी लग जाती है. इसलिए मेहसाणा में पहली रैली कर हमने आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया. धीरे-धीरे विसनगर, गांधीनगर और गुजरात के दूसरे हिस्सों में रैली कर आंदोलन को आगे बढ़ाया. आज जारी आंदोलन की यह शुरुआत थी.

आपकी मांगों में विरोधाभास नजर आता है. अहमदाबाद में हुई रैली में तमाम लोग इसलिए शामिल हुए क्योंकि उनका मानना था कि आप देश में आरक्षण व्यवस्था को खत्म करने की मांग कर रहे हैं. एक तरफ तो आप आरक्षण की मांग कर रहे हैं और दूसरी तरफ यह भी कह रहे हैं कि पाटीदारों को अगर आरक्षण नहीं दिया जाएगा तो ये व्यवस्था खत्म होनी चाहिए. आप इन दोनों बातों को किस तरह से देखते हैं?

भारत से आरक्षण व्यवस्था को खत्म नहीं किया जा सकता क्योंकि हमारा देश इसी वजह से चल रहा है. यहां तक कि देश में राजनीति का आधार एक तरह से आरक्षण ही है. इसलिए हम आरक्षण व्यवस्था काे खत्म नहीं कर सकते. इसकी जगह हम आरक्षण का हिस्सा बनना चाहते हैं क्योंकि अगर हमें इसमें शामिल किया जाता है तो हमारे समुदाय को भी वे लाभ मिलेंगे जो दूसरों को मिलते हैं. आज अनुसूचित जाति या जनजाति के छात्र-छात्राओं को सामान्य श्रेणी के लिए आरक्षित सीटों पर भी एडमिशन लेने का मौका मिल जाता है. मगर हमें उनके लिए आरक्षित सीटों पर एडमिशन नहीं मिलता. मैं सिर्फ पाटीदार समुदाय की ही नहीं सामान्य श्रेणी में आने वाली दूसरी जातियों की भी बात कर रहा हूं. पहले तो वे अपनी सीट खाते हैं और बाद में हमारी.

गुजरात में दंगे जैसी स्थितियां पैदा होने के बाद इस आंदोलन ने बड़ा रूप ले लिया है. क्या आपने या सरकार के लोगों में से किसी ने मामले का हल निकालने के लिए बातचीत की कोई कोशिश की है?

सरकार आगे आए और हमसे बात करे. हम नहीं जाएंगे सरकार से बात करने. अगर किसी दूसरे समुदाय को हमसे कोई दिक्कत है तो उन्हें ये फैसला करने का हक नहीं कि हमें क्या करना चाहिए. सरकार को फैसला करने दीजिए कि वह क्या करना चाहती है.

क्या आप अश्विन पटेल के पाटीदार आरक्षण संघर्ष समिति से भी जुड़े थे, जिन्होंने सबसे पहले इस मुद्दे को लोगों के सामने रखा. ऐसा कहा जाता है कि आप दोनों के बीच वैचारिक मतभेद होने के बाद आपको संगठन से हटा दिया गया. आपका इस बारे में क्या कहना है?

मैं अश्विन के साथ कभी नहीं रहा. हमने अपने आंदोलन के बारे में उन्हें जानकारी दी थी, लेकिन हमें आरक्षण जैसे मुद्दे के हल को लेकर उनका दृष्टिकोण पसंद नहीं था. उनकी अपनी विचारधारा है और वे भाजपा के साथ जुड़े हुए भी थे. अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए वह हमारे आंदोलन को भुनाना चाहते थे. वह दिल्ली में अपने राजनीतिक आधार की तलाश कर रहे थे, लेकिन मैं राजनीतिज्ञ नहीं बनना चाहता. अगर रिमोट कंट्रोल हमारे हाथ में होगा तो हम सरकार को झुका भी सकते हैं और उसे बदल भी सकते हैं.

आप और अश्विन के बीच किस तरह के राजनीतिक मतभेद थे, जिसकी वजह से आपको अलग राह चुननी पड़ी?

अश्विन के पास ऐसा कोई विचार नहीं था कि एक आंदोलन कैसे चलाया जाए. आंदोलन क्रांति के जैसा होता है और वह क्रांतिकारी नहीं हैं.

तो क्या इसलिए इस आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए आप सरदार पटेल समूह (एसपीजी) के साथ जुड़ गए?

वह समूह हमारे संगठन का हिस्सा कभी नहीं रहा और न ही हम कभी उसके साथ रहने की चाहत रखते थे. एसपीजी की तरह गुजरात में 5,000 पाटीदार समूह हैं. सिर्फ पाटीदार अनामत आंदोलन समिति ही है जो खासतौर पर पटेल समुदाय काे आरक्षण दिलाने के लिए संघर्ष कर रही है. हर छोटा समूह इस आंदोलन में हमारा साथ दे रहा है. एसपीजी ने भी हमारा साथ दिया था, लेकिन अब वे अलग हो गए हैं. इससे हमें कोई खास फर्क नहीं पड़ा है. यह तो हमारी समिति थी, जो एसपीजी को राज्य में आगे लेकर आई.

इसका मतलब आप पूरे आंदोलन को अपने कंधों पर आगे बढ़ा रहे हैं और खुद को अलग पहचान देने में लगे हुए हैं. अहमदाबाद में हुई अपनी रैली में आपने गुजरात से भाजपा सरकार को हटाने का भी जिक्र किया था. क्या इसे एक राजनीतिक उद्देश्य के तौर पर देखा जाना चाहिए?

मैं कोई राजनीतिज्ञ नहीं हूं, लेकिन अगर मेरे मित्र आगे आना चाहते हैं और इस संगठन को राजनीतिक दल बनाने की इच्छा रखते हैं तो मैं हमेशा उनकी मदद करूंगा. अगर हमारे पास रिमोट है तो हम सरकार को बदल सकते हैं. हम भाजपा या कांग्रेस को नहीं चाहते. हम उनके साथ हैं, जो हमारा समर्थन करते हैं. हम लोगों से अपील करेंगे कि अगर हमारी मांगों को पूरा नहीं किया जाता तो 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में वे नोटा (नन ऑफ द अबव) बटन दबाएं. मैं शिवसेना की तरह एक ऐसा संगठन बनाना चाहता हूं, जो लोगों के अधिकारों के लिए लड़े और उनकी तकलीफों का ख्याल रखे. हमारी कार्यप्रणाली में दोहरापन नहीं है. हम वही करते हैं जो कहते हैं. मैं भी वहीं करूंगा जो सही है, वह भी पूरी दबंगई के साथ.

क्या आप खुद को बालासाहब ठाकरे की तरह देखते हैं?

हां, मैं खुद को उनकी स्थिति में देखता हूं. उनके फैसले पूरी राजनीतिक कार्यप्रणाली का रुख बदले सकते थे. उन्होंने हमेशा सही किया. उनके पास जो ताकत थी, उसकी बात ही अलग है.

आपको हिरासत में लिए जाने के बाद गुजरात में दंगे जैसी स्थितियां बनने के बारे में आपका क्या कहना है? क्या हिंसा फैलने की स्थिति में भी आप आंदोलन को आगे बढ़ना चाहेंगे?

अगर सही तौर पर हिंसा करनी पड़ी तो वो भी करूंगा. गुजरात में जो कुछ भी हुआ उसके लिए सरकार और पुलिस जिम्मेदार है. जिस तरह पुलिस ने लोगों को घरों में घुसकर पीटा और महिलाओं के साथ बदसलूकी की, वह कहीं से भी न्यायोचित नहीं था. अगर मेरे पास ताकत और अधिकार होंगे तो मैं ऐसे पुलिसवालों को पीटने का कोई भी मौका नहीं गंवाऊंगा. उन्हें लगता है कि वे हिटलर या जनरल डायर हैं.

क्या आपको नहीं लगता कि इस तरह का दृष्टिकोण हिंसा को और बढ़ाता है?

अगर वे हिंसक हो सकते हैं, तो हम क्यों नहीं? वे सरकार का हिस्सा हैं और तब वे ऐसा कर रहे हैं. हम तो आम लोग हैं, तो हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते? अगर पुलिस ने इस तरह से काम किया तो लोग इसका विरोध जताने के लिए आगे आएंगे. आम लोगों के लिए मेरा संदेश है कि वे व्यवस्था बनाए रखें और तब तक हिंसा न करें, जब तक कि कोई उनके घरों में घुसकर उनसे मारपीट न करे.

ये पहले से तय था कि वे पुलिस से भिड़ेंगे : अश्विन पटेल

पाटीदार आरक्षण संघर्ष समिति (पीएएसएस) के राष्ट्रीय संयोजक अश्विन पटेल हैं. कथित तौर पर कहा जाता है कि हार्दिक पटेल ने इसी संगठन से अपनी पहचान बनाई है. हालांकि इस बात से हार्दिक साफ-साफ इंकार कर चुके हैं. उनका कहना है कि उनके आंदोलन को पीएएसएस से जोड़कर न देखा जाए. वहीं अश्विन पटेल की बातों पर भरोसा किया जाए तो हार्दिक उनके संगठन से बाकायदा जुड़े हुए थे, लेकिन उनकी दिलचस्पी पटेल समुदाय के कल्याण से ज्यादा राजनीति में थी, इसीलिए उन्हें संगठन से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

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अश्विन कहते हैं, ‘ये 1992 की बात है, जब गुजरात के लोगों ने आरक्षण के खिलाफ आवाज उठाई थी. यह एक छोटे स्तर का विरोध प्रदर्शन था, जो मेहसाणा के नजदीक शुरू किया गया था. लोग देश में आरक्षण व्यवस्था के खिलाफ खड़े हुए थे. उस समय यह विरोध प्रशासन का ज्यादा ध्यान नहीं बटोर पाया और कहीं गुम हो गया. इतने दशक बाद पटेलों के लिए आरक्षण की मांग को लेकर पाटीदार आरक्षण संघर्ष समिति तीन साल पहले उभरी.’ उन दिनों को याद करते हुए अश्विन कहते हैं, ‘शुरुआत में हमारे संगठन का उद्देश्य देश से आरक्षण खत्म करना था. करीब एक साल तक विरोध जारी रहा. उस समय संगठन में कुल पचास कार्यकर्ता थे. तब हमें ये लगा कि हमारी मांगें पूरी नहीं हो पाएंगी. अगर समाज का एक वर्ग हमारा समर्थन भी करेगा तब भी हम अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाएंगे. इसीलिए हमने पटेलों के लिए ओबीसी कोटे की मांग की. ये मांग खासतौर से किसानों के लिए थी जिनकी हालत बहुत खराब थी. इसके बाद पटेलों को ओबीसी कोटा देने की मांग को लेकर दो साल पहले सूरत में आंदोलन शुरू हुआ. हमने रैलियां करने से पहले लोगों में जागरूकता फैलाने का निर्णय लिया था. हमारी योजना अगले दो सालों में गांवों तक पहुंचकर एक शांतिपूर्ण आंदोलन चलाने की थी. हम नहीं चाहते थे कि ओबीसी में शामिल दूसरे समुदाय पटेलों के खिलाफ हिंसात्मक रुख अख्तियार कर लें और हमारे खिलाफ खड़े हो जाएं.’ अश्विन के अनुसार, ‘संगठन दिल्ली में जब आंदोलन के लिए खाका तैयार कर रहा था तब हार्दिक गुजरात की टीम देख रहे थे. वे ग्रामीण इलाकों में बहुत सक्रिय थे. उस समय सरदार पटेल समूह (एसपीजी) ने हमारा समर्थन किया था. साथ ही समूह का नजरिया इस बात को लेकर स्पष्ट था कि वे आंदोलन में सामने नहीं आएंगे.’ हार्दिक ने गुजरात में एसपीजी के साथ आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए लगातार काम किया और यह अभियान सबकी नजरों में आ गया.’

आंदोलन ने हिंसक रुख कैसे अख्तियार कर लिया, इसके जवाब में अश्विन ने कहा, ‘विसनगर की रैली हमारी दूसरी महत्वपूर्ण रैली थी जिसके इंचार्ज हार्दिक थे. हमारा उद्देश्य एकदम साफ था. हमें एक शांतिपूर्ण रैली कर पांच हजार पटेलों के हस्ताक्षर लेने थे. फिर इन हस्ताक्षरों के साथ एक ज्ञापन पुलिस कमिश्नर को देना था. लेकिन रैली के बाद झड़प हो गई. विसनगर के विधायक ऋषिकेश पटेल की गाड़ी जला दी गई और सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया.’

अश्विन ने बताया, ‘इसके बाद मामला दिल्ली पहुंच गया. दिल्ली में पटेल मंत्रियों ने मुझसे पूछताछ की. जब मैंने हार्दिक से पूरे मामले की जानकारी मांगी तो उन्होंने बताया कि रैली खत्म होने के बाद हिंसा हुई थी. जबकि पूरी जानकारी लेने के बाद पता चला कि हार्दिक ने ज्ञापन के लिए सिर्फ 10 हस्ताक्षर लिए थे. हमारे संगठन ने हार्दिक के क्रियाकलापों पर सख्त रुख अपनाया. ये सामने आया कि पांच हजार पटेलों द्वारा हस्ताक्षर किए गए ज्ञापन की 15-20 प्रतियां अलग-अलग शहरों में भेजने की बजाय हार्दिक ने 42 ज्ञापन अलग-अलग मांगों के साथ भेज दिए थे. कुछ में उन्होंने लिखा कि हम पटेलों के लिए एससी/एसटी कोटा चाहते हैं. किसी में उन्होंने सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत कोटे की मांग की तो कहीं पर ओबीसी में 30 प्रतिशत का कोटा मांगा. अलग-अलग ज्ञापनों में कोटे का प्रतिशत 25 से लेकर 50 प्रतिशत तक था. हार्दिक ने पाटीदारों के लिए अलग कोटे की मांग भी की थी.’

अश्विन के अनुसार, ‘हार्दिक को किसानों और युवाओं से समर्थन मिला जो नहीं जानते थे कि उनका नेता कर क्या रहा था. इसीलिए हमें उन्हें अपने संगठन से हटाना पड़ा. हार्दिक ने हमें ऐसे हालात में पहुंचा दिया कि ओबीसी समुदाय के दूसरे लोग हमारे खिलाफ हो गए और शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन को आगे ले जाने का उद्देश्य कहीं खो गया.’

32 वर्षीय अश्विन दोहराते हैं, ‘अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए हार्दिक ने पाटीदार आरक्षण संघर्ष समिति के साथ धोखा किया. हमारा ज्ञापन राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ले जाने की बजाय हार्दिक कलेक्ट्रेट ऑफिस ले गए. इस तरह से इस आंदोलन को आगे नहीं ले जाना चाहिए था. इन सबके बावजूद 17 अगस्त को सूरत की रैली में हमारा संगठन उनके साथ खड़ा था. उस समय हिंसा का कोई मामला नहीं था क्योंकि हम ऐसा नहीं चाहते थे.’ अश्विन कहते हैं, ‘25 अगस्त की रैली से पहले मैंने गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल से मुलाकात की थी. सरकार हमसे मिलकर पटेल आरक्षण मामले का कोई हल निकालना चाहती थी. हार्दिक हमारे साथ नहीं आए क्योंकि कोई समाधान निकले वो इसके इच्छुक नहीं थे, बल्कि वे इस मुद्दे से राजनीतिक लाभ लेना चाहते थे.’

25 अगस्त को अहमदाबाद में हुई रैली को समर्थन न देने के सवाल पर अश्विन ने आरोप लगाते हुए कहा, ‘ये पहले से तय था कि वे पुलिस से भिड़ेंगे. हार्दिक ने ये स्पष्ट कर दिया था वे ही आगे की कार्रवाई को निर्देशित करेंगे इसीलिए हम उनसे अलग हो गए.’ अश्विन कहते हैं, ‘हार्दिक के पास उस एजेंडे का ड्राफ्ट नहीं है जो हमने गुजरात सरकार को दिया था. हमारी आठ मांगे हैं- गरीबी रेखा के नीचे आने वाले भूमिहीन पाटीदार किसानों को विशेष पिछड़ा वर्ग का कोटा दिलवाना, समुदाय के विकास के लिए पटेल बोर्ड की स्थापना करवाना आदि. इसके अलावा बोर्ड के लिए 500 करोड़ रुपये का बजट दिलवाने की भी मांग थी ताकि उससे छात्र-छात्राओं को छात्रवृत्ति और कॉलेज जाने वाली छात्राओं को दो पहिया वाहन दिए जा सकें. साथ ही दिल्ली में यूपीएससी की तैयारी करने वालों के लिए सरदार पटेल भवन का निर्माण कराना था ताकि छात्र वहां रहकर आराम से परीक्षा की तैयारी कर पाएं.’ अश्विन के अनुसार, पटेलों के कल्याण के लिए मांगों की सूची काफी लंबी है जिसे अब लाखों पटेलों की आशाओं का समर्थन मिला हुआ है और उनका आंदोलन आगे भी चलता रहेगा.

‘मधेसियों पर संकट आता है तो वे एक बार भारत को और दूसरी बार भगवान को याद करते हैं’

मधेसियों का आरोप है कि सत्ता पर नियंत्रण पहाड़ी लोगों का है. नाराजगी इसलिए भी बढ़ी क्योंकि चार प्रमुख राजनीतिक दल इस बात पर सहमत हुए कि संघीय नेपाल में छह प्रदेश होंगे. मधेसी चाहते हैं कि तराई के सारे जिलों को मिलाकर एक प्रदेश या दो प्रदेश बनाए जाएं और उनको पहाड़ के जिलों से अलग रखा जाए. इस प्रस्ताव को प्रमुख दलों ने मानने से इंकार कर दिया. इसके बाद से मधेश इलाके में पिछले एक महीने से हिंसा का दौर जारी है. विवाद इसलिए भी है क्योंकि अधिकांश संसाधन मधेश इलाके में ही हैं. फिलहाल अब तक की हिंसा में तकरीबन 40 लोग मारे जा चुके हैं.

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नेपाल में इतनी अशांति है. आए दिन कहीं न कहीं विवाद, हिंसा और हत्या की खबरें मिल रही हैं. ये कब तक चलेगा?

नेपाल में प्रांतों के बंटवारे और उनकी संख्या पर विवाद है. स्वतंत्र इलाके की लड़ाई है. तराई इलाके में रहने वाले मधेसी लड़ाई लड़ रहे हैं. शांतिपूर्ण लड़ाई को दबाने के लिए भी सरकार हिंसा का सहारा ले रही है. और आप तो जानते ही हैं कि न्यूटन का तीसरा नियम है कि हर क्रिया की बराबर प्रतिक्रिया होती है.

प्रांत के विवाद का समाधान तो नेपाल की संविधान सभा निकाल ही रही है. प्रांतों की संख्या छह से सात तक बढ़ाने पर बात चली ही है.

आपको मालूम होगा कि पहले 18 प्रांतों का मामला था, फिर छह हुआ और फिर सात. वे खुद तो तय नहीं कर पा रहे कि कितने प्रांत होने चाहिए.

प्रांतों की संख्या को लेकर मधेसियों के इलाके में ही इस कदर अशांति और हिंसा क्यों? प्रांतों की संख्या के घटने-बढ़ने से फर्क तो सब पर पड़ेगा.

क्योंकि अस्तित्व, अस्मिता और पहचान का संकट और सवाल मधेसियों के ही सामने है, दूसरे किसी समुदाय के सामने नहीं.

मधेसियों को पहचान, अस्मिता, अस्तित्व के संकट की बात अब क्यों याद आ रही है? क्या राजतंत्र के समय मधेसियों के लिए इस तरह की चुनौतियां नहीं थीं? क्या राजतंत्र में मधेसियों को ज्यादा स्वायत्तता और स्वतंत्रता थी?

राजतंत्र में तो कुछ भी नहीं था. उसमें तो मधेसी और उत्पीड़न झेलते थे. इसीलिए तो जब पहाड़ी लोगों ने राजतंत्र का विरोध किया तो मधेसियों ने भी साथ दिया. राजतंत्र के विरोध में तो मधेसियों का इलाका ही केंद्र बना था.

अभी क्या स्थिति है?

चारों ओर तनाव है. कई मधेसी इलाके में सेना उतर गई है. थारूओं का एक बड़ा इलाका सेना के हवाले है. महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे हैं. लाश तक का पता नहीं चलने दिया जा रहा है.

मधेसियों की यह लड़ाई एक तरीके से सरकार के बहाने पहाड़वालों के वर्चस्व के खिलाफ भी है. नेपाल का एक और बड़ा समूह  ‘एथनिक ग्रुप’  (जातीय समूह) का है, जो पहाड़वालों के खिलाफ माना जाता है. वह इस आंदोलन में मधेसियों का साथ दे रहा है या नहीं?

पहाड़ के लोगों और एथनिक ग्रुप के बीच वर्चस्व की लड़ाई अपनी जगह है लेकिन तराई में रहने वाले मधेसियों के खिलाफ दोनों एकजुट हैं. पहाड़ पर रहने वाले और तराई में रहने वाले बाशिंदों के बीच लड़ाई है. दोनों की नागरिकता में ही फर्क है. तराई वाले नेपाल में दोयम दर्जे के नागरिक माने जाते हैं. तराई वाले कुछ भी करेंगे तो आवाज उठेगी कि भारतीय हैं, इसलिए ऐसा कर रहे हैं.

पहाड़ पर रहने वालों का वर्चस्व है तो एथनिक ग्रुप मधेसियों की बजाय उनके करीब क्यों है?

सिर्फ पहाड़ वालों का वर्चस्व है, ऐसा नहीं कह सकते. कुछ जातीय समूहों का भी वर्चस्व है. ये शुरू से ही मधेसियों के विरोधी रहे हैं. अभी तो डाॅ. हसमुख जातीय समूह से ही हैं, जो प्रमुख हैं. इस समूह वाले मांग करते रहे हैं कि मधेसी भारतीय हैं और उन्हें नेपाल की नागरिकता नहीं बल्कि यहां रहने के लिए वक्फ परमिट दिया जाए.

बड़ी अजीब बात है कि मधेसियों की इस लड़ाई में वे खुद ही अपने एजेंडे को लेकर बिखरे हुए हैं. कोई कह रहा है कि हमें अलग राज्य चाहिए, जो ज्यादा सशक्त, स्वायत्त और ज्यादा अधिकारों से लैस हो तो कोई अलग देश की ही मांग कर रहा है.

मुख्य मांगें दो किस्म की हैं. एक तो अलग प्रांतों की और दूसरा स्वतंत्र तराई देश की. यह मांगें भी नई नहीं, बल्कि 1950 में भारत-नेपाल संधि में निहित धारा पांच के आधार पर है. यह आज की नहीं, बल्कि लंबी लड़ाई है, जिसका प्रस्फुटन समय-समय पर होता रहा है. अब नया संविधान लागू होने वाला है, इस वजह से यह विरोध तेज हो गया है.

आप लोग स्वतंत्र देश के पक्षधर हैं, जिसके लिए हथियारबंद लड़ाई भी लड़ रहे हैं. इस विश्व में कितने देश बनेंगे. नेपाल तो पहले ही एक छोटा-सा देश है?

नेपाल 1,47,181 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है. इसका 25 प्रतिशत हिस्सा तराई मधेश में है. करीब डेढ़ करोड़ आबादी तराई मधेसियों की है. इतने में एक अलग देश क्यों नहीं बन सकता? और रही बात कितने बड़े देश की तो भूटान, मालदीव या यूरोप के कई देश तो इससे भी छोटे हैं और उनका अपना अस्तित्व है या नहीं, बताइए. देश या स्वायत्त क्षेत्र की बात अलग, पहले नेपाल की सरकार बातचीत को तैयार तो हो. वह विचार-विमर्श का दौर शुरू करे. इसके लिए तो वह तैयार ही नजर नहीं आ रही है.

सवाल ये भी है कि मधेसी खुद इतने बिखराव के शिकार क्यों हैं और मधेसियों की इस लड़ाई में इतनी फूट क्यों हैं? आप लोग पहले आपस में ही समन्वय और एका क्यों नहीं बना पा रहे हैं?

ब्रिटिश काल में भारतीय जब अंग्रेजों से लड़ाई लड़ रहे थे तब क्या सभी भारतीय अंग्रेजों के खिलाफ थे. बहुतेरे तो ऐसे थे जो अंग्रेजों के यहां नौकरी ही नहीं बल्कि भारतीयों पर अत्याचार करने में भी उनका सहयोग करते थे. ऐसे लोगों ने अंग्रेजों का भरपूर साथ दिया. ऐसा तो होता रहा है. आम युवा व मधेसियों की इच्छा क्या है, यह सबसे महत्वपूर्ण है. आप सर्वे करवा लीजिए. नेपाल के अधिकांश लोग स्वतंत्र तराई के पक्ष में नजर आएंगे.

मधेसियों की बातें नेपाल में सुनी नहीं जा रहीं, सरकार इस मामले काे अपने तरीके से निपटा रही है. ऐसे में आगे क्या होगा?

मधेसियों की बातें नहीं सुनी गईं तो स्थितियां दिन-ब-दिन बिगड़ेंगी और नियंत्रण हो जाएंगी.

आपने एक जगह कहा कि मधेसी शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं और सरकार हिंसा पर उतारू है. लेकिन कुछ दिनों पहले एसपी समेत कई जवानों की हत्या हुई. आरोप है कि उनकी हत्या मधेसियों ने की. ऐसे में आप मधेसियों के इस आंदोलन को किस तरह से शांतिपूर्ण कह सकते हैं?

आंदोलन शांतिपूर्ण ही था. सरकार ने दमन की शुरुआत की, तो थारूओं के इलाके में उसकी प्रतिक्रिया हुई. उसके पहले भारदा में हमारे साथी राजेंद्र राउत को मार दिया गया था. बाद में गृहमंत्री ने कहा कि आंदोलनकारियों ने पहले गोली चलाई इसलिए ऐसा हुआ. इससे बड़ा झूठ क्या बोला जा सकता है. सरकार ऐसे झूठ बोलेगी तो जनता तो प्रतिरोध करेगी ही.

साभार : Conciliation Resources
साभार : Conciliation Resources

एमाले, नेपाली कांग्रेस और माओवादी, ये तीनों नेपाल सरकार में शामिल प्रमुख दल हैं. तीनों के बीच मतभिन्नता भी है. तीनों में से कौन-सी पार्टी मधेसियों के प्रति नरम रुख अपनाए हुए है?

कोई नहीं. यही तीनों तो मधेसियों के सबसे बड़े शत्रु हैं. इन तीनों पार्टियों की आपसी मतभिन्नता अलग बात ह,ै लेकिन मधेसियों के खिलाफ तीनों एक हो जाते हैं.

राष्ट्रपति तो मधेसी हैं, उनका रुख?

मधेसियों का समर्थन कोई नहीं कर रहा है.

नेपाल को धर्मनिरपेक्ष देश बनाने की बात चल रही है और कुछ लोग इसे हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं. क्या इसे लेकर भी अंदर ही अंदर विवाद है?

इसे लेकर द्वंद्व है और यह बना ही रहेगा.

नेपाल के अल्पसंख्यक विशेषकर मुसलमान, किस ओर हैं. क्या वे मधेसियों के पक्ष में हैं?

अल्पसंख्यक पूरी तरह से मधेसी हैं और मधेश के सवाल पर वे सिर्फ मधेसी हैं और कुछ नहीं. वे पूरी तरह से हमारे साथ हैं.

नरेंद्र मोदी तो दो बार नेपाल गए. कई सालों बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री वहां गया है और बहुत सालों बाद ही सीधे नेपाल के मामले को भी देख रहा है. इसका कुछ तो सकारात्मक असर होगा?

भारतीय प्रधानमंत्री आए तो जरूर लेकिन आपने देखा ही होगा कि नेपाल में इसका क्या असर हुआ और भारत के प्रति नेपाल में क्या माहौल है. भूकंप आने के बाद भारत ने सबसे पहले सहयोग किया, लेकिन उसका क्या असर हुआ. भारत की राहत सामग्री ही वापस कर दी गई, पत्रकारों को भगाया गया. इससे क्या फर्क पड़ता है कि कोई भारतीय प्रधानमंत्री 17 साल बाद गया है या 17 दिनों बाद. नेपाल मंे भारत का विरोध ही राष्ट्रवादिता की मूल पहचान बन गया है. देशभक्ति का एकमात्र नारा है और राष्ट्रीयता का आधार भारत और भारतीयों का विरोध ही है. भूकंप के समय चीन से राहत सामग्री दो दिनों के बाद आई. चीन को कहां कुछ लौटाया गया. नेपाल में मधेसियों के लिए ‘भारतीय विस्तारवाद मुर्दाबाद’ का नारा बोला जाता है. चीन ने तिब्बत को कब्जे में कर रखा है, लेकिन उसे कभी चीनी विस्तारवाद नहीं कहा गया. आपको और कुछ जानना हो तो आप याद कीजिए कि जब राजतंत्र का अंत हुआ तब गणतंत्र की रूपरेखा भारत में बनी, लेकिन जब  प्रचंड नेपाल के प्रधानमंत्री बने तो पहले चीन गए. भारत और भारत सरकार के प्रति उनका क्या रवैया था, आप समझ ही सकते हैं.

भारत के अलावा वहां चीन की धमक और खनक सब जानते हैं. साथ ही यूरोपियन यूनियन और अमेरिका भी महत्वपूर्ण भूमिका में हैं. उनके प्रति नेपाल में क्या रवैया है?

सब हैं वहां लेकिन यह सच है कि नेपाल के हर परिवर्तन में भारत की ही भूमिका सबसे अहम रही है. राणा शासन के अंत के बाद जब व्यवस्था बनाने की बात हुई तो भारत की भूमिका रही. पंचायती व्यवस्था की बात आई तो भारत के एमजे अकबर जैसे पत्रकार, हरकिशन सिंह सुरजीत, चंद्रशेखर जैसे नेताओं की भूमिका रही. राजतंत्र के खात्मे के बाद गणतंत्र की बात आई तो दो बिंदुओं वाला समझौता कहीं और नहीं बल्कि दिल्ली में ही हुआ. भारत हमेशा अहम भूमिका निभाता रहा है लेकिन भारतीयों के साथ वहां क्या हो रहा है. पशुपति नाथ मंदिर के पुजारी को निकाला गया. भारतीय राजदूत पर जूता फेंका गया. भूकंप के बाद भारतीय सहायता सामग्री लौटाने के बाद भारतीय पत्रकारों को भगाया गया. कोई बताए तो सही कि नेपाल में भारतीय पत्रकारों की गलती आखिर क्या थी? भारत को हटा दें तो नेपाल में कोई बदलाव नहीं हुआ.

क्या भारत सरकार मधेसियों के पक्ष में किसी तरह का सार्थक हस्तक्षेप कर रही है?

दुख तो इसी बात का है कि भारत कभी मधेसियों की पीड़ा समझता ही नहीं जबकि मधेसी भारतीय होने की सजा ही भुगत रहे हैं. तराईवासी मधेसियों को जब-जब संकट आता है, वे एक बार भारत को याद करते हैं और दूसरी बार भगवान को, लेकिन भारत कभी इनकी पीड़ा नहीं समझता. नेपाल में मधेसी दोयम दर्जे के नागरिक बन गए हैं और भारत में उससे भी घटिया दर्जे के. वहीं भारत में कुछ होता है तो उसका मधेसियों पर क्या असर पड़ता है, इसे एक उदाहरण से समझाता हूं. एक बार भारतीय फिल्म कलाकार ऋतिक रोशन ने कह दिया था कि उन्हें नेपाली पसंद नहीं. उसके बाद काठमांडू में तीन दिनों तक अत्याचार हुआ. तराई में गोलियां चलीं और मधेसियों को मारा गया.

मधेसियों को भारत से क्या अपेक्षाएं हैं?

बस भारत हमें अौर हमारी पीड़ा को समझे. जो नेपाल के नागरिक हैं, वे भारतीय सेना में भर्ती हो सकते हैं लेकिन जो मधेसी हैं, उन्हें भारतीय सेना में नहीं लिया जाता. आखिर मधेसियों ने भारत का क्या बिगाड़ा है? भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों से मधेसियों का रिश्ता बेटी-रोटी का है. हमारे यहां भारत के लोगों की शादियां होती हैं. अब जो भारत में हैं, उन्हें भी भारत में अवसर मिलता है, जो नेपाली हैं, उन्हें भी अवसर मिलता है, बीच में मधेसियों को कोई नहीं पूछता. ऐसे में आप समझ सकते हैं कि आंदोलन कर रहे मधेसियों को कैसा लगता होगा.

मधेसियों के प्रति बने भारत के इस नजरिये की आप क्या वजह मानते हैं?

भारत का रवैया शुरू से ही ऐसा रहा है. भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन भारत को देखने का जो नजरिया ब्रिटिशों  का था, वह बना रहा और अब भी यह कायम है.

आपका संगठन सशस्त्र और हथियारबंद आंदोलन में भरोसा रखता है. दुनिया में सशस्त्र आंदोलन के दिन लद रहे हैं. माओवादियों से लेकर एलटीटीई का हश्र देखकर आपको क्या लगता है?

ऐसा नहीं कि हम हिंसाप्रिय हैं. हम तो बात करना चाहते हैं. नेपाल सरकार ही बताए कि मधेसी कैसे नेपाल में आए? क्या बंगाल, अवध और बिहारवालों ने अपनी जमीन देकर नेपाल के दायरे का विस्तार नहीं किया था और क्या यह सच नहीं है कि नेपाल के पास अनाज उगाने वाले उपजाऊ इलाके थे ही नहीं. ऐसे में बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल आदि ने अपनी जमीन देकर नेपाल को आत्मनिर्भर और जीने योग्य बनाया. हम बाद में जाकर जबर्दस्ती तो वहां बसे नहीं हैं. कम से कम हमारे इस इतिहास पर तो बात हो. हमें अपने मधेश का इतिहास बताने की इजाजत दो, लेकिन ऐसा कुछ नहीं होने दिया जा रहा है.

अभी हाल ही में नेपाल सरकार के बारे में ‘मूल्यांकन’ पत्रिका के पत्रकार श्यामश्रेष्ठ ने अच्छी बात कही है. उनके अनुसार, ‘नेपाल की सरकार हिंसाप्रिय है, बिना हिंसा के बात सुनती ही नहीं.’ आपके यहां शहीद भगत सिंह कहते थे न कि बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है. वही नेपाल में हो रहा है. अब बताइए नेपाल में सरकार सीमांकन को तैयार है. वह तैयार हो जाती तो इतनी हिंसा तो न होती.

आपको क्यों लगता है कि आप लोगों की बात एक दिन जरूर सुनी जाएगी?

भारत में जब ब्रिटिशराज था तब कहा जाता था कि ब्रिटिश सरकार का सूरज कभी नहीं डूबता. उसके पास दूसरा विश्वयुद्ध लड़ी हुई सेना थी, लेकिन भारत के लोगों ने उन्हें अपने यहां से भागने पर मजबूर कर दिया. भारत आजाद हुआ. जनता की ताकत अलग होती है. यह हमेशा नहीं जगती, लेकिन जब जगती है तो बड़ी-बड़ी क्रांतियां हो जाती हैं.

‘जन’ से दूर ‘औषधि’

58-59-1राजधानी दिल्ली के शाहदरा स्थित गुरु तेग बहादुर अस्पताल में लगी भारी भीड़ के बीच फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे 68 वर्षीय सुरेश चंद्र एक हाथ में अपनी मेडिकल फाइल और दूसरे में डॉक्टर का पर्चा लिए यहां संचालित जन औषधि केंद्रकी तरफ बढ़ रहे हैं. केंद्र सरकार की ओर से शुरू किए गए इस केंद्र पर बाजार की तुलना में काफी सस्ती दवाएं मिलती हैं. सुरेश को उम्मीद है कि उन्हें यहां सस्ती दवाएं मिल जाएंगी. हालांकि उन्हें निराशा हाथ लगी जब पता चला कि उनके इलाज के लिए लिखी गईं दवाएं जन औषधि केंद्र के स्टॉक में उपलब्ध ही नहीं हैं. निराश सुरेश कहते हैं, ‘मेरी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि मैं किसी निजी मेडिकल स्टोर से महंगे दामों पर ये दवाएं खरीद सकूं.इस केंद्र के बाहर तकरीबन आधा घंटा बिताने पर पता चला कि दवा की तलाश में आए 10 से 15 लोगों को भी सुरेश की तरह खाली हाथ लौटना पड़ा क्योंकि दवाएं स्टॉक में मौजूद ही नहीं थीं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और हेल्थ एक्शन इंटरनेशनल की ओर से 2004-2005 में किए गए एक सर्वे से जुटाए गए आंकड़ों पर नजर डालने पर पता चलता है कि सरकार की ओर से चलाए जा रहे दवा केंद्रों पर सिर्फ 30 फीसदी जरूरी दवाएं उपलब्ध होती हैं. यह स्थिति तब है जब भारत दुनिया के बड़े दवा निर्यातक देशों में से एक है. विश्व भर में कहीं भी प्रयोग होने वाली हर पांचवीं गोली, कैप्सूल या इंजेक्शन भारत में बनी होती है.

2008 में तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार ने आम जन को कम दामों पर गुणवत्तापूर्ण जेनरिक दवाएं उपलब्ध कराने के लिए देश भर में जन औषधि केंद्र खोलने की योजना बनाई थी. इसके बाद रसायन मंत्रालय के तहत आने वाले औषधि विभाग ने राज्य सरकारों, रेड क्रॉस सोसायटी और कुछ गैरसरकारी संस्थाओं के साथ मिलकर देश भर में जन औषधि केंद्र खोले थे. शुरुआती दौर में ऐसे तकरीबन 200 केंद्र खोले गए. तब सरकार ने घोषणा की थी कि देश के 660 जिलों में जन औषधि केंद्र खोले जाएंगे. हालांकि दवाओं की अनुपलब्धता और लोगों में ब्रांडेड दवाओं की तुलना में जेनरिक दवाओं की गुणवत्ता और चिकित्सीय गुणों के प्रति जागरूकता की कमी के चलते आज सिर्फ 98 केंद्र ही ठीक तरह से काम कर रहे हैं.

उदाहरण के लिए, श्रीनगर में भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी की क्षेत्रीय शाखा की इमारत में संचालित जन औषधि केंद्र के पास केवल सौ दवाओं का ही स्टॉक है. भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी (आईआरसीएस) की सचिव रोमा वानी कहती हैं, ‘जागरूकता की कमी के चलते चंद लोग ही जन औषधि केंद्र तक पहुंचते हैं.इस जमीनी हकीकत के बावजूद वर्तमान सरकार जन औषधिअभियान को और व्यापक स्तर पर शुरू करने की योजना बना रही है. सरकार की तरफ से घोषणा हुई है कि देश भर में ऐसे ही हजारों केंद्र खोले जाएंगे. हाल ही में रसायन एवं उर्वरक मंत्री अनंत कुमार ने एक प्रेसवार्ता में दावा किया है कि सात राज्यों के साथ समझौते पर हस्ताक्षर कर शुरुआती चरण में जन औषधि केंद्रों की संख्या 3000 तक बढ़ाई जाएगी और एक नई व्यापक योजना के तहत बाद में देश भर के सभी जिला अस्पतालों में ऐसे केंद्र खोले जाएंगे. यह प्रस्ताव महत्वाकांक्षी जान पड़ता है. इसका वास्तविकता में तब्दील होने का मतलब होगा देश की बड़ी दवा निर्माता कंपनियों द्वारा निर्मित ब्रांडेड दवाओं पर लोगों की निर्भरता कम होना व सस्ती जेनरिक दवाओं की आसानी से उपलब्धता. सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी यह क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगा.

Pharmaceutical machine operating

वर्तमान में संचालित जन औषधि केंद्रों पर जरूरत की सिर्फ कुछ ही दवाएं मिलती हैं, जैसे- एंटीबायोटिक्स (प्रतिजैविक दवाएं), एनाल्जेसिक (दर्द निवारक दवाएं), एंटीपायरेटिक्स (बुखाररोधी दवाएं) और दर्द निवारक व एंटी इनफ्लेमेटरी (जलनरोधी) दवाओं का मिश्रण. सार्वजनिक क्षेत्र की पांच कंपनियां- इंडियन ड्रग एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड (आईडीपीएल), हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स लिमिटेड (एचएएल), बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड (बीसीपीएल), कर्नाटक एंटीबायोटिक्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड (केपीसीएल) और राजस्थान ड्रग्स एंड फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड (आरडीपीएल) इन दवाओं का निर्माण कर रही हैं. सूत्रों के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र की इन सभी इकाइयों को पुनरुद्धार की जरूरत हैं. नाम न छापने की शर्त पर मंत्रालय के एक सूत्र ने बताया, ‘तकनीक के लिहाज से इन इकाइयों में किसी भी तरह के बदलाव नहीं किए गए हैं. दवा निर्माण की ये इकाइयां या तो बंद पड़ी हैं या फिर दवा की बहुत ही काम सप्लाई कर रही हैं.जाहिर तौर पर सरकार इन कंपनियों को केवल नाम के लिए चला रही है. गरीबों को कम कीमत पर जेनरिक दवाएं उपलब्ध कराने के लिए स्थापित इन कंपनियों के वास्तविक उद्देश्य से वह बेपरवाह है. जन औषधि केंद्रों पर उपलब्ध दवाओं के स्टॉक में वे सभी जरूरी दवाएं होनी चाहिए जो केंद्र और राज्यों की सूची में होती हैं. हालांकि जो दवाएं इन केंद्रों से बेची जा रही हैं, वे सभी इन दवा कंपनियों में बनाने वाली दवा सूची से निर्धारित की जाती है.

इसके अलावा लोगों में भी यह धारणा बन चुकी है कि सस्ती जेनरिक दवाओं से ब्रांडेड महंगी दवाएं अच्छी होती हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय के वीपी चेस्ट संस्थान में औषधि विज्ञान विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर अनीता कोटवानी कहती हैं, ‘लोग अपनी ही सुविधा के लिए उपलब्ध जेनरिक दवाओं की गुणवत्ता पर भरोसा नहीं करते. दवा की दुकानों से जेनरिक दवा खरीदने को लेकर लोग अनिच्छुक नजर आते हैं क्योंकि इन दवाओं की गुणवत्ता के प्रति वे खुद सवाल उठाते हैं.कोटवानी औषधि वैज्ञानिकों की एक टीम के साथ जन औषधि केंद्र में उपलब्ध दवाओं की गुणवत्ता परखने का अध्ययन कर चुकी हैं. चार दवाओं पर किए गए अध्ययन में खुलासा हुआ था कि जेनरिक दवाओं के दाम बाजार में उपलब्ध अपने समकक्ष ब्रांडेड दवाओं के बराबर थे. साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में निर्मित जेनरिक दवाओं की गुणवत्ता गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस (जीएमपी) के अनुरूप ठीक पाई गई. अध्ययन में कई महत्वपूर्ण सवाल भी उठाए गए हैं, जैसे- अगर जेनरिक दवाएं उतनी ही अच्छी हैं जितनी कि ब्रांडेड दवाएं तो लोग आखिर क्यों ज्यादा महंगी दवाएं खरीदते हैं? सरकारी अस्पतालों में जब निःशुल्क दवाएं उपलब्ध नहीं होतीं तब क्या डॉक्टर मरीज को जेनरिक स्टोर से दवा खरीदने की सलाह देते हैं? इसके अलावा क्या डॉक्टर दवाओं को उनके जेनरिक नाम से लिख रहे हैं? भारतीय चिकित्सा परिषद (पेशेवर व्यवहार, शिष्टता एवं नैतिकता) अधिनियम 2002 में वर्णित है कि हर डॉक्टर को जहां तक संभव हो सके मरीजों के लिए दवाएं उनके जेनरिक नाम से लिखनी चाहिए और वह यह भी सुनिश्चित करेगा कि दवा की पर्ची और दवा का इस्तेमाल तर्कसंगत हो.

देखा जाए तो तकनीकी तौर पर हम सभी जेनरिक दवा ही खाते हैं. पेटेंट की निर्धारित अवधि बीतने के बाद दवाएं जेनरिक की श्रेणी में आ जाती हैं. कभी-कभी दवा निर्माण कंपनियां इन जेनरिक दवाओं को अपने ब्रांड नाम के साथ बाजार में उतारती हैं. इन्हें ब्रांडेड जेनरिकदवाएं कहा जाता है. निजी मेडिकल स्टोर पर ब्रांडेड जेनरिक दवाएं मिलती हैं जो वास्तव में जेनरिक दवाओं के समान ही होती हैं, सिर्फ इनकी कीमत अधिक होती है. सार्वजनिक क्षेत्र निर्माताओं से दवाएं अनब्रांडेड जेनरिक के रूप में जेनरिक नाम से खरीदता है. सरकार सार्वजनिक अस्पतालों को दवा की आपूर्ति करने वाली निर्माण कंपनियों को एक निश्चित राशि मूल्यवर्धित कर (वैट) के तौर पर चुकाती है. दवा की कीमत में कोई अतिरिक्त लागत नहीं जोड़ी जाती. दूसरी ओर समान ब्रांडेड दवाओं की कीमत में इनका विज्ञापन खर्च जोड़े जाने से इनकी बाजार कीमत बढ़ जाती है. निर्माता, थोक विक्रेता और फुटकर विक्रेताओं को दी जाने वाली विक्रय योजनाओं का खर्च भी इन दवाओं के मूल्य से जोड़ा जाता है, जिससे ये और महंगी हो जाती हैं. इन योजनाओं के तहत फुटकर विक्रेताओं को सबसे ज्यादा लाभ दिया जाता है. एक निश्चित मात्रा की दवा की खरीददारी पर उन्हें कुछ दवाएं फ्री में मिल जाती हैं. इसके बावजूद फुटकर विक्रेता ग्राहकों को किसी तरह की छूट देने की जहमत नहीं उठाते.

भारतीय औषधि उद्योग का एक रोचक पहलू ये है कि विनिर्माता ब्रांडेडऔर ब्रांडेड जेनरिकउत्पाद बाजार में अलग-अलग कीमतों पर उतारते हैं. इसलिए मरीज द्वारा वहन दवा की लागत काफी हद तक इस कारक पर निर्भर करती है कि डॉक्टर उसे कौन-सी दवा लिखता है और दवा विक्रेता कौन-सी दवा देता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, देश में 3.2 प्रतिशत भारतीय दवाओं पर होने वाले क्षमता से अधिक खर्च के कारण हर साल गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं. भारत में स्वास्थ्य खर्च का 80 प्रतिशत हिस्सा जेब पर दबाव डालकर होता है. इसमें भी मरीज के इलाज के दौरान स्वास्थ्य खर्च का 70 प्रतिशत दवाओं की खरीद में जाता है. देश में दवाओं की कीमत और उपलब्धता ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर 1995 (डीपीसीओ) के तहत निर्धारित की जाती है. इसके बाद डीपीसीओ के तहत राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) 1997 में गठित किया गया था जो औषधि विभाग के तहत आता है.

हैरान करने वाली बात ये है कि सरकार डीपीसीओ के अंतर्गत दवा निर्माण में जरूरी सिर्फ 74 तत्वों से निर्मित दवाओं की कीमत ही नियंत्रित करती है. बाकी की कीमतें दवा निर्माता निर्धारित करते हैं. वे दवाएं जो इन 74 दवा सामग्रियों के मिश्रण से बनती हैं सूचीबद्ध दवाएंकही जाती हैं. इन दवाओं की कीमत जिनमें कुछ बेहद ही जरूरी दवाएं भी शामिल हैं, प्राय: कम रखी जाती हैं. बाकी गैर-सूचीबद्ध दवाओं की कीमत दवा निर्माता ही निर्धारित करते हैं. अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) और मूल्य के रूप में छपी अंतिम राशि का निर्धारण, खुदरा और थोक व्यापारियों को दिया जाने वाला लाभ आदि सभी पर निर्णय दवा निर्माताओं द्वारा ही लिया जाता है. आखिर में निर्माता दवा की कीमत एनपीपीए से पंजीकृत करा लेता है. मूल्य निर्धारण प्राधिकरण केवल यह निगरानी करता है कि गैर-सूचीबद्ध दवाओं की कीमत साल भर में दस प्रतिशत से अधिक न बढ़े. दवा निर्माताओं को एमआरपी निर्धारित करने का अधिकार देने का उद्देश्य दवाओं के एक मुक्त बाजार का निर्माण करना है जिससे कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा हो और दवाओं की कीमतें नीचे लाने में मदद मिले. हालांकि यह दवा नीति अब तक ऐसा करने में सफल नहीं हो सकी.

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कोटवानी अपने एक शोधपत्र में लिखती हैं, ‘दवा विक्रेता उन दवाओं को स्टॉक कर लेते हैं जो ज्यादा बिकती हैं. इससे यह संकेत मिलता है कि डॉक्टर कुछ चुनिंदा ब्रांडेड दवाएं ही मरीजों के लिए लिखते हैं. वैध रूप से औषधि विक्रेताओं को जेनरिक और ब्रांडेड दवाओं के बीच विकल्प देने की अनुमति नहीं है. डॉक्टर द्वारा लिखे गए किसी दवा के व्यापारिक नाम को किसी अन्य दवा से बदला नहीं सकता है.वहीं मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के नियमों के मुताबिक, डॉक्टरों से उम्मीद की जाती है कि वह कम कीमत वाले जेनरिक संस्करण या ब्रांडेड जेनरिक दवाएं ही मरीजों को लिखें, ताकि लोग आसानी से उसे खरीद सकें.

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आंकड़ों के आईने में

  • भारतीय दवा उद्योग वैश्विक उत्पादन के दस प्रतिशत हिस्से की आपूर्ति करता है. आपूर्ति की मात्रा के लिहाज से यह विश्व में  तीसरे स्थान और मूल्य के लिहाज से 14वें स्थान पर आता है
  • एंटी एचआईवी दवाओं की वैश्विक जरूरत का 30 प्रतिशत हिस्सा भारत में बनता है
  • वैश्विक बाजार में भारतीय दवा उद्योग की हिस्सेदारी 2.4 प्रतिशत है
  • भारतीय दवाएं अमेरिकारूसजर्मनी जैसे तकरीबन 200 देशों में निर्यात की जाती हैं. इसका लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ अमेरिका को निर्यात किया जाता है

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अपने शोध में शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि दवा निर्माता ब्रांडेड जेनरिक दवाओं को उनके समकक्ष पेटेंट दवाओं की तुलना में ऊंचे अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) पर बेच रहे हैं. इसमें इंजेक्शन भी शामिल हैं जो गंभीर रूप से बीमार मरीजों को लगाए जाते हैं. सरकारी अस्पतालों के पास बने निजी मेडिकल स्टोर इन महंगी दवाओं का स्टॉक रखते हैं और ऊंचे दामों पर मरीज के संबंधियों को बेच देते हैं. जैसा कि सरकार गरीब आबादी तक जरूरी दवाओं की पहुंच की प्रक्रिया में सुधार के लिए जन औषधि योजना को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है, ऐसे में दवा निर्माताओं, खुदरा विक्रेताओं और डॉक्टरों की भूमिका पर भी ध्यान देने की जरूरत है.

सरकार को सबसे पहले अपनी मूल्य निर्धारण पद्धति को लोगों के अनुकूल और दक्ष बनाना होगा. हाल ही में रसायन और उर्वरक मंत्री अनंत कुमार ने फार्मा प्राइस डाटा बैंकका शुभारंभ किया है. यह एकीकृत औषध डाटाबेस प्रबंधन प्रणाली है. इसका प्रयोग दवा निर्माण/क्रय-विक्रय/आयात/वितरण कंपनियां ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर 2013 के तहत बताई गईं जरूरी जानकारियां ऑनलाइन सबमिट करने के लिए इस्तेमाल कर सकेंगी. इसका प्रबंधन एवं संचालन राष्ट्रीय औषधि मूल्य नियंत्रण प्राधिकरण द्वारा किया जाएगा. हालांकि, इससे मरीजों को राहत तब तक नहीं मिलेगी जब तक सरकार मूल्य निर्धारण प्रणाली में कोई बदलाव नहीं लाती. इसके लिए सरकार को किसी दवा का अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) तय करने में निर्माताओं की तुलना में ज्यादा भागीदारी रखनी चाहिए. दूसरा, सरकारी फार्मेसी और जन औषधि केंद्र पर आपूर्ति प्रबंधन को मजबूत करना होगा.

रियाज़ वानी के सहयोग से

‘आदिवासी समाज से कोई आगे आएगा तो हिंदी लेखकों की चिंता बढ़ जाएगी’

आपने गांव के स्कूल में पढ़ाई पूरी की. आप कॉलेज नहीं गए. क्या कविता लेखन में रुचि स्कूली जीवन से ही थी?

नहीं, स्कूली जीवन में क्या लिखने की रुचि रही होगी. बस किसी तरह पढ़ाई कर लिया करते थे. छठी क्लास में पहुंचने के बाद लगा कि कोई कक्षा में अव्वल आता है तो उसकी वैल्यू क्लास में बढ़ जाती है. ऐसा सोचकर मुझे लगा कि मुझे भी कक्षा में अव्वल आना चाहिए. फिर मेरी दिलचस्पी पढ़ाई में जगने लग गई लेकिन उसी समय मेरे ऊपर विपत्तियों का पहाड़ भी आ टूटा. मेरे मजदूर पिता ने अपनी कमाई से गांव में ही जमीन का एक टुकड़ा खरीदा तो गांव और आस-पड़ोस के लोगों को यह अखर गया. उन्होंने पिता की इस तरक्की से जल-भुनकर बदला लेना शुरू कर दिया. मेरे पिता को ओझा-गुनी करार दिया गया. समाज ने कई स्तर पर उन्हें प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. बिना वजह अपमान सहने का बोझ पिता बर्दाश्त नहीं कर सके. वे अंदर ही अंदर टूट गए. इतने उद्वेलित और दुखी हुए कि एक रात हमसब को छोड़कर कहीं निकल गए और आज तक उनका पता नहीं चल सका. उनके पीछे हमारे घर में हम दो भाई और मां रह गए. मेरे बड़े भाई को जमीन को लेकर झगड़ा और प्रताड़ना करने वाले ताऊ ने अपनी ओर पहले ही मिला लिया था और पिता से अलग करवा दिया था, जिन्होंने पिता को डायन करार देने में अहम भूमिका निभाई थी. इस तरह से अब मैं और मेरी मां ही इस विपत्ति में एक-दूसरे का सहारा रह गए थे. मां ने ही मां और पिता- दोनों की भूमिका निभाई और मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया. 2006 में मां भी गुजर गईं.

न पढ़ाई-लिखाई की पृष्ठभूमि, न कोई गुरु, तब आखिर आपने पहली बार लिखने की शुरुआत कब की और कविता की विधा को ही लेखन में क्यों चुना?

कविता लिखने का चयन मैंने विधा जैसा कुछ सोच-समझकर शुरू नहीं किया था. न ही यह सोचकर लिखना शुरू किया कि मुझे यह लिखना है, वह लिखना है. सीआईएसएफ की नौकरी में आया तो देश के अलग-अलग हिस्से में नौकरी के लिए जाता रहा. मुझे अपनी भाषा संथाली की ही समझ थी. हिंदी बस काम चलाने लायक बोल लेता था. नौकरी तो करता रहा लेकिन जो पिता के साथ हुआ था, वह कसक हमेशा मन में रहती थी. उसी पीड़ा को मैंने कागज पर उतारना शुरू कर दिया. कविता सोचकर नहीं लिखी लेकिन वह कविता की तरह होता गया. लिखकर पहली बार एक संथाली पत्रिका में भेजी और वह छप भी गई. मैं बहुत उत्साहित हुआ. फिर तो जब भी समय मिले, लिखता ही गया. आॅल इंडिया संथाली राइटर्स एसोसिएशन ने मुझसे संपर्क किया और लिखने के लिए प्रोत्साहित किया. 2001 में जब मैं 27 साल का था तब ऑल इंडिया संथाली राइटर्स एसोसिएशन ने कविता लेखन के लिए मुझे सम्मानित और पुरस्कृत किया. उसके बाद कई संथाली पत्रिकाओं में लिखना शुरू किया. मुझे सम्मेलनों में बुलाया जाने लगा और फिर 2011 में मुझे अपनी रचना संग्रह ‘बांचाव लड़हाई’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार/सम्मान मिला.

इस कविता संग्रह में क्या है?

संथाली में जो ‘बांचाव लड़हाई’ है, उसका हिंदी में अर्थ है जीने का संघर्ष. रोजमर्रा के जीवन में इंसानी समुदाय के सामने जो जीवन के संघर्ष हैं, उसी को केंद्र में रखकर मैंने हमेशा लिखा. मैंने इस संघर्ष को बहुत करीब से देखा है. जब मेरी पहली पोस्टिंग केरल में हुई और वहां गया तो मैं खुद को संथाली बताता था तो मुझसे यह सवाल किया जाता था कि हू आर यू? यह मेरे लिए अप्रत्याशित था. अपने देश में मुझे अपनी पहचान बतानी पड़ेगी कि मैं कौन हूं? मैं किस समुदाय से हूं? यह संकट सिर्फ मेरे समुदाय के साथ नहीं, कई समुदाय और अनंत लोग ऐसे हैं, जिन्हें इन सवालों से टकराना पड़ता है. बस, इन्हीं अनुभवों को लिखता गया और संकलन तैयार हो गया.

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आप सीआइएसएफ में कांस्टेबल हैं. समय नहीं मिलता होगा, फिर लेखन कब करते हैं?

लेखन के लिए माहौल की जरूरत होती है, यह मुझे कभी नहीं मिला क्योंकि आप जानते हैं कि अर्द्धसैनिक बलों में काम करने का अपना एक अनुशासन होता है. सबकुछ तय समय से होता है. समय तो अभी भी नहीं मिलता है. लेकिन मुझे जब भी समय मिला, मैं लिखता गया. घर में पत्नी पूरा दिन मेरा इंतजार करती हैं इसलिए ड्यूटी से घर पहुंचते ही तुरंत नहीं लिख सकता हूं. ऐसे आलम में मेरे पास एक ही बहाना बचता है. मॉर्निंग वॉक पर जाने और पार्क या कहीं थोड़ी जगह देखकर लिखने बैठ जाता हूं.

जब आपको साहित्य अकादमी मिला होगा तब तो आप सीआइएसएफ में हीरो की तरह हो गए होंगे. बहुत छोटी उम्र में, मामूली कांस्टेबल के पद पर रहते हुए इतना बड़ा राष्ट्रीय सम्मान आपने पा लिया?

ऐसा कुछ नहीं है. साहित्य अकादमी सम्मान को पानेवाला सैनिक और अर्द्धसैनिक बलों की तमाम कंपनियों से में पहला आदमी था. और साहित्य अकादमी के इतिहास में भी सबसे कम उम्र का कवि-लेखक. लेकिन फौज या अर्द्धसैनिक बलों की अपनी कार्यप्रणाली होती है. वहां खेलकूद आदि की उपलब्धियों को ज्यादा तवज्जो मिलती है, साहित्य से किसी को बहुत ज्यादा सरोकार नहीं है वहां.

आपको जिस साल साहित्य अकादमी मिलाउसी साल हिंदी में काशीनाथ सिंह को भी मिला था. अकादमी का सम्मान मिलने के बाद हिंदी के साहित्यकारों-कवियों ने आपको बधाई दी होगी. आपसे संपर्क किया होगा और आपको प्रोत्साहित करने की कोशिश की होगी?

नहीं. किसी ने नहीं. कोई ऐसा नहीं आया, जो कम से उस सम्मान समारोह में ही कहता कि तुमने बहुत अच्छा काम किया. या कम से कम पूछ लेता कि क्या लिखे हो संथाली में, जरा हिंदी में समझा दो. अब तक किसी ने बधाई नहीं दी. सिर्फ संथाली राइटर्स एसोसिएशन के लोगों ने बधाई दी और रांची में अखड़ा, जोहार दिसुम खबर, सहिया जैसी पत्रिका निकालनेवाले अश्विनी दा, वंदना दीदी जैसे लोगों ने बधाई दी और आगे लिखने को प्रोत्साहित किया. हिंदी वालों को लोकभाषाओं के रचनाकारों से अलग-अलग किस्म का खतरा सताता रहता है इसलिए वे कभी पूछेंगे भी नहीं. आदिवासियों की अलग-अलग भाषाओं के रचनाकारों से तो और ज्यादा. और ऊपर से तो यह भी अखरने वाली बात रही होगी कि मामूली कांस्टेबल, जो न एमए. पीएचडी किया, न बड़े गुरुओं के संपर्क में रहा, यह कैसे साहित्य अकादमी तक पहुंच गया.

आप जैसे लोगों से हिंदी वालों को क्यों डर लगेगा, वे तो दुनिया में छाए हुए हैं?

मुझसे डर नहीं लगेगा. लेकिन जब आदिवासी या किसी पिछड़े समुदाय के लोग लिखने लगेंगे तो उनके सामने नई चुनौती आ खड़ी होगी और जाहिर है कि उन्हें चिंता सताने लग जाएगी. वे ज्ञान के क्षेत्र पर एकाधिकार रखकर अब तक अपने तरीके से चीजों की व्याख्या करते रहते हैं. लेकिन उनका ज्ञान तो बहुत बाद का ज्ञान है न. इतिहास ज्ञान भी उनका बहुत बाद का है. वे पवित्रता और ज्ञान की दुनिया में आदिवासियों या देसज चेतना वालों के सामने टिक नहीं पाएंगे. उनका भेद खुल जाएगा. एकाधिकार टूट जाएगा. इसलिए वे डरते हैं कि सृष्टि को सबसे करीब से समझने वाले, देखने वाले, महसूसने वाले और सबसे लंबे समय से दुनिया को बदलते हुए देखते रहनेवाले अगर लिखेंगे तो उनके लिखे हुए पर सवालों के घेरे बनते जाएंगे. पवित्रता में कहीं टिक नहीं पाएंगे, इसलिए वे डरते हैं. हमारे समुदाय की दुनिया छल-प्रपंच की दुनिया नहीं है.

दलित-पिछड़े साहित्य वाले भी अपना बड़ा-बड़ा संगठन चलाते हैं और वे अपनी ही छतरी तले आदिवासियों को भी रखते हैं और जब भी बात करते हैं तो दलित-आदिवासी साहित्य के विकास की बात एक साथ करते हैं. क्या ऐसे किसी किसी संगठन या दलित साहित्य लेखक-आलोचक ने आपसे संपर्क किया और बधाई दी?

नहीं. अब तक तो नहीं. चार साल तो हो गए. मैं किसी को जानता भी नहीं. वे भी मुझे क्यों जानेंगे या पूछेंगे. अब तक किसी संगठन ने कभी गलती से मुझसे कुछ नहीं कहा-पूछा. मैं तो जानता भी नहीं किसी ऐसे संगठन-लेखक आदि को.

हिंदी में लिखना शुरू किया है तो किन समकालीन कवियों को पढ़ते हैं आप? आप किस-किस को जानते हैं?

ईमानदारी से कहूं तो किसी कवि का नाम नहीं जानता. आप मुझे शर्मिंदा कर रहे हैं. मेरी परीक्षा तो नहीं ले रहे हैं न! मैं किसी को नहीं जानता. ज्ञानोदय, वागर्थ समकालीन भारतीय साहित्य जैसी पत्रिकाएं पढ़ता हूं. एक बार समकालीन भारतीय साहित्य में मेरी रचना छपी थी. दोबारा भेजा तो कहा गया कि यह नहीं छप सकती, तब से उधर ज्यादा ध्यान भी नहीं देता लेकिन पत्रिकाएं पढ़ता हूं. उन पत्रिकाओं में छपी रचनाएं पढ़ता हूं. रचनाकारों के बारे में कभी नहीं जाना और न ही उसकी कोई जरूरत महसूस हुई. केदारनाथ सिंह का नाम सुना है और किसी का नहीं. पहले के कवियों में रवींद्रनाथ टैगोर, निराला, दिनकर को पढ़ा है. बाकि आज हिंदी में कौन-कौन से कवि हैं, नहीं जानता.

संथाली के बाद अब आप हिंदी में अपनी कविता संग्रह  पहाड़ पर हूल फूल’  लाने की तैयारी में हैं. इसके बारे में जानकारी दें. क्या इसमें संकलित कविताएं भी आदिवासी समुदाय के संकट के बारे में है?

इस संकलन में संकलित रचनाएं मैंने असम में पोस्टिंग के दौरान लिखी हैं. इसमें दुनिया के सामने, सृष्टि के सामने जो संकट है, उसके बारे में लिखा है. दुनिया को बचाना जरूरी है, मनुष्यता ही संकट में है. कोई समुदाय तो पूरी सृष्टि का एक छोटा-सा हिस्सा होता है. समुदाय का संकट अकेले और अपने में कोई स्वतंत्र संकट नहीं है. दुनिया जिस राह पर है, उससे जो संकट के रास्ते तैयार हो रहे हैं, उसी से समुदायों का अस्तित्व दांव पर लगता जा रहा है. बस, उसी को केंद्र में रखकर कुछ लिखने की कोशिश की है मैंने.

संथाली में लिख रहे थे आप. आपने हिंदी में लिखना क्यों शुरू कर दिया. और अचानक पूरी दुनिया के बारे में सोचना शुरू कर दिया.

यह जरूरी है. हम कैसे सोचते हैं दुनिया के बारे में, हम दुनिया के संकट को किस नजरिए से देखते हैं और हमारे अनुसार क्या मूल कारण है यह बताना जरूरी है. हिंदी इसलिए अपनाया क्योंकि अब यह वैश्विक भाषा है. पूरी दुनिया को हम अपना नजरिया बताना चाहते हैं. हम उस समुदाय से आते हैं, उस मिट्टी से आते हैं, जो हवा-आकाश-पानी-जंगल-पेड़-पौधे से अनंत काल से बतियाने की कला जानता है. हमारी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे. अपने समय में जो घटित हो रहा है, उसे लिखते रहना चाहिए ताकि कल की भावी पीढ़ी को किसी चीज को एकांगी व्याख्या के जरिए समझाने की जरूरत न आ पड़े.

‘सरकारें चाहती हैं कि संसाधनों पर जनता का कोई नियंत्रण न रहे’

Medha for WEB

सरदार सरोवर बांध का डूब क्षेत्र 214 किलोमीटर का है. इस परियोजना से लाखों लोग प्रभावित हो रहे हैं. इससे विस्थापित होने वालों में 50 प्रतिशत आदिवासी और 20 प्रतिशत से ज्यादा लोग गरीब और वंचित समुदायों के हैं. नर्मदा बचाओ आंदोलन की शुरुआत जनशक्ति के आधार पर हुई है. अब तक जो हासिल हुआ वह लंबे मैदानी संघर्ष और कानूनी लड़ाइयों की वजह से संभव हुआ है. इस आंदोलन ने व्यापक रूप से यह सवाल उठाया कि कैसे लोगों के नजरिये से विकास का नियोजन होना चाहिए. गुजरात और मध्य प्रदेश में अब तक लगभग 11 हजार प्रभावित परिवारों को जमीन के बदले जमीन मिली है. मध्य प्रदेश में जो 88 बसाहटें निकाली गई हैं, वह आंदोलन की वजह से ही संभव हो सका है. सरकार को वयस्क बेटों को भी जमीन देनी पड़ी. इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने 5 एकड़ जमीन अलग से मंजूर की है. परियोजना की खामियों की वजह से विश्व बैंक ने भी इसे जारी किया गया ऋण वापस ले लिया.

तीनों राज्यों (मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र) को अपनी पुनर्वास नीतियों में नए प्रावधान लाने पड़े. महाराष्ट्र में कोर्ट ने यह तक कहा कि विकासशील पुनर्वास होना चाहिए और विस्थापितों को भी विकास में हिस्सा मिलना चाहिए. मुझे याद है कि जब प्रशासन के साथ पहली मीटिंग हुई थी तब तीनों राज्यों के अधिकारी और हमारे 300 लोग थे. अधिकारियों का कहना था कि परियोजना से क्या लाभ-हानि और पर्यावरण को कैसा नुकसान हो रहा है, इससे आपको क्या लेना-देना? आप तो विस्थापित लोगों को अपनी बात करने दीजिए. वर्ष 2000 में नर्मदा के मामले में कोर्ट का फैसला आया कि पुनर्वास नीति छोटी रकम आधारित नहीं हो सकती. इसे देश में सबसे ज्यादा उपयोग किए जाने के फैसले के रूप में माना जाता है. इस दौरान नर्मदा बचाओ आंदोलन के जो अनुभव रहे हैं उससे दूसरे आंदोलनों और संगठनों को भी सीख मिली है.

पुनर्वास कार्यों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार

पुनर्वास और निर्माण कार्यों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार देखने को मिल रहा है. हमारी नजर में ऐसे अनगिनत मामले हैं जिसमें अपात्रों को पैसा लेकर सुपात्र बना दिया गया है. घर-प्लॉट वितरण में बहुत धांधली हो रही है. यहां तक कि कई अधिकारियों के परिवारवालों व रिश्तेदारों को भी प्लॉट मिला है. ऐसे अधिकारी भी हैं जो तीस सालों से वहीं पोस्टेड हैं.

2002 से ही हम इन सब मामलों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई है. योजना ही ऐसी बनाई गई है कि दलालों के बिना काम नहीं होता. निर्माण कार्यों में हुए भ्रष्टाचार की जांच आईआईटी मुंबई और मैनिट भोपाल ने की है, जिसकी रिपोर्ट अभी सावर्जनिक नहीं की गई, हालांकि इसमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को उजागर किया गया है.

जो व्यापमं में है वही इस परियोजना में भी

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह तो बातचीत के ही पक्ष में ही नहीं हैं. दिल्ली में 26 दिन के उपवास के बाद जब हम मुख्यमंत्री के सामने भ्रष्टाचार के मुद्दे रखने के लिए भोपाल में रुके तो वे हमसे नहीं मिले. मध्य प्रदेश में इस परियोजना से 193 गांव प्रभावित हैं. हर गांव में 800 से 1000 परिवार हैं. पीड़ितों के पक्ष में कई सारे कानून और फैसले होने के बावजूद उन्हें अमल में नहीं लाया गया. उल्टा मध्य प्रदेश सरकार ने यह भूमिका अपना ली कि लोग गुजरात चले जाएं क्योंकि ट्रिब्यूनल ने यह फैसला दिया था कि अगर लोग गुजरात जाएंगे तो उन्हें जमीन दी जाएगी. बाद में ट्रिब्यूनल ने कहा कि पीड़ितों को जमीन उनके ही राज्य में देनी है. इसके बाद जहां महाराष्ट्र ने 11 बसाहटें बसाई और 3.5 हजार परिवारों को जमीन दी गई, वहीं मध्य प्रदेश सरकार ने मात्र 30 परिवारों को ही जमीन दी.

ऐसा लगता है कि मध्य प्रदेश सरकार भ्रष्टाचारियों को समर्थन दे रही है, क्योंकि जो एफआईआर दाखिल है उस पर भी कार्रवाई नहीं की जा रही है, जो व्यापमं घोटाले में हुआ कुछ ऐसा ही वही नर्मदा पुनर्वास योजना में भी हो रहा है. सरदार सरोवर बांध के लिए भू-अर्जित जमीनों पर नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण द्वारा गुजरात की हकदारी है. इसके बावजूद भी मध्य प्रदेश के खनिज विभाग की ओर से उन जमीनों को रेत खनन के लिए लीज पर दे दिया गया था. हम मामले को उच्च न्यायालय ले गए, कोर्ट ने इसे अधिकारों का दुरुपयोग माना. खनन पर स्टे भी मिल गया लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ. फिर जब हमने अवमानना का केस दर्ज किया तब जाकर खनन रुका है. इस मामले में न्यायालय ने शासन से साफ शब्दों कहा है, ‘सरदार सरोवर के लिए इतने सारे लोगों को विस्थापित करने के बाद, बांध को भी खत्म करेंगे क्या?’ और स्पष्ट कहा, ‘शासन या तो बांध बनाए या रेत खनन करे, दोनों संभव नहीं’.

जनशक्ति पर हावी राज्य

सरकारें चाहती हैं कि संसाधनों पर स्थानीय निकायों और जनता का कोई नियंत्रण न रहे. यह जनतंत्र और संविधान के खिलाफ है. तभी तो कई कानूनी नीतियां और ट्रिब्यूनल के फैसले हैं, जो कहते हैं कि जब तक पुनर्वास न हो जाए किसी भी स्थिति में लोगों की संपत्ति डुबोई नहीं जा सकती है. इसके बावजूद इन पर अमल नहीं किया जा रहा. उल्टा इसमें अड़ंगा डाला जाता है. नर्मदा के मामले में विभिन्न आयोगों और अधिकारियों ने जांच में कभी भी पूरा सहयोग नहीं दिया. मोदी सरकार ने आते ही पहला निर्णय बांध की ऊंचाई बढ़ाने को लेकर दिया है. अभी भूमि अधिग्रहण कानून आ गया है. इन सब को देखकर लग रहा है कि जनशक्ति पर राज्य हावी हो गया है. इधर जो सबसे बड़ी चुनौती आई है वह यह है कि सरकार का ही कॉरपोरेटीकरण हो गया है.

जन आंदोलनों की अलग राजनीति

हम दलीय राजनीति को अछूत नहीं मानते हैं. जन आंदोलनों की राजनीति के आयाम ही अलग होते हैं. इनके मार्ग साधन और पद्धति दूसरे होते हैं. अब तो चुनावी प्रक्रिया का भी कॉरपोरेटीकरण हो गया है, फिर भी चुनावी राजनीति में अगर सुधार होते हैं तो दलीय राजनीति में आया जा सकता है, लेकिन अभी ऐसा होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है. इतने सालों से जो देखा है और अभी के जो अनुभव रहे हैं उससे हमारी समझ बनी है कि दलीय राजनीति से अलग रहना चाहिए. हमारा काम विकेंद्रीकृत है. कोई भी कार्यकर्ता समूह अपने हिसाब से निर्णय ले सकता है. हमने सरदार सरोवर के क्षेत्र में यही तय किया है कि नर्मदा बचाओ आंदोलन किसी पार्टी का हिस्सा नहीं है.

‘आप’ से जुड़ने का कोई पछतावा नहीं 

आम आदमी पार्टी से जुड़ने का एक विशेष अनुभव रहा है, लेकिन इसे लेकर हमें कोई पछतावा नहीं है. हमने अपनी नैतिकता बचाकर रखी है. इस दौरान हमारे चुनाव राजनीति की व्यवस्था और प्रचार को लेकर जो भी अनुभव रहे हैं वे चुनाव पद्धति को लेकर आज तक के हमारे विश्लेषण के अनुसार ही थे. इससे यह बात पुख्ता हो गई कि चुनावी राजनीति की रणनीति बहुत अलग होती है जिसमें जन आंदोलनों के साथियों का सामंजस्य बैठा पाना मुश्किल होता है. जिस तरह से चुनाव में प्रचार और खर्चे करने पड़ते हैं, वह सब हमें नहीं आता है. हमारी पद्धति और चुनावी राजनीति की प्रक्रिया और जरूरतें अलग है. बहुत सी विसंगतियां हैं. पार्टियों के साथ जो जनशक्ति व जनसैलाब खड़े होते हैं वे टिकाऊ नहीं होते. इसे टिकाऊ बनाने के लिए राजनीतिक दलों के अंदर जो प्रकिया होनी चाहिए वह हो नहीं पाती है, क्योंकि एक चुनाव के बाद दूसरे चुनाव पर ध्यान देना होता है. पार्टी के नेतृत्व का ध्यान भी उन रणनीतियों की तरफ होता है जो सत्ता हासिल करने और उसे टिकाये रखने के काम आती है. मैं इसे पूरी तरह गलत भी नहीं मानती हूं, लेकिन कुछ बुनियादी सिद्धांत भी होने चाहिए, बस यही सब अनुभव रहे हैं. लोहिया जी कहा करते थे कि राजनीति में जेल, फावड़ा और मतदान पेटी तीनों होने चाहिए. पहले की राजनीति में यह संभव था. समाजवादी विचारधारा के कई ऐसे लोग हुए है जिन्होंने सामाजिक कार्य, संघर्ष और निर्माण को आगे बढ़ाते हुए चुनावी राजनीति में हिस्सा लिया, लेकिन वर्तमान में यह संभव नहीं है. अब राजनीति के मानक अलग हो गए हैं जो इस दौरान स्पष्ट रूप से दिखाई दिए. अगर जनशक्ति का आधार लेकर सत्ता में आए हैं तो सत्ता में आने के बाद भी उसका आधार खत्म नहीं होना चाहिए.

अभी खत्म नहीं हुआ आंदोलन

अब तक जो कुछ भी मिला है आंदोलन की वजह से मिला है, लेकिन अभी आंदोलन खत्म नहीं हो सकता, लोग लड़ रहे हैं. अभी बांध के पानी का स्तर बड़ा मुद्दा है. ‘न्यू बैक वाटर लेवल’ की वजह से पानी का स्तर कम बताया जा रहा है, जो कि एक धोखा है. अचानक तीस साल बाद एक सब-कमेटी बनाई गई. उसने फील्ड पर न जाकर सारी जानकारी दस्तावेजों से ली है और ‘माडल’ बदल कर ‘बैक वाटर लेवल’ कम किया है. इसी के आधार पर सरकार कह रही है कि ऊंचाई बढ़ाने से एक भी इंच ज्यादा जमीन नहीं डूबेगी. लेकिन अभी सरकार ने ही जो ‘न्यू बैक वाटर लेवल’ बताया था उससे भी पानी पार हो गया है. सरकार ने खुद सुप्रीम कोर्ट में जानकारी दी है कि इससे लगभग 16 हजार परिवारों को वहां से हटाया गया है.  सुप्रीम कोर्ट में हमारी याचिका पर बीते एक अगस्त (शनिवार) को विशेष सुनवाई हुई है. ऐसा शायद पहली बार हुआ कि शनिवार के दिन कोर्ट खुला रखा गया. आधे दिन सुनवाई हुई मगर यह बांध की ऊंचाई पर केंद्रित नहीं रही. हमें उम्मीद थी कोर्ट से हमें राहत मिलेगी और पानी का स्तर कम किया जा सकेगा, लेकिन कानूनी प्रक्रिया में भी विरोधाभास है. केवल कोर्ट के जरिये हम लोगों को पूरा न्याय मिलेगा यह मानकर नहीं चल सकते हैं. यहां तो जीने-मरने का सवाल है. बड़वानी में सत्याग्रह शुरू हो गया है और यह संघर्ष आगे भी जारी रहेगा.

(जावेद अनीस से हुई बातचीत पर आधारित)

Web narmada

सरकारों का रुख

अरुंधती राय नर्मदा बांध पर अपने चर्चित लेख ‘द ग्रेटर कॉमन गुड’ की शुरुआत जवाहरलाल नेहरू द्वारा  हीराकुंड बांध के शिलान्यास के मौके पर दिए गए भाषण की उन लाइनों से करती हैं जिसमें उन्होंने कहा था, ‘अगर आपको कष्ट उठाना पड़ता है तो आपको देशहित में ऐसा करना चाहिए.’ बड़ी परियोजनाओं के संदर्भ में इसी ‘व्यापक जनहित’ की छाप अब भी सरकारों की सोच पर हावी है. अब तो एक कदम आगे बढ़कर सरकारें नर्मदा बचाओ जैसे आंदोलनों पर यह आरोप लगाती हैं कि ये विकास के रास्ते में रोड़े अटका रही हैं. इसकी ताजा मिसाल इस साल गर्मियों में ओंकारेश्वर बांध का जलस्तर बढ़ाए जाने  के विरोध में जल सत्याग्रह कर रहे किसानों को लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का दिया वह बयान है, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘यह आंदोलन विकास और जनविरोधी है, इससे मध्य प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश का नुकसान हो रहा है और इसकी जितनी भर्त्सना की जाए कम है.’ नर्मदा बचाओ आंदोलन ने पिछले तीस सालों में इसी सोच को चुनौती दी है. रहमत कहते हैं, ‘सरकारों का रवैया सिर्फ नर्मदा बचाओ आंदोलन के मामले में ही निरंकुश नहीं हुआ है बल्कि पिछले कुछ सालों से हमारे लोकतंत्र के सामने चुनौतियां गंभीर हुई हैं. भूमि अधिग्रहण का ही मसला ले लें, जिस तरह से किसानों के हितों के खिलाफ और व्यापक विरोध के बावजूद सरकार इसे किसी भी कीमत पर पास करना चाहती था, वह चिंता का विषय था. इस मामले में सरकार ने अपने कदम पीछे खींच लिए ये अलग बात है. एक तरफ तो सरकारें ‘इनवेस्टर मीट’ का आयोजन करके उद्योगपतियों को मुफ्त जमीन और सारी सुविधाएं देने की घोषणा कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर बांध प्रभावित और जल सत्याग्रह कर रहे लोगों की बात तक कोई सुनने को तैयार नहीं है.’

शंकर तड़वले कहते हैं, ‘मामला एकतरफा हो गया है. अब तो सरकारें जन आंदोलनों की बात भी सुनने को राजी नहीं हैं और आंदोलन करने वालों को एक तरह से विकास विरोधी, शत्रु और यहां तक कि नक्सली के तौर पर देखने लगी है.’ इसकी वजह बताते हुए वे कहते हैं, ‘देश में एक वर्ग है जो संगठित होकर संसाधनों को पूरी तरह से अपने कब्जे में लेना चाहता है, ताकि अपने फायदे के लिए वे इनका दोहन कर सकें.’

शरदचंद्र बेहार का मानना है कि सरकार और प्रशासन में यह सोच हावी है कि पूरे देश के विकास के लिए कुछ लोगों का बलिदान करना पड़े तो यह जायज है. राजनेताओं में जन आंदोलनों को लेकर एक सोच यह भी रहती है कि इस तरह के आंदोलनों की कोई वैधता नहीं होती है, जनता के असली प्रतिनिधि तो हम हैं. अपने अनुभवों को साझा करते हुए वह बताते हैं, ‘जब मैं प्रशासन में था तो कुछ राजनेताओं द्वारा मुझसे कहा जाता था कि जनता क्या चाहती है इसके बारे में ठीक तरह से सामाजिक आंदोलन के लोग जानेंगे या हम?’

राजनीति बनाम गैर-राजनीति की बहस

जन आंदोलनों के राजनीतिक या गैर-राजनीतिक होने के सवाल पर बहस पुरानी है. इसे लेकर कई तरह की राय रही है. कुछ लोगों का मानना है कि वे सामाजिक क्षेत्र से जुड़े हुए हैं और उनका राजनीति से कोई जुड़ाव नहीं है, वहीं एक खेमा यह मानता है कि भले ही वे चुनावी राजनीति में शामिल न हों लेकिन उनके मुद्दे राजनीतिक हैं. एक तीसरा पक्ष भी है जो चुनावी राजनीति में शामिल होने की वकालत करता है. आम आदमी पार्टी के परिदृश्य पर उभरने के बाद यह सवाल फिर सामने आया था. नर्मदा बचाओ आंदोलन सहित देश के कई आंदोलनों से जुड़े लोग ‘आप’ में शामिल हुए और चुनाव भी लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिल सकी. आंदोलन से जुड़े रहे आलोक अग्रवाल इस समय ‘आप’ की मध्य प्रदेश इकाई में संयोजक की भूमिका में हैं.

रहमत कहते हैं, ‘राजनीति व चुनावी राजनीति को लेकर हमारे समाज में हमेशा से ही भ्रम रहा है. शुरू में मुख्यधारा की राजनीति से जुड़े लोग यह आरोप लगाते थे कि हम आंदोलन के नाम पर राजनीति कर रहे हैं. उन्हें सफाई देनी पड़ती थी कि हम उन लोगों की तरह पार्टीगत राजनीति नहीं करते हैं, इससे भ्रम फैला. 1995-96 से सामाजिक आंदोलनों में यह चर्चा होनी शुरू हुई कि अगर हमें अपने मुद्दों को सही अंजाम तक पहुंचाना है तो चुनावी राजनीति में शामिल होना पड़ेगा लेकिन साथ में इस पर भी चर्चा होती थी कि चुनावी राजनीति के अपने नियम हैं, जहां मुद्दों की जगह जाति, समुदाय, पैसा और माफिया हावी हैं. इस दिशा में ये सब व्यवहारिक रुकावटें हैं. बाद में अन्ना आंदोलन और ‘आप’ के गठन को देखकर लगा था कि साफ-सुथरे तरीके से चुनावी राजनीति में सफल हुआ जा सकता है, इसीलिए पिछले लोकसभा चुनाव में आंदोलन से जुड़े लोगों ने चुनाव लड़ा था.’

शरदचंद्र बेहार कहते हैं, ‘राज्य समाज का एक हिस्सा है और राजनीति उसका एक पहलू मात्र है. हालांकि समकालीन बातचीत और विमर्श में राजनीति को समाज से अलग करके देखा जाता है. ‘सामाजिक’ शब्द का इस्तेमाल कर एक तरह से यह भ्रम पैदा किया जाता है मानो जन आंदोलन जिन मुद्दों को उठाते हैं वे गैर-राजनीतिक हों, दूसरी तरफ आंदोलन के लोगों के ‘आप’ से जुड़ने के बाद सरकारों को लगा अगर वे आंदोलन की मांगों को मान लेंगे तो इसका फायदा ‘आप’ को मिल सकता है. इसलिए उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया कि चुनावी राजनीति से जुड़ने के बाद आंदोलन की नैतिक ताकत कमजोर हो गई है. हमें यह समझना होगा कि एनबीए. सामाजिक आंदोलन नहीं बल्कि नॉन-इलेक्ट्रोरल (गैर निर्वाचित) राजनीति है. इस फर्क को समझना जरूरी है.’ अब्दुल जब्बार कहते हैं, ‘जन आंदोलनों के चुनावी राजनीति में अपना प्रतिनिधि खड़ा करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन हमारी आदत मैगी खाने की हो गई है जबकि ऐसे आंदोलनों के लिए तैयारी और धैर्य की जरूरत है.’

आप से जुड़ाव और उसके बाद  

13 जनवरी 2014 को मेधा पाटकर आम आदमी पार्टी में शामिल हुई थीं. इसे इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा सकता है. उस समय उन्होंने कहा था कि उनके लिए चुनावी राजनीति में आने का फैसला काफी मुश्किल भरा था. पिछले लोकसभा चुनाव में मेधा पाटकर और आंदोलन के दूसरे प्रमुख नेता आलोक अग्रवाल ने  चुनाव भी लड़ा था. हालांकि प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव प्रकरण के बाद मेधा पाटकर ने यह कहते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया कि पार्टी तमाशा बनकर रह गई है. उस समय अरविंद केजरीवाल को भेजे गए अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा था, ‘वैकल्पिक राजनीति की अपेक्षाओं की तुलना में प्राप्त हुई थोड़ी उपलब्धियां हमारे कुछ सीमित उद्देश्यों को ही पूरा करने वाली हैं.’

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इन सबके बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि ‘आप’ से जुड़ने का फैसला सही था या गलत? जवाब इस घटना में ढूंढा जा सकता है. इस साल अप्रैल और मई में मध्य प्रदेश के घोघलगांव में जल सत्याग्रह को लेकर प्रदेश सरकार की प्रतिक्रिया बदली हुई नजर आई, जबकि 2012 में इसी घोघलगांव के जल सत्याग्रह के बाद राज्य के साथ-साथ केंद्र सरकार भी हरकत में आ गई थी. तब जलस्तर कम करने और जमीन के बदले जमीन देने जैसी मांगों को मान लिया गया था. वहीं इस बार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी नर्मदा बचाओ आंदोलन को विकास विरोधी बताया. भाजपा अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान ने भी इसे कुछ लोगों की नौटंकी करार दिया था. वहीं केंद्र सरकार ऐसा जता रही थी जैसे कुछ हुआ ही न हो. आंदोलन से जुड़े रहे कई लोग इसे चुनावी राजनीति से जुड़ जाने के बाद आंदोलन की नैतिक ताकत का कम होना मानते हैं. वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता योगेश दीवान कहते हैं, ‘आप’ में कार्यकर्ताओं के शामिल होने से आंदोलन को धक्का लगा क्योंकि वहां लोग वैकल्पिक राजनीति के नाम पर चले तो गए थे लेकिन असलियत में वहां कोई वैकल्पिक ढांचा था ही नहीं और न ही ऐसा माहौल था कि इस बारे में बात भी की जा सके.’

डूब प्रभावित गांव भीलखेड़ा (बड़वानी) से नर्मदा बचाओ आंदोलन के पूर्णकालिक कार्यकर्ता कैलाश अवास्या खरगोन-बड़वानी सीट से ‘आप’ के टिकट पर पिछला लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं. वे कहते हैं, ‘हम लोग ‘आप’ से इसी मंशा के साथ जुड़े थे कि साफ-सुथरी राजनीति होगी और इससे बदलाव आ सकता है, लेकिन बाद में वहां जाकर अनुभव हुआ कि हमें अभी जन आंदोलन और दबाव समूह के रूप में ही काम करना चाहिए.’ वे बताते हैं, ‘उन्होंने अभी पार्टी से इस्तीफा नहीं दिया है लेकिन अभी जो कुछ वहां चल रहा है उससे वे असहमत हैं.’ देवराम कनेरा कहते हैं, ‘हम ‘आप’ के साथ काफी मंथन के बाद जुड़े थे, लेकिन पार्टी से जो उम्मीद थी वह सही साबित नहीं हुई. नर्मदा घाटी में आंदोलन पर इसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा.’ उनका कहना है, ‘अगर हम राजनीति के साथ जुड़कर आंदोलन करेंगे तो हमारी बात पहले की तरह नहीं सुनी जाएगी और इसे वोट की राजनीति के नजरिये से देखा जाएगा.’ महादेव भगवान दास का कहना है, ‘आप’ से जुड़ने का कोई नुकसान हुआ हो ऐसा डूब क्षेत्र में तो नहीं दिखाई देता है, अब भी सब संगठन के साथ जुड़े हैं.’

Medha Patkar, founder of the Narmada Bachao Andolan. Photo by K Sateesh/Tehelka

आंदोलन का भविष्य

बीते 28 जुलाई को दिल्ली के कॉन्सटीट्यूशन क्लब में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें आंदोलन के तीस साल पूरे होने पर इसके संघर्ष, चुनौतियों और भविष्य पर चर्चा की गई. सम्मेलन में तय किया गया कि बांध में पानी का स्तर कम करने के लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा पूरी नर्मदा घाटी में पदयात्रा की जाएगी. 6 अगस्त को खालघाट (धार) से यह पदयात्रा शुरू होकर 12 अगस्त को मध्य प्रदेश के बड़वानी स्थित राजघाट पहुंची. आंदोलन से जुड़े लोगों ने यहां अनिश्चितकालीन सत्याग्रह शुरू कर दिया है. इस बीच एक छह सदस्यीय स्वतंत्र टीम द्वारा परियोजना से प्रभावित गांवों के मई में किए गए दौरे की रिपोर्ट भी आ गई है. ‘डिस्ट्रॉयिंग अ सिविलाइजेशन’ नाम की इस रिपोर्ट के अनुसार अब भी हजारों परिवार सही मुआवजा और पुनर्वास से वंचित हैं, कई प्रभावितों को तो डूब क्षेत्र में शामिल ही नहीं किया गया है और अगर भविष्य में बांध की ऊंचाई 17 मीटर बढ़ाई जाती है तो इससे और ज्यादा परिवार डूब क्षेत्र में आ जाएंगे.

तीस साल के लंबे संघर्ष के बाद हम देखें तो ‘कोई नहीं हटेगा बांध नहीं बनेगा’ के नारे के साथ आंदोलन शुरू हुआ था लेकिन तमाम संघर्ष और कुर्बानियों के बीच बांध के निर्माण को रोका नहीं जा सका और इस बीच लड़ाई की मांगों का दायरा भी धीरे-धीरे कम होता गया. बड़े बांध के खिलाफ शुरू हुआ यह संघर्ष बाद में बांधों की ऊंचाई के खिलाफ, फिर बेहतर पुनर्वास के लिए और अब पुनर्वास में हो रहे भ्रष्टाचार को लेकर सिमटता जा रहा है. इन सब को लेकर शरदचंद्र बेहार कहते हैं, ‘या तो हम गलत मांग कर रहे हैं या फिर सरकार जनता के लिए है ही नहीं. ऐसे में अब आंदोलनों के सामने बड़ा सवाल ये होना चाहिए कि कैसे सरकारों को जनता के प्रति ज्यादा जवाबदेह बनाया जाए.’ वे दार्शनिक प्लेटो को कोट करते हुए कहते हैं, ‘लोकतंत्र के नाम पर जब तक थोड़े लोगों का राज होगा तब तक असली लोकतंत्र नहीं आ पाएगा. इसलिए सारे आंदोलनों को मिलकर अपनी पहचान और मुद्दों को कायम रखते हुए सच्चे लोकतांत्रिकरण के लिए संघर्ष शुरू करना चाहिए, क्योंकि इस तरह की सरकारें जब तक चलती रहेंगी तब तक नर्मदा बचाओ आंदोलन और इस तरह के दूसरे संघर्षों की बातें अनसुनी की जाती रहेंगी और उनके पास अपने संघर्ष की मांगों को सीमित करने का विकल्प ही बचेगा.’

तीस साल आंदोलन की पगडंडी पर चलते हुए नर्मदा बचाओ आंदोलन बड़े बांधों और उससे जुड़े विकास के मॉडल पर सवाल और बहस खड़ा करने में कामयाब रहा है. इसने विस्थापितों के सवाल को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया और अंत में इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि किस तरह से तमाम रुकावटों के बीच नर्मदा घाटी के लोग हिम्मत और प्रतिबद्धता के साथ अहिंसात्मक तरीके से न केवल संघर्ष कर रहे हैं, बल्कि उन्होंने दूसरों के लिए प्रेरणा बनने का काम भी किया है.

आंदोलन के महत्वपूर्ण पड़ाव

 1985 : महाराष्ट्र में ‘नर्मदा धारणग्रस्थ समिति’, मध्य प्रदेश में ‘नर्मदा घाटी नव निर्माण समिति’ और गुजरात में  ‘नर्मदा असरग्रस्त संघर्ष समिति’ की ओर से सरदार सरोवर बांध परियोजना का विरोध शुरू हुआ. इन तीनों संगठनों ने मिलकर काम करने का निर्णय लिया. इस तरह से ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ का गठन हुआ.

28 अगस्त 1989 : मध्य प्रदेश पुनर्वास नीति बनी जिसमें यह कहा गया कि विस्थापितों को कम से कम 5 एकड़ संचित और उपजाऊ जमीन और पुनर्वास स्थल पर आवश्यक संसाधनों सहित आवास के लिए जमीन प्रदान की जाएगी.

28 सितंबर 1989 : हरसूद में आयोजित संकल्प मेले में पूरे देश से लगभग 50,000 लोगों ने एकजुट होकर इस बांध का विरोध किया.

09 अगस्त 1991 : सुप्रीम कोर्ट ने बीडी शर्मा बनाम भारत सरकार मामले में आदेश दिया कि सरकार द्वारा छह महीने के अंदर विस्थापित लोगों का अनिवार्य रूप से पुनर्वास किया जाए.

18 जून 1992 : विश्व बैंक के एक स्वतंत्र समीक्षा संस्था ‘मॉरिस कमेटी’ की रिपोर्ट जारी. रिपोर्ट में बैंक को सरदार सरोवर परियोजना से अलग होने की अनुशंसा की गई.

26 जून 1992 : 16 देशों की 42 संस्थाओं द्वारा समर्थित नर्मदा इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स पैनल ने अपनी रिपार्ट जारी की.

20 जुलाई 1994 : पांच सदस्यों वाली एक स्वतंत्र समिति ने अपनी रिपोर्ट भारत सरकार को दी. इसी साल कानूनी विवादों के चलते बांध बनाने का काम रोक दिया गया.

1999 : सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बांध का काम फिर से शुरू हुआ.

07 जनवरी 2002 : मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पुनर्वास और पुनर्सुधार के लिए पीड़ितों को नकद राशि देने की योजना की शुरुआत हुई.

14 अप्रैल 2003 : सुप्रीम कोर्ट ने बांध की ऊंचाई 95 मीटर से 100 मीटर बढ़ाने का आदेश दिया.

16 जून 2005 : मध्य प्रदेश सरकार ने विशेष पुनर्वास अनुदान में बदलाव कर उसे विशेष पुनर्वास पैकेज में बदल दिया, जिसमें रकम के बदले जमीन देने की बात की गई. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पुनर्वास और विस्थापन की व्यवस्थाएं पर्याप्त नहीं थीं.

2006 : बांध के काम को और बढ़ाने के लिए आवेदन दिया गया, जिस पर नर्मदा बचाओ आंदोलन ने भूख हड़ताल की पर काम जारी रहा. साथ ही पुनर्वास और विस्थापन परियोजना असफल हो गई.

23 फरवरी 2009 : मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने जस्टिस झा कमीशन को निर्देश दिया कि सरदार सरोवर बांध परियोजना पुनर्वास और पुनर्सुधार में हो रहे घपले की जांच करे.

24 जून 2010 : सरदार सरोवर बांध की समीक्षा करने वाले जस्टिस शाह आयोग की रिपोर्ट भोपाल में जारी. इसमें पूर्ण पुनर्वास और पर्यावरण सुरक्षा की सिफारिश की गई.

12 दिसंबर 2014 : नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई 17 मीटर बढ़ाने के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में अपील.

(स्रोत : नर्मदा: 30 ईयर्स ऑफ रेजिलेंस)

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जीवनशाला : संघर्ष और निर्माण साथ-साथ

नर्मदा बचाओ आंदोलन और इससे जुड़े लोगों ने परियोजना के विरोध के साथ कई रचनात्मक काम भी किए हैं, जिसमें बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल की स्थिति में सुधार जैसे काम शामिल हैं. आंदोलन द्वारा संचालित ‘नर्मदा नवनिर्माण अभियान’ ट्रस्ट दूरदराज के डूब क्षेत्रों में जीवनशाला चलाता है. आंदोलन के दौरान पता चला कि इन इलाकों में स्कूल नहीं हैं और अगर हैं भी तो ठीक से चलते नहीं. आंदोलन से जुड़ीं परवीन जहांगीर बताती हैं, ‘शुरू में सरकार पर इन इलाकों में स्कूल खोलने के लिए दबाव बनाया गया. लगातार आवेदन दिए गए लेकिन स्थिति जस की तस बनी रही. तब आंदोलनकारियों और समुदाय ने खुद पहल करते हुए जीवनशाला स्कूल खोला. 1991 में पहली जीवनशाला शुरू हुई जो कि महाराष्ट्र के चिमलखेड़ी और नीमगांव में थी. यहां वर्तमान में नौ जीवनशालाएं चल रही हैं, जिसमें 7 महाराष्ट्र और 2 मध्य प्रदेश में हैं. यहां कुल 910 बच्चे पढ़ते हैं. महाराष्ट्र की जीवनशालाओं में 780 और मध्य प्रदेश में 130 बच्चे हैं. वर्तमान में कुल 40 शिक्षक हैं. इसके अलावा हर जीवनशाला में एक मौसी (खाना बनाने के लिए) और एक कमाथी (सहायक) होते हैं. ये शालाएं आवासीय होती हैं. यहां 6 वर्ष से ऊपर के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा दी जाती है. मध्य प्रदेश की जीवनशालाओं में पहली से 5वीं तक शिक्षा दी जाती है, वहीं महाराष्ट्र में पहले यह चौथी तक था, अब उसे 5वीं कक्षा तक किया गया है. 2012-13 से महाराष्ट्र की जीवनशालाओं को राज्य सरकार से मान्यता भी मिल गई है.’ परवीन बताती हैं, ‘सभी जीवनशालाओं को सर्व शिक्षा अभियान के तहत किताबों के अलावा कोई सरकारी सहायता नहीं मिलती है और इसके लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ता है.’

jeevan shala WEB

जीवनशालाएं महात्मा गांधी की बुनियादी तालीम की सोच पर आधारित हैं, जिसमें जीवन कौशल और पढ़ाई साथ-साथ होती है. यहां सामुदायिक जीवन निर्वाह, आत्मनिर्भरता, सहयोग, आदिवासी संस्कृति, पर्यावरण व प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण जैसे नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी जाती है. पढ़ाई की शुरुआत मातृभाषा में होती है फिर दूसरी भाषाएं सिखाई जाती हैं. किताबों का अनुवाद भी स्थानीय बोलियों में किया गया है. इन किताबों में अन्य बातों के अलावा स्थानीय समाज-संस्कृति के बारे में भी जानकारी दी गई है. परवीन बताती हैं, ‘यहां से दो लड़के एथलीट भी बने हैं जिन्होंने राज्य और राष्ट्रीय स्तर कई पदक जीते हैं. इसी तरह से महाराष्ट्र में खेलों को बढ़ावा देने वाली क्रिया प्रबोधनी परीक्षा में जीवनशाला के बच्चे भी बैठे थे. नंदूरबार जिले से इस परीक्षा में केवल दो बच्चों का चयन हुआ, ये दोनों ही बच्चे जीवनशाला से हैं.’

जीवनशालाएं लोगों द्वारा दिए गए व्यक्तिगत चंदे और समुदाय के सहयोग से चलती हैं. समुदाय जो भी उगाता है, उसमें से थोड़ा हिस्सा बच्चों को देता है. समुदाय को जीवनशाला से जोड़ा भी गया है. समुदाय से लोगों को देख-रेख कमेटी में चुना जाता है जो कि निगरानी का काम करते हैं. जीवनशालाओं के अलावा महाराष्ट्र के धड़गांव में एक छात्रवास भी चलाया जा रहा है, जहां वर्तमान में 23 बच्चे रहकर 5वीं के बाद दूसरे स्कूलों में आगे की पढ़ाई कर रहे हैं. परवीन जहांगीर बताती हैं, ‘जीवनशाला से हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि दूरदराज के आदिवासी बच्चों को भी शिक्षा का अधिकार मिले.’

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[ilink url=”https://tehelkahindi.com/medha-patkars-take-on-narmada-bachao-andolan/” style=”tick”]मेधा पाटकर का साक्षात्कार [/ilink]

संघर्ष की पगडंडी पर 30 साल

बीते 17 और 18 जुलाई को नर्मदा घाटी से आए सरदार सरोवर बांध के हजारों विस्थापित और उनके समर्थकों ने ‘आएंगे दिल्ली, बजाएंगे ढोल, जगाएंगे सरकारों को’ के नारे के बीच राजधानी के जंतर-मंतर पर धरना दिया. मांग की गई कि विस्थापितों का समुचित पुनर्वास हो जिसके तहत पैसे की जगह सभी को जमीन के बदले जमीन और घर बनाने के लिए उचित मुआवजा दिया जाए. रैली में केंद्र सरकार के उस फैसले को लेकर भी सवाल उठाए गए जिसके तहत बांध की ऊंचाई 17 मीटर बढ़ाने की बात की गई है. आंदोलनकारियों ने केंद्र सरकार को चेतावनी दी है कि अगर ऐसा हुआ तो वे चुप नहीं बैठेंगे और जलसमाधि लेंगे.

30 साल पहले इस आंदोलन का नारा था ‘कोई नहीं हटेगा बांध नहीं बनेगा’ लेकिन इतने बड़े आंदोलन और प्रतिरोध के बावजूद सरदार सरोवर बांध बना. अब भी विस्थापितों को बसाने, उन्हें मुआवजा दिलवाने, इसमें हो रहे भ्रष्टाचार और बांध की ऊंचाई बढ़ाए जाने की लड़ाई जारी है. इस दौरान रैलियां, धरने, अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल, विरोध प्रदर्शन, सार्वजनिक सभाएं और पदयात्राएं की गईं. दूसरी तरफ सरकारों की ओर इस आंदोलन को कुचलने की कोशिश भी लगातार जारी रही. आंदोलन ने इन सालों में सफलताएं भी अर्जित की हैं. इसी वजह से सरदार सरोवर परियोजना और अन्य बांधों के मामले में विस्थापन से पहले पुनर्वास की व्यवस्था, पर्यावरण व अन्य सामाजिक प्रभावों पर बात की जाने लगी है. इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसने विचार के स्तर पर पर्यावरण और वर्तमान विकास के मॉडल पर सवाल उठाया और इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है.

नर्मदा नदी पर नर्मदा घाटी विकास परियोजना के तहत 30 बड़े और 135 मध्यम आकार के बांध बनाने की योजना बनाई गई थी. जिसमें सरदार सरोवर बांध, महेश्वर बांध आदि विशालकाय परियोजनाएं  शामिल हैं. 1985 में इस परियोजना के लिए विश्व बैंक ने 450 करोड़ डॉलर का लोन देने की घोषणा की थी. 1989 में परियोजना के विरोध में नर्मदा बचाओ आंदोलन एक जन आंदोलन के रूप में सामने आया. आंदोलन ने इस परियोजना पर कई गंभीर सवाल खड़े किए और मांग की कि बांध निर्माण का काम रोक कर इस पर पुनर्विचार किया जाए. अपने तीस साल के सफर में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने पुनर्वास के साथ-साथ बांध के पर्यावरणीय, जैविकीय व इससे उपजने वाली बीमारियों से स्वास्थ्य पर होने वाले असर जैसे मुद्दों को उठाया है.

1994 wesddfमें परियोजना को कर्ज देने वाले विश्व बैंक के एक दल ने नर्मदा घाटी का दौरा करने के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा कि सरदार सरोवर परियोजना गड़बड़ियों से भरी है. परियोजना से पर्यावरण पर क्या फर्क पड़ेगा इसका ठीक से आकलन तक नहीं किया गया है और मौजूदा तरीके से विस्थापन और पुनर्वास का काम पूरा नहीं हो सकता. इस रिपोर्ट के बाद विश्व बैंक को परियोजना के लिए दिया जाने वाला कर्ज वापस लेना पड़ा. आंदोलन के लिए यह बड़ी जीत थी. इसके बावजूद भारत सरकार ने बांध निर्माण का काम जारी रखा जबकि इसी साल केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय के एक विशेषज्ञ दल ने भी अपनी रिपोर्ट में परियोजना में हो रही पर्यावरण की भारी अनदेखी पर सवाल उठाया था. दिसंबर 2006 में सरदार सरोवर बांध बनकर तैयार हो गया. नरेंद्र मोदी ने इसका उद्घाटन किया. उस समय वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे. आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि इस बांध से करीब 3 लाख 20 हजार लोग प्रभावित हुए हैं.

नर्मदा नदी पर ही बने इंदिरा सागर बांध की बात करें तो इसके डूब क्षेत्र में कुल 255 गांव थे. इन्हीं में से खंडवा के पास मध्य प्रदेश का 700 वर्ष पुराना कस्बा ‘हरसूद’ भी था. ‘हरसूद’ को सन 2004 के मानसून में डूब जाना था इसलिए वहां के लोगों को उसी साल 30 जून को जबरन, बिना समुचित पुनर्वास की व्यवस्था किए उजाड़ दिया गया. नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ देशभर के समाजसेवी, मानव अधिकार कार्यकर्ता, पर्यावरणविद, लेखक, बुद्धिजीवी, फिल्म व मीडिया क्षेत्र के लोग, छात्र-छात्राएं, महिलाएं, आदिवासी, किसान जुड़े हुए हैं. बुकर पुरस्कार से सम्मानित लेखिका अरुंधती रॉय भी इससे जुड़ी रहीं. उन्होंने इस मुद्दे पर ‘द कॉस्ट ऑफ लिविंग’ नाम से एक किताब भी लिखी. 2006 में आमिर खान ने विस्थापितों के पुनर्वास के समर्थन में मेधा पाटकर का समर्थन किया था और प्रदर्शनकारियों से मिलने भी गए, जिसके बाद उनका जबरदस्त विरोध किया गया. यहां तक कि गुजरात के सिनेमाघरों में उनकी फिल्म ‘फना’ पर भी रोक लगा दी गई.

2011 में सुप्रीम कोर्ट ने नर्मदा बचाओ आंदोलन को झूठे शपथ-पत्र पेश करने पर फटकार लगाई थी. यह आंदोलन के लिए एक बड़ा झटका था. हालांकि अदालत द्वारा आंदोलन के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई नहीं की गई. अदालत ने यह फटकार इंदौर के जिला जज की ओर से की गई जांच के परिणामों को देखने के बाद लगाई थी. जांच परिणामों पर आधारित रिपोर्ट में कहा गया था कि आंदोलन से जुड़े लोगों ने अपने हलफनामे में जो दावे किए हैं वे पूरी तरह झूठे हैं. हालांकि आंदोलन करने वालों का कहना था, ‘देवास जिले के जिन पांच गांवों को लेकर शपथ-पत्र पेश किया गया था, वहां के सारे लोग आदिवासी थे, जो कि डूब रहे थे. उनकी मांग थी कि उन्हें नकद नहीं जमीन चाहिए और अगर जमीन नहीं मिलेगी तो वे नहीं हटेंगे.’ मामला हाईकोर्ट गया तो हाईकोर्ट ने भी कहा कि इन्हें जमीन दी जाए. बाद में एनवीडीए (नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण) ने कहा कि चूंकि यहां पांच करोड़ रुपये की लागत से एक पुल बनाया जा रहा है, इसलिए इनके पुनर्वास की कोई जरूरत नहीं, लेकिन जमीन अधिग्रहित की जा चुकी थी. इसलिए मामला फिर सुप्रीम कोर्ट गया. वहां एनबीए (नर्मदा बचाओ आंदोलन) की ओर से कहा गया, ‘लोगों की जमीन छिन गई है. अब उनके पास इसका कानूनी अधिकार भी नहीं है, जबकि एनवीडीए का कहना था कि जमीन हमने नहीं ली है.’ मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इंदौर के जिला जज को जांच कर अपनी रिपोर्ट देने को कहा था. जिला जज ने अपनी रिपोर्ट ने कहा था, ‘जमीन एनवीडीए ने नहीं ली है यह आदिवासियों के ही पास है.’ इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एनबीए कोर्ट को गुमराह कर रहा है और उसे फटकार पड़ी, जबकि एनवीडीए की ओर से जमीन अधिग्रहित की गई थी. बाद में एनबीए ने इसका रीजॉयंडर (जवाबी दावा) देने की भी कोशिश की लेकिन कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया.

खैर, आंदोलन के दौरान नेतृत्व के काम करने के तरीके और नजरिये में फर्क भी देखने को मिला. आंदोलन से जुड़े कुछ लोग इसे विभेद या मनमुटाव न मानते हुए एक तरह से काम के बंटवारे के रूप में देखते हैं. वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे भी हैं जो दूसरी राय रखते हैं. इनका मानना है कि आंदोलन में जिस तरह काम के क्षेत्र का बंटवारा हुआ है वह नेतृत्व की सीमा को दर्शाता है, क्योंकि इस अनौपचारिक विभाजन के बाद भी उनके काम करने की पद्धति, सोच और शैली में कोई फर्क देखने को नहीं मिला है. नाम व झंडा भी पुराना ही है. इसका मतलब जो विभाजन हुआ है उसके पीछे व्यक्तिवादी नजरिया है. एक तरह से यह मध्य वर्ग के अहम का टकराव और द्वंद्व है.

निश्चित तौर से आंदोलन की कुछ सीमाएं भी रही होंगी. वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता योगेश दीवान कहते हैं, ‘यह मुद्दा आधारित आंदोलन था. ऐसे आंदोलनों की एक सीमा होती है. ऐसे आंदोलन में समाज के बाकी सवाल जैसे वर्ग, जाति, लिंग छूट जाते हैं. इसकी वजह यहां राजनीतिक प्रकिया का अभाव होना है, जिसका असर नेतृत्व, कार्यकर्ताओं और इसके काम पर देखने को मिलता है. इससे आंदोलन की वैचारिक समझ पुख्ता नहीं हो पाती और राजनीतिक रूप से अस्पष्टता देखने को मिलती है. इसमें मुद्दे के आधार पर कोई भी शामिल हो सकता है. नतीजे में हम देखते हैं कि जिन क्षेत्रों में आंदोलन मजबूत है, वहां दक्षिणपंथी ताकतें हावी हैं.’

कई लोगों का मानना है कि इस आंदोलन के इतने लंबे समय तक चलने की पीछे एक वजह यह भी है कि इसे मध्यमवर्गीय किसानों का समर्थन रहा है. एक उदाहरण सन् 1994 का दिया जाता है जब दिग्विजय सिंह ने यह प्रस्ताव दिया था कि बांध की ऊंचाई 436 फीट तक कर देंगे. इस प्रस्ताव से निमाड़ तो बच रहा था लेकिन नीचे के आदिवासी क्षेत्र डूब रहे थे, हालांकि बाद में इस प्रस्ताव को मान लिया गया.

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आंदोलन का प्रभाव

तीस साल बाद मुड़कर देखें तो पहला सवाल यही उठता है कि यह आंदोलन किस हद तक अपने मकसद को हासिल करने में कामयाब रहा? तमाम विरोध और प्रतिरोध के बीच बांध तो बन गया और लड़ाई का दायरा सिमट कर उचित पुनर्वास और मुआवजे तक आ पहुंचा, लेकिन क्या आंदोलन को इस सीमित नजरिये से ही देखा जाना चाहिए? रहमत भाई ने 11 साल तक आंदोलन के साथ एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में काम किया है और खुद भी बांध प्रभावित हैं. मंथन अध्ययन केंद्र से जुड़े रहमत का कहना है, ‘अगर 30 साल बाद आंदोलन का समग्रता में मूल्यांकन करें तो भले ही हम बांध बनने से नहीं रोक पाए हों लेकिन इसके व्यापक प्रभाव पड़े हैं. अब जबरिया विस्थापन करना उतना आसान नहीं रह गया है. आंदोलन से पहले विस्थापन के मामलों में जमीन के बदले जमीन की नीति नहीं थी. नर्मदा बचाओ आंदोलन ने जब विस्थापन के मुद्दे को उठाना शुरू किया तो असंवेदनशीलता इस हद तक थी कि सरकार के पास इससे प्रभावित होने वाले लोगों को लेकर कोई आंकड़ा तक नहीं था. आंदोलन की वजह से ही सरकार सरदार सरोवर बांध के मामले में जमीन के बदले जमीन की नीति लाने को मजबूर हुई. हालांकि इसमें भी कई खामियां हैं. इसी तरह से स्थानीय स्तर पर देखें तो इस आंदोलन का प्रभाव विस्थापन के मुद्दे के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों में भी देखने को मिलता है. इससे समुदाय का दूसरे मुद्दों पर भी सशक्तिकरण हुआ है. उनमें सामाजिक जागरूकता आई है और अब लोग स्वयं अपने अधिकारों के लिए आगे आने लगे हैं.’

वर्षों से भोपाल गैस पीड़ितों की लड़ाई लड़ रहे अब्दुल जब्बार भी कुछ इसी तरह की राय रखते हैं. उनका कहना है, ‘बांध तो बन गया लेकिन इससे बड़े बांधों को लेकर सवाल खड़ा करने में सफलता मिली है और बड़े बांधों के क्या नुकसान हो सकते हैं, इसका संदेश देश ही नहीं देश से बाहर भी गया है. इसे कम करके नहीं आंका जा सकता है. जिन सैकड़ों गांवों के लोग इस आंदोलन में शामिल हुए उन्होंने यह जाना कि आंदोलन क्यों जरूरी है और सरकार अगर गलत करती है तो क्यों और कैसे लड़ना चाहिए.’

शुरुआती दौर से ही एनबीए से जुड़े रहे खेड़ूत मजदूर चेतना संगठन के संयोजक शंकर तड़वले कहते हैं, ‘इस आंदोलन ने देशभर के कार्यकर्ताओं को जोड़ने और दूसरे आंदोलनों को प्रेरणा देने का काम भी किया है. आंदोलन से देश के सामने यह बात आ सकी कि विस्थापन के बाद लोगों को किस तरह की त्रासदी झेलनी पड़ती है. इसके बाद ही सरकारें विस्थापन के बाद पुनर्वास को लेकर अपनी सोच बदलने पर मजबूर हुईं.

नर्मदा बचाओ आंदोलन के वरिष्ठ कार्यकर्ता और धार जिले के खापरखेड़ा गांव के डूब प्रभावित देवराम कनेरा कहते हैं, ‘पिछले तीस सालों से हम अपनी जान को हथियार बनाकर लड़ रहे हैं. इस वजह से शायद यह इकलौता आंदोलन है, जिसमें उजड़ने के बाद लोग जमीन के बदले जमीन पाने में कामयाब रहे हैं. सरकार 88 पुनर्वास स्थल बनाने को भी मजबूर हुई है. यह सब आंदोलन से ही संभव हो सका है. हम 12 अगस्त से फिर सत्याग्रह कर रहे हैं.’

बड़वानी जिले के डूब क्षेत्र में आने वाले गांव छोटा बरदा के निवासी और नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता महादेव भगवान दास का कहना है, ‘हम भले ही बांध बनने से नहीं रोक पाए हों लेकिन अब तक हम यहां संघर्ष की वजह से ही टिके हुए हैं. अगर आंदोलन नहीं होता तो हम 15-20 साल पहले ही उजाड़ दिए गए होते.’ आंदोलन के भविष्य को लेकर उनका कहना है, ‘हमें मुआवजे के बलबूते नहीं रहना है. हम जीवन की लड़ाई लड़ रहे हैं और इसे आगे भी जारी रखेंगे.’

नर्मदा बचाओ आंदोलन के पूर्णकालिक कार्यकर्ता और भीलखेड़ा गांव (बड़वानी) के कैलाश अवास्या का कहना है, ‘तीस साल बाद भी लोग हटे नहीं बल्कि पूरी ताकत के साथ डटे हुए हैं. लोग यह लड़ाई सिर्फ अपने लिए नहीं सभी गांवों के लिए लड़ रहे हैं, हम आगे भी लड़ते और संघर्ष करते रहेंगे.’

आंदोलन से जुड़े मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव शरदचंद्र बेहार कहते हैं, ‘इस आंदोलन ने तथाकथित विकास के मॉडल के खिलाफ पहली बार आवाज उठाई. यह पहला उदाहरण था जिसने यह रास्ता दिखाया कि कैसे बड़ी विकास परियोजनाओं का भी विरोध किया जा सकता है. इससे पहले ऐसी परियोजनाओं को सिर्फ अच्छा ही माना जाता था. विकास के इस स्याह पक्ष को सरकार के साथ-साथ जनता भी नजरअंदाज करती थी. इस पक्ष को सामने लाना और उसे स्थापित करना ही इस आंदोलन की पहली बड़ी उपलब्धि रही है. दूसरी उपलब्धि यह है कि इसने बताया कि बड़े बांधों के दुष्प्रभावों से मात्र इंसानों को ही नुकसान नहीं होता है बल्कि इसका डूब क्षेत्र बनने से जमीन, वहां का इतिहास, स्थानीय पेड़-पौधे, पर्यावरण, संस्कृति भी डूबते हैं. इस तरह से बड़े बांधों से होने वाले मानवीय, सामाजिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक आघात को विमर्श के केंद्र में लाने में इस आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. इसके प्रभाव से ही यह संभव हो सका कि अब नाभिकीय और खनन जैसी बड़ी परियोजनाओं के खिलाफ लगातार आंदोलन हो रहे हैं. इसने उन्हें रास्ता दिखाने का काम किया है. यह इस आंदोलन की ही साख थी कि जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व बांध आयोग बना तो मेधा पाटकर को भी सदस्य बनाया गया.’

 

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गहरे जख्म छोड़ गया देश का सबसे बड़ा विस्थापन

विजय मनोहर तिवारी

एक साल पहले इंदिरा सागर बांध के इलाके में एक बार फिर जाने का मौका मिला. तब मुझे 2004 के मानसून के विकट दिन याद आ गए. इस परियोजना में करीब 250 गांव डूबे. हरसूद नाम का छोटा सा शहर जून 2004 में डूब क्षेत्र में आया था. दुनिया भर के मीडिया ने तब दिखाया था कि एक हजार मेगावाट बिजली हजारों परिवारों के लिए किस कदर अंधेरा लेकर आई थी. ज्यादातर लोग मामूली मुआवजा लेकर निकले या निकाले गए. हरसूद वालों के लिए छनेरा नाम की जगह पर एक उजाड़ पथरीला मैदान दिया गया था, जहां बीच बारिश में विस्थापितों को अपने घर बनाने थे. सब कुछ बेहद अमानवीय ढंग से हुआ.

10 साल के कांग्रेस राज में बांध एक तरफा ढंग से बनता गया. पुनर्वास के नाम पर कुछ हुआ नहीं था. 2003 में उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा की सरकार मध्य प्रदेश में बनी. विकास का राग अलापने वाली सरकार के लिए हरसूद देश में विस्थापन और पुनर्वास का एक शानदार मॉडल बनाने का मौका था, जो बेलगाम और भ्रष्ट अफसरशाही के हाथों उसने गंवा दिया गया. खाने-कमाने वाली राजनीति के खेल में नेता बेगुनाह नहीं थे. पदों की अंधी होड़ में उन्हें ऐसी कोई ट्रेनिंग ही नहीं दी जाती, जब उन्हें सिखाया जाए कि आम आदमी के हितों से जुड़े इस तरह के संवेदनशील मसलों पर वे किस तरीके से पेश आएं. ज्यादातर नेताओं के पास अपना कोई नजरिया ही नहीं है. वे इतने ईमानदार भी नहीं हैं कि अफसर डर से खुद बेईमानी न करें. यह विस्थापन इनके मकड़जाल में उलझी एक दर्दनाक कहानी है.

दिग्विजय सिंह ने दस साल एकछत्र राज किया था. पिछले 12 साल में भाजपा सरकार में तीन मुख्यमंत्री हुए. शिवराजसिंह चौहान को दस साल से ज्यादा हो गए. उन्हें तीन बार लगातार अच्छे-खासे बहुमत से चुना गया. हांलाकि किसी के भी राज में इस तरह कोई खास कदम नहीं उठाए गए. आप आज भी हरसूद, छनेरा, काला पाठा, चैनपुर और सतवास के पुनर्वास स्थलों पर जाकर देख सकते हैं कि इस सरकार को मिली ताकत यहां किसी के कुछ काम नहीं आई. मुझे अफसोस के साथ यह स्वीकार करना पड़ रहा है कि यह विस्थापन हमारे राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र की नाकामी की एक घृणित मिसाल है.

भ्रष्ट अफसरों के लिए यह इलाका एक टकसाल बन गया था. जांच एजेंसियों ने 13 अफसरों को रिश्वत लेते हुए पकड़ा था. वे उन चील-गिद्धों की तरह पेश आए जो अपने हिस्से का मांस नोचने के लिए जमीन पर पड़े मुर्दों के ऊपर मंडराते हैं. यहां डेढ़ लाख की बेदखल आबादी उनके लिए पौष्टिक आहार की तरह उपलब्ध थी. ढाई हजार से ज्यादा भुक्तभोगी खंडवा की अदालत में सालों तक चक्कर लगाते रहे. ऐसे कई परिवार हैं, जो बीते 11 सालों में तीन-तीन शहरों में बसने की नाकाम कोशिश में लगे रहे हैं. हरसूद के एक प्रतिष्ठित परिवार से आने वाले आरटीआई एक्टीविस्ट धर्मराज जैन ने आरटीआई के जरिए एक कामयाब लड़ाई लड़कर अपना हक हासिल तो कर लिया मगर इसमें एक पूरी पीढ़ी बर्बाद हो गई. दस साल में बांध से 2500 करोड़ रुपये की बिजली बनी. छह साल का मुनाफा ही करीब 1800 करोड़ रुपये का था. यह आंकड़ा इसलिए ध्यान देने योग्य है, क्योंकि यहां से बेदखल हुए लोगों को उनकी संपत्तियों का कुल मुआवजा मिला था सिर्फ 1170 करोड़ रुपये. इसमें हरसूद शहर का मुआवजा था मात्र 68 करोड़ रुपये!

नर्मदा बचाओ आंदोलन के सुविधाहीन और सक्रिय कार्यकर्ताओं ने इस अमानवीय और लोगों के दिलों पर गहरे जख्म छोड़कर गए विस्थापन को गुमनाम नहीं रहने दिया. बांध पूरा बनने के बावजूद 91 गांवों में भूअर्जन ही शुरू नहीं हुआ था. नर्मदा बचाओ आंदोलन ने हाईकोर्ट की शरण ली. बांध में पानी पूरा न भरने के लिए याचिका लगाई गई. विस्थापितों की बात सरकार ने नहीं, अदालत ने सुनी. चीफ जस्टिस रवींद्रन ने कहा कि सरकार को यह हक ही नहीं था कि वह इन गांवों के लोगों को जाने के लिए कहें. पूरे इलाके में ऐसी अनगिनत उलझनें थीं, जिनमें हजारों लोग फंसे हुए थे. हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित तीन याचिकाएं नर्मदा बचाओ आंदोलन की टीम को विस्थापन के दस साल बाद भी व्यस्त बनाए रहीं. जो कुछ भी ठीक हुआ वह आलोक अग्रवाल, शिल्वी, चितरूपा जैसे कार्यकर्ताओं के संघर्ष का नतीजा है, जिन्हें मध्य प्रदेश के व्यापमं ब्रांड सरकारी तंत्र ने हमेशा हतोत्साहित किया.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्होंने हरसूद विस्थापन का कवरेज करते हुए इसे करीब से देखा और इसे अपनी किताब ‘हरसूद 30 जून’ में संकलित किया है)

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किस हाल में ‘माई’ के लाल

Lalu Prasad yadav interacting with media. Photo/Prashant Ravi30 अगस्त को पटना के गांधी मैदान में स्वाभिमान रैली का आयोजन था. नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के मेल-मिलाप और सीटों को लेकर आपसी तालमेल के बाद पहला बड़ा साझा राजनीतिक आयोजन. नीतीश को एक बार फिर से मुख्यमंत्री बनाने के लिए मार्ग प्रशस्त करने के लिए दिल्ली से चलकर सोनिया गांधी भी पटना पहुंची थीं. लालू प्रसाद यादव और दूसरे कई बड़े नेता भी साथ थे. तपती दुपहरी के साथ गांधी मैदान लोगों से पटता जा रहा था. सड़कों पर चलने की जगह नहीं थी. कहीं नाच, कहीं बैंड बाजा, हर ओर लोगों का हुजूम. हर हाथ में झंडा, जुबां पर नारा.

आयोजन नीतीश को केंद्र में रखकर था, सो जाहिर-सी बात है कि नीतीश कुमार का पोस्टर-बैनर ज्यादा से ज्यादा लगा हुआ था. कांग्रेस को यह मौका अरसे बाद मिला था, या यूं कहिये कि करीब ढाई दशक पहले भागलपुर दंगे के बाद से बिहार में धीरे-धीरे खात्मे के राह पर अग्रसर होकर लगभग खत्म हो चुकी कांग्रेस के लिए यह सुनहरा मौका था, सो उसने भी कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी. कांग्रेसियों ने भी खूब झंडे, बैनर-पोस्टर लगाए थे. लेकिन इन सभी झंडे-बैनर-पोस्टर पर लालू यादव का बैनर-पोस्टर भारी पड़ रहा था. गांधी मैदान में और पटना की सड़कों पर भी. टमटम पर लालटेन रखकर पटना की सड़कों पर चल रहे राजद कार्यकर्ता आकर्षण का केंद्र थे. तो वर्षों बाद पटना के लोग सड़कों पर लौंडा नाच भी देख रहे थे.

सिर्फ रैली के दिन ही नहीं, उसके ठीक पहले 29 अगस्त की रात से ही पटना रैली के रंग में रंगा हुआ नजर आ रहा था. वर्षों बाद पटना के कई इलाके रात भर नाच-गाने और तरह-तरह के आयोजनों से गुलजार थे. इससे पहले यह सब तब होता था, जब लालू यादव अपने उफान के दिनों में रैलियां करवाया करते थे. स्वाभिमान रैली के बहाने लालू पुराने दिनों की ओर लौट रहे थे. सिर्फ तैयारियों के स्तर पर नहीं, बल्कि जब वे स्वाभिमान रैली को संबोधित करने आए तो वर्षों बाद अपने पुराने रंग में दिखे. लालू प्रसाद आखिरी वक्ता के तौर पर माइक के सामने आए थे. ऐसा क्यों हुआ कि सोनिया गांधी के रहते भी प्रमुख वक्ता के तौर पर लालू प्रसाद यादव आखिर में आए. नीतीश, जिनके नाम पर यह आयोजन था, वह भी क्यों पहले ही बोलकर निकल लिये, यह भी समझ में नहीं आया. शरद यादव, जो खुद को लालू का निर्माणकर्ता बताते नहीं अघाते, उन्हें तो काफी पहले ही बोलने का मौका देकर बिठा दिया गया था.

लालू जब बोलने लगे तब सबको समझ में आया कि क्यों इतने दिग्गजों के बीच में भी वह सबसे महत्वपूर्ण तरीके से पेश किए गए. लालू ने नरेंद्र मोदी और भाजपा को निशाना पर लेना शुरू किया. मोदी की नकल उतारकर मोदी के ही अंदाज में जवाब देने की कोशिश की. लालू ने एक प्रसंग के बहाने ऊंची जातियों पर निशाना साधा और जोर देकर कहा, ‘सब कान खोलकर सुन ले, यह 1990 के पहले वाला बिहार नहीं है.’ जाति आधारित जनगणना की बात कहकर उन्होंने अपना एजेंडा भी साफ कर दिया और ‘जंगलराज’ की बजाय अपने शासनकाल को ‘मंडलराज’ और आने वाले शासनकाल को ‘मंडलराज पार्ट टू’ की संज्ञा दी.

रैली के बहाने भारी भीड़ को देख गदगद लालू प्रसाद एक लय में बोलते रहे, उन्होंने लगे हाथ नीतीश कुमार को डरपोक बताते हुए इस बात का आश्वासन भी दिया कि नीतीश को मन में धुकधुकी रखने की जरूरत नहीं है, हम उन्हें ही सीएम बनाएंगे. ऐसा कहकर लालू प्रसाद सोनिया को भी बताना चाहते थे कि उन्होंने जिस लालू को अछूत मानकर दूरी बना ली हैं, वह अहम है और जिस नीतीश का साथ दे रही हैं, उसके पास लालू के रहमोकरम पर  आगे की राजनीति करने के अलावा कोई चारा नहीं है. वे भूल गए कि मंडल की राजनीति का सिर्फ यदुवंशियों से ही वास्ता नहीं होता, उसमें पिछड़े-दलित सब होते हैं और बिहार की राजनीति अब बदल चुकी है. पिछड़ों का भी विस्तार होकर ‘अतिपिछड़ा’ समूह बन चुका है और दलितों में ‘महादलित’ नाम का एक नया खेमा खोज लिया गया है.

लालू बार-बार बताते रहे कि भाजपा के लोग यदुवंशियों को भटकाना चाहते हैं, मगर उन्हें भटकना नहीं है. फिर उन्होंने कृष्ण का वंशज होने का वास्ता देकर यदुवंशियों को अपने साथ ही रहने की बात कही. कृष्ण से भी संतोष नहीं हुआ तो उन्होंने यदुवंशियों को समझाने के लिए भैंस का भी सहारा लिया और कहा, ‘जब जादव का बेटा को भैंस पटकिये नहीं पाता है तो नरेंद्र मोदी क्या पटकेगा, तैयार रहना है.’ लालू अपनी धुन में थे. शरद यादव और मुलायम सिंह यादव का न जाने कितनी बार उन्होंने नाम लिया. हर तरीके से लालू प्रसाद यदुवंशियों पर जी भरकर बोल चुके थे, लेकिन शायद इतने से उन्हें संतोष नहीं हुआ तो उन्होंने आखिरी में यदुवंशियांे को संबोधित करते हुए  सवाल पूछ ही लिया, ‘बताओ साथ दोगे न! दोगे या नहीं! अगर देना है तो खुलकर दो, नहीं देना है तो वह भी कह दो!’ लालू अपने भाषण में मजबूत बने रहे. वाहवाही बटोरते रहे. हर लाइन के बाद तालियों की गड़गड़ाहट होती रही लेकिन जैसे ही वह आखिरी वाक्य तेज आवाज में बोलना शुरू किया और जब यदुवंशियों को साथ देने का वास्ता देने लगे तो तालियों की गूंज कम हो चली थी. उस वक्त उनकी मजबूत आवाज में मजबूरी झलकने लगी थी. एक किस्म का डर. यह पहली बार हो रहा था कि लालू प्रसाद को अपने कोर वोट बैंक के सबसे बड़े समर्थक यादवों से सार्वजनिक तौर पर पूछना पड़ा कि साथ दोगे या नहीं! यह अकारण नहीं था. लालू प्रसाद के पहले स्वाभिमान रैली के बहाने असरे बाद मंच पर आईं उनकी पत्नी और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने भी अपने भाषण में यदुवंशियों की चिंता करते हुए पप्पू यादव पर निशाना साधा. पप्पू को कोसने के बहाने वह यदुवंशियों को एकजुट करने में ऊर्जा लगाते हुए दिखीं.

उधर, रैली के एक दिन पहले ही तारिक अनवर और एनसीपी जैसे जैसी पुरानी सहयोगी पार्टी को दरकिनार कर पांच सीटें समाजवादी पार्टी के हवाले करके लालू प्रसाद यादव मतदाताओं को अपनी ओर करने का इंतजाम कर चुके थे. स्वाभिमान रैली में नए नवेले समधी बने उत्तर प्रदेश के नेता व मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल सिंह यादव की प्रशंसा कर, बार-बार उनका नाम लेकर भी वह यादव खेमे में और यादवी राजनीति में अपने विस्तार का संकेत दे चुके थे.

बहरहाल स्वाभिमान रैली खत्म हुई और लालू प्रसाद ही उसके चैंपियन बने. नीतीश कुमार और सोनिया गांधी अहम होते हुए भी उतने चर्चित नहीं हो सके, वाहवाही नहीं बटोर सके, जो लालू प्रसाद के खाते में आया. इस वाहवाही में यह सवाल वहीं दबकर रह गया कि आखिर क्यों लालू प्रसाद को यदुवंशियों से भी साथ देने के लिए पूछना पड़ा?

स्वाभिमान रैली के दिन तो वह सवाल नहीं पूछा जा सका लेकिन उसके बाद बिहार के राजनीतिक गलियारे का एक अहम सवाल यही रहा? पूरे भाषण में लालू प्रसाद की यही लाइन ऐसी थी जिससे भाजपाई खेमे में खुशी की लहर दौड़ पड़ी थी. भाजपा इसलिए खुश हुई क्योंकि लालू प्रसाद ने पहली बार स्वीकार किया कि वे जितने मजबूत दिख रहे हैं, उतने ही मजबूर भी होते जा रहे हैं. यदुवंशी उनके हाथ से निकल रहे हैं. खुशी की दूसरी वजह यह रही कि लालू ने यदुवंशियों पर खुद को इतना ज्यादा केंद्रित किया कि भाजपा और राजग खेमे को इसी में संभावना के सूत्र दिखने लगे. भाजपा और राजग के नेता चाहते थे कि लालू प्रसाद खुलकर यादवों की राजनीति के पक्ष में आएं. वे पूरी ऊर्जा लगभग 15 प्रतिशत आबादी वाले यादव मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में लगाएं. अतिपिछड़ों, दलितों, महादलितों पर कम से कम बोलें. अगर लालू प्रसाद ऐसा करेंगे तो दूसरी ओर बैकफायर करने की गुंजाइश खुद बनेगी. यादव जितने एकजुट होंगे, दूसरी गैरयादव, पिछड़ी व दलित जातियां खुद-ब-खुद दूसरे छोर पर ध्रुवीकृत होंगी. ऐसा पहले भी बिहार की राजनीति में देखा और आजमाया जा चुका है. नीतीश कुमार यादवों को राजनीति में अलग कर ही, गैर यादव पिछड़ों व दलितों को एकजुट कर दस सालों तक सत्ता की सियासत के सफर में लंबी रेस का घाेड़ा साबित होने में सफल रहे हैं.

बहरहाल अब सवाल ये उठता है कि क्या वाकई लालू यादव का कोर वोट बैंक दरक रहा है? इसका जवाब इतना आसान नहीं लेकिन इतना कठिन भी नहीं. लालू प्रसाद को अपने कोर वोट बैंक की चिंता है तो यह बेवजह भी नहीं है. लालू के कोर वोट बैंक में यादव (वाई) और मुसलमान (एम) रहे हैं, जिसे बिहार में ‘माई (एमवाई)’ समीकरण कहा जाता रहा है. इन्हीं को साधकर लंबे समय तक वह बिहार में प्रभावी रहे हैं और इन्हीं के सहारे राबड़ी देवी से लेकर तमाम दूसरे प्रयोग भी करते रहे हैं. मधेपुरा व दानापुर जिसे अब पाटलीपुत्र संसदीय क्षेत्र कहा जाता है और छपरा, ये इलाके ऐसे रहे हैं, जहां से ‘माई’ के ये लाल खुद या अपने परिजनों को चुनाव लड़वाते रहे हैं लेकिन यादव बहुल होने के बावजूद एक-एक कर ये इलाके उनके हाथों से निकल चुके हैं. विधानसभा क्षेत्र में राघोपुर, सोनपुर जैसे इलाके का चयन लालू प्रसाद करते रहे हैं, जो यादव बहुल हैं लेकिन इन सीटों पर भी राबड़ी बुरी तरह हार चुकी हैं. यादव के गढ़ में लालू प्रसाद लगातार हारते रहे हैं तो उनकी चिंता वाजिब ही है.

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एक वजह यह भी है कि लालू प्रसाद अब आगे की सियासत खुद के बजाय अपने दोनों बेटों तेजप्रताप और तेजस्वी को राजनीति में जमाने के लिए कर रहे हैं. तेजप्रताप और तेजस्वी में वह तेज-ओज नहीं, जिसके सहारे वे लालू के स्वाभाविक उत्तराधिकारी बन सके. लालू प्रसाद जानते हैं कि वे अगर सक्रिय राजनीति के जमाने में अपने बेटों को स्थापित नहीं कर सके तो फिर आगे उनके बेटों का भी वही राजनीतिक हश्र होगा, जो बिहार के और दूसरे मुख्यमंत्रियों की संतानों का होता रहा है. अधिक से अधिक विधायक-सांसद बनकर राजनीतिक जीवन काटते रहे हैं. लालू अपने बेटों के लिए भी अपना कोर वोट बैंक को बचाए-बनाए रखना चाहते हैं लेकिन इस बार कोर वोट बैंक के दोनों ही समूह में उनके सामने बड़ी चुनौती है.

हाल के वर्षों में एक-एक कर सारे यादव नेता लालू को छोड़कर अलग खेमे में जा रहे थे, मुस्लिम वोटों में भी नीतीश कुमार के जरिये बिखराव हो चुका था. लेकिन इस बार नीतीश कुमार के साथ आने बाद मुसलमान मतों के बिखराव की नई चुनौती सामने आ गई है, जो एक तरीके से आगे के लिए खतरनाक भी है. यह लालू प्रसाद के लिए बड़ा खतरा है, नीतीश कुमार के लिए कम.नीतीश कुमार राजनीति में सत्ता की सियासत साधने के लिए इधर से उधर भटकने वाले नेता माने जाते रहे हैं लेकिन लालू प्रसाद के साथ स्थिति दूसरी है. वह सांप्रदायिकता विरोधी नेता माने जाते रहे हैं. अगर मुस्लिमों का वोट एक बार उनके आधार से खिसक गया तो फिर भावी राजनीति ही खतरे में पड़ जाएगी. और इस बार 16.5 प्रतिशत आबादी वाले मुस्लिम वोट पर सीधे तो नहीं लेकिन परोक्ष तौर दूसरे किस्म की चुनौतियां सामने आई हैं.

सीमांचल इलाके में तारिक अनवर अब लालू-नीतीश-कांग्रेस के गठबंधन के साथ नहीं. तारिक साॅफ्ट मुसलमान चेहरा माने जाते रहे हैं, उनका अपना आधार रहा है. धनबल के कारण चंपारण इलाके में साबिर अली एक अहम नेता रहे हैं. पहले वह नीतीश के साथ थे. बीच में भाजपा के साथ गए थे. विवाद हुआ था तो भाजपा का साथ छोड़ दिया. अब फिर भाजपा के साथ है. इन सबके बीच ओवैसी का बिहार में आगमन अलग कहानी लिखने की राह पर है. 25 सीटों पर लड़ने की घोषणा कर उन्होंने दूसरे दलों के लिए परेशानी खड़ी कर दी है. वे मुसलमानों का भी वोट एक हद तक काटेंगे लेकिन उससे ज्यादा हिंदुओं के ध्रुवीकरण में सहायक साबित हो सकते हैं. ये नई चुनौतियां हैं, जो मुसलमान वोटों को लेकर महागठबंधन के सामने हैं और उससे लालू प्रसाद का चिंतित होना स्वाभाविक है.

चुप-चुप क्यों हैं लालू

स्वाभिमान रैली में लालू ने जमकर बोला और जोरदार तरीके से अपने विरोधियों को ललकारा भी. इसके बावजूद पार्टी में इस बात की चर्चा है कि मोदी के लगातार उन पर हमला बोलने के बाद भी लालू शांत क्यों हैं. इतना ही नहीं गठबंधन के उनके सहयोगी नीतीश कुमार भी उनका पक्ष न लेते हुए सिर्फ अपने प्रचार-प्रसार में लगे हुए हैं. इससे राजद कार्यकर्ताओं में गुस्सा भी नजर आ रहा है.

जुलाई महीने में जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पटना में आकर सरकारी योजनाओं का शिलान्यास करने के बाद मुजफ्फरपुर में पहली बार चुनावी शंखनाद करने वाले थे, उसी शाम की बात है. पटना के विधायक आवास वाली चाय की दुकान पर लगने वाली चौपाल में कई राजद कार्यकर्ता उत्तेजना में थे. बोलेरो-स्कॉर्पियो से चलने वाले छिटपुटिया नेता भी. सब चिट्ठी तैयार कर रहे थे. लालू प्रसाद यादव के नाम. चिट्ठी में कुछ यूं लिखा था, ‘माननीय अध्यक्ष श्री लालू प्रसाद यादवजी, आप कब तक चुप रहेंगे! आप क्यों नहीं कुछ बोल रहे. नीतीश कुमार जान-बूझकर भाजपा के सामने आपको गाली खाने के लिए परोस रहे हैं और खुद की छवि बड़े-बड़े होर्डिंग-पोस्टर में और गीतों में चमका रहे हैं लेकिन आपके साथ कहीं फोटो तक नहीं लगा रहे. खुद के डीएनए को बिहार का डीएनए बताने में ऊर्जा लगाए हुए हैं लेकिन उनके इशारे पर भाजपा वाले आपको गाली दे रहे हैं, आपको जंगलराज का पर्याय बता रहे  हैं, तब भी वे आपके पक्ष में एक लाइन तक नहीं बोल रहे, सिर्फ अपना दामन बचाने में लगे हुए हैं.’

ऐसी ही कई बातों को मिलाकर चिट्ठी तैयार हुई. तय हुआ कि लालू प्रसाद यादव के यहां जाकर इसे देना है. उनसे सामूहिक तौर पर आग्रह करना है कि वे अपना मुंह खोलेें, कुछ बोलें. लेकिन यह होने से पहले ही वहां एक सीनियर टाइप बुजुर्गवार नेता ने सबको गणित समझाया कि नीतीश कुमार को करने दो, जो कर रहे हैं. भाजपा को देने दो गालियां, जितना जी में आए, चुनाव हमारे नेता लालू प्रसाद यादव के इर्द-गिर्द ही होना है और नीतीश को हमारे पीछे चलना होगा, अभी भले ही आगे-आगे फुदक रहे हों. बुजुर्गवार नेता ने बहुत ही तसल्ली और कायदे से समझाया कि भाजपा जितना ज्यादा लालू प्रसाद को निशाने पर लेगी, हमें फायदा होगा. लोकसभा चुनाव में जो कोर मतदाता इधर-उधर बिखर गए थे, वे भी साथ में जुट जाएंगे. और नीतीश कुमार को तो इसलिए पीछे आना होगा कि वे बिना लालू प्रसाद यादव कर क्या सकते हैं इस बार के बिहार चुनाव में? सांप्रदायिकता पर खुलकर बोल नहीं पाएंगे, क्योंकि ऐसा बोलेंगे तो भाजपा वाले नोच लेंगे उन्हें कि सांप्रदायिक थे तो 17 साल से साथ क्यों थे? तब सांप्रदायिक नहीं थे, जब केंद्र से लेकर बिहार में सत्ता की मलाई काट रहे थे! नीतीश कुमार जातीय समीकरणों पर खुलकर बोल ही नहीं पाएंगे, क्योंकि उन्हें वह सूट नहीं करेगा. वे खुद को सुशासन और विकास पुरुष के दायरे में ही रखेंगे और इससे उन्हें वोट मिलने वाला नहीं. तो इसके लिए भी उन्हें लालू प्रसाद यादव के पीछे चलना होगा.

ऐसी ही कई बातों को बुजुर्ग नेताजी ने समझाया और जो चिट्ठी लिखी गई थी, उसे वहीं रोक लिया गया. उस दिन लालू प्रसाद के समर्थकों में गुस्सा इसलिए था, क्योंकि पटना के वेटनरी कॉलेज में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बोलने के पहले नीतीश कुमार ने उस रोज कहा था, ‘जिस रेलपथ पर प्रधानमंत्री आज हरी झंडी दिखाकर परिचालन कर-करवा रहे हैं, उस पर अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने में ही परिचालन हो गया होता, अगर उनकी सरकार छह माह और रह गई होती. नीतीश कुमार ने लगे हाथ यह भी कहा कि यह उसी समय की परियोजना है, जिस समय अटलजी की सरकार में वे रेल मंत्री थे लेकिन यह बीच में लटका ही रह गया. उसके बाद सबने देखा-सुना था कि पटना के वेटनरी कॉलेज में किस तरह नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार की बातों के एक छोर को पकड़कर फिर लालू प्रसाद को निशाने पर ले लिया था.’

वहीं नरेंद्र मोदी ने कहा था, ‘नीतीश जी ठीक कह रहे हैं. यह रेल परियोजना तब ही चालू हो गई होती लेकिन बाद में जो बिहार से ही रेल मंत्री बने, उन्हें अपने राज्य में रेल का विकास याद ही नहीं रहा, वे राजनीति में उलझे रहे.’ और भी तरीके से नरेंद्र मोदी लालू प्रसाद को निशाने पर लेते रहे. नीतीश कुमार वहीं बैठकर चुपचाप सुनते रहे. सुनने के अलावा कोई चारा भी नहीं था, क्योंकि यह बोलने का अवसर नीतीश कुमार ने ही दिया था. बात वहीं खत्म नहीं हुई. उसके बाद नरेंद्र मोदी ने मुजफ्फरपुर में जाकर नीतीश कुमार के डीएनए की बात हवा में उछाली, साथ ही लालू प्रसाद यादव की पार्टी को रोज जंगलराज का डर वाला नाम दिया. इसके बाद शाम को पटना में नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी के सवालों का जवाब देना शुरू किया. डीएनए वाले मसले को  लेकर सेंटी-सेंटी बयान दिए, ललकार लगाए लेकिन लालू प्रसाद यादव को जितने तरीके से निशाने पर नरेंद्र मोदी ने लिया, उस पर उन्होंने कुछ नहीं कहा. एक बार भी नहीं. राजद कार्यकर्ताओं व नेताओं के गुस्से की वजह यही थी. अखरन और गुस्सा होना स्वाभाविक भी था, क्योंकि उस दिन यह पहली बार नहीं हुआ था, बल्कि नीतीश कुमार से गठबंधन होने के बावजूद जिस तरह से नीतीश कुमार लालू प्रसाद यादव और उनकी पार्टी से अलगाव-दूराव का भाव बनाते रहे हैं, उससे इस किस्म का गुस्सा उपजना स्वाभाविक भी है.

नीतीश कुमार ने जितने चुनावी अभियान चलाए, वे उनके लिए या जदयू के लिए ही रहे. इतना ही नहीं, नीतीश कुमार ने राजद द्वारा गठबंधन के नेता व सीएम पद के लिए उम्मीदवार के तौर पर खुद का नाम घोषित होने के पहले ही, खुद के पोस्टरों से पटना को पाट दिया था और उस वक्त जब नीतीश से यह पूछा गया था कि अभी लालू प्रसाद यादव ने आपको नेता घोषित भी नहीं किया है तो खुद को कैसे मुख्यमंत्री के तौर पर घोषित कर दिया? इस पर उनका जवाब था कि जो भी पोस्टर-होर्डिंग लगे हैं, वह किसी ने लगा दिए हैं, इससे उनका कोई लेना-देना नहीं लेकिन बाद में लोगों ने जाना कि वे होर्डिंग व पोस्टर खुद नीतीश कुमार की सहमति से उनके सलाहकार प्रशांत किशोर ने लगवाया था. वही पोस्टर अब पटना समेत पूरे राज्य में सबसे ज्यादा चमक रहे हैं. बीच में ऐसी कई बातें होती रहीं, जिस वजह से राजद कार्यकर्ताओं का गुस्सा नीतीश कुमार पर लगातार बढ़ता रहा और उस शाम चौपाल में चिट्ठी लिखकर लालू प्रसाद यादव को देने और नीतीश से कुट्टी कर लेने का दबाव बनाने की कोशिश करना, उसी गुस्से का सम्मिलित प्रस्फुटन था.

सवाल यह है कि बिहार की राजनीति के रग-रग से वाकिफ और नीतीश की राजनीति को भी सबसे बेहतर तरीके से समझने वाले लालू प्रसाद यादव क्या इन बातों को नहीं जानते, जो उनके कार्यकर्ता-नेता जानते हैं और जिन वजहों से गुस्से में रहते हैं? अगर जानते हैं तो फिर क्यों लालू प्रसाद यादव जानकर भी इससे मुंह मोड़े हुए हैं और इस विषय पर एक बार भी कुछ नहीं बोलना चाहते!

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इसका जवाब बहुत साफ है. उस जवाब की बहुत हद तक झलकियां चायवाली उस चौपाल में उस बुजुर्गवार नेता ने दे दी थीं, लेकिन मामला सिर्फ उतना भर ही नहीं है. लालू प्रसाद यादव जानते हैं कि वे खुद राजनीतिक जीवन में मुश्किलों और चुनौतियों से तो घिरे हुए ही हैं लेकिन नीतीश उनसे ज्यादा बेबस और लाचार हैं इसलिए नीतीश चाहे जितनी बातें कर लें, आखिर में नीतीश उस मुहाने पर खड़े हो चुके हैं, जिस मुहाने से मंजिल की ओर जाने के लिए सिर्फ और सिर्फ लालू प्रसाद यादव का साथ लेना और एक समय-सीमा के बाद उनकी शर्तों को मानना उनकी मजबूरी होगी. इसका एहसास भी लालू प्रसाद यादव ने स्वाभिमान रैली में करवाया. वे न सिर्फ स्टार वक्ता के तौर पर आखिर में मंच पर उतरे बल्कि उन्होंने सबके सामने कहा कि नीतीश अगर मुख्यमंत्री बनेंगे तो उनकी ही मेहरबानी से. ये कहकर वह अपने कोर मतदाताओं को निश्चिंत करवाना चाहते थे कि वे किंगमेकर रहेंगे. लेकिन लालू प्रसाद को इस बात का अहसास है िक इस बार की बिहार की लड़ाई उनके लिए भावी पीढ़ी की राजनीति के वजूद को बनाए और बचाए रखने की लड़ाई है. वे जानते हैं कि वे खुद इस बार के चुनाव मैदान में तो नहीं ही होंगे और यह कोई नई बात नहीं होगी लेकिन वे बहुत खुलकर राजनीति भी नहीं कर पाएंगे, क्योंकि कोर्ट-कचहरी का पहरा उन पर रहेगा और खुलकर राजनीति करने पर उनकी जमानत रद्द हो सकती है, जिसकी धमकी भाजपा नेता सुशील मोदी दे चुके हैं.

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लालू प्रसाद जानते हैं कि बीते लोकसभा चुनाव में उनके कोर मतदाताओं के समूह में से एक यादवों में भी भाजपा ने सेंधमारी कर दी है. यादवों के बिखराव को अगर वे इस बार नहीं रोक पाए या अपनी ओर नहीं समेट पाए तो अपने दोनों बेटों तेजस्वी और तेजप्रताप को ऐसी विरासत सौंपेंगे, जिसमें मुश्किलें ही मुश्किलें होंगी और संभावनाओं के सारे द्वार बंद रहेंगे. लालू प्रसाद यह भी जानते हैं कि बिहार में यादवों के पांच गढ़ मधेपुरा, दानापुर, छपरा और राघोपुर-सोनपुर जैसे इलाकों में वे और उनके परिवार के लोग बुरी तरह से हार का सामना कर चुके हैं, इन क्षेत्रों में उनका किला दरक चुका है. वह यह भी जानते हैं कि वे लाख कोशिशों के बावजूद राबड़ी देवी और मिसा को खड़ा नहीं कर सके तो इस बार की जरा-सी चूक तेजस्वी और तेजप्रताप को भी हाशिये पर धकेल देगी. नीतीश कुमार आनेवाले कल में अपनी सत्ता बचाने के लिए किसी ओर भी जा सकते हैं, इसका भी लालू का आभास है. किसी ओर का मतलब भाजपा से भी हाथ मिला सकते हैं लेकिन ऐसा करने के लिए लालू प्रसाद यादव के पास विकल्प कम होंगे. इसलिए लालू प्रसाद सब कुछ देख-सुन-समझकर भी नीतीश द्वारा लालू से अलगाव-दुराव का भाव दिखाते हुए सिर्फ खुद को ही स्थापित करने की प्रक्रिया में लगे रहने के बावजूद चुप्पी साधे रहे. इस सब के बाद लालू प्रसाद यह भी जानते हैं कि आज चाहें नीतीश कुमार जितनी भी पैंतरेबाजी कर लें, खुद को स्थापित करने की कोशिश कर लें लेकिन अगर चुनाव बाद उनकी पार्टी राजद जदयू के मुकाबले जरा भी मजबूत स्थिति में आती है तो फिर नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के सारे सपने को भी वे ध्वस्त कर देंगे. एकबारगी स्थिति ऐसी बनेगी कि नीतीश कुमार को एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई में से एक को चुनना होगा. लालू प्रसाद इस चुनाव में जितनी लड़ाई भाजपा या एनडीए से लड़ रहे हैं, उतनी ही बड़ी लड़ाई अपने संगी-साथी नीतीश कुमार से भी लड़ रहे हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि भाजपा से लड़ने में तो वे पहले भी सक्षम रहे हैं और आगे भी रह सकते हैं लेकिन उनकी बुनियाद को नीतीश कुमार ने ही कमजोर किया है और उन्हें राजनीति में इस स्थिति में पहुंचाया है कि उनके नाम की चर्चा के साथ कुविकास, जंगलराज से लेकर तमाम किस्म के विशेषण जरूर लगाए जाते हैं. नीतीश कुमार ने अपनी पूरी राजनीति लालू को ही दुश्मन बनाकर खेली और लालू प्रसाद के कारण ही वे सुशासन से लेकर विकास पुरुष तक के प्रतीक बने. नीतीश ने ही पिछड़ी राजनीति में गैर यादव जातियों को गोलबंद कर एक नया समीकरण बनाया और सुरक्षित राजनीतिक भविष्य के लिए पिछड़ो में भी ‘अतिपिछड़ों’ का बंटवारा कर लालू प्रसाद की बची-खुची संभावनाओं पर प्रहार किया था. नीतीश कुमार ने ही दलितों को ‘महादलित’ जैसे फ्रेम में बांधकर लालू प्रसाद के एक और बड़े कोर समूह को विखंडित किया और मुस्लिमों में भी ‘असराफ मुसलमान’ बनाम ‘पसमांदा मुसलमान’ की राजनीति कर उसमें बिखराव के बीज डाले. लालू प्रसाद यह सब जानते हैं और जानते हैं कि अगर भविष्य में उन्हें अपनी भावी पीढ़ी की राजनीति को बचाए रखना है तो नीतीश की राजनीतिक धारा को भी उतना ही कमजोर करना होगा, जितना की भाजपा की धारा को. यह सब और इस बार के चुनाव में खुद के महत्व को जानते हुए भी लालू प्रसाद इसलिए नीतीश कुमार के साथ बने हुए हैं, बने रहेंगे, क्योंकि हाल और हालात उनके अनुकूल नहीं हैं.

बेशक लगातार राजनीतिक तौर पर नीतीश की वजह से कमजोर होने, भाजपा की वजह से यादव वोटों में सेंधमारी होने, कांग्रेस द्वारा लगातार तिरस्कृत होने, तमाम तिकड़म-समझौते करने और राजनीतिक-रणनीतिक ताकत लगाने के बावजूद यादवों के गढ़ पाटलीपुत्र और छपरा में मिसा और राबड़ी की हार और विरासत के लिए घर के अंदरूनी कलह से लेकर बाहरी तौर पर पप्पू यादव द्वारा खुलेआम चुनौती मिलने के बाद लालू प्रसाद के सामने मुश्किलों का पहाड़ है. लेकिन अतीत के आंकड़े और वर्तमान में उपजी राजनीतिक स्थितियों ने उन्हें उस मजबूत स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से लालू प्रसाद के पास खोने के लिए छोटा-सा दायरा है लेकिन पाने के लिए फिर से जीवित होकर बिहार में सदाबहार बड़ी ताकत बनने की संभावना भी.

अतीत के आंकड़े बताते हैं तमाम विपरीत परिस्थितियों, लोकप्रियता घटने, भाजपा-जदयू जैसी पार्टियों के साथ रहने के बावजूद, अपने सबसे बुरे दौर में भी वोट प्रतिशत के मामले में लालू बड़ी ताकत बने रहे हैं. 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद को 30.67 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे, जो किसी भी पार्टी से ज्यादा थे. 2009 के लोकसभा चुनाव में राजद को 19.31 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे, 2014 के लोकसभा चुनाव में राजद को 20.1 प्रतिशत वोट मिले, जो नीतीश को मिले वोट से करीब पांच प्रतिशत ज्यादा थे. इसी तरह 2005 में अक्टूबर में हुए विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव की पार्टी को 23.45 प्रतिशत वोट मिले थे, जो किसी भी पार्टी से ज्यादा थे. इसी तरह 2010 के चुनाव में राजद को 18.84 प्रतिशत वोट मिले थे, जो भाजपा से करीब दो प्रतिशत ज्यादा था. ऐसे ही कई और आकंड़े लालू प्रसाद को भविष्य में भी मजबूत बने रहने के संकेत देते हैं. व्यक्तिगत तौर पर भी लालू प्रसाद के वोट का दायरा नीतीश की तुलना में ज्यादा माना जाता है. नीतीश कुमार  ने अपनी राजनीतिक पारी में दोनों ही बार बिना किसी सहारे के अपने दम पर चुनाव लड़ने की कोशिश की है और दोनों में ही वह एक फिसड्डी नेता साबित हुए हैं.

भाजपा से जुड़ाव से पहले 90 के दशक में जब नीतीश कुमार ने अकेले अपने दम पर समता पार्टी बनाकर विधानसभा चुनाव लड़ा, तो सात सीट पर उनकी पार्टी सिमट गई थी, जबकि उस वक्त झारखंड भी बिहार का हिस्सा हुआ करता था और वर्तमान से 81 सीटें ज्यादा हुआ करती थीं. बाद में 2014 के लोकसभा चुनाव अकेले लड़े तो दो सीटों पर सिमट गए. ऐसे में लालू प्रसाद उन पर भारी पड़ते हैं.

अतीत की बातों को छोड़ दें तो भी लालू प्रसाद के पास वर्तमान में भी कई ऐसी संभावनाएं हैं, जिसके जरिये वे इस बार के बिहार चुनाव में केंद्र बने रहेंगे. नीतीश कुमार डीएनए और बिहारी अस्मिता जैसे मामले को उछालकर बिहार के वोटरों को गोलबंद करने में लगे हुए हैं. बिहारी अस्मिता एक ऐसा मामला रहा है, जिसे नीतीश कुमार पिछले दस सालों से चलाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन वह कभी परवान नहीं चढ़ सका है. दूसरी ओर लालू प्रसाद यादव ने सीधे-सीधे मंडल पार्ट-2 का बिगुल बजा दिया है. लालू ने सीधे-सीधे जातिगत व सामाजिक न्याय की राजनीति का एलान किया है. जातीय जनगणना को सार्वजनिक करने की मांग को लेकर वे धरना से लेकर रोड मार्च तक कर चुके हैं. लालू प्रसाद ने इस बार के चुनाव में अपना एजेंडा साफ कर दिया है िक वे पुराने समीकरणों की वापसी चाहेंगे. वे अपने वोटों के बिखराव को रोकने के लिए मंडल, सामाजिक न्याय के बहाने जातिगत ध्रुवीकरण चाहेंगे. इसके लिए वे सवर्णों का खुलेआम विरोध करेंगे.

लालू प्रसाद जानते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में सवर्णों से बार-बार माफी मांगने, सवर्णों के मठों में रात-रात भर घूमकर चंदा देने, अच्छी-अच्छी बातें बोलने के बावजूद सवर्णों ने उनका साथ नहीं दिया था तो इस बार के विधानसभा चुनाव में उसकी संभावना तो और दूर-दूर तक नहीं. इसलिए वे ऐसा करेंगे और यह उन्हें फायदा भी पहुंचाएगा. हालांकि नीतीश इससे खुद की छवि को ध्यान में रखते हुए अनकंफर्ट महसूस करेंगे लेकिन उनके पास दूसरा रास्ता नहीं होगा. लालू प्रसाद अपनी ताकत जानकर ही नीतीश कुमार से साफ कर चुके हैं कि उन्हें बराबरी का सीट चाहिए. नीतीश 2010 के विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के लिए अर्जित सीट का वास्ता देकर लालू प्रसाद को कम सीटों पर सिमटाना चाहते थे लेकिन लालू प्रसाद ने पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में नीतीश की स्थिति की याद दिलाकर उन्हें बैकफुट पर जाने को मजबूर किया. लालू प्रसाद आगे की राजनीति भी जानते हैं कि अगर सीटों के बराबर बंटवारे में उन्हें नीतीश से ज्यादा सीटें मिल गईं तो फिर वे बिहार की राजनीति का मुहावरा भी बदलने की कोशिश करेंगे और नीतीश कुमार के संगी-साथी यह जानते हैं कि लालू प्रसाद के मजबूत होने के बाद भाजपा से ज्यादा मुश्किलें नीतीश कुमार के लिए ही आने वाली हैं.

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लेकिन इतनी संभावनाओं के बावजूद, मजबूरी में ही मजबूती की संभावना बनने के बावजूद लालू प्रसाद के पास जो छोटी-छोटी चुनौतियां हैं, उससे ही पहले पार पाना होगा. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘चुनौतियां और संभावनाएं तो राजनीति में आती-जाती रहती हैं लेकिन यह सच है कि लालू प्रसाद और नीतीश कुमार का समर्थक समूह अथवा वोट बैंक ऐतिहासिक बिखराव की ओर है. न तो यह गोलबंदी एक दिन में हुई थी, न बिखराव की स्थिति एक दिन में आई है. एक लंबी प्रक्रिया के बाद बिखराव की स्थिति बनी है और ऐसे में लालू प्रसाद को सिर्फ अपने बिखराव पर ही पूरी ऊर्जा लगानी होगी. वे नया कुछ हासिल  नहीं कर पाएंगे लेकिन वे बिखराव को जितना ज्यादा रोक पाएंगे, उतना ही सफल होंगे.’

नीतीश-लालू दोनों के साथ लंबी राजनीतिक पारी खेल चुके बिहार के चर्चित नेता और पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी कहते हैं, ‘लालू प्रसाद की भूमिका सामाजिक न्याय की राजनीति में नीतीश कुमार की तुलना में सदा ही ज्यादा रही है. लालू प्रसाद इस बार नीतीश के लिए खेवनहार बन सकते हैं, उसकी संभावना कम है. ज्यादातर चुनौतियां लालू प्रसाद के लिए हैं. उनके लिए चुनौती अपनी जाति की राजनीति में भी है.’

बेशक आज लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव जैसे तीन प्रमुख यादव नेता एक साथ, एक छोर पर हैं और यह परिघटना वर्षों बाद हुई है लेकिन बिहार में शरद यादव और मुलायम सिंह यादव की ज्यादा चलती नहीं है. बिहार में कई दूसरे ताकतवर यादव नेता आज लालू प्रसाद से दूसरे छोर पर हैं. नंदकिशोर यादव पहले से ही भाजपा में हैं और प्रमुख नेता रहे हैं. अब लालू के अहम संगी साथी और उनकी बेटी मिसा भारती को हराकर संसद पहुंचे रामकृपाल यादव भी भाजपा के साथ हैं. भोजपुर के इलाके में एक छोटे दायरे में ही पकड़ रखने वाले ददन पहलवान दूसरी ओर हैं. लालू प्रसाद के चर्चित साले साधु यादव भी अपनी पार्टी बनाकर अलग ताल ठोंक रहे हैं. इन सबके बाद पप्पू यादव भी अब लालू प्रसाद के साथ नहीं हैं, जिनकी कोसी इलाके में पकड़ मानी जाती है और भाजपा की आंधी में भी लोकसभा चुनाव में अगर कोसी के इलाके में भाजपा का प्रभाव नहीं जम सका था तो उसमें पप्पू यादव की ही भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई थी. पप्पू यादव कहते हैं, ‘व्यक्तिगत तौर पर लालू प्रसाद मेरे लिए आदरणीय हैं लेकिन वे जिस तरह की राजनीति करना चाहते हैं, हम उसके विरोध में खडे़ हुए हैं.’ लालू प्रसाद कहते थे, ‘रानी के पेट से नहीं मेहतरानी के पेट से भी राजा जनमेगा’, तो फिर क्यों वे अपने ही परिवार के बाहर नहीं सोच पा रहे. पहले राबड़ी देवी को लाए. बाद में बेटी को लाना चाहा. अब बेटों को आगे करना चाह रहे हैं. वे क्यों यादवों को अपनी जागिर समझ रहे हैं. पप्पू कहते हैं, ‘जिस नीतीश कुमार की वजह से यादव जंगलराजी जाति बने, उसी नीतीश कुमार के साथ मिलकर लालू प्रसाद कौन-सी राजनीति करना चाहते हैं, यह साफ नहीं है.’ हालांकि पप्पू यादव अपनी राजनीतिक भाषा बोल रहे हैं. वे लालू प्रसाद से अलग हुए हैं तो विरोध में बोलेंगे ही, लेकिन उन्होंने एक मसला उठाकर लालू को परेशानी में डाल दिया था. पप्पू ने कहा था कि अगर विरासत परिवार को ही सौंपनी है तो मिसा को क्यों नहीं? बेटों को क्यों? यह लालू प्रसाद के सामने एक ऐसा सवाल था, जिसका जवाब देना उनके लिए आसान नहीं था. हालांकि लालू प्रसाद ने पप्पू को जवाब दिया और कहा कि उनके बेटे ही उनकी विरासत को संभालेंगे.

लालू प्रसाद ने भले ही यह कह दिया हो कि उनके बेटे ही उनकी विरासत को संभालेंगे लेकिन सूत्र बताते हैं कि इसे लेकर परिवार में भी कोई कम कलह नहीं है. उनकी बेटी मिसा भारती, जो पिछले लोकसभा चुनाव में जोरशोर से दानापुर से मैदान में उतरी थी और जिनकी जीत सुनिश्चित कराने के लिए लालू प्रसाद यादव ने दानापुर क्षेत्र के दबंग और जेल में बंद रितलाल यादव तक से समझौते किये थे, वह मिसा चुनाव नहीं जीत सकी थीं. मिसा भले चुनाव नहीं जीत सकी थी लेकिन लोगों ने यह माना था कि लालू की उत्तराधिकारी उनके परिवार में वही हो सकती हैं, क्योंकि वह क्षेत्र में जिस अंदाज में प्रचार कर रही थीं, उससे उनमें बहुत संभावना दिखी थी. लेकिन लोकसभा चुनाव हारने के बाद मिसा दरकिनार कर दी गई हैं. राबड़ी देवी पोस्टरों पर चमक रही हैं लेकिन वह चुनाव नहीं लड़ेंगी, ऐसा ऐलान हो चुका है. लालू प्रसाद के दोनों बेटे चुनाव मैदान में उतरेंगे, इसका एेलान भी हो चुका है लेकिन उनके उतरने पर क्या होने वाला है, इसके संकेत भी मिल चुके हैं.

बहरहाल, महुआ विधानसभा क्षेत्र में जैसे ही लालू प्रसाद के बेटे ने अपने को वहां का प्रत्याशी घोषित किया, सबके सामने ही राजद कार्यकर्ता आपस में सिरफुटव्वल और गालीगलौज कर दिखा चुके हैं कि लालू अपने परिवार को इतनी आसानी से अब थोप नहीं सकते. महुआ में लालू प्रसाद के सामने ही कार्यकर्ताओं की लड़ाई होती रही और वह कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं रह गए थे. बस तमाशबीन भर बने हुए थे. लालू प्रसाद के लोग जानते हैं कि मिसा को एक झटके में दरकिनार कर, दोनों बेटों को दो सीटों से लड़वाकर लालू प्रसाद अपने परिवार की राजनीति को अगर शांत भी कर लेते हैं तो टिकट बंटवारे के समय ऐसे कई ‘महुआकांड’ उन्हें झेलने पड़ सकते हैं और राजद में होने वाली बगावत का असर उनकी पूरी रणनीति पर पड़ेगा. पप्पू यादव का समर्थन कर भाजपा इसलिए ही आगे बढ़ा रही है कि लालू प्रसाद के जो बगावती होंगे, उन्हें वे अपनी पार्टी में लेकर मजबूती से चुनाव में उतार देंं, ताकि वोटों का बंटवारा हो और लालू प्रसाद का कुनबा बिखर सके. भाजपा के लिए नीतीश नहीं लालू ही चुनौती हैं, इसलिए भाजपा नीतीश से ज्यादा लालू पर ही वाक प्रहार कर रही है और पूरे चुनाव में करती भी रहेगी.