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मुजफ्फरनगर दंगा : सपा-भाजपा दोषी!

2013 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुए दंगों की जांच के लिए बने आयोग के अध्यक्ष जस्टिस विष्णु सहाय ने दंगों की रिपोर्ट उत्तर प्रदेश के राज्यपाल को हाल ही में सौंप दी. जांच रिपोर्ट को सार्वजानिक तो नहीं किया गया है पर सूत्रों की मानें तो रिपोर्ट में सपा और भाजपा के नेताओं को दंगों के लिए जिम्मेदार बताया गया है, साथ ही कुछ नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं.

गौरतलब है कि अगस्त 2013 में एक लड़की से छेड़छाड़ के बाद एक मुस्लिम युवक की हत्या से भड़की हिंसा ने सांप्रदायिक दंगों का रूप ले लिया और दंगों की आंच आसपास के इलाकों में भी पहुंच गई थी. दंगों में 60 से ज्यादा जानें गईं और 50,000 से ज्यादा लोग बेघर हुए. दो साल में तैयार 775 पृष्ठों की जांच रिपोर्ट में 478 लोगों के बयान दर्ज किए गए हैं, जिसमें 101 बयान अधिकारियों और बाकी 377 जनता केे हैं.

रिपोर्ट में सपा और भाजपा के नामों का कयास लगते ही राजनीति शुरू हो गई है. जहां भाजपा के लोग इसे ‘राजनीतिक उद्देश्यों’ से प्रेरित बता रहे हैं, वहीं कांग्रेस प्रवक्ता वीरेंद्र मदान का कहना है, ‘उस समय लोकसभा चुनाव कुछ ही समय दूर थे इसीलिए भाजपा में ये दंगे करवाए. सत्ता में होते हुए भी सपा ने इस पर कोई कदम नहीं उठाया. दंगों में इन दोनों दलों की भूमिका थी.’ इस बीच भाजपा सांसद संगीत सोम, जिन पर इन दंगों को भड़काने के आरोप हैं, का कहना है, ‘हमें इस जांच का हिस्सा नहीं बनाया गया है, ये रिपोर्ट पूरी तरह से एकपक्षीय है.’

नेपाल में संविधान पर विवाद

साभार : Conciliation Resources

 

साभार : Conciliation Resources
साभार : Conciliation Resources

क्या है मामला?

लगभग सात वर्षों के संघर्ष के बाद नेपाल में बीते 20 सितंबर को संविधान लागू हुआ. संविधान लागू होने के बाद नेपाल हिंदू राष्ट्र से एक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की श्रेणी में आ गया है. संविधान में नेपाल को सात प्रांतों में बांटा गया है पर इनके नाम और सीमाओं का अभी निर्धारण नहीं हुआ है. राजशाही से चल रहे नेपाल के नए संविधान का मूल सिद्धांत संघवाद होगा यानी सत्ता को विकेंद्रित किया जाएगा. केंद्र में संघीय सरकार होगी जबकि राज्यों में राज्य की, साथ ही जिले और ग्राम स्तर पर भी शासन व्यवस्था बनाई जाएगी. 601 सदस्यों वाली संविधान सभा में 507 लोगों ने संविधान के पक्ष में वोट दिया जबकि मधेसी और अन्य जनजातियों के 69 प्रतिनिधियों में इसका बहिष्कार किया.

क्याें है विवाद?

नेपाल के मधेसी, थारू और कुछ और गुट इस संविधान के विरोध में है. लगभग महीने भर तक हुए इस विरोध के चलते हुई हिंसा में तकरीबन 40 लोगों की जान गई है. मधेसी भारत से जुड़े तराई इलाके में रहने वाले भारतीय मूल के लोग हैं, जो नेपाल में नए संविधान में देश में बने सात प्रांतों के गठन का विरोध कर रहे हैं. उनका ये भी कहना है कि संविधान में मधेसियों और कुछ अन्य जनजातियों और वर्गों को उचित स्थान और अधिकार नहीं दिए गए हैं. कुछ गुटों का विरोध नेपाल को हिंदू राष्ट्र न बनाने से भी है.

क्या कहना है भारत का?

यूं तो भारत नेपाल के संविधान पर अपनी खुशी जाहिर कर चुका है पर मीडिया में आ रही खबरों की मानें तो भारत मधेसियों की संविधान में हुई अवहेलना से नाखुश है और विदेश मंत्रालय द्वारा मधेसियों के पक्ष में किए गए कुछ संशोधनों की एक सूची भारतीय राजदूत के जरिये काठमांडू भिजवाई गई है. हालांकि विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरुप ने ऐसी किसी सूची को भेजने की खबर का खंडन किया है. दूसरी और नेपाली संविधान में भारत के भेजे गए संशोधनों पर भारत में नेपाल के राजदूत दीप कुमार उपाध्याय का कहना है, ‘नेपाली संविधान दक्षिण एशिया का सबसे प्रगतिशील संविधान है और दोनों देशों के लिए संविधान में संशोधन को लेकर चर्चा करने के लिए ये सही समय नहीं है. यदि भारत के आग्रह पहले पता होते तो कुछ किया जा सकता था.’

बीसीसीआई : खेल में फेल

former International Cricket Council chief Jagmohan Dalmiya,  Photo by Tehelkaभारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) धीरे-धीरे क्रिकेट के बजाय गड़बड़ियों और अव्यवस्थाओं का बोर्ड बनता जा रहा है. कारण स्वाभाविक हैं. क्रिकेट के मामलों में अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने का कोई भी मौका मुश्किल से ही छोड़ने वाला बीसीसीआई अपनी संस्थागत परेशानियों से जूझ रहा है. बोर्ड की परेशानियों में अध्यक्ष जगमोहन डालमिया के असमय निधन ने और इजाफा कर दिया है. अपने खराब स्वास्थ्य के चलते ही वे बीसीसीआई अध्यक्ष के रूप में अपनी जिम्मेदारियों का ठीक तरीके से निर्वहन नहीं कर पा रहे थे. डालमिया की मौत ने बीसीसीआई को और मुश्किल में डाल दिया है, जिसके कारण इसकी भविष्य की योजनाएं बुरी तरीके से प्रभावित होंगी.

वर्तमान स्थिति में ऐसे ढेरों सवाल उठ रहे हैं, जिनका जवाब देने में बोर्ड के अधिकारियों को खासा संघर्ष करना पड़ेगा. खराब सेहत के बावजूद डालमिया बीसीसीआई अध्यक्ष पद पर क्यों बने रहे? गौर करने वाली बात यह है कि बीसीसीआई अध्यक्ष के रूप में डालमिया की नियुक्ति पर सबसे पहला सवाल सुप्रीम कोर्ट ने उठाया. पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज अशोक भान और आरवी रवींद्रन के पैनल ने अध्यक्ष पद के साक्षात्कार के दौरान डालमिया की सेहत को ठीक नहीं पाया था. इस पैनल का गठन सुप्रीम कोर्ट द्वारा आईपीएल 2013 में सट्टेबाजी के दोषी पाए जाने के बाद पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मयप्पन और राजस्थान रॉयल्स के सह मालिक राज कुंद्रा के लिए दंड निर्धारित करने के लिए किया गया था.

जस्टिस लोढ़ा की अध्यक्षता वाले इस पैनल ने डालमिया के काम पर सवाल उठाए, जिस पर अपने पिता के स्थान पर डालमिया के बेटे अभिषेक ने न्यायाधीशों को उनकी सफाई दी, जो इस पैनल को बेतुकी लगी. उनका सवाल था कि आखिर बीसीसीआई को चला कौन रहा है. ये पैनल डालमिया के स्वास्थ्य पर बीसीसीआई अधिकारियों की चुप्पी पर आश्चर्यचकित था. उन्होंने टिप्पणी भी की, ‘यदि इस समय बीसीसीआई अध्यक्ष के मानसिक और शारीरिक सेहत की ये स्थिति है तो क्या तीन महीने पहले उनका चयन करने वाले उनके इस हाल से अनभिज्ञ थे? और अगर उनकी सेहत हाल के समय में लगातार गिर रही है तो आखिर दुनिया के इस सबसे धनी क्रिकेट बोर्ड को चला कौन रहा है?’

वरिष्ठ क्रिकेट लेखक आशीष शुक्ला ‘तहलका’ को बताते हैं, ‘वास्तव में बोर्ड ने डायरेक्टर के रूप में रवि शास्त्री के कार्यकाल को दो साल न बढ़ाकर अपना ही नुकसान किया है. कितने कोचों ने विदेशी दौरों में पहले मैच को हारने के बाद तीन टेस्ट मैचों की सीरीज में जीत दिलाई है? भारत को शास्त्री के रूप में एक हेड कोच की जरूरत नहीं है, हालिया सपोर्टिंग स्टॉफ बढिया काम कर रहा है. श्रीलंका की भीषण गर्मी में जब वहां के स्थानीय खिलाड़ी नहीं खेल पा रहे थे तब भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन बेहतर रहा. राहुल द्रविड़ एक अच्छे कोच हो सकते हैं और वे यह जिम्मेदारी भी लेना चाहते हैं. नए खिलाड़ी भी उनसे लगातार सलाह लेते रहते हैं. वे बोर्ड को सुझाव दे सकते हैं और मुझे लगता है वे खुशी से द्रविड़ की बात मान भी लेंगे.’

डालमिया की अस्वस्थता के समय बीसीसीआई सचिव अनुराग ठाकुर और आईपीएल चेयरमैन राजीव शुक्ला क्रिकेट से संबंधित सभी मामले देख रहे थे. इस साल मार्च में जब डालमिया ने बीसीसीआई अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाला था तो उनसे ढेरों उम्मीदें थीं, हालांकि वे इन्हें पूरा कर पाने में असफल रहे. वैसे भारतीय क्रिकेट की वर्तमान हालत, आईपीएल से जुड़े विवाद और डालमिया के खराब स्वास्थ्य पर चिंतित होने के बजाय बीसीसीआई के अधिकारियों को समस्याओं से निपटने के लिए ज्यादा बेहतर तरीके से काम करना चाहिए. हालांकि डालमिया के निधन से स्थिति बद से बदतर हो गई. अब बीसीसीआई को ऐसे अध्यक्ष की तलाश करनी होगी, जो बोर्ड को इन सभी परिस्थितियों से उबारने में सक्षम हो और फिर से शून्य से शुरुआत करे.

डालमिया की नियुक्ति के शुरुआती दौर में लोगों को बहुत सारी उम्मीदें थी. पूर्व खिलाड़ी और राष्ट्रीय स्तर के चयनकर्ता अशोक मल्होत्रा ‘तहलका’ से बात करते हुए कहते हैं, ‘डालमिया एक अनुभवी प्रशासक थे, खिलाड़ी उनसे प्यार करते थे. उनका कार्यकाल भारतीय क्रिकेट के लिए काफी अच्छा होता.’

दुर्भाग्यवश, ये उम्मीदें पूरी नहीं हो सकीं. बीसीसीआई में उस समय ऐसे बहुत से मामले थे, जिनका जल्द निपटारा होना चाहिए था, लेकिन डालमिया ने अपने जीवनकाल में उन्हें पूरा नहीं किया. सबसे पहला मामला तो यही है कि आईपीएल की दो निलंबित टीमों, चेन्नई सुपरकिंग्स और राजस्थान रॉयल्स का क्या होगा? दूसरा, टीम इंडिया का अगला हेड कोच कौन होगा? तीसरा, दिसंबर में पाकिस्तान के साथ टेस्ट सीरीज खेली जाएगी या नहीं. चौथा, आईपीएल 2016 में कितनी टीमें खेलेंगी, आठ या दस? और सबसे आखिरी और महत्वपूर्ण, क्या सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे विवादों में घिरे बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष एन. श्रीनिवासन को बोर्ड की बैठकों में भाग लेने की अनुमति देनी चाहिए या नहीं?

इन सबके अलावा बीसीसीआई के सामने कुछ और जटिल मुद्दे भी हैं. इनमें आरटीआई के दायरे में आने से इंकार करने और दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा क्लीन चिट मिलने के बावजूद एस. श्रीसंथ, अंकित चह्वाण और अजीत चंडीला के ऊपर लगे बैन को हटाने को लेकर बोर्ड की अनिच्छा प्रमुख मुद्दे हैं. गौरतलब है कि इन खिलाड़ियों पर 2013 आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग का आरोप लगा था. अगर पूर्व भारतीय क्रिकेटर अजय जडेजा पर लगे मैच फिक्सिंग के आरोप, उन पर लगे 5 साल के बैन के बाद हट सकते हैं, उन्हें दिल्ली की रणजी टीम के 2015-16 सत्र का मेंटर बनाने की बात हो सकती है तो श्रीसंथ और बाकियों के साथ बीसीसीआई इतनी सख्ती क्यों बरत रही है?

यहां सवाल राजीव शुक्ला के आईपीएल प्रमुख बने रहने पर भी हैं. अगर पूर्व आईपीएल प्रमुख ललित मोदी को आईपीएल 2010 में हुई गड़बड़ियों की सजा मिली तो राजीव शुक्ला अब तक क्यों इस पद पर हैं जबकि 2013 आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग मामला तो उनकी नाक के नीचे ही हुआ है? उनका पद पर बने रहना साबित करता है कि बीसीसीआई और आईपीएल के मामले में दोनों राष्ट्रीय दल, भाजपा और कांग्रेस साथ हैं. एक तरफ तो संसद में दोनों दल भूमि अधिग्रहण बिल, विदेश नीतियों और बाकी मुद्दों पर लड़ते, बहस करते देखे जा सकते हैं पर क्रिकेट के इस खेल में भाजपा के अनुराग ठाकुर (सचिव, बीसीसीआई) और कांग्रेस के राजीव शुक्ला (आईपीएल प्रमुख) पूरी खेल भावना के साथ-साथ काम कर रहे हैं. ये बात ललित मोदी के उस ट्वीट का समर्थन करती हैं जहां उन्होंने कहा था कि भाजपा और कांग्रेस के नेता ‘यूनाइटेड बाय क्रिकेट’ हैं यानी क्रिकेट की वजह से साथ हैं.

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शरद पवार के साथ शशांक मनोहर

अपने मुंहफट अंदाज के लिए मशहूर पूर्व क्रिकेटर और भाजपा सांसद कीर्ति आजाद ‘तहलका’ को बताते हैं, ‘बीसीसीआई के लिए डालमिया की जगह पर किसी और को लाना भूसे के ढेर में सुई ढूंढने जैसा है, साथ ही ये तो भगवान ही बता सकते हैं कि आने वाले दिनों में बीसीसीआई सही रास्ते पर चल भी पाएगा या नहीं.’ ये पूछने पर कि क्या राहुल द्रविड़ भारतीय क्रिकेट टीम के बैटिंग कोच के पद के लिए उपयुक्त होंगे, आजाद कहते हैं, ‘राहुल इस पद के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं.’ राहुल वर्तमान में इंडिया- ए टीम के कोच हैं और समय-समय पर विराट कोहली, चेतेश्वर पुजारा, केएल राहुल, अजिंक्य रहाणे और सुरेश रैना जैसे नए युवा खिलाड़ियों को बैटिंग के गुर सिखाते रहते हैं. युवा खिलाड़ी उन पर भरोसा करते हैं और उनसे सीखना चाहते हैं, तो फिर क्यों बीसीसीआई उन्हें टीम इंडिया का बैटिंग कोच बनाने से पीछे हट रहा है? डालमिया के असमय निधन ने बीसीसीआई को एक नए अध्यक्ष को चुनने की पसोपेश में डाल दिया था, शरद पवार और राजीव शुक्ला के नाम इस पद के दावेदारों के रूप में उभरे थे पर बाजी मारी शशांक मनोहर ने. मनोहर पहले भी 2008 से 2011 तक ये पद संभाल चुके हैं और चार अक्टूबर से फिर ये जिम्मेदारी संभालेंगे. बीसीसीआई अध्यक्ष पद के लिए शरद पवार और राजीव शुक्ला को दावेदार माना जा रहा था लेकिन शशांक मनोहर ने बाजी मार ली

‘सामाजिक न्याय के नाम पर लालू ने लोगों को ठगने का काम किया’

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वाम दल अलग-अलग चुनाव लड़ने के अभ्यस्त हैं, अब एक होकर लड़ने को कैसे तैयार हो गए?

हम सांप्रदायिक ताकतों को रोकना चाहते हैं. देश को खतरा साफ दिख रहा है. नरेंद्र मोदी की सरकार सीधे-सीधे आरएसएस के अंग की तरह काम कर रहा है. इसी खतरे से देश को बचाने के लिए वाम एकता की जरूरत पड़ी है.

क्या यह एकता सिर्फ बिहार विधानसभा चुनाव के लिए ही है?

बिहार से वाम एकता की शुरुआत हुई है तो अब तय मानिए कि यही एकता और ताकत देश की राजनीति को राह दिखाएगी. इस चुनाव मे एक होकर हम फिर से बिहार में वर्ग संघर्ष को धार देने की कोशिश करेंगे, उससे देश को संदेश देंगे. हम वर्ग एकता की बात करते हैं. हमारी लड़ाई जाति और संप्रदाय की राजनीति करने वालों के साथ है.

लेकिन बिहार में तो वाम दल विडंबनाओं के भंवरजाल में फंसे रहे हैं. कभी लालू तो कभी नीतीश को समर्थन देते रहे हैं. उनका महागठबंधन भी तो भाजपा को ही रोकने के लिए काम कर रहा है, आप लोगों ने आर-पार के मौके पर अलग राह अपना ली, क्यों?

जदयू और भाजपा की नीतियों में कोई फर्क नहीं. और लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय के नाम पर यहां के लोगों को ठगने का काम किया है. जदयू आज लड़ाई लड़ रही है, कल तक भाजपा के साथ ही थी. जनता के ऊपर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है. किसान आत्महत्या करने लगे हैं. हम इन नीतियों के खिलाफ एकजुट हुए हैं, सिर्फ सरकार बनाने के लिए नहीं. सरकार किसी की भी बने, हम तो जनता से सिर्फ यही कहेंगे कि सदन में वामपंथियों को इतनी संख्या भेजिए कि हम लोग जनता के सवाल को उठाने और दबाव बनाने की स्थिति में रहें.

इस बार के चुनाव में असली फैसला तो युवा मतदाता करेंगे. वाम गठबंधन के पास युवाओं के लिए क्या कोई  खास एजेंडा है?

बिहार के युवा जान-समझ चुके हैं और देख रहे हैं कि वर्तमान में केंद्र में जो सरकार है, वह कुछ कॉरपोरेट घरानों के इशारे पर काम कर रही है. इससे युवाओं का कभी भला नहीं होने वाला. युवाओं के लिए स्थायी रोजगार का रास्ता हम ही तलाशेंगे.

प्रधानमंत्री अच्छे दिन की बात कर चुनाव में सीधे हस्तक्षेप कर रहे हैं. आपकी क्या रणनीति है?

उनके अच्छे दिन के बारे में किसी को बताने की जरूरत अब भी रह गई है क्या? देश की संपत्तियों पर कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया है. हमारा देश गरीब नहीं है. सरकार की नीतियां गलत हैं. इस देश को वैकल्पिक नीतियों की जरूरत है जो सिर्फ वामपंथ ही दे सकता है.

वामदल में कितना बल

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सात सितंबर को पटना लाल रंग में रंग हुआ था. हरे और भगवा रंग के बीच सत्ता की राजनीति पर वर्चस्व के लिए छिड़ी जंग के दौरान यह लाल खेमों के हस्तक्षेप का दिन था. यह इसलिए भी खास था, क्योंकि इस दिन भारत के अलग-अलग हिस्से में सक्रिय छह वाम दलों के बीच एक सम्मेलन के जरिये सामंजस्य का एेलान होने वाला था. ऐसा हुआ भी. भाकपा, माकपा, भाकपा माले, एसयूसीआई-सी, आरएसपी और फारवर्ड ब्लाॅक के तकरीबन 40 प्रमुख नेता जब एकजुट हुए तो सम्मेलन का मंच भर गया था.

सीपीआई की ओर से वरिष्ठ नेता एबी वर्धन, सीपीएम की ओर से पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी, आरएसपी के महासचिव अवनी राय, फाॅरवर्ड ब्लाॅक के महासचिव देवब्रत्त विश्वास, भाकपा माले की ओर से पार्टी के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य और एसयूसीआई-सी की ओर से केंद्रीय कमेटी की सदस्य छाया मुखर्जी मौजूद रहे. बेहद अनुशासित तरीके से सम्मेलन हुआ, जो वाम दलों के आयोजनों की पहचान भी होती है. कैडर संयमित ढंग से अपने नेताओं की बात सुनते रहे. बीच-बीच में इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगते रहे. सभी नेताओं ने जोरदार तरीके से, तेज आवाज में अपनी बातें रखीं.

नवउदारवाद, सांप्रदायिक ताकतें, सामाजिक न्याय के नाम पर जाति का खेल खेलने वाले और ठगने वाले नेताओं को कोसा जाता रहा. भाजपा, कांग्रेस, लालू, नीतीश सभी निशाने पर आते रहे. तालियां बजती रही और आखिरी पंक्ति में बैठे कार्यकर्ता आपस में ही सवाल पूछते रहे कि सांप्रदायिकता और नवउदारवाद का विरोध तो ठीक है, लेकिन लालू-नीतीश भी भाजपा-कांग्रेस की तरह ही हैं और देश या राज्य के भविष्य को बर्बाद कर रहे हैं, ये बातें वाम दलों को इतनी देर से क्यों समझ में आई. अभी जो छह दल एक साथ आकर ताल ठोक रहे हैं, आपस में सामंजस्य बनाकर लड़ने की बात कर रहे हैं, ये काम वे पांच साल पहले ही क्यों नहीं कर सके थे. छह दल की बात तो दूर, बिहार में सक्रिय रहे कम से कम तीन वामदल- भाकपा, माकपा और भाकपा माले, भी अगर साथ रहे होते तो विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इस तरह की एकजुटता दिखाने की नौबत ही नहीं आती. लेकिन अब तब साथ आए हैं, जब अपनी जमीन अपनी ही गलतियों से गंवा चुके हैं.

सीपीआई के नेता एबी वर्धन जब यह बात बोल रहे थे तो पीछे से कुछ कार्यकर्ता आपस में बात करते रहे कि आज नीतीश इतने बुरे लग रहे हैं, सांप्रदायिक लग रहे हैं तो यह तो कुछ माह पहले भी समझ जाना चाहिए था, जब भाजपा और नीतीश के बीच दूरियां बढ़ी तो सबसे पहले भाकपा के इकलौते विधायक के ही समर्थन का प्रस्ताव नीतीश के पास गया था. लालू प्रसाद और कांग्रेस ने तो फिर भी थोड़े दिन का समय सोचने-समझने, भाव दिखाने में लिया था.

देखा जाए तो दोनों में से कोई गलत नहीं था. मंच से बोलने वाले नेता जिन मसलों को उठाकर एक साथ आने की दुहाई दे रहे थे और बिहार की जिन चुनौतियों का हवाला दे रहे थे, वे भी गलत नहीं थे और पिछली कतार में बैठकर कार्यकर्ता जो आपस में कानाफूसी कर रहे थे, वे भी गलत नहीं थे. दोनों के सवाल सही थे. क्योंकि बिहार में हर कोई यह जानता और मानता है कि यहां का जो राजनीतिक मन-मिजाज रहा है, वह सदा ही वाम दलाें के लिए अनुकूल रहा है. बिहार के जो मसले रहे हैं या अब भी हैं, वे ऐसी स्थितियां हमेशा ही तैयार करते हैं कि वामपंथी दल यहां अपनी ताकत दिखा सकें. बिहार में जिस तरह की राजनीतिक पृष्ठभूमि रही है, वह भी इसके लिए अनुकूल माहौल बनाती है. और इन सबसे बढ़कर बात यह कि जिस तरह से वामपंथी दल राज्य में समय-समाज और संस्कृति के सामयिक सवालों पर राजनीति और राजनीतिक हस्तक्षेप करते रहे हैं, उससे भी उम्मीद जगती है कि बिहार में वाम दल एक मजबूत और बेहतर विकल्प के तौर पर उभर सकते हैं.

ऐसा मानने वालों की संख्या बिहार में काफी है और इसके पीछे ठोस वजहें भी हैं. बिहार में हालिया वर्षों की ही घटनाओं की बात करें तो ये वाम दल ही थे, जो सदन में मौजूद नहीं रहने के बावजूद सड़कों पर आंदोलन करते रहे और मीडिया में प्रश्रय नहीं मिलने के बावजूद जनता के सवालों को मुद्दा बनाने में ऊर्जा लगाते रहे. वह सवाल चाहे लक्ष्मणपुर बाथे-बथानी टोला-शंकर बीघा जैसे कांडों में अपराधियों का हाईकोर्ट से बरी हो जाने का हो, चाहे बंदोपाध्याय कमेटी की रिपोर्ट को दबा दिए जाने का हो, चाहे अमीर दास आयोग को भंग कर दिए जाने का हो, चाहे हालिया दिनों में हुई एक से बढ़कर एक अत्याचारी घटनाओं का हो.

Tableयह तो वर्तमान के प्रसंग हैं, जो वामदलों को बिहार के लिए जरूरी बनाते हैं. इतिहास के पन्नों को पलटें तो लगता है कि वाम दलों में हमेशा से इतनी संभावनाएं रही हैं. बिहार में वामदलों का चुनावी राजनीति में आने का इतिहास 1956 से शुरू होता है. 1956 में पहली बार बेगुसराय से काॅमरेड चंद्रशेखर सिंह जीतकर बिहार विधानसभा पहुंचे थे. उसके बाद तो बेगुसराय जैसे जिले भाकपा के लिए गढ़ ही बन गए. उसे बिहार का लेनिनग्राद कहा जाने लगा. 1972 में भाकपा के 35 विधायक सदन में पहुंचे और 1977 में जब जनता पार्टी की आंधी आई, तब भी 21 सीटों पर भाकपा ने जीत हासिल की. वह भी तब जबकि उस समय भाकपा ने इमरजेंसी का विरोध नहीं कर के अपने लिए एक जोखिम मोल लिया था. यानी जोखिम की स्थितियों में भी वाम दलों की मजबूती बनी रही. यह तो भाकपा की बात हुई. बाद में जब भाकपा माले का चुनावी राजनीति में प्रवेश हुआ तो वह बिहार की राजनीति में रचनात्मक विपक्ष का पर्याय ही बन गई. उसने न सिर्फ सीटों पर जीत भी हासिल की, बल्कि सीट नहीं मिलने पर भी जनता के सवालों पर धारदार राजनीति करती रही. लेकिन ठोस नीति-रणनीति नहीं होने और आपस में सामंजस्य की भारी कमी रहने के कारण वाम दल अपना मर्सिया खुद लिखने लगे और 2010 के चुनाव में स्थिति ऐसी आई कि तीन प्रमुख वाम दलों के चुनाव लड़ने पर भी मात्र एक सीट पर खाता खुल सका, वह भी भाकपा का.

ऐसा क्यों हुआ, इसके जवाब कई लोग, कई तरह से देते हैं. प्रचलित अवधारणा यह है कि वामदलों ने लालू प्रसाद का साथ दिया, पहले उसकी कीमत चुकानी पड़ी, बाद में नीतीश का साथ देने की कीमत भी चुकानी पड़ी. कुछ कहते हैं कि जब वर्ग की राजनीति करनी थी तो जाति की बुनियाद पर शुरू हुए मंडल आंदोलन के पक्ष में जाकर मंडलवादी नेताओं का साथ देने की जरूरत ही क्या थी. वैसे वाम से लंबे समय तक जुड़ाव रखने वाले महेंद्र सुमन जैसे राजनीतिक विश्लेषकों का साफ तौर पर मानना है कि वाम  बिहार की जरूरत है, लेकिन यहां की बदलती राजनीति से कदमताल न मिला पाने और समय के अनुसार अपने को ढाल न पाने की वजह से उनका यह हाल हुआ. सुमन कहते हैं, ‘1990 के बाद बिहार की राजनीति में तेजी से बदलाव हुआ उस बदलाव में यह होना स्वाभाविक भी था.’ बदलाव स्वाभाविक था लेकिन सीताराम येचुरी जैसे नेता दूसरी बात कहते हैं. वह कहते हैं, ‘भविष्य में हमें संभावनाएं दिख रही हैं. दो सितंबर को देश भर में हुई हड़ताल में जिस तरह से करोड़ों मजदूरों ने साथ दिया, उससे उम्मीद जगी है. जिस तरह से केंद्र की सरकार को भूमि अधिग्रहण कानून वापस लेना पड़ा है, उससे उम्मीद जगी है. अभी कौन कितनी बड़ी भूमिका बना रहा है, उस पर नहीं जाइए, राजनीति में पल भर में जनता सबक सिखाती है. लोकसभा चुनाव के बाद लग रहा था कि भाजपा की हवा कहीं रुकेगी ही नहीं. भाजपा के नेता कहते भी थे कि विपक्ष तो इतना ही बड़ा रह गया है कि उसे एक बस में बिठाकर ले जाया जा सकता है. लेकिन कुछ ही माह बाद दिल्ली के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सदस्य संख्या सिमटकर तीन पर आ गई.’ येचुरी का कहना ठीक है, लेकिन वाम दलों के इस गठजोड़ में जो पेंच है, वह अब भी अंदर ही अंदर बना हुआ है. जिस तरह से नीतीश और लालू के मिलन में लालू प्रसाद बार-बार कहते हैं कि हमारे अलग रहने का फायदा अब तक भाजपा ने फायदा उठाया उसी तरह वामदलों के नेता भी कह रहे हैं कि हमारे बिखराव का फायदा दूसरों को मिलता रहा. अब सवाल उठता है कि क्या वाकई में वामदल बिहार में होने  विधानसभा चुनाव के बहाने ही सही, साथ आने की राह पर हैं और यह साथ आगे भी बना रहेगा.

बहरहाल, साथ आने की यह उम्मीद पिछली बार लोकसभा चुनाव में भी जगी थी. आखिरी समय तक लग रहा था कि बिहार में कम से कम तीनों प्रमुख दल भाकपा-माकपा और भाकपा माले साथ आ जाएंगे लेकिन ऐसा हो न सका था. भाकपा और माकपा नीतीश के साथ चले गए थे, भाकपा माले अलग राह पकड़ ली थी. नीतीश और लालू जैसे नेता वाम दलों को लेकर निश्चिंत भी रहे हैं. दोनों ने जब चाहा, तब वाम दलों को अपने पाले में करके इनके कैडरों का फायदा भी उठाया है. चूंकि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाकपा और माकपा के साथ के बावजूद नीतीश को कोई फायदा नहीं मिल सका तो उन्होंने एक झटके में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उनका साथ छोड़ दिया. हालांकि जदयू या राजद के नेताओं से बात करने पर वे वामदलों को बहुत हल्के में लेते हुए कहते हैं कि उनमें से एक जीते या एक दर्जन, आखिर में वे हमारा ही साथ देंगे, क्योंकि सांप्रदायिकता के सवाल पर उन्हें घूमफिरकर हमारे पास ही आना होगा. वामदलों के प्रति इस तरह का हल्का नजरिया जदयू या राजद जैसे दल रखते हैं तो उसकी भी ठोस वजहें रही हैं.

बहरहाल ये ऐलान हो गया है कि सभी छह वाम दल मिलकर 243 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे. इन 243 सीटों में 221 का हिसाब-किताब स्पष्ट हो गया है. 91 सीटों पर भाकपा लड़ेगी, भाकपा माले के खाते में 78 सीटें आई हैं. माकपा 38 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी जबकि एसयूसीआई-सी छह और फारवर्ड ब्लाॅक के उम्मीदवार पांच सीटों पर लड़ेंगे. 22 सीटों पर अभी घोषणा नहीं हो सकी है. उसके लिए बैठकें चल रही हैं. बताया गया है कि बैठक के बाद ये तय होगा लेकिन सूत्रों के हवाले से सूचना मिली है कि भाकपा माले इनमें से 18 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी और यह फैसला उस पार्टी ने ले लिया है. हालांकि इस बाबत आधिकारिक बात होने पर कोई कुछ नहीं कहता. अलगाव और मतभेद के बिंदु इस छोटे से फैसले में समझे जा सकते हैं कि आखिर क्यों 21 सीटों पर फैसला नहीं हो सका और अब क्यों कहा जा रहा है कि 21 सीटों पर फ्रेंडली जैसी लड़ाई भी हो सकती है. इस मुश्किल समय में फ्रेंडली जैसी लड़ाई की जरूरत ही क्योंकर है.

असल में वाम दलों के बीच बिहार में इस अलगाव के कारण भी स्वाभाविक रहे हैं. भाकपा और भाकपा माले के बीच की लड़ाई पुरानी है. नेताओं और कार्यकर्ताओं के स्तर पर भी. भाकपा, माकपा और भाकपा माले, ये तीन प्रमुख दल हैं, जो बिहार में सक्रिय रहे हैं. इसके अलावा जिले स्तर पर कई वाम दल हैं, जो अपना अपना संगठन बनाए हुए हैं और मौका पाकर चुनाव भी लड़ लेते हैं. इन तीन प्रमुख दलों की ही बात करें तो तीनों के बीच श्रेष्ठताबोध की लड़ाई ज्यादा रही है. सीपीआई खुद को देश में सबसे पुरानी वाम पार्टी होने के नाते और बिहार में स्वर्णिम इतिहास रहने के कारण श्रेष्ठ पार्टी मानती है. दूसरी ओर माकपा को बंगाल का गुमान है कि वह बंगाल, केरल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में सत्ता में रहने की अभ्यस्त रही है, इसलिए उसे भी श्रेष्ठ माना जाए, जबकि बिहार में वर्षों से सीटों की राजनीति में दखल रखने की वजह से भाकपा माले खुद को राज्य की ही पार्टी मानती है. इन बातों पर शुरू से ही नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच टकराव होता रहा है और यह टकराव सार्वजनिक स्थल पर होने वाली बातचीत में भी देखा जाता रहा है.

श्रेष्ठताबोध और टकराव को टालने की कोशिश कोई एक बार नहीं हुई. कुछ साल पहले जब करीब तीन दशक बाद पटना विश्वविद्यालय में छात्र संघ का चुनाव हो रहा था तब भी यह कोशिश की गई कि इतने वर्षों बाद बिहार की राजनीतिक फैक्ट्री माने जाने वाले विश्वविद्यालय में चुनाव हो रहा है तो सभी एकजुट हों, लेकिन ऐसा न हो सका था. वाम दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की जीत हो गई थी. उसी तरह बिहार के तमाम बड़े मसलों पर एक होकर आंदोलन की भी कोशिश हुई लेकिन सभी वाम दल अपनी-अपनी राह पकड़कर एक एजेंडे को ही उठाते रहे और नतीजा यह हुआ कि जरूरी सवालों पर आंदोलन की जो पृष्ठभूमि तैयार कर सकते थे,  वो नहीं कर सके. और अब जबकि छह दल एक साथ आ गए हैं तो सवाल और भी बड़ा हो गया है कि क्या ये एक ही तरीके से काम करेंगे. क्योंकि बिहार में सक्रिय वाम दलों की लड़ाई तो पुरानी थी ही, एसयूसीआई-सी जैसी पार्टी के आने से यह और भी देखने को मिलेगी.

एसयूसीआई-सी जैसी पार्टी और माकपा के बीच आपसी लड़ाई का इतिहास रहा है. आगे क्या होगा, यह कोई नहीं जानता. मंडल टू बनाम हिडेन कमंडल की लड़ाई में फंसे बिहार में वर्षों बाद अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे वाम दल कितना प्रभाव दिखा पाएंगे, यह भी आगे पता चलेगा. सीताराम येचुरी कहते हैं, ‘हम सरकार बनाने के लिए नहीं लड़ रहे, हमें बस इतनी सीटें चाहिए कि हम सदन में जनता के सवाल पर दबाव बना सके.’

येचुरी जैसी मंशा बहुतेरे बिहारियों की भी है. बिहार के हाल और हालात में वामदलों की उपस्थिति सभी चाहते हैं. वामदलों से जुड़ाव रखने की आकांक्षा अब भी गरीब और बेबस वंचित तबका रखता है, इसलिए वामदलों का कोई भी मार्च हो या सम्मेलन हो, हाशिये के लोग तपती धूप, कड़कड़ाती ठंड या मूसलाधार बारिश में पटना में देखे जाते हैं. हालांकि चुनाव के समय ये लोग ही जाति की खोल में भी घुस जाते हैं. पहले तो नीतीश और लालू थे, जिनसे वामदलों को मुश्किलें थीं. अब मांझी जैसे नेताओं का भी उभार हो गया है, जो नीतीश या लालू के समानांतर वामदलों के वोट को ही नुकसान पहुंचाएंगे.

[ilink url=”https://tehelkahindi.com/yechuri-on-left-in-bihar/” style=”tick”]पढ़ें ‘क्या कहना है सीताराम येचुरी का वाम एकता पर'[/ilink]

‘जीडीपी और आर्थिक विकास, दुनिया के सबसे झूठे शब्द हैं, इनके कारण ही दुनिया का विनाश होगा’

Felex Padel (6)तकरीबन चार दशक से आप भारत को नजदीक से देख रहे हैं. आप जब यहां आए तब और अब के भारत में आपको क्या फर्क नजर आता है?

इसका जवाब देना मुश्किल है. कितने बदलावों की बात करूं. जब भारत आया था तो यहां की नदियां, नदी की तरह ही थीं, लेकिन अब जगह-जगह नदियों के बहने में रुकावट हैं, तमाम नाले में बदल गई हैं. पहले यहां पहाड़ों और जंगलों का महत्व था. प्रकृति और सृष्टि से मानव का मार्मिक रिश्ता था. धर्म जीवन की एक प्रक्रिया थी, उसमें जीवन मूल्य समाहित थे. अब सब कुछ तेजी से बदल चुका है, अब तो निवेश यहां का मूल मंत्र है. ये विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के जाल में फंसा हुआ एक मुल्क बन चुका है. विश्व बैंक के लिए दुनिया के तमाम देश सिर्फ तीन खांचों में फिट होते हैं, पहला- विकसित (डेवलप्ड), दूसरा- विकासशील (डेवलपिंग) और तीसरा- अल्प विकसित (अंडरडेवलप्ड). विकसित बनने की होड़ में शामिल होकर भारत अपना सब कुछ बदल चुका है. सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और आर्थिक विकास इसके मूलमंत्र बन चुके हैं.

जीडीपी और आर्थिक विकास मूलमंत्र बन चुके हैं, मतलब?

हां, निश्चित रूप से यही दो ऐसे शब्द हैं, जो दुनिया के सबसे शक्तिशाली झूठे शब्द हैं. ये दोनों पूरी सृष्टि को रसातल में ले जा रहे हैं. इनके लक्ष्यों को पाने के लिए सबसे पहले मानवीय और सांस्कृतिक मूल्यों को ध्वस्त करना पड़ता है, सुंदर और पहचान से जुड़ी परंपराओं का नाश करना पड़ता है. जब तरक्की की दौड़ नहीं थी, तब क्या विकास नहीं था? था, तब भी था, लेकिन उस विकास में मानव समुदाय के बीच आपसी रिश्ते की भी कद्र थी. अब तो तेजी से दूरियां बढ़ती जा रही हैं. आर्थिक विकास और जीडीपी ने सत्ता, राजनीति, कॉरपोरेट और माओवादियों के बीच गठजोड़ बनाया है. इन चारों का गठजोड़ क्या कर रहा है, कैसे आपसी सहमति से सामंजस्य बैठाकर भारत जैसे देश को बर्बाद किया जा रहा है, इसे लोगों को बताने की जरूरत नहीं.

जिस गठजोड़ की बात आप कर रहे हैं तो इसका मतलब क्या माओवादी सीधे-सीधे सामंजस्य बैठाकर, आपसी सहमति से काम कर रहे हैं?

हां, बिलकुल. इन सबकी फंडिंग कौन करता है, यह देखना होगा. सबको कॉरपोरेट विशेषकर माइनिंग कंपनियां फंड करती हैं. इन माइनिंग कंपनियों को फंड कहां से मिलता है. विश्व बैंक व आईएमएफ से. इसके लिए सरकार देश के विकास का हवाला देते हुए अधिक से अधिक माइनिंग की जरूरत पर बल देती है. इसके लिए चारों आपस में गठजोड़ कर एक-दूसरे की मदद करते हैं. जहां भी माइनिंग कंपनियां आती हैं, सबसे पहले वहां की संस्कृति का बलात्कार करती हैं, फिर औरतों का, फिर धर्म का नाश करती हैं, लोगों को झांसा देती हैं. सब आपस में मिलकर काम करते-हैं. मैं तो कहता हूं कि माओवादियों को अपने नाम से ‘माओ’ शब्द हटा देना चाहिए.

आप ओडिशा में रहकर वर्षों से काम कर रहे हैं. नियमगिरी वाला मामला बहुत चर्चित रहा है और वेदांता का विरोध वहीं हुआ. आपका इस पर क्या कहना है?

नियमगिरी का मामला अलग है. जब भी वहां काेई माइनिंग कंपनी गई तो सबसे पहले उन्होंने लोगों को यह बताने की कोशिश की कि वह वहां नियमगिरी राजा का विशाल मंदिर बनवा देगी. तब वहां के आदिवासियों ने जवाब दिया कि हमारा भगवान, नियमगिरी राजा मंदिरों में नहीं रहता, वो रह ही नहीं सकता. वह कंक्रीट के जंगल में नहीं, असली जंगल में रहता है, पहाड़ पर खुले आसमान के नीचे. लोग जब कंपनी के झांसे में नहीं फंसे. तब दूसरे रास्ते अपनाए गए. वहां के लोग साफ कहते हैं कि पहाड़ को हमारी जरूरत है और हमें पहाड़ की. ऐसा नहीं है कि आदिवासी नहीं जानते कि इस पहाड़ में सैकड़ों तरह के अयस्क हैं, लेकिन उनके लिए धरती, जंगल, पहाड़ कभी लालच पूरा करने के स्रोत की तरह नहीं रहे. आदिवासी जैव पारिस्थितिकी आधारित अर्थव्यस्था पर चलते हैं, इसलिए कंपनियां उन्हें आसानी से दूसरे समुदाय की तरह झांसा नहीं दे पाती.

दूसरे समुदाय, मसलन?

दूसरे समुदाय को एक उदाहरण से समझिए. मैं जब भारत आया था तो हिंदू धर्म मुझे आकर्षित करता था, अब भी करता है. मैंने हिंदू धर्म का नदियों से, उसके पानी से, सृष्टि से, पहाड़ से लगाव देखा था. अब भी मैं हिंदू धर्म के अनुसार पूजा करता हूं, मंदिर जाता हूं लेकिन जब भी किसी बड़े मंदिर जाता हूं, जहां सिर्फ संगमरमर ही संगमरमर लगे होते हैं, तो सोचता हूं कि इस विशाल मंदिर में क्या भगवान रहता होगा? और रहता होगा तो कैसे? क्या भगवान को नहीं मालूम कि उसका वास बनाने में इस्तेमाल संगमरमर निकालने में बड़े लोगों ने मजदूरों पर कितने तरह के जुल्म किए थे? निश्चित रूप से भगवान यह जानता होगा. जिस तरह का झांसा देकर बड़े लोगों ने मंदिर बनवाए ठीक वैसे ही माइनिंग कंपनियों ने अपने बचाव के लिए बड़े-बड़े मंदिरों का निर्माण शुरू करवा दिया है ताकि लोग उसमें उलझे रहें और उनका कोई विरोध न हो.

आप मूल रूप से मानव विज्ञानी हैं, आदिवासियों को करीब से देखा है. आदिवासी अलग किस्म के संकट के दौर में हैं. किसी कंपनी के आने पर उनके विस्थापन की बात-भर कहकर बात खत्म कर दी जाती है, जबकि कोई भी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विस्थापन पर गंभीरता से बात नहीं करता?

मानव विज्ञानी अब सिर्फ औपनिवेशिक तरीके से मामलों का ऊपरी तौर पर ही अध्ययन करते हैं. ऐसा नहीं होना चाहिए. वे बहुत पारंपरिक तौर पर गांवों का अध्ययन वगैरह करते हैं जबकि किसी भी समुदाय को समझने के लिए उसकी जड़ों में जाना होता है. आदिवासियों को लेकर एक बात मुझे याद आती है. जब मैं पहली बार झारखंड के संथाल परगना गया था तब उस गांव में आम की नई फसल तैयार थी. मैं जिस घर में गया, वहां आम रखे हुए थे. मैंने खाने की इच्छा जताई तो उन्होंने कहा कि अभी नहीं खिलाएंगे, अभी इनकी पूजा नहीं की गई है. मालूम हुआ कि पूजा के तौर पर आम को वे पहले सृष्टि को चढ़ाएंगे, फिर खाएंगे. ऐसा ही होता है आदिवासी जीवन. वे प्रकृति से सिर्फ लेते नहीं, जो लेते हैं, उसे देते भी हैं. आदिवासियों को समझने की जरूरत होगी. आज विस्थापन के खिलाफ उनकी लड़ाई को ऊपरी तौर पर ही देखा जाता है. जल-जंगल-जमीन की लड़ाई के रूप में देखा जाता है. अपने समुदाय को बचाने की लड़ाई के तौर पर देखा जाता है जबकि सच्चाई ये है कि आज आदिवासी भारत जैसे देश के भविष्य, दुनिया और पूरी सृष्टि बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. वे जीवन मूल्यों को बचाए और बनाए रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं. अगले 20-30 सालों बाद क्या होने वाला है, साफ दिख रहा है. कंपनियों को किसी भी तरह सारे संसाधन चाहिए. उन्हें नदी-पहाड़-सृष्टि से मतलब नहीं. क्या होगा 20 साल बाद जब सारे संसाधन खत्म हो जाएंगे? अभी बिजली मिल जाएगी, आगे क्या होगा? नदियों का पानी खत्म हो जाएगा, सारे जलस्रोत खत्म हो जाएंगे, तब क्या होगा? जमीन खत्म हो जाएगी, जंगल खत्म हो जाएंगे तब क्या होगा? आदिवासी उसी को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. उनकी लड़ाई को मानवता की लड़ाई के तौर पर देखा जाना चाहिए, उसी नजरिये से अध्ययन होना चाहिए.

आदिवासी करीब आठ प्रतिशत की आबादी में बचे हैं. अगर ये कहा जाए कि आने वाले दिनों में आदिवासी समुदाय खत्म हो जाएंगे, तो ऐसे में देश का स्वरूप कैसा होगा?

नहीं, कतई नहीं! मेरा दृढ़ विश्वास है कि यह समुदाय कभी खत्म नहीं होगा. ऐसा हो ही नहीं सकता. यह सृष्टि से प्रेम करने वाला समुदाय है. उसका स्वरूप बदलेगा. आज माइनिंग कंपनियों ने कुछ आदिवासियों को अपने यहां रखकर उनके स्वरूप को बदल दिया है. कुछ माओवादियों ने अपने यहां उन्हें शामिल कर उनके स्वरूप को बदल दिया है. पुलिसवालों ने एसपीओ बनाकर उनका स्वरूप बदल दिया है. ये तीनों आदिवासियों के स्वरूप को बदलने में लगे हुए हैं लेकिन आदिवासियों के मूल में ऐसा है कि वे ज्यादा दिन अपने मूल्यों और संस्कृति से कटे रह ही नहीं सकते. कर्म और धर्म में उनकी गहरी समझ होती है. अभी संकट है लेकिन वे फिर वापस लौटेंगे और वे कभी खत्म नहीं होंगे. भले ही उन्हें मुख्यधारा की संस्कृति बनाने की लाख कोशिश की जाए, आदिवासी लौटेंगे अपने ही मूल में.

भारत में जो शासन व्यवस्था है, उसमें सभी राजनीतिक खेमों को देख लिया गया. मध्यमार्गियों, वामपंथी, दक्षिणपंथी और समाजवादियों को भी देखा जा चुका है. क्या आपको ये उम्मीद दिखती है कि इन स्थितियों में बदलाव आ सकेगा?

आप किसी भी राजनीतिक खेमे काे ले आओ, कोई फर्क नहीं पड़ता. सब  अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के हिसाब से काम करते हैं. सबके लिए आर्थिक विकास मूल मंत्र है. ऐसे में सिर्फ नाम बदलेंगे, काम नहीं. आज ग्रीस जिस संकट से गुजर रहा है, उसे मैं कई सालों से देख रहा हूं. 40 साल पहले वहां गया था. खूबसूरत देश है. फिर दस सालों के बाद गया तो देखा वहां निवेश आने लगा है, विकास होने लगा है. विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का हस्तक्षेप बढ़ गया है. आज ग्रीस कहां पहुंच गया है, आप देख ही रहे हैं.

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आप चार्ल्स डार्विन के परिवार से आते हैं. उनकी  ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’  वाले सिद्धांत की व्याख्या अब ताकतवर और वर्चस्ववादी लोग अपने तरीके से करते हैं. क्या आपको इस बात का दुख है?

‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ वाले सिद्धांत में डार्विन ने अपनी ओर से कोई बात नहीं कही थी, यह तो सृष्टि की बात थी. सृष्टि से रिश्ता बनाने की बात थी. इसकी व्याख्या बदल देने से सृष्टि के प्राणियों की प्रक्रिया नहीं बदल जाएगी. सृष्टि में इतने तरीके के जीव रहते हैं, सभी में लगभग 90 प्रतिशत समानता है. मनुष्य उनमें सबसे ज्यादा बुद्धिमान है. अपने तरीके से व्याख्या करता है. छोड़िए इस बात को, क्या कहूं इस पर. इंसान समझता नहीं कि इस सृष्टि के सभी जीवों से रिश्ता बनाकर रखना होगा. इंसानों ने बंदर और चांद को मामा और बिल्ली को मौसी कहा है तो इसकी कुछ तो वजह रही होगी.

सवालों के घेरे में एनकाउंटर

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बीते अगस्त की तीन तारीख को रात के लगभग 11 बजे मोहन कुशवाह को एक अंजान नंबर से फोन आता है. रीढ़ की हड्डी में चोट से जूझ रहे मोहन जब तक फोन उठाते तब तक वह कट चुका था. मोहन पिछले 24 घंटे से अपने छोटे बेटे धर्मेंद्र की कोई खोज-खबर न मिलने से परेशान थे. यही हाल उनकी पत्नी और बेटी का भी था. धर्मेंद्र को एक दिन पहले ही पुलिस उठाकर ले गई थी. इस बीच अंजान नंबर से आई कॉल में उन्हें एक उम्मीद की किरण नजर आई.

उन्होंने वापस कॉल की तो दूसरी तरफ से एक महिला ने अपना परिचय ग्वालियर पुलिस की क्राइम ब्रांच में पदस्थ अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (एएसपी) प्रतिमा एस. मैथ्यू के रूप में दिया. उन्होंने मोहन से परिवार की जानकारी लेकर फोन काट दिया. शंकाओं से मोहन का मन भर उठा. उन्होंने फिर वही नंबर घुमाया और बेटे के बारे में पूछा. उसके बाद उन्हें जो जवाब मिला वह सुनकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई. बताया गया कि उनका बेटा पुलिस एनकाउंटर में मारा जा चुका है. इस बात का उन्हें भरोसा न हुआ. रात चिंता और बेचैनी में गुजर गई. सुबह जब अखबार उनके हाथों में पहुंचा तो उनकी दुनिया लुट चुकी थी. उनका बेटा वास्तव में पुलिस की गोली का शिकार हो चुका था.

इस कथित एनकाउंटर के बारे में एएसपी प्रतिमा एस. मैथ्यू कहती हैं, ‘यूपी एटीएस ने ग्वालियर पुलिस को आगाह किया था कि जेल में बंद अंतर्राज्यीय शूटर हरेंद्र राणा प्रॉपर्टी डीलर बिल्लू भदौरिया हत्याकांड के गवाह पंकज भदौरिया को मारना चाहता है. ऐसा इसलिए क्योंकि बिल्लू की हत्या में उसका छोटा भाई अरुण भी नामजद है और हरेंद्र की प्रतिज्ञा है कि वह भाई को जेल नहीं होने देगा. अपने खिलाफ चल रहे लगभग हर आपराधिक प्रकरण में राजीनामा कर चुका हरेंद्र, पंकज भदौरिया को राजीनामे के लिए तैयार नहीं करा पा रहा था इसलिए उसने उसे ठिकाने लगाने की योजना बनाई और यह काम सौंपा धर्मेंद्र कुशवाह को. शिवपुरी लिंक रोड के एक खंडहर में धर्मेंद्र जब अपने साथियों के साथ इस काम को अंजाम दे रहा था तब मुखबिर की सूचना के आधार पर पुलिस ने दबिश दी और एक घंटे चली मुठभेड़ में धर्मेंद्र ढेर हो गया, जबकि उसके दो साथी भागने में सफल रहे.’ हालांकि पुलिस की ये कहानी धर्मेंद्र के पिता मोहन कुशवाह सिरे से नकार चुके हैं. उनका दावा है, ‘एनकाउंटर से एक दिन पहले पुलिस उनके बेटे को पूछताछ के नाम पर घर से उठाकर ले गई थी. लॉकअप में मारपीट के दौरान उसकी मौत हुई है. पुलिस एनकाउंटर की मनगढ़ंत कहानी रचकर अपने पापों पर पर्दा डाल रही है.’ अपनी बात के समर्थन में वह धर्मेंद्र के शव पर बने चोटों के निशान भी दिखाते हैं.

मोहन के दावों की पुष्टि धर्मेंद्र की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी करती है, जिसमें बताया गया है कि उनकी मौत गोली लगने से नहीं बल्कि किसी भोथरे हथियार से दी गई चोट के कारण सिर में खून जमा होने से हुई है. पोस्टमॉर्टम करने वाली डॉक्टरों की तीन सदस्यीय टीम का हिस्सा रहे सार्थक जुगलानी बताते हैं, ‘धर्मेंद्र के शरीर पर एक से दो दिन पुरानी कई चोटें थीं, जो किसी भोथरे हथियार से दी गई थीं. चोटें इतनी गंभीर थीं कि सामान्य परिस्थितियों में व्यक्ति की मौत का कारण बन सकती थीं.’ धर्मेंद्र के मुठभेड़ में मारे जाने की पुलिसिया कहानी इसलिए भी किसी के गले नहीं उतर रही क्योंकि धर्मेंद्र को लगी गोलियों के घाव से खून नाममात्र का निकला है. गोली लगने पर इतना कम खून निकलना तब ही संभव है जब गोली लगने के कई घंटों पहले व्यक्ति दम तोड़ चुका हो. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में डॉक्टरों ने इस बात की भी पुष्टि की है. धर्मेंद्र को दो गोली लगी थी. पहली छाती के नीचे बायीं बांह की साइड में और दूसरी छाती के बायीं ओर ऊपर मारी गई थी. दोनों ही गोलियां शरीर के दूसरी ओर से बाहर निकल गई थीं.

इस पर प्रतिमा मैथ्यू का कहना है, ‘धर्मेंद्र चूंकि अपराधी प्रवृति का था, इसलिए मुठभेड़ के पहले हुए किसी झगड़े में उसे चोटें आईं होंगी. रहा सवाल कम खून निकलने का तो यह चिकित्सीय शोध का विषय है. क्या पता उन चोटों के कारण उसके शरीर में कुछ ऐसी अंदरूनी रासायनिक क्रियाएं हो रही हों जिससे कम खून निकला.’ हालांकि सार्थक जुगलानी उनकी इस कहानी को हास्यास्पद ठहराते हुए बताते हैं, ‘पहली बात चिकित्सीय विज्ञान में ऐसा संभव ही नहीं कि जीवित व्यक्ति को गोली लगे और खून न निकले और दूसरा यह कि धर्मेंद्र शारीरिक रूप से एकदम स्वस्थ था.’  मध्य प्रदेश पुलिस के सेवानिवृत उप पुलिस अधीक्षक एमपी सिंह चौहान कहते हैं, ‘पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट देखने के बाद मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि धर्मेंद्र की मौत पुलिस मुठभेड़ में नहीं हुई, उनकी हत्या की गई है.’

वहीं, मुठभेड़ के दौरान दो अपराधियों के भाग जाने की प्रतिमा मैथ्यू की कहानी भी गले नहीं उतरती. विशेषज्ञों का कहना है कि एफआईआर रिपोर्ट में उन्होंने मुठभेड़ स्थल को जिस तरह से घेरा जाना बताया है, उसके बाद किसी के भाग जाने की गुंजाइश ही नहीं बचती, फिर दो बदमाश कैसे भाग गए. वहीं पोस्टमॉर्टम के पहले डॉक्टरों की टीम ने भी मुठभेड़ स्थल का निरीक्षण किया था. वह भी ऐसे ही कई साक्ष्य मिलने का दावा करते हैं जो पुलिस की कहानी पर सवालिया निशान लगाते हैं. अगर धर्मेंद्र का आपराधिक रिकॉर्ड खंगाला जाए तो उस पर शहर के किसी भी थाने में कोई प्रकरण तक दर्ज नहीं है. वह दिन में ऑटो चलाता था और रात को ऑटो स्टैंड पर चौकीदारी करता था.

धर्मेंद्र के बारे में उसके पड़ोसियों का कहना है, ‘वह बस अपने काम से काम रखता था. ज्यादा बोलता भी नहीं था.’

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मृतक धर्मेंद्र कुशवाह

बहरहाल पुलिस की दहशत का क्षेत्र में कुछ ऐसा आलम है कि लोग अपना नाम तक बताना नहीं चाहते. नाम न छापने की शर्त पर एक शख्स बताते हैं, ‘धर्मेंद्र जब 4-5 साल का था, मैंने तब से उसे देखा है. वह बीड़ी, सिगरेट, पान तक नहीं छूता था, किसी की हत्या क्या करेगा. उसके साथ अन्याय हुआ है. दोषियों को सजा मिलनी ही चाहिए.’ वहीं स्थानीय निवासी भगवानदास रत्नाकर का कहना है, ‘पिता के कहने पर पहले वह दोने-पत्तल की दुकान पर बैठा करता था, फिर मोबाइल की दुकान खोली लेकिन वह चली नहीं. उसके बाद वह ऑटो चलाने लगा और पिता के साथ चौकीदारी. पुलिस ने उस मासूम को क्यों मार दिया, समझ नहीं आता.’

यह पहला मौका नहीं है जब ग्वालियर पुलिस की क्राइम ब्रांच की कार्यप्रणाली पर उंगुली उठी हो. पिछले वर्ष हुए मुकेश राठौर एनकाउंटर मामले में उनके खिलाफ हाई कोर्ट का फैसला 21 अगस्त को ही आया है, जिसमें कोर्ट ने एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए क्राइम ब्रांच की टीम पर उचित कानूनी कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं. इसी क्राइम ब्रांच ने पिछले वर्ष 21 अक्टूबर को चेन स्नैचिंग की वारदात को अंजाम देकर भागने के दौरान मुकेश राठौर को मार गिराने का दावा किया था. लेकिन मुकेश के परिजनों ने इस पर हंगामा कर दिया. शहर के हजीरा चौराहे पर शव रखकर जाम लगा दिया था और मामले की सीबीआई जांच की मांग की. धर्मेंद्र की तरह ही मुकेश के परिजनों का दावा था कि पुलिस ने मुकेश को महाराजपुरा क्षेत्र के कुंवरपुरा गांव से 20 अक्टूबर को उठाया था तो वह अगले दिन चोरी की घटना को अंजाम देते हुए कैसे पुलिस की गोली का शिकार हो गया? इसके समर्थन में जब गांव के कुछ प्रत्यक्षदर्शी भी सामने आए तो एनकाउंटर की यह कहानी क्राइम ब्रांच ही नहीं प्रशासन के भी गले की हड्डी बन गई. पुलिस जिस समय थाने में मुकेश को थर्ड डिग्री टॉर्चर दे रही थी उसी समय रामेश्वर यादव वहां मौजूद थे. दूसरे दिन जब उन्होंने मुकेश के एनकाउंटर की खबर अखबार में पढ़ी तो मीडिया के सामने आकर पुलिस के झूठ से पर्दा उठा दिया. रामेश्वर यादव के बयान और मुकेश के शरीर पर कई गंभीर चोटों के निशान से प्रशासन बैकफुट पर आ गया और मामले की सीआईडी जांच के आदेश दे दिए.

दूसरी ओर प्रशासन और पुलिस मामले को दबाने की जी तोड़ कोशिश में लग गए. मुकेश के भाई सुनील राठौर बताते हैं, ‘जब रामेश्वर मीडिया के सामने आए तो वहां मौजूद एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने उन्हें मामले से दूर रहने की समझाइश दी ताकि हमारा केस कमजोर पड़ जाए. पर वह अपने बयान पर डटे रहे. उनकी गवाही ही पुलिस के खिलाफ आए फैसले में निर्णायक साबित हुई.’ सुनील बताते हैं, ‘मेरे भाई पर पुलिस ने भले ही चोरी-चकारी के कई प्रकरण दर्ज किए हों पर वह बार-बार उन आरोपों से बरी कर दिए गए. फिर भी क्राइम ब्रांच ने उनका पीछा नहीं छोड़ा. नए सिरे से जिंदगी शुरू करने का बार-बार प्रयास किया लेकिन क्राइम ब्रांच के दो सिपाही जिनमें से एक हत्या के आरोप में जेल तक काट आया है और आज पुलिस से बर्खास्त है, उनके पीछे पड़े रहे. भैया जहां जाते वे वहीं से उन्हें उठा लाते और मामला दर्ज कर लेते. आप खुद ही देखिए क्राइम ब्रांच में ऐसे लोग भी काम कर रहे हैं जो हत्यारे भी हो सकते हैं.’ इस मामले में मुकेश पक्ष की पैरवी करने वाले वकील अवधेश भदौरिया का कहना है, ‘पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मुकेश के शरीर पर पंद्रह से अठारह गंभीर चोटों की पुष्टि हुई थी. मुकेश को तीन हिस्सों में पीटा गया था. कुछ चोटें छह तो कुछ दस से बारह घंटे पुरानी थीं. शरीर पर लगीं इन गंभीर चोटों के कारण ही उनकी मौत हो चुकी थी. पुलिस हिरासत में हुई मौत को छिपाने के लिए पुलिस ने एनकाउंटर की झूठी कहानी रची और कुछ किरदारों को इसमें शामिल कर चेन स्नैचिंग का सीन फिल्मा सबकी आंखों में धूल झोंकने का प्रयास किया.’

बहरहाल, धर्मेंद्र कुशवाह को क्राइम ब्रांच ने कब उठाया? यह साफ नहीं हो पा रहा है. धर्मेंद्र के पिता का कहना है, ‘दो अगस्त की रात 11 बजे पांच–छह पुलिसवाले घर आए और पूछताछ के नाम पर उसे घर से उठा ले गए थे.’ वहीं दूसरी ओर ये बात भी सामने आ रही है कि मोहन कुशवाह किसी दबाव के चलते सच छिपा रहे हैं. धर्मेंद्र को उसके घर से नहीं बल्कि घर से कुछ सौ मीटर की दूरी पर सुनसान जगह से क्राइम ब्रांच वालों ने तब उठाया जब वह खाना खाकर टहलने निकला था. पुलिस द्वारा महिंद्रा बोलेरो में धर्मेंद्र को ले जाते समय दो स्थानीय निवासियों ने भी देखा था. तीन दिन पहले घर में हुई अनबन के चलते धर्मेंद्र एक रात गायब रहा था. इसलिए जब उस रात धर्मेंद्र घर नहीं पहुंचा तो पिता ने सोचा कि शायद वह फिर से उसी तरह कहीं गया हो लेकिन जब उसका सुबह होने पर भी पता नहीं चला तो वह चिंतित हो उठे. तभी उन्हें धर्मेंद्र के अपहरण के दोनों प्रत्यक्षदर्शियों ने रात का घटनाक्रम कह सुनाया जिसके बाद वह बेटे की खोज-खबर के लिए आसपास के थानों में भी गए.

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परिवार वालों को न्याय का इंतजार

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने से पहले ही धर्मेद्र के परिजन मामले की न्यायिक जांच के लिए अड़े हुए थे. जांच खत्म होने तक मुठभेड़ में शामिल क्राइम ब्रांच की टीम को बर्खास्त करने या तबादला करने की मांग भी उन्होंने शासन के सामने रखी ताकि दोषी जांच को किसी भी प्रकार से प्रभावित न कर सकें. अपनी मांग के समर्थन में धर्मेंद्र के शव पर लगी चोटों को दिखाते हुए उन्होंने शवगृह से शव ले जाने से इंकार कर दिया.

फिर उनके समर्थन में क्षेत्रीय जनता, कुशवाह समाज और कई राजनीतिक दलों के नेता शवगृह पर आ डटे. विरोध के स्वर बढ़ते देख आनन-फानन में जिला कलेक्टर डॉ. संजय गोयल ने पीड़ित पक्ष और प्रदर्शनकारियों के साथ बैठक बुलाकर न्यायिक जांच के आदेश का मांग पत्र राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को फैक्स किया. साथ ही गृह सचिव और मुख्यमंत्री से फोन पर न्यायिक जांच की स्वीकृति मिलने की बात बताकर जांच जल्द शुरू कराने का आश्वासन दिया. तब जाकर पीड़ित धर्मेंद्र का शव ले जाने तैयार हुआ. तीन दिन बीतने के बाद भी जब न तो न्यायिक जांच के लिखित आदेश आए और न ही मुठभेड़ में शामिल क्राइम ब्रांच की टीम को बर्खास्त किया गया तो राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ता ‘पुलिस अत्याचार मिटाओ संघर्ष समिति’ का गठन कर मोहन कुशवाह के साथ अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए. इस धरने की गूंज भोपाल तक पहुंची तो दूसरे ही दिन राज्य सरकार ने जस्टिस सीपी कुलश्रेष्ठ की अध्यक्षता में एक सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग का गठनकर धरना स्थल पर न्यायिक जांच के लिखित आदेश भिजवा दिए. लेकिन आंदोलनकारी इससे संतुष्ट नहीं हुए और अगले एक महीने तक धरने पर बैठे रहे.

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धर्मेंद्र के पिता मोहन कुशवाह अब भी न्याय की आस में भटक रहे हैं

उनकी मांग थी कि जांच को प्रभावित होने से बचाने के लिए मुठभेड़ में शामिल क्राइम ब्रांच की टीम को भी हटाया जाए. साथ ही उन्हें सीपी कुलश्रेष्ठ को जांच की कमान सौंपे जाने पर भी आपत्ति थी. पुलिस अत्याचार मिटाओ संघर्ष समिति के महासचिव भारत देहलवार बताते हैं, ‘जांच के नाम पर शासन केवल लीपापोती कर रहा था. जांच जस्टिस सीपी कुलश्रेष्ठ को थमा दी गई, जिनके भाई स्वयं संभाग के मुरैना जिले में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के तौर पर पदस्थ हैं. ऊपर से मुठभेड़ में शामिल क्राइम ब्रांच की एएसपी प्रतिमा एस. मैथ्यू व उनकी टीम को न तो बर्खास्त किया गया और न ही उनका तबादला हुआ. इससे तो जांच प्रभावित होने की आशंका है और वैसे भी आप ही देखिए जांच आयोग तो बना दिया पर महीने भर से ज्यादा होने को है लेकिन जांच अब तक शुरू नहीं की जा सकी है.’

उधर, बैकफुट पर आता देख पुलिस ने खुद मोर्चा संभाला और आंदोलनकारी और पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टरों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया. आंदोलन के संरक्षक काशीराम देहलवार के भतीजे नीलेश को झूठे आरोप में फंसाकर हवालात में डाल दिया गया. पोस्टमॉर्टम करने वाली डॉक्टरों की टीम पर दबाव बनाने के लिए एएसपी प्रतिमा मैथ्यू ने पीएम रिपोर्ट से संबंधित क्वैरी मांगने के लिए अस्पताल अधीक्षक को पत्र लिख दिया. पर दोनों ही तरफ से पुलिस को मुंह की खानी पड़ी. न तो नीलेश पर आरोप साबित हुए और डॉक्टर भी अपनी दी पीएम रिपोर्ट पर डटे रहे. 25 अगस्त को राज्य सरकार के विरोध में माकपा और समानता दल ने 194 गिरफ्तारियां दीं.

मामला राजनीतिक तूल पकड़ चुका था. छह सितंबर को मुख्यमंत्री का ग्वालियर दौरा प्रस्तावित था और दो दर्जन से अधिक दलों के सहयोग से बनी ‘पुलिस अत्याचार मिटाओ संघर्ष समिति’ ने मुख्यमंत्री को काले झंडे दिखाने की योजना बनाई थी. सूबे के मुखिया के सामने अपनी किरकिरी होने से बचाने के लिए पुलिस और प्रशासन ने आंदोलन को तोड़ने की रणनीति पर अमल करना शुरू किया जिसमें उन्हें दो सत्तारूढ़ दल के स्थानीय विधायकों का साथ मिला.

समिति के संरक्षक काशीराम देहलवार बताते हैं, ‘प्रशासन-पुलिस जब धर्मेंद्र के न्याय की आवाज नहीं दबा सके तो उन्होंने आंदोलन में फूट के बीज बोने शुरू कर दिए. मोहन को आर्थिक सहायता, उनके दूसरे बेटे को सरकारी नौकरी और दूसरी मांगों को पूरी करवाने का आश्वासन देकर मुख्यमंत्री से सीधी मुलाकात करवाने का वादा किया. पूरा कुशवाह समाज इस धरने प्रदर्शन में शामिल था इसलिए कुशवाह समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले दो स्थानीय भाजपा विधायक भी मुख्यमंत्री के सामने अपनी किरकिरी नहीं होने देना चाहते थे. दोषी को सजा मिले और पीड़ित को न्याय इसे दरकिनार कर उन्होंने बस अपनी राजनीति की. लिहाजा पिता मोहन न्याय के लिए भटक रहे हैं.’

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दूसरी ओर, धर्मेंद्र के पुलिस के निशाने पर आने की जो कहानी सामने आई है उसके अनुसार धर्मेंद्र और हरेंद्र राणा का दाहिना हाथ मनीष कोली बचपन से ही एक-दूसरे से परिचित थे. दोनों ही हजीरा क्षेत्र में रहते थे. समय के साथ मनीष कोली अपराध की दुनिया से प्रभावित होकर उसका हिस्सा बन गया और धर्मेंद्र ने परिवार की जिम्मेदारी उठा ली. पांच सदस्यों वाले धर्मेंद्र के परिवार में उसके माता-पिता, एक बड़ा भाई और एक बहन थे. पिता एक ऑटो स्टैंड की चौकीदारी करते थे. धर्मेंद्र बचपन से ही पढ़ाई के साथ पिता के काम में हाथ बंटाया करता था. पहले पिता ने उसे दोने-पत्तल की दुकान खुलवा दी. दुकान नहीं चली तो धर्मेंद्र ने मोबाइल का काम शुरू किया लेकिन कुछ दिन बाद वह भी बंद करके ऑटो चलाने लगा. इसके अलावा धर्मेंद्र ने एक प्राइवेट काॅलेज से बीएससी में दाखिला भी लिया था. हालांकि दो साल पहले गिरने से पिता की रीढ़ की हड्डी में चोट लगने के कारण परिवार की सारी जिम्मेदारी धर्मेंद्र के कंधों पर आ गई. बड़ा भाई एम. टेक कर रहा था, उसकी पढ़ाई में कोई व्यवधान न पड़े इसलिए धर्मेंद्र ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी. अब वह दिन में ऑटो चलाता था और रात को ऑटो स्टैंड पर चौकीदारी करता था. बीच में समय मिलता था तो ऑटो स्टैंड के बाहर ही गाड़ियों की धुलाई कर लेता था. कभी-कभार राह चलते उसकी मुलाकात मनीष कोली से हो जाती थी. अपनी ही दुनिया में खोया रहने वाला धर्मेंद्र इस बात से अंजान था कि मनीष कोली पुलिस और क्राइम ब्रांच के निशाने पर है. इन्हीं मुलाकातों के चलते धर्मेंद्र क्राइम ब्रांच की नजर में आया. हरेंद्र राणा और मनीष कोली की गिरफ्तारी के बाद जब पुलिस को संदेह हुआ कि ये दोनों जेल से ही कोई आपराधिक षड्यंत्र रच रहे हैं तो उन्होंने इनके संपर्कों को टारगेट करना शुरू कर दिया. इसी कड़ी में धर्मेंद्र को क्राइम ब्रांच ने उठा लिया और हरेंद्र राणा से उसके संबंध उगलवाने के लिए उसे तब तक पीटा, जब तक कि उसकी मौत नहीं हो गई. इसके बाद क्राइम ब्रांच ने मुकेश राठौर एनकाउंटर की तरह ही फिर एक पटकथा लिखी और उसे एनकाउंटर का नाम दे दिया.

वैसे दोनों ही मामलों में शासन-प्रशासन के रवैये को देखकर लगता ही नहीं कि वह पीड़ितों को न्याय दिलाने के इच्छुक हैं. धर्मेंद्र की मौत के मामले में जांच के नाम पर बस खानापूर्ति ही की जा रही है. कथित एनकाउंटर के दूसरे दिन ही न्यायिक जांच के आदेश दे दिए गए थे लेकिन 40 दिन बीतने के बाद भी अब तक जांच शुरू नहीं हो सकी है. वहीं सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार आयोग की स्पष्ट गाइडलाइन हैं कि एनकाउंटर में किसी भी व्यक्ति के मारे जाने पर तुरंत मजिस्ट्रियल जांच प्रशासन द्वारा कराई जानी चाहिए (वैसे तो निर्देश एनकाउंटर में शामिल टीम के हथियार जब्त करने के भी हैं लेकिन इसका पालन नहीं किया जाता) लेकिन धर्मेंद्र के मामले में तो मजिस्ट्रियल जांच ही एक महीने बाद शुरू करवाई गई. एक सीनियर एडवोकेट का कहना है कि यह सब बस मामले को लटकाना चाहते हैं इसलिए जांच प्रक्रिया को लंबा खींचा जा रहा है.

एक अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी कहते हैं कि अगर इस मामले में कार्रवाई होती है तो पुलिस अधीक्षक हरिनारायणचारी मिश्र पर भी आईपीसी की धारा 120 (बी) के तहत प्रकरण दर्ज हो सकता है, क्योंकि मुठभेड़ को उनकी भी स्वीकृति प्राप्त थी. इसलिए विभाग फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है. वहीं मुकेश राठौर के मामले में भी पुलिस विभाग ने क्राइम ब्रांच पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है जिससे साफ जाहिर है कि एएसपी प्रतिमा एस. मैथ्यू और उनकी टीम को बचने का पूरा मौका दिया जा रहा है. इस बारे में विभाग का कहना है कि कोर्ट के फैसले के खिलाफ रिव्यू पिटीशन दाखिल की गई है. मामले की सीआईडी जांच भी चल रही है.  बहरहाल न्याय की आस लगाए धर्मेंद्र कुशवाह और मुकेश राठौर के परिजनों को अब बस कोर्ट से ही न्याय की उम्मीद है.

विचार के जवाब में गोली का जमाना

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कर्नाटक में धर्मांधता, पाखंड विरोधी लेखक एम एम कलबुर्गी की हत्या के बाद कई धुंधली चीजों पर रोशनी गिरी है और वे फिर से चमक उठी हैं. अक्सर निराश लेखक बड़बड़ाते पाए जाते हैं कि हमें कौन पढ़ता है, लिखे का क्या असर होता है, समाज पर जिनका अवैध वर्चस्व है उनके कान पर जूं तक नहीं रेंगती! उन्हें जरा आंखें खोलकर देखना चाहिए कि दो साल के भीतर भारत और पड़ोसी देशों में कम से कम दस लेखक, ब्लॉगर, एक्टिविस्ट बंद दिमाग के लोगों के हाथों मौत के घाट उतारे जा चुके हैं. बहुतों का हमलों और धमकियों के कारण जीना मुहाल हो गया है, कईयों को देश छोड़ना पड़ा है. जवाब यह है कि अगर आप अपने हिस्से का सच लिखते हैं, उस पर अड़े रहते हैं तो जान से जा सकते हैं. विरोधी विचार का जवाब न तलाश पाने की बौखलाहट में धर्म की ओट लेकर गोली मारने की प्रवृत्ति बढ़ने के साथ ही लिखना, बोलना, जागरूक बनाना खतरनाक काम होता जा रहा है.

पहले समझा जाता था कि सरकारी साहित्यिक अकादमियां और सांस्कृतिक संस्थाएं क्लर्क चलाते हैं जो कि आदमी ही होते हैं. अब दिखाई दे रहा है कि वे तो रोबोट हैं जो कलबुर्गी को साहित्य अकादमी पुरस्कार दे सकते थे लेकिन उनकी हत्या पर एक शोक प्रस्ताव तक जारी नहीं कर सकते क्योंकि ऐसा करने की कमांड उन्हें अभी नहीं मिली है. जिस तथाकथित सर्वोच्च पुरस्कार के लिए हिन्दी (बाकी भाषाओं का पूर्ण अंदाजा नहीं है) में इतनी कनकव्वेबाजी और जूतमपैजार होती है उसे अंततः एक मंत्री अपनी जेब के सलाहकारों के जरिए तय करता है. संस्था की विश्वसनीयता का भ्रम बनाए रखने के लिए कभी-कभार कुछ अच्छे लेखकों के नाम भी छांट लिए जाते हैं. रोबोट वह पुरस्कार थमा देते हैं फिर लेखक से कोई सरोकार नहीं रखते. भले ही उसे उन्हीं विचारों पर टिके रहने के लिए मार डाला जाए जिनके लिए विरूदावली गान के साथ यह तमगा दिया गया था.

अगर लेखक कलबुर्गी हो जो मध्यवर्ग की सड़ियल प्रेम कहानियां नहीं लिखता, जिसने लिंगायत धार्मिक आंदोलन की अंधविश्वास, जातिप्रथा, मूर्तिपूजा, कर्मकांड का विरोध करने वाली वचन शास्त्र परंपरा (कबीरदास से काफी पुरानी) पर मौलिक शोध किया हो, जो धर्म को व्यक्तिगत मोक्ष और देवत्व के जाल से बाहर लाकर सामाजिक बदलाव का हथियार बनाना चाहता हो तो रोशनी की एक लंबी लकीर सत्ता का असली चेहरा भी दिखा देती है. जातीय-धार्मिक ध्रुवीकरण के नए फाॅर्मूले खोजने वाले, विफलता से डरे हुए ये राजनेता कौन-सा ‘आधुनिक भारत’ बनाने निकले हैं. ये राजनेता जिनकी उंगलियां अंगूठियों से लदी हुई हैं, जो हर चुनाव से पहले मठों, मजारों की परिक्रमा करते हैं, बलि देते हैं, गुप्त तांत्रिक अनुष्ठान कराते हैं. वोट बिदक जाने के डर से खाप पंचायतों समेत तमाम कुरीतियों और अपराधों के खिलाफ मुंह सिले रहते हैं. भला उन्हें कलबुर्गी, दाभोलकर, पानसारे जैसे मनुष्यों की हत्याओं से परेशानी क्यों होगी! ये उलटबांसी काफी हद तक उन्हीं की देन है कि समाज में पूंजी और तकनीक के प्रभाव के समानान्तर ही कर्मकांड, अंधविश्वास और पोंगापंथ फलते-फूलते दिखाई दे रहे हैं, विवेक बेहोश हुआ जा रहा है.

मौजूदा अच्छे दिनों का परिदृश्य तो और भी भयानक है जिसमें भारतीयता को उसके विचार वैविध्य से मिलने वाली ऊर्जा से वंचित कर कुंठित, हिंसक और मनमाने हिंदू रंग में रंगने की कोशिश की जा रही है, इस मूर्खतापूर्ण आत्मविश्वास के साथ जैसे चार्वाक, लोकायत, सांख्य, बौद्ध, जैन, कबीर, दलितों, आदिवासियों के दर्शन, आचार-विचार और धार्मिकताओं का कभी अस्तित्व ही नहीं रहा. पुराणों की टीकाओं, स्मृतियों के पैरोकारों को सत्ताधारी होने के गुमान के साथ अब काॅरपोरेट का पैसा भी मिल गया है. वे नासमझ और अपनी हीनता के कारण गुस्से से भरे लोगों को उकसाकर हिंसा का पाटा चलाकर मैदान बराबर कर देना चाहते हैं.

एक तरफ यह आलम है तो दूसरी ओर हिन्दी में कलबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने वाले लेखक उदय प्रकाश से हिसाब-किताब बराबर करने की भी पैंतरेबाजी चल रही है. जो इस क्षुद्रता में लगे हैं, उदय को सुधरने का मौका भी नहीं देना चाहते या फिर उन्हें व्यक्तिगत कुंठाओं को उलीचने की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी अधिक प्यारी है. यही झंझावाती समय हिन्दी और दूसरी भाषाओं में सच्चे लेखकों के निर्माण का भी है. बहरहाल एक लेखक की जिंदगी तो कलबुर्गी जैसी ही होनी चाहिए, आसान पहुंच वाले चारागाहों में फैले भेड़ों की तरह झुंड में मैं-मैं करते हुए जीना भी कोई जीना है.

‘किसी फिल्म में हीरो-हीरोइन का होना जरूरी नहीं’

Ghaywan WEB
नीरज घायवान

‘मसान’  तक की अपनी यात्रा के बारे में बताइए. इसे बनाने का विचार कैसे आया?

मसान तक की यात्रा के बारे में जानने से पहले ये जानना जरूरी है कि आखिर मैं फिल्मों में आया कैसे और एक फिल्मकार कैसे बना. बचपन में मैंने दूरदर्शन पर काफी कला फिल्में या कहें समानांतर सिनेमा देखा है, इसलिए नहीं कि इनमें रुचि थी बल्कि इसलिए क्योंकि मेरी मां और बहन इन्हें पसंद करती थीं. तब से ही मैं श्याम बेनेगल व सत्यजीत रे के नाम अौर काम से वाकिफ हो गया था. अगर ऐसा कुछ नहीं हुआ होता तो मैं भी औरों की ही तरह सिर्फ अमिताभ बच्चन की फिल्मों को देखते हुए ही बड़ा हुआ होता.

मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और फिर एमबीए करने पुणे पहुंचा. वहां एक बार मैंने सिनेमा पर फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट के पूर्व डीन समर नखाटे की क्लास अटेंड की, जिसने फिल्मों को देखने के मेरे नजरिये को पूरी तरह बदल दिया. हालांकि मैंने सत्यजीत रे की पाथेर पांचाली देखी हुई थी पर तब वो मुझे बहुत बोरिंग लगी थी. उसके बारे में नखाटे के विश्लेषण ने मुझे उस फिल्म के बारे में एक नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया. फिर मैंने एक हिन्दी फिल्म वेबसाइट ‘पैशन फॉर सिनेमा डॉट कॉम’ के लिए काम करना शुरू किया. अनुराग कश्यप और सुधीर मिश्रा जैसे बड़े फिल्मकारों के ब्लॉग पर की जाने वाली मेरी टिप्पणियों ने धीरे-धीरे ब्लॉग की शक्ल ले ली, जहां मैं विश्व सिनेमा पर अपने विचार और रिव्यू लिखता. मैं लगभग महीने भर का वक्त लेकर किसी फिल्म का विश्लेषण करता और विस्तृत रूप से उस पर लिखता.

और फिर मुझे वेबसाइट का संपादक बना दिया गया. तब मुझे तीन और लोगों के साथ अनुराग कश्यप से मिलने के लिए मुंबई बुलाया गया. उस दिन हम सुबह पांच बजे तक सिनेमा पर बात करते रहे, बातचीत के दौरान ही विशाल भारद्वाज भी आ गए. वो किसी सपने की तरह था.

उसी वक्त से मैंने सोच लिया कि मुझे सिनेमा के क्षेत्र में ही कुछ करना है. फिर मुंबई आकर कुछ दिन मैंने यूटीवी के प्रोडक्शन हाउस यूटीवी स्पॉटबॉय के साथ काम किया. फिर एक दिन अनुराग का फोन आया और उन्होंने अपने साथ काम करने का प्रस्ताव रखा. बस फिर क्या, मैंने घर फोन करके अपने माता-पिता से कहा कि मैं अपनी कॉर्पोरेट की नौकरी छोड़कर फिल्म बनाने जा रहा हूं. अनुराग कश्यप के साथ गैंग्स ऑफ वासेपुर में असिस्टेंट डायरेक्टर के बतौर काम करना ही मेरा फिल्म स्कूल बना. यही वो समय था जब मैं ‘मसान’ के बारे में सोचने लगा था. ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ की शूटिंग के समय पर हम वाराणसी गए थे. वहां मैंने इस शहर के बारे में एक छोटी कहानी लिखी. फिर जब वरुण (मसान के दूसरे स्क्रीनप्ले राइटर) मेरे साथ जुड़े तब हम फिर वाराणसी गए और शहर को समझने के लिए लगभग डेढ़ महीना वहां बिताया. तब जाकर मसान की ये कहानी लिख पाए जो आपने फिल्म में देखी.

कई सालों से बॉलीवुड की कई कहानियां इसी शहर के इर्द-गिर्द बुनी गई हैं. क्या आप वाराणसी को  अलग तरह से दिखाने के बारे में आशंकित या चिंतित नहीं थे?

जैसा मैंने बताया कि हमने वाराणसी में काफी समय गुजारा, ये इसलिए नहीं था कि किसी टूरिस्ट की तरह हम शहर घूमे, बल्कि हम खुद बनारसी बनना चाहते थे. हमने स्थानीय बोली सीखने की कोशिश की, छोटे शहरों की लड़कियों-महिलाओं के बारे में जाना. आजकल की फिल्मों में छोटे शहरों को जिस तरह एक व्यंग्य के रूप में पेश किया जाता है, वो मुझे और वरुण दोनों को ही पसंद नहीं है. साथ ही हम ये भी देख रहे थे कि कहीं कहानी के चलते हम वास्तविकता से ही दूर न चले जाएं. इसीलिए हमने दर्शकों को खुद सोचने का मौका दिया. एक तरफ हमने छोटे शहरों का बढ़ता हुआ यानी प्रगतिवादी रवैया दिखाया और उसके सामने पुराणपंथी, नैतिकता का चोला पहने खड़े झूठ और कपट को भी रखा. फिल्म के कलाकार संजय मिश्रा के शब्दों में कहूं तो ‘ये फिल्म बनारस की नहीं बनारसियों के बारे में है’

Masaan WEB
फिल्म ‘मसान’ का एक पोस्टर

फिल्म में दिल को छू लेने वाली अदायगी है. फिल्म की कास्ट के बारे में फैसला कैसे कर पाए?

क्योंकि मैं ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में ऋचा चड्ढा के साथ काम कर चुका था तो देवी का किरदार लिखते समय सिर्फ वे ही मेरे दिमाग में थीं. वे इस लड़की के रोल के लिए बिलकुल सटीक हैं. साथ ही जब फिल्म बार-बार टल रही थी, तब भी वो हमारे साथ ही रहीं, पीछे नहीं हटीं.

शुरू में हमने देवी के पिता के किरदार के लिए मनोज बाजपेयी का नाम सोचा था, पर ऐसा हो नहीं पाया. बाद में संजय मिश्रा, जो दिल से, सच्चे बनारसी हैं, हमारे विद्याधर बने. अब तक वो जिस तरह सिर्फ हास्य किरदार करते रहे हैं, ये उनसे आगे की बात है. वैसे भी फिल्म ‘आंखों देखी’ के बाद से ही एक चरित्र अभिनेता के रूप में उनकी असली क्षमताओं की पहचान हो पाई है. वे कहते हैं कि उनके लिए ये किरदार उनकी जड़ों की तरफ लौटने जैसा है.

विकी कौशल को चुनने के पीछे एक दूसरी ही कहानी है. हम दोनों ही ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में असिस्टेंट डायरेक्टर थे और पहले-पहल तो मैं ये सोचकर ही उन्हें ये रोल ऑफर नहीं करना चाहता था कि कहीं ये किसी दोस्त का पक्ष लेने जैसा न हो जाए. पर ऑडिशन के समय जिस आसानी से उन्होंने खुद को एक पंजाबी से बनारसी में बदला, मुझे पता चल गया कि दीपक का किरदार उन्हीं के लिए है.

फिल्म में कविताओं के रंग घुले हुए हैं. कविताएं शामिल करने का विचार कैसे आया?

फिल्म में वरुण का मुख्य रूप से यही तो योगदान है. हिंदी सिनेमा में हिंदी साहित्य अछूता ही रहा है, इस फिल्म में शालू का किरदार इसका जवाब है. फिल्म में दुष्यंत कुमार, मिर्जा गालिब, बशीर बद्र, अकबर इलाहाबादी और निदा फाजली की कविताओं/शेरों का प्रयोग किया गया है. यहां तक कि हमारे एक गाने के बोल भी हिंदी कविताओं के खजाने से लिए गए हैं.

फिल्म में बनारस की पृष्ठभूमि में कई कथानक साथ चलते हैं.  ‘शिप ऑफ थिसियस’  जैसी फिल्मों ने इसे बहुत प्रभावी रूप से प्रयोग किया है, क्या ये विचार वहीं से आया था?

मेरी लिखी एक छोटी कहानी इस फिल्म के कथानक का आधार रही है. पर हम जब इस पर काम कर रहे थे तब हमने फिल्म को एक हिंदी उपन्यास की तरह गढ़ा. हां, शिप ऑफ थिसियस में कई कहानियां हैं पर हमारी फिल्म बिना किसी विशेष प्रयास के अपने मौलिक स्वरूप में पहुंच जाती है.

‘मसान’  में सेक्स स्कैंडल व जातिगत भेदभाव के मुद्दों को भी उठाया गया है. क्या ये तय था कि छोटे शहरों को किसी विशेष तरीके से ही दिखाना है या फिर ये सिर्फ आम जिंदगी को कैद करने की कोशिश थी?

अगर गौर करें तो इंडस्ट्री की गंभीर फिल्मों में ही सामाजिक संदेश होते हैं. चाहे वो गृह युद्ध संबंधी हों या किसी शारीरिक अक्षमता के बारे में हों. पर हम सोच के उस दायरे से आते हैं जहां कहानी मूल में है और उसके इर्द-गिर्द सामाजिक और राजनीतिक परतों को बुना गया है. आप मणिरत्नम की फिल्मों को देख लीजिए. उनकी किसी फिल्म की पृष्ठभूमि भले ही गृहयुद्ध की हो उसके मूल में एक खूबसूरत प्रेमकथा होती है. अब मेरी फिल्म का उदाहारण लेते हैं. फिल्म में इंस्पेक्टर का किरदार देखिए. ये सिस्टम पर कोई सीधी चोट करने की बजाय उस भ्रष्ट चरित्र को दिखा रहा है जो समाज में आसानी से देखा जा सकता है. वो सादे कपड़ों में पुलिस चौकी से दूर जाकर रिश्वत लेता है. तो ये कहानी का स्वाभाविक हिस्सा है जो समाज की विभिन्न परतों को दिखा रहा है.

फिल्म में कहीं बहुत उदासी है तो कहीं ये बहुत सहज और सरल है. क्या कहानी कहने के किसी विशेष तरीके को प्रयोग करना चाहते थे?

मैं इस बात को गलत साबित करना चाहता था कि किसी फिल्म में सिर्फ हीरो-हीरोइन का होना जरूरी है. हमारी फिल्म में हर किरदार अहम है. हमने कहानी को ऐसे ही बनाया था कि अगर किसी जगह पर एक कहानी थोड़ी उदास या विषादपूर्ण हो तो हम साथ चल रही दूसरी कहानी को कुछ हल्का या सरल ही रखें. ऐसा जान-बूझकर ही किया गया था. आप मैक्सिको के फिल्म निर्देशक अलेजांद्रो इनार्तियु की फिल्में देखें तो उन्हें कला या मुख्यधारा जैसे किसी खांचे में नहीं बांट पाएंगे. वे ऐसी फिल्में हैं जो लोगों से जुड़ती हैं, उन्हें प्रभावित करती हैं. मैं भी अपनी फिल्म से बिलकुल यही चाहता था.

आत्म-अन्वेषण यानी खुद की खोज आपकी फिल्म का एक अभिन्न हिस्सा है. इसी पर बात करें तो ये क्यों जरूरी लगा कि दोनों मुख्य किरदारों को अंत में मिलना ही चाहिए?

वो मिले क्योंकि वो वहां थे! यहां मैं फिर कहूंगा कि हमने फिल्म को किसी हिंदी उपन्यास की तरह बनाया है, जहां लोग, जगहों और चीजों के बीच में किसी भी अवसर और संयोग की पूरी-पूरी संभावना रहती है. अगर आप फिल्म की परिस्थितियों को गौर से देखेंगे तो पता चलेगा कि दोनों किरदारों के रास्ते कई बार टकराते हैं पर वो इससे अनजान हैं. इसके अलावा, अगर ऐसा नहीं होता तो दर्शकों को एक शून्यवादी, अर्थहीन-सा अंत देखने को मिलता, यह फिल्म की टैगलाइन के उलट होता, जो कहती है, सेलीब्रेटिंग लाइफ एंड डेथ, एंड एवरीथिंग इन बिटवीन (जीवन और मृत्यु के बीच की सभी चीजों पर उत्सव मनाना).

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कांस फिल्म समारोह में फिल्म की टीम

दर्शकों के एक वर्ग का मानना है कि फिल्म अच्छी है पर उतनी नहीं कि उसे कांस जैसे नामी फिल्म समारोह में इतना सराहा जाए! आप क्या कहना चाहेंगे?

वैसे तो फिल्म को हर तरफ सराहना ही मिली है पर आपका शुक्रिया कि इसकी आलोचना भी मुझ तक पहुंचाई. मुझे कोई गिला नहीं है कि लोग ‘मसान’ को जरूरत से ज्यादा तवज्जो देने की बात कह रहे हैं. अगर कोई फिल्म एक अच्छा विचार-विमर्श शुरू नहीं कर सकती तो क्या फायदा? किसी फिल्म की प्रासंगिकता के लिए स्वस्थ आलोचना जरूरी होती है.

इसके उलट, क्या आपको लगता है कि  ‘द लंचबॉक्स’ के बाद दर्शकों का एक बड़ा वर्ग तैयार हुआ है जो इस तरह की फिल्मों को देखना पसंद करता है?

मैं ‘द लंचबॉक्स’ का शुक्रगुजार हूं. उसके आने के बाद से ही धीरे-धीरे लोगों की धारणा बदली कि फिल्म समारोह में दिखाई जाने वाली फिल्में भी आम दर्शकों को भा सकती हैं, वे उनको एंजॉय कर सकते हैं. मुझे ढेरों लोगों ने मेसेज भेजे कि उन्हें मेरी फिल्म बहुत पसंद आई. एक सज्जन जिन्हें मैं जानता तक नहीं, उन्होंने मुझे फेसबुक पर मेसेज किया कि कैसे फिल्म देखते हुए उन्हें उनके पिता का दाह-संस्कार याद आया. और यही बातें होती हैं जो किसी फिल्मकार को बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड से ज्यादा याद रहती हैं.

तो अब मसान की सफलता के बाद क्या योजना है?

मैंने पिछले पांच सालों से कोई ब्रेक नहीं लिया है तो सबसे पहले तो मैं छुट्टी पर जाने की सोच रहा हूं. ऐसी जगह जहां कोई मुझे न जानता हो, जिससे मैं इस फिल्म से आगे निकल कर अपने नए प्रोजेक्ट के बारे में सोच सकूं.

आजादी तो मिल गई है पर हमें पता नहीं कि उसका करना क्या है?

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लगभग बीस साल पहले की बात है. कलकत्ता के ‘फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन’ की ओर से ‘दो बीघा जमीन’ फिल्म के निर्देशक बिमल रॉय और हमें यानी उनके साथियों को सम्मान दिया जा रहा था. ये एक साधारण पर रुचिकर समारोह था. बहुत अच्छे भाषण हुए, पर श्रोता बड़ी उत्सुकता के साथ बिमल रॉय को सुनने की प्रतीक्षा कर रहे थे. हम सब वहां फर्श पर बैठे थे, मैं बिमल दा के पास ही बैठा था और देख रहा था कि जैसे-जैसे उनके बोलने का समय आ रहा था कि उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी. फिर जब उनकी बारी आई, वे उठे और हाथ जोड़कर सिर्फ इतना कहा, ‘जो कुछ कहना होता है मैं अपनी फिल्मों के माध्यम से कह देता हूं, मेरे पास कहने के लिए और कुछ नहीं है.’

इस समय मैं भी सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं. अगर मैं इससे ज्यादा कहने का साहस कर पा रहा हूं, तो सिर्फ इसलिए कि जिस व्यक्ति के नाम पर आपकी यूनिवर्सिटी बनी है, उसके व्यक्तित्व से मुझे प्यार है. उतना ही प्यार और आदर, बल्कि उससे भी ज्यादा, आपकी यूनिवर्सिटी से जुड़े मेरे मन में पीसी जोशी के लिए है. मेरे जीवन के कुछ बेहद कीमती पल इनकी ही बदौलत हैं, कुछ ऐसे कर्ज भी हैं जिन्हें मैं कभी चुका नहीं सकता. इसलिए आपकी संस्था की ओर से मिले किसी भी निमंत्रण को अस्वीकार नहीं कर सकता. अगर आप मुझे फर्श साफ करने के लिए भी बुलाते तब भी मैं उतना ही खुश और सम्मानित महसूस करता, जितना इस समय यहां खड़े होकर आपको संबोधित करने में महसूस कर रहा हूं. पर उस सेवा के लिए मैं शायद अधिक योग्य साबित होता.

कृपया मुझे गलत न समझें. मैं शिष्टता का दिखावा नहीं कर रहा हूं. जो बात मैंने कही है, वह दिल से कही है और अब आगे भी जो कहूंगा, दिल से ही कहूंगा, फिर चाहे वह आपको अच्छा लगे या न लगे, वह ऐसे मौकों के अनुकूल हो चाहे प्रतिकूल. शायद आप सब जानते होंगे कि शैक्षणिक वातावरण से मेरा संबंध लगभग 25 बरसों से टूटा हुआ है. मैंने कभी किसी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह को भी संबोधित नहीं किया है.

वैसे यहां मैं ये भी जोड़ना चाहूंगा कि आपकी दुनिया से मेरा नाता टूटना ऐच्छिक नहीं था. इस दूरी के लिए कहीं न कहीं हमारे देश की फिल्म बनाने की दशा जिम्मेदार है. हमारी फिल्मी दुनिया में या तो अभिनेता को इतना कम काम मिलता है कि वह भूखों मरता है या फिर चाहे धन-दौलत की भूख हो या न हो, उसे इतना ज्यादा काम करना पड़ता है कि वह हर तरफ से कट जाता है. उसे न अपने पारिवारिक जीवन की सुध-बुध रहती है, न ही अपनी मानसिक और आत्मिक आवश्यकताओं की. पिछले 25 वर्षों में मैंने लगभग सवा-सौ फिल्मों में काम किया है. इतने समय में अमेरिका या यूरोप में एक अभिनेता 30-35 फिल्मों में काम करता है. इससे आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं मेरी जिंदगी का कितना बड़ा हिस्सा सेल्यूलॉयड की रीलों में दफन हुआ पड़ा है. इस अरसे में कितनी किताबें थीं, जो मैं नहीं पढ़ सका, कितने आयोजन थे जहां मैं जाना चाहता था पर जा नहीं सका. कभी-कभी मैं खुद को बहुत पिछड़ा हुआ महसूस करता हूं और मेरी कुंठा तब और बढ़ जाती है जब मैं सोचता हूं कि इन सवा सौ फिल्मों में कितनी फिल्में महत्वपूर्ण होंगी? कितनी ऐसी फिल्में होंगी, जिन्हें याद रखा जाएगा? शायद बहुत कम, मुश्किल से एक ही हाथ की उंगलियों पर गिनने लायक. और उन्हें भी लोग या तो भूल गए हैं या जल्दी ही भूल जाएंगे.

इसीलिए मैंने कहा था कि मैं शिष्टता नहीं दिखा रहा हूं. मैं आपको सचेत करना चाहता हूं कि अगर मेरा भाषण खास विद्वता का सबूत न दे, तो आपको निराश न होकर मुझे माफ कर देना चाहिए. बिमल दा बिलकुल सही थे. एक कलाकार का क्षेत्र उसका काम ही होता है. इसीलिए मैं यहां जो कुछ कह रहा हूं, अपने जीवन के अपने अनुभव से ही कह रहा हूं, जो मैंने देखा-परखा-महसूस किया. उससे बाहर की बात करना बेवकूफी होगी, किसी दिखावे सरीखा होगा.

इस समय मुझे अपने विद्यार्थी जीवन की एक घटना याद आ रही है, जिसे मैं कभी भुला नहीं सका, जिसने मेरे मन पर बहुत गहरा असर डाला. मैं अपने परिवार के साथ गर्मियों की छुट्टियां मनाने रावलपिंडी से कश्मीर जा रहा था. पिछली रात भारी बारिश होने के कारण से रास्ते में पहाड़ का एक हिस्सा टूटकर गिर गया था जिसके कारण सड़क बंद हो गई थी. दोनों तरफ मोटरों की लंबी कतारें लग गईं. न खाने-पीने का इंतजाम था, न सोने का. पीडब्ल्यूडी के कर्मचारी सड़क की मरम्मत करने में जी-तोड़ मेहनत कर रहे थे. फिर भी ड्राइवर और यात्री हर समय उनके पीछे पड़े रहते, उन्हें सुस्त और निकम्मा कह-कहकर कोसते रहते. इसमें काफी समय लगा. यहां तक कि आसपास के गांवों के लोग शहर के तौर-तरीकों वाले यात्रियों से उकता गए थे.

आखिरकर एक दिन रास्ता खुलने का एेलान हुआ और ड्राइवरों को हरी झंडी दिखा दी गई. पर तब एक अजीब-सी बात हुई. कोई भी ड्राइवर पहले अपनी गाड़ी बढ़ाने को तैयार ही नहीं था. न इस तरफ से और न ही उस तरफ से. सभी खड़े एक-दूसरे का मुंह देख रहे थे. इसमें शक नहीं कि रास्ता कच्चा था और खतरनाक भी. एक तरफ पहाड़ था और दूसरी तरफ खाई व हिलोरे मारता झेलम दरिया. आधा घंटा बीत गया. कोई टस से मस न हुआ. ये वही लोग थे जो कल तक पीडब्ल्यूडी के कर्मचारियों को आलस और अकर्मण्यता के लिए कोस रहे थे. इतने में पीछे से एक छोटी-सी हल्के रंग की स्पोर्ट्स कार आती दिखाई दी. एक अंग्रेज उसे चला रहा था. इतने सारे वाहनों और भीड़ को देखकर वह हैरान हुआ. मैं कोट-पतलून पहने जरा बन-ठनकर खड़ा था. उसने मुझसे पूछा, ‘क्या हुआ है?’ मैंने उसे सारी बात बताई, तो वह जोर से हंसा और उसी क्षण हार्न बजाता हुआ, बिना किसी डर के, कार चलाते हुए आगे बढ़ गया.

उसके बाद तो नजारा और भी देखने लायक था. कहां तो कोई माई का लाल गाड़ी स्टार्ट करने के लिए तैयार नहीं था, और अब वे हाॅर्न पर हाॅर्न बजाते हुए एक साथ वह हिस्सा पार करने लगे. इतनी भगदड़ मची कि रास्ता फिर काफी देर के लिए बंद हो गया. तब मैंने अपनी आंखों से प्रत्यक्ष देखा कि एक आजाद देश में पले-बढ़े आदमी और एक गुलाम देश में पले-बढ़े आदमी में क्या फर्क होता है.

आजाद आदमी के अंदर कुछ सोचने, फैसला करने और अपने फैसले पर अमल करने की दिलेरी होती है. गुलाम आदमी यह दिलेरी खो चुका होता है. वह हमेशा दूसरे के विचारों को अपनाता है, घिसे-पिटे रास्तों पर चलता है. इस सबक को मैंने अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया था. अपने जीवन में जब भी मैं कोई कठिन निर्णय ले पाया, मैं बहुत खुश हुआ. मैं खुद को आजाद महसूस करता, मुझे जीवन सार्थक लगा और मैं जीवन का लुत्फ शायद इसीलिए उठा पाया क्योंकि मैंने समझा की जीवन का कुछ अर्थ है.

पर फिर भी साफ-साफ कहूं तो ऐसे मौके बहुत कम आए. किसी कठिन निर्णय के समय मैं हिम्मत खो देता था और दूसरे लोगों के आसरे रहता. मैंने सुरक्षित रास्ता चुना. मैंने वही फैसले लिए जो मेरा परिवार मुझसे चाहता था, जो वो बुर्जुआ वर्ग चाहता था, जिससे मैं आता हूं. मेरे ऊपर मूल्यों का एक बोझ-सा डाल दिया गया था. मैं सोचता कुछ और था और कुछ और ही करता था. इस कारण मुझे बाद में काफी बुरा भी लगता. मेरे कुछ निर्णयों से मुझे कभी खुशी नहीं मिली. जब कभी भी मैं हिम्मत हार जाता, मेरी जिंदगी मुझे एक निरर्थक बोझ लगने लगती.

मैंने अपने सामने एक अंग्रेज का उदाहरण रखा है. कोई ये सोच सकता है कि किसी हद तक यह भी मेरे हीनभाव का सबूत है. मैं सरदार भगत सिंह का उदाहरण दे सकता था, जो उसी जमाने में ही फांसी चढ़े थे. मैं महात्मा गांधी का उदाहरण दे सकता था, जिन्होंने पूरा जीवन अपनी ही शर्तों पर जिया. मुझे याद है कि कैसे मेरे कॉलेज के प्रोफेसर, शहर के सम्मानीय और बुद्धिमान व्यक्ति गांधी की बातों पर हंसा करते थे कि वह बिना हथियार के सिर्फ सत्य-अहिंसा से अंग्रेज सरकार को हरा देंगे और देश को आजाद करा लेंगे. मेरे शहर के शायद एक प्रतिशत से भी कम लोग ये सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि अपने जीवनकाल में वे देश को आजाद हुआ देख सकेंगे. पर गांधीजी को खुद पर, अपने विचारों और अपने देशवासियों पर भरोसा था.  शायद आपमें से किसी ने नंदलाल बोस द्वारा चित्रित गांधीजी का चित्र देखा होगा. वह एक ऐसे व्यक्ति का चित्र है, जिसमें सोचने का साहस था और उस सोच पर अमल करने की हिम्मत थी.

मेरे कॉलेज के समय मुझ पर भगत सिंह या गांधीजी का प्रभाव नहीं था. मैं पंजाब प्रांत के लाहौर में स्थित प्रसिद्ध गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में एमए कर रहा था. इस कॉलेज में सिर्फ सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थियों का चयन होता है. आजादी के बाद मेरे साथियों ने हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की सरकारों और समाज में काफी ऊंचे पद हासिल किए. पर उस समय कॉलेज में दाखिला लेते समय हमें लिखकर देना पड़ता था कि हम राजनीतिक आंदोलनों में हिस्सा नहीं लेंगे. उस समय राजनीतिक आंदोलन का मतलब देश में चल रहे आजादी के आंदोलन से था.

आज हमारे देश को आजाद हुए पच्चीस साल हो गए हैं. इस साल हम आजादी की रजत जयंती मना रहे हैं. पर क्या हम कह सकते हैं कि गुलामी और हीनता का भाव हमारे मन से बिल्कुल दूर हो चुका है? क्या हम दावा कर सकते हैं कि व्यक्तिगत, सामाजिक या राष्ट्रीय स्तर पर हमारे विचार, हमारे फैसले और हमारे काम मूलतः हमारे अपने हैं और हमने दूसरों की नकल करनी छोड़ दी है? क्या हम स्वयं अपने लिए फैसले लेकर उन पर अमल कर सकते हैं या फिर हम यूं ही इस नकली स्वतंत्रता का दिखावा करते रहेंगे?

इस बारे में तो मैं आपका ध्यान हमारी फिल्म इंडस्ट्री की तरफ ले जाना चाहूंगा, जहां से मैं आता हूं. मैं जानता हूं कि उनमें से ज्यादा फिल्में ऐसी हैं, जिनका जिक्र सुनकर ही आप हंस पड़ेंगे. एक पढ़े-लिखे बुद्धिमान आदमी के लिए हमारी फिल्मेंं तमाशे से ज्यादा कुछ नहीं हैं. उनकी कहानियां बचकानी, असलियत से दूर और तर्कहीन होती हैं. और ये बात तो आप भी मानेंगे की सबसे बड़ी खराबी है कि उनकी कहानी, तकनीक और नाच-गाने तक पश्चिम की फिल्मों की अंधी नकल होते हैं. कई बार तो पूरी की पूरी फिल्म ही किसी विदेशी फिल्म की नकल होती है. कोई हैरानी की बात नहीं है कि आप नौजवान लोग इन फिल्मों पर हंसते हैं, पर साथ ही कुछ ऐसे भी हैं जो फिल्म-स्टार बनने के सपने भी देखते होंगे.

हालांकि मेरे लिए उनका मजाक उड़ाना आसान नहीं है. मैं उनसे अपनी रोजी कमाता हूं. मैंने उनसे खूब पैसा और मशहूरियत हासिल की. आज मुझे यहां जो इज्जत दी जा रही है, उसके पीछे कुछ हद तक मेरी फिल्मी मशहूरियत ही है. जब मैं आपकी तरह विद्यार्थी था, तो हमारे अंग्रेज और हिन्दुस्तानी प्रोफेसर बड़ी कोशिशों से हमारे अंदर यह एहसास पैदा करना चाहते थे कि कला का सृजन करना सिर्फ गोरी चमड़ी वालों का ही विशेषाधिकार है. अच्छी फिल्में, अच्छे नाटक, अच्छा अभिनय, अच्छी चित्रकला आदि सब यूरोप और अमेरिका में ही संभव हैं. हिन्दुस्तान के लोग, भाषा, संस्कृति इन कलात्मक भावनाओं के लिहाज से अपरिष्कृत और पिछड़े हुए हैं. ये सब सुनकर हमे बुरा लगता और हम गुस्सा भी हो जाते पर अंदर से हम ये बात मानने को मजबूर थे.

पर उस जमाने और आज के जमाने में बहुत फर्क है. आजादी के बाद भारतीय कलाओं ने बहुत प्रगति की है. फिल्मों की बात करें तो सत्यजीत रे और बिमल रॉय ऐसे नाम हैं जो विश्व प्रसिद्ध हो चुके हैं. कई कलाकारों और टेकनीशियनों की तुलना अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होती है. आजादी से पहले हमारे देश में मुश्किल से 10-15 फिल्में ही बनती थीं, जो मशहूर होती थीं. आज हम संसार भर में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाला देश हैं. और इन फिल्मों को सिर्फ हमारे देश की जनता ही नहीं, बल्कि अफगानिस्तान, ईरान, पूर्वी सोवियत यूनियन, मिस्र, अरब, अफ्रीका के अनेक देशों की जनता भी बड़े शौक से देखती है. हमने इस क्षेत्र में हॉलीवुड द्वारा लाई गई एकरसता को तोड़ा है.

और अगर सामाजिक जिम्मेदारी के नजरिये से भी देखा जाए तो हमारी फिल्में नैतिक रूप से अभी उतने निचले स्तर पर नहीं पहुंची हैं जहां कुछ पश्चिमी देश पहुंच चुके हैं. हिन्दुस्तानी निर्माताओं ने अभी लाभ कमाने के लिए सेक्स और अपराध का सहारा नहीं लिया है जैसा अमेरिकी निर्माता कई सालों से करते आ रहे हैं, बिना ये सोचे कि इससे वो देश में एक गंभीर सामाजिक समस्या को जन्म दे रहे हैं.

इस सबके बावजूद अगर कमी है तो सिर्फ एक बात की कि हम अभी भी नक्काल हैं. इसी एक गलती के कारण हम सभी बुद्धिजीवियों के मजाक का पात्र बनते हैं. हम विदेशों से उधार लिए गए, घिसे-पिटे फाॅर्मूले पर फिल्में बनाते हैं. हम में अपने देश के जीवन को अपने ढंग से पेश करने का साहस नहीं है.

यह बात मैं सिर्फ हिन्दी या तमिल फिल्मों के बारे में नहीं कह रहा हूं, ये शिकायत तथाकथित प्रगतिवादी और प्रयोगवादी फिल्मों से भी है, चाहे वो बंगाली में हों, हिन्दी में या मलयालम में. मैं सत्यजीत रे, मृणाल सेन, सुखदेव, बासु भट्टाचार्य या राजिंदर सिंह बेदी के काम का बड़ा प्रशंसक हूं. मैं जानता हूं कि वे बहुत ही काबिल और सम्माननीय हैं. मैं यह भी कहे बिना नहीं रह सकता कि इनकी फिल्मों पर इटली, फ्रांस, स्वीडन, पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया के फैशन की गहरी छाप है. वे नया कदम जरूर उठाते हैं, पर दूसरों के बाद.

मेरा थोड़ा-बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है. यही हालत मैं वहां भी देखता हूं. यूरोपीय साहित्य का फैशन भी हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है. अगर सोवियत यूनियन को छोड़ दें तो शायद पूरे यूरोप में कोई हिन्दुस्तानी साहित्य के बारे जानता तक नहीं है. उदाहरण के लिए मैं अपने प्रांत पंजाब की ही बात करता हूं. मेरे पंजाब में युवा कवियों की नई पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है. इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नई व्यवस्था बनाने की बात की गई है. आप इसे नकार नहीं सकते क्योंकि हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है. इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छी कही गई हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है. इस पर पश्चिम का प्रभाव है. वहीं की तरह ये मुक्त छंद में हैं, न ही कोई तुकांत है. यदि वहां के कवियों ने लय और छंद का प्रयोग नहीं किया है तो पंजाबी कवियों को भी यही करना है. इसका परिणाम ये होता है कि ये इंकलाब एक छोटे से कागज पर ही रह जाता है, जिसकी तारीफ बस एक छोटे-से साहित्यिक समझ वाले समूह में हो जाती है पर वो किसान और मजदूर जो इस शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, इसे समझ ही नहीं पाते हैं. ये उन पर कोई असर नहीं डालती. अगर मैं ये कहूं कि बाकी हिन्दुस्तानी भाषाएं भी इसी ‘न्यू वेव’ कविताओं के प्रभाव में हैं, तो गलत नहीं होगा.

मुझे चित्रकला के बारे में कोई ज्ञान नहीं है, पर इतना जरूर जानता हूं कि वहां भी पश्चिम के फैशन का ही बोलबाला है. इस प्रभाव से बचकर अलग राह पर चलने की हिम्मत शायद ही कोई चित्रकार कर सकता है. और शैक्षणिक संसार के बारे में क्या कहूं? मैं आपको खुद इसे पढ़ने के लिए कहूंगा. अगर आप हिन्दी फिल्मों पर हंसते हैं तो शायद खुद पर भी हंसना चाहेंगे.

इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया. जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीत नगर के पास था. एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया, तो किसी ने कहा, ‘हमारे साथ तो आप तहमत (लुंगी) और कुर्ते में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहां जाकर सूट-बूट पहनकर साहब बहादुर बन जाओगे.’ मैंने हंसते हुए कहा, क्यों! आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा.’ तभी दूसरा कोई बोला, ‘आप ऐसा कर ही नहीं सकते, हमारे इन सरपंच को ही लीजिए. शहर में इन्हें किसी छोटे-मोटे काम से सरकारी दफ्तर जाना हो, तो तहमत की जगह पाजामा पहनते हैं. कहते हैं कि तहमत पहनने पर इज्जत नहीं होती. और आप तो यूनिवर्सिटी में जा रहे हैं.’

एक और फौजी किसान, जो उस समय छुट्टी पर आया हुआ था, कहने लगा, ‘अजीब बात है, आजकल तो शहरों की लड़कियां भी तहमत बांधती हैं, तो फिर इनकी इज्जत क्यों नहीं होगी?’

ये सब गपशप होती रही और मुझे ये चुनौती स्वीकार करनी पड़ी. मैं अगले दिन सचमुच तहमत-कुर्ते में सीनेट की मीटिंग में पहुंच गया और मुझे उम्मीद नहीं थी कि इससे वहां क्या खलबली मची. वहां पहुंचा तो बरामदे में गाउन पहनाने के लिए एक प्रोफेसर खड़े थे. पहली नजर में तो उन्होंने मुझे पहचाना ही नहीं. फिर, जब पहचाना तो हैरानी भरी नजर से मुझे सिर से पांव तक देखने लगे. आखिर गाउन पहनाते समय वे कहे बिना रह न सके, बोले, ‘साहनी साहब, तहमत बांधी है, तो बूट की जगह खुस्सा (जूती) पहननी चाहिए थी न.’ ‘अगली बार ख्याल रखूंगा’, मैंने क्षमा मांगने वाले स्वर में कहा और मीटिंग वाले कमरे में चला गया. पर तभी मुझे खयाल आया कि किसी के लिबास के बारे में आलोचना करना सभ्यता के नियमों के उलट समझा गया है. यह बात मैंने प्रोफेसर को क्यों नहीं कही! मुझे अपनी धीमी हाजिरजवाबी पर अफसोस हुआ.

मीटिंग के बाद यूनिवर्सिटी के लड़के-लड़कियों से मिलने पर भी मेरा लिबास उनके मनोरंजन की चीज बना रहा. उनके लिए हंसी की बात ये भी थी कि मैंने तहमत के साथ जूते पहन रखे थे. पर उन्हें इसमें कोई अजीब बात दिखाई नहीं दी कि कई लड़कों ने पतलून के साथ चप्पल पहनी हुई थी.

आपको लग रहा होगा कि ये छोटी-सी घटना बताकर मैं आपका समय क्यों खराब कर रहा हूं! पर एक पंजाबी किसान के नजरिये से इसे देखिए. हरित क्रांति में उनके सहयोग के लिए सब उनकी प्रशंसा करते हैं. वे हमारी फौजों की रीढ़ हैं. उन्हें कैसा लगेगा जब उनके कपड़ों या रहन-सहन को विस्मय से देखा जाएगा? पंजाब में यह बात कही जाती है कि गांव का लड़का कॉलेज की शिक्षा पाने के बाद गांव का नहीं रहता. वो अपने आप को अलग और श्रेष्ठ समझने लगता है, मानो वो यहां से नहीं किसी और ही दुनिया से है. उसकी एक ही कोशिश रहती है कि कैसे वो गांव छोड़कर शहर भाग जाए. क्या इसे शिक्षा के नाम पर एक धब्बा नहीं कहना चाहिए?

मैं मानता हूं सभी जगह ऐसा नहीं है. मैं ये भी जानता हूं कि तमिलनाडु या बंगाल में अपने पारंपरिक पहनावे को पहनने को लेकर कोई हीनभावना नहीं है. एक किसान से लेकर प्रोफेसर तक कोई भी, किसी भी अवसर पर धोती पहन के जा सकता है. पर वहां भी उधार लिए गए विचार किसी-न-किसी शक्ल में सामने आते हैं. ये किसी न किसी स्वरूप में हर जगह मौजूद हैं. आजादी से पच्चीस साल बाद भी हम खुशी से वही शिक्षण-प्रणाली ढो रहे हैं, जो मैकाले ने क्लर्क और मानसिक गुलामों को बनाने के लिए बनाई थी. वो गुलाम जो अपने ब्रिटिश मालिकों के बारे में सोच पाने में भी असमर्थ होंगे, वो, जो अपने मालिकों से नफरत करने के बावजूद भी उनकी हमेशा तारीफ करेंगे, उनके जैसे बोलने, कपडे़ पहनने, गाने-नाचने में गर्व महसूस करेंगे. ये गुलाम जो अपने ही लोगों से नफरत करते हैं और बाकियों को भी नफरत का पाठ पढ़ाने के लिए तैयार रहेंगे. क्या अब भी हमें आश्चर्य होगा कि विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों का अपनी शिक्षा-व्यवस्था से विश्वास उठता जा रहा है.

यहां मैं फिर एक और छोटी बात बताना चाहूंगा. अगर आज से दस साल पहले आप दिल्ली के किसी फैशनेबल विद्यार्थी को पतलून के साथ कुर्ता पहनने के लिए कहते तो वह आप पर हंस देता. पर आज यूरोप से आए हिप्पियों और ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ संस्कृति की नकल में, पतलून के साथ कुर्ता पहनना सिर्फ फैशन ही नहीं बना बल्कि कुर्ते का नाम ‘गुरुशर्ट’ हो गया है. अमेरिकियों द्वारा रविशंकर को सम्मान मिलते ही सितार ‘स्टार’ ही बन गया, बिलकुल वैसे ही जैसे 50 साल पहले स्वीडन से नोबेल पुरस्कार मिलते ही रवींद्रनाथ टैगोर पूरे देश के ‘गुरुदेव’ बन गए थे.

क्या आप कॉलेज के किसी विद्यार्थी से सिर के बाल और दाढ़ी-मूंछें मुंडवाने के लिए कह सकते हैं जबकि फैशन इसे बढ़ाने का है? पर अगर कल योग के प्रभाव में आकर यूरोप के विद्यार्थी ऐसा करने लगें तो मैं दावे से कह सकता हूं की अगले ही दिन कनाट प्लेस पर आपको गंजे सिर ही दिखेंगे. योग को इसकी जन्मभूमि में प्रचलित होने के लिए यूरोप से ही सर्टिफिकेट लेना होगा!

मैं एक और उदहारण देता हूं, मैं हिन्दी फिल्मों में काम करता हूं और सभी जानते हैं कि इन फिल्मों के गीत और संवाद ज्यादातर उर्दू में लिखे जाते हैं. मशहूर उर्दू लेखक और कवि- कृशन चंदर, राजिंदर सिंह बेदी, केए अब्बास, गुलशन नंदा, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, कैफी आजमी जैसे नाम इस काम से जुड़े रहे हैं. तो जब उर्दू में लिखी हुई फिल्म को हिन्दी फिल्म कहते हैं तो ये माना जा सकता है कि हिन्दी और उर्दू एक ही हैं. पर नहीं! क्योंकि हमारे ब्रिटिश मालिकों ने अपने समय पर इन्हें दो अलग भाषाएं कहा था इसलिए ये अलग हैं, पर आजादी के पच्चीस साल बाद भी हमारी हुकूमत, हमारे विश्वविद्यालय, विद्वान हिन्दी और उर्दू को अलग-अलग भाषाएं माने हुए हैं. क्या आपने कभी संसार के किसी और देश के बारे में भी ये सुना है कि वहां लोग बोलते एक भाषा हैं, पर लिखते समय वह दो भाषाएं कहलाएं? कोई भी भाषा किसी भी लिपि में लिखी जा सकती है. मेरी मातृभाषा पंजाबी के लिए दो लिपियां कबूल की गई हैं. हिन्दुस्तान में गुरुमुखी और पाकिस्तान में फारसी. दो लिपियों में लिखी जाने पर भी वह भाषा तो एक ही रहती है… पंजाबी. तो दो लिपियों में लिखी जाने के कारण हिन्दी और उर्दू अलग-अलग भाषाएं कैसे हो गईं? रेडियो पाकिस्तान अरबी और फारसी के शब्द घुसेड़-घुसेड़कर इस भाषा की खूबसूरती का सत्यानाश कर रहा है, वहीं आॅल इंडिया रेडियो उर्दू के साथ संस्कृत के शब्दकोश को मिला देता है. दोनों इन दोनों के मूल स्वरूप को ही बिगाड़ते हुए एक तरह से अपने मालिक की ही इच्छा की पूर्ति कर रहे हैं, वो है ‘अविभाज्य’ को अलग करना. इससे ज्यादा बेतुका और क्या होगा? अगर ब्रितानियों ने कभी सफेद को काला कह दिया होता तो क्या हम हमेशा सफेद को काला ही कहते? इस बात पर मेरे दोस्त जानी वॉकर एक दिन कहने लगे, ‘रेडियो पर अनाउंसर को यह नहीं कहना चाहिए कि अब हिन्दी में समाचार सुनिए, बल्कि यह कहना चाहिए कि अब समाचार में हिन्दी सुनिए.’ मैंने इस हास्यास्पद स्थिति के बारे में हिन्दी-उर्दू के कई प्रगतिवादी और परंपरागत लेखकों से भी बात की है, उन्हें इस बात के लिए मनाया है कि इस मुद्दे पर नई सोच की जरूरत है. पर अब तक ये दीवार पर अपना सिर मारने जैसा ही है! हम फिल्म वाले लोग इसे ‘विद्वानों की जहालत’ कहते हैं. क्या हम गलत हैं?

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यहां मैं आपको अपना एक अनुमान बताने से नहीं रोक पा रहा हूं, हो सकता है कि ये गलत हो पर ये है! ये सही भी हो सकता है! कौन जाने! पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में स्वीकार किया है कि देश की आजादी की लड़ाई, जिसका नेतृत्व इंडियन नेशनल कांग्रेस कर रही थी, में शुरू से ही संपन्न और पूंजीपति वर्ग का वर्चस्व रहा है. सो यह स्वाभाविक ही था कि आजादी के बाद इसी वर्ग का शासन और समाज पर वर्चस्व होता. और आज कोई भी इस बात से इंकार नहीं करेगा कि पिछले 25 सालों से पूंजीपति वर्ग दिन-प्रतिदिन और ज्यादा धनवान और शक्तिशाली हुआ है वहीं मजदूर-किसान वर्ग और ज्यादा लाचार और परेशान. पंडित नेहरू इस स्थिति को बदलना चाहते थे, पर बदल नहीं सके. इसके लिए मैं उन्हें दोष नहीं देता. हालात ने उन्हें मजबूर कर रखा था. आज इंदिरा गांधी के नेतृत्व में हमारी हुकूमत फिर इस स्थिति को बदलने और समाजवाद लाने का वादा कर रही है. वे कब और किस हद तक सफल होंगी, कुछ कहा नहीं जा सकता. न ही इस बहस में पड़ने का मेरा इरादा है. राजनीति मेरा विषय नहीं है. सिर्फ इतना कहना ही काफी है कि जिस तरह हिन्दुस्तान में अंग्रेजों की हुकूमत पर अंग्रेज पूंजीपतियों का दबदबा था, उसी तरह आज देश की हुकूमत पर हिन्दुस्तान के पूंजीपतियों का प्रभाव है.

मैं समझता हूं कि ये बात तो सभी मानेंगे कि अंग्रेजों की पूंजीवादी व्यवस्था ने अपने कदम मजबूत करने के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया था, जिसमें उन्हें खासी सफलता भी मिली. मैं पूछता हूं कि आज हमारे देश के शासक किस भाषा को अपने प्रतिनिधित्व को मजबूत करने लायक समझते हैं? राष्ट्रभाषा हिन्दी? यहां मेरा अनुमान ये कहता है कि उनके उद्देश्यों की पूर्ति सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी ही कर सकती है. पर चूंकि उन्हें अपनी देशभक्ति का दिखावा भी करना है इसलिए वो राष्ट्रभाषा हिन्दी की रट लगाए रहते हैं जिससे जनता का ध्यान भटका रहे. पूंजीपति भले ही हजारों भगवान में विश्वास करें पर वो पूजता सिर्फ एक को ही है- मुनाफे का भगवान. उस दृष्टिकोण से उसके लिए आज भी अंग्रेजी ही फायदेमंद है. औद्योगिकीकरण और तकनीकी विकास के इस दौर में अंग्रेजी ही फायदेमंद है. शासक वर्ग के लिए तो अंग्रेजी गॉड-गिफ्ट ही है.

आप सोच रहे होंगे कि वह कैसे? आसान-सा कारण है- अंग्रेजी भारत के आम मेहनतकश लोगों के लिए एक मुश्किल भाषा है. पहले के समय में फारसी और संस्कृत इन मेहनतकशों की पहुंच से दूर थी, इसीलिए शासक वर्ग ने उन्हें राजभाषा का दर्जा दिया था, जिससे वे जनसाधारण में असभ्य, अशिक्षित होने की हीनता व आत्मग्लानि की भावनाएं पैदा करता था और वो खुद को कभी शासन के योग्य ही न बना पाए. आज यही रोल अंग्रेजी भाषा अदा कर रही है.

यही आज भारत का शासक वर्ग कर रहा है. ये देश में इंकलाब नहीं चाहता, कोई बुनियादी तब्दीली नहीं चाहता. अंग्रेजों से मिली हुई व्यवस्था को उसी प्रकार कायम रखने में उसका फायदा है. पर वह खुलेआम अंग्रेजी को अंगीकार नहीं कर सकता. राष्ट्रीयता का कोई न कोई आडंबर खड़ा करना उसके लिए जरूरी है. इसीलिए वह संस्कृतवादी हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करने का ढोंग करता है. उसे पता है कि संस्कृत शब्दों के बोझ तले दबी नकली और बेजान भाषा अंग्रेजी के मुकाबले में खड़ी होने का सामर्थ्य अपने अंदर कभी भी पैदा नहीं कर सकेगी. आज के युग के वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दों से रिक्त होने के कारण वह हमेशा कमजोर भाषा बनी रहेगी. हम फिल्मी कलाकारों को उनके प्रशंसकों की ओर से रोज पत्र आते हैं. ऐसे पत्र मुझे पिछले बीस साल से आ रहे हैं. यह पत्र आमतौर पर कॉलेज के विद्यार्थियों और पढ़े-लिखे नौजवानों की ओर से आते हैं. उनके आधार पर मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि हमारी शिक्षण संस्थाओं में अंग्रेजी का स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है. शायद इसलिए, मैंने सुना है कि दाखिला देते समय कॉलेज में पब्लिक स्कूलों से पढ़कर आने वाले विद्यार्थियों को महत्व दिया जाता है. पब्लिक स्कूल मतलब वो स्कूल जहां पर बड़े घरों के बच्चे पढ़ते हैं.

मेरे लिए अंग्रेजी को ताकतवर बनाने की इस बात पर टिप्पणी करना जरूरी नहीं है. ये स्पष्ट भी है. ये बात मानी भी जा चुकी है कि अंग्रेजी विदेशी है और एक औसत आम भारतीय के लिए इसे सीखना कठिन है. पर फिर भी, आप खुद अपनी आंखों से देख सकते हैं कि किस प्रकार जीवन के हर क्षेत्र में अंग्रेजी को महत्व दिया जा रहा है. मेरी नाचीज राय में इसका बुनियादी कारण ये है कि उद्योग के क्षेत्र में पूंजीपतियों के राष्ट्रीय पैमाने पर संगठित होने और वर्तमान सामाजिक ढांचे को ज्यों का त्यों कायम रखने के लिए अंग्रेजी बहुत ज्यादा सहायक है.

कुछ दिन पहले की बात है, मैंने अपना यह विचार बम्बई के एक मजदूर नेता के सामने रखा और कहा कि आप अगर सचमुच पूंजीवादी व्यवस्था की जगह समाजवादी व्यवस्था कायम करना चाहते हैं, तो मजदूरों को भी पूंजीपतियों की तरह राष्ट्रीय पैमाने पर संगठित होकर आत्मविश्वास पैदा करना होगा और यह चीज अंग्रेजी से पीछा छुड़ाकर ही हो सकती है. मजदूर नेता मुझसे सहमत हुए, पर कहने लगे, ‘रोग तो आपने ठीक पकड़ा है, पर इसका इलाज क्या है?’

‘इलाज ये है कि अंग्रेजी लिपि को अपनाना और अंग्रेजी भाषा को धक्का देकर बाहर निकालना.’

‘वह कैसे?’

टूटी-फूटी हिन्दुस्तानी सारे देश के मजदूर बोल और समझ लेते हैं. वो इसमें अपना सारी व्याकरण मिलाकर इसका प्रयोग करते हैं. इस तरह की भाषा में लड़की भी ‘जाता’ है और लड़का भी ‘जाता’ है, होता है. इस तरह के माहौल में एक ऐसी आजादी मिलती है कि कई बार बुद्धिजीवी भी इस तरह की भाषा बोलते हुए देखे जा सकते हैं. और यही तो भारत की परंपरा में है. आज की हिन्दुस्तानी में यूनिवर्सिटी ‘यूनीवरास्टी’ बन जाता है, (विश्वविद्यालय के मुकाबले में यूनीवरास्टी कितना सुंदर और जानदार शब्द है!) स्पैनर ‘पाना’ है, लैंटर्न ‘लालटेन’, कार की ‘चेसिस’ ‘चैसी’ हो जाती है यानी सब कुछ संभव है. जिस तार से फौजी अपनी बंदूक साफ करते हैं वो अंग्रेजी में पुल-थ्रू कहलाता है पर रोमन हिन्दुस्तानी में ये ‘फुल्ट्रू’ बन जाता है. कितना सुंदर शब्द! हॉलीवुड के लाइटमैन एक तरह के कवर के लिए बार्न डोर शब्द प्रयोग करते हैं, बम्बई फिल्म कर्मचारियों में इसे नाम दिया ‘बंदर’, वाह! कितना अच्छा बदलाव है! इस तरह की हिन्दुस्तानी में तमाम संभावनाएं हैं. ये अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक और तकनीक शब्दावली को कितनी आसानी से अपना लेती है. ये हर जगह से शब्द ले कर खुद को समृद्ध बना लेती है. बार-बार संस्कृत शब्दकोश देखने की जरूरत ही नहीं.’

‘पर रोमन लिपि ही क्यों?’ उन्होंने पूछा.

‘इसलिए कि किसी लिपि के बारे में किसी के कोई पूर्वाग्रह नहीं हैं. फिर, इस समय यह राष्ट्रीय पैमाने पर सबसे ज्यादा प्रचलित लिपि है. मद्रास, कलकत्ता, बम्बई, दिल्ली आदि शहरों में हर जगह दुकानों और फिल्मों के साइनबोर्ड इसी लिपि में लिखे हुए नजर आएंगे. खतों पर नाम व पता लिखने के लिए भी तो देश-भर में यही लिपि इस्तेमाल की जाती है. फौज तो इसे लगभग 30 सालों से इस्तेमाल कर रही है.’

वो दोस्त कुछ देर चुप रहे, फिर हंसकर कहने लगे, ‘काॅमरेड, यूरोप में भी एक बार एस्प्रांटों चलाने का तजुर्बा किया गया था. जाॅर्ज बर्नार्ड शाॅ जैसे विद्वान ने इसे अंग्रेजी जैसा मशहूर बनाने के लिए पूरा जोर लगाया था पर वह प्रयोग बुरी तरह असफल हुआ, क्योंकि वह बनाई गई भाषा थी. भाषाएं बनाई नहीं जातीं, वे अपने-आप स्वाभाविक ढंग से बनती हैं,.’

मैं हैरानी से उनकी ओर देखता रह गया. फिर मैंने कहा, ‘काॅमरेड, एस्प्रांटों तो वह है, जिसे राष्ट्रभाषा के नाम पर हिन्दी पंडित संस्कृत के शब्दकोश से शब्द लाकर गढ़ रहे हैं. मैं उस भाषा की बात कर रहा हूं जो आस-पास लोगों द्वारा फैलाई जा रही है.’

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मैंने और भी कई दलीलें दीं, पर उन्हें राजी न कर सका. मैंने जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस का भी हवाला दिया कि इन दोनों महान नेताओं ने भी रोमन हिन्दुस्तानी की जोरदार हिमायत की थी पर इसका भी उन पर कोई असर न हुआ. यहां सवाल ये नहीं है कि उनमें और मुझमें कौन सही था. शायद मैं गलत था. पर उनके अनुसार मेरी बात उन्हें शेखचिल्ली का सपना लग रही थी. जैसा मैंने पहले भी कहा कि अनुमान सही भी हो सकते हैं और गलत भी. पर कोई भी अनुमान या अनकही बात कर पाना आजाद सोच की निशानी है. काॅमरेड को इस बात की तारीफ करनी चाहिए थी पर वे ऐसा नहीं कर पाए क्योंकि वो एक तयशुदा सोच से हटकर सोच ही नहीं सके.

कोई भी देश तभी उन्नति कर सकता है, जब वो अपने अस्तित्व से पूरी तरह वाकिफ हो. इसे अपने लिए सोचना-सीखना होगा. इसे अपनी समस्याओं के समाधान खुद तलाशना सीखना होगा. पर मैं जिस ओर भी देखता हूं मुझे लगता है कि हमारी हालत अभी भी उस पक्षी जैसी है, जो लंबी कैद के बाद पिंजरे में से आजाद तो हो गया हो, पर उसे नहीं पता कि इस आजादी का करना क्या है. इसके पास पंख हैं पर ये खुले आसमान में उड़ने से डरता है. ये सिर्फ उस सीमा में ही रहना चाहता है जो उसके लिए निर्धारित की गई है.

व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से हम वाॅल्टर मिटी (एक उपन्यास का काल्पनिक चरित्र जो एक काल्पनिक दुनिया में ही रहता है) जैसी जिंदगी ही जी रहे हैं. हमारे अंदर की जिंदगी बाहर की जिंदगी से बिलकुल उलट है. हमारी सोच और कामों में जमीन-आसमान का अंतर है. हम बदलाव तो चाहते हैं पर बरसों से चली आ रही लीक से हटकर सोच पाने का साहस ही नहीं जुटा पाते.

मैं समझता हूं कि हमारे देश में भी कई पुलिस-अफसर ऐसे होंगे, जो जनता के मन में डर पैदा करने की बजाय उसकी सेवा और सहायता करना चाहते हैं. उन्होंने यह भी पढ़ा-सुना होगा कि इंग्लैंड में पुलिस का जनता से व्यवहार बहुत मददगार होता है. पर वे अंग्रेजी साम्राज्य से मिली हुई व्यवस्था के शिकार हैं जो अपने देश में तो अलग है पर यहां के लिए नहीं. इस औपनिवेशिक परंपरा के अनुसार, जब भी कोई व्यक्ति उनके दफ्तर में दाखिल हो, तो डर भर दिया जाए, उससे जितना हो सके प्रतिरोधी और गैर-मददगार व्यवहार किया जाए. ये व्यवस्था हर सरकारी दफ्तर में चपरासी से लेकर मंत्री तक में देखी जा सकती है.

मुझे एक घटना याद आ रही है, जो मेरे एक फिल्म-निर्माता मित्र ने बताई थी. उसने बाॅक्स-आॅफिस की बजाय समाज की भलाई को सामने रखकर एक फिल्म बनाने की गलती कर डाली. वह चाहता था कि उस पर मनोरंजन कर माफ हो जाए. मंत्री ने उसे मिलने के लिए राजभवन में आने का समय दिया हुआ था. वे नए-नए मंत्री बने थे और उसी दिन उन्हें शपथ लेनी थी. निर्माता नियत समय पर पहुंच गया. मंत्री के सेक्रेटरी ने उसे अपने पास खड़ा कर लिया. उधर, मंत्री राज्यपाल के सामने जनता की निष्काम सेवा करने की कसम उठा रहे थे और इधर उनका सेक्रेटरी निर्माता से बीस हजार रुपये रिश्वत के तौर पर मांग रहा था.

वह निर्माता बहुत चाहता है कि इस दृश्य को अपनी किसी फिल्म में डाल दे. पर कोई फाइनेंसर इस फिल्म के लिए तैयार नहीं हैं. पर अगर फिल्म बन भी जाए तो क्या हमारा सेंसर इस बात की इजाजत देगा? सेंसर के अनुसार ये अलिखित कानून है कि सरकार का कोई भी मंत्री रिश्वत नहीं लेता. पर यहां ज्यादा हास्यास्पद बात यह है कि जो लोग हर समय मंत्रियों के रवैये के खिलाफ शिकायतें करते हैं, वही मंत्रियों को हार पहनाने के लिए सबसे आगे खड़े होते हैं. किसी भी सभा-सोसायटी का जलसा हो, वहां मंत्री जरूर आना चाहिए. या तो वहां फिल्म अभिनेता मुख्य अतिथि होगा नेता अध्यक्ष या उल्टा होगा, नेता मुख्य अतिथि और फिल्म अभिनेता अध्यक्ष. किसी बड़े नाम का वहां होना बहुत ही आवश्यक है क्योंकि ये एक ब्रिटिश, औपनिवेशिक परंपरा है.

मैं 25 वर्षों से इप्टा (इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन) का सदस्य हूं. यह संस्था आम जनता के लिए नाटक खेलने का दावा करती है. इसके नाटकों में सरकार और शासन-व्यवस्था की कड़ी आलोचना होती रही है. इसलिए सीआईडी इस पर खास नजर रखती है. पर मैंने देखा है कि इसी इप्टा की काॅन्फ्रेंस के उद्घाटन के लिए मंत्रियों का आना जरूरी समझा जाता है.

आखिरी विश्व युद्ध के समय मैंने कुछ समय बीबीसी में बतौर उद्घोषक काम करते हुए बिताया. संकट के चार उन सालों में भी मैंने प्रधानमंत्री समेत ब्रिटिश कैबिनेट के किसी भी मंत्री को कहीं नहीं देखा. पता नहीं, वे कहां छिपे रहते थे! पर यहां, देश की आजादी के बाद से ही मुझे हर जगह मंत्री ही दिखाई दे रहे हैं.

1930 में जब महात्मा गांधी गोलमेज सम्मेलन के लिए इंग्लैंड गए थे, तो उन्होंने इंग्लैंड के पत्रकारों को संबोधित करके कहा था,  ‘हिन्दुस्तान के लोग ब्रिटिश सरकार की बंदूकों और मशीनगनों को उसी तरह देखते हैं, जिस तरह दीवाली के दिन उनके बच्चे पटाखों को देखते हैं.’ यह दावा वे क्यों कर सके? इसलिए कि उन्होंने हिन्दुस्तानियों के दिलों में से अंग्रेज शासकों का डर निकाल दिया था. आम लोग अंग्रेज शासकों को इज्जत की जगह नफरत से देखने और उनके साथ असहयोग करने लगे थे. यह साहस महात्मा गांधी ने निहत्थे हिन्दुस्तानियों के दिलों में भरा था.

आज अगर हम सचमुच चाहते हैं कि हमारे देश में समाजवाद आए, तो जनसाधारण को पैसे और रुतबे की छाया से आजाद कराने की जरूरत है. पर इस समय असलियत क्या है? हर तरफ पैसे और रुतबे का बोलबाला है. समाज में इज्जत उसकी ही है, जिसके पास मोटरें हैं, बंगले हैं, दौलत का दरिया बहता है. क्या कभी ऐसी हालत में समाजवाद आ सकता है? समाजवाद से पहले हमें वो माहौल लाना होगा जहां सिर्फ धन-दौलत का होना ही सम्मान देने का पैमाना न बने. हमें ऐसा माहौल बनाना होगा जहां सबसे ज्यादा सम्मान उस मजदूर को मिले जो चाहे शारीरिक मेहनत करता हो या मानसिक. अपने कौशल के साथ मेहनत करता हो या प्रतिभा के साथ. अपनी कला से देश की सेवा कर रहा हो या किसी अाविष्कार से. इसके लिए पुरानी सोच को तोड़कर एक नई सोच लाने की जरूरत होगी. क्या हम कहीं से भी खुद को उस क्रांति को लाने के करीब पाते हैं?

शायद हमें आज एक मसीहा की जरूरत है जो हमें इस गुलामी से निकाल कर एक आजाद सोच और नए मूल्यों का निर्माण करने का साहस दे. जिससे हम अपने शासकों के साथ जुड़ने की बजाय आम जनता के साथ जुड़ें. ये मेरी आशा और प्रार्थना है कि आप जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट अपने जीवन में वो सफलता पाने में समर्थ होंगे जो मैं और मेरी पीढ़ी के कई लोग नहीं पा सके.