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भारत एक देश नहीं विचार है

webइन दिनों जब एक धार्मिक रंगत वाला रक्तपिपासु राष्ट्रवाद और भारतीयता सत्ता का संरक्षण पाकर बलबला रहे हैं, यह सवाल हर आदमी को खुद से जरूर पूछना चाहिए क्योंकि यह जिंदगी और मौत का मसला बनता जा रहा है. ये स्वयंभू राष्ट्रवादी धार्मिक भावनाओं को आहत करने, देशविरोधी काम करने, सभ्यता और संस्कृति को मैला करने के मनमाने आरोप लगाकर, आसानी से उकसावे में आ जाने वाली हीनता, हताशा की मारी भीड़ का कुशल प्रबंधन कर जानें ले रहे हैं. वे खानपान, कपड़े, प्यार करने के तरीकों से लेकर पूरी जीवनशैली को अपने हिसाब से निर्धारित करना और पालन कराना चाहते हैं. ऐसा नहीं है कि उनमें पवित्रता का तेज और नैतिकता का बल है, वे खुद गले तक हर तरह के घच्चेपंजे में फंसे लोग हैं, जो भाजपा नेता दादरी में अखलाक नाम के मुसलमान की हत्या को गाय खाने का आरोप लगाकर जायज ठहराता है, वही एक बूचड़खाने  के निदेशक के रूप में बीफ का एक्सपोर्ट करके करोड़ों रुपये पीटने का सपना देखता पाया जाता है.

वे सब कुछ भारतमाता की जय की आड़ में कर रहे हैं, उनका एकमात्र तर्क है, ‘वृंदावन में रहना है तो राधे-राधे कहना है.’

मैने खुद अपने भीतर झांका तो बचपन में किताबों में देखा कश्मीर से कन्याकुमारी के बीच फैला एक नक्शा झिलमिलाया जिसमें एक देवी जैसी गोरी औरत और उसका रथ खींचते शेर सही अनुपात में फिट हो गए, दिल्ली के लालकिले पर अकेला तिरंगा झंडा दिखा जिसके बगल में पंद्रह अगस्त की परेड की सलामी लेने के बाद एक पका हुआ आदमी बुलेटप्रूफ केबिन से भाषण दे रहा था, लता मंगेशकर के गाए ‘जरा याद करो कुर्बानी’ की धुन पर हिलते कंटीले तार दिखे जिनसे ओस आंसुओं की तरह टपक रही थी, वहीं मुस्तैद फौजी दिखे जो किसी भी क्षण जान देने को तैयार खड़े थे, थोड़ी देर तक तो इन लुभावनी तस्वीरों का रेला चला लेकिन भीतर बियाबान फैलने लगा… ये सब तो कैलेंडर, टीवी, म्यूजिक और फोटो हैं. इन बंदूक लिए सैनिकों की क्या जरूरत थी पहले पता तो चले कि रक्षा किसकी करनी है. अगर जमीन देश होती है तो रियल इस्टेट के कारोबारियों, हर तरह के छल से जमीनें बचाए रजवाड़ों और जमींदारों को इनका मालिक होना चाहिए और इसकी रक्षा भी उन्हीं को करनी चाहिए. यानी जमीन देश नहीं है, लोग भी देश नहीं है, अगर होते तो हमें उनके ऊंच, नीच, अछूत, म्लेच्छ होने में इतना पुरातन और पक्का यकीन कैसे होता कि हम आपस में खून बहाते.

आज जो भारत है वह कभी एक देश था ही नहीं. लोक में अपने गांव से सौ कोस से आगे की जगह परदेस हो जाती है, महाराष्ट्र, सौराष्ट्र और तमिलनाडु ही नहीं लगभग सभी राज्यों के पुराने नामों को याद किया जाए तो इतिहास में छिपे कई देश झिलमिलाने लगते हैं, कम से कम जितनी भाषाएं संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज है उतनी उपराष्ट्रीयताएं तो अब भी मौजूद हैं. इनमें से कई एक-दूसरे से टकराती भी हैं. एक ढीला-ढाला राष्ट्रवाद स्वाधीनता आंदोलन के दौरान ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ते हुए उसी रेल, डाक और तार के जरिए यानी आपसी मेलजोल के नए अवसरों से बना था जो हमें गुलाम बनाने वालों ने अपने व्यापारिक मुनाफे को संगठित और अकूत बनाने के लिए मुहैया कराए थे. राष्ट्रवाद को जीवित रहने के लिए हमेशा एक साझा दुश्मन चाहिए होता है लिहाजा चीन और पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध के समय इसका उभार देखा गया. जब तक साम्राज्यवाद के विरोध का हैंगओवर था हमें ‘आमार नाम तोमार नाम वियतनाम’ कहने से भी परहेज नहीं था लेकिन ग्लोबलाइजेशन और नई आर्थिक नीतियों को सहर्ष लागू करने के बाद वही साम्राज्यवादी शक्तियां फिर से हमारी नीतियां ही नहीं तय करने लगीं, हमारा मानस भी बदल डाला और हम भारतीय उनकी भाषा, पहनावे, खानपान और संस्कृति अपनाने को तरक्की कहने लगे.

अगर विडंबना कोई सड़क है तो अब हम उस मोड़ पर खड़े हैं जहां साम्राज्यवाद के आगे घुटने टेक देने के पाप पर पर्दा डालने के लिए और अपनी मिथकीय सनकों को फलीभूत करने के लिए राष्ट्रवाद को मुसलमानों, ईसाईयों और अन्य धार्मिक समूहों से नफरत पर आधारित करने की कोशिश की जा रही है. यह दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों से नफरत यानी जाति आधारित भी हो सकता था लेकिन खुद घृणा के सौदागर ही इतनी भाषाएं बोलते हैं, एक-दूसरे के रीति रिवाजों से अनजान हैं, इतनी ऊंच-नीच है कि उनमें एका संभव नहीं है.

भारत अब तक इतने अंतर्विरोधों के बावजूद नाजुक संतुलन से इसलिए बंधा हुआ है कि वह देश नहीं एक विचार है जिसका मूल विविधता, भिन्नता, अनेकता का सम्मान करने में है. यही भारतीयता है जिसे हिंदू पादशाही स्थापित करने की सनक पाले लोग देखना नहीं चाहते.

एक गोभक्त से भेंट

एक शाम रेलवे स्टेशन पर एक स्वामीजी के दर्शन हो गए. ऊंचे, गोरे और तगड़े साधु थे. चेहरा लाल. गेरुए रेशमी कपड़े पहने थे. पांवों में खड़ाऊं. हाथ में सुनहरी मूठ की छड़ी. साथ एक छोटे साइज का किशोर संन्यासी था. उसके हाथ में ट्रांजिस्टर था और वह गुरु को रफी के गाने के सुनवा रहा था.

मैंने पूछा- स्वामी जी, कहां जाना हो रहा है?

स्वामीजी बोले – दिल्ली जा रहे हैं, बच्चा!

मैंने कहा- स्वामीजी, मेरी काफी उम्र है, आप मुझे ‘बच्चा’ क्यों कहते हैं?

स्वामीजी हंसे. बोले – बच्चा, तुम संसारी लोग होटल में साठ साल के बूढ़े बैरे को ‘छोकरा’ कहते हो न! उसी तरह हम तुम संसारियों को बच्चा कहते हैं. यह विश्व एक विशाल भोजनालय है जिसमें हम खाने वाले हैं और तुम परोसने वाले हो. इसीलिए हम तुम्हें बच्चा कहते हैं. बुरा मत मानो. संबोधन मात्र है.

स्वामीजी बात से दिलचस्प लगे. मैं उनके पास बैठ गया. वे भी बेंच पर पालथी मारकर बैठ गए. सेवक को गाना बंद करने के लिए कहा.

कहने लगे- बच्चा, धर्मयुद्ध छिड़ गया. गोरक्षा-आंदोलन तीव्र हो गया है. दिल्ली में संसद के सामने सत्याग्रह करेंगे.

मैंने कहा- स्वामीजी, यह आंदोलन किस हेतु चलाया जा रहा है?

स्वामीजी ने कहा- तुम अज्ञानी मालूम होते हो, बच्चा! अरे गौ की रक्षा करना है. गौ हमारी माता है. उसका वध हो रहा है.

मैंने पूछा- वध कौन कर रहा है?

वे बोले- विधर्मी कसाई.

मैंने कहा- उन्हें वध के लिए गौ कौन बेचते हैं? वे आपके सधर्मी गोभक्त ही हैं न?

स्वामीजी ने कहा- सो तो है. पर वे क्या करें? एक तो गाय व्यर्थ खाती है, दूसरे बेचने से पैसे मिल जाते हैं.

मैंने कहा- यानी पैसे के लिए माता का जो वध करा दे, वही सच्चा गो-पूजक हुआ!

स्वामीजी मेरी तरफ देखने लगे. बोले- तर्क तो अच्छा कर लेते हो, बच्चा! पर यह तर्क की नहीं, भावना की बात है. इस समय जो हजारों गोभक्त आंदोलन कर रहे हैं, उनमें शायद ही कोई गौ पालता हो पर आंदोलन कर रहे हैं. यह भावना की बात है.

स्वामीजी से बातचीत का रास्ता खुल चुका था. उनसे जमकर बातें हुईं, जिसमें तत्व मंथन हुआ. जो तत्व प्रेमी हैं, उनके लाभार्थ वार्तालाप नीचे दे रहा हूं.

स्वामीजी और बच्चा की बातचीत

स्वामीजी, आप तो गाय का दूध ही पीते होंगे?

नहीं बच्चा, हम भैंस के दूध का सेवन करते हैं. गाय कम दूध देती है और वह पतला होता है. भैंस के दूध की बढ़िया गाढ़ी मलाई और रबड़ी बनती है.

तो क्या सभी गोभक्त भैंस का दूध पीते हैं?

हां, बच्चा, लगभग सभी.

तब तो भैंस की रक्षा हेतु आंदोलन करना चाहिए. भैंस का दूध पीते हैं, मगर माता गौ को कहते हैं. जिसका दूध पिया जाता है, वही तो माता कहलाएगी.

यानी भैंस को हम माता…नहीं बच्चा, तर्क ठीक है, पर भावना दूसरी है.

स्वामीजी, हर चुनाव के पहले गोभक्ति क्यों जोर पकड़ती है? इस मौसम में कोई खास बात है क्या?

बच्चा, जब चुनाव आता है, तब हमारे नेताओं को गोमाता सपने में दर्शन देती है. कहती है बेटा चुनाव आ रहा है. अब मेरी रक्षा का आंदोलन करो. देश की जनता अभी मूर्ख है. मेरी रक्षा का आंदोलन करके वोट ले लो. बच्चा, कुछ राजनीतिक दलों को गोमाता वोट दिलाती है, जैसे एक दल को बैल वोट दिलाते हैं. तो ये नेता एकदम आंदोलन छेड़ देते हैं और हम साधुओं को उसमें शामिल कर लेते हैं. हमें भी राजनीति में मजा आता है. बच्चा, तुम हमसे ही पूछ रहे हो. तुम तो कुछ बताओ, तुम कहां जा रहे हो?

स्वामीजी मैं ‘मनुष्य-रक्षा आंदोलन’ में जा रहा हूं.

यह क्या होता है, बच्चा?

स्वामीजी, जैसे गाय के बारे में मैं अज्ञानी हूं, वैसे ही मनुष्य के बारे में आप हैं.

पर मनुष्य को कौन मार रहा है?

इस देश के मनुष्य को सूखा मार रहा है, अकाल मार रहा है, महंगाई मार रही है. मनुष्य को मुनाफाखोर मार रहा है, काला-बाजारी मार रहा है. भ्रष्ट शासन-तंत्र मार रहा है. सरकार भी पुलिस की गोली से चाहे जहां मनुष्य को मार रही है. बिहार के लोग भूखे मर रहे हैं.

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बिहार? बिहार शहर कहा है बच्चा?

बिहार एक प्रदेश है, राज्य है.

अपने जम्बूद्वीप में है न?

स्वामीजी, इसी देश में है, भारत में.

यानी आर्यावर्त में?

जी हां, ऐसा ही समझ लीजिए. स्वामीजी, आप भी मनुष्य-रक्षा आंदोलन में शामिल हो जाइए न!

नहीं बच्चा, हम धर्मात्मा आदमी हैं. हमसे यह नहीं होगा. एक तो मनुष्य हमारी दृष्टि में बहुत तुच्छ है. वे लोग ही तो हैं, जो कहते हैं, मंदिरों और मठों में लगी जायदाद को सरकार ले ले. बच्चा, तुम मनुष्य को मरने दो. गौ की रक्षा करो. कोई भी जीवधारी मनुष्य से श्रेष्ठ है. तुम देख नहीं रहे हो, गोरक्षा के जुलूस में जब झगड़ा होता है, तब मनुष्य ही मारे जाते हैं. एक बात और है, बच्चा! तुम्हारी बात से प्रतीत होता है कि मनुष्य-रक्षा के लिए मुनाफाखोर और काला-बाजारी से बुराई लेनी पड़ेगी. यह हमसे नहीं होगा. यही लोग तो गोरक्षा-आंदोलन के लिए धन देते हैं. हमारा मुंह धर्म ने बंद कर दिया है.

खैर, छोड़िए मनुष्य को. गोरक्षा के बारे में मेरी ज्ञान-वृद्धि कीजिए. एक बात बताइए, मान लीजिए आपके बरामदे में गेहूं सूख रहे हैं. तभी एक गोमाता आकर गेहूं खाने लगती है. आप क्या करेंगे?

बच्चा? हम उसे डंडा मारकर भगा देंगे.

पर स्वामीजी, वह गोमाता है न. पूज्य है. बेटे के गेहूं खाने आई है. आप हाथ जोड़कर स्वागत क्यों नहीं करते कि आ माता, मैं कृतार्थ हो गया. सब गेहूं खा जा.

बच्चा, तुम हमें मूर्ख समझते हो?

नहीं, मैं आपको गोभक्त समझता था.

सो तो हम हैं, पर इतने मूर्ख भी नहीं हैं कि गाय को गेहूं खा जाने दें.

पर स्वामीजी, यह कैसी पूजा है कि गाय हड्डी का ढांचा लिए हुए मुहल्ले में कागज और कपड़े खाती फिरती है और जगह जगह पिटती है!

बच्चा, यह कोई अचरज की बात नहीं है. हमारे यहां जिसकी पूजा की जाती है उसकी दुर्दशा कर डालते हैं. यही सच्ची पूजा है. नारी को भी हमने पूज्य माना और उसकी जैसी दुर्दशा की सो तुम जानते ही हो.

स्वामीजी, दूसरे देशों में लोग गाय की पूजा नहीं करते, पर उसे अच्छी तरह रखते हैं और अब वह खूब दूध देती है.

बच्चा, दूसरे देशों की बात छोड़ो. हम उनसे बहुत ऊंचे हैं. देवता इसीलिए सिर्फ हमारे यहां अवतार लेते हैं. दूसरे देशों में गाय दूध के उपयोग के लिए होती है, हमारे यहां वह दंगा करने, आंदोलन करने के लिए होती है. हमारी गाय और गायों से भिन्न है.

स्वामीजी, और सब समस्याएं छोड़कर आप लोग इसी एक काम में क्यों लग गए हैं?

इसी से सब हो जाएगा, बच्चा! अगर गोरक्षा का कानून बन जाए, तो यह देश अपने-आप समृद्ध हो जाएगा. फिर बादल समय पर पानी बरसाएंगे, भूमि खूब अन्न देगी और कारखाने बिना चले भी उत्पादन करेंगे. धर्म का प्रताप तुम नहीं जानते. अभी जो देश की दुर्दशा है, वह गौ के अनादर का परिणाम है.

स्वामीजी, पश्चिम के देश गौ की पूजा नहीं करते, फिर भी समृद्ध हैं?

उनका भगवान दूसरा है बच्चा. उनका भगवान इस बात का ख्याल नहीं करता.

और रूस जैसे समाजवादी देश भी गाय को नहीं पूजते, पर समृद्ध हैं?

उनका तो भगवान ही नहीं बच्चा. उन्हें दोष नहीं लगता.

यानी भगवान रखना भी एक झंझट ही है. वह हर बात का दंड देने लगता है.

तर्क ठीक है, बच्चा, पर भावना गलत है.

स्वामीजी, जहां तक मैं जानता हूं, जनता के मन में इस समय गोरक्षा नहीं है, महंगाई और आर्थिक शोषण है. जनता महंगाई के खिलाफ आंदोलन करती है. वह वेतन और महंगाई-भत्ता बढ़वाने के लिए हड़ताल करती है. जनता आर्थिक न्याय के लिए लड़ रही है और इधर आप गोरक्षा-आंदोलन लेकर बैठ गए हैं. इसमें तुक क्या है?

बच्चा, इसमें तुक है. देखो, जनता जब आर्थिक न्याय की मांग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज में उलझा देना चाहिए, नहीं तो वह खतरनाक हो जाती है. जनता कहती है हमारी मांग है महंगाई बंद हो, मुनाफाखोरी बंद हो, वेतन बढ़े, शोषण बंद हो, तब हम उससे कहते हैं कि नहीं, तुम्हारी बुनियादी मांग गोरक्षा है. बच्चा, आर्थिक क्रांति की तरफ बढ़ती जनता को हम रास्ते में ही गाय के खूंटे से बांध देते हैं. यह आंदोलन जनता को उलझाए रखने के लिए है.

स्वामीजी, किसकी तरफ से आप जनता को इस तरह उलझाए रखते हैं?

जनता की मांग का जिन पर असर पड़ेगा, उसकी तरफ से. यही धर्म है. एक दृष्टांत देते हैं. एक दिन हजारों भूखे लोग व्यवसायी के

गोदाम में भरे अन्न को लूटने के लिए निकल पड़े. व्यवसायी हमारे पास आया. कहने लगा स्वामीजी, कुछ करिए. ये लोग तो मेरी सारी जमा-पूंजी लूट लेंगे. आप ही बचा सकते हैं. आप जो कहेंगे, सेवा करेंगे. बस बच्चा, हम उठे, हाथ में एक हड्डी ली और मंदिर के चबूतरे पर खड़े हो गए. जब वे हजारों भूखे गोदाम लूटने का नारा लगाते आए, तो मैंने उन्हें हड्डी दिखाई और जोर से कहा किसी ने भगवान के मंदिर को भ्रष्ट कर दिया. वह हड्डी किसी पापी ने मंदिर में डाल दी. विधर्मी हमारे मंदिर को अपवित्र करते हैं., हमारे धर्म को नष्ट करते हैं. हमें शर्म आनी चाहिए. मैं इसी क्षण से यहां उपवास करता हूं. मेरा उपवास तभी टूटेगा, जब मंदिर की फिर से पुताई होगी और हवन करके उसे पुनः पवित्र किया जाएगा. बस बच्चा, वह जनता आपस में ही लड़ने लगी. मैंने उनका नारा बदल दिया. जब वे लड़ चुके, तब मैंने कहा- धन्य है इस देश की धर्मपरायण जनता! धन्य है अनाज के व्यापारी सेठ अमुकजी! उन्होंने मंदिर की शुद्धि का सारा खर्च देने को कहा है. बच्चा जिसका गोदाम लूटने वे भूखे जा रहे थे, उसकी जय बोलने लगे. बच्चा, यह है धर्म का प्रताप. अगर इस जनता को गोरक्षा-आंदोलन में न लगाएंगे तो यह बैंकों के राष्ट्रीयकरण का आंदोलन करेगी, तनख्वाह बढ़वाने का आंदोलन करेगी, मुनाफाखोरी के खिलाफ आंदोलन करेगी. उसे बीच में उलझाए रखना धर्म है, बच्चा.

स्वामीजी, आपने मेरी बहुत ज्ञान-वृद्धि की. एक बात और बताइए. कई राज्यों में गोरक्षा के लिए कानून है. बाकी में लागू हो जाएगा. तब यह आंदोलन भी समाप्त हो जाएगा. आगे आप किस बात पर आंदोलन करेंगे.

अरे बच्चा, आंदोलन के लिए बहुत विषय हैं. सिंह दुर्गा का वाहन है. उसे सरकसवाले पिंजरे में बंद करके रखते हैं और उससे खेल कराते हैं. यह अधर्म है. सब सरकसवालों के खिलाफ आंदोलन करके, देश के सारे सरकस बंद करवा देंगे. फिर भगवान का एक अवतार मत्स्यावतार भी है. मछली भगवान का प्रतीक है. हम मछुओं के खिलाफ आंदोलन छेड़ देंगे. सरकार का मत्स्यपालन विभाग (फिशरीज महकमा) बंद करवाएंगे.

स्वामीजी, उल्लू लक्ष्मी का वाहन है. उसके लिए भी तो कुछ करना चाहिए.

यह सब उसी के लिए तो कर रहे हैं, बच्चा! इस देश में उल्लू को कोई कष्ट नहीं है. वह मजे में है.

इतने में गाड़ी आ गई. स्वामीजी उसमें बैठकर चले गए. बच्चा वहीं रह गया.

गाय और गोमांस की राजनीति

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फोटो- विजय पांडेय

‘शाकाहार विचार और कार्य की पवित्रता के लिए अपरिहार्य है. यह साधन की पवित्रता का एक प्रकार है. आप जो बोते हैं, वही काटते हैं. बूचड़खानों में ले जाए जाने वाले बेजुबान जानवरों का दर्द हमें सुनना और समझना है.’

नरेंद्र मोदी, तत्कालीन मुख्यमंत्री, गुजरात, 2 अक्टूबर 2003 को

महात्मा गांधी की 135वीं जयंती पर पोरबंदर में आयोजित कार्यक्रम में.

‘हम हिंदू गाय को अपनी माता मानते हैं. हम उसे पवित्र मानते हैं. मुसलमानों ने गाय को मारा है. यह जागने और बदला लेने का समय है. उनके इस क्रूर कृत्य के लिए उन्हें पीट-पीटकर मार डालना चाहिए. मुस्लिमों के वेष में शैतान, जिन्होंने गाय काटने जैसा यह क्रूरतापूर्ण कृत्य किया है, उन्हें मार देना हमारा असली धर्म और पवित्र कर्तव्य है.’

हिंदूवादी संगठन हिंदू युवक मंडल द्वारा प्रकाशित पम्फलेट 

भ्रमित न हों, यह पम्फलेट उत्तर प्रदेश के दादरी का नहीं है, जहां 28 सितंबर को एक 50 वर्षीय अखलाक को गाय चुराकर मारने और गोमांस खाने के आरोप में हिंदू कट्टरपंथियों की भीड़ ने पीटकर मार डाला. गुजराती भाषा में छपा यह पर्चा 1985 का है जब अहमदाबाद सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में था. उन दिनों दंगों की अगुवाई करते हुए संघ परिवार के कार्यकर्ताओं द्वारा इसे बड़े पैमाने पर बांटा गया था.

इस पम्फलेट ने यह अफवाह फैलाने में मदद की कि मुसलमानों ने सरयूदासजी मंदिर की एक गाय ‘जसोला’ का सिर काटकर उसे मंदिर के दरवाजे पर छोड़ दिया और उसके खून से लिखा, ‘हिंदू काफिर और सूअर हैं.’ इतिहासकार ओरनीत शानी का कहना है, ‘इस अफवाह ने 1985 के दंगों को फैलाने में अहम किरदार निभाया, जो कि सवर्ण जातियों ने मिलकर शुरू किया था. यह आरक्षण का लाभ पाने वाले दलितों के प्रति गुस्सा था, इसलिए उन्हें निशाना बनाया गया. जसोला को लेकर अफवाह हिंदुत्व कार्यकर्ताओं ने फैलाई थी. ऐसा राजनीतिक रूप से मुखर दलितों (जो वास्तव में खानपान की आदतों और वर्गीय अवस्थिति के मामले में मुस्लिमों के ही समान थे) को मुस्लिमों के खिलाफ संगठित करने के लिए किया गया.’

क्या इससे यह समझने में मदद मिलती है कि दादरी की घटना पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्यों मौन हैं? इतिहासकार केएन पनिक्कर कहते हैं, ‘अफवाहें, खासकर गोहत्या से जुड़ी अफवाहें, हमेशा से ही मुसलमानों के खिलाफ आरएसएस का प्रमुख हथियार रही हैं, जिसे उसने मुसलमानों की झूठी छवि गढ़ने के लिए इस्तेमाल किया है कि वे ‘भारत माता’ के हत्यारे या लुटेरे हैं.’ मोदी ने अपनी ‘हिंदू हृदय सम्राट’ की छवि बनाने के लिए ‘गाय और गोमांस की राजनीति’ का सुविधाजनक ढंग से प्रयोग किया है. मोदी के पोरबंदर के भाषण को देखा जा सकता है. सामाजिक मानवविज्ञानी पारविस घासेम फाचंदी का एक शोध आलेख है. यह ‘पोग्रोम इन गुजरात शीर्षक’ से है. इसमें उन्होंने मोदी (जिन पर उस समय न्यूटन के गति के नियम पर आधारित ‘क्रिया की प्रतिक्रिया होती है’ के जरिये तबाही को उकसाने के लिए चौतरफा हमले हो रहे थे.) के भाषण के अंशों पर ध्यान दिलाया है जिसमें वे बड़े शातिराना तरीके से शाकाहार और मांसाहार में अंतर करते हैं.

मोदी ने कहा था, ‘भारत के वेदों के मुताबिक, पेट रूपी कुंड में अग्नि है. इस अग्नि में अगर सब्जी, फल या अनाज डाला जाता है तो इस अग्नि कुंड को यज्ञ (बलिदान) कुंड कहते हैं, लेकिन अगर इस अग्नि में मांस डाला जाता है तो यह ‘श्मशान भूमि’ की अग्नि बन जाती है, यानी चिता की आग बन जाती है. यज्ञ की अग्नि जीवन, ऊर्जा, शक्ति आैैर धर्मनिष्ठा प्रदान करती है, जबकि ‘श्मशान’ की अग्नि गंदगी को गंदगी में और राख को राख में बदल देती है.’

घासेम फाचंदी का तर्क है कि ‘मोदी ने ‘यज्ञ और श्मशान’ में जो फर्क किया कि बलिदान जीवन देता है और मांस खाना मौत का प्रतीक है, वह शाकाहारी और मांसाहारी के बीच का अंतर है, जो कि हिंदू और मुसलमान में है. जो लोग शाकाहार लेते हैं वे मांस का त्याग करके बलिदान देते हैं और जीवन प्राप्त करते हैं. जो लोग मांसाहार लेते हैं, वे खुद को चिता में बदल लेते हैं. वे मांसाहार के रूप में जो भी खाते हैं, उससे मृत्यु प्राप्त करते हैं.’ यह विचार परियोजना ऐसी धारणा पेश करती है कि जो लोग मांसाहार लेते हैं वे हिंदुओं और भारतीय संस्कृति के लिए किसी दूसरे ग्रह के प्राणी हैं.

गुजरात में 2001 में मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने के बाद मोदी ने मुस्लिमों द्वारा कथित तौर पर गैरकानूनी बूचड़खाने चलाने और ‘गाय माता को चुराकर मारने’ जैसे विवादास्पद भाषण देकर सांप्रदायिक आधार पर विभाजक रेखा खींची. गुजरात के मानवाधिकार कार्यकर्ता सागर रबाड़ी याद करते हैं कि मोदी सरकार ने गोरक्षा अधिकार संगठनों (ज्यादातर गैर सरकारी संगठन-एनजीओ) और दूसरे गोरक्षा कार्यकर्ता समूहों के साथ काम किया, जो संघ परिवार से जुड़े थे. मोदी ने मुस्लिमों द्वारा चलाए जाने वाले बूचड़खानों पर पुलिस कार्रवाई की शुरुआत की, जहां कथित तौर पर गोहत्याएं होती थीं और स्थानीय मीडिया ने आधे सच आधे झूठ के साथ इस मामले को सनसनीखेज सुर्खियों के साथ उछाला.

इन संगठनों द्वारा प्रसारित प्रचार साहित्य पर निगाह डालने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि उनकी दिलचस्पी गाय की रक्षा करने के बजाय ‘गोमांस खाने वाले मुसलमानों’ को मारने में ज्यादा है. उनका अभियान हमेशा गुजरात की अहिंसा की समृद्ध परंपरा का आह्वान करता रहा लेकिन गाय को मारने और गोमांस खाने वाले मुस्लिमों के प्रति हिंसक ही रहा. अभियान में चालाकी से यह संकेत किया गया कि मुसलमानों की खानपान संबंधी हिंसक प्रवृत्तियां उनकी दैहिक इच्छाओं और क्रियाओं पर भी प्रतिबिंबित होती हैं. उन्हाेंने मुसलमान पुरुषों की कामेच्छा को भी खतरनाक ढंग से उत्तेजक और तामसिक बताया. इस अभियान में डर का पुट जोड़कर, ऐसे पुरुषों को शाकाहारी (सात्विक) उच्च जातीय हिंदू और जैन महिलाओं के लिए खतरा बताकर पेश किया गया. इस अभियान ने एक बड़े सजातीय वर्ग की सामान्य समझ को प्रभावित किया जो हिंदुओं के ध्रुवीकरण में सहायक हुआ.

2002 की हिंसा से जुड़े कई अध्ययनों में कहा गया है कि ‘मांसाहारी मुसलमानों की लैंगिकता’ के उस डर ने बहुत से हिंदू पुरुषों को मुस्लिम महिलाओं के प्रति क्रूर यौन हिंसा के लिए उकसाया. इन सब के बावजूद, इस हिंसा को गोधरा कांड की प्रतिक्रिया बताते हुए मोदी को गुजरात पर्यटन की ‘अहिंसा टूरिज्म’ की योजना की घोषणा करने में कोई हिचक महसूस नहीं हुई.

‘अहिंसा’ और पवित्र गाय का मिथक मोदी के लिए गुजरात में खुद की राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में कारगर साबित हुआ और यहां तक कि उनके दिल्ली तक पहुंचने में भी यह तरीका काफी उपयोगी साबित हुआ. 2012 में मोदी ने जैन समुदाय के अंतराष्ट्रीय व्यापार संगठन के साथ बैठक में गोरक्षा का आह्वान किया और इसी साल महाराणा प्रताप की जयंती पर आयोजित एक कार्यक्रम में यही बात दोहराई. दो साल बाद, दिल्ली में बाबा रामदेव द्वारा आयोजित कार्यक्रम में भी उन्होंने हूबहू वही बातें कहीं. मोदी के लोकसभा चुनाव प्रचार सभाओं के दौरान बिहार के नवादा और उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में यही राग दोहराया गया.

‘पिंक रिवोल्यूशन’ (मांस व्यापार) को बढ़ावा देने वाली यूपीए सरकार से नजदीकी के लिए मुलायम सिंह यादव आैैर लालू यादव पर हमला करने के लिए मोदी ने बड़ी होशियारी से भगवान कृष्ण के गाय के प्रति अनुराग की छवि का इस्तेमाल किया. मुस्लिम कसाइयों की गायों को चुराती हुई तस्वीरों को भी व्यापक रूप से फैलाया गया.

गोरक्षा के लिए किए गए इतने प्रचार के बावजूद, मोदी जब सत्ता में आए तब उन्हाेंने भारत में बढ़ रहे बीफ निर्यात को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया. वास्तविक स्थिति यह है कि मोदी सरकार के पहले साल में बीफ निर्यात में बढ़ोतरी हुई है. इस बीच, उनकी पार्टी के लोग उनकी शाकाहारी छवि पेश करने के लिए अतिरिक्त रूप से सतर्क हैं. दूसरी ओर बड़ी सावधानी से ‘दूसरे मांसाहारी’ लोगों की छवि हिंदू भारत में ‘म्लेच्छ’ के रूप में पेश की जा रही है.

वैज्ञानिक इतिहास लेखन ने यह सिद्ध किया है कि गाय कोई पवित्र जानवर नहीं है जैसा कि हिंदुत्व के स्वयंभू रक्षकों द्वारा दावा किया जाता है. मशहूर इतिहासकार डीएन झा के लीक से हटकर किए गए शोध में यह बताया गया है कि संघ परिवार जिस ऐतिहासिक काल की गाथा गाता है, उस वैदिक और उत्तर वैदिक युग में उच्च जातीय हिंदुओं द्वारा धड़ल्ले से गोहत्या की जाती थी और उसका मांस खाया जाता था. मुस्लिमों, दलितों, आदिवासियों और अन्य बीफ खाने वालों के बारे में रूढ़िबद्धता है, वह सीधे तौर पर हिंदुत्व से संबंधित है और हिंदू राष्ट्र के ड्रीम प्रोजेक्ट का अभिन्न हिस्सा है. इसलिए हिंदुत्व की राजनीति के माहिर हिंदू हृदय सम्राट नरेंद्र मोदी के लिए मोहम्मद अखलाक के परिवार के प्रति सच्ची संवेदनाएं जाहिर करना असंभव लगता है.

‘केवल कुत्तों और गायों को जीने दीजिए, शायद वही डिजिटल इंडिया के राजसी ठाठ-बाट के अधिकारी हैं’

हमारे पूर्वज वर्तमान युग को कलयुग (बुराई का युग) की संज्ञा देते समय एकदम सही थे. हिंदू पौराणिक मान्यता के अनुसार कलयुग की शुरुआत 5000 हजार वर्ष पहले पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध के साथ हुई, जिसकी अवधि 4,32,000 वर्ष है. आज चारों ओर के माहौल को देखते हुए इस समय को कलयुग ही कहा जा सकता है.

आप खुद ही देख लीजिए भारत के सबसे अमीर समुदायों में से एक, पटेलों द्वारा नियम कानून की परवाह न करते हुए आरक्षण की मांग की, आप किस तरह से इसकी व्याख्या करेंगे? इस उग्र आंदोलन के युवा नेता का कहना है कि अगर पुलिस रास्ते में आई तो पुलिस के लोग मारे जाएंगे.

राष्ट्रीय परिदृश्य तब और भी विडबंनापूर्ण होकर उभरता है जब हम पटेलों द्वारा कानून के इस प्रकार उल्लंघन की घटना को दिल्ली के सीमांत इलाके के दादरी में 50 वर्षीय मुस्लिम को भीड़ द्वारा मौत के घाट उतार देने की घटना के बरक्स रखते हैं. भीड़ के इस शख्स को मारने से पहले उसके परिवार के साथ गोमांस खाने की फैली अफवाह ने इसे धार्मिक चोला पहना दिया.

उत्तर प्रदेश के मुज्जफरनगर में 2013 में कथित रूप से मुस्लिम विरोधी हिंसा को भड़काने वाले के रूप से मशहूर शख्स ने इस बार ‘पवित्र गाय के रक्षक’ के रूप में सुर्खियां बटोरीं. हत्या की घटना के बाद भाजपा विधायक संगीत सोम ने दादरी पहुंच कर उस आग में घी डालने का काम किया जिसे संघ परिवार इससे जुड़े संगठन अपनी सांप्रदायिक कड़ाही के नीचे बड़ी मशक्कत से जलाए हुए है.

फिर जल्दी ही मीडिया में अलीगढ़ में इस गाय प्रेमी विधायक का गोमांस का कारखाना होने की खबर गूंजने लगीं. हिंदुत्व मूल्य गाय को अपनी जीविका के लिए मारने और गोमांस खाने वालों के लिए मौत की बात कहते हैं और बमुश्किल ही इस ‘गुनाह’ को माफ करते हैं पर उनके इस गोरक्षा अभियान के नायक का गोमांस का कारखाना चलाना उन्हें नहीं अखरता. ऐसा लगता है कि हिंदुत्व की विचारधारा इस विषय पर स्पष्ट है कि लाभ किसी भी कृत्य को क्षमा कर सकता है चाहे फिर वह गोहत्या पर आधारित व्यवसाय हो या फिर ‘गाय की रक्षा’ के नाम पर गरीब मुस्लिमों (या फिर ईसाईयों के खिलाफ भी जैसा कि ओडिशा के आदिवासी क्षेत्रों में हुआ है) के खिलाफ लामबंदी के लिए उकसाता हो.

दूसरी तरफ, केंद्र और कुछ राज्य सरकारें संघ का अभिन्न अंग हैं. वही संघ, जो दृढ़ता से अपनी ‘हिंदू राष्ट्र’ की विचारधारा के साथ खड़ा होता है. यही विचारधारा सीपीआई नेता और 17वीं शताब्दी के मराठा शासक शिवाजी की जीवनी लिखने वाले गोविंद पानसरे तथा हम्पी में कन्नड़ विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस चांसलर एमएम कलबुर्गी जैसे स्वतंत्र विचारकों की हत्या का कारण भी बनती है.

एक तरफ इन हत्याओं की जांच करने और हत्यारों को पकड़ने में पुलिस की उदासीनता से निराशा होती है, दूसरी ओर साहित्य अकादमी जैसी बड़ी संस्थाओं की चुप्पी ने भारत के कुछ बड़े लेखकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हमारे संवैधानिक अधिकार की रक्षा के लिए आवाज उठाने के लिए प्रेरित किया. उदय प्रकाश से जो शुरुआत हुई तो साहित्य अकादमी और साहित्य के लिए अन्य राज्य स्तर के पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों की फेहरिस्त बढ़ती ही जा रही है. यह दृश्य ‘सामूहिक चेतना वाले प्रबुद्ध’ लेखकों के विचार के प्रति भरोसा पैदा करता है.

इस बीच पूर्व पाकिस्तानी विदेश मंत्री की पुस्तक का लोकार्पण आयोजित करने के चलते संघ विचारक सुधींद्र कुलकर्णी के खिलाफ अपना गुस्सा दिखाकर शिवसेना गैर-सांप्रदायिक भारतीयों की नजरों में थोड़ा और चुभने लगी. सुधींद्र कुलकर्णी का काला चेहरा 21वीं सदी के भारत को पीछे अंधयुग की ओर धकेले जाने का सटीक प्रतीक है.

केवल उग्र हिंदुत्व की भीड़ ही नहीं बल्कि सड़कों पर घूमते आवारा कुत्ते भी आम जनता के लिए खतरा बनते जा रहे हैं. इस घटना को ज्यादा समय नहीं गुजरा है जब दिल्ली में एक रिक्शा चालक के घर में खेल रहे सात वर्षीय बच्चे को कुत्तों के एक समूह ने नोच कर मार डाला था. सैंकड़ों लोग कुत्तों के काटने से मर रहे हैं. मेरे साथी एक बार जब कुत्ते के काटने पर सरकारी अस्पताल पहुंचे तो वे कुत्ते के शिकार लोगों की लंबी लाइन देख कर हैरान रह गए. इस लाइन में अधिकांश झुग्गी में रहने वाले लोग थे जो रेबीज के टीके के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे.

मेरे इस साथी का अनुभव मुझे एक कैबिनेट मंत्री की याद दिलाता है जो अक्सर कुत्तों और बिल्लियों के अधिकारों के लिए जोर शोर से बोलते थे. अभिजन समाज के लोग अंधेरी रातों में सड़कों पर कुत्तों के आतंक के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं और इसलिए वे उनके अधिकारों के लिए खड़े हो सकते हैं. वे मंत्री मदर टेरेसा मिशनरियों द्वारा चलाए जा रहे 13 अनाथालयों के लाइसेंस रद्द करने से नहीं झिझके जबकि इन आश्रय स्थलों में लगभग 10 लाख ऐसे बच्चे थे जो पर्याप्त धन नहीं होने अथवा किसी किस्म की अशक्तता से ग्रस्त होने के कारण अपने अभिभावकों द्वारा त्याग दिए गए थे.

एक देश जिसका दुनिया को सबसे बड़ा योगदान महात्मा गांधी का अहिंसा का सिद्धांत और मदर टेरेसा का मानव मात्र के प्रति प्रेम है, ऐसा प्रतीत होता है कि आज वह स्वयं अपने उन मूल्यों को नकारता जा रहा हैै. लेकिन ठीक है, ऐसा होने दीजिए! केवल कुत्तों और गायों को जीने दीजिए, शायद वही डिजिटल इंडिया के राजसी ठाठ-बाट के अधिकारी हैं!

केंद्र और कुछ राज्य सरकारें संघ का अभिन्न अंग हैं. संघ, जो दृढ़ता से अपनी ‘हिंदू राष्ट्र’ की विचारधारा के साथ खड़ा होता है. यही विचारधारा स्वतंत्र विचारकों की हत्या का कारण भी बनती है

‘अब्बू कहते थे मानवता से बढ़कर कोई धर्म नहीं, ऐसे आदमी को उस रात धर्मांध भीड़ ने मार डाला’

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घर से फोन आना सरताज के लिए सामान्य बात थी. उनका 22 वर्षीय छोटा भाई दानिश, जो कि हास-परिहास और जिंदादिली से भरपूर था, अक्सर उन्हें फोन करता था. दोनों भाइयों में तमाम मसलों पर चर्चा होती थी और हर बात से पहले वे थोड़ा सा हंसी मजाक भी कर लेते थे. वायुसेना की जिंदगी ने सरताज को परिवार से दूर कर दिया था. उत्तर प्रदेश स्थित बिसाहड़ा गांव से बहुत दूर चेन्नई में रहते हुए वह परिवार से बहुत कम संपर्क कर पाता था. अक्सर देर शाम के वक्त सरताज के घर से फोन आया करता था. 28 सितंबर की रात जब उनकी बहन का नंबर मोबाइल पर साया हुआ तो उन्हें बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि ये कॉल उनकी जिंदगी पूरी तरह से बदलने जा रही है.

मोबाइल पर आ रही कॉल रिसीव करने के लिए उनकी उंगलियों ने जब रिसीविंग बटन दबाया तब उन्हें नहीं पता था कि वे अब तक की सबसे बुरी खबर सुनने जा रहे हैं. खून की प्यासी भीड़ ने उनसे उनके पिता को छीन लिया था.

उनकी बहन ने रोते-चीखते हुए किसी तरह कहने की कोशिश की, ‘वे हम सबको मार डालेंगे. उन्होंने अब्बू को मार डाला. भाई प्लीज, कुछ करो.’ फोन पर पीछे से आ रहा कोलाहल सरताज को सुनाई दे रहा था. यह बताते हुए सरताज की आंखें भर आईं. सरताज ने अपनी लरजती आवाज को मुश्किल से संभाला.

सरताज ने इस दौरान खुद को संभालने और एक बहादुर की तरह पेश करने की पूरी कोशिश की, जबकि उनके पिता की पीटकर हत्या कर दी गई थी और उनका भाई दानिश जिंदगी और मौत से जूझ रहा है. दानिश का अब भी दिल्ली के एक अस्पताल में इलाज चल रहा है.

अस्पताल के बिस्तर पर पड़े भाई के बगल में एक छोटे से स्टूल पर बैठे सरताज आपबीती सुना रहे थे. घटना के दौरान जब उसकी बहन का फोन आया, उसके बाद सरताज ने खुद को संभाला और बिसाहड़ा की स्थानीय पुलिस को मदद के लिए फोन किया. सरताज के मुताबिक, ‘पुलिस वालों ने इसे रोजमर्रा के अन्य फोन की तरह ही रिसीव किया और काट दिया. मैंने कई बार कॉल किया लेकिन सब बेकार गया. मैंने एंबुलेंस सर्विस के लिए आपातकालीन नंबर पर भी फोन किया लेकिन उन्होंने भी कुछ करने से मना कर दिया.’

जिस वक्त सरताज की बहन लगातार बदहवासी में उन्हें मदद के लिए फोन कर रही थीं, उस वक्त को याद करते हुए सरताज कहते हैं, ‘मैंने अपने जीवन में खुद को इतना असहाय कभी नहीं महसूस किया था. उस रात मैं कई बार मरा. आखिरकार, सुबह करीब चार बजे मुझे पता चला कि अब्बू नहीं रहे.’

सरताज जानते हैं कि एक बार अगर आंख से आंसू निकले तो उन्हें रोक पाना आसान नहीं होगा. वे रोना नहीं चाहते, न ही अपने भाई पर इसका असर होने देना चाहते हैं. सरताज अपने अब्बू को अपना रोल मॉडल मानते हैं. वे याद करते हैं, ‘मुझे आश्चर्य होता है कि कैसे एक व्यक्ति बुरे से बुरे वक्त में भी उम्मीद नहीं छोड़ता. मुश्किल वक्त में भी कभी उन्हाेंने परिवार नहीं टूटने दिया. वे हमेशा हम लोगों से कहते थे कि मानवता से बढ़कर कोई धर्म नहीं है. ऐसे आदमी को उस रात धर्मांध भीड़ ने मार डाला.’

अखलाक ने कुछ समय पहले अपने घर के पास ही के मंदिर की चहारदीवारी और दरवाजे के निर्माण में निःशुल्क काम किया था. सरताज कहते हैं, ‘मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता कि जो लोग हमारे उत्सवों में शामिल हुआ करते थे, एक दिन मेरे पिता की हत्या कर देंगे. मानवता में मेरा विश्वास अब भी बरकरार है, लेकिन सिर्फ सामान्य तौर पर. मैं अपने पड़ोसियों और दूसरे गांव वालों पर कतई विश्वास नहीं कर सकता. इसलिए मैंने सोचा है कि अपने परिवार को चेन्नई ले जाऊंगा. गांव के जिन लोगों पर अब्बू के कत्ल का इल्जाम है, उनमें से कुछ तो मेरे बाद पैदा हुए हैं. मैंने उन्हें बड़े होते हुए देखा है. वे मेरे भाई के हमउम्र हैं.’

सरताज की बहन ने उन्हें बताया कि अस्पताल ले जाने के पहले ही उनके पिता की मौत हो चुकी थी. ‘लेकिन भीड़ ने उनकी लाश पर भी रहम नहीं किया. जब वैन अब्बू को अस्पताल ले जाने लगी तब उन लोगों ने वैन पर भी ईंट-पत्थर फेंके.’

वायुसेना के इस जवान के लिए अपने भाई की गंभीर हालत फिलहाल चिंता का सबब है. वे कहते हैं, ‘मेरा भाई अच्छा विद्यार्थी था. अभी कुछ  दिन पहले ही उसने उन सब प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए आवेदन किए थे, जिनके लिए वह योग्य था. लेकिन वह भारतीय सेना की तरफ आकर्षित था. सेना में अफसर बनना चाहता था. वह कम्बाइंड डिफेंस सर्विस (सीडीएस) की परीक्षा भी देने वाला था.’

घटना के इतने समय बाद अब दानिश पर धीरे-धीरे इलाज का असर हो रहा है. हालांकि डॉक्टरों को यह डर है कि ठीक होने पर उसको याददाश्त से संबंधित दिक्कतें आ सकती हैं. सरताज बताते हैं, ‘उसके सिर पर जानलेवा किस्म की चोटें आई हैं. भीड़ ने मेरे पिता को तो मार ही दिया, साथ ही मेरे भाई के सपनों को भी कुचल दिया.’ दानिश के साथ गुजरे दिनों को याद करके सरताज के होठों पर मुस्कान आ जाती है. वह याद करते हैं, ‘वह जिंदादिल इंसान था. उसके साथ होने पर आपको अपनी हंसी रोकनी मुश्किल होती. वह इतना मजाकिया है कि उसके साथ कुछ देर बैठते के बाद आप हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाओगे.’

सरताज ‘तहलका’ को बताते हैं कि भीड़ का गुस्सा स्वाभाविक नहीं था. उन्हाेंने कहा, ‘मुझे नहीं याद है कि इस गांव में कभी एक भी सांप्रदायिक घटना घटी हो. जो लोग इस गांव को धर्म के आधार पर बांटना चाहते हैं, उन्हाेंने जरूर पहले से इसकी तैयारी की होगी. मैं किसी पार्टी विशेष पर इल्जाम नहीं लगाना चाहता लेकिन मैं दिल से चाहता हूं कि मेरे पिता के हत्यारों को ऐसी सजा मिले जो ऐसेे लोगों के लिए नजीर बन सके. इस बीच नेताओं को गांव का माहौल नहीं बिगाड़ना चाहिए. मैं सभी से अपील करता हूं कि सौहार्द्र बनाएं रखें. नेता आकर हमारा दुख बांट सकते हैं लेकिन उनको खून पर राजनीति नहीं करनी चाहिए.’ जाहिर है कि सरताज जिस देश की सेना में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, उस देश को लेकर उनकी निष्ठा को डिगा पाने में ऐसी कई भयावह घटनाएं भी कम पड़ जाएंगी. सरताज कहते हैं, ‘मैं अपने देश की सेवा उसी शिद्दत से करता रहूंगा जिसके साथ मेरे पिता ने मुझे पाल-पोस कर बड़ा किया था’ और इसके बाद वे शाम की नमाज के लिए चले गए.’

भीड़ का इंसाफ, मानवता साफ

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शाम के आठ बजने को हैं. अक्टूबर की इस शाम की हवा में ठंडक घुल चुकी हैै. जाहिर है कि आने वाले दिन और सर्द होंगे. यहां दिल्ली से महज 70 किमी. दूर गौतमबुद्ध नगर जिले के दादरी कस्बे के पास स्थित बिसाहड़ा गांव में भी एक अजीब सी ठंडक पसरी हुई है. गांव में चुप्पी का डेरा है. इसकी वजह एक इंसान की हत्या है, जो कुछ दिन पहले यहां हुई. इस हत्या ने गांव के सामाजिक ताने-बाने को खून की लकीर खींचकर बांट दिया गया है.

मौसम की गर्माहट से इस ठंड में कोई अंतर नहीं आएगा. सालों से इस गांव के रहवासी 50 वर्षीय मोहम्मद अखलाक को पिछले दिनों हिंदुओं की भीड़ ने गोमांस खाने के अाशंका के चलते पीट-पीटकर मार डाला गया. इस घटना में अखलाक के 22 साल के बेटे दानिश भी गंभीर रूप से घायल हुए. दानिश अब आईसीयू से बाहर हैं पर इस घटना के बाद बिसाहड़ा गांव शायद हमेशा के लिए बदल गया.

यहां क्या हुआ है, इस बारे में गांव वालाें के कुछ बताने से पहले गांव के बाहर एक अस्थायी चाय की दुकान का माहौल सारी कहानी बयान कर देता है कि यहां सब कुछ कैसे बदल गया है. चीजें कैसे रातों-रात बदल जाती हैं! जिस गांव में दो अलग-अलग आस्थाओं के लोग सदियों से रह रहे थे. आखिरकार उसे नफरत की उपजाऊ जमीन बना देने में ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ता लगा.  28 सितंबर की उस भयानक शाम को जब अखलाक को मारा गया, तबसे ये दुकान बंद है. लेकिन इस दुकान के ग्राहक अपने तय समय पर यहां पर यह देखने आते हैं कि हालात सामान्य हुए या नहीं. 70 वर्षीय किसान रूपचंद बताते हैं, ‘पिछले 30 सालों से हमारे मिलने-जुलने की जगह यही दुकान है. कोई ऐसा दिन नहीं है जब हम यहां मिलते न हों. ज्यादा चीनी वाली चाय के साथ हम यहां पारिवारिक मसलों से लेकर राजनीति और हर चीज पर चर्चा करते हैं, लेकिन हमने कभी धर्म पर चर्चा नहीं की. दरअसल, हमने शायद ही कभी गौर किया हो कि हममें में आधे हिंदू हैं और आधे मुसलमान हैं.’ उस शाम के बाद से रूपचंद हर रोज यहां पर निश्चित समय पर आते हैं कि दोस्तों से साथ एक कप चाय पिएंगे लेकिन दुकान बंद मिलती है. वे कहते हैं, ‘इस गांव का सामाजिक तानाबाना इस तरह छिन्न-भिन्न कर दिया गया है कि अब उसे वापस संभाला नहीं जा सकता. बिसाहड़ा को फिर से बिसाहड़ा होने में लंबा समय लगेगा.’

28 सितंबर की शाम ‘मोदीमय’ हुए भारत के नागरिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान के समर्थन में फेसबुक पर अपनी प्रोफाइल पिक्चर को तिरंगे के रंग में रंग रहे थे, जबकि मोदी फेसबुक के अमेरिका स्थित मुख्यालय में उसके सीईओ मार्क जुकरबर्ग के साथ थे और बड़े गर्व से दुनिया को बता रहे थे कि वे कितनी साधारण पारिवारिक पृष्टभूमि से हैं और देश ने उनको प्रधानमंत्री बनाकर कितना बड़ा मौका दिया है. उसी समय यहां बिसाहड़ा में कुछ ऐसा घटित हो रहा था, जो बेहद भयावह था. उसी समय अखलाक और उसके परिवार को पीटकर मार डालने के लिए भीड़ अपनी योजना को अंतिम रूप दे रही थी. अफवाह यह थी कि इस परिवार ने गाेमांंस खाया है और घर में भी रखा हुआ है. सांप्रदायिक तनाव इस गांव के लिए नया है. यहां पर 2500 परिवार हैं, जिसमें से केवल 50 परिवार मुस्लिमों के हैं.

इन डरावनी वजहाें से अचानक यह गुमनाम सा गांव बिसाहड़ा सुर्खियों में आ गया. रात भर में ही यह पुलिस छावनी और मीडिया हब में तब्दील हो गया, गांव की गलियां ओबी वैन और मीडियाकर्मियों से भर गईं. मीडिया के खुलासे के चलते कुछ संदिग्ध लोगों की गिरफ्तारी हुई. एक हफ्ते में ही बिसाहड़ा कट्टरपंथियों के अड्डे में तब्दील हो गया और सभी अपनी नफरत की राजनीति को अमल में लाने के लिए शोर करने लगे.

रूपचंद का कहना है, ‘हमारे गांव में अब स्पष्ट तौर पर सांप्रदायिक तनाव की रेखा खींची जा चुकी है. अब हिंदू, हिंदू है और मुसलमान, मुसलमान है. भाईचारे का पुराना बंधन अब नहीं रहा.’

जैसे ही आप मुख्य हाइवे से जुड़ने वाली सड़क से गांव की तरफ बढ़ेंगे, आपके लिए सामाजिक बंटवारे की वजह से फैली उस उदासी को नजरअंदाज कर पाना नामुमकिन होगा जिसने अभी अभी गांव में घुसपैठ की है और यहां अपना स्थायी बसेरा बना लेना चाहती है. समूह में खेल रहे युवाओं के माथे पर तिलक और चेहरे पर झलकती आक्रामकता वहां मौजूद तनाव के एहसास को बढ़ा देती है.  राष्ट्रीय राजधानी से 70 किमी दूर इस गांव में फिलहाल माहौल सामान्य नहीं है.

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मृतक अखलाक

गांव में इस तरह के युवाओं का दिखना नया है. भीड़ के कानून अपने हाथ में लेने के बाद यह छवि गढ़ी गई है. इसी तरह के एक युवा ने बैरभाव से भरी आवाज में इस संवाददाता का स्वागत किया, ‘मीडिया यहां बुरी तरह मारी जाएगी, टाइम रहते निकल लो.’ कुछ देर समझाने के बाद वह इस संवाददाता को बृजेश सिसौदिया के पास ले चलने को राजी हो गया. बृजेश सिसौदिया इस गांव के नए नवेले नेता और स्वयंभू मसीहा हैं.

सिसौदिया राष्ट्रवादी प्रताप सेना के अहम सदस्य हैं. राष्ट्रवादी प्रताप सेना हाल ही में सामने आया संगठन है जो हिंदुओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए लड़ने का दावा करता है. बिसाहड़ा के लिए शर्म का कारण बनी इस घटना का जिक्र करते हुए उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं दिखी. उसने दो-टूक शब्दों में कहा, ‘गोहत्या अपराध है. हम हिंदू लोग गाय का माता के रूप में सम्मान करते हैं. हम किसी को उसे नुकसान पहुंचाने के बारे में सोचने की इजाजत भी कैसे दे सकते हैं?’

जितनी बार उनसे पूछा गया कि आपको एक मार दिए गए आदमी और उसके परिवार को लेकर कोई अफसोस है, वह अपने फोन में कुछ ढूंढने या फोन पर बात करने के बहाने बात टालता रहा. भीड़ द्वारा अखलाक को पीटकर मार डालने से संबंधित एक सवाल के जवाब में उसने कहा, ‘देखिए, हमारे संगठन का भाजपा या आरएसएस से कोई लेना-देना नहीं है. हालांकि, जाति आधारित आरक्षण को समाप्त करने के मसले पर हम आरएसएस से सहमत हैं. हमारा संगठन ज्यादातर गांववालों की रोजमर्रा की समस्याओं को सुलझाने में उनकी मदद करता है.’

सिसौदिया के संगठन से जुड़े यशपाल सिंह भी उन लोगों में से एक हैं जो इस घटना के संबंध में गिरफ्तार किए गए हैं. मित्रों और समर्थकों से घिरे सिसौदिया ने यशपाल सिंह के बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. इस सेना के प्रमुख जो कि ग्रामीणों के रोजमर्रा सुख-दुख में शामिल होने का दावा करते हैं, कहते हैं कि उन्हें कोई अंदाजा नहीं था कि गांव के कुछ लोग एक मुसलमान के घर पर गोमांस खाने के आरोप को लेकर हमला करने की योजना बना रहे हैं. वे मीडिया का उपहास उड़ाते हुए कहते हैं, ‘मुझे नहीं मालूम है कि वे कौन लोग थे. मैं उस पर कोई बयान नहीं देना चाहता. मीडिया पूर्वाग्रह से ग्रस्त है और गांव वाले उनकी मौजूदगी से चिढ़ रहे हैं. सतर्क रहें, एक गलत सवाल करने पर आप पर हमला हो सकता है.’  हाल ही में गठित सेना से जुड़े युवाओं और पुलिसकर्मियों के अलावा गांव ऐसे दिख रहा है, जैसे उसकी आत्मा ही न रह गई हो. गांव के लोग मीडिया से बात करने से कतरा रहे हैं.

गौरव और सौरव नाम के दो भाई जो अखलाक के घर के बगल में ही रहते हैं, हत्या के संदिग्ध आरोपियों के तौर पर गिरफ्तार किए गए हैं. उनके घर के मुख्य दरवाजे की दरार से रोशनी बाहर झांक रही है. दरवाजे पर दस्तक देने पर दरवाजा खुलता है. यह आरोपियों की मां उर्मिला है. लगातार रोने से सूज गए चेहरे के साथ वे कहती हैं, ‘मेरे बेटों का इस हत्या से कुछ लेना देना नहीं है. मैं मीडिया को यह बताते-बताते थक गई हूं. सारा गांव जानता है कि अखलाक को किसने मारा. हत्यारे खुलेआम घूम रहे हैं और मेरे बेटों को बिना वजह फंसाया जा रहा है.’  जब इस संवाददाता ने उनसे हत्यारे का नाम पूछा तो उन्होंने दरवाजा बंद कर लिया. दोबारा दरवाजे खटखटाने पर उन्होंने दरवाजा खोला और पूछा, ‘हम त्योहारों पर उनके घर जाते थे, अपने यहां उनको बुलाते थे. मेरे बेटे अखलाक को चाचा कहते थे. वे उनकी हत्या कैसे कर सकते हैं? आपको एक बात और बता दूं कि हत्यारे बाहर के नहीं हैं. वे इसी गांव के रहने वाले हैं.’

उर्मिला यह स्वीकार करने वाली अकेली नहीं हैं कि अखलाक को मारने वाले इसी गांव के हैं. गांव के प्रधान संजय राणा भी कहते हैं कि हत्यारे इसी गांव के हैं. संजय राणा के केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा समेत कई भाजपा नेताओं से नजदीकी रिश्ते हैं, जिसे लेकर उनकी अकड़ जगजाहिर है. अखलाक की हत्या के आराेप में जो पकड़े गए हैं, उनमें से एक संजय राणा का बेटा भी है, लेकिन इसे लेकर संजय बेहद सहज नजर आते हैं.

राणा इसलिए भी चर्चा में हैं क्योंकि पिछले दिनों में वे बार बार अपना रवैया व बयान बदलते रहे. जब अखलाक को मारे जाने की घटना सामने आई तब संजय राणा ने कहा कि 28 सितंबर की रात को वे और उनका बेटा दोनों गांव में नहीं थे. एक हफ्ते बाद उन्होंने ‘तहलका’ से कहा, ‘जब यह घटना घटी मैं अपने घर के अंदर था.’ अखलाक के घर से राणा का घर कुछ ही मीटर की दूरी पर है. लेकिन, ग्राम प्रधान होने के बावजूद, जब भीड़ अखलाक को पीट-पीटकर मार रही थी, वे अपने घर से नहीं निकले. वे याद करते हुए कहते हैं, ‘गांव के पुजारी ने मंदिर के लाउडस्पीकर से घोषणा कर गांववालों से बिजली के ट्रांसफार्मर के पास इकट्ठा होने को कहा. मुझे बताया गया कि लोग अखलाक के घर के पास इकट्ठा हो रहे हैं. मैंने 10.30 बजे रात को पुलिस को फोन किया. जब तक पुलिस न आ जाए, मैंने घर में ही रहने का फैसला किया. यह मैं ही था जो अखलाक को अपनी कार में लेकर अस्पताल गया.’

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पूरी बातचीत के दौरान राणा कहीं भी चिंतित नहीं दिखते. अपने समर्थकों से घिरे हुए, वे पूरे आत्मविश्वास से कहते हैं कि उनका बेटा जल्दी ही छूट जाएगा. वे कहते हैं, ‘मेरा बेटा गुड़गांव में मेरे दामाद की फैक्ट्री में काम करता है. जब यह घटना हुई, उस समय वह दिल्ली में था.’ घटना के बाद राणा का बेटा बिसाहड़ा से सटे एक गांव से गिरफ्तार किया गया था.

‘तहलका’ ने उस पुजारी से भी मिलने की कोशिश की जिसने मंदिर के लाउडस्पीकर से घोषणा की थी, लेकिन मंदिर के पास जिस कमरे में वह रहता है, वह बंद था. वहां आसपास रहने वाले ज्यादातर लोगों ने बताया कि पूछताछ के बाद जबसे पुलिस ने उसे छोड़ा है, तबसे वह दिखाई नहीं दिया. यह कोई नहीं जानता कि असल में वह पुजारी कहां से आया था. संजय राणा कहते हैं, ‘मैं उसे व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता. एक साल पहले पुराने पुजारी की मौत हो गई थी, तब से मंदिर की देखरेख बिना किसी पुजारी के की जा रही थी. पूर्व प्रधान बाग सिंह द्वारा बहुत सिफारिश करने पर मैंने सुखदास को नए पुजारी के रूप में नियुक्त किया था.’ जबकि बाग सिंह ने ‘तहलका’ को बताया, ‘यह निहायत बकवास है. मैं उस पुजारी को नहीं जानता. मैं किसी ऐसे आदमी के नाम की सिफारिश क्यों करूंगा जिससे मैं पहले कभी मिला ही नहीं?’  कुछ गांव वालों ने बताया कि पुजारी बताया करता था कि वह उत्तर प्रदेश के सहारनपुर का रहने वाला है. एक ग्रामीण ने बताया, ‘लेकिन हर आदमी से अपने गांव का नाम उसने अलग-अलग बताया है.’ गांव में पुलिस तैनात है, लेकिन पुलिस को भी नहीं पता है कि प्रारंभिक पूछताछ के बाद वह पुजारी कहां गया? जन हस्तक्षेप नामक संगठन की ओर से गांव में एक फैक्ट-फाइंडिंग टीम भेजी गई थी. इस टीम के सदस्य विकास वाजपेयी ने बताया, ‘कहा जा रहा है कि पुजारी एक अक्टूबर को डॉक्टर के पास गया था, तबसे नहीं लौटा.’

इस बीच अखलाक के घर का दरवाजा बंद है. इस गांव का एक पुश्तैनी परिवार उजाड़ा जा चुका है. वे अपने ही पड़ोसियों से धोखा खाकर आहत हैं इसलिए किसी ‘सुरक्षित’ जगह जाना चाहते हैं. फिलहाल अखलाक का परिवार वायुसेना में कार्यरत उनके दूसरे बेटे के साथ चला गया है. अखलाक की बेवा की टूटी चूड़ियों के टुकड़े खून सने दरवाजे के पास बिखरे एक निष्ठुर संदेश दे रहे हैं कि ‘बिसाहड़ा अब दोबारा वैसा नहीं हो सकेगा.’ लेकिन कुछ लोग तो यह भी पूछते हैं कि क्या भारत अब पहले जैसा रह जाएगा और क्या अखलाक के परिवार जैसे अन्य परिवार अधिक समय तक महफूज रह पाएंगे?

सार्वजनिक होंगी नेताजी से जुड़ी फाइलें

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा फैसला किया है. नेता जी से जुड़ी गोपनीय फाइलों को अगले साल उनके जन्मदिन 23 जनवरी को सार्वजनिक किया जाएगा. इसका ऐलान स्वयं प्रधानमंत्री ने नेता जी के परिवार से मुलाकात के बाद किया.

प्रधानमंत्री ने कहा, ‘कोई कारण नहीं है जिसकी वजह से इतिहास का गला घोंटा जाए. मैं न सिर्फ दूसरे देशों की सरकारों को इस बारे में पत्र लिखूंगा बल्कि अपनी मुलाकातों के दौरान भी इस मुद्दे को उठाऊंगा.’ दूसरे देशों के सामने ये मुद्दा उठाने की शुरुआत दिसंबर में रूस से होगी. 14 अक्टूबर को नेताजी के परिवार के 35 सदस्यों से मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री ने ये फैसला लिया. इससे पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी नेताजी से जुड़ी 64 गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक कर चुकी हैं जो कोलकाता पुलिस के म्यूजियम में रखी हैं. बनर्जी ने फाइलें सार्वजनिक करने के दौरान मोदी सरकार को केंद्र सरकार के पास मौजूद 41 फाइलों को सार्वजनिक करने की चुनौती दी थी. अगले साल नेताजी से जुड़ी गोपनीय बातें देश के सामने आएंगी, जिनसे कई रहस्योद्घाटन होने की उम्मीद है. कहा जाता है कि नेताजी की मौत एक विमान दुर्घटना में हुई थी लेकिन इसके कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले. 1953 से साल 2000 तक तैयार की गई 41 फाइलों में से अब तक केवल 2 ही सार्वजनिक की गईं हैं. शेष 39 में 4 अति गोपनीय, 20 गोपनीय, 5 क्लासीफाइड और 10 अनक्लासीफाइड फाइलें हैं.

हिंदी साहित्य में स्वेतलाना एलेक्सीविच की जरूरत

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इस साल साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित बेलारूस की खोजी पत्रकार और नॉन फिक्शन (गैर काल्पनिक) लेखिका स्वेतलाना एलेक्सीविच की सबसे चर्चित किताब ‘वॉयसेज फ्रॉम चर्नोबिल’ के बारे में पढ़ते हुए मेरा ध्यान सबसे पहले भोपाल गैस त्रासदी के साहित्यिक दस्तावेजीकरण की तरफ गया. यह किताब वर्ष 1986 में यूक्रेन के चर्नोबिल परमाणु ऊर्जा संयंत्र में हुए भयानक विस्फोट के दुष्परिणामों पर आधारित है. अपनी रिपोर्टिंग के दौरान स्वेतलाना ने दुनिया की सबसे वीभत्स औद्योगिक आपदाओं में से एक के तौर पर पहचाने जाने वाली ‘चर्नोबिल आपदा’ के पीिड़तों का कई सालों तक साक्षात्कार लिया. बारम्बार… तब तक लोगों से दोबारा-तिबारा मिलती रहीं, जब तक लोग घटना से जुड़ी अपनी सबसे ईमानदार ‘भावनात्मक याद’ उन्हें बता न दें. जाहिर है पीिड़तों की यादों के जरिये चर्नोबिल विभीषिका की कहानी का करुणामयी दस्तावेजीकरण करके उसे किताब की शक्ल देने का काम उनकी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बना और उन्हें प्रसिद्धि दिलाई. स्वेतलाना का जन्म यूक्रेन में हुआ था पर उन्होंने अपना सारा जीवन यूक्रेन से सटे बेलारूस और उसके पड़ोसी स्लाविक क्षेत्रों में रिपोर्टिंग करते हुए बिताया. स्थानीय रूसी भाषा में रिपोर्ताज और किताबें लिखीं और हाशिये पर खड़े आम लोगों की जिंदगियां इतिहास में दर्ज करती रहीं.

स्वेतलाना को अभी-अभी मिले साहित्य के नोबेल पुरस्कार और ‘वॉयसेज फ्रॉम चर्नोबिल’ के साथ-साथ ‘वॉर्स अनवूमेनली फेस’ जैसी उनकी महत्वपूर्ण नॉन-फिक्शन (सत्य घटनाओं पर आधारित/ गैर काल्पनिक) किताबों ने एक तरफ जहां एक पत्रकार के तौर पर मुझे प्रेरित किया, वहीं मेरे जेहन में भोपाल गैस त्रासदी से लेकर हिंदी पत्रकारिता और हिंदी साहित्य तक से जुड़े कई सवाल भी पैदा किए. लेकिन इन सवालों पर आने से पहले इस साल के साहित्य नोबेल पुरस्कार के वैश्विक महत्व में झांकना जरूरी है.

आठ अक्टूबर की दोपहर घोषित हुआ साहित्य का नोबेल पुरस्कार मेरे लिए प्रोत्साहन और उम्मीद से भरी एक चिट्ठी की तरह था. शायद यह मेरे साथ हर पत्रकार के लिए गर्व का क्षण था. नोबेल पुरस्कार के इतिहास में पहली बार एक सक्रिय खोजी पत्रकार को नॉन-फिक्शन लेखन के लिए ये पुरस्कार दिया गया है. यहां यह दोहराना भी जरूरी है कि उपन्यासों, कविताओं और कहानियों जैसी विधाओं से पहचाने जाने वाले वैश्विक साहित्यिक संसार में नॉन फिक्शन विधा को दोयम दर्जे का समझा जाता रहा है. इस भेदभाव के पीछे तर्क यह दिया जाता है कि ‘कल्पना की उड़ान’ भरकर ‘कला’ को ऊंचाइयों तक ले जाने की जो आजादी काल्पनिक उपन्यासों-कविताओं और कहानियों के पास है, वह सिर्फ सत्य घटनाओं पर आधारित नॉन-फिक्शन के पास कहां? इतना ही नहीं, हर रोज आपदाओं के बीच बदल रही दुनिया का दस्तावेजीकरण करने वाली रिपोर्ताज (लॉन्ग फॉर्म रिपोर्टिंग) की महत्वपूर्ण विधा को भी हिकारत की नजर से देखकर हमेशा खारिज ही किया गया है. ऐसे में स्वेतलाना को नोबेल मिलने की खबर आने के बाद जब कुछ लोगों से सोशल मीडिया पर नोबेल पुरस्कार समिति को ‘शेम शेम’ कहते हुए उनके गिरते हुए स्तर को कोसा तो मुझे बिलकुल भी हैरानी नहीं हुई. एक सज्जन ने तो पुरस्कार समिति से ही सवाल किया कि क्या वे यह भूल गए थे कि स्वेतलाना सिर्फ एक  ‘पत्रकार’ हैं?book

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स्वेतलाना को यह पुरस्कार मिलना कई कारणों से महत्वपूर्ण है. एक रिपोर्टर होने के नाते स्वेतलाना के काम और उनके जीवन से प्रेरणा मिलती है. इस बात का गर्व भी है कि हमारे ही बीच के एक साथी रिपोर्टर ने अपनी गहरी संवेदना, लगन और लेखन शैली पर सालों लगातार काम करने के बाद विश्व के लिए कितने महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार किए. अपने एक इंटरव्यू में स्वेतलाना ने कहा, ‘अगर मैं 19वीं सदी में पैदा हुई होती तो जरूर उपन्यास लिखती, लेकिन युद्ध, महामारी, अकाल, अत्याचार जैसी अनगिनत आपदाओं से भरी 20वीं सदी के इतिहास को बताने के लिए फिक्शन कमजोर माध्यम है, इसलिए मैंने हजारों साक्षात्कारों के बाद सामने आने वाली लोगों की भावनात्मक यादों के आधार पर लिखे गए रिपोर्ताज का रास्ता चुना.’ उनकी किताबों को नोबेल पुरस्कार समिति ने ‘सोवियत रूस का भावनात्मक इतिहास’ कहकर संबोधित किया है.

इस पुरस्कार को साहित्यिक सामंतों के दंभ को तोड़ने वाली घटना के तौर पर भी देखा जा सकता है. शायद अपनी आराम कुर्सियों पर बैठकर कल्पना की उड़ाने भरते हुए अंग्रेजी में लिखने-पढ़ने वाले एक बड़े वर्ग के लिए यह सच पचा पाना बहुत मुश्किल होगा कि एक छोटे से गांव में गरीब ग्रामीण प्राथमिक शिक्षक के घर जन्मी एक लड़की को अपनी स्थानीय भाषा में लिखने के लिए नोबेल कैसे मिल गया? और उसने लिखा भी तो क्या! छोटे ग्रामीण अखबारों से लेकर पत्रिकाओं तक में लिखा, हाशिये पर ढकेल दी गईं आम औरतों और बच्चों की जबान बनीं.

स्वेतलाना को मिला यह पुरस्कार एक ओर जहां रिपोर्ताज के महत्व को दोबारा स्थापित करता है, वहीं भारतीय पत्रकारिता के सामने कई सवालों के सिरे भी छोड़ जाता है. सवाल ये कि हिंदी पत्रकारिता और लेखन में लंबे रिपोर्ताज पर आधारित जमीनी किताबों की क्या स्थिति है? फणीश्वर नाथ रेणु की ‘ऋणजल धनजल’ और फिर अनिल यादव की ‘वह भी कोई देस है महाराज’ जैसी गिनती की कुछ किताबों के नाम ही याद आते हैं, जबकि हमारे देश में आपदाओं और महामारियों के साथ-साथ समाज की हर परत में गहरा टकराव है, जिसकी वजह से भारत विदेशी पत्रकारों और लेखकों को हमेशा आकर्षित करता रहा है. यह हमारे लिए आत्मविश्लेषण का प्रश्न है कि क्यों आंतरिक संघर्षों और अनगिनत टकरावों के बारूद पर बैठे इस देश के सबसे ज्वलंत मुद्दों पर सबसे अच्छा काम विदेशी लेखकों का है?

उदाहरण के लिए भोपाल गैस त्रासदी पर प्रकाशित हुई सबसे प्रसिद्ध किताब ‘फाइव पास्ट मिडनाइट इन भोपाल’ फ्रांसीसी लेखकों डॉमिनिक लैपियर और जेवियर मोरो ने लिखी, फिर पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित कैथरीन बू की किताब ‘बिहाइंड द ब्यूटीफुल फॉरएवर्स’ को भारतीय गरीबी पर सबसे मजबूत किताब के तौर पर देखा जाता है. भारत में जो थोड़ी बहुत रिपोर्ताज प्रकाशित होती हैं, वे सिर्फ अंग्रेजी में काम करने वाले मीडिया संस्थान ही करते हैं. स्थानीय भाषा में लिखने वाले हिंदी पत्रकारों को लंबी रिपोर्ताज लिखने के लिए प्रोत्साहित और प्रकाशित करना न सिर्फ लेखन के लोकतांत्रिकरण के लिए, बल्कि विषय के साथ न्याय करने के लिए भी जरूरी है. लेकिन हिंदी के अखबार महत्वपूर्ण विषयों पर लंबी रिपोर्ताज प्रकाशित करने के लिए आम तौर पर दो पन्ने की जगह भी नहीं देते. सामंती सोच, औपनिवेशिक असर के साथ हिंदी में संसाधनों की कमी भी इसके लिए जिम्मेदार है. कारण कई हो सकते हैं पर हिंदी साहित्यकारों के साथ ही हिंदी पत्रकार भी कभी अपने समय का ईमानदार दस्तावेजीकरण न करने पाने की जवाबदेही से इनकार नहीं कर पाएगी.

‘इस बार सभी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को पता चलेगा कि सीमांचल की जनता में कितना आक्रोश है’

बिहार के सीमांचल में आपकी पार्टी चुनाव आखिर किस मकसद से लड़ रही है?

भारत एक जनतांत्रिक देश है और यहां हर दल कहीं से भी चुनाव लड़ सकता है. जहां तक असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी का चुनाव लड़ने का सवाल है तो सीमांचल के लोगों ने लगातार उनसे संपर्क किया. अपनी गरीबी, बदहाली, परेशानी को बताया. किशनगंज में बड़ी रैली करने के बाद जनता की भीड़ और भावनाओं को देखकर हमने यह फैसला किया कि हम चार जिलों किशनगंज, अररिया, कटिहार व पूर्णिया में चुनाव लड़ेंगे.

आपकी पार्टी का मुख्य मसला क्या होगा?

सीमांचल के इलाके में तो मसले ही मसले हैं. सीमांचल का मसला कभी उठा कहां? सीमांचल के जिले पटना से 500 किलोमीटर की दूरी पर है. पटना में तीन-तीन मेडिकल कॉलेज हैं. पटना से 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मुजफ्फरपुर में इंजीनियरिंग कॉलेज, विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज हैं. 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित गया में भी ढेरों संस्थान हैं. पटना में नीतीश कुमार ने तीन नए संस्थान खोले- आर्यभट्ट तकनीकी विश्वविद्यालय, चंद्रगुप्त प्रबंधन विश्वविद्यालय व चाणक्य नेशनल लॉ विश्वविद्यालय. सीमांचल के लिए क्या हुआ? सीमांचल में प्रति व्यक्ति आय 8000-9000 रुपये है जो कि राज्य में सबसे कम है. पूरे प्रदेश में किशनगंज में सबसे ज्यादा 79 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं. दूसरे जिलों में जहां 5-10 पंचायतों पर एक प्रखंड है वहीं हमारे इलाके में 25-30 पंचायतों पर एक प्रखंड है. किशनगंज की आबादी 17 लाख है और केवल दो मान्यताप्राप्त कॉलेज हैं. किशनगंज के नेहरू कॉलेज में तो दो हजार छात्रों पर एक शिक्षक हैं. अब खुद ही बताइए कि क्या यह न्याय है?

मुस्लिमों की हालत तो पूरे बिहार में ही ऐसी है, तो फिर सिर्फ सीमांचल में चुनाव क्यों लड़े रहे हैं, पूरे बिहार में क्यों नहीं?

हम पहले अपने आधार का विस्तार करेंगे, उसके बाद पूरे बिहार में भी जाएंगे.

आपकी पार्टी और ओवैसी पर तो सीधे आरोप है कि भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए आप लोग चुनाव लड़ रहे हैं?

ऐसी झूठी अफवाहों की परवाह नहीं. सीमांचल की जनता जानती है कि हम क्या हैं और सांप्रदायिकता के खिलाफ हमने क्या लड़ाई लड़ी है. और जहां तक राजद-जदयू के महागठबंधन की ओर से आरोप लगाने का सवाल है तो जदयू 17 साल तक भाजपा के साथ ही रही है, उसे तो भाजपा के खिलाफ बोलने का हक तक नहीं.

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क्या सीमांचल में आप अपनी पार्टी से सिर्फ मुसलमानों को ही टिकट देंगे या दूसरे समुदाय के लोगों को भी पार्टी का उम्मीदवार बनाएंगे?

ये हिंदू-मुसलमान का देश नहीं है. जो हिंदुस्तानी हैं, हम उनके साथ होंगे, वे हमारे साथ. हमारी पार्टी ने महाराष्ट्र में दलितों को टिकट दिया. औरंगाबाद में म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के चुनाव में 29 में पांच दलित हैं और वे सभी हमारी पार्टी से हैं. हम संप्रदाय और जाति के आधार पर राजनीति नहीं करेंगे. हम सिर्फ जीतने के लिए चुनाव नहीं लड़ रहे. हमारे लड़ने से सीमांचल में इस बार सभी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को पता चलेगा कि यहां की जनता में कितना आक्रोश है. सीमांचल की जनता दूध का दूध और पानी का पानी करेगी.

लेकिन एक बात तो तय है कि आपकी पार्टी चुनाव लड़ेगी तो वोटों का बंटवारा होगा और धर्मनिरपेक्ष ताकतें कमजोर होंगी. आप क्या सोचते हो?

याद रखिए, देखते रहिएगा. हम धर्मनिरपेक्ष को ही मजबूत करेंगे और तरक्की पसंद वोटों को बिखरने नहीं देंगे.