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‘मैं खुद को किसी खांचे में नहीं बांधना चाहता’

Chaitanya Tamhane12

आपकी फिल्म  ‘कोर्ट’  के दोनों मुख्य किरदारों में एक सफाई कर्मचारी (जमादार) और दूसरा दलित लोक गायक है. क्या आपको उम्मीद थी कि ये दोनों किरदार उच्च मध्य वर्ग खासकर पश्चिमी दर्शकों को समझ में आएगी?

जब मैंने इस फिल्म का कथानक (स्क्रिप्ट) लिखा, तब मेरे सामने भी ये सवाल खड़ा हुआ था कि यह फिल्म किस तरह के दर्शक वर्ग के लिए होगी. मुझे उम्मीद नहीं थी कि फिल्म में दिखाए गए सांस्कृतिक भेद और जातिगत राजनीति जैसे मुद्दे पश्चिमी दर्शकों की समझ में आएंगे. मैं ये भी जानता हूं कि भारत में इस तरह की फिल्म देखने वाले दर्शकों की संख्या बहुत ही कम है. ऐसी फिल्मों का सिनेमाघरों तक पहुंच पाना लगभग नामुमकिन होता है. इसके बावजूद कई सारे सम्मान मिलने, फिल्म के कई देशों के अलावा और तमाम भारतीय सिनेमाघरों में सफल प्रदर्शन के बाद मैं इसे मिली प्रतिक्रिया से विस्मित हूं. कुछ लोगों का कहना है कि फिल्म सबको अपनी तरफ खींचती है. बहरहाल, मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि मैंने जितनी उम्मीद की थी ‘कोर्ट’ उससे कहीं आगे निकल चुकी है. इसके लिए मैं सभी दर्शकों का आभारी हूं.

फिल्म में सरकारी वकील और गुजराती अभिजात्य कार्यकर्ता की पृष्ठभूमि, कोर्ट में उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के उलट हैं. क्या ये एक सोचा-समझा निर्णय था?

मैंने फिल्म के किरदारों को अपने आसपास देखे गए लोगों के आधार पर गढ़ा है, फिर इन किरदारों में कल्पना के रंग भरे हैं. दोनों किरदारों के बीच   आप जिस विषमता की बात कर रही हैं, वह मेरे दिमाग में एकदम से स्पष्ट नहीं थी. दोनों में तमाम समानताओं के साथ कई सारी असमानताएं भी हैं. मैंने दोनों किरदारों को मूलभूत तरीके से विकसित किया, इसलिए दोनों में विचारों के स्तर पर विषमता नजर आई.

ऑस्कर की दौड़ में  ‘कोर्ट’  ने  ‘मसान’ ,  ‘हैदर’ ,  ‘पीके’  और  ‘मैरीकॉम’  जैसी सराहनीय फिल्मों को पीछे छोड़ दिया. क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों को तो थिएटर मिलना ही मुश्किल होता है, ऑस्कर की तो बात ही जाने दें. ऐसे में क्या लगता है किस बात ने कोर्ट के पक्ष में काम किया?

वास्तव में मैं इस बारे में कुछ नहीं सोचना चाहता कि ‘कोर्ट’ ने दूसरी फिल्मों को कैसे पछाड़ा. इस तरह का फैसला जूरी (निर्णायक समिति) के सदस्यों की सोच को दर्शाता है. ऑस्कर के लिए ऐसा चयन विशेष रूप से किया जाता होगा. हां, मगर मैं इस बात को लेकर आश्वस्त हूं कि ऑस्कर के लिए फिल्म का चयन करते वक्त जूरी ने दूसरे पक्षों का भी ख्याल रखा होगा. वास्तव में कौन-सी बात ‘कोर्ट’ के पक्ष में रही, इस बारे में मैं यकीनी तौर पर कुछ नहीं कह सकता. अगर इस बारे में अंदाजा लगाना हो तो मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि फिल्म को मिली अंतर्राष्ट्रीय सराहना चयन के दौरान उसके पक्ष में रही होगी.

‘कोर्ट’  में कविताओं को शामिल किया है, जिन्हें अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम माना जाता है. हालांकि फिल्म के गीत और कविताएं मराठी में हैं, जो अंग्रेजी भाषा के किसी भी दर्शक के दिल को नहीं छू सकते. क्या आपको लगता है कि बहुभाषी फिल्म को इस बात का नुकसान उठाना पड़ता है कि दर्शकों तक वह  असल अभिव्यक्ति नहीं पहुंच पाती, जो फिल्म की मूल भाषा से पहुंचती है?

एक भाषा का मर्म उसके किसी और भाषा में अनुवाद होने के बाद हमेशा खत्म हो जाता है. किसी फिल्म के सबटाइटल लिखते वक्त ये एक बड़ी चुनौती है, जिसका सामना हमें करना पड़ता है. कभी कभी तो ये भाषा बनाम सिनेमा के टकराव जैसी स्थिति हो जाती है. ‘कोर्ट’ के गीत समेत संवादों को सबटाइटल करने का काम पत्रकार और नाटककार रामू रामनाथन ने किया. इस प्रक्रिया में हमारा बहुत समय भी खर्च हुआ. हालांकि आप सही हैं. इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि अनुवाद कितना अच्छा हुआ है. अनुवाद कितना भी अच्छा हो अंतर्राष्ट्रीय भाषा के दर्शकों तक पहुंचने में मूल भाषा की सुंदरता और उसकी संस्कृति हमेशा कहीं खो जाती है.

फिल्म को उसके निर्मम यथार्थवादी चित्रण की वजह से चुना गया. क्या आपको इस बात की चिंता थी कि कहीं इस तरह के चित्रण से दर्शक फिल्म से जुड़ नहीं पाएंगे, वे दर्शक जो अदालत की प्रक्रियाओं को नाटकीय अंदाज में देखने के अभ्यस्त हो चुके हैं?

नहीं, ऐसा नहीं है. मैं इस बात को लेकर ज्यादा सतर्क था. मैं ऐसा कुछ चाहता था जिससे अदालत की प्रक्रियाओं के नाटकीय होने को टाला जा सके. वास्तव में, मैं चाहता था कि फिल्म के किरदारों, दृश्यों और संवादों का यथार्थवादी चित्रण हो. एक फिल्म या तो पसंद की जाती है या फिर नहीं. निजी तौर पर मैं उन फिल्मों की ही सराहना करता हूं जिनमें वास्तविकता का अंश हो. फिल्म को लेकर दर्शकों का ध्यान खो देने का डर मुझे कभी नहीं रहा. हां, ये हमने महसूस किया कि इस तरह की समझ और शैली सबके बस की बात नहीं, लेकिन हमें इससे कोई दिक्कत नहीं थी.

‘कोर्ट’  में मशहूर लेखक फ्रांज़ काफ्का की एक विशेष झलक मिलती है. फिल्म के लिए किया गया आपका शोध किस तरह भारतीय न्याय व्यवस्था के करीब है?

फिल्म में दिखाई गई अदालत वास्तव में सिर्फ एक कल्पना है, एक ऐसी कल्पना जिसके दम पर इसकी कहानी कहने में मुझे आसानी हुई. अदालत की प्रक्रियाओं के संबंध में हमने अपनी ओर से कुछ स्वतंत्रता ली है. शुरू से ही मैंने तय कर लिया था कि मैं अपनी फिल्म की कहानी में वास्तविकता का गैरजरूरी दबाव नहीं आने दूंगा. इसलिए मैं कहूंगा कि फिल्म में भारतीय अदालतों को कुछ हद तक महसूस किया जा सकता है.

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बूढ़े लोकगायक की अदालती जद्दोजहद

‘कोर्ट’ चैतन्य तम्हाणे की पहली फिल्म है.  28 साल के चैतन्य ने मीठीबाई कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में डिग्री ली है. फिल्ममेकिंग की किताबों में गहरी दिलचस्पी रखने वाले चैतन्य इससे पहले एकता कपूर के प्रोडक्शन हाउस बालाजी टेलीफिल्म्स के साथ काम कर चुके हैं. साथ ही उन्होंने ‘सिक्स स्ट्रैंड्स’ नाम की एक शॉर्ट फिल्म भी बनाई थी, जिसे उन्होंने कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रदर्शित किया था. ‘कोर्ट’ एक बूढ़े लोकगायक की एक स्थानीय अदालत में चल रही जद्दोजहद दिखाती है, जहां उस गायक पर एक सफाई कर्मचारी को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है. फिल्म में सफाई कर्मचारियों और अदालतों की दुर्दशा भी दर्ज है. ‘कोर्ट’ फिल्म का प्रदर्शन पहली बार पिछले साल सितंबर में  71वें वेनिस फिल्म समारोह में किया गया था, जिसके बाद से विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर फिल्म ने कुल 18 अवॉर्ड जीते हैं. वेनिस फिल्म समारोह में इसे सर्वश्रेष्ठ फिल्म और तम्हाणे को ‘लॉयन ऑफ द फ्यूचर’ सम्मान मिला, वहीं विएना अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में भी ‘कोर्ट’ सर्वश्रेष्ठ फिल्म घोषित की गई.

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Court-Indian-Posterआप कह चुके हैं कि आपकी फिल्म आलोचना नहीं है. हालांकि  ‘कोर्ट’  की सराहना इसलिए ज्यादा हुई क्योंकि इसमें भारतीय न्याय व्यवस्था पर टिप्पणी की गई है. इसे किस तरह से देखते हैं?

यह एक रोचक सवाल है. किसी संस्था से ज्यादा मेरा ध्यान मानवीय पहलू पर था. या यूं कह सकते हैं कि मेरी दिलचस्पी मशीन से ज्यादा उसके कलपुर्जों में है. वैसे भारतीय न्याय व्यवस्था की कमियां दिखाने के लिए आपको किसी काल्पनिक फिल्म की जरूरत नहीं. मेरे लिए सिनेमा अकादमिक होने से ज्यादा प्रयोगधर्मी और भावुक माध्यम है. इसलिए भारतीय न्याय व्यवस्था पर टिप्पणी के लिए जब भी फिल्म की सराहना होती है तो मैं सोचता हूं कि यह लोगों से प्रभावी तौर पर जुड़ने में नाकाम रही. फिल्म निश्चित रूप से कमियों को छूती है, लेकिन मेरे दिमाग में फिल्म का मूल अर्थ ये नहीं था.

गैर कलाकारों के साथ काम करने और उनके साथ लगातार लंबे दृश्य फिल्माने के अपने निर्णय के बारे में क्या कहेंगे ?

शुरुआत से ही मैं इस बात को लेकर स्पष्ट था कि मैं फिल्म के लिए जितना संभव हो सकेगा उतने गैर कलाकार लूंगा. समाज के कई तबकों से हमने लोगों को चुना, जिसमें शिक्षक, बैंकर, चपरासी, टैक्सी ड्राइवर और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे. फिल्म के कलाकारों के लिए ऑडिशन लेने और उन्हें चुनने में ही एक साल का समय गुजर गया. कई बार यह प्रक्रिया काफी कठिन लगती थी. सबसे बड़ी चुनौती इन लोगों से चार से पांच मिनट के संवाद बिना किसी रुकावट के बुलवाना था. अगर कोई भी एक संवाद बोलने में गलती करता था तो हमें पूरी प्रक्रिया फिर से दोहरानी पड़ती थी. इस प्रक्रिया ने न सिर्फ हमारे धैर्य की परीक्षा ली बल्कि फिल्म की शूटिंग का समय और बजट भी बढ़ाया. लेकिन हां, मुझे लगता है कि इस मेहनत का प्रतिफल भी मिला. इन गैर कलाकारों ने फिल्म में अपनी जिंदगी के अनुभवों को समेटा है, जिसनेे फिल्म को एक अलग ही रंग दिया है. इसके अलावा इन गैर कलाकारों में दूसरे अभिनेताओं की तरह किसी भी तरह की असुरक्षा की भावना नहीं थी, इसलिए उनके साथ काम करना काफी आसान रहा. एक निर्देशक और कलाकार के संबंधों के अलावा इंसान होने के नाते भी यह एक तरह का समृद्ध अनुभव था. मुझे कभी भी ऐसा मौका नहीं मिलता कि मैं समाज के अलग-अलग तबकों से आने वाले लोगों से बातचीत करता और उनके साथ घुलमिल पाता.

क्या आप इस तरह के सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर काम जारी रखेंगे?

मैंने इस तरह की कोई कसम नहीं खाई है. न तो ऐसा मेरा एजेंडा है और न ही मैं इस तरह के खांचों में खुद को सीमित रखना चाहता हूं. ऐसा कहा जाता है कि मैंने इस तरह के सामाजिक-राजनीतिक तत्वों को महसूस करते हुए फिल्म की स्क्रिप्ट में शामिल किया था. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जब आप एक बार इस तरह की वास्तविकता से परिचित हो जाते हैं तो उन्हें नकारना कठिन होता है.

 

‘यह लोकतंत्र के रूप में नया राजतंत्र है’

svami mukteshvaranandबनारस अब तो शांत दिख रहा है लेकिन सुना जा रहा है कि अंदर ही अंदर अभी माहौल गर्म है. ये उपद्रव आपके नेतृत्व में निकली अन्याय प्रतिकार यात्रा के कारण हुआ, जिसमें पुलिस ने लाठीचार्ज किया और बाद में कर्फ्यू भी लगा. क्या आगे भी ऐसी कोई यात्रा निकालने की योजना है?

अन्याय प्रतिकार यात्रा और उसके बाद संतों का सम्मेलन दोनों ही ऐतिहासिक रहे. काशी में उस दिन वर्षों बाद दलगत और संगठनागत भावना से ऊपर उठकर सनातन समाज एक हो गया. साधु-संतों ने एकजुटता दिखाई. अब जब ऐतिहासिक कदम उठ गए हैं तो लड़ाई आगे भी जारी रहेगी लेकिन अब लड़ाई का तरीका बदल देंगे क्योंकि इस तरीके में सरकार को अराजकता फैलाने में सहूलियत मिल जाती है. मगर हम अपनी आवाज बंद नहीं करेंगे.

आपने 15 दिन पहले से ही अन्याय प्रतिकार यात्रा की घोषणा कर दी थी, फिर उस रोज इस यात्रा में हिंसा क्यों फैली? क्या आपकी तैयारी पूरी नहीं थी?

हमारे लोग तो वहां पहुंच भी नहीं सके थे, जहां से हंगामे की शुरुआत हुई. हंगामे की शुरुआत गोदौलिया चौक से हुई और तब तक हमारे लोग पीछे ही थे. वहां पहले से ही भारी संख्या में पुलिसवाले और हजारों लोग मौजूद थे. अब वे हजारों लोग कौन थे, जिन्होंने माहौल को इस कदर खराब कर दिया, ये तो जांच से ही पता चलेगा. हम चाहते हैं कि सरकार इसकी निष्पक्ष जांच करवाए.

आपके धुर विरोधी रहे विश्व हिंदू परिषद और दूसरे संगठन भी आपकी इस यात्रा में साथ थे और आपके अनुसार हिंसा में आपके लोग शामिल नहीं थे. ऐसे में आपको अराजकता फैलाने का संदेह किस पर है?

ये कैसे कहें. बिना जांच के कुछ कहना ठीक नहीं, लेकिन मैं बार-बार कहूंगा कि सरकार को जांच करवानी चाहिए कि ये कौन लोग थे, जिन्होंने एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन को हिंसा में बदल दिया. फिर पुलिस ने माहौल को और बिगाड़ दिया. हां, इतना जरूर कहूंगा कि राज्य सरकार का रवैया शुरू से सहयोगपूर्ण नहीं था.

सरकार उनसे बात कर ले, जिन पर लाठियां चली हैं ताकि उनके मन में पुलिस-प्रशासन के बारे में बनी धारणा टूटे वरना कल को वे बच्चे ही तो नक्सली बनेंगे

इस यात्रा में साध्वी प्राची भी आईं थीं, जबकि उस खेमे के लोग राम जन्मभूमि आंदोलन के समय से ही आपके विरोधी रहे हैं. ये कैसे संभव हुआ?

अन्याय प्रतिकार यात्रा के करीब एक पखवाड़े पहले मैं पुलिस के लाठीचार्ज का शिकार हुआ था. जाहिर है, चोट लगी थी और मैं अस्पताल में भर्ती था. तब एक संत साथी होने के नाते साध्वी प्राची मुझे देखने अस्पताल आई थीं. उसी समय उन्होंने कहा था कि वे भी यात्रा में शामिल होंगी. हमने तब ही शर्त रख दी थी कि अगर वे आएंगी तो मर्यादा में रहकर ही बोलेंगी. फिर जब वे मंच पर आईं और जैसे ही मुसलमानों के बारे में कुछ बोलने की शुरुआत की, मैंने उनसे माइक छीन लिया.

यह भी अजीब है कि आपकी अन्याय प्रतिकार यात्रा में तो साध्वी प्राची समेत विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों के कई नामी लोग शामिल हुए, जबकि कुछ दिन पहले जब आप पर पुलिस का लाठीचार्ज हुआ था तो स्वामी जीतेंद्रानंद और शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद जैसे लोगों ने आपके विरोध में बयान दिए थे. 

अब जिसने भी विरोध किया और जो भी बोला, उसे बनारस के लोगों ने गंभीरता से नहीं लिया और न ही काशी विद्वत परिषद ने उन बातों पर कुछ कहा.

गणेश चतुर्थी के बाद आपने धरना-प्रदर्शन इसलिए शुरू किया ताकि गणेश प्रतिमाओं को गंगा में विसर्जित करने दिया जाए और कोर्ट के साफ आदेश हैं कि गंगा में प्रतिमा विसर्जन नहीं होगा. तो क्या आप कोर्ट के आदेश को नहीं मानना चाहते? जब ये आदेश आया तब ही इसे चुनौती क्यों नहीं दी?

धरना-प्रदर्शन की शुरुआत हमने नहीं की थी. हमने तो दो दिनों तक देखा-सुना कि गणेशजी की प्रतिमा विसर्जित होने के लिए गई है और प्रशासन ने गोदौलिया और दशाश्वमेध घाट के बीच में उसे रोक दिया है. अधिकारी मेरी बात सुनते नहीं, जो उनसे आग्रह करता. नेता भी मेरी बात नहीं सुनते. मुझे यह ठीक नहीं लगा कि मैं अपने कमरे में सोया रहूं और गणेशजी की प्रतिमाएं सड़क पर विसर्जन का इंतजार करती रहें. तब मैं भी अपने मठ से बटुकों के साथ गया लेकिन वहां तो पुलिस ने लाठीचार्ज कर मामले को दूसरी ही दिशा में मोड़ दिया. रही बात कोर्ट के आदेश को चुनौती देने की तो इस मामले में कोर्ट के आदेश की कोई जानकारी ही नहीं थी. वह तो गणेशजी की प्रतिमा को बीच सड़क पर रोका गया, तब हम इस बारे में जान सके.

लाठीचार्ज के बाद ही आपने इस यात्रा का ऐलान कर दिया था, तब से लेकर अब तक काफी समय था. क्या इस बीच यात्रा रोकने के लिए सरकार ने आपसे बात नहीं की?

लाठीचार्ज कराना सीधे-सीधे राज्य सरकार का मामला था. हमने यही कहा भी था कि डंडा चलाने वाला दोषी नहीं बल्कि दोषी सरकार है, जिनके नियंत्रण में डंडा चलाने वाले हैं. वह इस विषय पर बात करें. हमने कभी नहीं कहा कि प्रदेश के मुखिया माफी मांगे, सिर्फ यह कहा कि संवाद स्थापित किया जाए. कम से कम उन बच्चों से, जो उस धरने में शामिल थे और जिन पर पुलिस ने बेरहमी से लाठियां चलाईं. उस लाठीचार्ज का वीडियो बना, यूट्यूब पर गया, जिसे देश ने और लाखों बच्चों ने देखा. हमारी शर्त तो सिर्फ यही थी कि सरकार उन बच्चों से बात कर ले, जिन पर लाठियां चली हैं ताकि उनके मन में पुलिस और प्रशासन के बारे में बनी धारणा तो टूटे, वरना कल को वे बच्चे नक्सली ही तो बनेंगे. लेकिन सरकार ने तो बात ही नहीं की.

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सुना तो यह गया है कि यात्रा के समय मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आपसे बात करने की कोशिश की थी पर आपने मना कर दिया.

हम जब यात्रा पर निकल चुके थे तब उनके लोगों ने बताया कि मुख्यमंत्री बात करना चाहते हैं. हमने बातचीत के लिए दिन के 12 बजे तक का ही समय निर्धारित किया था, उसके बाद बात करने के लिए न तो समय था और न ही उसका कोई अर्थ होता.

मुख्यमंत्री ने इस मसले पर कुछ नहीं कहा पर बनारस तो प्रधानमंत्री मोदी का संसदीय क्षेत्र है. प्रधानमंत्री, जो दुनियाभर के मसलों पर ट्वीट करते रहते हैं, काशी में हुए इस बवाल पर वे भी चुप हैं. इस पर आपका क्या कहना है?

प्रधानमंत्री से क्या उम्मीद करें, जबकि सब जानते हुए भी मुख्यमंत्री ही चुप्पी साधे रहे. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. हम तो मुख्यमंत्री से ज्यादा उम्मीद लगाए हुए थे कि वे इस मामले का समाधान निकालेंगे. और फिर क्या मुख्यमंत्री, क्या प्रधानमंत्री! यह लोकतंत्र के रूप में नया राजतंत्र है, जहां लोगों को अपने लोगों से ही फुर्सत नहीं. सभी अपने परिवार में उलझे हुए हैं. राजतंत्र इसलिए खत्म हुआ कि तानाशाही खत्म होगी लेकिन ये लोकतंत्र तो और ज्यादा खतरनाक राजतंत्र बनता जा रहा है. पहले के राजा रात में वेष बदलकर प्रजा का सुख-दुख जानने भी निकलते थे, अब के राजाओं को तो प्रजा के सुख-दुख से कोई मतलब ही नहीं.

काल के गाल में नौनिहाल

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फोटो: विजय पांडेय

ओडिशा के व्यावसायिक केंद्र कटक स्थित सरदार वल्लभ भाई पटेल पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ पेडियाट्रिक्स, जो कि शिशु भवन के नाम से मशहूर है, में पहुंचते ही आपको एक गंध घेर लेती है. ये वही गंध है जिससे देशभर के किसी भी सरकारी अस्पताल में आपका सामना होता है. दीवारों से उखड़ा रंग, लोगों से भरे वार्ड, इनक्यूबेटर में लेटे बच्चे और उनके बेबस, चिंतित व निराश मां-बाप जो अपने बच्चे की परेशानियों के खत्म होने का इंतजार कर रहे हैं. उपेक्षा और डर से भरे इन दृश्यों में झलकती कराह आपको भावुक कर देती है. ये अस्पताल बाल रोगों के इलाज के लिए जाना जाता है.

ये वही जगह है जहां अगस्त के दो हफ्तों में 69 नवजात बच्चों की मौत हुई है, जिसके विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं और बच्चों की मृत्यु का कारण जानने के लिए जांच की मांग भी की जा रही है. किसी भी राज्य, भले ही वो शिशु मृत्यु दर में सिर्फ एक प्रदेश (मध्य प्रदेश) से पीछे हो, के लिए भी ये आंकड़े डरावने ही होंगे. साथ ही दिलचस्प बात ये भी है कि 2013-14 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार मध्य प्रदेश और ओडिशा दो ऐसे राज्य हैं जहां गरीब ग्रामीण आबादी सबसे अधिक है और जो अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित रहते हैं.

जब ‘तहलका’ की ओर से इस अस्पताल का दौरा किया गया तो और भी क्षुब्ध करने वाले तथ्य सामने आए, जो दिखाते हैं कि कैसे एक प्रमुख सरकारी अस्पताल शिशु मृत्यु दर से लड़ने के लिए प्रयासरत है जबकि वहां भर्ती हुए शिशुओं की संख्या के कोई कम्प्यूटरीकृत मेडिकल रिकॉर्ड ही नहीं हैं.

गौर करने वाली बात ये है कि राज्य के गंभीर रूप से बीमार बच्चों को कटक के शिशु भवन में भेजा जाता है. राज्य में बेहतर बाल चिकित्सा के लिए मशहूर इस अस्पताल में नवजात से लेकर 14 साल तक के बच्चों का इलाज किया जाता है. 416 बिस्तरों वाले इस अस्पताल में 21 आईसीयू हैं. बताया जाता है कि अधिकतर शिशुओं की मौत ऐस्फिक्सिया यानी श्वास अवरोध (ये ऐसी अवस्था है जिसमें शरीर में ऑक्सीजन सही तरीके से नहीं पहुंच पाती, जिसकी वजह से सांस लेने में परेशानी होती है, कई अंग सही से काम नहीं कर पाते. बच्चों में अगर जन्म से ये बीमारी हो तो मस्तिष्क को भी खासा नुकसान होता है), समय से पहले जन्म, रक्त विषाक्तता और दिमागी बुखार से हुई है. हालांकि अस्पताल के अधिकारियों का दावा है कि जब बच्चों को दूसरे अस्पतालों से यहां लाया गया था तब ही उनकी हालत काफी गंभीर थी, तो ऐसे में उनके बच पाने की उम्मीद क्षीण ही थी. ये दावा अस्पताल और सरकार द्वारा बच्चों की मौत की जिम्मेदारी टालने से ज्यादा कुछ नहीं लगता.

यहां ये जानना जरूरी है कि आखिर ये बच्चे शिशु भवन आए ही क्यों? ये सबूत है कि सरकार राज्य भर में पर्याप्त और प्रभावी स्वास्थ्य सुविधाएं देने, साथ ही आसपास के इलाकों में नाजुक हालत के मरीजों की देखभाल में असफल रही है. अच्छे इलाज की आशा में अभिभावक विभिन्न रोगों से जूझ रहे अपने बच्चों को गंभीर हालत में शिशु भवन लेकर आते हैं.

अस्पताल में मिले मनोज कुमार साहू के मामले को देखा जाए तो पता चलता है कि कैसे जिला अस्पताल समय पर सही इलाज देने में नाकाम हैं. मनोज पुणे में प्लम्बर हैं. वह बताते हैं कि कैसे दक्षिणी ओडिशा के कोरापट जिले से वो अपनी लगभग मृतप्राय बेटी को लेकर शिशु भवन पहुंचे थे. उनके अनुसार, ‘बच्ची को जन्म के छठे दिन से ही बुखार आने लगा, हमने उसे जिला अस्पताल में भर्ती करवाया पर उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. तब डॉक्टरों ने हमें उसे शिशु भवन ले जाने को कहा. हमने एक हजार रुपये देकर एम्बुलेंस किराये पर ली जिससे हम बच्ची को शिशु भवन ले जा सकें. हमें कटक पहुंचने में पूरा दिन लग गया. तब तक मेरी बेटी लगभग मर ही चुकी थी, उसमें कोई हलचल नहीं हो रही थी. यहां डॉक्टरों ने उसे फौरन आईसीयू में भर्ती किया. अगर हमारे जिले में कोई अच्छा अस्पताल होता तो शायद मेरी बेटी बच जाती!’ मामला जितना दूरदराज का और जितने गरीब इलाके का होता है त्रासदी उतनी ही बड़ी होती है. अगर दूरी को छोड़ भी दें तो इलाज की कीमत (क्या आपको लगता है सरकारी अस्पताल सस्ते होते हैं?) देने में किसी परिवार, जो बमुश्किल दो जून की रोटी जुटाता है, की कमर टूट जाती है और कर्ज का कभी न खत्म होने वाला चक्र शुरू हो जाता है. उदाहरण के तौर पर देखें तो अभिभावक को पहले आईसीयू की 250 रुपये फीस देनी होती है, जो पांच दिनों के बाद बढ़कर 500 रुपये हो जाती है. इसके अलावा वेंटिलेटर के लिए भी 500 रुपये देने होते हैं. साथ ही ग्लूकोज आदि की बोतल के लिए भी 300-400 रुपये भरने पड़ते हैं. यहां उस राज्य की बात हो रही है, जहां इस साल के अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर सरकार ने गैर प्रशिक्षित मजदूरों (इसमें खेतिहर मजदूरी भी शामिल है, जिस पर सबसे ज्यादा आबादी निर्भर है) की न्यूनतम मजदूरी 150 से बढ़ाकर 200 रुपये रोजाना की है, अर्द्ध-कुशल मजदूरों की 170  से बढ़ाकर 220 रुपये रोजाना और प्रशिक्षित मजदूरों की 190 से बढ़ाकर 240 रुपये रोजाना प्रतिदिन की गई है. चिकित्सा के ये खर्चे उस समय और घातक लगने लगते हैं जब ये पता चले कि ओडिशा की एक तिहाई ग्रामीण आबादी (35.79 फीसदी) 32 रुपये रोजाना (देश का आधिकारिक गरीबी रेखा पैमाना) की आय से भी कम पर गुजारा करती है. प्रति व्यक्ति मासिक खर्च 1,003 रुपये है जो दिखाता है कि ग्रामीण ओडिशा देश में सबसे कम खर्चा करने वाला भाग है, जहां परिवारों की कुल आय का लगभग 57 फीसदी हिस्सा खाने पर व्यय होता है.

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प्रदीप प्रधान, ‘राइट टू फूड कैम्पेन’ के कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने हाल ही में अपनी रिपोर्ट ओडिशा के राज्यपाल को सौंपी है. इसमें साफ बताया गया है कि कैसे बीपीएल कार्ड धारकों को शिशु भवन में इलाज करवाने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है. उदाहरण के लिए वो बताते हैं, ‘कोरापट जिले के जयपुर के एक बीपीएल कार्डधारक अपने तीन साल के बच्चे के इलाज के लिए शिशु भवन आए थे. बाहर काउंटर पर बैठे स्टाफ ने उनसे खून की जांच के लिए फीस मांगी, जब उन्होंने अपना बीपीएल कार्ड दिखाते हुए कहा कि उन्हें मुफ्त इलाज की सुविधा है, तब स्टाफ ने उन्हें गाली देते हुए कहा, या तो फीस भरो या निकल जाओ. आखिर में उन्हें 190 रुपये भरने पड़े.’

इस रिपोर्ट के अनुसार, अस्पतालों के अधिकारी इस बात से अनभिज्ञ हैं कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना और बीजू कृषक कल्याण योजना (वर्तमान मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के पिता और पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक के नाम पर ओडिशा के किसानों के लिए शुरू की गई स्वास्थ्य बीमा योजना) के तहत मुफ्त इलाज की सुविधा दी गई है. इस तरह अस्पताल के अधिकारियों द्वारा गरीब लोगों की एक बड़ी आबादी को उनको मिले मुफ्त इलाज के अधिकार से वंचित रखा जाता है. वहीं इतना सब होने के बावजूद राज्य सरकार का दावा है कि उनके पास इन मौतों से निपटने के पर्याप्त संसाधन हैं. इससे भी खराब ये है कि चिकित्सा अधिकारी इस बात को कहते हुए बड़ा गर्व महसूस करते हैं कि कम से कम उनकी स्थिति मध्य प्रदेश से तो अच्छी है. सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार चाइल्ड केयर यूनिट में मृत्यु दर 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती. कटक के शिशु भवन में मृत्यु दर का आंकड़ा 13 प्रतिशत है जबकि जबलपुर मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल में ये आंकड़ा 24 प्रतिशत है. भोपाल और डिब्रूगढ़ (असम) में ये आंकड़ा क्रमशः 19 और 13 प्रतिशत है. प्रदीप प्रधान बताते हैं, ‘खराब प्रशासन के साथ यहां डाॅक्टरों और अन्य मेडिकल स्टाफ की भारी कमी है, जिससे इलाज का स्तर गिरता ही जा रहा है. पर अस्पताल और राज्य के अधिकारी इस बात को मानने को तैयार ही नहीं हैं.’

बच्चों की बढ़ती मौतों का कारण जानने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने तीन डॉक्टरों के एक जांच दल को शिशु भवन भेजा. स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है, ‘21 से 26 अगस्त 2015 के बीच हुई बच्चों की मौत के मामलों को जांच दल के सदस्यों ने देखा है, साथ ही वाॅर्ड, आईसीयू और लैब सुविधाओं का भी मुआयना किया.’

हालांकि भाजपा नेता बिजय मोहपात्रा का कहना कुछ और ही है. उनका आरोप है कि जब जांच दल भुवनेश्वर एअरपोर्ट पहुंचा तब राज्य सरकार के स्वास्थ्य सचिव ने उन्हें लौट जाने को कहा. बिजय बताते हैं, ‘सचिव ने दावा किया कि उनके पास इस समस्या से निपटने के पर्याप्त संसाधन हैं, साथ ही दल को इस मामले की विस्तृत रिपोर्ट भेजने को भी कहा, जो बाद में उन्होंने भेजी भी.’ स्वास्थ्य मंत्रालय की इस टीम ने अस्पतालों को गंभीर मामलों से और बेहतर तरीके से निपटने के लिए कई सुझाव भी दिए हैं. जैसे- बीमार बच्चों को मॉनिटर करने के लिए और ज्यादा वरिष्ठ डाॅक्टरों को लाया जाए, जिसमें शिशु रोग विभाग के लिए एक एमडी (डॉक्टर ऑफ मेडिसिन) भी हो, गंभीर मामलों और इमरजेंसी के समय अस्पताल के अंदर ही 24 घंटे लैब सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, लैब टेक्नीशियनों की नियुक्ति की जाए, रेडियोग्राफर और पैरामेडिकल स्टाफ सुविधा चौबीस घंटे उपलब्ध हों, जीवन रक्षक और उच्च एंटीबायोटिक दवाएं मुफ्त दी जाएं, अधिक नर्सिंग स्टाफ तैनात किए जाएं, खासकर इमरजेंसी केसों में. साथ ही किसी भी प्रकार के संक्रमण से बचने और उसकी पहचान की व्यवस्था और एक कम्प्यूटरीकृत मेडिकल रिकॉर्ड सिस्टम, जहां डाटा और जांच रिपोर्टों को किसी भी समय देखा जा सके. अगर प्री-इंटेंसिव केयर यूनिट (प्री-आईसीयू) में जाकर देखें तो अभिभावक बच्चों के इनक्यूबेटर के पास बैठे हैं. उनका सामान मशीन के नीचे रखा है, वो नवजात बच्चों को छू भी रहे हैं, जो कि खतरनाक है क्योंकि इससे उनमें संक्रमण होने का खतरा रहता है. यहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जो अभिभावकों को बताए कि क्यों उन्हें बच्चों को छूना नहीं चाहिए. साथ ही बीमार बच्चों की संख्या ज्यादा होने की वजह से एक ही इनक्यूबेटर में दो बच्चे हैं जो कि ठीक नहीं है क्योंकि इससे भी बच्चों में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है.

ओडिशा में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति और साफ तौर पर देखने के लिए ‘तहलका’ ने मध्य ओडिशा के कंधमाल जिले का भी जायजा लिया. यहां का सबसे बड़ा जिला अस्पताल फुलबनी में है, जहां कुछ महीनों पहले तक एक डॉक्टर भी नहीं था. भुवनेश्वर से 250 किमी दूर फुलबनी प्रमुख रूप से एक आदिवासी जिला है. कंधमाल में 14 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और 34 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं पर कहीं भी बाल रोग विशेषज्ञ नहीं है.

कुपोषण पर काम कर रहे एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता अशोक परिदा बताते हैं, ‘मौत के बहुत सारे मामले तो रिपोर्ट ही नहीं होते क्योंकि इन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर रिकॉर्ड बनाने की कोई व्यवस्था ही नहीं है. अक्सर जिला अस्पताल तक पहुंचने से पहले ही बच्चे की मृत्यु हो जाती है. कंधमाल में सिर्फ पांच महीनों में 226 बच्चों ने जान गंवाई क्योंकि यहां कोई डॉक्टर ही नहीं था. जब इन मौतों की खबर सुर्खियों में आई तब जाकर एक बाल रोग विशेषज्ञ को यहां भेजा गया वरना यहां के अधिकारी तो इस तरह की मौतों के मामले को दबा देने में अभ्यस्त हैं.’ बच्चों की मृत्यु का कारण श्वास अवरोध और समय पूर्व जन्म है. शिशु मृत्यु दर का सीधा संबंध माता के स्वास्थ्य से है. जिन महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान संक्रमण या एनीमिया (खून की कमी) होती है, वो अक्सर कमजोर बच्चों को जन्म देती हैं जो ज्यादा नहीं जीते. इस समस्या की गंभीरता जानने के लिए ‘तहलका’ ने फुलबनी के पास सर्तगुड़ा गांव जाकर उन महिलाओं से मुलाकात की, जिन्होंने हाल ही में बच्चे को जन्म दिया है. इन महिलाओं में अधिकतर अंडरवेट यानी तय मानकों से कमजोर थीं, उनका विवाह 16 साल से भी कम उम्र में हो गया था, वे तीन से चार बार पहले भी मां बन चुकी थीं, जहां कई बार उन्हें मृत शिशु भी पैदा हुए. सरकार की स्वास्थ्य योजनाएं, जिनका प्रेस में तो व्यापक प्रचार हो रहा है, की जमीनी सच्चाई यहां देखी जा सकती है. राज्य के महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही ममता योजना के हिसाब से एक उपयुक्त गर्भवती महिला को उनकी और नवजात के पोषण और देखभाल के लिए चार किश्तों में 5000 रुपये की धनराशि आर्थिक मदद के रूप में दी जाएगी. ये योजना सुनने में भले ही उत्कृष्ट लगे, इसका कार्यान्वयन उतना अच्छा नहीं है. एक गर्भवती सौदामिनी मलिक को पिछले दो महीनों में कोई धनराशि नहीं मिली है.

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परिदा बताते हैं, ‘गर्भवती और धात्री (दूध पिलाने वाली) माताओं को तकरीबन दो सालों से कोई धनराशि नहीं मिली है. दूसरी समस्या ये है कि जिले के स्वास्थ्य उपकेंद्रों पर बमुश्किल ही कोई एएनएम (सहायक दाई) है.’ गांव की महिलाओं ने बताया कि आशा कार्यकत्रियाें द्वारा बहुत ही कम महिलाओं को नियमित रूप से आयरन सप्लीमेंट मिल पाता है क्योंकि स्वास्थ्य कर्मचारियों द्वारा इसका ध्यान ही नहीं रखा जाता.

हालांकि राज्य सरकार द्वारा इन इलाकों में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं पर जमीन पर उनके पास दिखाने को कुछ नहीं है. इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों में मातृ-शिशु मृत्यु दर में थोड़े ही बदलाव देखे गए हैं. इन जिलों में खाद्य असुरक्षा अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा संकट है. सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को इनके वांछित परिणामों को पाने में अभी और समय लगेगा. उदाहरण के लिए, यहां गांव वालों से सुनी जा सकने वाली सबसे सामान्य शिकायत ये है कि केंद्र सरकार के महिला एवं बाल विकास कल्याण मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही समेकित बाल विकास सेवा के तहत बच्चों और महिलाओं को दिए जाने वाला सत्तू अच्छी गुणवत्ता का नहीं होता. इस साल जनवरी में, भोजन के अधिकार (राइट टू फूड) अभियान की टीम ने एक निश्चित इलाके के कई प्राथमिक विद्यालयों और आंगनबाड़ी केंद्रों का मुआयना किया. उन्होंने पाया कि एक गांव में कोई आंगनबाड़ी केंद्र नहीं था और नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र भी तकरीबन 2 किमी दूर था. ऐसे स्थानों पर छोटे आंगनबाड़ी केंद्र खोलने का प्रस्ताव रखा गया था पर सरकार इस पर सिर्फ विचार करती ही दिख रही है. कई आंगनबाड़ी केंद्रों के पास संचालन के लिए कोई इमारत ही नहीं है और यदि है तो बहुत ही जीर्ण-शीर्ण हाल में है.

गर्भवती और धात्री माताओं को जितना पोषण मिलना चाहिए, उतना उन्हें नहीं मिल रहा है. महीने में उन्हें आठ अंडों की खुराक मिलनी चाहिए पर उन्हें सिर्फ चार से छह अंडे मिल रहे हैं. बच्चों को सत्तू के दो पैकेट की बजाय सिर्फ एक ही पैकेट मिल रहा है. साफ है कि समेकित बाल विकास सेवा में समुचित पोषण देने में हो रही अव्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार के चलते बच्चों पर असमय मौत का साया मंडराने लगता है. इन सब के बावजूद राज्य सरकार को गर्व है कि देशभर में शिशु मृत्यु दर के आंकड़े में मध्य प्रदेश ओडिशा से आगे है.

‘लालू सत्ता में वापस आते हैं तो यादव फिर शक्तिशाली हो जाएंगे’

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पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार राजग के सहयोगी के बतौर उतरे थे, जबकि इस बार वे लालू प्रसाद के साथ मिलकर भाजपा के नेतृत्व वाले राजग के सामने उतर रहे हैं. आपका इस बार के विधानसभा चुनावों के बारे में क्या कहना है?

इस बार का चुनाव कुछ हद तक अनोखा है. नीतीश कुमार के खिलाफ सत्ता विरोधी कोई लहर नहीं है. वो ऐसे व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं, जो अपने वादों पर खरा उतरा है. वहीं भाजपा को भी सांप्रदायिक दल नहीं माना जाता क्योंकि राजग के रूप में ही नीतीश सात साल शासन कर पाए हैं और इन सालों में भाजपा के राजनीतिक और सांस्कृतिक एजेंडे ने कहीं भी उनके शासन को प्रभावित नहीं किया. तो भाजपा के खिलाफ भी कोई सत्ता विरोधी लहर नहीं दिखती है.

पिछले डेढ़ साल में राष्ट्रीय स्तर पर मोदी की चमक फीकी पड़ी है. हालांकि मैं हैरान हूं कि इससे बिहार में उनकी लोकप्रियता पर कोई असर नहीं पड़ा है. वे काफी संख्या में लोगों को आकृष्ट कर रहे हैं. फिर भी, अन्य राज्यों में उनके सामने इतने कद्दावर नेता नहीं थे. बिहार में उनके सामने एक ऐसा सफल नेता (नीतीश) है, जो 2019 के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री पद का दावेदार हो सकता है. ऐसे में मोदी के लिए बिहार में जीत का सफर थोड़ा मुश्किल भरा होगा.

आम तौर पर माना जाता है कि बिहार की राजनीति में जाति एक प्रमुख भूमिका निभाती है. क्या इस बार भी ये निर्णायक कारक साबित होगी?

बिहार की राजनीति में जाति हमेशा से ही महत्वपूर्ण रही है. अब सवाल ये है कि इसका विन्यास क्या होगा? नीतीश कुमार पहले ही उस गठबंधन से अलग हो चुके हैं जहां अन्य पिछड़ा वर्ग और दलितों के साथ सवर्ण निर्णायक भूमिका में थे. यहां गौर करने वाली बात ये है कि जब भी राज्य में ऊंची जातियां एक साथ आकर गठबंधन करती हैं तो इसे जातिगत गठजोड़ नहीं कहा जाता पर जब हाशिये पर पड़ी, गरीब जातियां साथ आती हैं तो इसे फौरन जातिवादी गठबंधन होने का नाम दे दिया जाता है.

जातिगत समीकरण के बारे में क्या आप थोड़ा विस्तार से बता सकते हैं?

भाजपा का राष्ट्रीय आधार ऊंची जातियां हैं, जो कभी कांग्रेस का आधार हुआ करती थीं. इतिहास देखें तो भाजपा का आधार बनिया हुआ करते थे. हालांकि बिहार में भाजपा अब पिछड़ी जातियों से समर्थन मांगते हुए नजर आ रही है. उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो भाजपा ने सम्राट अशोक को कोईरी जाति का घोषित करते हुए उनके नाम पर डाक टिकट जारी किया है. भाजपा इससे पहले जातिगत रैलियों का आयोजन भी करती रही है पर फिर भी वे यही कहते हैं कि वे जातिवादी नहीं हैं. इसलिए चुनाव में जाति एक महत्वपूर्ण घटक है.

महादलित समुदाय के बारे में आपका क्या कहना है? जीतनराम मांझी खुद को एकमात्र महादलित नेता कहते हैं, इसे आप क्या कहेंगे?

भाजपा यहां हाशिये पर पड़ी जातियों से समर्थन पाने के लिए काम कर रही है. मांझी को साथ लेने का उद्देश्य महादलित वोटरों को अपनी तरफ करना है. वैसे मांझी भाजपा के साथ इसलिए हुए क्योंकि नीतीश परिस्थितियों को सही तरह से संभाल नहीं पाए. व्यावहारिक तौर पर नीतीश ने ही मांझी को भाजपा के खेमे तक पहुंचाया.

भाजपा के उन आरोपों पर आपका क्या कहना है, जिसमें वह कह रही है कि अगर लालू-नीतीश सत्ता में वापसी करते हैं तो बिहार में जंगलराज वापस आ जाएगा?

1991 में जब लालू सत्ता में थे, पिछड़ी जाति और सामाजिक न्याय व्यवस्था पर आधारित यह तब का सबसे बड़ा गठबंधन था. तब बिहार अविभाजित था, उन्हें 54 सीटों में से 53 मिल सकती थीं, लेकिन चारा घोटाले में लालू के खिलाफ कोर्ट केस हुआ जिसके बाद उनका आधार सिर्फ यादव जाति तक ही सीमित रह गया. हालांकि राज्य में लालू के शासन के समय ही लोकतांत्रिकरण की शुरुआत हुई, उसके बावजूद बिहार पतन की ओर ही बढ़ता चला गया. राज्य में कई स्तरों पर भारी अव्यवस्थाओं और कानून व्यवस्था की कमी के चलते ऊंची जातियों ने ‘बड़े’ अपराध करने शुरू किए, वहीं यादव ‘छोटे’ अपराधों में लिप्त हो गए. उस दौर में जनता के एक बड़े वर्ग की सामान्य सोच यही थी. इसलिए अब इस बात का डर है कि अगर लालू यादव सत्ता में वापस आते हैं तो यादव फिर से शक्तिशाली हो जाएंगे.

सवालों के घेरे में चिदंबरम

Finance Minister P Chidambaram  Photo by Shailendra Pandey/Tehelka

उनके राजनीतिक विरोधी उन्हें बिना किसी करिअर प्लान का उत्तराधिकारी बताते हैं. शायद यही कारण है कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्थी चिदंबरम, ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट की तरह अपने पिता की राजनीतिक विरासत संभाल नहीं पाए. तमिलनाडु में युवा कांग्रेस के अध्यक्ष रहने के बावजूद लोग उनके बारे में कम ही जानते हैं, साथ ही उनकी गतिविधियां भी हमेशा एक परदे में ही रही हैं.

भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के ‘मसीहा’ के ये इकलौते पुत्र आजकल गलत कारणों से ही सही, सुर्खियों में हैं. मशहूर दक्षिणपंथी नेता और कूटनीतिज्ञ सुब्रह्मण्यम स्वामी के आरोप है कि कार्थी विवादित एयरसेल-मैक्सिस अनुबंध में एक लाभार्थी हैं. इसके बाद कार्थी पर राजस्थान एम्बुलेंस स्कैम में भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप भी लगे, जिसने उन्हें मीडिया और जनता के सामने सवालों के घेरे में ला दिया. आरोपों का ये सिलसिला यहीं नहीं थमा. आरएसएस के विचारक एस. गुरुमूर्ति ने हाल ही में पी. चिदंबरम और कार्थी चिदंबरम पर हेल्थकेयर चेन वासन आई केयर से काला धन लेने सहित कई गंभीर आरोप लगाए हैं. दोनों पर वासन आई केयर के बेनामी मलिक होने का भी आरोप है. चिदंबरम का कहना है कि ये आरोप गलत हैं और राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित हैं. पर इससे आरोप लगाने वाले गुरुमूर्ति और ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ पर कोई फर्क नहीं पड़ता. गुरुमूर्ति ने चेन्नई के एक पूर्व आयकर कमिश्नर एम. श्रीनिवास राव के शपथ पत्र का हवाला भी दिया है. राव ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) में दर्ज एक शिकायत में कहा था कि उनके वरिष्ठों के ‘नाजायज’ आदेश न मानने की सजा के बतौर उनका ट्रांसफर किया गया.

इस दैनिक अखबार में लिखे लेख में गुरुमूर्ति ने दावा किया है कि कार्थी की कंपनियों के वासन आई केयर के साथ संभावित संबंध के परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी उपलब्ध हैं. गुरुमूर्ति आगे ये भी कहते हैं कि ये हेल्थकेयर चेन जेडी ग्रुप नाम की एक कंपनी और किन्ही डॉ. एएम अरुण के साथ मिलकर अवैध गतिविधियों में भी शामिल है.

‘न मैं, न मेरा बेटा और न ही मेरे परिवार का कोई  सदस्य ‘कथित’ कंपनी में किसी भी प्रकार के निवेश या आर्थिक लाभ के भागीदार हैं’

राव द्वारा दायर याचिका बताती है कि जेडी ग्रुप ने वासन ग्रुप को लगभग सौ करोड़ रुपये का भुगतान काले धन से किया था. गुरुमूर्ति लिखते हैं, ‘राव की याचिका पर कैट द्वारा की गई जांच बताती है कि जेडी ग्रुप द्वारा वासन ग्रुप को 223 करोड़ रुपये नकद दिए गए हैं.’ कहा जा रहा है कि इस बात के सबूत आयकर विभाग के पास हैं.

गुरुमूर्ति के अनुसार वासन आई केयर से ये सारा काला धन डॉ. एएम अरुण के माध्यम से पी. चिदंबरम तक पहुंचा है. वे कहते हैं, ‘कुछ बेनामी और फर्जी कंपनियों के चिदंबरम और उनके बेटे कार्थी वासन आई केयर में महत्वपूर्ण भागीदार हैं.’ राव की रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए उनका ये भी कहना है कि मॉरिशस और सिंगापुर की कुछ कंपनियों के माध्यम से चिदंबरम वासन आई केयर के मालिक हैं. इस बात की पुष्टि करते हुए वे कहते हैं कि कार्थी की एक  कंपनी ‘शेल’ (एक गैर व्यावसायिक कंपनी जिसका प्रयोग कई वित्तीय मामलों में माध्यम के रूप में किया जाता है या भविष्य के किसी काम के लिए निष्क्रिय अवस्था में रखा जाता है) की आड़ में निवेश करने के बाद ही वासन आई केयर में वृद्धि देखी गई, जब मॉरिशस की कुछ फर्मों ने उसमें लगभग हजारों करोड़ रुपये का निवेश किया. गुरुमूर्ति ये भी कहते हैं कि चिदंबरम ने वासन की राजनीतिक पहुंच की झलक तब दिखाई जब तमिलनाडु के कराईकुडी में वासन के सौवें क्लीनिक के उद्घाटन के लिए उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बुलाया. गुरुमूर्ति इस मामले की सरकारी जांच की मांग कर रहे हैं.

वहीं चिदंबरम ने इन सभी आरोपों को खारिज किया है. वे अपने बयान में कहते हैं, ‘न मैं, न मेरा बेटा और न ही मेरे परिवार का कोई भी सदस्य ‘कथित’ कंपनी में किसी भी प्रकार के निवेश या आर्थिक लाभ के भागीदार हैं. मुझे आयकर विभाग या इसके अधिकारियों से संबंधित जून 2015 में हुई किसी भी घटना की जानकारी नहीं है. संप्रग सरकार तो मई 2014 में ही दफ्तर छोड़ चुकी थी.’

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फोटोः जितेंद्र गुप्ता/आउटलुक

हालांकि यहां भी गुरुमूर्ति का कहना है कि चिदंबरम की अस्वीकृति उन पर लगे आरोप के किसी भी तथ्य, परिस्थिति या दस्तावेज से जुड़े सवाल का जवाब नहीं देती. 22 सितंबर को लिखे एक लेख में वे कहते हैं, ‘चिदंबरम के बौद्धिक स्तर को देखते हुए कोई भी सामान्य व्यक्ति उनकी बात मान लेगा पर अगर बात वासन से जुड़े मामले की है तो उनके बयान की समीक्षा करने की जरूरत है.’ विवादित एयरसेल-मैक्सिस अनुबंध से प्रसिद्द मारन बंधुओं के जुड़े होने का आरोप लगा चुके गुरुमूर्ति चिदंबरम पर भी सवाल खड़े करते हैं, ‘वासन का नाम लेने में चिदंबरम की हिचकिचाहट ही अपने आप में गवाह है. उन्होंने अपने बयान एक भी बार वासन का नाम नहीं लिया है बल्कि इसे ‘कथित’ कंपनी कह कर संबोधित किया है. ये आश्चर्यजनक है क्योंकि अप्रैल 2008 में खुद उन्होंने मदुरै में वासन के 25वें क्लीनिक का उद्घाटन किया था. फिर 2011 में उनके संसदीय क्षेत्र में वासन के सौवें क्लीनिक के उद्घाटन के समय भी प्रधानमंत्री और राज्यपाल के साथ वे मुख्य अतिथियों में से एक थे. एक निजी नेत्र देखभाल संस्थान से असाधारण रूप से प्रगाढ़ता दिखाने के बाद अब उन्हें वासन का नाम लेते हुए भी शर्म आ रही है, क्यों?’

गुरुमूर्ति आगे लिखते हैं, ‘इसके बावजूद, चिदंबरम ‘कथित’ कंपनी द्वारा जारी की गई ‘तात्कालिक’ अस्वीकृति का लाभ उठाते . वासन का बयान देखिए, वे इन सभी आरोपों को गलत और द्वेषपूर्ण बताते हैं.’ गुरुमूर्ति का कहना है कि वासन का खंडन उनके सवालों का जवाब नहीं है. उन्होंने अपने लेख में 28 सवाल उठाए थे, जिनका वासन ने कोई जवाब नहीं दिया है. ‘चिदंबरम के बेटे कार्थी से जुड़े किसी सवाल का तो जवाब दिया जाता! जैसे- क्या प्रवर्तन निदेशालय ने वासन और डॉ अरुण को द्वारकानाथन से कार्थी की कंपनी को डेढ़ लाख शेयर ट्रांसफर करने पर नोटिस नहीं दिया था? 17 सितंबर को किए गए खुलासे में बताया गया है कि कार्थी के स्वामित्व वाली एक कंपनी ने वासन के डेढ़ लाख शेयर अधिग्रहित किए हैं. इस तथ्य को या तो स्वीकारा जाए या नकारा जाए. कोई नकारा हुआ तथ्य झूठा या द्वेषपूर्ण कैसे हो सकता है?’

सच कुछ भी हो, इस मामले ने मीडिया और जनता का ध्यान खींचा है. मद्रास इंस्टिट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक सी. लक्ष्मणन का कहना है, ‘केंद्र और राज्य दोनों जगह प्रतिकूल सरकार होने की वजह से चिदंबरम पिता-पुत्र के लिए इस मामले से निकलना बड़ी चुनौती होगी. इससे निकलने के लिए उन्हें खासी मशक्कत करनी होगी. गुरुमूर्ति के पीछे आरएसएस-भाजपा नेतृत्व का समर्थन है, जिनका जाहिर रूप से पिता-पुत्र के काम करने की शैली को लेकर दुराव है. गुरुमूर्ति के चिदंबरम की राजनीतिक नींव पर हमला करने के उद्देश्य निजी हो सकते हैं पर इस बात से चिदंबरम पर लगाए गए आरोपों की गंभीरता कम नहीं हो जाती.’

शिक्षा बचाने का संघर्ष

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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नॉन नेट फेलोशिप खत्म करने का निर्णय लेने के बाद देश के कई विश्वविद्यालयों में शुरू हुआ आंदोलन खत्म होने की जगह बढ़ता जा रहा है. हालांकि, बाद में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने फेलोशिप खत्म न करने की बात कही, लेकिन छात्र-छात्राओं ने फेलोशिप के तहत मिलने वाली राशि बढ़ाने अाैर शिक्षा का निजीकरण न करने की मांग काे लेकर आंदोलन जारी रखा है. सैकड़ों की संख्या में छात्र-छात्राएं दिल्ली स्थित यूजीसी मुख्यालय के सामने ‘ऑक्यूपाई यूजीसी’ अभियान चलाते हुए धरना दे रहे हैं. बीते 27 अक्टूबर को यूजीसी के सामने प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया जिसमें  कई छात्र-छात्राओं को गंभीर चोटें आईं.

सात अक्टूबर को यूजीसी ने एक बैठक में नौ वर्षों से चल रही नॉन नेट फेलोशिप योजना खत्म करने का निर्णय लिया था. इस योजना के तहत वर्तमान में एमफिल की पढ़ाई कर रहे छात्रों को 18 महीने तक प्रतिमाह 5,000 रुपए जबकि पीएचडी की पढ़ाई कर रहे छात्रों को चार साल तक प्रतिमाह 8,000 रुपए की वित्तीय मदद दी जाती है. यह फेलोशिप देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शोध करने वाले उन छात्र-छात्राओं को दी जाती है, जिन्होंने नेशनल एलिजबिलिटी टेस्ट (नेट) पास नहीं किया है या जिन्हें जूनियर रिसर्च फेलोशिप (जेआरएफ) नहीं मिलती है.  इस  फेलोशिप को बंद करने के पीछे यूजीसी का तर्क था कि इसमें पारदर्शिता की कमी के कारण इसका दुरुपयोग किया जा रहा है. यूजीसी ने कहा था कि यह फेलोशिप कार्यक्रम भेदभावपूर्ण है और विश्वविद्यालयों में चयन प्रक्रिया में समरूपता की कमी है. साथ ही धन की कमी के कारण भी यूजीसी यह फेलोशिप देने में असमर्थ है. इस फैसले के बाद दिल्ली, इलाहाबाद, हैदराबाद समेत कई शहरों व विश्वविद्यालय परिसरों में प्रदर्शन शुरू हो गए.

विरोध-प्रदर्शनों को देखते हुए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 25 अक्टूबर को एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि सरकार ने यूजीसी द्वारा प्रदान की जाने वाली नेट और नॉन नेट रिसर्च फेलोशिप के मामलों की जांच के लिए एक समीक्षा समिति गठित करने का फैसला किया है. समीक्षा समिति, दिसंबर 2015 तक मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी. तब तक यूजीसी का निर्णय स्थगित है, सभी मौजूदा फेलोशिप जारी रहेंगी. यूजीसी साल में दो बार अखिल भारतीय राष्ट्रीय योग्यता परीक्षा (नेशनल एलिजबिलिटी टेस्ट) आयोजित करता है, जिसके तहत फेलोशिप प्रदान की जाती है. यूजीसी ने 2006 में नॉन नेट फेलोशिप योजना शुरू की थी. इसके तहत ऐसे छात्रों को भी फेलोशिप दी जाती है जिन्हें नेट के तहत जूनियर रिसर्च फेलोशिप नहीं मिलती. मौजूदा वक्त में यह फेलोशिप केवल 50 संस्थानों के लिए सीमित है. वर्तमान में करीब 35,000 छात्र इन फेलोशिप का उपयोग कर रहे हैं.

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छात्रों की मांग

  • यूजीसी और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को स्पष्ट तौर पर नोटिफिकेशन जारी करना चाहिए कि 7 अक्टूबर को जारी यूजीसी का निर्णय मान्य नहीं होगा
  • इस तरह के किसी भी प्रावधान को वापस लिया जाना चाहिए जो मेरिट या आर्थिक आधार पर लाभार्थी छात्रों को लाभ से वंचित करता हो
  • फेलोशिप की मौजूदा राशि 5,000/8,000  रुपये से बढ़ाकर जेआरएफ फेलोशिप के अनुपात में 8,000/12,000 रुपये की जाए. साथ ही भविष्य को ध्यान में रखते हुए फेलोशिप को महंगाई सूचकांक के साथ भी जोड़ा जाए
  • फेलोशिप केंद्रीय विश्वविद्यालयों के साथ राज्य विश्वविद्यालयों में भी बिना किसी भेदभाव के लागू की जाए
  • शिक्षा के बाजारीकरण के सभी प्रयास बंद किए जाएं

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मंत्रालय ने दिसंबर 2014 से नेट आधारित रिसर्च फेलोशिप के लिए सहायता राशि बढ़ा दी थी. जूनियर रिसर्च फेलो को पहले दो वर्ष के लिए 25,000 रुपये प्रतिमाह और हर वर्ष 30 प्रतिशत मकान किराया (एचआरए) और आकस्मिक अनुदान तथा सीनियर रिसर्च फेलो को अगले तीन वर्षों के लिए प्रतिवर्ष 28,000 रुपये प्रतिमाह, 30 प्रतिशत एचआरए और आकस्मिक अनुदान मिलता है.

हालांकि, मंत्रालय के समिति गठित करने की घोषणा के बाद भी छात्रों ने अपना आंदोलन वापस नहीं लिया है. जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने बताया, ‘ऑक्यूपाई यूजीसी आंदोलन जारी रहेगा. मंत्रालय की ओर से हमें जो पत्र मिला है, उसमें कहा गया है कि इस बारे में कमेटी गठित की गई है, वह नॉन नेट फेलोशिप की समीक्षा करेगी. उसकी सिफारिश के बाद इस बारे में निर्णय लिया जाएगा. समीक्षा समिति बने, इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन कमेटी इसलिए बननी चाहिए कि छात्रों को शोध कार्य के लिए और क्या बेहतर सुविधाएं दी जा सकती हैं. कमेटी आर्थिक हालत और मेरिट के आधार पर समीक्षा करने जा रही है, जिससे हम सहमत नहीं हैं. फेलोशिप की समीक्षा के लिए आर्थिक और मेरिट का आधार हटाया जाए और इसके तहत राज्य विश्वविद्यालयों को भी शामिल किया जाए.’

आंदोलन से सिर्फ फेलोशिप का मसला नहीं जुड़ा है. केंद्र सरकार पिछले बजट में उच्च शिक्षा के आवंटित बजट में 25 प्रतिशत की कटौती कर दी थी. दिसंबर में विश्व व्यापार संगठन के जनरल एग्रीमेंट्स ऑन ट्रेड सर्विस की वार्ता में सरकार उच्च शिक्षा को निजी क्षेत्र के लिए खोलने की तैयारी कर रही है. 2005 में मनमोहन सिंह ने उच्च शिक्षा को इसके तहत लाने का प्रस्ताव रखा था. इस साल के अंत में इस समझौते पर अंतिम वार्ता होनी है. अगर सरकार उच्च शिक्षा को वैश्विक निजी क्षेत्र के लिए खोल देती है तो शिक्षा एक उत्पाद होगी और छात्रों को अंतर्राष्ट्रीय कीमत पर शिक्षा खरीदनी होगी. ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों ने शिक्षा क्षेत्र को विश्व व्यापार के लिए खोलने से इंकार कर दिया है. छात्र-छात्राएं और अध्यापकों का तर्क है कि सरकार से इस कदम से शिक्षा की गुणवत्ता तो प्रभावित होगी ही, साथ ही देश का बहुसंख्यक तबका जो आर्थिक रूप से कमजोर है, उच्च शिक्षा से वंचित हो जाएगा.

शिक्षा को विश्व व्यापार के लिए खोलने के विरोध में अध्यापकों के संगठन भी छात्रों के साथ हैं. प्रदर्शन में शामिल सभी छात्रों की ओर से एक राष्ट्रीय मोर्चा बनाने की तैयारी है जो इस मसले पर राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलाएगा. 29 अक्टूबर को आईसा की ओर से जारी बयान में कहा गया, ‘हमारा आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक हमारी सभी मांगें पूरी नहीं हो जातीं. हमें मालूम है कि नॉन नेट फेलोशिप बंद करने का निर्णय दिसंबर में विश्व व्यापार संगठन के साथ होने वाली वार्ता के मद्देनजर लिया गया है. हम शिक्षा को विश्व व्यापार संगठन के हवाले करने की इजाजत नहीं देंगे.’

जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष का कहना है, ‘हम नॉन नेट फेलोशिप के अलावा शिक्षा को बाजार और पूंजी के हवाले करने के भी विरोध में हैं. इससे शिक्षा गरीब जनता की पहुंच से बाहर हो जाएगी. दरअसल हम शिक्षा को बचाने के लिए लड़ रहे हैं.’ इस विरोध प्रदर्शन में एआईएसएफ, एसएफआई, आईसा, एनएसयूआई शामिल हैं. इसके अलावा ऐसे छात्र भी शामिल हैं जो किसी संगठन में नहीं हैं. फिलहाल, इलाहाबाद, पुडुचेरी, वर्धा, हैदराबाद और अलीगढ़ से विरोध-प्रदर्शन की खबरें हैं.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ की ओर से जारी बयान में कहा गया है, ‘हम यूजीसी के उस फरमान के खिलाफ हैं जिसमें कहा गया है कि उन छात्र-छात्राओं को अब शोधवृत्ति नहीं दी जाएगी जो नेट की परीक्षा पास नहीं होंगे.’ इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ की अध्यक्ष ऋचा सिंह ने 28 अक्टूबर को एक जुलूस का नेतृत्व किया, जिसमें एसएफआई, आईसा, एआईडीएसओ और फ्रेंड्स यूनियन के छात्र-कार्यकर्ता शमिल रहे. छात्राें ने मांग की है कि यूजीसी अपना निर्णय वापस लेने की घोषणा करे और उसे अपनी वेबसाइट पर प्रदर्शित करने के साथ शोध छात्रों का मानसिक उत्पीड़न बंद करे. भारत के राष्ट्रपति और मानव संसाधन विकास मंत्री को संबोधित अलग-अलग ज्ञापनों में छात्रों ने अपनी मांगें और शिकायतें दर्ज कराईं. इस मसले पर इलाहाबाद में हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है. यहां पर एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने भी यूजीसी के चेयरमैन का पुतला फूंका. हालांकि, एबीवीपी ने छात्र आंदोलन से खुद को अलग रखा है.  इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ की अध्यक्ष ऋचा सिंह ने कहा, ‘नॉन-नेट शोध छात्रों की फेलोशिप हटाना अदूरदर्शी और अलोकतांत्रिक है.’

गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद के शोध छात्र रमाशंकर ने बताया कि ‘केन्या की राजधानी नैरोबी में होने वाली विश्व व्यापार संगठन की आगामी बैठक में किए जाने वाले समझौते छात्रों को ग्राहक में बदल देंगे. फीस महंगी हो जाएगी और उच्च शिक्षा गरीबों के लिए सपना हो जाएगी. केंद्र सरकार को शिक्षा के बजट को बढ़ाकर शोध और विकास की उस परियोजना को आगे बढ़ाना चाहिए जो भारत की आजादी की लड़ाई के दौरान इसके निर्माताओं ने सोची थी. आज के दौर में प्रजातंत्र और आधुनिकता के मूल्य उच्च शिक्षा के बिना आगे नहीं जा सकते. दुर्भाग्य से केंद्र सरकार ने अपनी रुचियों का क्षेत्र बदल दिया है.’

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इलाहाबाद छात्रसंघ अध्यक्ष का चुनाव लड़ चुके एसएफआई के प्रदेश उपाध्यक्ष विकास स्वरूप का मानना है, ‘समान कार्य के लिए समान फेलोशिप की संरचना जरूरी है, न कि इस प्रकार की विभेदकारी व्यवस्था.’ शोधछात्र अंकित पाठक मानते हैं, ‘नॉन नेट छात्र विश्वविद्यालय में शोध कार्यक्रम में प्रवेश लेते हैं, अपने पांच साल के शोध के दौरान नेट हो जाते हैं, कुछ को जूनियर रिसर्च फेलोशिप मिल जाती है. यह फरमान इन संभावनाओं को खत्म कर देगा.’

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मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से गठित समिति इन मुद्दों पर करेगी विचार

  • योग्यता के आधार पर नेट फेलोशिप की संख्या बढ़ाने की व्यावहारिक समीक्षा
  • नॉन नेट शोधकर्ताओं को हर माह फेलोशिप की राशि का हस्तांतरण करने के लिए पारदर्शी पद्धति स्थापित करना. वर्तमान में यह प्रतिपूर्ति के आधार पर और सरकार के प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण आदेश के बिना की जा रही है
  • नॉन नेट फेलोशिप योजना के लाभों और अवसरों को राज्य विश्वविद्यालयों सहित बड़ी संख्या में विश्वविद्यालयों तक पहुंचाना
  • नॉन नेट फेलोशिप के लिए आर्थिक और अन्य मापदंड पर विचार करना. नॉन नेट फेलोशिप के चयन, प्रदान करने और प्रशासन के बारे में दिशानिर्देश की सिफारिश करना

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आंदोलन में शामिल जेएनयू के शोधछात्र ताराशंकर ने कहा, ‘हम मांग कर रहे थे कि महंगाई और बढ़ते खर्चों को देखते हुए नॉननेट फेलोशिप की राशि बढ़ाई जाए तो यूजीसी ने कहा कि अगले साल से फेलोशिप ही बंद कर दी जाएगी! इसका विरोध किया गया तो सरकार ने कहा कि ठीक है फेलोशिप बंद नहीं होगी! कुल मिलाकर बात तो वहीं पहुंची जहां से शुरू हुई थी! दबाव में आकर स्मृति ईरानी ने कहा कि मांग के मुताबिक नॉन नेट फेलोशिप सभी विश्वविद्यालयों में लागू रहेगी, लेकिन ये भी कहा कि एक रिव्यू कमेटी बनेगी, वो समीक्षा करेगी और उसके अनुसार निर्णय लिया जाएगा… यानी अगर कल को रिव्यू कमेटी कह दे कि बिना नेट परीक्षा पास किए किसी को फेलोशिप नहीं दी जाएगी या मेरिट वाला कोई क्राइटेरिया रखकर अधिकांश छात्रों को इस दायरे से बाहर कर दिया जाए तो यूजीसी उसे मान लेगी!’

बहरहाल,  ‘ऑक्यूपाई  यूजीसी’ अभियान का दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ, जामिया शिक्षक संघ ने समर्थन किया है. दक्षिण अफ्रीका की शिक्षा नीति को लेकर वहां के छात्र भी आंदोलनरत हैं. उस आंदोलन से जुड़े छात्रों ने भी इस अभियान के समर्थन में पत्र भेजा है.

देशबंधु कॉलेज के प्रोफेसर संजीव ने कहा, ‘नॉन नेट फेलोशिप और शिक्षा के बाजारीकरण के मुद्दे आपस में जुड़े हैं. शिक्षा क्षेत्र को विश्व व्यापार के लिए खोलने के बाद आप जितनी सुविधाएं, फंडिंग आदि अपने विश्वविद्यालयों को देते हैं, उतना ही विदेशी संस्थाओं को भी देना होगा. ऐसा न करना डब्ल्यूटीओ के नियमों का उल्लंघन होगा. दूसरे, शिक्षा क्षेत्र को विश्व व्यापार के लिए खोल देने पर आम जनता के लिए शिक्षा की उपलब्धता कम हो जाएगी, जो कि पहले से ही कम है. इसके बाद के हालात और भी भयावह हो जाएंगे.’

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. आशुतोष कुमार ने आगाह किया कि ‘विश्व व्यापार संगठन से समझौते का मतलब है कि शिक्षा प्रणाली को विश्व व्यापार के लिए खोलना, जिसकी शर्तें बाजार तय करेगा. फेलोशिप कम करना, शिक्षा बजट घटाना उसी प्रक्रिया का हिस्सा है. सरकार का अगला कदम होगा कि आईआईटी और अन्य बड़े संस्थानों की आर्थिक सहायता कम की जाएगी और उन्हें निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया जाएगा. बाहर से जितना कॉन्ट्रीब्यूशन ​होगा, सरकार उसी हिसाब से फंड करेगी. निजी क्षेत्र शिक्षा के लिए फंड करेगा तो वह अपनी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाएगा, सरकार भी उन्हीं विषयों को तवज्जो देगी. ज्ञान के बुनियादी इलाके में मार्केट की कोई दिलचस्पी नहीं है. इसका परिणाम यह होगा कि बाजार की मांग पर रिसर्च भी होंगे और जितने भी बेसिक रिसर्च हैं, वे सब के सब बंद हो जाएंगे.’

डीयू के एक कॉलेज की शिक्षक डॉ. सुनीता का कहना है, ‘यूजीसी व सरकार को यह नॉन नेट फेलोशिप बंद नहीं करनी चाहिए. अगर उसे लगता है कि इसमें पारदर्शिता की कमी है तो उसके उपाय करने चाहिए. क्योंकि अगर कोई साधारण पृष्ठभूमि का छात्र संघर्ष करके शोध करने तक पहुंचता है तो यह फेलोशिप उसे बहुत मदद करती है. ग्रेजुएशन या पोस्ट ग्रेजुएशन की अपेक्षा शोध महंगा है. फेलोशिप मिलने से छात्रों को मुक्त होकर शोध करने का अवसर मिलता है.’ आईसा की अध्यक्ष सुचेता डे ने बताया, ‘हमारा संघर्ष देश के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए है. इस मुद्दे पर जनता की राय ली जानी चाहिए. यह आंदोलन उनके लिए है जो हमारी आवाज को दरकिनार कर रहे हैं.’

डीयू के प्रो. अपूर्वानंद का कहना है, ‘दुनिया भर के देश जब अपने को मापते हैं तो यह देखते हैं कि उनके यहां कितना शोधकार्य हो रहा है. उस हिसाब से वे अपनी शैक्षिक नीतियां तय करते हैं. चीन अपने यहां उच्च शिक्षा पर सबसे ज्यादा ध्यान दे रहा है. अमेरिका इसलिए सुपर पावर नहीं है कि वह हथियार बेचता है. दुनियाभर के स्कॉलर वहां पर शोध करना चाहते हैं. उसने बड़ी संख्या में नोबेल विजेता पैदा किए हैं. आप गुणवत्ता के तर्क के आधार पर अगर परिमाण घटा देंगे तो गुणवत्ता और कम हो जाएगी. परिमाण बढ़ेगा तो गुणवत्ता अपने आप बढ़ेगी. केंद्र सरकार ने विज्ञान प्रयोगशालाओं से भी कहा है कि वे अपने लिए पैसा खुद जुटाएं. इसी क्रम में नॉन नेट फेलाशिप भी हटा दी. यह कदम पूरी तरह ज्ञान विरोधी है. पिछले कुछ समय से जिस नॉलेज इकोनॉमी की बात चल रही थी, इस सरकार ने उसे बदल दिया. नई सरकार ने अपनी नीतियों से नॉलेज (ज्ञान) शब्द ही हटा दिया है.’

मां बनने का दुख!

Rehabilitation

ये यकीन से परे था, दो महीने पहले 13 साल की मूक-बधिर लड़की को गर्भपात के लिए एक अस्पताल में भर्ती किया गया. वो बेचारी ये तक नहीं जानती थी कि उसके साथ क्या हो रहा था. अस्पताल में उसके गर्भ को गिराया गया, उसकी वजह बलात्कार थी. दूसरी तरफ उसके घर का उजाड़ वातावरण वहां रहने वालों की मनोदशा जैसा ही था. पड़ोसी उस मासूम की मां गीता की मदद के लिए आते हैं, जो दो साल पहले अपने पति को खो चुकी हैं. उनके चेहरे पर सिर्फ डर और चिंता है, जिसकी वजह 37 साल के एक शख्स की घटिया हरकत है. ये उस शख्स ने किया जो न केवल उनका भरोसेमंद पड़ोसी था, बल्कि उनके परिवार के लिए एक भाई की तरह था.

अब तक, यौन उत्पीड़न और बलात्कार से जुड़े मामलों को आरोपियों की गिरफ्तारी तक ही रिपोर्ट किया जाता है. एक बार अगर आरोपी गिरफ्तार हो जाता है, तो ये मान लिया जाता है कि ये मामला अब खत्म हुआ, अब ‘पीड़िता’ और  उसका परिवार फिर से सामान्य जीवन जीने लगेगा. पर क्या ये कहना और सोचना इतना आसान है? इस दौरान जिस अहम चीज की उपेक्षा कर दी जाती है वह यह है कि पीड़िता किस तरह एक ‘सर्वाइवर’ में बदल जाती है. वो महिलाएं या लड़कियां, जो बलात्कार की वजह से मां बनती हैं और इसके अवांछित नतीजों का सामना करती हैं, उनके दर्द को शायद ही कोई समझ सके.

‘तहलका’ ऐसी ही कुछ महिलाओं और युवतियों की आवाज सामने ला रहा है, ये बताने के लिए कि उनकी जंग अभी भी खत्म नहीं हुई है. सौभाग्य से, इनमें से कुछ युवतियों के साथ समाज खड़ा होता है. बलात्कार की शिकार 13 साल की मासूस की पड़ोसी गौरी कहती हैं, ‘उसके दिन अच्छे थे जो वो जेल में है हमारे हाथ में आता तो मर चुका होता. अच्छा हुआ कि हम समय रहते बच्ची के गर्भ के बारे में जान गए, वरना पूरे समाज के सामने हमें शर्मिंदा होना पड़ता.’ दूसरी तरफ वो मासूम लड़की इस हादसे की वजह से हुए बदलावों से अनजान है, क्योंकि उसके मूक-बधिर होने के कारण उसे बलात्कार के जैविक परिणामों के बारे में प्रभावी ढंग से नहीं बताया जा सकता. उसकी मां गीता रोते हुए बताती हैं, ‘इस घटना का असर बस उसके डर में दिखता है.’ पीड़िता को धमकाया गया था कि अगर वो अपने साथ हुई घटना (बलात्कार) के बारे में किसी को बताएगी तो उसकी मां की हत्या कर दी जाएगी. उस मासूम की पीड़ा तब और बढ़ जाती है जब वो अपने घर में इकट्ठी भीड़ को हैरानी भरे सवालिया नजरों से देखती है.

सामान्य तौर पर यौन उत्पीड़न के मामले उनके साथ होते हैं, जिन्हें असहाय के रूप में देखा जाता है और दुनिया भर में बच्चे ही इसका आसान शिकार बनते हैं. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों से जाहिर होता है कि 2013 में बलात्कार की कुल 33,707 वारदातें सामने आईं, जो 2012 के मुकाबले 35.2 फीसदी ज्यादा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2002 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में 18 साल से कम उम्र की करीब 15 करोड़ लड़कियों और 7.3 करोड़ लड़कों ने किसी न किसी रूप में यौन हिंसा का सामना किया था. अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक 2002 में अमेरिका के प्रति 1000 बच्चों में 12 बच्चे यौन उत्पीड़न के शिकार थे. इन आंकड़ों की रोशनी में ‘तहलका’ ने न्यूयॉर्क टाइम्स की मशहूर लेखिका डलीन बेरी से संपर्क किया. डलीन एक पुरस्कृत पत्रकार, स्तम्भकार और संपादक रही हैं, जिन्होंने हाल ही में ऑनलाइन प्रकाशकों के लिए भी लिखना शुरू किया है. डलीन की जिंदगी का दूसरा पहलू ये है कि 13 साल की उम्र में वे भी यौन उत्पीड़न की शिकार हुई थीं.

अक्सर यही देखा जाता है कि बलात्कारी या आरोपी पीड़ित की जान-पहचान का ही होता है. ज्यादातर तो परिवार के बेहद विश्वस्त होते हैं. बेरी बताती हैं, ‘तमाम दूसरे बच्चों की तरह मैं भी सिंगल-पैरेंट वाले घर से थी. मां जरूरत से ज्यादा काम में व्यस्त रहती थीं, पिता होकर भी नहीं थे. शायद इसलिए मेरे उत्पीड़क के लिए मुझ तक पहुंचना आसान था. अगर माता-पिता साथ होते तो मुझ तक उसकी पहुंच इतनी आसान नहीं होती. मेरी मां उस पर अपने परिवार के किसी सदस्य की तरह विश्वास करती थीं.’

बलात्कार और उसके साथ जुड़े सदमे की वजह से ये युवतियां खुद को अकेला और अलग-थलग महसूस करती हैं. ऐसे में अगर वह गर्भवती हो जाएं, तब तो ये भावनाएं उन पर और ज्यादा हावी हो जाती हैं. तीन साल तक यौन उत्पीड़न की शिकार बनने के बाद बेरी ने आखिरकार अपने उत्पीड़क से शादी कर ली क्योंकि वे उसके बच्चे की कुंवारी मां बनने वाली थी. दुर्भाग्य से, उनके उत्पीड़न का ये सिलसिला यही खत्म नहीं हुआ. बेरी याद करती हैं, ‘1995 तक, मैं 21 साल की थीं, तीन बच्चे थे और चौथा जन्म लेने वाला था. मैं बाथरूम के फर्श पर बैठी थी और बच्चों समेत खुद को मारने की योजना बना रही थी.’

एक बार जब यौन उत्पीड़न से जुड़ी कानूनी-प्रक्रियाएं पूरी हो जाती हैं तो अक्सर औरत की लाचारगी, उसकी असहाय स्थिति की उपेक्षा कर दी जाती है. बेरी अपने आत्महत्या के बारे में सोचने की वजह बताती हैं, ‘मैं मरना चाहती थी क्योंकि मुझे लगता था कि जैसे खुद अपने शरीर पर भी मेरा कोई अख्तियार नहीं है, उसके साथ क्या हुआ या क्या होगा इस पर मेरा कोई वश नहीं है. मैं जैसे कोई कठपुतली थी जिसका कोई अपनी मर्जी के हिसाब से इस्तेमाल कर रहा था. ऐसा लग रहा था कि जैसे मेरा शरीर कोई औजार हो, कोई खिलौना हो और वह (पति) उसके साथ जो चाहे वो कर सकता था. मुझे लगता था कि मैं उस जिंदगी से कभी आजाद नहीं हो पाऊंगी और उस जिंदगी को मैं और ज्यादा नहीं जीना चाहती थी.’ पर उनका सौभाग्य था कि वे बच गईं. वह बताती हैं, ‘मैं अपने पति के चंगुल से तब तक नहीं निकल सकती थी जब तक कि मैं अपनी और बच्चों की खुद देखभाल करने लायक नहीं हो जाती. इसलिए मैंने एक योजना बनाई. मुझे एक नौकरी मिल गई. मैं बच्चों और खुद की सारी जिम्मेदारियां उठाना सीख गई और इन सबके दरम्यान धीरे-धीरे मेरा आत्मसम्मान विकसित हुआ, जिसने मुझमें भरोसा जगाया कि मैं उस आदमी से बच निकलने और अपने बलबूते पर जीवनयापन करने के योग्य थी.’

बेरी के उलट, बहुत सारी महिलाएं इन परिस्थितियों में खुद को पूरी तरह असहाय पाती हैं. भारत में, ऐसी पीड़िताओं को इन विपरीत परिस्थितियों से पार पाने और जिंदगी जीने में मदद करने के लिए तमाम परामर्शदाता या सलाहकार होते हैं. कई सलाहकार ‘रेप क्राइसिस इंटरवेंशन सेंटर्स’, राष्ट्रीय महिला आयोग, दिल्ली महिला आयोग जैसे संगठनों के साथ मिलकर पीड़िताओं की मदद करते हैं.

दिल्ली महिला आयोग की काउंसलर और वकील शुभ्रा मेंदीरत्ता बताती हैं, ‘एक बार जब शिकायत दर्ज हो जाती है तो हम पीड़िता और उसके परिवार के सदस्यों को हर तरह की भावनात्मक, कानूनी और चिकित्सकीय मदद देने की प्रक्रिया शुरू कर देते हैं.’ बलात्कार की शिकार बहुत सारी नाबालिग बच्चियां परिस्थितियों को नहीं समझ पातीं. ऐसे मामलों में माता-पिता की काउंसलिंग बहुत जरूरी हो जाती है. मेंदीरत्ता आगे बताती हैं, ‘माता-पिता बेटी से बलात्कार होने के बाद उसकी शादी को लेकर बेहद चिंतित हो जाते हैं. उन्हें काउंसलिंग की बेहद जरूरत होती है. एक बार जब पीड़िता भावनात्मक रूप से कुछ हद तक संभल जाती है तो हम उसके लिए काउंसलिंग सत्र नियमित कर देते हैं. पीड़िता की चिकित्सकीय जांच के दौरान सलाहकार उसके साथ रहते हैं और टू-फिंगर टेस्ट न हो इसके लिए दबाव भी डालते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी टू-फिंगर टेस्ट पर बैन लगा रखा है.’ अगर पीड़िता गर्भवती हो जाए और गर्भपात करना मुमकिन हो तो इसके लिए भी प्रावधान दिया गया है. हालांकि मेंदीरत्ता गर्भपात करवाने से असहमत हैं, ‘प्री-मैच्योर अबॉर्शन यानी समय पूर्व गर्भपात में बहुत सारी ऊर्जा का ह्रास होता है और लड़की को समुचित पोषण की जरूरत होती है. ये तभी हो सकता है जब सरकारी मुआवजे को तत्काल उपलब्ध कराया जाए.’ आगे बात करते हुए उन्होंने जिक्र किया कि ऐसे मुआवजों को उपलब्ध कराने की कानूनी प्रक्रिया इतनी लंबी है कि तत्काल राहत का इसका उद्देश्य ही बेमानी हो जाता है.

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमारमंगलम के मुताबिक, ‘सबसे पहला काम तो ये सुनिश्चित करना होता है कि सर्वाइवर्स के पास खुद के पैरों पर खड़े होने की क्षमता हो. उन्हें समाज से पूरा सहारा मिलना चाहिए. उन्हें हाथों हाथ लिए जाने की जरूरत है.’ ललिता के अब तक अनुभवों के आधार पर वो बताती हैं कि महिला के लिए यौन हिंसा सिर्फ शारीरिक कष्ट नहीं है, ये इससे कहीं ज्यादा है. कुछ समय तक के लिए तो उनके आत्म-अस्तित्व की भावना ही खत्म हो जाती है. वह खुद को किसी भी लायक नहीं समझती. एक बार जब वह इससे पार पाना सीख लेती हैं तो वह पहले से मजबूत हो जाती हैं और बलात्कार की वजह से पैदा हुए बच्चे का पालन-पोषण और उसके लिए लिए संघर्ष करने लगती हैं. कुमारमंगलम कहती हैं, ‘बच्चे का भला-बुरा इस बात पर निर्भर करता है कि मां भावनात्मक रूप से कितनी मजबूत है. आमतौर पर माताएं काफी मजबूत होती हैं और अपने बच्चों का लालन-पालन करने में समर्थ होती हैं.’ यहां भारतीय समाज को भी बेहतर भूमिका निभाने की जरूरत है. समाज को भी रेप सर्वाइवर और उसके बच्चों को स्वीकृति देनी होगी.

बलात्कार की शिकार युवतियों को पूरी आजादी तभी मिल पाएगी जब उनका सही से पुनर्वास हो, समाज संवेदनशीलता के साथ मां और उसके बच्चे का साथ दे

भारतीय समाज की पाखंडी प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए कुमारमंगलम कहती हैं, ‘हाल ही में बलात्कार के एक मामले में एक खाप पंचायत ने फैसला लिया कि बलात्कारी से ही लड़की (जो नाबालिग थी) की शादी कर दी जाए तो लड़की सुरक्षित रहेगी. ये बेहद गलत है क्योंकि खुद लड़की की राय के बारे में किसी ने जरा भी फिक्र नहीं की.’ सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक और दूरगामी असर डालने वाला फैसला सुनाया है. फैसले के मुताबिक, बिन-ब्याही माताएं अपने बच्चों की संरक्षक हैं, पूर्ण अभिवावक हैं. कुमारमंगलम ये भी बताती हैं कि बलात्कार की शिकार डरी हुई होती हैं कहीं वे एचआईवी से संक्रमित तो नहीं हो चुकी हैं क्योंकि ज्यादातर बलात्कारी सीरियल रेपिस्ट भी होते हैं.

यौन उत्पीड़न का सामना कर चुकी ज्यादातर महिलाएं इसके लिए खुद को जिम्मेदार मानने लगती हैं. बलात्कार की शिकार युवतियों की जिंदगी में बदलाव लाने के संबंध में कुमारमंगलम बताती हैं, ‘सबसे पहला कदम तो खुद को दोष देने की प्रक्रिया पर रोक लगाना है, जो अपने आप में एक बहुत बड़ा कदम होगा. इसके बाद महिला को भौतिक या मनोवैज्ञानिक, हर स्तर पर आत्म-निर्भर बनाना है. उसमें ये विश्वास जगे कि उसके पास वह सब कुछ है जो जिंदगी जीने के लिए जरूरी है, उसके पास मकसद है. जरूरत पड़ने पर उन्हें ट्रेनिंग दी जाती है ताकि वे समाज में खुद के लिए एक जगह बनाने में समर्थ हों.’ शुभ्रा मेंदीरत्ता की राय है कि ये एक अंतहीन प्रक्रिया है. वह भी ललिता कुमारमंगलम जैसी ही राय रखती हैं और कहती हैं, ‘निश्चित तौर पर ये प्रक्रिया ऐसी है जैसे आपको हाथ थामकर चलना है. ऐसे मामलों में ये उसी तरह है जैसे आप घोड़े को पानी के पास ले जा रहे हों और उसे पीने की प्रक्रिया समझा रहे हों और उनमें ये विश्वास भर रहे हों कि वे ऐसा करके जी पाएंगी.

विपरीत परिस्थितियां लोगों को मजबूत बनाती हैं और ये पीड़िताएं अधिकांश लोगों के मुकाबले ज्यादा मजबूत होती हैं. इन्हें उनकी जरूरत की सारी चीजें उपलब्ध कराने के लिए निश्चित तौर पर एक सिस्टम विकसित होना चाहिए, लेकिन पीड़िताओं के अपने परिजनों-दोस्तों की भूमिका यहां सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है. अगर वे उसके साथ मजबूती से खड़े होते हैं तो वह सारी मुश्किलों से पार पा जाएंगी. अगर परिजन-प्रियजन उसके साथ नहीं खड़े होंगे तो निश्चित ही ऐसा माहौल बनेगा जिसमें वह टूट जाएंगी. इन्हें पूरी तरह आजादी तभी मिल पाएगी जब उनका सही से पुनर्वास हो, समाज संवेदनशीलता के साथ मां और उसके बच्चे का साथ दे.

 (सभी नाम बदले गए हैं)

पटेल आरक्षण चाहते हैं या सिर्फ आंदोलन

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इस समय पटेल आंदोलन क्यों शुरू हुआ? क्या ये सच में पटेलों के लिए आरक्षण पाने की मुहिम है या ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) आरक्षण को खत्म करने की साजिश? शुक्र है अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तक फिलहाल इस आंदोलन की आंच नहीं पहुंची. क्या यह आंदोलन नरेंद्र मोदी को मजबूत करने की लिए है, जिन्होंने आम चुनावों में पिछड़ी जाति का वोट बटोरने के चक्कर में खुद को पिछड़ी जाति का घोषित कर दिया था और जिसकी वजह से वे चुनकर आए? वैसे भी इस बार तो भाजपा की जगह उन्हें ही चुना गया है. या कहीं ये इसलिए तो नहीं किया जा रहा कि मोदी की नाव को झटका देकर यह देखा जाए कि पटेल, जाट, गुर्जर जैसी पिछड़ी जातियों की पकड़ केंद्र सरकार में मजबूत होती है या नहीं. हालांकि सवाल ये भी उठता है कि क्या ये जातियां वाकई में इतनी मजबूत हैं कि ब्राह्मण और बनियों को चुनौती दे सकें, जो वास्तव में केंद्र सरकार को चला रहे हैं और जिनकी वजह से मोदी मजबूत प्रधानमंत्री नजर आते हैं? इस तरह के कुछ सवाल हैं, जिनकी पूछताछ करने के साथ इनके संभावित जवाबों को जनता के सामने रखने की जरूरत है.

भाजपा के प्रबल समर्थकों में वे लोग भी शामिल हैं, जो आरक्षण का समर्थन करने वालों के खिलाफ हैं. साथ ही वे भी, जो ‘सनातन वर्ण धर्म’ (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) के समर्थक हैं. इस प्रकार इन प्रबल समर्थकों में ब्राह्मण, बनिया, राजपूत और शूद्र वर्ग की उच्च जातियों जैसे पटेल, जाट और मराठा शामिल हैं, जो लोकसभा चुनावों के समय जोश में थे और जिन्हें यह समझाया गया था कि अगर मोदी की सरकार केंद्र में आई तो ओबीसी आरक्षण पर फिर से विचार किया जाएगा.

हमें यह तथ्य भी नहीं भूलना चाहिए कि सोशल मीडिया पर ‘टीम मोदी’ (उस समय यह ‘टीम इंडिया’ नहीं थी) के लोगों को लामबंद करने की रणनीति में उच्च वर्ग के युवाओं की संख्या ज्यादा थी, जो आरक्षण के खिलाफ थे. अब ये युवा खुद को ठगा-सा महसूस कर रहे हैं. उन्हें लगता हैं कि मोदी की जीत उनकी वजह से ही हुई है, लेकिन जीत के बाद उनकी सरकार आरक्षण के मुद्दे की समीक्षा की तरफ ध्यान ही नहीं दे रही है.

मोदी ने जब खुद को पिछड़ी जाति का बताया था तब उनका यह बयान हैरान कर देने वाला था क्योंकि जब तक वे गुजरात के मुख्यमंत्री रहे तब तक उन्होंने इसे तुरुप के पत्ते की तरह छिपाकर रखा. उन्हें इस बात का अंदाजा था कि पटेल और ऊंची जाति वाले दूसरे गुजराती लोग ओबीसी और अल्पसंख्यकों (मुस्लिम या दलित ईसाइयों) के आरक्षण के खिलाफ हैं. हालांकि 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान उत्तर प्रदेश और बिहार का चुनावी मैदान अलग था. इन राज्यों में जब तक अन्य पिछड़ा वर्ग के सत्तारूढ़ नेताओं से तालमेल बैठाकर ओबीसी वोट को अपने पक्ष में नहीं किया जाता तब तक मोदी यहां ज्यादा सीटें नहीं जीत सकते थे. यूपी और बिहार में अच्छी खासी संख्या में सीटें जीतने के बाद मोदी अब न तो ओबीसी आरक्षण के खिलाफ जा सकते हैं और न सुप्रीम कोर्ट की ओर से तय किए गए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को खत्म कर सकते हैं. न ही वे आरक्षण की सीमा को भारत की शूद्र जाति के उच्च वर्ग तक बढ़ा सकते हैं, जो एक समय में मंडल कमीशन को तरजीह देने की बजाय क्षत्रियों के साथ होने को तरजीह देते थे.

इन सभी जातियों ने अपने नाम के साथ पटेल, चौधरी, रेड्डी और राव जैसे उपनाम लगाने शुरू कर दिए. ऐतिहासिक रूप से क्षत्रिय होने के क्रम में (हिंदुत्व के प्रभाव में) ऐसा किया गया था. ऐसा इसलिए क्योंकि आजादी के बाद से यह एक तरह का चलन बन गया था. दूसरे शब्दों में कहें, जिसे मैंने अपनी किताब ‘वाय आई एम नॉट अ हिंदू’ में भी बताया है कि अनुसूचित जाति और जनजाति से घृणा के कारण शुरुआत में वे ‘नए-क्षत्रिय’ (नियो-क्षत्रिय) बन गए. इसके बाद अब इन लोगों ने अन्य पिछड़ा वर्ग के खिलाफ भी घृणा विकसित करनी शुरू कर दी हैं, जो केंद्रीय और राज्य सेवा में शामिल हो रहे हैं. हालांकि अंग्रेजी सीखने और भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में जाने के मामले में ये समुदाय ब्राह्मण, बनिया और क्षत्रिय युवाओं से तगड़ा मुकाबला नहीं कर सका है. इसका परिणाम यह हुआ कि अब हम देख सकते हैं कि गुजरात केंद्रित केंद्र सरकार में ब्राह्मण और बनिया ज्यादा दिखाई देते हैं, लेकिन पटेल मुश्किल से नजर आते हैं. पटेल सोचते हैं कि ‘गुजरात’ का मतलब ‘वे खुद’ हैं और ‘वे खुद’ ही ‘गुजरात’ हैं. हालांकि भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में उनकी मौजूदगी लगभग शून्य है. अब उन्हें महसूस हुआ है कि गुजरात में उनका पाटीदारी जीवन या यूरोप और अमेरिका में उनका औद्योगिक स्वामित्व भारतीय नौकरशाही तंत्र में ज्यादा प्रासंगिक नहीं रह गए हैं. मुझे नहीं लगता है कि भारत में पटेल समुदाय में से अंग्रेजी में बोलने वाला कोई प्रबुद्ध राजनयिक होगा. भारत की शूद्र जाति के उच्च वर्ग में यही वास्तविक समस्या है.

अंग्रेजी से लैस उच्च प्रशासनिक तंत्र में मुख्य रूप से ब्राह्मण, बनिया और जैन के साथ कुछ दलित अधिकारी और दक्षिण भारत के कुछ नेता शामिल हैं. शूद्र जाति के उच्च वर्ग रियल इस्टेट और औसत दर्जे के शिक्षा से जुड़े व्यापारों में  हैं. यह उन्हें वैश्विक जीवन स्तर के लिए जरूरी प्रबुद्धता नहीं देता. ईमानदारी से कहूं तो मोदी खुद भी भारत के अंग्रेजीदां प्रशासनिक तंत्र को संभालने में कठिनाई महसूस करते होंगे. दिल्ली की जनसभाओं में हिंदी में भाषण देना भर ही काफी नहीं.

शूद्र जाति के उच्च वर्ग को लगता है कि वीपी सिंह के कार्यकाल में उन्होंने जिस मंडल कमीशन का विरोध किया था वह अब ब्राह्मण और बनियों के मुकाबले में उनके प्रशासनिक सेवाओं में जाने का दरवाजा खोल देगा. शूद्र जाति के उच्च वर्ग के बच्चे सामान्य कोटा में ब्राह्मणों और बनियों के साथ प्रशासनिक सेवा के लिए मुकाबला करते हैं और जब सफल नहीं होते तो बिना अंग्रेजी के चल सकने वाले कारोबार या फिर कृषि से जुड़े व्यवसायों को पकड़ लेते हैं. उदाहरण के तौर पर राजस्थान और गुजरात के मीणा (जनजाति) को देखा जा सकता है. मीणा अच्छी अंग्रेजी जानते हैं और दोनों राज्यों की नौकरशाही में पटेल और गुर्जरों की तुलना में बेहतर दखल रखते हैं. पैसे से इतर राज्य की सत्ता में होना एक अलग हैसियत प्रदान करता है.

भाजपा यह नहीं जानती कि पटेल और उच्च वर्ग के आंदोलन को कैसे संभाला जाए क्योंकि वह खुद उनसे आरक्षण की समीक्षा करने का वादा कर चुकी है. अगर दिल्ली में ऐसा कुछ होता है तो ओबीसी कोटे के सांसद विद्रोह कर उठेंगे. तब मोदी सरकार एक बड़ी समस्या का सामना करेगी. ये सब बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की महानता की छांव तले हो रहा है, जिन्होंने देश की आरक्षण व्यवस्था को नई राह दिखाई. साथ ही देश में पनप रहीं इस तरह की स्थितियां जाति व्यवस्था के लिए भी खतरनाक साबित होंगी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और विश्व हिंदू परिषद (विहिप) जहां इस आंदोलन का सहयोग कर रहे हैं, वहीं भाजपा इससे अपना पीछा छुड़ाते हुए नजर आ रही है. हालांकि यह मामला राम मंदिर निर्माण जैसा नहीं है. वास्तव में गुजरात में अगर वे पटेलों को आरक्षण देते हैं, जैसा कि कांग्रेस ने महाराष्ट्र में मराठियों को दिया तो अदालत इसे रद्द कर सकती है. इस लिहाज से देखा जाए तो भारतीय न्याय व्यवस्था और अधिक संकट का सामना करने से बचाती है. यह उन लोगों के साथ भी विश्वासघात होगा, जिनसे भाजपा आरक्षण देने का वादा कर चुकी है. बहरहाल ये देखने वाली बात होगी इस समस्या का समाधान किस तरह से निकाला जाता है.

हालांकि इस बीच एक बात साफ हो चुकी है कि शूद्र जाति के उच्च वर्ग का अंग्रेजी भाषा और आरक्षण को हल्के में लेने का घमंड चूर-चूर हो चुका है.

(लेखक शिक्षाविद हैं)

भारत में कमर्शियल सरोगेसी पर लगेगा प्रतिबंध

Stamp Babyक्या है मामला?

केंद्र सरकार ने कमर्शियल सरोगेसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह इसका समर्थन नहीं करती. इससे संबंधित नए कानून में केवल भारतीयों को ही सरोगेसी की सुविधा प्राप्त करने की अनुमति होगी. कमर्शियल सरोगेसी के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा था. सरकार ने माना कि केवल भारतीय पति-पत्नी को ही परोपकारिक तौर पर ये सुविधा मिलेगी जो बच्चा पैदा करने में असमर्थ हैं. इसमें किसी तरह का लेन-देन नहीं होना चाहिए. सुविधा का लाभ लेने वाले युगलों का चयन एक सक्षम प्राधिकरण पूरी छानबीन के बाद करेगा. ‘सहायक प्रजनन तकनीक (नियमन) बिल, 2014’ में सरोगेसी से जुड़े विभिन्न प्रावधान और सरोगेट मां के अधिकारों को शामिल किया गया है.  प्रस्तावित कानून के मुख्य बिंदु हैं- कमर्शियल सरोगेसी को प्रतिबंधित करना और दंड लगाना. विकलांग सरोगेट बच्चे को लेने से मना करने पर युगल पर दंड लगाना. सरोगेट मां के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी प्रावधान.

क्या होती है कमर्शियल सरोगेसी?

जो पति-पत्नी किसी कारण से स्वयं बच्चा पैदा करने में असमर्थ होते हैं वे ऐसी महिलाओं की कोख किराये पर लेते हैं जो प्रजनन करने में सक्षम हैं. इसके लिए औरत के अंडों और आदमी के शुक्राणुओं को सरोगेट मां की बच्चेदानी में निषेचित कर दिया जाता है. गर्भावस्था के दौरान सरोगेट मां की सभी जरूरतों का ख्याल वह जोड़ा करता है जिसे बच्चा चाहिए. इस सुविधा के लिए देश में कई चिकित्सालय हैं जिन्होंने सरोगेट माओं को ठहराने के लिए हॉस्टल जैसे इंतजाम भी किए हैं. बच्चा पैदा होने के बाद उसके असली मां-बाप को सौंप दिया जाता है और सरोगेट मां को सहायता के तौर पर कुछ राशि उपलब्ध करा दी जाती है. इस सुविधा के दुरुपयोग के भी मामले आए हैं जिसके चलते सरकार ऐसा कदम उठाने जा रही है.

नए कानून का क्या होगा असर?

भारत में कमर्शियल सरोगेसी का कारोबार पिछले दशक में बहुत तेजी से बढ़ा है. संयुक्त राष्ट्र की जुलाई 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में यह कारोबार 400 मिलियन डॉलर सालाना का है और करीब तीन हजार प्रजनन केंद्र इस समय यह सुविधा उपलब्ध करा रहे हैं. कई महिलाएं जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं, अपनी कोख किराए पर देती हैं. सरकार के इस फैसले से न सिर्फ उन गरीब महिलाओं के लिए मुश्किल खड़ी होगी बल्कि विदेशी जोड़ों को भी परेशानी होगी जो एक अदद बच्चे की आस में भारत का रुख करते हैं. पश्चिमी देशों से विदेशी जोड़े भारत में इस सुविधा का लाभ लेने आते हैं क्योंकि उनके यहां सरोगेसी काफी महंगी है. नए कानून के बाद विदेशी नागरिक इस सुविधा से वंचित हो जाएंगे. साथ ही बच्चा पाने के इच्छुक भारतीय युगलों के लिए भी सरोगेट मांओं का इंतजाम करना मुश्किल हो जाएगा.

बाबा, बवाल और जरूरी सवाल

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पांच अक्टूबर को बनारस में जो हुआ, उसे सबने देखा. टीवी और सोशल मीडिया के जरिये धारणा बनी कि मोदी के बनारस आने पर अब यही सब होना है. दिल्ली से लेकर दूर देस में बसे लोग बनारस की घटना पर तरह-तरह से तर्क दे रहे थे और बनारसी उन सारे तर्कों को हंसी उड़ा रहे थे. दरअसल पांच अक्टूबर को जो कुछ भी हुआ और फिर उसे जिस तरह से बताया गया, उन दोनों यानी तथ्यों व तर्कों में तालमेल का अभाव था, उसमें घालमेल जैसा ज्यादा था.

उस दिन जो भी हुआ वह पहले से तय था. अनायास जैसा कुछ नहीं था. देखते ही देखते बनारस रणक्षेत्र बन गया. हजारों की संख्या में साधु-संन्यासी बनारस की सड़कों पर उतर गए और पुलिस से टकराव हुआ. पत्थरबाजी और लाठीचार्ज हुआ. कुछ देर के लिए कर्फ्यू भी लगा रहा. बाद में बात उड़ी कि प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र में फैली यह अशांति और डेढ़ दशक बाद काशी में लगा कर्फ्यू कहीं भाजपा और संघ परिवार की नई चाल तो नहीं. कुछ यह कह रहे थे कि बनारस का बवाल मोदी की लोकप्रियता कम करने के लिए चली गई चाल है. हालांकि सच्चाई इसके पार की है. सच यही है कि बनारस के बवाल की वजह और परिणाम दूसरा ही था. इससे जो कुछ भी हासिल हुआ उसके जरिये पहला निशाना सीधे-सीधे उत्तर प्रदेश की सरकार पर साधने की गुंजाइश है, बाद में जिसका असर पूरे देश पर होगा.

बनारस साधु-संन्यासियों से पटा रहता है, लेकिन उस दिन जो कुछ भी हुआ वह इस शहर के बदलते हुए मिजाज की ओर संकेत दे रहा है. पहली बार ऐसा हुआ कि एक-दूसरे के घोर विरोधी माने जाने वाले साधु-संन्यासी एक साथ खड़े नजर आए. यह सब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की अगुवाई में निकली अन्याय प्रतिकार यात्रा में दिखा, जो कुछ दिन पहले गणेश प्रतिमा के विसर्जन को लेकर साधु-संतों पर पुलिस के लाठीचार्ज के विरोध में निकाली गई थी. अविमुक्तेश्वरानंद बनारस के श्रीविद्यामठ के प्रमुख हैं. श्रीविद्यामठ जोशीमठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद का आश्रम है. स्वरूपानंद और कांग्रेस के मधुर संबंध राम जन्मभूमि आंदोलन के समय से ही सब जानते हैं. भाजपा और विश्व हिंदू परिषद (विहिप)जैसी संस्थाएं स्वामी स्वरूपानंद को खुलेआम कांग्रेसी एजेंट कहती रही हैं. इस नाते स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद भी हमेशा से भाजपा, विहिप जैसे संगठनों के निशाने पर रहे हैं. गंगा सेवा अभियान से लेकर दूसरे तमाम अभियानों में भाजपा और संघ के लोग उनके विरोध में ही रहे हैं. हालांकि यह समीकरण उस रोज बदलता हुआ दिखा. हिंदुत्व के उभार के नाम पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में विहिप, भाजपा समेत साध्वी प्राची जैसे वे संत-संन्यासी भी आ गए, जो अविमुक्तेश्वरानंद के विरोधी रहे हैं. यह बनारस के बदलते हुए समीकरण का संकेत है.

नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में यह सब मोदी के सांसद बनने के बाद हो रहा है लेकिन बनारसवाले जानते हैं कि यह अखिलेश सरकार के लिए नया जख्म बनने जा रहा है

इस घटना का आगे क्या असर पड़ेगा, इस पर बात करने के पहले यह जान लेना जरूरी है कि बात यहां तक पहुंची कैसे थी? हर साल की तरह इस साल भी बनारस में कुछ जगहों पर गणेश चतुर्थी का आयोजन हुआ था. बात 17 सितंबर की है. प्रतिमा विसर्जन की बारी आई तो प्रतिमाओं को गंगा की ओर ले जाने की तैयारी हो रही थी. इसके पहले हाईकोर्ट ने प्रशासन को यह आदेश दिया था कि किसी भी प्रतिमा का विसर्जन गंगा में न हो, प्रशासन इसके लिए वैकल्पिक इंतजाम करे. बनारस में प्रशासन ने राजघाट के पास एक कुंड बनवाकर इंतजाम कर दिया था. लेकिन इस पूरे मामले में काशी विद्वत परिषद ने अड़ंगा लगा दिया. परिषद ने तर्क दिया कि कुंड में प्रतिमा को विसर्जित करना शास्त्रसम्मत नहीं. प्रतिमा का विसर्जन प्रवाहमान जल में ही होना चाहिए, ठहरे हुए जल में नहीं. परिषद ने तर्क गढ़े तो पूजा समितियों को बल मिला. गणेश की प्रतिमाएं शहर के दशाश्वमेध घाट के पास पहुंचीं. उसे पुलिस ने रोका तो प्रतिमा विसर्जित करने वाले गंगा में विसर्जन को लेकर अड़ गए और बात बढ़ती चली गई. धरना प्रदर्शन शुरू हो गया. इस धरने में दो दिन गुजर गए. श्रीविद्यामठ के प्रमुख स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने आश्रम के बच्चों के साथ शामिल हो गए. वह कहते हैं, ‘मैंने एक दिन देखा, दो दिन देखा. मुझे अच्छा नहीं लगा कि गणेशजी की प्रतिमाएं सड़क पर हैं और हम लोग आराम कर रहे हैं. इसलिए मैं पहुंच गया.’

[ilink url=”https://tehelkahindi.com/is-india-being-governed-by-dictators/” style=”tick”]अविमुक्तेश्वरानंद से बातचीत..यहां पढ़ें[/ilink]

अविमुक्तेश्वरानंद वहां पहुंचे तो पुलिस से बात बढ़ी. लाठीचार्ज शुरू हुआ और बवाल मच गया. अविमुक्तेश्वरानंद समेत कई लोग घायल हुए. प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने पर भी मोदी ने पुलिसिया लाठीचार्ज पर कुछ नहीं बोला. इससे भाजपा कार्यकर्ता नाराज हुए. भाजपा के करीब 300 कार्यकर्ताओं ने इस्तीफा दे दिया. यह एक आश्चर्यजनक बात थी क्योंकि बनारस में यह सब जानते हैं कि भाजपा और अविमुक्तेश्वरानंद में छत्तीस का आंकड़ा रहा है. उन्हीं अविमुक्तेश्वरानंद के लिए भाजपाइयों के दिल में प्यार उपजा, जो इस घटना के कुछ दिनों पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न आने के बाद बीएचयू के नवनिर्मित ट्रॉमा सेंटर का उद्घाटन नारियल फोड़ खुद कर आए थे. यह कहते हुए कि पीएम नहीं आ रहे हैं तो क्या गरीबों के लिए बने इस अस्पताल का उद्घाटन रुका रहेगा!

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अविमुक्तेश्वरानंद घायल हुए तो उन्होंने ऐलान किया कि नासिक कुंभ के बाद पांच अक्टूबर को बनारस में संतों का जमावड़ा होगा और अन्याय प्रतिकार यात्रा निकलेगी. प्रशासन सचेत हो गया. लाठीचार्ज के बाद पुलिस को भी लग गया कि गलत जगह पर उसने हाथ डाल दिया है और अब बवाल मचेगा. प्रशासन ने दूसरा रास्ता अपनाया. बनारस में संतों में फूट डाली, जिसकी स्वाभाविक संभावना हमेशा बनी रहती है. अविमुक्तेश्वरानंद के दो घोर विरोधी संतों को अपने पाले में किया गया. उन दोनों का संघ से गहरा जुड़ाव माना जाता है. गंगा महासभा से जुड़े स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती और विहिप के सौजन्य से शंकराचार्य बने स्वामी नरेंद्रानंद ने प्रशासन के लाठीचार्ज कार्रवाई को गैरवाजिब नहीं बताया. हालांकि दोनों की बात का कोई खास असर नहीं हुआ. इसी बीच बनारस में राज्य के डीजीपी जगमोहन यादव का आना हुआ. उनसे पूछा गया कि लाठीचार्ज की जो घटना हुई और जिसकी वजह से शहर अंदर ही अंदर जल रहा है, उस पर आप क्या कर रहे हैं. डीजीपी ने जवाब दिया, ‘जिसने लाठीचार्ज किया है, उनसे पूछिए, मैं कुछ नहीं जानता.’ डीजीपी के बयान से बात और बिगड़ गई. मामला संभालने के लिए राज्य के पर्यटन मंत्री ओमप्रकाश सिंह भी सरकार का दूत बनकर अविमुक्तेश्वरानंद से मिलने पहुंच गए. फिर शिवपाल यादव ने भी बात की लेकिन बात बनी नहीं. तब तक अन्याय प्रतिकार यात्रा निकालने का समय आ गया और देखते ही देखते नजारा बदल गया. विहिप और दूसरे हिंदूवादी संगठन जो अविमुक्तेश्वरानंद का कांग्रेसी एजेंट कहकर विरोध करते थे, वे भी यात्रा में शामिल हुए. साध्वी प्राची जैसी फायर ब्रांड नेता भी पहुंच गई. प्रदर्शन शुरू हुआ. भीड़ में संतों और समर्थकों की संख्या बढ़ी तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अविमुक्तेश्वरानंद से बात करने की कोशिश की तब स्वामीजी ने मना कर दिया और उसके बाद जो हुआ वो सबके सामने है. बात यह हो रही है कि बनारस में डेढ़ दशक बाद कर्फ्यू लगा. घटना का दूसरा पक्ष यह है कि ढाई दशक बाद कांग्रेस और भाजपा के खेमे में बंटे रहने वाले संत एक हुए. ये नरेंद्र मोदी के लिए कम और अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के लिए ज्यादा खतरे की घंटी है. ऊपरी तौर पर यह बताया जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस में यह सब मोदी के सांसद बनने के बाद हो रहा है लेकिन बनारसवाले जानते हैं कि यह अखिलेश सरकार के लिए नया जख्म बनने जा रहा है. अविमुक्तेश्वरानंद कहते हैं, ‘लॉ एंड ऑर्डर केंद्र का नहीं, राज्य का मसला है. हमारा विरोध राज्य सरकार से है. इस बहाने बनारस में इतिहास बना, आपसी विरोध के सारे बंधन टूट गए, सनातन समाज के नाम पर सबमें एका हो गया है, इसका असर देखने को मिलेगा.

अब आगे कौन, कैसा आंदोलन करेगा, ये तो संत ही जानें लेकिन इसके संकेत मिल गए हैं. साथ ही कुछ हलको में यह संदेश चला भी गया है कि विहिप और संघ परिवार ने इस घटना के जरिये अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन कर एक बड़ी चाल चली है. देश में स्वामी स्वरूपानंद ही भाजपा विरोधी मुखर संत माने जाते हैं, जो इतने बड़े ओहदे यानी दो पीठों के शंकराचार्य हैं. स्वामी स्वरूपानंद का उत्तराधिकारी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ही माना जाता है. अगर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को संघ या विहिप या फिर भाजपा ने साध लिया तो फिर देश में संतों के जरिये राजनीति करने में उनके लिए राह आसान होगी. आज नहीं लेकिन एक समय के बाद भाजपा के लिए संभावनाओं के नए द्वार खुलेंगे.