घबराए वामपंथी चला रहे राजनीतिक मुहिम
भारतीय संस्कृति और दर्शन का एक सूत्र-वाक्य है ‘नेति-नेति’, जिसका अर्थ होता है यह भी नहीं वह भी नहीं. अर्थात भारतीय समाज प्रकृति से प्रयोगधर्मी और विमर्शात्मक है. संक्षेप में शास्त्रार्थ हमारी सभ्यताई परंपरा है, इसलिए प्रयोगधर्मिता और विमर्शात्मकता बनी रहनी चाहिए और इस पर चोट करने वाली किसी भी ताकत और विचारधारा को परास्त किया जाना चाहिए. तभी तो नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के संदिग्ध अपराधियों, जिनका संबंध कथित रूप से सनातन संस्था से है, को जब पकड़ा गया तब कोई भी उनके बचाव में सामने नहीं आया. जब उनकी हत्या हुई, तब महाराष्ट्र और केंद्र में कांग्रेस की सरकारें थीं और जब अपराधी पकड़े गए तब भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं. इस देश के लोगों का मानवीय सरोकार कितना मजबूत है इसका प्रमाण इस बात से मिला कि पूरे देश ने एक स्वर में प्रो. कलबुर्गी और दादरी घटना की निंदा की. लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि इन घटनाओं को सिर्फ इन बातों से नजरअंदाज कर दिया जाए. हमारी कोशिश होनी चाहिए कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो.
लेकिन इन घटनाओं की आड़ में कुछ साहित्यकारों के द्वारा अवार्ड लौटाने की मुहिम कितनी उचित है, यह विचारणीय प्रश्न है. विरोध प्रकट करना और विरोध प्रकट करने की प्रकृति निश्चित रूप से किसी का निजी और मौलिक अधिकार होता है. अतः साहित्यकारों के विरोध प्रकट करने के अधिकार पर सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता. सवाल विरोध प्रकट करने की नीयत का है. कलबुर्गी की हत्या या दादरी की घटना से अगर कुछ साहित्यकार विचलित हुए हैं तो यह अस्वाभाविक नहीं है, लेकिन स्थानीय मुद्दे को राष्ट्रीय मुद्दा बना देना और अपराध को वैचारिक रंग दे देना ऐसे साहित्यकारों की नीयत पर सीधा सवाल खड़ा करता है. क्या अवार्ड लौटाना ही इन घटनाओं से लड़ने का एकमात्र रास्ता है?
सच्चाई यह है कि एक विशिष्ट विचारधारा ने समाजशास्त्र और साहित्य के क्षेत्र में अपना आधिपत्य पिछले साठ सालों से बनाए रखा है और इस आधिपत्य ने विमर्श को सर्वसमावेशी नहीं बनने दिया और संस्थाओं पर अपना एकाधिकार बनाए रखा, जिसके कारण वैकल्पिक विचारधाराएं सिर्फ पीड़ित ही नहीं हुईं बल्कि स्वतंत्र सोच और मेधा के लोग भी या तो उनके दासत्व को स्वीकार करने के लिए बाध्य हुए अथवा हाशिये पर भेज दिए गए. क्या कोई कल्पना कर सकता है कि 70-80 के दशकों में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में संघ की विचारधारा का प्रतिपादन करने वाला व्यक्ति वहां सफल शोधार्थी या शिक्षक हो सकता था? वैसे ही साहित्य के क्षेत्र में ट्रेड यूनियन की राजनीति किसने शुरू की? जिन तीन संगठनों ने अपना इस क्षेत्र में आधिपत्य बनाए रखा वे तीनों भारत की तीन कम्युनिस्ट पार्टियों से जुड़े हुए हैं. ये हैं प्रगतिशील लेखक संघ (जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ा है), जनवादी लेखक संघ (जो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ा है) और जन संस्कृति मंच (जो मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा से संबद्ध है). क्या यह महज संयोग है कि पुरस्कार लौटाने की मुहिम जिस व्यक्ति उदय प्रकाश ने शुरू की, वे 16 वर्षों तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्णकालिक कार्यकर्ता रहे हैं और प्रगतिशील लेखक संघ से 22 वर्षों तक जुड़े रहे हैं. उनकी कार्रवाई के बाद बाकी दोनों वामपंथी संगठनों में होड़ मच गई और जन संस्कृति मंच के मंगलेश डबराल और राजेश जोशी मैदान में कूद गए. बड़ी तादाद में जिन साहित्यकारों ने अवार्ड लौटाया है वे सफदर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट (सहमत) से जुड़े हैं. सहमत की वैचारिक पहचान से पूरी दुनिया वाकिफ है. निश्चित तौर पर इस क्रम में कुछ ऐसे साहित्यकार भी सामने आए जिनका इन संगठनों से संबंध नहीं है और वे इन वामपंथियों के द्वारा बनाए गए माहौल के शिकार हो गए.
कलबुर्गी की हत्या पर संवेदना और दर्द पूरे देश को है, लेकिन जो लोग संवेदना और दर्द की बात कर आज मुहिम चला रहे हैं उनको आईने में अपने आप को देखना पड़ेगा. उन्होंने न सिर्फ राष्ट्रवादी साहित्यकारों को हाशिये पर डाला व उनका दमन किया, बल्कि उनका समय-समय पर उपहास किया. इस संदर्भ में दो नाम उल्लेखनीय हैं- नरेंद्र कोहली और कमल किशोर गोयनका. इसकी सूची लंबी है. यही नहीं, उनसे असहमत रहने वाले वामपंथी साहित्यकारों को भी स्टालिनवादी दमन का सामना करना पड़ा. हिंदी साहित्य में त्रिलोचन जी एक बड़ा नाम हैं. उनका घोर अपमान और दमन इस हद तक किया गया कि उन्हें दिल्ली शहर छोड़ना पड़ा. रामविलास शर्मा के साथ क्या व्यवहार किया गया, यह किसी से छिपा नहीं है. संवेदना के प्रति ये कितने जागरुक हैं, इसका उदाहरण अवार्ड लौटाने वाले अशोक वाजपेयी का वह कथन है, जो उन्होंने भोपाल में यूनियन कार्बाइड की गैस त्रासदी के बाद कहा था. तब हजारों लोग मारे गए थे. उस वक्त वाजपेयी अंतर्राष्ट्रीय कविता सम्मेलन करा रहे थे. संवेदनशील लोगों ने उसे स्थगित करने की अपील की तो वाजपेयी ने कहा, ‘मुर्दों के साथ रचनाकार नहीं मरते.’ जिस सफदर हाशमी की हत्या कांग्रेस शासन में खुलेआम हुई वही ‘सहमत’ कांग्रेस सरकार से लाखों का अनुदान लेता रहा.
यह मुहिम राजनीतिक-वैचारिक उपक्रम है. इसका प्रमाण यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव से पूर्व इसी जमात के अनेक साहित्यकारों ने अपील जारी की थी कि ‘फासीवादी’, ‘नस्लवादी’, और ‘सांप्रदायिक’ नरेंद्र मोदी को मतदान न करें. यह अपील 8 अप्रैल, 2014 के जनसत्ता अखबार में छपी थी. इसमें वाजपेयी और डबराल जैसे लोग भी थे, जिन्होंने पहले ही नरेंद्र मोदी और संघ की विचारधारा को फासीवादी मान लिया था. वे आज कलबुर्गी की हत्या की आड़ में किस वैचारिक स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं. इन्हीं लोगों ने या इनकी धारा के लोगों ने इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाने पर उनका गौरवगान किया था. तब जिन फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ ने सम्मान वापस किया था, इन्होंने उनकी आलोचना की थी. 1984 के दंगे उनकी नजर में आई-गई घटना बन गए. जब सिंगूर और नंदीग्राम में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी शासित पश्चिम बंगाल राज्य ने सर्वहारा और अल्पसंख्यकों पर बर्बर हिंसा की थी तब मार्क्सवादी चिंतक नोम चॉम्सकी ने अपील की थी कि मार्क्सवादी सरकार का विरोध न करें और इक्के-दुक्के (इतिहासकार सुमित सरकार और उपन्यासकार महाश्वेता देवी जैसे) लोगों को छोड़कर अधिकांश साहित्यकारों ने मौन-व्रत धारण कर लिया था. तब उन गरीब लोगों की हत्या पर इनकी कलम की स्याही सूख गई थी और संवेदना रेफ्रिजरेटर में बंद हो गई थी.
क्या यह महज संयोग है कि पुरस्कार लौटाने की मुहिम जिस व्यक्ति उदय प्रकाश ने शुरू की, वे 16 वर्षों तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्णकालिक कार्यकर्ता रहे हैं और प्रगतिशील लेखक संघ से वर्षों तक जुड़े रहे हैं
सरकार के कुछ नीतिगत फैसलों से भी कुछ साहित्यकार प्रभावित हुए हैं. मोदी सरकार आने के बाद ऐसे अनेक लोग हैं जो कई कारणों से दुखी हैं, उनमें से एक वर्ग उन लोगों का है जो एनजीओ चलाता है. सरकार ने विदेशी धन देने वाली फोर्ड फाउंडेशन जैसी विदेशी संस्थाओं पर लगाम लगाने का काम किया है. इसका सीधा प्रभाव ऐसे अनेक एनजीओ पर पड़ा है जिनको कई लेखक चलाते हैं. इनमें से एक गणेश देवी हैं. इनकी संस्था को लगभग 12 करोड़ रुपये का डोनेशन मिला. मैं उनकी ईमानदारी पर सवाल नहीं कर रहा, न ही मैं उनके एनजीओ की गतिविधियों पर सवाल कर रहा हूं लेकिन उन्हें 2014-15 में फोर्ड फाउंडेशन से मिलने वाला धन पहले की तुलना में कम हो गया.
विचारधारा के स्तर पर मिल रही चुनौती से घबराए ये वामपंथी साहित्यकार इन दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं की आड़ में राजनीतिक मुहिम चला रहे हैं, जिनके साथ कुछ स्वतंत्र साहित्यकार भी शामिल हुए हैं. जो ऐसा ही है कि जौ के साथ घुन भी पीसा जाता है.
मैं इतिहास के एक उद्धरण के द्वारा अपनी बात समाप्त करना चाहता हूं. 1919 के भारत सरकार अधिनियम के तहत जब चुनाव हुआ और 1922 में पहली बार प्रांतों में कांग्रेस के लोग मंत्री बने, तब एक विकट स्थिति उत्पन्न हुई. औपनिवेशिक नौकरशाही को जिन मंत्रियों के साथ काम करना था उन्हें वे कल तक गुंडा कहते थे. (पुलिस और नौकरशाही में मौजूद लोग कांग्रेसियों को गुंडा कहते थे) नौकरशाही इन ‘गुंडों’ को सरकार में हजम करने को तैयार नहीं थी. ठीक वही स्थिति है. जिन लोगों को इनमें से अधिकांश लेखक सांप्रदायिक और फासीवादी कहते रहे हैं, उन्हें आज सत्ता में देखकर बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं. खैर, इस घटना से वैचारिक विमर्श का फलक बढ़ेगा और विमर्श पर प्रायोजित वामपंथी एकाधिकारवाद को और भी बड़ी चुनौती मिलेगी. इन साहित्यकारों के यह कार्य ताकत के तर्क का प्रदर्शन है न कि तर्क की ताकत का.
(लेखक भारत नीति प्रतिष्ठान के निदेशक और संघ से जुड़े विचारक हैं)
मुसलमान-वध वर्णाश्रम की जरूरत है!
ऐसा लग ही नहीं रहा है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार किसी भी मोर्चे पर नाकाम है. न ये कि कोई भी चुनावी वादा ऐसा है जो अधूरा रह गया है. चारों दिशाओं से आ रही मुसलमानों की बेरहम हत्याओं ने जश्न का कुछ ऐसा समां बांधा है, मानो बेरोक-टोक हो रही ये मुस्लिम-हत्याएं इस देश की हर नई-पुरानी समस्या का अंत कर रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा चुनाव पूर्व का हर वादा झूठ, ढोंग, जुमला साबित हो चुका है, इसके बावजूद वो दिल्ली, बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे मुख्य क्षेत्रों के चुनाव में स्टार प्रचारक हैं. उन्हें लाज क्यों नहीं आती, डर क्यों नहीं लगता कि जनता उन्हें विकास के वादे याद दिला सकती है? और वाकई जनता भी उन्हें ये वादे क्यों नहीं याद दिलाती? क्यों जनता ये नहीं पूछती कि अच्छे दिन की बजाय बदतर दिन क्यों आ गए? किसानों की आत्महत्याएं क्यों बढ़ीं? बलात्कार क्यों बढ़ गए? दाल का भाव 180-200 रुपये प्रतिकिलो क्यों चल रहा है? श्रम-कानून क्यों लचर किए गए? पर्यावरण कानून क्यों कमजोर हुए? नेपाल क्यों दीदे दिखा रहा है? चीन क्यों नहीं सुधर रहा है? पाकिस्तान से आखिर चल क्या रहा है? बेतहाशा विदेश-यात्राओं की फिजूलखर्ची से क्या हासिल हुआ? काला धन आने की बजाय बाहर क्यों जा रहा है? शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट बढ़ाने की बजाय घटाया क्यों जा रहा है? मनरेगा जैसी योजनाओं को असफल क्यों बनाया जा रहा है?
जनता चुनाव की रैलियों में ये सवाल क्यों नहीं पूछती अपने इस अंतर्राष्ट्रीय नेता से? क्या जनता सिर्फ इस बात से खुश है कि और कुछ हुआ हो या न हुआ हो लेकिन म्लेच्छ-मुसलमानों को सही काटा जा रहा है? क्योंकि डेढ़ साल में सिर्फ यही फर्क आया है कि भारत की सबसे निर्धन-कमजोर-सत्ताहीन आबादी-दलितों और मुसलमानों को बे-रोक, बेहिचक मारना और भी आसान हो गया है. तो क्या इस देश को बस यही चाहिए? क्या वह सिर्फ इस बात से राजी-खुशी है कि और कुछ करो न करो बस मुसलमानों को ‘ठीक’ कर दो? दलितों का सिर कुचल दो? विकास की वे बातें सब छलावा थीं.
सवाल यही है कि मुस्लिमों के प्रति हिंसा को बढ़ाने के लिए इतिहास की किताबों तक को प्रोपेगेंडा पम्फलेट में बदल रही ये व्यवस्था किस लक्ष्य को पाना चाहती है? 13 प्रतिशत की आबादी वाले सबसे निर्धन और हशियाग्रस्त मुस्लिम समाज से दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश को क्या वाकई खतरा हो सकता है? भारत के किसी भी हिस्से में इतने मुसलमान एक साथ नहीं रहते कि देश की संप्रभुता को कोई खतरा बन जाएं. भारत का कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं जहां इनकी एकछत्र मर्जी चलती हो. कृषि-उद्योग-कारीगरी-श्रम में ये न सिर्फ दूध में चीनी की तरह घुले हुए हैं बल्कि सबसे निचले पायदान पर हैं. राजनीति, नीति और अर्थतंत्र में ये अपने सभी हकों से वंचित हैं, ऐसे में मुस्लिम-वध के लिए इतनी संवेदनहीन और खून की प्यासी जमीन कैसे तैयार की गई? और सबसे बड़ा सवाल यह कि इसकी जरूरत क्यों है?
इसका जवाब वर्ण-व्यवस्था के अंदर है और दलित समाजविज्ञानी अब इस साजिश को समझने लगे हैं कि इस खून-खराबे की धुरी सांप्रदायिकता या हिंदू-मुस्लिम ‘एकता-फेकता’ है ही नहीं. धर्मनिरपेक्षता से इसका लेना-देना है ही नहीं, न ही देश की छवि का सवाल इसके आड़े आता है. दरअसल ये सवाल सनातन समाज के अंदर से आ रहे जानलेवा चुनौती को भ्रमित कर, मुसलमान को खतरा बता, सनातन धर्म के अस्तित्व को बचाने का आखिरी दांव है. वरना ऐसा क्यों है कि जब भी सनातन व्यवस्था आधुनिकता से टकराती है, दलित को बराबरी और हिस्सा देने की बात सिर उठाती है तभी हिंदू-मुस्लिम एकता और द्वेष के धुर-विरोधी खेमे आपस में जोर-शोर से कदमताल करने लगते हैं?
आजादी की लड़ाई याद कीजिए, उस वक्त भी सब कुछ ‘ठीक’ चल रहा था. गोरे मालिकों को बाहर कर देसी मालिकों के हाथ में सत्ता आ ही गई थी कि सनातन-व्यवस्था के अंदर के गुलामों (दलितों) ने अपना दावा ठोंक दिया. गांधी जो महात्मा बन चुके थे, इसलिए दलितों (हरिजनों) के स्वयं के नेतृत्व के अधिकार को नकारते हुए, ये तय कर चुके थे कि वैश्य जाति के वे स्वयं ही अछूतों के प्रतिनिधि हैं, न कि एक दलित भीमराव आंबेडकर! दूसरी गोलमेज कॉन्फ्रेंस में वे बिफर गए, बाबा साहेब की आधुनिक और वैज्ञानिक दलीलों ने अंग्रेजों से दलितों के लिए अलग व्यवस्था सुनिश्चित करा ली थी लेकिन ‘महात्मा’ के राजहठ के आगे उन्हें अपने कदम वापस लेने पड़े. दलित का सवाल केंद्र में आ ही गया था कि तभी सबसे तीखा हिंदू-मुस्लिम टकराव पैदा होता है. गांधी एक तरफ हिंदू-मुस्लिम की एकता की वकालत करते तो दूसरी तरफ भारत में ‘रामराज्य’ लाने का शोशा छेड़कर मुसलमानों को संदेश देते कि नई व्यवस्था सनातन धर्म के आधार पर चलेगी. ‘रामराज्य’ की स्थापना को अपना लक्ष्य बताने वाले गांधी अपने विरोधाभासों से हिंदू-मुस्लिम नफरत की जड़ें मजबूत कर रहे थे. ये द्वेष जैसे-जैसे बढ़ा वैसे-वैसे दलितों का एजेंडा हाशिये पर सरकता चला गया. बहरहाल बंटवारा हुआ और हिंदुओं के साथ सहअस्तित्व में यकीन न रखने वाला सामंती-सांप्रदायिक मुसलमान सरहद पार कर गया, जिससे काफी हद तक भारतीय मुस्लिम समाज के अंदर का सामंती मैल भी छंटा. लेकिन भारत के हिंदू समाज में ऐसी कोई छंटनी नहीं हुई बल्कि उस तरफ का सामंती और सहअस्तित्व का विरोधी हिंदू भी इधर ही जमा हो गया. नतीजा ये कि महज कुछ दशकों में ही शाकाहारी हत्यारे जत्थे उत्तर भारत की पहचान बन गए हैं और दलितों और मुसलमानों पर पिल पड़े.
गांधी एक तरफ हिंदू-मुस्लिम एकता की वकालत करते तो दूसरी तरफ भारत में ‘रामराज्य’ लाने का शोशा छेड़कर मुसलमानों को संदेश देते कि नई व्यवस्था सनातन धर्म के आधार पर चलेगी. ‘रामराज्य’ को अपना लक्ष्य बताने वाले गांधी अपने विरोधाभासों से हिंदू-मुस्लिम नफरत की जड़ें मजबूत कर रहे थे
तब से लेकर आजतक सफल फार्मूला वही है- दंगों में दलितों-पिछड़ों का इस्तेमाल कर ‘सत्ताहीनों की एकता’ को तोड़ो, दलित-वध बिना शोर शराबे के और मुसलमान-वध उत्सव की तरह करते रहो. देश को हिंदू-मुस्लिम की परिपाटी से इतर सोचने न दो और हिंदू धर्म-समाज के अंदर से सिर उठाने वाली चुनौतियों को कभी मुख्यधारा के सवाल बनने न दो. लिहाजा मुख्यधारा का बनिया-ब्राह्मण संचालित सर्वव्यापी मीडिया कभी किसी दलित की हत्या पर शोर नहीं मचाता, उनकी नैतिकता दलित हत्याओं-बलात्कारों को आत्मसात कर चुकी है. उनकी जरूरत तो मुसलमान-वध है. पूरे हिंदू समाज की एकता को साझा दुश्मन यानी मुसलमान की सबसे ज्यादा जरूरत आज ही इसलिए भी है कि अब दलित-आदिवासी चेतना अपने इतिहास के सबसे मुखर दौर में दाखिल हो चुकी है. दलित बुद्धिजीवी और कार्यकर्ता देश से लेकर विदेशों तक अपने समाज को तेजी से आंदोलित कर रहे हैं. अब इस सैलाब को भटकाया नहीं गया तो महज 8 प्रतिशत की आबादी वाला ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ कैसे देश के 80 प्रतिशत संसाधनों पर काबिज रह सकेगा? जैसे-जैसे बेदखल अवाम आपसी गठजोड़ बनाएंगे उसी अनुपात में हिंदू एकता को मुसलमान बलि की दरकार रहेगी. अतः फिलहाल ये उत्सव जारी रहेगा.
दिल्ली से सटे दादरी में एक मुस्लिम परिवार पर सैकड़ों की भीड़ का हमला करना, मुखिया अखलाक को पीट-पीट के मार डालना और जवान बेटे को लगभग मरा छोड़ कर इस जघन्य अपराध को जायज ठहराना, सारी दुनिया की पहली खबर बना, लेकिन बात-बात पर ‘मन की बात’ करने वाले प्रधानमंत्री ने उस परिवार से दो शब्द हमदर्दी के नहीं कहे. हमदर्दी से कोई जिंदा नहीं हो जाता, शरीर और आत्मा के घाव भर नहीं जाते, किसी नुकसान की भरपाई नहीं हो जाती. वह प्रधानमंत्री, जिसने तीन माह पूर्व ही अपनी विदेश यात्राओं से ठीक पहले, देश के मुसलमानों को वचन दिया था कि ‘अगर आधी रात में भी आप मेरा द्वार खटखटाएंगे तो मैं आपका साथ दूंगा’. प्रधानमंत्री अपनी तमाम नाकामियों को मुसलमान-वध के उत्सव में ढक देना चाहते हैं.
(लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
इस राजनीति को हिंसा से परहेज नहीं
देश की राजधानी दिल्ली से लगे हुए दादरी के एक गांव में जिस तरह उन्मादी भीड़ ने एक मुस्लिम परिवार के घर में घुसकर मुखिया की हत्या कर दी और फिर उसके बाद उसी उन्माद को और आगे बढ़ाने की जो हरकतें राजनेताओं की फौज ने कीं, वह देश भर के आम लोगों को आतंकित करने वाला प्रसंग है. सामान्य लोगों का आतंकित होना इसलिए कि इस पूरी घटना से कानून व्यवस्था के पूरी तरह ध्वस्त हो जाने की तस्वीर उभरती है. जो जानकारी आई उसके मुताबिक मंदिर से कुछ घोषणाएं कराई गईं और उसके बाद उन्मादी भीड़ ने एक मुस्लिम परिवार पर उसके घर में घुसकर हमला किया जिसमें बाप की मृत्यु हो गई और बेटा अब भी अस्पताल में दाखिल है. डर के मारे परिवार एयरफोर्स की पनाह में है क्योंकि उस परिवार का एक सदस्य एयरफोर्स की नौकरी करता है. मैं सोचता हूं कि यदि वह एयरफोर्स में न होता तो वह परिवार कहां पनाह लेता? राज्य सरकार उस परिवार की सुरक्षा भी सुनिश्चित करने लायक नहीं बची. अलबत्ता उसने 5 लाख से बढ़ाते-बढ़ाते मुआवजे की रकम 45 लाख रुपये जरूर कर दी. देश के प्रधानमंत्री ने इस घटना पर दुख व्यक्त करना तथा ऐसे कदम की निंदा करना भी जरूरी नहीं समझा. बहुत आग्रह के बाद मुंह खोला भी तो अपनी राजनीति करने के अंदाज में.
यह घटना उस प्रकार की राजनीति को उजागर करती है जो धर्म व संप्रदाय का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए करती है और जिसे हिंसा से कोई परहेज नहीं है. यह कहा ही जा सकता है या कहा जा रहा है कि समाज में असहिष्णुता बढ़ती जा रही है और विद्वेष की मानसिकता बन रही है लेकिन यह सही नहीं है. समाज तो अब भी प्रेम, भाईचारे और सहयोग के साथ आगे बढ़ रहा है. केवल एक वर्ग है जो निहित स्वार्थ वाली राजनीति का खिलौना बन जाता है जो किसी भी रूप में समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता. सभ्य समाज को प्रतिगामी बनाने की नीयत से कबीलाई मानसिकता की ओर धकेलते हुए सत्ता हथियाने की राजनीति करने की प्रवृत्ति तो मेरी चिंता का विषय है ही, लेकिन इससे अधिक चिंता का सबब है कानून व्यवस्था व प्रशासनिक तंत्र का ध्वस्त हो जाना. कोई भी विध्वंसक व विभाजनकारी शक्तियां सिर्फ इसलिए ही बलवती नहीं होतीं कि उन्हें राजनेताओं का प्रश्रय और प्रोत्साहन है, बल्कि इसलिए घातक रूप अख्तियार कर लेती हैं कि उनके सामने कानून, न्याय, संविधान और समूची व्यवस्था नतमस्तक हो जाती है. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब हम कानून व्यवस्था को ध्वस्त होते या कुछ लोगों को कानून को धता बताते हुए समाज में कटुता, विद्वेष और हिंसा फैलाते देख रहे हैं. लेकिन पिछले कुछ समय से, खासकर केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद से जो हालात बन रहे हैं, वे सचमुच ऐसी स्थितियों को विस्तारित करने वाले हैं.
गांव में एक मुस्लिम परिवार के खिलाफ उन्मादी भीड़ इकट्ठा होकर उसके घर में हमला करती है और पुलिस प्रशासन को इसकी कोई पूर्व जानकारी नहीं होती. ऐसा उन्माद अचानक नहीं फैलता. इसकी तैयारी तो पहले से चलती रही होगी लेकिन प्रशासन इससे नावाकिफ रहा या मूकदर्शक. हमला हो जाने के बाद राजनेताओं की फौज निषेधाज्ञा का खुलेआम उल्लंघन करती है, वे माहौल को और उन्मादी बनाने की हरकतें करते हैं लेकिन समूची सरकार व प्रशासनिक तंत्र फिर मूकदर्शक बना रहता है. जिन राजनेताओं ने कानून तोड़ा, उन पर तत्काल ही कार्रवाई की जाती जो आम आदमी द्वारा कानून तोड़ने पर की जाती है तो ऐसे राजनेताओं को सबक मिलता जो अपने आपको कानून से ऊपर समझकर समाज में अराजकता व हिंसा का माहौल बनाते हैं. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. जो लोग इस घटना से दुखी या असहमत हैं, उनकी मुख्य आपत्ति सिर्फ इतनी रही कि इस घटना पर प्रधानमंत्री चुप क्यों हैं, उन्हें प्रशासन व सरकार की निष्क्रियता से कोई शिकायत नहीं है. प्रदेश के मुख्यमंत्री टोने-टोटके के चलते घटनास्थल पर नहीं जाते. चलिए, कम से कम प्रशासन को सख्ती से कार्रवाई करने का निर्देश तो दे ही सकते थे. उल्टे उनके ही एक मंत्री मामले को जब संयुक्त राष्ट्र संघ ले जाने की पहल करते हैं तो वे खामोशी से उस पहल को खारिज नहीं कर पाते. जिस राजनेता ने भी कानून का उल्लंघन किया, उसके खिलाफ कानून सम्मत कार्रवाई कर दी जाती तो अन्य नेताओं को सबक मिलता लेकिन इसमें भी राजनीतिक नफे-नुकसान का गणित देखा जाने लगा.
प्रश्न यह नहीं है कि किसी घटना विशेष के प्रति प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या सरकारें विशेष रूप से ध्यान दें बल्कि असली सवाल तो यह है कि कानून का न्यूनतम पालन भी क्यों नहीं किया जाता
हिंसा और विद्वेष फैलाने की क्रिया-प्रतिक्रिया होती रही, दोषारोपण होता रहा और आम जनता आतंक के आगोश में समाती रही. यह सही है कि प्रधानमंत्री इस घटना पर तत्काल प्रतिक्रिया देते तो यह संदेश जाता कि ऐसी घटनाओं के प्रति सरकार सख्त है. हो सकता है कि अपनी राजनीति के चलते वे अपनी पार्टी के उन नेताओें के खिलाफ कार्रवाई करने की स्थिति में न रहे हों. ऐसा इसलिए कि 2014 के लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक उनकी पार्टी के नेता मंत्री उन्माद फैलाने वाले, भड़काऊ और विभाजनकारी बयान देते रहे हैं लेकिन कभी किसी पर उनके या उनकी पार्टी द्वारा कार्रवाई नहीं की गई और न ही ऐसे विचारों को बयान बनने से रोका गया. अलबत्ता ऐसे नेताओं को सम्मानित करने की भी पहल की गई. यहां यह समझना चाहिए कि हत्या करने वाली उन्मादी भीड़ से अधिक गुनहगार वे लोग हैं जिन्होंने अबोध लोगों को उन्मादी भीड़ में तब्दील कर दिया. प्रश्न यह नहीं है कि किसी घटना विशेष के प्रति प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या सरकारें विशेष रूप से ध्यान दें बल्कि असली सवाल तो यह है कि कानून का न्यूनतम पालन भी क्यों नहीं किया जाता, एक खास वर्ग को कानून तोड़कर आमजन के जानो-माल को असुरक्षित करने का अधिकार क्यों दे दिया जाता है. सभी को सुरक्षा प्रदान करने का संवैधानिक दायित्व राज्य क्यों नहीं निभाता? यही वह स्थिति है जो उन लोगों को भी आतंकित करती है जो किसी घटना विशेष से बहुत दूर हैं. ‘कानून के ऊपर कोई नहीं’, ‘कानून अपना काम करेगा’, जैसे सत्ताधारी राजनेताओं के दावे आम आदमी को न्याय के प्रति आश्वस्त नहीं करते बल्कि ये ऐसे मुहावरे बन गए हैं जो एक वर्ग विशेष को कानून और संविधान से परे हर तरह के गैरकानूनी कार्य करने का विशेषाधिकार प्रदान करते हैं. कानून व्यवस्था का प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि न्यायपूर्ण व्यवस्था कायम करने का यह आधार है. सामान्यजन को सुरक्षा प्रदान करना न्याय की पहली जरूरत है और यदि तंत्र असफल होता है तो छोटे-छोटे दादरी हर दिन होते रहेंगे और समूची व्यवस्था निहित स्वार्थों के हाथों की कठपुतली हो जाएगी.
राजनीति और राजनेताओं द्वारा जाति, संप्रदाय, धर्म के आधार पर लोगों को एकजुट करने तथा समाज में हिंसा फैलाने की घटनाओं की निंदा तो की ही जानी चाहिए लेकिन उनसे ऐसा नहीं करने की अपेक्षा करने की बजाय कानून व्यवस्था का राज कायम करने पर जोर देना ज्यादा जरूरी है. दादरी जैसी घटनाओं से परे भी पूरे देश में कानून व्यवस्था की स्थिति इतनी अराजक हो चली है कि गिरोहबंद लोग कानून को अपनी बांदी मानकर चलते हैं. वहीं राजनीति और व्यवसाय के साथ गठबंधन धर्म निभाने वाला प्रशासन तंत्र भी उसी के साथ खड़ा नजर आता है जिसके साथ बल और सत्ता हो. ऐसे में लोकतंत्र, संविधान, कानून का राज, न्याय जैसी कोई चीज नजर नहीं आती. दादरी जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए जरूरी है देश व समाज में कानून व्यवस्था का राज कायम हो और वह राजनीति पर हावी हो, न कि राजनीति प्रशासन तंत्र पर. यह कहा जा सकता है कि राजनीति या सत्ता के दुरुपयोग के चलते प्रशासन तंत्र अपने आपको असहाय पाता है और कानून का राज स्थापित करने में वह सक्षम नहीं है लेकिन यह तर्क सही नहीं है. कई उदाहरण हैं जहां प्रशासकों ने सत्ता या राजनीति को कानून से खिलवाड़ करने की इजाजत नहीं दी और दादरी जैसी घटनाओं से बचा जा सका.
राजनीति की बुराइयों को ढाल बनाकर प्रशासन तंत्र अपनी निष्क्रियता या अकर्मण्यता का औचित्य साबित नहीं कर सकता. इसी तरह प्रशासन पर निष्क्रियता का आरोप लगाकर राजनेता अपनी ओछी राजनीति को आगे बढ़ाने का लाइसेंस नहीं पा सकते. दोनों एक-दूसरे के पूरक भी नहीं हैं लेकिन न्यायपूर्ण व्यवस्था को कायम करने की दिशा में एक-दूसरे के विलोम हो सकते हैं. विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका का संवैधानिक प्रावधान ऐसी ही अराजकता के बदले न्याय की व्यवस्था कायम करने के लिए है. हाशिये पर पड़े लोगों को लाठी से हांकने की मानसिकता ही आगे चलकर दादरी जैसी घटनाओं को जन्म देती है और वह स्थिति तब और दुखद हो जाती है जब तंत्र द्वारा लगातार किए जा रहे अन्याय के चलते आम लोगों में प्रतिरोध की सोच और क्षमता ही खत्म होती जाती है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)
खतरनाक दौर से गुजर रहा भारतीय लोकतंत्र
भारत आजादी के बाद के सबसे खतरनाक दौर से गुजर रहा है. या सबसे कड़े इम्तेहान से. यह कोई नाटकीय वक्तव्य नहीं है. भारत की जो कल्पना आजादी के आंदोलन के दौरान गांधी के नेतृत्व में प्रस्तावित की गई थी और जिसे भारतीय संविधान ने मूर्त करने का प्रयास किया, वह पिछले एक साल में क्षत-विक्षत कर दी गई है. यह बात अब उन लोगों की समझ में भी आने लगी है जिन्होंने भारतीय जनता पार्टी को भारत का शासन चलाने के लिए सबसे उपयुक्त पाया था और जो हाल-फिलहाल तक उसकी और उसके प्रमुख की वकालत किए जा रहे थे. अब समझ में आने लगा है कि भारत का शासन उनके हाथ में चला गया है जो पिछले सात दशकों से भारत की इस धारणा के खिलाफ जनता को तैयार कर रहे थे. फिर भी आश्चर्य की बात है कि नयनतारा सहगल को छोड़कर कोई खुलकर कहने की जरूरत महसूस नहीं करता कि भारत का शासन अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पास है. या इतना ही कि वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी के पास है. और यह तब भी नहीं कहा जा रहा है जब पूरा देश देख चुका है कि पूरी सरकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दफ्तर में हाजिर हुई, उसे अपना रिपोर्ट कार्ड दिया और उससे निर्देश लिए. इसके बाद भी धर्मनिरपेक्ष और उदार तवलीन सिंह, सुरजीत भल्ला या मेघनाद देसाई लगातार प्रधानमंत्री को सलाह दिए जा रहे हैं कि वे अपनी छवि बचा लें, जो कुछ भी हो रहा है, उससे खुद को अलग करके. या तो वे राजनीतिक मूढ़ हैं या खुद को धोखा दे रहे हैं.
आजादी के बाद हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या थी? अंग्रेजों के जाने के बाद अंग्रेज शासित भूभाग से इस्लाम के नाम पर एक राष्ट्र बनने के बावजूद हिंदुओं को इस बात के लिए सहमत करना कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र आधुनिक समय में समाज के संगठन का सबसे सभ्य और मानवीय तरीका है! और अल्पसंख्यक मुसलमानों को भरोसा दिलाना कि उनके साथ धोखा नहीं होगा, वे बहुसंख्यक हिंदुओं के साथ बराबरी और इज्जत के साथ रह सकेंगे. यह बीसवीं सदी के एक बड़े खून-खराबे के बीच मुमकिन हुआ. याद रखें, हिंदुओं को कोई इस्लामी राष्ट्र की सेना नहीं मार रही थी और न मुसलमानों को हिंदू राष्ट्र की सेना मार रही थी, साधारण हिंदू और मुस्लिम जनता ने ही एक-दूसरे का कत्ल किया था.
गुस्से, नफरत और बदले की इस आग के बीच धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में भारत के प्रस्ताव को व्यापक जन सहमति दिलाना आसान न था. न सिर्फ गांधी, नेहरू, आजाद जैसे नेता इसे लेकर ईमानदारी से प्रतिबद्ध थे बल्कि वे इसके लिए सामान्य जन से कड़ी बहस करने को और किसी भी हद तक जाने को तैयार थे. पटेल और राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं ने अपनी हिचक पर काबू पा लिया था और बुनियादी मानवीयता में उनकी आस्था पर संदेह नहीं किया जा सकता था.
गांधी ने अपना जनतांत्रिक प्रशिक्षण किया था, इसलिए कट्टर शाकाहारी होते हुए भी उन्हें न सिर्फ मांसाहारियों, बल्कि गोमांसाहारियों से भी कभी नफरत नहीं हुई
धर्मनिरपेक्षता को सहकारी जीवन का सर्वोच्च सिद्धांत जीवन मूल्य मानने के लिए ये नेता कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थे. ध्यान रहे, इनमें से अगर कोई भी खुद को हिंदू नेता के रूप में पेश करता तो भारत के सभी हिंदू उसे हाथो-हाथ लेने को तैयार थे. इस प्रलोभन को उन्होंने ठुकराया. इसमें सब शामिल थे, बावजूद पटेल और राजेंद्र प्रसाद के सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में प्रमुख भूमिका निभाने के, उनके बारे में भी यह कहा जा सकता है. गांधी से सावरकर या हेडगेवार प्रतियोगिता नहीं कर सकते थे और न नेहरू से. पटेल, राजेंद्र प्रसाद या अन्य नेताओं की बात ही जाने दें.
आखिर मुस्लिम लीग यही तो कह रही थी कि कांग्रेस हिंदुओं की जमात है. पाकिस्तान के निर्माण के बाद इसे आरोप की जगह नियति के रूप में स्वीकार करना कांग्रेस के लिए सबसे सुविधाजनक होता. शायद तत्कालीन अंतर्राष्ट्रीय जनमत भी इसे ही अवश्यसंभावी मान लेता. आखिर एक पिछड़े समाज से और क्या उम्मीद की जा सकती थी? गांधी के नेतृत्व में अगर कांग्रेस ने यह आसान रास्ता नहीं चुना तो इसका अर्थ क्या था और है? इस पर हमने कायदे से विचार क्यों नहीं किया है?
धार्मिक राष्ट्र एक आसान और समझ में आने वाली कल्पना थी. आधुनिक जनतंत्रों ने भी खुद को धर्मनिरपेक्ष घोषित नहीं किया था. भारत के नेता बहुत मुश्किल घड़ी में यह प्रस्ताव भारत की जनता के सामने रख रहे थे.
स्वाभाविक यह था कि मुसलमानों को पाकिस्तान जाने दिया जाता. गांधी और नेहरू को यह कबूल न था. गांधी ने तो तैयारी कर रखी थी कि वे नई खींची सीमा के इस ओर भगाए गए हिंदुओं और सिखों को वापस उस तरफ ले जाने और इस तरफ से खदेड़े या भागे मुसलामानों को इधर वापस लाने का अभियान चलाएंगे. आबादियों को उनके अपने परिवेश से जबरन उखाड़ दिए जाने का विचार उनके लिए असभ्यता था.
इस प्रतिबद्धता के लिए गांधी को सजा दी गई. लेकिन उनकी हत्या ने भारत की जनता को झटका दिया. यह कहा जा सकता है कि गांधी के खून ने भारत को जोड़ने का काम किया. राष्ट्रपिता की हत्या के अपराधबोध के कारण भारत में एक आत्म-चिंतन और मंथन शुरू हुआ.
भारत के इस विचार में दूसरी कई अपूर्णताएं थीं. मसलन, जैसा शिव विश्वनाथन ने अपने दिलचस्प काल्पनिक संवाद में दिखाया है यह आदिवासियों के नजरिये को समझ नहीं पाया था. लेकिन इस तरह की कमियों के बावजूद एक बड़ा हासिल इसका यह था कि इसने दो बड़ी आबादियों, यानी हिंदू और मुसलमानों को एक-दूसरे के पड़ोस में रहने को तैयार कर लिया था.
धर्मनिरपेक्षता एक अत्यंत परिष्कृत विचार था. क्या मुख्यतया निरक्षर जनता इसका अभ्यास कर पाएगी? क्या वह एक झटके में मिले सार्वजनिक वयस्क मताधिकार का भी विचारपूर्वक प्रयोग कर पाएगी? इसे लेकर पश्चिम में गहरा शक था और आशंका जताई जा रही थी कि शुरुआती उत्साह के ठंडा पड़ते ही भारत बिखर जाएगा, लेकिन भारत जम गया, सार्वजनीन वयस्क मताधिकार का प्रयोग भी शिक्षा, संपन्नता, जाति-धर्म, लिंग से निरपेक्ष भारत की जनता ने प्रायः सफलतापूर्वक किया. उसका दायरा बढ़ता ही गया और उसमें नई जनता शामिल होकर उसपर अपना दावा पेश करती रही. इस अधिकार के अपहरण का इतिहास है लेकिन धीरे-धीरे दलित, आदिवासी, औरतों, सबने इसका अपने फैसले के मुताबिक इस्तेमाल करने की हिम्मत दिखाई. वर्चस्वशाली वर्गों से उन्हें टकराना पड़ा लेकिन उनके साथ संविधान खड़ा था. यह कितना क्रांतिकारी विचार था और कितना साहसी, यह सिर्फ दुनिया के सभी जनतंत्रों के इतिहास पर नजर डालकर समझा जा सकता है, जहां सभी तरह की आबादियों को बिना भेदभाव के एक साथ मताधिकार नहीं मिला और इसके लिए क्रमवार संघर्ष करना पड़ा.
भारतीय धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के मूल में ठीक यही बात थी. जैसा जवाहरलाल नेहरू ने उसे परिभाषित किया, धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा में सामाजिक न्याय आधारभूत था. कहा जा सकता है कि यह धर्मनिरपेक्षता दरअसल राजनीतिक और सामाजिक शक्ति-संतुलन को पूरी तरह समानता के सिद्धांत के सहारे बदल देना चाहती थी.
गांधी और नेहरू को इसमें कोई दुविधा न थी कि धर्मनिरपेक्षता का आशय है बहुसंख्यकवाद का विरोध, उसके दबदबे से इनकार. यह बात गांधी ने 1947 के हिंसा भरे दौर में भी बेझिझक कही थी कि भारत में मुसलमान हिंदुओं के अनुचर होकर नहीं रहेंगे. यही बात बाद में नेहरू ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को एक पत्र में स्पष्ट की. दोनों के सामने यह भी साफ था कि मुसलमानों का चतुराई से हिंदूकरण करने के किसी भी तिकड़म को कबूल नहीं किया जा सकता. यानी भारत को प्रतीकात्मक तरीके से भी हिंदू दिखना नहीं चाहिए.
यह सबकुछ समझना आसान न था, इस पर अमल करने की बात तो और मुश्किल थी. चूंकि भारतीय धर्मनिरपेक्षता आधुनिकीकरण या मानव स्वभाव के जनतंत्रीकरण से अभिन्न थी, इसमें व्यक्तिगत और सामाजिक आत्मसंघर्ष की आवश्यकता थी. गांधी ने अपना जनतांत्रिक प्रशिक्षण किया था, इसलिए कट्टर शाकाहारी होते हुए भी उन्हें न सिर्फ मांसाहारियों, बल्कि गोमांसाहारियों से भी कभी नफरत नहीं हुई. वे खुद शराब नहीं पीते थे लेकिन अपने सहयोगियों को अपनी असाधारण स्थिति का लाभ उठाकर शराब पीने से उन्होंने रोका हो, इसका कोई उदाहरण नहीं है.
आश्चर्य नहीं कि सनातनी, शाकाहारी गांधी के सामने जब राजेंद्र प्रसाद ने हजारों-हजार हिंदुओं के गोहत्या विरोधी अनुरोध का जिक्र किया तो गांधी को वह विचारणीय भी नहीं लगा. उन्होंने पूछा कि क्या हम कबूल करेंगे कि पाकिस्तान हिंदुओं पर शरीयत लागू कर दे.
धर्मनिरपेक्षता के भारतीय रूप की जटिलता को नजरअंदाज करके इसे राजनीति से धर्म के विच्छेद की एक आधुनिकतावादी पाश्चात्य अवधारणा के रूप में समझा और प्रचारित किया गया. गांधी द्वारा धर्म के दिए व्यापक आशय को भी भुला दिया गया जिसकी आत्मा को एक संदेहवादी नेहरू ने कहीं बेहतर समझा था. धर्मनिरपेक्षता सामाजिक जीवन में साथ मिलकर रहने का नया मुहावरा गढ़ने का एक प्रयास था. इसका अभ्यास किया जाना था. सभ्य जीवन भी, जिसमें हम किसी को अपनी शक्ल में ढालने के लोभ से बचते हैं, यह दीर्घ अभ्यास का मामला था.
धर्मनिरपेक्षता में शिक्षित और संपन्न हिंदू को बहुत रुचि नहीं रही. उसने साझा सार्वजनिक स्थानों के लोप पर अफसोस नहीं किया, इसमें सक्रिय भूमिका निभाई. इस पर बहुत बात नहीं की गई है कि आर्थिक और सामाजिक बराबरी के विचार के अवमूल्यन के समानांतर धर्मनिरपेक्षता का पतन भी हुआ. धर्मनिरपेक्षता का विरोध स्वार्थपरता, लालच से उपजी क्रूरता से जुड़ा हुआ है. ताज्जुब नहीं कि गुजरात के हिंदू वहां के मुसलमानों को बात करने लायक विषय भी नहीं मानते.
इसे न भूलें कि इस अभियान के साथ सार्वजनीन मताधिकार को सीमित करने के प्रयोग गुजरात, राजस्थान और हरियाणा के भारतीय जनता पार्टी शासित प्रदेशों में किए जा रहे हैं. यानी धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र की बुनियाद, समानता को खंडित करने का प्रयास. श्रेष्ठतर भारतीय और हीनतर भारतीय की दो श्रेणियों का निर्माण.
धर्मनिरपेक्षता सेकुलरिज्म का सही अनुवाद है या नहीं, इस बहस में न पड़कर यह समझने की आवश्यकता है कि यह भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के बुनियादी सिद्धांत से संगत है, यानी सामाजिक समूहों के बीच श्रेष्ठता और हीनता के रिश्ते के अस्वीकार पर.
गांधी बावजूद औद्योगिक, वैज्ञानिक तरक्की के अंग्रेजों या यूरोपियनों को यह अधिकार देने को तैयार न थे कि वे पिछड़े हुए समाजों को सभ्य बनाएं. फिर यह अधिकार वे हिंदुओं को मुसलमानों के मुकाबले कैसे दे सकते थे? उसी तरह इस्लाम से प्रभावित होने के बावजूद अन्य धार्मिक या विश्वास-प्रणालियों से बेहतर होने के उसके दावे को वे कबूल नहीं कर सकते थे.
दादरी में हुई हत्या के प्रसंग में भारतीय राज्य की प्रतिक्रिया ने लोगों को हिला दिया है. लेकिन अब विकासवादियों को भी समझ में आ रहा है कि विकास की स्वार्थी जल्दबाजी में उन्होंने देश और खुद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हवाले कर दिया है. यह समझौता उन्हें आखिरकार महंगा पड़ेगा और किस कदर, इसका पूरा अंदाजा होने में उन्हें वक्त लगे शायद. लेकिन क्या तब तक बहुत देर नहीं हो चुकी होगी?
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं)
संस्थाओं को नष्ट कर रही मोदी सरकार
मुझे लगता है कि देश में अभी जो निजाम है वो संस्थाओं को पोषित या प्रोत्साहित करने की बजाय नष्ट करने में लगा है. जिस दल की अभी सरकार है आप उसका इतिहास देखिए तो उसने एक भी संस्थान नहीं बनाया. जो संस्थाएं पहले से थीं, उनको मिटाने पर लगे हैं. इस तरह की राजनीति और इस विचारधारा में ही इतना बांझपन है कि अब यही होना है. इनके पास अपने बुद्धिजीवी नहीं हैं. ऐसे ऐसे लोगों की नियुक्तियां कर रहे हैं जो योग्य नहीं हैं. इससे संस्थाओं का कद अपने आप ही कम हो जाता है.
अब लोग कहते हैं कि पहले भी ऐसी घटनाएं होती रहीं हैं. यह सही है, लेकिन तब भी हम लोग उसकी निंदा करते थे. आज हालात अलग हैं. ऐसा प्रधानमंत्री जो हर बात पर बयान देता है वह इन घटनाओं पर चुप है. देश में क्या हो रहा है, क्या उन्हें मालूम नहीं है? अगर इतने बेखबर हैं, तो उनका भगवान ही मालिक है. एक संस्कृति मंत्री जो कु-संस्कृति मंत्री हैं, उनका बयान है कि कलाम के नाम पर सड़क का नाम इसलिए रखना चाहिए क्योंकि वे राष्ट्रवादी मुसलमान थे.
इस तरह के बेहूदा बयान और भड़काऊ बातें लगातार हो रही हैं. अब देश को आगे ले जाने वाले मसलों को छोड़कर इस बात पर बहस हो रही है कि क्या खाएं, क्या न खाएं, क्या पहनें, क्या न पहनें, क्या पढ़ें, क्या न पढ़ें. यह खतरनाक स्थिति है.
इन मसलों पर हम और कुछ नहीं कर सकते थे तो अपने पुरस्कार वापस करके अपना विरोध जताया. साहित्य अकादमी ऐसी संस्था बन गई जो अपने लेखकों पर अत्याचार पर चुप है. उसने इस बारे में कोई निर्णय नहीं किया, वह सरकार को पत्र लिखकर अपना विरोध जता सकती थी. उनसे कोई विरोध प्रदर्शन करने की उम्मीद नहीं करता, लेकिन बोलना तो चाहिए था. अकादमी का अध्यक्ष सामान्य परिषद द्वारा चुना जाता है न कि सरकार नियुक्त करती है. उन पर कोई दबाव भी नहीं होता. मैं जब अकादमी का अध्यक्ष था तो मकबूल फिदा हुसैन के मामले में सरकार को पत्र लिखा था और अपना विरोध दर्ज कराया था.
यह विरोध जारी रहेगा. अभी और लेखक सामने आएंगे. हम एक नवंबर को लेखकीय स्वतंत्रता पर हो रहे प्रहार को लेकर कॉन्स्टीट्यूशनल क्लब में लेखकों, संस्कृतिकर्मियों का एक अधिवेशन बुला रहे हैं. हम अपना विरोध जारी रखेंगे.
(लेखक साहित्यकार हैं)
हिंदू तालिबान बनाने की तैयारी
हाल के दिनों में जिस तरह की घटनाएं लगातार देखने में आ रही हैं, उससे जाहिर है कि मुसलमानों को लोकतंत्र से बाहर किया जा रहा है. उनको यह बताया जा रहा है कि उन्हें सबके बराबर अधिकार नहीं है. उनके मन में भय पैदा किया जा रहा है कि अगर हमारी शर्त पर रहने को तैयार हो तो रहो, अन्यथा इस तरह की परेशानियां उठानी होंगी. हमारी शर्त पर नहीं रहना है तो आपकी जान खतरे में है. यह दरअसल, लोकतंत्र पर हमला है. यहां सिर्फ मुसलमानों की बात नहीं है, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि सभी अल्पसंख्यकों पर खतरा है और बढ़ता जा रहा है. आज नहीं तो कल सबकी बारी आएगी.
सांप्रदायिक आधार पर इस देश को बांटने जैसी हरकतें करने वाले लोग इस देश के इतिहास और इसके समाजशास्त्र के बारे में अनभिज्ञ हैं. हिंदुस्तान एक महादेश है और वे इस महादेश के बारे में नहीं जानते. वे इसे अपने हिसाब से बनाना और चलाना चाहते हैं, जैसा कि पाकिस्तान में है. दूसरे शब्दों में कहें तो यह हिंदू तालिबान बनाने की तैयारी है. हिंदू तालिबान की क्या संरचना होगी, वे उसी दिशा में काम कर रहे हैं और इसमें वे सफल हुए हैं. क्योंकि उनके पास सत्ता है, साधन है, लोग हैं और पैसा है. उन्हें राजसत्ता का सहयोग, साधन और धन सबकुछ मुहैया है. इन सबके साथ मिलकर वे मुसलमानों को अलग-थलग कर रहे हैं. उनको ये नहीं मालूम है कि मुसलमानों को अलग-थलग करके आप उन्हें गैर-संवैधानिक गतिविधियों के लिए उकसा रहे हैं. ऐसा करना देश और समाज दोनों के लिए खतरनाक है. देश के अंदर असहिष्णुता बढ़ती है तो वह भयानक रूप ले लेती है. उससे लाभ उठाने वाले भी बहुत हैं. पूरे विश्व में ऐसी शक्तियां हैं जो देशों को कमजोर करके उसका लाभ उठाना चाहती हैं. यह सांप्रदायिक उन्माद देश को कमजोर करके उन शक्तियों के आगे डाल देगा जो इस पर अपना अधिकार जमाना चाहती हैं.
इस वक्त हालत यह है कि मुसलमानों की समझ में नहीं आ रहा है कि वे क्या करें. मुसलमान कम पढ़े-लिखे हैं, उनके पास आर्थिक शक्ति नहीं है, सत्ता में हिस्सेदारी अथवा प्रतिनिधित्व नहीं है, शिक्षा-जागरूकता नहीं है, उनकी समझ में नहीं आता कि वे विरोध कैसे करें? उनके पास दो रास्ते हैं कि या तो वे चुपचाप हाशिये पर रहते रहें या फिर वे गैर-संवैधानिक रास्ते अख्तियार करें. यह दोनों बातें देशहित में नहीं है.
बात सिर्फ मुसलमानों के हित की नहीं, इस देश के लोकतांत्रिक ढांचे को बचाने की भी है. आप 15-18 करोड़ आबादी को अलग-थलग रहने को विवश कर दें या फिर वह निराश होकर गैर-संवैधानिक रास्ता अपना ले, लोकतंत्र से उसका विश्वास खत्म हो जाए, तो क्या स्थिति होगी? ज्यादातर मुसलमानों का विश्वास लोकतंत्र से उठ रहा है. इससे वे लाभ उठा रहे हैं, जिनके लिए वे वोट करते हैं. मुसलमानों की कोई सुनने वाला नहीं है. इससे देश में भयानक स्थिति उत्पन्न हो रही है.
अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे तब आेडिशा में पादरी ग्राहम स्टेन्स को दो और लोगों के साथ जला दिया गया था. जो आरोपी था, उसे फांसी हुई. बाद में कोर्ट ने उसे उम्रकैद में बदल दिया. इस तरह तीन लोगों का हत्यारा बच गया, जबकि सीबीआई ने उसके लिए मौत की सजा की अपील की थी. ऐसे तमाम मसले सामने आते रहे हैं. ये सब चीजें अल्पसंख्यकों के लिए क्या संकेत करती हैं?
भारतीय लोकतंत्र में सबको बराबरी का स्तर प्राप्त नहीं है. अगर बराबरी नहीं है तो मुसलमानों-ईसाईयों से आप क्या आशा करते हैं? क्या वे अपने दोयम दर्जे को स्वीकारते हुए देश के प्रति समर्पित रहेंगे? क्या वे संविधान में यकीन करेंगे? वे अविश्वास की स्थिति में हैं. जो लोग इन चीजों को और बढ़ावा दे रहे हैं उनको खुद नहीं मालूम है कि इसके क्या नतीजे हो सकते हैं.
मुस्लिम समाज की भी अपनी कमियां हैं. उनमें अज्ञानता है, जहालत है, लीडरशिप नहीं, धर्मांधता है, तमाम बुराइयां हैं, लेकिन लोकतंत्र में कमियों के प्रति सचेत होकर उसकी पहचान कर उसके निदान की जरूरत होती है. कांग्रेस ने सच्चर कमेटी गठित की थी, उसने अपनी रिपोर्ट में कहा कि मुसलमानों की हालत दलित के बराबर है. उसने कुछ सिफारिशें सौंपी थीं, जिन्हें मानने की बजाय उन सिफारिशों को ताक पर रख दिया गया. सांप्रदायिक घटनाओं को रोकने के लिए कड़े कानून नहीं हैं. ये सारी बातें गलत संकेत देती हैं.
ये सारी भयानक स्थितियां अचानक नहीं आ गई हैं. इसमें सिर्फ भाजपा ही नहीं, कांग्रेस का भी पूरा हाथ रहा है. आजादी के बाद कांग्रेस ने छोटे पैमाने पर बार-बार वही किया है जो भाजपा कर रही है
जो लोकतंत्र के रक्षक हैं उनको सोचना चाहिए कि वे इस देश को क्या बना रहे हैं. इसमें अंतत: यह होगा कि वे हिंदू जो कट्टर नहीं हैं, उनके लिए भी संकट खड़ा होगा. ईसाई, मुसलमान, जैन, बौद्ध के अलावा उदार हिंदू भी सांप्रदायिकता का शिकार बनेगा. लोकतंत्र खत्म होगा तो लोकतांत्रिक सोच वाले हर व्यक्ति को मुसीबत होगी. इससे देश बदतर हालत में पहुंचेगा.
मुसलमानों के साथ त्रासदी यह है कि मुस्लिम समाज का सारा मध्यम वर्ग बंटवारे के समय पाकिस्तान गया. जो गरीब थे यानी मजदूर, बुनकर आदि वे यहां रह गए. उनके पास न सामर्थ्य बची न ही लीडरशिप. जो मुसलमानों के नेता बनकर उभरे, उन्होंने मुसलमानों की समस्या सुलझाने के नाम पर उनको भावनात्मक रूप से उकसाया और उनका शोषण किया. जैसे मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में हैं. उन्होंने हमेशा ही मुसलमानों का भावनात्मक शोषण किया. उर्दू, फारसी और मदरसे जैसे बेवजह के मुद्दों में मुसलमानों को फंसाए रखा गया. उन्होंने फारसी विश्वविद्यालय बनवाया तो उसका मुसलमानों के लिए क्या उपयोग है? ऐसी भाषा जिसका कोई भविष्य नहीं है, वह मुसलमानों को क्या देगी? केवल भावनात्मक स्तर पर मुसलमानों को उकसाकर वोट लेने के लिए यह सब किया जाता है. मुसलमानों के इन कथित रहनुमाओं ने मुस्लिम कट्टरपंथ को बढ़ाया और आम मुसलमान की समस्या के प्रति संवेदनहीन रहे. ये जानते हैं कि अनपढ़-जाहिल मुसलमान, नेताओं के कहने में आ जाएंगे. उनको सिर्फ फंसाया जाता रहा है.
मुसलमानों की रहनुमाई के नाम पर एक नए नेता उभरे हैं असदुद्दीन ओवैसी. ओवैसी आधुनिक जिन्ना है क्योंकि वह भी भड़काऊ और भयानक बातें करके मुसलमानों को आकर्षित करता है. उसका भी उद्देश्य सत्ता के साथ सौदेबाजी और जोड़तोड़ ही है. वह मुस्लिम समाज के सुधार की कोई बात नहीं करता. ओवैसी जिस पार्टी का है उसका इतिहास सबको पता है. मुसलमान दिशाहीन स्थिति में हैं और इसे कोई दिशा देने वाला नहीं है. वो जिसे भी अपना लीडर मानते हैं, निराश होते हैं. अब जब लीडरशिप की यह हालत है तो मुस्लिम बुद्धिजीवी क्या कर सकते हैं, वे सिर्फ लिख सकते हैं, बात कर सकते हैं, लेकिन पार्टी या संगठन नहीं बना सकते. दूसरे, मुस्लिम समाज अंदर से बंटा हुआ है. इसलिए वो किसी एक की बात सुनने को तैयार नहीं है.
ये सारी भयानक स्थितियां अचानक नहीं आ गई हैं. इसमें सिर्फ भाजपा ही नहीं, कांग्रेस का भी पूरा हाथ रहा है. आजादी के बाद कांग्रेस ने छोटे पैमाने पर बार-बार वही किया है जो भाजपा कर रही है. मुसलमानों की असुरक्षा को बढ़ाकर वोट लिया गया. पिछले पचास साल में जो हुआ, अब वह अपने चरम पर है. यह बहुत दुखद और चिंताजनक है, क्योंकि इसका असर दीर्घकालिक होगा और यह देश और समाज को भारी पड़ेगा.
(लेखक प्रसिद्ध साहित्यकार हैं )
(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)
गोडसे के वारिस : हिंदुत्व आतंक के रचयिता
भाजपा के गोवा से विधायक विष्णु वाघ की एक मांग पर क्या रुख तय किया जाए, यह फिलवक्त भाजपा के नेतृत्व को समझ में नहीं आ रहा है, जिन्होंने ‘सनातन संस्था’ पर पाबंदी की मांग की है. मालूम हो कि काॅमरेड गोविन्द पानसरे की हत्या में कथित संलिप्तता को लेकर सनातन संस्था इन दिनों नए सिरे से सुर्खियों में है, उसके कई कार्यकर्ता पकड़े गए हैं. इतना ही नहीं नरेंद्र दाभोलकर, पानसरे एवं एमएम कलबुर्गी की हत्या में एक ही सूत्र जुड़े रहने के संकेत भी मिल रहे हैं.
खबरों के मुताबिक पुलिस को उसके अन्य कार्यकर्ताओं रुद्र पाटिल और सारंग अकोलकर की भी तलाश है, जिन्हें अक्टूबर, 2009 के मडगांव बम विस्फोट में फरार घोषित किया गया है. इस संस्था से जुड़े दो आतंकी- मालगोंडा पािटल और योगेश नायक- बम विस्फोट में तब मारे गए थे, जब वे दोनों नरकासुर दहन नाम से समूचे गोवा में लोकप्रिय कार्यक्रम के पास विस्फोटकों से लदे स्कूटर पर जा रहे थे और रास्ते में ही विस्फोट हो जाने से न केवल उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ा बल्कि उनकी समूची साजिश का भी खुलासा हुआ. ये दोनों आतंकी उसी दिन मडगांव से 20 किलोमीटर दूर वास्को बंदरगाह के पास स्थित सान्काओले में एक अन्य बम विस्फोट की कोशिश में भी शामिल थे.
दरअसल जनाब विष्णु वाघ ने अतिवादी संगठनों पर पाबंदी को लेकर अपनी ही सरकार के दोहरे रुख को उजागर किया है. उन्होंने न केवल ‘सनातन संस्था’ की तुलना प्रतिबंधित संगठन ‘सिमी’ अर्थात स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया से की, बल्कि यह भी जोड़ा कि ‘सनातन’ पर अगर बाहर के कई देशों में पाबंदी लग सकती है, तो यहां पर क्यों नहीं?(http://zeenews.india.com/news/india/bjp-mla-compares-sanatan-%E2%80%8Bsanstha-with-simi-seeks-ban-for-spreading-terror_1800711.html)
विष्णु वाघ का प्रश्न है कि प्रमोद मुतालिक की अगुआई वाली श्रीराम सेना जिसने खुद गोवा के अंदर उत्पात नहीं मचाया है, उसकी गतिविधियों पर अगर गोवा में पाबंदी लगाई जा सकती है, तो फिर सनातन संस्था जिसके कार्यकर्ता कई आतंकी घटनाओं में लिप्त पाए गए हैं, उनके प्रति इतना मुलायम रवैया क्यों (http://www.ndtv.com/india-news/ban-sanatan-sanstha-demands-goa-bjp-lawmaker-vishnu-wagh-1220555 )
यह बात नोट करने लायक है कि श्रीराम सेना पर पाबंदी का फैसला उन दिनों का है, जब रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर गोवा के मुख्यमंत्री थे. न केवल श्रीराम सेना गोवा में प्रतिबंधित है बल्कि उसके नेता प्रमोद मुतालिक के प्रवेश पर भी पाबंदी है. गौरतलब है कि पिछले दिनों देश की सुप्रीम कोर्ट ने भी गोवा सरकार के उपरोक्त फैसले पर अपनी मुहर लगाई थी और ‘नैतिक पहरेदारी और उसके नाम पर महिलाओं पर हमले करने’ की निंदा की थी. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के शब्द थे ‘आखिर आप नैतिक पहरेदारी क्यों करते हैं? क्या आप यही करना चाह रहे हैं? आप नैतिकता के नाम पर महिलाओं पर हमले करते हैं.’
यह सोचने का सवाल है कि श्रीराम सेना से नफरत और सनातन पर इस भाजपाई इनायत का राज क्या है, जबकि तथ्य यही बताते हैं कि दोनों संगठनों की गतिविधियों में कोई गुणात्मक अंतर नहीं है. क्या यह सब दिखावटी है और अंदर से सभी एक साथ है?
यह वही श्रीराम सेना है जिसके नेता प्रमोद मुतालिक कभी विश्व हिंदू परिषद एवं बजरंग दल की दक्षिण भारत इकाई के संयोजक थे और उन्हें तब पद से हटा दिया गया था, जब बाबा बुडनगिरी मामले में उन पर भड़काऊ भाषण देने के आरोप लगे थे. इसके बाद उन्होंने अपने स्वतंत्र संगठन का निर्माण किया था. कर्नाटक में जब भाजपा शासन में ईसाईयों पर हमले होने लगे तो उसकी जिम्मेदारी उन्होंने खुद ली थी. इतना ही नहीं, वह इस बात को भी सार्वजनिक तौर पर स्वीकार चुके हैं कि वह लोगों को हथियारों का प्रशिक्षण देते हैं (www.rediff.com,10Nov2008http://www.rediff.com/news/2008/nov/10inter-we-are-training-youth-to-fight-terror.htm)
वैसे ऐसा नहीं कहा जा सकता कि श्रीराम सेना को लेकर गोवा भाजपा का रुख उसके प्रति राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के रुख को प्रतिबिंबित करता है. जिन दिनों कर्नाटक में भाजपा एवं जनता दल सेकुलर की साझा सरकार थी और बाद में जब येदियुरप्पा की अगुआई में अपने बलबूते सरकार बनाने में भाजपा को सफलता मिली तब उन्होंने अन्य हिंदुत्ववादी संगठनों- बजरंग दल आदि के साथ श्रीराम सेना पर लगे मुकदमे भी वापस लिए थे. (देखें, बीजेपी विथडू केसेस अगेन्स्ट मुतालिक, टाइम्स आॅफ इंडिया, 29 जनवरी 2009) वर्ष 2004 से 2006 के दरमियान मुतालिक एवं अन्य 150 कार्यकर्ताओं के खिलाफ दंगा फैलाने, गैरकानूनी ढंग से सभा करने, भड़काऊ भाषण देने, सांप्रदायिक दंगे भड़काने आदि को लेकर कई केस दर्ज हुए थे, जिनमें से अधिकतर में मुतालिक का नाम शामिल था, मगर उन सभी 54 मामलों को सरकार ने बाद में वापस लिया था.
अगर हम बारीकी से देखें तो इन सभी अतिवादी संगठनों की गतिविधियों में आपस में बहुत सामंजस्य दिखाई देता है. इंडियन एक्सप्रेस ने ‘द सेफ्रन फ्रिंज’ नाम से एक स्टोरी (1 फरवरी 2009 को) की थी, जिसमें पहले यह बताया गया था कि श्रीराम सेना ने किस तरह ‘कॉलेज परिसरों में घुसपैठ बना ली है, जहां उसका एजेंडा गोहत्या बंदी, अंतरधार्मिक रिश्तों को रोकना, फैशन शो का विरोध करना है.’ वहीं उसने एक दिलचस्प बात भी कही थी कि एक जैसे दिखने वाले इन अतिवादी समूहों की गतिविधियों में श्रम विभाजन भी दिखता है.
हालांकि श्रीराम सेना बजरंग दल और हिंदू जागरण वेदिके से रिश्ते से इंकार करती है, उसके कार्यकर्ता एक दूसरे के साथ मिलकर काम करते दिखते हैं. और वह एक दूसरे के कार्यक्षेत्र में शायद ही घुसपैठ करते हैं- श्रीराम सेना अगर नैतिक पहरेदार है, बजरंग दल धर्मांतरण को निशाना बनाती है तो वेदिके अन्य मसलों से निपटती है.
चाहे श्रीराम सेना हो, सनातन संस्था, अभिनव भारत हो या अक्सर विवादों में रहने वाली भाजपा सांसद आदित्यनाथ की प्रेरणा से सक्रिय पूर्वी उत्तर प्रदेश की हिंदू युवा वाहिनी- जिसके कार्यकर्ताओं ने पिछले दिनों बिसाहड़ा, दादरी जाकर गांव के सभी हिंदुओं को हथियार बांटने की बात कही थी- या अगस्त 2008 में कानपुर के प्राइवेट हॉस्टल में बम इकट्ठा करते मारे गए हिंदूवादी संगठनों के दो कार्यकर्ता और उनके पीछे फैला व्यापक नेटवर्क हो, हम आसानी से देख सकते हैं कि पूरे देश में आतंकी घटनाओं के जरिए एक ऐसा वातावरण पैदा किया जा रहा है, जो सरगर्मियां किसी भी मायने में इस्लामिस्ट आतंकियों या जियनवादी आतंकियों या फिर खालिस्तानी आतंकियों से कमतर नहीं दिखती हैं.
सनातन संस्था
हिप्नोथेरेपिस्ट जयंत बालाजी अठावले द्वारा 1999 में बनाई गई सनातन संस्था पर तब देश की निगाह गई जब अप्रैल 2008 में इसके कार्यकर्ताओं की ठाणे, पनवेल और वाशी जैसे स्थानों पर बम विस्फोट कराने की योजना का खुलासा हुआ. इत्तेफाक से इन बम विस्फोटों में किसी की मौत नहीं हुई थी. एंटी टेरेरिस्ट स्क्वाड के चर्चित पुलिस अधिकारी हेमंत करकरे ने आध्यात्मिकता के आवरण में हिंसक गतिविधियों में लिप्त उपरोक्त संस्था को लेकर दायर अपनी प्रथम सूचना रिपोर्ट में संस्था पर ही कार्रवाई करने की बात कही थी.
जांच में पुलिस के सामने यह तथ्य भी आया था कि उपरोक्त संस्था एक तरफ ‘आध्यात्मिक मुक्ति’, ‘सदाचार/धार्मिकता की जागृति’ की बात करती है, एक ऐसी दुनिया जो ‘साधकों और जिज्ञासा रखने वालों के सामने धार्मिक रहस्यों को वैज्ञानिक भाषा में पेश करने का मकसद रखती है’ और ‘जो साप्ताहिक आध्यात्मिक बैठकों, प्रवचनों, बाल दिशानिर्देशन वर्गों, आध्यात्मिकता पर कार्यशालाओं’ आदि का संचालन करती है, मगर दूसरी तरफ वहां ‘शैतानी कृत्यों में लगे लोगों के विनाश’ को ‘आध्यात्मिक व्यवहार’ का अविभाज्य हिस्सा समझा जाता है. (देखें, ‘साइंस ऑफ स्प्रिचुअलिटी’ जयंत आठवले, वाॅल्यूम 3, एच – सेल्फ डिफेंस ट्रेनिंग, चैप्टर 6, पेज 108-109) और यह विनाश ‘शारीरिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर’ करना है. गौरतलब है कि इस ‘धर्मक्रान्ति’ को सुगम बनाने के लिए साधकों को हथियारों-राइफल, त्रिशूल, लाठी और अन्य हथियारों का प्रशिक्षण भी दिया जाता है.
अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब महाराष्ट्र के अग्रणी दैनिक लोकसत्ता में लिखे लेख में (28 सितंबर 2015) उपरोक्त संस्था द्वारा मराठी में प्रकाशित पुस्तिका ‘क्षात्राधर्म’ के अंश दिए गए हैं, जो इस संस्था के चिंतन और कार्यप्रणाली पर और रोशनी डालते हैं. (http://epaper.loksatta.com/598945/loksatta-pune/27-09-2015#page/6/2). पिछले दिनों ‘मुंबई मिरर’ नामक अखबार को दिए साक्षात्कार में संस्था के मैनेजिंग ट्रस्टी वीरेंद्र मराठे ने खुल्लमखुल्ला कहा कि हम ‘हथियारों का प्रशिक्षण देते हैं’. उपरोक्त संस्था द्वारा मराठी, अंग्रेजी आदि भाषाओं में प्रकाशित अखबार ‘सनातन प्रभात’ भी अक्सर सुर्खियों में रहता आया है क्योंकि उसमें अन्य समुदायों के खिलाफ बहुत अपमानजनक बातें लिखी गई होती हैं. एक बार ऐसे ही लेख के प्रकाशन के बाद मिरज शहर (महाराष्ट्र) में दंगे की नौबत तक आ गई थी.
किन्हीं प्रार्थनास्थलों पर बम रखने वाले, अजमेर दरगाह बम धमाका (2007), मक्का मस्जिद बम धमाका (2007), मुसाफिरों से भरी रेलगाड़ी में बम रखने वाले/समझौता एक्सप्रेस बम धमाका (2007), मुस्लिम बहुल इलाकों में दुपहिया वाहन में विस्फोटक रख कर निरपराधों को मारने की साजिश रचने वाले/मालेगांव बम धमाका (सितंबर 2008), मोडासा बम धमाका (सितंबर 2008), नरकासुर महोत्सव में एकत्रित हजारों लोगों के बीच विस्फोटक रखने के लिए तैयार/मडगांव बम धमाका (अक्टूबर 2009), सनकोले बम धमाका (अक्टूबर 2009), करने वाले आखिर किस मिट्टी के बने इंसान हैं और इन्हें तथा बसों से खींच कर निरपराधों को मारने वाले तालिबानियों या खालिस्तानियों से किस बात में अलग कहे जा सकते हैं?
निश्चित ही यह ऐसे प्रयास हैं जिन्हें किसी केंद्रीय संगठन से प्रेरणा भी मिलती दिखती है तो कुछ स्थानीय स्तर की पहलकदमी करने वाले भी दिखते हैं, जो कुछ समय तक सक्रिय रहने के बाद टूट-बिखर जाते हैं. उदाहरण के तौर पर 2002 में सहारनपुर इलाके में सक्रिय ‘आर्य सेना’ नामक हिंदू आतंकी समूह को ही देखें (एनडीटीवी, 7 जून 2002, ndtv.com/morenews/showmorestory.asp?slug=Hindu+militant+outfit+ discovered+in+UP/) जिसने मस्जिदों एवं मदरसों पर हमले किए थे जिसके दो सदस्य पकड़े गए थे मगर इस समूह का मास्टरमाइंड अभी भी फरार था. पुलिस की सेवा में पहले रहे किसी सत्येंद्र मलिक ने सेना के लिए पैसे एवं प्रेरणा दी थी और अल्पसंख्यक निशानों पर हमले की योजना बना थी. सहारनपुर की 40 फीसदी मुस्लिम आबादी आर्य सेना की हिंसा का निशाना थी.
या आप मेवात के गुरुकुल में हुए यह बम विस्फोट की खबर देखें (फॉरेंसिक रिपोर्ट ने उड़ाए जांच एजेंसियों के होश, जागरण, राष्ट्रीय संस्करण, 16 नवंबर 2010) जिसमें पाया गया था कि यहां ग्राम भडास में महर्षि दयानंद आश्रम द्वारा संचालित गुरुकुल में हुए बम विस्फोट में पीईटीएन नामक विस्फोटक- जो आरडीएक्स एवं टीएनटी से अधिक विनाशकारी होता है- पाया गया था और वहां कार्यरत स्वामी आनंद मित्रानंद को पुलिस ने पकड़ा था, जिसने पुलिस को बताया था कि वहां पहले से कार्यरत स्वामी अमरानंद ने उसे वह बम दिए थे.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बनाम जमात-ए-इस्लामी
दक्षिण एशिया में धर्म विशेष की राजनीति करने वाले दो संगठनों- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो हिंदू राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है और जमात-ए-इस्लामी, जो इस्लामिक राज्य बनाने की बात करता है- में गजब की समानता दिखती है. दरअसल दोनों ने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अनुषांगिक संगठनों, संस्थाओं एवं समविचारी समूहों का विशाल नेटवर्क तैयार किया है. ऐसे अनुषांगिक संगठनों में समाज के अलग-अलग तबकों के अलावा, अलग-अलग मुद्दों पर सक्रिय संगठन शामिल हैं.
सुरुचि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किताब ‘परम वैभव के पथ पर (लेखक सदानंद दामोदर सप्रे) आरएसएस की ऐसी कार्यप्रणाली पर रोशनी डालती है. संघ से संबद्ध डॉ. सप्रे 31 छोटे-छोटे अध्यायों में संघ से संबद्ध विद्यार्थी परिषद से लेकर पूर्व सैनिक परिषदों जैसे संगठनों पर तथा प्रचार माध्यम एवं सामयिक महत्व के कार्य के अंतर्गत गोरक्षा आदि मामलों में संघ तथा उससे संबंधित संगठनों की सक्रियता को रेखांकित करती है, इनमें हिंदू जागरण मंच का भी जिक्र है. गौरतलब है कि जब हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ता कई सूबों में ईसाईविरोधी हिंसा फैलाने में लिप्त पाए गए थे, तब उससे किनारा करने में भी संघ ने वक्त नहीं गंवाया था. (देखें, पेज 15, गोडसेज चिल्ड्रेन, हिंदुत्व टेरर इन इंडिया)
बांग्लादेश के अनुभवों को लेकर प्रोफेसर अब्दुल बरकत का अध्ययन, बांग्लादेश में मूलवाद के राजनीतिक अर्थशास्त्र की चर्चा के बहाने वहां जड़ जमा चुकी जमात-ए-इस्लामी पर निगाह डालता है. (अंग्रेजी पत्रिका, मेनस्ट्रीम, मार्च 22-28, 2013) ढाका विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बरकत बताते हैं कि अपनी मूलवाद की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए अपने काडर आधारित नेटवर्क के माध्यम से जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश ने ‘वित्तीय संस्थानों, शैक्षिक संस्थानों, फार्मास्युटिकल एवं स्वास्थ्य संबंधी संस्थानों, धार्मिक संगठनों, यातायात से जुड़े संगठनों, रियल इस्टेट, न्यूज मीडिया और आईटी, स्थानीय प्रशासन, एनजीओ, हरकत-उल-जिहाल-अल-इस्लामी से लेकर जमाइतुल मुजाहिदीन बांग्लादेश’ जैसे संगठनों/समूहों का निर्माण किया है. ध्यान रहे कि यह वही जमाइतुल मुजाहिदीन बांग्लादेश है, जिसने अपनी आतंकी गतिविधियों के जरिए बांग्लादेश में कहर बरपा किया था, जिसकी ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने एक साथ बांग्लादेश के तमाम जिलों में बम विस्फोट करके आतंक मचाने की कोशिश की थी.
निश्चित ही संघ द्वारा अपने अनुषांगिक संगठन के तौर पर किसी आतंकी संगठन का निर्माण किया गया हो, इसकी आधिकारिक जानकारी किसी के पास नहीं है, मगर इस बात को मद्देनजर रखते हुए कि 21वीं सदी की पहली दहाई में भारत के विभिन्न स्थानों पर हुए आतंकी हमलों में हिंदुत्ववादी विचारों से प्रेरित कार्यकर्ताओं की संलिप्तता देखी गई थी, जिनमें से कइयों के संघ से संबंधों का खुलासा हुआ है. कइयों के बारे में संघ ने इस बात की भी पुष्टि की है कि वह संघ के पूर्व कार्यकर्ता थे, तो यह उसके लिए आत्मपरीक्षण का भी वक्त है कि आखिर उसके जैसे अनुशासित कहे जाने वाले संगठन के कार्यकर्ता- जो अपने आप को ‘चरित्र निर्माण’ के लिए प्रतिबद्ध कहता हो- वह आखिर बम-गोलियों के सहारे मासूमों की हत्या क्यों कर रहे हैं?
विडंबना यही है कि संविधान को ताक पर रख कर काम करने वाले इन संगठनों पर अंकुश कायम करने की बजाय ऐसे हालात पैदा किए जा रहे हैं कि उन्हें आसानी से फलने-फूलने का रास्ता मिले. और यह प्रतीत हो रहा है कि भाजपा के केंद्र में सत्तारोहण के बाद हिंदुत्व आतंक की परिघटना एवं उससे जुड़े मामलों में शामिल लोगों को क्लीनचिट देने की तैयारी चल रही है. इस बदली हुई परिस्थिति को लेकर संकेत एक केंद्रीय काबिना मंत्री के बयान से भी मिलता है जिसमें उन्होंने हिंदू आतंक की किसी संभावना को सिरे से खारिज किया था और यह इस हकीकत के बावजूद कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी कम से कम 16 ऐसे उच्च-स्तरीय मामलों की जांच में मुब्तिला रही है, जिसमें हिंदुत्व आतंकवादियों की स्पष्ट संलिप्तता दिखती है और हिंदुत्व संगठनों के आकाओं पर से संदेह की सुई अभी भी हटी नहीं है.
ताजा समाचार यह है कि मालेगांव बम धमाके के असली कर्णधारों में शुमार किए जाने वाले कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा को राष्ट्रीय जांच एजेंसी ‘बेदाग बरी’ कर देगी. (http://economictimes.indiatimes.com/ news/politics-and-nation/ malegaon-blasts-nia-may-let-off-sadhvi-pragya-lt-colpurohit/ articleshow/ 49264576.cms)
और यह खबर पढ़ते ही देश के अंदर कुछ समय पहले सुर्खियां बनीं मुंबई की मशहूर वकील रोहिणी सालियान- जो मालेगांव बम धमाके में सरकारी वकील हैं- के उन साक्षात्कारों को याद किया जा सकता है, जिसमें उन्होंने बताया था कि किस तरह राष्ट्रीय जांच एजेंसी की तरफ से उन पर दबाव पड़ रहा है कि वह मालेगांव बम धमाके में चुस्ती न बरतें. और हम इस बात को भी याद कर सकते हैं कि जिन दिनों इस मसले पर चर्चा चल ही रही थी कि समाचार मिला कि अजमेर बम धमाके (2007) में कई गवाह अपने बयान से मुकर चुके हैं और एनआईए द्वारा मध्य प्रदेश के संघ के प्रचारक सुनील जोशी की हत्या के मामले को अचानक फिर मध्य प्रदेश पुलिस को लौटा दिया जा रहा है. समाचार यह भी मिला था कि उसी राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने ‘अधूरे सबूतों’ की बात करते हुए मोदासा बम धमाका मामले में अपनी फाइल बंद करने का निर्णय लिया है.
21वीं सदी की दूसरी दहाई के मध्य में यह सवाल नए सिरे से मौजूं हो उठा है कि नाथूराम गोडसे के असली वारिस कहे जाने वाले यह आतंकी एवं उनके सरगना कभी अपने मानवद्रोही कार्यों की सजा पा सकेंगे?
(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक हैं)
‘पुरस्कार लौटाकर खामोशी तोड़ने की कोशिश’
कुछ लोग पुरस्कार लौटाने में राजनीति देख रहे हैं, लेकिन वैसा बिल्कुल नहीं है. पुरस्कार लौटाना राजनीति करने का मसला नहीं है, बल्कि यह उस खामोशी को तोड़ने का एक प्रयास था जो लगातार लेखकों पर हो रहे हमले के बावजूद पसरी हुई थी. अपने विचार व्यक्त करने के लिए कई लेखकों और बुद्धिजीवियों को प्रताड़ित किया जा रहा है. कुछ की तो हत्या भी कर दी गई. एमएम कलबुर्गी, नरेंद्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे को क्रूरतापूर्वक मार दिया गया. इन हत्याओं और हमलों के बाद भी जो चुप्पी छाई हुई थी, उसने मुझे झिंझोड़ कर रख दिया. इन सब घटनाओं को लेकर साहित्य अकादमी की उदासीनता भी निराश करने वाली रही. मुझे ऐसा लगा कि इन सब खतरों को लेकर एक संदेश देने की जरूरत है. मैंने वही किया जो मुझे करना चाहिए था. मैं सिर्फ साहित्य समाज को ही नहीं, बल्कि अकादमिक संस्थानों को भी एक संदेश देना चाहता था.
मेरे पुरस्कार वापस करने के बाद आपातकाल का मुखर विरोध करने वाली साहसी लेखिका नयनतारा सहगल और वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने भी उन्हीं कारणों से अपने पुरस्कार लौटाए और अब बड़ी संख्या में लेखकों ने अपने पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर दी है और आगे भी करेंगे. जाहिर है कि मेरा फैसला गलत नहीं था. इस समाज में लेखकों को अकेला छोड़ दिया गया है. लेखक ऐसी संस्था का पुरस्कार लेकर करेगा भी क्या जो अपने द्वारा पुरस्कृत लेखक की मौत पर भी चुप रहे?
इस समय देश में 1947 के पहले वाला सांप्रदायिकता का खेल खेला जा रहा है. जाति, समुदाय, धर्म आदि के बीच फूट डाली जा रही है. लोगों को बांटकर वोट बटोरने और सत्ता तक पहुंचने का गंदा खेल देश पर सबसे बड़ा खतरा है. ऐसा नहीं है कि यह सब आज शुरू हुआ है, यह कांग्रेस के समय भी था, लेकिन जिस रूप में आज यह हमारे सामने है, वह बेहद भयावह है. पिछले दो तीन सालों से लेखकों, बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं पर हमले बढ़े हैं और अब तो अति हो गई. अब उनकी हत्याएं हो रही हैं. उन्हें शर्मसार करने या उन पर आरोप लगाने, अफवाह फैलाने जैसी हरकतें हो रही हैं. इन सबका विरोध करना जरूरी है.
जब प्रो. एमएम कलबुर्गी की हत्या हुई, उस समय मैं अपने गांव में था. पांच दिन से बिजली नहीं थी. चार सितंबर को मैं गांव के पास एक ढाबे पर गया, वहां पर अपना मोबाइल चार्ज किया और फेसबुक खोला तो पता चला कि कलबुर्गी की हत्या कर दी गई है. यह घटना बेहद डरावनी और विचलित करने वाली थी. हत्या हुए पांच दिन हो गया था, लेकिन उन्हें पुरस्कृत करने वाली साहित्य अकादमी ने भी तब तक कोई कदम नहीं उठाया था. आप लेखक को सम्मानित तो करते हैं, लेकिन वह निहायत ही अकेलेपन में जीता है. उसकी मौत पर भी उसके साथ कोई नहीं है. उस वक्त के दुख और भय की वजह से मैंने वहीं से यह घोषणा की कि मैं यह पुरस्कार लौटा रहा हूं.
भारत सरकार कहती है कि हम 2017 तक महाशक्ति हो जाएंगे और अर्थव्यवस्था एवं विकास के मामले में चीन को पीछे छोड़ देंगे. लेकिन आप गांवों में जाइए, तो हालात बदतर हैं. बाजारवाद ने गांवों में सिर्फ अपराध और भ्रष्टाचार पहुंचाया है. विकास के दावों की हवा मात्र डेढ़ साल में ही निकल गई. वहां घोर गरीबी और अशिक्षा है. इन सबने लोगों में सिर्फ अति संवेदनशीलता भर दी है. अब अफवाहें फैलाकर उसका फायदा उठाया जा रहा है.
आप देखेंगे कि साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी, एफटीआईआई आदि संस्थाएं आजादी के बाद बनाई गई थीं. लंबे प्रयास के बाद इनमें एक परंपरा कायम हुई. जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री के रूप में ऐसे शख्स थे, जिनके देश में और विदेश में तमाम लेखकों कलाकारों से निजी रिश्ते थे. वे कला और साहित्य के महत्व और सरोकार समझते थे. अब इन संस्थाओं में चुन-चुन कर ऐसे लोगों को बिठाया जा रहा है, जो इसे नष्ट कर दें. शिक्षा, इतिहास, कला, साहित्य के संस्थानों को मिटाने का बाकायदा अभियान चलाया जा रहा है. पिछले सालों में वेंडी डोनिगर समेत कई लेखकों की किताबें प्रतिबंधित करना और लेखकों को प्रताड़ित करना इसी अभियान का हिस्सा था. हालत यह है कि आज यदि कोई लेखक प्रचलित धारणाओं और विचारों के खिलाफ अपने विचार व्यक्त करता है, तो उस पर हमले किए जाएंगे, उसकी किताबें जलाई जाएंगी और उसे देशद्रोही घोषित किया जाएगा. मशहूर लेखक यूआर अनंतमूर्ति ने चुनावों से पहले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को लेकर अपनी नापसंदगी जाहिर कर दी तो उनके खिलाफ पब्लिक ट्रायल किया गया, उन्हें अपमानित किया गया. उनके साथ ऐसा व्यवहार हुआ जैसे वे गंभीर किस्म के अपराधी हैं, उन्हें पाकिस्तान भेज दिए जाने की धमकी दी गई. यह सब बेहद स्तब्ध करने वाला है.
जो चीजें अभी तक इस समाज की अच्छाइयां थी, उनका मजाक बनाया जा रहा है. बौद्धिकता को हाशिये पर किया जा रहा है. धर्मनिरपेक्ष, वामपंथ, समाजवाद, लोकतंत्र आदि शब्द गाली की तरह इस्तेमाल किए जा रहे हैं. यानी नेहरू की विरासत पर व्यवस्थित तरीके से हमले हो रहे हैं. इस देश की लोकतांत्रिक परंपरा पर ऐसे हमले कभी नहीं हुए. राम मनोहर लोहिया नेहरू के आलोचक थे, पर वे इस तरह के हमले के बारे में सोच नहीं सकते थे. अटल बिहारी वाजपेयी ने भी नेहरू को लेकर ऐसे हमले कभी नहीं किए. उनके समय में यह भाषा भी नहीं इस्तेमाल हुई थी जो आजकल विरोधियों या आलोचकों के लिए इस्तेमाल हो रही है.
एक देश के रूप में भारत में ऐसा कभी नहीं था कि लोकतांत्रिक मूल्यों को हतोत्साहित किया जाए. भारत हमेशा से विचारों के लिए एक लोकतांत्रिक स्पेस आजादी कराने वाला देश रहा है. हमने उन लेखकों को भी प्रश्रय दिया जो अपने देशों से बाहर किए गए. तस्लीमा नसरीन और सलमान रुश्दी जैसे लेखकों को यहां जगह दी गई और उनके अभिव्यक्ति के अधिकार और विचारों की रक्षा की गई.
एक समय था जब हमारे लेखकों का सम्मान होता था, उनकी एक गरिमा थी. लेकिन आज अगर आप राजनीतिक, सांस्कृतिक या सामाजिक मसलों पर तार्किक आलोचना करते हैं, तो लोग उसे बर्दाश्त नहीं करते. वे हिंसात्मक होकर आपको प्रताड़ित करते हैं. हर चीज का सांप्रदायिकरण हो रहा है, कला जगत भी इससे अछूता नहीं है. अब हालात पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसे हो चुके हैं. बांग्लादेश में भी कट्टरपंथियों द्वारा लेखकों की हत्या कर दी जाती है.
इस सांस्कृतिक-सामाजिक पतन के लिए मौजूदा सरकार जिम्मेदार है. नेतृत्व की ओर से लोगों को कोई ऐसा संदेश नहीं दिया जा रहा है कि वे सहिष्णु हो सकें. हर घटना पर, हर चीज पर बोलने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हालिया घटनाओं पर मौन हैं, चाहे वह लेखकों की हत्या का मामला हो या फिर दादरी में घटी जघन्य घटना. अपराधियों को सुरक्षा देने वाले देश में लेखकों की हालत यह है कि कोई भी आकर उन्हें मार सकता है. लेखक अकेलेपन में जी रहा है.
रवींद्र नाथ टैगोर ने कहा था, ‘हम मानवता का महासागर हैं.’ हमारे पास एक महान विरासत है. तमाम भाषाएं, संस्कृतियां हैं, लोगों की अपनी आदतें और पसंद-नापसंद है. हम इन सब विभिन्नताओं के बावजूद एक साथ रहते हैं. इस सहिष्णुता के कारण ही हमारे पास महान विरासत है. अब उसी सहिष्णुता पर हमले किए जा रहे हैं. हालांकि, इन सबके बावजूद, मेरा अब तक यह विश्वास है कि भारत की जनता असहिष्णुता बर्दाश्त नहीं करेगी. वह उन प्रवृत्तियों को नकार देगी, जो हमारी परंपरा को चोट पहुंचाती हैं.
(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)
अकादमी पुरस्कार को जो लोग सरकारी मानते हैं, उन्होंने इसे लिया ही क्यों था?
लेखकों के साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने और अकादमी पर चुप रहने का आरोप लगाना गलत है. अकादमी ने जिन लेखकों को पुरस्कृत किया है, वह उनके साथ नहीं है, वह लेखकों पर हो रहे हमलों पर खामोश है, यह एक झूठ है. तरह-तरह की अफवाहें फैलाई जा रही हैं, जबकि हमने एमएम कलबुर्गी की हत्या के बाद बंगलुरु में अकादमी की तरफ से शोकसभा करके इस कृत्य की निंदा की थी. बढ़ती असहिष्णुता और सांप्रदायिकता को लेकर अगर आप सरकार का विरोध कर रहे हैं तो इसके लिए अकादमी का पुरस्कार लौटाने से भ्रम फैल रहा है. ऐसा लग रहा है कि आप साहित्य अकादमी का ही विरोध कर रहे हैं. यह स्पष्ट कर दूं कि अकादमी पुरस्कार देने में सरकार का हस्तक्षेप नहीं होता और जो लोग इसे सरकारी पुरस्कार मानते हैं, तो उन्होंने लिया ही क्यों था?
लेखकों को भी मालूम है कि साहित्य अकादमी पुरस्कार सरकार नहीं देती. यह साहित्य अकादमी देती है. सरकार इस संबंध में कोई निर्देश भी नहीं देती. लेखकों का चुनाव भी लेखक ही करते हैं. सरकार का विरोध करने के दूसरे भी तरीके हैं, लेकिन लेखकों का इस तरह पुरस्कार लौटाना गलत है. सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने भी इस तरह का बयान दिया है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि मैं सरकारी बयान दोहरा रहा हूं. मैं अपना बयान पहले ही दे चुका था. उनका बयान बाद में आया. मैं पहले भी यह बात कह चुका हूं और फिर से कह रहा हूं कि अकादमी का पुरस्कार लौटाना गलत है. मेरा बयान महेश शर्मा का बयान नहीं है. इस तरह के आरोप लगातार लगाए जा रहे हैं कि साहित्य अकादमी लेखकों के साथ नहीं है या उनकी हत्याओं पर मौन है. इसमें कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि मैं अपने लेखकों के साथ हूं. उनकी लेखकीय स्वतंत्रता का समर्थन करता हूं, उनपर हो रहे हमलों की निंदा करता हूं, लेकिन फिर भी कहूंगा कि इन सबके लिए पुरस्कार लौटाने को सही नहीं मानता. रही बात अकादमी की परिषद से इस्तीफा देने वालों की तो यह वे लोग ही जानें कि वे साहित्य अकादमी से क्यों इस्तीफा दे रहे हैं. उन्होंने लंबे समय तक अपनी सेवाएं दी हैं. उनके विरोध के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता. जहां तक सरकार को अकादमी की ओर से कोई संदेश देने का सवाल है तो हम सरकार को कोई संदेश नहीं दे सकते. हम गलत चीजों की निंदा कर सकते हैं, वह मैंने की.
(लेखक साहित्य अकादमी के अध्यक्ष हैं)
(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)





